Antervasna नीला स्कार्फ़
10-05-2020, 12:45 PM,
#21
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
सुश्रुता कुछ कहती नहीं। सिर्फ़ अपनी किताब की ओर देखती रहती है। मुझे मेरा जवाब मिल गया है।
“यू आर टेरिबली यंग। ये बात माँ-बाप ने सिखाई तो होगी कि ज़िंदगी में की जानेवाली ग़लतियों के लिए ज़िम्मेदार हम ही होते हैं, भुगतना भी हमें ही पड़ता है। तुम समझ रही हो न मैं क्या कह रही हूँ?”
“यस टीचर।” सुश्रुता का ध्यान अब कहीं और है। तेरह साल की है ये। सात साल में सिया भी इतनी ही बड़ी होगी। बार-बार मैं इस लड़की में अपनी बेटी को क्यों देखती हूँ? उस दिन मैं सुश्रुता को जल्दी घर भेज देती हूँ।
मुझे सुश्रुता में न अपनी बेटी ढूँढ़नी चाहिए न उसकी माँ बनने की कोशिश करनी चाहिए।
धीरज आ गए हैं और मैंने सुश्रुता को कुछ दिनों का ब्रेक दे दिया है। अब हम क्लास में ही मिलते हैं। भीड़ में, बाक़ी सब लड़कियों के साथ। धीरज मुझे स्कूल छोड़ दिया करते हैं, इसलिए सुश्रुता के साथ जाने का ये बहाना भी नहीं रहा। लेकिन ये भी सच है कि मैं उसकी कमी महसूस करती हूँ।
एक दिन स्कूल की छुट्‌टी के बाद सुश्रुता मुझे स्टॉफ़ रूम में मिलती है।
“आपको कुछ बताना था टीचर।”
“हाँ सुश्रुता?”
“मेरा ब्रेक-अप हो गया दुष्यंत के साथ। मैंने व्हॉट्सएप्प पर बता दिया था उसे।” इतनी कम उम्र में ये रिश्ते खेल लगते हैं इन्हें। जाने अपने मन और शरीर को कितना चोट पहुँचाते होंगे ये बच्चे ऐसी नादानियाँ करके। मैं फिर परेशान हो गई हूँ।
“बट वी आर फ़्रेंड्स स्टिल। जस्ट दैट, हम किसी रिलेशनशिप में नहीं हैं।”
मेरा मन करता है, उसे झकझोर कर पूछूँ, तेरह साल की उम्र में किस रिलेशनशिप में थी सुश्रुता?
मुझे फिर सिया के लिए चिंता होने लगी है। ऐसी क्यों है सुश्रुता? मैं ऐसा क्या करूँ कि सिया सुश्रुता न बन जाए? सुश्रुता की बेपरवाही और अनुशासनहीनता हर बार मुझे एक टीचर के तौर पर नहीं, एक माँ के तौर पर चुनौती देती दिखाई देती है। सिया के जिस पालन-पोषण और अनुशासित होने पर मुझे नाज़ है, उस अहसास को सुश्रुता रह-रहकर चिढ़ा जाती है।
धीरज के रहते-रहते सुश्रुता न के बराबर ही आती है। लेकिन क्लास में उसकी होमवर्क कॉपी मुझे क़रीब-क़रीब हर रोज़ मिलने लगी है। कई बार स्टाफ़रूम में वो मुझसे या ताहिरा से मिलने आती है, डाउट्स क्लियर करने के लिए। हमारे बीच अब कोई निजी बातचीत नहीं होती। वो सिया के बारे में भी नहीं पूछती, न ये पूछती है कि ट्यूशन के लिए कब से वापस आ सकती है।
फ़ाइनल इम्तिहान में सुश्रुता ने अच्छा किया है। जैसी उससे उम्मीद थी, उससे कहीं अच्छा। लेकिन उसका रिपोर्ट कार्ड लेने कोई नहीं आया, ख़ुद सुश्रुता भी नहीं। मैं ये सोचकर रिपोर्ट कार्ड रख लेती हूँ कि उसके घर ले जाकर दे दूँगी। लेकिन शाम को हम जमशेदपुर के लिए निकल जाते हैं, सिया के दादा-दादी के पास। मैं स्कूल खुलने के एक दिन पहले राँची लौटी हूँ।
दो दिनों में धीरज को जहाज़ पर जाना है, इसलिए सुश्रुता को फ़ोन करने का भी वक़्त नहीं मिलता। उसकी नई क्लास टीचर ताहिरा से मैं सुश्रुता के बारे में पूछती हूँ। सुश्रुता स्कूल खुलने के बाद नहीं लौटी है। धीरज के जाने के बाद आज सिया को लेकर मैं सुश्रुता के घर आई हूँ, पहली बार।
बहुत देर तक घंटी बजाने के बाद सुश्रुता की माँ हाँफते-खाँसते दरवाज़ा खोलती हैं। मुझे देखकर उनके निस्तेज और बीमार चेहरे पर परेशान-सी मुस्कान को देखकर मुझे जाने क्यों लगता है जैसे मैंने ठहरे हुए तालाब के ज़रा-से पानी में कंकड़ फेंकने की गुस्ताख़ी की है।
“सुश्रुता बाज़ार गई है, घर के सामान लाने।” ये कहकर वो किचन की ओर मुड़ने लगी हैं, हमारे लिए पानी लाने की ख़ातिर शायद। मैंने उनसे बैठ जाने का आग्रह करती हूँ और सुश्रुता का रिपोर्ट कार्ड उनकी ओर बढ़ा देती हूँ। बिना रिपोर्ट कार्ड देखे अपनी हाँफती-खाँसती आवाज़ में वे बातें करती रहती हैं, “सुश्रुता ने बताया था कि आपके पति आए हैं, इसलिए आप कुछ दिन ट्यूशन नहीं पढ़ा पाएँगी। हम रिज़ल्ट लेने नहीं आ पाए। सुश्रुता के पिता शांतनु का रिज़ल्ट लेने जाया करते थे हमेशा, लेकिन…।”
अबतक मुझे समझ में आ गया है कि इस घर में ग़ैर-मौज़ूद शांतनु यहाँ की दीवारों, शो-केस और बातचीत में हमेशा मौज़ूद रहता है। दीवारों पर उसकी कई तस्वीरें हैं। जो दो-एक तस्वीरें सुश्रुता की हैं भी वो सब शांतनु के साथ की हैं। शो-केस में सजे उसके बड़े-बड़े शील्ड कैसे सुश्रुता के वजूद को एकदम छोटा बना देते होंगे, ये अंदाज़ा लगाना बिल्कुल मुश्किल नहीं मेरे लिए। तेरह साल की सुश्रुता को क्यों दुष्यंत में, एक ‘बॉयफ़्रेंड’ में अपना साथी तलाशना पड़ा होगा, ये भी समझ आ गया है।
एक बीमार माँ, माज़ी में जीनेवाले, अपनी ही धुन में रहनेवाले पिता और एक मरे हुए भाई के हर वक़्त इस घर में होने के अहसास के साथ कैसे रहती होगी सुश्रुता? कैसा लगता होगा उसे जब वो रिपोर्ट कार्ड लाती होगी और उसके बदले बातचीत का हर छोर उसके भाई की ओर मुड़ जाया करता होगा? कैसे हर लम्हा उसे अपने छुटपन का अहसास होता होगा, तब भी जब वो बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ अपने माँ-बाप और उनके घर को संभाल रही है? गुज़रे लम्हों में रहनेवाले इस परिवार के बीच उसे अपना भविष्य कहाँ दिखता होगा?
सुश्रुता सब्ज़ी का झोला लिए अपनी ही चाभी से घर खोलकर अंदर ड्राईंग रूम में आ गई है और सिया को देखते ही उसका चेहरा खिल गया है। मैं उठकर उसके हाथ से झोला लेकर फ़र्श पर रख देती हूँ और उसके हाथ में रिपोर्ट कार्ड पकड़ा देती हूँ।
“ये प्रोग्रेस रिपोर्ट है सुश्रुता। तुम्हारे प्रोग्रेस की रिपोर्ट है ये।”
मैं और कुछ नहीं कह पाती, उसका हाथ पकड़ लेती हूँ और भरी आवाज़ में कहती हूँ, “कल शाम से ट्यूशन पढ़ने आओगी तो सिया को भी एक घंटे के लिए कुछ पढ़ा देना सुश्रुता। सिया श्रुति दीदी से पढ़ना चाहती है।”
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10-05-2020, 12:45 PM,
#22
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
लिव-इन
अवि के ब्लॉग-ड्राफ़्ट्स से
26 दिसंबर 2012
कैसी तो सुबह थी आज की- धुँध से भरी, ठंडी और तीखी हवाओं वाली। सुबह-सुबह नैना के फ़ोन ने जगाया था मुझे। इतनी झल्लाहट हुई थी कि पूछिए मत। दस मिनट में गेट पर मिलने को उसने कह दिया और मैंने सुन लिया! सुन ही नहीं लिया, नर्म रजाई और गर्म ब्लोअर छोड़कर चला भी गया उसके बुलावे पर! चला ही नहीं गया, ले भी आया उसे ऊपर। वो भी बोरिया-बिस्तर समेत!
नैना अचानक ही मेरी सोसाइटी के गेट पर आ गई अपने सामान के साथ। मेरे साथ रहने। मतलब लिव-इन रहने। कैन यू बीट दैट?
मेरे और नैना के बीच की ये सुबह एक ऐसी सुबह थी जिस सुबह मुझे ज़िंदगी में पहली बार दोधारी आरी पर अपने पैर मार आने का नतीजा महसूस हुआ है। मतलब प्यार-अफ़ेयर-रिलेशनशिप तक तो ठीक है। मगर लिव-इन?
नैना ने मेरे घर में लिव-इन रहने के लिए दिसंबर को छोड़ किसी और महीने में शिफ़्ट किया होता न तो शायद मैं इस रिश्ते को कई और महीनों तक झेल जाता। लेकिन ज़िद का… वो भी गर्लफ़्रेंड की ज़िद का… वो भी बीवी बनने के लिए तैयार गर्लफ़्रेंड की ज़िद का… वो भी बीवी बनने से पहले लिव-इन रहने के लिए तैयार गर्लफ़्रेंड की ज़िद का कोई सिर-पैर होता है जो नैना की ज़िद का हो?
समझ लो कि उल्टी गिनती शुरु हो गई है बस।
नैना की डायरी से
26 दिसंबर 2012
ख़्वाब है। ख़्वाब ही है कोई कि जी में आता है, आँखें बंद किए पड़ी रहूँ कहीं और मर जाऊँ यही ख़्वाब देखते-देखते। ‘तेरी बाँहों में मर जाएँ हम’ का जो बेतुका ख़्याल सिमरन को सरसों के खेत में राज की बाँहों में समाते हुए आया होगा न, वो यूँ ही नहीं आया होगा।
लेकिन ये ख़्वाब नहीं है, सच है।
मुझमें वाक़ई इतनी हिम्मत आ गई है कि मैंने अपने हॉस्टल का कमरा छोड़ दिया और अवि के साथ रहने आ गई? लिव-इन रहने? आई मस्ट बी स्मोकिंग समथिंग एल्स!
लेकिन लिव-इन न रहने आती तो और क्या करती? हम यूँ भी रात-दिन, दिन-रात साथ ही तो होते हैं- अपनी-अपनी दुनियाओं में होते हुए भी एक-दूसरे के साथ। तो फिर इस बेजाँ दूरी की ज़रूरत क्या थी?
अब मैं करवट लूँगी तो तुम्हारी पीठ पर हाथ रख सकूँगी अवि। मेरी उँगलियों को तुम्हारी हथेलियों से उलझने के लिए किसी मुक़र्रर वक़्त का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा अब। मुझे तुम्हारे लिए तुम्हारी पंसद की मटन करी चूल्हे पर धीमी आँच पर पकता छोड़ हॉस्टल आने की जल्दी नहीं होगी। तुम्हारे हाथ की कॉफ़ी अब सुबह-सुबह भी मिल जाया करेगी।
मुझसे कुछ और लिखा नहीं जा रहा।
तुम रहना साथ। तुम हमेशा साथ ही रहना, अवि।
अवि के ब्लॉग-ड्राफ़्ट्स से
30 दिसंबर, 2012
ऑफ़िस के काम के सिलसिले में जा रहा था लखनऊ, ट्रेन में एक लड़की मिली। एकदम ‘धर्मा प्रोडक्शनन्स’ स्टाइल में।
“कैन आई बॉरो योर पेन प्लीज़?” मेरी बग़ल में बैठी लड़की ने कहा तो जाकर उसकी तरफ़ ध्यान गया। ख़ूबसूरत लड़कियों की क़सम खाकर कह रहा हूँ, ख़ूबसूरत लड़कियों को नज़रअंदाज़ करने की फ़ितरत नहीं है मेरी। लेकिन उस दिन बग़ल की- अपनी बग़ल की सीट पर बैठी लड़की पर नज़र तब गई थी जब शताब्दी अलीगढ़ पहुँचने वाली थी! (हम ज़िंदगी के लंबे सफ़र में को-पैसेन्जर्स बननेवाले थे, शायद इसलिए।) वैसे उस दिन दो घंटे तक अपनी बग़ल की सीट पर बैठी लड़की को पूरी तरह इग्नोर करने की ग़लती का ठीकरा मैं एस.जे. वॉटसन नाम के शख़्स के माथे फोड़ना चाहता हूँ। थ्रिलर के आख़िर के नवासी पन्ने पढ़ने की जल्दी न होती तो दो घंटे इस तरह ज़ाया न होते।
“कैन आई बॉरो योर पेन प्लीज़?” पहली बार के सवाल ने मेरी किताब में खलल डाला था और दूसरी बार के सवाल ने मेरे ख़्याल में। हालाँकि जितनी देर में लड़की ने सवाल पूछे थे उतनी देर में मैंने उसकी आँखों से लेकर उसके दुपट्टे तक के रंग को अपने दिमाग़ की रैंडम एक्सेस मेमोरी में स्टोर कर लिया था। बादामी आँखें थीं। पलकों के ऊपर और नीचे गहरी भूरी लकीरें, जो बादामी आँखों के कान तक खिंचे होने का गुमाँ देती थीं। लड़की सुंदर थी। बहुत सुंदर।
“यू हैव वन पीपिंग आउट ऑफ योर पर्स।” उस सुंदर लड़की से बात बढ़ाने के इरादे से मैंने कहा।
“दिस वन डजन्ट वर्क। सिर्फ़ दिखने के लिए क्रॉस का पेन है। क्वायट यूज़लेस। कैन आई स्टिल बॉरो योर पेन?”
“इज़ दिस द न्यू पिक अप लाइन?” मैंने ऐसा कह तो दिया, लेकिन ज़ुबाँ से ग़लत बोल फूटते ही ख़ुद को सरे-ट्रेन दो थप्पड़ रसीद देने की इच्छा भी उतनी ही तेज़ी से फूटी। जाने उसने सुना नहीं या जानबूझकर अनसुना कर दिया, पेन लेकर वो अख़बार में क्रॉसवर्ड खेलने में लग गई।
उसकी हैंडराइटिंग उसकी आवाज़ की तरह ही सधी हुई थी- अख़बार के पन्ने पर बारिश की बूँदों की तरह हल्की-हल्की गिरती हुई। मैंने कनखियों से देखा था- दो नर्म उँगलियों के बीच कभी दाएँ-कभी बाएँ किसी गहरे ख़्याल में झूलता वो पेन मेरा ही था। अगर किसी की हैंडराइटिंग से उसकी शख़्सियत की पहचान होती है तो ये लड़की ज़रूरत से ज़्यादा सधी हुई थी। (और मैं बिना किसी पहचान के ही ठीक था!)
