Desi Sex Kahani जलन
12-05-2020, 12:19 PM,
#31
RE: Desi Sex Kahani जलन
"आह-आह !" सरदार ने करवट बदली।

“कैसी तबीयत है सरदार आपकी? "

सरदार ने अपनी निस्तेज आंखें ऊपर की ओर उठाईं—“सुलतान, मैं किस मुंह से तुम्हारी तारीफ करूं? तुम मेरे भाई हो। तुमने मुझ पर जो एहसान किया है, उसका बदला तुम्हें खदा देगा, मैं तो अदना इन्सान हूँ। तुम्हारे एहसान का बदला चुकाना मेरी ताकत से बाहर है।

धीरे-धीरे गिरोह का प्रत्येक व्यक्ति सुलतान को चाहने लगा। सभी सुलतान से दो-दो बातें करने के लिए लालायित रहा करते।

सरदार भी सुलतान को जी-जान से चाहने लगा था, मगर उसे मेहर और सुलतान की प्रेम लीलायें, उनका घंटों अकेले बैठकर बातें करना अच्छा न लगता था।

जब से सुलतान वहां रहने लगा, तब से सरदार ने, फिर कभी मेहर को तंग करने का प्रयास नहीं किया। सुलतान गिरोह के हर एक आदमी को प्रसन्न रखने के लिए जी-जान से कोशिश कर रहे थे।

कादिर और सुलतान में खूब बनती थी। मेहर का प्रेम पाकर सुलतान सब कुछ भूल गये थे। मेहर के प्रेम के कारण ही सुलतान डाकुओं का साथ दे रहे थे, मगर अवसर की ताक में सदा रहते थे। मेहर की मुक्ति का प्रश्न उनके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण था।
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एक महीने बाद
सरदार बिल्कुल स्वास्थ्य हो गया। उसने अपने सब साथियों को और सुलतान को बुलाकर कहा- आज बहुत दिनों बाद मेरी तबियत ठीक हुई है। अब मैं चाहता हूं कि हम लोग किसी ऐसी जगह डाका डालें कि हमारा इतने दिनों का नुकसान पूरा हो जाये। इस काम के लिए मैंने सुलतान काशगर का महल चुना है।"

सुनते ही सुलतान चौंक पड। वह सरदार उन्हीं के महल को लूटने का मंसूबा बांध रहा है। खैर, देखा जायेगा।

सरदार कहता गया—“मुझे अच्छी तरह मालूम है कि सुलतान काशगर के महल में काफी रकम इकट्ठी है और अगर कोशिश करके हम यह रकम हाथ में कर सके। तो हमें इस पेशे से हमेशा के लिए छुट्टी मिल जायेगी। इधर सुनने में आया है कि सुलतान, सल्तनत छोड़ कर न जाने कहां चले गये हैं और तख्त पर इस वक्त नाकाबिल परवेज का कब्जा है। इसलिए हमें कुछ भी दिक्कत न उठानी पड़गी। जाओ, तैयारी करो।"
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जब से सुलतान काशगर सिंहासन छोड कर चले गये हैं, वृद्ध वजीर बराबर चिन्ताग्रस्त रहता है, क्योंकि उसे शहजादे परवेज के रंग-ढंग अच्छे नहीं दीखते।

सुलतान का रंगमहल आजकल सूना पड़ा हुआ है। महल के बाह्य भाग में वजीर ने अपने रहने का स्थान चुन रखा है, ताकि महल के अंदर जितनी अपार धनराशि एकत्रित है, उस पर कोई बद-निगाह न डाल सके। __यों तो वजीर के लिए एक छोटा-सा महल अलग है, परंतु सुलतान के महल को असुरक्षित देखकर उसने वहीं रहना ठीक समझा।

अर्धरात्रि के अवसान होने में कुछ ही समय शेष था कि वृद्ध वजीर को निद्रा अकस्मात् भंग हो गईं।

वह जल्द से पलंग पर उठ बैठा और कान लगाकर उस आवाज पर गौर करने लगा, जिसे सुनकर निद्रा टूटी थी।
उसने महल के अन्त:पुर से कुछ आवाज सुनी, जैसे महल में बहुत से आदमी घुस आये हों और धीरे-धीरे बातें कर रहे हों।

शीघ्रता के साथ, मगर इस तरह कि अवाज न हो, वह उठ खड़ा हुआ और दरवाजा खोलकर बाहर के पहरेदार को जगाया। पहरेदार आंख मलता हुआ उठ बैठा।

वजीर ने उससे कहा—"माद् ! महल में डाकू घुस आये हैं। तू जल्दी से जा और सिपहसालार से कह कि पांच सौ सिपाहियों को लेकर महल का कोना-कोना घेर ले। बहुत होशियारी और आहिस्ता से यह काम हो। समझ गया ना जा, जल्दी कर!" पहरेदार चला गया।

वजीर ने अपनी तलवार उठाई और अंधेरे में ही वह दबे पांव महल के अग्रभाग वाले हिस्से की ओर बढ़ गया।
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12-05-2020, 12:20 PM,
#32
RE: Desi Sex Kahani जलन
सुलतान काशगर के विलास भवन का द्वार खुला और एक काली आकृति भीतर घुसी। उसके तुरंत बाद ही एक दूसरी काली आकृति ने उसका अनुसरण किया।
पहली आकृति ने कहा -"तुम आ गये सुलतान?"

दूसरी आकृति बोली —"जी सरदार! हम लोग ठिकाने पर पहुंच गये हैं, मगर जरा धीरे बोलिये, यह खास सुलतान का ख्वाबगाह है।"

"मगर तहखाने का रास्ता कहीं नहीं दीख पडता ...।" सरदार ने कहा।

दोनों तहखाने का रास्ता खोजने लगे। इस समय सुलतान की विचित्र अवस्था हो रही थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए! एक बार तो उनके मन में आया कि वे शोर मचाकर सब डाकुओं को पकडवा दें, परंतु शीघ्र ही उन्होंने एक दूसरा रास्ता सोच लिया।

इतने में एक आदमी घबराया हुआ अंदर घुसा और सरदार से बोला- गजब हो गया सरदार! पहरेदार जाग गये हैं। उन्होंने हल्ला बोल दिया है। चारों तरफ से सिपाही हमें घेर रहे हैं। अब हमारी खैर नहीं!"

