मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
06-08-2021, 12:47 PM,
#41
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
पियूष ढिठाई से हँसा, “तो यह परेशानी है पिहू को… इसे तो मैं भी दूर कर सकता था।” वह करण की तरह जेंटलमैन नहीं था।
‘नहीं, यह परेशानी नहीं है !’ हीना ने आगे बढ़कर टोका।
“तो फिर?”
“इसके अन्दर केला फँस गया है। देखते नहीं?”
करण मेरे नीचे दुबका था। मेरे दोनों पाँव सहारे के लिए करण की जांघों के दोनों तरफ बिस्तर पर जमे थे। टांगें समेटते ही गिर जाती। पियूष बिना संकोच के कुछ देर वहाँ पर देखा। फिर उसने नजर उठाकर मुझे, फिर पिहू को देखा। हम दोनों के मुँह पर केला लगा हुआ था। मुझे लग गया कि वह समझ गया है। व्यंग्य भरी हँसी से बोला, “तो केले का भोज चल रहा है!!” उंगली बढ़ाकर उसने मेरे मुँह पर लगे केले को पोछा और मेरी योनि की ओर इशारा करके बोला, “इसमें पककर तो और स्वादिष्ट हो गया होगा?”
हममें से कौन भला क्या कहता?
“मुझे भी खिलाओ।” वह हमारे हवाइयाँ उड़ते चेहरे का मजा ले रहा था।
“नहीं खिलाना चाहते? ठीक है, मैं चला जाता हूँ।”
रक्त शरीर से उठकर मेरे माथे में चला आया। बाहर जाकर यह बात फैला देगा। पता नही मैंने क्या कहा या किया कि हीना ने पियूष को पकड़कर रोक लिया। वह बिस्तर पर चढ़ी, मेरे पैरों को फैलाकर मेरी योनि में मुँह लगाकर चूसकर एक टुकड़ा काट ली। पियूष ने उसे टोका, ‘मुँह में ही रखो, मैं वहीं से खाऊँगा।’ उसने हीना का चेहरा अपनी ओर घुमा लिया।
दोनों के मुँह जुड़ गए।
यह सब क्या हो रहा था? मेरी आंखों के सामने दोनों एक-दूसरे के चेहरे को पकड़कर चूम चूस रहे थे। हीना उसे खिला रही थी, वह खा रहा था।
पियूष मुँह अलग कर बोला, “आहाहा, क्या स्वाद है। दिव्य, सोमरस में डूबा, आहाहा, आहाहा… दो दो जगहों का।” फिर मुँह जोड़ दिया।
दो दो जगहों का? हाँ, मेरी योनि और हीना के मुख का। सोमरस। मेरी योनि की मुसाई गंध के सिवा उसमें हीना के मुँह की ताजी गंध भी होगी। कैसा स्वाद होगा? छि: ! मैंने अपनी बेशर्मी के लिए खुद को डाँटा।
“अब मुझे सीधे प्याले से ही खाने दो।”
हीना हट गई। पियूष उसकी जगह आ गया। मैंने न जाने कौन सेी हिम्मत जुटा ली थी। जब सब कुछ हो ही गया था तो अब लजाने के लिए क्या बाकी रहा था। मैंने उसे अपने मन की करने दिया। अंतिम छोटा-सा ही टुकड़ा अन्दर बचा था। अंतिम कौर।
“मेरे लिए भी रहने देना।” मेरे नीचे से करण ने आवाज लगाई। अब तक उसमें हिम्मत आ गई थी।
“तुम कैसे खाओगे? तुम तो फँसे हुए हो।” पियूष ने कहकहा लगाया, “फँसे नहीं, धँसे हुए…..”
हीना ने बड़े अभिभावक की तरह हस्तक्षेप किया, “पियूष, तुम करण की जगह लो। करण को फ्री करो।”
क्या ????
हैरानी से मेरा मुँह इतना बड़ा खुल गया। हीना यह क्या कर रही है?
पियूष ने झुककर मेरे खुले मुँह पर चुंबन लगाया, “अब शोर मत करो।”
उसने जल्दी से बेल्ट की बकल खोली, पैंट उतारी। चड़ढी सामने बुरी तरह उभरी तनी हुई थी। उभरी जगह पर गीला दाग।
वह मेरे देखने को देखता हुआ मुसकुराया, “अच्छी तरह देख लो।” उसने चड्डी नीचे सरका दी। “यह रहा, कैसा है?”
इस बार डर और आश्चर्य से मेरा मुँह खुला रह गया।
वह बिस्तर पर चढ़ गया और मेरे खुले मुँह के सामने ले आया,”लो, चखो।”
मैंने मुँह घुमाना चाहा पर उसने पकड़ लिया,”मैंने तुम्हारा वाला तो स्वाद लेकर खाया, तुम मेरा चखने से भी डरती हो?”
मेरी स्थिति विकट थी, क्या करूँ, लाचार मैंने हीना की ओर देखा, वह बोली, “चिंता न करो। गो अहेड, अभी सब नहाए धोए हैं।”
मुझे हिचकिचाते देखकर उसने मेरा माथा पकड़ा और उसके लिंग की ओर बढ़ा दिया।
पियूष का लिंग करण की अपेक्षा सख्त और मोटा था। उसके स्वभाव के अनुसार। मुँह में पहले स्पर्श में ही लिसलिसा नमकीन स्वाद भर गया। अधिक मात्रा में रिसा हुआ रस। मुझे वह अजीब तो नहीं लगा, क्योंकि करण के बाद यह स्वाद और गंध अजनबी नहीं रह गए थे लेकिन अपनी असहायता और दुर्गति पर बेहद क्षोभ हो रहा था। मोटा लिंग मुँह में भर गया था। पियूष उसे ढिठाई से मेरे गले के अन्दर ठेल रहा था। मुझे बार बार उबकाई आती। दम घुटने लगता। पर कमजोर नहीं दिखने की कोशिश में किए जा रही थी। हीना प्यार से मेरे माथे पर हाथ फेर रही थी लेकिन साथ-साथ मेरी विवशता का आनन्द भी ले रही थी। जब जब पियूष अन्दर ठेलता वह मेरे सिर को पीछे से रोककर सहारा देती। दोनों के चेहरे पर खुशी थी। हीना हँस रही थी। मैं समझ रही थी उसने मुझे फँसाया है।
अंतत: पियूष ने दया की। बाहर निकाला। आसन बदले जाने लगे। मुझे जिस तरह से तीनों किसी गुड़िया की तरह उठा उठाकर सेट करने लगे उससे मुझे बुरा लगा। मैंने विरोध करते हुए पियूष को गुदा के अन्दर लेने से मना कर दिया,”मार ही डालोगे क्या?”
मुझे करण की ही वजह से अन्दर काफी दुख रहा था। पियूष के से तो फट ही जाती। और मैं उस ढीठ को अन्दर लेकर पुरस्कृत भी नहीं करना चाहती थी।
केला इतनी देर में अन्दर ढीला भी हो गया था। जितना बचा था वह आसानी से करण के मुँह में खिंच गया। वह स्वाद लेकर केले को खा रहा था। उसके चेहरे पर बच्चे की सी प्रसन्नता थी।
उसने हीना की तरह मुझे फँसाया नहीं था, न ही पियूष की तरह ढीठ बनकर मुझे भोगने की कोशिश की थी। उसने तो बल्कि आफर भी किया था कि मैं नहीं चाहती हूँ तो वह चला जाएगा। पहली बार वह मुझे तीनों में भला लगा। योनि खाली हुई लेकिन सिर्फ थोड़ी देर के लिए। उसकी अगली परीक्षाएँ बाकी थीं। करण को दिया वादा दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था,‘जो इज्जत केले को मिली है वह मुझे भी मिले।’
समस्या की सिर्फ जड़ खत्म हुई थी, डालियाँ-पत्ते नहीं।
काश, यह सब सिर्फ एक दु:स्वप्न निकले। मां संतोषी !
लेकिन दु:स्वप्न किसी न समाप्त होने वाली हॉरर फिल्म की तरह चलता जा रहा था। मैं उसकी दर्शक नहीं, किरदार बनी सब कुछ भुगत रही थी। मेरी उत्तेजना की खुराक बढ़ाई जा रही थी। करण मेरी केले से खाली हुई योनि को पागल-सा चूम, चाट, चूस रहा था। उसकी दरार में जीभ घुसा-घुसाकर ढूँढ रहा था। गुदगुदी, सनसनाहट की सीटी कानों में फिर बजनी शुरू हो गई। होश कमजोर होने लगे।
क्या, क्यों, कैसे हो रहा है….. पता नहीं। नशे में मुंदती आँखों से मैंने देखा कि मेरी बाईं तरफ पियूष, दार्इं तरफ हीना लम्बे होकर लेट रहे हैं।
उन्होंने मेरे दोनों हाथों को अपने शरीरों के नीचे दबा लिया है और मेरे पैरों को अपने पैरों के अन्दर समेट लिया है। मेरे माथे के नीचे तकिया ठीक से सेट किया जा रहा है और ….. स्तनों पर उनके हाथों का खेल। वे उन्हें सहला, दबा, मसल रहे हैं, उन्हें अलग अलग आकृतियों में मिट्टी की तरह गूंध रहे हैं। चूचुकों को चुटकियों में पकड़कर मसल रहे हैं, उनकी नोकों में उंगलियाँ गड़ा रहे हैं।
दर्द होता है, नहीं दर्द नहीं, उससे ठीक पहले का सुख, नहीं सुख नहीं, दर्द। दर्द और सुख दोनों ही।
वे चूचुकों को ऐसे खींच रहे हैं मानों स्तनों से उखाड़ लेंगे। खिंचाव से दोनों स्तन उल्टे शंकु के आकार में तन जाते हैं। नीचे मेरी योनि शर्म से आँखें भींचे है। करण उसकी पलकों पर प्यार से ऊपर से नीचे जीभ से काजल लगा रहा है। उसकी पलकों को खोलकर अन्दर से रिसते आँसुओं को चूस चाट रहा है। पता नहीं उसे उसमें कौन-सा अद़भुत स्वाद मिल रहा है। मैं टांगें बंद करना चाहती हूँ लेकिन वे दोनों तरफ से दबी हैं।
विवश, असहाय। कोई रास्ता नहीं। इसलिए कोई दुविधा भी नहीं।
जो कुछ आ रहा है उसका सीधा सीधा बिना किसी बाधा के भोग कर रही हूँ। लाचार समर्पण। और मुझे एहसास होता है- इस निपट लाचारी, बेइज्जंती, नंगेपन, उत्तेजना, जबरदस्ती भोग के भीतर एक गाढ़ा स्वाद है, जिसको पाकर ही समझ में आता है।
शर्म और उत्तेजना के गहरे समुद्र में उतरकर ही देख पा रही हूँ आनन्दानुभव के चमकते मोती। चारों तरफ से आनन्द का दबाव। चूचुकों, योनि, भगनासा, गुदा का मुख, स्तनों का पूरा उभार, बगलें… सब तरफ से बाढ़ की लहरों पर लहरों की तरह उत्तेकजना का शोर।
पूरी देह ही मछली की तरह बिछल रही है। मैं आह आह कर कर रही हूँ वे उन आहों में मेरी छोड़ी जा रही सुगंधित साँस को अपनी साँस में खीच रहे हैं। मेरे खुलते बंद होते मुँह को चूम रहे हैं।
पियूष, हीना, करण…. चेहरे आँखों के सामने गड्डमड हो रहे हैं, वे चूस रहे हैं, चूम रहे हैं, सहला रहे हैं,… नाभि, पेट,, नितंब, कमर, बांहें, गाल, सभी… एक साथ..। प्यार? वह तो कोई दूसरी चीज है- दो व्यक्तियों का बंधन, प्रतिबद्धता। यह तो शुद्ध सुख है, स्वतंत्र, चरम, अपने आप में पूरा। कोई खोने का डर नहीं, कोई पाने का लालच नहीं। शुद्ध शारीरिक, प्राकृतिक, ईश्वर के रचे शरीर का सबसे सुंदर उपहार।
ह: ह: ह: तीनों की हँसी गूंजती है। वे आनन्दमग्न हैं। मेरा पेट पर्दे की तरह ऊपर नीचे हो रहा है, कंठ से मेरी ही अनपहचानी आवाजें निकल रही हैं।
मैं आँखें खोलती हूँ, सीधी योनि पर नजर पड़ती है और उठकर करण के चेहरे पर चली जाती है, जो उसे दीवाने सा सहला, पुचकार रहा है। उससे नजर मिलती है और झुक जाती है। आश्चर्य है इस अवस्था में भी मुझे शर्म आती है।
वह झुककर मेरी पलकों को चूमता है। हीना हँसती है। पियूष, वह बेशर्म, कठोर मेरी बाईं चुचूक में दाँत काट लेता है। दर्द से भरकर मैं उठना चाहती हूँ। पर उनके भार से दबी हूँ। हीना मेरे होंठ चूस रही है।
करण कह रहा है,”अब मैं वह इज्जत लेने जा रहा हूँ जो तुमने केले को दी।”
मैं उसके चेहरे को देखती हूँ, एक अबोध की तरह, जैसे वह क्या करने वाला है मुझे नहीं मालूम।
हीना मुझे चिकोटी काटती है,”डार्लिंग, तैयार हो जाओ, इज्जत देने के लिए। तुम्हारा पहला अनुभव। प्रथम संभोग, हर लड़की का संजोया सपना।”
करण अपना लिंग मेरी योनि पर लगाता है, होंठों के बीच धँसाकर ऊपर नीचे रगड़ता है।
हीना अधीर है,”अब और कितनी तैयारी करोगे? लाओ मुझे दो।”
उठकर करण के लिंग को खींचकर अपने मुँह में ले लेती है।
मैं ऐसी जगह पहुँच गई हूँ जहाँ उसे यह करते देखकर गुस्सा भी नही आ रहा।
हीना कुछ देर तक लिंग को चूसकर पूछती है,”अब तैयार हो ना? करो !”
पियूष बेसब्र होकर होकर करण को कहता है,”तुम हटो, मैं करके दिखाता हूँ।”
मैं अपनी बाँह से पकड़कर उसे रोकती हूँ। वह मुझे थोड़ा आश्चर्य से देखता है।
हीना झुककर मेरे योनि के होंठों को खोलती है। पियूष मेरा बायाँ पैर अपनी तरफ खींचकर दबा देता है, ताकि विरोध न कर सकूँ।
मैं विरोध करूंगी भी नहीं, अब विरोध में क्या रखा है, मैं अब परिणाम चाहती हूँ।
करण छेद के मुँह पर लिंग टिकाता है, दबाव देता है। मैं साँस रोक लेती हूँ, मेरी नजर उसी बिन्दु पर टिकी है। केले से दुगुना मोटा और लम्बा।
छेद के मुँह पर पहली खिंचाव से दर्द होता है, मैं उसे महत्व नहीं देती।
करण फिर से ठेलता है, थोड़ा और दर्द। वह समझ जाता है मुझे तोड़ने में श्रम करना होगा।
हीना को अंदाजा हो रहा है, वह उसका चेहरा देख रही है। वह उसे हमेशा पियूष की अपेक्षा अधिक तरजीह देती है। मुझे यह बात अच्छी लगती है। पियूष जबर्दस्ती घुस आया है।
हीना पूछती है,”वैसलीन लाऊँ?” पर इसकी जरूरत नहीं, चूमने चाटने से पहले से ही काफी गीली है।
करण बोलता है,”इसको ठीक से पकड़ो।”
दोनों मुझे कसकर पकड़ लेते हैं। करण, एक भद्रपुरुष अब एक जानवर की तरह जोर लगाता है, मेरे अन्दर लकड़ी-सी घुसती है, चीख निकल जाती है मेरी।
मैं हटाने के लिए जोर लगाती हूँ, पर बेबस।
करण बाहर निकालता है, लेकिन थोड़ा ही। लिंग का लाल डरावना माथा अन्दर ही है। मेरा पेट जोर जोर से ऊपर नीचे हो रहा है।
मेरी सिसकियाँ सुनकर हीना दिलासा दे रही है,”बस पहली बार ही…… ”
पियूष- असभ्य जानवर क्रूर खुशी से हँस रहा है, कहता है,”बस, अबकी बार इसे फाड़ दे।”
हीना उसे डाँटती है।
ललकार सुनकर करण की आँखों में खून उतर आया है।
मुझे मर्दों से डर लगता है, कितने भी सभ्य हों, कब वहशी बन जाएँ, ठिकाना नहीं।
हीना करण को टोकती है,”धीरे से !”
मगर करण के मुँह से ‘हुम्म’ की-सी आवाज निकलती है और एक भीषण वार होता है।
मेरी आँखों के आगे तारे नाच जाते हैं, पियूष और हीना मुँह बंद कर मेरी चीख दबा देते हैं।
कुछ देर के लिए चेतना लुप्त हो जाती है…
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06-08-2021, 12:47 PM,
#42
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
मेरी आँखें खुलती हैं, नजर सीधी वहीं पर जाती है। करण का पेडू मेरे पेडू से मिला हुआ है। लिंग अदृश्य है। मेरे ताजे मुंडे हुए पेडू में उसके पेड़ू के छोटे छोटे बालों की खूंटियाँ गड़ रही हैं।
सब मेरा चेहरा देख रहे हैं। हीना से नजर मिलने पर वह मुसकुराती है। करण धीरे धीरे लिंग निकालता है। लिंग का माथा लाल खून में चमक रहा है। मुझे खून देखकर डर लगता है। आँसू निकल जाते हैं, यह मेरा क्या कर डाला।
लेकिन हीना प्रफुल्लित है, वह ‘बधाई हो’ कहकर मेरा गाल थपथपाती है।
पियूष ताली बजाता है,”क्या बात है यार, एकदम फाड़ डाला !”
करण मानों सिर झुकाकर प्रशंसा स्वीकार करता है।
सभी मुस्कुरा रहे हैं, मैं सिर घुमा लेती हूँ।
पियूष बढ़ता है और मेरी योनि से रिस रहे रक्त को उंगली पर उठाता है और उसे चाट जाता है,”आइ लाइक ब्ल्ड” (मुझे खून पसंद है।)
हीना उसे देखती रह जाती है, कैसा आदमी है !
पियूष उत्साह में है,”तगड़ा माल तोड़ा है तूने याऽऽऽऽर…… ”
बार-बार बहते खून को देख रहा है।
करण आवेश में है, खून और पियूष की उकसाहटें उसे भी जानवर बना देती हैं। वह फिर से लिंग को मेरी योनि पर लगाता है और एक ही धक्के में पूरा अन्दर भेज देता है। मैं विरोध नहीं करती, हालाँकि अब मेरे हाथ पैर छोड़ दिए गए हैं, पर अब बचाने को क्या बचा है?
हीना भी उत्साहित है,”अब मालूम हो रहा होगा इसको असली सेक्स का स्वाद। इतने दिन से मेरे सामने सती माता बनी हुई थी। आज इसका घमण्ड टूटा। जब से इसे देखा था तभी से मैं इस क्षण का इंतजार कर रही थी।”
पियूष भी साथ देता है।
रक्त और चिकने रसों की फिसलन से ही लिंग बार बार घुस जा रहा है, नहीं तो रास्ता बहुत तंग है और इतना खिंचाव होता है कि दर्द करता है। केले से दुगुना लम्बा और मोटा होगा। मैं सह रही हूँ। योनि को ढीला छोड़ने की कोशिश कर रही हूँ ताकि दर्द कम हो।
करण मेरे ऊपर लेट गया है और मुझमें हाथ घुसाकर लपेट लिया है, मुझे चूम रहा है, कोंच रहा है कि उसके चुम्बनों का जवाब दूँ।
मेरी इच्छा नहीं है लेकिन….।
वह जितना हो सकता है मुझमें धँसे हुए ही ऊपर-नीचे कर रहा है। मुझे छूटने, साँस लेने, योनि को राहत देने का मौका ही नहीं मिलता।
इससे अच्छा तो है यह जल्दी खत्म हो।
मैं उसके चुम्बनों का जवाब देती हूँ।
मेरी जांघों पर उसकी जांघें सरक रही हैं, मेरे हाथ उसकी पीठ के पसीने पर फिसल रहे हैं। मेरी गुदा के अगल बगल नितम्बों पर जांघें टकरा रही हैं- थप थप थप थप।
रह-रहकर गुदा के मुँह पर फोते की गोली चोट कर जाती है। उससे गुदा में मीठी गुदगुदी होती है। पियूष और हीना मेरे स्तन चूस रहे हैं, मेरे पेट को, नितम्बों को सहला रहे हैं।
अचानक गति बढ़ जाती है, शायद करण कगार पर है, जोर जोर की चोट पड़ने लगी है, योनि में चल रहा घर्षण मुझे कुछ सोचने ही नहीं दे रहा, हाँफ रही हूँ, हर तरफ चोट, हर तरफ से वार।
दिमाग में बिजलियाँ चमक रही हैं।
“अब मेरा झड़ने वाला है।”
“देखो, यह भी पीक पर आ गई है।”
“अन्दर ही कर रहा हूँ।”
“तुम केला निकालने आए हो या इसे प्रेग्नेंट करने?”
“याऽऽर… अन्दर ही कर दे। मजा आएगा।”
पियूष उसे निकालने से रोक रहा है। “साली की मासिक रुक गई तब तो और मजा आ जाएगा।”
“आह, आह, आह” मेरे अन्दर झटके पड़ रहे हैं।
“गुड, गुड, गुड, हीना, तुम इसकी क्लिेटोरिस सहलाओ। इसको भी साथ फॉल कराओ।”
एक हाथ मेरे अन्दर रेंग जाता है। करण मुझ पर लम्बा हो गया है। मुझे कसकर जकड़ लेता है। जैसे हड़डी तोड़ देगा। भगनासा बुरी तरह कुचल रही है। ओऽऽऽह… ओऽऽऽह… ओऽऽऽह…..
गुदा के अन्दर कोई चीज झटके से दाखिल हो जाती है।
मैं खत्म हूँ ………
मैं खत्म हूँ ………
मैं खत्म हूँ ………
जिंदगी वापस लौटती है। हीना सीधे मेरी आँखों में देख रही है, चेहरे पर विजयभरी मुस्कान, बड़ी ममता से मेरी ललाट का पसीना पोछती है, होंठों के एक किनारे से मेरी निकल आई लार को जीभ पर उठा लेती है। लगता है वह सचमुच वह मुझे प्यार करती है? बहुत तकलीफ होती है मुझे इस बात से।
वह रुमाल से मेरी योनि, मेरी गुदा पोंछ रही है। मेरा सारा लाज-शर्म लुट चुका है। फिर भी पाँव समेटना चाहती हूँ। हीना रुमाल उठाकर दिखाती है। उसमें खून और वीर्य के भीगे धब्बे हैं।
वह उसे करण को दे देती है,”तुम्हारी यादगार।”
मैं उठने का उपक्रम करती हूँ, पियूष मुझे रोकता है,”रुको, अभी मेरी बारी है।”
“तुम्हारी बारी क्यों?” हीना आपत्ति करती है।
“क्यों? मैं इसे नहीं लूँगा?”
“तुमने क्या इसे वेश्या समझ रखा है?” हीना की आवाज अप्रत्याशित रूप से तेज हो जाती है।
‘क्यों ? फिर करण ने कैसे लिया?”
“उसने तो उसे समस्या से निकाला। तुमने क्या किया?”
पियूष नहीं मानता। “नहीं मैं करूँगा।”
करण कपड़े पहन रहा है। उसका हमदर्दी दोस्त के प्रति है। कमीज के बटन लगाते हुए कहता है,”करने दो ना इसे भी।”
हीना गुस्से में आ जाती है, “तुम लोग लड़की को क्या समझते हो? खिलौना?” हीना मुझे बिस्तर से खींचकर खड़ी कर देती है,”तुम कपड़े पहनो।”
फिर वह उन दोनों की ओर पलट कर बोलती है,”लगता है तुम लोगों ने मेरे व्यवहार का गलत मतलब निकाला है। सुनो पियूष, जितना तुम्हें मिल गया वही तुम्हारा बहुत बड़ा भाग्य है। अब यहीं से लौट जाओ। तुम मेरे दोस्त हो। मैं नहीं चाहती मुझे तुम्हा*रे खिलाफ कुछ करना पड़े।
पियूष कहता है,”यह तो अन्याय है। एक दोस्त* को फेवर करती हो एक को नहीं।”
हीना,”तुम मुझे न्याय सिखा रहे हो? जबरदस्ती घुस आए और …..”
पियूष,”करण को तो बुलाकर दिलवाया, मैं खुद आया तब भी नहीं? यह क्या तुम्हारा यार लगता है?”
हीना की तेज आवाज गूंजी,”तुम मुझे गाली दे रहे हो?”
करण को भी उसके ताने से से क्रोध आ जाता है,”पियूष, छोड़ो इसे।”
“चुप रह बे ! तू क्या हीना का भड़ुआ है? एक लड़की चुदवा दी तो बड़ा पक्ष लेने लगा।”
पानी सिर से ऊपर गुजर जाता है। दोनों की एक साथ ‘खबरदार’ गूंज जाती है, मारने के लिए दौड़े करण को हीना रोकती है।
पियूष पर उसकी उंगली तन जाती है,”खबरदार एक लफ्ज भी आगे बोले, चुपचाप यहाँ से निकल जाओ। मत भूलो कि लड़कियों के हॉस्टल में एक लड़की के कमरे में खड़े हो। यहीं खड़े खड़े अरेस्ट हो जाओगे।”
मैं जल्दी-जल्दी कपड़े पहन रही हूँ।
कमरे की चिल्लाहटें बाहर चली जाती हैं, दस्तक होने लगती है,”क्या़ बात है हीना, दरवाजा खोलो !”
अब मामला पियूष के हाथ से निकल चुका है, वह कुंठा में अपने मुक्के में मुक्का मारता है।
मैं सुरक्षित हूँ। मेरा खून चखने वाले उसे राक्षस को एक लात जमाने की इच्छा होती है !
दुर्घटना से उबर चुकी हूँ। लेकिन स्थाई जख्म के साथ।
हीना निर्देश देती है,”कोई कुछ नहीं बोलेगा। सब कोई एकदम सामान्य सा व्य़वहार करेंगे।”
हीना दरवाजा खोलकर साथियों से बात कर रही है,’हाय अल्का, हाय प्रीति…. कुछ नहीं, हम लोग ऐसे ही सेलीब्रेट कर रहे थे। एक खास बाजी जीतने की।”
मेरा कलेजा मुँह को आ जाता है, कहीं बता न दे। पर हीना को गेंद गोल तक ले जाने फिर वहाँ से वापस लौटा लाने में मजा आता है। ऐसे सामान्य ढंग से बात कर रही है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। बड़ी अभिनय-कुशल है।
उस दिन हीना ने अपने करीबी दोस्त* पियूष को खो दिया- मेरी खातिर। उस वहशी से मेरी रक्षा की। एक से बाद एक अपमान के दौर में एक जगह मेरे छोटे से सम्मान को बचाया।उसने मुझे केले के गहरे संकट से निकाला। कितना बड़ा एहसान किया उसने मुझपर !
लेकिन किस कीमत पर? मेरे मन और आत्मा में जो घाव लगा, मैं किसी तरह मान नहीं पाती कि उसके लिए हीना जिम्मेदार नहीं थी। बल्कि उसी ने मेरी दुर्दशा कराई। उसी के उकसावे पर मैंने केले को आजमाया था। मेरी उस छोटी सी गलती को हीना ने पतन की हर इंतिहा से आगे पहुँचा दिया।
फिर भी पहला दोष तो मेरा ही था। मैंने हीना से दोस्ती तोड़ देनी चाही- बेहद अप्रत्यक्ष तरीके से, ताकि अहसान फरामोश नहीं दिखूँ।
——-समाप्त——
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06-08-2021, 12:47 PM,
#43
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
Bhai bahan ki chudai--चोद दिया बड़ी बहन को