टुंडला तक पहुँचते-पहुँचते उसने पन्ने पर के सारे क्रॉसवर्ड्स, सुडोकू- सब हल कर लिए और मैं ‘बिफ़ोर आई गो टू स्लीप’ नाम का थ्रिलर उपन्यास चाट गया। टुंडला से इटावा तक आते-आते हमारी बातचीत पेन के माँगने-लौटाने से आगे बढ़कर नॉवल तक आ गई और कानपुर सेंट्रल तक पहुँचते-पहुँचते हम किताबों की दुनिया से आगे बढ़कर एक-दूसरे के काम-धाम के बारे में काफ़ी कुछ जान चुके थे। हाँ, उसका नाम ज़रूर लखनऊ पहुँचने से पचास किलोमीटर पहले मालूम चला था, लेकिन बादामी आँखों वाली इस लड़की का नाम नैना के अलावा कुछ हो भी नहीं सकता था।
लखनऊ में उतरकर उसने ‘इट वॉज़ नाइस मीटिंग यू’ कहकर हाथ बढ़ाया और मैंने अपनी हथेली और अपना पेन, दोनों उसका नंबर माँगने के लिए उसके आगे पसार दिया। उसने मेरी ही पेन से मेरी ही हथेली पर अपनी सधी हुई हैंडराइटिंग में मेरी ही ख़ातिर अपना नंबर लिख दिया और उस नंबर को कुली से टैक्सी में अपना सामान चढ़वाने तक मैं रट गया।
किसी से पहली मुलाक़ात उस पसंदीदा कविता की तरह होती है, जिसे हम बार-बार ऊँची आवाज़ में बोल-बोलकर, बहाने ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ना चाहते हैं। इस एक मुलाक़ात पर जब प्यार का, किसी रिश्ते का मुलम्मा चढ़ जाता है तो यही कविता चौथी क्लास में कंठस्थ याद करने के लिए ज़बर्दस्ती पकड़ाया गया होमवर्क हो जाती है। मेरे साथ भी यही होने लगा है, इसलिए मैं भूलने लगा हूँ कि उसके बाद मैं और नैना कब, कहाँ और कितनी दफ़ा मिले।
हालाँकि लखनऊ शताब्दी में हुई उस पहली मुलाक़ात और नैना के मेरे साथ लिव-इन रहने के लिए आ जाने के बीच गुज़रे साढ़े दस महीनों में मुझे कई बार ये ज़रूर लगा कि ये वाला प्यार फ़ाइनल है (लेकिन इतना फ़ाइनल कभी नहीं लगा कि साथ रहने की नौबत आ जाएगी, इसके बारे में सोचा जाए)।
प्यार के मामले में मैं इम्पलसिव हूँ, तो नैना मुझसे भी बढ़कर आवेगी है- अपनी सधी हुई हैडराइटिंग के ठीक उलट। उसका यही आवेग, यही मौजीपन मुझे उससे बाँधने लगा था। ज़िंदगी से लबरेज़ था उसका मौजीपन। हम लखनऊ में एक बार मिले और दिल्ली लौटकर कई बार। वैसे मेरी उम्र बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन तैंतीस और तेईस में दस साल का फ़र्क़ होता है। दस साल का ये फ़र्क़ नैना ने ख़ुद ही मिटा दिया था… अपनी तरफ़ से।
साथ रहकर अब हमारे बीच के कई फ़र्क़ दिखाई देंगे, नैना ये बात समझती क्यों नहीं?
नैना की डायरी से
1 जनवरी 2013
नए साल का पहला दिन है और अवि के घर में- हमारे घर में- मेरा छठा दिन। माँ रूममेट को हैप्पी न्यू ईयर बोलना चाहती थी। मैंने सोते हुए अवि के माथे पर हाथ फेरते हुए माँ से कह दिया कि रूममेट सो रही है।
नाराज़ है रूममेट। कहती है, मुझे इस तरह इम्पल्स में फ़ैसला नहीं लेना चाहिए। मुझे वाक़ई इम्पल्स में फ़ैसला नहीं लेना चाहिए। लेकिन अवि इम्पल्स नहीं है, सोची-समझी साज़िश है क़िस्मत की। वर्ना दस महीने में ऐसा क्या पागलपन कि सब छोड़-छाड़कर उसके ही घर में, उसकी ही मेज़ पर अपनी डायरी में उसके ही बारे में लिखती रहती हूँ हमेशा?
प्यार क्या होता है, नहीं जानती। लेकिन अगर प्यार यही हश्र करता है जो मेरा हुआ है तो बड़ी कमीनी चीज़ है ये प्यार। मेरे अंदर के कमीनेपन को भी बाहर ले आया है। आख़िर माँ के लिए झूठी-फ़रेबी तो बन ही गई मैं।
अवि के ब्लॉग-ड्राफ़्ट्स से
2 जनवरी, 2013
एक हफ़्ता भी नहीं हुआ नैना के साथ रहते-रहते और जी में आता है कि दिल्ली छोड़कर किसी बर्फ़ीले पहाड़ पर घर बना लूँ- अपना घर, अकेले का। या फिर नैना का हाथ थामकर चाँद के पास वाली किसी चोटी पर खींचकर ले जाऊँ उसको और कहूँ- कूदकर जान देने का यही लम्हा सही है जानाँ। मेरे लिए यहाँ से कूद सकोगी? वर्ना अगर दोनों बचे रह गए तो अपनी-अपनी ज़िंदगियों की जद्दोज़ेहद में एक-दूसरे को तबाह ही करेंगे बस।
मैं नैना को कैसे समझाऊँ कि इतना क़रीब रहते हुए निस्वार्थ प्यार नहीं किया जा सकता, ख़ुदग़र्ज़ समझौते किए जाते हैं। हम दूर होते हैं तो प्यास होती है और प्यास होती है तो एक-दूसरे के नमक को चखने का लालच बना रहता है। हम पास होते हैं तो नमक कम, एक-दूसरे के भीतर का ज़हर ज़्यादा चखते हैं, उसे कुरेद कर बाहर निकालते रहते हैं। मुझपर नैना को खो देने का डर इस क़दर तारी रहता है कि मैं उसको हमेशा के लिए खो देना चाहता हूँ। उससे दूर चला जाना चाहता हूँ।
और एक नैना है कि चली आई है मेरे जैसे आदमी के साथ रहने। अपने-अपने दफ़्तरों से लौटकर एक साथ शाम की कॉफ़ी पीने की आदत इस मोड़ तक आ पहुँचेगी, ये तो मैंने सोचा भी नहीं था।
जिस रात पहली बार नैना कॉफ़ी के बाद के डिनर और डिनर के बाद की लंबी वॉक के बाद अपने घर नहीं, मेरे घर मेरे साथ लौटकर आई थी, उस रात पहली बार उसके भीतर के पागलपन का सोता मुझे फूटता नज़र आया था।
अपनी रसोई में अपनी सिंक में अपनी प्लेट धोते हुए पूछा था मैंने उससे, “रूममेट को क्या कहोगी कि रात कहाँ रुकी?”
“उससे कुछ कहने की क्या ज़रूरत है?”
“घर में क्या कहोगी?”
“घर में भी कहने की क्या ज़रूरत है?”
“एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ेंगे।”
“मैं सिर्फ़ एक सच जीना चाहती हूँ। उसके लिए सौ झूठ भी कम हैं।”
अपनी आवेगी फ़ितरत से लाचार नैना बहता हुआ नल और आधी धुली प्लेट से बेपरवाह मेरे वजूद पर बेरहम कालबैसाखी की तेज़ी से बरस गई थी और उसके आवेग में डूबता-उतराता मैं अपनी ही आँखों अपनी ही शुरुआती तबाही का मंज़र देखता रहा था।
अवि के ब्लॉग-ड्राफ़्ट्स से
12 जनवरी, 2013
असल में मुसीबत तो तब से शुरू हुई है जब से मैडम ट्रैक्स और सफ़ेद जॉगिंग शूज़ पहने मुझे हर सुबह रजाई से खींच-खींचकर बाहर निकालने पर आमादा होने लगी हैं। दिल्ली की जनवरी की सर्दी में कोई मॉर्निंग वॉक के लिए जाता है भला! लेकिन मैडम को जाना होता है। वो भी मेरे साथ जाना होता है। मैडम को मेरी तोंद, मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी, मेरे सफ़ेद होते बाल, मेरे गंदे नाख़ून, मेरा गीला तैलिया, मेरी बदबूदार जुराबें- सब दिखने लगे हैं आजकल।
नैना की क़सम, आज कल दिन-रात दिमाग़ में ‘ब्रेकककककअपपपपप’ चिल्लाता रहता हूँ मैं। ज़िंदगी को बर्बाद कर देना हो तो प्यार से बेरहम कोई वजह नहीं होती।
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10-05-2020, 12:45 PM,
#23
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
अब आज भी मैंने पार्क के पंद्रह चक्कर तो लगा लिए, लेकिन गली के मोड़ पर चायवाले के सामने रुककर चाय पीने के नाम पर विद्रोह कर दिया।
“मैं चाय नहीं पीता। ख़ाली पेट तो बिल्कुल नहीं। पैन में इन काली पत्तियों के साथ खौलती चाय को देखकर मुझे उबकाई आती है।” जितनी सहजता से मैं ये बात कह सकता था, मैंने कह दी।
“दिस इज़ एक्ज़ैक्टली वाई… बिल्कुल इसी वजह से अवि… हमारा साथ रहना बहुत ज़रूरी था। हम अभी भी एक-दूसरे को कितना कम जानते हैं।” चाय का ग्लास उसने मेरी तरफ़ बढ़ा दिया और मैंने थाम लिया – नैना के भाषण के डर से कम, बर्फ़ हो गए अपने हाथों को थोड़ी-सी नर्मी देने के इरादे से ज़्यादा।
कम जानते हैं, इसलिए साथ हैं। ज़्यादा जान जाएँगे तो अलग हो जाएँगे, कहना तो ये चाहता था मैं, लेकिन कहने की हिम्मत थी नहीं, इसलिए बात कहीं हलक़ में ही अटकी रह गई थी (और इसलिए यहाँ ब्लॉग पर लिखना पड़ रहा है। और इसलिए ये पोस्ट भी ड्राफ़्ट में ही रह जाएगी)।
मुझे अचानक मिस एलिस याद आ रही हैं आज, हाई स्कूल में मेरी इंग्लिश टीचर, जिन्होंने केकी एन दारुवाला की एक कविता पढ़ाते हुए कहा था क्लास में, ‘एवरी रिलेशनशिप कम्स विथ एन एक्सपायरी डेट’। हर रिश्ता अपनी मियाद लिखवाकर आता है। कमाल की बात है कि उस दिन मिस एलिस एक प्रेम गीत (लव पोएम) पढ़ा रही थीं क्लास में।
“Her star-erasing beauty’s spell,
turns me feverish, frail, unwell.
Her presence is both bliss and hell -
I tremble so.”
ये कविता मुझे इसलिए मुँहज़ुबानी याद है क्योंकि जितने दिन में मिस एलिस ने ये पोएट्री पढ़ाई उससे भी कम दिनों में मैंने लाइब्रेरी से चुराई हुई केकी एन दारुवाला की और कविताओं के पुर्जे भेज-भेजकर अपनी क्लास की सबसे इन-डिमांड गर्ल अदिति बैनर्जी को अगले दो साल के लिए पटा लिया था।
ये कविता इसलिए भी मुँहज़ुबानी याद है क्योंकि ‘हर स्टार-इरेज़िंग ब्यूटिज़ स्पेल / टर्न्स मी फ़ीवरिश, फ्रेल, अनवेल’ वो पंक्तियाँ हैं जिसका इस्तेमाल मैंने अपनी हर रिलेशनशिप, हर अफ़ेयर में, हर लड़की के लिए किया। प्यार चाहे कितनी ही बार क्यों न कर लो, हर बार एक अच्छे-भले इंसान को कमज़ोर, बीमार बना देने का माद्दा रखता है। हम फिर भी अगली बार सबक नहीं लेते। मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट ही समझ लीजिए। और कमाल की बात है कि कोई-न-कोई पोएट हमारी शख़्सियत की हर कमज़ोरी को ठीक-ठीक बयाँ करने के लिए पता नहीं कहाँ से लफ़्ज़ भी ढूँढ़ लाता है! मैं अपने अगले जन्म में शायर होना चाहता हूँ- बैचलर शायर, जिसको किसी के साथ कभी लिव-इन की किसी मजबूरी में न बँधना पड़े।
वैसे मिस एलिस की बात कच्ची उम्र में ही समझ आ गई थी। रिश्ते मतलब के होते हैं। मेरा वक़्त नहीं कटता, इसलिए अपनी ख़लिश भरने के लिए मैंने तुम्हें फ़ोन लगा लिया। मेरे पास करने को कुछ नहीं है, इसलिए मैंने तुम्हें ईमेल भेज दिया, तुमसे चैट कर लिया। मैं बेवजह ज़िंदगी से परेशान था, इसलिए मैंने तुमसे तुम्हारी एक शाम उधार माँग ली।
हर रिश्ता मतलब का, हर रिश्ते का कोई मानी।
तो क्या नैना वो म्यूज़ है जिसकी ख़ातिर दिल के बाँटे हुए छोटे-छोटे टुकड़ों को इधर-उधर से बीनकर उसके आगे रखने का जी करे? सोचना पड़ेगा। वैसे मेरे अंदर का कम्पलसिव बैचलर विद्रोह पर उतारू है।
नैना और अवि व्हॉटसैप मैसेज पर
25 जनवरी 2013
नैना- कब तक लौटोगे? मैं ऑफ़िस से निकल रही हूँ दस मिनट में।
अवि- देर होगी। बहुत देर। इंतज़ार मत करना। मेरे पास स्पेयर की है।
नैना- लेकिन मेरे पास स्पेयर बॉयफ़्रेंड नहीं है!
अवि- हा हा हा। दिस वॉज़ नॉट फनी नैना…
नैना- ओके सॉरी। आई लव यू अवि।
नैना- अवि
नैना- अवि…
नैना- अवि, तुमने जवाब नहीं दिया तो मैं फ़ोन करूँगी अब।
अवि- नैना प्लीज़। मैं कुछ काम ख़त्म करने की कोशिश कर रहा हूँ। घर पहुँच गई हो?
नैना- हाँ। खाना?
अवि- नॉट फॉर मी। गुड नाइट।
नैना- फिर एक साथ रहने का क्या मतलब है अवि? तुम पिछले एक हफ़्ते से रोज़ आधी रात के बाद आ रहे हो।
अवि- ईयर क्लोज़िंग है। डेडलाइन। मैं कल सुबह बात करता हूँ।
नैना- मुझे बात नहीं करनी।
अवि- थैंक गॉड, तुम्हें बात नहीं करनी!
नैना की डायरी से
25 जनवरी 2013
कल सुबह आठ बजे मुझे अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट ई-मेल करनी है और दिमाग़ है कि किसी कोरे काग़ज़ से बढ़कर हो गया है। अपनी पहली नौकरी से ही मुझे इतनी नफ़रत हो जाएगी, ये मैंने कहाँ सोचा था! पागल कुत्ते ने काट खाया था कि बैंक की नौकरी कर ली। आधे वक़्त तो बैंक के किसी और बैंक से मर्जर की अफ़वाहें राउंड ले रही होती हैं और बाक़ी के आधे वक़्त ई-मेल पर गोल-सेटिंग हो रही होती है। जी में आता है ये नौकरी मुझे अपनी कंपनी से बाहर कर दे, उससे पहले ही मैं इस नौकरी को लात मार दूँ।
लेकिन न नौकरी छूटती है न प्यार छूटता है। अजीब मुसीबत है। नैना सिंह, किसने कहा था 23 की नादान उम्र में ऐसे दो-दो जानलेवा रोग पाल लेने को?