"तुम घबराओ नहीं!" सरदार गम्भीर स्वर में बोला। सरदार हमेशा से ही इस तरह के खतरे उठाने का आदी हो गया था। "सुलतान अब क्या करना चाहिए?" उसने सुलतान की ओर अभिमुख होकर पूछा।

सुलतान मन-ही-मन वजीर की तत्परता और चतुरता देखकर बहुत प्रसन्न हो रहे थे।
वे बोले-"बेहतर होगा कि हम अपने सब साथियों को एक जगह कर लें, फिर जो कुछ सामने आयेगा, सब साथ ही झेलेंगे।"

सरदार ने अपने सब साथियों को अंदर बुला लिया। बाहर चारों तरफ टिड्डियों की तरह सिपाही फैल गये थे। डाकुओं की हालत चिंताजनक हो रही थी।

इतने में एक डाकू बोल उठा—"सरदार ! भागने का एक रास्ता है। बगल वाले दरवाजे से हम बाहर निकल सकते हैं।"

"हां-हां! यह रास्ता तो ठीक है। चलो, सब लोग भाग चलें।" सरदार ने कहा।

सुलतान का ध्यान अभी तक बगल वाले दरवाजे की ओर नहीं गया था। अब उनका भी ध्यान उस ओर गया। अगर लोग अधर से भागते हैं तो उन्हें को कोई पकड नहीं पायेगा, परंतु सुलतान ने तो उन्हें पकड वा लेने का दृढ निश्चय कर लिया था। उन्होंने सरदार पर अहसान लादने का अच्छा उपाय सोच रखा था। ___ सब डाकू भाग जाने के लिए दरवाजे की ओर बढ़ । सुलतान ने सबको हाथ से बाहर जातेदेखा। उन्होंने लपक कर पास ही दीवाल में लगी हुई एक छोटी-सी कील दबा दी। उनकी इस कार्य वाही को कोई देख न सका।

कील दबाते ही विलास भवन के दरवाजे, बिना शब्द किए हुए अपने आप बंद हो गये। कोई डाकू भाग न सका।

"यह क्या ?" अब सरदार भी घबरा उठा।

"हम चारों ओर से बंद हो गये हैं, सरदार !" सुलतान ने कृत्रिम दुख के साथ कहा।

थोड ही देर में वजीर के सिपाहियों ने आकर सब डाकुओं को बंदी बना लिया। सुलतान भी पकड लिए गये। उन्होंने अपने चेहरे का अधिकांश भाग साफे से छिपा रखा था।

दूसरे दिन दरबार आम हुआ। राज्य के सभी बड-बड। प्रतिष्ठित नागरिक और उच्च पदस्थ कर्मचारी उपस्थित थे।

सुलतान का सिंहासन रिक्त था। नीचे एक छोटे से सिंहासन पर शहजादा परवेज बैठा था। उससे कुछ नीचे वजीर का आसन था। वजीर की आज्ञा से कल के पकड हुए सब डाकू उपस्थित किए गये।

वजीर उठा और शहजादे का अभिवादन कर बोला- जहाँपनाह! ये डाकू कल शहंशाह के ख्वाबगाह में पकड़ गये हैं।"

"भाईजान के महल में घुस आये थे सब? इनकी इतनी हिम्मत?" परवेज बोला।

वजीर डाकुओं के सामने खड़ा हो गया और अपनी बूढ आखें सरदार की आंखों में डालकर बोला-"क्यों सुलतान का खजाना लूटने आये थे? परंतु बुढे वजीर को इतनी जल्दी कैसे भूल गये तुम लोग!" ____अकस्मात् वजीर की उडती हुई दृष्टि सरदार के बगल में खड] सुलतान पर जा पड़ी ।

यद्यपि इस समय भी सुलतान के चेहरे का पर्याप्त भाग छिपा हुआ था, फिर भी वजीर ने उन्हें कुछ-कुछ पहचान लिया।

वजीर उन्हें गौर से देख रहा था। दूसरे ही क्षण उसके चेहरे पर मुस्कराहट खेल गईं। भला अपने सुलतान को बह कैसे न पहचानता?

किसी ने नहीं देखा कि सुलतान की दाहिनी आंख का एक कोना कुछ बंद हुआ। इतने से वजीर सब कुछ समझ गया।

आंख का संकेत पाते ही वह जान गया कि सुलतान अभी अपना भेद गुप्त रखना चाहते हैं। अत: वह बोला—"तुम...तुम भी हो?"

"हां वजीरे आजम!" सुलतान ने कहा- में ही है, जिसने एक दिन जंगल में आपकी जान बचाई थी और आपने वादा किया था कि तुम जो मांगोगे में दूंगा। आज में आपसे वहीं वादा पूरा करने की मिन्नत करता हूं।" सुलतान की ये बातें बनावटी थीं।

"क्या है तुम्हारी मुराद बोलो?" वजीर ने पूछा।

सुलतान ने कहा- "मैं चाहता हूं कि मेरे साथ मेरे सब साथी छोड दिये जायें।"

"छोड दिये जायें ?" सम्मिलित कण्ठ से आश्चर्यमिश्रित स्वर दरबारियों के मुख से निकल पड़ा I
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12-05-2020, 12:20 PM,
#33
RE: Desi Sex Kahani जलन
मगर वजीर की मुखाकृति शांत थी। वह बोला-"यह मेरे अख्तियार की बात नहीं ठहरो, शहजादे से आरजू करता हूं।"

वजीर शहजादे से बोला—“जहाँपनाह, इस शख्स ने मेरी जान बचाई थी, ऐसे वक्त जबकि मैं मौत के एकदम नजदीक था। एहसान भी इसने मुझ पर बहुत किये थे। मैंने वादा किया था कि तुम्हारी मुराद पूरी करूंगा। आज ऐसे बेवक्त वह अपनी मुराद पूरी करने का ख्वाहिशमन्द है। अगर जहांपनाह का हुक्म हो तो...!" __

_वजीर...!" शहजादा बोला- तुम बुजुर्ग हो। अगर तुम चाहो तो इन्हें छोड़ सकते हो। सल्तनत का कोई नुकसान तो ये लोग कर नहीं पाये।"

वजीर ने कोशिश की।
सब डाकू आजाद कर दिये गये। सरदार सुलतान पर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सुलतान को छाती से लगा लिया। सब डाकु उनकी बलैयां लेने लगे। आज उन्हीं के कारण उनकी जान बची थी तो भला वे सुलतान की बलैयां क्यों न लेते?