मेरा नाम तपन घोष है! मैं आसनसोल का रहने वाला हूँ ! आज मैं आपको ऐसी कथा बताने जा रहा हूँ जो सुनकर सब कहेंगे तपन बना बहन चोद !

मैं अपनी माँ का एकलौता बेटा हूँ! मेरी एक बड़ी बहन है छाया ! मुझसे उम्र में चार साल बड़ी है!
जब मैं अपने यौवन का स्वाद चख ही रहा था तब मुझे पता चला कि मैं हरामी हूँ .. उनकी अपनी संतान नहीं हूँ ! मेरे फ्लैट-सोसाईटी वाले मुझे छेड़ते थे इस बात को लेकर ! पापा मम्मी अलग कमरे में सोते थे और मैं और दीदी बाजू वाले कमरे में सोते थे।

वो मेरा बहुत ध्यान रखती थी ! मैं नया नया मुठ मरना शुरू किया था ! स्कूल के दोस्त कहते थे अगर किसी लड़की मुठ से मरवाई जाए तो क्या कहना . मैं सोचता था कि छाया मेरी अपनी बहन तो है नहीं ! क्यूँ न इस पर ही कोशिश करूँ?

एक रात वह बिलकुल मदहोश होकर सो रही थी! मैं अपना लंड उसके मुलायम हाथ में रखा ! आह अहह कितनी नर्म हैं दीदी की उंगलियाँ ! मज़ा आ गया ! फिर मैंने उसकी हथेली में अपना वीर्य निकाल दिया!

सुबह मैंने देखा वो अपने हाथ धो रही थी …

दीदी क्या हुआ ??

अरे देखो ना क्या लग गया है सोते सोते ! साबुन जैसा चिकना है !!

दीदी कैसी खुशबू है उसकी ?

उसने सूंघा, अहह पता नहीं अजीब सी है !

बेचारी अब तक कुँवारी चूत लेकर फिर रही है … मैं तो बेकार में ही सुनीश के साथ शक करता था ?

सुनीश की पास में परचून की दुकान थी।

एक दिन मैं स्कूल से जल्दी आ गया, घर का दरवाज़ा खुला था ..
मैंने अन्दर जाकर देखा कि सुनीश दीदी को चोद रहा था।

दीदी की गोरी-गोरी टाँगें फैली हुई थी और सुनीश की काली काली गांड हवा में उछल उछल के घस्से मार रही थी।

दीदी की गोरी गांड देख कर जैसे मेरा खड़ा हुआ कि सुनीश मुझे देख वहाँ से रफूचक्कर हो गया …

तपन ! मम्मी को मत बताना ! मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती हूँ !!

मैं ज़रूर बताऊंगा दीदी … मैं नाराज़ होकर बोला।

ठीक है ! बता देना ! फिर पापा को मैं भी तुम्हारे बारे बता दूंगी कि तुम रात में मेरे हाथ में मुठ मारते हो। हरामी कहीं के…

मैं चुप हो गया … रात आई .. मुझे नींद नहीं आ रही थी …

मैंने दीदी को पकड़ लिया।

अहह ! तपन यह क्या कर रहे हो ?

अपनी टांगें मैं उसकी नायटी में फेरने लगा …

नायटी में हाथ डाल कर उसकी पैंटी को छुआ !

आह्ह ! नहीं ! मैं तुम्हारी दीदी हूँ !

कैसी दीदी? मैं तो हरामी हू ना ?

कहकर मैंने उसकी पैंटी खोल दी … उसकी जांघें ! मानो जन्नत ..

आओ ना ! जो कसर सुनीश ने छोड़ी है, मैं पूरा किये देता हूँ !

