Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
10-18-2020, 01:18 PM,
#61
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
“आपको अन्देशा था कि क्लब महाडिक के हाथ से निकल गयी तो आपकी शादी नहीं होगी ।” - इन्स्पेक्टर बोला - “इसलिये आपने बाकायदा योजना बनाकर देवसरे का कत्ल कर दिया ।”
“क्या मुश्किल काम था ? मैं उसे उसकी कार पर रिजॉर्ट में लायी और यहां भीतर उसके साथ आयी । मैंने उससे पहले दरख्वास्त की कि वो क्लब को बेचने का इरादा छोड़ दे क्योंकि उसमें मिस्टर महाडिक की बर्बादी छुपी थी । उसने मेरी दरख्वास्त को हंसी में उड़ा दिया । फिर मैंने अपने बैग में से गन निकाल कर उस पर तान दी । वो डर गया । गुहार करने लगा कि मैं गोली न चलाऊं । मैंने फिर कहा कि वो क्लब बेचने का अपना इरादा नहीं छोड़ेगा तो उसकी मौत निश्चित थी । वो बोला वो क्लब को महाडिक को ही ऐसी शर्तों पर बेच देगा कि उसे कीमत अदा करने में कोई दिक्कत पेश नहीं आयेगी । बोला, उसकी वाल सेफ में सेल डीड मौजूद था जिस पर वो उसी वक्त साइन करने को तैयार था । बोला, वो खुद साइन करके सेल डीड मुझे सौंप देगा और मैं बाद में उस पर महाडिक के साइन करा के ला सकती थी । मैं बहुत खुश हुई कि बूढे को आखिरकार अक्ल आ गयी थी लेकिन वो तो मेरे साथ चाल चल रहा था । वो तो मुझे बातों में भरमा के अपनी जान बचाने का मौका तलाशना चाहता था । मिस्टर महाडिक के हक में सेल डीड साइन करने का उसका कोई इरादा असल में था ही नहीं । बार बार यही कहता कि वो अभी सेल डीड साइन करता था वो वाल सेफ पर पहुंचा, पुश बटन डायल पर कोई कोड पंच करके उसने बाहर का दरवाजा खोला । तब मैं ऐन उसके पीछे खड़ी थी...”
“मीनू !” - महाडिक ने फरियाद की - “चुप हो जा ।”
लेकिन वो तो जैसे तब तक किसी सम्मोहन में जकड़ी जा चुकी थी ।
“फिर वो बोला” - वो कहती रही - “कि सेफ का दूसरा दरवाजा चाबी लगाने से खुलता था और चाबी उसकी जेब में थी । मैंने बोला वो जेब से चाबी निकाल सकता था । उसने एक्शन तो जेब से चाबी निकालने का किया लेकिन एकाएक मेरे रिवॉल्वर वाले हाथ पर झपट पड़ा । लकिन वो बूढा था, वो मेरे जितनी तेजी और फुर्ती नहीं दिखा सकता था । मैंने उसे जोर का धक्का दिया तो वो लड़खड़ाता हुआ टेलीविजन के सामने पड़ी कुर्सी पर जाकर ढेर हुआ । उसके उस एक्शन से मैं पक्का समझ गयी कि बूढे का अपनी जिद छोड़ कर मिस्टर महाडिक को फेवर करने का कोई इरादा नहीं था और अब उसकी मौत ही हमारी समस्या का हल था । मैंने टी.वी. ऑन किया और उसके पीछे पहुंच गयी । जब टी.वी. की आवाज कमरे में गूंजने लगी तो मैंने उसे शूट कर दिया ।”
वो खामोश हो गयी ।
कमरे में तब मरघट का सा सन्नाटा था ।
“घिमिरे ने तुम्हें यहां से निकलते देखा था ।” - फिर इन्स्पेक्टर यूं बोला जैसे उसे प्रॉम्प्ट कर रहा हो ।
