मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
06-08-2021, 12:45 PM,
#31
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
मुंबई की बारिश और माँ बेटे का प्यार--3

अपने बेटे का मोटा लॉडा चूत में अंदर जाते ही रश्मि को ऐसे महसूस होता है जैसे कोई भाला उसकी चूत को छेद रहा हो. वो अपने बदन को ढीला छोड़ने की कोशिस करती है. गुज़रे दो सालों में आज पहली बार उसकी चूत में उसकी उंगलियों के अलावा कुछ और घुसा था और उसकी चूत वाकई में काफ़ी टाइट हो गयी थी. रश्मि बेसब्री से अपनी चूत अपने बेटे के लंड पर धकेलती है क्योंकि वो जानती थी जितनी जल्दी रवि का लौडा उसकी चूत में घुस कर उसे खोलेगा उतना ही ज़यादा उन दोनो को मज़ा आएगा.

"ओह मम्मी! तुम्हारी चूत तो किसी कुवारि लड़की की तरह टाइट है.....उफफफ्फ़.....कितनी गरम है" रवि कराहता है.

"असल में ...काफ़ी समय हो गया है...तुम्हारे पिताजी के बाद आज पहली बार चुद रही हूँ में....थोड़ा धीरे बेटा!" रश्मि रवि को समझाती है.

रवि असचर्यचकित होकर थोड़ी देर के लिए रुक जाता है, उसके चेहरे पर अविस्वास के भाव थे.

"तुम...तुम सच बोल रही हो मम्मी....क्या वाकई में आप पिताजी की मौत के बाद..."

"हां मेरे लाल में बिल्कुल सच बोल रही हूँ. अपने पिता के बाद तुम पहले और एकलौते सख्श हो मुझे चोदने वाले" रश्मि उसे बीच में टोकते हुए बोलती है "अब रूको मत. प्लीज़ बेटा, अब जल्दी से अपना लॉडा अपनी मम्मी की चूत में घुसा दे. मुझसे अब और इंतज़ार नही होता."

रवि अपना लॉडा फिर से अपनी माँ की चूत के अंदर ठेलना चालू कर देता है. चूत की गरम दीवारे उसके लंड के चारों तरफ कस गयी थी. वो अपना लौडा धीरे धीरे उसकी चूत में अंदर बाहर करने लगता है, हर धक्के के साथ गहरा होते हुए उसका लौडा आख़िर में पूरी तरह चूत में घुस जाता है.

रश्मि महसूस करती है कि उसकी चूत उसके बेटे के लौडे की लंबाई, मोटाई के हिसाब से फैल चुकी थी और उसके टट्टों को अपनी चूत के होंटो पर महसूस करके वो राहत की साँस लेती है. शैतानी से वो अपनी चूत की दीवारों को कस्ति है तो रवि के मुख से आह निकल जाती है और वो शैतान माँ अपने बेटे की हालत पर मुस्करा पड़ती है.

"सबाश मेरे लाल! तेरा पूरा लॉडा मेरी चूत घुस गया है. अब मार अपनी माँ की चूत. चोद अपनी माँ को. पूरा ज़ोर लगा कर चोद!" रश्मि कामोउन्माद में सिसियाती है.

रवि को अब किसी और प्रोत्साहन की ज़रूरत नही थी. वो उसकी टांगे पकड़ कर और भी चौड़ी कर देता है और सुपाडे को छोड़ कर वो अपना पूरा लंड बाहर खींच लेता है. उसे उपर की ओर उठाते हुए वो अपना लौडा वापिस उसकी चूत में ठोकता है. रश्मि के मुख से जोरदार सिसकी निकलती है. रवि पूरी ताक़त लगाते हुए अपनी माँ की खौलती हुई चूत अपने लौडे से ठोकने लगता है.

"हां...हां...बस ऐसे ही! ऐसे ही...मेरे लाल. सबाश....चोद मुझे!"

"ठोक मेरी चूत अपने इस मोटे और कड़े लंड से!"

"और ज़ोर से...और ज़ोर से! हां बेटा..ऐसे ही...बस ऐसे ही चोद मुझे!"

रवि को तो जैसे रश्मि की अश्लील भाषा प्रेरणा दे रही थी. वो पूरी कठोरता से अपनी माँ को ठोकता हुए उसकी चूत में गाढ़े गर्म रस को उबलता हुआ महसूस करता है. उसका लॉडा अपनी माँ की चूत में तेज़ी से अंदर होते हुए फॅक फॅक का उँचा शोर पैदा करता है. रवि अपनी माँ को चोदते हुए उसके चेहरे को देख रहा था.

वो वाकई में एक खूबसूरत नज़ारा था. उसका मुँह ऐसे खुला हुआ था जैसे एक मछली पानी के लिए तरस रही हो. उसका चेहरा काम उन्माद और वासना के कारण तमतमाया हुआ था. रवि को लगता है जैसे वो किसी अश्लील फिल्म की शूटिंग कर रहा हो जिसका नायक वो खुद था.

"रुकना मत..उफफफ्फ़...उफफफफफ्फ़......और अंदर तक...और ज़ोर से..."

"ठोक मेरी चूत....ठोक अपनी माँ की चूत.....हे भगवान....हाए...हाए.......उफफफ्फ़....चोद अपनी माँ को.......चोद डाल"

रश्मि का जिस्म अकड़ जाता है और वो बुरी तरह से काँपने लग जाती है. वो झड रही थी और उसकी चूत कसते हुए रवि के लंड को निचोड़ रही थी. उसका बदन आनंद के चरम पर पहुँच कर झटके खा रहा था.

जब रवि अपनी माँ की चूत द्वारा अपने लंड को भींचते और कसते हुए महसूस करता है तो वो घस्से लगाना बंद कर देता है. वो अचंभित सा अपनी माँ को झड़ते हुए देखता है और इसमे एक जबरदस्त रोमांच का अनुभव करता है. जब रश्मि का झड़ना कुछ कम हो जाता है तो वो पूरी निर्दयता से अपना लंड उसकी चूत में दुबारा से घुसेड देता है और उसको बुरी तरह से चोदने लगता है.

"ओह.........ओह माँ.......ओह माँ! हॅयान्म चोद मुझे...... चोद अपनी मम्मी को...... ऐसे ही मेरे लाल.... चोद चोद कर फाड़ डाल मेरी चूत!"

"और ज़ोर से...और ज़ोर से....चोद अपनी माँ को जिसे चोदने के तू बरसों से सपने देखा करता था. ....हाए में मरी....उफफफ्फ़.....कितना मोटा लॉडा है मेरे लाल का....लगा दे पूरा ज़ोर.....मेरे बेटे...ऐसे ही चोद....उफ़फ्फ़ में फिर से झड़ने वाली हूँ....में फिर से झड़ने वाली हूँ...."

"देख कैसे तेरे मोटे लौडे ने मेरी चूत फैला दी है. तूने अपनी माँ की चूत का क्या हाल कर दिया है बेटा........हाए मेरी चूत...उफफफफ्फ़....हे मेरे भगवान .....आज तो लगता है में मज़े से मर ही जाऊंगी....मेरे लाल में तो तुझे बता भी नही सकती कि तू मुझे चोद कर कितना मज़ा दे रहा है. ....उफ़फ्फ़...कितना मज़ा है अपने बेटे से चूत मरवाने में ....अहह....हाँ और गहराई तक ठोक अपनी माँ की चूत......जड तक घुसेड अपना लॉडा......उफफफफफ्फ़

"अहह...आह. चोद डाल.....चोद डाल माँ को........हे भगवान मेरा निकलने वाला है....में झड रही हूँ....मेरे साथ साथ तुम भी बेटा....गिरा दो अपना माल मेरी चूत में.....भर दे अपनी मम्मी की चूत अपने गरम रस से..."

रवि आँखे बंद किए और दाँत भिंचे पूरे ज़ोर से अपनी माँ को चोदे जा रहा था. वो अपने टट्टों में वीर्य उबलता हुआ महसूस करता है और फिर हलाल होने वाले बकरे की तरह एक उँची कराह भरते हुए एक आखरी धक्का लगा कर अपना लॉडा अपनी माँ की चूत की जड तक पहुँचा देता है.

रश्मि अपनी चूत में जबरदस्त ऐंठन महसूस करती है और फिर उसकी चूत में गर्म वीर्य की बरसात सी होने लगती है. उसका मुँह एक घुटि चीख के रूप में खुल जाता है और कामोउन्माद के शिखर पर उसे उस वो आनंद प्राप्त होता है जिसके लिए वो पिछले दो सालों से तरस रही थी. उसकी चूत अति संकुचित होकर रवि के लौडे को निचोड़ रही थी. आनंद की चर्म अवस्था में वो अपना बदन झटक रही थी और उसके मुख से अनियंत्रित सिसकारियाँ फुट रही थी. धीरे धीरे उसका बदन शांत होने लगा और वो नज़र उठाकर अपने बेटे को देखती है जो अभी भी उसकी चूत में गहराई तक लंड घुसेडे हुए था.

"ओह बेटा..."वो सिसकती है. "तुमने तो कमाल कर दिया. एसा मज़ा जिंदगी में पहली बार मिला है."

"सच कहूँ मम्मी.....यह तो मेरी कल्पना से भी कही ज़यादा मज़ेदार था. उफ़फ्फ़ आपकी चूत....आपकी चूत का तो कोई जवाब नही...में हमेशा सोचा करता था कि कैसे लगेगा आपको चोद कर, अपनी मम्मी को चोद कर! मगर आज जब मेने आपको चोदा तो जाना ऐसे मज़े के बारे में तो कल्पना भी नही की जा सकती."

"मेरे ख़याल से मुझे चोदते वक़्त तुम्हे मुझे मम्मी कह कर नही पुकारना चाहिए" रश्मि हंसते हुए बोलती है.

"अच्छा! तो फिर में आपको क्या कह कर पुकारूँ?"

"मुझे नही मालूम" रश्मि हंसते हुए जवाब देती है"कुछ भी कह कर बुला सकते हो-गश्ती, रांड़, भोसड़ी की...कुछ भी...और चाहो तो मुझे सिर्फ़ रश्मि कह कर भी पुकार सकते हो."

"ओके! में आपको रांड़ नही मेरी रांड़ ...उम्म्म्म या फिर मेरी रंडी माँ. या फिर साली कुतिया.....उम्म्म सोचना पड़ेगा! मगर आपको चोदने के समय मम्मी कह कर पुकारने में भी अलग ही मज़ा है. यह एहसास कि में अपनी सग़ी माँ को चोद रहा हूँ अलग ही मज़ा देता है....मगर सोचना पड़ेगा...'

"हाँ वाकई में जब तुम अपना लॉडा मेरी चूत में फँसाए मुझे मम्मी मम्मी कहोगे तो मज़ा दुगना हो जाएगा. मगर ध्यान रहे तुम सिर्फ़ मुझे चोदने के वक़्त ही ऐसे नामों से या गालियाँ देकर पुकार सकते हो मगर बाकी पूरे समय में तुम्हारी माँ ही रहूंगी. और इस बात को कभी भूलना नही"

"नही भूलूंगा. वैसे भी आज आप को चोदकर मैं भी मादरचोद बन गया हूँ"

"एक बहुत ही बढ़िया और जानदार मादरचोद." रश्मि हँसती है और महसूस करती है रवि ने उसकी चूत से अपना लॉडा निकाल लिया था. "तुम्हारा बाप इस चूत को चोदते हुए कभी थकता नही था अब देखना है तुममे कितना दमखम है"

इस तरह दोनों माँ बेटे के बीच जब सेक्स का अवैध रिश्ता बना तो फिर कोई शर्म या संकोच की भावना नही रही और दोनो अपना जीवन प्यार और वासना के साथ अपना सुख पूर्वक गुजरने लगा

दोस्तो इसी के साथ विदा लेता हूँ फिर मिलेंगे एक और नई कहानी के साथ आपका दोस्त राज शर्मा

समाप्त
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06-08-2021, 12:45 PM,
#32
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
Bhai bahan ki kahani-भैया का पूरा साथ

मेरा नाम स्नेहा है, मेरी उम्र 28 साल की है, मेरे घर मे मेरे मम्मी पापा और मेरा एक भाई जिसकी उम्र 31 साल की है। उनकी शादी हो चुकी है, उनकी बीवी दिखने मे कुछ खास नहीं है और थोड़ी मोटी भी हैं। पर मेरे भाई ने उनसे इसलिए शादी की है, क्योंकि वो अपने घर मे इकलौती लड़की है और उनकी बहुत प्रॉपर्टी भी है। भैया के ससुराल वालों ने भैया के लिए अलग से बिज़्नेस के लिए पैसे दिए थे।

इसलिए भैया हमारे साथ घर मे नहीं रहते है और ना ही अपने ससुराल मे रहते हैं, बल्कि वो हमारे ही शहर में अलग घर में भाभी के साथ रहते हैं। अब मैं आपको अपने बारे मे बताती हूँ। दोस्तों मैं देखने मे बहुत सुंदर पतले बदन की मालकिन हूँ, मेरे चेहरे पर होंठों के नीचे एक मस्सा है, मैं हमेशा साड़ी ही पहनती हूँ। क्योंकि मेरी सहेली कहती है कि में साड़ी पहनकर बहुत सुंदर दिखती हूँ और मुझे भी साड़ी पहनना पसंद है। मैं अपनी पढ़ाई पूरी करके एक मोबाइल कॉम्पनी मे एक कंप्यूटर ऑपरेटर का काम करती हूँ। मेरे साथ काम करने वाले सारे लड़के और मेरे बॉस भी मुझसे बात करने का बहाना ढूँढते हैं। सभी मुझे मज़ाक मज़ाक मे छेड़ते रहते है और हमेशा मेरी तारीफ करते हैं।

ये सभी बातें मुझे भी अच्छी लगती हैं क्योंकि कौन लड़की अपनी तारीफ़ नहीं सुनना चाहती है। मेरे पापा पोस्ट ऑफीस मे बाबू हैं और मेरी माँ हाउसवाईफ। मैं अपने घर मे शुरू से ही बहुत प्यार से पली बढ़ी हूँ। मेरे भैया और भाभी भी मुझे बहुत चाहते है और भैया खर्चे के लिए आए दिन पैसे देते रहते हैं। भाभी भी अक्सर घर आती है और मेरे लिए कुछ ना कुछ लाती ही हैं मेरी भी भाभी से खूब बनती है मेरी भाभी काफ़ी मजाकिया है।

मैं उनके साथ घंटों बैठ के बातें किया करती हूँ खाली समय पर मैं भैया भाभी के घर जाकर भाभी से गप्पे लड़ाती हूँ। मैं घर पर खुले माहौल मे रही हूँ। घर पर मेरी सारी जायज़ या नाजायज़ माँगों को माना जाता है। मेरी जिंदगी मे मुझे सब कुछ मिला, मोबाइल कॉम्पनी मे जॉब करने का आइडिया भी मेरा था। शुरू मे जब मैने ये बात बताई तो माँ ने कहा बेटी तेरी शादी की उम्र निकलती जा रही है, तेरे लिए कई रिश्ते आ रहे है, एक तो तू शादी नहीं करना चाहती और अब तू जॉब करना चाहती है। तुझे किसी चीज़ की कमी तो है नहीं, फिर तू जॉब क्यों करना चाहती है? तो मैने उनकी बात पर ज़्यादा ध्यान ना देते हुए अपनी मर्ज़ी से जॉब कर लिया। फिर माँ भी चुप हो गयी पर सच्चाई तो यही थी की मेरे साथ की लगभग सभी लड़कियों की शादी हो चुकी थी और जो भी लड़कियाँ बची थी उनकी शादी की बात चल रही थी ये बात कहीं ना कहीं मेरे मन मे भी थी। पर ये बात भी सच थी कि मैं अभी शादी नहीं करना चाहती थी। मैं तो जिन्दगी को और बहुत अच्छे से जीना चाहती थी।

लेकिन मेरे जज्बात अंदर से अंगड़ाई लेने लगे थे और में मन ही मन में वो सब करके देखना चाहती थी, जो एक औरत और एक मर्द आपस में करते हैं। मेरे ऑफीस मे हम तीन लड़कियाँ थी और बाकी सभी लड़के मेरे साथ की एक लड़की रीना का अफेयर हमारे बॉस से था। वैसे तो हमारे बॉस की नज़र मुझ पर थी, पर वो मुझे कभी भी ऐसे नहीं लगे। जिस पर मैं अपना दिल हार जाऊं इसलिए मैं उन्हे हमेशा उन्हे अनदेखा करती थी। मेरे साथ काम करने वाली लड़की रीना ने भी मुझे बॉस के मेरे बारे मे उनकी गंदी सोंच को बताया, पर मैने कभी भी ध्यान नहीं दिया, पर रीना ने मुझे अपने और बॉस के बीच में हुए सेक्स के बारे मे कई बार बताया था। जिसे सुनकर मेरे अंदर भी एक हलचल सी मच गयी और मेरे मन मे भी सेक्स करने की बहुत इच्छा हुई। हमारे ऑफीस मे मेरे साथ एक लड़का और काम करता था उसका नाम था रोहित वो कम बोलता था और देखने मे भी सीधा साधा था। ऑफीस के लड़को मे वो ही एक ऐसा था जो कि मुझसे कम बात करता था। हाँ लेकिन एक बार उसने मुझे चाय के लिए बाहर होटल मे जाने को ज़रूर बोला था।

लेकिन मुझे अच्छे से याद है कि उस वक़्त भी उसके पसीने छूट गये थे। मुझे उसकी मासूमियत भा गयी थी और मैं उसे मन ही मन चाहने लगी थी और अब जबकि रीना की बातों से मेरा मन मचल गया था। उस समय मेरे मन मे सिर्फ़ रोहित ही घूम रहा था मेरा मन रोहित के साथ में सेक्स करने को उतावला हो गया और मैं रोहित को पाटने के तरीके सोचने लगी और शाम को जब ऑफीस की छुट्टी हुई तो मैं रोहित के पास गयी और उससे बात करने लगी।

मैं : हाय रोहित क्या काम खत्म कर लिया तुमने?

रोहित- हाँ काम पूरा हो गया अब में घर पर ही निकल रहा था।

मैं : तो तुम घर जाकर टाइम पास के लिए क्या करते हो ?(यहाँ मैं आपको एक बात बता दूं की रोहित का परिवार दूसरे शहर का रहने वाला है और रोहित यहाँ पर एक किराए के कमरे मे अकेला रहता है।

रोहित : कुछ नहीं घूम फिर के या किताबें पढ़कर जैसे तैसे टाईम कट जाता है।

मैं : क्या कभी तुम्हे घर वालों की याद तो आती होगी?

रोहित : हाँ आती तो है पर क्या करूँ काम के कारण साल मे दो या तीन बार ही जा पता हूँ।

मैं : अरे लगता है मैने तुम्हे घरवालों की याद दिलाकर तुम्हे दुखी कर दिया है मुझे माफ़ कर दो प्लीज।

रोहित : ठीक है लेकिन ऐसी कोई बात नहीं है।

मैं : अच्छा चलो आज हम कहीं चाय पीने चलते है, मेरी ये बात सुनकर रोहित मेरी ओर एकटक देखने लगा, जैसे की मेरा चेहरा पढ़ रहा हो, उसका मेरी ओर इस तरह देखना अजीब सा लगा और मैने उसे टोकटे हुए कहा क्या हुआ, मेरी बात सुनकर वो हड़बड़ाते हुए बोला हाँ कुछ नहीं, फिर मैने कहा तो चाय पर चलें उसने मुस्कुराते हुए हाँ मे सर हिला दिया और बोला कहाँ चलें उसकी बात सुनकर मैं सोच मे पड़ गई फिर कुछ देर सोचने के बाद कहा क्यों ना तुम्हारे घर पर चलें एक बार फिर हैरत से मुझे देखने लगा मैं आज तक उसके घर नहीं गयी थी।
कुछ देर तक मुझे देखने के बाद उसने बिना कुछ बोले अपना बैग उठाया और हम ऑफीस से बाहर आ गये, मेरे इस तरह से खुलने के कारण ही शायद अब वो पूरे रास्ते मुझसे खुल के बातें करने लगा और हम इधर-उधर की बातें करते हुए उसके रूम पहुँचे उसका कमरा शहर के बीच मे दूसरी मंज़िल पर था। शहर के बीच मे होने के बावजूद भी मुझे उसके कमरे मे सन्नाटा सा लगा। रूम मे बैठ कर हम बातें करते रहे, फिर मैंने कहा चाय पीने तो आ गये, पर क्या तुम्हे चाय बनानी आती है।

तो जवाब मे उसने मुस्कुरा कर कहा तुम पी कर बताना और उठ कर चाय बनाने चला गया और इस बीच मैं सोचने लगी कि अब आगे क्या करूँ। रोहित चाय बनाकर ले आया और उसने एक कप मेरे हाथ मे थमा दिया और हम चाय पीने लगे फिर मैने कुछ सोचकर कहा तुम बहुत प्यारे हो रोहित, वरना आज कल के लड़के तो बस लड़कियों के पीछे ही लगे रहते हैं, तुम्हारी ये मासूमियत मुझे भा गयी है, ये सुनकर रोहित खुश होता हुआ बोला अगर तुम बुरा ना मानो तो में भी एक बात कहूँ तुम बुरा तो नहीं मानोगी।

मैने कहा अरे तुम तो बोलो ना मैं कभी बुरा नहीं मानूँगी।

रोहित बात ये है कि तुम हो ही इतनी सुंदर की कोई भी तुम्हारे पीछे पड़ जाए, मन तो मेरा भी करता है कि तुम्हारे जैसी मेरी भी गर्लफ्रेंड हो, पर डरता हूँ की तुम बुरा ना मान जाओ। आज रोहित के मुहं से ये बातें सुनकर मैं थोड़ो हैरान हो गयी कि क्या ये वही रोहित है, जो मुझसे बात करने मे हमेशा कतराता था और आज इतना कुछ बिना किसी झिझक के बोल रहा है। खैर मैं भी यही चाह रही थी। मुझे आज मेरी मंज़िल दिखाई दे रही थी और मैने कहा रोहित सच तो यह है कि में भी तुम्हे बहुत प्यार करती हूँ। ये सुनकर रोहित कहा की सच और मेरे हाथों को अपने हाथों मे लेकर सहलाने लगा और मैने जान बूझकर अपना सर रख के आखें बंद करके खो गयी, जब मैं थोड़ो सम्भल कर सर को ऊपर किया तो मेरी नज़र घड़ी पर गयी। अब आठ बज गये थे और मैने घर पर फोन भी नहीं किया था। मैं हड़बड़ाकर उठी और रोहित से कहा रोहित अब मैं चलती हूँ, आज मुझे बहुत देर हो रही है। अभी रोहित भी गरम होने लगा था उसने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा प्लीज मत जाओ ना, तुम्हे घर ही तो जाना है। आज कोई बहाना कर दो। मैने हाथ छुडाते हुए कहा रोहित इतना उतावलापन भी ठीक नहीं है। मैं कहीं भागी थोड़ी ही जा रही हूँ, हम कल फिर मिलेंगे कहते हुए मैं सीढ़ियों से नीचे आ गयी और मुड़कर देखा तो पाया रोहित मुझे ऊपर से देख रहा था और मैं घर पर आ गयी।

घर पर भी मैं ठीक से खाना नहीं खा पाई। मुझे पर एक खुमारी सी छा गयी थी। रात को 10 बजे रोहित का फोन आया और मैं बेडरूम मे थी। इसलिए मम्मी पापा को पता नहीं चला और हम बातें करते रहे और फोन पर ही प्लान बनाया की कल हम ऑफीस ना जाकर रोहित के रूम मे मिलेंगे। फिर में सुबह का इंतज़ार करने लगी। मेरे मन मे हज़ारों अरमान मचलने लगे और मुझे आने वाले कल के बारे मे सोचकर नींद नहीं आ रही थी। खैर मैने जैसे तैसे आँखों ही आँखों में रात काटी और सुबह नहाकर अपनी नयी साड़ी जो की पिंक कलर की थी, मेंचिंग ब्लाउस के साथ पहनी। अंदर ब्लैक कलर की पेंट और ब्लैक कलर की ब्रा पहन रखी थी और साथ ही मेचिंग पिंक कलर की लिपस्टिक लगाई और फिर रोहित के घर की और चल दी जैसे जैसे मैं रोहित के घर की और बढ़ रही थी मेरी सांसे तेज़ी से चलने लगी और में रोहित के घर पहुँची। रोहित का घर खुला हुआ था दरवाजे को धकेल कर मैं अंदर गई तो देखा कि रोहित घरेलू कपड़े मे पलंग पर लेटा हुआ था। मेरे अंदर आते ही उसने जाकर दरवाजा बंद कर दिया और मुड़कर मेरी ओर देखने लगा। तो मैने कहा क्या देख रहे हो उसने कहा आज तो तुम स्वर्ग की अप्सरा लग रही हो।
उसकी बात सुनकर मेरी गर्दन शरम से झुक गयी उसने मुझे हाथों से पकड़कर पलंग पर बिठा दिया और खुद भी पलंग पर बैठ गया और मेरे चेहरे को अपने हाथों से थामकर अपनी ओर किया और मेरे होंठो पर अपने होंठ रख दिये, मैं जानबूझ कर दिखावे के लिए नाटक करने लगी। रोहित ने होठों को किस करते हुए मुझे अपने से सटा लिया जिससे मेरे बूब्स रोहित की छाती से दबने लगे और मेरे मुहं से सिसकारियाँ निकालने लगी, मैं अह्ह्ह की आवाज करने लगी जिससे रोहित की और हिम्मत बढ़ी और उसने अपना एक हाथ मेरे बाई तरफ के बूब्स पर रख दिया और मेरे बूब्स पर अपने हाथ फेरने लगा जिससे मेरी सांसे और तेज़ी से चलने लगी और रोहित ने अपना हाथ मेरे बूब्स पर जमा दिये और ज़ोर -ज़ोर से दबाने लगा जिससे मुझे दर्द होने लगा। लेकिन साथ ही साथ मैं परम सुख की अनुभूति कर रही थी और मेरे मुहं से जोरो की सिसकारियाँ निकालने लगी और मेरे मुहं से अह्ह्ह्ह की आवाजे निकालने लगी। रोहित भी मेरी मादक आवाज सुनकर गरम हो गया था।

अब उसने मेरी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिरा दिया और किस करना छोड़ कर मेरी साड़ी को खींचने लगा जल्दी ही उसे कामयाबी मिल गयी और मैं पेटीकोट और ब्लाउस में आ गयी। अब उसने बिना समय गँवाए अब वो मेरे ब्लाउस के बटन खोलने लगा और कुछ समय मे मेरे ब्लाउस को मेरे शरीर से अलग कर दिया और मैं रोहित के सामने सिर्फ़ ब्लैक ब्रा मे थी। जिसमे से मेरे बूब्स ब्रा को फाड़कर बाहर आने को तड़प रहे थे। उधर रोहित बिना रुके मेरे पेटीकोट की ओर बढ़ा और देखते ही देखते मैं ब्लैक पेंटी और ब्रा मे थी।

अब रोहित ने ब्रा के ऊपर से ही मेरे बूब्स को दबाने लगा और में मस्त होकर अह्ह्हन्ह्ह्ह करने लगी और रोहित ने अपने हाथ मेरी पीठ के पीछे लाकर ब्रा का हुक भी खोल दिया और ब्रा को मेरे शरीर से निकालकर मेरी गुलाबी निप्पल को देखने लगा और फिर मेरे दोनो बूब्स को अपने दोनो हाथों से दबाने लगा और अपने मुहं से एक बूब्स को चूसने लगा मुझे गुदगुदी और उत्तेजना से अब मेरे रोंगटे खड़े हो गये और मैं आँखें बंद करके अपने दातों से अपने होठों को चबाने लगी थी।

मैं अब पूरी तरह से गरम हो चुकी थी। फिर रोहित ने अपना एक हाथ मेरी पेंटी मे डाल कर मेरी चूत मे अपनी उंगली डालने लगा। जैसे ही रोहित ने अपनी उंगली मेरी चूत मे डाली मैं चीख उठी और कुछ ही देर बाद मैं भी अपना चुतड उठाकर उसका जवाब देने लगी। अब मेरा सब्र का बाँध टूटने लगा था और इसी बेसब्री मे मेरा हाथ रोहित के लोवर के ऊपर उसके लंड पर चला गया। रोहित भी शायद मेरी बेताबी को समझ गया और मुझे छोड़कर वो अपने कपड़े उतारने लगा।

