Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
08-18-2019, 01:42 PM,
#41
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
अब हमारा कहीं और जाने का प्लान नही था,इसलिए अरुण ने बाइक सीधे हॉस्टिल वाले रोड मे मोड़ दी थी...
"यार अरमान, दीपिका मॅम को कॉल लगाकर बुला,साली को चोदते है आज...बीसी ने बड़ा हार्ड वीवा लिया था..."बाइक चलाते हुए अरुण ने कहा...
"नंबर नही है साली का..."
"मेरे पास है...."भू ने जेब से मोबाइल निकाल कर मुझे दिया.....उस वक़्त मैं 80-90 की स्पीड मे शराब पीकर बाइक पर सवार था, ना तो मुझे वक़्त का अंदाज़ा था और ना ही किसी और चीज़ का...उस वक़्त जो मन मे आए,मेरे लिए वही सही था...जो भी अरुण और भू बोले, मैं उस वक़्त वही करता......दीपिका मॅम ,ने कॉल नही उठाया तो मैने भू को उसका मोबाइल दे दिया....जब दीपिका मॅम को कॉल नही लगा तब मैं वापस शांत होकर आँखो मे पड़ रही मस्त हवाओं का आनंद लेने लगा...लेकिन भू लगातार दीपिका मॅम को कॉल किए जा रहा था.....
"ले,ले...धर "
"क्या हुआ..."
"दीपिका चूत ने कॉल उठा ली, बुला साली को..."ये कहकर भू ने मोबाइल मेरे हाथ मे थमा दिया....
"हेलो..."
"हेलो..."
"हेलो..."मैने एक बार फिर हेलो कहा...
"कौन है..."उसने अपनी आवाज़ तेज़ करके कहा...
"चूत मरवा रही थी क्या जानेमन..."मैने भी आवाज़ तेज़ करके कहा, उस वक़्त मुझे ज़रा भी अंदाज़ा नही था कि मैं किससे और किस तरह से बात कर रहा हूँ....
"कौन..."
"मैं हूँ,जिसने तुझे लॅब मे लंड चूसाया था...भूल गयी इतनी जल्दी..."
"अरमान..."उसने थोड़ा रुक कर जवाब दिया...
"यस, आजा हॉस्टिल ,चोदने का मन है किसी को...."
उसके बाद पता नही क्या हुआ, मैं उसे बोलता ही रहा आने को लेकिन इस बीच वो कुछ नही बोली, थोड़ी देर बाद मुझे मालूम चला कि उसने कॉल बहुत देर पहले ही काट दी थी, भू ने एक बार फिर उसका नंबर लगाया,लेकिन अब उसका नंबर स्विच ऑफ था....
"क्या बे ,कही वो नाराज़ तो नही हो गयी..."
" यही तो प्यार है पगले....राइट साइड वाला....ना तो मैं उसे चोद सकता हूँ, बिकॉज़ ऑफ हर चूत आंड ना ही वो मुझे चोद सकती है बिकॉज़ ऑफ माइ लंड

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उस दिन हम हॉस्टिल सुबह 4 बजे पहुँचे...हॉस्टिल आते वक़्त बीच रास्ते मे मैने जब भू के मोबाइल से दीपिका मॅम को कॉल लगाया था तब 1 बज रहे थे और वहाँ से हॉस्टिल तक आने मे हमे मुश्किल से आधा घंटा लगता ,लेकिन हम लोग आधे घंटे मे नही ,बल्कि 3 घंटे मे हॉस्टिल पहुँचे....ख़ैरियत थी कि हम तीनो मे से किसी को कुछ नही हुआ था,लेकिन हमने वो तीन घंटे कहाँ बिताए ये हमे ज़रा सा भी याद नही था...याद था तो बस सीनियर हॉस्टिल के सामने बाइक रोकना और फिर सीडार को कॉल लगाकर सीनियर हॉस्टिल का गेट खुलवाना.....क्यूंकी अपने हॉस्टिल मे जाते तो लफडा हो सकता था और यदि इसी पॉइंट को लेकर गर्ल्स हॉस्टिल की वॉर्डन ने रात वाले कांड से जोड़ दिया तो हम तीनो लंबे से फँस सकते थे, फिलहाल हमारा इस लफडे मे फँसने का कोई इरादा नही था,इसलिए हम तीनो अपने हॉस्टिल ना जाकर सीधे सीनियर हॉस्टिल पहुँचे थे.....
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उसकी अगली सुबह मेरी नींद सीधे दोपहर को 11 बजे खुली और वो भी इसलिए क्यूंकी एक तो मुझे प्यास लगी थी और दूसरा बहुत देर से मेरा मोबाइल बज रहा था....मैने टेबल पर रखे हुई पानी की बॉटल को उठाया और आँखे मल कर एक नज़र मोबाइल स्क्रीन पर डाली....
"बीसी, 1000 मिस कॉल "
मैने तुरंत अपनी आँखो को हाथो से सहलाया और एक बार नज़र फिर मोबाइल पर डाली , मोबाइल पर 10 मिस कॉल्स थी और वो सभी मिस कॉल्स घर से थी.....मोबाइल को वापस बिस्तर पर पटक कर मैं हॉस्टिल के बाथरूम मे घुसा और नल चालू करके लगभग 5 मिनिट्स तक अपना सर ठंडे पानी से भीगोता रहा, ऐसा करने पर मुझे बहुत ठंडक महसूस हो रही थी....उसके बाद मैं वापस रूम पर आया और घर का नंबर डाइयल किया.....
"फोन क्यूँ नही उठाता, सुबह से हज़ार बार कॉल कर चुका हूँ..."
"कौन..विपिन भैया..."
"नही...रॉंग नंबर लगाया है तूने.."
"साइलेंट मे था मोबाइल कल रात से, अभी देखा तो मिस कॉल थी...."
"फाइन...घर कब आ रहा है..."
"आज ही दोपहर 12 बजे की ट्रेन है..."
"तो अभी कहाँ है...."
"अभी हॉस्टिल मे हूँ...."बोलते हुए मैने एक नज़र दीवार पर लगी घड़ी पर मारी " 11 तो यही बज गये...."
उसके बाद मैने तुरंत भैया से कहा कि मैं हॉस्टिल से रेलवे स्टेशन के लिए ही निकल रहा हूँ, बाद मे कॉल करता हूँ.....उसके बाद मैने मोबाइल सीधे अपनी जेब मे डाला और अरुण ,भू को लात मार कर उठाया.....
"अबे कुत्तो, मुझे रेलवे स्टेशन छोड़ो जल्दी..."
भू तो हिला तक नही, ले देकर मैने अरुण को उठाया और रेलवे स्टेशन चलने के लिए राज़ी किया.....उसके बाद 15 मिनट. मे मैने सब कुछ कर लिया, फ्रेश भी हो गया,बॅग भी पॅक कर लिया और बाइक पर बैठकर रेलवे स्टेशन के लिए भी निकल गया.....हॉस्टिल से निकलते वक़्त तो यही लग रहा था कि मैं कुछ नही भूला हूँ,लेकिन मुझे अपनी सीट पर बैठकर अपनी ग़लती का अहसास होने लगा था....
"ब्रश.....वो भी भूल गया "
"स्लीपर....वो भी भूल गया "
"एटीएम कार्ड...बीसी वो भी भूल गया..."
जब मुझे धीरे-धीरे याद आने लगा कि मैं क्या-क्या भूल गया हूँ तो मैने सबसे पहले बाकी काम छोड़ कर अपना वॉलेट चेक किया, और पीछे की जेब मे वॉलेट है ,ये देखकर मैने राहत की साँस ली.....मैने वॉलेट निकाला और देखने लगा कि उसमे कितना माल है,...
"कल रात तो 3000 था, एक ही रात मे ऐसा क्या कर दिया मैने...."

मैने सोचा की शायद 1000-500 की नोट दूसरे पॉकेट्स मे पड़ी होंगी,इसलिए मैने अपने दूसरे पॉकेट्स भी चेक करके देखा,...पैसे तो नही मिले..लेकिन मेरे जीन्स पैंट के जेब मे रखे हुए,पेन्सिल...एरेसर...कटर...एक पेन,जिस्लि स्याही बाहर निकल आई थी...यही सब थे...गुस्से मे मैने सारी चीज़े निकाल कर खिड़की से बाहर फेकि और इंतज़ार करने लगा ट्रेन के चलने का...
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जब घर से दूर था ,तब भी पढ़ाई की फिकर होती थी और अब घर पर हूँ तो अब भी मुझे पढ़ाई की फिकर है...कॉलेज मे मूड हर वक़्त बदलता रहता था इसलिए एक पल मे जो सोचता था वो दूसरे पल मे लाइट की वेलोसिटी से आर-पार हो जाता था, मैं स्टडी नही कर रहा हूँ ये ख़याल मुझे तब भी आया था,जब मैं कॉलेज मे था...लेकिन वहाँ का महॉल ही कुछ ऐसा था कि मैं कभी सीरीयस नही हो पाया...लेकिन इस वक़्त मैं घर पर था, जहाँ घर के अंदर एक कदम रखने से पहले ये पुछा गया कि एग्ज़ॅम कैसा गया,पांडे जी की बेटी का सब पेपर हंड्रेड टू हंड्रेड गया है...घर पर यदि कोई आता भी तो वो "कैसे हो बेटा"कहने की बजाय ये पुछ्ता की "एग्ज़ॅम कैसे गये,..."

कोई -कोई तो ये भी पुछ्ता कि कितने मार्क्स आ जाएँगे, मैं अपने ही घर मे किसी मुज़रिम की तरह क़ैद हो गया था,जिसकी वजह सिर्फ़ एक थी कि मेरे पेपर इतने खराब गये थे कि टॉप मारना तो पूरे यूनिवर्स की लंबाई मापने के बराबर था, इधर तो ये भी कन्फर्म नही था कि मैं किस-किस सब्जेक्ट मे पास हो जाउन्गा.....घर वाले मुझसे बहुत उम्मीदे जोड़े हुए थे, और इसमे उनकी ज़रा सी भी ग़लती नही थी...एलेक्ट्रान के साइज़ के बराबर भी ग़लती उनकी नही थी....उनकी ये उम्मीद मैने ही बाँधी थी..मेरे आज तक के एजुकेशन रेकॉर्ड ने ही उन्हे मुझसे इस तरह उम्मीद रखने के लिए प्रेरित किया था और जो सवाल वो आज पुच्छ रहे थे,वो सवाल वो मुझसे पहले भी करते थे...लेकिन फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि पहले मैं उनके इस तरह सवाल पुछने के पहले ही बोलता था कि "पापा, आज का पेपर पूरा बन गया,..."या फिर ये बोलता कि"1 नंबर का छूट गया है...."
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मेरे इस तरह कहने पर वो कहते कि "कोई बात नही बेटा...1 नंबर का ही तो छूटा है..."

यही उम्मीद मैं आज भी कर रहा था कि मैं जब उन्हे सब सच बताऊ तो वो पहले वाले अंदाज़ मे ही बोले कि"डॉन'ट वरी बेटा, ये तो फर्स्ट सेमेस्टर है ,बाकी के सात सेमेस्टर बाकी है..."

लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ, ना तो मैने उन्हे सच्चाई बताई और ना ही उन्होने मुझसे ऐसा कहा....जब तक ,जितने भी दिन मैं घर मे रहा मैं हर पल घुट रहा था,..हर पल,खाते,पीते ,सोते ,जागते मैं यही सोचता रहा कि मैं तब क्या कहूँगा,जब रिज़ल्ट निकलेगा...क्या बहाना मारूँगा....घर मे तो कुछ बहाना मार भी नही सकता था क्यूंकी घर मे इन सब बहानो को अच्छी तरह समझने वाला मेरा बड़ा भाई था...जो इस वक़्त मेरे सामने बैठा हुआ था....
"गर्ल फ्रेंड है कोई..."
"अयू..."
"अरे गर्ल फ्रेंड..."
"ना..."
"सिगरेट पिया..."
"पानी तक नही पीता मैं तो बिना फिल्टर किए हुए, सिगरेट तो बहुत दूर की बात है...."
"कल रात दारू कितनी पी थी..."
"एक भी नही "मैं तुरंत बोल पड़ा....
"मुझे हॉर्सराइड मत सिखा...तेरी आवाज़ सुनकर ही समझ गया था..."
"नो भाई, मैं तो उस वक़्त सो कर उठा था...."
"खा उस लड़की की कसम ,जो तुझे कॉलेज मे सबसे अच्छी लगती है ,कि तूने कल रात शराब नही पी थी..."
जैसे ही विपिन भैया ने ये बोला, मेरे जहाँ मे एश आई , अब दिक्कत ये थी कि एश की झूठी कसम खाकर खुद को ग़लत होते हुए भी सही साबित करना या फिर सब कुछ सच बता कर खुद एक नये बोझ से दूर रकखु...उस वक़्त मैने दूसरा रास्ता चुना, लेकिन क्यूँ ? ये मैं नही जानता....
"वो दोस्तो ने जबारजस्ति पिला दी थी..."
"अच्छा...तूने सच बोला इसका मतलब यही कि कॉलेज मे तेरी गर्ल फ्रेंड भी है...मना किया था ना ये सब करने के लिए...."

अभी तक मैं खुद को बहुत शातिर समझता था ,लेकिन इस वक़्त मेरी सारी होशयारी तेल लेने चली गयी थी, भैया ने बातो मे फँसा कर सब कुछ जान लिया था....अपने शब्दो के जाल मे फँसा कर विपिन भैया और भी कुछ ना जान जाए ,इसलिए मैं पानी पीने के बहाने से वहाँ से उठा और ऐसा उठा कि वापस उस तरफ गया ही नही

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वैसे तो छुट्टियाँ 7 दिन की थी,लेकिन हम सबने प्लान बनाकर ये डिसाइड किया था कि 15 दिन तक कॉलेज नही जाएँगे...और ये सही भी था,क्यूंकी यदि अभी कॉलेज से बंक नही मारेंगे तो क्या बाद मे ऑफीस से बंक मारेंगे...लेकिन मुझे उस वक़्त घर मे ऐसा महॉल क्रियेट होगा...इसका मुझे अंदाज़ा नही था, सोचा था कि घर मे रहूँगा, बढ़िया 15 दिन तक खाना खाउन्गा और बाद मे कॉलेज के लिए रवाना....लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ,क्यूंकी ये मेरा कॉलेज नही,ये मेरा घर था,जहाँ मैं अपने हिसाब से नही चल सकता था....घर मे रात को 10 या 11 बजे तक सोना पड़ता था,ताकि सुबह 6 बजे तक नींद खुल जाए.....मैं रात को 10 बजे सोने की बहुत कोशिश करता लेकिन सफल नही होता था...मैं अपने रूम के बिस्तर पर पड़े-पड़े मैं कॉलेज की लड़कियो के बारे मे देर रात तक सोचता रहता...कभी-कभी मेरी ये सोच आधे घंटे तक चलती तो कभी कुछ घंटो तक...और एक दिन तो ग़ज़ब हो गया जब मैं इसी सोच मे इतना खो गया कि सुबह के 3 बजे तक मैं जागता हुआ करवटें बदलता रहा....
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मुझे अपने घर की ज़िंदगी रास नही आ रही थी...इसलिए मैने डिसाइड किया कि मैं 7 दिन बाद कुछ भी बहाना मारकर यहाँ से निकल जाउन्गा ,भले ही मुझे विदाउट रिज़र्वेशन ही क्यूँ ना जाना पड़े....और अपने इसी प्लान को कामयाब करने के लिए मैने पहला तीर तब चलाया...जब शाम को सब एक साथ हॉल मे बैठे थे, इस वक़्त हॉल मे टी.वी. चालू था और उसमे बेहद ही बकवास और बोरिंग...सीरियल चल रहा था...बकवास इसलिए क्यूंकी वो बकवास था और बोरिंग इसलिए क्यूंकी इन सीरियल वालो ने एक अच्छी ख़ासी टनटन माल को साड़ी पहना कर रखा हुआ था,सबसे पहले यकीन भैया को दिलाना था,इसलिए मैने सबसे पहले उन्ही से बोला...
" भैया....कल मुझे वापस जाना है..."
"कहाँ..."
"आइयूéयूàन..."
"अब हिन्दी मे बोल..."
"चाइनीस मे आइयूéयूàन का मतलब कॉलेज होता है...मुझे कल कॉलेज जाना है..."
"तूने तो कहा था कि 15 दिनो के लिए यहाँ आया है..."
"आक्च्युयली...भैया वो क्या है कि..मैने भी यही सोचा था ,लेकिन फिर वो मैं, मुझे खुद मालूम..या मुझे..."
"ये तेरी आन्सर शीट नही है जो शब्दो को घुमा-घुमा कर भरेगा...अब जल्दी बोल.."

"फॉर्म भरना है..."मैने झट से जवाब दिया...और ये आइडिया मुझे सामने चल रहे बकवास और बोरिंग सीरियल से ही सूझा था...जिसमे एक माल दूसरे माल को एक पेपर पकड़ा कर साइन करवा रही थी....
"फॉर्म कैसा फॉर्म.."
"सेकेंड सेमेस्टर का...मेरे एक दोस्त का फोन आया था सुबह उसी ने बताया कि कल से फॉर्म मिलना चालू हो जाएगा..."
"तो लास्ट डेट मे भर लेना...उसमे कौन सी बड़ी बात है..."
"अरे भैया आप समझ नही रहे हो,...शुरू-शुरू मे भीड़-भाड़ बहुत कम रहती है, इसलिए जितना जल्दी भर दिया जाए...उतना ही सही है...."
विपिन भैया चुप होकर कुछ सोचने लगे और फिर मेरी तरफ देखकर बोले"तो फिर कल फॉर्म भरकर वापस घर आ जाना...सिंपल..."
"ठीक है,,,"अपने प्लान की भजिया बनते देख मैं वहाँ से उठा और अंदर आकर अंदर ही अंदर दहाड़ मारने लगा....
"लेकिन भैया...कल आने मे प्राब्लम है..."मैं वापस हॉल मे गया और विपिन भैया के साइड मे बैठकर बोला"दो-तीन दिन के लिए अब मैं क्या वापस आउन्गा...वही रुक जाउन्गा..."
"एक हफ्ते मे दो-तीन दिन होते है क्या..."
"नही "
"तो फिर ऐसा क्यूँ बोला कि दो तीन दिन के लिए क्या आएगा....कल सीधे से कॉलेज जाना और सीधे से वापस आना..."
"धत्त तेरी की...."
उसके अगले दिन ठीक वैसा ही हुआ,मैं घर से फॉर्म भरने के बहाने निकला और दिन भर घूम कर रात को 9 बजे,ट्रेन के टाइम पर रेलवे स्टेशन पहुच गया.....
"हो गया काम..."मुझे पिक अप करने के लिए आए विपिन भैया ने पुछा...
"हां...हो गया.."
"स्लिप कहा है..."
"स्लिप ???" मैं कुछ देर तक सोच मे पड़ गया की भैया किस स्लिप के बारे मे बात कर रहे...
"स्लिप बे..."
"धत्त तेरी की...वो तो मैं हॉस्टिल मे ही भूल आया..."
"अगली बार से ध्यान रखना..."एक कड़क आवाज़ मेरे कानो मे गूँजी...
"जी भैया..."
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वो 15 दिन मैने जैसे-तैसे बिताए...उन 15 दिनो मे मुझे ऐसा लगने लगा था कि जैसे वो 15 दिन 15 साल के बराबर हो...लेकिन अब मैं अपने कॉलेज वापस आ गया था, यानी कि सेकेंड सेमेस्टर मे...इस सेमेस्टर मे बहुत कुछ नया होने वाला था...कुछ अच्छा था तो कुछ बेहद बुरा....दीपिका मॅम का अब कोई पीरियड क्लास मे नही था, ये मेरे लिए एक बुरी खबर थी...कुछ लौन्डो ने कहा था कि रिज़ल्ट इस बार जल्दी आएगा ..ये भी मेरे लिए बुरी खबर थी....और इस वक़्त सबसे बुरी खबर ये थी कि मैं इस वक़्त हॉस्टिल मे अपने ही रूम के बाहर कंधे पर बॅग टांगे खड़ा था...क्यूंकी अरुण रूम से कहीं फरार था...वो घर से तो आ गया था,लेकिन अभी कहीं गया हुआ था....मैं पिछले 15 मिनट. मे 3 बार उसे कॉल लगा चुका था और हर बार वो यही जवाब देता कि बस 5 मिनट.
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घर से सोचकर आया था कि इस सेमेस्टर मे कुछ भी उल्टा सीधा नही करूँगा...ना तो लौंडियबाज़ी करूँगा और ना ही लड़ाई झगड़ा और दिन मे 3 सिगरेट से ज़्यादा नही पीऊंग....ये सेमेस्टर मेरे लिए एक दम नया था,क्यूंकी बहुत सी चीज़े नयी होने वाली थी जैसे कि न्यू सब्जेक्ट्स थे...कुछ नये टीचर्स, नये लॅब...वर्कशॉप एट्सेटरा. एट्सेटरा.

लेकिन सबसे ज़्यादा नयापन तो उस दिन लगने वाला था, जिस्दिन हमारा रिज़ल्ट आता..


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सेकेंड सेमेस्टर शुरू होने के एक दिन पहले मैं रात भर यही सोचता रहा कि कैसे मैं बेकार की चीज़ो को अवाय्ड करूँ, ताकि मैं ठीक वैसी ही स्टडी कर सकूँ,जैसे पिछले कयि सालो से करता आया था...मैने बहुत सोचा, रात भर अपना सर इसी सोच मे खपा दिया तब मुझे समझ आया कि इसकी जड़ तो मेरे रूम से ही शुरू होती है और यदि मुझे सुधरना है तो इसके दो ही रास्ते है, या तो खुद मैं रूम छोड़ दूं या फिर अरुण को दूसरे रूम मे शिफ्ट होने के लिए कहूँ....सल्यूशन एक दम सिंपल था...मैं जान चुका था कि मुझे क्या करना चाहिए, लेकिन मैने ऐसा नही किया...या फिर ये कहें कि मेरी हिम्मत ही नही हुई कि अरुण को मैं दूसरे रूम मे जाने के लिए कहूँ....मैने खुद ने भी रूम नही बदला, जिसका सॉफ और सुढृढ मतलब यही था कि मैं खुद भी उसी रूम मे अरुण के साथ रहना चाहता था और अपनी ज़िंदगी की जड़े खोदकर बाहर कर देना चाहता था.....
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नींद सुबह के 5 बजे लगी और जैसा कि अक्सर होता था मेरी नींद अरुण के जगाने से खुली...
"अबे ,फर्स्ट क्लास दंमो रानी की है, मरवाएगा क्या..."
"टाइम "
"सिर्फ़ 10 मिनिट्स..."
"क्या...सिर्फ़ 10 मिनिट्स..."मैं तुरंत उठकर बैठ गया और हाथ मुँह धोकर ,बालो मे थोड़ा पानी डाला और कॉलेज जाने के लिए तैयार हो गया....

