antervasna चीख उठा हिमालय
03-25-2020, 01:22 PM,
#51
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
बागरोफ अच्छी तरह समझ चूका था, बातों से जितने मूर्ख नजर आत्ते हैं, ये असल में उतने ही खतरंनाक है। कहने को तो वह न जाने क्या कह रहा था किन्तु दिल में सोच रहा था कि वह एकसाथ इन दोनों पर काबू कैसे पाये ? उसका दिमाग बडी तेजी से काम कर रहा था । ईतना वह समझ चुका था कि, अगर वे एक बार वह हावी हो गये तो फिर वह बच न सकेगा है अचानक उसकी नजर मशाल पर गई।

वह फुर्ती के साथ मशाल पर झपटा तो---

"अरे…अरे...रे ... चचा पागल हो गये तुगलक --इन्हें पकड़ ।"

किन्तु, इससे' पूर्व कि इनमें से कोई वागारोफ के झपटे बागारोफ ने मशाल सम्भाल ली और विद्युत की तीव्रता के साथ उनकी तरफ घूम गया । उस पर झपटने का प्रयास कर रहे दोनों ही ठिठक गये ।

नुसरत कह रहा था --"मै कहता न था तुगलक, हमारे मजाक को चचा गलंत समंझेंगे वही हुआ । अब तुझे नहीं छोड़ेगे चचा । मर साले मैं तेरी क्या मदद कर सकता हूं ?"

हाथ में मशाल लिये बागारोफ नुसरत की तरफ ही बढ़ रहा था ।

उधर तुगलक कह रहा था नुसरत की क्या गलती है चचा, गलती तो मेरी है । मजाक तो मैंने किया था, सजा मुझे दो ।"


" सच चचा !" कान पकड़ लिये नुसरत ने -----" मेरी कोई गल्ती नहीं है । सजा देनी है तो इसे ही दो चचा मैं तो ......"

तेजी से घुमाकर मशाल का एक बार बागरोफ ने नुसरत पर किया ।
गजब की फुर्ती के साथ स्वयं को वचाता हुया नुसरत चीखा-"अबे ओ उल्लु के पदृठे तुगलक की दुम, साले मरवा दिया मुझे ।"

और…जैसे रो पड़ा तुगलक-"नहीं चचा, मेरे गुनाहों की सजा नुसरत को न दो । कहता हुआ तुगलक अभी उस पर झपटने ही बाला था कि बागरोफ ने तीव्रता के साथ उसकी तरफ मशाल घुमा दी ।

मशाल सटाक से उसके चेहरे पर लगी ।

" मर साले और कर चचा से मजाक ।" नुसरत चीखा ।

सचमुच, तुगलक के चेहरे पर मशाल बहुत जोर टकराई थी । उसके मुंह से चीख निकल गई, किंतु- बागरोफ की तरफ से तुरन्त ही होने वाले वार से उछलकर स्वंयं को बचाता हुआ वह रो पडा बोला--" माफ कर दो चचा,मैं उसे चिमटे की कसम खाकर कहता हैं, जिससे पकड़कर मेरे अब्बा ने मुझे अम्मी क पेट से निकाला था । अब तुमसे कभी मजाक नहीं करुगाँ ।"

"अब रोता क्या है साले चचा के पैरों में गिरकर माफी मांग।" नुसरत ने उसे डांटा ।

तुगलक ने जैसे ही बागरोफ के कदमों में झुकना चाहा, बागारोफ ने पुन: उस पर मशाल का वार किया ।

" नहीं चचा , ऐसा न करो ।" तुगलक ने 'कहा-"मुझे माफी मांगने का मौका तो दो ।"



तुगलक गिड़गिड़ाता रहा ।


' रह-रहकर नुसरत तुगलक को कोस रहा था कि उसने चचा से मजाक किया ही कयों ? बीच बीच में वह बागरोफ से तुगलक को क्षमा कर देने का भी अनुरोध करता है मगर
तुगलक और नुसरत की चाल बागारोफ समझ चुका था । वह समझ चुका था कि जिस तरह मुर्खता पूर्ण बाते करने में वे एक दूसरे से काफी आगे हैं, उसी प्रकार बातों में फंसाकर बार करने में भी एक से आगे एक है ।
वे दोनों इसी चक्कर में थे कि जिसका भी मौका लगे, यह बागारोफ को दबोच ले जबकि बागरोफ का प्रयास था कि इतना अवसर उनमें से किसी को भी न मिल सके ।
बे दोनों ऊटपटांग बातों के-साथ अपने बचाव में रहे किन्तु--विजयी हुआ यागारोफ । .

करीब तीस मिनट पश्चात् एक प्रकार से वे दोनों बागारोक की कैद में थे ।कई पलों के लिये तीनों के दिल की धड़कनें मानों बन्द हो गई ।

किसी बुत की भांति वे खड़े रह गये -- सागर तट पर ।

उन तीनों के सामने वतन पड़ा था । झुलसा हुआ --- जला हुआ वतन । मस्तक पर पडा़ बल इस बात का प्रमाण था कि वह वतन ही है । चमन का मसीहा । धनुषटंकार का भाई । अपोलो का मालिक ।

गीले रेत पर जला हुआ वतन पड़ा था ।

फूट-फूटकर रो पड़ा नादिर । अपोलो चीख चीखकर अपने सींग रेत में पटकने लगा । धनुषटंकार है मुंह से एक डरावनी आवाज निकली रोने की आवाज । वह भी सिर पटक पटककर अपोलो की तरह रोने लगा ।

नादिर किसी बच्चे की तरह कुट-कूटकर रो रहा था ।

ना जाने कितनी देर तक वतन के दीवाने पागलो की तरह रोते रहे ।

जब उन्हें होश आया तो देखा-चमन के हजारों नागरिक उन्हें घेरे खड़े थे ।

सभी रो रहे थे । सारा चमन रो रहा था। रोता क्यों नहीं, उनका मसीहा-उनका देवता जो सामने पड़ा था----जला हुआ ।।

अचानक-वतन के मुंह से एक कराह निकली ।

नादिर के साथ साथ अपोलो और धनुषटंकार चौके । उन दोनों के मस्तक उन्हीं के खून से सने थे ।

"अभी महाराज जिन्दा हैं ।" रोते हुए नादिर के मुंह से खुशी की एक किलकारी निकली-"इन्हें महल में ले चलो ।"

फिर जले हुए वतन को महल में लाया गया । शरीर पर से इस तरह के तिनके उतर रहे थे जैसे जले हुये गत्ते पर से उतरते है । चमन के यौग्यतम जसूसों ने राष्ट्रपति भवन के उस विशेष कक्ष में पडे़ पलंग को धेर लिया ।

अभी वे अधिक कुछ नहीं, कर पाये थे कि वतन ने कराहकर नेत्र खोल दिये । फफोलेयुक्त आखों से उसने चारों तरफ देखा । यह समझते ही कि वह राष्ट्रपति भवन में है, बिस्तर पर उठकर बैठ गया ।


डॉक्टरों ने इन्कार किया तो वतन की वाणी गूँज उठी -"बतन मरा नहीं है साथियों---सिर्फ जला है औरर जलकर कुन्दन सी तरह चमका है ।"

सुनने बाले रो पड़े । धनुषटंकार और अपोलो उससे लिपट गए ।

फिन्तु-देखने बालों ने देखा वतन के जले हुए होंठों पर एक दर्द युक्त मुस्कान उभरी ।।।





वतन बोला, "रोते नहीं पागलो, इस दुनिया ने वतन की दिखा दिया है कि दुनिया कितनी धिनौनी हैं ? कितनी डरावनी और बदसूरत है, मेरी तरह । मैं इस दुनिया को जवाब दूंगा--जबाव ।" कहकर धनुषटंकार अौर अपोलो को अलग-अच्चा हटा दिया उंसने ।

मुलाजिम रोकते ही रह गये अौर वतन उठकर खड़ा हो गया । डॉक्टर यह कहते ही रह गये कि अभी उसका उठना ठीक नहीं है, लेकिन वह नहीं माना । चमन में किसका साहस था जो वतन की इच्छा का विरोध करता.

यूं जला हुआ वतन बाहर आ गया । ।

चमन का बच्चा-बच्चा राष्ट्रपति भवन के बाहर खडा था ।

एक दृष्टि वतन ने सागर की भांति उमड़ते विशाल ज़न् समुदाय 'पर डाली । मस्तक पर वल पड़ गया । आंखों से नीर तैर उठा ।।

वातावरण में मौत का सा सन्नाटा था । अभी कुछ कहने ही जा रहा था वतन कि सफेद, बेदाग--दूध जैसे कपडे लिये उसके पास अपोलो पहुंचा । सुनहरे फ्रेम का एक काला चश्मा भी था उसके पास। रोते हुए अपोलो ने वतन का वह सामान उसके आगे कर दिया ।

हल्के से मुस्कराया वतन ।अंपोलो को प्यार किया । तड़प-तड़प-खूब चूमा उसे ।

फिर-अपनी प्रजा के समक्ष ही सफेद कपड़े पहने उसने आँखों पर चश्मा लगाया ।

सारा चमन वहाँ मौजूद था, लेकिन संन्नटा ऐसा कि सुई भी गिरे तो बम जैसा विस्फोट हो । एक बार पुन: बंतन ने अपने दीवानों को चश्मे के अन्दर से देखा । फिर-वतन की वाणी जन-जन् के कानों तक-पहुंची---'" प्यारे देशा वासियों ! मैं देख रहा हैं कि आज तुम्हारी आँखों में आसू हैं ।





हर आँख में आंसू देख रहा हूँ । मुझे ये अाॉसू पसंद नहीं । जो आंसुओं को न रोक सकता हो, वह उन्हें काले चश्मे से ढक ले । क्यों--मेरे जिगर के टुकडों की आँखों में आँसू क्यों हैं ? अपने वतन की सूरत देखकर ? यह देखकर कि कल का खूबसूरत वतन आज जलकर दुनिया का सबसे वदसूरत व्यक्ति बन गया है ? इसमें रोने की कोई वात नहीं है प्यारे चमन के निवासियों । रोने की बात तो यह है कि ये दुनिया-तुम्हारे वतन की तरह वदसूरत है । उसी दुनिया ने तुम्हारे वतन को अपनी तरह बदसूरत बना दिया है । अभी नहीं बताऊँगा प्यारे देशवासियों कि मुझे बदसूरत किसने बनाया ा है ? यह रहस्य मैं तुम्हें नहीं, एक साथ सारी दुनिया को वतलाऊंगा । तभी आप भी जान लेंगे। मैं अपनी प्रयोगशाला में जा रहा हूँ । कुछ ही देर पश्चात दुनिया के हर टी० वी० सेट पर मेरा चेहरा उभरेगा । सारी दुनिया के साथ आप भी जान तेने कि यह दुनिया कितनी बदसूरत है ।"

एक क्षण सांस लेने हेतु रूका वतन, फिर बोला-"आप लोगा से सिर्फ इतना ही कहना है की कोई भी घवराये नहीं । वतन अभी जिन्दा है । आज मैं आपका खूबसूरत वतन न सही, जला हुआ वतन तो हूँ । बदसूरत वतन तो है । कम-से-कम उस समय तक जब तक कि वतन किंसी भी सूरत में जीवित है--चमन को दुनिया से नहीं, दुनिया को चमन से डरना होगा । अगर तुम्हें वतन क् चेहरे से नहीं, दिल से मुहब्बत है तो तुम सबको कसम है अपने वतन की, कोई भी एक भी आँसू आँखों में न आने दे । जो भी यह जानना चाहता हैकि मैं आगे क्या करने जा रहा हूँ, वह कुछ ही देर बाद टी० बी० पर मेरी आबाज सुन ले । जो कुछ मुझे करना है, उसकी घोषणा मुझे सारी दुनिया के सम्मुख करनी ।"
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03-25-2020, 01:22 PM,
#52
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
पुन: एक क्षण के लिए चुप होकर वतन ने जनसमुदाय को देखा । पूर्णतया सन्नाटा । कोई पक्षी तक भी तो नहीं चहचहा रहा था ।
सन्नाटे कों बेंधती वतन की वाणी पुन: जनसमुदाय के कर्ण पर्दों से टकराई----"फिलहाल सिर्फ इतना ही कहना है मुझे आपसे कि आप लेशमात्र भी न घबराएँ है तनिक भी चिंतित न हों । आपके वतन में सिर्फ उतना ही परिवर्तन आया है कि वह बदसूरत बन गया । यह बदसूरती अच्छी ही है, जो मुझे देखेगा उसे याद आ जाएगा कि ये दुनिया कितनी है
बदसूरत है । मुझे बिदित है कि आपके ह्रदय में विभिन्न प्रकार के प्रश्व चकरा रहे हैं । मैं वादा-करता हूँ कि आपके सभी प्रशन का उत्तर मैं कुछ, हो देर बाद टी ० दी ० पर दूंगा । फिलहाल मुझे प्रयोगशाला जाना ।"

वतन का वाक्य पूर्ण होते-हौते धनुषटंकार मुख्य द्वार पर वतन की सफेद कार लेकर पहुंच गया।

वतन कार में बैठा।

स्वयं ड्रांइविग सीट पर ।

अपीलों और धनुपटकार ने बैठना चाहा तो----

"तुम नहीं मोण्टों । अपोलो, तुम भी नहीं ।" वतन ने ,गंभीरता के साथ कहा…"आज हमें अकेलेे ही प्रयोगशाला-जाना । राष्ट्रपति भवन का टी.वी खोल कर तुम भी तुम भी सुनो हम क्या कहते है ?"

अवाक् से खड़े रहगए दोंनों।

कार एक झटके के साथ आगे बढा दी थी वतन ने । काई की भांति कटकर भीड़ ने उसके लिए रास्ता छोड़ दिया ।

"हमारा देवता ।" भावावेश में नादिर चीख पडा ।

"जिन्दाबाद " जनसमुदाय के जयघोष से गगन कांप उठा ।


"वतन जिन्दाबाद !" के नारों से समस्त दिशायें नाद कर उठी ।

कार ड्रराइव करते वतन के होंठों पर ऐसी मुस्कान उभरी थी मानो इन नारों ने पुन: जलने से पूर्व जैसा सुन्दर बना दिया हो ।

अपोलो और धनुषठंकार अबाक् से खड़े रह गये ।



पन्द्रह्र मिनट पश्चात टी. बी पर डरावऱना भंयकर और बदसूरत वतन का चेहरा उभरा । वह कह रहा था----"आपके टी. बी प्रोग्राम में बिघ्न पडा.. इसके लिये मैॉ क्षमा चाहता हूँ । कुछ कहने से पूर्व आपको ये बता दूं कि दुनिया के प्रत्येक उस टी..बी सेट पर जो इस समय आँन है, मेरा ही चेहरा और आवाज है । कुछ लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात होंगी कि उनके चलते हुए टी . वी प्रोग्राम बन्द क्यों हो गए और मेरा चेहरा कैसे उभर आया । इस प्रश्न के उत्तर में मैं सिर्फ इतना ही कहना उचित समझता--कि मेरे पास ऐसे साधन हैं कि मैं जब भी चाहूं । रेडियो अथवा टी. वी के माध्यम से एकसाथ सम्पूर्ण, दुनिया से संबन्ध स्थापित कर सकता हूँ ।

मै चाहता तो रेडियो पर आपको सिर्फ अपनी आवाज भी सुना सकता था ।

किन्तु नहीं-अंबाज के साथ-साथ आप लोगों को में अपना चेहरा भी दिखाना चाहता था ।

संभवत: आपने पहचाना भी हो मुझे ।


मेरी सूरत में थौड़ा परिवर्तन आ गया है, अत: संभव है कि आप मुझे पहचान न सके हों । अतः आपको अपना परिचय देदेना चाहता हूँ । मैं महान सिंगही का शिष्य औऱ नंन्हे -से देश चमन का राजा वतन हूं।

सबने मुझे देखा है, किन्तु वह वतन वहुत सुन्दर था ।

मेरी सूरत देख आप यह भी सोच सकते हैं कि वतन के नाम से यह कौन बदसूरत व्यक्ति बोल रहा है, परन्तु किसी प्रकार के भ्रम का शिकार न हों । वास्तव मे मैं दुनिया की सूरत में तो अब आया हूं । अाप भी शायद इस बात को जानते होंगे कि मेरी तरह ही बदसूरत है दुनिया ।

सच --- मेरे गुरू महान सिंगही सच ही कहते थे कि -- बड़ी बदसूरत है यह दुनिया ।


मैं कहता था ---- दुनिया बड़ी खूबसूरत है उसी तरह जैसे पहले मैं खूबसूरत था ।

मेरा भ्रम टूट ग़या ।

सिंगही गुरू जीत गये ।

मैंने वेवज एम बनाया था ।

हर देश ने यह आदेश देकर अपने जासूसों को चमन के लिए रबाना कर दिया कि चमन से या बेवज एम का फार्मूला गायब कर दो अथवा वतन का अपहरण कर लो ।

मैं जानता हूँ -कि जिन महाशक्तियों ने यह घृणित्र कार्य किया है, सारी दुनिया के साथ-साथ वे भी इम समय मेरा चेहरा देख और आवाज सुन रही हैं । सुन रही हैं तो गौर से सुने । वतन का एक एक लफ्ज विशेष रूपसे उन्हीं के लिए है । मैं उनका नाम सारी दुनिया को बता रहा हूँ वे देश हैं रूस, अमेरिका, चीन, इंग्लैड और नादान पाकिस्तान भी । इन् पांच देशों ने अपने-जासूस चमन भेजे ।

अन्तर्राष्ट्रीय अदालत और यु.एन.ओ सुन ल कि मैं इन्हें किसी अन्य राष्ट्र में घुसकर महत्त्वपूर्ण चीज चूरने का दण्ड दूंगा । सारी दुनिया सुन ले कि वतन इन्हें दण्ड देगा ।

चीन---चीन के कर्णधार सुन लें जिसके जसूसों ने मेरे चेहरे पर यह परिवर्तन किया है । मुझे जला डाला है । वे सतर्क रहे---कहीं उनका चीन भी मेरे चेहरे की भांति जलकर राख न हो जाये । मैं उनसे प्रतिशोध लूंगा--- वतन का प्रतिशोध कितना भयानक होगा, सारी दुनिया उसे अपनी आंखों से देख सकेगी । जिस देश ने मेरे विरुद्ध चीन की सहायता की उसका हश्र भी चीन के समान ही होगा ।

उन शब्दों के बाद दुनिया के टी.बी स्क्रीनों से वतन का चेहरा गायब ।
वतन की पूरी बात सुनने के पश्चात् अलफांसे ने कहा---"लेकिन इससे तो तुम्हारे ही देशवासियों को असीम दुख होगा ।"

एक क्षण के लिए वतन के गुलाबी होंठों पर-चिर-परिचित मुस्कान दौड़ गई--- हल्के से बोला---"मेरे देशवासीयों का दुख अस्थाई होगा, चचा ! मैं जानता हूं कि जब वे अपने वतन को जला हुआ देंखेंगे तो उन्हें कितना दुख होगा-किन्तु उन्हें यह अस्थायी दुख देना मेरे लिए आवश्यक है।"

'"लेकिन तुम्हारा उद्देश्य क्या है ?"

" हां चचा, आपका यह प्रश्ऩ अति महत्वपुर्ण है ।" वतन ने कहा-"मैं इन महांशक्तियों को जी भी दण्ड देना चाहता हूँ, खुलकर दूंगा । सारी' दुनिया जानेगी कि वतन क्या कुछ कर रहा है । यू.एन.ओ. और अदालत की दृष्टि में मैं अपराधी होऊंगा । चीन निश्चय ही मुझ पर मुकदमा करेगा । अदालत में वह यह भी प्रमाणित करने ही चेष्टा करेगा कि मैंने क्या कुछ किया है । भले ही सभी देश आजाद हों , किन्तु यू.एन.ओं माध्यम से सभी निश्चित कनूनों के दायरे में बंधे हैं । मैं उस दायरे से बाहर रहना चाहता हूं ।"

" किस प्रकार ?"