मैने पहली बार किसी मर्द को पूरा नंगा देखा था। मुझे रोहित का लंड उस समय बहुत प्यारा लग रहा था और में एकटक उसके लंड को देख रही थी। इसी बीच रोहित ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने लंड पर रख दिया मैं भी उसके लंड को पकड़कर उसकी टोपी को आगे पीछे करने लगी और रोहित ने मुझे किस करना शुरू किया वो इस बार मेरे सारे चेहरे पर किस करने लगा और अचानक ही उसने मुझे किस करना छोड़ कर मुझसे बोला यार स्नेहा तुम इतनी सुंदर हो लेकिन तुम्हारे होंठों के नीचे ये मस्सा चाँद पर ग्रहण जैसा लग रहा है, प्लीज़ इसे हटा देना। इस पर मैने कहा की अगर तुम्हे पसंद नहीं तो मैं इसे कल ही काट दूँगी। मेरी इस बात को सुनकर रोहित ने मुझे जोश मे आकर गले से लगा लिया और मुझे उठा कर पलंग पर लिटा दिया और और मेरी चूंचियों को मसलने लगा।

मैं अपने जोश के चरम पर थी मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था। इसी जोश मे मैने रोहित से कहा की रोहित प्लीज़ तुम्हे जो करना है बाद मे कर लेना अभी मुझसे सहा नहीं जा रहा है प्लीज़ मेरी प्यास बुझाओ मेरी बात सुनकर रोहित ने मेरे पैरों को फैलाया और अपना लंड मेरी चूत मे रगड़ने लगा अब मेरी चूत मे तेज़ खुज़ली होने लगी और मैं रोहित के लंड अंदर डालने का इंतज़ार करने लगी और मैने आखें बंद कर ली अचानक ही मुझे मेरी चूत के पास कुछ गरम-गरम सा लगने लगा। मैने आखें खोल के देखा तो रोहित मेरी चूत पर अपना लंड रगड़ के ठंडा हो गया था शायद वो झड़ चुका था और मेरी बगल मे आखें बंद करके लेटा हुआ था।

तभी मैं गुस्से से तिलमिला उठी और बिना कुछ बोले बाथरूम मे जाकर अपनी चूत के पास से रोहित के वीर्य को साफ किया। वापस आकर जल्दी से मैने कपड़े पहनने लगी तब रोहित ने आखें खोलकर बोला, सॉरी ज़्यादा जोश की वजह से में जल्दी ही झड़ गया था। लेकिन तुम बिलकुल भी चिंता मत करो। मुझे कुछ देर का समय दो में तुम्हे दोबारा लंड दूँगा। मैने अपने कपड़े पहन लिए थे। मैने रोहित को गुस्से मे कहा कि तुम क्या मेरी प्यास बुझाओगे तुम तो दो मिनट में ही झड़ गये थे।

लेकिन तुम आज के बाद मुझसे किसी भी प्रकार का संबंध रखने की कोशिश मत करना वरना इसका अंजाम तुम सोंच भी नहीं सकते। रोहित ने पलंग से उठते हुए कहा स्नेहा मेरी बात तो सुनो पर मैंने उसकी एक भी बात बिना सुने ही उसके घर से बाहर आ गयी रोड पर चलते हुए अपने आप झल्लाई हुई सी जाने लगी। फिर मैने सोचा अभी घर जाना ठीक नहीं होगा वैसे भी मैं ऑफीस के नाम से घर से निकली थी, इससे अच्छा है की में भाभी के पास जाती हूँ।

इसी बहाने मेरा मन भी बहाल जाएगा, ये सोचकर मैं भैया के घर की ओर चल पड़ी …
फिर मैं ऑटो से भैया के घर पहुँची। डोर बेल बजाई तो दरवाज़ा भैया ने खोला। भैया बानियान और लूँगी मे थे। मुझे देखका बोले अरे स्नेहा तुम अभी तो तुम्हारा ऑफीस टाइम है, यहाँ कैसे तो मैने कहा आज भाभी से मिलने की इच्छा हुई तो आ गयी और ऑफीस से छुट्टी ले ली लेकिन आप आज घर पर कैसे? मैने पूछा जवाब मे भैया ने बताया की तुम्हारी भाभी कई दिनों से मायके जाने की ज़िद कर रही थी, तो मैं उसे अभी-अभी छोड़कर आ रहा हूँ

मैने आज काम भी बंद कर दिया है, अरे तुम बाहर क्यों खड़ी हो अंदर आओ। भाभी नहीं है तो क्या हुआ भैया से बातें करो और मैं उदास मन से अंदर आई और सोफे पर बैठ गयी और भैया भी सामने बैठ गये फिर भैया ने कहा एक मिनट रूको मुझे एक दो फोन करने हैं मैं अभी आता हूँ।
फिर हम दोनो बैठकर ढेर सारी बातें करेंगे, मैने भैया से कहा भैया तब तक मैं नहा लेती हूँ। (क्योंकि अभी तक मेरे शरीर मे वासना की आग जल रही थी) और मैं नहाने चली गयी और नहाकर फिर से सोफे पर आकर बैठ गयी। जहाँ भैया बैठकर टीवी पर गाने देख रहे थे और मेरे आते ही उन्होने मुझसे पूछा और बताओ कैसा चल रहा है तो मैने कहा कुछ खास नहीं भैया।

भैया : एक बात बताओ स्नेहा अब तुम्हारी शादी की उम्र निकली जा रही है क्या तुम शादी नहीं करोगी।

मैं : नहीं भैया मैं अभी शादी के लिए तैयार नहीं हूँ।

भैया : सही समय मे शादी हो ही जाना चाहिए बाकी फिर तुम्हारी मर्ज़ी।

मैं : भैया एक बात बताओ क्या मेरे चेहरे पर ये मस्सा अच्छा नहीं लगता ?

भैया : हट पगली ये मस्सा तुम पर बहुत खिलता है, जैसे की बच्चे के चेहरे पर काला टीका पर आज तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो।

मैं : मेरे दोस्त कहते हैं की ये मुझ पर अच्छा नहीं लगता और इसे कटा लो।

भैया : अच्छा तुम्हारा कोई भरोसा भी नहीं है, तुम इसे कटा भी सकती हो, वैसे भी तुम जो भी चाहती हो कर लेती हो, इतना कहकर भैया अचानक सोफे से उठे और मेरे चेहरे को अपने हाथों से थामकर मेरे होठों के नीचे मेरे मस्से को किस करने लगे मैं हड़बड़ाकर बोली भैया मत करो ना प्लीज़, ये तुम क्या कर रहे हो। तो भैया ने कहा कल के दिन तुम इस मस्से को काट दोगी, इससे पहले मैं इसे जी भर कर चूम तो लूँ।
मैं भैया के पंजे से खुद को छुड़ाते हुए बोली ठीक है भैया मैं इसे नहीं कटाउंगी, ये कहते हुए मैने खुद को उनसे छुड़वाया, भैया ने मुझे अपने हाथो से आज़ाद करते हुए कहा तुम मुझे कितना चाहती हो मेरे कहने पर तुम ये मस्सा नहीं कटवा रही हो, क्या मैं तुम्हे एक बार किस कर लूँ? मैने कहा क्या इससे पहले किस करने से पहले पूछा था। ये सुनकर शायद भैया ने इसे मेरा खुला निमंत्रण समझा और मुझ पर टूट पड़े और मेरे चहरे को अपने दोनो हाथों से पकड़कर सोफे से उठाते हुए मेरे मस्से को छोड़कर अब सीधे मेरे होठों पर हमला कर दिया और मुझे अपनी छाती से चिपका लिया और जो आग मेरे अंदर लगी थी फिर से भड़कने लगी और इसी जोश मे मैने अपने हाथों को उनकी पीठ पर फेरने लगी कुछ देर ऐसे ही किस करते रहे फिर मैने खुद को संभाला और भैया से बोली भैया ये ग़लत है, आप मेरे सगे भाई है, जवाब मे भैया ने कहा भाई वहाँ पर ही भूल जा तू कब तक ऐसे ही अपनी जवानी को लेकर घूमती रहेगी मुझसे तेरी ये हालत नहीं देखी जाती है। अब जब तक तेरी शादी नहीं हो जाती तू मुझसे अपनी इच्छाओ की पूर्ति कर लिया कर और कौन सा हम सबके सामने ऐसा कर रहे है। इस बात का पता किसी को नहीं चलेगा ये बोलते हुए फिर से मुझे किस करने लगे और मैं भी उनका साथ देने लगी फिर भैया ने मेरी चुचियों को मुट्ठी भरकर ज़ोर-ज़ोर से दबाने लगे और मैं मुहं से सिसकारियाँ निकालने लगी।

फिर भैया ने मेरे सारे कपड़े निकाल दिए मेरे, शरीर पर सिर्फ़ पेंटी ही थी और भैया मुझे उठा कर बेडरूम मे लेकर गये और मुझे पलंग पर पटक दिया और खुद अपने कपड़े निकालने लगे जब भैया ने अपना अंडरवियर उतारा तो मैं उनका लंड देखकर में तो डर ही गयी, रोहित का लंड भैया के लंड के मुक़ाबले छोटा था और उसका लंड देखकर मुझे डर भी नहीं लगा था।

भैया के लंड को देख कर में सिहर गयी, मैने डरते हुए भैया से कहा भैया ये तो बहुत बड़ा है मुझे नहीं करवाना है। इस पर भैया बोले तू भी पागल है, कभी अपनी भाभी को देखा है, क्या वो तुम्हे दुखी लगती है, वो इसे पाकर ही तो इतनी खुश रहती है और तुम चिंता मत करो अभी में हूँ ना। ये कहकर वो भी पलंग पर चड़ गये और मेरे बूब्स को ज़ोर ज़ोर से रगड़ने लगे मेरे मुहं से आ ऊहहाः की आवाज़ आने लगी और मैं भैया के लंड को अनदेखा करने लगी।

तभी भैया ने एक हाथ मेरी पेंटी के अंदर डाला और उनका हाथ मेरी चूत के आस पास के बालो पर घूमने लगे और भैया ने मेरी पेंटी उतार दी और मेरी चूत की और देखते हुए कहा क्यों स्नेहा क्या तुम अपने चूत के बाल को साफ नहीं करती हो। जवाब मे मैने कहा नहीं भैया ये सब मुझसे नहीं होता है। तो भैया ने कहा चलो आज मैं ही तेरे बाल साफ कर देता हूँ। मैने कहा भैया अगर कट गया तो? भैया ने कहा तुम चिंता मत करो तुम्हारी भाभी के भी मैं ही साफ करता हूँ। कुछ नहीं होगा और फिर भैया ने मुझे अपनी गोद मे उठाकर बाथरूम मे ले गये और वहाँ मुझे फर्श पर बिठाकर मेरी चूत के बाल मे खूब सारा साबुन लगाया और उस्तरे से मेरे सारे बाल साफ किये। बाल साफ करने के बाद मेरी चूत फूली हुई पवभाजी की तरह लग रही थी। जिससे कुछ बूंदे पानी की निकल रही थी। भैया ने मेरी चूत को हाथों से सहलाया और कहा स्नेहा तेरी चूत तो बहुत मस्त है।

भैया के मुहं से चूत शब्द सुनकर में शरमा गयी फिर मुझे गोद मे लेकर फिर से पलंग पर पटक दिया और मुझ पर चड़ कर मेरे निप्पल को अपने मुहं मे लेकर चूसने लगे बीच बीच मे वो अपने दातों से निप्पल को काट देते थे जिससे मैं चीख जाती थी अब भैया ने निप्पल चूसते हुए अपना एक हाथ मेरी चूत मे ले जाकर अपनी एक उंगली घुसा दी मैं भी चूतड़ उछालकर साथ देने लगी फिर भैया ने निप्पल को छोड़कर अपना मुहं मेरी चूत की तरफ लेकर गये और अपने दोनो हाथों से मेरी चूत के होठों को फैलाकर उसमे अपनी जीभ डाल दी। मेरे सारे शरीर पर मानो हज़ारों चीटियाँ दौड़ने लगी मैं उहाहहाहह ऊ मर गयी भैया और अंदर से जैसे शब्द निकालने लगी कुछ ही देर मे मेरा शरीर अकड़ने लगा मैं खत्म होने के कगार पर थी। भैया ने शायद इस बात को समझ लिया और मेरी चूत को चाटना छोड़ दिया फिर भैया ने अपने लंड की ओर इशारा करते हुए कहा इसे मुहं मे लो ना।

मैने कहा भैया बहुत बड़ा है मुहं दर्द करेगा भैया ने कहा जब मुहं दर्द करेगा तो निकाल लेना। मैने मजबूरी मे हाँ कर दी, फिर भैया ने अपना लंड मेरे होठ पर रख दिए और मैं उसे मुहं मे लेकर चूसने लगी। उनका लंड बड़ी मुश्किल से मेरे मुहं मे आ रहा था। कुछ देर मे भैया गरम हो गये और मेरे सर को पकड़कर मुख चुदाई (ओरल सेक्स) करने लगे, जिससे मेरी साँस अटकने लगी और मुझे खाँसी आने लगी मैं छुड़ाने की कोशिश करने लगी, पर भैया अपना लंड निकालने को तैयार ही नहीं थे।

बड़ी मुश्किल से मैने उनके लंड को अपने मुहं से बाहर निकाला और राहत की साँस ली फिर मैने भैया से कहा की भैया अब देर मत करो मुझसे रहा नहीं जा रहा है। ये सुनकर भैया तेल की शीशी ले आए और मेरे पैरो को फैलाकर उनके बीच बैठ गये और मेरी चूत को फैलाकर उसमे ढेर सारा तेल डाल दिया और तेल की शीशी को किनारे रखकर अपना लंड मेरी चूत मे सटा दिया और अपने दोनो हाथ मेरे कंधे पर रखकर एक झटका दिया जिससे मैं उछल गयी और उनका लंड फिसल गया। भैया ने फिर से अपना लंड चूत पर टिकाया और झटका मारा इस बार तेल के कारण लंड सरसरता हुआ चूत के पर्दे को फड़ता हुआ आधा अंदर घुस गया और में दर्द के मारे में चिल्ला उठी उईईईई माआ म्माआरररर दद्दला रे मेरे आँखो से आँसू आने लगे भैया ने मेरे बालों को अपने हाथों से प्यार से सहलाते हुए मेरे आँसू पोंछे और कहा बस एक बार और फिर तुम्हे भरपूर मज़ा मिलेगा पर मैं उनकी बात नहीं सुनना चाहती थी। मैं तो बस यही चाहती रही भैया प्लीज़ नहीं सहा जा रहा है, प्लीज़ उठ जाओ, इस बार भैया ने जैसे मेरी बात अनसुना करते हुए बिना किसी चेतावनी के एक और ज़ोर का झटका दिया ये हमला मेरे लिए खतरनाक था। इस बार पूरा लंड गंगनता हुआ चूत को फाड़कर पूरा अंदर चला गया। मुझे तो लगा कि मेरी साँस ही उखड़ गयी है। मुझे असहाय पीड़ा होने लगी थी।
मैं भैया को पीछे धकेलने की पूरी कोशिश किए जा रही थी और रोए जा रही थी और भैया समझाए जा रहे थे, कि जो दर्द होना था हो गया अब मज़ा आएगा, ये कहकर वो मेरे बूब्स को दबाने लगे और धीरे धीरे लंड को आगे पीछे करने लगे। कुछ ही देर बाद चमत्कारिक रूप से दर्द गायब हो गया और दुख सुख मे बदल गया और मुझे स्वर्ग की अनुभूति होने लगी और मैं गांड उछालकर भैया का पूरा साथ देने लगी और साथ ही साथ आआअहह की आवाज़ निकालने लगी थी।

कुछ ही देर के बाद में झड़ गयी पर भैया रुकने को तैयार ही नहीं थे। में तीन बार झड़ गयी फिर अचानक भैया ने स्पीड बढ़ा दी और भैया का शरीर अकड़ गया और उनके लंड से वीर्य की पिचकारी निकली, जिससे मेरी चूत भर गयी और दोनो निढाल हो गये कुछ देर बाद हम दोनो बिस्तर से उठे तो देखा बिस्तर मेरी चूत के खून से और भैया के वीर्य से सना हुआ था। मैने बिस्तर को बाथरूम में ले जाकर साफ किया और चूत पर लगे खून को साफ किया पीछे पीछे भैया आ गये तो मैने भैया के लंड को अपने हाथ से रगड़ कर धोया और भैया से कहा भैया तुमने वीर्य अंदर छोड़ दिया है अगर कुछ हो गया तो? तब भैया ने भाभी की एक टेबलेट लाकर दी और कहा इसे खा ले फिर कुछ नहीं होगा। मैंने टेबलेट खा ली और फिर बड़ी मुश्किल से लंगड़ाते हुए बेडरूम तक गयी। चुदाई से मेरा पूरा अंग अंग टूट रहा था। लेकिन मन मे एक सन्तुष्टि भी थी। मैने आज दुनिया की सारी खुशी कुछ ही समय मे पा ली थी और वो भी अपने सगे भाई से। में बेडरूम आकर मैं कपड़े पहनने लगी तो पीछे से भैया ने पकड़ लिया और कहा एक बार और हो जाए, तो मैने पलटकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया, अभी नहीं मेरे भैया पहले मुझे सम्भलने तो दो तुमने तो मेरी हालत ही खराब कर दी है। कहकर मैं कपड़े पहनकर पलंग पर लेट गयी पर भैया पर अभी भी खुमारी छाई हुई थी और वो नंगे थे मेरी बगल मे मुझे बाहों में लेकर लेट गये और में भी इस पर मैं भी उनसे लिपट गयी।
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06-08-2021, 12:46 PM,
#33
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
Maa bete ki kahani-बेटा ये तेरी माँ की चूत है

मेरी उम्र 21 साल की है और मेरी प्यारी माँ 43 साल की है। घर पर मेरी माँ और में रहता हूँ। मेरी माँ एकदम सेक्सी है। उनकी बहुत मद मस्त जवानी है। उसके कूल्हे बहुत अच्छे लगते हैं। मैंने एक बार जब वो सोई हुई थी तो तब उसके कमरे में जाकर उसकी गांड देखी थी और बड़ा उत्तेजित हुआ था। मुझे उनकी गांड चाटने का बहुत मन होता था। लेकिन मौका नहीं मिलता था और भी हिम्मत नहीं होती थी। लेकिन एक दिन मौका भी मिला मुझे।

मेरी माँ भी मेरे खड़े हुए लंड को बार बार देखती थी। मैं सोने की एक्टिंग करता था और वो मेरे पास सो कर मेरे पीछे से मेरे लंड को पकड़ कर सहलाती थी और मैं आँखे बंद करके बहुत मज़ा लेता था। माँ अपनी छाती को मेरे हाथो से दबवाती थी और एक बार तो मेरा लंड चूस भी लिया था। में भी एक्टिंग करता था और माँ की गांड को मसलता रहता था।

एक बार मैंने बाथरूम खोला तो देखा की माँ आधी नंगी बैठ कर कपड़े धो रही थी और उसकी गांड का छेद साफ दिख रहा था। मैं चुपके से पीछे बैठ गया और माँ के गले लग गया। मेरा लंड खड़ा हो गया था पीछे से माँ के बदन को छू रहा था और माँ को अच्छा लग रहा था। मैंने धीरे से अपने हाथ माँ के कूल्हों पर रख दिया और उसे मसलने लगा। माँ तो अपने काम में मस्त थी और मजा ले रही थी।

कूल्हों को मसलते मसलते मेरी नज़र माँ के सिकुड़ते फैलते हुए गांड के छेद पर गई मेरे मन मैं आया की क्यों ना इसका स्वाद भी चखा जाए देखने से तो माँ की गांड वैसे भी काफ़ी खूबसूरत लग रही थी। जैसे गुलाब का फूल हो मैंने अपनी लपलपाती हुई जीभ को उसकी गांड के छेद पर लगा दी और धीरे-धीरे ऊपर ही ऊपर लपलपाते हुए चाटने लगा। गांड पर मेरी जीभ का स्पर्श पा कर माँ पूरी तरह से हिल उठी।
“ओह ये क्या कर रहा है ओह बहुत अच्छा लग रहा है, ये सब कहाँ से सीखा, तू तो बड़ा कलाकार है। हे राम देखो कैसे मेरी चूत को चाटने के बाद मेरी गांड को चाट रहा है। तुझे मेरी गांड इतनी अच्छी लग रही है, कि इसको भी चाट रहा है, ओह बेटा सच में गजब का मज़ा आ रहा है। चाट चाट ले अब पूरी गांड को चाट ले ओह ओह।

मैंने पूरी लगन के साथ गांड के छेद पर अपनी जीभ को लगा कर दोनो हाथो से दोनो कुल्हो को पकड़ कर छेद को फैलाया और अपनी नुकीली जीभ को उसमे डालने की कोशिश करने लगा। माँ को मेरे इस काम में बड़ी मस्ती आ रही थी और उसने खुद अपने हाथो को अपने कुल्हो पर ले जा कर गांड के छेद को फैला दियाऔर मुझे जीभ डालने के लिए उत्साहित करने लगी। ईईईईई डाल दे जीभ को जैसे मेरी चूत में डाला था वैसे ही गांड के छेद में भी डाल दे और चोद के खूब चाट मेरी गांड को मर गई रीईईई, ओह इतना मज़ा तो कभी नहीं आया था। ओह देखो कैसे गांड चोद रहा है,,,,,,,,सस्स्स्स्स्सीईई चाटो इसे चाटो और ज़ोर से चाटो।

मैं पूरी लगन से गांड चाट रहा था। मैंने देखा की चूत का गुलाबी छेद अपने रस को टपका रहा है, तो मैंने अपने होंठो को फिर से चूत के गुलाबी छेद पर लगा दिया और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगा जैसे की कोकोकोला पी रहा हूँ। सारे रस को चूसने के बाद मैंने चूत के छेद में जीभ को डाल कर अपने होंठो के बीच में चूत के छेद को क़ैद कर लिया और खूब ज़ोर ज़ोर से चूसना शुरू कर दिया।

माँ के लिए अब बर्दाश्त करना शायद मुश्किल हो रहा था। उसने मेरे सिर को अपनी चूत से अलग करते हुए कहा फिर से चूस कर ही झाड़ देगा क्या? अब तो असली मज़ा लूटने का समय आ गया है। बेटा राजा अब चल मैं तुझे जन्नत की सैर कराती हूँ। अब अपनी माँ की चुदाई करने का मज़ा लूट मेरे राजा चल मुझे नीचे उतरने दे साले।

मैंने माँ की चूत पर से मुँह हटा लिया वो जल्दी से नीचे उतर कर लेट गई और अपने पैरो को घुटनो के पास से मोड़ कर अपनी दोनो जाँघो को फैला दिया और अपने दोनो हाथो को अपनी चूत के पास ले जा कर बोली “आ जा राजा जल्दी कर अब नहीं रहा जाता। जल्दी से अपने मूसल को मेरी ओखली में डाल कर कूट दे जल्दी कर बेटा डाल दे अपना लंड माँ की प्यासी चूत में, मैं उसके दोनो जाँघो के बीच में आ गया पर मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करू। फिर भी मैंने अपने खड़े लंड को पकड़ा और माँ के ऊपर झुकते हुए उसकी चूत से अपने लंड को सटा दिया।

माँ ने लंड को चूत से सटाते ही कहा “हाँ अब मार धक्का और घुसा दे। अपने सांप जैसे लंड को माँ के बिल में। मैंने धक्का मार दिया पर ये क्या लंड तो फिसल कर चूत के बाहर ही रगड़ खा रहा था। मैंने दोबारा कोशिश की फिर वही नतीज़ा तीन धक्के मारे फिर लंड फिसल कर बाहर इस पर माँ ने कहा “रुक जा मेरे नासमझ खिलाड़ी, मुझे ध्यान रखना चाहिए था, तू तो पहली बार चुदाई कर रहा है, अभी तुझे मैं बताती हूँ, फिर अपने दोनो हाथो को चूत पर ले जाकर चूत के दोनो फांको को फैला दिया और चूत के अंदर का गुलाबी छेद नज़र आने लगा था। चूत एक दम पानी से भीगी हुई लग रही थी। चूत छोड़ी करके माँ बोली ले मैंने तेरे लिए अपनी चूत को फैला दिया है, अब आराम से अपने लंड को ठीक निशाने पर लगा कर चोद ले जितना चाहे उतना चोद।

मैंने अपने लंड को ठीक चूत के खुले हुए मुँह पर लगाया और धक्का मारा लंड थोड़ा सा अंदर तो घुसा पानी लगे होने के कारण लंड का मुहं अंदर चला गया था। माँ ने कहा “शाबाश ऐसे ही मुहं चला गया अब पूरा घुसा दे मार धक्का कस के और चोद डाल मेरी चूत को बहुत खुजली मची हुई है। मैंने अपनी गांड तक का ज़ोर लगा कर धक्का मार दिया, पर मेरा लंड में ओर दर्द की लहर उठी और मैंने चीखते हुए झट से लंड को बाहर निकाल लिया। माँ ने पूछा क्या हुआ चिल्लाता क्यों है।

ओह माँ लंड में बहुत दर्द हो रहा है। माँ उठ कर बैठ गई और मेरी तरफ देखते हुई बोली देखूं तो कहा दर्द है। मैंने लंड दिखाते हुए कहा देखो ना जैसे ही चूत में घुसाया था, वैसे ही दर्द करने लगा माँ कुछ देर तक देखती रही फिर हंसने लगी और बोली साले अनाड़ी चुदक्कड़, चला है माँ को चोदने, अभी तक तो तेरे लंड की चमड़ी ढंग से उतरी ही नहीं है, तो दर्द नहीं होगा तो और क्या होगा, चल कोई बात नहीं मुझे इस बात का ध्यान रखना चाहिए था, मेरी ग़लती है मैंने सोचा तूने खूब मूठ मारी होगी तो चमड़ी अपने आप उतरने लगी होगी, मगर तेरे इस गुलाबी सुपाड़े की शक्ल देख कर ही मुझे समझ जाना चाहिए था, कि तूने तो अभी तक ढंग से मूठ भी नहीं मारी, चल नीचे लेट, लगता है अब मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।

मैंने तो अब तक यही सुना था की लड़का लडकी के ऊपर चड़ कर चोदता है। मगर जब माँ ने मुझे नीचे लेटने के लिए कहा तो मैं सोच में पड़ गया और माँ से पूछा नीचे क्यों लेटना है, माँ क्या अब चुदाई नहीं होगी। मुझे लग रहा था कि माँ फिर से मेरा मुठ मार देगी। माँ ने हँसते हुए कहा नहीं अनाड़ी चुदाई तो होगी, जितनी तुझे चोदने की आग लगी है मुझे भी चुदवाने की उतनी ही आग लगी है, चुदाई तो होगी ही, तुझे तो अभी रात भर मेरी चूत का बाजा बजाना है, मेरे राजा तू नीचे लेट अब उल्टी तरफ से चुदाई होगी। उल्टी तरफ से चुदाई होगी इसका क्या मतलब है। माँ बोली इसका मतलब तुझे लिटाके में खुद ही तेरे लंड से चुदवाउंगी, ये तो तू खुद ही थोड़ी देर के बाद देख लेना मगर फिलहाल तू नीचे लेट और अपना लंड खड़ा कर के रख फिर देख मैं कैसे तुझे मज़ा देती हूँ।

मैं नीचे लेट तो गया पर अब भी मैं सोच रहा था, कि माँ कैसे करेगी माँ ने जब मेरे चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव देखे तो वो मेरे गाल पर एक प्यार भरा तमाँचा लगते हुए बोली सोच क्या रहा है, तू अभी चुपचाप तमाशा देख फिर बताना की कैसा मज़ा आता है, कह कर माँ ने मेरे कमर के दोनो तरफ अपनी दोनो टाँगे कर दी और अपनी चूत को ठीक मेरे लंड के सामने ला कर मेरे लंड को एक हाथ से पकड़ा और लंड को सीधा अपनी चूत के गुलाबी मुँह पर लगा दिया।

लंड को चूत के गुलाबी मुँह पर लगा कर वो मेरे लंड को अपने हाथो से आगे पीछे कर के अपनी चूत की दरार पर रगड़ने लगी। उसकी चूत से निकला हुआ पानी मेरे लंड पर लग रहा था और मुझे बहुत मज़ा आ रहा था, मेरी साँसे उस अगले पल के इंतज़ार में रुकी हुई थी जब मेरा लंड उसकी चूत में घुसता।

मैं बहुत देर से इंतज़ार कर रहा था। तभी माँ ने अपनी चूत की फाँक को एक हाथ से फैलाया और मेरे लंड के मुहं को सीधा चूत के गुलाबी मुँह पर लगा कर उपर से हल्का सा ज़ोर लगाया। मेरे लंड का मुहं उसके चूत की फांको के बीच में समा गया। फिर माँ ने मेरी गांड पर अपने हाथो को जमाया और ऊपर से एक हल्का सा धक्का दिया मेरे लंड का थोड़ा सा और भाग उसकी चूत में समा गया था। उसके बाद माँ स्थिर हो गई और इतने से ही लंड को अपनी चूत में घुसा कर आगे पीछे करने लगी। थोरी देर तक ऐसा करने के बाद उसने फिर से एक धक्का मारा। इस बार धक्का थोड़ा ज्यादा ही जोरदार था और मेरे लंड का लगभग आधा से अधिक भाग उसकी चूत में समा गया। मेरे मुँह से एक ज़ोरदार चीख निकल गई।
क्योकि मेरे लंड के मुहं की चमड़ी एक दम से पीछे उलट गई थी। पर माँ ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया और उतने ही जोर से लंड को आगे पीछे करते हुए धक्का मारते हुए बोली, बेटा चुदाई कोई आसान काम नहीं है, लड़की भी जब पहली बार चुदती है, तो उसको भी दर्द होता है और उसका दर्द तो तेरे दर्द के सामने कुछ भी नहीं है, जैसे उसकी चूत की सील टूटती है, वैसे ही तेरे लंड की भी आज सील टूटी है। थोड़ी देर तक आराम से लेटा रह फिर देख तुझे कैसा मज़ा आता है।