ओह! आ जा मेरे राजा ! चढ़ जा !

उसने अपने नायटी हटाई, मैं उसके मम्मों को चूसने लगा।

दूध नहीं निकलता क्या ? मैं निचोड़ते हुए बोला।

हट पागल ..

उसने मेरे लौड़े को अपने चूत में घुसाया !

अहह ! मज़ा आ गया छाया दी !

अहह अह !

मैं स्खलित हो गया।

बस बच्चे ! दो चार ही बार में ही?

सुनीश तो पचास बार कम से कम करता है ! चलो मैं तुम्हें सिखाती हूँ !

उसने मेरे लण्ड को चूसा, जब खड़ा हो गया तो उसने अपने प्रवेश द्वार पर डाला। मैंने धक्के मारने शुरू किये ..

बस छाया दी निकल जायेगा ..

उसने पूछा- बता 5 गुने 5 ?

मैं सोचने लगा और मैं इस बार स्खलित नहीं हुआ ..

वाह दीदी ! क्या आईडिया है ..

मैंने इस तरह बहुत बार उस रात छाया दी को चोदा।

मैंने मुठ उसके होंठो पर मारी …

ओह तपन कितना शरारती हो ?

मैंने उसे अपने माल से नहला दिया।

अगले दिन छुट्टी थी ..

हम दोनों साथ में नहाए..
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06-08-2021, 12:47 PM,
#44
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
Hindi xxx stori--रात भर मैं चुदवाते रही

दोस्तों मेरा नाम आँचल है, मेरे माँ बाप मुझे अच्छी तरह से परवरिश की, पढ़ाया लिखाया, और फिर जो उनका अरमान था की मेरी शादी किसी अच्छे घर में हो और मेरा पति राजकुमार की तरह हो, मुझे कभी भी ज़िंदगी में किसी चीज की कमी नहीं हो, और फिर मेरी शादी जयपुर के एक प्रतिष्ठित परिवार में मेरी शादी करवा दी.
मेरी शादी को हुए अभी तीन साल हुए है, अभी मेरी उम्र २४ साल है, मैं देखने में काफी सुन्दर हु, जवानी भरपूर चढ़ी है, बदन गदराया हुआ है, ब्लाउज में चूचियाँ समाते नहीं समती, ब्रा का हालात भी ख़राब हो जाता है, क्यों की आज मैं बहुत खुश हु, और ससुराल बाले भी बहुत खुश है, मैं आपको अपनी ये कहानी आपके सामने पेश करुँगी. पहले तो मुझे लग रहा था की ये बात किसी और को बताऊँ की नहीं लोग क्या कहेंगे, कई तो ये सोचेंगे की क्या ये सही हो सकता है की कोई बहन अपने भाई से ही प्रेग्नेंट हो और खुश हो, पर हां ये मेरे साथ है, मैं खुश हु, और इसमें सिर्फ मैं अकेली नहीं हु, कई और भी है जो इस तरह का रिश्ता रखे हुए है और खुश है,
मेरी शादी बड़ी ही धूम धाम से हुई, और शादी के चार से पांच दिन बाद ही मेरे पति को दौरा पड़ा, और वो पागल की तरह करने लगे थे, उसके बाद से हम दोनों के बिच में सेक्स सम्बन्ध नहीं बना क्यों की वो सोते तो मेरे साथ थे पर उनका लण्ड खड़ा नहीं होता था मैं कितना भी हिलाती डुलाती मुंह में लेती पर कुछ भी इसका प्रभाव नहीं पड़ता था, मैं काफी परेशां हो गई थी, क्यों की मुझे सेक्स चाहिए था, उनका बदन तो काफी गठीला था देखने में काफी अच्छे थे, मैं रात को पूरा उनको नंगा कर देती थी और मैं भी पूरी नंगी होके उनके ऊपर लेटती थी और कभी उनको ऊपर करती थी पर कोई फायदा नहीं होता था, उलटे मेरा दिमाग ख़राब हो जाता था, क्यों की मेरी चूचियाँ तन जाती थी, मेरे चूत से पानी निकलने लगता था, चूत मेरी गरम हो जाती थी, चूचियों का निप्पल टाइट हो जाता था, आँखे नशीली हो जाती थी पर मैं प्यासी की प्यासी रह जाती थी.
कई महीनो तक इलाज चला, पर वो ठीक नहीं हुए, घर में वो अकेला संतान थे, एक दिन मेरी सास बोली की बहू रात को सोने में तो कोई दिक्कत नहीं है. मैंने कहा क्या माँ जी समझी नहीं तो वो फिर बोली की मैं ये पूछ रही हु तो तुम दोनों में प्यार मुहब्बत है की नहीं, मैं समझ गई, की पागलपन के दौरे के बाद वो मुझे चोद पा रहे है की नहीं, मैंने कह दिया हां, इसमें कोई दिक्कत नहीं है, तो सासु माँ बोली भगवान् का शुकर है की इस हवेली के एक चिराग मिल जायेगा, फिर सासु माँ कहने लगी, देख बेटी, तुम जल्दी से एक बच्चा कर लो, क्यों की इस घर को एक वारिश की जरूरत है नहीं तो सब कुछ खत्म हो जाएगा, मैं हैरान हो गई, मैंने सोचा इतना बड़ा रिश्ता, सब ठाठ बाट की ज़िंदगी, मुझे कुछ चाल चलना पड़ेगा ताकि मैं इस हवेली की बहूरानी ज़िंदगी भर बनी रहु, मैं दो तीन दिन तक प्लान सोचते रही, तभी मेरा भाई जो की बंगलुरु में रहता है आया, मेरे पति को देखने की अब तबियत में सुधार है की नहीं,
अपने भाई को देखकर मैं रोने लगी, उसने मुझे सांत्वना देते हुए कहा, बहन रोती क्यों है, हु ना मैं मैं इनको बड़ा से बड़ा डॉक्टर को दिखाऊंगा, ये ठीक हो जायेंगे, फिर पुरे दिन हम दोनों बातचीत करते रहे, उस दिन मेरे पति को चेकअप के लिए सासु माँ और ससुर दोनों जयपुर ले गए थे, घर में हम दोनों ही थे, शाम को मेरे ससुर जी का फ़ोन आया की हमलोग कल आएंगे. रात को कहना खाकर हम दोनों खुले छत पर घूम रहे थे और बात कर रहे थे तभी फिर से मेरी आँख छलक गई, और भाई ने मुझे गले लगा लिया, पता नहीं दोस्तों मुझे एक रूहानी एहसास हुआ और मैं अपने भाई के सीने से चिपक गई, वो मुझे अपनी बाहों में समेटे खड़ा था, और मैं उस पल का आनंद ले रही थी, तभी मैंने महसूस किया की भाई का लण्ड खड़ा हो रहा था और मेरे जांघों से सट रहा था, मेरी चूचियाँ उसके सीने से चीपकी हुई थी, फिर वो मेरे पीठ को सहलाने लगा, मैंने भी उसके पीठ को सहलाने लगी, और फिर मेरी साँसे जोर जोर से चलने लगी, और उसकी भी गरम गरम साँसे मेरे कानो के पास से गुजर रहा था, अचानक मैं थोड़ा अलग हो गई.
और दोनों निचे आ गए, थोड़े देर तक हम दोनों सोफे पे चुपचाप बैठे रहे और फिर मेरा भाई बोला क्या जीजा जी ठीक होंगे की नहीं, मैंने कहा कुछ भी नहीं पता और ऊपर से सास को पोता चाहिए, मैं कभी भी उनको पोता नहीं दे पाऊँगी, तो भाई बोला ये क्या बोल रही है, मैंने कहा हां, वो अब कुछ भी नहीं कर पा रहे है, पर ये बात मैंने अपने सास से झूठ बोला, जब वो मुझसे पूछी की सब ठीक ठाक है, तो मैंने कह दिया हां ठीक है और वो खुश हो गई, और बोली की चलो मेरे घर का चिराग आ जायेगा पर ये संभव नहीं है क्यों की मैं अकेले कैसे बच्चा दे सकती हु.
मैंने कहा काश एक बच्चा हो जाता तो मैं यहाँ की रानी बन कर राज करती क्यों की और भी कोई वारिश नहीं है इस हवेली का. और फिर दोनों चुप हो गए, तो भाई ने कहा देख बहन एक बात है, तुम्हारे सास को पोता चाहिए, तुम्हारा पति दे नहीं सकता, तुम्हे भी बेटा चाहिए, अगर तुम मेरे से हेल्प चाहती हो तो तुम्हारी ज़िंदगी बन जाएगी और ये बात किसी को पता भी नहीं चलेगा यहाँ तक की तुम्हारे हस्बैंड को भी नहीं क्यों की वो पागल है. मैं तो अपने भाई का मुंह देखने लगी, पर बात में जान था, करीब पांच मिनट तक चुप रही वो नजदीक आके बैठ गया और मेरी बालों को सहलाने लगा और फिर मेरे से गले लगा लिया और फिर कब एक दूसरे के बाहों में खो गए पता ही नहीं चला, फिर मेरा भाई मुझे गोद में उठकर बैडरूम में गया और बेड पे पटक दिया.
उसको बाद उसने मेरे ब्लाउज को उतार दिया और मेरे चूचियों को पिने लगा और दबाने लगा, मेरी चूचियाँ तन गई और निप्पल कड़ा हो गया, वो जोर जोर से मेरी चूचियों को खींचने लगा, और मेरे होठो को चूसने लगा, मैंने भी उसके होठों को चूसने लगी और उसके छाती के बालों को सहलाने लगी.
उसके बाद मेरा भाई मेरे सारे कपडे उतार दिए, और मेरी चूत की झांटो को सहलाने लगा, और फिर मेरे चूत में ऊँगली डालने लगा, मैं तो गरम हो गई थी, अब मुझे लण्ड चाहिए था क्यों की काफी दिन से लण्ड की भूखी थी, मैंने अपने भाई के लण्ड को मुंह में लिए और चूसने लगी, फिर दोनों 69 की पोजीशन में आ गए वो मेरे चूत को और मैं उसके लण्ड को चूसने लगी. और फिर वो बक्त आ गया जब मेरा भाई अपना मोटा लण्ड निकाल और मेरे चूत पे रख के जोर से धक्का मार और पूरा लण्ड मेरे चूत में घुसेड़ दिया, मैं आह आह करने लगी और फिर लगा वो जोर जोर से चोदने, वो मुझे गाली दे रहा था और मुझे वो गाली बहुत अच्छा लग रहा था मुझे जोश आ रहा था, फिर उसने मेरे चूत में सारा माल झाड़ दिया, और फिर से चूची को पिने लगा, करीब आधे घंटे बाद उसका लण्ड फिर से कड़ा हो गया और वो फिर से मुझे घोड़ी बना कर चोदने लगा,

रात भर मैं चुदवाते रही और वो मुझे चोदते रहा, मेरा भाई करीब दस दिन तक रहा था और मुझे खूब चोदा, मुझे तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा था जब मुझे माहवारी नहीं आई थी, डॉक्टर के पास गई तो डॉक्टर ने कन्फर्म कर दिया की मैं माँ बन्ने बाली हु, मैंने ये बात अपनी सास को बताई की मैं माँ बन्ने बाली हु वो बहुत खुश हुई, पर उनको ये पता नहीं है की ये बच्चा मेरे भाई का है, उनका बेटा तो मुझे चोद भी नहीं सकता,
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06-08-2021, 12:48 PM,
#45
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
Newhindisexstory- माँ की भी मर्जी

ये कहानी है एक 18 वर्षीय कालिया की जिसने अपने झोपड़े में अपनी ही माँ की चूत की चुदाई कर डाली।
पंद्रह साल का कालिया अपने माँ-बाप और दो छोटे भाइयों के साथ मुंबई के झोपड़पट्टी में रहता था। उसका बाप दिन भर कचरा चुनता था और सारी कमाई दारू पर उड़ा देता था। उसकी माँ भी दिन भर दुसरे के घरों में बर्तन सफाई का काम करती थी और वो भी रात में दारु पी कर सो जाती थी। किसी तरह से घर चल रहा था। कालिया भी कचरा चुन कर कुछ कमा लेता था। वो भी अपने माँ बाप की तरह अय्याश निकल गया था। जो कमाता था उसका वो सिगरेट और गुटका का सेवन करता था। वो अक्सर अपने दोस्त के घर पर ब्लू फिल्मे भी देखने लगा था। घर पर तो कोई रोकने-टोकने वाला था नहीं।
एक रात जब वो अपने दोस्तों के घर से ब्लू फिल्म देख कर अपने झोपडी में लौटा तो उसका ध्यान फिल्म के चुदाई वाले सीन पर ही था। वो अपने दोस्त के साथ उसके घर पर ही खाना खा कर आया था। घर पर पहुँचने पर उसने देखा कि बापू का कोई अता – पता नहीं है। उसकी माँ ने सिर्फ लो कट की ब्लाउज और पेटीकोट पहन रखी थी और वो दारू पी रही थी। उसकी ब्लाउज सामने से लगभग खुली हुई थी सिर्फ एक बटन के सहारे किसी तरह उसके स्तन को छिपाने का काम कर रहे थे. और उसकी पेटीकोट उसके जाँघों के काफी ऊपर तक चढ़े हुए थे. उसकी माँ का ये रूप कालिया ने कोई पहली बार नहीं देखा था. कई बार तो उसने अपनी माँ को शराब के नशे में धुत हो कर अपने सभी वस्त्र खोलते हुए पूरी नंगी होते हुए देखा था. कालिया के लिए अपनी माँ के खुले स्तन और चूत देखना कोई आश्चर्य की बात नहीं रह गयी थी. आज उसका फिर से अपनी माँ को नंगा देखने का मन करने लगा.
उसने अपनी माँ से पूछा – बापू कहाँ है?
उसकी माँ ने नशे में कहा – साला गया है अपने यारों के साथ मस्ती करने। कल आएगा।
कालिया ने अपने सरे वस्त्र खोल दिए और सिर्फ अंडरवियर पहन कर अपनी माँ के पास लेट गया.
कालिया की माँ ने कालिया से पूछा – तू कहाँ गया था?
कालिया – फिल्म देखने।
उसकी माँ ने नशे में कहा – कौन सी फिल्म देखने चला गया था? मुझे भी कहता मैं भी जाती तेरे साथ।
कालिया – वो फिल्म तेरे देखने के लायक नहीं है.
उसकी माँ – क्यों? जब तू देख सकता है तो मैं क्यों नहीं?
कालिया ने बेझिझक कहा – अब तुझे कैसे समझाऊं? उसमे नंगी औरतें और नंगे मर्द रहते हैं। औरतों के देखने लायक नहीं है। गंदे सीन होते हैं.
उसकी माँ – गंदे गंदे सीन का क्या मतलब?
कालिया – मतलब नंगे लड़के और नंगी लड़की उसमे वही काम करते हैं जो तू और बापू रात में करते हैं।
उसकी माँ – ओ तो तू चोदा – चोदी वाली फिल्म देख कर आ रहा है..?
कालिया – हाँ, चुदाई वाली फिल्म।
कालिया जानता था कि उसकी माँ को ये बात पता है कि उसके आसपास के सभी बच्चे ब्लू फिल्म (चुदाई वाली फिल्म) देखते हैं।
माँ – अच्छा एक बात बता..क्या उसमे मर्द किसी औरत को चोदते हुए दिखता है क्या?
कालिया – हाँ।
माँ- और क्या दिखाता है?
कालिया का लंड खडा हो रहा था. उसने अपने अंडरवियर के ऊपर से ही आने लंड को दबाते हुए कहा – उसमे मर्द औरत की चूची को खूब चूसता है. लड़की की सिसकारी निकल जाती है.
माँ – हिरोइन की चूची भी देखते होगे।
कालिया – हाँ, हिरोइन पूरी तरह से बिना कपडे के रहती है. सब कुछ दिखता है।
माँ- बड़े बेशर्म लोग होते हैं ना सिनेमा वाली लड़की-लड़का.
कालिया – अरे नहीं माँ. इसमें बेशर्मी कैसी? यही तो मजा है. वैसे एक बात पूंछू तेरे से?
माँ – हाँ पूछ ना.
कालिया – लड़की की चूची चूसते समय लड़की और लड़का सिसकारी क्यों भरती है?
माँ – लड़का लड़की के चूची के निपल को जब चूसता है तो लड़की की काफी मजा आता है इसलिए वो मजे से सिसकारी भरने लगती है इसलिए लड़का भी सिसकारी भरने लगता है.
कालिया – लेकिन जब बच्चा अपनी माँ का दूध पीता है तो उस समय वो माँ सिसकारी क्यों नहीं भरती?
माँ – अरे बच्चे के द्वारा निपल चुसना और बड़े के द्वारा निपल चूसने में काफी फर्क है.
कालिया – फर्क कैसा?
माँ – देख जब तू बच्चा था और जब मेरा दूध पीता था तो मुझे कुछ नहीं होता था लेकिन अब तू मेरी निपल चुसेगा तो तो मेरे अन्दर से भी सिसकारी निकलने लगेगी. और तू भी सिसकारी भरने लगेगा.
कालिया – मुझे यकीन नहीं होता.
कालिया की माँ ने एक झटके में अपना ब्लाउज खोल दिया। अन्दर ब्रा पहनी नहीं थी इसीलिए एक झटके में उसकी दोनों चूचियां कालिया के सामने आ गयी। कालिया ने इस से पहले भी कई बार नशे में धुत माँ के चूची और चूत को देख चूका था। बल्कि कई बार तो नशे में धुत उसके माँ – बाप रात में चुदाई करते थे तो कालिया की आँख खुल जाती थी और वो अपने सामने ही माँ की चुदाई देखता था।
माँ – आ चूस मेरी निपल, देख तुझे सिसकारी होती है कि नहीं ?
कालिया अपनी माँ की चूची पकड़ के दबाने लगा। उसकी माँ को काफी मज़ा आ रहा था।
माँ – आ चूस मेरी निपल, देख तुझे सिसकारी होती है कि नहीं ?
कालिया अपनी माँ की चूची पकड़ के दबाने लगा। उसकी माँ को काफी मज़ा आ रहा था।