मुकेश को उस घड़ी लग रहा था कि उसने इसी बात में बचाव की कोई सूरत तलाश करनी थी कि मीनू के हाथ में थमी गन की नाल का रुख तो उसकी तरफ था लेकिन उसकी तवज्जो तब इन्स्पेक्टर की तरफ थी ।
“हां ।” - वो कह रही थी - “टेलीविजन चलता होने की वजह से गोली चलने की आवाज उसने नहीं सुनी हो सकती थी लेकिन बाद में उसे मालूम हो के रहना था कि पीछे क्या हुआ था और किसके किये हुआ था ! वो भीतर घुसा आया होता तो मैं उसे यकीनन जान से मार डालती लेकिन सरेराह मैं उसे शूट नहीं कर सकती थी । मैं उसे नजरअन्दाज करके चली जाती, मेरे पीछे वो भीतर जाता, देवसरे को भीतर मरा पड़ा पाता तो वो फौरन पुलिस को फोन करता कि अभी अभी मैंने देवसरे को शूट कर दिया था । उस घड़ी उस शख्स को कैसे भी सम्भालना मेरे लिये जरूरी था । बाद में कुछ भी होता लेकिन उस घड़ी उसका मुंह बन्द करने के लिये कुछ करना मेरे लिये निहायत जरूरी था ।”
“क्या किया आपने ?” - इन्स्पेक्टर बोला ।
“मैं उसके सामने जा खड़ी हुई और बोली - ‘मिस्टर घिमिरे, मैंने अभी तुम्हारे एम्पलायर को शूट कर दिया है और महसूस करो तो मैंने तुम्हारे पर बहुत बड़ा अहसान किया है । अब बरायमेहरबानी इस बाबत पुलिस को तब तक कुछ न बताना जब तक मेरा तुम्हारे से विस्तृत वार्तालाप न हो जाये’ । उसके बाद मैं कार पर सवार हुई और क्लब लौट आयी । कितनी आसानी से बूढे का खेल खत्म हो गया । विघ्न भी पड़ा तो उसका हल अपने आप ही निकल आया । फिर रात को जब पुलिस मुझे गिरफ्तार करने न पहुंची तो मुझे बिलकुल ही यकीन हो गया कि घिमिरे ने मेरी बाबत अपनी जुबान नहीं खोली थी ।”
“फिर उसका कत्ल क्यों किया ?”
“क्योंकि वो बहुत दब्बू और डरपोक आदमी था । उसने जुबान बन्द रखी थी लेकिन किसी को उस पर जरा भी शक हो जाने पर उसकी जुबान जबरन खुलवाई जा सकती थी । यानी कि वो खतरा तलवार बन कर हमेशा मेरे सिर पर लटका रहता ।”
“आपने उससे विस्तृत वार्तालाप के लिये कहा था । किया तो होगा ऐसा वार्तालाप ?”
“अगले दिन मैं उससे मिली थी । तब वो मुझे बहुत टेंस लगा था । अपने एम्पलायर की मौत का उसे बहुत सदमा लगा हो ऐसी बात चाहे नहीं थी लेकिन गिल्टी कांशस का मारा वो साफ लग रहा था । उसकी कांशस पर ये बोझ भी था कि वो कातिल को जानता था फिर भी उसकी बाबत खामोश था और ये अहसास भी था कि अहसान तो मेरा सच में ही था उस पर । बोला कि उसे संतोष था कि अब वो बहार विला खरीद सकता था । मेरे कुरेदने पर अपनी कांशस पर बोझ की बात उसने कुबूल की लेकिन साथ ही ये भी कहा कि थोड़े किये वो अपनी जुबान नहीं खोलेगा ।”
“थोड़े किये ?”
“हां । इस बात से मेरा भी माथा ठनका था लेकिन उसे थोड़ी और ढील देने का फैसला मैंने फिर भी किया था ।”
“फिर ?”