वजीर थोडी देर के लिए सुलतान से एक कमरे में अकेले मिला। वह सुलतान के पैरों पर गिर पडा और आर्तनाद कर उठा- शहंशाह ! आपकी यह हालत? आप...!" ___

"घबराओ नहीं मेरे बुजुर्ग!"... सुलतान की आंख भी तर हो आई-"क्या करूं, मजबूर होकर डाकुओं का साथ दे रहा हूं। अपने दिल से मजबूर हूं। जब तक इनके साथ रहता हूं, तब तक दिल की जलन ठण्डी रहती है।"

"ताज्जुब है!" वजीर बोला। अगर उसे मेहर और सुलतान के मुहब्बत की बात मालूम होती तो ऐसा प्रश्न कभी नहीं करता।

"मुझे अब इस सल्तनत से कोई दिलचस्पी नहीं रही, वजीर!" ।

"नहीं शहंशाह, ऐसा न करिये। आपको दिलचस्पी लेनी होगी। चमन की बहार बुलबुल से है — पौधे की खुबसूरती फूलों से है। जब बुलबुल और फूल ही न रहे तो चमन और पौधा किस काम के, जहाँपनाह? आप अब नहीं जा सकेंगे।"

"नहीं! मुझे जाना ही होगा, वजीर!" सुलतान ने कहा।

वजीर ने बहुत समझाया, परंतु उनकी समझ में कुछ न आया।

वे डाकुओं के साथ चले गए। सकुशल लौटकर डाकुओं ने खूब आनन्दोत्सव मनाया।

कई महीने बीत गये।
सुलतान और मेहर का हृदय मिला तो ऐसा मिला, जैसे दूध और पानी। बिना एक-दूसरे को देखे उन्हें चैन न पडता ।
मेहर के प्रेम के कारण ही सुलतान उन डाकुओं का साथ दे रहे थे। सरदार उन पर हमेशा प्रसन्न रहता था। उसे सुलतान की सभी बातें अच्छी लगती थीं, परंतु उनका मेहर से एकान्त में मिलना भी उसे खटकता था। गिरोह के और डाकू सुलतान को भाई-सा प्यार करने लगे। सुलतान ने अपनी मीठी-मीठी बातों से सभी को वश में कर रखा था।

"मेहर!" एकान्त देखकर सुलतान ने मेहर को गुदगुदा दिया।

मेहर कटाक्ष करती हुई बोली-“वह क्या है?"

"कुछ नहीं. सिर्फ उंगलियां शरारत कर बैठी हैं।" फिर एकाएक गम्भीर होकर बोला - प्यास ने मुझे बेदम कर दिया है। वह प्यास कैसी है, जानती हो? वह है मुहब्बत की प्यास। तुम तो जानती ही होगी मेहर! कि मुहब्बत की प्यास, उल्फत की जलन कितनी तकलीफदेह होती है।

मेहर सुलतान की बात सुनकर खिलखिला पड़ी __"तुम कभी-कभी जमीन से आसमान तक की बातें करने लगते हो सुलतान!" अकस्मात् उसी समय उसके सिर की ओढनी नीचे खिसक गयी। काली घटा जैसे केश कमर तक फैल गये।

सुलतान के हाथ आगे बढ । दूसरे ही क्षण वह सौन्दर्य की प्रतिमा उसकी गोद में समा गईं।
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12-05-2020, 12:20 PM,
#34
RE: Desi Sex Kahani जलन
"सुलतान!" दरवाजे पर से सरदार का कर्कश स्वर सुनाई पड़ाI
सुलतान ने घबराहट में मेहर को छोड़ दिया। मेहर कांपती हुई एक ओर खडी हो गईं। सरदार कमरे के अंदर आ गया। उसने सब कुछ देख लिया था। उसकी आखें अंगारे जैसी लाल थीं। क्रोध से उसके होंठ फडफ ड़ा रहे थे।

"सुलतान!" उसके मुख पर मन्द मुस्कान की रेखा खिल उठी। उसने मुस्कराते हुए सुलतान के कंधे पर हाथ रख दिया।

“जी जरा मेहर से बातें कर रहा था। सुलतान ने झेंपते हुए कहा।

"मगर बात इस तरह नहीं की जाती दोस्त...!" सरदार ने व्यंग्य किया-"मेरे सीधेपन से बेजा फायदा उठाने की कोशिश न करो सुलतान। आओ मेरे साथ।"
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उस दिन सुलतान की तबीयत खराब थी, इसलिए वे डाकुओं के साथ न जा सके। मकान में केवल मेहर और सुलतान थे। मेहर सुलतान के साथ बैठी हुई थी।

"कैसी तबीयत है, सुलतान?" मैहर ने पूछा।

"तबीयत एकदम ठीक है, मेहर! सिर्फ जलन मुझे परेशान कर रही है। मैं यहां बहुत खुश था और चाहता था कि पूरी जिंदगी यहीं गुजार दूं, मगर अब मालूम होता है, जैसे यह नामुमकिन है। सरदार को हमारी मुहब्बत से जलन होती है। __

"एक घर में रहते हुए भी हमारी मुलाकात नहीं हो पाती।" मेहर ने कहा- “सरदार के डर से मैं उफ तक नहीं कर सकती, मगर क्या कहूं सुलतान! तुम्हारी याद, तुम्हारी जुदाई मुझे बेइन्तहा तकलीफ देती है। _

_तभी तो कहता हूं मेहर, कि मैं प्यासा हूं। सामने पानी रखा है, मगर पी नहीं सकता। मुझ-सा बदकिस्मत कौन होगा तुम भी तो..." सुलतान ने एक गहरी सांस ली। ___

मेहर ने उसके कंधे पर अपना हाथ रख दिया और बोली- "प्यारे सुलतान! ऐसी तरकीब करो कि तुम्हारी मुहब्बत ताकयामत कायम रहे! कोई जरिया सोचो! मैं तुम्हें पाने के लिए हर खतरा उठा सकती हूं, जान भी दे सकती हूं।"

सुलतान ने मेहर को खींचकर सीने से लगा लिया और बोले- क्या करूं? कुछ समझ में नहीं आता! आजकल सरदार बुरी तरह मेरे पीछे पड़ गया है। आज ही देखो, अगर मैं बीमारी का बहाना न करता तो वह मुझे कभी यहां न रहने देता।"

"हम दोनों एक-दूसरे के लिए तडपते रहते है, मगर खुदा का कहर कि हमारी ख्वाहिशें ख्वाहिशें ही रह जाती हैं। अब ज्यादा नहीं सहा जाता। चलो, निकल चलें यहां से कहीं दर, इतनी दूर कि जहाँ नापाक इन्सानों का हाथ न पहुंच सके।

आश्चर्य करते हुए सुलतान ने पूछा- "लेकिन कहां?...कितनी दूर?...किस जगह ?"

"तुम जहां भी कहीं ले चलो, मैं चलने को तैयार हूं, मगर अब मैं यहां नहीं रह सकती। चलो, अगर दुनिया भर में हमें कोई जगह नहीं मिलेगी, तो हम दोनों खुदकुशी कर लेंगे। यह तो बस की बात है न?...सुलतान, मेरे सुलतान! बोलो न?"