मैंने भी क़रीब-क़रीब फ़ैसला कर ही लिया है। जब देखो तब माँ फोन पर शादी—शादी करती रहती है। कह दूँगी कि हिम्मत करके कि लिव-इन रहकर देख रही हूँ और लिव-इन का हासिल ये है कि शादी को लेकर मेरे दिमाग़ में क्लैरिटी आ रही है।
वैसे रूममेट के साथ हॉस्टल में रहना ही ठीक था। कम-से-कम उससे वक़्त पर लौट आने की अपेक्षा तो नहीं थी। मेरे भीतर ये जो भी गुबार था, सोता हुआ ही ठीक था। अवि ने पता नहीं क्या किया है? मैं मैं नहीं रह गई। और रह गई बात नौकरी की, तो अगर किराया चुकाने के लिए ही नौकरी करनी होती है तो मैं किसी मौनैस्ट्री में रहने के लिए चली जाऊँगी एक दिन कसम से।
वाह वाह नैना सिंह! शादी करनी नहीं। नौकरी करनी नहीं। ज़िंदगी में कोई मक़सद दिखता नहीं। मेरी ही जैसी हालत रही होगी सिस्टर फिलॉमिना की कि एक दिन ननहुड ले लिया होगा उन्होंने। ज़िंदगी भर का एब्स्टिनेन्स- ज़िंदगी भर का परहेज़… संयम… त्याग। ज़िंदगी भर का पलायनवाद। वैसे भाग जाने के लिए कितनी हिम्मत चाहिए? किसी के साथ लिव-इन रहने से भी ज़्यादा?
इस घर की आदत नहीं लग पाई है वैसे। दो कमरे के इस घर में अब भी अँधेरे में दीवारों, दराज़ों, मेज़-कुर्सियों से टकराती रहती हूँ। बदन से नील नहीं उतरता। हर जगह चोट के निशाँ और हर चोट का मरहम एक- अवि की फेदर टच छुअन।
दो बजनेवाले हैं, और अवि अभी भी नहीं लौटा।
नैना और अवि व्हॉटसैप मैसेज पर
12 फरवरी 2013
नैना- अवि, मैं चाभी घर पर भूल गई। ऑफ़िस जाते हुए अपनी वाली प्लीज़ लेटर बॉक्स में छोड़ देना।
अवि- कहो तो ऑफ़िस न जाऊँ। लंच में मटन करी खाओगी?
नैना- फिलहाल बॉस सिर खा रहा है। वी विल हैव टू स्किप इट टुडे।
अवि- शो योर मिडल फिंगर टू दैट ईडियट एंड कम होम।
नैना- प्लीज़ अवि। तुम्हारी डेडलाइन ख़त्म हो गई तो कुछ भी बोलोगे?
अवि- अच्छा सॉरी। शाम तो तो जल्दी आओगी?
नैना- इट इज़ योर टर्न टू वेट नाउ। मैंने पूरे हफ़्ते रात-रात भर इंतज़ार किया है अवि।
अवि- तुम इतनी भी विन्डिक्टिव हो? अब मुझसे बदला लोगी?
नैना- साथ नहीं रहते तो मेरे बारे में ये बात कैसे पता चलती अवि?
अवि- तुमको हर लम्हा जानना किसी ट्रेज़र हंट से कम नहीं है। यू आर अ मिस्टिरियस वूमैन नैना।
अवि- नैना…
अवि- नैना…
अवि- नैना, प्लीज़ मैसेज का जवाब दो वर्ना मैं तुम्हारे ऑफ़िस आ जाऊँगा।
अवि के ब्लॉग-ड्राफ़्ट्स से
14 फरवरी, 2013
नैना के साथ रहते-रहते मैं अपने बारे में कम-से-कम ये तो समझ ही चुका हूँ कि मैं ज़िंदगी से ऊबा हुआ और भावनात्मक रूप से नितांत अकेला आदमी हूँ। तैंतीस की उम्र तक आते-आते कम-से-कम पंद्रह-सत्रह नज़दीकियाँ जी चुकने के बाद ख़ुशी और सुकून की तलाश बंद कर चुका हूँ। दस साल पहले घर से भागकर नए शहर में आकर बस जाने पर उठाए जानेवाले सवाल ख़त्म हो चले हैं, शादी करके बस जाने का सबब बाक़ी नहीं रहा।
मेरी दुनिया में ज़बर्दस्ती घुस आने की कोशिशें बहुत की हैं लोगों ने। लोगों से मेरा मतलब लड़कियों से है। लेकिन नैना की तरह आज तक इस अधिकार के साथ कोई मेरे वजूद पर हावी नहीं हुआ। इसको उम्र का तकाज़ा कहा जा सकता है। अगर औरतों का कोई बायलॉजिकल क्लॉक होता है तो पुरुषों का भी होता ही होगा शायद। (पुरुष? मैं लड़के से पुरुष कब बन गया अपनी ही नज़र में?)
रोज़-रोज़ भागते हुए जब हाँफने लगता हूँ तो एक नैना ही मेरी हताशा, अवसाद, पागलपन और विध्वंस को झेलने का माद्दा रखती है। मेरे साथ रहते-रहते वो दस साल बड़ी हो गई है। उसके साथ रहते-रहते मैं दस साल का बच्चा हो गया हूँ। अपने भीतर प्यार की जिस डाल को मेरे भीतर के बेरहम लकड़हारे ने काट डालने का फ़ैसला किया था, उसपर ये ताज़ा कोंपलें फूटने लगी हैं और कब से? मियाद तो ख़त्म होनी थी न?
“हर प्रेज़ेंस इज़ बोथ ब्लिस एंड हेल -आई ट्रेंबल सो…”
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10-05-2020, 12:45 PM,
#24
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
मेरी याद में जो है, वो प्यार के कुछ तवील फ़साने हैं। थ्री-एक्ट प्ले की तरह ये फ़साने बिगिनिंग, मिडल और एंड के पैटर्न पर तो हैं, लेकिन इन फ़सानों में कोई रेज़ोल्यूशन नहीं है। मुझे जो जिस हाल में जैसे मिलता गया, मैं उनसे प्यार करता गया। मेरे पास कोई परिभाषा नहीं थी, कोई माइलस्टोन नहीं था, न प्यार का ऐसा कोई आदर्श था जिसके पदचिह्नों पर चला जा सके। जब हम ताउम्र अपने आस-पास लोगों को साथ रहते हुए भी दूर रहते देखते हैं तो प्यार का मुकम्मल स्वरूप समझ में नहीं आता। ये अधूरे फ़साने और कुछ हों-न-हों, मेरे लिए ज़रूरी बहुत थे। अफ़सोस से उबरना उन्हीं फ़सानों की बदौलत सीखा है। और एक नैना है कि मुझे मेरी ऊब और सनक के साथ रहते हुए भी मुझे जीने की वजहें देती रहती है।
दुनिया भर में आज वैलेंटाइन डे मनाया जा रहा है। प्यार के बाज़ारवाद, प्यार की मार्केटिंग का दिन। मैं भी वही करने जा रहा हूँ। नैना के लिए डिनर अरेंज करना चाहत कम, ज़रूरत ज़्यादा है। ख़ुदगर्ज़ समझौते, ताकि हर हाल में, जितना हो सके, कलह से बचा जा सके। लिव-इन रहने के ख़तरों में से एक बड़ा ख़तरा- ख़ुदग़र्ज़ समझौते। इन ख़ुदग़र्ज़ समझौतों के आईने में अपना जो अक्स दिखाई देता है, उससे डर लगता है।
मैं इतना क्यों बदलने लगा हूँ?
“हर प्रेज़ेंस इज़ बोथ ब्लिस एंड हेल –आई ट्रेंबल सो…”
नैना और अवि व्हॉटसैप मैसेज पर
28 फरवरी 2013
नैना- हाय अवि। मैं आज रात रूमी के साथ रुक रही हूँ, अपने हॉस्टल के कमरे में।
अवि- क्यों?
नैना- आई नीड सम ‘मी टाइम’। मुझे न ऐसे पजामा पार्टी करने की, अपनी उम्र की लड़कियों के बीच होने की तलब हो रही है।
अवि- कहना क्या चाहती हो? मैं तुम्हारी उम्र का नहीं हूँ, इसलिए?
नैना- आई डिडन्ट मीन दैट अवि। जस्ट दैट दोस्तों की याद आ रही है।
अवि- और जो मुझे तुम्हारी याद आएगी, उसका क्या होगा?
नैना- अवि, एक रात की तो बात है।
अवि- एक रात में सुनामी आ गई थी। एक रात की बारिश ने मुंबई को डुबो दिया था। ज़िंदगी बदल जाए, इसके लिए एक रात तो क्या, एक लम्हा बहुत होता है।
नैना- सिर पीटने वाले इमॉटिकॉन नहीं बनाया होता एन्ड्रॉयड पर? अवि, यू आर टेकिंग इट टू फार नाऊ।
अवि- ओके गो। बट आई विल मिस यू।
नैना- नहीं मैं नहीं जा रही कहीं। मेरे लिए खाना रख देना प्लीज़।
अवि- किस वाला इमॉटिकॉन कहाँ है?
नैना- यू हैव लॉस्ट इट अवि। बाय। सी यू।
अवि- जल्दी आना।
नैना की डायरी से
5 मार्च 2013
अवि कहता है कि मुझे बेचैन रहने की बीमारी है। अवि ये बात नहीं भी कहता, तो भी मुझे ये बात मालूम थी। भटकने की फ़ितरत लेकर पैदा हुए लोग अपना जेनेटिक स्ट्रक्चर कैसे बदल डालेंगे भला! अवि कहाँ बदला कि मैं बदल पाती!
अभी तक मेरा यही आवेग, मेरी यही बेचैनी अवि को मुझसे जोड़े रखती थी। अब इन्हीं बेचैनियों में वो शिकायतें ढूँढ़ता रहता है। जब लिव-इन ये है तो शादी क्या है? बच्चे पैदा करने की मजबूरी? मैं अवि की भाषा बोलने लगी हूँ, और अवि मेरी। लिव-इन के ख़तरों में से एक बड़ा ख़तरा।
वैसे अपनी ही डायरी में मेरे इस एकालाप का कोई हासिल नहीं है। मैं क्या सोचती रहती हूँ, उस पर मेरा भी बस नहीं चलता आजकल। तीन क़रीबी दोस्त पिछले दो महीने से नौकरी की तलाश कर रहे हैं। मैं नोटिस पीरियड में हूँ। बैकिंग का करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म होता-सा दिखता है। अवि के साथ कहाँ तक जाऊँगी, ये भी नहीं मालूम। फिर चैन आए तो कैसे? कभी लगता है, योगा इंस्ट्रक्टर बन जाऊँ। कभी लगता है, लखनऊ वापस चली जाऊँ और वहीं किसी छोटे-से स्कूल में टीचर बन जाऊँ। कभी लगता है माँ की बात मान लूँ और शादी कर लूँ- अवि से नहीं, बल्कि किसी नॉर्मल से इंसान से जो मुझे नॉर्मल बच्चे दे सके। जिसके लिए खाना बनाते हुए और जिसके बच्चों की नाक पोंछते हुए मेरी उम्र का आधा हिस्सा निकल जाए। वो कैसी औरतें होंगी जो चैन से जीती होंगी?
घर जा रही हूँ आज। इससे पहले हज़ार काम हैं निपटाने को- घर के, बाहर के। पैकिंग करनी है, बैंक का काम करना है। दोस्तों से किए गए झूठे वायदे निभाने है। मॉर्निंग वॉक छूट नहीं सकती और बैंक में आपके बदले कौन कर आए काम? तमाम कोशिशों के बावजूद मैं डिसऑर्गनाइज्ड ही बनी रहती हूँ, स्क्रीन पर चमकते पावर नोट्स काम नहीं आते और एमबीए के दिनों में टाइम मैनेजमेंट पर पढ़ी गई एक हज़ार किताबें यहाँ मुँह चिढ़ाती हैं। टाइम मैनेजमेंट तो फिर भी मुमकिन होगा, लेकिन माइंड मैनेजमेंट? या फिर हार्ट मैनेजमेंट?
खिड़की पर जिस जगह बैठकर डायरी लिख रही हूँ वहाँ से दूर पार्किंग लॉट में खड़ी किसी की गाड़ी की विंडस्क्रीन पर नीम के सूखे हुए पत्ते गिरे जा रहे हैं बेसाख़्ता। धूप आँख-मिचौली खेल रही है और फागुन अपने शबाब पर है। सामने दूर क्षितिज पर कुछ दिखता नहीं, एक अंतहीन सड़क दिखती है बस। मैं घर लौटने के सफ़र पर जाने से पहले थककर बैठी हूँ थोड़ी देर और अवि के म्युज़िक सिस्टम पर आबिदा परवीन जाने क्या गा रही हैं।
ये क़रार के मुख़्तसर लम्हों को याद करना दरअसल तूफ़ान के आने से पहले की शांति है। वैसे, हमारे और तुम्हारे बीच बेक़रार बने रहने का ही क़रार था शायद अवि। मैं तुमसे लखनऊ की उस शताब्दी में मिली ही क्यों?
नैना और अवि व्हॉटसैप मैसेज पर
4 अप्रैल 2013
अवि- नैना, कब लौटोगी? तुम्हें गए एक महीने से ज़्यादा हो गए।
नैना- मेरे पास नौकरी नहीं है अवि। मैं लौटूँ भी तो किस वजह से?
अवि- मैं तो हूँ। आओ तो। हम साथ मिलकर तुम्हारे लिए दूसरा ब्रेक ढूँढ़ेगे। पहले से बेहतर।
नैना- पहला कभी बेहतर नहीं होता। पहला प्यार भी नहीं।
अवि- तुम क्या कहना चाहती हो नैना?
नैना- ये तो तुम बताओ अवि। प्यार के मामले में मुझसे कहीं ज़्यादा तजुर्बेकार हो। क्या ये ब्रेक-अप के लक्षण हैं?
अवि- नहीं, तुम्हारे दिमाग़ के ख़राब हो जाने के लक्षण हैं। कम बैक। तुम्हारी मानसिक सेहत के लिए ये बहुत ज़रूरी है कि कोई तुम्हें ज़ोर से थामे और बहुत देर तक तुम्हें चूमता रहे।
नैना- कोई?
अवि- ज़ाहिर है… मैं।
नैना- अवि, एक बात पूछूँ? बताओगे?
अवि- पूछो न नैना।
नैना- हाउ इज़ किस ‘ए’ डिफ़रेंट फ्रॉम किस ‘बी’ टू किस ‘सी’?
अवि- ये कैसा ऊलजुलूल सवाल है नैना? यू रियली नीड टू कम बैक। टू मी।
अवि- नैना…
अवि- नैना, तुम जवाब क्यों नहीं दे रही? फ़ोन तो उठा लो।
अवि- नैना, अगर तुमने जवाब नहीं दिया तो मैं लखनऊ आ जाऊँगा। नहीं रहना है लिव-इन यार। मुझे शादी करनी है तुमसे।
नैना की डायरी से
15 मई 2013
मुझे पता नहीं क्या हो गया है। जिस अवि के लिए सौ झूठ बोले, उस अवि से झूठ बोलने लगी हूँ। ये नहीं है मेरे लिए। ये बिल्कुल नहीं था मेरे लिए। जब लिव-इन नहीं था तो शादी क्या होगी?
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10-05-2020, 12:45 PM,
#25
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
कैसे कहूँ कि जब से लखनऊ से लौटी हूँ, उमस-सी इन रातों और पिघलती आइसक्रीम से दिनों के इस बदलते मौसम में मुझे अवि की उँगलियाँ ठंडी नहीं, सर्द लगती हैं। रिलेशनशिप की मियाद इतनी जल्दी ख़त्म हो जाती है? माँ सही कहती है। इन्स्टेंट मैसेजिंग वाली ये पीढ़ी इंतज़ार नहीं जानती। इन्स्टेंट मैसेजिंग वाली ये पीढ़ी प्यार भी नहीं जानती।