माँ अब उतने लंड को ही चूत में ले कर धीरे धीरे धक्के लगा रही थी। वो अपनी गांड को उछाल उछाल के धक्के पर धक्का मारे जा रही थी। थोड़ी देर में ही मेरा दर्द कम हो गया और मुझे गीलेपन का अहसास होने लगा था, माँ की चूत ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया था और उसकी चूत से निकलते पानी के कारण मेरे लंड का घुसना और निकलना भी आसान हो गया था, माँ अब और ज़ोर ज़ोर से अपनी गांड उछाल उछाल के धक्के लगा रही थी और मेरे वीर्य का ज्यादा से ज्यादा भाग उसकी चूत के अंदर घुसता जा रहा था।

माँ ने इस बार एक ज़ोरदार धक्का मारा और मेरे लंड का ज्यादातर भाग अपनी चूत में छुपा लिया और सिसकते हुए बोली ईईईइ दैयया, कितना तगड़ा लंड है, जैसे कि गरम लोहा हो एक दम सीधा चूत की दीवारो को रगड़ मार रहा है, मेरे जैसी चुदी हुई औरत की चूत में जब ये इतना कसा हुआ है। तो जवान लड़कियों की चूत तो फाड़ के रख देगा, मज़ा आ गया, ले साले और घुसा लंड और घुसा” कह कर तेज़ी से तीन चार धक्के और मार दिए।

माँ ने तेज़ी से लगाए गये इन धक्को से मेरा पूरा का पूरा लंड उसकी चूत के अंदर चला गया। माँ ने सिसकते हुए धक्के लगाना जारी रखा और अपने एक हाथ को चूत के मुहं के पास ले जाकर देखने लगी की पूरा लंड अंदर गया है की नहीं। जब उसने देखा की पूरा का पूरा लंड उसकी चूत में घुस चुका है। तब उसने अपनी गांड को उठाते हुए एक तेज धक्का मारा और मेरे हाथो का चुम्मा ले कर बोली कैसा लग रहा है। बेटा अब तो दर्द नहीं हो रहा है ना।
नहीं माँ अब दर्द नहीं हो रहा है, देखो ना मेरा पूरा लंड तुम्हारी चूत के अंदर चला गया है। हाँ बेटा अब दर्द नहीं होगा अब तो बस मज़ा ही मज़ा है। मेरी चूत के पानी के गीलेपन से तेरी चमड़ी उलटने में अब आसानी हो रही है। इसलिए तुझे अब दर्द नहीं हो रहा होगा बल्कि मज़ा आ रहा होगा। क्यों बेटा बोल ना मज़ा आ रहा है या नहीं, अपनी माँ की चूत में को चोदकर। अब तो तुझे पता चल रहा होगा की चुदाई क्या होती है, बेटा ले मज़े चुदाई का और बता कि तुझे कैसा लग रहा है, माँ की चूत में लंड घुसाने में। माँ सच में गजब का मज़ा आ रहा है, ओह माँ तुम्हारी चूत कितनी कसी हुई है। मेरा लंड तो इसमे बड़ी मुश्किल से घुसा है, जबकि मैंने सुना था की शादीशुदा औरतो की चूत ढीली हो जाती है।

माँ बोली “बेटा ये तेरी माँ की चूत है, ये ढीली होने वाली चूत नहीं है, कहकर माँ ने लंड को पूरा खींच कर बाहर निकाला और फिर ऊपर से गांड का ज़ोर लगा के एक ज़ोरदार धक्का मारा कि पूरा लंड एक ही बार में गप्प से अपनी चूत के अंदर चला गया। माँ अब तेज तेज धक्के लगा के पूरा का पूरा लंड अपनी चूत में एक ही बार में गप्प गप्प से लेती रही थी।

उसने मेरा उत्साह बड़ाते हुए कहा अबे साले नीचे क्या औरतो की तरह से पड़े रह कर चुदवा रहा है, अपनी गांड उछाल उछाल के तू भी धक्का मार साले चोद अपनी माँ को ऐसे पड़े रहने से थोड़े ही मज़ा आएगा, देख मेरी चूत कैसे तेरे सारे वीर्य को एक ही बार में निगल रही है, तेरा लंड मेरी चूत की दीवारो को कुचलता हुआ कैसे मेरी चूत के लास्ट तक ठोकर मार रहा है और तू भी नीचे से धक्का मार मेरे राजा और बता की कैसा लग रहा है, माँ की चुदाई करने में मज़ा आ रहा है या नहीं।

मैंने भी नीचे से गांड उछाल कर धक्का मारना शुरू कर दिया और माँ के कुल्हो को अपनी हथेलियों के बीच दबोच कर बोला, माँ बहुत मज़ा आ रहा है, सच में इतना मज़ा तो जिंदगी में कभी नहीं आया। ओह तुम्हारी चूत में मेरा लंड एकदम धीरे धीरे जा रहा है और ऐसा लगता है जैसे कि मैंने किसी गरम भट्टी में अपने लंड को डाल दिया है। ओह सस्सस्सस्सीईईईई कितना गरम है तेरी चूत माँ और ज़ोर से मरो धक्का और ले लो अपने बेटे का लंड अपनी चूत में ऊऊओह साली मज़ा आ गया कह कर मैंने अपनी एक उंगली को माँ की गांड की दरार पर लगा कर उसको हल्का सा उसकी गांड में डाल दिया।

माँ का जोश मेरी इस हरकत पर दुगुना हो गया और वो अपनी कुल्हो को और तेज़ी के साथ उछालने लगी और कहने लगी गांड में उंगली डालता है। तेरी माँ को चोद और ले मेरा चूत का धक्का तेरे लंड पर दूँगी मुँह क्या देख रहा है, चूची दबा साले मुँह में लेकर चूस और चुदाई का मज़ा ले। मुझे कितने वर्षो के बाद ऐसी चुदाई का आनंद मिल रहा है ।।

मैंने माँ के आदेश पर उसकी चूचियों को अपने हाथो में थाम लिया और उसकी चूची को खींच कर उसके निप्पल से अपने मुँह को सटा कर चूसते हुए दूसरी चुचि को खूब ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा। माँ अब अपनी गांड को पूरा उछाल उछाल कर मेरे लंड को अपनी गरम चूत में डलवा रही थी। उसकी चूत एक दम अंगीठी की तरह से गरम हो चुकी थी और खूब पानी छोड़ रही थी मेरा लंड उसकी चूत के पानी से भीग कर सटा सट उसकी चूत के अंदर बाहर हो रहा था।

माँ के मुँह से गालियों की बौछार हो रही थी। वो बोल रही थी, चोद मेरी चूत को दम लगाके, कितना मज़ा आ रहा है, तेरे बाप से अब कुछ नहीं होता अब तो तू ही मेरी चूत की आग को ठंडी करना, मैं तुझे चुदाई का शहनशाह बना दूँगी, तेरे उस बाप को छूने भी नहीं दूँगी में अपनी चूत, तू ही चोदना मेरी चूत को और मेरी आग ठंडी करना, कहाँ था तू, अब तक तो मैं तेरे लंड का कितना पानी पी चुकी होती, चोद रे चोद अपनी गांड तक का ज़ोर लगा, चोदने में आज अगर तूने मुझे खुश कर दिया तो फिर मैं तेरी गुलाम हो जाउंगी।

मैं माँ की चूचियों को मसलते हुए अपनी गांड को नीचे से उछलता जा रहा था। मेरा लंड उसकी कसी चूत में गपागप…फ़च फ़च की आवाज़ करता हुआ अंदर बाहर हो रहा था, हम दोनो की साँसे तेज हो गई थी और कमरे में चुदाई की माँदक आवाज़ गूँज रही थी और दोनो के बदन से पसीना छूट रहा था और सांसो की गर्मी एक दूसरे के बदन को महका रही थी। माँ अब शायद थक चुकी थी। उसके धक्के मारने की रफ़्तार अब थोड़ी धीमी हो गई थी और अब वो हांफने भी लगी थी।

थोरी देर तक हाँफते हुए वो धक्का लगाती रही फिर अचानक से पस्त हो कर मेरे बदन के ऊपर गिर गई और बोली ओह मैं तो थक गई इतने में आम तौर पर मेरा पानी तो निकल जाता है। पर आज नये लंड के जोश में मेरा पानी भी नहीं निकल रहा। ओह मज़ा आ गया आज से पहले ऐसी चुदाई कभी नहीं हुई, अब तो तुझे मेरे ऊपर चढ़ कर धक्का मारना होगा। तभी चुदाई हो पाएगी साले, कह कर वो अपने पूरे शरीर का भार मेरे बदन पर दे कर लेट गई।

मेरी साँसे भी तेज चल रही थी मगर लंड अब भी खड़ा था। दिल में चुदाई की ललक थी और अब तो मैंने चुदाई भी सीख ली थी। मैंने धीरे से माँ के कुल्हो को पकड़ का नीचे से ही धक्का लगाने का प्रयास किया और दो तीन छोटे छोटे धक्के मारे मगर क्योंकी माँ थोड़ा थक गई थी, इसलिए वो उसी तरह से लेटी रही बिना हिले।

माँ के भारी शरीर के कारण मैं उतने ज़ोर के धक्के नहीं लगा पाया जितना लगा सकता था। मैंने माँ को बाँहो में भर लिया और उसके कान के पास अपने मुँह को ले जाकर फुसफुसाते हुए बोला, ओह माँ जल्दी करो ना और धक्का मारो ना अब नहीं रहा जा रहा है, जल्दी से मारो ना। माँ ने मेरे चेहरे को गौर से देखते हुए मेरे होंठो को चूम लिया और बोली थोड़ा दम तो लेने दे साले कितनी देर से तो चुदाई हो रही है। थकान तो होगी ही ना।
पर माँ मेरा तो लंड लगता है फट जाएगा मेरा जी कर रहा है कि खूब ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाऊं। तो मार ना, मैंने कब मना किया है, आजा मेरे ऊपर चड़ के खूब ज़ोर ज़ोर से चुदाई कर दे। माँ धीरे से मेरे ऊपर से उतर गई, उसके उतरने पर मेरा लंड भी फिसल के उसकी चूत से बाहर निकल गया था। लेकिन माँ ने कुछ नहीं कहा और बगल में लेट कर अपनी दोनो जाँघो को फैला दिया।

मेरा लंड एक दम रस से भीगा हुआ था और उसकी चूत लाल रंग की किसी पहाड़ी आलू के जैसे लग रही थी। मैंने अपने लंड को पकड़ा और सीधा अपनी माँ की जाँघो के बीच डाल दिया। उसकी जाँघो के बीच बैठ कर मैं उसकी चूत को गौर से देखने लगा। उसकी चूत पूरी पिचक रही थी और चूत का मुँह अभी थोड़ा सा फूला हुआ लग रहा था। चूत का गुलाबी छेद अंदर से झाँक रहा था और पानी से भीगा हुआ महसूस हो रहा था। मैं कुछ देर तक रुक कर उसकी चूत की सुंदरता को निहारता रहा।

माँ ने मुझे जब कुछ करने की बजाए केवल घूरते हुए देखा तो वो सिसकते हुए बोली “क्या कर रहा है। जल्दी से डाल ना चूत में वीर्य को, ऐसे खड़े खड़े खाली घूरता रहेगा क्या? कितना देखेगा चूत को, अबे उल्लू, देखने से ज्यादा मज़ा चोदने में है, जल्दी से अपना मूसल डाल दे मेरी चूत में अब नाटक मत कर। माँ ने इतना कहकर मेरे लंड को अपने हाथो में पकड़ लिया और बोली ठहर मैं लगाती हूँ। साले और मेरे लंड के मुहं को चूत के खुले छेद पर घिसने लगी और बोली चूत का पानी लग जाएगा और चिकना हो जाएगा समझा फिर आराम से चला जाएगा चूत मैं। माँ के ऊपर झुक गया और अपने आप को पूरी तरह से तैयार कर लिया अपने जीवन की पहली चुदाई के लिए।

माँ ने मेरे लंड को चूत को छेद पर लगा कर स्थिर कर दिया और बोली हाँ अब मारो धक्का और चोद दो चूत में मैंने अपनी ताक़त को समेटा और कस के एक ज़ोरदार धक्का लगा दिया मेरे लंड का मुहं तो पहले से भीगा हुआ था। इसलिए वो आराम से अंदर चला गया उसके साथ साथ मेरे लंड का आधा से अधिक भाग चूत की दीवारो को रगड़ता हुआ अंदर घुस गया। ये सब अचानक तो नहीं था मगर फिर भी माँ ने सोचा नहीं था कि मैं इतनी ज़ोर से धक्का लगा दूँगा, इसलिए वो चौंक गई और उसके मुँह से एक चीख निकल गई।

मगर मैंने तभी दो तीन और ज़ोर के झटके लगा दिए और मेरा लंड पूरा का पूरा अंदर घुस गया। पूरा लंड घुसा कर जैसे ही मैं रुका तो माँ के मुँह से निकला पड़ा साले हरामी क्या समझ रखा है रे, कमीने ऐसे धक्का मारा जाता है क्या? सांड की तरह से घुसा दिया सीधा एक ही बार में, धीरे धीरे करना नहीं आता है तुझे, साले कमीने पूरी चूत हिल गई और एक तेरा बाप है कि घुसाना ही नहीं जनता और बेटा है कि घुसाता है तो ऐसे घुसाता है कि जैसे की मेरी चूत फाड़ने के लिए घुसा रहा हो हरामी कहीं का।

माफ़ कर देना माँ मगर मुझे नहीं पता था कि तुम्हे चोट लग जाएगी। तू तो जानती है ना कि ये मेरी पहली चुदाई है। फिर मैंने माँ की दोनो चुचियों को अपने हाथो में थाम लिया और उन्हे दबाते हुए एक चूची के निप्पल को चूसने लगा। कुछ देर तक ऐसे ही रहने के बाद शायद माँ का दर्द कुछ कम हो गया और वो भी अब नीचे से अपनी गांड उचकाने लगी और मेरे बालो में हाथ फेरते हुए मेरे सिर को चूमने लगी। मैंने पूरी तरह से स्थिर था और चुचि को चुसने और दबाने में लगा हुआ था। माँ ने कहा बेटा अब धक्का लगाओ और चोदना शुरू करो अब देर मत करो तेरी माँ की प्यासी चूत अब तेरे लंड का पानी पीना चाहती है।

मैंने दोनो चुचियों को थाम लिया और धीरे धीरे अपनी गांड उछालने लगा। मेरा वीर्य माँ की चूत के अंदर से बाहर निकलता और फिर घुस जाता था। माँ ने अब नीचे से अपने कुल्हो को उछालना शुरू कर दिया था। इस तरह झटके मारने के बाद ही चूत से ,,,फ़च फ़च की आवाज़े आनी शुरू हो गई थी। ये इस बात को बतला रहा था कि उसकी चूत अब पानी छोड़ने लगी है और अब उसे भी मज़ा आना शुरू हो गया है। माँ ने अपने पैरो को घुटनो के पास से मोड लिया था और अपनी टॅंगो की कैंची बना के मेरे कमर पर बाँध दिया था। मैं ज़ोर ज़ोर से धक्का मारते हुए उसके होंठो और गालो को चूमते हुए उसके चुचियों को दबा रहा था।

माँ के मुँह से सिसकारियों का दौर फिर से शुरू हो गया था और वो हांफते हुए बोलने लगी, मारो और ज़ोर से मारो राजा चोदो मेरी चूत को चोद चोद के बिगाड़ दो बेटा कैसा लग रहा है। बेटा चोदने में मज़ा आ रहा है या नहीं, मेरी चूत कैसी लगा रही है। मुझे बता ना राजा, पूरी जड़ तक लंड से चोद दो राजा और कस कस के धक्के मार के पक्के बन जाओ। बता ना राजा बेटा कैसा लग रहा है। माँ की चूत में वीर्य डालने में मैंने धक्का लगते हुए कहा, हाँ.. माँ बहुत मज़ा आ रहा है, बहुत कसी हुई है तुम्हारी चूत, मेरा लंड तो एक दम मस्त होकर जा रहा है तेरी चूत में, ऐसा लग रहा है जैसे किसी बोतल में लकड़ी का ढक्कन फँसा रहा हूँ। क्या सच में मेरा बापू तुझे चोदता नहीं था, या फिर तुम उसको चोदने नहीं देती थी।

इस पर माँ ने अपने पैरो का शिकंजा और कसा दाँत पीसते हुए कहा, साले तेरा बाप तो क्या चोदेगा मुझे उसने तो मुझे ना जाने कब से चोदना छोड़ा हुआ है, पर मैं किसी तरह से अपनी चूत की खुजली को अंदर ही दबा लेती थी। क्या करती किस से चुदवाती और फिर जिसके पास चुदवाने जाती वो कही मुझे संतुष्ट नहीं कर पता तो क्या होता। बदनामी अलग से होती और मज़ा भी नहीं आता। तेरा लंड जब देखा तो मुझे लग गया की तू ना केवल मुझे संतुष्ट कर पाएगा, बल्कि तुझसे चुदवाने से बदनामी भी नहीं होगी और तू भी मेरी चूत का प्यासा है। फिर अपने बेटे से चुदवाने का मज़ा ही कुछ और ही है। जब सोचने में इतना मज़ा आ रहा था, तो मैंने सोचा की क्यों ना चुदवा के देख ही लिया जाए।
माँ तो फिर कैसा लग रहा है अपने बेटे से चुदवाने में मज़ा आ रहा है ना मेरा लंड अपनी चूत में लेकर, बोलो मेरा लंड तुझे मज़ा दे रहा है या नहीं।

गजब का मज़ा आ रहा है राजा, तेरा लंड तो मेरी चूत के कोने तक टकरा रहा है और मेरी चूत के दीवारो को मसल रहा है और मेरी नाभि तक पहुँच रहा है। तू बहुत सुख दे रहा है अपनी माँ को मार कस के मार धक्का चोद ले अपनी माँ की चूत को और इसकी दो फाँक कर दे।
मेने कहा जब चुदवाने में इतना मज़ा आ रहा है तो फिर सोते वक्त इतना नाटक क्यों कर रही थी। जब मैं तुझे नंगा हो कर दिखाने को बोल रहा था।

अरे मेरे भोलू राम इतना भी नहीं समझता क्या? इसको कहते है नखरा, औरते दो तरह का नखरा दिखा सकती है या तो सीधे तेरा लंड पकड़ के कहती की चोद मुझे या फिर धीरे धीरे तुझे तडपा तडपा के एक एक चीज़ देखती और तब तुझसे चुद्वाती, मुझे सीधे चुदाई में मज़ा नहीं आता, मैं तो खूब खेल खेल के चुदवाना चाहती थी। चक्की जितनी धीरे चलती है उतना ही बारीक़ पीसती है। साले इसलिए मैंने थोड़ा सा नखरा दिखाया था, अब बाते चोदना बंद कर और लगा ज़ोर ज़ोर से धक्का और चोद मेरी चूत को लंड डाल चूत में।

ठीक है, अब तो मैं भी पूरा सीख गया हूँ। देख अब मैं कैसे चोदता हूँ। तेरी इस मस्तानी चूत को और कितना मज़ा देता हूँ तुझे, देख साली फिर ना बोलना की बेटे ने ठीक से नहीं चोदा। रंडी जितना तूने मुझे सिखाया है मैं उस से कही ज्यादा मज़ा दूँगा, साली मैं अब पूरे जोश के साथ धक्का मरने लगा था और मेरा पूरा लंड मुहं तक निकल कर बाहर आ जा रहा था। फिर सीधा सरकते हुए गच्च से अंदर माँ की चूत की गहराइयों में समा जा रहा था। लंड की चमड़ी तो अब शायद पूरी तरह से उलट चुकी थी और चुदाई में अब कोई दिक्कत नहीं आ रही थी। माँ की चूत एक दम से गरम भट्टी की तरह तप रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं जन्नत की सैर कर रहा हूँ।
मेरी गांड पर माँ का हाथ था और वो ऊपर से दबाते हुए मुझे अपनी चूत पर दबा रही थी और साथ में नीचे गांड उछाल कर मेरे वीर्य को अपनी चूत में ले रही थी। चूत के होंठो को मसलते हुए मेरा लंड सीधा चूत की दीवार से टकराता था और फिर उतनी ही तेज गति से बाहर आ कर फिर घुस जाता था। कमरे का माहौल फिर से गरम हो गया था और वातावरण में चुदाई की महक फैल गई थी। पूरे कमरे में गछ गछ फ़च फ़च की आवाज़ गूँज रही थी। हम दोनो की साँसे गर्म चल रही थी। दोनो के बदन से निकलता पसीना एक दूसरे को भिगो रहा था। लेकिन इसकी फ़िक्र किसे थी।
ऐसे ही धक्का मारे जा ऐसे ही चोद कर मुझे ठंडा कर दे, तेरे लंड से ही ठंडी होगी तेरी माँ, पंखे से ठंडे होनी वाली नहीं हूँ मैं, तेरी माँ को तो तेरा मोटा मूसल चाहिए जो की उसकी चूत की दो फांके कर के उसकी चूत के अंदर की ज्वाला को ठंडा कर दे।

ले साली और ले मेरे लंड को अपनी मस्तानी चूत में, ले खाजा मेरे लंड को अपनी चूत से, ओह मेरा तो जन्म सफल हो गया और कस कस के दे बेटा इसी लंड के लिए तो मैं इतनी प्यासी थी, ऐसे ही लंड से चुदवाने की चाहत को पाले हुए थी मैं, आज मेरी तमन्ना पूरी हो गई। अब तो बस आंधी आए या तूफान कोई भी हमे नहीं रोक सकता था। हम दोनो अब पूरे चरम पर पहुँच चुके थे और चुदाई की रफ़्तार में कोई कमी नहीं चाहते थे। माँ की सिसकारिया तेज हो गई थी और अब दोनो में से कोई भी एक दूसरे को छोड़ने वाला नहीं था। दोनो जी जान से एक दूसरे से चिपके हुए धक्के धक्के पर धक्का लगाए जा रहे थे।

माँ सिसकते हुए बोली राजा ऐसे ही मेरा निकालने वाला है। मारता रह धक्का धीरे मत कर। मेरा भी अब निकालने वाला था और मैं भी ज़ोर ज़ोर से धक्का लगाते हुए चोदने लगा और झड़ने लगा ओह साली मेरा भी निकल रहा है। मेरा वीर्य तो पूरा का पूरा चूत में निकल गया, कह कर मैं माँ के ऊपर लेट गया। हम दोनो की आँखे बंद थी और थकान के मारे दोनों एक दूसरे बदन से चिपके हुए थे।।
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06-08-2021, 12:46 PM,
#34
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
भैया मुझे कोई अच्छा सा गन्ना दो ना

मेरा नाम धवल है। दोस्तों मेरी उम्र 23 साल की है मेरी लम्बाई 5.7 है रंग गौरा और में बहुत हेंडसम हूँ। अभी कुछ समय पहले मेरी बाहर नई नई नौकरी लगी थी। में वहाँ से कुछ दिनों कि छुट्टी ले कर घर पर आया था।

ये कहानी अभी पिछले महीने की है जिसमे मैने अपनी छोटी बहन प्रिया की चुदाई खेत पर की और फिर उसके बाद क्या क्या हुआ वो आप सभी कहानी मे ही पड़ लेना। दोस्तो पहले में आपका परिचय अपनी बहन से करा देता हूँ। दोस्तों मेरी छोटी बहन का नाम प्रिया है। उसकी उम्र 20 साल तक होगी उसके फिगर बहुत बड़े 36 28 34 है। और वो बहुत सुंदर है वैसे तो वो शहर मे रहकर पड़ाई कर रही है।

लेकिन अभी उसकी कॉलेज की छुट्टियाँ चल रही है। और प्रिया जब से शहर से आई है। वो काफ़ी समझदार हो गई है। एक तो वो वैसे ही बहुत सुंदर है उपर से उसके छोटे छोटे कपड़े मे वो तो और सेक्सी लगती है। और उसका फिगर देख कर तो किसी का भी लंड खड़ा हो जाए। क्या फिगर है मोटे और गोरे बूब्स पतली कमर भरी हुई गांड दोस्तो आप तो जानते है की बाहर नौकरी जब कुछ भी नही कर सकते और वहाँ उन्हे कुछ भी देखने को नही मिलता। अब घर पर आकर तो बस मुझसे रहा नही जा रहा था। में हर समय बस यही सोच रहता था की बस किसी की भी चूत मिल जाए चाहे वो चूत प्रिया की ही क्यों ना हो बस मुझे तो चूत कि चुदाई करनी थी।

तभी एक दिन की बात है। में बैठ कर प्रिया के बूब्स को निहार रहा था। की तभी माँ ने कहा की बेटा जा कर अपने बाबूजी को खेत पर खाना दे कर आओ। तो मैने कहा ठीक है माँ आप खाने को पैक कर दो तो मैं बाबूजी को दे कर आता हूँ। तभी प्रिया ने कहा की माँ मैं भी भैया के साथ खेत देखने जाउंगी मुझे बहुत दिन हो गये खेत पर गये हुए तो माँ ने कहा की ठीक है। और माँ ने खाना पैक कर के मुझे दे दिया और हम दोनों जाने लगे।

मैने एक सायकिल ले ली और प्रिया को आगे बैठने के लिए कहा तो प्रिया आगे बैठ गई। और हम चल दिए और फिर खेत पर पहुंच कर बाबूजी को खाना खिलाया। और फिर हम खेत पर टहलने लग गये। बाबू जी खाना खा के एक मजदूर को घर उसे बुलाने चले गये। और हम दोनों को कहा की में जा रहा हूँ। और हो सकता है कि मुझे थोड़ी देर हो जाएगी तुम लोग टहल कर घर चले जाना। फिर क्या था मैं और प्रिया टहलने लगे वहाँ पर हमारा एक गन्ने का खेत था। में उसमे से एक गन्ना तोड़ कर उसे चूसने लगा था।

तभी प्रिया ने मुझसे कहा की भैया मुझे भी गन्ना चाहिए। तो मैने उसे भी तोड़ कर गन्ना दे दिया। और वो मजे से उसे चूसने लगी कुछ देर के बाद प्रिया ने मुझसे कहा की भैया मुझे टयलेट लगी है। तो मैने कहा की यहीं पर कहीं भी जगह देख कर कर लो। यहाँ पर कोई दरवाजा तो नही है। और मैं आगे की तरफ चला गया फिर मैने एक गन्ने के झुंड के पीछे छुप गया और चुप कर प्रिया को देखने लगा। प्रिया ने अपनी जीस उतारी। और मैने देखा की उसने अंदर एक पिंक कलर की पेंटी पहनी हुई थी उसे भी उतार दी। तब मैने पहली बार प्रिया की गोरी गांड देखी जिसे देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया।

और फिर प्रिया जब खड़ी हो रही थी। अब मैने उसकी गांद का गुलाबी छेद भी देखा जिसे देख कर मुझसे रहा नही जा रहा था। फिर प्रिया ने अपनी जींस पहन कर मुझे आवाज़ लगाई। तो मैं उसके पास गया और मेरे पास आते ही उसकी नज़र मेरे लोवर पर पड़ी। जो की एक टेंट बना हुआ था। अब वो ज़रूर समझ गई थी की मैं उसे टायलेट करते हुऐ देख रहा था। फिर वो मुस्कुराने लगी और उसने मुझसे कहा की भैया मुझे कोई अच्छा सा गन्ना तोड़ कर दो ना।