“फिर आज उसने मुझे फोन किया और बोला कि उसे अपनी गिरफ्तारी का अन्देशा था । वो आवाज से ही ऐसा खौफजदा लग रहा था कि मुझे यकीन हो गया कि गिरफ्तार वो किसी और वजह से होगा और बक वो कुछ और देगा । मैंने उसे हौसला रखने को कहा और समझाया कि मेरे पास एक तरकीब थी जिस पर वो अमल करता तो उसकी गिरफ्तारी का अन्देशा खत्म हो सकता था । मेरी उस बात से वो आश्वस्त हुआ । तब मैंने मुलाकात के लिये उसे उस जगह पहुंचने के लिये राजी किया जहां कि उसकी कार खड़ी पायी थी । खुद मैंने स्विमिंग कास्ट्यूम पहना, अपने बीच बैग में गन रखी, यहां के बीच से टहलती हुई पब्लिक बीच पर पहुंची, वहां से मौकायवारदात पर पहुंची, जाकर घिमिरे की कार में उसकी बगल में बैठी, उसे शूट किया और बैग झुलाती, टहलती वापिस लौट आयी । ईजी ।”
“लिहाजा मच्छर मसलना और आदमजात की जान लेना एक ही मसला हुआ आपके लिये ।”
“जो शख्स एक कत्ल कर चुका हो, उसके लिये ये है ही एक ही मसला । अभी यहां आगे जो होगा वो भी इसीलिये होगा ।”
“आप तीन खून और करेंगी ?”
“मुझे अहसास था कि आगे ऐसी कोई जरूरत सामने आयेगी इसीलिये मैंने इस गन को सम्भाल के रखा हुआ था ।”
“इतने कत्ल करने के बाद - जिसमें एक पुलिस ऑफिसर का कत्ल भी शामिल होगा - फांसी के तख्ते पर झूलने से आपको भगवान भी नहीं बचा सकेगा ।”
“फांसी के तख्ते पर तो मैं पहुंचते पहुंचते पहुंचूंगी, अभी तो मैंने जेल जाने से बचना है जिसकी कि मुझे दहशत है ।”
“आप नहीं बच पायेंगी ।”
तब तक मीनू के गन वाले हाथ पर झपटने की मुकेश पूरी तैयारी कर चुका था, पूरी हिम्मत संजो चुका था लेकिन पहले ही कुछ और हो गया ।
मीनू की बगल में बैठा महाडिक ही बाज की तरह उसके गन वाले हाथ पर झपट पड़ा । पलक झपकते गन मीनू की गिरफ्त से निकल कर महाडिक के हाथ में पहुंच गयी ।
“वैलडन, मिस्टर महाडिक ।” - उठने का उपक्रम करता इन्स्पेक्टर प्रशंसात्मक स्वर में बोला ।
“खबरदार !” - महाडिक हिंसक भाव से बोला ।
इन्स्पेक्टर जैसे हवा में ही फ्रीज हो गया ।
महाडिक ने अपनी जेब में हाथ डाला और उसमें से एक नन्हीं सी रिवॉल्वर बरामद की । उसने रिवॉल्वर इन्स्पेक्टर की तरफ तान दी ।
“वहीं बैठे रहो चुपचाप ।” - उसने आदेश दिया ।
असहाय भाव से गर्दन हिलाते हुए इन्स्पेक्टर ने अपना शरीर कुर्सी पर वापिस ढीला छोड़ दिया ।
मीनू अपने बायें हाथ से अपनी दायीं कलाई मसल रही थी और आश्चर्य और असमंजसपूर्ण भाव से महाडिक की तरफ देख रही थी ।
महाडिक ने मीनू की गन में से गोलियों के क्लिप को लूज किया और अंगूठे के एक्शन से एक एक गोली बाहर गिराने लगा । क्लिप खाली होने तक चार गोलियां नीचे फर्श पर गिर चुकी थीं । उसने खाली क्लिप को वापिस गन में लगाया और गन वापिस मीनू को थमा दी ।
“क्यों किया ?” - वो गुस्से से बोली ।
“क्या क्यों किया ?” - महाडिक शान्ति से बोला - “गोलियां क्यों निकालीं ?”
“गन क्यों छीनी ?”
“क्योंकि इसी में तुम्हारी भलाई थी । जो खूनखराबा करने को तुम आमादा थीं वो तुम्हें बिल्कुल ही खत्म कर देता ।”
“अभी कुछ बाकी दिखाई देता है ?”
“हां । सब कुछ बाकी दिखाई देता है ।”
“क्या ?”