इस घर की इन दीवारों से अब भी टकराती हूँ मैं लेकिन जानबूझकर। दम घुटने लगा है मेरा। मुमकिन है कि ये मेरी अपनी नाकामियों की वजह से हो। ये भी मुमकिन है कि मेरा जी ऊब गया हो। ये भी मुमकिन है कि बँध जाने से डर लगने लगा हो। ये भी मुमकिन है कि मैं बदलने लगी हूँ। और ये भी मुमकिन है कि मेरा दिमाग़ पूरी तरह फिर चुका हो…
सही कहता था अवि, लव इज़ रियली द बिगेस्ट एसहोल!
अवि के ब्लॉग-ड्राफ़्ट्स से
30 मई, 2013
मैं लकड़ी का एक पुल पार कर स्कूल जाया करता था। आयजॉल के उस सेंट्रल स्कूल में हिंदी बोलने वाले कम ही बच्चे थे। पता नहीं ऐसे कितने सेंट्रल स्कूलों में पढ़ता रहा हूँ! पता नहीं कितनों से दोस्ती हुई और कितने बिछड़ गए! एक सरकारी मुलाज़िम के बच्चे कभी किसी शहर के नहीं होते, किसी दोस्त, किसी स्कूल के भी नहीं होते। और अगर वो सरकारी मुलाज़िम अपने परिवार का भी न हुआ हो, तो उसके बच्चे का ख़ुदा ही मालिक है।
मैं बहुत सारे अजनबियों के साथ रहा हूँ। सबने यही यक़ीन दिलाया कि कि जिससे भी ख़ूब प्यार करोगे, वह आपका हो जायेगा। मैंने दूसरों को प्यार करना ख़ूब सीखा। दूसरों के रास्ते ख़ुद को प्यार करना ख़ूब सीखा। नारिसिस्ट हूँ। दूसरों में अपना अक्स देखकर प्यार करता रहा हूँ उसी को। दूसरों को अपना भी बनाया है ख़ूब, दूसरों के उस हिस्से को जो मेरी फ़ितरत के माफ़िक़ होते थे। जिस दिन दूसरों में अपना अक्स फीका पड़ने लगा, उस दिन मैंने प्यार करना बंद कर दिया। इसलिए मैं किसी का नहीं बन सका कभी। बचपन के सीखे हुए में कहीं कोई कमी रह गई होगी, शायद इसलिए।
मैं नैना का भी नहीं हो पाया। चाहकर भी। मुझे वो बहुत सारे चेहरे याद आ रहे हैं जो मेरे हो गए। वजह-ए-ताल्लुक और तर्क-ए-जुदाई के सबब भी याद आ रहे हैं। हम जिस तेज़ी से दूसरों से जुड़ने के बहाने ढूँढ़ते हैं, उस तेज़ी से अलग हो जाने के कारण भी खोज लेते हैं। इस बार बहाने और कारण, दोनों नैना के खोजे हुए हैं। नैना मेरी कई सारी ग़लतियों का प्रायश्चित है।
नैना ने कहा था कि उसके चले जाने से क्या फ़र्क़ पड़ता है? रहने के लिए वो अपनी मर्ज़ी से आई थी। जा भी वो अपनी मर्ज़ी से रही है। नैना को वाकई इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उसका होना मुझे हज़ार आफ़तों से बचा लिया करता था। उसके साथ जितनी सुबहों ने आँखें खोलीं, शिकायतों से खाली रहीं।
मैं घर से निकला तो आवारगी और बेपरवाही में बिताए लम्हों से बुनी हुई चादर के नीचे पनाह ढूँढ़ ली। इतने सालों में उस चादर के नीचे मेरे साथ मेरी बेचैनियाँ बाँटते जिस्मों के बारे में मैंने कभी सोचा ही नहीं। नैना ने मुझे सोचना सिखाया था। मैं उसको जो सिखाने की कोशिश कर रहा था, शायद वो उसे पसंद नहीं आया। हमें वाक़ई लखनऊ की शताब्दी में नहीं मिलना चाहिए था। मुझे नैना को उसी दिन वापस उसके हॉस्टल छोड़ देना चाहिए था जिस दिन वो मेरे साथ रहने आई थी। हम दूर रहते तो शायद कुछ और महीनों के लिए क़रीबी बनाए रखते। अगर शादी दुनिया का सबसे वाहियात इंस्टीट्यूशन है तो लिव-इन रिश्तों के बर्बाद हो जाने की सबसे बड़ी वजह।
मैं आज मिस एलिस और केकी दारुवाला, दोनों को जान से मार देना चाहता हूँ।
मुक्ति
वो फिर ग्रीन टी बनाकर ले आए थे।
प्रमिला के लिए चाय का मग बिस्तर की बग़लवाली मेज़ पर रखकर वे खिड़कियों की ओर मुड़ गए, पर्दे हटाने के लिए। ये पर्दे प्रमिला की पसंद के थे। हरे-नीले रंगों की छींट सफ़ेद-जैसे दिखने वाले रंग पर।
पिछली दीवाली पर आख़िरी बार धुले थे ये पर्दे। पर्दों के हटते ही नवंबर की धूप का एक कोना फ़र्श पर छितरा गया। खिड़कियों पर लगे ग्रिल की चौकोर आकृतियाँ ज़मीन पर बड़ी सुलझी हुई लग रही थीं। परछाईं का एक-एक हिस्सा जैसे बड़ी सावधानी से धीरे-धीरे उकेरा गया हो। उन्होंने अपनी कुर्सी बिस्तर के क़रीब खींच ली।
प्रमिला की आँखें बंद थीं। धीमी-धीमी चलती साँसों से लगता था जैसे गहरी नींद में हो। अचानक आँखें खोलकर वे पंखे की ओर देख रही थीं। आँखों के नीचे गहरे धब्बे ज़रूर थे लेकिन पुतलियों की चमक बिल्कुल वैसी ही थी जैसी उन्होंने बयालीस साल पहले देखी थी, शादी के बाद पहली बार। प्रमिला के साधारण से चेहरे की वो असाधारण आँखें! वो और नहीं सोचना चाहते थे, भावुक होने के लिए वक़्त ही कहाँ था! अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाकर उन्होंने प्रमिला की बाँह को छू लिया।
“चाय पियोगी न?”
“हाँ, लेकिन ये चाय नहीं। अम्मा के हाथ वाली चाय। वो मिलेगी क्या?”
“डॉक्टर ने यही चाय पीने के लिए कहा है प्रमिला। तुम्हारी तबीयत जल्दी ठीक हो जाएगी इससे।”
तबीयत का ज़िक्र आते ही प्रमिला उठकर बैठ गई। अब उन आँखों से उतरता हुआ ग़ुस्सा पूरे चेहरे पर फैल गया। उसकी भौंहों के तनाव की लंबाई देखकर वो समझ जाते हैं कि ग़ुस्से की तीव्रता कितनी है। अभी भौंहें इतनी ही तनी थीं कि आँखों का सिकुड़ना पता नहीं चल रहा था।
“तबीयत ठीक है। रामखेलावन की जोरू दूध और चीनी चुरा ले गई है। अब साड़ी चुराएगी।”
“ऐसी बात नहीं है प्रमिला। वाक़ई तुम्हें डॉक्टर ने यही चाय पीने की सलाह दी है। इसे ग्रीन टी कहते हैं।”
“तबीयत ठीक है। दूध चीनी चुराई है, अब साड़ी चुराएगी।” बुदबुदाते हुए प्रमिला फिर तकिये पर लुढ़क गईं। चाय का मग वहीं पड़ा रहा। अनछुआ। गहरे नीले रंग का ये मग प्रमिला ही लाई थीं सरोजिनी नगर से। दो साल पहले तक ये कुर्सी, सुबह का अख़बार, चाय का यही मग और प्रमिला का साथ उनकी सुबह के अभिन्न हिस्से थे।
अब ये हिस्से टुकड़ों-टुकड़ों में पूरे घर में ऐसे बिखरे पड़े थे कि उन्हें सहेजना नामुमकिन लगता था।
वो थोड़ी देर प्रमिला को ऐसे ही देखते रहे, बिना कुछ कहे। फिर उठकर धीरे-धीरे ड्राइंगरूम में आ गए। पूरी ज़िंदगी जिन घरेलू उलझनों से प्रमिला ने उन्हें बचाए रखा था, वही परेशानियाँ अब उम्र के इस मोड़ पर उनकी दिनचर्या का हिस्सा थीं। घर ठीक करना था। मशीन में गंदे कपड़े डालने थे। खाना बनवाना था। कामवाली के आने-जाने का, दूध, धोबी, अख़बार और राशन की दुकान का हिसाब रखना था। इन सबके बीच प्रमिला को वक़्त पर दवा देना था। उससे नहाने-धोने, खिलाने-पिलाने के लिए मनुहार करना था।
तभी फ़ोन अपनी पूरी ताक़त से घनघनाया था।
“कैसे हैं पापा?”
सुकृति की आवाज़ सुनते ही उन्हें लगा जैसे आँखों के आगे धुँआ बनकर रुके हुए आँसू पिघलकर अब चेहरे पर लुढ़क ही आएँगे। लेकिन उन्होंने ख़ुद को संभाला। वैसे ही जैसे इतने महीनों से कतरा-कतरा ख़ुद को संभालते आए थे।
“ठीक हूँ। तुमलोग कैसे हो? मेहा का बुख़ार उतरा?”
“मेहा ठीक है पापा। कॉलेज गई है। मैं भी चार दिनों बाद ऑफ़िस आई हूँ आज। माँ कैसी हैं?”
“तीन दिन पहले जैसी थीं वैसी ही बेटा। क्या बदलेगा अब?”
“नहीं पापा। मैंने इंटरनेट पर एक नया रिसर्च पेपर पढ़ा कल रात में। आपको भी लिंक मेल किया है। कुछ हर्बल रेमेडिज़ आई हैं बाज़ार में जिससे अल्ज़ाइमर्स ठीक हो सकता है। मैं यहाँ पता करती हूँ। आप भी डॉक्टर से पूछिए न।”
“पूछ लूँगा।” नहीं चाहते हुए भी उनकी हताशा उनकी आवाज़ में उतर ही आई थी।
बेटी से कैसे कहते कि ऐसे कई रिसर्च पेपर पढ़-पढ़कर अब उनकी हिम्मत जवाब दे चुकी थी। कैसे कहते कि डॉक्टर ने उनसे कहा था कि अवसाद के लिए अब उन्हें भी इलाज की ज़रूरत है। कैसे कहते कि उन्होंने ये भी पढ़ा था कि डिमेनशिया या अल्ज़ाइमर्स जैसी बीमारियाँ आनुवांशिक होती हैं। जेनेटिक।
“तुम भी अपना ख़्याल रखना मेरी बच्ची।” बस इतना भर कह पाए थे फ़ोन पर।
“आई एम सॉरी पापा। मैं आपकी कुछ भी मदद नहीं कर पाती। आई फील सो मिज़रेबल।” सुकृति फिर फ़ोन पर रो पड़ी थी। उन्हें कभी-कभी लगता था कि प्रमिला को संभालने से ज़्यादा मुश्किल सुकृति को या ख़ुद को संभालना था। उससे ज़्यादा मुश्किल उन दोस्तों, रिश्तेदारों, शुभचिंतकों की भीड़ को संभालना था जो गाहे-बगाहे अपनी विशेष टिप्पणियाँ बाँटने उनके घर आ धमकते थे।
“सुकु बेटा, मेरी इतनी ही मदद करो बस कि मज़बूत रहो। तुम्हारी बेचारगी तुम्हारी माँ की बीमारी से ज़्यादा भारी लगती है मुझे।”
“सॉरी पापा, आई विल बी योर ब्रेव गर्ल। मैं भूल जाती हूँ कि मैं एयरकॉमोडोर वी डी कश्यप की बेटी हूँ।”
“दैट्स लाइक इट। बाद में बातें होंगी। अभी बहुत काम है।” ये कहकर उन्होंने फ़ोन रख दिया। दो मिनट सोचते रहे कि काम ख़ुद को संभालने से शुरू करें या घर को संभालने से। लेकिन फिर चाय पिलाने की आख़िरी कोशिश के लिए प्रमिला के कमरे की ओर बढ़ गए।
ये कमरा प्रमिला ने सबसे ज़्यादा मेहनत लगाकर सजाया था। “जब आप बूढ़े होने लगते हैं तो दिन का सत्तर फ़ीसदी हिस्सा बेडरूम में, दस बाथरूम में, दस किचन और डाइनिंग हॉल में बिताते हैं। बाक़ी बचे दस फ़ीसदी वक़्त में ही आप घर के और हिस्सों में जा पाते हैं। ऐसा मैंने कहीं पढ़ा है और मेरे ख़्याल से एक लिहाज़ से ये सही भी है। इसलिए सबसे ख़ुशनुमा यही कमरा होना चाहिए।” दोनों में से किसी को क्या मालूम था कि प्रमिला की दुनिया एक दिन इसी कमरे में सिमट जाएगी।
बेडरूम की इस साजो-सज्जा के बीच प्रमिला अब एक प्रतिमा भर रह गई थी। बात करते-करते भूलना, चिड़चिड़ापन, बेवजह रोना, तनाव ये सब लक्षण तो इस घर में आते ही नज़र आने लगे थे। लेकिन तब लगता था, नई जगह या फिर एक अत्यंत व्यस्त सामाजिक दिनचर्या से बाहर निकलकर आने की वजह से वो परेशान है।
लेकिन लक्षण बिगड़ते चले गए। एक शाम तो प्रमिला ने उन्हें पहचाना ही नहीं। लगातार कहती रही कि आप मेरे बाबूजी के दोस्त हैं जो बरेली से आए हैं। फिर डॉक्टरों और अस्पतालों का चक्कर शुरू हुआ। लेकिन एक पल के लिए भी उन्हें ऐसा नहीं लगा कि प्रमिला अब ठीक नहीं होगी।
एक दिन प्रमिला शाम को बैठे-बैठे रोने लगी। बहुत पूछने पर कहा, “आप मेरे बाबूजी के दोस्त हैं इसलिए बता रही हूँ।” उस दिन प्रमिला के लिए पहली बार वे अजनबी थे और उस दिन ऐसे अजनबी हुए कि इतने सालों तक तिनका-तिनका जोड़ा हुआ विश्वास एक झटके में धराशायी हो गया।
प्रमिला ने पहली बार किसी महेश का ज़िक्र किया था उस दिन। कहती रही, “आप बाबूजी के दोस्त हैं इसलिए बता रही हूँ। उन्हें समझाइए न कि मैं महेश से शादी करना चाहती हूँ। ऐसे किसी इंसान के साथ कैसे ज़िंदगी गुज़ार दूँ जिसे जानती तक नहीं। आप समझाइए न बाबूजी को।”
वो एक शाम उनकी ज़िंदगी की सबसे भारी शाम थी। प्रमिला अपनी बेख़ुदी में कई बातें बताती चली गई और उन्हें सुनते हुए ऐसा लगता रहा जैसे सालों बाद आई बाढ़ ने सब्र के किसी बाँध को तोड़ दिया है और ये बाढ़ किसी को नहीं बख़्शेगी, कम-से-कम उनके और प्रमिला के बीच के रिश्ते को तो बिल्कुल नहीं।
उस रात एक लम्हे के लिए भी उनकी पलकें नहीं झपकी थीं। कई तरह के भाव उनके मन में आते-जाते रहे- विश्वासघात, क्षोभ, नाराज़गी, चोट, तकलीफ़, पश्चाताप।
अगली सुबह प्रमिला को कुछ याद न था और उन्होंने कुछ पूछा भी नहीं। बड़े अनमने ढंग से दोनों अपने-अपने कामों में लगे रहे। साथ-साथ होते हुए भी दूर-दूर।
प्रमिला ठीक लग रही थी उस दिन, और प्रमिला ने ही याद दिलाया कि आज 24 तारीख़ थी- 24 सितंबर। बिजली-बिल जमा करने की आख़िरी तारीख़। कमाल तो ये था कि बीमारी के बीच जब प्रमिला ठीक होतीं तो इस तरह की तमाम छोटी और कई बार ग़ैर-ज़रूरी बातें उसे याद रहतीं। रिश्तेदारों की शादी की सालगिरह, पड़ोसियों के जन्मदिन, सुनामी किस दिन आया और किस दिन गुजरात में दंगे शुरू हुए…।
लेकिन आज उन्हें इस तारीख़ से कुछ और याद आया था।