एक क्षण तक अलफासे की तरफ देखता रहा वतन, फिर उसकी बात का कोई उत्तर न देकर वह पिशाचनाथ की तरफ देखता हुआ बोला---" पहले तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो पिशाच ।"

अगर उत्तर बन पड़ा तो अवश्य दूंगा ।" सतर्क होकर पिशाच सम्मानित स्वर में बोला । दिल-ही दिल में पिशाच वतन की महानताओं से प्रभावित हो चुका था । वह: वतन का बहुत सम्मान करता था ।"

"जो योजना मैंने तुम्हे बताई है ।" वतन ने कहा-" वह चचा के साथ-साथ तुम भी सुन चुके हो । यह भी समझ गए हो कि मेरी योजना का मुख्य अंग तुम हो । हकीकत पूछो तो तुम्हें दिमाग में रखकर ही मैंने यह योजना तैयार की है । तुम्हारे ही मुंह से सुनना चाहता हूँ कि क्या वह सव कुछ तुम सफलतापूर्वक कर सकते हो जो कुछ मेरी योजना में करना है ?"




" कर तो सकता हैं, किन्तु ....!"

हल्के से मुस्कराया वतन बोला----"तुम्हारी किंन्तु का अर्थ समझता हूँ । तुम्हारी हिचक का कारण भी जानता हैं, लेकिन इस किन्तु को बीच में से हटाने से पूर्व तुमने यह जानंना चाहता हूं कि क्या तुम अपने चेहरे पर मेरी सूरत का ऐसा मेकअप कर सकते हो कि कभी कोई यह न जान सके कि तुम वतन नहीं, पिशाच हो ?"


"आप स्वयं भी कभी नही जाने सकेंगे ।"

"क्या तुम अपने शरीर को उस हद तक जला हुआ दिखा सकते हो, जितना मैंने बताया है ?"

"राक्षसनाथ के तिलिस्म से प्राप्त मेरे पास ऐसे-ऐसे लेप है कि किसी का भी शरीर जले नहीं अौर देखने बाले यही समझे कि वह जलकर राख होगया है ।" पिशाचनाथ ने थोड़े गर्व से कहा… बड़े बड़े डाक्टर भी उसका शरीर देख कर यह नहीं कह सकते किं वह जला हुआ नहीं है ।"
"चलने-फिरने , बोलने में मेरी नक्ल तो तुम कर ही लोगे ?"

"'इस काम में तो महारथ हासिल है मुझे ।" पिशाचनाथ ने कहा-"मैं किसी की भी हू-ब-हू नकल कर सकता हूं ।"

एक क्षण की चुप्पी के पश्चात वतन ने पुन: कहा---"अब मैं तुम्हारी "किन्तु' का निदान करता हूं ।"" कहने के पश्चात् अलफांसे पर दृष्टि जमाकर वतन बोला---"चचा पिशाचनाथ को मैं जला हुआ वतन बनाकर चमन में पहुंचाऊंगा । हम तीनों के अतिरिक्त सभी यही जानेंगे कि वतन जल गया है, वहां पहुंचकर पिशाच को क्या कुछ करना है, वह मैं बता ही चुका हूं । इधर मैं चीन में घुसकर अपना काम कर रहा होऊंगा, उधर मेरे मेकअप में पिशाचऩाथ जला हुआ वतन बनकर राष्ट्रपति भवन में पड़ा होगा । जले हुए वतन के रूप में पिशाचनाथ सारी दुनिया के टैलीविजनों पर यह घोषना करेगा कि वह महाशक्तियों से बदला लेगा । चमन के नागरिक पिशाचनाथ से प्रार्थना करेंगे कि जब वह ठीक हो जायें तब वह महाशक्तियों से बदला लें । जले हुए वतन के रुप में पिशाच इस प्रार्थना को स्वीकार लेगा । बह आराम करेगा। इधर जो कुछ करना है--मैं करूंगा ।"

" इससे क्या होगा ?"

" जव महाशक्तियाँ यह प्रचार करेगी-कि वतन यह सब कुछ कर रहा है तो जला हुआ वतन विश्व के सभी टैलीविजनों पर यह घोषणा करेगा कि बह महाशक्तियों को ख्बाव चमक रहा है । अभी तो वह ठीक भी नहीं हुआ है ।"

"ओह !" अलकांसे के मुंह से निकला----" तो यह यू.एन.ओ. और अंतर्राष्ट्रीय अदालतों से बचाव का रास्ता है ? तुम जो कुछ कहना चाहते हो, वह खूलकर अपने नाम से करोगे और दुसरी तरफ यह भी प्रमाणित करते रहोगे कि वतन तो अभी बिस्तर से नहीं उठा है ।



" बेशक---यही सोचा है मैंने ।"

"बिल्कुल ठीक सोचा है तुमने ।" अलफांसे ने मुस्कान के साथ कहा--" तुम्हारा समर्थन करता हूँ ।"

" तो फिर पिशाच की किन्तु सुलझा दीजिए चचा !" वतन ने कहा--" मैं समझता हूं कि 'किन्तु' का कारण सिर्फ यह है कि जो कुछ मैंने इन्हें करने के लिए कहा है, वह करने का आदेश अभी तक इन्हें आपकी तरफ से नहीं मिला है"

"'मेरा आदेश है ।"

पिशाचनाय का चेहरा चमचमा उठा ।

उसने अलफासे के चंरणस्पर्श कर लिए ।

वतन कह रहा था---"बस तो चचा, हम जले हुए वतन को एक हैलीकाँप्टर में लटकाकर पहले सारे चमन के ऊपर घुमएंगें, अन्त में सागार में डाल देंगें। होश में आने पर पिशाचनाथ प्रयोगशाला में जायेगा । जिस ढंग से मैंने समझाया है, उसी ढंग से सारे विश्व से सम्बन्ध स्थापित करेगा ।"

-"सारा काम आपकी योजनानुसार ही होगा ।" पिशाचनाथ ने कहा ।

और---पाठक पढ चुके हैं-वैसा ही हुआ भी है।।।

बागारोफ ने तुगलक की जेब से अभी पर्स निकाला ही था कि बह बुरी तरह बौखला उठा!

" अबे कौन चटनी का है ?" कहता हुआ वह उछल कर खड़ा हो गया ।

उसे ऐसा लगा था कि जैसे अचानक किसी ने उस पर छलांग लगा दी हो । बड़ी फुर्ती के साथ पलटकर देखा, कमरे के फ़र्श पर नुसरत और तुगलक के अतिरिक्त एक अन्य बेहोश शरीर पड़ा था ।



बागारोफ ने उसे ध्यान से देखा । ।पहचान लिया ।।

" मुंह से निकला----" ये साला इंग्लैंड की चाय कम्पनी का एजेंट यहाँ कैसे आ पड़ा ।"

ठीक पहचाना चचा, ये जेम्स बाण्ड है ।'" आवाज अाई ।


-"कौन है वे ।" बीखलाया बागारोफ-----"असली हींजड़े की औलाद है तो सामने आ ।"

" तुम्हारा बच्चा है चचा ।" कहता हुआ विकास कमरे में आ गया--" ये दूसरी बात है कि आप क्या है ।"

“"अबे......." उसे देखते ही उछल पड़ा बागरोफ-----"पौदीने के तू यहाँ कहाँ से आ गया ।"



विकास ने यहां पहुंचने से पहले ही बाण्ड के चेहरे पर से जैकी का फेसमास्क और अपने चेहरे से हैरी का फेसमास्क उतार लिया था ।

बागारोफ के सामने खड़ा लम्बा लड़का कह रहां था----"ये पर्स हैलीकाँप्टर में से बाण्ड ने फेका था । परिणाम आप देख रहे हैं । पर्स मेरे हवाले कर-दीजिए ।"

" वाह चिड़ी के इक्के ।'" सतर्क होकर पै'तरा बदला बागारोंफ ने…"ये खूब रही । इन साले पाकिस्तानी मुर्गों ने तो हमें इस फिल्म के चक्कर में मुर्ग-मुस्लम बना दिया और एक तुम हो कि दाल-भात में मुसलचंद के पोते बनकर आगये।"

"मैं तुम्हें धनिये की चटनी बना दूगा चचा ।"

" अबे....." बागारोफ ने आंखें निकाली-"ये तुने क्या कहा देंकची के ।"

गंभीर था विकास, बोला---"' ठीक कह रहा हूँ चचा, इन दोंनों फिल्मों कों चमन से मैंने गायब किया है, अतः इन पर मेरा अधिकार है । अच्छा है कि शराफत से ये फिल्में आप मेरे हबाले कर दें।"




" और अगर न करूं तो ?"

-"तो........" विकास का लहजा कठोर हो----" दुनिया की कोई ताकत मुझे ये फिल्में प्राप्त करने से नहीं रोक सकती, मैं आपसे....."

"बोलती पर ढक्कन लगा चिड़िया कें बच्चे । चलता बन जहां से
।जाकर नाड़ा बांधना सीख जाकर ।"

"क्या कहना चाहते हो चचा ?"

" मैं कहना चाहता हूं उल्लू की दुम फाख्ता किं हमारा नाम बागारोफ है । फूचिंग, हुचांग, ग्रीफित या बाण्ड नहीं ।" एक ही सांस में बागारोफ कहे चला गया-तेरी इन आंखों ,से माइक डरता होगा----तेरी धमकियों का खौफ बाण्ड खाता होगा ।। तेरे नाम से चीन और अमेरिका कांपता होगा…। मैं रूसी हूं ।। रूसी हूं-----------जन्मजात रूसी ! बागारोफ है मेरा नाम । तुम जैसी छटंकी तो जेब में रहती है मेरी । फिल्म का ख्याल छोड़ कर भारत लौट जा, मां की गोद में बैठकर दूध पी । नाडा बांधना सीख ।"

"विकास को आंखें सुर्ख हो गई । हल्के से गुर्रा उंठा वह है-" अाप मुझे मजबूर कर रहे हैं चचा ।"

'"अबे तू अगर मजबूर भी हो जाये बछिया के ताऊ, तो कौन सा मुुझे सूली पर लटका देगा ।" बागारोफ बिगड़ गया…"हरेक को फूचिंग नहीं समझते ईंट के छक्के । अपनी, औकात नहीं भूलते ! मैंनें फिल्में इन चिडी के गुलामों से प्राप्त की है और......."


आगे के शब्द कहने का अवसर नहीं दिया विकास ने ।

एकदम किसी गौरिल्ले की तरह लम्बे तड़के ने छलांग लगा दी बागरोंफ पर ।।

किन्तु बागारोफ लड़के की नस-नस से वाकिफ ।। बागरोफ जानता था कि विकास किसी भी क्षण उस पर जम्प लगा सकता है । विकास के किसी भी हमले का सामना करने के लिए बागरोफ प्रत्येक पल तैयार था ।। लोमड़ी जैसी चालाकी साथ बागरोंफ ने खूद को बचाया ।

एक ही पल पूर्व जहाँ बागरोफ खडा था, उस स्थान के ऊपर से हवा में सन्नाता हुया विकास नुसरत के बेहोश शरीर पर जा गिरा ।

"अबे ।" दूसरी तरफ खड़ा बागारोफ कह रहा था----"ये क्या कर रहा है रायते की औलाद !"


फुर्ती से उठकर विकास ने अभी दूसरी जम्प लगाई ही थी कि
रेट.........-रेट........रेट....

जंगल में छाये भयंकर संन्नाटे को किसी गन ने झंझेड़ कर रख दिया ।

एकसाथ विकास और बागारोफ के मुंह से चीखें' निकल गई ।

दो गोलियाँ विकास, की टांगों में तो एक बायें कंधे में लगी थीं ।

दो गोलियों ने बागारोफ के कंधे तोड़ दिए । पर्स उसके हाथ से उछलकर कमरे की हवा में चकरा उठा ।


चीखकर दोनों उठे अौर अभी उनमे से कोई संभल भी नहीं पाया था कि---

-"एक भी हिला तो अनगिनत गोलियां उसके सीने में धंस जायेंगी ।" इस चेतावनी के साथ ही धड़धड़ाते हुए नौ व्यक्ति अन्दर घुस आये ।

सभी के हाथों में गनें थीं ।

दोनों में से कोई संभल भी नहीं पाया था कि बुरी तरह घिर गए ।

किंतु....... किन्तु...... उफ कमाल कर दिया लडके नै !

यह देखते ही कि उन्हें चीनियों ने घेरा है, विकास का जिस्म हवा में कलाबाजियां खा उठा । उन दो चीनियों नौ चीनियों में सबसे लम्बे चीनी पर झपटा वह ।। चीनियों की गनें गर्जनें ही जा रही थी कि-----

" नहीं ...... ।" स्वयं को बचाता हुआ लम्बा चीनी चीखा----"फायर कोई न करे ।"

मुंह के बल एक अन्य चीनी के कदमों में जा गिरा विकास ।

अभी इतना समय भी नहीं मिला था कि कोई दूसरा हमला कर पाता कि उसके कंठ से चीख निकल गई । टांग के ताजे घाव में लम्बे चीनी के नोकीले बूट की ठोकर पड़ी । साथ ही उस चीनी की आवाज ---" मेरा नाम सांगपोक है विकास बेटे---" फूचिंग का लड़का हूं मैं ।"

बिकास अभी अपने होशो-हंवास ठीक से काबू भी न कर पाया था कि------

एक बहुत ही नाटे से चीनी ने उसका गिरेबान पकड़ लिया । दांत पीसता हुआ बोला---"मुझे देख विकास, मेरी आँखों में झांक । तेरी-मौत का फरमान मेरी आँखों में लिखा है। मैं उसी हुचांग का साला हूँ, जिसे तूने मार डाला । मेरा नाम तो सुना होगा? मुझे हवानची कहते हैं ।" कहने के साथ ही नाटे ने अपने सिर की जोरदार टक्कर विकास के चेहरे पर मारी ।

विकास का सारा चेहरा खून से पुत गया ।

एक चीख के साथ अभी वह गिरने ही वाला था कि , किसी ने उसके बाल पकड़ लिए । अपने सिर के बालों पर ही झूल-सां उठा विकास । अभी संभल भी न पाया या कि एक चीनी महिला की आवाज--"मुझे सिंगसी कहते हैं ।"

विकास उस महिला का चेहरा न देख सका ।।

न ही महिला ने विकास पर कोई वार किया।

इस प्रकार जैसे कसाई बकरे को पकड लेता है , सिंगसी ने उसके बाल पकड़ रखे थे ।

धटनाक्रम कुछ इस तेजी से घटा था कि विकास कुछ ना कर सका ।

उसका सारा ध्यान उस समय सिर्फ बागरोफ पर ही स्थिर था जब तीन शोलों ने उसे चीखते हुए गिरने पर मजबूर कर दिया ।

वह यही देख सका था कि चीनियों ने
उन्हें घेर लिया है । यह देखनेमें एक क्षण भी गंवाये विना कि वे कितने चीनी हैं, विकास सबसे लम्बे चीनी पर झपट ही जो पड़ा था, लेकिन संभलने के लिए एक पल भी तो न मिला उसे ।

दुश्मनों ने उसकी स्थिति का खूब लाभ उठाया ।

इस समय सिंगसी ने उसके बाल जकड़ ऱखे थे । वह अकेली होती तो एक ही मिनट में वह सिंगसी को समझा देता कि विकास के बाल पकडने को परिणाम क्या होता है,

किन्तू विकास देख रहा था---नौ गनों के साये में था वह ।।।

एक चीनी फर्श पर पंड़े जख्मी बागरोफ के सीने पर पैर रखे खड़ा था ।।


विकास के ठीक सामने खड़ा था सांगपोफ । फूचिग की तरह ही लम्बा । अपने पिता की भांति ही उसे चीनी होने के बावजूद लम्बा होने का फख्र प्राप्त था । विकास को ही धूर रहा था वह--स्थिर आँखेॉं में खून लिए ।


आँखों में वही भाव लिए उसके समीप ही खड़ा था--हबानची । लोटा ! गोल--मटोल ! ठीक किसी लोटे की तरह ।

" मैनें कसम खाई है विकास बेटे कि अपने पिता की कब्र को तेरे खून से धोऊंगा ।"

अभी सांगपोक का वाक्य पूरा हुआ ही था कि हबानची गुर्रा उठा-"मेरा जिन्दगी का आखिरी कत्ल तेरा कत्ल होगा ।"


खून से लिथड़ चुका था विकास का चेहरा । आखें तो अंगारे वन ही चुकी थी । जैसे शेर गुर्रा उठे-"तेरा बाप तेरी
तरह नामर्द नहीं था सांगगोक । दुश्मनों को नों गनों के साये में लेकर नहीं धमकाता था वह । उसका असली बेटा है तो.........."
"वह समय भी आयेगा ।" विकास की बात पूरी होने से पहले ही सांगपोक गुर्रा उठा---"अपने पिता की कब्र को तेरे खून से धोने से पहले तुझे पूरा मौका दूंगा मैं । मैं नही, हवानची मारेगा तुझे । अपनी जिन्दगी का आखरी कत्ल करेगा ये ।"

"ये लोटा ....."

अभी विकास आगे एक शब्द भी न कह पाया था कि -सचमुच हवानची का शरीर हर्वा में इसतरह कलावजियां खा उठा जैसे किसी ने घुमाकर लोटे को फेंक दिया हो हवा में लोटे की तरह घूमता हुआ वह विकास के समीप अाया और-------

फटाक से दोनों पैरों का प्रहार उसने विकास की छाती पर किया ।

अपनी छाती की हड्डियां विकास को चरमराती-सी महसूस दी ।

"जो भी हवानची को पहली बार देखता है इसके लौटा शब्द का ही प्रयोग करता है ।"' सांगपोक ने कहा -"लेकिन दुनिया में आज तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसने कभी दूसरी बार इसे लोटा कहा हो । यह शब्द इसे पसंद नहीं विकास । जो भी हवानची के लिए इस शब्द का प्रयोग करता है या तो यह उसे दुनिया में और कुछ बोलने के लिए जिन्द ही नहीं छोड़ता अथवा उसे इस हद तक सबक सिखा देता है कि जिन्दगी में लोटा शब्द उसकी जुबान पर नहीं आता । कई बार तो यह भी देखा गया है कि इसी बात पर हवानची से पिटा आदमी सचमुच के लोटे को गिलास कहता है ।" पहले तो सांगपोक की इस बात पर धीरे से हंसा कोई,
फिर बोला----"बाह क्या शायराना बात की है ।

विकास सहित सभी ने पलटकर उस तरफ देखा।।।।
तुगलक उठकर खड़ा हो रहा था ।


"तुम " उसे धूरता हुआ सांगपोक गुर्रा उठा---"तुम होश में हो ?"



"और हम जोश में हैं ।"


इन शब्दों के साथ नुसरत खान को खड़ा होता देखकर बागरोफ की आँखें आश्चर्य से फैल गई।


खूनी दृष्टि से उन दोनों की घूरता हुया सांगपोक गुर्रायां---"तुम दोनों होश में हों ?"


तुगलक बौखला उठा ।


नुसरत कांपने लगा था ।

कांपता हुआ बोला---"अभी आपको बताया तो था माई बाप कि ये साला जामुन की औलाद होश में था और मैं जोश में ।। आप की आवाज सुनी तो सच, किसी क्बाँरी कन्या---"



" बको मत ।"


हवर्तिबी के गुर्राते ही सकपकाकर नुसरत चुप हो गया। तुगलक बोल उठा----" इस साले प्यार की निशानी को कई बारं समझाया है माई बाप कि ज्यादा मत बोला कर, लेकिन… "
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03-25-2020, 01:23 PM,
#53
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
साँगपोक के चीखते ही तुगलक की जुबान पर ब्रेक लग गए तो तुरन्त ही नुसरत ने तुगलक से कहा--"ले बेटा, और कर मेरी चुगली । तुझसे पहले ही कहा था साले, कि माई बाप से मेरा बहुत पहला याराना है, तेरे सिखाये में नहीं आयेंगे ।"



"अबे चलचक्की के !" तुगलक ने नुसरत से कहा--" तुझसे पहली मुलाकात तो माई-बाप से मेरी ही है है"


"तुम चूप रहो ।" हवानबी गुर्रा उठा ।




" चुप क्यों नहीं रहता वे तुगलक की दुम ?" फोरन ही नुसरत तुगलक पर बिगड गया---" माई बाप का कहना नहीं मानता ?"
"मैं कहता हूँ, बको मत तुम ।" सांगपोक भूनभुना उठा ।।



"'मैं पहले ही कहता था साले नुसरत कि माई बाप को गुस्सा आ जायेगा "
तुगलक अभी आगे भी कुछ कहना चाहता था किं -----

चटाक............