वैसे तो इस सेमेस्टर मे सारे सब्जेक्ट ही न्यू थे,लेकिन कुछ टीचर्स वही थे जिन्होने फर्स्ट सेमेस्टर मे हमारा सर खाया था...दंमो रानी इस सेमेस्टर मे भी हमे बात-बात पर क्लास से बाहर भेजने के लिए तैयार थी ,कुर्रे सर और उनका"आप फिज़िक्स के खिलाफ नही जा सकते"डाइलॉग भी हमारे सर पर हथौड़ा मारने के लिए हमारे साथ था....साथ नही थी तो वो थी दीपिका मॅम, दीपिका मॅम के यूँ चले जाने से मुझे दुख तो नही हुआ लेकिन थोड़ा बुरा ज़रूर लगा था,क्यूंकी मैने अच्छा ख़ासा वक़्त उनकी लॅब मे बिताया था और वो वक़्त ऐसा था कि जिसे मैं कभी भूल नही सकता था, मैं ही क्या ,मेरी जगह यदि कोई और भी होता तो वो दीपिका मॅम को नही भूल पाता...क्यूंकी उसकी जैसे एक दम बिंदास रापचिक माल ,जो रिसेस मे आपका लंड चूसे उसे भूलना मुश्किल होता है और उस पल को भी जब ये सब हुआ
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08-18-2019, 01:42 PM,
#42
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
भू अभी तक घर से नही आया था और आज मैं और अरुण ही कॉलेज पहुँचे, क्लास वही थी और टीचर भी जानी पहचानी थी....
"ये दमयंती फिर,बाहर करेगी..."क्लास से जब हम दोनो थोड़ी दूर पर थे, तब मैने कहा...क्यूंकी इस वक़्त कॉरिडर पर सन्नाटा फैला हुआ था और क्लास भी बिल्कुल शांत थी,जिसका एक ही मतलब था कि दंमो रानी क्लास के अंदर मौज़ूद है....

वैसे तो मुझे 100 % श्योर था कि दंमो हम दोनो को क्लास मे घुसने नही देगी,लेकिन फिर भी ट्राइ करने मे क्या जाता है,ऐसा सोचकर मैं बोला"मे आइ कम इन...."

उसने हमे देखा और कुछ देर बाद बोली"कम इन, यदि थोड़ा लेट और हुए होते तो क्लास मे एंटर होने नही देती..."

"थॅंक यू मॅम..."बोलकर मैने और अरुण ने अपनी सीट पकड़ ली...

अब क्यूंकी मुझे पहले से ही मालूम था कि दीपिका मॅम से मिलना नही हो पाएगा तो मैं थोड़ा उदास सा था, क्यूंकी.....यदि सीधे लफ़ज़ो मे कहा जाए तो मैं उसे चोदना चाहता था...उसके मुँह मे, चूत मे अपना लवडा पेल देना चाहता था...और अब जबकि वो हमारे साथ नही है तो ये काम करना लगभग नामुमकिन था...क्यूंकी जो मैं सोच रहा हूँ,उसके हिसाब से उसने कोई दूसरा अरमान ढूँढ लिया होगा..जो रिसेस मे उसके साथ लॅब मे वक़्त बिताए, लेकिन मैं इतना तो पक्के तौर पर कह सकता हूँ कि उसे मेरी याद तो ज़रूर आएगी क्यूंकी हर लड़का....अरमान नही हो सकता और ना ही अरमान की तरह ब्रिलियेंट और हॅंडसम


खैर जो भी था पर सच यही था कि अब मुझे दीपिका को पूरी तरह से भूल कर आगे बढ़ना होगा, दूसरा ख़याल ये आया कि एश और गौतम की प्रेम कहानी को कैसे तोड़ा जाए, क्यूंकी छुट्टियो के दिनो मे तो उन दोनो ने बहुत समय साथ बिताया होगा.....
"हे...यू..."
"यस सर..."खड़े होते हुए मैने कहा और सामने देखा , हमारी दंमो रानी से कुर्रे सर ने पोज़िशन कब एक्सचेंज कर ली ,इसका मुझे पता तक नही चला और इस वक़्त मेरे सामने कुर्रे सर थे...
"कहाँ देख रहे हो..."
"कही नही...."
"मैं तुम लोगो को पढ़ने के लिए कल रात भर 3-3 बुक्स से पढ़कर आया हूँ और तुम सामने देखने की बजाय नीचे सर झुकाए बैठे हो...लकवा मार गया है क्या..."

"वो सर,मैं अपना पेन निकाल रहा था बॅग से..."

"पर बॅग तो तुम्हारा डेस्क के उपर है, नीचे कहाँ से पेन निकाल रहे थे..."

"बॅग से निकालते वक़्त नीचे गिर गया था, तो उठा रहा था...."

"बाहर जाओ, मैं नही चाहता कि किसी एक की वजह से पूरी क्लास डिस्टर्ब हो..."

"क्या सर..."

"गेट आउट...."कुर्रे ने अपनी लाल होती आँखो से मुझे घूरते हुए कहा...

"साले कल्लू, तेरी माँ की चूत...बोसेडीके,म्सी,बीसी"साइलेंट मोड मे अपने होंठ हिलाते हुए मैं क्लास से बाहर आया....


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मैं वाकई मे सुधरना चाहता था, घर मे बिताए हुए 15 दिनो ने मेरे अंदर एक गहरी छाप छोड़ी थी....लेकिन इस वक़्त मैं क्लास के बाहर खड़ा होकर होड़ को गाली दे रहा था,क्यूंकी होड़ सर आज ,उस कल्लू कुर्रे की क्लास ख़त्म होने से पहले ही आ पहुँचे थे और मुझे क्लास के बाहर देखकर उन्होने रीज़न पुछा...तो मैने सच बता दिया कि मैं क्लास मे ध्यान नही दे रहा था ,इसीलिए कुर्रे सर ने मुझे बाहर भगा दिया....

"मेरी क्लास मे भी मत आना अब, समझे..."

"तेरी माँ की...."सर झुकाकर मैं बोला"ओके सर..."

और अब मैं लगातार दो पीरियड भर क्लास के बाहर था...उपर से होड़ सर ने ये भी कहा था कि मैं क्लास के गेट के सामने ही खड़ा रहूं, ताकि वो और पूरी क्लास जब बोर हो जाए तो मुझे देखकर अपना टाइम पास कर सके...मैं क्या करता,होड़ सर की बात टाल कैसे सकता था आख़िर मेरा सारा लेखा जोखा तो उन्ही के हाथ मे था...मैं पूरी पीरियड भर गेट के सामने खड़ा रहा और रिसेस होने का इंतज़ार करता रहा...हमारी हर एक क्लास 50 मिनिट्स की होती थी ,तो उसके हिसाब से मैं पूरे एक घंटे 40 मिनिट्स तक बाहर खड़ा रहा, और इस बीच पैर इतना दर्द देने लगा कि ,रिसेस होने के बाद मैं तुरंत अपने बेंच पर जाकर लेट गया, अपने बेंच पर पैर फैलाए तो वो बगल वाली बेंच से जा टकराए ,और मैने बिना किसी की परवाह किए हुए दो-दो बेंच पर पैर पसारे और तब तक लेटा रहा, जब तक अरुण बाहर से घूम फिरकर मेरे पास नही आ गया....
"ओये, उठ...बाहर तेरी माल है..."
"कौन..एश..."मैं तुरंत उठकर बैठ गया...
"नही,शेरीन है...."
"सच बता..."
"एश है, लेकिन उसके साथ मे गौतम भी है...."

"तो क्या मैं डरता हूँ उससे ,जो मुझे बता रहा है..."मैं एक दम जोश मे खड़ा हुआ फिर बोला"चल आ बाहर चलते है..."
हम दोनो बाहर आए, बाहर कॉरिडर मे हमारे क्लास के कुछ और लड़के थे,जो अनाप-सनाप बाते करके अपना टाइम पास कर रहे थे...मैं और अरुण भी उनके उस अनाप-सनाप गॉसिप मे शामिल हो गये....
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अपने दोस्तो से बाते करते हुए मैं बीच-बीच मे एश की तरफ देखता, वो गौतम के साथ दीवार की टेक लिए हुए बाते कर रही थी...मैं ,जो कि अब सारीफ़ नही रहा , एश को देखते ही इतना एमोशनल कैसे हो जाता हूँ ,ये मेरी समझ के उस वक़्त भी बाहर था और अब भी बाहर है....उस वक़्त मैं एश को देखकर यही सोच रहा था कि "क्या उसे कोई फरक नही पड़ता मेरे होने या ना होने से.. या फिर वो मुझे ये शो नही करती...इतनी दिन की लड़ाई को वो इतनी जल्दी तो नही भूल सकती...."
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मैं आगे भी बहुत कुछ सोचता यदि गौतम के मोबाइल की रिंग ना बजी होती, जनरली कॉलेज मे सभी अपना मोबाइल साइलेंट ही रखते थे,लेकिन उस उल्लू ने ऐसा नही किया हुआ था...उसने कॉल रिसीव की और फिर एश की तरफ इशारा करते हुए बोला कि उसे जाना पड़ेगा.......
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"साले की क्या किस्मत है...वो उसे छोड़ के जा रहा है, तब भी वो उसी के साथ चिपकी रहेगी और इधर मैं उसके लिए इंजिनियरिंग तक छोड़ने को तैयार हूँ,लेकिन वो एक नज़र उठा कर देखती भी नही..."
"कुछ ज़्यादा नही हो गया..."
"सच...ले फिर मैं ऐसे बोल देता हूँ कि मैं उसके लिए सिगरेट छोड़ने को तैयार हूँ...."

"बेटा,मैने तो पहले ही कहा था कि ,इस लौंडिया के चक्कर मे मत पड़...यदि इसकी जगह तूने दीपिका मॅम को तीन-तीन लॅंग्वेज मे आइ लव यू बोला होता तो...अब तक तू उसे तीन बार ठोक चुका होता...वो तेरा इतना ख़याल रखती जैसे कि वो तेरी बीवी हो...मस्त चुदवाती और अपनी सॅलरी का कुछ हिस्सा तुझे ऐश करने के लिए भी देती...इससे हमारा भी कुछ भला हो जाता..."

एक पल के लिए मुझे भी यही लगा कि मुझे एश को छोड़ कर दीपिका मॅम पर ध्यान देना चाहिए था लेकिन उसके अगले पल ही मैने एश को ,जो की अब अकेली खड़ी थी,उसे देखते हुए अरुण से बोला...
"नही यार..."
"क्या नही..."
"दीपिका मॅम, मालदार भी है और शानदार भी...लेकिन उनमे वो बात नही है...."
"एश से तो हर क्वालिटी और क्वांटिटी मे दीपिका मॅम बेटर है..."
"दीपिका मॅम को देखकर लंड खड़ा होता है, दीपिका मॅम को जब भी देखता हूँ तो नज़र सीधे उनके सीने,चूत,गान्ड पर ही जा के रुकती है....लेकिन एश को देखकर लेफ्ट साइड धड़कता है...आइ लव हर यार,तू मान या ना मान..."

"चल प्रूव कर..."

"कैसे..."

"मैं एक काम बोलूँगा और तुझे वो करना पड़ेगा...."

"कैसा काम"मैने आर्मी स्टाइल मे तन्कर खड़ा होते हुए अरुण से पुछा..

"ऐसी शकल क्यूँ बना रहा है,मैं तुझे यहाँ से नीचे कूदने के लिए नही बोलूँगा ,बेफिकर रह..."फिर अपने होंठो पर मुस्कान लाते हुए अरुण बोला"कभी एश को टच किया है..."

"ह्म्‍म्म...ना,कभी नही,बिल्कुल भी नही,ज़रा सा भी नही...एश को तो बस देखा है..."

"आज एश को जाकर छु के दिखा..."

"पागल है क्या बे, सबके सामने इज़्ज़त की वॉट क्यूँ लगवा रहा है..."

"हज़ार की शर्त है..."

"घंटा मुझे हज़ार रुपये से ज़्यादा अपनी जान प्यारी है...वो मेरा खून कर देगी..."

"फिर तो मैं यही समझूंगा कि ,तेरी मे वो दम नही है...जो रोमिओ मे उसकी जूलिएट के लिए था, मजनू मे उसकी लैला के लिए था, रांझा मे उसकी हीर के लिए था..."

"देख ,तू मुझे जानता नही...यदि मैं चाहू तो अभी इसी वक़्त उसे किस कर लूँ और वो मुझे कुछ बोलेगी भी नही..."

"पहले तो उसे उसकी मर्ज़ी से टच करके दिखा..."

"मैं उसे नही,वो मुझे टच करेगी...लेकिन एक शर्त पर, शर्त हज़ार की नही दो हज़ार की होगी..."

"डन..."अरुण खुश होते हुए बोला...
.
अब जब अरुण के सामने अपनी शेखी झाड़ ही आया था तो उसे अब सही भी साबित करना था...वरना अच्छी ख़ासी रेप्युटेशन की धज्जिया उड़ जाती...मैं अपने दिमाग़ मे एक प्लान बनाते हुए धीरे-धीरे एश की तरफ बढ़ा...वो अब भी वहाँ अकेली खड़ी थी और किसी से फोन मे बात कर रही थी, मैं उससे लगभग एक मीटर की दूरी पर खड़ा हुआ और इंतज़ार करने लगा उस वक़्त का,जब वो कॉल कट कर दे....जैसे ही उसने ऐसा किया,मैं धीमी आवाज़ मे गुनगुनाया...
"तुम्हारी नज़रों मे हमने देखा...अजब सी चाहत झलक रही है..."

वो एक बार मेरी तरफ पलटी और मुझे देखते ही गुस्से से भर गयी, मैं उसके करीब गया और एक बार फिर से वही गाना गुनगुनाया....
"क्या है..."
"तुझे कही देखा है, कल हॉस्टिल मे तू ही झाड़ू लगा रही थी ना..मेरा रूम सॉफ करना भूल गयी,"

"दिमाग़ तो सही है..."दाँत चबाते वो बोली...

"मज़ाक था..."

"मज़ाक उनसे किया करो,जो तुम्हारे दोस्त हो..."

"तू सच मे चुड़ैल है,..डायन कही की..."

"शट अप...."

"अपना तो सुबह से शट डाउन है..."मैं उसके और करीब जाते हुए बोला"ये तेरा बाय्फ्रेंड,मुझसे डरता बहुत है...मैं जैसे ही क्लास से बाहर आया तो वो खिसक लिया..."

"वो किसी से नही डरता.."

"और ये तुम्हे कैसे मालूम ?"

"क्यूंकी मुझे मालूम है कि वो यहाँ से क्यूँ गया..."

"क्यूँ...?"

"क्यूंकी उसे फेरवेल पार्टी अरेंज..."बोलते हुए वो रुक गयी "एक्सक्यूस मी, मैं तुम्हे क्यूँ बताऊ कि वो यहाँ से क्यूँ गया..."

"चल गुस्सा छोड़..और बता कैसी बीते हॉलिडे..."

"दट डज़न्ट युवर बिज़्नेस..."

"कुछ नया ,कुछ पुराना कुछ तो बता..."

"दट डज़न्ट युवर बिज़्नेस..."

इसी बीच मैने एक नज़र दूर खड़े अरुण पर डाली,जो अपनी घड़ी मे इशारा करके मुझे बता रहा था कि रिसेस का टाइम जल्द ही ख़त्म होने वाला है...मैं एश से और भी बाते करता, उसका सर खा जाता...लेकिन टाइम की कमी की वजह से मैं सीधे पॉइंट पर आया,...

कुछ दिन पहले जब मैं घर मे था तो सर से स्ट्रेस दूर करने के तरीके इंटरनेट पर तलाश रहा था,तभी मुझे कुछ ऐसा मिला जिसके द्वारा हम किसी भी शक्स को कुछ पल के लिए हिप्नोटाइज़ड कर सकते है, इसका असर सामने वाले शॅक्स पर 5 से 10 सेकेंड्स तक रहता है और इस हाइप्नॉटाइज़ को अप्लाइ करने के लिए बस कुछ ऐसा कहना पड़ता है,जिसे सुनकर सामने वाला कुछ देर के लिए होश खो बैठे....इस तरह से हाइप्नॉटाइज़ करने के लिए अलग ही टोन मे बोलना पड़ता था, जो की डिपेंड करता था कि आप किसी मेल को हाइप्नॉटाइज़ कर रहे है या किसी फीमेल को....इधर एश को भी टाइम का अंदाज़ा हुआ तो वो क्लास के अंदर जाने के लिए हुई,लेकिन मैने उसे आवाज़ दी...

"आइ'म नोट इंट्रेस्टेड टू टॉक वित यू..."

"तेरे इश्क़ की वजह से यदि कोई मेरे सीने मे खंज़र खोंप दे या फिर दिल निकाल कर अंगारो के बीच रख दे..."उसके बाद मैने आवाज़ तेज़ और भारी करते हुए कहा" तेरे इश्क़ की वजह से यदि कोई मेरे सीने मे खंज़र खोंप दे या फिर दिल निकाल कर अंगारो के बीच रख दे..तो मुझे इसकी ज़रा सी भी परवाह नही...,लेकिन तेरी आँखो से आँसू का एक बूँद भी निकला तो वो मेरे लिए कयामत है..."

मेरा फ़ॉर्मूला एक दम फिट बैठा था, मेरे बोलने के अंदाज़ से एश एक दम शांत होकर मेरी आँखो मे देखती रही और तभी मैने अपना एक हाथ उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा"दे ताली...इसी बात पर..."

उसने वैसा ही किया और अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया..और जब उसका हाथ मेरे हाथ से छु गया तो मैं तुरंत वहाँ से अरुण की तरफ बढ़ चला....

"क्यूँ बे,हार्ट अटॅक आ गया ना, दो हज़ार गँवाने के बाद..."

"तू तो भाई है अपना...तू अब मेरे से पैसे लेगा क्या..."
.
मैं आगे की कहानी भी नोन-स्टॉप सुनाए जाता यदि उसी वक़्त निशा का कॉल ना आया होता तो, इस वक़्त शाम के 5 बजे थे और बाहर का मौसम बादल के घिरे होने से एक दम बढ़िया था और मन को सुकून देने वाला था
"हां,निशा..."मैने कॉल रिसीव की..


.
"कहाँ हो अरमान...फॅक्टरी से निकल गये..."

"नही तो...तुम्हे ऐसा क्यूँ लगा कि मैं फॅक्टरी से निकल चुका हूँ.."

"आज वो कान को फाड़ कर रख देने वाली आवाज़े नही आ रही ,इसलिए....वैसे जानेमन हो कहाँ..."

"जानेमन....कल रात के बाद आवाज़ काफ़ी बदली-बदली सी लग रही है..."उसे छेड़ते हुए मैने कहा"भूलो मत कि दो हफ्ते बाद तुम्हे देखने के लिए तुम्हारे पातिदेव आ रहे है,कुछ तो उनके लिए बचा कर रक्खो..."बोलते हुए मैं हंस पड़ा...

"तुम्हारे रहते हुए,उस चपडू की ज़रूरत...कहो तो मामला फिट करूँ..."

"कैसा मामला..."मैं बोला...

इस वक़्त मेरे मोबाइल का लाउडस्पिकर ऑन था और अरुण ,निशा की बाते सुनकर बड़ा खुश हो रहा था...उसने दबी हुई आवाज़ मे कहा कि मैं उसे हां बोल दूँ...लेकिन मैने ऐसा नही किया...
"कैसा मामला..."मैं बोला...
"हम दोनो का मामला "
"क्या....मतलब कि..."
"मतलब कि, तुम चाहो तो हम दोनो ज़िंदगी भर....."फिर वो चुप हो गयी, और इधर मैं भी चुप चाप मोबाइल को कान से लगाए हुआ था...मुझे कल ही ये अंदाज़ा हो चला था कि निशा ऐसा ही कुछ बोलेगी...लेकिन इतनी जल्दी.....ये मैने नही सोचा था....
"तुमने जवाब नही दिया..."हम दोनो के बीच की चुप्पी को तोड़ते हुए वो बोली...

"निशा, आक्च्युयली अभी कुछ काम आ गया है, शाम को बात करता हूँ..."बोलते हुए मैने तुरंत मोबाइल की रेड बटन दबा दी.....
मैं अब ये सोच रहा था कि मेरे दोनो दोस्त जो कुछ देर पहले तक निशा से मेरी बात-चीत को बड़े गौर से सुन रहे थे...वो अब मुझे अपनी सलाह देंगे...लेकिन साले बड़े कमीने निकले...मैने मोबाइल अपनी जेब मे घुसाया और इंतज़ार करने लगा उनकी सलाह का....
"अबे बकलुंडो, कुछ तो बको..."जब कुछ देर तक दोनो मे से कोई नही बोला तो मैं झल्लाया...

"अरमान,...मुझे नही लगता कि तू सच बोल रहा है..."

"कैसा सच "

"यही की उस दिन तूने एश को हिप्नोटाइज़ड किया था..."वरुण अपनी जगह से उठकर मेरे पास आया "तू साले हमे चोदु बना रहा है...तूने ज़रूर एश से कहा होगा कि वो अपना हाथ तेरे हाथ मे दे दे, बदले मे तू उसे शर्त के आधे पैसे दे देगा....आम आइ राइट अरुण अंकल..."

अरुण तो था ही इसी मौके की तालश मे ,वो उछाल कर वरुण का साथ देने आया"मुझे तो उसी दिन इसपर शक़ हो गया था..."

"अबे गधो...वो खन्ना की एकलौती बेटी थी, वो हज़ार रुपये के शर्त के लिए मेरा साथ क्यूँ देगी..."