सुकृति बहुत छोटी थी, ढाई साल की। उनकी पोस्टिंग सहारनपुर के पास सरवासा में अभी हुई ही थी। घर मिला नहीं था और तीनों एयरफोर्स स्टेशन के मेस में रह रहे थे। अभ्यास के दौरान एक दिन विंग कमांडर अखौरी के साथ उन्हें प्लेन उड़ाना था। एयरबेस से टेक-ऑफ़ के दौरान तो सबकुछ ठीक लगा लेकिन ऊपर उठते ही दोनों को किसी तकनीकी ख़राबी का अहसास हो गया। विंग कमांडर ने ज़र्बदस्ती उन्हें कॉकपिट से इजेक्ट करवा दिया लेकिन ख़ुद क्रैश में मारे गए। ये सब कुछ सात मिनट के भीतर हो गया था। उड़ना, एयरबेस से संपर्क टूटना, विंग कमांडर अखौरी से इजेक्ट करने-ना करने के लिए बहस, उनका कॉकपिट से निकल आना, प्लेन का सौ मीटर की दूरी पर गिरकर आग लग जाना…। जब उन्हें होश आया तो वे अस्पताल में थे। होश में आने से लेकर अगले छह महीने तक वे अस्पताल के उसी बिस्तर पर पड़े रहे, मल्टीपल फ्रैक्चर्स के साथ।
लेकिन प्रमिला ने हिम्मत नहीं हारी। सुकृति के साथ तीनों वक़्त का खाना लेकर हर रोज़ बेस स्टेशन से अस्पताल आती रही।
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10-05-2020, 12:45 PM,
#26
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
एक दिन सुबह आने में देर हो गई थी। उनके पूछने से पहले खुद ही बताया, “रोज़-रोज़ अच्छा नहीं लगता था कि अस्पताल पहुँचाने के लिए मैं किसी की बाट जोहती रहती। तो मैंने आज ख़ुद अम्बैसडर निकाल ली। आज पहले गियर पर चलाकर लाई हूँ। कल दूसरा डालूँगी और परसों तीसरा। ठीक है न?”
उन छह महीनों में प्रमिला के चेहरे पर निराशा और परेशानी की एक भी लकीर नज़र नहीं आई। सुकृति का स्कूल में दाख़िला ख़ुद कराया। उनकी देख-रेख ख़ुद करती रही और साथ ही घर-बार, नाते-रिश्तेदार भी संभालती रही। तब तो ये भी नहीं लगता था कि वे अपने पैरों पर खड़े भी हो पाएँगे लेकिन कई बार उन्हें लगता प्रमिला ही उनके लिए सावित्री बन गई थी। इतना ही नहीं, जब क्रैश में जीवित बच जाने के बदले उनका कोर्ट मार्शल हुआ तो प्रमिला ही उनकी हिम्मत बनी रही।
24 सितंबर को याद आई उन भूली बातों के बाद फिर उन्हें प्रमिला पर कभी ग़ुस्सा नहीं आया।