झन्नाटे के साथ हवानचीं का हाथ उसके गाल से टकराया ।



" ले बेटा । " नुसरत कब चूकने वाला था ----" मैंने पहले ही कहा था कि माई बाप को गुस्सा आ गया तो मार देंगें ।"



नुसरत की बात पूरी होते-होते सांगपोक की ठोकर उसके पेट में लगी । चीखकर दुहरा होगया वह ।



"ले बेटा--अौर बोल ....."


तभी तुगलक के मुंह पर हवानची का घूंसा पडा । वड़ा ही अजीब-सा सिलसिला शुरू हो गया है हवानवी तुगलक को मारता तो नुसरत बोल पडता । सांगपोक नुसरत का मारता तो तुगलक । काफी देरत तक यही क्रम चलता रहा। एक स्थिति ऐसी आई कि दोनों ही चुप हो गए ।


नुसरत के लम्बे बाल पकड़कर झंझोड़ता हुआ सांगपोक बोला-----" अब आई अक्ल टिकाने ?"



" माई बाप...... " नुसरत ने कहा-"बोलने की इजाजत हो तो कुछ कहूं ?"




" मेरी बातों का जबाव दो ।" सांगपोक गुर्राया ।

"मैँ तो आपका खादिम हुं माई बाप-हुक्म करो ।"'



" होश टिकाने आया या नहीं ?"
" मेरे होश तो पहले ही ठिकाने थे माई-बाप !" नुसरत ने कहा-----" बदमाश तो साला ये जामुन की औलाद है । यह भी नहीं देखता कि किसके सामने बोलना है और किसके सामने नहीं । इसे मैं कई बार समझा चुका हैं कि हर आदमी को एक ही लाठी से नहीं हांकना चाहिए । लेकिन ये सुनता ही नहीं है अपने साथ मुझे भी फंसवा देता है । सारी गलती तो इसकी है माई बाप । "




ठीक यही शब्द तुगलक ने हवानची से कहे थे ।




तुगलक ने हबानची को और नुसरत ने सांगपोक को जो जबावं दिया था, वह एफ-दूसरे ने सुना । सांगपोक और
हवानची ने एक-दूसरे को देखा फिर-
सांगपोक ने नूसरत से और हबानची ने तुगलक से एक ही प्रश्न किया…........"इसका मतलब ये हुआ कि तुम बेहोश नहीं हुए थे ?"

कनखियों से तुगलक और नुसरत ने एक-दूसरे को देखा । दोनों एक ही सुर में बोले----" इस तुगलक को कई बार समझाया है कि चचा से…मजाक मत किया करो । चचा हमारे मजाक को समझते नहीं, बुरा मान जाते हैं, लेकिन ये नहीं माना : मजाक ही मजाक में इसने चचा की टांग खींच दी । नतीजा ये कि चचा बुरा मान गए । इसने मुझे भी मरवा दिया, जब हमने देखा कि चचा हमें मार ही डालेंगे तो बेहोशी का नाटक करके अपनी जान बचाई ।" नुसरत ने तुगलक का नाम लिया था और तुगलक ने नुसरत का ।



उत्तर सुनकर सांगपेक और हबानची की दृष्टि मिली ।

सांगपोक ने कहा---"ये हमारा समय नष्ट कर रहे है ।"

फिर हबानची और सांगपोक के हाथ एक साथ चले है दोनों के हाथों की बनी कैरेटें पाकिस्तानी जासूसों की -कनपटियों की नस से टकराई कि एक-दूसरे का नाम लेकर वे फर्श पर गिर गये । अच्छी तरह से तसल्ली करने के उपरान्त कि वे बेहोश हो गए है, सांगपोक ने हबानची से कहा----" जाने पाकिस्तानी कैसे, कैसे रंगरूटों की सीर्केट सर्बिस में भर्ती कर लेते है ।"


" बातों से तो ये मूर्ख किन्तु व्यवहार से चलते-पुर्जे नजर आते हैं ।" कहता हुआ हबानची विकास की तरफ मुड़ा ।
विकास के पीछे बाल पकड़े खडी सिंगसी की तऱफ देखकर बोला-----हमारे पास अधिक समय नहीं है सिंगसी !"



विकास अभी समझ भी नहीं पाया था हबा ची के शब्दों पर सिंगसी क्या प्रतिक्रिया करने वाली है कि पीछे से सिंगसी ने एक जबरदस्त ठोकर इतनी जोर से विकास की कमर पर मारी कि लड़खड़ाकर विकास अभी मुंह के वल गिरने हीं बाला था कि---------------

फटाक से सांगपोक के जूते की ठोकर उसके जवडे़ पर पडी ।


विकास अभी संभल भी नहीं पाया था कि हवानची का घुटना उसके पेट में ।



"अबे अो चीनी चमगादड़ों ।" फर्श पर पड़ा बागारोफ भावावेश में चीख पडा-----"औरतों की तरह गनों के साये में लेकर मेरे शेर के बच्चे को क्या मारते हो ? मर्द की अौलाद हो तो ये गने हटा लो---तब देखो इसका कमाल ।"



" तू चुप रह बूड्ढे ।" बागारोफ के सीने पर पैर रखे चीनी गुर्राया ।"


" बुड्ढा बोलता है गंजे की औलाद ।" दहाड उठा बोगरोफ---" बुड्ढी होगी तेरी मां । अरे सीने पर गन रख, कर क्या गुर्राता है । ये गन हटा ले, बताऊं कि बुड्ढा कौन है ! ऐसी चीख निकलेगी, तरे मुंह से कि चीन में बठा तेरा हरामजादा बाप बहरा हो जाएगा !"


उत्तर मुंह से देने के स्थान पर उसने गन की नाल बागरोफ के सीने मे गाड़ दी ।

विकास-------इस युग का सर्वाधिक खतरनाक लडका !


सांगपोक, हबानची और सिंगसी के त्रिकोण में फंसा हुआ था । विकास कों संभलने का एक भी मौका दिए बिना वे रह रह कर उस पर बार कर रहे थे । बागारोफ चीखे जा रहा था ।

हबा में चकराकर एक चीनी ने अपने दोनों पैरों का प्रहार विकास की छाती पर किया तो विकास चारों खाने चित फर्श पर जा गिरा । गुर्राया-----याद रखना हबानची तेरी लाश कों चीर-फाड़ पिकिंग के किसी चौराहे पर लटकां दूंगा ।"


तभी सांगपोक का बार सहना पड़ा उसे ।


विकास को पिटता देखकर बागरोंफ वेचारा चीखता रहा, चिल्लाता रहा । यहाँ तक रो पड़ा, रोता हुआ बोला…"ये कैसा हरामजादा लड़का है ? देख रहा है कि गनों के साये में हैं, लेकिन चूप नहीं रहता......झुकता नही ।"


इस हद तक उन तीनों ने विकास की धुनाई की कि वह बेहोंश होकर लुढक गया ।
चीन में…क्रिस्टीना ने अभी अभी टेलीविजन बन्द किया था ।।

उसका चेहंरा गंभीर था । रसीले नेत्र बता रहे थे कि वह कुछ सोच रहीं है है स्विच आँफ करके वह पीछे घूमी ।

सोफे पर बैठे विजय को देखा । उसने उस एक पल के लिए विजय के उस चेहरे कों गम्भीर देखा था जिसके विषय में उस ने पिछले चार-बाच दिनों में यह निर्णय कर लिया था कि उस
चेहरे पर गम्भीरता आ ही नहीं सकती ।

" विजय भैया ।" क्रिस्टीना बोली---" क्या सोच रहे हो ?"


विजय सम्हाला स्वंय को, पुन: अपने चेहरे की सामान्य करता हुआ बोला----"बारह तो तुम्हारे चेहरे पर बजे हैं ।"


गम्भीर ही रही क्रिस्टीना, बोली---"गम्भीरता की बात ही है विजय भैया ।चीनियों ने वतन को जला डाला है ।"

" अजी जला डाला है तो तुम्हारी सेहत पर क्या क्या फर्क पड़ता है ?"


"'भैया ।" विजय के समीप अा गई क्रिस्टीना---" वतन से कभी मिली नहीं हूं ।उनकी कहानी सुनी है । अजीब से दर्द में डूबी है उसकी कहानी । कई बार उसके फोटो देखे हैं । एक बार पहले टी . बी . पर भी देखा पा था । कितना सुदंर था वतन और अब........अब-देखा तो उफ-इन जालिमों ने किस तरह जलाकर राख कर दिया है उसे ? कैसा भयानक डरावना और बदसूरत हो गया है वतन !"


"लगता है क्रिस्टीना ! दिल में कहीं दर्द है तुम्हारे "


"क्या मतलब भैया ।"


"सुना है, दिलों में जब मुहब्बत का अचार पकने लगता है तो आंखों से सड़ा हुआ गन्ने का रस निकलने लगता है ।" विजय कहे चला गया…"मुझे लगता है कि वतन का अचार तुम्हारे दिल में पक रहा है ।"



"भैया !" गम्भीर थी क्रिस्टीना---"मुझे गर्व है कि आपका नाम लेकर आपको भैया कहती हूँ मैं । यह भाग्य है मेरा कि आप जैसे महान जासूस को मैं अपना भाई कह सकती हूं । विजय-भैया, महान हैं आप, जो आपने मुझे यह अधिकार दिया । मैं स्पयं नहीं समझ सकती कि मेरा हृदय आपको इतना -सम्मान क्यों देता है ?"



"हमें बनाने की कोशिश मत करो क्रिस्टी ! इन बातों में वतन की बात को घुमाने की चेष्टा मत करो ।"


हल्के से मुस्काई क्रिस्टीना--- बोली--- " आप मेरी बातों में कहां आयेंगे । "


'‘बिरुकुल नहीं आयेंगे ।" अपने ही अन्दाज में विजय ने कहा---" और जनाब आने की ही क्या बात है, हम तो जायेंगे भी नहीं । ताड़ने बाले कयामत की नजर रखते हैं ।
बोलो---" तुम यहाँ वतन की मुहब्बत के बताशों में आलू-पाना भर रही हो न ।" "ऐसी तो कोई बात नहीं है ।" क्रिस्टीना ने कहा चाहा ।

किन्तु विजय कहां मानने बाला था, बोला… " झूठ काला, सफेद, हरा, नीला पीला झूठ ।"



-"'भैया पुनः गम्बीर हो गई क्रिस्टीना----"ऐसी बात नहीं है । बतन मिली नहीं हूँ, उसकी कहानी जानी है, उसकी तस्वीर देखी है । उत्कंठा है उसे देखने की । कैसा होगा वह ? कैसा लगता होगा ? कैसा होगा वतन, जिसने आठ वर्ष की उम्र में जिम का कत्ल कर डाला ? पूरे अमेरिका को झुकाकर जो आज चमन का राजा बन बैठा, अभी विजय कुछ कहनां ही चाहता थां कि लॉकेट रूपी ट्रांसमीटर स्पाक्क करने लगा ।

शीध्रता से आन कर , ट्रासंमीटर को मुंह के करीब ले जाकर बोला ---" हेलो प्यारे बर्फ की सिल्ली ! मैं बोल रही हूं गिल्ली ।"

" मैं डण्डा बोल रहा हूं जासूस प्यारे ।" दूसरी तरफ से अलफांसे की आबाज उभरी ।


" गुच्चिक कहां है ?" विजय ने पूछा ।


"अभी अभी उसे तुमने टीबी पर देखा होगा ।'" अलफांसे की आवाज आई----"देखा ना भी हो तो सुन अवश्य लिया होगा कि वतन विश्व भर के टीवीज पर बोला है ।"


" देखा भी है और सुना भी है प्यारे लूमड़ खान ।" विजय ने कहा-पूछ रहे हैं खाकर बनॉरसी पान कि तुम वहां क्या कर रहे हो लगाकर ध्यान ?"


"जिस वतन को तुमने अभी अभी टीबी पर देखा है, वह वतन नहीं जासूस प्यारे, जले हुए वतन के रुप में पिचासनाथ था ।"


" अमां ये तुम क्या कह रहे हो, लूमड़ भाई ?"


" मुझे आश्चर्य है कि बात तुम्हारी समझ मैं क्यों नहीं आई ?" दूसरी तरफ से अलफांसे ने तुक मिलाई------वतन निश्चय कर चुका है कि इस बार उसे चीन में तबाही मचानी है । " मुझे आश्चर्य है कि बात तुम्हारी समझ मैं क्यों नहीं आई ?" दूसरी तरफ से अलफांसे ने तुक मिलाई------वतन निश्चय कर चुका है कि इस बार उसे चीन में तबाही मचानी है ।---------- तुम समझ सकते हो कि वतन एक स्वतन्त्र देश का राजा है । अगर वह ऐसा कुछ करेगा तो आतर्राष्ट्रीय अदालत में मुजरिंम साबित हो जाएगा । जो कुछ उसने करने की ठानी है, वह उसी दौरान करेगा, जिसमें जला वतन बना के
पिशाचनाथ चमन में ठीक होने के लिए पडा़ है । टीबी पर पर जो शब्द उसने कहे, वे भी उसी योजना के अंग हैं ।"

"अमां मियां लूमड़ खान, यह तो पता लगे कि वह योजना क्या है ?" उत्तर में अलकांसे ने सब कुछ बता दिया ।



सुनने के बाद विजय ने कहा--लेकिन प्यारे वतन को चीन ही से क्या दुश्मनी है ?"



" क्योकि उसे पता लग चुका है कि उसका फार्मूला चीनी जासूसों के हाथ लग गया है ।''



चौका विजय, बोला----क्या कह रहे तो लूमड़ भाई जो बात साली हमें नहीं पता वह उस साले बटन को पता है ?"


""बिकास मैदान में कूदने से बाज नहीं आया विजय ।"


"क्या मतलब ?"



" मतलब ये कि हैरी को विकास ने गिरफ्तार कर लिया ।" अलफांसे ने बताया-"वह अभी तक मेरी कैद में है।। विकास स्वयं हैरी बनकर वतन की प्रयोगशाला में गया । फार्मुला चुराया । हैरी बनकर जैकी से मिला ।"

" फिर ?"



"उसके बाद की कहानी मुझे अभी-अभी विकास ने ट्रांसमीटर पर बताई है ।"

"क्या कहानी ?"



"सुनो विजय ।" अलफांसे बताने लगा,""मैंने विकास को बहुंत रोका, वहुत समझाया कि फिलहाल वह भी हमारी तरह ही आराम से बैठकर तमाशा देखे लेकिन वह नहीं माना,
इस विषय में विकास के बारे में मुझसे ज्यादा तुम जानते हो, वह जो करने की ठान लेगा, करेगा । किसी के रोकने से रुकेगा नहीं । मैंने भी उसे खूब रोका, लेकिन बोला कि-- घुस कर तमाशा देखने में कुछ और ही मजा आता है ।परिणाम यह कि वह घुस गया । सिर्फ यहां तक मुझे पता लगा कि वह फिल्मों सहित हैरी बना जैकी के साथ हैलीकॉप्टर में जा बैठा, बाद में यह भी सूचना मिली कि वह हैलीकॉप्टर " किसी पहाडी से टकराकर नष्ट हो गया, । मैं यहां विकास की कोई भी सूचना पाने के लिए व्यग्र रहृा । इस बीच, वतन से बातें हुई । पिशाचनाथ को बतन बना कर उसकी योजना कार्यान्वित की । अभी कुछ देर पहले ट्रांसमीटर पर विकास ने मुझ से सम्बन्ध स्थापित्त किया।"


" क्या ?"


"कहता था कि वह एक जलपोत से बोल-रहा है ।"


"जलपोत ?" विजय हल्के से चौका ।


" हां ।" अलफांसे ने कहा--"उसके साथ जो भी कुछ हुआ, उसमें संक्षेप-में मुझे बताया । उसका कहना है कि
जैकी के रूप में वाण्ड था । पहले बाण्ड से उसका टकराव हुआ ।" इत्यादि सब कुछ बताने के बाद अलफांसे ने कहा…उसने बताया कि इस समय वह एक चीनी जलपोत से बोल रहा है । यह जलपोत उसे, जेम्स बाण्ड, बागारोफ, नुसरत और तुगलक को लिए पिकिंग की तरफ़ बढ रहा है । फिल्में इम समय सांगपोकं इत्यादि के कब्जे में हैं । विकास का कहना है कि उन्हें जलपोत में इस प्रकार कैद किया गया है कि फिलहाल वे कुछ भी करने में समर्थ नहीं है ।"
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03-25-2020, 01:23 PM,
#54
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
" देख लिया साले ने घुसकर तमाशा ?"

" जिस समय विकास मुझे - यह सब कुछ बता रहा था, उस समय वतन भी मेरे पास था । " अलफांसे ने बताया----" इसने भी सब कुछ सुना और उसी समय से वतन भी गायब है ।"


" कहां चला गया ?


"कदाचित विकास की तरह घुसकर … तमाशा देखने !"


--"क्या मतलब ।"



" वतन के यहां से जाने के बाद मुझे वतन का 'एक पत्र मिला है ।" "कैसा पत्र ?"


'"मैं पढकर सुनाता हूँ तुम्हे ।" कहने के उपरांत अलकांसे ने पत्र सुनाना किया, "प्यारे अलकांते चचा ! मुझे विदित हो गया है कि चीनी कुत्ते न सिर्फ मेरी फिल्में लेकर पिकिंग जा रहे हैं, बल्कि मेरे यार को भी कैद कर लिया है । बस----इतना जान लेना मेरे लिए काफी है । अब चीन में वतन जो तबाही मचाएगा, उसे आप ही नहीं… सारा दुनिया-सुनेगी ।।

इस हरामजादी कौम को मैं बताऊंगा कि वतन के फार्मूले पर दृष्टि डालने अौर वतन के यार को बन्दी बनाने का परिणाम क्या होता है ? मैं जा रहा हूँ चचा, मेरे बिषय में किसी भी प्रकार की फिक्र न करना है बस---पिचासनाथ को समझा देना कि मैंने उसे जो कुछ समझाया है, वही करे ।" यह बहुत आवश्यक है कि बीच-बीच में दुनिया पहचानती रहे कि वनत चमन में है और इलाज करा रहा है-आपका भतीजा -- वतन ।"



"ये साला बटन कहां चला गपा ?" पुरा पंत्र सुनते ही विजयं ने कहा ।


"यह तो मैं स्वयं नहीं जानता विजय ।" अलफांसे ने केहा----' जैसे ही उसे यह पता लगा कि विकास, बागारोफ, बाण्ड, नुसरत और तुगलक चीनी जासूसों के चूंगल में पहुंच चुके हैं और दोनों फिल्में लेकर वे जलपोत के माध्यम से पिकिंग की तरफ बढ़ रहे हैं तो उसके चेहरे पर कुछ ऐसे भाव उभरे जैसे वह इसी धटना का प्रतीक्षक था । उसके बाद से मुझे वतन नहीं, सिर्फ वतनं का यह पत्र मिला है ।"

"इसका मतलव ये हुआ लूमड़ भाई कि दोनों छोकरे तुम्हारा बजरबटटू बना गए ?"



" शायद तुम्हारी बनाने चीन आ रहे हैं ।"
"इसका मतलव ये हुआ लूमड़ भाई कि दोनों छोकरे तुम्हारा बजरबटटू बना गए ?"



" शायद तुम्हारी बनाने चीन आ रहे हैं ।"


" मेरी फिक्र मत करें प्यारे लूमड़ भाई । अपने राम ने तो बजरबटटू बनाना सीखा है बंनना नहीं ।" विजय कहे चला गया ---" उचित समझो तो तुम भी चीन आ जाओ, किन्तु आने से पूर्व जो हिदायत तुम्हें पिशाचनाथ को देनी है, वह न भूलना ।"


" हैरी का क्या करू ?"