“यहां जो कुछ हुआ, सब जुबानी जमा खर्च हुआ । तुम्हारे खिलाफ थ्योरी के आर्कीटैक्ट माथुर ने खुद अपनी जुबानी कुबूल किया कि ये साबित कुछ नहां कर सकता । तुम्हारे खिलाफ जो वाहिद सबूत है वो ये गन है जिसे तुमने पहले अपने पास रखे रहने की और अब इन पर तानने की हिमाकत की ।”
“और वो जो मैंने सब कुबूल किया ?”
“नहीं साबित किया जा सकता कि तुमने कुछ कुबूल किया, इसलिये समझ लो कि तुमने कुछ कुबूल नहीं किया ।”
“लेकिन...”
“पुलिस तुम्हे गिरफ्तार कर सकती है - किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है शक के बिना पर, ऐसे अख्तियारात है पुलिस को - लेकिन तुम्हारे खिलाफ कोई केस खड़ा नहीं कर सकती इसलिये गिरफ्तार किये नहीं रह सकती । पहले ही पेशी में तुम्हारी जमानत हो जायेगी और फिर तुम्हारा सन्देह लाभ पाकर बरी हो जाना महज वक्त की बात होगा । माथुर को देखो - ये वकील है - इसके मुंह पर लिखा है कि जो मैं कह रहा हूं, सच कह रहा हूं ।”
मीनू ने मुकेश की तरफ देखा और सहमति में सिर हिलाया ।
“तुम्हारे खिलाफ पुख्ता कुछ है तो यो गन है जिसको अभी भी गायब कर देगी तो पीछे कुछ बाकी नहीं बचेगा ।”
“गायब ! गायब कर दूं ?”
“जो कि कोई मुश्किल काम नहीं । सामने इतना बड़ा समुद्र है, वहां से गन इन्हें ढूंढे नहीं मिलेगी ।”
“मैं... मैं क्या करूं ?”
“अभी भी पूछ रही हो क्या करूं ? इस गन के साथ यहां से निकल जाओ । मैं गारन्टी करता हूं कोई तुम्हारे पीछे नहीं आयेगा ।”
“गन... समुद्र में फेंक दूं ?”
“ज्यादा से ज्यादा दूर । इतनी दूर कि गहरे समुद्र में ये रेत के नीचे दब के रह जाये । समझीं ।”
सहमति में सिर हिलाती वो उठ खड़ी हुई ।
“महाडिक” - इन्सपेक्टर सख्ती से बोला - “तुम इसे गलत सलाह दे रहे हो ।”
महाडिक खामोश रहा ।
“ये नहीं बच सकती । कायदे कानून के सात इतनी दीदादिलेरी न कभी चली है, न चलेगी । कोई फर्क पड़ेगा तो ये कि कातिल के मददगार के तौर पर तुम भी लम्बे नपोगे ।”
“टु एड एण्ड अबैट ए क्रिमिनल इज आलसो ए सीरियस क्राइम ।” - मुकेश बोला ।
“सुना तुमने ! इसलिये अगर तुम्हारे में जरा भी अक्ल है और अगर तुम इसके हितचिन्तक हो तो इसे अपने जुर्म की लीपापोती की नहीं, अपने आपको कानून के हवाले करने की सलाह दो । अभी तुमने इसे एक माकूल सलाह दी थी जब ये कहा था कि खूनखराबा करने को ये आमादा थी, वो इसे बिलकुल ही खत्म कर देता । अब ऐसी ही माकूल और नेक सलाह इसे ये दो कि ये आलायकत्ल को मेरे हवाले करने दे और मुल्क के कानून को अपना रास्ता अख्तियार करने दे । बदले में मैं वादा करता हूं कि जो किरदार अभी तुमने निभाया है, मैं उसे भूल जाऊंगा और अदालत में इसके लिये कम से कम सजा की सिफारिश करूंगा ।”
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10-18-2020, 01:18 PM,
#62
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महाडिक ने जैसे वो सब सुना ही नहीं । वो मीनू से बोला - “जाओ । और जैसा मैंने कहा है, वैसा करो ।”
“ये नहीं जा सकती ।” - इन्सपेक्टर उठता हुआ बोला ।
“खबरदार ?”