"लेकिन फिर भी मैं नही मानता कि तूने उसे हिप्नोटाइज़ड किया था...यदि किया था तो ले मुझे भी हिप्नोटाज़ड़ कर..."

"उसे हिप्नोटाइज़ड नही कहते...."

"अब आया ना बेटा लाइन पर...."

"उसे कुछ और ही कहते है,क्या कहते है...मालूम नही,लेकिन उसके ज़रिए कुछ देर तक सामने वाला शक्स शॉक्ड हो जाता है...मुझे उस वक़्त मालूम था कि एश मेरे द्वारा कहे गये प्यार के उन दो मीठे बोल से शॉक्ड हो जाएगी..."

"तो बात तो घूम फिर कर वही आ गयी ना ,हिप्नोटाइज़ड पर...या जो भी कहते हो उसे...तू सच-सच बता कि तूने एश से क्या कहा था उस दिन.."

"बता तो दिया कि क्या कहा था..."
"मैं नही मानता..."
"तो मत मान ,मुझे क्या..."बोलकर मैं वहाँ से उठा...तभी वरुण शेर की तरह दहाड़ मारकर बोला...

"यदि सच नही बताया तो ,अभिच निशा को कॉल करके बोल दूँगा कि तू सुबह से यही पड़ा है...."

"अबे पागल है क्या...रुक अभी तेरा डाउट क्लियर करता हूँ..."

मैने अरुण और वरुण दोनो को बाल्कनी की तरफ बुलाया और हमारे फ्लॅट के सामने से जो छोटी सी गली निकली हुई थी उसपर अपना शिकार ढूँढने लगा और तभी मुझे मेरे फ्लॅट की तरफ आ रहा एक लड़का दिखा.....

"अपना सर बचा कर...."बोलकर मैं अंदर गया और एकलौता हेल्मेट जो दीवार पर टंगा हुआ था ,उसे लेकर वापस बाल्कनी की तरफ आया....

"तू करने क्या वाला है..."

"वो तो आगे ही पता चलेगा..."
इसके बाद जो लड़का हमारे फ्लॅट की तरफ आ रहा था ,वो जब थोड़ी दूर पर था तो मैने उसे आवाज़ दी और ठीक नीचे आने के लिए कहा....

"क्या है..."वो लड़का बोला...
"तेरा बाप मर गया है, वापस जा..."मैने ज़ोर से बोला और अपना चेहरा रोने जैसे बना लिया....जबकि ना तो मैं उसे जानता था और ना ही उसके बाप को....
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08-18-2019, 01:42 PM,
#43
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
मेरा ये कहना था कि उस लड़के की फॅट के हाथ मे आ गयी वो मुँह फाडे बाल्कनी की तरफ हम तीनो को देख रहा था...

"डर मत,मज़ाक था...इन दोनो ने मुझे ऐसा कहने के लिए कहा...अब तू चाहे तो नीचे पड़ा पत्थर उठा कर इन दोनो का सर फोड़ दे...."

मैने हेल्मेट लगा ली और उसके तुरंत बाद वो लड़का गुस्से से हमारी तरफ देखा और माँ-बहन की गाली देकर पत्थर से भी मारा...जो सीधे जाकर वरुण के छाती मे लगा....

"रुक भोसड़ी के भागता कहाँ है..."उस लड़के को भागते हुए देख वरुण चिल्लाया....
"अब आया बेटा यकीन..."
"याहह..."अपनी छाती सहलाते हुए वरुण बोला"हां...अब डाइरेक्ट रिज़ल्ट वाले मोमेंट पर पहुच..."

"रिज़ल्ट..."ये सुनकर मेरी हालत ठीक वैसी हो गयी,जैसे चार साल पहले हुई था...कितना खौफनाक पल था,जब मेरे कान मे किसी ने कहा कि "रिज़ल्ट आ गया है और तू..."उसके बाद मैने उसका मुँह पकड़ कर दूसरी तरफ फेर दिया था और सॉफ कहा था कि मैं खुद केफे मे जाकर अपना रिज़ल्ट देखूँगा.....
.
जो हालत उस वक़्त मेरी थी वो हालत अरुण की भी थी...हम दोनो का गला सूख गया था..जब हमे पता चला कि रिज़ल्ट आ गया है...भू की गान्ड हम दोनो से ज़्यादा फटी पड़ी थी, उसकी तो बात करने तक की हिम्मत नही हो रही थी,जबकि वो एग्ज़ॅम ड्यूरेशन मे दिन भर किताबो से चिपका रहता था....मैं और अरुण किसी तरह से एक दूसरे का धीरज बाँधते हुए केफे की तरफ बढ़े...एक बार फिर मेरी हालत वही थी जो एग्ज़ॅम के समय मे हुई थी...कभी पांडे जी याद आते तो कभी पांडे जी की बेटी...तो कभी घर का महॉल....

"यार ,अरमान...मेरा बाप जैल मे डाल कर डंडे से मारेगा मुझे..."

"मेरा भी कुछ यही हाल होगा..."

उस वक़्त मुझे खुद के रिज़ल्ट से ज़्यादा परवाह पांडे जी की बेटी के रिज़ल्ट की थी..मैं उपरवाले से प्रार्थना कर रहा था कि पांडे जी की बेटी या तो फैल हो जाए या फिर मेरे से कम नंबर लाए...

कितनी अजीब बात है कि जिसे मैने आज तक देखा नही ,उसके बारे मे मैं इतना बुरा सोच रहा हूँ...और ऐसा सोचने वाला शायद मैं अकेला नही था...हमारे घरवाले अक्सर किसी ना किसी लड़का/लड़की को हमारे ऑपोसिट खड़ा कर देते है और ऐसे रिएक्ट करते है जैसे कि प्राइम मिनिस्टर का एलेक्षन हो,और हमे हार हाल मे सामने वाले को हराना है....मैं पांडे जी की बेटी के बारे मे पहली बार बुरा नही सोच रहा था, पिछले 2-3 सालो से मैं जब भी भगवान का नाम लेता तो एक दुआ हमेशा माँगता कि पांडे जी की बेटी मुझसे कम नंबर लाए...वो फैल हो जाए...या फिर उसके साथ कुछ ऐसा हो जाए जिसकी वजह से वो एग्ज़ॅम ही ना देने पाए....
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आज से पहले मैं एग्ज़ॅम देने के बाद हमेशा इसी इंतज़ार मे रहा कि रिज़ल्ट कब आएगा...लेकिन अबकी बार मैं चाह रहा था कि रिज़ल्ट कभी आए ही ना....जहाँ कॉपीस चेक होने गयी है,वहाँ डाका पड़ जाए,आग लग जाए...या कुछ भी ऐसा हो जाए,जिससे रिज़ल्ट रुक जाए....लेकिन ये मुमकिन नही था....और आज वो दिन था जब रिज़ल्ट मेरे आँखो के सामने अपना प्रचंड रूप दिखाने वाला था.....

आज से पहले ,जब मेरे घरवाले मेरे मार्क्स देखते तो तुरंत सारी दुनिया मे कॉल करके पुछ्ते की आपके बेटी का कितना नंबर आया, आपके बेटे के रिज़ल्ट का क्या हुआ....और उसके बाद बड़े शान से कहते थे कि "अरमान के तो इतने % आए है,इसने स्कूल मे टॉप मारा है....प्रिन्सिपल सर ने कॉल करके खुद बधाई दी है..."

"यार अरुण...."

"क्या है..."

"गला सूख रहा है भाई...आजा थोड़ा पानी वानी पी लेते है..."

इस वक़्त हम दोनो हाइवे पर पहुच चुके थे और वही पास एक अच्छा-ख़ासा होटेल बना हुआ था...मैने दो कप चाय लाने के लिए कहा और अरुण के साथ चुप चाप वही टेबल पर बैठ गया....
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मुझे उस वक़्त चाय भी नीम के रस से ज़्यादा कड़वा लग रहा था, चाय का हर एक घूट ऐसे लगता जैसे कि दुनिया की सबसे कड़वी चीज़ उस चाय मे मिला दी गयी हो...तीन चार घूट के बाद जब मुझसे चाय नही पिया गया तो मैं अरुण के साथ वहाँ से उठा...और केफे की तरफ चल पड़ा, जो हमसे बमुश्किल 5 मिनिट्स की दूरी पर था...

"अरमान,इस बार रिज़ल्ट अच्छा आ जाए तो कल से ही पढ़ाई शुरू कर दूँगा..."

"तू और मत फाड़ बे, ऐसा लग रहा है कि कोई लगातार सीने मे हथौड़ा पीट रहा हो...साला कही हार्ट अटॅक ना आ जाए..."
केफे तक पहुचते पहुचते मैं हल्का-हल्का काँपने लगा था , वहाँ पहले से ही बहुत भीड़ थी, 10 मिनिट्स तक खड़े रहने के बाद एक सिस्टम खाली हुआ तो हम दोनो उसपर बैठे और यूनिवर्सिटी की साइट खोली...जहाँ "बी.टेक फर्स्ट सेमेस्टर रिज़ल्ट" के आगे लाल रंग का टॅग चमक रहा था....

"अरुण आगे तू देख..."

"ना तू देख...यदि तू फैल हुआ तो तसल्ली तो होगी मुझे "

गाली देने का मन तो बहुत किया लेकिन मैने गाली देने की बजाय सीधे अपना रोल नंबर टाइप किया और जैसे ही रिज़ल्ट खुला...मैं एक दम नीचे पहुच गया,जहाँ पास ऑर फैल लिखा रहता है...और उसके बाद मैं खुशी से ऐसे कुदा जैसे वर्ल्ड कप जीत लिया हो और फाइनल मॅच का मॅन ऑफ थे मॅच मैं ही हूँ.....मैने एक बार फिर कंप्यूटर स्क्रीन पर नज़र डाली, वहाँ सच मे पास लिखा हुआ था...और अब बारी थी अरुण और भू की.....


मुझे इस वक़्त कुछ भी नही सूझ रहा था कि मैं क्या करूँ, खुश होकर नाचू या फिर चुप चाप वही बैठा रहूं...केफे मे मेरे आलवा भी बहुत लोग थे और मेरी इस हरकत पर वो मुझे पागल बोलकर बाहर भी फेक सकते थे,इसलिए मैं शांति से अरुण के साइड वाली चेयर पर शांति से बैठ गया...मेरे इस तरह शांति से बैठने का एक रीज़न ये भी था कि अरुण का मॅतमॅटिक्स मे बॅक लगा था, यानी कि फैल !!!

"होता है बे, टेन्षन नही लेने का..."उसका दिल रखने के लिए मैने उससे कहा"मर्द बन और अंकल जी को बिंदास फोन करके बता कि एक मे बॅक लगी है..."

"वही करना पड़ेगा अब...."

अरुण को देखकर मुझे नही लगा कि फैल होने से उसे कुछ ज़्यादा एफेक्ट पड़ा है, जहाँ वो रिज़ल्ट देखने के कुछ देर पहले तक लगभग कांप रहा था अब वही वो हल्का सा उदास था बस.....उसने उसी वक़्त अपने इनस्पेक्टर बाप को कॉल करके सब कुछ बता दिया और अब मेरी बारी थी घर मे कॉल करने की....
.
मैं पास तो हो गया था लेकिन बहुत ही बुरी तरीके से फँसा था, कयि सब्जेक्ट्स मे तो मैं पास और फैल की बाउंड्री लाइन पर था...मैने एक बार एसपीआइ पर नज़र मारी....

"6,9...धत्त तेरी की अब तो चुदे ढंग से, कहाँ घर वाले 9 पॉइंट + की उम्मीद लगाए बैठे है और इधर एसपीआइ 7 ही क्रॉस नही हुआ...बीसी ,मुझे शुरू से ही ध्यान देना चाहिए था...उपर से वो कुत्ति पांडे की लौंडिया....अपनी चूत मरवा-मरवा कर अधिक नंबर लाई होगी,साली छिनार..."
.
मैं घर फोन करने की सोच ही रहा था कि घर से ही कॉल आ गया, मैं कुछ देर तक मोबाइल को हाथ मे पकड़ कर देखता रहा और सोचता रहा कि कॉल पिक अप करूँ या रहने दूँ.....

"हटा, बाद मे मैं खुद ही कॉल करके रिज़ल्ट बता दूँगा...और वैसे भी कौन सा अच्छा रिज़ल्ट आया है ,जो मैं तुरंत बताऊ..."

"अबे मेरी बॅक लगी है फिर भी मैने अपने घर मे बता दिया और तू पास होकर भी डर रहा है,साले डरपोक...बी आ मर्द ! उठा फोन एक झटके मे बता दे "
"उठा लूँ..."
"बिल्कुल..."
"सच मे उठा लूँ..."
"अब तुझे टाइप करके दूं क्या..."
"अच्छा ठीक है..."
मैने जब अपना रिज़ल्ट घर मे बताया तो मेरे पापा जोरो से मुझ पर चीखे ,ईवन कयि तरह की धमकिया भी दी....उसके बाद जब भाई ने फोन थामा तो डीटेक्टिव बनकर बात करने लगा....मेरा बड़ा भाई मेरी इस बर्बादी के पीछे की वजह की तहक़ीक़त करने के लिए जल्द ही मेरे कॉलेज आएगा ....ऐसा उसने फोन पर बताया....आधे घंटे बाद फोन मेरी माँ के हाथ मे पहुचा और हमेशा की तरह उनका एक ही डाइलॉग था...
"पांडे जी की बेटी का 9.3 बना है,अब क्या बोलेंगे उसको..."

"ओके,अब फोन रखता हूँ...बॅलेन्स ख़त्म हो रहा है..."बोलते हुए मैने कॉल कट कर दी और तब मुझे ध्यान आया कि कॉल तो उधर से आया था...फिर मेरा बॅलेन्स कैसे कम होगा...
.
भू ने 7.5 एसपीआइ मारा था और नवीन ने 7.7...इन दोनो को बुक्स से चिपके रहने का फ़ायदा मिल चुका था...लेकिन इधर मेरी और अरुण...दोनो की हालत खराब थी, अरुण के 7.2 बने थे...लेकिन मॅतमॅटिक्स मे उसका बॅक था ,मेरे ऑल सब्जेक्ट क्लियर थे...लेकिन एसपीआइ 7 पॉइंट भी नही था , और उस वक़्त अपुन ने प्रतिग्या ली की कुछ भी हो जाए अब पढ़ाई करना ही है....जबकि मैं उस वक़्त जानता था कि ऐसा अब हारक़िज़ नही हो सकता...क्यूंकी मुझमे जो चेंजस फर्स्ट सेमेस्टर मे आए थे वो सभी इरिवर्सिबल थे , मतलब कि अब मैं जो हूँ,आने वाले सालो मे भी ऐसा ही रहने वाला था....कोई मुझे किसी भी रिक्टेंट्स की मदद से पहले जैसा नही बना सकता था...एक बार बदहाली की आदत लग जाए तो उसे फिर खुद से दूर करना बहुत मुश्किल है....मैं ये बखूबी जानता था कि मैं किस राह पर चल रहा हूँ, मैं ये भी जानता था कि ये राह मुझे किस मंज़िल तक ले जाएगा...लेकिन फिर भी मैने वो राह नही बदली....
.
मुझे पूरा यकीन है कि यदि मैने खुद को बदलने की थोड़ी सी भी कोशिश की होती तो आज मायने कुछ और होते,मैं कही और होता और मेरे अरमान भी कही और होते....मेरे पापा को अब भी यकीन नही हो रहा था कि मेरे इतने कम मार्क्स कैसे आ गये, और मुझे यकीन नही हो रहा था कि मैं पास कैसे हो गया एग्ज़ॅम तो काला अक्षर भैंस बराबर गया था, यानी कि एग्ज़ॅम मे जो क्वेस्चन नही पुछा गया था ,मैने उसका भी आन्सर लिख दिया था या फिर ये कहे कि मुझे जिस यूनिट से जो बाँटा था मैं क्वेस्चन नंबर डालकर वही छाप मारा....मतलब सॉफ था कि कॉपी की चेकिंग एक दम ईज़ी हुई थी


बाकी सब्जेक्ट्स मे तो मैने फिर भी बहुत कुछ लिखा था,लेकिन ड्रॉयिंग के पेपर मे तो मैने सामने वाले लड़के की ड्रॉयिंग शीट देखकर उल्टी-सीधी,आडी-टेढ़ी लाइन्स खींचकर सिर्फ़ ड्रॉयिंग बनाई थी, हम दोनो के बीच डिस्टेन्स इतना था कि मुझे ये तक मालूम नही चल पा रहा था कि वो किस क्वेस्चन की ड्रॉयिंग बना रहा है...आंड अट दा एंड ,मैने अपने मन से क्वेस्चन नंबर दे डाला....लेकिन फिर भी साला मैं पास हो गया

मेरे घरवाले भले ही मेरे रिज़ल्ट को लेकर नाराज़ हो लेकिन मैं बहुत खुश था,क्यूंकी मुझे मालूम था की मैने इस पूरे सेमेस्टर मे सिवाय बक्चोदि कुछ भी नही किया था....जिस दिन रिज़ल्ट निकला उस दिन मैं बहुत खुश था,इतना खुश कि यदि उस वक़्त कोई मुझसे मेरी जान भी माँग ले तो मैं उस वक़्त उसे हां कर दूँ,बाद मे भले ही पिछवाड़े मे चार लात मारकर भगा दूँ....
.
दूसरे दिन कॉलेज पहुँचे तो सभी टीचर पढ़ाने की बजाय हर एक को खड़ा करके उसका रिज़ल्ट पुछ रहे थे, जिनका बॅक नही था ,जैसे कि मेरा ,वो शान से खड़े होते और सीना तानकर बोलते "एसी"
और जिनका बॅक लगा था वो यही चाह रहे थे कि उनका नंबर ही ना आए ,लेकिन ऐसा हो नही सकता था और हुआ भी नही....इस वक़्त क्लास दमयंती की थी और उसने मेरे बाद अरुण को खड़ा किया....
"जी मॅम..."
"जी मॅम, क्या...एसी या अब..."
"अब मतलब..."
"ऑल बॅक...आज तक मालूम नही था क्या "दंमो रानी अपनी नज़र से फाइयर करते हुए बोली..
"एक मे लुढ़क गया मॅम.."
"बैठो...पढ़ोगे-लिखोगे नही तो इससे भी बुरा हाल होगा...अभी ये हाल है तो बाद मे क्या होगा..."
.
और उसके बाद अरुण जैसे बैठा मैने उसके मज़े लेने शुरू कर दिए....

"बेटा देख ,मैं बिना पढ़े एसी हूँ और तू दिन रात रट्ता मारने के बाद भी चुद गया..."

"एसपीआइ ज़्यादा है तेरे से..."अरुण बोला..

"इस सेमेस्टर मे ,वो भी क्रॉस कर दूँगा...लेकिन बात यहाँ बॅक की है...वो देख नवीन भी एसी, अपना भोपु भी एसी....बस तू ही एक चोदु फँसा है हमारे फ्रेंड सर्कल मे जो फैल हो गया....पहले मुझसे बात मत करना तू..."

"देख एक काम कर...चुप चाप काल्टी हो जा...वरना वो बम्बू पूरा का पूरा अंदर डाल दूँगा,एक इंच भी बाहर नही रहेगा...और यदि तू फिर भी नही माना तो तेरे शर्त के 2000 भूल जाना..."

"अरे नही यार...भाई है तू अपना...यही तो प्यार है पगले "

"चल नाश्ता करा फिर..."

"चल आजा, वैसे भी कॅंटीन गये बहुत दिन हो गये...आज लड़कियो को ताडते है "

दंमो रानी का पीरियड कब का ख़त्म हो चुका था और उसके बाद वाली क्लास खाली चल रही थी,किसी ने हमे ये भी बताया कि ये पीरियड खाली ही जाने वाला है तो मैं और अरुण वहाँ से उठे और क्लास से बाहर की तरफ निकले...

"कहाँ जा रहे हो बे..."नवीन बोला, आज वो नये-नये कपड़ों मे चमक कर आया था...

"माल चोदने,चलेगा क्या..."ये पंच अरुण ने सबके सामने मारा....और उसके बाद सभी लड़के-लड़किया अरुण का मुँह ताकने लगे...

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08-18-2019, 01:43 PM,
#44
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
उस दिन कॅंटीन मे कुछ खास नही हुआ..हम दोनो ने वहाँ अपना पेट भरा और फिर बिल सीडार के अकाउंट मे एड करा कर वापस आ गये...

कॉलेज मे कभी कोई एक ही एमोशन पर स्टेबल नही रह सकता, मतलब कि आज यदि कॉलेज मे दुख का महॉल है तो कल खुशी से गालियाँ देते हुए लड़के मिलेंगे....रिज़ल्ट अभी ही निकला था,कुछ उदास थे तो कुछ खुश....लेकिन अब सब खुश थे और फेरवेल की तैयारियो मे जुटे हुए थे....तरह-तरह के गेम,क्विज़ कॉंपिटेशन से कॉलेज का महॉल एक बार फिर कुछ-कुछ वेलकम पार्टी की तरह हो गया था....क्लास से आधे स्टूडेंट्स फेरवेल फंक्षन की तैयारी के लिए क्लास से गायब रहते और वेलकम पार्टी की तरह फेरवेल पार्टी भी टू पार्ट मे डिवाइड थी...सिटी वालो का फेरवेल अलग होता और हॉस्टिल वालो का अलग....लेकिन गेम्स और कॉनटेस्ट्स मे हॉस्टिल वाले और सिटी वाले, दोनो ही मिलकर पार्टिसिपेट करते....अरुण और मैने किसी भी गेम और कॉंटेस्ट मे पार्टिसिपेट नही किया था..लेकिन हमारे लीडर सीडार का गेम्स मे बहुत ज़्यादा इंटेरेस्ट था,इसलिए वो फिलहाल फेरवेल के आक्टिविटीस मे आक्टिव था...
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ऐसा नही था कि मुझे गेम्स मे इंटेरेस्ट नही था, मैं बॅस्केटबॉल का एक शानदार खिलाड़ी था...मैं खुद को शानदार इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकी बॅस्केटबॉल का मैं एक नॅशनल प्लेयर था ,सजीएचआइ मे हमारी टीम फाइनल नही पहुच पाई वरना इंडियन कॅंप के होने वाले सेलेक्षन लिस्ट मे मेरा भी नाम आता...खैर मुझे उस बात का गम ना तो उस वक़्त था और ना ही अब है...क्यूंकी मैं अपना करियर एजुकेशन के फील्ड मे बनाना चाहता था...इसकी दो वजह थी...