अलकांसे द्वारा पूछे गए इस प्रश्न ने एक पल के लिए .. विजय को निरुत्तर-सा कर दिया, फिर बोला, "अजी लगता है लुमड़ मियाँ कि अपनी बुद्धि का कुछ भाग तुम भी डाई अान किलो के हिसाब से बेचकर खा गए हो । अमां. उय साले का करना ही क्या है ? पिशाचनाथ के हवाले कर अाना यह जरूर वता देना उसे कि अपने गुरु का वह पट्ठा हरामी कितना है । कहीं ऐसा न हो कि वह किसी तरह कैद निकल भागे ।"


" ठीक है ।" अलफांसे ने यह कहकर सम्बन्ध विच्छेद कर दिया--" मैं चीन आ रहा हूँ ।"


"सम्बन्ध विच्छेद होते ही विजय ने क्रिस्टीना की तरफ देखा है उसके चेहरे पर चमक थी कदाचित उसने विजय और अलफांसे के बीच होने वाली संपूर्ण 'वार्ता सुन ली थी ।


विजय ने कहा-----" तुम्हारा सारा चेहरा बिल्ली की आंखें बन रहा है क्रिस्टी !"


" क्या मतलब ?"

-"'अपने शिकार को देखकर जिस तरह बिल्ली की आंखें चमकती हैं, उसी तरह इस समय तुम्हारा चेहरा चमक रहा है ।"


हल्के से हंसीं क्रिस्टीना बोली-"मैंने कौन-सा शिकार देख लिया है?"




…"बटन ।" विजय ने कहा--"बोलो, क्या कुछ गलत कहा मैंने ?"




"शिकांर बाली तो कोई बात नहीं है विजय भैया ।"



क्रिस्टीना--- ने कहा --" "लेकिन हां, यह जानकर खुशी अवश्य हुई कि जिस वतन को हमने कुछ ही देर पहले टीबी पर देखा था, वह वतन नहीं था है वतन पहले जैसा ही खूब' सूरत है, वह चीन आ रहा है ।"



-'"इसी को कहते हैं अड़गीमार इश्क है"' कहने के पश्चात विजय किसी अन्य से सम्बन्ध स्थापित करने का
प्रयास करने लगा । उसे ऐसा अवश्य लगा था कि उसकी बात का क्रिस्टीना ने कोई जवाब दिया है, किन्तु उस जवाब को सुनने का उसने कोई प्रयास न किया ।
विजय निरन्तर किसी से सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास में व्यस्त था । क्रिस्टीना की आवाज उसके कानों में पडीं --- " किससे बातें करता चाहते हो विजय भैया ?"


उसकी बात का कोई जवाव देने के स्थान पर विजय ने हाथ उठाकर उसे चुप रह का संकेत किया । उसका पूरा ध्यान ट्रांसमीटर की तरफ था, और धीरे धीरे बह सेट पर कह -कह रहा था ---"हैलो हैलो" प्यारे झानझरोखे ।"

"हेलौ !" दूसरी तरफ से स्वर उभरा---"में बोल हूं ।"



"कौन ?" विजय ने पुछा---"झानझरोखे ?"



"'झानझरोखे नहीं बिजय लेटे, यह हम बोल रहे है ।" दूसरी तेरफ से आवाज आई ।



हल्के से चौक पडा विजय, मुंह से निकला--" कौन… गुरुदेव ?"



"ठीक पहचाना बेटे ।" दुसरी तरफ से सचमुच जैकी वोल रहा था ।


" -पांव लागूं गुरु !" स्वर को संभालते हुए विजय ने एकदम कहा-. "लेकिन इस ट्रांसमीटर पर आप कहाँ से टपक पड़े ।


'"तुम समझ सकते हो विजयकि तुम्हारा झानझरोख इस समय हमारी ही कैद में है ।'.' जैकी ने कहा-"मुझे अफसोस है कि अशरफ यहां से 'आँपरेशन --वेवज. एम से सम्बन्धित सारी सूचनायें तुम्हें देता रहा, किन्तु हम उसके बिषय में कुछ न जान सके।। उसने पीछा भी किया, किन्तु मैं न जान सका कि कोई मेरे पीछे है । सच मुझे सख्त अफसोस है , किन्तु-अफसोस अब तुम्हें भी होगा ।"


" अरे हम तो तुम्हारे बच्चे हैं गुरुदेव ।" विजय ने कहा---अपने झानझरोखे को तुमने कैसे पकड़ लिया ?"


"उसने सोचा था कि वह जैकी बनकर, हैलीकॉप्टर लेकर चमन से हैरी को लेने चला जाएगा ।" जैकी ने बताया -"यह सोचकर वह मेरे घर में घुस आया मुझ पर और --- जूलिया पर उसने एक साथ हमले किए, किन्तु............"


" उसी समय बांण्ड आ गया और उसने झानझरोसे सहित तुम सबका तीया-पांचा कर दिया ।" जैकी की बात पूर्ण होने से पहले ही विजय ने कहना शुरू कर दिया-जो काम अपना झानझरोखे करना चाहता था, वह जेम्स वाण्ड ने किया ।"

जैकी के चौकने का स्वर----"यह सब कुछ तुम्हें कैसे मालूम ?"



"'हमारा नाम विजय दी ग्रेट है गुरुदेव !" सीना अकड़ाकर विजय ने कहा…"हमें तो यह भी मालूम है कि इस समय हैरी कहां है ? लेकिन पहले तुम यह बताओ कि अपने झांनझरोखे मियां इस समय कहां हैं ?"


--'"हमारी कैद में ।"



" उसे छोड़ दो !"



" क--क्या मतलब ?" निश्चित . रूप से विजय के इस विचित्र आदेश पर जैकी चौका था -"यह बात तुमने "कैसे-कही?"



-"गुरुदेव !" विजय ने मानो जैकी को पुचकार'-"और उसका करोगे क्या ?'"



" आँपरेशन वेवज एम' वाले इस अभियान से तुम्हें हटाने के काम तो अशरफ ही आएगा ।'" जैकी ने कहा------."सुनो विजय, ध्यान से मेरी बात सुनो । इस अभियान पर तुम्हारे बच्चे को भेजा गया है…हैरी को उसका काम है, . वेवज एम का फामुँला सुरक्षित अमेरिका पहुँचाना । मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि वह अपने इस अभियान में उस समय तक सफल नहीं होगा जब तक कि बीच में तुम हो, यह समझो कि तुम्हें आदेश देता हैं मैं---तुम इसअविन्यान से हट जाओं ! अगर तुमने मेरे इस आदेश की अवहेलना की तो याद रहे, तुम्हें जीवित अशरफ को देखने का अवसर कभी नहीं मिलेगा ।"



…"वाहं गुरुदेव----यह भी खूब रही ।" विजय ने कहा----"आपने वह कहावत तो सुनी ही होगी फि चूहे के हाथ कत्तर लग गई तो वह स्वयं को बजाज यानी कपडे का व्यापारी ही समझ बैठा ।"

"'क्या कहना चाहते हो ?"



"यह कि हैरी हैमारीे कैद में है ।" विजय ने कहा--" तुम्हारा मेकअप करके वाण्ड आया था तो हैरी के भेष में उससे विकास मिला । हैरी को विकास ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया था ।"



"यह सब बकवास है ।" जैकी चीख पड़ा ।




"कभी--कभी बकवास भी सच होती है गुरुदेव !" विजय ने यहा---" बकवास ही सही, लेकिन सच है । हैरी इस समय हमारी कैद में है और आप भी यह याद रखें कि जो कुछ आपकी कैद में पड़े हमारे झानझरोखे के साथ होगा ठीक वही हैरी के साथ ।"



" बकवांस मत करो विजय ।" दूसरी तरफ से बोलने वाला जैकी चीख पड़ा था--- "जासूसी तुम्हें मैंने सिखाई है । उसी जासूसी का पैतरा तुम मुझ पर चला रहे हो, । मैं जानता हूँ कि हैरी-वेरी कोई नहीं है तुम्हारे पास है यह 'झूठ तुम इस लिये बोल रहे हो, क्योंकि अशरफ को मारने की धमकी जो दी है मैंने । मैं तम्हारी इस चाल में आने वाला नहीं हूँ विजय । "



"अगर इस गलतफहमी में रहें , तो निश्चित रुप से आप वहुत बड़ा धोखा खायेंगे" । विजय ने कहा--" ये सच है कि हैरी हमारे पास है और झानझरोखे के साथ जो भी करो, इस बात को अच्छी तरह-सोच-समझकर करना वही व्यवहार हैरी के साथ भी हो रहा होगा। एक क्षण के लिये सेट पर सन्नाटा छा गया, फिर जैकी की आवाज---" मुझे तुम्हारी बात पर बिलकुल यकीन नहीं है ।"




" और मैं आपकों यकीन दिलाना भी नहीं चाहता ।"


'"तुम्हारे पास क्या सबूत है ?"

"'क्या ये सबुत कम| है मुझे यह पता है कि तुम्हारे मेकअप में हैरी को लेने जेम्स बाण्ड आया था ।” विजय ने
कहा----"जरा सोचो गुरुदेव, अमेरिका में घटी धटना की जानकारी मुझे कैसे हो गई ? एक ही माध्यम था---ये कि
विकास ने हैरी को गिरफ्तार कर लिया था । स्वयं विकास हैरी के मेकअप में बाण्ड से मिला । उसने वाण्ड को पहचान लिया । तुम स्वयं समझ सकते हो कि विकास ने बाण्ड का क्रिया-कर्म किस ढंग से किंया हौगा ।। बस, स्वयं बाण्ड ने वताया कि क्या कुछ हुआ था ।"



-"ये झूठ है ।" जैकी चीख पड़ा---- "तुम्हारी यह बात प्रभावित नहीं करती कि हैरी तुम्हारी कैद में है सम्भव है कि किसी अन्य माध्यम से तुम्हें यह जानकारी हुई हो । तुम्हारी इस खोखली दलील मैं नहीं मान सकता कि हैरी--------!"



"अगर में ये कहूं गुरूदेव कि आप भी झूठ बोल रहे है----अशरफ आपके पास हैं ही नहीं तो ?"



"'मैं तुम्हारी तरह खोखली धमकियां नहीं दिया करता ।"' जैकी ने कहा---"अशरफ मेरी कैद में है, इसका प्रमाण मैं तुम्हें अभी ट्रांसमीटर पर उसकी आवाज सुनाकर भी दे सकता हूं बोलो----वया तुम सुनवा सकते हो हैरी की आवाज ?"



" गुरु चाहूँ तो अभी अपने ही मुंह से हैरी की आवाज निकालकर आपको यकीन दिला दू ।।" विजय वे कहा…लेकिन फिलहाल मुझे यह हथकंडा अपनाने की कोई अाबश्यकता नहीं है । यह भी जानता हुं कि आपके लिये भी अशरफ की आवाज की नकल करना कोई कठिन काम नहीं है, किन्तु मुझे विश्वास है कि अपना झानझरोखेे आपकी कैद में है और तुम्हें भी विश्वास करना पड़ेगा गुरुदेव----यह कि हैरी हमारी कैद में है । याद रखना, जैसा व्यवहार उसके साथ होगा, वैसा ही हैरी के साथ..........!"कहते के पश्चात् विजय ने एकदम सम्बन्ध विच्छेद कर दिया । दूसरी तरफ से जैकी हैलो -हैलो ही करता रह गया है
पनडुब्बी से बाहर समुंद्र के अथाह जल में जो व्यक्ति अभी-अभी कूदा था उसके हाथ में एक छड़ी थी ।



सम्पूर्ण जिस्म पर गोताखोरी का लिबास ।


पीठ पर दो आक्सीजन के सिलेण्डर रखे थे और पनडुब्बी से कूदते- ही उसने जलपोत के उस हिस्से में मौजूद एक रॉड पकड़ ली थी जो पानी में डूबी थी ।

मस्त हाथी की भांति जलपोत्त सागर के कलेजे पर दनदना रहा था ।


छड़ी को सम्बाले वह रॉड के सहारे चलता हुआ सागर की सतह पर अा गया ।
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03-25-2020, 01:23 PM,
#55
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
इस समय उसका गर्दन से ऊपर का भाग पानी के ऊपर था शेष पानी के अन्दर । धीरे धीरे पानी के अन्दर का भाग भी ऊपर आता जा रहा था ।



रॉड के सहारे चलता हुआ वह जलपोत के पिछले भाग में आ गया है । फिर छपकली की तरह वह जलपोत की ऊंची और चिकनी दीवार पर चिपक गया ।


उसके हाथ-पैरों के चारों पंजों में विचित्र-सी किस्म के दस्ताने थे । ऐसा प्रतीत होता था मानो उसके दस्तानों में हवा भरी हुई हो ।जलपोत को दीवार से उसने दायाँ हाथ हटाया उस हाथ का दस्ताना इस प्रकार फूलता चला गया जैसे किसी माध्यम से उसमें हवा भरी जा रही हो । उसने हाथ सीधा किया, कुछ ऊपर, जलपोत की दीवार पर उसने हाथ रखा ।


उस हाथ के दस्ताने की हवा निकलती चली गई । ज्यों-ज्यों हवा निकलती जा रही पी त्यों-त्यों उस हाय की उंगलियाँ एक विचित्र से ढंग से जलपोत की दीबार पर जमती जा रही थी ।। जब वह हाथ पूर्णतया दीवार पर जम गया तो उसने बायां हाथ दीवार से हटाया । दांयें हाथ की भांति दीवार से हटते ही उस हाथ के दस्ताने में भी हवा भरत्ती चली गयी, फिर दायें हाथ से ऊपर, दीवार पर उसने बायां हाथ जमाया । दस्ताने की हया निकंली और यह हाथ दीवार पर जम गया । फिर दायां हाथ उसने दीवार से हटाया। उसमें हवा भरी दायें से ऊपर चिपकाया ।। इस प्रकार ठीक किसी छपकली की भांति यह जलपोत की ऊंची , सपाट और चिकनी दीबार पर चढ़ता चला गया । जलपोत अपनी स्थायी गति से बढ़ता चला जा रहा था ।


पूरी दीवार पर चढ़ कर: डेक पर पहुंचने में उसे तीस मिनट लग गये ।


डेक पर पहुंचकर उसने निरीक्षण किया । किसी इन्सान की मौजूदगी न पाकर वह डेक पर उतर गया । छडी़ सम्बाले वह एक शेड के नीचे पहुंचा है सर्वप्रथम उसने अपनी पीठ को सिंलेण्डरों के भार से मुक्त किया, कैप उतारी । उसके चेहरे पर चौडे फ्रेम वाला काला चश्मा लगा हुआ था ।

गोताखोरी का लिबास उतरा तो जिस्म पर मौजूद सफेद कपडे चमचमा उठे ।



पैरों में क्रैपसोल के सफेद जूते थे , अपना शेष सामान वहीं छोड़कर उसने छड़ी उठाई और डेक से नीचे जाने वाली सीढियों की तरफ बढ़ गया । उसका रंग गोरा था…दृध जैसा । कद लम्बा । विकास की भांति ही लम्बा ।। लम्बे-लम्बे कदमों के साथ वह बढ रहा था ।।



सीढियां उतरकर वह एक गैलरी में पहुंचा ।


सीढ़ियों के नीचे समीप ही खडे़ एक चीनी सैनिक ने उसे देख लिया था । देखते ही सैनिक ने फुर्ती के साथ उसकी तरफ गन तान ली और चिल्लाया…"कौन हो तुम ? कहां चले आते हो ? "



किन्तु जबाब में दूध जैसे कपडों बाला उसके ऊपर अा गिरा था ।



सफैद बूट की ठोकर इतनी जोर से उसकी कनपटी पर पडी थी कि अपने कंठ से चीख निकालता हुया वह धड़ाम से जलपोत के फर्श पर गिरा उसके हाथों से निकलकर गन तो हवा में लहराती हुई बहुत दूर जा गिरी थी ।।



वह फुर्ती के साथ खड़ा हुआ।



अब भी नहीं पहचाना मुझे गुलाबी अधरों से निकली वाणी के साथ ही उसके मस्तक पर बल पड़ गया----" मै
" व....व....वतन !" सैनिक का पोर-पोर कांप उठा ।।

एक जहरीली मुस्कान गुलाबी होंठों पर उभरी । ऐसे, जैसे कोई लड़का म्यान से तलवार निकाले । छडी के अन्दर से खींचकर हहिडयों का बना मुगदर निकाल लिया वतन ने ।



सैनिक की आंखों में साक्षात मौत नृत्य कर रही थी । भय के कारण चेहरां पीला पड़ा हुआ था । वह पीछे हट रहा था और धीरे-धीरे लम्बे कदमों के साथ वतन उसकी तरफ बढ रहा था ।



सैनिक के पीछे दीवार आ गई । अब वह और अधिक पीछे नहीं हट सकता था ।


वतन का मुगदर वाला हाथ ऊपर उठा मुगदर हवा में लहरा उठा और सन्नाकर वह अभी सैनिक के जिस्म के किसी भाग से टकराने ही वाला था कि सैनिक गिड्रगिड़ा उठा-"न---न---नहीं मुझे मत मारो , मैंने कुछ नहीं किया ।" हाथ रुक गया वतन का , मस्तक पर पडा बल, गहरा बहुत गहरा हो उठा। बोला---"' तुम्हारे चेहरे पर आतंक देख रहा हूँ । मौत के भय की परछाइयां कभी यह परछाइयां मैंने अपनी मां और बहन के चेहरों पर देखी थीं किन्तु किन्तु उन-जालियों ने उन्हें छोड़ा नही था ।। मैं तुम्हें छोड सकता हूँ।"



रो पडा सैनिक--" तुम्हें छोड़ने की कुछ शर्त हैं मेरी ।"


सैनिक की आंखों में प्रश्न उभर आया । जैसे पूछ रहा हो…" क्या ?"



"बताओ कि विकास इत्यादि इस जलपोत में कहा कैद हैं ?"



सैनिक के चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव उभर अाये ।

"'तुम्हारा नाम तो नहीं जानता मैं ।" बेहद गम्भीर स्वर में वतन ने कहा--"यह भी सुन लो कि तुम्हारी कौम से घृणा है मुझे । नजानते हो, क्यों? इसलिये, क्योंकि तुम समझते हो कि दुनिया में जीवित रहने का अधिकार सिर्फ तुन्हीं का है ।
तुम्हारा वस चले तो सारी दुनिया को अाग लगा दौ तुम । स्वयं जीवित रहने के लिये दूसरों को फाड़कर खा जाओ । मैं अहिंसा को मानने वाला हूँ, हिंसा का क्या परि'गाम होता है, वह मैंने अपनी मां, बहन और पिता को लाशों पर देखा है । सोचता हूं कि मेरे कारण दुनिया का कोई भी इन्सान उस हिंसा का शिकार न हो, किंतु ऐसी बात भी नहीं कि मैं हिंसा का प्रयोग नहीं कर सकता । मैग्लीन और उसके बेटे का अंजाम सारी दुनिया को पता है । मैं महात्मा गांधी की तरह महान नहीं, जो हिंसा का प्रयोग करने की कसम ही उठा लूँ । हां यह अवश्य मानता हूं कि जहाँ अहिंसा से काम हो सके वहां हिंसा प्रयोग नीच व्यक्ति करते हैं । जो सोदेश्य के लिए हिंसा का प्रयोग नहीं करता, मैं उसे भी नीच समझता हूँ । मेरे सिद्धान्त पर गौर करो और फिर सोचो कि तुम्हें क्या करना है, वे लोग कहाँ कैद हैं ? यह बताना है या.....?"


" मैं वता रहा हूँ ।" बुरी तरहसे गिड़गिड़ा उठा सैनिक ।


" बोलो ?"