में पहले तो ये समझ नही पा रहा था। पर मैने कहा की तू यहीं रुक मैं तेरे लिए एक अच्छा से गन्ने का इंतज़ाम करता हूँ। तो प्रिया ने कहा की सच भैया जल्दी करो मुझसे रहा नहीं जा रहा। मुझे प्रिया की बातों मे मुझे कुछ शरारत नज़र आ रही थी। मैं खेत के अंदर चला गया और वहाँ मुझे एक जगह खाली और साफ सी नज़र आई। और अब तो मेरे सामने सिर्फ प्रिया की गोरी गांड ही घूम रही थी। फिर क्या था मैने अपना 8 इंच का लंड बाहर निकल कर मूठ मारने लगा उधर प्रिया काफ़ी देर तक मेरा बाहर इंतजार करने के बाद जाने कब अंदर आ गयी। और मेरी आँखे बंद थी अचानक मुझे किसी और का हाथ अपने लंड पर महसूस हुआ। तभी मैने आँख खोली तो देखा की प्रिया घुटनो के बल बैठ कर मेरे लंड को सहला रही है। मैने उसको कहा की प्रिया ये क्या कर रही हो। तो प्रिया ने कहा की भैया ये आपकी हालत मेरी वजह से हुई है ना तो मैने सोच की इससे ठीक भी मैं ही कर दूँ। फिर क्या था मेरे चेहरे पर मुस्कान थी। और मैंने प्रिया को कुछ नही कहा जिसे उसने मेरी हाँ समझी और उसने मेरा लंड मुहं मे लेकर उसे चूसने लगी मैं उसके सर पर हाथ फिरा रहा था और मेरे मुहं से अहाआ आआआहा की आवाज़ निकल रही थी। प्रिया मेरा लंड को एक गन्ने की तरह चूस रही थी। जैसे कि उसने पहले भी कई बार लंड चूसा हो।

काफ़ी देर बाद मैने प्रिया को खड़ा किया और उसकी टी-शर्ट के उपर से ही उसके मोटे बूब्स दबाए। और मैंने उसे कहा की रूको मैं अभी आता हूँ तो उसने कहा की कहाँ जा रहे हो तुम। तो मैने कहा की बस दो मिनट मे आया और मैं भाग के गया और जिस चादर पर बाऊजी ने खाना खाया था। वो चादर उठा कर लाया और फिर उसे वहाँ पर बिछा दिया। और मैने प्रिया के सभी कपड़े उतार दिये और प्रिया को पूरा नंगा कर दिया। और अपने भी सारे कपड़े उतार लिये। प्रिया के बड़े बड़े बूब्स पपीते की तरह हवा मे झूल रहे थे। मैने प्रिया को लिटा कर उसके बूब्स को मुहं मे लेकर चूसने लगा। और मैने एक उंगली प्रिया की चूत मे डालकर अंदर बाहर करने लगा। काफ़ी देर अंदर बाहर करने से प्रिया की चूत बहुत गीली हो गई थी। और प्रिया ने मुझसे कहा की भैया अब रहा नही जा रहा तो मैने भी अपने लंड पर थूक लगाकर प्रिया की चूत लंड लगाया और जोर से एक धक्का लगाया और मेरा आधे से ज्यादा लंड सरक कर उसकी चूत मे समा गया। और फिर दो चार धक्के मारने के बाद मे पूरा लंड प्रिया की चूत मे समा गया और मैं प्रिया को चोदने लगा। उसे चोदते वक़्त मेरे मन मे एक ही ख़याल आ रहा था। की जिस तरह प्रिया की चूत मे मेरा लंड गया है। इस चुदाई से तो ये साफ हो जाता है की प्रिया पहले भी कई बार चुद चुकी है। लेकिन मुझे इससे कोई फर्क नही पड़ता की मेरी बहन किससे चुद्वाती है। क्योकि वो तो इतनी सेक्सी माल है की उसे चोदने के लिए कोई भी तैयार हो जाए और इसी उधेड़ वन मे प्रिया को करीब 20 मिनट से में ज़ोर ज़ोर से चोद रहा था। और प्रिया भी खूब आवाज़ निकाल रही थी आआआहाल्ह भैया और छोड़ो मुझे में झड़ने वाली हूँ। तब मैने और तेज़ धक्के मारने शुरू कर दिये। और प्रिया झड़ गई इधर में भी झड़ने वाला था। थोड़ी देर बाद मैं भी झड़ गया। जैसे ही में ने अपना लंड प्रिया की चूत मे से बाहर निकल कर हम खड़े हुए तो हम दोनो के होश उड़ गये सामने बाबूजी खड़े थे। उन्हे देख कर हम दोनो की ज़ुबान पर जैसे ताला लग गया था।

और फिर बाबूजी आगे आए और मुझे समझ नही आ रहा था। की में उनसे क्या कहूँ तभी बाबूजी आगे आए और उन्होने प्रिया की गांड पर हाथ फेरा और कहा की अरे प्रिया तू तो शहर जा कर और भी कड़क माल बन गई हो। इसे सुन कर तो हमारी जान मे जान आई। और फिर क्या था। प्रिया ने झट से घुटनो के बल बैठ कर बाबूजी के लंड को बाहर निकल लिया। बाबूजी का लंड 9 इंच लंबा और दो इंच मोटा है। फिर प्रिया ने बाबूजी का लंड को सहलाते हुए कहा की इतने मोटे ताज़े लंड हमारे घर मे ही है।

और में ऐसे ही बाहर के मर्दो से चुद्वाती रही। और फिर प्रिया ने बाबूजी का लंड मुहं मे ले लिया और चूसने लगी उसे देखा मेरा लंड भी फिर से खड़ा हो गया। और मैं भी प्रिया के सामने जा कर खड़ा हो गया। तभी प्रिया ने मेरा भी लंड हाथ मे ले लिया। और उसे भी चूसने लगी काफ़ी देर के बाद बाबूजी लेट गये। और प्रिया बाबूजी के लंड पर अपनी चूत को लगाकर बैठ गई फिर और बाबूजी धक्के मारने लगे। पहले तो थोड़ी देर तक प्रिया ने मेरा लंड चूसा फिर मैने अपने हाथ मे लेकर अपना लंड सहलाने लगा। और जब मुझे पीछे की वार मिल गया तो प्रिया की गोरी गांड देखकर मेरे मुहं मे पानी आ गया था।

मैने अपने लंड पर तोड़ा सा थूक लगाया। और पीछे से प्रिया की गांद के गुलाबी छेद पर लगाया। तो प्रिया ने पीछे देखकर मुझे एक स्माइल दी तो जैसे उसने हाँ भर दी फिर क्या था। मैने एक ज़ोर दार धक्का मारा और मेरा लंड प्रिया की गांड मे फिसलता हुआ चला गया। फिर हम दोनो ने धक्के मारने शुरू कर दिये और प्रिया आवाज़े निकल रही थी। आआहाआआहहाहा बाबूजी और तेज़ और तेज़ और बाबूजी भी और तेज़ मारने लग गये करीब 30 मिनट के बाद हम लोग बारी बारी से झड़ गये और फिर प्रिया ने मेरा और बाबूजी का लंड चूस कर साफ किया। और फिर हमने अपने कपड़े पहन कर बाहर आ गये। फिर हम दोनो घर आ गये उस दिन रात को भी माँ के सोने के बाद हम तीनो ने छत पर चुदाई की जब तक हमारी छुट्टियां थी हमने चुदाई के खूब मज़े लिए। और फिर प्रिया अपने कालेज चली गई। और में अपनी जॉब पर चला गया। अब भी में रोज़ शाम को प्रिया से फ़ोन पर बात करता हूँ। अभी कुछ दिनो के बाद में दीवाली की छुट्टीयां ले कर घर जाऊंगा और प्रिया भी आएगी तो हम फिर से चुदाई करेंगे।
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06-08-2021, 12:46 PM,
#35
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
अहहहह क्या मस्त है मेरी बहना

हैल्लो दोस्तों, मेरी बहन पदमा जब 22 साल की हुई तब में 21 साल का था. मेरा नाम आशु है और में एक प्राइवेट कम्पनी में काम करता हूँ. मेरा कद 5 फुट 11 इंच है और में बहुत कसरती जिस्म का मालिक हूँ. जिस कम्पनी मे में काम करता हूँ उसकी मालकिन मिस कुकरेजा एक 40 साल की महिला है जिसका पति मर चुका है और उसके एक बेटा और एक बेटी है. उसका बेटा अनिल मेरा दोस्त है और वो बिल्कुल लड़की जैसा दिखता है.

अनिल की उम्र कोई 23 साल की है और उसकी बहन अनीला 20 साल की है. दोनों भाई बहन बहुत सुंदर दिखते है. मिस कुकरेजा भी काफ़ी प्रभावशाली औरत है. बेशक अनिल की उम्र 23 साल की हो चुकी है, लेकिन उसकी शादी अभी तक नहीं हुई क्योंकि में कुकरेजा फेमिली का दोस्त हूँ इसलिए मिस कुकरेजा मुझे अपना बेटा ही मानती है. अनिल स्लिम सा लड़का है, बहुत गोरा, गुलाबी होंठ, कद कोई 5 फुट 7 इंच, भूरे बाल और सबसे आकर्षित करने वाली चीज़ उसकी गांड है जो काफ़ी उभरी हुई है. मेरे दोस्त लोग आमतौर पर बातें करते है कि अनिल को लड़की होना चाहिए था क्योंकि उसकी गांड चुदने वाली है. में और अनिल एक साथ पढ़ते थे और पढ़ाई के बाद मुझे उसकी माँ ने नौकरी पर रख लिया था. में कुकरेजा परिवार का बहुत एहसानमंद हूँ.

मेरी माँ यशोदा एक स्कूल में टीचर है और पिता जी का देहांत हो चुका है. मेरी दीदी पदमा कॉलेज में पढ़ती है और बहुत सेक्सी है, पदमा 5 फुट 5 इंच की सेक्सी लड़की है और कई बार लड़के मेरी बहन के कारण एक दूसरे से लड़ाई कर चुके है, लेकिन मेरी बहन किसी को घास नहीं डालती. पदमा का जिस्म 36-24-36 है और गोरा रंग, कटीले नेन. वो अधिकतर टाईट जीन्स और टॉप पहनती है जिसमें से उसकी सेक्सी गांड और चूची का उभार देखने को बनता है. बेशक पदमा मेरी बहन है फिर भी मेरा ध्यान उसके हुस्न की तरफ चला ही जाता है.

एक बार वो अपने रूम मे कपड़े बदल रही थी और दरवाजा लॉक करना भूल गयी और में ग़लती से रूम मे घुस गया. पदमा बिल्कुल नंगी थी और उसका साँचे में ढला हुआ नंगा जिस्म देखकर मेरी साँस रुक गयी. मेरी बहन की लंबी टाँगें, कसरती जांघे और सपाट पेट देखकर मेरा लंड खड़ा हो गया. उसने झट से अपने हाथों से अपनी बड़ी-बड़ी चूची को ढक लिया, लेकिन में उससे पहले ही पदमा दीदी के जिस्म को देख चुका था. फिर में मांफी मांगता हुआ वापस लौट गया, लेकिन दीदी के नंगे जिस्म की तस्वीर ना भुला सका.

अब 25 जून को मेरी बहन का जन्मदिन है और में कुकरेजा फेमेली को इन्वाईट करने चला गया. सबसे पहले मुझे अनीला मिली अनीला एक स्लिम सी सेक्सी लड़की है, जिसकी चूची कोई 34 करीब होगी और गांड भी बिल्कुल कसी हुई है और मुझे उसके जिस्म पर कोई भी कमी नहीं दिखती. भूरी आँखें और भूरे बालों वाली अनीला क़िसी का भी दिल जीत सकती है और में भी उसके हुस्न का आशिक था.

वो मुझे प्यार की नज़र से कभी-कभी देख लेती थी, लेकिन में उन लोगों के बराबर नहीं था इसलिए में हमेशा अनीला को बस इज़्ज़त की नज़र से देखता था. मिस कुकरेजा ने मेरे इन्विटेशन के बारे मे कहा कि बेटा में तो आ नहीं पाऊँगी, लेकिन अनिल और अनीला पदमा के बर्थ-डे पर ज़रूर आयेंगे. ख़ैर अब मेरी बहन के जन्मदिन पर अनिल पदमा पर फिदा हो गया और या यह कहो कि अनीला मेरी बहन को अपनी भाभी बनाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो गयी.

फिर उसने अपने भाई से ना जाने क्या कहा कि अनिल बोला कि आशु मुझे तेरी बहन बहुत पसंद है और में तुझे अपना साला बनाना चाहता हूँ क्या हुस्न है? तेरी बहन पदमा का, तू मुझे अपना जीजा बना ले. में सारी उम्र उसको हर खुशी दूँगा और अपनी रानी बनाकर रखूँगा. मुझे ये रिश्ता पसंद था अनिल एक ईमानदार लड़का था, सुंदर था, अमीर था. फिर मैंने माँ से बात कि तो वो तुरंत मान गयी, लेकिन अब मिस कुकरेजा पर निर्भर करता था कि ये रिश्ता होगा या नहीं.

फिर अनिल और अनीला ने अपनी माँ से बात चलाई तो मिस कुकरेजा ने मुझे ऑफिस मे बुलाया. मिस कुकरेजा उस वक्त सफेद साड़ी मे अपनी कुर्सी पर बैठी हुई थी. वो बोली कि आशु बेटा मुझे इस रिश्ते से कोई एतराज़ नहीं है अगर तुम अनिल को अच्छी तरह जानते हो, समझते हो और उसको अपनी बहन का सुहाग बनाना चाहते हो तो मुझे ये शादी मंज़ूर है, लेकिन फिर बाद में मुझे क़िसी बात पर दोषी मत ठहराना. फिर में बोल उठा आपको दोषी, नहीं आंटी, कभी नहीं ? आप तो हम लोगों को इतना प्यार करती है, तो ठीक है हम शादी की तैयारी शुरू करते है.

अब पदमा भी बहुत खुश थी, होती भी क्यों ना? उसको इतना पैसे वाला पति मिल रहा था. शादी की शॉपिंग मे में और अनीला भी बहुत काम कर रहे थे और अनीला भी मेरे नज़दीक आ रही थी, वो बात-बात पर हंस देती मुझे पीठ पर हाथ मारती और कई बार तो गले से लिपट जाती. फिर मुझे लगा कि वो मेरे साथ अपना चक्कर चलाने के मूड में है. ऐसी सेक्सी लड़की के साथ संबंध बनाने मे मुझे क्या एतराज़ हो सकता था? अब अनिल और पदमा की शादी हो गयी और कुछ दिन के बाद पदमा हमारे घर वापस आई, लेकिन उसके चेहरे पर कोई खास खुशी नहीं झलक रही थी. मेरा एक दोस्त पदमा की शक्ल देखकर मुझसे अकेले मे बोला आशु क्या बात है? पदमा दीदी खुश नज़र नहीं आती. में तो सोचता था कि शादी के बाद पदमा दीदी खिल उठेगी, लेकिन ये तो मामला ही कुछ और है.

सच कहूँ तो शादी के बाद जब औरत को खूब अच्छा लंड मिले और खूब ज़ोर से चुदाई हो तो पूरा बदन खिल उठता है. आशु कहीं अनिल जीजा जी के लंड मे तो कोई कमी नहीं है. साले अगर मुझे मौका मिलता तो चाहे में पदमा को दीदी पुकारता हूँ, लेकिन उसको चोद-चोदकर कली से फूल बना देता. मुझे मेरे दोस्त की बात पर बहुत गुस्सा आया और मैंने उसको बाहर जाने को कह दिया, लेकिन मेरे दोस्त के शब्द मेरे दिमाग मे टिक गये.

फिर अगले दिन दोपहर को में अनिल से बात करने गया तो पता चला कि वो गोदाम मे गया हुआ है. गोदाम के बाहर चौकीदार ने मुझे देखा तो बोला साहब अन्दर जाने की क़िसी को इजाजत नहीं है, लेकिन आप तो साहब के साले हो तो चले जाओ. फिर में अंदर गया तो सारा गोदाम खाली पड़ा था. में मुड़ने ही वाला था की एक कमरे से आवाज़ें आ रही थी, हह्ह्ह्ह ज़ोर से अकबर भाई, ज़ोर से चोदो अपनी रानी को बहुत दिनों के बाद मौका मिला है, आअहह चोदो मुझे अकबर, क्या मस्त लंड पाया है आपने? वाहह अकबर भाई.

ये आवाज़ तो अनिल की थी और अकबर हमारी कंपनी मे एक ड्राइवर था, दरवाजा कुछ खुला था और मुझे अनिल नग्न रूप मे घुटनों और हाथों के बल झुका हुआ नज़र आया. अनिल की गोरी गांड उठी हुई थी और अकबर का कम से कम 7 इंच लंबा और मोटा लंड अनिल की गांड में घुसा हुआ था. अकबर मेरे जीजा को बेरहमी से चोद रहा था और अनिल मज़े से लंड अपनी गांड मे ले रहा था. अकबर क़िसी कुत्ते की तरह हाँफ रहा था. फिर अकबर बोला हाँ मालिक जब से आप शादी मे व्यस्त थे, मुझे भी ऐसी गांड नहीं मिली.

अब तो मेरी बीवी भी गांड मरवाने से मना करती है और मुझे गांड के बिना कुछ और अच्छा नहीं लगता. मालिक आप ही मेरी रानी बने रहो, मुझे कोई बीवी नहीं चाहिए. अब अनिल भी नीचे से बोला कि अकबर भाई मैंने भी पदमा से शादी करके यू ही मुसीबत मोल ले ली है, अगर मेरी बहन मुझे ना कहती तो में कभी ये शादी नहीं करता, लेकिन में अपनी बहन को क्या कहता कि मुझसे ठीक तरह से चुदाई नहीं होगी? या ये कहता कि में पदमा को क्या चोदूंगा? मुझे तो खुद को अपनी गांड के लिए अकबर भाई का लंड चाहिए. अब में उनकी और बातें सुन नहीं सका और गुस्से से भरा हुआ मिस कुकरेजा के रूम में गया.

फिर में बोला आंटी मेरी बहन शादी से खुश नहीं है, अनिल तो खुद कहता है कि वो ठीक से चोद नहीं सकता, वो तो खुद गांडू है और इस वक्त गोदाम मे अकबर से गांड मरवा रहा है. आंटी मेरी बहन की तो ज़िंदगी बर्बाद हो गयी ना. फिर मिस कुकरेजा अपनी सीट से उठी और मुझे अपनी बाहों में भरकर सीने से लगाते हुए बोली कि आशु बेटा मैंने तुझसे कहा था ना कि कल मुझे दोष मत देना. असल में अनिल के पिता भी लंड के मामले में कमज़ोर थे, लेकिन मुझे ये पता नहीं था कि उसको ये गांड कि भी बीमारी है. बेटा निराश मत होना जो करना होगा में करूँगी.

में कभी पदमा के जज़्बातों का नुकसान नहीं होने दूँगी, आख़िर पदमा अब हमारे घर की बहू है. में अनिल से बात करूँगी और समस्या का हल ढूंढ ही लूँगी और फिर अनीला भी तो तुझसे शादी करना चाहती है, अब मेरी एक नहीं दो बेटियाँ है अनीला और पदमा और जल्द ही अनिल तुझसे बात करेगा. फिर में बोला अनिल साला मुझसे क्या बात करेगा? जो करना था वो ठीक से कर नहीं पाया, लेकिन उसी रात अनिल ने मुझे एक बार में बुलाया और दो पेग विस्की के पीने के बाद मुझसे बोला यार में जान चुका हूँ कि तुझे मेरे उस शौक के बारे मे पता चल गया है और तुम जानते हो कि मेरे लंड में इतनी ताक़त नहीं है, लेकिन मेरे पास एक बहुत अच्छा सुझाव है अगर कहो तो बोलूं?

फिर मैंने कहा अब क्या सुझाव बचा है मेरी बहन की ज़िंदगी बर्बाद करके? देख आशु पदमा की चुदाई तो होगी अगर में नहीं करता तो कोई और करेगा. अब किसी बाहर के आदमी से हो तो घर की इज़्ज़त का क्या होगा? मेरी बात मान लो तुम खुद पदमा की चुदाई जी भरकर कर लो.

तुम दोनों भाई बहन पर क़िसी को शक भी नहीं होगा और में तुझे अपनी मनाली वाली कोठी की चाबी भी दूँगा जहाँ तुम दोनों अपना हनीमून मना लेना. तुझे भी अपनी बहन के जिस्म का मज़ा मिल जायेगा और अगर भगवान की मर्ज़ी हुई तो पदमा माँ भी बन जायेंगी और सारे समाज मे में भी बाप कहलाऊंगा. फिर कल को तुझे ही तो अनीला का पति बनाना है. फिर तुम हमारे घर मे रहकर दोनों को चोद सकते हो बोलो मंज़ूर है? लेकिन में पदमा को कैसे? वो मेरी बहन है, ये कैसे हो सकता है? फिर अनिल पेग पीकर फिर से बोला तो हम क्या पदमा को क़िसी और गैर से चुदने के लिए छोड़ दें ? इससे बेहतर होगा कि तुम ही उसकी जवानी के मज़े लूट लो और घर की इज़्ज़त भी बची रहेगी. फिर में बोला लेकिन अगर मैंने अपनी बहन को स्पर्श भी किया तो वो मुझे जान से मार डालेगी, चोदना तो दूर की बात है.

फिर अनिल बोला तू उसकी चिंता मत कर कल ही हम तीनों मनाली जायेंगे और में पदमा को चोदने की कोशिश करूँगा और जब मुझसे चोदा नहीं जायेगा तो वो मुझे गाली देगी और तब तुम आ जाना. जब चूत जल रही होती है तो रिश्ते नहीं देखती और फिर अपनी बहन की चूत अपने लंड से भर देना, एक बार वो चुद गयी तो सदा के लिए तेरी हो जायेगी.

जीजा की बात सुनकर अचानक मेरा लंड खड़ा होने लगा और अपनी बहन को चोदने की इच्छा सच होती नज़र आने लगी. फिर अगले दिन हम तीनों मनाली की तरफ चल पड़े. पदमा को उत्तेजित करने के लिए अनिल बार-बार उसके जिस्म पर हाथ फेरने लगा. फिर हम दोपहर को शराब पीने लगे, अनिल जानबूझ कर मेरे सामने ही पदमा के साथ सेक्सी बातें करने लगा, जिनको सुनकर पदमा का रंग लाल होने लगा.

फिर मनाली पहुँचकर अनिल बोला आशु तुम पास वाले कमरे मे सो जाओ और में अभी अपनी बीवी के साथ चुदाई के मज़े लेता हूँ. उसकी बात सुनकर पदमा शर्म से लाल हो उठी थी. शराब पी होने की वजह से अनिल का लंड जो थोड़ा बहुत खड़ा होता था वो भी नहीं हुआ था. फिर पदमा गुस्से में चिल्लाने लगी कि अनिल बहनचोद अगर लंड में कमज़ोरी थी तो मुझसे शादी क्यों की? साले अब इस जलती हुई चूत को में कहाँ लेकर जाऊं? मादरचोद की औलाद, साले नपुंसक कहीं के.

फिर अनिल शर्मिंदा हुआ बाहर निकला और बोला आशु तू अब बस 5 मिनट इंतज़ार करना, फिर अंदर चले जाना तेरा मामला फिट हो जायेगा. फिर ठीक 5 मिनट के बाद जब मे पदमा दीदी के रूम मे गया तो मैंने देखा कि पदमा नंगी पलंग पर लेटी हुई है और जांघे फैलाकर अपनी चूत मे उंगली कर रही थी. सच मानो तो उस समय मेरी बहन कोई कामदेवी लग रही थी. उसकी शेव की हुई चूत से पानी टपक रहा था और वो आँखें बंद किए हुई थी और चूत रगड़ रही थी.

फिर मैंने हिम्मत की और पलंग के पास जाकर उसके नंगे जिस्म पर हाथ फेरने लगा तो उसने झट से अपनी आँखें खोल दी और बोली भैया तुम यहाँ क्या कर रहे हो? जाओं यहाँ से, लेकिन फिर मैंने अपने हाथ उसकी चूची पर रख दिए और रगड़कर बोला दीदी में तुझे ऐसे प्यासी कैसे छोड़ दूँ? आख़िर भाई का भी कोई फ़र्ज़ होता है या नहीं? अगर जीजा नपुंसक हो तो क्या भाई का फ़र्ज़ नहीं बनता कि अपनी बहन की चूत की आग ठंडी करे, ऐसा मदमस्त जिस्म क्या भगवान हर क़िसी को देता है? दीदी अपनी भारी-भारी चूची, आपकी मस्त चूत जो बेचारी मस्त लंड के लिए तरस रही है और आपकी गांड सब मुझे पागल बना रही है. दीदी अब मुझे चुदाई से मत रोकना, में अपनी पदमा दीदी की चूत चोदे बिना आज यहाँ से जाने वाला नहीं हूँ, अगर मुझ पर विश्वास नहीं होता तो अपने भाई का लंड देख लो.

फिर मैंने ये कहते ही अपनी पेंट उतार दी और अपना 9 इंच वाला मोटा लंड पदमा को दिखाते हुए उसके हाथ मे दे दिया. मेरा मोटा लंड मेरी काली झांटो के बीच में से क़िसी काले नाग की तरह फूंकार रहा था. दीदी अब बताओ कि आपके भाई का लंड मस्त है या नहीं? आपकी मस्त चूत इसको अंदर लेने के लिए मचल रही है या नहीं? अब पदमा के भाव बता रहे थे कि वो एक पल के लिए झिझकी, लेकिन फिर वासना ने उस पर काबू पा लिया.

फिर मैंने कमीज़ भी उतार दी और कमरे का दरवाजा बंद करने के लिए बढ़ा तो पदमा बोली कि नहीं मेरे प्यारे भैया दरवाज़ा खुला ही रहने दो, अगर मेरा नपुंसक पति देखना चाहे तो देख ले कि मर्द का लंड कैसा होता है? और जवान औरत की प्यास कैसे बुझाई जाती है? आ जाओ भैया और तोड़ दो मेरी सील, जो शायद आज तक मेरे भैया के लिए ही बची हुई थी. मेरे भाई आज मुझे अपना बना लो, मुझे इस मस्त लंड से चोदकर पूरी औरत बना लो, आपकी बहन आज से सिर्फ़ आपकी है.

फिर में भी पदमा दीदी की बात सुनकर पूरा जोश में आ गया और अपनी दीदी के होंठों को चूमने लगा. उसके होंठों पर जीभ फेरते हुए उसके नंगे जिस्म से लिपटने लगा. हमारे जिस्म जल रहे थे और दीदी अभी भी मेरे लंड को पकड़े हुई थी और में उसको चूम रहा था. फिर मैंने बोला कि दीदी तुमने कभी लंड चूसा है? तो दीदी मचलकर बोली कि अभी तक तो नहीं, लेकिन आज अपने भैया का लंड चूसने की इच्छा ज़रूर है. अगर इजाज़त हो तो चूस लूँ? अगर चूस लेती हूँ तो मेरे भैया मेरे सईयां बन जायेंगे.

फिर मैंने दीदी की चूची को चूम लिया और बोला कि देर किस बात की, बना लो मुझे अपना सईयां. फिर दीदी ने झुककर मेरे लंड का टोपा चूम लिया और मेरे अंडकोष थामकर लंड को मुँह में ले लिया. फिर मैंने दीदी के बाल पकड़कर उसका मुँह अपने लंड पर टिका दिया और कमर आगे पीछे करने लगा.

फिर मैंने दीदी को पलंग पर सीधा लेटाकर उसके ऊपर चढ़ गया और अब मेरा मुँह दीदी की लाल चूत पर था और मेरा लंड उसके मुँह में था. हम 69 पोजिशन में एक दूसरे को चाटने लगे. अब दीदी की चूत का रस मुझे बहुत उत्तेजित करने लगा और उसकी चूत फड़फडाने लगी. अब देरी करना फ़िज़ूल था क्योंकि दीदी अब बहुत गर्म हो चुकी थी. मैंने दीदी से पूछा कि अब चुदाई शुरू करें? तो दीदी बोली हाँ भैया, अब इंतज़ार नहीं होता पेल डालो अपना लंड मेरी चूत में भैया और इस रात को यादगार बना दो. अब दीदी ने शर्म छोड़कर मुझे चोदने का निमंत्रण दिया. अब मैंने चूत की भीगी हुई फांकों को फैलाकर लंड चूत के मुँह पर टिका दिया और धड़कते दिल से मैंने लंड को एक धक्का मारा और मेरा पूरा टोपा चूत में घुस गया, ओह भैया धीरे से आहह में मर गयी, अहह भैया धीरे से उई माँआआ धीरे से भैया. फिर मेरे लंड को चूत के अंदर गर्माहट महसूस हुई और मैंने धीरे से लंड और आगे बढ़ा दिया.

फिर में दीदी की गांड को थाम कर धीरे-धीरे लंड अंदर पेलने लगा, सच मानों दोस्तों ऐसा मज़ा मुझे आज तक नहीं मिला था. दीदी की चूत जन्नत का दरवाजा थी. मेरे लंड पर कसी हुई दीदी की चूत की दीवारें मेरे लंड को सहला रही थी. जब आधे से ज्यादा लंड चूत में घुस गया तो दीदी अपने चूतड़ उठाकर और लंड लेने लगी. में दीदी के ऊपर सवार था और जन्नत का मज़ा लेते हुए चुदाई करने लगा और चूत की चिकनाहट के कारण अब लंड आसानी से चूत में घुस रहा था.