कालिया – तेरी चूची भी बड़ी है। तेरी चूची भी हिरोइन की चूची की तरह एकदम कड़क है.
माँ – अब चूस ना .
कालिया अपनी माँ की चूची को अपने मुंह में दबाया और मजे ले ले चूसने लगा. उसकी माँ तो मस्ती में पागल हुयी जा रही थी. उसकी चूत भी गीली होने लगी. उधर कालिया को भी काफी मजे आ रहे थे. उसने अपनी माँ की दोनों चूची को चूस चूस कर पूरी तरह गीला कर दिया. वो अपनी माँ की चूची का निपल को अपनी जीभ से इस तरह चाट रहा था मानो आइसक्रीम हो. वो अपनी माँ के गले से ले कर दोनों चूची के हर कोने कोने को चूसने में लीन हो गया. और सिसकारी भी भरने लगा.
माँ – चुदाई वाली फिल्म देखता है तो तेरा मिजाज़ तो गर्म हो जाता होगा रे। तू फिर क्या करता है? कहीं रंडी के पास तो नहीं चले जाता है तू?
कालिया – नहीं माँ, गर्म होता हूँ तो अपने लंड का पानी निकाल देता हूँ।
माँ – कैसे ?
कालिया – हाथ से मुठ मार कर।
माँ – तू कब से मुठ मारने लगा है?
कालिया – लगभग 2 साल से मुठ मार रहा हूँ.
माँ- खोल के दिखा तो अपना लंड. ज़रा मैं देखूं कि कितना बड़ा है?
कालिया ने एक झटके में अपना अंडरवियर खोल दिया और माँ के सामने नंगा हो कर अपने हाथ में अपना 9 इंच का लंड पकड़ कर दिखाने लगा और बोला – देख, है कि नहीं बड़ा.
माँ – हाँ रे, तेरा लंड तो सच में बड़ा हो गया है और उस पर बाल भी मस्त हैं.
कालिया – तेरी चूत पर भी तो बड़े बड़े बाल हैं.
माँ- हाय राम, तूने मेरी चूत कब देख ली रे?
कालिया – जब तू दारु पी के बिना कपड़ों के सो जाती है तो मैंने तो कई बार तेरी चूत देखी है। यही नहीं जब बापू तेरी चुदाई करता है तो मैंने भी कई बार देख लिया है।
माँ – हाय राम, तू तो बड़ा हरामी हो गया है रे। जब तू मेरी चुदाई देखता है तो तू क्या करता है रे?
कालिया – मेरा लंड भी खड़ा हो जाता है और मैं भी उसी समय अपना लंड का मुठ मार कर माल निकाल लेता हूँ।
माँ – आज तो तूने फिर से चुदाई वाली फिल्म देखा है और मेरी चूची भी देख लिया है तो तेरा मिजाज़ तो और भी गर्म हो गया होगा? तो क्या अब मुठ मारेगा?
कालिया – हाँ, मारना तो पड़ेगा ही. नहीं तो लंड फट जायेगा. जब तू गरम होती है तो तू भी तो यही करती होगी ना?
माँ – हाँ.
कालिया – माँ, फिल्म में तो लड़का अपने मुंह से लड़की की चूत भी चूसता है और उसके चूत का माल भी पी लेता है.
माँ- हाय , तब तो लड़की को कैसा लगता होगा रे?
कालिया – बापू जबतेरी चूत चाटता है तो तुझे कैसा लगता है?
माँ – हाय, उसने तो कभी मेरी चूत चुसी ही नहीं, हमेशा मुझसे ही अपना लंड चुसवाता है.
कालिया – तब तू अपने चूत के माल का क्या करती है?
माँ – क्या करुँगी? पोंछ देती हूँ. या बह जाने देती हूँ.
कालिया – क्या आज तक बापू ने कभी भी तेरी चूत का रस नहीं पिया है?
माँ – नहीं रे. मेरा ये सपना सपना ही रह गया कि कभी तेरा बापू मेरी भी चूत चुसे.
कालिया – माँ , आज मैं तेरा ये सपना पूरा करूँगा. तब तुझे अहसास होगा कि जब एक मर्द एक औरत का चूत चूसता है तो औरत को कितना मजा आता है.
माँ – तू मेरी चूत का रस पिएगा?
कालिया – हाँ माँ,
कालिया की माँ ने एक झटके में अपना पेटीकोट खोल कर बिलकुल नंगी हो गयी।
कालिया ने अपनी माँ की चूत को अपने मुंह में भर लिया और जीभ को अन्दर डाल दिया. उसकी माँ की तो साँसे फूलने लगी. इतना मजा तो उसे आज तक कभी नहीं आया था. पांच मिनट तक कालिया ने अपनी माँ की चूत चुसी. उसके बाद उसकी माँ का बदन अकड़ने लगा और उसके चूत ने रस छोड़ने का सिग्नल दे दिया. उसकी माँ की आँखें कास के बंद हो गयी और दबी दभी आवाज में बोली – कालिया बेटा , मेरा चूत का रस निकलने वाला है.
कालिया ने कहा – निकलने दे माँ , आज मैं तेरे रस को पिऊंगा.
तभी उसकी माँ के चूत से सफ़ेद सफ़ेद माल निकलने लगा . कालिया ने बड़े ही प्रेम से उस रस को अपने मुंह में ले लिया. वो अपनी माँ की चूत को अच्छी तरह से चाट चाट के साफ़ कर दिया.
उसकी माँ को काफी मजा आया. इसके बाद कालिया अपने माँ के नंगे बदन पर पूरी तरह चढ़ गया और अपना मुंह अपनी माँ के होठो पर लगाया और और अपना लंड माँ के चूत पर घस रहा था.
कालिया – माँ , अब तू मेरा लंड पकड़ कर देख ना मस्त है कि नहीं?
माँ ने उसके लंड को पकड़ कर दबाने लगी और कही – हाँ रे, तेरा लंड तो एकदम कड़क जवान हो गया है.
उसके बाद कालिया ने अपनी माँ की चूत को फिर से सहलाया और उसके चूत के छेद में ऊँगली डाल कर पूछा – माँ , इसी छेद में बापू तुझे चोदता है?
माँ – हाँ रे, इसी छेद में लंड डाला जाता है.
कालिया – आज मैं तेरी छेद में लंड डालूं?
माँ – नहीं रे, पागल हो गया है क्या? माँ को चोदेगा?
कालिया ने अपनी माँ की चूत में ऊँगली अन्दर बाहर करते हुए कहा – माँ, जब इतना हो ही गया है है तो थोडा और सही.
माँ – नहीं रे, अपनी माँ को चोदना अच्छी बात नहीं.
लेकिन कालिया अब मानने वाला नहीं था. उसने अपने लंड को अपनी माँ के चूत में कस कर सटाते हुए कहा – जब तेरे बुर में मैंने अपना जीभ घुसा ही दिया है तो लंड में क्या रखा है?
माँ ने कहा – तेरे बापू क्या कहेंगे?
कालिया – अच्छा ठीक है…ज्यादा नहीं घुसाऊंगा. बस लंड की टोपी को अन्दर जाने दे.
माँ- ओह ,अब तू इतनी जिद कर रहा है तो ठीक है..थोडा ही अन्दर घुसाना ….पूरा लंड अन्दर मत घुसाना.
कालिया ने बिना एक पल की देर किये अपनी माँ के टांगों को फैला दिया। और अपनी माँ की चूत के मुंह पर अपना लंड को रखा और हल्का सा दवाब डाला. कालिया को बड़ा ही मज़ा आया.
माँ- हाँ अब देख, इस से ज्यादा अन्दर मत घुसाना.
माँ- हाँ अब देख, इस से ज्यादा अन्दर मत घुसाना.

लेकिन कालिया का पौरुषत्व जाग गया था. और उसकी माँ की चूत काफी चिकनी हो चुकी थी. उसने हल्का सा दम लगा कर अपना लंड को पूरी तरह अपनी माँ के चूत के अन्दर डाल दिया और उसे पेलने लगा। उसकी माँ की हालत खराब हो गयी। उसका सारा नशा गायब हो गया। अब उसे अहसास हो रहा था कि उसका खुद का बेटा उसे चोद रहा है। हालांकि जब तक वो समझती और प्रतिरोध करती तब तक काफी देर हो चुकी थी। उसका बेटा उसके चूत में धक्के मार रहा था। थोड़ी देर शर्माने के बाद उसकी माँ की भी झिझक खतम हो गयी।

उसने सोचा – अब जब लंड डाल ही दिया है तो जम के चुदाई का मज़ा ले लेना चाहिए। अब वो भी अपने बेटे का साथ दे रही थी। थोड़ी ही देर में कालिया ने अपनी ही माँ के चूत में माल उगल दिया। उसकी माँ भी दोबारा झड चुकी थी। वो भी काफी आनादित थी. काफी दिनों के बाद उसने काफी मन से अपनी चुदाई करवाई थी.

अब वो नहीं चाहती थी कि इस काण्ड पर उसका बेटा शर्मिंदा होए, इसलिए उसके बाद भी उसकी माँ ने कालिया के साथ 3 बार सेक्स किया ताकि कालिया को लगे कि इस में माँ की भी मर्जी थी।

उस रात के बाद कालिया जब भी ब्लू फिल्म देख कर आता अपनी माँ को जरुर चोदता था।

end
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06-08-2021, 12:48 PM,
#46
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
nonvegstory-माँ की चुदास और बेटी की प्यास

मेरा नाम डॉली है.. मैं 18 साल की हूँ। यह बात उन दिनों की है.. जब मैं स्कूल में पढ़ती थी। मेरी माँ कोमल एक प्राइवेट स्कूल में इंग्लिश की टीचर हैं और मेरे पापा दुबई की एक कंपनी में हैं। वह साल दो साल में इंडिया आया करते हैं और 25-30 दिनों के लिए ही आते हैं। जब वे घर आते थे.. तब माँ बहुत खुश रहती थीं.. लेकिन उनके जाने के बाद माँ बहुत उदास हो जाती थीं।
हमारा घर शहर की आबादी से दूर था, हम किराये के मकान में रहते थे, यह घर पापा के दोस्त जय अंकल का था। जय अंकल पापा के दोस्त थे। यही वजह थी कि वह हम लोगों से किराया नहीं लिया करते थे। जय अंकल हमारे घर अक्सर आया करते थे। उनके आने पर माँ बहुत खुश रहती थीं। उनके आने से माँ का अकेलापन दूर हो जाता था।
कभी-कभी हम लोग जय अंकल के साथ बाहर उनकी कार से आउटिंग पर भी जाते थे। धीरे-धीरे वह हमारे साथ बेहद घुल-मिल गए थे।
एक दिन मैं स्कूल से घर आई तो देखा कि मेरे पापा के दोस्त जय अंकल आए हुए हैं।
माँ दोपहर का खाना बना रही थीं। मैंने अपना स्कूल बैग कमरे में रखा और किचन की तरफ बढ़ गई.. लेकिन अन्दर का नज़ारा देख कर मेरे पाँव ठिठक गए थे।
मैंने चुपके से किचन में झांक कर देखा.. जय अंकल ने माँ को अपने आगोश में लिया हुआ था। वह अपने हाथों को माँ के बदन पर घुमा रहे थे। माँ अंकल की कमर पर हाथ फिरा रही थीं.. फिर गर्दन पर.. और फिर सर पर.. उधर अंकल माँ के होंठों को छोड़ कर उनके गालों को चूमने लगे और फिर गर्दन पर अपने होंठ फिराने लगे।
माँ लगातार उनका साथ दे रही थीं और अंकल भी उनके गुदाज स्तन लगातार दबा रहे थे। अंकल ने माँ का जालीदार सफ़ेद कुरता ऊपर उठा दिया था। माँ ने नीले रंग की ब्रा पहनी थी। जय अंकल अब अपने होंठों को उनकी गर्दन पर लेकर आए और फिर उनके कंधों पर चूमने लगे।
यह सब देख कर मैं पागल हुए जा रही थी, मैंने ऐसा पहली बार देखा था। मेरे जिस्म में आग सी लग गई थी। मैं यह समझ चुकी थी कि एक शादीशुदा औरत को पूरे-पूरे साल बिना शौहर के रहना बेहद मुश्किल होता है। पेट की भूख तो खाने से मिटाई जा सकती है.. लेकिन जिस्म की भूख का क्या?
यही वजह थी कि माँ ने अपना जिस्म जय अंकल को सौप दिया था।
वैसे भी मेरी माँ एक कॉलेज में टीचर थीं। वह खुले विचारों वाली महिला थीं। लेकिन मुझे फिर भी अपनी माँ से यह उम्मीद नहीं थी कि जय अंकल माँ को चोदेंगे।
किशोरावस्था में होने के कारण मेरी इसमें दिलचस्पी और बढ़ गई थी, मैं न चाहते हुए भी उन दोनों को देखे जा रही थी।