"जलपोत की सबसे निचली मंजिल के कमरा नम्बर दस में ।" 'सैनिक ने जबाब दिया ।



मुगदर छडी के अन्दर रख लिया वतन ने बोला------"इस बात के लिए धन्यवाद कि तुमचे मुझे-हिंसा का प्रयोग करने पर विवश नहीं किया, लेकिन याद रखना, तुम जहां खड़े हो जिस, पोजीशन में खड़े थे, उसी. तरह वही खडे हो जाओगे । मेरे विषय में किसी से भी कुछ नहीं कहोगे। यूं समझो कि तुम्हें यह पता ही नहीं है कि वतन यहाँ से गुजरा . है"


" जी हां ।" उसकी जुबान सूख गई थी ।




"उम्मीद हैकि तुम मुझे हिंसा अपनाने के लिए विवश नहीं करोगे ।" कहने के साथ ही वतन उसके पास से मुडा है छड़ी टेकता हुअा वह गैलरी में इस प्रकार आगे बढ गया, मानो उसके पीछे कोई हो ही नहीं । लम्बे लम्बे कदमों के साथ वह गैलरी में ठीक इस प्रकार बढा चला जो रहा था, मानो वह चमन के राष्ट्रपति भवन में ही टहल रहा हो ।
जैसे ही वह गेलेरी कें एक मोड पऱ मुड़ा उसने देखा एक सैनिक उसकी तरफ आ रहा था ।

वतन को देखते ही वह बुरी तरह चौककर ठिठका । गजब की तेजी के साथ उसने कन्धे पर से गन उतारी, किन्तु अभी वह उस गन को किसी पर फायर करने की पोजीशन में भी नहीं ला पाया था कि वतन का मुगदर इतनी जोर है उसकी कनपटी पर पड़ा कि वह चीख पडा ।



एक ही वार में उसकी कनपटी की कोई नस फट गई ।।



कोई बाँध टूट गया मानो---- फव्बारे जैसा रूप धारण करके बह उठा । गन तो कभी की उसके हाथ से निकलकर फर्श पर गिर चुकी थी । उसके कंठ से निकलने वाली वह भयानक चीख--उसके इस जीवन की अन्तिम चीख थी ।



वतन से डरी हुई रूह, उसके जिस्म पर लात मारकर ईश्वरपुरी जा पहुंची थी और अब इस प्रयास में थी कि यमराज अपने खाते-में उसकी एण्ट्री कर ले जब तक उसके शरीर को जलपोत के फर्श पर पड़ा देखकर वतन के मस्तक पर बल पड़ गया ।


हहिडयों से बने मुगदरं पर उसके खून का अंश आ गया था ।


वतन ने मुगदर छडी में ऱखा और निश्चित भाव से आगे वढ़ गया ।
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03-25-2020, 01:27 PM,
#56
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
इस मंजिल की शेष गौलरी में उसे कोई नहीं टकराया । सीढि़यां लय करता हुआ जब वह नीचे की मंजिल की तरफ़ बढ़ रहा था तो सीढियों के नीचे, खड़ा एक सैनिक सतर्क हो गया, किंतु', अभी वह अपनी सतर्कता का कोई लाभ भी नहीं , उठा पाया था कि हवा में संनाती हुई मुगदऱ ने कनपटी पर चोट करके उसकी रूह को भी शरीर त्यागकर ईश्वरपुरी की तरफ रवाना पर दिया ।।


पुन: मुगदर को छेड़ी में रखकर वतन आगे बढ गया ।


उस मंजिल को गैलरी में घूमतां वह एक हलि कमरे में गया ।

हाँल एकदम खाली था और हाँल जिस दरवाजे से अन्दर प्रविष्ट हुआ था, ठीक उसके सामने हाल का एक दूसरा दरवाजा चौपट खुला पडा़ था ।


हाँल मं से गुजरकर उस दरबाजे में से ही निकल जाने का निश्चय किया था वतन ने । अभी वह हाँल के ठीक बीचोबीच ही पहुँचा था कि बिधुत की सी गति से हाँल में खटाखट की आवाजें गुजं उठी ।


वतन ने देखा--पूरे-हॉल में अनगिनत दरवाजे उत्पन्न हो गये थे । प्रत्येक दरवाजे पर तीन-तीन सैनिक उसकी तरफ गन ताने खड़े थे ।


एक पल के लिये वतन ठिठका ।


चेहरे पर किसी भी प्रकार की घबराहट का एक भी चिन्ह न उभरा ।


अगले ही पल--वह इस प्रकार आगे बड़ गया मानो उसे किसी की उपस्थिति का आभास न हो ।


" वतन !"


इस आवाज ने विद्युत की सी गति से उसे पलटने पर विवश कर दिया ।



देखा-----एक नाटा चीनी खडा़ था । होठों पर कूर मुस्कान लिये वोला-----"मेरा नाम हवानची है ।"



वतन की दृष्टि हवानची के बराबर में खडे उस सैनिक पर स्थिर हो गई थी…जिसे वह अहिंसा का प्रयोग करता हुआ जीवित छोड़ आया था ।

हवानची के बराबर में खड़े उस चेहरे पर भी करीब-करीब हवानची जैसी मुस्कान थीं ।।


उसे घूरता हुआ वतन गुर्रा उठा…..."तुम जैसे व्यकित ही मेरे अहिंसा के सिद्धांत को ताक पर रखवा देते हैं ।"



"मूर्ख हो तुम, जो इस ज़माने में अहिंसा की पोटली को बांधे फिरते हो । सैनिक गुर्राया ।


उत्तर में तेजी के साथ उनकी तरफ बढा वतन ।


सहमकर सैनिक हवानची के पीछे आ गया ।


बेपैदी के लोटे की तरह घूमकर हवानची वतन की तरफ बढा, बोला-"हवानची है मेरा नाम ।"


एक पल के लिये वतन ठिठका, बोला---" तुम्हारा नाम नहीं पुछा मैंने ।"


"लेकिन मैंने बता दिया है।"
वतन ने वैसी दृढता के साथ ही उससे आगे बढ़करं कहा -----" तुम्हारा नाम कोई ऐसी तोप नहीं है, जिससे मैं डरूं । सच पूछो तो अपना नाम बताकर तुमने अपने अब तक के जीवन की सबसे बडी भूल की है । उम्मीद मुझे ये है कि यह तुम्हारे जीवन की अंतिम भूल सांवित होगी । इससे बड़ी या छोटी भूल करने के लिए मैं तुम्हें जिन्दा छोडुंगा नहीं । क्या बताया था तुमने अपना नाम एक बार फिर कहना ।



"हवानची ।" वह वतन से बिना तनिक भी प्रभावित हुए गुर्राया ।।


--"'हूं ।" जैसे जहर से बुझ गये वतन के के अधर ----" तो तुम हो वह हवानची जिसने अपनी जिदगी का आखिरी खून विकास का करने की कसम खाई है ? हुचांग का साला ? तुम । हत्या करोंगे विकास की ?"

पुन: मुस्कराया हवानची बोला----तुम्हें शक है कुछ ?"



" कभी देखा है विकास को ?" पूछा वतन ने ।



" मेरी कैद में है वह ।"



-"इसीलिये उसकी हत्या की बात सोच ली ।" वतन ने कहा---"स्वंतन्त्र होता तो स्वयं को बचाते फिरते!"




--"घवरांओ नहीं ।" हवानची ने कहा----" अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोडुंगा विकास की हत्या मेरे द्वारा की गई अंतिम हत्या होगी । अब यह आवश्यक है कि उससे पहले मैं तुम्हें मारू ।


" ख्बाब देखने छोड दो हवानची !" वतन मुस्कराया ----"मुझे तुमसे हमदर्दी है । शायद इसलिये कि तुम विकार से अपने जीजां के खून का बदेला लेना चाहते हो । अपनी बहन की मांग का सिंदुर उजड़ने का बदला लेना चाहते हो , किंन्तु ये सोचो कि बिकास ने तुम्हारे जीजा की हत्या , इसलिये की हैं क्योंकी वह मानवता के मस्तक पर एक कलंक था । धरती मां उसका बोझ नहीं सह सकती थी । "



" वतन ।" हवानची दहाड उठा ।



"’चीखो मत, चीखने से कोई समस्या हल नहीं होती है ।" वतन ने शान्ति के साथ कहा----" सच्चाई बदल नहीं जायेगी । तुम्हारे चीखने से नर्कमें पड़ा तुम्हारा जीजा उछल कर स्वर्ग में नहीं जा गिरेगा ।"

मैं कहता जुबान सम्भालकर बात करो !"



'"दूसरे की नही, अपनी जुबान पर ध्याना-दो हबानची , शायद तुम जानते नहीं कि वह क्या-वया कह रही है !"



वतन ने कहा--"तुम्हें तो पता है हिंसा का प्रयोग सिर्फ उसी स्थिति में करता हूं मैं, जब अहिंसा से काम न चले !"


"क्या कहना चाहते हो ?"



"यह कि तुम लोगों के बीच मैं अकेला जरूर हूं , लेकिन वास्तव में अकेला हूँ नहीं हूं !" वतन ने कहा-"यह याद रखना कि अगर मुझे , इस जलपोत में कुछ हो गया तो इसे जलपोत की पेंदी में एक वडा छेद हो जायेगा । वह छेद कहाँ हुआ है, यह रहस्य भी तुम्हें उस समय पता लगेगा, जव जलपोत डूबने लगेगा ।"



कुटिलता के साथ मुस्कराया हवानचीं, बोला---इस किस्म की झूठी बातों में-फंसने वाला नहीं हूँ मैं ।" -



" सच को झूठ समझना सबसे बड़ी बेवकूफी है ।"'



"अौर सबसे वडी बेवकूकी है समझदाऱ आदमी के सामने झूठ बोलना ,जो उसके सामने चल न सके!" हवानवी ने कहा -" मैं दावे के साथ कह सकता कि कम-से-कम तुम्हारा आदमी इस जलपोत में कोई ऐसा छद नहीं करेंगे जिसके परिणामस्वरूप यह जलपोत डूबे । जानते हो, क्यों ? इसलिये कि तुम उन्हें कभी ऐसा आदेश दे ही नहीं सकते है क्योंकि तुम्हे: मालूम है कि इम जलपोत पर विकास भी है । हम जलपोत में डूवेंगे तो विकास भी बचा नहीं रहेगा !"


वतन के मस्तिष्क की एक झटका सा लगा ।

यह बात सच थी कि उसने झूठ बोला था है इस मकसद से कि इस झांसे में आकर वे किसी भी प्रकार की हिंसात्मक वारदात करने का साहस न कर सकें, किन्तु…किन्तु हवानची? वतन को लगा सचमुच हवानची एक खतरनाक जासूस है ।



मगर अपने किसी भी भाव को वतन ने चेहरे से स्पष्ट न होने दिया ।
वतन बोला--"कभी-कभी अपने ही दिमाग का कोई… ख्याल, अपने लिये मौत का कारण बन जाता है !" वतन ने कहा-मेरा सिद्धान्त यह भी है कि अगर सौ नीच व्यक्तियों की मारना हो और एक सच्चा इन्तान भी मारना आवश्यक तो-----"



"छोडो इन बातों को ।" उसने वतनं का रोक दिया ----"यह जलपोत डूबने लगेगा तो मैं स्वयं फैसला कर लूगा कि मुझे क्या करना है फिलहाल तुम मुझे यह बताओ कि इस जलपोत पर क्या करने आये हो ?"



"अपने दोस्त विकास को यहां से निकालने और फिल्में लेने जो इस समय तुम्हारे कब्जे मैं है ।"




--"'मुझे दुख है कि इनमें से तुम्हारा कोई भी ख्वाब पूरां नहीं होगा ।"



"और मुझे दुख है कि तुम्हारा लोटे जैसा शरीर मुझे रोक नहीं सकेगा !"



कहने को वतन ने कह तो दिया, किन्तु प्रतिक्रियास्वरू� � उसने जब हबानची का चेहरा देखा, जो किसी शुगरमिल के बायलर की तरह तप रहा था । नेत्र मानो मोटे-मोटे खून के गोले बन गये थे ।


वतन ने उसके चेहरे को एक बिचित्र सी अनुभूती के बीच तनते देखा ।

उसने यह भी देखा कि चारों . . तरफ खडे सैनिक, सतर्क हो गए हैं ।


वतन ने स्थिति को भांपा स्वयं भी सतर्क हुआ और बीला-----"क्या लोटा शब्द अच्छा नहीं लगता तुम्हें ?'"




" कोई फायर नहीं करेगा !" इतनी जोर है चीखा …हवानची कि सम्पूर्ण जलपोत कांपता सा महसूस हुया-------- बहुत नाम सुना है इसका । इसे मैं ही देखूंगा । सुना है विकास के बाद दुनिया का सबसे खतरनाक लडका यही है ।"



मुस्कान थी वतन के होंठों पर, बोला…"तुम शायद हिसा का सहारा लेना.........!"




"मिस्टर वतन !" जैसे शेर की मौत पर शेरनी दहाड उठे------" सुना है कि विकास के बाद, दुनिया के दूसरे खतरनाक लडके तुम हो है चाहूँ तो मेरे एक ही इशारे पर सैकडों गोलियां तुम्हारे शरीर में धंस जायें है"



"कोशिश करके देख लो !" वतन मुस्कराया ।
"कोशिश तो ये है कि मैं तुम्हारा वह खतरनाकपन देखना चाहता हूं !" हवानची गुर्रा उठा--------"तुम पर कोई गोली नहीं चलेगी । मेरे अलावा कोई तुम पर किसी प्रकार का हमला नहीं करेगा मुझसे बचना है तुम्हें यह देखना है कि यह लोटा ...........!"



और अपनी बात बीच में ही छोड़कर नाटा हवानची उछल पड़ा । ठीक इस तरह, मानो उसके पैरों में स्प्रिंग लगे हो । ठीक किसी कबूतर की भांति हवा में कलाबाजियाँ खाता हुआ वह वतन के ऊपर पहुंचा और अपनी दोनों टागों का वतन के चेहरे पर इतना तेज प्रहार किया उसने कि वतन के कंठ से चीख निकल गई ।

हवा में उछलकर वतन दूर जा गिरा । आँखों से चश्मा उतरकर गिर गया था !




दूसरे ही पल उठा सिंगही का वह शिष्य तो उसने देखा--------



ठीक उसके सामने बडी-बड़ी आँखों से आग उगल रहा था हवानची !



वतन की नीली झील-सी गहरी आंखों में पानी तैर रहा था ।


स्थिर से नेत्रों से उसने हवानची को देखा और बोला----"मुझे मेरे सिद्धांत के दूसरे पहलू पर आने के लिये विवश न करो हवानची !"



किन्तु उसकी बात का जबाव अपनी जुबान से देने के मूड में नहीं था हैवानची ।


सचमुच उसका शरीर किसी बिना पेंदी के लौटे को तरह जमीन पर लुढ़का और कब वह जोक की तरह आकर वतन की टांगों से चिपट गया, यह स्वयं वतन भी न जान सका !


उसे तो इस बात का आभास उस समय हुआ, जब बह धड़ाम से गिरा !
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03-25-2020, 01:27 PM,
#57
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
टांगों में अंब भी हवांनची जोक बनकर चिपटा हुआ था। वतन को लगा, उसकी दोनों, टांगों की हड्डियां चरमरा-कर टूटने वाली हैं !. . उसे अब जाकर आभास हुआ कि सचमुच हवानची हर तरह से बहुत खतरनाक आदमी है ! उसके लोटे जैसे नाटे
शरीर में न सिर्फ विदुत से भी कहीं अधिक फुर्ती है, बल्कि----उसके शरीर में बला की ताकत भी है !

वतन को लगा कि उसकी टागें फौलादी सरियों के बीच फंस गई हैं ! वह समझ चुका था कि अगर शीघ्र ही किसी तरकीब से उसने अपनी टागों को हबानची की पकड़ से मुक्त न किया तो वह उसकी टागें तोड़ डालेगा ।



वतन का मस्तिष्क चेतन हुआ ।


अपनी पुरी शक्ति समेट कर उसने टांगों की एक तीव्र झटका दिया !


किन्तु झटका खाकर रह गया नाटा हवानची ! टागें उससे मुक्त होने की तो बात ही दूर, बन्धन की सख्ताई में लेशमात्र भी तो परिवर्तन नहीं आया । वतन के कंठ से अब टांग की पीड़ा के कारण चीख निकलने वाली थीं । एकाएक उसे अपने गुरु का सिखाया हुआ एक दांव याद आ गया ।

उसकी आँखों के सामने मुस्कराते हुए सिंगही का चेहरा उभरा । मानो वतन के गुरु ने उसे कोई निर्देश दिया !


अपनी टांगों को एकदम फैला लिया वतन ने । टांगो को उसी स्थिती में रखे वह बैठे गया, अव…वह आसानी के साथ अपनी टांगों से लिपटे हवानची को देख सकता था ।



उस समय टांगों की हड्डियां कड़-कड़ बोलने लगी थीं जव वतन के दायें हाथ का कैरेट हवानची की मेंढक जैसी गर्दन पर पड़ा ।


एक चीख के साथ हवानची का चेहरा थोडा सा झुका तो वतन का घुटना मुड़कर फटाक से उसकी नाक पर पड़ा । तुरन्त ही दूंसरी बार ,चीखकर हवानची दुसरी तरफ लुढ़क गया । घुटना ठीक नाक पर लगृने के कारण उसकी नाकं से खून बहने लगा था । वतन ने फूर्ती के साथ उठकर खड़ा होना चाहा, किन्तु खड़ा होते_ही लड़खड़ा गया वह ।


उसे लगा कि अगर उसने अपने जिस्म का भार टांगों पर डाला तो कोई न कोई हडडी अवश्य टूट जायेगी । अभी वह स्वयं को संभाल भी नहीं पाया था कि हवानची की दोनों टागें दो भारी मूसलों की तरह उसकी छाती पर पड़ी ।


न चाहते हुए भी वह चीखता हुआ गिरा।

अभी वह गिरा ही था कि उसने अपने, ऊपर लहराते इन्सानी जिस्म का आभास पाया । कुछ और न सूझा वतन को दो तीन करवटें ले गया वह 1 फटाक से हवानची खाली फ्लोर पर गिरा ! उछलकर खडा हुआ! इस बार जो वह गेंद की तरह वतन की तरफ उछल तो---------



लम्बी टांग घूम गई बतन की ।



प्रहार हवानची के चेहरे पर हुआ । गेंद की तरह्र ही उछल कर दूर जा गिरा ।


उठने से पहले ही उसने महसूस किया कि वह किसी के हाथों में है और उन हाथों ने उसे वापस फर्श, पर पटक दिया ।



कमाल कर दिया हवानंची ने।


बेशक उसके कंठ से चीख निकली किंन्तु फर्श से टकराते ही किसी रबर के बबुये की तृरह उछलकर खड़ा हो गया । सामने उससे तिगुना लम्बा लड़का खड़ा था वतन ।



हवानची ने अपनी पेटी वाले स्थान पर हाथ मारा और अगले ही पल उसके हाथ में सर्प की भांति एक कांटेदार पेटी लहरा रहीं थी । उसके अग्रिम भाग में पीतल का एक मोटा गोला था ।



वतन को आभास हो गया कि इस पेटी के एक भी बार का परिणाम क्या हो सकता है ।



अंपनी सम्पूर्ण' इन्द्रियों को सचेत करके वंह्र बोला…"बस खत्म हो गई मर्दानगी ?"

किन्तु------उछलकर बिजली के उस बेटे ने वतन पर पेटी का वार किया ।



स्वयं कों बचाने की खूब चेष्टा की वतन ने, किंतु बचा न सका ।


हाँ, इतना अवश्य हुया कि पीतल का गोला उसके सिर पर लगने के स्थान पर कन्धे पर लगा । पेटी की कांटों ने-उसकी खाल नोंचली ।


दर्द से, तिलमिलाकर वह गिरा ।


उसका भाग्य था कि यह अपनी छड़ी पर गिरा । पलक झपकते ही उसने छड़ी उठा ली अोर एक अनजाने से खतरे का मुकाबला करने के लिए उसेने छडी यूं ही हवा में ऊंपर उठा दी ।-हवानची की पेटीका अगला वार उस छड़ी पर रूक गया ।
जब तक हवानची पेटी को घुमाकर तीसरा वार करता, तब तक वतन न सिर्फ खड़ा हो गया था बल्कि हड्डियों का मुगदर -उसने छड़ी के अन्दर से खींच लिया था । अब अपने हाथ में दबी पेटी को हवानची लहरा रहा था तो वतन मुगदर को अपने जिस्म की ढाल बनाये हुए था ।



उसके दूसरे हाथ में खाली छड़ी थी । फिर-बिजली के उन दोनों बेटों के बीच शुरू हुआं एक भयानक युद्ध । निश्चित रूप से हवानची भी लड़ने के अच्छे तरीके जानता था और साथ ही उसके जिस्म में आश्चर्यचकित कर देने बाली शक्ति भी थी ।






इधर वतन ! मुजरिमों के बादशाह सिंगही का शिष्य ।


स्वयं सिंगही का कहना है कि वतन को उसने वह सब सिखाया है, जो स्वयं भी नहीं जानता ।… . .