"अच्छी बात है,? मैं तैयार हूं। मेरा घोड़े] मौजूद है। चलो, उसी पर चढ कर इसी वक्त भाग चलें। मौका अच्छा है...।" सुलतान ने कहा- जल्दी करो, नहीं तो सरदार आ जायेगा।"

"आ जायेगा नहीं, आ गया।" दरवाजे पर से आवाज आई।

मेहर और सुलतान ने देखा कि दरवाजे पर क्रोध से कांपता हुआ सरदार खडा है।

“नादान दोस्त! जान-बूझकर मौत को क्यों बुलाता है....।" सरदार आगे बढ़ आया और उसने सुलतान के गाल पर तडाक से एक तमाचा जड़ दिया।

सुलतान ने चाहा कि ईंट का जवाब पत्थर से दे, परंतु चुपचाप खड रहे।

*आओ मेरे साथ !" - सरदार ने, फिर गरज कर कहा और दुसरे कमरे की ओर चल पड। सुलतान भी उसके पीछे चले। जाते-जाते उसकी दृष्टि मेहर पर पड। उन्होंने देखा कि मेहर की बडबड आंखों में मोती जैसी बूंदें झर रही हैं मानो उनसे कह रही हों ____ "सुलतान ! यह क्या हुआ? हम मिल करके भी आज जुदा क्यों हो रहे हैं ? "

दुसरे कमरे में जाकर सरदार सुलतान से बोला— सुलतान! तुम दोनों ने सोचा था कि सरदार हम दोनों से बेफिक्र हो गया है—मगर यह तुम्हारी भूल है! इसकी सजा जानते हो क्या?"

"नहीं।" सुलतान ने लापरवाही से कहा मानो वे सब कुछ कहने के लिए तैयार हो।

सरदार कहने लगा—“इसकी सजा मौत है—समझे! मगर नहीं, मैं तुम्हारे लिए सजाये मौत तजवीज नहीं करूंगा, क्योंकि तुमने तीन बार मेरी जान बचाई है, मैं भी तुम्हारी जान बख्शता हूं, मगर तुम अब यहां नहीं रह सकते। क्यों, जानते हो—नहीं जानते? अगर तुम यहाँ रहोगे तो मेहर को अपना बनाने की कोशिश करोगे और इस तरह मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दोगे। मैं मेहर से मुहब्बत करता हूं, मगर अब तक वह मुझसे नफरत करती आ रही थी। मैं भी देखूगा कि तुम्हारे चले जाने पर वह कैसे नहीं मुझे कबूल करती है?"

"सरदार!"

"बोलने की कोशिश न करो। मैं तुम्हें छोटे भाई-सा प्यार करता रहा। मुझे अफसोस है कि आज तुम्हारे जैसा बहादुर शख्स मेरे गिरोह से चला जायेगा, मगर मैं क्या करूं। मुझे लाचार होकर ऐसा हुक्म देना पड़ रहा है।"
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12-05-2020, 12:20 PM,
#35
RE: Desi Sex Kahani जलन
सरदार के स्वर में नम्रता के साथ-साथ कठोरता का भी मिश्रण था—"तुम अभी अपने जाने का इन्तजाम कर लो और, फिर भूलकर भी इधर पैर न रखना। सुलतान गमगीन न बनो। मैं जानता है कि तुम्हें यहां से जाते हए बड़ी तकलीफ होगी, क्योंकि तुम मेहर को चाहते हो, मगर मेरे दोस्त, अब इस जिंदगी में वह कभी तुम्हें नहीं मिल सकेगी! वह मेरी है, मेरी रहेगी।"

निमिषमात्र में यह खबर सारे गिरोह में फैल गईं कि आज सुलतान जाने वाला है। मेहर ने भी सुना, कादिर ने भी सुना, सबने सुना।

"क्या सुलतान जा रहा है?"

“हां ! सरदार ने उन्हें जाने का हुक्म दिया है।"

"मगर कसूर उसका ?"

"न जाने क्या कसूर उसने किया है...।"

"क्या कहा?"

"बेचारा सुलतान आज हमें छोड़ कर जा रहा है। कितना अच्छा आदमी था बेचारा और कितना बहादुर!"

"तुम जा रहे हो सुलतान?"

"क्या करूं कादिर ! खुदा की यही मर्जी है, रोओ नहीं। मैं जानता हूं तुम मुझे बहुत चाहते हो, मगर समझ लेना कि हमारी मुलाकात ख्वाब में हुई थी। जा रहा हूं, अपनी आंखें पौंछ लो। देखना, मेहर की देख-रेख करना।"

सुलतान के चले जाने के समाचार से सभी डाकुओं को ठेस लगी। किसी की भी आंखें सूखी नरहीं।

सुलतान की विदाई के लिए सब डाकू इकट्ठे हुए। सरदार भी आया। बारी-बारी से सभी के गले मिला। कादिर को भी गले से लगाया। कादिर रो रहा था। रोते हुए ही बोला—“तुम चले ही जाओगे सुलतान! क्या सचमुच अब मुलाकात न होगी?"

सुलतान का गला भर आया। वे कुछ बोले नहीं, केवल अपने रूमाल से कादिर की गीली आंखें उन्होंने पोंछ दीं।

सबके पश्चात सुलतान सरदार से मिले। सरदार का भी दिल रो रहा था, मगर मेहर के लिए उसे सुलतान को दूर हटाना ही था।

"सरदार ! मेरे सरदार!"

"सुलतान!"— सरदार के गले से रुकती आवाज निकली।

"चलते वक्त मेरी एक ख्वाहिश है—सिर्फ एक ! और वह भी बहुत आसान है। खुदा के लिए उसे पूरी कर दो, सरदार!"

“क्या है तुम्हारी ख्वाहिश, सुलतान?" सरदार ने पूछा।

*चलते वक्त सिर्फ दो मिनट के लिए मेहर से मिलने की इजाजत चाहता है। इनकार मत करना, सरदार!" सुलतान ने अत्यंत ही दीन स्वर में कहा।

सुलतान ने मेहर के प्रकोष्ठ में प्रवेश किया। मेहर चारपाई पर पड सिसक रही थी! सुलतान ने प्रेमपूर्वक उसे उठाया और कहा- यह आखिरी मुलाकात है, मेहर! शायद ही अब इस जिंदगी में मैं तुमसे मिल सकू।"

"तुम चले जाओगे सुलतान? मुझे यहीं अकेली छोडकर...।" मेहर जोरों से रो पड़ी । उसने सुलतान की गोद में अपना सिर रख लिया।

*मेहर! खुदा की मरजी को कौन टाल सकता है। हम तुम मिले थे, सिर्फ बिछड़ ने के लिए! हमारी-तुम्हारी मुहब्बत हुई थी सिर्फ तडपने के लिए, ख्वाब था यह सब मेहर!" सुलतान ने कहा।

"नहीं-नहीं मेरे सुलतान! ऐसा न कहो। यह ख्वाब नहीं सच है और सच, सच होकर रहेगा। सुलतान तुम फूल हो,मैं खुशबू! तुम कालिब हो, मैं रूह ! मेरे महबूब, मुझे भी ले चलो अपने साथ। मैं भी चलूंगी।"

"मैं तुम्हें ले चलने को तैयार हूं, मेहर ! मेरे बाजुओं में इतनी ताकत है कि.....