फिर कोई 5 मिनट में लंड पूरा चूत में समा गया. मेरी रानी बहन मेरा लंड पूरा अपनी चूत में ले चुकी थी. मेरी रानी तेरी क्या मस्त चूत है? अहहहह क्या मस्त है मेरी बहना? अब तो दर्द नहीं हो रहा पदमा रानी? तो दीदी मज़े से आँखें बंद किए हुए बोली नहीं मेरे राजा भैया, अब तो मज़ा आ रहा है, चोद डालो अपनी लाडली बहना को, शाबाश राजा भैया, पेलो अपना लंड अपनी सजनी की चूत में, अब तो हम भाई बहन सिर्फ़ दुनिया के लिए ही है असल मे तो मेरा भाई मेरा पति है, ऑह्ह्ह्ह मेरे भैया का कितना मस्त लंड है.

अब दीदी अपनी गांड उठाकर चुदवाने लगी थी और में बहुत जोश में आकर ज़ोर ज़ोर से धक्के मारने लगा. अब पूरा कमरा फ़च फ़च की आवाज़ों से गूँज रहा था और चुदाई का संगीत चारों तरफ था और चुदाई की सिसकियाँ हम दोनों भाई बहन के मुँह से निकल रही थी. मेरा लंड क़िसी पिस्टन की तरह अपनी सग़ी बहन की चूत चोद रहा था. अब हमारे जिस्म पसीना-पसीना हो चुके थे और में आगे झुक कर दीदी के बूब्स चूसने लगा. दीदी मदहोश हो गई और बोली ओह्ह्ह्हह्ह्ह्ह भैया और चूसो आआआआआ म्‍म्म्मममममम चोदो मेरे राजा चोदो मुझे, मुझे हर रोज ऐसे चोदना भैया. फिर में दीदी को चोदने लगा और दीदी बेकाबू होने लगी, भैया मुझमे समा जाओ, रोज़ चोदना मुझे, भर दो मेरी चूत अपने लंड से, बना दो मुझे अपनी पत्नी, मुझे अपने बच्चे की माँ बना दो भैया. फिर लगातार चुदाई के बाद दीदी झड़ गई और वो पूरी तरह से संतुष्ट हो गई थी. अब हम बहुत चुदाई करते है और खूब मजे लेते है.
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06-08-2021, 12:46 PM,
#36
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
गुरु जी का केला Hindi Sexi Stories

दोस्तो आज काफ़ी दिन बाद आरएसएस पर आया हूँ तो सोचा क्यूँ ना आपको कुछ मस्त कहानियों का तोहफा दूं तो मित्रो इसी कड़ी में आज की ये तड़कती फड़कती दूसरी कहानी पेश है कैसे एक गुरु ने अपने शिष्य की पत्नी की चुदाई की...

मेरा नाम कोमल मिश्रा है और मैं एक मिड्ल क्लास घर की बहू हूँ. मेरी शादी, 3 महीने पहले जय से हुई थी.
जय एक व्यापारी है और उनका छोटा कारोबार है. घर में सास के अलावा, मेरी ननद डॉली रहती है जो अब कॉलेज ख़तम करके एक छोटी सी फर्म में नौकरी कर रही है..
मेरी सासू मां बहुत ही धार्मिक किस्म की औरत है जो ज़्यादातर वक़्त पूजा-पाठ में गुज़ार देती है.

सासू मां, सिर्फ़ 37 साल की है क्यूंकी उनकी शादी 15 वर्ष की आयु में हुई थी और जब जय पैदा हुआ तब वो सिर्फ़ 18 साल की थी.
जय 21 साल के है और मैं 19 की. उनकी छोटी बहन डॉली भी मेरे उम्र की ही है.
जय की शादी के बाद, अब डॉली की शादी के चर्चे जोरों पर है.
क्यूंकी मां जी बहुत धार्मिक है, उनके मुंह से हमेशा उनके गुरु जी के बारे में सुना करती थी.
गुरु जी का नाम आरके महाराज है जो इन दिनों उतर भारत की यात्रा पर गये हुए थे.
जब मैं नयी दुल्हन बन कर इस घर में आई थी तब से मां जी और डॉली को गुरु जी के आश्रम जाते हुए देखा करती थी.
मां जी ने मुझे सिर्फ़ इतना कहा था की गुरु जी की वजह से उनके परिवार में सुख-शांति बनी हुई है.
मैं मां जी की तरह घंटों पूजा घर में बैठ कर पूजा नहीं करती थी लेकिन फिर भी मैं धार्मिक थी. हमेशा से मेरे मां-बाबूजी ने मुझे धर्म के प्रति आस्था बनाए रखने की सलाह दी थी.
मैं भी रोज़ मां जी के साथ पूजा घर में बैठ कर उनके लिए पूजा की सामग्री तैयार करके देती.
परिवार में सब कुछ एकदम ठीक चल रहा था. मैंने अपने परिवार में हमेशा झगड़ा और नफ़रत देखी थी.
मेरे बाबूजी के रिश्तेदार, हमेशा जायदाद के नाम पर एक दूसरे पर कीचड़ उछालते रहते थे पर यहाँ आकर मैं जैसे सब परेशानियों से मानो दूर आ गई थी. मेरे मा-बाबूजी शादी के बाद मेरी खुशी देख कर बहुत खुश थे.
जय मुझसे बहुत प्यार करते है. व्यापारी होने के कारण, वो हफ्ते में 2-3 बार देर से घर लौटते थे लेकिन फिर भी मैं उनका इंतेज़ार करती थी और हम दोनों साथ बैठकर खाना खाते.
आज रात को भी मैं जय का इंतेज़ार कर रही थी और जय को घर आते आते, रात का 1 बज गया.
थके हारे घर पर लौटने के बाद, फ्रेश होकर वो खाना खाने बैठे.
मैं भी उनके सामने बैठ गई.
पहला नीवाला खाने के बाद, दूसरा नीवाला मेरे मुंह के पास लाकर बोले – चलो खा लो जानेमन !?!
मैंने अपना मुंह खोला और उनकी उंगलियों को मुंह में लेकर नीवाला मुंह में लिया और जैसे ही उन्होंने अपनी उंगलियाँ पीछे खींची, मैंने उनकी कलाई पकड़ ली और उनकी उंगलियों को हल्के से चूस लिया.
नीवाला खाते हुए, मैं हल्के से हंस पड़ी.
आँखों-आँखों में मानो, वो मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रहे थे.
उनकी नज़रें, मेरे पूरे जिस्म का जायज़ा ले रही थी.
खाना खा कर जय अख़बार लेकर बेडरूम में चले गये और में रसोई के काम ख़तम करने लगी. रसोई के काम निपटाकर मैं बेडरूम में आई.
जय जैसे अख़बार में डूबे हुए थे.
मैं बिस्तर पर उनके पास बैठ गई और मैंने अख़बार खींचते हुए उनसे थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा – आप इतनी देर से मत आया करो जी… मुझे आपके साथ वक़्त बिताना अच्छा लगता है और आप है की हमेशा देर से आते हो… घर से बाहर निकलने के बाद आपको याद भी रहता है की आपकी बीवी घर पर इंतेज़ार कर रही होगी !?!
जय मुस्कुराते हुए बोले – जानेमन, ये सब हमारे भविष्य के लिए ही तो कर रहा हूँ ना… हमारा परिवार बढ़ेगा तो हमें आगे के लिए भी तो सोचना चाहिए, है ना !?! – और मुझे समझाते हुए उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींचा और अपने सीने से लगाते हुए कहा – कस कर पाकड़ो ना जान !!
जय की बाहों में, मुझे जैसे जन्नत नसीब होने के एहसास मिलता.
जय के होंठ मेरे गले को छू रहे थे. उन्होंने मेरी गर्दन पर अपनी जीभ फेरते हुए कहा – इतनी शिकायत करोगी तो कल से बिस्तर से नहीं उतुंगा और ना ही तुम्हें उठने दूँगा…
उनकी ये प्यार भरी बातें सुन कर मैं उनकी बाहों में जैसे पिघल सी गई थी.
जय ने मेरे गालों को चूमा और फिर मेरे होंठों पर अपना मुंह रखा और मेरे होंठों को चूमने लगे.
मैं भी उनके होंठों को चूमने लगी.. – उम्म्म म्म्म्म म म म मम म्म्म्म म मम…
फिर जय ने मेरा पल्लू हटाया और मेरी चोली के बटन्स खोल कर मुझे बिस्तर पर लिटा दिया.
मेरी साड़ी और पेटिकोट उतार कर मेरी चूत को पैंटी के ऊपर से सहलाना शुरू किया.
आ आ अह ह स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स स्स विपूल्ल्ल्ल्ल् ल्ल्ल्ल्ल् ल्ल्ल्ल्ल् ल्ल सस्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्सस्स ओह…
जय के मेरी पैंटी निकाली और मेरी बुर पर कस कर अपनी उंगलियाँ रगड़ने लगे.
ओह, विपूल्ल्ल्ल आ आ आ अहह क्या कर रहे हूऊ ऊ ऊ ऊ ऊ स स्स्स्स्स् स्स्स स्स… – मैं सिसकारियाँ ले रही थी और जय मेरी बुर को रगड़ रहे थे.
फिर जय ने अपनी शॉर्ट्स उतारी और अपने लंड का सुपाड़े को मेरी बुर पर रगड़ना शुरू किया.
ओह म्म्म्म म म म म कितना गर्म है तुम्हारे ये जय…
अंदर डालूं ना जानेमन… – जय ने पूछा..
मैंने मुस्कुराते हुए, उनकी कमर पर हाथ रखते हुए कहा – एकदम गहराई तक डालो, जानू… मेरी ये सिर्फ़ तुम्हारी है… सिर्फ़ तुम्हारी…और जय ने मेरे पैर फैलाते हुए, अपना वो एक झटके के साथ मेरी बुर के अंदर डाल दिया.
उूउ उइ ई ई माआ आ आअ उू उउफ फ फ फ फफ फफ्फ़ स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स स्स ओह…
जय, मेरे ऊपर झुक गये और अपनी कमर ऊपर नीचे हिलाते हुए मेरी बुर मारने लगे.
उनका वो मेरी बुर के अंदर बाहर होने लगा और में सिसकारियाँ लेती रही – स स्स्स्स्स् स्स स्स ओह आ आह ह जय सस्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स स्स म्म्म्म म म म मम…
2-3 मिनिट बाद, जय ने अपना वो मेरी बुर से निकाला और अपना सारा मुठ मेरे पेट पर उंड़ेल दिया.
मैं बाथरूम गई और अपने आपको सॉफ करके उनके बगल में आ कर बैठ गई.
जय, मेरे तरफ देख कर बोले – मां जी ने बताया होगा ना की गुरु जी वापस आ गये है !?!
मैंने हाँ में सिर हिलाया.
देखो शायद, गुरु जी कल दोपहर को घर आ रहे है…
इससे पहले की व अपनी बात ख़तम करते मैंने उनके मुंह पर हाथ रखते हुए कहा – जी, मैं जानती हूँ की गुरु जी कल घर आ रहे है और उनकी खूब सेवा करनी है… मां जी ने सब बताया था, शाम को… आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए… आपकी जोरू आपको शिकायत का मौका नहीं देगी… मां जी ने आज मुझे गुरु जी के बारे सब कुछ बताया… ये भी की कैसे 10 साल पहले आपकी जान ख़तरे में थी तब गुरु जी ने ही आपकी रक्षा की थी… यहाँ आने के बाद मैंने गुरु जी के बारे में जितना सुना है, उससे मेरी उत्सुकता और बढ़ गई है… इतनी महान हस्ती से मिलने का मौका रोज़ रोज़ थोड़ी मिलता है !! – बात करते करते, मैंने जय के सीने पर सिर रखा..
मां जी ने तो ये भी बताया की कैसे आपने ये कारोबार गुरु जी के कहने पर सिर्फ़ 5,000 की लागत से शुरू किया और आज इससे इस मुकाम तक पहुँचाया है की आपने ये घर भी खुद के दम पर खरीदा…
अपनी बीवी की ऐसे समझदार बातें सुन कर, जय को अच्छा लगा..
अगले दिन दोपहर को बताए अनुसार गुरु जी घर आए. उनके आते ही, घर में मानो रौनक सी आ गई.
सारे घर पर चहल-पहल थी.
आस पड़ोस की औरतें भी उनके दर्शन करने आई थी.
गुरु जी ने जल-पान करके सबको एक एक करके आशीर्वाद दिया और जब सारे लोग लौट गये तो मां जी, दीदी, डॉली और मैंने गुरु जी के चरण स्पर्श किए.
मैं गुरु जी को पहली बार देख रही थी. उनके चेहरे पर मानो एक अलग सा तेज था.
मां जी ने मुझे एक बार बताया था की गुरु जी की उम्र लगभग 46-48 की है लेकिन उन्हें देख कर लग रहा था मानो वो मुश्किल से 25-30 वर्ष के है.
मां जी ने पहले सारी आस-पड़ोस की औरतों को गुरु जी के दर्शन करने दिए और तब तक, मैं सोलह शृंगार करती रही.

मेरे बाहर आने के बाद मां जी ने मुझे गुरु जी से मेरा परिचय कराया और साथ में मुझे इशारे करते हुए उनके पैर छूने को कहा. मैंने मां जी के कहे अनुसार गुरु जी के पैर छुए.
गुरु जी ने अपना हाथ मेरे सिर पर थपथपाते हुए मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा – सदा सुहागन रहो, बहू…
फिर गुरु जी ने मां जी की तरफ देखते हुए कहा – बहू तो बहुत सुंदर है मां जी और संस्कार बड़े अच्छे है… (गुरु जी के मुंह से अपनी तारीफ़ सुन कर, में हल्के से मुस्कुरा उठी.)
मां जी- आप के कहे अनुसार ही हमारे गाँव का सरपंच के बेटी से ब्याह कराया है, जय का… सच कहूँ तो अगर आपने बहू की सिफारिश नहीं की होती तो ऐसी बहू पाने का सौभाग्य नहीं मिलता, गुरु जी…
आस-पड़ोस की औरतें अब जा चुकी थी. डॉली भी तैयार हो रही थी लेकिन उससे इतनी देर होते देख मां जी ने मुझे उसके कमरे में भेजा.. मैं उसके कमरे की तरफ चलने लगी और मां जी गुरु जी से आश्रम के बारे में बातें करने लगी..
डॉली के कमरे में पहुँचते ही, डॉली ने दरवाज़ा खोल कर मुझे गले लगाते हुए पूछा – भाभी, आपको हमारे गुरु जी कैसे लगे !?!
मैंने उस सवाल को टालते हुए उससे पूछा – क्या सचमुच गुरु जी 47-48 साल के है !?! उन्हें देखकर लगता है की उनकी उम्र 30-32 से ज़्यादा नहीं होगी…
डॉली ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया – भाभी जान, आप भी ना !?! मां तो लगभग 17-18 वर्षों से गुरु जी की भक्त रही है… वैसे तो मां गुरु जी से उम्र में छोटी है लेकिन गुरु जी फिर भी मां को आदर से मां जी कहते है… आपने तो सुना ही होगा ना, उन्हें बातें करते हुए !?!
हम दोनों बातों में मसरूफ़ थी.
उतने में मां जी की आवाज़ आई – बहू और डॉली !?! दोनों ऊपर क्या कर रही हो इतनी देर !?! जल्दी नीचे आओ दोनों…
हम दोनों कहे अनुसार नीचे आई और डॉली ने भी गुरु जी के पैर छुए. गुरु जी ने उससे भी आशीर्वाद दिया और चलने की इजाज़त माँगी.
गुरु जी ने जब जाने की बात की तो मां जी ने गुरु जी से 2 मिनिट रुकने को कहा..
मां जी ने गुरु जी से कहा की उन्हें कुछ बात करनी है…
गुरु जी ने मां जी की तरफ मुड़ कर कहा – कहिए क्या बात है मां जी !?! निसंकोच होकर कहिए..
मां जी के चेहरे पर हल्की सी शिकन थी. बात करते हुए वो थोड़ा सा हड़बड़ा रही थी.
गुरु जी – वो… वो… वो… (गुरु जी ने फिर से उन्हें आश्वस्त किया.)
गुरु जी आपके कहे अनुसार मैंने तीर्थ यात्रा पर जाने का प्रबंध किया है… मैं कल रात 8 बजे की ट्रेन से जा रही हूँ… डॉली भी कल सुबह अपने ऑफीस के काम से मुंबई जा रही है, कुछ दिनों के लिए… लगा था की जय और बहू को अकेले में वक़्त बिताने का मौका मिलेगा… लेकिन जय ने आज सुबह बताया की उससे भी शायद कुछ दिन देल्ही जाना पड़ेगा… हम तीनो शायद 2 हफ्तों तक घर पर नहीं है… बहू की चिंता हो रही है, गुरु जी… ये गाँव के माहौल में पली बढ़ी है तो शहर में अकेले रखना उचित नहीं होगा… मैंने आश्रम में सुषमा दीदी से बात की थी और उन्होंने कहा की रात में किसी स्त्री का आश्रम में रहना उचित नहीं है… मैं ये सोच रही थी की अगर आप हमारे घर पर कुछ दिन रुक जायें तो बहू को अभी आपकी सेवा करने का अवसर मिलेगा… आस पड़ोस की बहनें भी आपकी छत्र-छाया में रहेंगी तो उन्हें भी आनंद होगा…
मां जी की बातें सुन कर मुझे दुख हुआ की जय 2 हफ्ते मुझसे अलग रहेंगे. लेकिन इस बात की खुशी थी की गुरु जी का सेवा करने का अवसर भी मिलेगा मुझे.
गुरु जी ने मुस्कुराते हुए, उन्हें आश्वस्त किया की अगर वो यही चाहती है तो वो ज़रूर रहेंगे हमारे घर पर.. लेकिन साथ में उन्होंने ये भी बताया की वो दिन के समय घर पर नहीं आ सकते क्यूंकी उनके भक्तों का आश्रम में ताँता लगा रहता है और अगर वो आश्रम में नहीं दिखाई दिए तो उनके भक्त नाराज़ हो जाएँगे..
बहू तुम्हें तो कोई ऐतराज़ तो नहीं है ना अगर में यहाँ रात में 11:30 बजे तक आओं तो !?! गुरु जी ने पूछा..
गुरु जी की बातें सुन कर मुझे थोड़ा गुस्सा आया क्यूंकी वो अपनी भक्त से अनुमति कैसे ले सकते है !?!
मैंने सिर का पल्लू ठीक करते हुए ज़मीन की तरफ देखते हुए कहा – गुरु जी आप हमसे अनुमति क्यूँ माँग रहे है !?! आप हमारे घर पर आकर रहें ये तो हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी… आपके यहाँ रहने से, ये घर पावन हो जाएगा…
गुरु जी कुछ देर बाद लौट गये और दूसरे दिन सुबह, जय और मां जी चले गये.. डॉली भी श्याम 6 बजे निकल गई.. मैं अब घर में अकेली थी..
रात को 11:40 के करीब, गुरु जी घर पर आए.
मैंने उन्हें घर के भीतर लिया और उनके चरण स्पर्श किए.
गुरु जी को उनकी पसंदीदा द्रक वाली चाय बना कर दी.
गुरु जी ने चाय की चुस्की लेते हुए मुझसे पूछा – बहू तुम्हें रात में डरावने सपने आते है क्या !?!
मैं चौंक गई क्यूंकी मैंने ये बात सिर्फ़ मां जी को बताई थी, सुबह जब वो निकल रही थी..
जी गुरु जी… 2-3 बार मुझे डरावने सपने आए थे… सपने में मैंने देखा की मैं एक बन्द कमरे में हूँ, जहाँ हर तरफ खून ही खून है… सुबह उठ कर मैं काफ़ी देर तक सोचती रही की इस सपने का मतलब क्या होगा लेकिन फिर मैंने अपने आप से कहा की ये सपना ही तो है !?!
गुरु जी मेरी बातें, ध्यान से सुन रहे थे.
फिर उन्होंने अपने झोले में से एक नारियल निकाला और मुझे अपने कमरे में ले जाने को कहा..
मैं कहे अनुसार उन्हें अपने बेडरूम में ले आई.
वहाँ चल कर गुरु जी ने नारियल पर विभूति छिड़क दी और आँखें बंद करके कुछ मंतरा पढ़े.
मंतरा पढ़ने के बाद, उन्होंने अपनी आँखें खोली और झोले में से गंगा जल निकाल कर नारियल पर छिड़का.
गंगा जल छिड़कते ही, नारियल में से धुआँ उठने लगा.
मैं डर के मारे सकपका गई.
गुरु जी ये क्या है !?! – मैंने 2 कदम पीछे जाते हुए पूछा..
गुरु जी ने मेरी तरफ देख कर नारियल को एक तरफ रखा और कहने लगे – इस कमरे में कोई नकारात्मक उर्जा महसूस कर रहा हूँ, बहू… कुछ है जो तुम्हें नुकसान पहुचाना चाहता है… गुरु जी की बातें सुन कर मेरे पैरों तले से जैसे ज़मीन सरक गई..
मैं उनके पैरों में गिर पड़ी..
मुझे इस विपदा से बचा लीजिए, गुरु जी… कृपा करके बचा लीजिए मुझे…
(मेरी आँखों से आँसू बहने लगे.)
गुरु जी ने मुझे कंधे से पकड़ कर उठाया और मेरे आँसू पोंछते हुए, मुझे दिलासा देते हुए कहा की वह सब ठीक कर देंगे…
फिर उन्होंने फिर से आँखें बंद करते हुए मुझे बिस्तर में बैठने को कहा.
मैं तुरंत बैठ गई.
आँखें बंद करते हुए, वो मुझसे बात कर रहे थे.
बहू, क्या तुम्हारी शादी के बाद तुम्हारे घर से कोई यहाँ आया था !?!
मैं डर के मारे कुछ सोच नहीं पा रही थी लेकिन फिर मुझे याद आया की मेरी मेरी मासी आई थी, शादी के 2 हफ्ते बाद..
जी गुरु जी… मेरी मासी आई थी, शादी के बाद मुझे आशीर्वाद देने के लिए… वो मेरी शादी में नहीं आ पाई थी इसीलिए शादी के बाद आई थी…
गुरु जी कुछ पलों के लिए शांत हो गये लेकिन फिर उन्होंने मुझसे कहा की मेरी मासी ने मुझपर जादू-टोना किया हुआ है…
बहू, जय काम से दूर नहीं गया है… उसे भेजा गया है… जब तक ये टोना दूर नहीं होगा, जय तुझ में दिलचस्पी नहीं लेगा…
गुरु जी के बातें सुन कर दिल बैठा जा रहा था.
जय से दूर रह सकती हो, बहू !?!
नहीं गुरु जी… मैं उनके बगैर नहीं रह सकती… – मैंने तुरंत जवाब देते हुए उनके सामने हाथ जोड़े..
कुछ कीजिए, गुरु जी… मैं अपने पति को खोना नहीं चाहती…
गुरु जी अब मेरे बगल में बैठ गये, बिस्तर में.
ये टोना दिन बा दिन बढ़ता जाएगा, बहू… इसे निकालने के लिए तेरे शरीर को शुद्ध करना होगा…
मैंने धीमे स्वर में पूछा – क्या करना होगा, गुरु जी !?!
(गुरु जी ने मेरे कंधों को पकड़ कर, मुझे बिस्तर में लिटा दिया)
तुम्हारे शरीर को मंत्रों द्वारा शुद्ध करूँगा, मैं… अच्छा हुआ जो मैं गंगा जल और शहद साथ ले आया… और उन्होंने अपने झोले से गंगा जल और शहद की बोतलें निकाली..
एक कटोरी में गंगा जल और शहद का मिश्रण करके उन्होंने मुझसे बिना कुछ बोले, मेरे धुन्नी (नेवेल) पर से साड़ी को हटाया…
मेरी धुन्नी पर कटोरी को थोड़ा सा तिरछा करके गंगा जल और शहद का मिश्रण धीरे धीरे गिराया..
फिर उन्होंने उनकी उंगलियों को मेरी धुन्नी पर रगड़ना शुरू किया..
शुद्धि करते हुए ऐसा एहसास होगा, ये सोचा नहीं था मैंने.
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06-08-2021, 12:46 PM,
#37
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
गुरु जी के गर्म हाथ मेरी धुन्नी को ज़ोर ज़ोर से रगड़ रहे थे.
उम्म्म… गुरु जी… – मैंने सिसकारी भरते हुए “आ” भरी..
उन्होंने अपनी एक उंगली मेरी धुन्नी में डाली और उंगली को हिलाने लगे जिससे उनकी उंगली का सिरा, मेरी धुन्नी में कस कर रगड़ने लगा..
ओह गुरु जी ये क्या… स स्स्स्स स्स…
फिर उन्होंने रुक कर मेरी तरफ देखते हुए कहा – बहू, धुन्नी को ठीक से शुद्ध करना होगा… तुम्हें मेरे साथ देना होगा, इसमें… अगर तुम मेरा साथ नहीं दोगी तो में ये टोना कभी नहीं निकाल पाउँगा, बहू…
मैंने उनकी तरफ देखते हुए, बस अपनी गर्दन हिलाते हुए हामी भरी..
गुरु जी अब नीचे झुक गये और उन्होंने अब अपनी जीभ मेरी धुन्नी पर रगड़नी शुरू की..
श गुरु जी… आ आ अह ह स स्स्स्स्स स्स…
मैंने उनकी बालों में उंगलियाँ फेरनी शुरू की और गुरु जी अपनी जीभ को गोल गोल घुमाने लगे, मेरी धुन्नी के इर्द-गिर्द.
श गुरु जी… स स्स्स्स्स स्स ओह माआ आ अ… मैं मज़े से कराहने लगी और मैंने बिना सोचे समझे कहा – और चाटिये ना, गुरु जी…. हाँ, और चाटिये ना…
मेरे मुंह से ऐसा सुन कर उन्होंने अपनी जीभ का सिरा, मेरी धुन्नी के छेद में धकेला और मेरी धुन्नी को चाटने लगे..
स स्स्स्स्स् सस्स आ आ आ आ अह ह उम्म्म्म म म म म म म म म म म म म ओह माआ आ आ आअ उफ फ फ फ फफ्फ़…
मैंने उनके सिर को ज़ोर ज़ोर से मेरी धुन्नी में दबाया..
फिर गुरु जी ने अपना मुंह खोल कर मेरी धुन्नी पर प्रेस किया और मैंने उनके दाँतों को मेरी धुन्नी पर कटोचते हुए महसूस किया..
आ आ आ आ स स्स्स्स्स स्स ओह माआ आ ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह और कीजिए ना मेरी शुद्धि गुरु जी… पूरे बदन की शुद्धि कीजिए पूरी रात… स स्स्स स्स…
अब गुरु जी ने मेरे सीने पर से पल्लू हटाया और मेरा ऊपर आकर बिना कुछ कहे मेरे मुंह पर अपना मुंह रखा.
उनके गर्म होंठों के स्पर्श से जैसे में पिघल से गई.
मैंने उनकी पीठ पर हाथ रखते हुए उन्हें कसकर दबोच लिया.
गुरु जी ने अपना मुंह खोल कर मेरे होंठों को कस कर अपने मुंह में भींचना शुरू किया.
फिर उन्होंने अपनी जीभ मेरे होंठों पर रगड़ना शुरू किया.
मेरे होंठों को वो अपनी जीभ से चाट रहे थे और मैं मस्त होकर मचल रही थी..
म्म्म्म म म म उम्म्म्म एम्म्म…
मैंने अपना मुंह खोला और उनकी जीभ अपने मुंह में ली.
गुरु जी अब अपनी जीभ को मेरी जीभ के चारों तरफ रगड़ रहे थे.
फिर मैंने अपनी जीभ उनके मुंह में डाली.. गुरु जी, मेरी जीभ को चूसने लगे अपने मुंह में लेकर..
चूसते हुए उनके मुंह से – मु ह मु ह मु ह मु ह मु ह मु ह मु ह की आवाज़ें आ रही थी..
फिर उन्होंने मेरी जीभ पर अपने होंठों को आगे-पीछे रगड़ना शुरू किया..
उम्म्म स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प. उनकी चूसा से में पागल हो उठी और मैंने उन्हें कस कर अपनी तरफ खींचा..
चूसते हुए उन्होंने मेरी जीभ पर लगी सारी लार (थूक) चूस ली.
मैं भी गुरु जी के बालों में उंगलियाँ फेरते हुए, उन्हें सहला रही थी.
जय, इस तरह तेरी जीभ चूसता है क्या बहू !?!
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा – मैं उनसे प्यार करती हूँ गुरु जी लेकिन सच कहूँ तो आपकी लार का स्वाद बहुत अच्छा लगा मुझे…
जय ने कभी मेरी जीभ की चूसा नहीं की थी लेकिन जिस तरह से गुरु जी ने मेरी जीभ चूसी उससे ऐसे लगा मानो मैं स्वर्ग में हूँ..
फिर गुरु जी ने मेरे दोनों गालों को कस कर दबाते हुए मेरे मुंह खोला और अपना मुंह मेरे मुंह के ऊपर ला कर अपनी गाढ़ी थूक मेरे मुंह में गिराने लगे.
मैंने उनकी थूक को अपनी जीभ पर लिया और जीभ को मुंह में घुमाते हुए उनकी थूक का स्वाद चखने लगी..
उम्म्म्म गुरु जी स स्स स्स कितनी पावन है आपकी लार म्म्म्म म… और मैं और कुछ बोले बिना, उनकी लार पी गई.
फिर गुरु जी ने मेरी क्लीवेज के बीचो-बीच चूमना शुरू किया..
ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह गुरु जी आ आ अह ह स स्स्स्स्स् सस्स में आपकी दासी बनना चाहती हूँ गुरु जी… मुझे अपने काम वासना के लिए रोज़ इस्तेमाल कीजिया गुरु जी स स्स्स्स्स् स्स स्स…
मैं बस अपने होश खो कर उनके चुंबनों से पागल हो रही थी और गुरु जी की गर्दन को पकड़ कर उन्हें मेरे सीने पर दबा रही थी.
फिर उन्होंने मेरी क्लीवेज को अपनी जीभ से चाटना शुरू किया..
आ आह ह ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मा आ आ अ स स्स्स्स्स् स्स्स स्स श गुरु जिइ इ ई ई ई ई ई ई ई ई स स्स्स्स्स् स्स्स स्स…
फिर उन्होंने मेरी चोली के बटन्स खोले और पीछे हाथ डाल कर मेरी ब्रा उतारी.
उन्होंने मुझे बिस्तर पर बिठा दिया और मेरे स्तनों को हाथ में लेकर कस कर दबाने लगे.
आ आह ह कितने मजबूत हाथ है आपके स स्स्स्स्स् स्स्स्स स्स ज़ोर से… और ज़ोर से दबाइए ना, मेरे दूध… उम्म्म गुरु जी आ अह ह मेरी चूत गीली हो रही है म्म्म्म म गुरु जिइ इ ई…
अब उन्होंने मेरे दोनों दूध को अपनी मुट्ठी में जकड़ा और उन्हें कस कर मसलने लगे.
मैं उनकी इस हरकत से कराह उठी.. आ आ आ आ आ आ आ अहह…
मेरी चूत ने अपनी पहली धार छोड़ी.
फिर उन्होंने मेरे लेफ्ट चुचि मुंह में ली और मेरी चुचि को चूसने लगे..
ओह मा आ आअ स स्स्स्स्स् स स्स गुरु जी मेरी पैंटी पूरी गीली हो गई है… में झड़ चुकी हूँ, एम्म्म…
गुरु जी ने मेरी चुचि को अपने होंठों के बीच कस कर भींचा और उनकी इस हरकत से मैं थोड़ा पीछे झुकी.
उनके बालों को सहलाने लगी, अपनी उंगलियों से और गुरु जी मेरी चुचि को चूसते रहे..
कोमल, मेरी रंडियों की चूत में कभी सूखा नहीं पड़ता… उनकी चूत हमेशा गीली रहती है, मेरी कृपा से…
ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह गुरु जी… आ आ अहह चूसीए अपनी रंडी बहू की चुचियाँ गुरु जी… ओह स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स स्स उफ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फफ्फ़…
मेरी गंदी गंदी बातों से उत्तेजित हो कर, गुरु जी ने मेरी चुचियों को अपनी लार से गीला करना शुरू किया.
वो अपनी जीभ को मेरी चुचियों के चारों तरफ रगड़ने लगे, सर्कल्स में..
ओह, मा आ आ आ स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स स्स कितना मज़ा आ रहा है गुरु जी स स्स्स्स्स् स स्स चाटिये मेरी चुचियों को आ आ अहह स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स स्स और चाटिये… और चाटिये ना स स्स्स्स्स् स्स्स स्स…
गुरु जी अब मेरी चुचियों को दांतों तले दबाने लगे.
मेरी चुचियों को काटने लगे..
आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आह ह गुरु जी… में मर गाइि ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई…
मेरी चूत फिर से गीली होने लगी..
उनकी जीभ मेरी चुचियों को लगातार सहला रही थी और उनके होन्ट मेरी चुचियों को कस कर दबा रहे थे.
मैं उनकी गर्दन को जकड़ कर अपनी तरफ खींचती रही और फिर जैसे मेरी चूत से ज्वाला-मुखी उफन पड़ा और मैं सिहर उठी.
मेरी चूत ने दूसरी बार अपना पानी छोड़ा था.
उफनती नदी की तरफ मेरी चूत के रस ने मेरी पैंटी को पूरी तरह भिगो दिया..
गुरु जी ने मेरी साड़ी पूरी तरह निकाल दी.
मैं उनके सामने सिर्फ़ अपने पेटिकोट और पैंटी में थी.
पैंटी का गीलापन पेटिकोट पर लगा हुआ था.
गुरु जी ने अपना कुर्ता निकाला और फिर अपनी धोती उतारी..
अब वो केवल एक लंगोट में, मेरे सामने बिस्तर पर बैठ गये.
मैंने उन्हें वासना भरी निगाह से देखते हुए पूछा – गुरु जी आपने अपनी रंडियों का जीकर किया था कुछ देर पहले… कितनी रंडियाँ है आपकी और क्या वो मुझसे अच्छी है, बिस्तर में !?!