एक-दूसरे से लड़ते-लड़ते लहूलुहान हो गए । न जाने वतन हबानची की पेटियों के कितने वार अपने शरीर पर झेल चूका था । न जाने हवानची के जिस्म की खवर किंतनी बार वतन के मुगदर ने ली थी !

वतन का सफेद लिबास खूँन के धब्बों से सज गया था ! उसमें कुछ उसका खून था और कुछ हवानची का ।

जगह-जगह से कपड़े फट भी गए थे ।


दोनों ही हिंसक भेडि़ये जैसे लग रहे थे ।

अन्त में-तब जबकि वतन के अपने मुगदर का वार पूरी ताकत से हवानची के चेहरे पर किया ।


पहले तो रंग-बिरंगे तारे नाच उठे हबानची की आँखों के सामने, फिर अंधेरे की एक गहरी चादर फैलने लगी । उसी समय हडिडयो का-मुगदर उसकी पसलियों से टकराया उसने महसूस किया कि वह बेहोश होता जा रहा है ।



अचेतना के सागर में खोते हुए-हबानची के मस्तिष्क मैं अाखरी बार यह आया कि अगर वह बेहोश हो गया तो वतन विकास इत्यादि को इस जलपोत से निकाल ले जाएगा उसने स्वयं को बेहोश होने से राकने की काफी चेष्ठा की, किन्तु उसने महसूस किया की वह लड़खड़ाकर गिर चुका है । पेटी उसके हाथ से छूट गई है और अब किसी भी तरह वह स्वयं को बेहोश होने से नहीं रोक सकेगा, तो बेहोश होने से पूर्व ही चीख पड़ा ----- " फॉयर !"
"फायर " और हवानची से वतन को यह उम्मीद जैसे पहले ही थी ।



हवानची का आदेश होते ही चारों तरफ से गनें गूंज उठी । सैकडों दहकते शोले वतन की तरफ लपके।


बस, खतरे का मुकाबला करने के लिए वतन अगर तैयार न होता तो न जाने कितनी गोलियां उसके शरीर में धंस चुकी होतीं ।




किन्तु वतन…उफ. । वतन ने साबित कर दिया कि विकास से किसी भी तरह कमं नहीं है बह । उसने एक ऐसी भयानक कला का प्रदर्शन किया, जिसका-प्रदर्शन एक बार स्वयं-विकास ने अमेरिका में किया था । वह कला विकास को स्वयं जैकी ने सिखाई थी ।

इस कला में सिंगहीं को महारत हासिल थी और इस समय वतन द्वारा उसी कला का प्रदर्शन इस बात का प्रमाण था कि सिंगही का यह कथन बिल्कुल सत्य है कि, उसके पास एक भी कला ऐसी नहीं है जो उसने वतन को न सिखाई हो ।


वह कला थी-लाठी की मदद से गोलियों से अपनी रक्षा करना ।



इस कला में लाठियाँ इस प्रकार धुमाई जाती हैं कि लाठी घूमाने वाले के चारों तरफ एक व्यूह-सा बना लेती है । कला का प्रवर्तन करने वाले के हाथ बिजली से भी कहीं अधिक. तेजी है घूमते-है । लाठी इस तेजी से शरीर के चारों तरफ घूमती, है कि एक व्यू-सा बन जाता है । चारों तरफ़ से चाहे जितनी भी गोलियां चलाई जायें, किन्तु गोली उसके शरीर तक नहीं पहुंच पाती । सारी गोलियां लाठी पर ही लगती हैं । प्रदर्शन करने वाला फूतींला और इस कला का माहिर हो।


प्रेरक पाठको, यहाँ मैं लिख देना आवश्यक समझता हूँ कि लाठी चलाने का यह तरीका मेरी कल्पना की देन नहीं है, बल्कि इस किस्म की लाठी चलाने वाले को मैं जानता हूँ और हाँ कोई चाहे तो मैं किसी को भी ' उससे मिलवा सकता ' हूं । लाठी का काम वतन छड़ी से ले रहा था।
एक व्यूह टानाए छड़ी उसके चारों ओर धूम रहीं थी । स्वयं वतन का जिस्म भी किसी फिरकनी की भाति धूम रहा था । छडी नजर नही आ रही थी, किन्तु धांय धायं के बीच गोलियों की छड़ से टकराने की आवाज भी गूंज रही थी ।



इस कला को देखकर चीनी हतप्रभ रह गए ।।



किसी की भी वतन की छडी़ नजर नहीं आ रही थी, किन्तु एक अजीब-सा-व्यूह वतन के चारों ओर देख रहेथे ।



साथ ही उनकी गोलियां वतन के-जिस्म तक पहुंचने से पहले ही उस व्यूह से टकराती और छिटककर दूर जा गिरती ।

नाजाने किस धातु की छड़ थी वह टूटी नहीं।


इस चमत्कृत कर देने वाला कला का प्रदर्शन तो कर है रहा था वतन क्रिन्तु स्वयं उसका मस्तिष्क परेशान था ।



गोलियां उस पर चारों तरफ से बरस रहीं थीं! जब तक वह अपने चारों और व्यूह बनाए हुए था तब तक बचा हुआ था परन्तु, व्यू बनाए हुए वतन के मस्तिष्क में प्रश्न था , आखिर कब तक इस छड़ को घुमाता रहेगा ।


कब तक इस व्यूह को बनाए रखेगा ।



एक घंटे--दो घंटे--तीन....चार.... कभी तो उसे रुकना ही पड़ेगा !


कभी तो वह थककर शिथिल होगा ही ? तब.....तब क्या होगा ? इनकी गोलियां उसके शरीर को छेद डालेंगी ?




तो तो इस खतरे से स्वयं को मुक्त करने क लिए वह क्या करे ?क्या ?



जिस तरह छडी को घुमाता हुआ वह स्वयं चकरा रहा था, उसी तरह उसके मस्तिष्क में यह प्रश्न चकरा रहा था।



' गोली चलाने वाले सैनिक उसकी यह कला देखकर गोली में चलाना भी भूल गए ।



हैरत से फिरकनी की भांति धूमते वतन और उसके चारों और चकराते उस अवेध व्यूह को देखने लगे थे जिसे गनों की गोलियाँ भी तोड़ न पा रही थीं ।

अपने मस्तिष्क में बस प्रश्न को लिए वहाँ कोई एक घंटे तक छड़ी घुमाता रहा । आखिर, अचानक उसके कानों में एक आवाज पड़ी--शाबाश-------शाबाश मेरे मिट्टी के शेर । कमाल कर दिया तुने ----" वाह !"
इस आवाज को वह पहचान गया ।

परन्तु सुन कर ठिठका नहीं । ब्यूह उसी प्रकार बना हुआ वह बोला----"मुझे बचाओ। बिजय चचा । अब मुझमें ज्यादा देर तक यह ब्युह बनाए रखने की ताकत नहीं है ।"

"अभी लौ बटन प्यारे ! तुम्हारी इस कला को देखकर रोंगटे खड़े हो गए हमारे, अब कमाल देखो हमारे ।"


विजय की इस आवाज के बाद फायरों की गति तेज हो गई !


फिर, कुछ ही देर बाद विजय की गुर्राहट स्वयं वतन ने भी सुनी । वह कह रहा था---""अपने-अपने हथियार फेक दो चीनी चमगादडों वरना तुम्हारा ये हवानची हमारे सामने फर्श पर बेहोश पड़ा है-हमारे रिवॉल्वर से एक ऐसी टाफी निकलेगी कि इसका सर तरबूज बन जाएगा । अमी तो इसके होश में आने की उम्मीद है ,किन्तु अगर ऐसा हो गया तो कभी होर्श में नहीं आ सकेगा हैं । वतन को नही पता कि चिनियों पर विजय के शब्दों की क्या प्रतिक्रिया हुई !


वह तो पागलों की तरह बस, अपने चारों-तरफ छड़ी घुमाए चला जा रहा था । उसका दिमाग बुरी तरह घूम रहा था । हर पल जैसे ऐसा लग रहा था कि वह अब गिरा---अब गिरा, मगर उस समय तक वह स्वयंको संभाले रखना चाहता था जब तक कि विजय की तरफ से उसे रुक जाने, का आदेश न मिले ।


पुन: विजय द्वारा चीनियों को दी गई चेतावनी उसके कानों में गूँजी-- ।
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03-25-2020, 01:27 PM,
#58
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
तीसरी चेतावनी के बाद !


विजय की आवाज---"बस, मेरे मिट्टी के शेर ! अब बंद करो ये सर्कस का कमाल और-अपने हाथ से छड़ी छोडकर वंह लहराया और चक्कर खाकर धड़ाम से गिरा । इतनी देर से एक ही दिशा में धुमते-घूमते उसका दिमाग तरह भिन्ना गया था । सांस धोंकनी की भांति चल रही थी ।

यही कार था कि वह स्वय को संभालं नहीं सका ।


इसके बाद क्या हुया, वह कुछ न जान सका । उसकी आंखो के सामने काजल-सा अधकार छाता चला गया और मस्तिष्क को अवचेतना के गहन सागर में डूबने से वह न रोक सका, किन्तु होश के अन्तिम क्षण में उसे यह तसल्ली थी किं वह सुरक्षित है ।होश आया तो उसे छत दीवारें, फर्श अर्थात् सारा हाँल अब भी घूमता-सा प्रतीत हो रहा था । अभी तक उसका दिमाग हिलोरें ले रहा था । विजय का स्वर उसे ऐसा लग रहा था मानो वह स्वप्न में कहीं बहुत दूर से अारहा हो ।


विजय कह रहा था--"घबराओ मत बटन प्यारे,हमने संवार दिए हैं काम सारे ।"


आंखें खोल दी वतन ने, देखा-वह स्वयं एक लम्बी मेज पर पड़ा था । समीप ही विजय खड़ा था । सब कुछ तेजी के साथ घूमता प्रतीत हुआ उसे ।


उसने देखा उस हाँल में अनेक टी० वी० स्क्रीनें फिट थी ।

उनमें से सिर्फ एक टी० वी० अॉन था ।।


स्क्रीन पर जलपोत के चालक-कक्ष का दृश्य मौजूद था। दो चालक जलपोत को चला रहे थे ।। उनके चेहरे पर छाये भय को वतन स्पष्ट देख सकता था । अभी वह कुछ बोल भी न पाया था कि विजय ने कहा-----"घबराना मत बटन मियां, . साले सभी चीनी चमगादडों को मैंने निहत्थे करके एक कक्ष में बन्द कर दिया है, सिर्फ ये दोनों चालक ही स्वतन्त्र है और इतनी शराफत ये जलपोत को से इसलिए चला रहे हैं ,क्योंकि इन्हें पता है कि हम प्रत्येक पल इन्हें स्क्रीन पर देख रहे है और इनकी किसी भी हरकत से ईश्वरपुरी के लिए इनका टिकट कटा सकते हैं !"


वतन ने अपने दिमाग को नियन्त्रित किया । लम्बी मेज पर उठकर बैठ गया वह । पुन: सिर बुरी तरह चकराया ।


"अमां तुम, उठते क्यों हो, बटन प्यारे ? विजयं ने उसे रोकने का प्रयास किया ।। " चचा ।" होश में आने के बाद पहला शब्द कहा वतन ने ---" अपने चरणों की धूल तो लेने दो ।" कहने के साथ
ही मेज से उतरकर खड़ा हो गया वह। चरण स्पर्श करने के लिए झुका तो दिमाग ने एक इतना तेज झोंका खाया कि विजय के चरणों में गिर पड़ा ।।

" अमां , ये क्या उठा पटक करते हो ?" एकाएक बौखला गया विजय ।


वतन को चरणों से उठाया, गले से लगा लिया , बोला ---" तुम नई पौध की औलाद बहुत बदमाश हो । सालो ये नहीं सोचते कि क्या होगा , क्या नही ।"


" आपने ठीक समय पर आकर मुझे बचा लिया , चचा ।"



" साले ! " भर्रा उठा विजय का स्वर ---" पता होता है कि जहां छलांग लगा रहे हैं , वहां मौत ही मौत है, लेकिन नहीं --- दिमाग से काम नहीं लेंगें , बदले से मतलब , चाहे जो हो । दिमाग तो सालों ने टांड पर टागं दिया है ।"



" चचा । " वतन लिपट गया विजय से ----" बच्चा हूं आपका ।"



" अबे , हमारा बच्चा क्यों होता ?" छेड़ा विजय ने , " हमारा होता तो दिमाग से काम करता । साले तुम --- तुम विकास से कम नहीं । उसी की तरह मुर्ख हो---महामुर्ख ! तुममें से कोई सफल जासूस नहीं बन सकता । तुम दोनों को एक साथ लिखकर दे सकता हूं मैं कि तुममें से कोई सफल जासूस नहीं बन सकता । दोनों बहादूर हो , आवश्यकता से अधिक बहादूर हो और मेरा दावा है कि बहादूर आदमी कभी सफल जासूस नहीं बन सकता ।। जासूस आदमी बहादूरी या शरीरिक शक्ति से नही , बल्कि अपने दिमाग से बनता है और हकीकत ये है कि तुम्हारे पैदा होते ही 'तुम्हारा सारा दिमाग दीमक चाट गई ।"


" क्यों चचा , ऐसा क्या कर दिया मैंनें?"


" तो बेधड़क इस छड़ी के बूते पर इतने सैनिकों की मौजूदगी में हबानची से भिड़ना क्या दिमाग की बात थी ।?"

" उसने मुझे ललकारा था चचा ।"
"जो दुश्मन की ललकार पर तकरार कर बैठे, वह कभी सफ़ल जासूस नहीं बन सकता वटन प्यारे!" विजय कहता ही चला गया-"लेक्रिन जानता हूं कि मैं भैंस के आगे बीन बजा रहा हूँ । यह बीन साले उस दिलजले के आगे बजाते बजाते हम बूढे हो गए, लेकिन वंह भैस की तरह रेंकता ही रहताहै । एक छुटकारा मिला नहीं कि साले तुम पैदा हो गाए । उस साले नकली चचा की भी खोपडी खराब हो गई थी, जो तुम्हें पैदा कर दिया । तुम भी अपने गुरु का नाम रोशन. करोगे, क्योंकि दिमाग पैदल हो !"'

"ऐसी बात नही चचा !"


"तो और कैसी वात है बटन ?" उसी की टून में विजय ने प्रश्न किया ।



होश में आने के बाद पहली बार वतन के होंठों पर मुस्कान उभरी, बोला---" जिन बच्चों के ऊपर आप जैसों का साया हो चचा, वे मौत से क्यों डरें ? हम जानते हैं कि आप, अलकांसे चचा और महान सिंगही कवच बनकर हमेशा हमारी रक्षा करते हैं, फिर फिर क्यों न हम मौत से लड़े ?"



-'"ह्रम इत्तफाक से न पहुंचते बटन प्यारे, तब पता लगता ।"



"ऐसी उम्मीद न विकास को है चचा ,न मुझे । वतन ने कहा-बल्कि हमें विश्वास है कि जब भी मौत हम पर झपटेगी, आप तीनों मे से कोई उसे टाल देगा ।। इसी विस्वास पर तो मौत के कुऔ में कूद पड़ते हम । हमेँ यकीन है कि यमराज़ के हाथों में से भी झीन लायेंगे आप हमें ।"



-""साले हम-हम न हो गए, तुम जैसे सत्यवानों की सावित्री हो गए !"


विजय की इस बात पर उन्मुक्त ढंग से हंस पडा वतन ! उसके ठहाके की आवाज से मानो पूरे जलपोत पर फूलों की वर्षा हो उठी ।

विजय ने हंसते हुए वततं का चेहरा देखा---खून से लथपथ ! विजय ने देखा…हुंसंतै हुए भी उसकी आंखों में पानी था ।
समीप ही, मेज पर रखा वतन का चश्मा उठाकंर विजय अपने हाथों से वतन को पहनाता हुआ--बोला-"'इसे ,पहन लो बटन प्यारे, तुम्हारी आंखें नहीं देखी जातीं । ये आंखें एक कहानी कहती हैं ---- लम्बी कहानी । बचपन से लेकर तुम्हारे राजा बनने की कहानी !"


मस्तक पर बल पड़ गया वतन के ।


फिर मानो स्वयं को सम्भालकर बोला---" उस बात को छोडो चचा, ये बताओं कि ह्रवानची कहां है ?"



" वह साला तो अभी तक मेज के उस तरफ बेहोश पडा है ।" विजय ने कहा----"होंश में आ भी गया तो कुछ नहीं कर सकेगा । हमने बांध रखा है उसे, किन्तु आश्चर्य की बात ये है कि सारे जलपोत पर न कहीं सांगपोक है अौर न ही सिंगसी ! "



"वे दोनों कहां गये ?"



" यह भी जरुर पता लगायेंगे ।" विजय ने कहा लेकिन उससे पहले यह बताओं कि क्या तुम्हें मालूम हैं कि अपना दिलजला कहां है ?"



"सबसे निचली मंजिल के कमरा नम्बर दस मे ।" बतन ने बताया।



" हम जहां बैठे इन साले जलपोतों के चालक को देख रहे हैं ।" विजय ने कहा ----"तुम जाकर अपने दिलजले को ले आओ : याद रहे वहा किसी भी तरह की बहादुरी दिखाने की आवश्यक नहीं है । वहां जेम्स बाण्ड और बागारोफ जैसे महारथी होंगे फिलहाल उनमें से किसी को भी उस केैद से आजाद नहीं करना है । कमरे में से सिर्फ अपने दिलजले को निकालकर यहां लाना है ।"

" तब तो इस गन की आवश्यकता पड़ेगी चचा तो कहते हूये वतन ने गन उठा ली ।



""अवे....अबे !" बोखलाया बिजय-"इसकी क्या जरुरत है ?"


" यकीन रखो चचा, इसका दुरुपयोग नहीं करूंगा मैं ।" कहने के साथ ही-गन सम्हालकर हाँल से बाह्रर निकल गया वतन ।।


सूनी और साफ पड़ी गैलरी में से गुजरता हुआ वतन -अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ा । सबसे नीचे की मंजिल में कमरा नम्बर ढ़स के सामने ठिठक गया वह ।
दरवाजा बन्द था !



अन्दर से कुछ लोगों के आपस में बातचीत करने की आवाजें आ रही थीं ।


दरवाजा बाहर से बन्द धा । उसने धीरे के से सांकल खोली, इतनी धीरे से कि अन्दर किसी को सांकल खुलने का आभास न हो सका ।



फिर वतन ने एक तेज ठोकर दरवाजे में मारी ।


भड़ाक की आवाज के साथ किवाड़ खुलकर झनझना उठे !!


कमरे में उपस्थित बाण्ड , बागारोफ, नुसरत तुगलक औऱ विकास ने चौककर दरवाजे की तरफ देखा ।

उम पर दृष्टि पड़ते ही सबके मुंह से एक साथ निकला ----"वतन !"



"कोई भी हिला तो मेरी गन उसे स्थिर कर देगी ।" अपने स्वर में कठोरता उत्पन्न करके वतन ने कंहा----"सिर्फ विकास बाहर आए !"



सहित समी अवाक-से खडे़ वतन का चेहरा देख रहे थे !



और सभी पर दृष्टि रखे हुए वतन ने कहा------"तुमने सुना नहीं विकास ? तुम बाहर आओ ।"



एकाएक उसके आदेशात्मक स्वर को सुनकर सख्त हो गया विकास का चेहरा, गुरोंया----"क्या इस गन के बूते पर आदेश दे रहे हो ?"



वतन को लगा कि अगर उसने विकास को वास्तविकता नहीं समझाई तो र्वह भड़क उठेगा। यह भी वह समझता था कि उसके भड़काने से कोई भी जासूस कुछ भी लाभ उठा सकता है । बह सोचकर वतन ने विकास से नम्र स्वर में कहा-----"'ये गन तुम्हें आदेश देने के लिए तनी हुई नही है दोस्त, वल्कि इन सबको कक्ष, में रोक रखने के लिए तनी हुई हैं । बिजय चचा ने आदेश दिया है कि इस कमरे से सिर्फ तुम्हें निकालूं । उन्होंने हिदायत दी है कि इस कमरे से कोई और न निकल सके !"