"नहीं-नहीं तुम अकेले हो...मैं तुम्हारी जान खतरे में नहीं डालूंगी, सुलतान! यं ही तडपकर जान दे दूंगी...तुम जाओ। मैं अपने आराम के लिए तुम पर आफत नहीं आने दूंगी।"

सुलतान ने मेहर को हृदय से लगा लिया।

मेहर ने अपना शरीर ढीला कर दिया और निश्चेष्ट होकर सुलतान के हृदय से चिपटी रही। दोनों प्रेमियों का वह मिलन कितना कारुणिक था।

"मुझे भूलने की कोशिश करना, मेहर!" मेहर को अलग करते हुए सुलतान ने कहा।

“करूंगी....।" यह शब्द मानो मेहर की कब्र से निकला हो—“यही आखिर भेंट है, मेरे सुलतान! जाओ, रुक नहीं सकते तो जाओ! खुदा की यही मरजी है!"

सुलतान दरवाजे की ओर बढ़ा । उनके कानों में अभी तक मेहर की यह आवाज गूंज रही थी-“यही आखिरी भेंट है...रुक न सको तो ,जाओ, तुम जाओ।"

उधर दरवाजे पर बैठा हुआ कादिर हिचकियां लेकर गा रहा था

रुक न सको तो जाओ, तुम जाओ। एक मगर हम सबकी है फरियाद, कभी हमारी भी कर लेना याद। हम तो तुम्हें भूल न सकेंगे,
तुम चाहे बिसराओ—तुम जाओ!

सुलतान मेहर से विदा लेकर बाहर आये। मगर कादिर ने मानो सुना ही नहीं। उसकी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी। वह तन्मय होकर गा रहा था प्यारा वतन बिछुड ता तो जब पंथी किसका हृदय न भर जाता पंथी! तुम ये आंसू देख हमारे, कमजोरी न दिखाओ—तुम जाओ!

सुलतान बढ़ चले जंगल की ओर। उनका हृदय बैठा जा रहा था। जंगल के पेड-पत्ते उनकी हंसी उड रहे थे। पश्चिम में सूर्य भगवान अस्ताचल की और जाने की तैयारी में थे।

कादिर हिचकियों ले-लेकर गा रहा था। गाने की आवाज अभी तक कानों में आ रही थी। उसकी दर्द भरी आवाज से पेड की पत्तियों तक कांप रही थीं।

वे आगे बढ़ते ही चले जा रहे थे, परंतु स्वयं उन्हें भी यह न मालूम था कि उनकी यह मंजिल कहां जाकर समाप्त होगी।

संध्याकाल की बेला में, नीड की ओर जाते हुए पक्षियों का समूह मानो पूछ रहा था— ऐ मुसाफिर! कहां जायेगा इतनी विकट परिस्थिति में?

पेड। पल्लव कह रहे थे—*पथ भ्रांत पथिक ! लौट जा अपने घर को, सामने की ओर देख ! क्षितिज के पास काली अंधियारी घिरी आ रही है। जा, लौट जा!"

सुलतान का हृदय हाहाकार कर रहा था— कहां जाए ? क्या करे?"

पश्चिमाकाश में अस्त प्राय सूर्य की किरणों के साथ इठलाती हुई रक्तरंजित लालिमा, सुलतान की और संकेत करके पूछ रही थी— कहां है मंजिल तेरी ?"

मगर सुलतान आगे बढ़ते ही जा रहे थे। कादिर के गाने की आवाज अभी तक उनके कानों में गूंज रही थी
रुक न सको तो जाओ, तुम जाओ!
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12-05-2020, 12:20 PM,
#36
RE: Desi Sex Kahani जलन
दस
कमर ने ठहाका लगाया और बोला—“तुम भी बड भोले हो शहजादे ! तुमने आसपास की कुछ खबर नहीं रहती।"

"आखिर बात क्या है, दोस्त! मैं देख रहा हूं कि तुम्हारे चेहरे पर खुशी और गम दोनों एक साथ मौजूद हैं, बात क्या है?" शहजादे परवेज ने पूछा।

"बात ही ऐसी है, शहजादे...!" कमर ने कहा- अब हमारे आराम के दिन गये।"

"क्यों, आखिर हुआ क्या?" शहजादे की आंखों में ताज्जुब तैरने लगा।

"सुलतान, फिर आ रहे हैं।"

"क्या?...क्या भाईजान, फिर आ रहे हैं?"-परवेज का मुंह पीला पड़ गया।

"हां, आज तक जो तुम सल्तनत पाने का ख्वाब देखते आ रहे थे, उसे बर्बाद हुआ समझो। तुम्हारे सिपाही दिन-रात सुलतान को खोजते, फिरे, लेकिन कामयाब न हुए। आज सुलतान सही सलामत सल्तनत के करीब आ गए हैं। वजीर बडा खुश है। उसने सुलतान के लिए शहर के बाहर खेमे लगवा दिये हैं। वहीं से सुलतान की सवारी निकलेगी और शहर-भर में घूमती हुई महल में दाखिल होगी। शहर में पूरी तैयारी हो रही है। सारी रियाया खुशी से फूली नहीं समा रही है। अब तुम्हारी और साथ ही साथ मेरी भी सारी तमन्नाएं, सारी ख्वाहिशें हमेशा-हमेशा के लिए सो जाएंगी। कमर ने कहा।

"तो भाईजान की तबीयत अब दुरुस्त हो गई ?"