“खबरदार तो मैं उस घड़ी से हूं जबकि मैंने पुलिस की नौकरी जॉयन की थी । अब नया क्या खबरदार करना चाहते हो मुझे ! किसी मुजरिम ने गन कोई पहली बार नहीं तानी है मेरे पर । मुजरिमों से डरने से पुलिस की नौकरी नहीं चलती इसलिये गोली खाने को मैं सदा तैयार रहता हूं । तुम शौक से गोली चला सकते हो लेकिन जब तक में अपने पैरों पर खड़ा हूं, तब तक ये यहां से नहीं जा सकती । मुजरिम को भागने से रोकने की हो तो मुझे तनख्वाह मिलती है । मैं कैसे इसे यहां से जाने दे सकता हूं !”
“इन्स्पेक्टर ! आखिरी बार वार्न कर रहा हूं । एक कदम भी आगे बढाया तो गोली ।”
“और गोली का मतलब फांसी ।”
“मुझे परवाह नहीं । इस लड़की ने मेरे लिये इतनी कुर्बानी की, उसका बदला चुकाना मेरा फर्ज है । इसने जो किया, गलत किया लेकिन मेरे लिये किया...”
“अपने लिये किया ।”
“हमारे लिये किया । इसलिये इसे यहां से निकल जाने को कह कर भी मैं जो कर रहा हूं, हमारे लिये कर रहा हूं ।”
इन्स्पेक्टर दृढता से उसकी तरफ बढा
“रुक जाओ !” - महाडिक चिल्लाया ।
इन्स्पेक्टर न रुका ।
“मैं टांग में गोली मारूंगा और इतने की जो सजा होगी भुगत लूंगा लेकिन मैं मीनू को एक मौका और जरूर पाने दूंगा । इसलिए फिर कहता हूं रुक जाओ वर्ना....”
चेतावनी का इन्स्पेक्टर पर कोई असर न हुआ ।
“मीनू ! भाग जा !”
उस घड़ी इन्स्पेक्टर के कान यूं खड़े थे जैसे कोई आहट सुनने की कोशिश कर रहा हो ।
मुकेश जनता था कि उसके कान कौन सी आहट सुनने को तरस रहे थे ।
मीनू बाहर को दौड़ चली ।
“शाबाश !” - महाडिक बोला - “शाबाश, मेरी जान । गन गायब हो जाये तो तू सेफ है ।”
तभी बाहर से खटपट जैसी कुछ आवाज हुई फिर एक घुटी हुई जनाना चीख की आवाज ।
फिर सब-इन्स्पेक्टर सोनकर ने भीतर कदम रखा । उसके साथ मीनू थी, उसने उसे बायें हाथ से दबोचा हुआ था और दायें हाथ में थमी रिवॉल्वर उसने उसकी कनपटी से सटाई हुई थी ।
“खबरदार !” - वो कड़क कर बोला - “रिवॉल्वर फेंक दो वर्ना मैं इस लड़की को शूट कर दूंगा ।”
महाडिक ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई और फिर रिवॉल्वर अपनी उंगलियों में से फिसल जाने दी ।
इन्स्पेक्टर ने आगे बढ कर रिवॉल्वर उठा ली ।
तब कहीं जाकर सोनकर ने मीनू को बन्धनमुक्त किया और उसकी कनपटी से रिवॉल्वर हटाई । उसने उसे परे धकेल दिया और सतर्कता की प्रतिमूर्ति बना दरवाजे पर तन कर खड़ा हो गया ।
“मुझे अफसोस है कि मैं अपनी कोशिश में कामयाब न हो सका ।” - पराजित स्वर में महाडिक बोला - “लेकिन मेरी दिली ख्वाहिश थी कि लड़की को एक मौका और मिलता ।” - उसने गहरी सांस ली - “मैं अहसान का बदला न चुका सका ।”
उसने एक हसरतभरी निगाह मीनू पर डाली और फिर सिर झुका लिया ।
***
सुबह दस बजे मुकेश माथुर आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स के ऑफिस में पहुंचा, उसने सीधे टॉप बॉस के चैम्बर का रूख किया ।
नकुल बिहारी आनन्द की प्राइवेट सैक्रेट्री ने सिर उठाकर उस पर निगाह डाली ।
“गुड मार्निग ।” - मुकेश बोला ।
“गुड मार्निंग ।” - वो बोला - “सो यू आर बैक ।”
“तुम्हें क्या दिखाई देता है ? भूत खड़ा है मेरा तुम्हारे सामने ?”