अभी कॉलेज से आकर मैंने अपना ड्रेस भी नहीं बदला था। मैं अपनी चूचियों को शर्ट के ऊपर से ही मसलने लगी। अंकल और माँ को बड़ा मजा आ रहा था।
माँ ने अंकल की पैंट में अपना हाथ डाला हुआ था। वह अंकल के लण्ड को सहलाने लगीं.. जिससे अंकल का लण्ड खड़ा होकर 6 इंच का हो चुका था।
अंकल ने अपना एक हाथ माँ की सलवार में डाल दिया.. शायद उनकी चूत गीली हो चुकी थी और थोड़ा-थोड़ा चिपचिपा पानी निकल रहा था।
अंकल ने माँ की सलवार का इज़ारबंद खोलना चाहा.. तो माँ ने हाथ पकड़ कर रोक दिया- अभी नहीं, डॉली आ गई है स्कूल से.. रात को..
माँ अपने कपड़े सम्हालते हुए किचन से बाहर आ गई थी। उन्होंने खाना लगाया और मुझे आवाज़ दी। हम तीनों ने मिलकर लंच किया।
फिर मैं टीवी देखने लगी माँ और अंकल आराम करने लगे। मैं यह समझ चुकी थी कि आज रात को मेरी माँ जय अंकल से चुदवायेंगी।
मैं यही सोच-सोच कर खुश हो रही थी कि आज मुझे अंकल-माँ की चुदाई देखने को मिलेगी।
फिर रात को जय अंकल माँ और मैं खाना खाकर रात साढ़े दस बजे सोने लगे, मुझे नींद तो आ नहीं रही थी।
तकरीबन दो घंटे ऐसे ही बीत गए। मेरी आँख हल्की सी लगने लगी थी। तकरीबन 15 मिनट बाद मेरे कानों में चूड़ियों के खनकने की आवाज सुनाई पड़ी। मेरी नींद खुल चुकी थी.. मैंने धीरे से अपने कमरे की खिड़की खोली.. जो कि माँ के कमरे की तरफ खुलती थी।
जय अंकल मेरी माँ के बदन पर अपना हाथ फेर रहे थे, वो शरमा रही थीं, अंकल ने उनका सफ़ेद दुपट्टा निकल कर अलग कर दिया था और उनके कन्धे पर हाथ रख दिया।
वो वहाँ से उठकर जाने लगीं.. अंकल ने माँ को पीछे से कस कर पकड़ कर अपने होंठ उनकी गर्दन पर रख दिए।
वो थोड़ा छूटने के लिए कसमसाईं.. उनके चहरे पर एक घबराहट सी थी- जय.. है तो यह गलत ना..
कुछ गलत नहीं है कोमल.. तुम्हारे शौहर मेरे दोस्त हैं.. और फिर तुम्हारी भी तो कुछ ज़रूरतें हैं।
जय अंकल ने माँ की गर्दन पर अपने होंठ फिराते हुए कहा।
माँ ने एक लम्बी सी सांस लेते हुए आँखें बंद कर ली थीं- मुझे डर लगता है.. किसी को मालूम पड़ गया तो?
माँ थोड़ा झिझक रही थीं.. लेकिन फिर धीरे-धीरे उनका विरोध कम हो गया और माँ ने खुद को ढीला छोड़ दिया।
अंकल ने उन्हें अपने पास खींचा और माँ के गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वो थोड़ा ना-नुकर करते हुए बोलीं- तुम्हें नहीं लगता कि हम जो कर रहे हैं, ये सब गलत है.. मुझे अपने शौहर को धोखा नहीं देना चाहिए।
अंकल ने कहा- कोमल.. हम दोनों जो कर रहे हैं.. वो दो जिस्मों की जरुरत है.. तुम्हारे शौहर रंगीला मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं.. दुबई जाने से पहले उन्होंने मुझसे कहा था कि मैं आपका और आपकी बेटी डॉली का ख्याल रखूँ.. यदि तुम्हारा शौहर तुम्हारी इस जरूरत को पूरा करता है.. तो तुम बेशक जा सकती हो.. इस उम्र में ये सब सामान्य बात है। इसे धोखा नहीं कहते हैं.. यह तुम्हारी ज़रूरत है।
जय अंकल ने अपनी बात को जोर देते हुए माँ को समझाया था।
माँ मन ही मन में अंकल साथ देना चाहती थीं.. पर सीधा कह न सकीं। अंकल भी उसके मन की बात समझ गए और उसे चूमने लगा। धीरे-धीरे माँ ने खुद को समर्पित कर दिया था और अब उनका विरोध समाप्त हो चुका था।
मैं खिड़की से झांकते हुए अपनी माँ को अपने पापा के दोस्त से चुदते हुए देख रही थी।
उन दोनों ने तकरीबन दस मिनट तक किस किया। अब माँ की शर्म खत्म हो गई थी.. वह भी खुल गई थीं और अंकल का भरपूर साथ दे रही थीं।
अंकल उनके गाल के बाद उनके वक्ष स्थल पर चुम्बन करने लगे, इससे वो उत्तेजित हो गईं। वह उनके स्तनों को सहला रहे थे.. और उनके चूचुकों को अपनी उँगलियों से दबा कर मसल रहे थे.. माँ पूरी तरह गर्म हो गई थीं।
यह सब देख कर मेरे दिल में एक अजीब सी बेचैनी होने लगी थी। मेरा हाथ खिड़की पर खड़े हुए ही अपनी सलवार के अन्दर न चाहते हुए भी चला गया था।
उधर अंकल ने अपना हाथ माँ के पेट के ऊपर से सहलाते हुए उनकी सलवार में सरका दिया था.. शायद उनका हाथ माँ की चूत पर था।
‘आह्ह्ह.. जय..’
माँ मचल उठी थीं.. फिर अंकल माँ को अपनी गोद में उठाकर बिस्तर पर ले गए। उनको बिस्तर पर लेटा कर पीछे से उनकी कुर्ती की डोरियाँ खोलने लगे।
माँ ने फिर से थोड़ी ना-नुकुर की..
पर अंकल ने कहा- अब मुझे मत रोको.. जब भी मैं तुम्हारे जिस्म को मज़ा देता हूँ, हर बार तुम ऐसे करती हो कि जैसे मैं पहली बार तुम्हारे साथ ऐसा कर रहा होऊँ? हर बार तुम ना नुकुर करती हो?
प्यासी माँ की चूत पूरी तरह से गर्म हो चुकी थी.. इसलिए जय अंकल को भी कोई दिक्कत नहीं हुई। पाँच मिनट बाद जय अंकल बिस्तर पर माँ के ऊपर जा पहुँचे और माँ के पीठ की चुम्मियाँ लेने लगे।
मैं यह सब देख रही थी.. लेकिन मैंने अपनी खिड़की अधखुली कर रखी थी इसलिए माँ.. अंकल को कोई शंका नहीं हुई।
जय अंकल धीरे माँ के दूध दबाने लगे.. माँ के मुँह से आवाजें निकलनी शुरू हो गई थीं। जय अंकल ने धीरे से माँ की गुलाबी सलवार का इजारबंद खोल दिया और धीरे से कुर्ती भी ऊपर सरका दी। माँ अब अधनंगी हो चुकी थीं। उन्होंने अपनी कमर पर एक काली डोरी बांधी हुई थी। जय अंकल के द्वारा माँ की चुदाई को देख कर मैं पागल हो रही थी।
जय अंकल ने इतनी जोर से माँ के दूध दबाए और चूसे कि माँ ‘आ.. आहा.. अआ.. हह्हा..आआह्ह.. धीरे से..’ करने लगीं।
जय अंकल ने धीरे-धीरे माँ की सलवार घुटनों तक सरका दी और उनकी काली चड्डी के ऊपर से ही माँ के चूतड़ दबाने और चूमने लगे। माँ ने करवट बदली और खुद ही अपने जम्पर को उतार कर फेंक दिया। माँ अब ब्रा और पैंटी में थीं।
मैंने आज पहली बार अपनी माँ का गोरा जिस्म देखा था। ब्रा-पैंटी में वो मुझे उस समय बहुत ही कामुक.. सुन्दर और मासूम लग रही थीं, वे 34 साल की होने के बावजूद इस वक़्त जवान लड़की लग रही थीं।
अंकल माँ को अपनी बाँहों में लेकर.. उनके होंठों को चूसने लगे, अब वो भी अंकल का साथ दे रही थीं।
मेरे लिए यह अनुभव जन्नत से कम नहीं था। जय अंकल ने उठकर माँ के पाँव सहलाने शुरू कर दिए और उसमें गुदगुदी करने लगे। माँ अपना पाँव हटाने लगीं।
वह दोनों किसी प्रेमी जोड़े की तरह एक-दूसरे से खेल रहे थे, उनके अन्दर कोई जल्दबाजी नहीं थी, दोनों एक-दूसरे को प्यार कर रहे थे।
जय अंकल उनकी पायल को चूमने लगे और हाथ से पाँव पर मालिश करने लगे। जय अंकल धीरे से माँ की पैंटी की तरफ पहुँचे और उसे उतार कर किनारे रख दी।
उनका लण्ड जो इतना खड़ा हो चुका था कि चड्डी फाड़ रहा था। अंकल पूरे नंगे हुए और माँ की टांगें ऊपर करके अपना सात इंच का लण्ड माँ की फूली हुई चूत में डाल दिया।
माँ सिसकार उठीं- अअह आआ.. आआह.. अहह..हाहा आआहह्ह..हा जय धीरे-धीरे.. डॉली उठ जाएगी.. अहह्ह..सिइइइ..
माँ ने मेरे जाग जाने के डर से अपनी आवाजें बंद कर लीं। जय अंकल धीरे-धीरे चुदाई की गति तेज करने लगे। माँ की चूड़ियाँ खन-खन कर रहीं थीं।
अंकल उनको तेज-तेज चोदने लगे।
माँ भी अंकल के कंधे को पकड़ कर अपनी तरफ खींच रही थीं.. वैसे ही जय अंकल भी तेज स्पीड में उनकी चूत में धक्के लगा रहे थे। उनका सात इंच का लण्ड माँ की चूत में पूरा पेवस्त हो रहा था। माँ अपनी टांगें ऊपर किए हुए बिस्तर पर पड़ी लम्बी-लम्बी साँसें भर रहीं थीं।
तकरीबन आधे घंटे तक जय अंकल माँ को लण्ड डालकर चोदते रहे.. उसके बाद वे दोनों शांत हो गए। इसी के साथ उनकी पायलों की ‘छुन-छुन’ भी बंद हो गई थी। शायद जय अंकल झड़ चुके थे।
वह दोनों काफ़ी देर बिस्तर पर नंगे ही पड़े रहे.. उसके बाद फिर वो दूसरी बार के लिए तैयार हुए।
कुछ देर बाद उन्होंने माँ को फिर से चूमना-चाटना शुरू कर दिया। माँ ने भी जय अंकल के लण्ड को मुँह में लेकर उनके लौड़े को चूसना शुरू किया। पहली ठोकर के सारे वीर्य साफ़ को किया।
जय अंकल माँ को फिर से प्यार करने लगे। उनके दूध दबाने शुरू कर दिए। अब जय अंकल का लौड़ा फिर से हाहाकारी हो गया था। इस बार उन्होंने माँ को उल्टा किया.. मतलब अंकल ने माँ को कुतिया बना दिया।
‘ऐसे पीछे नहीं जय…’
‘तुम जानती हो मुझे कुतिया बना कर तुम्हारी गाण्ड मारना बहुत अच्छा लगता है.. कोमल..’
जय अंकल ने अपना मूसल माँ की गाण्ड के छेद में लगाया और उनके चूतड़ों पर एक थपकी दी।
मैं सोच भी नहीं सकती थी कि मेरी माँ आज पूरी रंडी बनी हुई थीं।
माँ समझ गईं कि अब ये थपकी देने का मतलब है कि उनकी गाण्ड में लौड़े की शंटिंग शुरू होने वाली है। उन्होंने खुद को गाण्ड मराने के लिए तैयार कर लिया था।
जय अंकल ने माँ की गाण्ड में शॉट मारा.. ‘आआह्ह्ह.. धीरे-धीरे जय..’
‘बस बस कोमल.. हो गया..’
माँ के हलक से एक घुटी सी चीख निकली.. जय अंकल का हाहाकारी लण्ड माँ की मुनिया की सहेली उनकी गाण्ड में पूरा घुस चुका था।
कोमल- प्लीज जय.. धीरे-धीरे दर्द हो रहा है..
माँ के चेहरे पर दर्द साफ़ झलक रहा था।
‘क्यों.. क्या रंगीला तुम्हारी गाण्ड नहीं मारता था?’
‘नहीं.. वह गाण्ड मारने के शौक़ीन नहीं हैं.. मुझे इन्हीं धक्कों का और तुम्हारे लण्ड का बड़ी बेसब्री से इन्तजार था। मुझे नहीं मालूम था जय कि तुम्हारा लौड़ा इतना बड़ा है.. आह्ह.. चोदो मुझे और जोर से चोदो..’
जय अंकल माँ के ऊपर कुत्ते जैसे चढ़े थे.. माँ की गाण्ड पर जैसे ही चोट पड़ती.. उनके दोनों चूचे बड़ी तेजी से हिलते। जय अंकल ने उनके हिलते हुए दुद्धुओं को अपने हाथों से पकड़ लिया.. जैसे जय अंकल ने माँ की चूचियों का भुरता बनाने की ठान ली हो।
उनकी गाण्ड को करीब दस मिनट तक ठोकने के बाद वे माँ की पीठ से उतरे और फिर उन्होंने माँ को चित्त लेटा दिया। अब उन्होंने माँ की कमर के नीचे तकिया लगाया और उनके पैर फैला कर उनकी चूत में अपने मूसल जैसे लौड़े को घुसेड़ दिया।
माँ भी नीचे से अपनी कमर उठा कर थाप दे रही थीं, माँ के मुँह से अजीब सी आवाजें निकलने लगीं थीं- चो..द.. जय.. और..ज्जोर.. स्से..धक्के.. मारर.. मेरेरेरे.. राज्ज्ज्ज..जा !
और फिर वो अचानक शिथिल पड़ गईं.. माँ झड़ चुकी थीं।
जय अंकल ने भी तूफानी गति से धक्के मारते हुए उनकी चूत में अपने लण्ड का लावा छोड़ दिया।
उन दोनों की चुदाई देखकर मेरी भी चूत गीली हो गई थी.. मैंने अपनी उंगली से अपनी चूत को सहलाना शुरू कर दिया था।
मुझे मालूम था कि आज जय अंकल माँ को देर तक चोदेंगे.. मैंने महसूस किया था कि जब चुदाई होती है.. तो फिर उन दोनों को.. मेरी तो जैसे सुध ही नहीं रहती है।
जय अंकल का इंजन अभी माँ की चूत में शंटिंग कर रहा था। मेरी आँखें मुंदने लगी थीं.. कुछ देर बाद मैं सो गई।
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06-08-2021, 12:48 PM,
#47
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
अब तो अंकल और माँ के बीच के सभी परदे मेरे सामने खुल चुके थे.. माँ भी अपनी पूरी मस्ती से अपनी चूत कि चीथड़े उड़वाने में लग चुकी थीं।
जय अंकल माँ को जब चाहते तब चोदते थे। धीरे-धीरे वह दोनों मेरे सामने ही एक कमरे में चले जाते और कई-कई घंटे बाद निकलते थे। मैं भी हमेशा माँ और अंकल की चुदास लीला देखती थी रात को जाग जाग कर…
एक दिन मैं जब सुबह उठी.. तो देखा कि जय अंकल मेरे साथ ही लेटे थे। वह मुझे पूरी तरह से चिपटाए हुए थे।
मैंने अंकल से पूछा- माँ कहाँ हैं?
अंकल- वह तो अपने कॉलेज चली गईं।
‘ठीक है.. मैं आपके लिए चाय बना दूँ?’
अंकल ने सिगरेट सुलगाते हुए ‘हाँ’ में सिर हिला दिया था। थोड़ी देर बाद मैं चाय लेकर आ गई थी। अंकल में मुझे पास में बैठने के लिए इशारा किया।
मैं वहीं उनके पास बैठ गई।
‘कल रात को तुम सो रहीं थी या जाग रही थीं?’ अंकल ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए सवाल किया।
अचानक इस तरह के सवाल से मैं सकपका गई थी। अंकल को शायद ये मालूम पड़ गया था कि माँ और उनकी चुदाई का मैंने पूरा नजारा देखा है।
‘देखो डॉली.. मैं तुम्हारा अंकल हूँ.. तुम्हारी माँ का ख्याल रखना मेरा फ़र्ज़ है.. तुम बड़ी हो गई हो.. समझदार हो.. इस बात को समझ सकती हो।’
मैंने बिना कोई जवाब दिए अपना सिर शर्म से नीचे झुका लिया था।
‘वैसे कितने साल की हो गई हो तुम?’
‘पिछले महीने में 18 साल की..’ मैंने धीरे से शरमाते हुए जवाब दिया था।
अंकल ने मुझे अपने सीने से लगा लिया- बड़ी हो गई है मेरी बच्ची.. तू फ़िक्र मत कर.. तेरे लिए मैं तेरी माँ से बात करता हूँ..
अंकल ने मुझे गले लगाये हुए ही मेरी पीठ पर सहलाते हुए कहा था। मैं किसी मासूम बच्चे की तरह उनसे चिपकी हुई थी।
अंकल ने मुझे अपनी ओर खींचा और अपनी गोद में झटके से खींच लिया.. हम दोनों बिस्तर पर गिर गए।
मैं बुरी तरह घबरा गई.. मैं हल्की सी आवाज में बोली- अंकल प्लीज मुझे जाने दो..
‘कुछ नहीं होगा तुझे मेरी गुड़िया रानी..’
अंकल मेरे कंधों पर किस करने लगे.. मुझे अच्छा लग रहा था.. परन्तु शर्म भी आ रही थी.. क्यूंकि वे मेरे अंकल थे।
मैं छूटने की कोशिश करने लगी.. परन्तु अंकल ने मुझे पीछे से जकड़ रखा था।
अचानक उनका हाथ मुझे अपनी टांगों के बीच महसूस हुआ। अंकल मेरी नन्हीं सी मासूम योनि को मसल रहे थे। मुझे अच्छा लग रहा था.. परन्तु थोड़ा अजीब भी.. क्यूंकि यह सब मेरे साथ पहली बार हो रहा था।