"मालूम तो ऐसा ही होता है। अब तुम्हारी क्या राय है? खैर घबराने की जरूरत नहीं। अभी बहुत से रास्ते हैं। यह लो, बुड्डा वजीर चला आ रहा है। मैं जा रहा हूं, तुम इससे निपटो।"

कहकर कमर चलता बना।

वजीर ने आकर शहजादे को अभिवादन किया और बोला- आलीजाह ! खुदा के फजल से सुलतान सही-सलामत आ पहुंचे हैं। उनकी दिल के सारी परेशानी दूर हो गई है। शहर के बाहर उनका खेमा पड़ा हैं। शहर में तैयारी का हुक्म मैंने दे रखा है। अब लोग सुलतान का वापस आना सुनकर बहुत खुश हैं—मैंने सोचा-अब आपको भी खबर कर देना जरूरी है, इसलिए चला आया, फिर भी देर से पहुंचा। माफ कीजिएगा।"

"अब बहुत खुश हूं वजीर, कि भाईजान आ गये। अच्छा हुआ कि मेरे नाजुक कन्धों से इस भारी सल्तनत का बोझ हट गया। तुम शहर-भर में खूब तैयारी कराओ। खूब जलसे हों समझे !" परवेज ने कृत्रिम प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा।

परंतु उसका हृदय भीतर-ही-भीतर रो रहा है, यह वजीर ताड गया उसके अंत:प्रदेश में छिपी हुई भावनाओं और उसकी मुखाकृति पर प्रतिक्षण होने वाले परिवर्तनों को देखकर।

वजीर वापस चला गया तो कमर, फिर शहजादे के पास आकर बैठ गया। "अब कौन-सी राय मुझे दे रहे हो। शुरू से ही मैं तुम्हारी राय पर अमल करता आ रहा हूं।"

"इसके लिए मैंने एक बहुत अच्छी तरकीब सोची है, जो कभी नाकामयाब न होगी...।" कहकर कमर ने शहजादे के कान में न जाने क्या कहा!

सुनते ही परवेज उछल पड़ाI बोला—"यह बात है, तुमने खूब सोची। यह ठीक होगा।"
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12-05-2020, 12:20 PM,
#37
RE: Desi Sex Kahani जलन
शहर के बाहर एक प्रशस्त मैदान में सुलतान का शिविर लगा हुआ है।

शिविर में एक पलंग पर बैठे हुए सुलतान, बूढ वजीर से कह रहे हैं—“तुमने नाहक ही सब किया। मेरा लौट आना क्या इतनी खुशी की बात है कि सल्तनत-भर में जलसे मनाने की तैयारी की जाए? मैं तो दुनियादारी से ऊब कर कुछ दिनों के लिए जंगलों की खाक छानता रहा। जब दिल को राहत मिली तो, फिर आ गया—यह कोई नई बात नहीं!"

"मगर आप रहे कहां इतने दिनों तक?"

“डाकुओं के गिरोह में रहा, लेकिन वहां से निकाल दिया गया। कुछ दिनों तक इधर-उधर भटकता रहा! मेरे दिल में औरतों से और दुनियादारी से जो नफरत हो गई थी, वह जाती रही और दिल को राहत मिल गई तो मैंने सोचा, इधर-उधर भटककर, रियाया की बेहतरी में अपनी जिंदगी गुजार दूं। मैंने आपको खबर दी। आप मेरे पास आये, परंतु इतनी टीम-टाम की क्या जरूरत थी?"सुलतान ने कहा।

"जरूरत...?" वृद्ध वजीर की मुखाकृति पर मुस्कराहट की रेखा दौड गयी—"जरूरत क्यों नहीं थी, आलीजाह! भला जिसके लौटने की हम दिन-रात बेसब्री से उम्मीद करते, जिसकेन रहने से फूली-फली सल्तनत, एकदम उजाड रहती आयी, उसके आने से हमारे दिल में खुशी न हासिल हो!...मगर जहापनाह, इस खुशी में भी गम है आसार नजर आ रहे है।।"

"तुम्हारा मतलब?"

“मतलब मेरा यह है जहाँपनाह, मुझे माफ करें, कि आपकी जान लेने की कोशिश की जा रही है। मेरे जासूस ने पता लगाया है कि जब आपकी सवारी शहर से गुजरने लगेगी। उसी वक्त कोई बेजा हरकत करके आपकी जान लेने की कोशिश की जायेगी। शहंशाह की जान को खतरा है। इस काम में किसका हाथ है, यह मुझे मालूम नहीं हो सका है, मगर जरूर इसमें कोई बड़ा आदमी शामिल है।"

“यह बात है? तब तो जुलूस निकलना मुश्किल है। अगर तुम कहो तो मैं चुपके से महल तक चला चलूँ सवारी नहीं निकलेगी, इसकी मुनादी करवा दी जाये।"

"नहीं, शहंशाह हुजूर! सवारी निकलेगी और जरूर निकलेगी। बुद्धे वजीर के रहते हुए किसकी मजाल है कि वह आपका बाल भी बांका कर सके। आप देखियेगा कि किस खूबी के साथ आपके दुश्मनों को शिकस्त देता हूं। वे भी वाह-वाह कर उठेंगे आलीजाह!”– वजीर ने कहा।

प्रजा ने शहर को सजाने में कोई कमी न रखी। सारा शहर स्वर्गवत् जगमगाने लगा। अपने बिछड हुए सुलतान का आगमन सुनकर सारी प्रजा हर्षोत्फुल हो उठी थी।

योजनानुसार निश्चित दिन को सुलतान की सवारी निकली। सल्तनत के सभी बड-बड नागरिक और पदाधिकारी जुलूस में सम्मिलित थे।

कई प्रकार के वाद्य यन्त्र आगे-आगे बज रहे थे। उसके बाद सैनिक घोड़े If पर सवार नंगी तलवारें लिए चल रहे थे।

जुलूस के ठीक मध्य भाग में, सुलतान एक विशाल हाथी पर विराजमान थे। उनके गले में पड बड-बड। फूलों के गजरों ने उनके चेहरे का काफी हिस्सा ढक लिया था। सुलतान ने उन गजरों को अपने गले से निकालकर रख देना उचित नहीं समझा। भला प्रजा की दी हुई भेंट का अपमान वे किस तरह कर सकते थे।

जुलूस में शहजादा परवेज, सुलतान के पीछे वाले हाथी पर सवार था और वजीर शहजादे के पीछे वाले हाथी पर।

शहजादे का दोस्त कमर भी शहजादे के बगल में बैठा हुआ जुलूस की बहार देख रहा था। कभी-कभी सौन्दर्ययुक्त उनकी मुखाकृति पर मुस्कराहट की एक अस्फुट रेखा खिंच उठती थी।

आज कमर और शहजादा परवेज दोनों प्रसन्न थे, क्योंकि आज उन्होंने सुलतान की जान लेने का पूरा प्रबन्ध किया था और उन्हें आशा थी कि एक घंटे के अंदर ही सुलतान इस संसार से चल बसेंगे।

धीरे-धीरे बढ़ता हुआ जुलूस उस जगह पर पहुंचा, जहाँ गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से आवृत एक छोटी-सी मस्जिद पडती थी और उसके पीछे सघन वृक्षों का एक वृहदाकार मनोरम उद्यान था।