पहली वजह ये थी कि बॅस्केटबॉल के गेम्स मे मेरा फ्यूचर ब्राइट नही हो सकता था और दूसरी वजह मैं खुद था...मैं खुद इस फील्ड मे और आगे नही जाना चाहता था....फेरवेल मे पार्टिसिपेट ना करने का रीज़न मेरी सपनो की रानी एश के सपनो का राजा गौतम था...टीम्स ब्रांच वाइज़ डिवाइड हो रही थी और वो मेकॅनिकल ब्रांच की बॅस्केटबॉल टीम का कॅप्टन गौतम था....
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जिस रात फेरवेल था उसके ठीक एक दिन पहले इनडोर, आउटडोर सारे कॉंटेस्ट ख़त्म हो चुके थे और सब फेरवेल की तैयारी मे जुटे थे...सिवाय हॉस्टिल वालो को छोड़ कर.....सीडार ने सभी हॉस्टिल वालो को सॉफ मना कर दिया था कि हम मे से कोई भी फेरवेल मे नही जाएगा...जिसको फेरवेल बनाना हो वो सीनियर हॉस्टिल मे आकर बनाए या फिर दिन भर हॉस्टिल मे पड़ा रहे......
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जिस दिन फेरवेल था उस दिन शाम को 5 बजे तक मैने भी ये सोच लिया था कि आज हॉस्टिल मे रहूँगा, लेकिन कंट्री क्लब के तरफ की चकाचौंध ने मुझे मेरे फ़ैसले से हिलने पर मज़बूर कर दिया...इस वक़्त शाम के 6 बजे थे और टेंपरेचर लगभग 22 °सी था और मैं अपने हॉस्टिल की छत मे सिगरेट के कश मारते हुए कंट्री क्लब की तरफ जाने वाले रोड पर अपनी नज़रें गढ़ाए हुए था...तभी मेरे दिल मे ख़याल आया कि एश कितनी प्यारी दिख रही होगी आज...दीपिका मॅम का तो कहना ही क्या...लेकिन साला एक मैं हूँ जो सिर्फ़ यहाँ खड़ा होकर अपना कलेजा जला रहा हूँ और वो बीसी बदसूरत लौन्डे पार्टी मे लौन्डियो के साथ ऐश कर रहे होंगे...ये सीडार भी पूरा ख़त्म है...ना खुद एंजाय करता है और ना ही दूसरो को करने देता है...सामने से जा रहे मॉडर्न अप्सराओं के झुंड को देखकर जैसे मैं पागल हुआ जा रहा था....इसी खुशी मे मैने एक और सिगरेट सुलगाई और उसके कश मरता हुआ कुछ सोचने लगा....
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बाद मे जो मुझे समझ आया उसके हिसाब से यदि मुझे पार्टी मे जाना है तो भागकर,बिना किसी को बताए अकेले ही जाना होगा, क्यूंकी यदि अरुण और भू साथ चलते है तो हॉस्टिल मे किसी ना किसी को तो हवा लग ही जाएगी....इसलिए मैं चुपके से रूम मे घुसा और तैयार होकर छत के रास्ते से ही बाहर निकल गया...अब मेरे सामने इस वक़्त दो मुसीबत थी...पहला ये कि यदि वहाँ कुछ पंगा हो गया तो मुझे बचाने वाला कोई नही होगा और दूसरा ये कि फेरवेल पार्टी के ख़त्म होने के बाद मैं रात भर कहाँ रुकुंगा...अपने हॉस्टिल मे तो आने से रहा और यदि आधी रात को सीनियर हॉस्टिल गया तो सीडार जान जाएगा कि मैं कंट्री क्लब का चक्कर मार कर आ रहा हूँ....फिलहाल मैने इन दोनो सवालो को अपने से दूर किया और कंट्री क्लब की तरफ चल पड़ा....
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वेलकम पार्टी की तरह मैं आज खुल्ले सांड के जैसे बर्ताव नही कर सकता था और जितना हो सकता था..उतना छुप कर रहना था...इसीलिए मैने डिसाइड किया कि मैं चुपके से नवीन के पास जाउन्गा और उसे लेकर बीच मे बैठ जाउन्गा ताकि कोई मुझे देख ना सके.....लेकिन उसी पल मेरे दिल मे ख़याल आया कि "मैं ये सब क्यूँ कर रहा हूँ..."और फिर उसी पल मेरे दिल ने मेरे ख़याल को शांत करते हुए एक नाम लिया "एश....."
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कंट्री क्लब के बाहर पहूचकर मैने नवीन का नंबर मिलाया और उसे बाहर आने के लिए कहा...मैं कंट्री क्लब के बाहर हूँ ये जानकार उसे थोड़ा झटका लगा था...उसे ही क्या यदि उसकी जगह कोई और भी होता तो उसे भी झटका लगता...क्यूंकी वेलकम पार्टी की मेरी हरकत के बाद मैने खुद ने भी नही सोचा था कि मैं कॉलेज के किसी लेट नाइट प्रोग्राम मे जाउन्गा...लेकिन इस वक़्त ऐसा कुछ नही हुआ था..मैं इस वक़्त नवीन के साथ फेरवेल पार्टी मे था कि तभी मेरा मोबाइल बज उठा...स्क्रीन पर नज़र डाली तो अब झटका खाने की बारी मेरी थी...क्यूंकी कॉल दीपिका मॅम की थी


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दीपिका मॅम की कॉल देखकर मुझे कुछ अजीब सा लगा ,क्यूंकी जब से सेकेंड सेमेस्टर की शुरुआत हुई थी...मैं उसे भूलने लगा था, और रिज़ल्ट के बाद तो जैसे भूल ही गया था...लेकिन इस वक़्त मुझे फिर से उसकी याद आ गयी, मैने कॉल रिसीव किया..
"हां.."
"तुम मुझसे मिलो..."
जैसा कि मुझे उम्मीद थी,वो लगभग चीखते हुए बोली थी...जिससे मैने अंदाज़ा लगाया कि वो अभी टीचर्स के साथ नही बैठी है...लेकिन मैने फिर भी एक बार सामने की तरफ नज़र डाली...
"सामने क्या टुकूर-टुकूर देख रहा है..."

"आप हो कहाँ..."

"तुझे ज़रा सा भी अंदाज़ा है कि उस दिन रात के 2 बजे कॉल करके तुमने मुझे क्या कहा था...."

"नही..मुझे बिल्कुल भी याद नही ...और प्लीज़ मॅम, अभी मत बुलाओ..वो क्या है कि मैं हॉस्टिल से भाग कर फेरवेल पार्टी मे आया हूँ यदि सिटी वालो मे से किसी ने पकड़ लिया तो फिर गये काम से...."

"तब तो तुम जल्दी से कंट्री क्लब की बाइक पार्किंग की तरफ भागो..."

"वो क्यूँ..."

"क्यूंकी मैं वरुण और गौतम को ये बताने जा रही हूँ कि उनका दुश्मन हॉस्टिल से भागकर यहाँ किसी कायर की तरह बैठा है..."

"अरे मॅम,लफडा हो जाएगा..."

"वो मेरी प्राब्लम नही है..."

"ठीक है,मैं आ रहा हूँ..."

नवीन से बहाना बनाकर मैं चुपके से पार्किंग की तरफ खिसक लिया जहाँ स्कूटी पर दीपिका मॅम बैठी हुई थी....मुझे देखते ही वो मुस्कुराइ और उसकी इसी अदा ने मुझे कन्फ्यूज़ कर दिया कि...ये इतनी खुश कैसे है..जबकि कुछ देर पहले तो चिल्ला ऐसे रही थी..जैसे कि मेरा मर्डर कर देगी...

"आपने बुलाया..."उसकी स्कूटी की तरफ जाते हुए मैं बोला...

"पीछे बैठो..."

"व्हेयर आर वी गोयिंग..."

"चुप चाप बैठ..."

जब मैं फेरवेल की पार्टी से बीच मे उठकर आया था तब मैं किसी दूसरे मूड मे था...लेकिन जब से दीपिका मॅम को देखा था तब से मेरा मूड बदल गया था....जोरदार मेकप के साथ उसका गोरा रंग काफ़ी खिला हुआ था और उसपर से उसके टाइट ड्रेस मे क़ैद उसके सीने के उभारों ने मेरे मुँह मे पानी ला दिया था, और तभी मेरी नज़र अपने आप नीचे की तरफ जाकर उसकी टाँगो के बीच अटक गयी....उसकी चूत पर नज़र गढ़ाए हुए मैं कयि सवाल का जवाब ढूँढ रहा था ,जैसे कि दीपिका मॅम ने मुझे देखा कैसे, वो पार्टी से वापस क्यूँ जा रही है और सबसे बड़ा सवाल ये था कि उसने मुझे अभी बुलाया क्यूँ है...जबकि उस रात मैने उसके साथ बदतमीज़ी की थी और मैं अब उसका स्टूडेंट भी नही था...और जहाँ तक मैं सोच सकता था उसके अनुसार उसके पास लंड की कमी नही थी..यदि फिर भी वो किसी नये बंदे से उस वक़्त चुदना चाहती थी तो वो पार्टी मे मौज़ूद किसी भी स्टूडेंट के सामने यदि अपनी चूत और मदमस्त गान्ड मारने का प्रस्ताव रखती तो शायद ही कोई उन्हे मना करता...ईवन यदि वो किसी टीचर के आगे भी ये प्रपोज़ल रखती तो टीचर भी फेरवेल पार्टी की चकाचौंध को छोड़ कर उसकी चूत और गान्ड को मसल्ने के लिए तुरंत तैयार हो जाता...
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मैं इस वक़्त दीपिका मॅम की स्कूटी मे उसके पिछवाड़े से अपना तना हुआ लंड सटा कर उससे चिपक कर बैठा हुआ था , और उसके जिस्म से आती हुई पर्फ्यूम की खुश्बू से अपने अंदर एक तूफान उठा रहा था...दिल कर रहा था कि दीपिका मॅम की दोनो चूचियो को पीछे से दबाकर यही स्कूटी रुकवाऊ और उसके मुँह,चूत,गान्ड...सब जगह अपना लंड घुसेड दूँ...लेकिन ऐसा करने से एक प्राब्लम हो सकती थी, यदि मैं अभी इसी वक़्त ज़ोर से दीपिका मॅम की छातियों पर पीछे से अपने हाथो द्वारा फोर्स अप्लाइ करता तो दीपिका मॅम का बॅलेन्स बिगड़ सकता था...जो कि मैं नही चाहता था...इसलिए फिलहाल मैं उसकी गान्ड से अपना लंड सटाये हुए बैठा रहा...दीपिका मॅम ने स्कूटी किस सड़क पर दौड़ाई मुझे कुछ भी याद नही...क्यूंकी पूरे रास्ते भर मैं अपना लंड बाहर से उसकी गान्ड के अंदर घुसा रहा था....
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दीपिका मॅम 2 बीएचके के एक फ्लॅट पर रहती थी,जो कि उन्होने किराए से लिया हुआ था...और इस वक़्त मैं उन्ही के किराए के फ्लॅट पर एक सोफे पर अपनी तशरीफ़ डाल कर बोला...
"आप पार्टी से चली क्यूँ आई..मेरा मतलब है कि मालदार लड़कियो को तो ऐसी पार्टी का हमेशा ही इंतज़ार होता है जिसमे वो अपने हुस्न की आग से हम ग़रीबो का एल जला सके..."

"एल बोले तो लंड..."जिस सोफे पर कुछ देर पहले मैने तशरीफ़ रखी थी,उसी सोफे पर अपनी तशरीफ़ रखते हुए दीपिका मॅम ने मुझसे पुछा...

"लवडी को चुदने की इतनी जल्दी है..."उसको देखकर अंदर ही अंदर मैने सोचा और फिर एक सेक्सी स्माइल अपने होंठो पर लाते हुए बोला" एल बोले तो लेफ्ट साइड बोले तो दिल..."

"इधर दिल की कोई ज़रूरत नही है..."

"मैं बाथरूम होकर आता हूँ...आँख थोड़ा जल रही है...तो किधर है.."

"क्या किधर है..."दोनो हाथ से अपनी जाँघो को सहलाते हुए उसने कहा...

"बाथरूम किधर है..."

"उधर..लेफ्ट साइड मे.."

"मॅम..."बाथरूम की तरफ जाते हुए मैं पलटा"कुछ खाने पीने का इंतज़ाम हो जाए तो..."

"तुम्हे अभी भूख लगी है..."वो थोड़ा गुस्से से बोली..

"वो क्या है कि, फेरवेल पार्टी मे मैने अपना पेट नही भरा और यदि मैं इस वक़्त कुछ खा लेता हूँ तो मेरी एफीशियेन्सी थोड़ा बढ़ जाएगी..."

"ओके..मैं बनाती हूँ कुछ..."

उसके बाद वो किचन मे चली गयी और मैं बाथरूम मे....
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मेरे खास दोस्त अरुण ने कहा था कि जब भी किसी लड़की को पहली बार ठोकने जाओ तो अपने लंड को एक बार खुद से ठोक लेना ताकि लड़की को चोदते समय जल्दी ही ना गिर जाए...और मैं इसी लिए बाथरूम मे घुसा था ,ये मेरा फर्स्ट टाइम था जब मैं किसी लड़की के साथ सेक्स करने वाला था और मैं नही चाहता था कि जब गाड़ी चल रही हो तो मैं बीच मे ही लुढ़क जाऊ...इसलिए बाथरूम मे मैने बाक़ायदा दीपिका मॅम की गान्ड और चूत को सोचकर मूठ मारा और फिर फ्रेश होकर बाहर आया...तब तक टेबल पर दीपिका मॅम ने दो प्लेट नूडल्स रख दिए थे....

"बियर चलेगी..."एक कॅन अपने हाथ मे पकड़े हुए वो बोली...

"मॅम...मुझे बियर और कोल्ड ड्रिंक सेम ही लगती है...दारू हो तो बात कुछ और हो..."

"फिलहाल तो मैं दारू नही पीती , इसलिए बियर से ही काम चलाना पड़ेगा..या फिर एक और जगह है ,जहाँ से पानी रिस्ता है...कहो तो ग्लास मे लेकर आउ..."

"उसकी कोई ज़रूरत नही..मैं बियर से ही काम चला लूँगा..."
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उसके बाद नूडल्स और बियर की एक कॅन मारकर मैं शांत बैठ गया..लेकिन मेरा दिल इस वक़्त बहुत फड्फडा रहा था..मैं थोड़ा डर भी रहा था ,क्यूंकी मुझे चुदाई के बारे मे कुछ खास नही मालूम था...यदि मुझे पहले से ही मालूम होता कि आज ये सब कुछ होने वाला है तो मैं सेक्स पवर बढ़ाने की काई टॅब्लेट्स खाकर आता और इस साली को जमकर रगड़ता...ऐसा रगड़ता की महीनो किसी से चुदवाने के लायक नही रहती...मैने अभी कुछ देर पहले ही मूठ मारा था ,लेकिन फिर भी अब से कुछ देर बाद होने वाले सीन की काई झलक सोचकर मेरा लंड फिर से तन गया था..मैं इस वक़्त सोफे पर स्ट्रेट बैठकर ये सोच रहा था कि यदि अभी मेरा ये हाल है तो उस वक़्त क्या होगा जब मैं दीपिका मॅम की चूत का साक्षात दर्शन करूँगा उस वक़्त क्या होगा जब उसकी बड़ी-बड़ी चूचिया नंगी मेरे आँखो के सामने लटक रही होंगी...और उसका भरा हुआ पिछवाड़ा मस्ती से मटक रहा होगा मेरे अंदर ही अंदर एक तूफान उठ रहा था लेकिन फिर भी मैं शांत बैठा था,क्यूंकी मुझे समझ नही आ रहा था कि शुरुआत कैसे करूँ...उसे एक झटके से पकड़ कर ज़मीन मे लिटा कर चोदु ,या फिर प्यार से उसके कपड़े उतारू...या फिर उसके लिपस्टिक से सने होंठो पर अपने होंठो से दस्तक दूं या फिर उसकी पहल का इंतज़ार करूँ....

"अरमान..तुम्हारा रिज़ल्ट क्या हुआ..."अपनी एक टाँग को सोफे पर थोड़ा उपर चढ़ाते हुए वो बोली,जिससे उसकी ड्रेस का निचला हिस्सा खुल गया और मेरी आँखो की रटिना ने सीधे वही फोकस किया...उसकी वाइट कलर की पैंटी की कुछ झलक मुझे सॉफ दिख रही थी...

"फिर तो इसने ब्रा भी वाइट कलर का पहना होगा..."उसकी वाइट कलर की पैंटी पर नज़र गढ़ाए हुए मेरे ठर्की दिमाग़ ने अंदाज़ा लगाया..
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08-18-2019, 01:43 PM,
#45
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
"फिर तो इसने ब्रा भी वाइट कलर का पहना होगा..."उसकी वाइट कलर की पैंटी पर नज़र गड़ाए हुए मेरे ठर्की दिमाग़ ने सोचा....

"इतना क्या सोच रहे हो,.."

दीपिका मॅम की आवाज़ ने उसकी वाइट पैंटी से मेरा कॉन्सेंट्रेशन हटाया...और मैं ऐसे हड़बड़ाया जैसे कि.....पता नही कैसे
मैने तुरंत अपनी नज़र दीपिका मॅम की टाँगो के बीच से हटाकर उसके फेस पर अटकाया...

"तुम शायद कुछ सोच रहे थे...टेल मी "

"टेल यू...व्हाट ?"

"यू नो बेटर दॅन मी..."मुस्कुराते हुए वो बोली...

"वो मैं ये सोच रहा था कि, तुमने मेरे सवाल का जवाब क्यूँ नही दिया..."

"कैसा सवाल और ज़रा इज़्ज़त से बात करो, टीचर हूँ तेरी आप करके बात किया कर..."

"हां म्सी चुदते वक़्त ध्यान नही रहता कि तू टीचर है और मैं स्टूडेंट..."उसकी आँखो मे देखते हुए मैने दिल ही दिल मे गालियाँ बरसाई....

"अरमान ,मेरी तबीयत कुछ दिनो से ठीक नही है, और आज फेरवेल पार्टी के शोर से मेरा सर दुखने लगा था...इसलिए मैने वापस आने का सोचा...दुख तो बहुत हुआ था उस वक़्त जब मैं वापस आ रही थी,क्यूंकी मेरी नयी ड्रेस, घंटो मेकप,महँगी लिपस्टिक बेकार जाने वाला था...लेकिन जब तुम्हे लड़को के बीच मे देखा तो एक प्लान मेरे दिमाग़ मे आया...."

"और वो प्लान ये था कि ,तुम मेरे साथ रात भर..कूची-कूची...राइट ! "

"हां...! ऐसा ही कुछ सोचा था उस वक़्त मैने और तुमने फिर मुझे तुम कहकर बुलाया...अगली बार से यदि तुम बोला तो हालत खराब कर दूँगी..."

"और हालत खराब कैसे करोगी..."

"हट..लॅब मे तो बड़ा सारीफ़ बनता है...मैं आती हूँ फ्रेश होकर..."

"क्या फ़ायदा फ्रेश होने का ,वैसे भी कुछ देर बाद तो मैं फ्रेश ही कर दूँगा...."

दीपिका मॅम एक बार पीछे पलटी और मुस्कुरा कर चल दी, उसकी मटकती हुई गान्ड को चोदने का सोचकर ही मेरा लंड पैंट फाड़ने लगता...मैं अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रहा था कि आज मैं दीपिका मॅम को चोदुन्गा और मेरा प्लान था कि उसे ऐसा चोदुन्गा की साली आज के बाद मेरे लंड की दीवानी हो जाएगी...सोते-जागते..पढ़ते-पढ़ते,इसे सिर्फ़ मैं और मेरे लंड द्वारा की गयी जोरदार चुदाई ही याद आएगी....
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कितनी अजीब बात है कि इस वक़्त मैं एक अंजान से फ्लॅट पर एक ऐसी लड़की के साथ हूँ जो हवस की पुजारीन है...कही वो अपनी हवस मिटाने के लिए मुझे कोई नुकसान ना पहुचा दे...मैने कयि न्यूज़ मे सुना और देखा था कि कुछ लोग सेक्स करते वक़्त इतने एग्ज़ाइटेड हो जाते है कि सामने वाले की जान तक ले लेते है...दीपिका मॅम ने मेरे लंड से भी बड़े-बड़े लंड को लिया होगा..इसलिए मैं उसे कोई नुकसान पहुचाता...ये तो नामुमकिन ही था..लेकिन अब मेरे अंदर एक डर अपनी जगह बना रहा था...

"अबे तेरा फर्स्ट टाइम है..इसीलिए इतना घबरा है...डर मत और चोद-चोद के गान्ड फाड़ डालना साली का..."मैने खुद से कहा...तब तक दीपिका मॅम अपने हाथ मे अपनी सफेद पैंटी को घूमाथे हुए मेरे पास आई और अपनी वो सफेद पैंटी को मेरे उपर फेक कर बोली..

"स्मेल इट..."

"उससे क्या होगा..."दीपिका मॅम की पैंटी को अपने हाथ मे लेते हुए मैं बोला और उनकी पैंटी के दोनो सिरो को दोनो हाथो से पकड़ कर खींचने लगा....

"इसका साइज़ क्या है..."

"और उससे क्या होगा..."अबकी बार वो बोली...

"होगा तो कुछ नही,साइज़ पूछ कर बस अपना जनरल नालेज बढ़ा रहा हूँ..क्या पता आइएएस के एग्ज़ॅम मे आ जाए "

"लो,वापस पहना दो..."बोलते हुए वो मेरे और करीब आई...