वो हड़बड़ाई । प्रत्यक्षत: उसे मुकेश से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी ।
“आ... आ... आई डोंट अन्डरस्टैण्ड...”
“वाट इज दैट यू डोंट अनडरस्टैण्ड ? वाज आई टाकिंग इन जर्मन ? ऑर इटेलियन ? ऑर फ्रेंच ?”
“वो... वो... वो क्या है कि...”
“एण्ड कॉल मी सर वेन यू आर टाकिंग टु मी ।”
“यस, सर ।” - भौंचक्की सी वो बोली ।
“हेज बिग बॉस अराइव्ड ?”
“यस सर ।”
“टैल हिम आई एक कमिंग इन ।”
मुकेश आगे बढा, और बीच का बन्द दरवाजा खोलकर उसने नकुल बिहारी आनन्द के निजी कक्ष में कदम रखा ।
टेलीफोन का रिसीवर बड़े आनन्द साहब के साथ में था और वो शायद मुकेश की आमद की खबर ही नहीं, उसकी शिकायत भी सुन रहे थे ।
उनके रिसीवर रखने तक मुकेश प्रतीक्षा करता रहा और फिर बोला - “गुड मार्निंग, सर ।”
“गुड मार्निग ।” - वो बोले - “आओ, बैठो ।”
“थैंक्यू सर ।”
“सो यू आर बैक फ्रॉम युअर असाइनमैन्ट ।”
“यस, सर ।”
“फार गुड ?”
“यस सर ।”
“अब जो कहना चाहते हो, जल्दी कहो ।”
“सर, आप सुनना नहीं चाहते तो मैं कुछ कहना नहीं चाहता ।”
“किसने कहा कि मैं सुनना नहीं चाहता ?”
“आपने जल्दी कहने को कहा न, सर, इसलिये सोचा कि....”
“गलत सोचा ।”
“और जल्दी का काम शैतान का होता है ।”
“क्या मतलब ?”
“मैं जो कहूंगा धीरे धीरे इतमीनान से कहूंगा, तभी तो वो आपकी समझ में आयेगा ।”
“क्या !”
“सर, ए वर्ड टु दि वाइज ।”
“माथुर, मैं जब भी तुम्हें मुम्बई से बाहर किसी असाइनमेंट पर भेजता हूं वापिस आकर तुम बहकी बातें करने लगते हो । गोवा से लौटे थे तो तब भी अजीब मिजाज था तुम्हारा और गणपतिपुले से लौटे हो तो अब फिर वैसा ही मिजाज दिखा रहे हो ।”
“सर, आपको वहम हो रहा है । मेरे मिजाज में कोई तब्दीली नहीं है ।”
“अभी श्यामली भी शिकायत कर रही थी । बहुत रुखाई से....”
“यस, सर । मैं भी कहना चाहता था । बहुत रुखाई से पेश आती है वो मेरे से । मेरे खयाल से हमें उसे एटीकेट्स के रिफ्रेशर कोर्स के लिये कहीं भेजना चाहिये, तभी वो फर्म के पार्टनर्स से अदब और तहजीब से पेश आना सीखेगी ।”
“क्या !”
“और पार्टनर और एम्पलाई में फर्क करना सीखेगी । अभी वो ये फर्क नहीं पहचानती या शायद वो आपकी शह पर पहचानना नहीं चाहती ।”
वो भौंचक्के से उसका मुंह देखने लगे ।
“माई डियर ब्वाय” - फिर वो सख्ती से बोलो - “आई एम नाट हैपी विद यू ।”
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10-18-2020, 01:18 PM,
#63
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“हैपी होने के कई तरीके मुमकिन हैं, सब कारगर हैं लेकिन उनकी बाबत मैं आपको फिर कभी बताऊंगा क्योंकि अभी आपके पास टाइम नहीं है ।”
“टा... टाइम नहीं है ?”