मेरे इस सवाल पर गुरु जी ने हल्की मुस्कुराहट भरे अंदाज़ में कहा – तेरे इस खानदान में ही मेरी कई रंडियाँ है, बहू. तेरी सासू मां पिछले 10 साल से मेरे साथ सो रही है और तेरी ननद डॉली भी मेरे साथ सोने लगी है… उसकी नथ मैंने ही उतारी थी और मैंने मां जी से सॉफ सॉफ कह दिया है की उसकी शादी इसी शहर में कराना ताकि वो मुझे अक्सर मिलने आ सके और तो और तेरी मां जी और डॉली दोनों को पता है की इन 2 दिनों में, मैं तुझे दिन-रात चोदूंगा… तेरी सासू मां की बहनें सीमा, उसकी दोनों भाभी, पिंकी और निशा और फिर तेरे पति के चाचा की बीवी और उनकी तीनो बहुए, ये सारी की सारी औरतें मेरे साथ कई बार सो चुकी है…
गुरु जी की बातें सुनकर मुझे मां जी, डॉली और उनकी बाकी रंडियों पर जलन तो हुई लेकिन ये भी ख़याल आया की मुझे भी मौका मिला है, गुरु जी के साथ वक़्त बिताने का..
गुरु जी, मैं आपकी सबसे बड़ी रंडी बनना चाहती हूँ… मां जी, डॉली और जय के आने तक मैं पूरा दिन और पूरी रात घर में नंगी रहूंगी, आपकी सेवा में…
गुरु जी अब बिस्तर पर खड़े हो गये और उन्होंने बिना कुछ कहे, मुझे अपनी तरफ खींचा..
मेरे बाल पकड़ कर उन्होंने मेरा चेहरा अपने लंगोट पर दबाया..
सूंघ ले, अपने गुरु जी का लंड रंडी…
गुरु जी के आदेश अनुसार में उनके लंगोट पर से उनके लंड की मादक खुशबू सूंघने लगी उम्म्म्मम..
उनके लंगोट से पसीने की मादक खुशबू आ रही थी.. मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उनके लंगोट को चाटना शुरू किया..
फिर, मैंने उनकी तरफ देखा और उनका लंगोट खोल कर मैंने उनके लंड के दर्शन किए..
उनका लंड, जय के लंड से काफ़ी मोटा और काला था..
मैं झट से उनके लंड से लिपट गई और अपनी जीभ से उनके अंडकोष को चूमने और चाटने लगी.
उनके लंड की मादक खुश्बू मुझे पागल करे जा रही थी.
गुरु जी ने अपने लंड को पकड़ कर उनका टोपा मेरे होंठों पर रगड़ा.
उम्म्म्मम गुरु जी… स स्स्स स्स कितनी मस्त खुश्बू आ रही है… स स्स स्स…
मैंने उनके लंड के टोपे को कवर करती चमड़ी को पीछे किया और उनका चिप-चिप स्लिपरी टोपा एक्सपोज़ करते हुए, उसे चाटने लगी.
गुरु जी मज़े में मोन करने लगे..
ओह प्रिय्आ अ म्म्म्म म कोमल बेटी आ आह ह स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् सस्स… साली, चाट अपने गुरु जी के टोपे को… मुंह में लेकर चूस ले कस कर तेरी मां की चूत…
मैं उनकी गालियों से और मस्त हो रही थी.
फिर मैंने उनके टोपे पर लगी पेशाब वाली क्रॅक पर जीभ घुमाना शुरू किया..
उम्म्म गुरु जी मुझे आपका मुठ पीना है… – और ये कह कर मैंने उनका लंड मुंह में लिया..
उनके लंड को चूसने लगी ज़ोर ज़ोर से..
स्ल स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प…
फिर गुरु जी ने मेरे गालों को पकड़ा और अपने लंड को मेरे मुंह में मारने लगे.
मेरे मुंह को चोदने लगे ज़ोर ज़ोर से..
उनका लंड मेरे मुंह में थपेड़े मारने लगा – स्वूप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप…
फिर उन्होंने अपना लंड बाहर निकाला और अपने हाथ में थूक कर उस थूक को अपने लंड पर रगड़ा.
उनका लंड, उनकी थूक की परत में चमक रहा था.
मैंने फिर से उनका थूक से सना लंड मुंह में लिया और उससे और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी.
गुरु जी भी मेरे बालों को पकड़ कर अपना लंड मेरे मुंह में मारने लगे, फिर से..
ले ले रंडी… ले मेरा लंड… आ आह ह स स्स्स्स्स स्स आ आ अह ह ह आह ह अह ह…
तोप तोप तोप तोप तोप तोप तोप तोप…
खूब चूसा के बाद, गुरु जी ने मुझे पकड़ा और फिर अपने लंड का टोपा मेरे होंठों पर टीका कर मुस्कुराते हुए कहा – ले मेरा मुठ, कुतिया…
और बस कुछ ही पलों में, उन्होंने अपनी पहली धार मेरे मुंह में छोड़ दी.
उनका गाड़ा रस, मेरे मुंह में उफन पड़ा..
उू उ उम्म्म्म स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् सस्स प्रआ आ आ आ आ आ आ आ आ आअ…
गुरु जी का गर्म गर्म मुठ मेरे मुंह में था.
मैंने उससे अपने मुंह में ही रख कर उन्हें दिखाते हुए, मुठ को अपनी जीभ से मुंह में चारों तरफ घुमाया और फिर में उसे पी गई..
मुठ निकलने के बाद, मुझे लगा गुरु जी और मर्दों की तरह ठंडे पढ़ जाएँगे, कुछ देर के लिए लेकिन उन्होंने मुझे बिस्तर पर फिर से लिटा दिया और मेरा पेटिकोट उतार दिया, पूरी तरह..
अब, मैं सिर्फ़ पैंटी में थी उनके सामने.. गुरु जी ने नीचे झुक-कर, मेरी चिकनी सपाट जांघों को चूमना शुरू किया.
उनकी इस हरकत से, मैं फिर से सिहर उठी और उनके बालों में उंगलियाँ घुमाने लगी.
फिर उन्होंने, मेरी जांघों को और फैला दिया और वो अपनी जीभ के सिरे से मेरी जांघों को चाटने लगे.
उनकी लार से मेरी दोनों जांघें गीली होने लगी और में उनके बालों को कसकर खींचते हुए सिसकियाँ लेने लगी – सस्स्स्स्स् स्स्स स्स ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह गुरुजिइइई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई म्म्म्म म म म म म म म म म ओह आ आ र र र्र र गज्ग घ ह… ऐसे चाटगे तो मेरी चूत फिर से पानी छोड़ देगी, मेरे रजा आा अ… – मैं मदमस्त होकर बड़बड़ाने लगी..
फिर उन्होंने, मेरी कमर को दोनों हाथों में दबोचा और अपने होंठों से मेरी चूत पर चुम्मों की बारिश करने लगे.
उनके होंठों का स्पर्श महसूस करते ही मुझे सातवें आसमान पर होने का अनुभव हुआ.
अब मैंने उनके बालों को पकड़ा और उन्हें सिर को नीचे दबाने लगी, मेरी चूत पर. मैंने अपने पैर उनकी गर्दन पर क्रॉस किए और उन्हें अपने पैरों में जकड़ लिया.
आह ह गुरुजिइइई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई चाट लो, मेरी चूत को… चाट लो मेरे मालिकक्कक क स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स स्स… अब से मैं आपकी रखेल हूँ… आपके साथ बिस्तर गर्म करने के लिए, कुछ भी करूँगी म्म्म्म म और मैं खुद ही मस्ती में बड़बड़ाते हुए, अपनी कमर उठा कर उनकी चटाई का आनंद लेने लगी..
गुरु जी ने अपना मुंह खोला और मेरे चूत को मुंह में दबोच लिया.
उनके होंठों को मेरी चूत के इर्द-गिर्द महसूस करते ही, मेरा जिस्म जैसे एकदम टाइट हो गया और मैंने अपनी कमर उठा ली मस्ती में..
ओह गुरुजिइइई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ऐसा आनंद देंगे तो दुनिया की हर औरत आपके साथ सोने को तैयार होगी एम्म्म स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स स्स और चूसो मेरी चूत… आज तक जय ने भी इतनी दफ़ा मेरी चूत से पानी नहीं निकाला है… मुझे तो पता ही नहीं था की मेरी चूत इतना पानी छोड़ सकती है स स्स्स्स्स् स्स्स स्स… खा जाइए, मेरी चूत… मसल दीजिए, मेरी चूत को…
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06-08-2021, 12:46 PM,
#38
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
Hindi sexi stori जब फँसा चूत में केला

यह एक ऐसी घटना है जिसकी याद दस साल बाद भी मुझे शर्म से पानी पानी कर देती है। लगता है धरती फट जाए और उसमें समा जाऊँ। अकेले में भी आइना देखने की हिम्मत नहीं होती। कोई सोच भी नहीं सकता किसी के साथ ऐसा भी घट सकता है ! ये एक केले का किस्सा है
उस घटना के बाद मैंने पापा से जिद करके जेएनयू ही छोड़ दिया। पता नहीं मेरी कितनी बदनामी हुई होगी। दस साल बाद आज भी किसी जेएनयू के विद्यार्थी के बारे में बात करते डर लगता है। कहीं वह सन 2000 के बैच का न निकले और सोशियोलॉजी विषय का न रहा हो। तब तो उसे जरूर मालूम होगा। खासकर हॉस्टल का रहनेवाला हो तब तो जरूर पहचान जाएगा।
गनीमत थी कि पापा को पता नहीं चला। उन्हें आश्चर्य ही होता रहा कि मैंने इतनी मेहनत से जेएनयू की प्रवेश परीक्षा पासकर उसमें छह महीने पढ़ लेने के बाद उसे छोड़ने का फैसला क्यों कर लिया। मुझे कुछ सूझा नहीं था, मैंने पिताजी से बहाना बना दिया कि मेरा मन सोशियोलॉजी पढ़ने का नहीं कर रहा और मैं मास कम्यूनिकेशन पढ़ना चाहती हूँ। छह महीने गुजर जाने के बाद अब नया एडमिशन तो अगले साल ही सम्भव था। चाहती थी अब वहाँ जाना ही न पड़े। संयोग से मेरी किस्मत ने साथ दिया और अगले साल मुझे बर्कले यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में छात्रवृत्ति मिल गई और मैं अमेरिका चली गई।
लेकिन विडम्बना ने मेरा पीछा वहाँ भी नहीं छोड़ा। यह छात्रवृत्ति हीना को भी मिली थी और वह अमरीका मेरे साथ गई। वही इस कारनामे की जड़ थी। उसी ने जेएनयू में मेरी यह दुर्गति कराई थी। उसने अपने साथ मुझसे भी छात्रवृत्ति के लिए प्रार्थनापत्र भिजवाया था और पापा ने भी उसका साथ होने के कारण मुझे अकेले अमेरिका जाने की इजाजत दी थी। लेकिन हीना की संगत ने मुझे अमेरिका में भी बेहद शर्मनाक वाकये में फँसाया, हालाँकि बाद में उसका मुझे फायदा मिला था। पर वह एक दूसरी कहानी है। हीना एक साथ मेरी जिन्दगी में बहुत बड़ा दुर्भाग्य और बहुत बड़ा सौभाग्य दोनों थी।
वो हीना ! जेएनयू के साबरमती हॉस्टल की लड़कियाँ की सरताज। जितनी सुंदर उससे बढ़कर तेजस्वी, बिल्लौरी आँखों में काजल की धार और बातों में प्रबुद्ध तर्क की धार, गोरापन लिये हुए छरहरा शरीर, किंचित ऊँची नासिका में चमकती हीरे की लौंग, चेहरे पर आत्मविश्वारस की चमक, बुध्दिमान और बेशर्म, न चेहरे, न चाल में संकोच या लाज की छाया, छातियाँ जैसे मांसलता की अपेक्षा गर्व से ही उठी रहतीं, उच्चवर्गीय खुले माहौल से आई तितली।
अन्य हॉस्टलों में भी उसके जैसी विलक्षण शायद ही कोई दिखी। मेरी रूममेट बनकर उसे जैसे एक टास्क मिल गया था कि किस तरह मेरी संकोची, शर्मीले स्वभाव को बदल डाले। मेरे पीछे पड़ी रहती। मुझे दकियानूसी बताकर मेरा मजाक उड़ाती रहती। उसकी तुर्शी-तेजी और पढ़ाई में असाधारण होने के कारण मेरे मन पर उसका हल्का आतंक भी रहता, हालाँकि मैं उससे अधिक सुंदर थी, उससे अधिक गोरी और मांसल लेकिन फालतू चर्बी से दूर, फिगर को लेकर मैं भी बड़ी सचेत थी, उसके साथ चलती तो लड़कों की नजर उससे ज्यादा मुझ पर गिरती, लेकिन उसका खुलापन बाजी मार ले जाता। मैं उसकी बातों का विरोध करती और एक शालीनता और सौम्यता के पर्दे के पीछे छिपकर अपना बचाव भी करती। जेएनयू का खुला माहौल भी उसकी बातों को बल प्रदान करता था। यहाँ लड़के लड़कियों के बीच भेदभाव नहीं था, दोनों बेहिचक मिलते थे। जो लड़कियाँ आरंभ में संकोची रही हों वे भी जल्दी जल्दी नए माहौल में ढल रही थीं। ऐसा नहीं कि मैं किसी पिछड़े माहौल से आई थी। मेरे पिता भी अफसर थे, तरक्कीपसंद नजरिये के थे और मैं खुद भी लड़के लड़कियों की दोस्ती के विरोध में नहीं थी। मगर मैं दोस्ती से सेक्स को दूर ही रखने की हिमायती थी
जबकि हीना ऐसी किसी बंदिश का विरोध करती थी। वह कहती शादी एक कमिटमेंट जरूर है मगर शादी के बाद ही, पहले नहीं। हम कुँआरी हैं, लड़कों के साथ दोस्ती को बढ़ते हुए अंतरंग होने की इच्छा स्वाभाविक है और अंतरंगता की चरम अभिव्यक्ति तो सेक्स में ही होती है। वह शरीर के सुख को काफी महत्व देती और उस पर खुलकर बात भी करती। मैं भारतीय संस्कृति की आड़ लेकर उसकी इन बातों का विरोध करती तो वह मदनोत्सव, कौमुदी महोत्सव और जाने कहाँ कहाँ से इतिहास से तर्क लाकर साबित कर देती कि सेक्स को लेकर प्रतिबन्ध हमारे प्राचीन समाज में था ही नहीं। मुझे चुप रहना पड़ता।
पर बातें चाहे जितनी कर खारिज दो मन में उत्सुकता तो जगाती ही हैं। वह औरतों के हस्तमैथुन, समलैंगिक संबंध के बारे में बात करती। शायद मुझसे ऐसा संबंध चाहती भी थी। मैं समझ रही थी, मगर ऊपर से बेरुखी दिखाती। मुझसे पूछती कभी तुमने खुद से किया है, तुम्हारी कभी इच्छा नहीं होती! भगवान ने जो खूबियाँ दी हैं उनको नकारते रहना क्या इसका सही मान है? जैसे पढ़ाई में अच्छा होना तुम्हारा गुण है, वैसे ही तुम्हारे शरीर का भी अच्छा होना क्या तुम्हारा गुण नहीं है? अगर उसकी इज्जत करना तुम्हें पसंद है तो तुम्हारे शरीर ……
“ओफ… भगवान के लिए चुप रहो। तुम कुछ और नहीं सोच सकती?” मैं उसे चुप कराने की कोशिश करती।
“सोचती हूँ, इसीलिये तो कहती हूँ।”
“सेक्स या शारीरिक सौंदर्य मेरा निजी मामला है।”
“तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारा नॉलेज भी तो तुम्हारी निजी चीज है?” उस दिन कुछ वह ज्यादा ही तीव्रता में थी।
केला अन्दर तक चला गया था..
“है, लेकिन यह मेरी अपनी योग्यता है, इसे मैंने अपनी मेहनत से, अपनी बुद्धि से अर्जित किया है।”
“और शरीर कुदरत ने तुम्हें दिया है इसलिए वह गलत है?”