मेरी दिल की धड़कने अब थोड़ी तेज़ हो गयी थी...क्यूंकी पहली बार मैं दीपिका मॅम की चूत देखने वाला था,
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यूँ तो मैने काई मर्तबा लड़कियो की चूत के दर्शन किए थे ,लेकिन इतने इतमीनान से पहली बार ही चूत दर्शन कर रहा था...और मुझे खुशी इस बात की भी थी कि ,जिस चूत को मैं आज बिना कपड़ो के देखूँगा...उसे मैं आज छुने के साथ-साथ चोद भी सकूँगा...बोले तो अपुन इस वक़्त टू हॅपी था

दीपिका मॅम की पैंटी अब भी मेरे हाथो मे थी,उसने मेरी आँखो मे देखकर अपना सलवार नीचे खिसका दिया और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराइ...सलवार नीचे आ जाने के कारण दीपिका मॅम की गोरी-गोरी जाँघो का कुछ हिस्सा उनके सूट से झलक रहा था...

"ये टुकूर-टुकूर क्या देख रहा है बेटा अरमान...साली की दोनो जाँघो को मसल दे और ऐसा मसल कि हफ्ते भर इयोडीक्स से मलने के बाद भी इसका दर्द कम ना हो...."दीपिका मॅम के सेक्सी लेग कट को देखते हुए मैने सोचा

मैं ये सोच ही रहा था की दीपिका मॅम मेरे और करीब आ गयी और अपने दोनो पैर को हल्का सा फैलाते हुए आँख मारकर मुझे इशारा किया कि मैं उनकी सफेद पैंटी उनकी सफेद चूत से वापस जोड़ दूं...मैने वैसा ही किया, जैसे-जैसे मैं दीपिका मॅम की पैंटी उपर चढ़ा रहा था,मेरे हाथ तेज़ी से काँपने लगे थे...

दीपिका मॅम को उनकी पैंटी पहनाने के बाद मैने अपना एक हाथ उनकी पैंटी के अंदर ही घुसा दिया,मेरा दिल जोरदार झटके मारते हुए धड़क रहा था...आख़िर कार वो पल भी आया जब मैने दीपिका मॅम की नंगी चूत को अपनी उंगलियो से महसूस किया और फिर उंगलियो से ही रास्ता ढूँढ कर एक उंगली उसके चूत के अंदर डाल दी...इसके बाद मैं जिस सोफे पर बैठा था ,दीपिका मॅम उसी सोफे पर मेरे उपर मेरी तरफ मुँह करके बैठ गयी और अपने दोनो हाथो से मेरे सर को सहलाने लगी...मेरी उंगली अब भी दीपिका मॅम की चूत के अंदर ही थी, मेरा दिल ही नही कर रहा था कि मैं अपनी उंगली निकालु...इसलिए मैने अपनी उंगली को थोड़ा अंदर की तरफ दबाया....

"ये किसने सिखाया..."मेरे गाल को सहलाते हुए दीपिका मॅम पुछि...

"किसी ने नही..."

"एक दिन मे कितनी बार मूठ मारते हो..."मेरे शर्ट के बटन्स को खोलते हुए उसने एक और सवाल पुछा...

दीपिका मॅम का इस तरह से सवाल पुछ्ना मुझे अच्छा लग रहा था, उसकी बाते सुनकर मेरा जोश और भी बढ़ जाता...
"जब टाइम मिलता है...तभी शुरू हो जाता हूँ..."मैने जवाब दिया..

"किसको सोचकर..."

"कभी कटरीना को सोचकर तो कभी प्रियंका को सोचकर तो कभी हॉलीवुड की आक्ट्रेसस को सोचकर...तो कभी टी.वी. सीरियल्स की लड़कियों को सोचकर...लेकिन पिछले सेमेस्टर मे अपनी कंप्यूटर वाली मॅम को सोचकर ही हिलाया है...."अपनी उंगली उसकी चूत के और अंदर करते हुए मैने कहा...

"मुझे किस पोज़िशन मे चोदते हो,मूठ मारते वक़्त..."

"हर दिन न्यू पोज़िशन...कभी लिटा कर तो कभी सीधा करके...कभी आगे से तो कभी पीछे से.."

मेरा जवाब सुनकर वो मुस्कुराइ और अपने सूट को मेरे पलक झपकते ही उतार कर नीचे फेंक दिया...और फाइनली दीपिका मॅम को ब्रा और पैंटी मे देखने का मेरा पहला अरमान पूरा हुआ...अब सिर्फ़ बाकी था तो,दीपिका मॅम को एक दम नंगी देखने का और फिर उसे उसी के बिस्तर पर लिटाकर जोर्डन चुदाई करने का अरमान...जो कि जल्द ही पूरा होने वाला था....
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मैने भी अपनी शर्ट और पैंट उतार कर दीपिका मॅम के सलवार-सूट के उपर फेंका और बोला"जैसे मैं तुझे चोदुन्गा...वैसे ही मेरे कपड़े भी तेरे कपड़े को चोदेन्गे..."

"तुमने फिर से मुझे तुम कहा..भूल गये मैं तुम्हारी मॅम हूँ..."बोलते हुए दीपिका मॅम ने मेरा एक हाथ अपने सीने पर रखा और मेरे सर के बाल को खींचते हुए बोली....

दीपिका मॅम के द्वारा सर के बाल खींचने के कारण हल्का सा दर्द मुझे महसूस हुआ और साथ ही थोड़ा गुस्सा भी आया,मैने तुरंत दीपिका मॅम की चूत से उंगली निकाली और ताव मे आकर दीपिका मॅम की फ्रिक्षनलेस चिकनी कमर को दोनो हाथो से पकड़ कर सोफे से उठ खड़ा हुआ और वही फर्श पर पटक कर उसके उपर चढ़ गया...

"स्टूडेंट्स से चूत मरवा सकती है लेकिन इज़्ज़त तुझे बराबर ही चाहिए तुझे..."

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"ये क्या...उठो मेरे उपर से..."

दीपिका मॅम ने अपने दोनो हाथो से मुझे उपर से हटाने की कोशिश की लेकिन वो नाकामयाब रही...अब मेरा लंड इतने जोश मे आ चुका था कि मुझे अब सिर्फ़ और सिर्फ़ चुदाई दिख रही थी....होंठो पर एक स्माइल लाते हुए मैने अपना एक हाथ दीपिका मॅम के सीने पर रखा और फिर उसके जिस्म को सहलाते हुए सीधे उसकी वाइट पैंटी के अंदर एक बार फिर दस्तक दी....
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मैं दीपिका मॅम को इस तरह ज़मीन मे पटक कर उसकी चूत मे उंगली करूँगा,ऐसा उसने शायद कभी सोचा भी नही होगा..मैने खुद ने भी कभी नही सोचा था...बस दिल किया और मैने कर दिया,....

"अरमान...दिमाग़ खराब है तुम्हारा...इस तरह से ज़मीन पर..."

दीपिका मॅम अपने दाँत चबाते हुए मुझसे बोली और मेरे हाथ को,जो कि उनकी सफेद पैंटी के अंदर उनकी सफेद चूत को मसल रहा था, उसको बाहर निकालने की एक और नाकामयाब कोशिश की....और जब वो उधर कुछ नही कर पाई तो एक बार फिर से मुझे धक्का देकर खुद के उपर से हटाने की कोशिश की.....

"आक्टिंग काफ़ी सॉलिड करती हो....मेरी रंडी मॅम..."उसके दोनो हाथो को मैने उसके सर के अगल-बगल अपने हाथो से जाकड़ लिया और फिर पूरा उस पर समाता हुआ अपने होंठ उसके होंठ के करीब लाया...

"मैं जानता हूँ कि तुम आक्टिंग कर रही हो...तुम्हारी आँखो मे मैं देख सकता हूँ...."

"मैं समझी नही कुछ...व्हाट डू यू वान्ट टू से...."

"दुनिया मे हर कोई अपने अंदाज़ से सेक्स करना चाहता है...सबका अपना-अपना स्टाइल है,किसी को 69 पोज़ीशन सबसे ज़्यादा अच्छी लगती है तो किसी को डॉगी...तो किसी को कोई और.."

"दट डज़न्ट' मॅटर फॉर मी...आइ एंजाय एवेरी पोज़िशन..."

"लेकिन तुम खुद का रेप करवा कर चुदना पसंद करती हो....राइट..."

"क्या दिमाग़ तो सही है तुम्हारा..."वो ऐसे रिएक्ट करके बोली जैसे की उसकी चोरी पकड़ी गयी हो...."हटो मेरे उपर से..."

"इतनी जल्दी भी क्या है जानेमन...एक बार लीप लॉक तो करने तो दे..."

उसके बाद मैने उसे चोदने के बजाय उसके उपर और दबाव बनाया और अपनी उंगलियो को उसके होंठो पर फिरते हुए बोला"मस्त है..."
"क्य्ाआंनह..."
"कुछ नही..."
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08-18-2019, 01:43 PM,
#46
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
दीपिका मॅम की सलवार तो मैं कब का उतार चुका था ,और अब बुरी तरह से अपना जिस्म उसके जिस्म से रगड़ने के कारण उसका सूट कमर तक खिसक चुका था,उसके होंठो को चूस्ते हुए मैं अक्सर बीच-बीच मे उसकी जाँघो को अपने हाथो से सहलाता ,जिससे दीपिका मॅम और जोश मे आ जाती....पहले पहल तो मैं तेज़ी के साथ दीपिका मॅम के होंठो को जाकड़ कर किस करता रहा ,लेकिन जब कुछ देर बाद दीपिका मॅम ने जकड़ना चालू किया तो मेरी हालत खराब हो गयी...लेकिन वो वक़्त ही ऐसा था कि उसके होंठो को अलग करने का मन नही कर रहा था...लेकिन मुझे जब दीपिका मॅम की छातियों का ख़याल आया तो मैने उसके होंठो को खुद के होंठो से अलग कर उसके सीने पर नज़र दौड़ाई...दीपिका मॅम की साँसे बहुत तेज़ चल रही थी ,जिसकी वजह से उसका सीना बहुत तेज़ी से उपर-नीचे हो रहा था....मैं दीपिका मॅम के उपर-नीचे होते सीने को देखकर यही सोच रहा था कि अब क्या करूँ.....

"बिना कपड़ो के इन दोनो को देखने का बहुत मन कर रहा है"

"नो...."वो फर्श पर इतराते हुए बोली

"वो क्यूँ...."

"मेरा समान है, मेरी मर्ज़ी..."

"ओके..."

उसके बाद मैने उसके दोनो बूब्स को अपने दोनो हाथो मे पकड़ कर दीपिका मॅम की तरफ देखा....वो हवस की पुजारीन मेरी इस हरकत से बहुत खुश हो रही थी और उसकी ये खुशी उसकी आँखो मे मैं सॉफ देख सकता था....मैने पूरी ताक़त के साथ उसके दोनो बूब्स को दबाया और दीपिका मॅम दर्द से चीख उठी और एक जोरदार तमाचा मेरे गाल पर आकर लगा....

"ईडियट...दर्द होता है..."

"तेरी माँ की...."गाल पर होते जलन को सहते हुए मैं खुद से बड़बड़ाया और एक बार फिर उसके सीने को ज़ोर से दबा दिया और पहली बार की तरह वो इस बार भी ज़ोर से चीखी ,लेकिन अबकी बार जब मुझे मारने के लिए दीपिका मॅम ने अपना हाथ उठाया तो मैने उनके हाथ को पकड़ा और मरोड़ दिया....और उसी वक़्त उन्होने अपने दूसरे हाथ से मुझे मारने की कोशिश की...लेकिन नतीजा पहले वाले हाथ की तरह था....

"दुख रहा है..."आँखो मे दर्द लिए हुए वो बोली"छोड़ो,प्लीज़.."

उसके दर्द से कराहने के बाद मैं दूसरी तरफ देखने लगा तो फिर से बोली"अरमान...लीव मे यार ! "

"नोप,.."

"अरमाआअन्णन्न्....."

"एक शर्त पर छोड़ूँगा...."

"कैसी शर्त,..."

"तुम मुझसे ये बोलो कि अरमान मैने तुम जैसा हॅंडसम, ब्रिलियेंट,हार्ड फकर लड़का...आज तक नही देखा..."

"ठीक है...अरमान मैने आज तक तुम जैसा हॅंडसम ,ब्रिलियेंट और.....आगे क्या था"

"हार्ड फकर..."

"हार्डफकर लड़का नही देखा..."

"थॅंक यू मॅम...मैने भी आप जैसी दुधारू लड़की आज तक नही देखी...."बोलते हुए मैने उनके दोनो हाथो को छोड़ दिया ,

"दिमाग़ खराब है क्या तुम्हारा...किसी लड़की के साथ कोई ऐसे बिहेव करता है क्या..."

लड़कियो की बक-बक करने की आदत बहुत भयंकर होती है, वो बक-बक करके सारी रात गुज़ार दे और इस वक़्त मुझे ऐसा ही कुछ महसूस हो रहा था...मैं ये नही चाहता था कि सूरज देवता सुबह दस्तक दे दे और मैं दीपिका मॅम के केवल होंठ चूस कर निकल जाउ...इसलिए मैने दीपिका मॅम के सूट को जो कि पहले से कमर तक आ गया था उसे उपर खिसकाते हुए दीपिका मॅम की गर्दन तक ले गया...

"मैं सोच रहा था कि यदि ये आपका ड्रेस उतार दिया जाए तो...आहह"मैने मुस्कुराते हुए कहा....

"उसके लिए तो खड़ा होना पड़ेगा...लेकिन तुम तो कब से मेरे उपर ही लदे हो ,"

"ओह ! ऐसा क्या.."

उसके बाद मैं और दीपिका मॅम उठ खड़े हुए, दीपिका मॅम का गोरा जिस्म अब पूरी तरह मेरी आँखो के सामने था, उंसके जिस्म के इस दीदार से एक वक़्त के लिए जैसे मैं भूल ही गया कि वो हवस की पुजारीन है, और यदि वो है भी तो मुझे कौन सा उसके साथ शादी करनी है....मुझे उस वक़्त कोई फ़र्क नही पड़ रहा था की उसने आज तक 10 का लंड लिया होगा या फिर 100 का....

"आइ आम रेडी..."उसने मुझे कसकर पकड़ा और खुद से सटा कर मेरे होंठो को बुरी तरह जाकड़ लिया और मैने भी उसके होंठो को कसकर जकड़ा और उसकी पैंटी को नीचे खिसकाने लगा....दीपिका मॅम की चिकनी चूत को मसल्ने का ख़याल ही मेरे अंदर हॉर्स पवर भर देता , और दीपिका मॅम की चूत को सहलाते वक़्त मैने एक छेड़-छाड़ करने की सोची... मैने दीपका मॅम की चूत को ठीक उसी तरह कसकर दबाया ,जैसे कि कुछ देर पहले उसकी छातियों को दबाया था...और इस बार तो जैसे दीपिका मॅम की जान ही निकल गयी, वो मुझे दूर फेंकते हुए मुझपर चिल्लाई

"फक यू...ब्लडी अरमान "

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वैसे तो मेरी दिली-इच्छा थी कि मैं दीपिका मॅम को उठा-उठा कर...लिटा-लिटा कर ,हार्ड कोर स्टाइल मे चोदु...और मैने अभी तक ऐसी कोशिश भी की थी..लेकिन हर बार दीपिका मॅम को वो नापसंद ही आता,इसलिए मुझे महसूस होने लगा कि कही वो गुस्सा होकर ,मेरे सारे अरमानो पर पानी ना फेर दे...और वैसे भी जब फ्री की चूत मिले तो ज़्यादा वेराइटी नही देखनी चाहिए....

"मैं तैयार हूँ..."बोलते हुए मैं दीपिका मॅम के पीछे खड़ा हो गया, वो पलट कर कुछ कहती या फिर कुछ करती उससे पहले ही मैने दीपिका मॅम को जाकड़ लिया"एक बात कहूँ मॅम..."

"यस..."

"मुझे बहुत दिन से इंतज़ार था इस पल का...शायद तब से जब मेरी पहली नज़र आप पर पड़ी थी...यू आर टू हॉट,...आइ नेवेर सी आ जबर्जस्त माल लाइक यू इन माइ होल लाइफ..."

"सच...."अपनी तारीफ सुनकर जैसे दूसरी लड़किया मचल जाती है ,वैसे ही वो भी मचल उठी..और मेरे हाथ मे अपने हाथ डालते हुए बोली"खुद को बहुत चालाक समझते हो..."

"अजी, आपके आगे तो हम एक दम नौसीखिया है..."

"ये अचानक क्या हो गया तुम्हे..."अपने हाथो से मेरे हाथ को सहलाते हुए दीपिका मॅम ने पुछा....

"मैने सोचा कि...पता नही क्या सोचा, बस दिल ने कहा और मैने कर दिया..."

"मुझे यही और ऐसे ही लड़के पसंद है...."

"मतलब कि मैं पसंद आया..."उसके हाथो को दूर करके उसके नंगे पेट को सहलाते हुए मैने अपने दोनो हाथ उसकी पैंटी के अंदर घुसा दिए और अबकी बार एक दम प्यार से उसकी चूत को मसल्ने लगा.......
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मैं दीपिका मॅम से अब इतनी शराफ़त से पेश आ रहा था और इसकी सिर्फ़ एक ही वजह थी कि मैं उसे जल्द से जल्द ठोकना चाहता था...मुझसे कंट्रोल नही हो रहा था और वो थी कि इधर-उधर उंगली डलवा कर टाइम पास कर रही थी....इसीलिए मैं उनसे एक दम प्यार से बात करने लगा....वैसे तो ये मेरी किसी लड़की के साथ फर्स्ट नाइट थी, और इस काम मे मैं वाकाई मे दीपिका मॅम के सामने एक नौसीखिया था...लेकिन गूगल महाराज की कृपा से थोड़ा बहुत तो मैं जानता ही था...मैने कयि ब्लॉग्स "फर्स्ट टाइम सेक्स" के बारे मे पढ़ा था...और जैसे किसी सब्जेक्ट का नोट्स हम बनाते है,वैसे ही "फर्स्ट टाइम सेक्स" का भी मैने नोट्स बनाया था.... और एक और साइट राजशर्मास्टॉरीजडॉटकॉम पर सेक्सी कहानियाँ पढ़ कर थोड़ा बहुत ग्यान लिया था वैसे सेक्स कहानियाँ भी अजीब होती है पता नही कैसे लोग एक बार मे ही लड़की से मिलकर उसकी चूत तक पहुँच जाते हैं
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"रुक क्यूँ गये....डियर अरमान..."लगभग सिसकते हुए दीपिका मॅम बोली, गूगल महाराज की कृपा दृष्टि पर मैं इतना खो गया था कि मेरा हाथ जो कि कुछ देर पहले दीपिका मॅम की वाइट पैंटी के अंदर उछल रहा था वो अब शांत हो गया था...

"डियर अरमान....काफ़ी स्पीडली प्रोग्रेस हो रही है मेरी इज़्ज़त मे"इसके साथ ही मैने दीपिका मॅम की पैंटी मे हलचल फिर से शुरू कर दी और थोड़ी ही देर मे उनकी पैंटी को नीचे खिसका दिया....

"मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है..."

"अजीब ? "

"सही बटाऊ तो मैं थोड़ा नर्वस हूँ मॅम,..."

"क्लास टीचर की तरह ही तुम मुझे सेक्स टीचर अस्यूम कर लो..."

"वो सब तो ठीक है,लेकिन मैं सच मे थोड़ा नर्वस हूँ...बोले तो अपुन की फॅट रेली है..खैर कोई बात नही..."

"सब कुछ नॉर्मल हो जाएगा डियर...चलो बेड पर चलते है..."बोलते हुए दीपिका मॅम बेडरूम की तरफ बढ़ी और उनके पीछे -पीछे मैं भी बेडरूम की तरफ बढ़ा....
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बेडरूम के अंदर जाने के बाद दीपिका मॅम ने अपनी पैंटी ,जिसे मैने नीचे खिसका दी थी...उसे पूरा का पूरा खुद से अलग करने के बाद उसने अपनी ब्रा भी खोल दी.... दीपिका मॅम को पूरी नंगी देखकर मेरे अंदर सनसनी सी फैल गयी...मैं क्या करूँ ,उस थोड़े से सनसनी वक़्त मे मुझे कुछ नही सूझा...मैं कभी दीपिका मॅम की गोरी-गोरी चुचियों को निहारता तो कभी उनके कमर के नीचे बने नरक के द्वार को.....वो कुछ देर वही बिस्तर के पास खड़ी होकर मटकती रही और फिर इशारे से मुझे अपने करीब आने को कहकर बिस्तर पर लेट गयी....

"कम ऑन, अरमान..."

"ओके..."लंबी-लंबी साँसे भरते हुए मैं बोला....और सिर्फ़ बोला ही कुछ किया नही...

"वहाँ खड़े ही रहोगे या अपना खड़ा भी करोगे..."
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मैं इस वक़्त दीपिका मॅम के बिस्तर के सामने खड़ा होकर यही सोच रहा था कि जंग के मैदान मे कूद जाऊ या फिर वापस लौट जाऊ....मैं उस वक़्त ऐसा इसलिए सोच रहा था क्यूंकी मुझे डर था कि कही दीपिका मॅम को एड्स की बीमारी ना हो....इस वक़्त मेरे कुछ अरमान ,जो मैने कॉलेज के शुरुआती दिनो से देखे थे वो अब पूरे होने वाले थे....लेकिन ऐन मौके पर मेरे खुराफाती दिमाग़ मे ना जाने एड्स की बीमारी कहाँ आ गयी थी,जिसकी वजह से मैं वही बिस्तर के पास खड़ा था...
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"मेरे पास तो कॉंडम भी नही है..."मैं खुद से बड़बड़ाया"रास्ते मे खरीद लेना चाहिए था..."

"अरमान "अपने मम्मे सहलाते हुए वो बोली

"हां.. आ रहा हूँ..."
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मैं कुछ देर तक और ऐसे ही वहाँ खड़ा रहा आंड फाइनली मैने खुद को मज़बूत करके दीपिका मॅम से पुछा...

"आपको एड्स तो नही है ना "

मेरे इस सवाल से वो थोड़ा चौक गयी और अपने मम्मे सहलाना बंद करके मेरी तरफ देखकर बोली"दिमाग़ तो सही ठिकाने पर है..."

"मेरी बात को दिल पर मत लो ,मुँह मे लो...."

"कॅन आइ नो दट व्हाई डिड यू अस्क दट क्वेस्चन...."

"आइ आस्क्ड दट क़्वश्चन बिकॉज़ ऑफ सेक्स अबिलिटी ऑफ युवर पुसी अलॉंग वित डिफरेंट डिक्स..."