लेकिन प्रमिला की तबीयत धीरे-धीरे और बिगड़ने लगी। पहले भूलना शुरू हुआ, फिर भाषा और सोचने-समझने की शक्ति प्रभावित हुई और कई बार ऐसा हुआ कि आँखों के आगे अँधेरा छाने की वजह से वो कभी घर में, कभी बाहर बेहोश होने लगी। पिछले एक महीने में अस्पताल जाने के अलावा प्रमिला घर से बाहर तक न निकली थी।
शाम को वो ही ज़िद करके प्रमिला को बाहर लॉन में ले आए थे। पहले प्रमिला दशहरे के बाद ही कई तरह के फूलों के बीज बग़ीचे में डलवा देती थी। गुलदाऊदी, गेंदा, डहेलिया, जिनीया, पैंज़ी, पेट्युनिया और कई ऐसे रंग-बिरंगे फूल जिनके नाम उन्होंने प्रमिला से ही सुने थे।
लेकिन इस साल लॉन उजाड़ पड़ा था। माली क्या काम करके जाता, उन्हें न देखने की हिम्मत होती न बाग़-बग़ीचे की समझ थी उनमें। दोनों इसी उजड़े हुए लॉन में चाँद निकलने तक बैठे रहे। अचानक प्रमिला को जैसे कुछ याद आया।
“अंदर जाती हूँ। साड़ी चुरा लेगी।”