"बिजय गुरु !" प्रसंनता से उछल पड़ा विकास--"वे पहुंच गए यहां' ?" " कहाँ है वह चिडीमार झकझका?" वागारोफ एक दम बिफर पड़ा-----"उस चौट्टी के ने ऐसा कहा !"

"बहको मत डबल चचा !" वतन ने गम्भीर स्वर में कहा--"डबल इसलिए क्योंकि विजय चचा तुम्हें खुद चचा कहते हैं । यह विजय चचा का ही आदेश है कि मैं फिलहाल सिर्फ विकास को ही इस कमरे से निकालूं !"




वतन की बात का तात्पर्य विकास अचछी तरह समझ चुका था ! तीव्रता के साथ वह लपका, औऱ वतन के समीप से गुजरकर कक्ष से बाहर आ गया ।



बाहर निकलने के लिए झपटा तो बागारोक भी था, किंन्तु इससे पूर्व कि वह दरवाजे तक पहुंचता, वतन ने एक झटके के साथ बागारोफ के मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया !



अन्दर बागारोफ भुनभुनता रहा अौर वतन बाहर से दरवाजे को सांकल लगाकर धूमा !



सामने खड़ा उसी की तरफ देख रहा था विकास !



दो बराबर की लम्बाईयां आमने-सामने खडी थीं । वतन तो विकास के नेत्रों में साफ-साफ झांक ही रहा था, लेकिन विकास को चश्मे के पीछे छुपी वतन की आँखों की स्थिति का आभास था । फिर दोनों एकसाथ एक-दूसरे की तरफ लपके -एक-दूसरे के गले से लग गये, बांहो में समा गए । उनके बीच छाई वह खामोशी उस महान प्रेम की सूचक थी, जिसकी अभिव्यक्ति के लिए कोई भी भाषा शब्द निर्माण न कर सकी । ।




-"ये तुमने अपनी क्या हालत बना रखी है ?" विकास ने पूछा ।।



"तुम्हारी चाल में लंगड़ाहटं देखी है मैंने ।" वतन ने उल्टा प्रश्च किया----"क्या कारण है उसका ?"

जो कुछ विकास के साथ हुआ था, वह उसने वतन को बताया और जो वतन के साथ हुआ था, वह विकास को। जब 'यह भेद' खोला कि विकास हैरी के भेष में प्रयोगशाला से फार्मूलां चुराने गया था तो वतन का चेहरा खिल उठा, क्योंकि सारा काम वतन की योजना के अनुसार हो रहा था !

जब विकास को यह पता लगी कि हवानची इस समय कब्जे में है
और सांगपोक व सिंगसी गायब हैं, तो चेहरा सुखे पड़ गया उसका ! अपने चश्मे के पीछे से वतने ने देखा-----किसी खून पीने वाले भेंड़िये की तरह हो गया था विकास का चेहरा ।



तव, जबकि वे उस स्क्रीन कक्ष में पहुंचे ।


ऐक विचित्र ही दृश्य देखा उन्होने । न जाने कहाँ से विजय को एक रस्सी मिल गई थी । जिसे उसने कक्ष की छत में पड़े एक कुन्दे में डाल थी उस रस्सी पर ही हंबानची के उसने उल्टा लटका रखा था !!



न सिर्फ लटका रखा था जबिक हवानची होश में थां । विजय उसकी पसलियों में गुदगुदी कर रहा था !!



मजबूर से हवानची को एक विचित्र से अन्दाज में हंसना पड रहा था ।



"आशीर्वाद दो गुरु !" कहता हुआ विकास चरणों में झुक गया विजय के । श्रद्धापूर्वक उसने चरण स्पर्श कर लिए !



"किसका आशीर्वाद !" झुककर विकास के कान पकडकर विजय ने ऊपर उठाया और जब पूरी तरह से साबधान स्थितियों में खड़ा हुया-----------विकास तो कान पकडे बिजय के हाथ ऊपर उठ गए थे, बोला, "साले, तूं टाड हो गया है दिलजले, लेकिन अक्ल के पीछे अभी तक लठिया लिए घूम रहा है !"

" कहो तो सहीं गुरु, क्या गलती हो गई मुझसे ?"
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03-25-2020, 01:28 PM,
#59
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
"'देख लिया घुसकर तमाशा देखने का पारणाम ?"


विकास के गुलाबी होंठों पर शरारत युक्त मुस्कान दौड गई बोला---" देख तो-रहा हूं गुरु, हम तीनों मस्ती मना रहै है । ये चीनी चमगादड़ हमारे सामने उल्टा लटका हुआ है । बोलिए, क्या ये परिणाम हमारे हक का नहीं ?"



"प्यारे दिलजले !" एकाएक गम्भीर हो गया विजय --"‘पहले भी कई बार कह चुका हूं, आज फिर कहने की तमन्ना। है । "



"जरूर कहिए !"


" तुम पैदा हुए थे तो हमने ख्बाब सजाया था कि तुम्हें जासूस बनायेंगे---------दुनिया का सबसे बड़ा जासूस !"



" बन तो गया हूं गुरू --- अन्तर्राष्ट्रीय सीक्रेट सर्विस का चीफ है तुम्हारा बच्चा ।"
" होगें !" विजय ने कहा ---" ये भी मानता हूं कि दुनिया भर के मुर्ख जासूसों ने तुम्हें ---सबसे बड़े जासूस की उपाधी दे दी है । ये दुनिया भी मुर्ख है , जो तुम्हें इस सदी का सबसे बड़ा जासूस समझती है ।

----- मुझसे पुछो, मेरे दिल की गहराईयों से पुछो तो जासूसी की ए बी सी डी का भी पता नहीं है तुम्हें !


------ हां सबसे बहादूर , सबसे बड़े पहलबान और समय आने पर दुनिया के सबसे बड़े दरिन्दे होसकते हो तुम ! जासूस के पास दीमाग होता है, इस नाम की कोई चीज तुम्हारे पास नहीं है ।

----- जासूस किसी घटना पर भली भातिं बिचार करता है , फिर मैदान में आता है , किन्तु तुम ----- तुम उस समय सोचते हो जब फंस जाते हो , खैर छोड़ो इस बात को मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तुम्हे भाषण पिलाने का कोई लाभ नहीं होने बाला है । देख रहा हू कि तुम्हारे पैरों में लड़खड़ाहट है, तुम्हारे मैदान में कूदने का परिणाम है ये !"



खूनी दृष्टी से पलटकर उल्टे लटके हबानची की तरफ देखा विकास ने !



हबानची के नाटे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई ।



विकास गुर्राया ----" ये लंगडाहट इन मर्दों की मर्दानगी है की वजय से है ।। मुझे चारों तरफ से घेर कर मर्दानगी का परिचय दिया था इन्होंने ।। मैं जान भी ना सका कि मुझे किसने घेरा है कि इनकी गोलियां मेरे शरीर में धंस गई ।"



" इसी को तो जासूसी पैंतरा कहते हैं प्यारे दिलजले ! इन्हे पता था कि अगर इन्होंने तुम्हें सम्हलने का का अबसर दिया तो परिणाम क्या होगा ।"



किन्तु विजय की बात पर ध्यान कहां था बिकास का । वह तो उल्टे लटके हबानची पर गुर्राया-----" तू तो मुझसे अपने जीबन का आखिरी खून करने के लिए मिला हे । जो कुता अपने बाप की कब्र को मेरे खून से धोने के लिए निकला था , वह कहां चला गया ?"


कुछ बोला नही हबानची , चुपचाप लटका रहा ।
" सुना नहीं तुमने ?" ऐसी आबाज कि अगर फौलाद से टकराये तो उसमें भी दरार पड़ जाती----" क्या पूछ रहा हूँ मैं ?"



बेचारा हवानवी जवाब वया देता ?


चुप रहा ।

उत्तर में एक तीव्र ठोकर उस के चेहरे पर पड़ी हबानची के कंठ से चीख निकल गई । फिर विकास ने शुरू कर दिया अपनी द़रिन्दगी का दौर !! स्वयं हबानची तो हलाल होते हुए बकरे की तरह मिमिया ही रहा था, इधर विजय और वतन’ को भी आंखें बन्द कर लेनी पड़ी । विजय तो जानता ही था कि ऐसे मौके पर विकास को टोकने 'से कोई लाभ नहीं होता, लेकिन वतन ने टोका तो उसकी तरफ इस तरह पलटकर गुर्रापा विकास कि जैसे उसे फाड़कर खा जाएगा-----"बीच में मत बोलो वतन , अपने काम में अवरोध उत्पन्न करने वाले को मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता ।"



और विकास की इस गुर्राहट के बाद स्वयं वतन कां साहस नं हुआं कि वह कुछ कहे ।



कहते है कि बिकास अगर जुबान खुलवाने का प्रण कर ले तो पत्थर के टुकडों को भी बोलने पर विवश कर देता है । एक समय ऐसा अग्या कि हवानची को बोलना ही पड़ा---- "वे दोनों चीन पहुँच चुके हैं !"

--'"क्रिस माध्यम से ?" विकास ने पूछा ।


"विमान से ।"


" क्या वे 'वेवज एम व अणनाशक किरणों के फार्मुले फिल्में भी अपने साथ ले गए हैं ?"



-"हा । हवानची ने जवाब दिया ।


"हूं !" गुर्राया विकास----"तो चीन में तबाही मचाने का सामान वे अपने साथ ले गए हैं !"

"एक बार फिर समझो प्यारे दिलजले------इसे कहते हैं जासूसी ।" विजय ने कहा--"हमारा ध्यान इस जलपोत पर केन्द्रित करके फिल्मों सहित वे सुरक्षित अपने देश पहुंचने में सफल हो गए हैं ।"



--"यही तो मैं चाहता था चचा !" विकास के स्थान पर वतन बोल पड़ा----" अगर इसी-जलपोत पर फिल्में मेरे हाथ लग गई होतीं तो बेहद अफसोस होता मुझे !"
"इस ऊट पटांग बात का क्या मतलब है बटन प्यारे ?" विजय ने, आंखें निकाली ।



" मतलब सिर्फ इतना है चचा कि चीन में जाकर तहलका मचाना चाहता हूँ मैं ।" वतन ने कहा-"अगर फिल्में यहीं मिल जाती तो चीन जाने का बहाना समाप्त हो जाता, मेरी हसरतें दिल में घुटकर रह जाती !"



. "तुम्हें कोई नहीं समझ सकता ।" झुंझला उठा विजय ।



विकास हवानची से कह रहाथा किसी ओऱ के द्वारा किए गए शिकार को खाना विकास का सिद्धान्त नहीं है । इस समय मेरी सेवा में तुम्हें गुरु और वतन ने प्रस्तुत किया है । तुमने कसम खाई है कि अपनी जिन्दगी का आखिरी खून तुम, मेरा करोगे ! जब तक तुम्हें अपनी हसरत पूरी करने का एक मौका न दे दू, तब तक मरने भी नहीं दूगा । तुम्हें जिन्दा रखूंगा मैं, मौका दूगा कि तुम मेरी हत्या कर सको । उस प्रयास में स्वयं भी अपने जीजा के पास पहुंच जाओ तो यह तुम्हारा भाग्य होगा !"



न जाने क्या सोचकर दर्द से कराहते हवानची के कान की एक नस दबा दी विजय ने ।


हबानची बेहोश हो गया ।



विजय की तरफ पलटकर विकास ने पूछा…"इससेक्या लाभ हुआ ?" '3"

" इससे वही लाभ हुआ प्यारे दिलजले, जो जुकाम में विक्स बैपोरब लगाने से होता ।" अपनी ही टुन में विजय कहता चला गया----"होश में रहने परं अब यह मिमियाने के अलावा कर भी वया सकता था ! वैसे भी यह हमें अपसी मुहब्बत की बाते न करने देता ।"



"खैर, चचा, अब आदेश दीजिए कि हमें क्या करना है ?" वतन बोला ।



खा जाने वाली नजरों से विजय ने घूरा वतन को बोला "मेरे आदेश की जरूरत है तुम्हें ?"



"वयों नहीं गुरु ?" विकास ने शरारत की ।



" तो मेरा आदेश तो ये है प्यारो कि इसी जलपोत पर बैठकर अखण्ड कीर्तन करो ।" विजय ने कहा, " शरीफ भक्तों की तरह बैठकर हमारी झकझकियों का रसास्वादन करो । उनमें छूपे तथ्यों को समझो और जीवन में उनका अनुकरण करो।"
"खैर, चचा, अब आदेश दीजिए कि हमें क्या करना है ?" वतन बोला ।



खा जाने वाली नजरों से विजय ने घूरा वतन को बोला "मेरे आदेश की जरूरत है तुम्हें ?"



"वयों नहीं गुरु ?" विकास ने शरारत की ।



" तो मेरा आदेश तो ये है प्यारो कि इसी जलपोत पर बैठकर अखण्ड कीर्तन करो ।" विजय ने कहा, " शरीफ भक्तों की तरह बैठकर हमारी झकझकियों का रसास्वादन करो । उनमें छूपे तथ्यों को समझो और जीवन में उनका अनुकरण करो।"

कुछ देर उन्हें विजय की उस बकवास का सामना करना पड़ा जो एक बार शुरू होकर बंद होनी कठिन हो जाती है ।


विकास तो वैसे भी विजय की बकसास का जवाब बकवास में ही देने का के माहिर था । वह तो विजय के सामने अड़ा रहा, किन्तु वतन बुरी तरह बोर हो गया ।।



जब उस पर रहा न गया तो बोला-----------" कुछ काम की बातें भी करो चचा!"



" ये हुई शरीफ वच्चों वाली बात ।" यह सोचकर कि काफी देर मौज मस्ती हो ली है, विजय स्वयं ही लाइन पर आता हुअा बोला--- --" चचा के पास तो बचा ही क्या है व्रटऩ प्यारे तुम ही काम की बातें करो ।"




" ये जलपोत किधर जा रहा है ?"



" पीकिंग की तरफ ।"



'"क्या हम इसी जलपोत के माध्यम से चीन में प्रविष्ट होंगें ?" वतन ने पूछा।





" इस जलपोत के चालकों को तो हमारा यही आदेश है की वे सीधा पीकिंग के बन्दरगाह पर ही लंगर डाले ।" बिजय ने बताया----""लेक्रिन हम बन्दरगाह तक पहूंचने से पूर्व ही जलपोत छोड़ चुके होंगे !"

" हूं !" बाण्ड वागगरोफ नुसरत और तुगलक का क्या होगा ?"



" हां !" बिजय न कहा "यह प्रश्न अवश्य विचार योग्य है । अगर हमंने उ़न्हें उसी कक्ष में बंद छोड़ दिया--- तो अंत में चीनियों की कैद में होगें बे । उन्हें साथ लें, तब भी खतरा है । साथ रहै, सम्भव है हमारे साथ रह कर वे हमारे ही काम मे अबरोध उत्पन ना करें ।"



" एक राय दूं गुरू ? विकास बोला ।



" जरूर दो !" विजय ने कहा है


" क्युं ना हम अपने साथ साथ चचा बागरोफ को ले लें ।"



" क्यों ? चचा में क्या लाल जड़ें हैं ?"
" क्यों? चचा में ही क्या लाल जडे है ?"



"यह बात अन्तर्राष्ट्रिय गठ्बन्धन के आधार पर की हैं गुरु ।" विकास ने कहा--" चीन, पाकिस्तान और इंगलैण्ड एक है। रूस उनका विरोधी है ,हमारे साथ है । पाकिस्तान और इगलैण्ड की सरकार के अनुराध पर चीनं उंनके जासूसों को तो लौटा देगा, किन्तु चचा के मामले में गड़बडी़ कर
सकता है । सम्भव है चीनी सरकार चचा के साथ कोई अनुचित हरकत भी कर डाले । चचा के साथ अगर कुष्ट भी अनिष्ट होता है तो उसके जिम्बेदारं हम होंगे !"

"जिस आधार पर तुमने यह राय दी है प्यारे दिलजले उस दृष्टि से तो बिल्कुल सही है !" विजय ने कहा…......"इसमें कोई शक नहीं कि एक बार अपने पंजे मे फंसे बागारोफ को चीन सरकार मार भी डाल तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी ! किन्तु सोचना यह है कि इस अभियान में चचा का लक्ष्य भी बही है जो बाण्ड इत्यादि का है-फार्मूला
प्राप्त करना । सम्भव है कि हमांरे साथ रहकर भी चचा वही प्रयास करें?"



" निश्चित रूप से आपकी बात में दम है गुरु !"



"तुम्हारी इस बारे में क्या राय हे बटन मियां !" विजय ने वत्तन से पुछा।



गम्भीर स्वर में वतन ने कहा--"क्या आप सचमुच मेरी दिली राय जानंना चाहते चचा ?"



" स्पष्ट कंहो दोस्त ! क्या कहना चाहते हो तुम ?" बिकास बोला !


"चचा !" विजय पर दृष्टि गड़ाए वतन गम्भीर में कहा…"मेरी राय जानना चाहते हो तो सच्चाई ये है कि मैं अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों में कोई फर्क नहीं समझता ।।ये सभी राष्ट्र महाशक्तियाँ कहलाते हैं और करीब करीब इन सभी की नीति एक जैसी है । मैं इसे अच्छा नहीं समझता किं रुस अगर भारत के साथ है तौ हम उसे ठीक कहें ।। नीति उसकी भी वही हेै छोटी मछलियों को ग्रास बनाना !"
" तुम लो अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का कचूमर निकालने लगे बटन प्यारे !"
विजय ने कहा--- "यहां सबाल ये नहीं हैं कि किस महाशक्ति की नीति क्या है ! प्रश्न ये है कि चचा को साथ लें अथवा बाण्ड और नुसरत तुगलक के साथ उसी कक्ष में बन्द पड़ा रहने दे?"



" सिर्फ इसलिए मुझे बागरोफ चचा से कोई सहानुभूति नहीं हो सकती कि वे रूस के हैं ।" वतन ने स्पष्ट कहा------"लेकिन यह भी सच्चाई है कि अगर उन्हें चीन के हवाले किया गया तो उन्हें सिर्फ रूसी होने की सजी मिलेगी !"

" तुम्हारे कहने का मतलब ये है कि चचा को अपने साथ ही ले लेना चाहिए !"



…"यही समझ लीजिये ।"



" और अगर वे फार्मूला प्राप्त करने के लिए हमारे साथ ही गड़बड़ करे तो ?"




''जब वह वक्त आयेगा तो चचा से हम स्वयं निबट लेंगे ।" वतन ने कहा----"यह बात ज्यादा गलत होगी कि इस डर से उन्हें इन दरिन्दे चीनियों के हवाले कर दिया जाए ।"




"मैं बतन की बात का समर्थन करता हूं ।" विकास ने कहा…"और साथ ही यह राय भी देता हूं कि फिलहाल हम हबानची को भी अपने साथ रखें । चीन में वह एक कवच की तरह हमारी रक्षा करेगा ।"

-"क्या मतलब ?" विकास की उपर्युक्त राय पर विजय चौका----हमें गले में घण्टी बाँधने की क्या जरूरत है ?"



" आप समझे नहीं गुरु !" विकास ने कहा-"हमे क्रिस्टीना के यहां ही तो ठहरना है !"



"बेशक।"



" जब तक हम चीन में रहकर फार्मुला ना प्राप्त करें,, तब तक हवानची को अपनी कैद में रख सकते है !"

" लेकिन इससे लाम क्या होगा ?"
"बहुत से लांभ होगे !" विकास ने कहा---"पहला फायदा तो ये कि सांगपोकऔर सिंगसी के ठिकानों का पता बतायेगा ये । वे ही दोनों फिल्में ले गये है और उन्हीं को मालूम होगा कि फिल्में कहाँ हैं ! वैसे भी जब तक हवानची हमारे कब्जे मैं-रहेगा, हम सुरक्षित रहेगे !"



"बात उल्टी भी पड़ सकती है प्यारे दिलजले !" विजय ने कहा हवानची हमारे साथ-साथ क्रिस्टीना--- को भी फंसा सकता है !"


''मामला थोडा गडबड हो गया गुरु !" विकांस ने कहा--"अगर यहां हमें हवानची के स्थान पर सांगपोक टकराया होता तो एक वडी़ ही खूबसुरत चाल चली जा सकती थी । दिक्कत ये है कि इसके लोटे जैसा शरीर हममें से किसी के पास भी नहीं है !"