"मैं सच ही कहूँगी इसकी क्या गॅरेंटी है...मैं तो झूठ भी बोल सकती हूँ..."

"दट वाज़ नोट माइ क्वेस्चन...."

"मुझे एड्स है...."मेरी तरफ देख कर दीपिका मॅम ने जवाब दिया

"मुझे कोई फरक नही पड़ता..."बोलते हुए मैं झटके से बिस्तर पर चढ़ा और अपने कपड़े उतार दिए....

दीपिका मॅम अपने दोनो पैरो को जोड़े बिस्तर पर लेटी थी,मैने उनकी जाँघो को अपने दोनो हाथो से मसल्ते हुए उनकी जाँघो को फैलाया...और ऐसा करते ही मुझे नरक का वो द्वार दिखा....जिसके चक्कर मे ना जाने कितने तबाह हो गये....
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तभी मुझे राजशर्मा का एक शेर याद आ गया

चूत री चूत तूने खाए बिराने पूत
यदि होती बीघा चार तो देती देश उजाड़

वैसे तो ये मेरा फर्स्ट टाइम था ,लेकिन अब मुझे किसी गाइड्लाइन की ज़रूरत नही थी...मैने दीपिका मॅम की दोनो जाँघो को कसकर पकड़ कर उपर उठाया और दीपिका मॅम को अपने करीब खींचा....जिससे उनकी रसभरी चूत और मेरे लंड के बीच अब कुछ ही फाँसला था...उसके दोनो पैरो को अपने कंधे पर रखक्कर दीपिका मॅम की चूत को पहले अपने लंड से सहलाया....इस बीच दीपिका मॅम अपनी छातियों को मसल रही थी....

"आर यू रेडी...."दीपिका मॅम की कमर को कसकर पकड़ते हुए मैं बोला और नीचे झुक कर उनके होंठो पर एक जोरदार किस भी किया....
"याअहह..."उसने अपनी सहमति दी...

और दीपिका मॅम की तरफ से ग्रीन सिग्नल मिलते ही मैने अपने लंड को उनकी चूत के बीच-ओ-बीच रखा और हल्का सा दबाव दिया.....लेकिन मेरा लंड ज़रा सा भी अंदर नही गया....फिर मैने और ज़ोर से दबाव बनाया...

"बेवकूफ़...थोड़ा ,नीचे डालो..."

"ओह ! सॉरी "

अपने लंड को दीपिका मॅम की चूत मे थोड़ा नीचे करने के बाद हल्का सा दबाव बनाया और मेरे लंड का उपरी हिस्सा तुरंत अंदर घुस गया....

"अरे ग़ज़ब "

"क्या ग़ज़ब...पूरा घुसा..."

मैने एक लंबी साँस भरी और फिर ज़ोर का झटका मारा, मेरा लंड बिना किसी रोक-टोक के सीधे घुसता चला गया और मुझे परम सुख की अनुभूति होने लगी....मैं अपनी आँखे बंद किए हुए कुछ देर तक उस पल को अपने लेफ्ट साइड से अटॅच करना चाहता था....लेकिन लंड की प्यासी दीपिका मॅम को ये शायद नापसंद था...उसने उसी वक़्त ,जब मैने एक जोरदार धक्का मारकर अपनी आँखे बंद कर ली थी ,तो उसी वक़्त उसने मुझे टोक दिया...और उसके बाद मैं दीपिका मॅम से लिपट कर उनकी चूत मे अपना लंड लगातार पेलता रहा....इस वक़्त दीपिका मॅम मुझे बहुत अच्छी लग रही थी...उनकी हर एक सिसकारी मुझे और भी ज़्यादा रोमांचित कर देती....मैं कभी उनकी बूब्स को ज़ोर से दबाता तो कभी उनके होंठो पर अपनी उंगलिया फिराता तो कभी उनके गुलाबी होंठो को अपने होंठो से जकड लेता....मेरे हर धक्के के साथ हम दोनो का बिस्तर पर लहराता जिस्म हम दोनो को एक-दूसरे मे समा जाने का मौका दे रहा था...और जब हम दोनो की आँखे एक-दूसरे से मिलती तो उस पल जैसे किसी ने हाइ वोल्टेज करेंट की वाइयर मुझसे टच करा दी हो,उस समय मेरा जोश दुगना हो जाता....

"य्ाआहह....स्टॉप नाउ..."

"क्या हुआ.."हान्फते हुए मैं बोला....

"आइ वान्ट टू सक युवर...."

"नोप...फिर मैं किस कैसे करूँगा..."

"तो कर लेना,उसमे क्या है..."

"मुझे बेकार लगता है..."

"दट'स युवर प्राब्लम...अरमान..."

"एक शर्त पर..."दीपिका मॅम के मम्मों को सहलाते हुए मैने इशारा किया...

"नही..बिल्कुल नही..."

"अब दर्द का बहाना मत बना लेना...क्यूंकी इतने लोगो के साथ सोई हो तो दो चार ने तो वहाँ लंड डाला ही होगा..."

"यॅ. तुम सही हो,लेकिन मुझे पसंद नही.."

"फिर मुझे भी लवडा चूसाना पसंद नही "उसके टाइट निपल को सहलाते हुए मैने कहा...
Reply
08-18-2019, 01:44 PM,
#47
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
दीपिका मॅम कुछ देर तक कुछ सोचती रही और फिर उन्होने मेरी शर्त मान ली....तो शर्त के मुताबिक ये तय हुआ था कि वो मेरा लंड चुसेगी और मैं उसकी गान्ड मारूँगा...आइ डॉन'ट थिंक कि इसमे मेरा कोई नुकसान हुआ है....मैं दीपिका मॅम के उपर से उठकर उनके बगल मे लेट गया और वो मेरी जाँघो के बीच अपने नितंब रखकर बैठ गयी और मेरे लंड को मुट्ठी मे भरकर आगे-पीछे करने लगी...कुछ देर तक वो ऐसे ही करती रही...

"जल्दी चूसो ना "

"रूको कुछ देर,पहले इसे तैयार तो कर लूँ....हां अब तैयार है..."

उसके बाद उसने अपनी जीभ बाहर निकाली मेरे लंड पर फिराने लगी,
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इसे दीपिका मॅम की आर्ट ऑफ ब्लोवजोब कहे या फिर कुछ और....कि मुझे उस वक़्त ज़्यादा मज़ा आ रहा था,जब वो मेरे लंड को अपने मुँह मे भरती और बाहर निकाल देती इनस्टेड ऑफ उस वक़्त के,जब मैं उनकी रसभरी चूत मे अपना लंड अंदर बाहर कर रहा था......
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जब दीपिका मॅम का मन भर गया तो वो बिस्तर पर लेट गयी और मैं एक बार फिर उनके उपर चढ़ गया....
"घूम जाओ..."
"पहले थोड़ी देर आगे की सेकाई कर दो, देन........श्ह्ह्ह्ह"
"ओके....श्ह्ह्ह"
मैने एक बार फिर उनकी चूत पर लंड रखा और तेज़ी से एक बार मे ही अपना पूरा लंड उसकी चूत मे उतार दिया और पहले की तरह ही उससे चिपक कर तेज धक्के मार रहा था....अब उसके होंठ तो चूम नही सकता था ,इसलिए मैने अबकी बार उसकी छातियों को निशाना बनाया और दीपिका मॅम के निपल्स को कसकर दबाया.....

"आआअनन्नह......"एक दर्द भरी उँची चीख दीपिका मॅम के मुँह से निकली...

"सॉरी...."बोलते हुए मैने एक और बार उनके दोनो निपल को मसल दिया और बोला "सॉरी अगेन..."

"मुझे तुम्हारी चीख निकालने के कयि तरीके मालूम है और कुछ तरीके तो ऐसे है कि तुम्हारी चीख भी नही निकलेगी....इसलिए ज़्यादा होशियारी नही..ओके"

"दिल से सॉरी...नेक्स्ट टाइम से नही करूँगा..."

और मैं फिर से उस काम मे लग गया,जो मैं कुछ देर पहले कर रहा था....अब मेरे लंड मे एक गुदगुदी से पैदा हो रही थी,जिसके कारण मैने खुद-ब-खुद धक्को की स्पीड तेज कर दी....मैं जान चुका था कि मैं झड़ने वाला हूँ और प्रीवियस प्लान के मुताबिक मुझे अपनी दीपिका मॅम की गान्ड भी मारनी थी,लेकिन मैं नही रुका....मेरे धक्के लगातार तेज़ होते गये और मैं निढाल होकर दीपिका मॅम के उपर गिर गया......


दीपिका मॅम और मेरे बीच फेरवेल की रात को जो कुछ भी हुआ वो सब सच था,लेकिन मेरे खास दोस्तो मे शुमार वरुण को जैसे यकीन ही नही हो रहा था....

"तू एडा बना रहा है मुझे..."

"अब क्या हुआ "

"मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है कि तूने दीपिका मॅम और खुद का चॅप्टर खुद से जोड़ लिया है...आइ मीन मुझे तो सब फेंक लग रहा है..."

"दीपिका मॅम अब मेरे कॉंटॅक्ट मे नही है,वरना उसी से पुच्छ लेता तू..."

मैं और वरुण बात कर ही रहे थे कि निशा की कॉल एक बार मेरे सेल मे टपक पड़ी और मेरे कॉल रिसीव करते ही वो मुझसे पुछने लगी कि मैं कहाँ हूँ और मैने बोल दिया कि मैं अपने रूम पर हूँ....

"वी हॅव टू गो सम व्हेयर"

"व्हेयर ? "

"मैं तुमसे एम.बी.डी. रेस्टोरेंट के पास मिलती हूँ..."

"कब..."मैं थोड़ा सा बौखला गया जब निशा ने एम.बी.डी. रेस्टोरेंट के पास मिलने के लिए कहा तो

"अभी,कुछ देर मे..."

"ठीक है,आधे घंटे मे पहुचता हूँ वहाँ,वैसे जाना कहा है..."

"पहले पहुचो तो सही..."
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मैने कॉल डिसकनेक्ट की और वरुण को एक ज़रूरी काम का बहाना बताकर तैयार होने लगा... मैं भी कितना बड़ा बेवकूफ़ था जो कि उन दोनो से झूठ बोल रहा था जो मेरी रॅग-रग से वाकिफ़ थे....

"अपनी आइटम से मिलने जा रहा है ना..."जब तैयार होकर मैं रूम से निकलने वाला था तभी वरुण ने टोका

"तुझे कैसे मालूम चला..."

"कॉल हिस्टरी देखकर..."

"तुम दोनो को अब कोई और काम नही बचा क्या..."

"यार अरमान,मेरा भी जुगाड़ जमा ना निशा से...जब से उसे बारिश मे भीगते हुए देखा है,रोम-रोम सिहर उठता है उसके नाम से "

अभी वरुण ने निशा के प्रति अपने अरमान ज़ाहिर किए थे कि अरुण ने अपना मुँह फाडा"मेरा भी जुगाड़ जमा दे माइ बेस्ट डोसिट..."

"अबे तुम दोनो ने सुबह-सुबह ये क्या बक-बक लगा रखी है और निशा मंदिर का कोई प्रसाद है क्या जो तुम दोनो के साथ बाटू ,उसकी शादी होने वाली है..."

"अभी सुबह नही शाम है...और तू बोले तो मैं तेरे साथ चलता हूँ..इसी बहाने नागपुर घूम लूँगा..."अरुण ने खड़े होते हुए कहा ,उसे शायद यकीन था कि मैं उसे हां ही कहूँगा,पर वो ग़लत था और वैसे भी लड़कियो के मामले मे सारी थियरी ग़लत ही हो जाती है...यदि निशा साथ ना होती या फिर यदि मैं नरक मे भी जा रहा होता तो अरुण को घसीट कर ले जाता....लेकिन उस वक़्त मैने ऐसा नही किया,

"अबे तू कहाँ आएगा हड्डी मे कवाब बनने....मतलब कवाब मे हड्डी बनने..."
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बहुत मशक्कत करनी पड़ी अरुण और वरुण को समझाने मे और आख़िर कार वो मेरे साथ ना आने के लिए मान गये, लेकिन उनकी एक शर्त थी कि मैं उन दोनो के लिए वापस लौटते वक़्त दारू का एक-एक खंबा लेकर ही आउ....
.
"कितनी देर हुई आए हुए...मैं ज़्यादा लेट तो नही हुआ.."एम.बी.डी. रेस्टोरेंट मे पहूचकर मैने निशा से कहा...

"बैठो अरमान..."निशा ने उखड़े हुए अंदाज़ मे जवाब दिया..

"अंकल-आंटी से बहस हुई क्या तुम्हारी "

इस सवाल के पीछे मेरा एक और मक़सद ये भी पता करने का था कि कही निशा ने हम दोनो के बारे मे अपने मोम-डॅड को ना बता दिया हो,वरना मेरे लिए बहुत मुश्किले खड़ी होने वाली थी...यदि निशा के माँ-बाप को इस समय जबकि निशा की शादी को कुछ दिन ही बाकी थे,उन्हे ये पता चलता कि उनकी गैर मौजूदगी मे मैं उनकी बेटी के साथ रास-लीला रचता हूँ तो वो शायद मुझे ज़िंदा नही छोड़ेंगे....

"नो, मोम-डॅड से कोई बहस नही हुई....वो कल डेविड आ रहा है मुझसे मिलने..."एक ग्लास मे पानी लेकर निशा ने गले से नीचे उतारते हुए कहा

"ये चूतिया डेविड कौन है...जिसकी वजह से तुम इतनी उदास हो.."

"मेरा होने वाला हज़्बेंड "

"ओह तेरी...सॉरी दट आइ कॉल्ड हिम चूतिया..."अबकी मैने भी सामने रखे पानी के ग्लास को उठाया और पूरा खाली किया..
."तो इसमे बुराई क्या है, हज़्बेंड है तेरा...आएगा प्यार के मीठे दो बोल गुनगुनाएगा ,चम्मा चाटी करेगा , फिर यहाँ वहाँ हाथ मार कर तुझे यहाँ से ले जाएगा...."

"मुझे वो पसंद नही...."

"और वो क्यूँ..."

"कार मे चलकर बात करते है ,कहीं चलना है हम दोनो को...."

हम दोनो एम.बी.डी. रेस्टोरेंट से बाहर निकल कर निशा की कार मे हो लिए,...ये पहली बार था जब मैं निशा के साथ अपनी कॉलोनी से बाहर निकला था, यूँ तो नागपुर आए हुए महीनो हो गये थे,लेकिन नागपुर के बारे मे अब भी मैं कुछ नही जानता था,जिसकी एक वजह ये थी कि मैं शहर की भीड़ भाड़ से दूर रहता था और दूसरा कुछ नया जानने की इच्छा महीनो पहले जैसे सीने मे ही दफ़न हो गयी थी...लेकिन आज निशा के साथ होने पर मैं नागपुर को पहली बार गौर से देख रहा था....और तभी मुझे बीते दिनो की याद आई जब हम हमेशा यही कहा करते थे कि काश हम नागपुर मे पढ़ते, काश हम नागपुर मे रहते या फिर काश कि नागपुर यहाँ से पल भर की दूरी मे होता....ऐसा कहने की हमारी सिर्फ़ और सिर्फ़ एक वजह थी और वो वजह थी सस्ते दामो मे अपना जिस्म परोसने वाली देसी और विदेशी लड़किया और कमसिन औरत....


"नागपुर के बारे मे मैने सुन रखा है कि यहाँ रात बिताने के लिए खूबसूरत लड़किया बहुत सस्ते दामो मे मिल जाती है..."खूबसूरत वर्ड पर मैने जानबूझ कर ज़्यादा ज़ोर दिया,ताकि निशा जल भुन जाए...और जैसे कि मेरा अंदाज़ा था निशा का रियेक्शन ठीक वैसा ही था...

"क्यूँ....उनके साथ रात बितानी है क्या "वो चिढ़ते हुए बोली...

"कुछ जुगाड़ जमा दो...आज कल रात को नींद नही आती "

"आगे थोड़ी दूर पर एक क्लिनिक है..कहो तो डॉक्टर से कन्सल्ट करके एक पाय्सन ले लो...रात मे फिर अच्छी नींद आएगी..."निशा फिर चिढ़ने वाले अंदाज़ मे बोली...

"थॅंक्स फॉर दा सजेशन, लेकिन मुझे मेरा ही आइडिया ज़्यादा पसंद है...कुछ जुगाड़ जमा दो..."उसकी तरफ देखते हुए मैने कहा"और हां लड़की रशियन हो तो और भी ज़्यादा सुकून से नींद आएगी "

"अरमान अब बस भी करो,आइ हॅव टू से सम्तिंग..."

"मैं सुन रहा हूँ..."

निशा ने अगले ही पल कार सड़क के साइड मे रोक दी और फिर मेरे हाथ को अपने हाथ से पकड़ कर बोली"मैने आज तक तुम्हारे सिवा किसी और के साथ सेक्स नही किया है...मैने तुम्हे आज तक मेरे जितने भी बाय्फरेंड्स के नेम और अड्रेस बताए सब फेक थे..."

ये मेरे लिए एक शॉकिंग न्यूज़ थी, मेरे लिए निशा की इस बात पर यकीन करना कि उसने आज तक मेरे सिवा और किसी के साथ बिस्तर गरम नही किया है ,ये बात मुझे कुछ हजम नही हो रही थी...उसने मुझे ये दिल को झकझोर कर रख देने वाली बात अभी क्यूँ बताई ये तो मैं जानता था,लेकिन सबसे बड़ा सवाल फिर उसने पहले मुझसे झूठ क्यूँ बोला
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उसने मुझे ये दिल को झकझोर कर रख देने वाली बात अभी क्यूँ बताई ये तो मैं जानता था,लेकिन सबसे बड़ा सवाल फिर उसने पहले मुझसे झूठ क्यूँ बोला

मैं इस वक़्त ऐसे हैरान था जैसे कि कितना बड़ा आश्चर्या देख लिया हो

"मैं जानती हूँ कि तुम्हे यकीन नही हो रहा है.."

"नही ऐसी कोई बात नही है,मुझे यकीन हो रहा है..."

"फिर खुश क्यूँ नही हो रहे हो..."

"मैं खुश तो हूँ, मैं बहुत ज़्यादा खुश हूँ...."

"तुम्हारी शकल देख कर तो ऐसा नही लग रहा..."

"क्या सच मे..."साइड मिरर को अपनी तरफ करके मैने उसमे अपना चेहरा देखा"ऐसा तो कुछ भी नही है...."

उसके बाद निशा कुच्छ नही बोली,उसने कार स्टार्ट की और वापस सड़क पर दौड़ा दी....लेकिन मैं अब भी मिरर मे देख रहा था, मुझे निशा की बात पर बिल्कुल भी यकीन नही हो रहा था और उसी वक़्त जैसे उसने मेरे अंदर की उलझन को समझ लिया हो वो बोली
"तुम बिलीव नही कर रहे हो कि मैं आज तक सिर्फ़ तुम्हारे साथ...."

"नही..बिल्कुल नही, मुझे पूरा यकीन है...देखो मैं कितना खुश हूँ..."झूठ बोलते हुए मैने मुस्कुरा दिया...

हमेशा फिलॉसोफी झाड़ने वाला मैं आज अपनी ही फिलॉसोफी नही समझ पा रहा था , मुझे देखकर उस वक़्त कोई भी कह सकता था कि मैं इस वक़्त किसी कन्फ्यूषन मे हूँ और कुछ सोच रहा हूँ....लेकिन पूरे वक़्त मैं जबर्जस्ति मुस्कुराने की आक्टिंग करता रहा,ताकि निशा को भनक ना लग जाए कि मैं उसपर शक़ कर रहा हूँ....

मैं पूरे रास्ते भर यही कोशिश करता रहा कि निशा को इस बात का अहसास ना हो जाए कि मुझे उसकी बात पर यकीन नही है,मैं ऐसे रिएक्ट करता जैसे मैं बहुत खुश हूँ...थोड़ी देर बाद निशा ने कार एक माल के सामने रुकी
"अरमान, ये झूठा बर्ताव करना बंद करो...मैं जानती हूँ कि तुम्हे मेरी बात पर भरोसा नही है..."

"ऐसा बिल्कुल भी नही है..."मैने एक बार फिर मुस्कुराने का झूठा लिबास ओढ़ते हुए कहा"बाइ दा वे ,तुम मुझे इस माल मे क्यूँ लाई हो...कही मूवी दिखाने का प्लान तो नही है..."

"घुमाने लाई हूँ तुम्हे ,दिन भर इंडस्ट्री मे तो रहते हो..."अपने बालों को मिरर मे देखकर संवारते हुए निशा बोली"बाइ दा वे ,तुमने अभी तक बताया नही मैं कैसी दिख रही है..."

"एक दम झक्कास..."बोलते हुए मैने उसकी तरफ सिर्फ़ अपने हाथ ही बढ़ाए थे कि वो डर कर तुरंत कार से बाहर निकल गयी...

"ड्राइवर कार पार्क करके आओ..."

"मैं ड्राइवर..."

"नही तो क्या मैं हूँ ड्राइवर..."

"जैसी आपकी आग्या मालकिन जी..."

मैने कार पार्क की ओर माल के अंदर आया....निशा माल के अंदर थोड़ी ही दूर पर मुझे खड़ी हुई दिख गयी...उसके बाद तो जैसे कयामत ही आ गयी, वो जहाँ भी कुछ खरीदने जाती वहाँ आधे से एक घंटा उसको टाइम लगता और उस पूरे टाइम मे मैं जमहाई लेता हुआ बाहर माल मे आने जाने वाले को देखता रहता....

"निशा, पूरे 2 घंटे हो गये है...लेकिन अभी तक तुझे कुच्छ पसंद नही आया क्या "

"मेरी बेस्ट फ्रेंड का बर्तडे है तो उसको कुछ अलग ही देना पड़ेगा ना और मेहनत तो मैं कर रही हूँ इससे तुमको क्या परेशानी है..."

"मुझे लगा , तुम अपनी शादी के लिए शॉपिंग कर रही हो पर यहाँ तो पूरा मामला ही उल्टा निकला"

"शादी के लिए शॉपिंग की क्या ज़रूरत, वेड्डिंग ड्रेस है तो मेरे पास..."