अंकल ने मुझे मुँह के बल बिस्तर पर लिटा लिया और मेरे ऊपर लेट कर मेरी पीली जालीदार कुर्ती की ज़िप खोल कर मेरी पीठ पर चुम्बन करने लगे। मैं चुपचाप सिसकारियाँ भर रही थी।
अंकल ने मेरे अधखिले उभार मसलने शुरू कर दिए.. मेरे पीछे उभारों पर मुझे उनके लौड़ा का दबाव साफ़ महसूस हो रहा था। नीचे मेरी योनि में कुलबुलाहट सी होने लगी थी। योनि को और साथ में भगांकुर को मसलवाने को मन कर रहा था।
फिर अंकल ने मेरी काली चूड़ीदार पजामी नीचे खिसका दी और मेरी गुलाबी रंग की चड्डी की एक झटके में नीचे खिसका लिया। मुझे शर्म सी महसूस हो रही थी परन्तु आनन्द भरी सनसनाहट में लिपटी.. मैं चुपचाप लम्बी-लम्बी सांसें ले रही थी। मुझे लग रहा था कि मेरी योनि कुछ रीतापन है.. उसे भरने के लिए मैं कुछ अन्दर लेने को मचल रही थी।
मुझे सीधा करके अंकल की अब उंगली आसानी से मेरी गुलाबी चूत में जा रही थी। मैं बहुत जोर से सिसकारियाँ ले रही थी ‘उन्नन्नह्हह.. आअह्हह.. ऊऊह्ह. आहन्न.. आहऊर चूसो..’
फिर जय अंकल ने मेरे छोटे-छोटे चूचों को चूसना छोड़ कर होंठों का किस लेना शुरू कर दिया- तू तो मेरी गुड़िया रही है डॉली.. मैं तो कब से तेरे पकने का इंतज़ार कर रहा था.. मूआआह्ह्ह..
अंकल ने मुझे चूमते हुए ख़ुशी ज़ाहिर की।
कुछ देर के बाद मैं पूरी तरह से गर्म हो गई। फिर अंकल ने अपना लोअर खोला और अपना लण्ड मेरे हाथ में थमा दिया। उनका लण्ड अब तन कर पूरा 90 डिग्री का हो गया था।
मैं पहले तो शरमाई.. लेकिन कुछ देर के बाद जब उन्होंने फिर से लण्ड पकड़ाया.. तो मैं थोड़ा खुल गई।
अंकल ने बोला- इसे सहलाओ और आगे-पीछे करो।
मैं वैसा ही करने लगी।
अंकल ने फिर मेरी नन्हीं सी मासूम चूत में एक उंगली डाल दी। मैं जोर से ‘आह्ह्ह..’ करके सिस्कार उठी। कुछ देर के बाद मैंने अपनी चूड़ीदार पजामी खुद उतार दी।
‘वाह.. क्या नन्हीं सी पिंक.. बिना बाल की चूत है.. आज तो मैं तुझे कली से फूल बनाऊंगा.. मेरी गुड़िया रानी..’
अंकल ने हाँफते हुए कहा।
मेरी चूत पूरी भीगी हुई थी। मेरी चूत पर एक भी बाल नहीं था.. हल्का सा रोंया ही अब तक आया था। मेरी चूत पूरी पावरोटी की तरह फूली हुई थी।