"तुम शायद यह कहना चाहते हो कि इसके स्थान पर यहां सांगपोक होता तो उसका मेकअप करके चीनी सीक्रेट सर्विस में धुस जाते ?"




"आपके बच्चे जियें गुरु !" विकास ने कहा… "काफी समझदार हो गये हैं आप ।''



सीना चौड़ा कर लिया विजय ने, बोला---" मूंग की दाल में भीमसेनी काजल मिलाकर खाना अपना खानदानी शोंक है प्यारे--- और यह तो तुम्हें पता है ही कि इनके सेवन से बुद्धि ऐड़ लगे हुए घोडे की तरह सरपट दौड़ती है । किन्तु सबाल ये हैकि हममें से किसी ने भी हवानची के शरीर जैसा हसीन जिस्म नहीं पाया है, अत: इसका मेकअप करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है ।"



''तो आप इस बात से सहमत नहीं है गुरु कि हबानची को अपने साथ रखा जाये !"


''एकदम नहीं ।" विजय ने कहा------"हां !"-----इस बात की तुम्हें पूरी छूट है कि जलयान छोड़ने से पूर्व तुम इससे जो भी जानकारी प्राप्त करना चाहते हो, प्राप्त कर सकते हो । जैसे सांगपोकं और सिंगसी का पता इत्यादि !"



" ठीक है !" कहकर विकास हवानची की तरफ धूम गया । अब वह हवानची को दुबारा होश में लाने का प्रयास कर रहा था ।



वतन कल्पना कर सकता था कि अब अगले कुछ समय में इस कक्ष में क्या कुछ होने जा रहा है !


वह सब कुछ अपनी आंखों से देखकर वतन में चुप रहने की ताकत नहीं थी ।


और न ही विकास का बिरोध करना चाहता था । अतः लम्बे-लम्बे कदमों के साथ वह कक्ष से बाहर निकल गया ।।।।
क्रिस्टीना ने वतन कौ देखा तो देखती ही रह गई । न जाने क्यों उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि दो तीन बार जोंर-जोर से धड़ककर उसकी हृदय-गति वंन्द हो गई है ।


हालांकि वतन के साथ ही उसके फ्लैट में विजय, विकास और बागारोफ भी प्रविष्ट हुए थे, किन्तु उसकी दृष्टि वतन के चेहरे पर ही स्थिर होकंर रह गई थीं । गोंरा दूध जैसा, सेव की लाली लिये चेहरा ।


आंखों पर काला चश्मा ।


हाथ में छडी़ । जिस्म पर मौजूद सफेद कपडों पर न सिर्फ खून के धब्बेे लगे हुए थे बल्कि जगह-जगह फटे हुए भी थे !

उसे देखकर कोई भी कह सकता था कि भयानक जंग के बाद उसे कपड़े बदलने का मौका नहीं मिला है ।



" वतन की ही देखती रहोगी क्या---- क्रिस्टीना को बिकास की आबाज ने मानो स्वप्न से जगाया , " हम भी खडे़ है !"



" ओह !" अपनी मुर्खता का अहसास करके झेंप गई क्रिस्टीना -----" आओ-आओ !" कहने के साथ ही बह दरवाजे से हटी और उन्हें ड्राइंगरूम में पड़े सोफे पर बैठने का संकेत करने लगी !"

बांगारोफ भला ऐसे मौकें पर चुप रेहने वाला कहाँ था ! बोला---"लगता हैं, छोकरी इस हरामजादे पर फिदा हो गई हैं !"


सुर्ख हो उठा क्रिस्टीना का चेहरा !




'विजय ने कहा----" चचा, अपने बंटन का नाम सुनते ही मीरा की तरह दीवानी हो गई है क्रिस्टी ! जब हम यहां थे तो हम इसे बटन की मुहब्बत के बताशे फोड़-फोड़कर खाते देखा करते थे । अब स्थिति ये है कि इस बटन को क्रिस्टी अपने ब्लाऊज पर लगा लेना चाहती है !
वतन के अधरों पर एक विचित्र-से दर्द में डुबी मुस्कान उभर अाई थी ।




विकस ने कहा सच ---वतन् क्रिस्टी के लायक है ! क्रिस्टीना खडी न रह सकी वहाँ' ! तेजी के साथ मुडी और दूसरे कमरे में भाग गई !!



"लौ !" बागारोफ ने कहा पहले तो इस हरामजादे के दिल में मुहंब्बत की धण्टी बजा दी छिनाल ने, ओर अब खुद डंका बजाती चली गई !"

" डबलं चचा !" वतन ने 'गम्भीर स्वर मैं कहा---"यहाँ इतनी फुर्सत ही कहां है कि किसी से मुहब्बत कर सकू ।चीन में आया हूं, चीनियों को सबक देने से ही फुर्सत नहीं मिलेगी । तुम समझाना क्रिस्टी को । विजय चचा, तुम भी समझाना । जो कुछ आंप कंह रहे हैं सचमुच अपने लिए क्रिस्टी की आखों में मैंने वह सब कुछ देखा है । विकास! उसे तुम भी समझाना मेरे यार । कहना कि वतन के दिल को धडकन उसका देश बन चुका है --------चमन ।"


वतन के उन शब्दों के बाद एक सन्नाटा सा खिंच गया कमरे में ।



कुछ देर तक तो बागारोफ जैसे व्यक्ति की भी समझ में नहीं आया कि इस सन्नाटे को वहं कैसे तोडे परन्तु अधिक, देर तक वातावरण मे वह बोझिलता कायम न रह सकी जहां विजय और बागारोफ जैसे हो ऊट पटांग बातें करने वाले हों वहाँ भला संनांटा कितनी देरे टिक सकता है ?





परिणाम ये कि कुछ ही देर बाद वहां ठहाके लगने लगे । उधर क्रिस्टीना को चैन कब था ! उसवै बहाना ढूंढा ! किचन में जाकर फटाफट काफी तैयार की और एक ट्रै में ऱख ड्राइंगरूम में आ गई ! दृष्टि झुका रखी थी उसने ! इच्छा क्या तो थी किंतु उनमें से किसी से भी दृष्टि मिलाने का साहस नहीं था उसमें !!!



कोई कुछनहीं बोला ।


" बतन ने स्वयं ही कहा---- "चचा सर्वप्रथम कपडे बदलने की इच्छा है !"
" तुम्हारे कपड़े बंदलना कोई आसान बात तो है नहीं प्यारे !" बिजय ने कहा… "सफेद कपडों के अतिरिक्त किसी अन्य रंग का कपड़ा तुम पहनते नहीं और मियां चुकन्दर की दुम,, तुम्हारे लिए अब यहां सफेद कपडे आयें कहां से ?"



" मेरे पास है !" एकाएक क्रिस्टीना के मुंह से निकल पड़ा !

सभी ने चौककर क्रिस्टीना की तरफ देखा ।


लाज से दोहरी हो गई क्रिस्टीना ।


दृष्टि उठा न सकी !
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03-25-2020, 01:28 PM,
#60
RE: antervasna चीख उठा हिमालय
विजय न पूछा----" तुम पर कहां से आ गये ?"


इस प्रश्न पर क्रिरुटीना बौखला गई । फिर स्वयं को संभालने का प्रयास करती हुई बोली---"मुझे मालूम था न भैया कि ये आ रहे हैं । यह भी पता था कि सफेद के अलावा किसी रंग का कपडा नहीं पहनते है ! सो...........सो मैं खरीद.....।


बात पूरी न कर सकी क्रिस्टीना । हलक सुख गया उसका !


'"यह्र तो बड़ा अच्छा किया तुमने । वतन सीधा क्रिस्टीना से बोला---;-"कपडे बदलना मेरे लिए इस समय किसी भी कार्य से अधिक आवश्यक है । अगर कपडे मैं नहा… कर बदलूं तो ओर भी अधिक अच्छा रहे ।"



यह अनुभूति करते ही कि यह वाक्य बतन ने सौधा उसी कहा है क्रिस्टीना का दिल जोर-जोर से धड़क उठा !


बीच में टपक पड़ा विजय---"क्यों" नहीं-क्यों नहीं बटन प्यारे, नहाना जरूर, चाहिये । आओ, मैं तुम्हें बाथरूम दिखाता हूं !



सोफे पर से उठकर खडे हो गये विजय की कलाई पकडी विकास ने एक झटका देकर सोफे पर विजय को वापस विठाता हुआ विकास वोला------"अाप बैठो गुरु, क्रिस्टी वतन को बाथरुम बतला देखी !"

"'अजी नहीं !" विजय ने खड़े होने का अभिनय किया ---"हम बतायेंगे !"
"'नहीं गुरु !" विकास ने वापस खीचा



-"अजी नहीं ।'" विजय ने पुन: उठना चाहा तो इस बार विकास के साथ बागारोफ ने भी विजय को पकड़कर खींचते हुये कहा…"अबे बोलती पर ढक्कन लगा ढक्कनी के ! मुहब्बत की खिचडी पक रही है तो पकने दे । तु क्यों दालभात में मूसलचन्द बनता है ? जा छिनाल की ताई-तू दिखा इस भूतनी वाले को बाथरूम का रास्ता ! इस चिडी के नटवे को हमने पकड़ रखा है !"



विजय की इस एक्टिंग पर वतन और क्रिस्टीना भी बिना मुस्कराये नहीं रह सके ।



-"'आप भी खूब हैं चचा !" कहता हुआ वतन उठ खड़ा हुआ-" मैं नहाने जा रहा हूँ ! क्रिस्टोना----बताना बाथरुम ।"



दृष्टि झुकाये कमरे से बाहर की तरफ चल दी क्रिस्टीना ।

उसके पीछे वतन था !


रहरहकर विजय विकास और बागारोफ के बन्धनों से मुक्त होने का प्रयास कर रहा था----साथ ही चीख रहा था -------"अबे छोडो मुझे ! बटन को बाथरुम का रास्ता मैं दिखाऊँगा !



"काँफी पी चटनी के वर्ना गंजा कर दूंगा ।" बागरोंफ उसे रोकता हुआ बोला !



दरवाजा पार करके वतन और क्रिस्टीना ओझल हो गये । तो ढीला पड़ गया विजय । बागारोफ की तरफ देखकर नाराजगी जैसे शब्दों में बेला-"ये तुमने अच्छा नहीं किया चचा मेरे पेट में दर्द होने लगा है ।''

" अबे चुपचाप कॉफी पी चोट्टी के ।"


कप उठकर कॉफी का एक पूंट भरा विजय ने और फिर विकास से वोला…"तुम्हें तो मैं भुगत लूँगा दिलजले !"


इधर यह मोज-मस्ती आ रहीं थी और उधर…वतन और क्रिस्टीना ?



उसके पीछे-पीछे चल रहा था वतन ! गर्दन झुकाये क्रिस्टीना धीरे-धीरे चली जा रही थी !
अचानक वतन दो लम्बे कंदमों के साथ उसके बराबर में अा गया !

उसके साथ चलता हुआ बोला--" क्रिस्ट्री !"



ठीठककर, दृष्टि झुकाये हुए ही क्रिस्टीना ने कहा…" जी !"



"मेरी तरफ देखो ।" उसके समीप ही खड़े वतन ने गम्भीर स्वर में कहा ।



न जाने कैसी शक्ति थी वतन में कि क्रिस्टीना कों धडकता हुआ दिल उसकी पसलियों में टकराने लगा है ! कम्पित से नेत्र उठे ! ऊपर, वतन के चेहरे की तरफ़ देखा उसने ! एक अनजाने से आदेशबश उसका सारा शरीर कांप रहा था ।


"त----तुम मुझे कैसे जानती हो !" वतन… ने गंभीर स्वर में पूछा ।


हलक सूख-सा गया था क्रिस्टीना का उसने वोलना चाहा है किन्तु स्वर अधरों से बाहर ना निकला !

"जवांब दो क्रिस्टीना-"कैसे जानती हो तुम मुझे ?"


क्रिस्टीना ने साहास समेटा धीमे स्वर में बोली…आपकौ कौन नहीं जानता ?"


"जो मुझे जानता है वह मेरी पूरी कहानी से भी परिचित होता है !"


" अनभिज्ञ मैं भी नहीं !"




" फिर भी मेरी तरफ इस विशेष दृष्टि की त्रुटि क्यों कर रही हो तुम ?" शान्त सागर जैसे गंभीर स्वर में वतन …" तुम भी तो जानती होंगी कि मैं उन अभागों में हूं जिससे जो प्रेम करेगा वह मृत्यु की गोद में सो जायैगा !" क्रिस्टीना देख रही थी-बोलते हुये वतन के मस्तक पर बल उभर आया था ---- वह कह रहा था---" अपने परिवार से प्रेम था मुझे अपनी मां से, बहन और पिता से मगर वे जीवित न रहे ! बूढी दादी मां से प्रेम करके उसे भी मार डाला मैंने अब----अव किसी से प्रेम करना नहीं चाहता । किसी को मारना नहीं चाहता ! किसी के भी प्रति मेरे ह्रदय मे प्रेम उमड़ने का तात्पर्य हैं, उसके लिये मृत्यु का सृजन करना ! मैं ओर अधिक हत्यायें नहीं, कर सकता ।"
"आपकी यह धारणा त्रुटिपूर्ण है !" क्रिस्टीना ने धीरे से कहा--- "आपके ह्रदय का भ्रम मात्र !"


"नहीं क्रिस्टी ये भ्रम नहीं, सत्य है !" वतन ने कहा---"कठोर सत्य है कि जिससे मैं प्रेम करूंगा, वह जीवित नहीं रह सकेगा क्रिस्टी !" वतन की आवाज भर्रा गई---" मैं और अधिक धाव न सह सकूगां ! मैं तुम्हारे प्रेम का उत्तर प्रेम से नहीं दे सकुंगा !"




"उतर की अभिलाषा किसे है ?" क्रिस्टीना ने कहा --- ईश्वर का उपासक यह कब चाहता है कि ईश्वर उसकी उपांसना करे ?"

" समझने का प्रयास करो क्रिस्टी !"


"यह प्रयास करने की आवश्यकता आपको है !" कहने के साथ ही क्रिस्टीना आगे बढ़ गई । बाथरुम की ओर सकेंत करके बोलीट---"वह बाथरुम है, उसी के अन्दर अपके कपड़े भी उपस्थित हैं ! नहाकर परिवर्तित कर लीजिएगा ।"



वतन उसे देखता रह गया !



सिर झुकाये वह तेजी से गैलरी में बढ़ी जा रही थी ।


"क्रिस्टी !" वतन ने पुकारा !"


ठिठकी क्रिस्टीना, मुड़ कर वतन की अोर देखा । कम्पित स्वर में बोली-"क्षमा करें, आपके उत्तर की अभिलाषी, नहीं मैं !"



"मैं तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूं !"



" यही न कि ईश्वर की उपासना त्याग दूं मैं ?" धीरे से क्रिस्टीना ने कहा--------परन्तु क्षमा करें । चमन पर शासन होगा आपका । चमन के नागरिकों के हृदय पर भी राज्य करते हैं आप--किन्तु क्रिस्टी के ह्रदय पर आप का कोई अधिकार नहीं है !

क्रिस्टी अंपने मनो-मस्तिष्क में किसी भी प्रकार के विचारों को स्थायित्व प्रदान करने हेतु स्वतन्त्र है । यह कहने का आपको कोई अधिकार नहीं कि अपने ह्रदय में ईश्वर की उपासना के विचारों को त्याग दूं । यह मुझ पर अत्याचार होगा और अत्याचार सहना क्रिस्टी का काम नहीं है !" कहकर वह मुडी और आगे बढ़ गयी !



" सुनों क्रिस्टी, मेरी बात सुनो ।" वतन ने पुकारा !

परन्तु इस बार रुकी नहीं क्रिस्टीना, पूर्ववत आगे वढ़ती चली गई !
अपने स्थान पर खडा वतन उसे उस समय तक देखता रहा जब तक कि गैलरी के मोड़ पर घूमकर ओझल न हो गई । वतन के मस्तक पर पड़ा बल गहरा हो गया । फिर न जाने किन विचारों के वशीभूत उसका चेहरा सुर्ख पड़ गया ।


सुर्ख चेहरा लिये वह लम्बे-लम्बे कदमो के साथ बाथरुम में समा गया !



उधर जब क्रिरुटीना ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया ।


नारा-सा लगाया विजय ने---" तो पक गई प्रेम की खिचडी ?"



" आपका तो हर सम्य मजाक सूझा करती है विजय भैया !" कहती हुई सोफे अर बैठ गई क्रिस्टीना ।


कॉफी का मग उठाया उसने और होंठो से लगा लिया ।


इधर उसने एक घूंट लिया और उधर विजय ने कहना शुरू किया------------"'मजाक नहीं क्रिस्टी इस गंजे चचा की कसम ।" विजय के स्वर में बंनावटी गम्भीरता थी------------"ये इस्क का रोग बडा भयानक है । एक बार हमें कल्लो..."




"अबे चुप !" बीच में ही डाटा बागारोफ ने---"तू साले क्या जाने कि…।"



"नहीं चचा, पिछले जन्म में कान्ता से इश्क किया था गुरू ने !"

इस प्रकार तीनों ही ऊलजलूल बातें करते रहे । इधर उनकी कॉफी समाप्त हुई, उधर दूध जैसे सफेद कपडे पहने वतन प्रविष्ट हुआ ।



एकटक वतन के सौन्दर्य को देख रही थी क्रिस्टी ।


वतन उससे नजर बचाने का प्रयत्न कर रहा था !


.'"चचा ! विजय ने नारा सा लगाया---" मामला तो साला उल्टा हो गया है क्रिस्टी मर्द बन गयी अौर अपना बटन औरत !"
जलपोत ने बन्दग्गाह पर लंगर डाला तो कई सैनिक अंधिकारियों के साथ सांगपोक और सिंगसी भी जलपोत पर चढ़ गये । इस बात से उनका 'माथा' ठनका था कि डेक पर कोई भी आदमी नहीं चमका था !



एक साधारण-सी बात थी के कि जलपोत जब बन्दरगाह पर पहुंचे तो यात्री डेक पर आजाते हैं, मगर डेक सूना पड़ा था ! कल्पना तो उन्होंने यहीं की थी कि कम-से-कम हवानची को तो होना ही चाहिये था ।



किन्तु पह अप्रिय घटना क्या हो सकती है, यह बात सांगपोक के-दिमाग के दायरे से बाहर थी ।



यह विचार भी उसके दिमाग से चकराया था कि अगर रास्ते में कोई अप्रिय घटना घटी है तो जलपोत के सुरक्षित यहां पहुंचने का क्या मकसद है?



फिर भी सांगपोक ने सैनिकों को सचेत कर दिया ।


सर्थप्रथम वे चालक-कक्ष में पहुंचे ।।

दो चालकों को बुत की भांति अपनी सीटों पर बैठे पाया !


"क्या बात है इस तरह क्यों बठे हो तुम ?" -सांगपोक ने पूछा !



अपने साथियों को अपने पास देखकर उनके पीले चेहरों की रंगत बदली । उन्होंने बताया कि, उनकेसभी साथियों को एक कक्ष में बन्द कर दिया गया है ।



विजय ने उन्हें जलपोत चलाते रहने का आदेश देते हुए यह कहा था कि अगर वे एक पल के लिये भी सीट से उठे अथवा अन्य किसी प्रकार की अनुचित हरकत करने की चेष्टा की तो वह टी.बी हाल में बैठा उन्हें देख रहा है । इसी डर से उनमें से कोई हिला तक नहीं ! जलपोत को सीधा यहाँ ले आये । अब भी बुत के समान इसीलिये बैठे थे, क्योंकि, उनकी दृष्टि में उन पर नजर रखी जा रही थी !
उनके उलटे-सीधे बयान से सांगपोक समझ गया कि रास्ते में जलपोत पर क्या घटना घटी है !


सिंगसी और कई अन्य अधिकारियों सहित सांगपोक टी वी हॉल की तरफ वढ़ गया है ! वहां पहुंचने के लिये पहले वे उस हॉल से गुजरे जिसमें वतन ने व्यूह का कमाल दिखाया था !




वहाँ की स्थिति कां निरीक्षण करता हुआ साँगपोक अनुमान लगाने का प्रयास करने लगा कि क्या कुछ हुआ होगा !!
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