"लेकिन उस दिन जब तुम्हारे अंदर भूत सवार हुआ था तब तो तुमने बरसात मे भीगकार उस लाल साड़ी का सत्यानाश कर दिया था..."

"वो तो साड़ी थी ना उसे मैं वेड्डिंग मे कैसे पहन सकती हूँ..."

"क्यूँ..."

"मैं क्रिस्चियन हूँ, क्या तुम्हे ये नही पता..."

" सच"

"या"
"शॉपिंग बाद मे कर लेना ,मेरा सर घूम रहा है...अभी फिलहाल वापस चलते है..."

लेकिन वो नही मानी उसने आधे घंटे तक मुझे और उस माल मे खाना खाया और जब हम दोनो वापस कार मे आए तो मैने अपनी आँखे बंद की और अपने सर को सहलाते हुए सारी चीज़ो को एक-एक करके समझने की कोशिश करने लगा......
.
"निशा "नेम तो हिंदू है लेकिन ये खुद को क्रिस्चियन बता रही है, नो प्राब्लम

लेकिन फिर इसके पास शादी का लाल जोड़ा कैसे आया...इसकी माँ की....पूरे दिमाग़ का डोसा बनाकर खा गयी है

"निशा ,अपना पूरा नेम बताना तो एक बार..."आँख खोलते ही मैने पहला सवाल यही पुछा...

"निशा पेरेज़...क्या तुम्हे सच मे नही पता था कि मैं एक क्रिस्चियन हूँ..."

"नही और मुझे कोई फरक भी नही पड़ता...लेकिन फिर एक सवाल अब है कि तुमने फिर वो लाल साड़ी अपने पास क्यूँ रखी है..."

"क्यूंकी मुझे वो पसंद आ गयी थी,तो मैने उसे खरीद लिया...इसमे बुरा क्या है..."

"कुछ भी बुरा नही है...मैं तो ऐसे ही जनरल नालेज के लिए क्वेस्चन पुच्छ रहा था ,तुम कार चलाओ..."बोलकर मैने अपनी आँखे बंद कर ली
.
यदि देखा जाए तो ग़लती निशा की नही थी ,हम दोनो पहले केवल बिस्तर पर कबड्डी खेलने के लिए मिला करते थे ,इसलिए एक दूसरे के बारे मे हमे ज़्यादा कुछ नही पता था....जैसे मैं निशा के बारे मे ज़्यादा नही जनता था वैसे ही वो भी मेरे बारे मे कुछ नही जानती थी...उसने मेरे बारे मे कयि बार कुच्छ नया जानने की कोशिश की थी लेकिन मैने हर बार फुल स्टॉप का बोर्ड टाँग दिया क्यूंकी यदि मैं उसे बताता तो क्या बताता कि मैं अपने घर से भाग कर यहाँ रह रहा हूँ....और उसे अपने बारे मे कुछ ना बताने का सबसे बड़ा रीज़न ये भी था कि वो फिर मेरी लाइफ के और भी पहलुओ को जानने की कोशिश करती....
.
"अरमान...एम.बी.डी. रेस्टोरेंट आ गया..."

"तो क्या यहाँ से मैं पैदल जाउ..चल ना लिफ्ट दे दे...वैसे तुमने मुझे बुलाया किसलिए था"

"वही तो बताने की कोशिश कर रही हूँ...लेकिन कुछ बोल नही पा रही..."

"अब ऐसा क्या धमाका करने वाली हो जानेमन "

"रेस्टोरेंट मे चलकर बात करते है "

हम दोनो एम.बी.डी. के अंदर घुसे और एक कोने वाले टेबल पर बैठ कर मैने दो कप कॉफी का ऑर्डर दिया और निशा की तरफ देखकर कहा"हां बोलो,अब..."

"आइ लव यू...अरमान"

"हां ,आगे बोलो..."मेरे दिल की धड़कने तेज़ होनी शुरू हो चुकी थी....

"मैं डेविड से शादी नही कर सकती..."

"ह्म्म...आगे बोलो..."

"तुम कुछ करो ना ,जिससे ये शादी रुक जाए..."

"ह्म्म...आगे बोलो.."

"डू यू लव मी "

"ह्म्म...आगे बोलो..."

"अब आगे क्या बोलू...सब तो बोल दिया ,अब तुम बोलो "गुस्से से मेरे हाथ मे अपने नाख़ून गढ़ा कर निशा ने कहा...
Reply
08-18-2019, 01:44 PM,
#48
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
"यही बात प्यार से भी तो कह सकती थी,खामाखाँ नाख़ून गढ़ा दिया और तूने ये डायन जैसे नाख़ून क्यूँ पाल रखे है,कटवाती क्यूँ नही..."

अपने लिए डायन शब्द सुनकर निशा मुझपर भड़क उठी और अपनी आँखे बड़ी करके एक बार और अपने डायन वाले नाख़ून को मेरे हाथ पर गढ़ा दिया....

"चुभता है यार..."

"तो फिर मुझे डायन मत बोलना और यही तो आज कल का फॅशन है..."

"वाह रे फॅशन...पहले तो जानवरो की तरह अपने नाख़ून बड़े करो फिर उसमे हज़ार तरह की नेल पोलिश थोपो...तुम लड़कियो के पास बहुत एक्सट्रा टाइम होता है क्या..."

तब तक वेटर ने दो कप कॉफी लाकर हमारे टेबल पर रख दी ,कॉफी की चुस्किया लेते हुए मैने कहा"हां तो बोलो ,क्या बोल रही थी..."
"डू यू लव मी..."
"आइ डॉन'ट नो..."
"डॉन'ट नो ऑर डॉन'ट लोवे, सॉफ-सॉफ बताओ..."
"सच मे मिस. पेरेज़ ,आइ डॉन'ट नो..."
"ओके ! तो ये बताओ कि तुम मुझसे शादी करोगे..."


"शादी...."मुझे उस वक़्त कुछ नही सूझ रहा था कि मैं निशा को क्या कहूँ, अपने रूम से निकलने के पहले ही मैं जान गया था कि वो इस तरह के ही सवाल पुछेगि लेकिन लाख सोचने के बावजूद अभी तक मैं इस बारे मे कुछ सोच नही पाया था और यही वजह थी कि मैं हर बार बात को किसी ना किसी बहाने टाल देता था और इस बार भी मैने वैसा ही करने की कोशिश की ...जब मुझे निशा को उसके सवाल का जवाब देना था तभी मैने वेटर को आवाज़ दी और दो प्लेट समोसे का ऑर्डर दिया...इस बात से बेख़बर कि मेरी इस हरक़त का निशा पर क्या असर होगा...मैने ये बिल्कुल भी नही सोचा कि वो समझ जाएगी कि मैं उसको टाल रहा हूँ....


और ऐसा हुआ भी...जब कुछ देर और मैने उसकी बात का जवाब नही दिया तो उसकी आँखो मे किसी छोटी बच्ची की तरह आँसू आ गये ,वो तुरंत टेबल से उठी और बाहर की तरफ जाने लगी....

"मैं अभी आया..."वेटर को इशारा करते हुए मैं भी निशा के पीछे हो लिया और सीधे जाकर उसके सामने खड़ा हो गया
"ओये डायन चल आजा...आइ लव यू..."
"सच..."
"101 % सच..."
और उसके बाद हम दोनो एक दोनो की बाहो मे बाहे डालकर वापस रेस्टोरेंट के अंदर आए, अब मुझे भी अहसास होने लगा था कि मुझे निशा के मामले मे जो करना है उसके बारे मे जल्दी सोचना होगा...
"तो तुमने क्या सोचा..."
"कल बताऊ तो चलेगा..."
"ह्म..."

हम दोनो ने एम.बी.डी. रेस्टोरेंट मे कुछ वक़्त और बिताया और फिर निशा ने मुझे मेरे रूम पर ड्रॉप कर दिया,...अपने फ्लॅट की बेल बजाने के बाद मुझे याद आया कि वरुण ने तो मुझे दारू लाने के लिए कहा था, वो तो मैं लाना ही भूल गया और वरुण ने भी रूम का दरवाजा खोलने से पहले ये देखा कि मेरे हाथ मे कुछ है या मैं खाली हाथ ही आया हूँ...

"उस दिन तूने दीपिका मॅम को फिर चोदा कि नही..."मुझे देखते ही वरुण का पहला रियेक्शन यही था...

उसके इस सवाल से मैं सकते मे आ गया और अरुण की तरफ देख कर इशारा मे पुछा...लेकिन अरुण तो फुल लोड था...वो अंडरवेर पहने हुए बिस्तर से उठा और लड़खड़ाते हुए बोला...

"अरमान, अच्छा हुआ, तू आ गया...इसने पुच्छ-पुच्छ कर दिमाग़ का बड़ा पाव बना दिया है...जब से तू गया है हज़ार बार ये मुझसे यही पुच्छ रहा है...यही पुच्छ रहा हाऐईयइ....."

"उठा साले को और वापस बिस्तर पर पटक दे..."

अरुण को बिस्तर पर जमाने के बाद वरुण ने कुछ खाने के लिए बनाया और फिर एक-एक कप चाय के साथ हम दोनो बैठ गये....
"अरमान,उसके बाद क्या हुआ..."
"खाने देगा, बाद मे बताउन्गा..."
"बता ना..."
"बाद मे..."
"यदि अभी बताएगा तो मेरे हिस्से का खाना तेरा..."
"ठीक है..."उसकी प्लेट अपनी तरफ सरकाते हुए मैं बोला"चाय पी ले,तू भी क्या याद रखेगा..."
"चल आगे बता..."
.
आगे.....मैं भी यही चाहता था कि मैं एक दो बार और दीपिका को गरम करूँ लेकिन एक बार झड़ने के बाद कुछ ही पॅलो मे मुझे नींद आ गयी, लेकिन दीपिका मॅम को छोड़ने की चाह मे मेरी नींद सुबह के 5 बजे खुल ही गयी, मैने आस-पास हाथ मारा... दीपिका मॅम मेरे बगल मे ही सो रही थी,मैने उनको दोबारा पेलने के जुगाड़ मे लाइट ऑन की और तुरंत उनके उपर चढ़ गया.....

"फिर..."वरुण चाय की एक लंबी चुस्की लेते हुए बोला

"फिर क्या ,मैं तो नंगा था ही ,वो भी बिना कपड़ो के ही थी...मैने पहले उसके बॉडी के कुछ प्राइवेट पार्ट्स दबाए,उन्हे चूसा...और फिर उनको उल्टा लिटा कर चोदने की तैयारी कर ही रहा था कि दीपिका मॅम बोली..."

"क्या बोली..."
"यही कि उनकी तबीयत खराब है और मैं उनके उपर से उतार जाउ..."

"तो तूने क्या किया..."

"मैने उनकी बात मान ली...लेकिन यदि मैं चाहता तो वो सब कुछ कर सकता था..लेकिन दीपिका मॅम की आवाज़ और उनके शरीर की गर्मी से मैं जान गया था कि वो अभी फिलहाल तैयार नही है...इसलिए मैं वापस बिस्तर पर लेट गया और सुबह होते ही हॉस्टिल आ गया..."

"तेरी बाते सुनकर ऐसा लग रहा है कि मैने बेकार मे ही अपना खाना छोड़ दिया ,चल आगे बता "
.
आगे वो हुआ जो मैने कभी एक्सपेक्ट नही किया था, मैं दूसरे दिन अपने हॉस्टिल पहुचा ही था कि मेरे भाई का कॉल आ धमका, मैने सोचा कि यूँ ही हाल-चाल पुछने के लिए कॉल किया होगा, लेकिन कॉल उठाते ही मालूम चला कि बड़े भैया तो रेलवे स्टेशन मे है और वो आधे घंटे मे मेरे हॉस्टिल पहुचने वाले है.....

"अबीईययययी अरुण..."मैने पूरी ताक़त से चीख कर कहा"बड़े भैया आ रहे है,जल्दी से रूम सॉफ कर...वरना आज ही मेरी टी.सी. कट जाएगी..."

"क्या सच..."वो बिस्तर से कूद कर ज़मीन पर आया और मुझसे बोला"तू अपनी साइड सॉफ कर ,मैं अपनी साइड सॉफ करता हूँ..."

"चल तू शुरू कर मैं झाड़ू का जुगाड़ करता हूँ..."

वहाँ से मैं तुरंत भू के रूम मे घुसा और झाड़ू माँगा....

"नही है..."

"बीसी, बोसे ड्के,जैसी बदसूरत शकल है...वैसी शकल रूम की भी बना रखी है...कभी सॉफ भी कर लिया करो...."

गालियाँ बकते हुए मैं दूसरे रूम मे घुसा और फिर तीसरे...लेकिन हालत सब जगह यही थी....इसलिए मैं जल्दी से भाग कर अपने रूम मे आया और न्यूज़ पेपर को हाथो मे लेकर रूम का सारा कचरा बाहर कर दिया और अरुण की एक टी-शर्ट को पानी मे भिगो कर अपना स्टडी टेबल सॉफ करके दो-चार बुक ,खोल कर रख दिया.....
"ला बे, वो गीला कपड़ा मुझे भी दे..."

"ले थाम..."

"कुत्ते, ये तूने क्या किया...ये मेरी नयी टी-शर्ट थी..."टेबल सॉफ करने के बाद अरुण चिल्लाया

"मुझे मालूम नही था यार, मैं तो इससे अपने शूस भी सॉफ करता हूँ, आइ आम रियली सॉरी यार..."

"तेरी ये बात सीधे दिल मे लगी है..."

"दिल पे नही ,मुँह मे ले ले और अभी रोना बंद कर ,बड़े भैया आते ही होंगे..."

उसके बाद बड़े भैया का एक और कॉल आया जब वो हॉस्टिल के बाहर खड़े थे...मैं तुरंत भाग कर बाहर गया और उनके पैर छुकर उनके हाथ मे जो भी खाने-पीने का समान माँ ने घर से मेरे लिए भिजवाया था उसे अपने हाथो मे लेकर भैया के साथ अपने रूम पर आया....

हमारे हॉस्टिल मे रहने वाले लौन्डो की सबसे बुरी आदत ये थी कि यदि उन्हे मालूम चल जाए कि फलाना लड़के के घर से कोई मिलने आया है तो वो उस फलाना लड़के के रूम मे किसी ना किसी बहाने से जाकर ये देखेंगे कि खाने का समान आया है कि नही और यदि खाने का समान आया है तो कितना आया है.....मेरे साथ भी यही हो रहा था, जब से बड़े भैया रूम मे बैठे थे तब से कयि लड़के रूम मे आते ,बड़े भैया को नमस्कार करते और फिर बिस्तर पर पड़े खाने के बॅग को देखकर चले जाते.....

"तेरे हॉस्टिल के लड़को को कोई काम धाम नही है क्या ,जब से देख रहा हूँ ,10-12 लड़के तेरे रूम का चक्कर लगा चुके है...."बड़े भैया ने पुछा...

"वो सब छोड़ो और ये बताओ कि इस तरह अचानक कैसे आना हुआ..."

"वो पिताजी ने कहा था कि मैं तुझे बिना बताए ही आउ,जिससे हमे मालूम चल सके कि तू रहता किस हाल मे है..."पूरे रूम की तरफ सी.आइ.डी. वाली नज़र डालते हुए बड़े भैया ने आगे कहा"वेल...रूम तो सॉफ करके रखा है...गुड"

"थॅंक यू भैया..."

"तेरा नाम क्या है भाई..."अरुण की तरफ देखते हुए बड़े भैया ने कहा...

अरुण इस वक़्त बुक खोलकर पढ़ने की नौटंकी कर रहा था, जैसे ही बड़े भैया ने सवाल पुछा उसने तपाक से अपना नाम बताया और फिर पढ़ने मे बिज़ी हो गया...

"अरमान,दट'स दा स्पिरिट,...ऐसे होते है पढ़ने वाले लड़के..."अरुण का एग्ज़ॅंपल देते हुए उन्होने अरुण से उसके फर्स्ट सेमेस्टर के रिज़ल्ट के बारे पुछा...

"ऑल क्लियर..."

"क्लियर तो सिर्फ़ एक दिन पढ़ने वाले भी कर लेते है यार..."

"8.9 ,क्लास मे 3र्ड रंक.."अरुण ने एक दम सीरीयस होते हुए जवाब दिया और फिर दूसरी बुक खोलकर पढ़ने बैठ गया....
.
जब बड़े भैया अरुण से सवाल-जवाब कर रहे थे तभिच मुझे ध्यान आया कि आलमरी मे सिगरेट की कुछ पॅकेट्स रखी हुई है...
"कहीं भैया आलमरी ना खोल दे, वरना सारी इज़्ज़त का कबाड़ा हो जाएगा "

"ये तेरी आलमरी है..."

"हां...ना..मेरा मतलब हां,लेकिन क्यूँ...आपने क्यूँ पुछा..."

"खोल तो..."

"वो अभी नही खुल सकती..."

"अभी नही खुल सकती...ऐसा क्यूँ, क्या कोई सूभ महूरत मे ही आलमरी खोलता है क्या..."

"इसकी चाभी गुम हो गयी ,आज सुबह-सुबह..."

"तो फिर ला ,ताला तोड़ देते है..."बड़े भैया आलमरी की तरफ जाते हुए बोले...

"बड़े भैया...रूको..."मैं एक दम से कूद कर आलमरी और बड़े भैया के बीच मे आ गया...

"आर यू ओके"
"आइ'म ओक..."
"फिर हट सामने से..."
"ताला तोड़ने की ज़रूरत नही है...मेरे पास एक्सट्रा चाभी है..."

"तो ला दे वो एक्सट्रा चाभी..."

"एक्सट्रा चाभी ही तो गुमी है...शाम तक मिल जाएगी..."

"पहले बोलता है कि एक्सट्रा चाभी है, फिर बोलता है कि एक्सट्रा चाभी ही गुम हो चुकी है और अब बोल रहा है कि शाम तक चाभी मिल जाएगी....तू पागल तो नही हो गया"

"मैं एक दम ठीक हूँ भैया, वो क्या है ना कि, ये चाभी मुझसे हमेशा खो जाती है,लेकिन फिर इधर-उधर पड़ी मिल जाती है...."
.
मेरे इस बर्ताव पर बड़े भैया कुछ देर तक चुप रहे और फिर बहुत देर तक मुझे घूरते रहे...

"तू काफ़ी बदला-बदला लग रहा है..."

"काफ़ी से याद आया, चलिए आपको कॉफी पिलाता हूँ, पास वाले दुकान के पास एक दम झक्कास कॉफी मिलती है..."

"पर आते वक़्त तो मुझे कोई भी दुकान आस-पास नही दिखी..."

"है ना ,2 किलोमेटेर की दूरी पर,आपने ध्यान नही दिया होगा..."

"2 किलोमेटेर दूर को तू आस-पास बोलता है..."

"कौन सा पैदल जाना है, बाइक से पहुचने मे 5 मिनिट्स भी नही लगते..."

"ज़्यादा बड़ा हो गया है तू,..मुझे कोई कॉफी नही पीनी,चुप चाप इधर ही बैठ वरना खींच के एक लाफा दूँगा..."

मैं क्या करता..चुप चाप अरुण के बिस्तर पर बैठ गया...

"तेरे साथ मुझे नही,विपेन्द्र भैया को ही रहना चाहिए...तभी तू शांत रहेगा..."धीमी आवाज़ मे अरुण बोला...

"चुप कर वरना...यही ठोक दूँगा..."मैं भी खुस्फुसाया और विपिन भैया की तरफ देखा, मुझे हड़का कर बिस्तर पर सो रहे थे...और जैसे कि उन्होने मुझे बताया था उसके हिसाब से उनकी ट्रेन शाम को थी...मैं हर आधे घंटे मे अपनी घड़ी देखता और इंतज़ार करता की जल्द से जल्द शाम हो जाए और मुझे मुक्ति मिले...दोपहर को खाना खाने के लिए मैने बड़े भैया को उठाया, लेकिन उन्होने हॉस्टिल की कॅंटीन मे खाने के लिए मना कर दिया और घर से जो लाए थे उससे अपना पेट-पूजा करके कुछ देर तक मुझसे और अरुण से बाते की और फिर ये बोलकर सो गये कि शाम को 4 बजे मैं उन्हे उठा दूं....भैया को सोता देख मैने राहत की साँस ली

"चल बे एक साइड..."अरुण को एक लात मारकर साइड होने के लिए मैने कहा...

"अरमान...खाने वाला बॅग खोल ना..."

"मुँह बंद कर नही तो जूता ,चप्पल डाल दूँगा मुँह मे..."

"यदि ऐसा करेगा तो फिर मैं बड़े भैया से बोल दूँगा कि तू सिगरेट पीता है,दारू भी पीता है,मार-पीट भी करता है और साथ मे लौंडियबाज़ी ,सीटियाँबाजी भी करता है...."

"अच्छा , फिर मैं बड़े भैया से बोलूँगा कि मुझे सिगरेट पीना तूने सिखाया, दारू की लत तूने डाली और लौंडियबाज़ी मे तू भी मेरे साथ रहता है..."

"अरमान, यू आर प्लेयिंग वित माइ लेफ्ट साइड..."

"अब बकवास बंद और ये बता कि तूने अपना रिज़ल्ट ग़लत क्यूँ बताया..."

"इंप्रेशन...बेटा इंप्रेशन...तू खुद सोच कि तेरे भाई को यदि ये मालूम होता कि मेरी फर्स्ट सेमेस्टर मे बॅक लगी हुई है तब उनका इंप्रेशन क्या होता..."

"चल खड़ा हो और वो मिठाई का डिब्बा उठा..."

"सच..."अरुण खुशी से बोला..

"नही मज़ाक कर रहा हूँ, अबे चल जा..."
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08-18-2019, 01:45 PM,
#49
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
"नही मज़ाक कर रहा हूँ, अबे चल जा..."
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अरुण चुपके से उठा और मिठाई का डिब्बा उठाकर वापस आया...
"अबे अरमान,बड़े भैया कही जाग तो नही रहे..."एक मिठाई अपने मुँह मे भरकर अरुण अजीब सी आवाज़ मे बोला...
"बड़े भैया,शुरू मे सोने का नाटक कर रहे थे...लेकिन पिछले 5 मिनिट्स से वो सो रहे है..इसलिए बिंदास होकर अपनी टंकी भर..."अरुण के नक्शे कदम पर चलते हुए मैने भी एक मिठाई उठाई और उसे खाते हुए अजीब सी आवाज़ मे बोला...
" ये तुझे कैसे मालूम..."अरुण ने एक और पीस उठाते हुए पुछा..