फिर अंकल ने मुझे अपना लण्ड चूसने के लिए बोला.. मैंने मना कर दिया।
अंकल ने बोला- कुछ नहीं होता..
मैं बोलने लगी- नहीं.. मुझे घिन आ रही है..
‘देखो इस तरह से चूसो..’
यह कहते हुए जय अंकल ने मेरी चूत को चूसना शुरू कर दिया।
मैं चिल्लाने लगी- आह्हह्हह्हह.. अंकल नहीं.. बस करो..
अंकल अपनी जीभ से मुझे चोद रहे थे.. मेरे मुँह से सिसकारियाँ फूट रही थीं ‘अंकल आह्ह.. मेरी चूत में आग लग रही है.. अहह्ह्ह.. कुछ करो..’
वे लगातार मेरी चूत को चूसते रहे।
मैं जोर से चिल्ला रही थी- और जोर से.. आह्ह..
मैं अपने हाथ से उनके सिर को अपनी चूत के ऊपर खींच रही थी। अपने पैरों को कभी ऊपर तो कभी दोनों जांघों को जोर से दबा रही थी.. कभी-कभी मेरी साँसें फूल जाती थीं।
कुछ देर के बाद मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया.. अंकल ने सारा का सारा पानी पी लिया।
मैं बिस्तर पर नंगी निढाल पड़ी थी। वो मेरे गोर दुबले-पतले नाज़ुक जिस्म को देख रहे थे। मैं जोर से हाँफ़ रही थी.. जैसे कोई कई मील से दौड़ कर आई होऊँ।
‘डरती है मेरी गुड़िया रानी.. अंकल से डरती है? कुछ हुआ मेरी बेबी.. मज़ा आया ना?’
अंकल ने मुझे सीधे लिटा कर प्यार से कहा।
मैंने हाँ में सिर हिलाया।
अब अंकल का मुँह मेरे सामने था.. उनका चेहरा लाल हो चुका था। वो मेरे चेहरे की तरफ देख भी नहीं रहे थे। उन्होंने अपने इनर को उठाया.. लोअर नीचे सरका कर अपने लौड़े को बाहर निकाला।
उस वक्त तो मुझे पता नहीं था कि मेरा यौनांग कुछ छोटा था।
मुझे थोड़ा अजीब जरूर लग रहा था.. पर कामोत्तेजना बहुत हो रही थी। अंकल ने मेरी टांगें फैला दीं और खुद टांगों के बीचों-बीच आ गए।
उन्होंने लौड़े पर थूक लगाया और योनिद्वार के ठीक बीचों-बीच मुझे उनका लौड़ा महसूस हुआ। उन्होंने मेरे दोनों घुटनों को अपने हाथों से थामा और जोर का एक धक्का लगाया ‘आआआ.. ईईई आश्स्श्श्श.. माँ….
मेरी तो जैसे जान ही निकल गई.. मैं छूटने के लिए तड़पने लगी। नीचे मेरी चूत में जलन सी हो रही थी।
‘धीरे से.. धीरे से.. कुछ नहीं होगा मेरी गुड़िया रानी को..’
यह कहते हुए अंकल मेरे मासूम नन्हें अधखिले वक्ष-उभार मसलने लगे और मुझे चूमने लगे।
पहली बार मेरी चूत में कोई लण्ड गया था। कॉलेज में मुझे कई सारे लड़के मुझे लाइन मारते थे.. लेकिन मैंने सोचा नहीं था कि यह सौभाग्य जय अंकल को मिलेगा।
लगभग 5 मिनट में मेरा दर्द कुछ कम हुआ.. तो मुझे अच्छा लगने लगा और मैं खुद ही कमर हिलाने लगी और कूल्हे उठाने लगी।
अंकल ने मेरी कमर के नीचे तकिया लगाया और हल्के-हल्के धक्के लगाने शुरू कर दिए और लगभग दो मिनट में उनकी रफ्तार बहुत तेज हो गई।
अब मुझे भी बहुत मजा आ रहा था.. मेरी योनि में मीठी सी चुभन मुझे आनन्द भरी टीस दे रही थी।
लगभग 7-8 मिनट तक धक्के लगाने के बाद मुझे चरमोत्कर्ष प्राप्त होने लगा और मुझे योनि के अन्दर संकुचन सा महसूस हुआ। मुझे योनि के अन्दर कुछ रिसता हुआ सा महसूस हुआ.. अंकल ने लौड़ा झटके से बाहर निकाला और सारा वीर्य मेरे योनि मुख और मेरे पेट पर गिरा दिया.. और मेरे ऊपर गिर गए।
वे झड़ चुके थे और लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगे।
मुझे चूत में दर्द महसूस हो रहा था.. मेरी चूत खून से लथपथ हो गई थी.. मैं डर गई थी।
तब अंकल ने बताया- पहली बार में ऐसा होता है..
मैंने चड्डी चूत पर चढ़ा ली।
कुछ देर बाद अंकल मेरे छोटे-छोटे चूतड़ों को मसलने लगे और फिर से मेरी चड्डी को कमर तक खिसका दिया। मैं आँखें बंद करके चुपचाप लेटी हुई थी।
अंकल मेरे ऊपर छा गए थे। उनका लौड़ा मेरी चूत में दुबारा घुस गया था.. मैं एकदम से थक कर चूर हो गई थी। ऐसा लग रहा था कि न जाने कितनी दूर से दौड़ लगा कर आई होऊँ।
कुछ देर अंकल का लण्ड मेरी चूत में ही पड़ा रहा.. अंकल ने अपनी आँखें खोलीं और मेरे सुनहरे घने बालों में अपना दुलार भरा हाथ फिराया। हम दोनों एक-दूसरे को देख कर मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने अपना लण्ड मेरी चूत से बाहर खींचा..
फिर अंकल ने लोअर पहना और बाथरूम में घुस गए..
मैं चुपचाप हल्की सी आँख खोलकर उनको देख रही थी.. जैसे ही वो अन्दर घुसे.. मैंने जल्दी-जल्दी अपनी पजामी ऊपर खींची.. कपड़े और बाल ठीक-ठाक किए और जल्दी से वहाँ से बाहर निकल आई.. क्यूंकि मेरा मन अंकल से नजर मिलाने को नहीं हो रहा था।
मेरे ख्याल से इस सारे प्रकरण में अंकल का कोई दोष नहीं था। मैं जानती थी कि मेरी माँ कोमल जो 34 साल की जवान और खूबसूरत औरत हैं.. उनके साथ जो हो रहा था.. वह मेरे साथ भी कभी भी हो सकता है.. लेकिन आज ही के दिन यह सब हो जाएगा.. मैं नहीं जानती थी।
कुछ देर बाद जय अंकल मेरे नजदीक आए और उन्होंने मेरे गालों पर एक ज़ोरदार पप्पी ली और 2 दिन बाद वापस आने का वादा करके चले गए।
फिर एक दिन वह हुआ.. जिसकी मैंने कभी उम्मीद भी नहीं की थी। शाम के 9 बज रहे थे.. जय अंकल की कार दरवाजे पर आकर रुकी थी। अंकल का रात को इस तरह आना.. कोई नई बात नहीं थी.. लेकिन मैंने दरवाजे पर जाकर देखा कि आज अंकल के साथ एक और आदमी भी था।
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06-08-2021, 12:48 PM,
#48
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
जय अंकल- हाय कोमल कैसी हो? इससे मिलो, यह मेरा दोस्त राज है!
माँ ने धीरे से ‘हाय’ करके अपना हाथ आगे बढ़ाया था।
‘और राज यह है मेरी प्यारी सी नन्हीं सी भतीजी डॉली..’
जय अंकल ने मेरे गाल खींचते हुए.. राज को मेरी तरफ इशारा किया।
राज ने ललचाई हुई नज़रों से मुझे नीचे से ऊपर तक देखा था.. उस वक़्त मैंने रेड स्कर्ट और ब्लैक टॉप पहना हुआ था। मैं बिना जवाब दिए अपने कमरे में चली गई थी।
मैं अपने कमरे में चली गई थी और खिड़की से उनकी बातें सुनने लगी थी।
जय अंकल माँ को कमरे में ले कर गए थे.. राज बरामदे में ही रुका था।
‘कोमल यह मेरा दोस्त राज है.. आज रात यह हमारे साथ रुकेगा..।’
अंकल माँ को समझा-बुझा रहे थे.. लेकिन माँ मानने को तैयार नहीं थीं।
‘अरे.. किसी को कुछ पता नहीं चलेगा.. बस मैं तुम और राज.. एक रात की तो बात है..’
मैं समझ चुकी थी कि जय अंकल माँ को राज से चुदवाने के लिए राजी कर रहे थे।
कोमल- तुम्हारी बात अलग है जय.. तुम मेरे शौहर के दोस्त हो.. लेकिन एक गैर मर्द के साथ मैं नहीं कर सकती।
माँ परेशानी से अपना सिर पकड़े सोफे पर बैठी थीं।
जय अंकल- मैं और राज बचपन के दोस्त हैं.. यहाँ तक कि मैंने उसकी पत्नी की भी ली है.. अब अगर वह कुछ माँगता है.. तो मैं कैसे मना कर दूँ.. और फिर यह बात इस कमरे से बाहर थोड़े ही जाने वाली है? मैंने राज को बोला है कि तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त रंगीला की बीवी हो।
‘तुमने मुझसे पूछ कर बोला था क्या..? मैं ऐसा नहीं कर सकती जय..’
जय अंकल ने माँ के गालों को अपने दोनों हाथों में लेते हुए अपनी बात पर जोर देकर कहा।
‘लेकिन घर में मेरी बेटी डॉली भी है.. वह क्या सोचेगी.. अब वह छोटी नहीं रही है..?’
माँ ने अपनी शंका ज़ाहिर करते हुए जवाब दिया था.. जबकि राज अंकल बाहर बरामदे में बैठे सिगरेट पी रहे थे।
‘हाँ मुझे बहुत अच्छी तरह से मालूम है कि वो ‘बड़ी’ हो गई है.. उसकी तुम फ़िक्र मत करो.. मैं उसको सम्हाल लूँगा।
फिर माँ धीरे-धीरे राजी हो गई थीं। जय अंकल माँ को अपनी गोद में लिए हुए थे और उनके कुरते में हाथ डाल कर उनके चूचों को मसल रहे थे। जिससे उनका विरोध अब कम हो गया था।
रात होने को थी.. मेरा दिल धड़कने लगा था.. मुझे बहुत ही अजीब लग रहा था कि मेरी माँ मेरे सामने ही दो-दो मर्दों से चुदेगीं.. कैसे चुदेगीं.. आह्ह्ह चाचा का और उनके दोस्त का कड़क लण्ड भला अन्दर कैसे घुसेगा..? यह सोच कर तो मेरी चूत में भी पानी उतारने लगा था।
रात को माँ मेरे कमरे में आईं और मुझे ठीक से सुला दिया और चादर ओढ़ा कर लाईट बन्द करके कमरे बन्द करके चली गईं।
मैंने धीरे से चादर हटा दी और उछल कर खिड़की पर आ गई।
राज अंकल शायद शराब पी रहे थे.. उसका यह रूप भी मेरे सामने आने लगा था। अपना लण्ड मसलते हुए वो धीरे-धीरे शराब पी रहे थे।
‘उसे चादर उढ़ा दी है.. वो गहरी नींद में सो गई है..’
यह सुनते ही जय अंकल ने माँ को अपनी बाँहों में भरते हुए चूम लिया।
मुझे उनके कमरे से अब राज अंकल की भी आवाज सुनाई दे रही थी..
मेरा दिल धड़क रहा था कि माँ की आज दो मर्दों से चुदाई होगी।
जय ने माँ को राज के पास जाने को कहा।
माँ धीरे-धीरे शरमाते हुए अंकल की तरफ़ बढ़ रही थीं.. उनके पास आकर वो रुक गईं.. और अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से उन्हें निहारने लगीं।
तभी माँ मेरे सामने मुँह करके आ गईं.. मैंने देखा कि उन्होंने आज बेहद ही कीमती ड्रेस पहना हुआ था.. छोटी सी ब्लैक रंग की बैकलेस कुर्ती और उसके साथ लाल रंग की जालीदार सलवार.. यह ड्रेस शायद राज अंकल माँ के लिए लाए थे।
मैं सोचने लगी कि अरे.. वाह माँ ऐसी ड्रेस में..
मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा था, ये दोनों हरामजादे आज रात को मेरी माँ की चुदाई करेंगे।
माँ का तराशा हुआ गुदाज गोरा जिस्म.. ट्यूबलाईट की रोशनी में जैसे चांदी की तरह चमक उठा। उनकी ताजी शेव की हुई चूत की फ़ांकें.. सच में किसी धारदार हथियार से कम नहीं थीं। कैसी सुन्दर सी दरार थी.. चिकनी शेव की हुई रसीली चूत।
‘उफ़्फ़्फ़.. कोमल.. आप भी ना.. अभी किसी मॉडल से कम नहीं हो।’ राज अंकल ने माँ के गोरे सफ़ेद जिस्म को चूमते हुए कहा था।
‘हा.. हा.. हा.. अच्छा जी.. जय भाईजान की मेहरबानी है.. यह जो तुम्हारे सामने हूँ।’
माँ उनसे लिपट कर बातें कर रही थीं। कभी तो वो मेरी नजरों के सामने आ जातीं.. और कभी आँखों से ओझल हो जाती थीं।
तभी राज अंकल ने माँ का हाथ पकड़ कर अपने सामने सामने खींच लिया और कुर्ती के ऊपर से ही उनके सुडौल चूतड़ों को दबाने लगे। माँ की लम्बाई चाचा के बराबर ही थी..
उफ़्फ़.. माँ ने गजब कर दिया.. उन्होंने राज अंकल की जीन्स की ज़िप धीरे से खोल दी।
‘क्यूं आपको.. मेरे सामने शर्म आ रही है क्या? अपने लण्ड को क्यूं छुपा रखा है.. जानेमन?’
तभी मेरी धड़कन तेज हो गईं.. अंकल ने माँ की सलवार के नीचे से माँ की गाण्ड को दबा दिया। माँ ने अपनी टांग कुर्सी पर रख दी.. ओह्ह्ह तो जनाब ने माँ की गाण्ड में उंगली ही घुसेड़ दी है।
वो अपनी उंगली गाण्ड में घुमाने लगा.. माँ भी अपनी गाण्ड घुमा-घुमा कर आनन्द लेने लगीं।
कमरबंद खींचते ही माँ की सलवार उनके शरीर से खिसक कर सरसराती हुई नीचे फ़र्श पर आ गिरी। माँ की सफ़ेद दूधिया माँसल टांगें नंगी हो चुकी थीं।
‘कोमल.. तुम कितनी सुन्दर हो..’
माँ ने मुस्कुराते हुए नजर नीची कर ली.. अंकल ने आगे बढ़ कर माँ को प्यार से गले लगा लिया। उनका दुपट्टा अलग करके उनके होंठों पर अपने होंठ लगा दिए थे, माँ तो जैसे उनसे चिपट सी गई थीं, दोनों के लब एक-दूसरे से मिल गए।
गहरे चुम्बनों का आदान-प्रदान होने लगा। अब राज अंकल माँ के नंगे भारी-भारी चूतड़ों को चीर कर उनकी गुदा द्वार में उंगली डाल रहे थे।
‘आउच…’
माँ के मुख से एक प्यारी सी ‘आह’ निकल पड़ी। पजामे में से अंकल का लण्ड उभर कर बाहर निकलने हो रहा था। माँ ने एक बार नीचे उनके लण्ड को देखा और अपनी चड्डी से ढकी चूत उनके लण्ड से टकरा दी। अब वो अपनी चूत वाला भाग लण्ड पर दबा रही थीं।
अंकल ने अपने दोनों हाथों से माँ की चूचियों को सहला कर दबा दिया.. तो माँ सिमट सी गईं।
‘कोमल.. मेरे लण्ड को भी प्यार करो..न..?’
अंकल ने माँ की गर्दन को चूमते हुए कहा।
मुस्कुराते हुए माँ धीरे से नीचे बैठ गईं और उनकी जीन्स को नीचे खिसका दिया.. फिर उसे धीरे से नीचे उतार दिया। अंकल का सात इंच का लण्ड बाहर आ गया.. उनका सुपाड़ा पहले से ही खुला हुआ था.. माँ ने मुस्करा कर ऊपर देखा और लण्ड को अपने मुख में डाल लिया। अंकल ने मस्ती में अपनी आंखें बन्द कर ली।
अब राज अंकल के हाथ माँ की ब्रा को खोलने में लगे थे.. माँ ने उनका लण्ड चूसना छोड़ कर पहले अपनी ब्रा को उतार दिया..
हाय रे… माँ के उरोज तो सच में बहुत सधे हुए थे.. हल्का सा झुकाव लिए.. चिकने और अति सुन्दर..
माँ ने फिर से उनका लण्ड अपने मुख में ले लिया और चूसने लगीं। अंकल के हाथ माँ के बालों में चल रहे थे.. उनके बाल खुल गए थे।
अब उन्होंने माँ को उठा कर खड़ा कर लिया- कोमल.. मुझे भी आप अपनी चूत को प्यार करने की इजाजत देंगी?’
राज की इस बात पर पहले तो माँ शरमा गईं.. फिर वो बिस्तर पर चित्त लेट गईं और उन्होंने अपनी दोनों टांगें ऊपर को खोलते हुए अपनी चूत पसार ली।
‘हाय.. कोमल.. इतनी चिकनी.. इतनी प्यारी.. लण्ड लगते ही भीतर फ़िसल जाए.. 34 साल की होकर भी तुम किसी कुंवारी लड़की से कम नहीं हो।’
‘ऐसे मत बोलो.. मेरी जान.. बस इसे चूम लो.. फिर चाहे जो करो.. भले ही उसमें अपना अन्दर उतार दो..’
राज- थैंक्स यार जय.. तेरे दोस्त की बीवी तो मस्त माल है.. मैं तो कहता हूँ कि परमानेंट बदल ले इसे मेरी बीवी से.. तू मेरी बीवी आयशा को जब चाहे.. जहाँ चाहे.. ले जाया कर.. और जैसे चाहे चोदा कर।
‘अरे यार.. तू भी कोमल को जब चाहे ले जा सकता है.. अब कोमल हम दोनों की दोस्त है।’
जय अंकल ने राज की इस बात का हँस कर जवाब दिया था।
‘अच्छा जी थोड़ा कम मस्का लगाओ..’
माँ को चुदने की बहुत लग रही थी.. इस पर अंकल ने अपना मुँह माँ की चूत पर लगा दिया.. और उनके दाने को उनके होंठों ने मसल दिया।
‘सीईईए..’ करते हुए माँ ने आँखें बंद कर लीं और अपनी चूत उछालने लगीं।
मेरी चूत में भी यह देख कर पानी उतर आया.. इधर मैं अपनी चूत को दबाने लगी।
माँ तो खुशी के मारे जैसे उछल रही थीं.. पर अंकल चूत से चिपके हुए उसका रस चूसने में लगे थे।
‘अब तड़पाओ मत.. जैसा मैं कहूँ वैसा करो..’
‘कोमल.. पीछे घूम कर कुतिया बन जाओ.. पहले तुम्हारी चिकनी गाण्ड मारूंगा..’
‘ओह.. तुम्हें भी गाण्ड मारना अच्छा लगता है.. कोई बात नहीं.. मेरे दोनों तरफ़ छेद हैं.. किसी को भी चोद दो.. पर पहले अपना ये लण्ड मुझे मुँह से चूसने दो ना..’
‘ओह.. जैसी कोमल जी की इच्छा..’
राज अंकल ने एक बार फिर बिस्तर पर बैठ गए और माँ को मुँह में अपना लण्ड दे दिया। माँ के मुँह से बीच-बीच में सिसकारी भी निकल जाती थी। वो अपने कठोर लण्ड को माँ के मुँह में मारते रहे और माँ ने अपनी चूत घिसवाना चालू कर दिया।
मुँह से लौड़ा चुसवाते हुए जैसे ही अंकल का वीर्य छलका.. माँ के मुँह से भी सीत्कार निकल पड़ी। माँ अंकल का सारा वीर्य गटक गई थीं.. और अब वे उनके लण्ड को चाट-चाट कर साफ़ करने लगी थीं।
‘इसमें आपको बहुत मजा आता है ना?’
‘हाँ’ कहते हुए उनके लण्ड को माँ ने हिलाया.. फिर माँ ने अंकल के लौड़े को अपने चिकने बोबे से लगा दिया और उसे अपनी छाती पर घिसने लगी।
माँ अब बिस्तर पर बैठ गईं और अपनी चिकनी चूत को उंगली से पहले सहलाने लगीं.. फिर चूत की फांक को मसलने सी लगीं। फिर माँ ने अपना दाना उभार कर देखा और उसे मसलने लगीं.. उन्होंने अपनी गीली चूत में अपनी उंगली घुसा ली और ‘आह’ भरते हुए हस्तमैथुन करने लगीं।
माँ जल्दी ही झड़ गईं.. वो शायद पहले से ही बहुत उत्तेजित थीं।
माँ के झड़ते ही राज अंकल माँ की चूत का रस चूसने लगे.. माँ ने उन्हें सिसकारी लेते हुए अपनी जांघों के बीच दबा लिया।
‘अब देखो.. मैं फ़िर तैयार हूँ.. अब मैं तुम्हारी जम कर गाण्ड चोदूँगा.. मजा आ जाएगा..’
माँ ने घोड़ी बन कर अपनी सुडौल गाण्ड पीछे की और उभार दी.. राज अंकल को गाण्ड मारने का शौक था, उन्होंने धीरे से लण्ड गाण्ड में डाल दिया और माँ मस्त हो गईं..
ये सब देखने में मुझे बहुत आनन्द आ रहा था।
माँ की गाण्ड को अंकल ने बहुत देर तक बजाया, माँ भी अंकल के स्खलित होने तक गाण्ड चुदाती रहीं।
माँ की गाण्ड मार कर अंकल सुस्ताने लगे।
‘जूस पियोगे या दूध लाऊँ?’
‘अभी तो दूध ही पियूँगा.. फिर जूस..’
‘ही ही ही..’
Reply
06-08-2021, 12:48 PM,
#49
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
माँ जैसे ही दूध लाने के लिए उठीं.. अंकल ने उन्हें फिर से गोदी में खींच लिया और उनकी चूचियों को अपने मुँह से दबा लिया।
‘कोमल.. मेरी जान कहाँ जा रही हो.. अपने दूध नहीं पिलाओगी क्या?’
अंकल माँ को गुदगुदाते हुए दूध पीने लगे।
‘हुंह..’
मैं अपनी चूत में उंगली करते हुए सोच रही थी कि अंकल माँ के दूध तो खूब चूस-चूस कर पी रहे हैं.. मेरे तो चूसते ही नहीं हैं..
माँ गुदगुदी के मारे सिसकारियाँ भरने लगीं।
‘बहुत प्यारे हो तुम दोनों.. कैसी-कैसी शरारतें करते हो..’
दोनों नंगे ही एक-दूसरे के साथ खेल रहे थे.. खेलते हुए उन दोनों में फिर से आग भरने लगी थी। जय अंकल का लण्ड फुंफकारने लगा था।
‘अब देरी किस बात की है..’ माँ ने चुदासे स्वर में कहा।
‘नहीं मुझे अभी दूध पीने दो.. न..’
‘पहले बस एक बार.. मेरे ऊपर चढ़ जाओ.. मुझे शांत कर दो..’
माँ ने अपनी दोनों खूबसूरत सी टांगें उठा लीं.. अंकल उन टांगों के बीच में समा गए। कुछ ही पलों में अंकल का मोटा लण्ड माँ की चूत को चूम रहा था। चाचा का लण्ड माँ की चूत में घुसता चला गया।
माँ आनन्द से झूम उठी थीं।
इधर मेरी चूत ने भी पानी छोड़ दिया.. मुझे भी एक मीठी सी गुदगुदी हुई।
मेरी माँ अपनी टांगें ऊपर उठा कर उछल-उछल कर चुदवा रही थीं और राज अंकल का लण्ड चूस रही थीं।
मेरा हाल इधर खराब होता जा रहा थ, माँ की मधुर चीखें मेरे कानों में रस घोल रही थीं।
दोनों गुत्थम-गुत्था हो गए थे.. कभी अंकल ऊपर तो कभी माँ ऊपर..! खूब जम कर चुदाई हो रही थी।
माँ को इस रूप में मैंने पहली बार देखा था.. वो एकदम रांड बनी हुई थीं। लगता था जिन्दगी भर की चुदाई वो तीनों आज ही कर डालेंगे।
तभी तीनों का जोश ठण्डा पड़ता दिखाई देने लगा..
अरे..!
क्या दोनों झड़ चुके थे?
सफ़र की इति हो चुकी थी.. हाँ सच में वो दोनों झड़ चुके थे।
राज अंकल ने मुस्करा कर माँ कर चूचे अपने मुँह में भर लिए और ‘पुच्च.. पुच्च..’ करके चूसने लगे।
माँ धीरे से नीचे बैठ गईं और राज का लण्ड पकड़ कर सहलाने लगीं, उसका लण्ड अपने मुँह में लेकर उसे चूसने लगीं।
राज कभी तो माँ की जांघें चूमता और कभी उनके बालों को सहलाता- जोर से चूसो कोमल डार्लिंग.. उफ़्फ़ बहुत मजा आ रहा है.. और कस कर जरा..
अब माँ जोर-जोर से ‘पुच्च.. पुच्च..’ की आवाजें निकालने लग गई थीं, राज की तड़प साफ़ नजर आने लगी थी।
फिर माँ ने गजब कर डाला.. माँ ने अपनी एक टांग उसके दायें और एक टांग राज के बायें डाल दी। राज का सख्त लण्ड सीधा खड़ा हुआ था, दोनों प्यार से एक-दूसरे को निहार रहे थे।
माँ उसके तने हुए लण्ड पर बैठने ही वाली थीं.. मेरे दिल से एक ‘आह..’ निकल पड़ी ‘माँ प्लीज ये मत करो.. प्लीज नहीं ना..’
पर माँ तो बेशर्मी से किसी रंडी की तरह उसके लण्ड पर बैठ गईं।
‘माँ घुस जायेगा ना.. ओह्हो समझती ही नहीं है..’
पर मैं उनके लण्ड को किसी खूँटा की तरह माँ की चूत में घुसता हुआ देखती ही रह गई.. कैसा चीरता हुआ माँ की चूत में घुसता ही जा रहा था।
फिर माँ के मुँह से एक आनन्द भरी चीख निकल गई।
‘उफ़्फ़्फ़.. कहा था ना जड़ तक घुस जाएगा.. पर ये क्या..? माँ तो राज से जोर से अपनी चूत का पूरा जोर लगा कर उससे लिपट गईं और अपनी चूत में लण्ड घुसवा कर ऊपर-नीचे हिलने लगीं।
अह्ह्ह.. खुदा वो तो मस्त चुद रही थीं.. सामने से राज माँ की गोल-गोल कठोर चूचियाँ मसल-मसल कर दबा रहा था। उसका लण्ड बाहर आता हुआ और फिर ‘सररर..’ करके अन्दर घुसता हुआ मेरे दिल को भी चीरने लगा था।
मेरी चूत का पानी निकल कर मेरी टांगों पर बहने लगा था। पूरी रात जय अंकल और उनके दोस्त राज ने मेरी माँ को किसी रांड की तरह चोदा था।
मुझे अपनी बारी का इंतज़ार था.. जो कि जल्द ही आने वाली थी।
मैं अपने बिस्तर पर आ गई और चूत में उंगली डाल कर अन्दर-बाहर करने लगी।
संयोग से एक रात को माँ को चुदवाते हुए देखकर मैं अपनी चूत में उंगली कर रही थी कि मेरे मुँह से सीत्कार निकल गई जिसको माँ ने सुन लिया। मैं जान नहीं पाई कि क्या हुआ लेकिन अगले दिन माँ का व्यवहार कुछ बदला-बदला सा था।
मुझसे रहा नहीं गया.. मैंने माँ से पूछा- क्या बात है माँ.. आज बहुत उदास हो?
माँ ने कहा- नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है।
कुछ देर के बाद माँ ने मुझे अकेले में बुलाया और बोलीं- कल रात..
इतना सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए.. मेरा चेहरा लाल हो गया।
तब माँ ने कहा- देखो बेटी मेरी उम्र इस वक़्त 32 साल है.. और तुम जानती हो कि तुम्हारे पापा बाहर रहते हैं.. उनको दुबई गए हुए दो साल से ऊपर हो गया।
ये सब कहते हुए माँ का गला भर आया.. उनकी आँखों से आंसू छलक पड़े। मैंने माँ को दिलासा दिया और कहा- मैं समझती हूँ.. कोई बात नहीं है माँ।
मेरी इस बात से उनका दिल कुछ हल्का हुआ और वो बोलीं- बेटी तुम नाराज़ नहीं हो न मुझसे?
मैंने कहा- नहीं माँ.. इसमें नाराज़ होने वाली कौन सी बात है.. ऐसा तो सबके साथ होता होगा?
माँ के चहरे पर कुछ मुस्कान आई।
मैं उस वक़्त कुछ और नहीं बोली।
उस दिन के बाद मैं तीन रातों तक माँ के चुदने का इंतज़ार करती रही लेकिन जय अंकल नहीं आए, उनकी चुदाई नहीं हुई।
अब मैं माँ की हमराज़ हो ही गई थी, मैंने माँ से पूछा- क्यों माँ.. आजकल अंकल रात को क्यों नहीं आ रहे हैं?
माँ ने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा- तुमको क्या दिक्कत हो रही है?
इधर मेरा भी तो जय के बिना बुरा हाल था, मुझे भी अंकल से चुदे कई दिन हो चुके थे। माँ के साथ-साथ मेरी चूत को भी लण्ड की ज़रूरत सताने लगी थी।
जिसका नतीजा यह हुआ कि मैंने बेअदबी के साथ माँ से कह दिया- माँ मुझे भी वही चाहिए.. जो तुम रोजाना रात को अपनी चूत में डलवाती हो।
माँ तो बिल्कुल सन्न रह गईं, उन्हें मुझसे ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी- देखो डॉली, तुम अभी बच्ची हो।
‘माँ मैंने आपको बताया नहीं.. जय अंकल मेरे साथ भी वो सब कर चुके हैं।’
‘क्या..???’
मेरे जवाब से माँ के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई थी।
‘माँ प्लीज़..’ मैंने माँ के गले लगते हुए कहा।
मेरी जिद के आगे माँ मजबूर हो गई थीं, उन्होंने कहा- ठीक है.. तुम्हारी चूत में भी लण्ड पेलवा दूँगी.. लेकिन ध्यान रहे पापा को ये सब बातें मालूम नहीं होनी चाहिए।
मैंने ख़ुशी से उछलते हुए कहा- ओके माँ.. तुम कितनी अच्छी हो।