“बिल्कुल नहीं, मैं मेकअप करती हूँ, इसे सजा-धजाकर अच्छे से संवार कर रखती हूँ।”
“लेकिन इससे मज़ा करना गलत समझती हो? या फिर खुद करो तो ठीक, दूसरा करे तो गलत, है ना?”
“अब तुम्हें कैसे समझाऊँ।”
वह आकर मेरे सामने बैठ गई, “माई डियर, मुझे मत समझाओ, खुद समझने की कोशिश करो।”
मैंने साँस छोड़ी, “तुम चाहती क्या हो? सबको अपना शरीर दिखाती फिरूँ?”
“बिल्कुल नहीं, लेकिन इसको दीवार नहीं बनाओ, सहज रूप से आने दो।” वह मेरी आँखों में आँखें डाले मुझे देख रही थी। वही बाँध देनेवाली नजर, जिससे बचकर दूसरी तरफ देखना मुश्किल होता। मेरे पास अभी उसके कुतर्कों के जवाब होते, मगर बोलने की इच्छा कमजोर पड़ जाती।
फिर भी मैंने कोशिश की, “मैं यहाँ पढ़ने आई हूँ, प्रेम-व्रेम के चक्कर में फँसने नहीं।”
“प्रेम में न पड़ो, दोस्ती से तो इनकार नहीं? वही करो, शरीर को साथ लेकर।”
मैं उसे देखती रह जाती। क्या चीज है यह लड़की ! कोई शील संकोच नहीं? यहाँ से पहले माँ-बाप के पास भी क्या ऐसे ही रहती थी ! उसने छह महीने में ही कई ब्वायफ्रेंड बना लिये थे, उनके बीच तितली-सी फुदकती रहती। हॉस्टल के कमरे में कम ही रहती। जब देखो तो लाइब्रेरी में, या दोस्तों के साथ, या फिर हॉस्टल के कार्यक्रमों में। मुझे उत्सुकता होती वह लड़कों के साथ भी पढ़ाई की बातें करती है या इश्क और सेक्स की बातें?
मुझे उसके दोस्तों को देखकर उत्सुकता तो होती पर मैं उनसे दूर ही रहती। शायद हीना की बातों और व्यवहार की प्रतिक्रिया में मेरा लड़कों से दूरी बरतना कुछ ज्यादा था। वह नहीं होती तो शायद मैं उनसे अधिक मिलती-जुलती। उसके जो दोस्त आते वे उससे ज्यादा मुझे ही बहाने से देखने की कोशिश में रहते। मुझे अच्छा लगता- कहीं पर तो उससे बीस हूँ। हीना उनके साथ बातचीत में मुझे भी शामिल करने की कोशिश करती। मैं औपचारिकतावश थोड़ी बात कर लेती लेकिन हीना को सख्ती से हिदायत दे रखी थी कि अपने दोस्तों के साथ मेरे बारे में कोई गंदी बात ना करे। अगर करेगी तो मैं कमरा बदलने के किए प्रार्थनापत्र दे दूंगी।
वह डर-सी गई लेकिन उसने मुझे चुनौती भी देते हुए कहा था, “मैं तो कुछ नहीं करूँगी, लेकिन देखूँगी तुम कब तक लक्ष्मण रेखा के भीतर रहती हो? अगर कभी मेरे हाथ आई तो, जानेमन, देख लेना, निराश नहीं करूंगी, वो मजा दूंगी कि जिन्दगीभर याद रखोगी।”
उस दिन मैं अनुमान भी नहीं लगा पाई थी उसकी बातों में कैसी रोंगटे खड़े कर देनेवाली मंशा छिपी थी। लेकिन अकेले में मेरे साथ उसके रवैये में कोई फर्क नहीं था। दोस्ती की मदद के साथ साथ एक अंतनिर्हित रस्साकशी भी। नोट्स का आदान-प्रदान, किताबों, विषयों पर साधिकार बहस और साथ में उतने ही अधिकार से सेक्स संबंधी चर्चा। अपने सेक्स के, हस्तमैथुन के भी प्रसंगों का वर्णन करती, समलैंगिक अनुभव के लिए उत्सुकता जाहिर करती जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से मेरी तरफ इशारा होता। कोई सुंदर गोरी लड़की मिले तो… तुम्हारी जैसी… शायद मेरे प्रति मन में कमजोरी उसे मुझे खुलकर बोलने से रोकती। वह अशालीन भी नहीं थी। उसकी तमाम बातों में चालूपन से ऊपर एक परिष्कार का स्तर बना रहता। वह विरोध के लायक थी पर फटकार के लायक नहीं। वह मुझे हस्तमैथुन के लिए ज्यादा प्रेरित करती। कहती इसमें तो कोई आपत्ति नहीं है न। इसमें तो कोई दूसरा तुम्हें देखेगा, छुएगा नहीं?
वह रात देर तक पढ़ाई करती, सुबह देर से उठती। उसका नाश्ता अक्सर मुझे कमरे में लाकर रखना पड़ता। कभी कभी मैं भी अपना नाश्ता साथ ले आती। उस दिन जरूर संभावना रहती कि वह नाश्ते के फलों को दिखाकर कुछ बोलेगी। जैसे, ‘असली’ केला खाकर देखो, बड़ा मजा आएगा।’ वैसे तो खीरे, ककड़ियों के टुकड़ों पर भी चुटकी लेती, ‘खीरा भी बुरा नहीं है, मगर वह शुरू करने के लिए थोड़ा सख्त है।’ केले को दिखाकर कहती, “इससे शुरूआत करो, इसकी साइज, लम्बाई मोटाई चिकनाई सब ‘उससे’ मिलते है, यह ‘इसके’ (उंगली से योनिस्थल की ओर इशारा) के सबसे ज्यादा अनुकूल है। एक बार उसने कहा, “छिलके को पहले मत उतारो, इन्फेक्शन का डर रहेगा। बस एक तरफ से थोड़ा-सा छिलका हटाओ और गूदे को उसके मुँह पर लगाओ, फिर धीरे धीरे ठेलो। छिलका उतरता जाएगा और एकदम फ्रेश चीज अंदर जाती जाएगी। नो इन्फेक्शकन।”
मुझे हँसी आ रही थी। वह कूदकर मेरे बिस्तर पर आ गई और बोली, “बाई गॉड, एक बार करके तो देखो, बहुत मजा आएगा।”
एक-दो सेकंड तक इंतजार करने के बाद बोली,”बोलो तो मैं मदद करूँ? अभी ! तुम्हें खा तो नहीं जाऊँगी।”
“क्या पता खा भी जाओ, तुम्हारा कोई भरोसा नहीं।” मैं बात को मजाक में रखना चाह रही थी।
“हुम्म….” कुछ हँसती, कुछ दाँत पीसती हुई-सी बोली,”तो जानेमन, सावधान रहना, तुम जैसी परी को अकेले नहीं खाऊँगी, सबको खिलाऊँगी।”
“सबको खिलाने से क्या मतलब है?” मुझे उसकी हँसी के बावजूद डर लगा।
उस दिन कोई व्रत का दिन था। वह सुबह-सुबह नहाकर मंदिर गई थी। लौटने में देर होनी थी इसलिए मैंने उसका नाश्ता लाकर रख दिया था। आज हमें बस फलाहार करना था। अकेले कमरे में प्लेट में रखे केले को देखकर उसकी बात याद आ रही थी,”इसका आकार, लम्बाई मोटाई चिकनाई सब ‘उससे’ मिलते हैं।”
मैं केले को उठाकर देखने लगी, पीला, मोटा और लम्बा। हल्का-सा टेढ़ा मानो इतरा रहा हो और मेरी हँसी उड़ाती नजर का बुरा मान रहा हो। असली लिंग को तो देखा नहीं था, मगर हीना ने कहा था शुरू में वह भी मुँह में केले जैसा ही लगता है। मैंने कौतूहल से उसके मुँह पर से छिलके को थोड़ा अलगाया और उसे होठों पर छुलाया। नरम-सी मिठास, साथ में हल्के कसैलेपन का एहसास भी।
क्या ‘वह’ भी ऐसा ही लगता है?
मैं कुछ देर उसे होंठों और जीभ पर फिराती रही फिर अलग कर लिया। थूक का एक महीन तार उसके साथ खिंचकर चला आया।
लगा, जैसे योनि के रस से गीला होकर लिंग निकला हो ! (एक ब्लू फिल्म का दृश्*य)।
धत्त ! मुझे शर्म आई, मैंने केले को मेज पर रख दिया।
मुझे लगा, मेरी योनि में भी गीलापन आने लगा है।
साढ़े आठ बज रहे थे। हीना अब आती ही होगी। क्लास के लिए तैयार होने के लिए काफी समय था। केला मेज पर रखा था। उसे खाऊँ या रहने दूँ। मैंने उसे फिर उठाकर देखा। सिरे पर अलगाए छिलके के भीतर से गूदे का गोल मुँह झाँक रहा था। मैंने शरारत से ही उसके मुँह पर नाखून से एक चीरे का पिहून बना दिया। अब वह और वास्तविक लिंग-जैसा लगने लगा। मन में एक खयाल गुजर गया- जरा इसको अपनी ‘उस’ में भी लगाकर देखूँ?
पर इस खयाल को दिमाग से झटक दिया।
लेकिन केला सामने रखा था। छिलके के नीचे से झाँकते उसके नाखून से खुदे मुँह पर बार-बार नजर जाती थी। मुझे अजीब लग रहा था, हँसी भी आ रही थी और कौतुहल भी। एकांत छोटी भावनाओं को भी जैसे बड़ा कर देता है। सोचा, कौन देखेगा, जरा करके देखते हैं। हीना डींग मारती है कि सच बोलती है पता तो चलेगा।
मैंने उठकर दरवाजा लगा दिया।
हीना का खयाल कहीं दूर से आता लगा। जैसे वह मुझ पर हँस रही हो।
मध्यम आकार का केला। ज्यादा लम्बा नहीं। अभी थोड़ा अधपका। मोटा और स्वस्थ।
मैं बिस्तर पर बैठ गई और नाइटी को उठा लिया। कभी अपने नंगेपन को चाहकर नहीं देखा था। इस बार मैंने सिर झुकाकर देखा। बालों के झुरमुट के अंदर गुलाबी गहराई।
मैंने हाथ से महसूस किया- चिकना, गीला, गरम… मैंने खुद पर हँसते हुए ही केले को अपने मुँह से लगाकर गीला किया और उसके लार से चमक गए मुँह को देखकर चुटकी ली, ‘जरूर खुश होओ बेटा, ऐसी जबरदस्त किस्मत दोबारा नहीं होगी।’
योनि के होठों को उंगलियों से फैलाया और अंदर की फाँक में केले को लगा दिया। कुछ खास तो नहीं महसूस हुआ, पर हाँ, छुआते समय एक हल्की सिहरन सी जरूर आई। उस कोमल जगह में जरा सा भी स्पर्श ज्यादा महसूस होता है। मैंने केले को हल्के से दबाया लेकिन योनि का मुँह बिस्तर में दबा था।
मैं पीछे लेट गई। सिर के नीचे अपने तकिए के ऊपर हीना का भी तकिया खींचकर लगा लिया। पैरों को मोड़कर घुटने फैला लिये। मुँह खुलते ही केले ने दरार के अंदर बैठने की जगह पाई। योनि के छेद पर उसका मुँह टिक गया, पर अंदर ठेलने की हिम्मत नहीं हुई। उसे कटाव के अंदर ही रगड़ते हुए ऊपर ले आई। भगनासा की घुण्डी से नीचे ही, क्योंकि वहाँ मैं बहुत संवेदनशील हूँ। नीचे गुदा की छेद और ऊपर भगनासा से बचाते हुए मैंने उसकी ऊपर नीचे कई बार सैर कराई। जब कभी वह होठों के बीच से अलग होता, एक गीली ‘चट’ की आवाज होती। मैंने कौतुकवश ही उसे उठा-उठाकर ‘चट’ ‘चट’ की आवाज को मजे लेने के लिए सुना।
हँसी और कौतुक के बीच उत्तेजना का मीठा संगीत भी शरीर में बजने लगा था। केला जैसे अधीर हो रहा था भगनासा का शिवलिंग-स्पर्श करने को।
‘कर लो भक्त !’ मैंने केले को बोलकर कहा और उसे भगनासा की घुण्डी के ऊपर दबा दिया।
दबाव के नीचे वह लचीली कली बिछली और रोमांचित होकर खिंच गई। उसके खिंचे मुँह पर केले को फिराते और रगड़ते मेरे मुँह से पहली ‘आह’ निकली। मैंने हीना को मन ही मन गाली दी- साली !
बगल के कमरे से कुछ आवाज सी आई। हाथ तत्क्षण रुक गया। नजर अपने आप किवाड़ की कुण्डी पर उठ गई। कुण्डी चढ़ी हुई थी। फिर भी गौर से देखकर तसल्ली की। रोंगटे खड़े हो गए। कोई देख ले तो !
नाइटी पेट से ऊपर, पाँव फैले हुए, उनके बीच होंठों को फैलाए बायाँ हाथ, दाहिने हाथ में केला।
कितनी अश्लील मुद्रा में थी मैं !!
मेरे पैर किवाड़ की ही तरफ थे। बदन में सिहरन-सी दौड़ गई। केले को देखा। वह भी जैसे बालों के बीच मुँह घुसाकर छिपने की कोशिश कर रहा था लेकिन बालों की घनी कालिमा के बीच उसका पीला शरीर एकदम प्रकट दिख रहा था। डर के बीच भी उस दृश्य को देखकर मुझे हँसी आ गई, हालाँकि मन में डर ही व्याप्त था।
लेकिन यौनांगों से उठती पुकार सम्मोहनकारी थी। मैंने बायाँ हाथ डर में ही हटा लिया था। केवल दाहिना हाथ चला रही थी। केला बंद होठों को अपनी मोटाई से ही फैलाता अंदर के कोमल मांस को ऊपर से नीचे तक मालिश कर रहा था। भगनासा के अत्यधिक संवेदनशील स्नायुकेन्द्र पर उसकी रगड़ से चारों ओर के बाल रोमांचित होकर खड़े हो गए थे। स्त्रीत्व के कोमलतम केन्द्र पर केले के नरम कठोर गूदे का टकराव बड़ा मोहक लग रहा था।
कोई निर्जीव वस्तु भी इतने प्यार से प्यार कर सकती है ! आश्चर्य हुआ।
हीना ठीक कहती है, केले का जोड़ नहीं होगा।
मैंने योनि के छेद पर उंगली फिराई। थोड़ा-सा गूदा घिसकर उसमें जमा हो गया था। ‘तुम्हें भी केले का स्वाद लग गया है !’ मैंने उससे हँसी की।
मैंने उस जमे गूदे को उंगली से योनि के अंदर ठेल दिया। थोड़ी सी जो उंगली पर लगी थी उसको उठाकर मुँह में चख भी लिया। एक क्षण को हिचक हुई, लेकिन सोचा नहा-धोकर साफ तो हूँ। वही परिचित मीठा, थोड़ा कसैला स्वाद, लेकिन उसके साथ मिली एक और गंध- योनि के अंदर की मुसाई गंध।
मैंने केले को उठाकर देखा, छिलके के अन्दर मुँह घिस गया था। मैंने छिलका अलग कर फिर से गूदे में नाखून से खोद दिया। देखकर मन में एक मौज-सी आई और मैंने योनि में उंगली घुसाकर कई बार कसकर रगड़ दिया।
उस घर्षण ने मुझे थरथरा दिया और बदन में बिजली की लहरें दौड़ गईं। हूबहू मोटे लिंग-से दिखते उस केले के मुँह को मैंने पुचकार कर चूम लिया।
और उसी क्षण लगा, मन से सारी चिंता निकल गई है, कोई डर या संकोच नहीं।
मैंने बेफिक्र होकर केले को योनि के मुँह पर लगा दिया और उसे रगड़ने लगी। दूसरे हाथ की तर्जनी अपने आप भगांकुर पर घूमने लगी। आनन्द की लहरों में नौका बहने लगी, साँसें तेज होने लगीं। मैंने खुद अपने यौवन कपोतों को तेज तेज उठते बैठते देख मैंने उन्हें एक बार मसल दिया।
मेरा छिद्र एक बड़े घूमते भँवर की तरह केले को अदंर लेने की कोशिश कर रहा था। मैंने केले को थपथपाया, ‘अब और इंतजार की जरूरत नहीं। जाओ ऐश करो।’
मैंने उसे अन्दर दबा दिया। उसका मुँह द्वार को फैलाकर अन्दर उतरने लगा। डर लगा, लेकिन दबाव बनाए रही। उतरते हुए केले के साथ हल्का सा दर्द होने लगा था लेकिन यह दर्द उस मजे में मिलकर उसे और स्वादिष्ट बना रहा था। दर्द ज्यादा लगता तो केले को थोड़ा ऊपर लाती और फिर उसे वापस अन्दर ठेल देती।
धीरे धीरे मुझमें विश्वास आने लगा- कर लूँगी।
जब केला कुछ आश्वस्त होने लायक अन्दर घुस गया तब मैं रुकी, केले का छिलका योनि के ऊपर पत्ते की तरह फैला हुआ था। मेरी देह पसीने-पसीने हो रही थी।
अब और अन्दर नहीं लूँगी, मैंने सोचा। लेकिन पहली बार का रोमांच और योनि का प्रथम फैलाव उतने कम प्रवेश से मानना नहीं चाह रहे थे।
थोड़ा-सा और अन्दर जा सकता है !
अगर ज्यादा अन्दर चला गया तो?
मैं उतने ही पर संतोष करके केले को पिस्टन की तरह चलाने लगी।
आधे अधूरे कौर से मुँह नही भरता, उल्टे चिढ़ होती है। मैंने सोचा, थोड़ा सा और… !
सुरक्षित रखते हुए मैंने गहराई बढ़ाई और फिर उतने ही तक से अन्दर बाहर करने लगी। ऊपर बायाँ हाथ लगातार भग-मर्दन कर रहा था। शरीर में दौड़ते करंट की तीव्रता और बढ़ गई। पहले कभी इस तरह से किया नहीं था। केवल उंगली अन्दर डाली थी, उसमें वो संतोष नहीं हुआ था।
अब समझ में आ रहा था औरत के शरीर की खूबी क्या होती है, हीना क्यों इसके पीछे पागल रहती है। जब केले से इतना अच्छा लग रहा था तो वास्तविक सम्भोग कितना अच्छा लगता होगा !?!
मेरे चेहरे पर खुशी थी। पहली बार यह चिकना-चिकना घर्षण एक नया ही एहसास था, उंगली की रगड़ से अलग, बेकार ही मैं इससे डर रही थी।
मुझे केले के भाग्य से ईर्ष्या होने लगी थी, केला निश्चिंत अन्दर-बाहर हो रहा था। अब उसे योनि से बिछड़ने का डर नहीं था। मैं उसके आवागमन का मजा ले रही थी। केले के बाहर निकलते समय योनि भिंचकर अन्दर खींचने की कोशिश करती। मैं योनि को ढीला कर उसे पुन: अन्दर ठेलती। इन दो विरोधी कोशिशों के बीच केला आराम से आनन्द के झोंके लगा रहा था। मैं धीरे-धीरे सावधानी से उसे थोड़ा थोड़ा और अन्दर उतार रही थी। आनन्द की लहरें ऊँची होती जा रही थीं, भगांकुर पर उंगलियों की हरकत बढ़ रही थी, सनसनाहट बढ़ रही थी और अब किसी अंजाम तक पहुँचने की इच्छा सर उठाने लगी थी।
बहुत अच्छा लग रहा था। जी करता था केले को चूम लूँ। एक बार उसे निकालकर चूम भी लिया और पुन: छेद पर लगा दिया। अन्दर जाते ही शांति मिली। योनि जोर जोर से भिंच रही थी। मैंने अपने कमर की उचक भी महसूस की।
धीरे धीरे करके मैंने आधे से भी अधिक अन्दर उतार दिया। डर लग रहा था, कहीं टूट न जाए। हालाँकि केले में पर्याप्त सख्ती थी। मैं उसे ठीक से पकड़े थी। योनि भिंच-भिंचकर उसे और अन्दर खींचना चाह रही थी। केला भी जैसे पूरा अन्दर जाने के लिए जोर लगा रहा था। मैं भरसक नियंत्रण रखते ही अन्दर बाहर करने की गति बढ़ा रही थी। योनि की कसी चिकनी दीवारों पर आगे पीछे सरकता केला बड़ा ही सुखद अनुभव दे रहा था।
कितना अच्छा लग रहा था !! एक अलग दुनिया में खो रही थी मैं ! एक लय में मेरा हाथ और सांसें और धड़कनें चल रही थीं, तीनों धीरे धीरे तेज हो रहे थे। मैं धरती से मानो ऊपर उठ रही थी। वातावरण में मेरी आह आह की फुसफुसाहटों का संगीत गूंज रहा था। कोई मीठी सी धुन दिमाग में बज रही थी…..
“आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन, मेरा मन
शरारत करने को ललचाए रे मेरा मन, मेरा मन ….
धीरे धीरे दाहिने हाथ ने स्वत: ही अन्दर-बाहर करने की गति सम्हाल ली। मैं नियंत्रण छोड़कर उसके उसके बहाव में बहने लगी। मैंने बाएँ हाथ से अपने स्तनों को मसलना शुरू कर दिया। उसकी नोकों पर नाइटी के ऊपर से ही उंगलियाँ गड़ाने, उन्हें चुटकी में पकड़कर दबाने की कोशिश करने लगी। योनि में कम्पन सा महसूस होने लगा। गति निरंतर बढ़ रही थी – अन्दर-बाहर, अन्दर-बाहर… सनसनी की ऊँची होती तरंगें …. ‘चट’ ‘चट’ की उत्तेजक आवाज… सुखद घर्षण.. भगनासा पर चोट से उत्पन्न बिजली की लहरें… चरम बिन्दु का क्षितिज कहीं पास दिख रहा था। मैंने उस तक पहुँचने के लिए और जोर लगा दिया …..
कोई लहर आ रही है… कोई मुझे बाँहों में कस ले, मुझे चूर दे…………… ओह……
कि तभी ‘खट : खट : खट’…..
मेरी साँस रुक गई। योनि एकदम से भिंची, झटके से हाथ खींच लिया….
खट खट खट…..
हाथ में केवल डंठल और छिलका था। मैं बदहवास हो गई। अब क्या करूँ?
“पिहू, दरवाजा खोलो !”…. खट खट खट…
मैंने तुरंत नाइटी खींची और उठ खड़ी हुई। केला अन्दर महसूस हो रहा था। चलकर दरवाजे के पास पहुँची और चिटकनी खोल दी।
हीना मेरे उड़े चेहरे को देखकर चौंक पड़ी- क्या बात है?
मैं ठक ! मुँह में बोल नहीं थे।
“क्या हुआ, बोलो ना?”
क्या बोलती? केला अन्दर गड़ रहा था। मैंने सिर झुका लिया। आँखें डबडबा आईं।
हीना घबराई, कुछ गड़बड़ है, कमरे में खोजने लगी। केले का छिलका बिस्तर पर पड़ा था। नाश्ते की दोनों प्लेटें एक साथ स्टडी टेबल पर रखी थीं।
“क्या बात है? कुछ बोलती क्यों नहीं?”
मेरा घबराया चेहरा देखकर संयमित हुई,”आओ, पहले बैठो, घबराओ नहीं।”
मेरा कंधा पकड़कर लाई और बिस्तर पर बिठा दिया। मैं किंचित जांघें फैलाए चल रही थी और फैलाए ही बैठी।
“अब बोलो, क्या बात है?”
मैंने भगवान से अत्यंत आर्त प्रार्थना की- प्रभो ….. बचा लो।
अचानक उसके दिमाग में कुछ कौंधा। उसने मेरी चाल और बैठने के तरीके में कुछ फर्क महसूस किया था। केले का छिलका उठाकर बोली, “क्या मामला है?”
मैं एकदम शर्म से गड़ गई, सिर एकदम झुका लिया, आँसू की बूंदें नाइटी पर टपक पड़ी।
“अन्दर रह गया है?”
मैंने हथेलियों में चेहरा छिपा लिया। बदन को संभालने की ताकत नहीं रही। बिस्तर पर गिर पड़ी।
हीना ठठाकर हँस पड़ी।
“मिस पिहू, आपसे तो ऐसी उम्मीद नहीं थी। आप तो बड़ी सुशील, मर्यादित और सो कॉल्ड क्या क्या हैं?” उसकी हँसी बढ़ने लगी।
मुझे गुस्सा आ गया- बेदर्द लड़की ! मैं इतनी बड़ी मुश्किल में हूँ और तुम हँस रही हो?
“हँसूं न तो क्या करूँ? मुझसे तो बड़ी बड़ी बातें कहती हो, खुद ऐसा कैसे कर लिया?”
मैंने शर्म और गुस्से से मुँह फेर लिया।
Reply
06-08-2021, 12:46 PM,
#39
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
Hindi sexi stori
अब क्या करूँ? बेहद डर लग रहा था। देखना चाहती थी कितना अन्दर फँसा हुआ है, निकल सकता है कि नहीं। कहीं डॉक्टर बुलाना पड़ गया तो? सोचकर ही रोंगटे खड़े हो गए। कैसी किरकिरी होगी !
मैंने आँख पोछी और हिम्मत करके कमरे से बाहर निकली। कोशिश करके सामान्य चाल से चली, गलियारे में कोई देखे तो शक न करे। बाथरूम में आकर दरवाजा बंद किया और नाइटी उठाकर बैठकर नीचे देखा। दिख नहीं रहा था। काश, आइना लेकर आती। हाथ से महसूस किया। केले का सिरा हाथ से टकरा रहा था। बेहद चिकना। नाखून गड़ाकर खींचना चाहा तो गूदा खुदकर बाहर चला आया।
और खोदा।
उसके बाद उंगली से टकराने लगा और नाखून गड़ाने पर भीतर धँसने लगा।
मैंने उछल कर देखा, शायद झटके से गिर जाए। डर भी लग रहा था कि कहीं कोई पकड़ न ले।
कई बार कूदी। बैठे बैठे और खड़े होकर भी। कोई फायदा नहीं। कूदने से कुछ होने की उम्मीद करना आकाश कुसुम था।
फँस गई। कैसे निकलेगा? कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी रही। फिर निकलना पड़ा। चलना और कठिन लग रहा था। यही केला कुछ क्षणों पहले अन्दर कितना सुखद लग रहा था !
कमरे के अन्दर आते ही हीना ने सवाल किया,”निकला?”
मैंने सिर हिलाया। हमारे बीच चुप्पी छाई रही। परिस्थिति भयावह थी।
“मैं देखूँ?”
हे भगवान, यह अवस्था ! मेरी दुर्दशा की शुरुआत हो चुकी थी। मैं बिस्तर पर बैठ गई।
हीना ने मुझे पीछे तकिए पर झुकाया और मेरे पाँवों के पास बैठ गई। मेरी नाइटी उठाकर मेरे घुटनों को मोड़ी और उन्हें धीरे धीरे फैला दी। बालों की चमचमाती काली फसल………. पहली बार उस पर बाहर की नजर पड़ रही थी। हीना ने होंठों को फैलाकर अन्दर देखा।
हे भगवान कोई रास्ता निकल आए !
उसने उंगलियों से होंठों के अन्दर, अगल बगल टटोला, महसूस किया। बाएँ दाएँ, ऊपर नीचे। नाखून से खींचने की असफल कोशिश की, भगांकुर को सहलाया। ये क्यों? मन में सवाल उठा, क्या यह अभी भी तनी अवस्था में है? हीना ने गुदा में भी उंगली कोंची, दो गाँठ अन्दर भी घुसा दी। घुसाकर दाएं बाएँ घुमाया भी।
मैं कुनमुनाई। यह क्या कर रही है?
पलकों की झिरी से उसे देखा, उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। कहीं वह मुझसे खेल तो नहीं रही है?
“ओ गॉड, यह तो भीतर घुस गया है।” उसके स्वर में वास्तविक चिंता थी, “क्या करोगी?”
“डॉक्टर को बुलाओगी? वार्डन को बोलना पड़ेगा। हॉस्टल सुपरिंटेंडेंट जानेगी, फिर सारी टीचर्स, … ना ना…. बात सब जगह फैल जाएगी।”
“ना ना ना…. ” मैंने उसी की बात प्रतिध्वनित की।
कुछ देर हम सोचते रहे। समय नहीं है, जल्दी करना पड़ेगा, इन्फेक्शंन का खतरा है।
…………. मैं क्या कहूँ।
“एक बात कहूँ, इफ यू डोंट माइंड?”
“………….” मैं कुछ सोच नहीं पा रही।
“करण को बुलाऊँ? एमबीबीएस कर रहा है। कोई राह निकाल सकता है। सबके जानने से तो बेहतर है एक आदमी जानेगा।”
बाप रे ! एक लड़का। वह भी सीधे मेरी टांगों के बीच ! ना ना….
“पिहू, और कोई रास्ता नहीं है। थिंक इट। यही एक संभावना है।”
कैसे हाँ बोलूँ। अब तक किसी ने मेरे शरीर को देखा भी नहीं था। यह तो उससे भी आगे……. मैं चुप रही।
“जल्दी बोलो पिहू। यू आर इन डैंजर। अन्दर बॉडी हीट से सड़ने लगेगा। फिर तो निकालने के बाद भी डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा। लोगों को पता चल जाएगा।”
इतना असहाय जिंदगी में मैंने कभी नहीं महसूस किया था,”ओके ….”
“तुम चिंता न करो। ही इज ए वेरी गुड फ्रेड ऑव मी (वह मेरा बहुत ही अच्छा दोस्त है।)” उसने आँख मारी, “हर तरह की मदद करता है।”
गजब है यह लड़की। इस अवस्था में भी मुझसे मजाक कर रही है।
उसने करण को फोन लगाया, “करण, क्या कर रहे हो….. नाश्ता कर लिया?… नहीं?… तुम्हारे लिए यहाँ बहुत अच्छा नाश्ता है। खाना चाहोगे? सोच लो… इटस ए लाइफटाइम चांस… नाश्ते से अधिक उसकी प्लेट मजेदार … नहीं बताऊँगी…. अब मजाक छोड़ती हूँ। तुम तुरंत आ जाओ। माइ रूममेट इज इन अ बिग प्राब्लम। मुझे लगता है तुम कुछ मदद कर सकते हो… नहीं नहीं.. फोन पर नहीं कह सकती। इट्स अर्जेंट… बस तुरंत आ जाओ।”
मुझे गुस्सा आ रहा था। “ये नाश्ता-वाश्ता क्या बक रही थी?”
“गलत बोल रही थी?”
उसे कुछ ध्यान आया, उसने दुबारा फोन लगाया, “करण , प्लीज अपना शेविंग सेट ले लेना। मुझे लगता है उसकी जरूरत पड़ेगी।”
शेविंग सेट! क्या बोल रही है?….. अचानक मेरे दिमाग में एकदम से साफ हो गया … क्या वहाँ के बाल मूंडेगी? हाय राम!!!
कुछ ही देर में दरवाजे पर दस्तक हुई।
“हाय पिहू ! ” करण ने भीतर आकर मुझे विश किया और समय में मैं बस एक ठंडी ‘हाय’ कर देती थी, इस वक्त मुस्कुराना पड़ा।
“क्या प्राब्लम है?”
हीना ने मेरी ओर देखा, मैं कुछ नहीं बोली।
“इसने केला खाया है।”
“तो?”
“वो इसके गले में अटक गया है।”
उसके चेहरे पर उलझन के भाव उभरे,”ऐसा कैसे हो सकता है?”
“मुँह खोलो !”
हीना हँसी रोकती हुई बोली, “उस मुँह में नहीं….. बुद्धू…. दूसरे में… उसमें।” उसने उंगली से नीचे की ओर इशारा किया।
करण के चेहरे पर हैरानी, फिर हँसी ! फिर गंभीरता…..
हे भगवान, धरती फट जाए, मैं समा जाऊँ।
“यह देखो”, हीना ने उसे छिलका दिखाया, “टूटकर अन्दर रह गया है।”
“यह तो सीरियस है।” करण सोचता हुआ बोला।
“बहुत कोशिश की, नहीं निकल रहा। तुम कुछ उपाय कर सकते हो?”
करण विचारमग्न था। बोला, “देखना पड़ेगा।”
मैंने स्वाचालित-सा पैरों को आपस में दबा लिया।
“पिहू….”
मैं कुछ नहीं सुन पा रही थी, कुछ नहीं समझ पा रही थी। कानों में यंत्रवत आवाज आ रही थी, “पिहू… बी ब्रेव…! यह सिर्फ हम तीनों के बीच रहेगा…..!”