"आज से लगभग दो साल पहले एक न्यूज़ पेपर मे एक आर्टिकल आया था ,जिसमे ये बताया गया था कि आप आँख मूंद कर लेटे हुए एक शक्स को देखकर कैसे मालूम करोगे कि वो सोने का नाटक कर रहा है या सच मे सो रहा है...."मैने भी मिठाई का दूसरा पीस उठाते हुए जवाब दिया...


"कमाल है.."अबकी बार अरुण ने तीसरा पीस उठाया और कहा"मैं क्या बोलता हूँ कि अपुन दोनो ही मिलकर ये डिब्बा खाली कर देते है,वरना बड़े भैया के जाते ही लौन्डे टूट पड़ेंगे और हम दोनो घंटा हिलाते रह जाएँगे"

"एक दम करेक्ट बात बोली है तूने..."

"वो तो अपुन हमेशा बोलता है...बोल पापा इसी बात पर "

"मम्मी बोलू...ये चलेगा क्या "
.
एक घंटे बाद बड़े भैया की आँख खुली और उन्होने हॉस्टिल वॉर्डन से मुलाक़ात की और मेरे बारे मे,मेरी हरकतों के बारे मे वॉर्डन से बात-चीत की...अब एक कॉलेज हॉस्टिल का वॉर्डन हॉस्टिल मे रहने वाले सभी लड़को के बारे मे कैसे जान सकता है...लेकिन हमारा वॉर्डन मेरे बारे मे बहुत कुच्छ जानता था...मेरी हरकतों के बारे मे वो मेरे भाई को सब कुच्छ बता सकता था...लेकिन उसने ऐसा नही किया और उसने ऐसा क्यूँ नही किया ,इसका रीज़न भी मैं ही था...हुआ कुच्छ यूँ कि जब से बड़े भैया ने फोन मे बताया था की वो यहाँ आकर मेरे टीचर्स से मिलेंगे तभिच से मैने सीडार को बोलकर अपने वॉर्डन को समझा दिया था कि वो मेरे बड़े भैया से मेरी कोई शिकायत ना करे...और हुआ भी वैसा ही, वॉर्डन ने बड़े भैया से कुछ नही कहा.....
.
उन दिनो मेरी किस्मत भी कुच्छ ज़्यादा ही मुझपर मेहरबान चल रही थी, जहाँ कल रात मैने कॉलेज की सबसे हॉट लौंडी को उसी के घर मे उसी के बिस्तर पर चोदा था वही कल की फेरवेल पार्टी के चलते आज कॉलेज बंद था...जिससे बड़े भैया को मेरे टीचर्स से मिलने का कोई मौका नही मिला...अब मैं प्राइम मिनिस्टर का कोई रिश्तेदार तो था नही कि कॉलेज का स्टाफ मेरे विपिन भैया से मिलने के लिए आए इसलिए बड़े भैया को फिलहाल वॉर्डन के मुँह से मेरी झूठी तारीफ सुनकर ही जाना पड़ा..
.
"आप कहो तो रेलवे स्टेशन तक छोड़ देता हूँ, बाइक का जुगाड़ है..."हॉस्टिल से बाहर निकलते वक़्त मैने कहा...

"कोई ज़रूरत नही है और बाइक कम चलाया कर..."डाँट लगाते हुए वो बोले

"बड़े भैया आपने ठीक से सुना नही शायद....मैने कहा कि मैं आपको रेलवे स्टेशन तक छुड़वा देता हूँ,मेरे किसी सीनियर के साथ..."अपनी बात को तुरंत पलट कर मैने कहा...

"वो सब छोड़ और ये बता की अरुण की कितने सब्जेक्ट मे बॅक लगी है..."

"आपके कान किसने भरे अरुण के खिलाफ वो तो टॉपर है क्लास का"पहले मैं बुरी तरह हड़बड़ाया लेकिन बाद मे संभालते हुए जवाब दिया...

मेरी बात सुनकर बड़े भैया वही रुक गये और मेरी तरफ देखते हुए बोले"अरमान, जिस दो साल पहले की आर्टिकल का हवाला देकर तू अरुण से बिंदास होकर बात कर रहा था, वो आर्टिकल मैने भी पढ़ा था और मुझे अच्छी तरह से मालूम है कि सोने की आक्टिंग कैसे करनी है...."

ये मेरी लिए करेंट के किसी झटके की तरह था..क्यूंकी यदि ऐसा था तो बड़े भैया ने फिर हमारी सारी बाते सुन ली होगी और साथ मे मैं खुद को शाबाशी भी दे रहा था कि अच्छा हुआ जो मैने उस वक़्त अपने बारे मे कोई बात नही की...वरना अभी ही मेरी टी.सी. निकल जाती....

"अब जर्मन मे बोलेगा या हिन्दी मे ही जवाब देगा..."मुझे भौचक्के खड़ा देखकर बड़े भैया ने अपना सवाल दागा...

"एक ही सब्जेक्ट मे बॅक है अरुण की..."

"और तूने वरुण नाम के सीनियर को क्यूँ पीटा था, मना किया था ना लड़ाई झगड़े के लिए..."

ये मेरे लिए पहले वाले झटके से भी बड़ा झटका था...बोले तो डबल शॉक....

ये मेरे लिए डबल शॉक इसलिए था क्यूंकी इस बारे मे मैने रूम मे अरुण से कोई डिस्कशन नही किया था लेकिन फिर भी विपिन भैया को ये मालूम चला...मतलब पक्का किसी ने अपनी काली ज़ुबान बड़े भैया के आगे खोली थी....
"उस म्सी वॉर्डन ने बताया होगा..."मैने अंदाज़ा लगाया...
"आपको ये किसने बताया..."

"जब मैं यहाँ आ रहा था तभी तेरे एक सीनियर से मेरी मुलाक़ात हुई और मैने तेरे बारे मे पुछा और जानता है क्या हुआ..."
"क्या "
"मैं अपनी बात भी ख़त्म नही कर पाया था कि वो बोल पड़ा.....आप उसी अरमान की बात कर रहे है ना जिसने वरुण वेर्मा को ठोका था...तो फिर मैने जवाब दिया कि...हां मैं उसी अरमान की बात कर रहा हूँ और मैं उसका बड़ा भाई हूँ..."

"उसके बाद क्या हुआ..."मेरी आवाज़ अब दबने लगी थी...मेरी हालत अब ऐसी थी जैसे कि मेरा बहुत बड़ा जुर्म सामने आ गया हो....

"जैसे ही तेरे उस सीनियर को पता चला कि मैं तेरा बड़ा भाई हूँ...तो वो एक दम से चुप हो गया और तुरंत ही वहाँ से खिसक लिया..."

"ऐसे ही छोटी-मोटी बहस हुई थी वरुण से...कुछ खास नही हुआ..."

"कुछ खास होना भी नही चाहिए...."मैं हाइवे से हमारे हॉस्टिल को जोड़ने वाली रोड पर आकर बड़े भैया ने कहा"देख अरमान, ये उम्र का वो दौर है,जब सारी अच्छी नसीहत खराब लगती है...बंदा ये सोचने लगता है कि ये सारे नियम ,क़ायदे-क़ानून उसे बंदिशो मे क़ैद करने के लिए बनाए गये है...लेकिन हक़ीक़त ये नही होती, हम सारी चीज़ो को तब समझते है,जब सब कुछ हमारे हाथो से निकल चुका होता है....मैं ये नही कह रहा कि तू कोई आदर्शवादी बन, कोई मिसाल कायम कर...लेकिन इस बात का भी ध्यान रख कि हम मिड्ल क्लास के लोग जिस सोसाइटी मे रहते है...वो बड़ी खराब है...यहाँ लोग अपने बारे मे सोचने से ज़्यादा दूसरो की बुराई करने मे ज़्यादा ध्यान देते है...यू डॉन'ट नो कि तेरे फर्स्ट सेमेस्टर मे इतने कम मार्क्स लाने से कैसी-कैसी बाते उड़ रही है...."

विपिन भैया की बाते मैं चुप-चाप सुन रहा था ,तभी मुझे दूर से सिटी बस आती हुई दिखाई दी...जिसे देखकर बड़े भैया ने बॅग मेरे हाथ से अपने हाथ मे लिया और बोले...
"एक आख़िरी बात अरमान...एंजाय युवर लाइफ फुल्ली..लेकिन इतना नही कि अदर्स एंजाय ऑन युवर लाइफ....बाइ,"
.
विपिन भैया के जाने के बाद भी उनकी बात मेरे कानो मे मंदिर के घंटो की तरह रही...मैं अपने ख़यालो मे डूबा हुआ ही हॉस्टिल आया और अपने रूम मे घुसते ही अरुण से पुछा की एग्ज़ॅम्स की डेट कब से है....और इस साल ये पहला मौका था जब मैने एग्ज़ॅम के पहले बुक खोलकर पढ़ने की जहमत की थी...लेकिन मेरे खास दोस्त अरुण को शायद ये पसंद नही आया इसीलिए वो बार-बार खाने के समान का पॅकेट ज़ोर से खोलते हुए मेरा कॉन्सेंट्रेशन पढ़ाई से हटाना चाहता था...लेकिन मैं भी कोई कमज़ोर खिलाड़ी नही था...मैने कान मे हेडफोन फसाया और पढ़ाई फिर से शुरू कर दी....और सच मे बताऊ तो उस रात मुझे बहुत दिनो बाद सुकून की नींद आई..इतनी शानदार नींद तो कल रात दीपिका मॅम को चोदने के बाद भी नही आई थी....बेसिक एलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग सब्जेक्ट के दो चॅप्टर एक ही दिन मे पढ़ने के बाद सोते वक़्त एश के बारे मे सोचना सच मे मुझे बहुत ज़्यादा सुकून देने वाला था....
______________
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08-18-2019, 01:45 PM,
#50
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
दूसरे दिन मेरी नींद अरुण से पहले खुली, जिसका एक रीज़न शायद ये भी हो सकता था कि अरुण ने रात-भर फ़ेसबुक पर किसी लौंडिया से चाटिंग की होगी...कॉलेज के लिए देर हो रही थी,लेकिन अरुण तो भजिए तल के सो रहा था....

"जागो मोहन प्यारे, सवेरा हो गया, सुर्य आकाश मे अपनी लालिमा बिखेर रहा है और आप है कि यहाँ अपने शयन कक्ष मे चिर निंद्रा मे खोए हुए है...आज महाविद्यालय की तरफ प्रस्थान करने के बारे मे आपका क्या विचार है..."

"तूने कुछ कहा क्या..."आँखे मलते हुए वो उठा और उठने के तुरंत बाद ही बिना ब्रश किए कॉलेज जाने के लिए तैयार होने लगा....

"अबे लोडू, ब्रश तो कर ले कम से कम..."

"शेर कभी ब्रश नही करता, खून हमेशा उनके दांतो मे लगा रहता है "

"ग़ज़ब...."
.
आज मैं पहली बार कॉलेज मे पढ़ने की उम्मीद लिए जा रहा था, मैने बहुत कुच्छ सोच रखा था,जैसे कि कुच्छ भी हो जाए,मैं क्लास मे एक लफ्ज़ भी अपने मुँह से नही निकालूँगा, टीचर्स जो पढ़ाएँगे वो समझ मे आए चाहे ना आए मैं फिर भी पढ़ुंगा...और हुआ भी ऐसा ही , मैने शुरू के फाइव पीरियड्स बिना किसी धमाके के निकाल लिए थे...आज किसी भी टीचर ने मुझे किसी भी बात के लिए नही टोका, और फाइनली मैं आज बहुत खुश था....सबको मेरे इस नये बर्ताव से थोड़ी हैरानी तो हुई लेकिन उन सबसे ज़्यादा हैरान और परेशान मेरा खास दोस्त अरुण था और उससे भी ज़्यादा हैरान और परेशान मैं खुद था....
.
"ओये अरमान, ये क्या लौंदियो की तरह डर कर चुप चाप बैठा है...मर्द बन और पहले की तरह बक्चोदि कर..."

"अभी तो फिलहाल मुझे स्टूडेंट बनना है और मर्द तो मैं हूँ ही..."

"मेरा कहने का मतलब था रियल मर्द बन..."

"चुप कर लवडे,आज मैं पढ़ने के मूड मे हूँ..."

"क्या पढ़ेगा इस बकवास पीरियड मे,"जमहाई लेते हुए अरुण ने कहा"एक तो वैसे भी ये ग्रूप डिस्कशन सब्जेक्ट सबसे बोरिंग सब्जेक्ट है उपर से ये भावना माँ को देखकर नींद और आ जाती है...यदि तू अपने बड़े भैया की नसीहत को इस पीरियड मे छोड़ देगा तो तेरा ही फ़ायदा होगा..."

"अबे बाहर कर देगी ये मोटी..."

"घंटा बाहर करेगी, ज़रा एक नज़र पूरी क्लास मे घुमा कर देख...सब टाइम पास कर रहे है..."
.
अरुण के कहने पर मैने अपनी नज़र एक बार पूरी क्लास मे दौड़ाई,वो सही बोल रहा था...जहाँ भावना माँ एक तरफ किसी टॉपिक पर लेक्चर दे रही थी वही दूसरी तरफ क्लास के सभी स्टूडेंट्स खुद का लेक्चर चला रहे थे...मैने सोचा की इस पीरियड मे अपने दिमाग़ को तोड़ा आराम दिया जाए....
.
"चल आजा लड़कियो के बारे मे बात करते है..."जमहाई मरते हुए मैने कहा...

"वो सब तो ठीक है लेकिन इस फटतू नवीन को इधर से भगा...साला खुद तो डरता रहता है उपर से हमे भी डरता है..."

"रहने दे ,मैं खुद ही यहाँ से चला जाता हूँ..."हम दोनो की बक बक से परेशान होकर नवीन ने कहा....

नवीन मौका देख कर पीछे वाली सीट पर समा गया और नवीन के जाते ही मेरे और अरुण के बीच पढ़ाई की बाते शुरू हो गयी...भावना मॅम का स्लीपिंग लेक्चर अब भी चालू था...भावना मॅम की क्लास को हम दोनो ने इस कदर भुला दिया कि हमे याद तक नही रहा कि अभी हम दोनो कॉलेज मे है...

"अरुण आंड अरमान..क्या चल रहा है उधर.."

"कुछ नही...कुच्छ भी तो नही माँ.."मैने तुरंत मोबाइल बॅग मे डाला और खड़ा हो गया...

"मोबाइल लाओ इधर और होड़ के पास चलने को तैयार हो जाओ"

"सॉरी मॅम,वो किसी की कॉल आ रही थी..."

"इतना एमर्जेन्सी कॉल था तो पर्मिशन लेकर बाहर जा सकते थे,इस तरह से क्लास को चिड़िया घर बनाने की क्या ज़रूरत थी..."

"नेक्स्ट टाइम से बिल्कुल भी ऐसा नही करूँगा..."एक दम प्यार से माफी मॅगने वाले अंदाज़ मे मैने कहा...

"अच्छा ये बताओ,जो सवाल मैने पुचछा था उसका जवाब क्या होगा..."

"रिपीट दा क्वेस्चन प्लीज़ "

भावना मॅम ने क्वेस्चन रिपीट किया लेकिन सब कुछ पानी की तरह मेरे सर के उपर से गया "मॅम, एक बार ग्रूप डिस्कशन का टॉपिक बताओ ना ..."
उसके बाद भावना मॅम मुझे खा जाने वाली नॅज़ारो से देखने लगी और गुस्से से चीखते हुए बोली"निकल जाओ मेरे क्लास से..."

"म्सी चिल्ला मत, वरना एक बार लंड फेकुंगा तो पूरा खानदान चुद जाएगा..."उनकी आँखो मे देखते हुए मैने अपनी आँखो से ही कह दिया और पैर पटकते हुए क्लास से बाहर आया....

क्लास से बाहर निकाले जाने के कुच्छ ही देर बाद ही कुच्छ ऐसा हुआ कि जहाँ कुच्छ देर पहले मैं भावना मॅम को गालियाँ दे रहा था अब वही मैं उनके मोबाइल पर थॅंक यू का मेस्सेज भेजना चाहता था...थॅंक यू का मेस्सेज मोबाइल पर इसलिए क्यूंकी भावना मॅम के सामने जाकर थॅंक यू बोलने की हिम्मत नही थी

"एश....रुक"एश जब क्लास से अकेली निकली तो मैने उसे आवाज़ दी लेकिन उसने मुझे पूरी तरह से इग्नोर किया और आगे चल दी...
"ओये चुड़ैलिन रुक..."

"क्या है "गुस्से से पलट कर वो बोली..

"तुझे भी क्लास से निकाल दिया क्या"उसे हल्का सा धक्का देते हुए मैने कहा..

.जिससे वो भड़क उठी और दूर होते हुए बोली
"माइंड युवर बिहेवियर..."
"चल चुड़ैल,ज़्यादा भाव मत खा...और ये बता कि तुझे क्लास से क्यूँ निकाला है..."
.
क्लासस अभी भी चल रही थी इसलिए कॉरिडर अभी पूरा खाली था,जिसमे मैं एश को परेशान कर रहा था...और दिल ही दिल मे ये भी सोच रहा था कि आज तो मस्त मौका मिला है....

"अरमान, मेरा मूड इस वक़्त बहुत खराब है...दूर रहो मुझसे..."

"ईईईईईई....."
"क्या ईईईई.."
"कुछ नही "उदास होते हुए मैने सोचा कि शायद मैं कभी एश को आइ लव यू नही बोल पाउन्गा...साला वैसे तो बहुत शेर बनता हूँ लेकिन जब इस चुड़ैल को आइ लव यू बोलने की बारी आती है तो हवा टाइट हो जाती है....फिर मैने सोचा कि आइ लव यू बोलने की इतनी जल्दी भी क्या है अभी तो सेकेंड सेमेस्टर ही चल रहा है....

"अब मेरे पीछे मत आना..."कॉरिडर मे आगे बढ़ते हुए एश बोली...

वैसे तो एश ने मुझे उसको फॉलो करने के लिए मना किया था लेकिन मुझे ऐसा लगा जैसे कि वो मुझे अपने साथ चलने का इन्विटेशन दे रही हो....मेरी सोच सही थी या फिर मैं ग़लत था,ये मुझे नही पता...लेकिन उस दिन मैं एश के पीछे-पीछे गया...शुरू मे तो वो गुस्सा हुई लेकिन फिर चुप हो गयी और कॅंटीन के पास पहुचते ही वो मुझपर मुस्कुराने लगी....
.
"तुम पर केस कर दूँगी..."हँसते हुए उसने कहा...

कॅंटीन मे वो जिस टेबल पर बैठी थी मैं भी अब वही बैठ गया था...

"तुम्हे मालूम है एश ,यू आर लाइक माइ कॅट...बोले तो एक दम सेम टू सेम.."

"तुम्हारा दिमाग़ सही नही है,तुम बिल्कुल पागल हो,मैं जा रही हूँ यहाँ से.."तुनक कर एसा वहाँ से उठी और जाने लगी...
.
मैं चाहता तो एश का हाथ पकड़ कर रोक सकता था...लेकिन मेरे सिक्स्त सेन्स ने मुझसे कहा कि "बेटा फ़िल्मो की कॉपी मत कर...वरना तिलमिलाई हुई एश लाफा तो मारेगी ही साथ मे गौतम के साथ पंगा अलग...."

मैने अपने सिक्स्त सेन्स की बात मान ली और एश को एक शब्द भी नही कहा मेरे ऐसा करने की एक और वजह ये थी की....अपुन की भी कोई इज़्ज़त है, अब वो बार-बार मुँह फूलकर भागे तो भाग जाए... उसके बाद मैं लगभग आधे घंटे तक और कॅंटीन मे बैठा रहा और जो मन मे आया उसे माँगा कर खाया और पैसे सीडार के अकाउंट मे एड करा दिए....
.
"आई साला...मज़ा आ गया आज तो..." हॉस्टिल वाली सड़क पर चलते हुए मैने कहा..

मैं अब हॉस्टिल जाकर सीधे सोने के मूड मे था जिससे रात को रिलॅक्स होकर पढ़ सकूँ...लेकिन उसी समय मेरा मोबाइल वाइब्रट होने लगा...

"एमटीएनएल भाई को आज मेरी याद कैसे आ गयी..."अपने पेट पर हाथ फिराते हुए मैने कॉल रिसेव की"हेलो..."

"हाई...हेलो छोड़ और ये बता बॅस्केटबॉल खेल लेता है ना..."

"एक दम झक्कास प्लेयर हूँ..."

"तो आजा बॅस्केटबॉल के ग्राउंड पर,एक प्रॅक्टीस मॅच चल रहा है..."

"अभी..."

"हां अभी..."

"लेकिन अभी तो मैं तैयार नही हूँ, एक तो मैने अभी ही जानवरो की तरह पेट भरा है और दूसरा मैं जीन्स पैंट मे बॅस्केटबॉल कैसे खेलूँगा..."

"जल्दी से इधर पहुच सब जुगाड़ है..."

"आता हूँ "
.
मॅच खेलने का मन तो नही था लेकिन सीडार भाई की बात को टालना मैने मुनासिब नही समझा...बॅस्केटबॉल के ग्राउंड पर पहुचा तो मालूम चला कि मामला एक प्रॅक्टीस मॅच से कहीं ज़्यादा है....जिसकी कहानी मुझे सीडार ने बताई...हुआ कुच्छ यूँ कि हॉस्टिल के किसी सीनियर ने किसी बात पर सिटी वालो को बॅस्केटबॉल मॅच खेलने का चॅलेंज दे दिया और मॅच स्टार्ट होने के कुछ ही देर बाद हॉस्टिल वालो मे से दो प्लेयर जो की मॅच विन्नर थे वो ज़ख़्मी हो गये....इसलिए सीडार ने मुझे मॅच खेलने के लिए बुलाया....इतने लोगो मे से उसने मुझे ही कॉल किया इसकी वजह शायद ये थी कि मैने कुछ दिन पहले सीनियर हॉस्टिल मे बॅस्केटबॉल का नॅशनल प्लेयर होने की हुंकार मारी थी...
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