दोस्तो.. जब मेरी माँ ने मुझसे कहा कि वे मेरी चूत में लण्ड पेलवा देंगी.. तो मैं बहुत खुश हुई कि मैंने माँ को मजबूर कर दिया था।
वैसे तो जय अंकल मुझे कई बार चोद चुके थे.. लेकिन अब मैं यह सब बिना डरे करना चाहती थी।
उसी दिन जब मैं नहाने जा रही थी तो माँ बाथरूम में आ गईं और दरवाजा बंद कर लिया।
वे बोलीं- अपने कपड़े उतारो।
मैंने माँ से कहा- माँ.. मुझे शर्म आएगी।
माँ ने मुझे डांटते हुए कहा- छिनाल कहीं की.. चूत और लण्ड का खेल देखकर पेलवाने की तुम्हारी हवस जाग उठी.. लेकिन यह नहीं जानती हो कि मर्द को क्या पसंद आता है? मर्द को चिकनी चूत चाहिए.. देखूं तुम्हारी झांटें साफ़ हैं या नहीं?
इसी के साथ माँ ने अपने सारे कपड़े उतार दिए और पूरी तरह नंगी हो गईं, उनकी चूत के बाल एकदम साफ़ थे।
सच में क्या शानदार चूत थी माँ की.. मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं इसी चूत के रास्ते बाहर निकली हूँ।
मैं भी फटाफट अपनी सलवार कुर्ती उतार कर नंगी हो गई। माँ ने मेरी चूत को सहलाया और बोली- आज तुम्हारे अंकल इसमें अपना लण्ड पेलकर बहुत खुश होंगे। एक बात बता दूँ.. उन्होंने मुझसे एक बार कहा था कि कोमल.. एकाध नए माल का इंतज़ाम करो.. पैसों की फ़िक्र मत करना।
माँ ने मुझे रगड़-रगड़ कर अच्छी तरह नहलाया.. मेरी चूत के बाल साफ़ किए और तब बोलीं- अब तुम्हारी चूत लण्ड लेने के लिए एकदम तैयार है।
शाम को राज अंकल आए तो मैं उनको निहारती रह गई। क्या बलिष्ठ गठा हुआ बदन पाया था अंकल ने..! मैं समझी कि माँ जय अंकल की बात कर रहीं हैं लेकिन मेरी चुदाई का प्रोग्राम राज अंकल के साथ था।
हम लोग खाना खाकर लेटने की तैयारी करने लगे। आज हम तीन लोग एक ही कमरे में एक ही बिस्तर पर आ गए।
माँ ने अंकल से कहा- क्यों जी.. आप किसी नए माल के बारे में कह रहे थे.. आज मैं अपनी मासूम बच्ची को आपके हवाले कर रही हूँ.. लेकिन ध्यान रखिएगा.. कि बेचारी की चूत एकदम कोरी है बहुत आराम से पेलिएगा..
‘फ़िक्र मत करो कोमल.. बस तुम देखो कैसे आज मैं तुम्हारी इस बच्ची को मासूम कच्ची कली से पूरी औरत बनाता हूँ।’
‘हम्म..’
अंकल बोले- कोमल.. तुम भी तो साथ ही रहोगी.. जब मैं इसकी चूत में अपना डंडा पेलूँगा.. तो तुम देखती रहना।
माँ ने कहा- हाँ मेरा रहना ज़रूरी है.. क्या पता तुम क्या हाल करोगे मेरी बच्ची का..
माँ ने हँसते हुए जवाब दिया।
मैं बोली- माँ मैं बच्ची नहीं हूँ.. आप ऐसे ही डर रही हो..
इस दौरान माँ ने कुर्ती और सलवार निकाल दी, मेरी चूत को सहलाकर अंकल को दिखाकर बोलीं- देखो जी कितनी चिकनी गुलाबी चूत है.. मेरी रानी बिटिया की..
मैंने अंकल के पजामे पर हाथ फ़ेरते हुए कहा- अंकल इस उम्र में भी आपका लण्ड भी कोई कम नहीं है..
माँ ने भी अपने सारे कपड़े उतार दिए, अंकल भी अपने कपड़े उतार चुके थे, अब हम तीनों मादरजाद नंगे थे। अंकल मेरे होंठों को चूसते हुए एक हाथ से मेरी चूत को सहला रहे थे.. तथा दूसरे हाथ से माँ की गाण्ड सहला रहे थे।
मैं तो गर्म होने लगी.. लेकिन माँ अभी गरम नहीं हुई थीं।
माँ ने मुझसे पूछा- क्यों बेटी.. लण्ड चूसोगी?
मैंने कहा- आप लोग जैसा आदेश करें.. मैं तो अनाड़ी हूँ.. मुझे आप लोगों की निगाहबानी में ही चूत चुदवानी है।
माँ बोलीं- तब ठीक है..मैं जैसा कहती हूँ.. तुम वैसा करो।
हम तीनों ऐसी पोजीशन में हो गए कि मैं राज अंकल का लण्ड चूस रही थी। माँ मेरी चूत चाट रही थीं और अंकल माँ की चूत चाट रहे थे.. अर्थात तीनों लोगों ने एक सर्किल बना रखा था।
मैं तो माँ द्वारा चूत की चटाई से ही एक बार झड़ गई।
थोड़ी देर बाद मैंने माँ से कहा- माँ.. मेरी चूत में जल्दी लण्ड डलवा दो नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगी।
माँ ने कहा- अच्छा.. अपनी टांगें फैलाकर पीठ के बल लेट जाओ.. मैं वैसलीन की शीशी लाती हूँ।
माँ ने मेरी चूत के अन्दर वैसलीन लगा दी और अंकल से बोलीं- मेरी रानी बिटिया की कुंवारी चूत को अपने लम्बे लण्ड से आबाद कीजिए।
माँ ने अंकल के सुपाड़े पर भी वैसलीन लगा दी। अंकल ने मेरी टांगों को फैलाकर लण्ड को मेरी प्यासी चूत के मुहाने पर रखा और मेरी माँ ने अंकल के पीछे से मेरी चूत को फैला रखा था।
अंकल ने धक्का लगाया लेकिन निशाना चूक गया।
मेरी चूत लौड़े के लिए तड़प रही थी.. कि जल्दी से उसमें लण्ड घुसे, मैं लगभग रोते हुए बोली- माँ.. पेलवा दो न.. क्यों देरी हो रही है?
माँ ने कहा- इस बार घुस जाएगा बेटी.. घबराओ मत.. मैं भी तो लगी हूँ इसी कोशिश में.. पेलिए जी मेरी बेटी को.. देखो बेचारी तड़प रही है।
जब इस बार अंकल ने अपना सुपाड़ा घुसा दिया तो मुझे लगा कि मेरी जान निकल जाएगी.. लेकिन मैंने अपने दांत भींच लिए।
‘आईईए.. माँ.. दर्द हो रहा है..’
मैंने सोचा नहीं था कि राज अंकल का लण्ड जय अंकल से मोटा और लम्बा भी है।
‘बस.. बस.. धीरे धीरे.. राज.. अभी ये कमसिन कुंवारी है..’
माँ मेरी चूत को पीछे से सहला रही थीं ताकि दर्द न हो।
अंकल ने थोड़ा और घुसाया तो मुझे लगा कि अब पूरा हो गया.. लेकिन जब मैंने अंकल से कहा- अब धक्का लगाइए.. तो उनके बोलने से पहले माँ ने बाहर निकले हुए लण्ड को नापकर कहा- बस बेटी 5 इंच लण्ड अभी बाहर है.. 3 इंच तो तुमने निगल लिया है।
यह सुनकर मेरी तो हालत खराब हो गई.. खैर अंकल ने थोड़ा और जोर लगाया.. तो दो बार में पूरा लण्ड जड़ तक घुस गया। अंकल ने स्पीड तेज़ की तो धीरे-धीरे मुझे मज़ा आने लगा।
मैं बोलने लगी ‘आह्ह्ह्ह ऊह..ह उह.. पेल दो अंकल.. फाड़ दो मेरी चूत को.. उफ़..’
थोड़ी देर के बाद ‘फच.. फच..’ की आवाज़ आने लगीं।
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06-08-2021, 12:48 PM,
#50
RE: मस्तराम की मस्त कहानी का संग्रह
मुझे बहुत अच्छा लग रहा था.. अंकल ने मेरी छोटी-छोटी कच्ची गुलाबी चूचियों के निप्पल को दबा-दबा कर लाल कर दिया था।
उधर माँ मेरी चूत को सहला रही थीं.. बीच-बीच में वह मेरी चूत और उसमें फंसे हुए लण्ड को चाटने भी लगती थीं।
माँ सिर्फ कॉलेज में ही नहीं बल्कि बिस्तर पर भी एक अच्छी टीचर थीं।
कुछ देर के बाद मुझे ऐसा लगा कि मैं आसामान में उड़ रही हूँ। अंकल ने मेरे छोटे से दुबले-पतले जिस्म को अपने कसरती शरीर में खूब जोर से भींच लिया था।
मैं अपनी गाण्ड इस क़दर उचकाने लगी कि लण्ड खूब गहराई तक घुस जाए।
अब मेरा काम-तमाम होने वाला था। मैं बड़बड़ाने लगी- अह.. मेरे राजा उन्ह.. आह औउच.. ओह.. मैं आ गई.. आह..ह ह हह ओह.. ओहोहोह..
मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया.. लेकिन अंकल रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। माँ ने मुझसे पूछा- क्यों बेटी मज़ा आया? कहो तो अब मैं भी चुदवा लूँ.. तुम्हें चुदवाते देखकर मेरी चूत भी पनिया गई है।
अंकल ने अपना 8 इंच का लपलपाता हुआ लण्ड बाहर निकाल लिया। माँ को इतना जोश चढ़ चुका था कि अंकल ज्यों ही पीठ के बल लेटे, माँ ने उनके खड़े लण्ड को अपनी चूत में फंसा दिया और धक्का मारने लगीं।
मैं माँ के पीछे जाकर उनकी चिरी हुई चूत में अंकल के फंसे हुए लण्ड को देखने लगी।
क्या गज़ब का नजारा था। मैं चूत लण्ड के संधिस्थल को चाटने लगी। मेरी चूत फिर से पनियाने लगी थी। माँ ने उछल-उछल कर खूब चुदवाया। अब माँ पीठ के बल लेट गईं और अंकल ने सामने से अपना लण्ड घुसा दिया और जोर-जोर से चोदने लगे।
थोड़ी देर बाद उनका पानी निकल गया। उस रात को अंकल ने मुझे तीन बार और माँ ने जबरन दो बार चूत चुदवाई।
रात के तीन बजे हम लोग सो गए।
फिर धीरे-धीरे हम चारों एक साथ इस खेल को खेलने लगे थे। माँ के कहने पर राज ने इस गैंग-बैंग में अपनी पत्नी आयशा को भी शामिल कर लिया था, वो आयशा को अपने साथ हमारे घर लाते और तीन गर्म बदनों के साथ खेलते।

समाप्त
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