“कौन पम्मी? कोई नहीं है यहाँ, मैं और तुम हैं बस। देखो, मुझे देखो। मुझे पहचानती हो या नहीं?”

प्रमिला ने उन्हें ऐसे देखा जैसे पाइथगोरस थ्योरम पढ़ाते-पढ़ाते क्लास में टीचर ने उनसे दस का पहाड़ा पढ़ने को कहा हो।

“आप विक्रम हैं, सुकृति के पिता। मेरे पति।”

“सुकृति से बात करोगी?”

“नहीं, उसे सोने दीजिए। पूरी रात रोई है। रिंकी उसकी गुड़िया चुराकर ले गई। अब मेरी साड़ी चुराएगी।”

उन्हें बहुत झल्लाहट हुई। लेकिन अपनी खीझ पर काबू किए वे प्रमिला को उसके कमरे की ओर ले गए। खाना लेने के लिए रसोई की तरफ़ मुड़े ही थे कि फिर फ़ोन बजा। सुकृति ही थी।
“तुम्हें आज माँ बहुत याद कर रही थी सुकु।”

“सचमुच पापा? उन्हें याद था? मेहा और समीर के बारे में भी पूछ रही थीं?”

“नहीं बेटा। तुम्हारा बचपन याद कर रही थीं।”

“ओ। लॉन्ग टर्म मेमोरी लैप्स।”

“हाँ, लेकिन कम-से-कम वो चल-फिर पा रही है। मैं तो सोचता हूँ धीरे-धीरे जब पूरी तरह बिस्तर पर पड़ जाएगी तो क्या होगा?”

“मैं आ जाऊँगी पापा। बस कुछ दिन और। मेहा को हॉस्टल में डाल दूँगी। समीर और मैं दिल्ली शिफ़्ट कर जाएँगे। बट पापा, यू अमेज़ मी। आपने कितनी लगन से माँ की सेवा की है। आप कितना थक जाते होंगे!”
“थकता तो हूँ बेटा। कभी-कभी तुम औरतों की तरह जी भर कर रो भी लेना चाहता हूँ। लेकिन मेरे टूटने से क्या संभलेगा? जब टूटने लगता हूँ, वो चालीस साल याद करता हूँ जो तुम्हारी माँ ने हमें दिए। बिना शिकायत। मैं फील्ड में रहा तो वो सबकुछ अकेले संभालते रही। तुम्हें, मेरी माँ के कैंसर को, ख़ुद को। उसने एक दिन भी मुझसे शिकायत नहीं की। बिना बताए मैं दोस्तों की भीड़ को पार्टी के लिए अपने घर लाता रहा, वो मुस्कुराकर सबका स्वागत करती रही। मुझे कई ऐसे दिन अब याद आते हैं जब मैंने उसे बहुत तकलीफ़ पहुँचाई होगी, उससे ऐसी अपेक्षाएँ की होंगी जो उचित नहीं थीं। तो ये समझ लो बेटा कि उसकी बीमारी में मेरी ये सेवा मेरा प्रायश्चित है बल्कि मेरे लिए मेरे रिडेम्पशन, मेरी मुक्ति का एक रास्ता है…”
वे बोलते रहे और सुकृति ख़ामोशी से सुनती रही। अपने पापा को पहली बार इतना खुलते हुए सुना था सुकृति ने।

“आई लव यू पापा। आई रियली डू। ईश्वर आपको शक्ति दें,” सिर्फ़ इतना ही कह पाई थी सुकृति।

“और तुम्हें भी। बाय बेटा।”