धांय! धांय! धाय!
एकाएक तीन बार गोली छटने का शब्द हुआ। साथ ही शाही हाथी पर जोरों की चीख सुनाई पडा और लोगों ने हैरत के साथ देखा कि सुलतान का सिर दाहिनी ओर लटक गया है।

सारे जुलूस में कोलाहल मच गया। वजीर घबरा उठा। परंतु परवेज और कमर बाह्यरूप से दुखी होते हुए भी भीतर से प्रसन्न थे। उनके सिपाहियों ने अपना काम पूरा कर दिया था और इस समय मृत शहंशाह शाही हाथी पर पड हुए थे।
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12-05-2020, 12:20 PM,
#38
RE: Desi Sex Kahani जलन
रंग में भंग हो गया था।
परवेज घबराई-सी सूरत बनाए वजीर के पास आया और रोता हुआ बोला—"यह क्या...यह क्या हो गया वजीर?"

"शहजादे साहब...!" वजीर भी रो पड]-"खुदा की मरजी!"

सारे शहर में एक विचित्र प्रकार की उदासीनता छा गई। अभी तक जो शहर प्रसन्नता और नाना प्रकार के विनोद में विभोर हो रहा था, वह थोड़ी ही देर में श्मशानवत् मालूम पड़ने लगा।

परवेज रोता हुआ चेहरा और हंसता हुआ दिल लेकर महल को रवाना हुआ। कमर भी उसके साथ था। दोनों की अभिलाषाएं आज मुद्दत के बाद पूरी हुई थीं।

ज्योहि परवेज महल के पास पहुंचा, उसने देखा महल में पूर्ववत् आनन्दोत्सव मनाया जा रहा है। वाद्ययन्त्र इस मस्ती के साथ बजाये जा रहे हैं मानो कुछ हुआ ही न हो।

परवेज को आश्चर्य हुआ। वह बोला— हैं, यह कैसी बात? गम के वक्त खुशी के आसार!"

न जाने क्यों परवेज और कमर का हृदय धडकने लगा! अभी तक जो हृदय हंस रहा था, वह रो उठा।
या खुदा! यह कैसा गडबड घोटाला?

स्पन्दित हृदय से दोनों महल में घुसे। घुसते ही उन्होंने जो कुछ देखा, उससे उनका मस्तिष्क घूम गया।
उन्होंने देखा कि महल के द्वार पर स्वयं सुलतान खड़े उनकी ओर देख रहे हैं।

परवेज घबरा गया। कमर भी आश्चर्य से चीख उठा-"यह क्या है? उसकी आंखों का कसूर है या खुदा का कहर!"

“आओ शहजादे!" सुलतान ने पुकारा परवेज को।

परवेज उनके पैरों पर गिर पड। सुलतान ने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया। एक बाप के दो बेटे, एक रक्त बिन्दु के दो हिस्से, एक आकृति के दो स्वरूप मिलकर एकाकार हो गए।

लेकिन दोनों हिस्सों में, दोनों स्वरूपों में जमीन-आसमान का अंतर था। उनमें एक था स्वतंत्र हृदय का महान् पुरुष और दूसरा था कलुषित हृदय का एक पतित पुरुष।

"भाईजान!"

"शहजादे! तुम्हें ताज्जुब हो रहा होगा...और है भी ताज्जुब की बात! मगर यह सब वजीर की कारगुजारी है। उसे पहले से ही पता लग चुका था कि मेरी जान लेने की पोशीदा तौर से कोशिश हो रही है। इसलिए उसने यह सब किया। शाही हाथी पर जो शख्स सवार था, वह मैं नहीं था। मैं तो जुलुस उठने के पहले ही यहां आ पहुंचा था।"

“शुक्र है खुदा का, भाईजान ! मैं तो रंजोगम से मुर्दा हुआ जा रहा था। परवेज ने कहा।

"ये तुम्हारे दोस्त हैं क्या ?" सुलतान ने कमर की ओर इशारा करके पूछा।

“जी हां, भाईजान! यह मेरे दोस्त हैं।" परवेज ने कहा।

कमर ने सुलतान को झुककर अभिवादन किया। सुलतान स्थिर दृष्टि से कमर की मुखाकृति को देख रहे थे। कदाचित् उसकी मुखाकृति उसके किसी परिचित से मिलती-जुलती थीं।

"मगर...।" सुलतान कोई बात कहते-कहते न जाने क्यों रुक गये।

"अभी इनसे मेरी नई-नई दोस्ती हुई है।" परवेज ने सुलतान की मन शंका दूर करने का प्रयत्न किया।

"मगर इस साजिश का पता अभी तक न चल सका कि किस शख्स ने इस तरह मुझे इस दुनिया से उठा देने की कोशिश की थी। वाकई उसकी हिम्मत काबिले-तारीफ है।" सुलतान बोले।

"जी हां ! मैं जी-जान से गुनहगार को खोजने की कोशिश करूंगा।" परवेज ने कहा।
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12-05-2020, 12:20 PM,
#39
RE: Desi Sex Kahani जलन
"सब कुछ उलट-फेर हो गया।" कमर ने हाथ मलते हुए कहा- जो सोचा था, वह न हुआ। हमारी सारी कोशिशें नाकामयाब हो गईं, हमारी सारी उम्मीदें मिट्टी में मिल गई—हुआ नहीं तो सिर्फ यही कि हमारा राज-फाश नहीं हुआ। अभी तक यह कोई नहीं जान सका कि इस खौफनाक साजिश के पीछे कमर और शहजादे का हाथ है।" ___

सचमुच दोस्त! हमारे सारे अरमान खाक में मिला दिये गये। हमें ऐसी शिकस्त दी गई है कि ताजिन्दगी याद रहेगी। यह ख्वाब में भी मुझे उम्मीद न थी कि सुलतान इस तरह बाल-बाल बच जायेंगे, मगर यह वजीर भी कितना आफत का परकाला है। उसका दिमाग न जाने किस चीज का बना है। है भी इतना बुलंद दिमाग कि उडती चिडिया का पर पहचान लेता है।" परवेज ने कहा।

___वजीर सचमुच वजीर ही है। यह मेरे रास्ते का कांटा हो रहा है। खैर, देखंगा कि कब तक सह सुलतान की खैरियत महफूज रख सकता है। शहजादे, तुम घबराओ नहीं। सुलतान आज बचे, कल बचे-कितने दिनों तक बचेंगे। कभी तो हाथ में आयेंगे। कमर ने कहा।

“अब तो कुछ दिनों के लिए इस प्रकार की हरकतें बन्द ही रखो और देखो कि भाईजान किस तरह रहते हैं और क्या करते हैं ? "

“हां! आज मैंने एक अच्छा-सा गुलाम खरीदा है।"

"गुलाम! गुलाम तो इतने सारे थे, फिर क्यों खरीद लिया?"