मेरी आँखों के आगे अंधेरा छाया हुआ है। मुझे पीछे ठेलकर तकिए पर लिटा रही है। मेरी नाइटी ऊपर खिंच रही है…. मेरे पैर, घुटने, जांघें… पेड़ू…. कमर….प्रकट हो रहे हैं। मेरी आत्मा पर से भी खाल खींचकर कोई मुझे नंगा कर रहा है। पैरों को घुटनों से मोड़ा जा रहा है……. दोनों घुटनों को फैलाया जा रहा है। मेरा बेबस, असहाय, असफल विरोध…. मर्म के अन्दर तक छेद करती पराई नजरें … स्त्री की अंतरंगता के चिथड़े चिथड़े करती….
जांघों पर, पेड़ू पर घूमते हाथ …. बीच के बालों को सरकाते हुए… होंठों को अलग करने का खिंचाव…।
“साफ से देख नहीं पा रहा, जरा उठाओ।”
मेरे सिर के नीचे से एक तकिया खींचा है। मेरे नितंबों के नीचे हाथ डालकर उठाकर तकिया लगाया जा रहा है…. मेरे पैरों को उठाकर घुटनों को छाती तक लाकर फैला दिया गया है… सब कुछ उनके सामने खुल गया है। गुदा पर ठंडी हवा का स्पर्श महसूस हो रहा है…
ॐ भूर्भुव: ………………………… धीमहि ….. पता नहीं क्यों गायत्री मंत्र का स्मरण हो रहा है। माता रक्षा करो…
केले की ऊपरी सतह दिख रही है। योनि के छेद को फैलाए हुए। काले बालों के के फ्रेम में लाल गुलाबी फाँक … बीच में गोल सफेदी… उसमें नाखून के गड्ढे…
कुछ देर की जांच-परख के बाद मेरा पैर बिस्तर पर रख दिया जाता है। मैं नाइटी खींचकर ढकना चाहती हूँ, पर….
“एक कोशिश कर सकती है।”
“क्या?”
“मास्टरबेट (हस्तेमैथुन) करके देखे। हो सकता है ऑर्गेज्म(स्खलन) के झटके और रिलीज(रस छूटने) की चिकनाई से बाहर निकल जाए।”
हीना सोचती है।
“पिहू!”
मैं कुछ नहीं बोलती। उन लोगों के सामने हस्तमैथुन करना ! स्खलित भी होना!!! ओ माँ !
“पिहू”, इस बार हीना का स्वर कठोर है,”बोलो…..”
क्या बोलूँ मैं। मेरी जुबान नहीं खुलती।
“खुद करोगी या मुझे करना पड़ेगा?”
वह मेरा हाथ खींचकर वहाँ पर लगा देती है,”करो।”
मेरा हाथ पड़ा रहता है।
“डू इट यार !”
मैं कोई हरकत नहीं करती, मर जाना बेहतर है।
“लेट अस डू इट फॉर हर (चलो हम इसका करते हैं)।”
मैं हल्के से बाँह उठाकर पलकों को झिरी से देखती हूँ। करण सकुचाता हुआ खड़ा है। बस मेरे उस स्थल को देख रहा है।
हीना की हँसी,”सुंदर है ना?”
शर्म की एक लहर आग-सी जलाती मेरे ऊपर से नीचे निकल जाती है, बेशर्म लड़की…!
“क्या सोच रहे हो?”
करण दुविधा में है, इजाजत के बगैर किसी लड़की का जननांग छूना ! भलामानुस है।
तनाव के क्षण में हीना का हँसी-मजाक का कीड़ा जाग जाता है,”जिस चीज की झलक भर पाने के लिए ऋषि-मुनि तरसते हैं, वह तुम्हें यूँ ही मिल रही है, क्या किस्मत है तुम्हारी !”
मैं पलकें भींच लेती हूँ। साँस रोके इंतजार कर रही हूँ ! टांगें खोले।
“कम ऑन, लेट्स डू इट…”
बिस्तर पर मेरे दोनों तरफ वजन पड़ता है, एक कोमल और एक कठोर हाथ मेरे उभार पर आ बैठते हैं, बालों पर उंगलियाँ फेरने से गुदगुदी लग रही है, कोमल उंगलियाँ मेरे होंठों को खोलती हैं अन्दर का जायजा लेती हैं, भगनासा का कोमल पिंड तनाव में आ जाता है, छू जाने से ही बगावत करता है, कभी कोमल, कभी कठोर उंगलियाँ उसे पीड़ित करती हैं, उसके सिर को कुचलती, मसलती हैं, गुस्से में वह चिनगारियाँ सी छोड़ता है। मेरी जांघें थरथराती हैं, हिलना-डुलना चाहती हैं, पर दोनों तरफ से एक एक हाथ उन्हें पकड़े है, न तो परिस्थिति, न ही शरीर मेरे वश में है।
“यस … ऐसे ही…” हीना मेरा हाथ थपथपाती है तब मुझे पता चलता है कि वह मेरे स्तनों पर घूम रहा था। शर्म से भरकर हाथ खींच लेती हूँ।
हीना हँसती है,”अब यह भी हमीं करें? ओके…”
दो असमान हथेलियाँ मेरे स्तनों पर घूमने लगती हैं। नाइटी के ऊपर से। मेरी छातियाँ परेशान दाएं-बाएँ, ऊपर-नीचे लचककर हमले से बचना चाह रही हैं पर उनकी कुछ नहीं चलती। जल्दी भी उन पर से बचाव का, कुछ नहीं-सा, झीना परदा भी खींच लिया जाता है, घोंसला उजाड़कर निकाल लिए गए दो सहमे कबूतर … डरे हुए ! उनका गला दबाया जाता है, उन्हें दबा दबाकर उनके मांस को मुलायम बनाया जा रहा है- मजे लेकर खाए जाने के लिए शायद।
उनकी चोंचें एक साथ इतनी जोर खींची जाती है कि दर्द करती हैं, कभी दोनों को एक साथ इतनी जोर से मसला जाता है कि कराह निकल जाती है। मैं अपनी ही तेज तेज साँसों की आवाज सुन रही हूँ। नीचे टांगों के केन्द्र में लगातार घर्षण, लगातार प्रहार, कोमल उंगलियों की नाखून की चुभन… कठोर उंगलियों की ताकतवर रगड़ ! कोमल कली कुचलकर लुंज-पुंज हो गई है।
सारे मोर्चों पर एक साथ हमला… सब कुछ एक साथ… ! ओह… ओह… साँस तो लेने दो…
“हाँ… लगता है अब गर्म हो गई है।” एक उंगली मेरी गुदा की टोह ले रही है।
मैं अकबका कर उन्हें अपने पर से हटाना चाहती हूँ, दोनों मेरे हाथ पकड़ लेते हैं, उसके साथ ही मेरे दोनों चूचुकों पर दो होंठ कस जाते हैं, एक साथ उन्हें चूसते हैं !
मेरे कबूतर बेचारे !जैसे बिल्ली मुँह में उनका सिर दबाए कुचल रही हो। दोनों चोंचें उठाकर उनके मुख में घुसे जा रहे हैं।
हरकतें तेज हो जाती हैं।
“यह बहुत अकड़ती थी। आज भगवान ने खुद ही इसे मुझे गिफ्ट कर दिया।” हीना की आवाज…. मीठी… जहर बुझी….
“तुम इसके साथ?”
“मैं कब से इसका सपना देख रही थी।”
“क्या कहती हो?”
“बहुत सुन्दर है ना यह !” कहती हुई वह मेरे स्तनों को मसलती है, उन्हें चूसती है। मैं अपने हाँफते साँसों की आवाज खुद सुन रही हूँ। कोई बड़ी लहर मरोड़ती सी आ रही है….
“पिहू, जोर लगाओ, अन्दर से ठेलो।” करण की आवाज में पहली बार मेरा नाम… हीना की आवाज के साथ मिली। गुदा के मुँह पर उंगली अन्दर घुसने के लिए जोर लगाती है।
यह उंगली किसकी है?
मैं कसमसा रही हूँ, दोनों ने मेरे हाथ-पैर जकड़ रखे हैं,”जोर से …. ठेलो।”
मैं जोर लगाती हूँ। कोई चीज मेरे अन्दर से रह रहकर गोली की तरह छूट रही है……. रस से चिकनी उंगली सट से गुदा के अन्दर दाखिल हो जाती है। मथानी की तरह दाएँ-बाएँ घूमती है।
आआआआह………. आआआआह………. आआआआह……….
“यस यस, डू इट…….!” हीना की प्रेरित करती आवाज, करण भी कह रहा है। दोनों की हरकतें तेज हो जाती हैं, गुदा के अन्दर उंगली की भी। भगनासा पर आनन्द उठाती मसलन दर्द की हद तक बढ़ जाती है।
ओ ओ ओ ओ ओ ह…………… खुद को शर्म में भिगोती एक बड़ी लहर, रोशनी के अनार की फुलझड़ी ……….. आह..
एक चौंधभरे अंधेरे में चेतना गुम हो जाती है।
“यह तो नहीं हुआ? वैसे ही अन्दर है !”… मेरी चेतना लौट रही है, “अब क्या करोगी?”
कुछ देर की चुप्पी ! निराशा और भयावहता से मैं रो रही हूँ।
“रोओ मत !” करण मुझे सहला रहा है, इतनी क्रिया के बाद वह भी थोड़ा-थोड़ा मुझ पर अधिकार समझने लगा है, वह मेरे आँसू पोंछता है,”इतनी जल्दी निराश मत होओ।” उसकी सहानुभूति बुरी नहीं लगती। कुछ देर सोचकर वह एक आइडिया निकालता है। उसे लगता है उससे सफलता मिल जाएगी।
“तुम मजाक तो नहीं कर रहे, आर यू सीरियस?” हीना संदेह करती है।
“देखो, वेजीना और एनस के छिद्र अगल-बगल हैं, दोनों के बीच पतली-सी दीवार है। जब मैंने इसकी गुदा में उंगली घुसाई तो वह केले के दवाब से बहुत कसी लग रही थी।”
अब मुझे पता चला कि वह उंगली करण की थी। मैं उसे हीना की शरारत समझ रही थी।
“तुम बुद्धिमान हो।” हीना हँसती है, “मैंने तुम्हें बुलाकर गलती नहीं की।”
तो यह बहाने से मेरी ‘वो’ मारना चाह रहा है। गंदा लड़का। मुझे एक ब्लू फिल्म में देखा गुदा मैथुन का दृश्य याद हो आया। वह मुझे बड़ा गंदा लेकिन रोमांचक भी लगा था- गुदा के छेद में तनाव। कहीं करण ने मेरी यह कमजोरी तो नहीं पकड़ ली? ओ गॉड।
“एक और बात है !” करण हीना की तारीफ से खुश होकर बोल रहा था,”शी इज सेंसिटिव देयर। जब मैंने उसमें उंगली की तो यह जल्दी ही झड़ गई।”
उफ !! मेरे बारे में इस तरह से बात कर रहे हैं जैसे कसाई मुर्गे के बारे में बात कर रहा हो।
“तो तुम्हें लगता है शी विल इंजॉय इट।”
“उसी से पूछ लो।”
हीना खिलखिला पड़ी,”पिहू, बोलो, तुम्हें मजा आएगा?”
वह मेरी हँसी उड़ाने का मौका छोड़ने वाली नहीं थी। पर वही मेरी सबसे बड़ी मददगार भी थी।
चुप्पी के आवरण में मैं अपनी शर्म बचा रही थी। लेकिन केला मुझे विवश किए था। मुझे सहायता की जरूरत थी। मेरा हस्तमैथुन करके उन दोनों की हिम्मत बढ़ गई थी। आश्चर्य था मैंने उसे अपने साथ होने दिया। अब तो मेरी गाण्ड मारने की ही बात हो रही थी।
मुझे तुरंत ग्लानि हुई ! छी: ! मैंने कितने गंदे शब्द सोचे। मैं कितनी जल्दी कितनी बेशर्म हो गई थी !
“पिहू, मजाक की बात नहीं। बी सीरियस।” हीना ने अचानक मूड बदल कर मुझे चेतावनी दी। उसका हाथ मेरे योनि पर आया और एक उंगली गुदा के छेद पर आकर ठहर गई।
“तुम इसके लिए तैयार हो ना?”
मेरी चुप्पी से परेशान होकर उसने कहा,”चुप रहने से काम नहीं चलेगा, यह छोटी बात नहीं है। तुम्हें बताना होगा तैयार हो कि नहीं। अगर तुम्हें आपत्ति्जनक लगता है तो फिर हम छोड़ देते हैं ! बोलो?”
मेरी चुप्पी यथावत् थी।
हीना ने करण से पूछा- बोलो क्या करें? यह तो बोलती ही नहीं।
“क्या कहेगी बेचारी ! बुरी तरह फँसी हुई है। शी इज टू मच इम्बैरेस्ड !” कुछ रुककर वह फिर बोला,”लेकिन अब जो करना है उसमें पड़े रहने से काम नहीं चलेगा। उठकर सहयोग करना होगा।”
“पिहू, सुन रही हो ना। अगर मना करना है तो अभी करो।”
“पिहू, तुम…. मैं नहीं चाहता, लेकिन इसमें तुम पर… कुछ जबरदस्ती करनी पड़ेगी, तुम्हें सहना भी होगा।” करण की आवाज में हमदर्दी थी। या पता नहीं मतलब निकालने की चतुराई।
कुछ देर तक दोनों ने इंतजार किया,”चलो इसे सोचने देते हैं। लेकिन जितनी देर होगी, उतना ही खतरा बढ़ता जाएगा।”
सोचने को क्या बाकी था ! मेरे सामने कोई और उपाय था क्या?
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06-08-2021, 12:46 PM,
#40
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
मेरी खुली टांगों के बीच योनिप्रदेश काले बालों की समस्त गरिमा के साथ उनके सामने लहरा रहा था।
मैंने हीना के हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया- जो सही समझो, करो !
“लेकिन मुझे सही नहीं लग रहा।” करण ने बम जैसे फोड़ा,”मुझे लग रहा है, पिहू समझ रही है कि मैं इसकी मजबूरी का नाजायज फायदा उठा रहा हूँ।”
बात तो सच थी मगर मैं इसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थी। वे मेरी मजबूरी का फायदा तो उठा ही रहे थे।
“खतरा पिहू को है। उसे इसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए। पर यहाँ तो उल्टे हम इसकी मिन्नतें कर रहे हैं। जैसे मदद की जरूरत उसे नहीं हमें है।”
उसका पुरुष अहं जाग गया था। मैं तो समझ रही थी वह मुझे भोगने के लिए बेकरार है, मेरा सिर्फ विरोध न करना ही काफी है। मगर यह तो अब …..
“मगर यह तो सहमति दे रही है !”, हीना ने मेरे पेड़ू पर दबे उसके हाथ को दबाए मेरे हाथ की ओर इशारा किया। उसे आश्चर्य हो रहा था।
“मैं क्यों मदद करूँ? मुझे क्या मिलेगा?”
सुनकर हीना एक क्षण तो अवाक रही फिर खिलखिलाकर हँस पड़ी,”वाह, क्या बात है !”
करण इतनी सुंदर लड़की को न केवल मुफ्त में ही भोगने को पा रहा था, बल्कि वह इस ‘एहसान’ के लिए ऊपर से कुछ मांग भी रहा था। मेरी ना-नुकुर पर यह उसका जोरदार दहला था।
“सही बात है।” हीना ने समर्थन किया।
“देखो, मुझे नहीं लगता यह मुझसे चाहती है। इसे किसी और को ही दिखा लो।”
मैं घबराई। इतना करा लेने के बाद अब और किसके पास जाऊँगी। करण चला गया तो अब किसका सहारा था?
“मेरा एक डॉक्टर दोस्त है। उसको बोल देता हूँ।” उसने परिस्थिति को और अपने पक्ष में मोड़ते हुए कहा।
मैं एकदम असहाय, पंखकटी चिड़िया की तरह छटपटा उठी। कहाँ जाऊँ? अन्दर रुलाई की तेज लहर उठी, मैंने उसे किसी तरह दबाया। अब तक नग्नता मेरी विवशता थी पर अब इससे आगे रोना-धोना अपमानजनक था।
मैं उठकर बैठ गई। केले का दबाव अन्दर महसूस हुआ। मैंने कहना चाहा,”तुम्हें क्या चाहिए?”
पर भावुकता की तीव्रता में मेरी आवाज भर्रा गई।
हीना ने मुझे थपथपाकर ढांढस दिया और करण को डाँटा,”तुम्हें दया नहीं आती?”
मुझे हीना की हमदर्दी पर विश्वास नहीं हुआ। वह निश्चय ही मेरी दुर्दशा का आनन्द ले रही थी।
“मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।”
“क्या लोगे?”
करण ने कुछ क्षणों की प्रतीक्षा कराई और बात को नाटकीय बनाने के लिए ठहर ठहरकर स्पष्ट उच्चारण में कहा,”जो इज्जत इन्होंने केले को बख्शी है वह मुझे भी मिले।”
मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। अब क्या रहेगा मेरे पास? योनि का कौमार्य बचे रहने की एक जो आखिरी उम्मीद बनी हुई थी वह जाती रही। मेरे कानों में उसके शब्द सुनाई पड़े, “और वह मुझे प्यार और सहयोग से मिले, न कि अनिच्छा और जबरदस्ती से।”
पता नहीं क्यों मुझे करण की अपेक्षा हीना से घोर वितृष्णा हुई। इससे पहले कि वह मुझे कुछ कहती मैंने करण को हामी भर दी।
मुझे कुछ याद नहीं, उसके बाद क्या कैसे हुआ। मेरे कानों में शब्द असंबद्ध-से पड़ रहे थे जिनका सिलसिला जोड़ने की मुझमें ताकत नहीं थी। मैं समझने की क्षमता से दूर उनकी
हरकतों को किसी विचारशून्य गुड़िया की तरह देख रही थी, उनमें साथ दे रही थी। अब नंगापन एक छोटी सी बात थी, जिससे मैं काफी आगे निकल गई थी।
‘कैंची’, ‘रेजर’, ‘क्रीम’, ‘ऐसे करो’, ‘ऐसे पकड़ो’, ‘ये है’, ‘ये रहा’, ‘वहाँ बीच में’, ‘कितने गीले’, ‘सम्हाल के’, ‘लोशन’, ‘सपना-सा है’…………… वगैरह वगैरह स्त्री-पुरुष की
मिली-जुली आवाजें, मिले-जुले स्पर्श।
बस इतना समझ पाई थी कि वे दोनों बड़ी तालमेल और प्रसन्नता से काम कर रहे थे। मैं बीच बीच में मन में उठनेवाले प्रश्नों को ‘पूर्ण सहमति दी है’ के रोडरोलर के नीचे रौंदती चली गई। पूछा नहीं कि वे वैसा क्यों कर रहे थे, मुझे वहाँ पर मूँडने की क्या आवश्यकता थी।
लोशन के उपरांत की जलन के बाद ही मैंने देखा वहाँ क्या हुआ है। शंख की पीठ-सी उभरी गोरी चिकनी सतह ऊपर ट्यूब्लाइट की रोशनी में चमक रही थी। हीना ने जब एक उजला टिशू पेपर मेरे होंठों के बीच दबाकर उसका गीलापन दिखाया तब मैंने समझा कि मैं किस स्तर तक गिर चुकी हूँ। एक अजीब सी गंध, मेरे बदन की, मेरी उत्तेजना की, एक नशा, आवेश, बदन में गर्मी का एहसास… बीच बीच में होश और सजगता के आते द्वीप।
जब हीना ने मेरे सामने लहराती उस चीज की दिखाते हुए कहा, ‘इसे मुँह में लो !’ तब मुझे एहसास हुआ कि मैं उस चीज को जीवन में पहली बार देख रही हूँ। साँवलेपन की तनी छाया, मोटी, लंबी, क्रोधित ललाट-सी नसें, सिलवटों की घुंघचनों के अन्दर से आधा झाँकता मुलायम गोल गुलाबी मुख- शर्माता, पूरे लम्बाई की कठोरता के प्रति विद्रोह-सा करता। मैं हीना के चेहरे को देखती रह गई। यह मुझे क्या कह रही है!
“इसे गीला करो, नहीं तो अन्दर कैसे जाएगा।” हीना ने मेरा हाथ पकड़कर उसे पकड़ा दिया।
“पिहू, यू हैव प्रॉमिस्ड।”
मेरा हाथ अपने आप उस पर सरकने लगा। आगे-पीछे, आगे-पीछे।
“हाँ, ऐसे ही।” मैं उस चीज को देख रही थी। उसका मुझसे परिचय बढ़ रहा था।
“अब मुँह में लो।”
मुझे अजीब लग रहा था। गंदा भी……….. ।
“हिचको मत। साफ है। सुबह ही नहाया है।” हीना की मजाक करने की कोशिश……..।
मेरे हाथ यंत्रवत हरकत करते रहे।
“लो ना !” हीना ने पकड़कर उसे मेरे मुँह की ओर बढ़ाया। मैंने मुँह पीछे कर लिया।
“इसमें कुछ मुश्किल नहीं है। मैं दिखाऊँ?”
हीना ने उसे पहले उसकी नोक पर एक चुम्बन दिया और फिर उसे मुँह के अन्दर खींच लिया। करण के मुँह से साँस निकली। उसका हाथ हीना के सिर के पीछे जा लगा। वह उसे चूसने लगी। जब उसने मुँह निकाला तो वह थूक में चमक रहा था। मैं आश्चर्य में थी कि सदमे में, पता नहीं।
हीना ने अपने थूक को पोंछा भी नहीं, मेरी ओर बढ़ा दिया- यह लो।
“लो ना…….!” उसने उसे पकड़कर मेरी ओर बढ़ाया। करण ने पीछे से मेरा सिर दबाकर आगे की ओर ठेला। लिंग मेरे होंठों से टकराया। मेरे होंठों पर एक मुलायम, गुदगुदा एहसास। मैं दुविधा में थी कि मुँह खोलूँ या हटाऊँ कि “पिहू, यू हैव प्रॉमिस्ड” की आवाज आई।
मैंने मुँह खोल दिया।
मेरे मुँह में इस तरह की कोई चीज का पहला एहसास था। चिकनी, उबले अंडे जैसी गुदगुदी, पर उससे कठोर, खीरे जैसी सख्त, पर उससे मुलायम, केले जैसी। हाँ, मुझे याद आया। सचमुच इसके सबसे नजदीक केला ही लग रहा था। कसैलेपन के साथ। एक विचित्र-सी गंध, कह नहीं सकती कि अच्छी लग रही थी या बुरी। जीभ पर सरकता हुआ जाकर गले से सट जा रहा था। हीना मेरा सिर पीछे से ठेल रही थी। गला रुंध जा रहा था और भीतर से उबकाई का वेग उभर रहा था।
“हाँ, ऐसे ही ! जल्दी ही सीख जाओगी।”
मेरे मुँह से लार चू रहा था, तार-सा खिंचता। मैं कितनी गंदी, घिनौनी, अपमानित, गिरी हुई लग रही हूँगी।
करण आह ओह करता सिसकारियाँ भर रहा था।
फिर उसने लिंग मेरे मुँह से खींच लिया। “ओह अब छोड़ दो, नहीं तो मुँह में ही………”
मेरे मुँह से उसके निकलने की ‘प्लॉप’ की आवाज निकलने के बाद मुझे एहसास हुआ मैं उसे कितनी जोर से चूस रही थी। वह साँप-सा फन उठाए मुझे चुनौती दे रहा था।
उन दोनों ने मुझे पेट के बल लिटा दिया। पेड़ू के नीचे तकिए डाल डालकर मेरे नितम्बों को उठा दिया। मेरे चूतड़ों को फैलाकर उनके बीच कई लोंदे वैसलीन लगा दिया।
कुर्बानी का क्षण ! गर्दन पर छूरा चलने से पहले की तैयारी।
“पहले कोई पतली चीज से !”
हीना मोमबत्ती का पैकेट ले आई। हमने नया ही खरीदा था। पैकेट फाड़कर एक मोमबत्ती निकाली। कुछ ही क्षणों में गुदा के मुँह पर उसकी नोक गड़ी। हीना मेरे चूतड़ फैलाए थी। नाखून चुभ रहे थे। करण मोमबत्ती को पेंच की तरह बाएँ दाएँ घुमाते हुए अन्दर ठेल रहा था। मेरी गुदा की पेशियाँ सख्त होकर उसके प्रवेश का विरोध कर रही थीं। वहाँ पर अजीब सी गुदगुदी लग रही थी।
जल्दी ही मोम और वैसलीन के चिकनेपन ने असर दिखाया और नोक अन्दर घुस गई। फिर उसे धीरे धीरे अन्दर बाहर करने लगा।
मुझसे कहा जा रहा था,”रिलैक्सन… रिलैक्सव… टाइट मत करो… ढीला छोड़ो… रिलैक्स … रिलैक्स…..”
मैं रिलैक्स करने, ढीला छोड़ने की कोशिश कर रही थी।
कुछ देर के बाद उन्होंने मोमबत्ती निकाल ली। गुदा में गुदगुदी और सुरसुरी उसके बाद भी बने रहे।
कितना अजीब लग रहा था यह सब ! शर्म नाम की चिड़िया उड़कर बहुत दूर जा चुकी थी।
“अब असली चीज !” उसके पहले करण ने उंगली घुसाकर छेद को खींचकर फैलाने की कोशिश की, “रिलैक्स … रिलैक्स .. रिलैक्स…..”
जब ‘असली चीज’ गड़ी तो मुझे उसके मोटेपन से मैं डर गई। कहाँ मोमबत्ती का नुकीलापन और कहाँ ये भोथरा मुँह। दुखने लगा। करण ने मेरी पीठ को दोनों हाथों से थाम लिया। हीना ने दोनों तरफ मेरे हाथ पकड़ लिए, गुदा के मुँह पर कसकर जोर पड़ा, उन्होंने एक-एक करके मेरे घुटनों को मोड़कर सामने पेट के नीचे घुसा दिया गया। मेरे नितम्ब हवा में उठ गए। मैं आगे से दबी, पीछे से उठी। असुरक्षित। उसने हाथ घुसाकर मेरे पेट को घेरा …
अन्दर ठेलता जबर्दस्तब दबाव…
ओ माँ.ऽऽऽऽऽऽऽ…
पहला प्यार, पहला प्रवेश, पहली पीड़ा, पहली अंतरंगता, पहली नग्नता… क्या-क्या सोचा था। यहाँ कोई चुम्बन नहीं था, न प्यार भरी कोई सहलाहट, न आपस की अंतरंगता जो वस्त्रनहीनता को स्वादिष्ट और शोभनीय बनाती है। सिर्फ रिलैक्स… रिलैक्स .. रिलैक्सप का यंत्रगान…..
मोमबत्ती की अभ्*यस्त* गुदा पर वार अंतत: सफल रहा- लिंग गिरह तक दाखिल हो गया। धीरे धीरे अन्दर सरकने लगा। अब योनि में भी तड़तड़ाहट होने लगी। उसमें ठुँसा केला दर्द करने लगा।
“हाँ हाँ हाँ, लगता है निकल रहा है !” हीना मेरे नितम्बों के अन्दर झाँक रही थी।
“मुँह पर आ गया है… मगर कैसे खींचूं?”
लिंग अन्दर घुसता जा रहा था। धीरे धीरे पूरा घुस गया और लटकते फोते ने केले को ढक दिया।
“बड़ी मुश्किल है।” हीना की आवाज में निराशा थी।
“दम धरो !” करण ने मेरे पेट के नीचे से तकिए निकाले और मेरे ऊपर लम्बा होकर लेट गया। एक हाथ से मुझे बांधकर अन्दर लिंग घुसाए घुसाए वह पलटा और मुझे ऊपर करता हुआ मेरे नीचे आ गया। इस दौरान मेरे घुटने पहले की तरह मुड़े रहे।
मैं उसके पेट के ऊपर पीठ के बल लेटी हो गई और मेरा पेट, मेरा योनिप्रदेश सब ऊपर सामने खुल गए।
हीना उसकी इस योजना से प्रशंसा से भर गई,”यू आर सो क्लैवर !”
उसने मेरे घुटने पकड़ लिए। मैं खिसक नहीं सकती थी। नीचे कील में ठुकी हुई थी।
मेरी योनि और केला उसके सामने परोसे हुए थे। हीना उन पर झुक गई।
‘ओह…’ न चाहते हुए भी मेरी साँस निकल गई। हीना के होठों और जीभ का मुलायम, गीला, गुलगुला… गुदगुदाता स्पर्श। होंठों और उनके बीच केले को चूमना चूसना… वह जीभ के अग्रभाग से उपर के दाने और खुले माँस को कुरेद कुरेदकर जगा रही थी। गुदगुदी लग रही थी और पूरे बदन में सिहरनें दौड़ रही थीं। गुदा में घुसे लिंग की तड़तड़ाहट,योनि में केले का कसाव, ऊपर हीना की जीभ की रगड़… दर्द और उत्तेजना का गाढ़ा घोल…
मेरा एक हाथ हीना के सिर पर चला गया। दूसरा हाथ बिस्तर पर टिका था, संतुलन बनाने के लिए।
करण ने लिंग को किंचित बाहर खींचा और पुन: मेरे अन्दर धक्का दिया। हीना को पुकारा, “अब तुम खींचो…..”
हीना के होंठ मेरी पूरी योनि को अपने घेरे में लेते हुए जमकर बैठ गए। उसने जोर से चूसा। मेरे अन्दर से केला सरका….
एक टुकड़ा उसके दाँतों से कटकर होंठों पर आ गया। पतले लिसलिसे द्रव में लिपटा। हीना ने उसे मुँह के अन्दर खींच लिया और “उमऽऽऽ, कितना स्वादिष्ट है !” करती हुई चबाकर खा गई।
मैं देखती रह गई, कैसी गंदी लड़की है !
मेरी चूत मस्त गरम हो चुकी थी
मेरे सिर के नीचे करण के जोर से हँसने की आवाज आई। उसने उत्साठहित होकर गुदा में दो धक्के और जड़ दिये।
हीना पुन: चूसकर एक स्लाइस निकाली।
करण पुकारा,”मुझे दो।”
पर हीना ने उसे मेरे मुँह में डाल दिया, “लो, तुम चखो।”
वही मुसाई-सी गंध मिली केले की मिठास। बुरा नहीं लगा। अब समझ में आया क्यों लड़के योनि को इतना रस लेकर चाटते चूसते हैं। अब तक मुझे यह सोचकर ही कितना गंदा लगता था पर इस समय वह स्वाभाविक, बल्कि करने लायक लगा। मैं उसे चबाकर निगल गई।
हीना ने मेरा कंधा थपथपाया,”गुड….. स्वादिष्ट है ना?”
वह फिर मुझ पर झुक गई। कम से कम आधा केला अभी अन्दर ही था।
“खट खट खट” …………. दरवाजे पर दस्तक हुई।को इतना रस लेकर चाटते चूसते हैं। अब तक मुझे यह सोचकर ही कितना गंदा लगता था पर इस समय वह स्वाभाविक, बल्कि करने लायक लगा। मैं उसे चबाकर निगल गई।
हीना ने मेरा कंधा थपथपाया,”गुड….. स्वादिष्ट है ना?”
वह फिर मुझ पर झुक गई। कम से कम आधा केला अभी अन्दर ही था।
“खट खट खट” …………. दरवाजे पर दस्तक हुई।
मैं सन्न। वे दोनों भी सन्न। यह क्या हुआ?
“खट खट खट” ….. “करण, दरवाजा खोलो।”
पियूष उसके हॉस्टल से आया था। उसको मालूम था कि करण यहाँ है।
किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। लड़कियों के कमरे में लड़का घुसा हुआ और दरवाजा बंद? क्या कर रहे हैं वे !!
“खट खट खट…. क्या कर रहे हो तुम लोग?”
जल्दी खोलना जरूरी था। हीना बोली, “मैं देखती हूँ।” करण ने रोकना चाहा पर समय नहीं था। हीना ने अपने बिस्तर की बेडशीट खींचकर मेरे उपर डाली और दरवाजे की ओर बढ़ गई। पियूष हीना की मित्र मंडली में काफी करीब था।
किवाड़ खोलते ही “बंद क्यों है?” कहता पियूष अन्दर आ गया। हीना ने उसे दरवाजे पर ही रोककर बात करने की कोशिश की मगर वह “करण बता रहा था पिहू को कुछ परेशानी है?” कहता हुआ भीतर घुस गया।
मुझे गुस्सा आया कि हीना ने किवाड़ खोल क्यों दिया, बंद दरवाजे के पीछे से ही बात करके उसे टालने की कोशिश क्यों नहीं की।
उसकी नजर चादर के अन्दर मेरी बेढब ऊँची-नीची आकृति पर पड़ी।
“यह क्या है?”उसने चादर खींच दी। सब कुछ नंगा, खुल गया….. चादर को पकड़कर रोक भी नहीं पाई। उसकी आँखें फैल गर्इं।
मुझे काटो तो खून नहीं। कोई कुछ नहीं बोला। न हीना, न मेरे नीचे दबा करण, न मैं।
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