फ़ोन रखकर वे फिर बेडरूम में आ गए, दो प्लेटों में खाना डालकर। प्रमिला सो चुकी थी। खिड़की के पर्दे अब भी समेटकर एक कोने में डाले हुए थे। बाहर से आती चाँदनी पूरे कमरे को हल्की-हल्की ख़ुशनुमा रौशनी से भर रही थी।
प्लेट में डाले हुए राजमा की ख़ुशबू उनकी भूख को और बढ़ा रही थी लेकिन प्रमिला को गहरी नींद में देखकर वो प्लेट लेकर वापस रसोई की ओर चले गए। कुछ न सूझा तो टहलने के इरादे से पैरों में जूते डालकर वो पिछले दरवाज़े से सर्वेन्ट क्वार्टर की ओर निकल आए।

अपने ड्राइवर मुकेश को उसके क्वार्टर के बाहर से ही प्रमिला की आवाज़ पर ध्यान देने के लिए बोलकर वे मेन गेट से बाहर निकलकर सड़क पर आ गए।

जलवायु विहार के इन सारे बंगलों और अपार्टमेंटों में फ़ौजी अफ़सर और उनके परिवार ही रहते थे। जिनमें ज़्यादातर रिटायर हो चुके थे। बाईं ओर रहनेवाले ग्रुप कैप्टन माथुर, दाईं ओर कॉमोडोर मिश्रा, सड़क के दूसरी ओर विंग कमांडर जोशी और कैप्टन परेरा। ये सब उनके साथी थे। शाम को क्लब में ब्रिज खेलना, सुबह टहलने के लिए निकलना, दोपहर में गप-शप के दौरान सन् 1965 और सन् 1971 युद्ध के किस्से बाँटना। रिटारमेंट के बाद की इस ज़िंदगी से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी।

प्रमिला की बीमारी के बाद साथियों से मिलना-जुलना कम होता गया और फिर तो वे उनसे मिलने से पूरी तरह बचने लगे। कई बार सवालों का जवाब देना मुश्किल हो जाता। क्या मिसेज कश्यप आपको भी नहीं पहचानतीं? अल्ज़ाइमर्स के क्या-क्या लक्षण हैं? खाना कौन बनाता होगा? कपड़े कौन धोता होगा? आप बेटी के पास क्यों नहीं चले जाते? बेटी क्यों नहीं आती?

आज भी दूर से ही उन्होंने कॉमोडोर मिश्रा को अपनी पत्नी के साथ सामने से आता देख लिया और बिना सोचे-समझे वापस मुड़ गए। बेवजह वे अपना मूड और ख़राब नहीं करना चाहते थे। जितनी तेज़ी से वे मेनगेट से निकले थे, उतनी ही तेज़ी से अंदर घुसकर उन्होंने खट से कुंडी बंद कर ली और पिछले दरवाज़े से ही घर के अंदर चले आए।

सर्वेन्ट्स क्वार्टर के दरवाज़े पर ही मुकेश की बीवी अपने ढाई साल के बेटे के साथ बैठी थी। “बड़ी जल्दी आ गए पापाजी?” मुकेश और मुकेश की बीवी उन्हें शुरू से ही पापाजी और प्रमिला को मम्मीजी बुलाते थे। बाक़ी रिटायर्ड अफ़सरों की तरह उनके यहाँ साहब-मेमसाहब बुलाने का चलन नहीं था। प्रमिला का जोड़ा हुआ यही अपनापन उनके मुश्किल दिनों का इकलौता सहारा था।

अपने साथियों से बच के लौट आने के मक़सद से अंदर आए तो थे लेकिन दिल का बोझ बाँटने के लिए वो वहीं बैठ गए, मुकेश के कमरे के बाहर।

“पापाजी, खाना खाए थे? हम राजमा बना दिए थे।” मुकेश की बीवी को इसके अलावा कुछ पूछना नहीं सूझा।

“खा लेंगे बेटा। तुम्हारी मम्मीजी सो रही हैं।” ये कहते हुए उन्होंने मुकेश के बेटे को गोद में लेने के लिए हाथ बढ़ा दिया। बच्चा गोद में आकर जेब में लगी उनकी कलम से खेलने लगा।
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10-05-2020, 12:45 PM,
#27
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
“इसको डॉक्टर बनाना बिटिया।” जाने क्यों उन्होंने मुकेश की बीवी से ये कह दिया। मुकेश की बीवी उनकी इस बेतुकी बात का क्या जवाब देती? वो बिचारी अपने दाहिने पैर के अँगूठे से फ़र्श पर चाँद-जैसा कुछ बनाती रही। उन्हें तुरंत अपनी ग़लती का अहसास हो गया। वो किस पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ डालने चले थे! फिर भी उन्होंने कहा,” चंदू को तो डॉक्टर हम बनाएँगे। जब हमारे दाँत झड़ जाएँगे और हम थोड़े और बूढ़े हो जाएँगे तो चंदू हमें सूई देकर ठीक करेगा, है न चंदू?”

उनकी इस बात पर बच्चा खिलखिलाकर हँस पड़ा। मुकेश की बीवी के चेहरे पर भी एक हल्की-सी मुस्कुराहट तैर गई। मुकेश को सुबह उनके पास भेजने की बात कर वे घर के भीतर चले गए।

प्रमिला अभी भी सो रही थी लेकिन उन्होंने आगे बढ़कर जगाने के लिए आवाज़ दी। एक आवाज़ में ही प्रमिला की आँखें खुल गईं। “खाना लाता हूँ, फिर मत सो जाना।”

प्रमिला ने इस बात पर कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर नहीं की। वो गए, खाने की प्लेटें बारी-बारी से माइक्रोवेव में डालकर गरम किया और गर्म तश्तरियाँ बेडरूम में ही ले आए।

“ये मुकेश की बीवी खाना ठीक-ठाक बना लेती है। लेकिन आजतक किसी ने वैसा राजमा नहीं खिलाया जैसा तुम बनाती हो।” उन्होंने हँसते हुए कहा।

प्रमिला को उनकी कोई बात समझ में नहीं आई।

“चाय चुराई है, अब साड़ी चुराएगी” का रिकॉर्ड फिर शुरू हो गया।

वे उठकर प्रमिला की बग़ल में आ गए, हाथ में खाने की प्लेट लिए हुए। रोटी और राजमा का एक-एक गस्सा धीरे-धीरे वे प्रमिला के मुँह में डालते रहे और उससे बातें करते रहे। लगातार। बिना रुके। निरंतर।
“मैंने तुमसे कभी नहीं कहा पम्मी, अब कह रहा हूँ जब तुमको मेरी बात समझ भी न आएगी, तब। पैम, तुममें बहुत धैर्य था। मुझ जैसे आदमी को तुम झेलती कैसे थी? कैसे इतना अपमान सह लेती थी? याद है, एक बार तुमने इसी राजमा में नमक नहीं डाला था तो मैंने पूरा भगोना डाइनिंग हॉल के फ़र्श पर फेंक दिया था? लेकिन उस शाम फिर भी तुम मेरे साथ मुस्कुराती हुई क्लब आई थी, मेरे वीएसएम के पदक मिलने का जश्न मनाने। ये समझते हुए भी कि ये विशिष्ट व्यक्ति तुम्हें अपमानित करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ता।”

उनका गला रूँध गया था और चेहरे का रंग बदलने लगा था।

प्रमिला मुँह में उनके हाथों के रास्ते आने वाले खाने को धीरे-धीरे चबाती रही, उनकी ओर देखती रही, जैसे सब समझना चाहती हो लेकिन…।

उन्होंने बोलना बंद नहीं किया। “हमारे बेटे को तुम डॉक्टर बनाना चाहती थी, मैंने फ़ौज में भेजने की ज़िद की। तुमने फिर मेरे आगे हार मान ली। काश! तुमने ज़िद की होती। काश! तुम मुझसे लड़ती, झगड़ती। हमारा बेटा ज़िंदा होता शायद। मिग ने मुझे छोड़ दिया। हमारे बेटे को नहीं बख़्शा। काश! मैंने तुम्हारी बात मान ली होती। उस डॉक्टर बेटे की ज़रूरत आज सबसे ज़्यादा मुझे है पम्मी।”

इतना कहकर वे फूट-फूटकर रोने लगे। इतने सालों में पहली बार वो कमज़ोर पड़े थे, वो भी प्रमिला के सामने। वो भी इतनी देर से, जब प्रमिला के पास न कुछ कहने की समझ बची थी न कुछ सुनने की।

जूठे हाथ थाली में वैसे के वैसे पड़े रहे। प्रमिला उन्हें वैसे ही टुकुर-टुकुर देखती रही।

शायद पति की बातों का असर था या मौक़े की नज़ाकत, प्रमिला ने अपने आप उनके सामने से प्लेट हटाकर बिस्तर की बग़ल वाली टेबल पर रख दिया और बिना पानी पिए आँखें मूँदकर लेट गई।

वे भी वहीं प्रमिला की बग़ल में लेट गए, वैसे ही राजमा-चावल में लिपटी उँगलियों के साथ।

आज जाने क्यों उन्हें लगा कि उन्हें नींद इसी कमरे में आएगी, प्रमिला की बग़ल में। वर्ना दोनों के बेडरूम तो सालों पहले ही अलग हो गए थे। थोड़ी देर में उन्हें वाक़ई नींद आ गई थी।

सुबह देर तक जब उन्होंने पीछे का दरवाज़ा नहीं खोला तो मुकेश की बीवी बग़ल से ग्रुप कैप्टन माथुर को बुला लाई। मुकेश ने पिछले दरवाज़े का शीशा तोड़कर कुंडी भीतर से खोलने की कोशिश की। थोड़ी-सी मेहनत के बाद दरवाज़ा खुल गया। तबतक ग्रुप कैप्टन माथुर ने अपने दूसरे पड़ोसियों को भी फ़ोन करके बुला लिया था।

जब सब बेडरूम में पहुँचे तो कुछ नहीं बदला था। नवंबर की धूप वैसे ही पर्दों के पार से कमरे में आ रही थी। ग्रिल की काली-गहरी परछाईं वैसे ही फ़र्श पर बिखरी हुई थी। प्रमिला खोई-खोई-सी वैसे ही पंखे को देख रही थी।
लेकिन एयर कॉमोडोर वीडी कश्यप का रिडेम्पशन पूरा हो चुका था। उन्हें मुक्ति मिल गई थी।


**************समाप्त****************
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