"मुझे वह बहुत पसंद आया। कहो तो बुलाएं। किसी भले घर का है। मालम होता है कि गुलाम और बांदियां बेचने वाले डाकुओं ने उसे पकड़ कर बेच दिया है।" परवेज ने कहा।

कमर ने पूछा- "नाम क्या है उसका?"

"उसने अपना नाम जहूर बताया है। कहता है कि वह अपने कबीले के सरदार का लड का था। एक लडकी की मुहब्बत में पड़ कर वह उसे ले भागा, मगर जंगल के डाकुओं ने उसे पकड लिया और साथ ही उस लडकी को भी। पकड जाने के बाद वह लाकर बेच दिया गया।"

"किस्सा तो काफी दिलचस्प है।" कमर ने कहा।

"वह देखो आ रहा है।"

परवेज के कहने से कमर ने दरवाजे की और दृष्टि घुमाई और देखकर बोला— "हां, छोकरा तो अक्लमंद दिखाई पड़ता है। ठीक है, यहां तो आ छोकरे ! हां, खडा हो जा सीधे...तु गमगीन न बन, इसे अपना ही घर समझ। रोता क्यों है ? भूल जा बीती बातों को।"

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12-05-2020, 12:20 PM,
#40
RE: Desi Sex Kahani जलन
ग्यारह
सच पूछिये तो सौन्दर्य-गरिमा गांव में ही देखने को मिलती है। देखिये न! जंगल के छोर पर बसा हुआ गांव और उस गांव के किनारे बना एक कच्चा-सा मकान ! क्या भला लग रहा है। __ और जरा उस सुन्दरी पर भी दृष्टिपात कीजिए, जो घर के द्वार पर खडी होकर सामने की ओर देख रही है।

और क्या देख रही है, कुछ समझा आपने? नहीं, अच्छा जरा गौर से देखिये, अभी-अभी एक नवयुवक अश्वारोही जंगल से निकला है और गांव की ओर घोडा दौड ता जा रहा है।

सुन्दरी की दृष्टि उसी अश्वारोही पर केंद्रित है। अश्वारोही के वस्त्रादि राजकीय ढंग के हैं। यदि आप ध्यानपूर्वक देखें तो तुरंत पहचान जायेंगे कि यह दूसरा कोई नहीं, शहजादा परवेज है, जो प्रात:काल ही आखेट के लिए निकला था और भटकता-भटकता इधर आ निकला है।

शहजादा गांव में घुसा और उस घर के पास आकर घोड़े से उतर पड़ा । उसके ललाट पर पसीने की बूंदों की राशि, थकावट और व्याकुलकता की द्योतक है।

सुन्दरी को देखकर शहजादे ने कहा- मैं शहजादा हूं, शिकार खेलते-खेलते राह भूलकर इधर आ निकला हूं। यहां कुछ देर तक आराम कर थोडा पानी पीना चाहता हूं।"

“आइये!" सुन्दरी ने मधुर स्वर में कहा और शहजादे को अंदर आने का संकेत किया।

शहजादा मकान के अंदर चला गया। सुन्दरी उसके बैठने के लिए मामूली-सी चारपाई डालकर बोली- हम गरीबों के घर यही पलंग का काम देती है, शहजादे साहब!"

“बहुत पसंद आई मुझे यह चारपाई !” शहजादा चारपाई पर बैठता हुआ बोला। सुन्दरी पानी लेने दूसरी कोठरी में चली गई।

शहजादा सोचने लगा— यह जन्नत की हूर, इस मकान में अकेले ही रहती है क्या? कोई दूसरा तो दिखाई पडता नहीं ....इसकी सूरत कितनी प्यारी और कितनी आकर्षक है?"

इतने में सुन्दरी एक तश्तरी में कुछ ताड का गुड और एक गिलास पानी लेकर आ पहुंची। मुस्कराते हुए उसने तश्तरी और गिलास शहजादे के पास रख दिया। उसकी मुस्कराहट शहजादे को बहुत भली लगी। बोला-"तुम क्यों इतनी तकलीफ उठा रही हो, नाजनी?"

"घर आये मेहमान की खातिरदारी करना हमारा फर्ज है, शहजादे हुजूर!" इतना कहकर सुंदरी की मुस्कराहट ने थोडा रंग पकड।

उसकी इस मुस्कराहट ने शहजादे को इतना अधीर बना दिया कि वह अपने हृदय को संयत न रख सका। वह आवेश में आकर उठ खडा हुआ और उसे बाहुपाश में कस लेने के लिए आगे बढ़ा ___ परंतु जब सुन्दरी शहजादे की कलुषित भावना से अवगत हुई तो उसने कर्कश स्वर में उसे दूर रहने की हिदायत दी।

परंतु शहजादे पर तो कामवासना का भूत सवार था, वह कब मानने वाला था। उसने आगे बढ कर सुन्दरी का हाथ पकड़ लिया।

उसी समय द्वार खुला और एक तीस वर्षीय नवयुवक वहां खड दिखाई पड़ाI

"फातिमा!" नवयुवक ने पुकारा।

"मुझे बचाओ भाईजान!" सुन्दरी ने नवयुवक से कहा।

नवयुवक उसका सगा भाई था। वह आकर शहजादे के सामने खडा हो गया। उसके कांपते हुए होंठों से निकला—*अकेली औरत पाकर उसकी अस्मत पर डाका डालते तुम्हें शर्म नहीं आई?"

नवयुवक क्रोध से आगबबूला हो उठा। बिना कुछ कहे-सुने उस पर टूट पड। शहजादे ने उसे रोकने के लिए अपनी तलवार की नोक उसके सामने कर दी। तलवार की नोक सामने देख उस नवयुवक ने अपने को संभालना चाहा, परंतु वह इतनी तेजी से आया कि सम्हल न सका। __ दूसरे ही क्षण शहजादे की तलीबार उस निरपराध नवयुवक की छाती में घुस गईं। करुण चीत्कार के साथ वह पृथ्वी पर गिर पड़ाI

शहजादे का विचार उस युवक को घायल करने का न था, मगर करता क्या? वह तो स्वयं ही उसकी और झपट पडा था।

शहजादा तुरंत मकान से बाहर निकल आया और अपने घोड़े पर चढ़ कर महल की ओर रवाना हो गया। सुन्दरी फातिमा अपने भाई की अवस्था देखकर मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ी ।
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