“अभी आप मेरी रिपोर्ट सुन रहे हैं । आई मीन सुनना शुरू कर रहे हैं । आई मीन सुनना शुरू करें या ना करें, इस बाबत सोच रहे हैं ।”
“माथुर, तुम्हारी बातों से मुझे एक शक हो रहा है ।”
“क्या, सर ?”
“मुझे लगता है कि ट्रंककॉल पर कोई क्रॉस टाक नहीं होती थी, जो अनापशनाप बोलते थे, तुम्हीं बोलते थे और उसकी जिम्मेदारी से बचने के लिये क्रॉस टाक का हवाला दे देते थे ।”
“ऐसा हो सकता है...”
“तो तुम मानते हो कि...”
“लेकिन हुआ कभी नहीं । क्रॉस टाक क्रॉस टाक ही थी जो ट्रंक लाइन को डिस्टर्ब करती थी ।”
“शुक्र है कि वो डिस्टर्बेंस अब नहीं हो सकती क्योंकि अब हम रूबरू बात कर रहे हैं ।”
“जी हां । शुक्र है । और अफसोस है ।”
“अफसोस !”
“सर, मजा आ जाता था क्रॉस टाक में । कभी शाहरुख बोलता था, कभी रितिक बोलता था और कभी कभी तो ऐश्वर्या की आवाज भी सुनाई दे जाती थी ।”
“माथुर !”
“सॉरी, सर ।”
“बी सीरियस ।”
“यस सर ।”
“एण्ड कम टु दि प्वायन्ट ।”
“यस सर ।”
“और प्वायन्ट ये है कि तुमने अपनी असाइनमेंट को बंगल कर दिया ।”
“जी !”
“तुम हमारे क्लायन्ट की हिफाजत न कर सके ।”
“सर, मिस्टर देवसरे को हिफाजत की जरूरत खुदकुशी से थी, कत्ल की कल्पना न मैं कर सकता था, न आप कर सकते थे ।”
“मैं कैसे कर सकता था ? मैं तो वहां नहीं था ।”
“होते तो भी न कर पाते । कब किसके मन में क्या होता है, ये जानने का आला अभी नहीं बना ।”
“चलो, मैंने मान लिया कि कत्ल की कल्पना तुम नहीं कर सकते थे लेकिन हमेशा उसके साथ तो बने रह सकते थे ! तुम तो ये भी न कर पाये ।”
“कातिल ने न करने दिया । क्योंकि मैं कातिल के षड्यन्त्र का शिकार हुआ । मेरी जगह मिस्टर आनन्द होते या मिस्टर आनन्द होते या खुद आप होते तो भी यही होता ।”
“हूं ।”
“बाई दि वे, लाश मुम्बई पहुंच गयी है, अब आप उसका अन्तिम संस्कार कर सकते हैं ।”
“मैं ! मैं कर सकता हूं ?”
“सर, आप ही ने तो कहा था कि अन्तिम संस्कार हम करेंगे, इसीलिये तो लाश मुम्बई भिजवाई गयी है वर्ना ये काम तो गणपतिपुल में भी हो सकता था ।”
“मैंने कलैक्टिलवली हम कहा था - हमसे मेरा मतलब आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स था, न कि नकुल बिहारी आनन्द था । अन्डरस्टैण्ड ?”
“आई डू नाओ, सर । सो....”
“फर्म से कोई भी इस काम के लिये जा सकता है । मसलन तुम ही जा सकते हो ।”
“यानी कि काला चोर भी ये काम कर सकता है ।”
“क्या मतलब ?”
“अगर काम काले चोर ने ही करना है तो इसे सफेद चोर को ही कर लेने दीजिये ।”
“अरे, क्या मतलब ? क्या कहना चाहते हो ?”
“मिस्टर देवसरे मानते या न मानते थे, ये हकीकत अपनी जगह कायम है कि विनोद पाटिल उनका दामाद है । मेरे खयाल से पाटिल के हाथों ही अन्तिम संस्कार होना बेहतर होगा ।”
“वो ऐसा करना मंजूर करेगा ?”
“जी हां, करेगा ।”
“ठीक है फिर । लैट हिम डू दि जॉब । मौके पर फर्म के प्रतिनिधि के तौर पर तुम....”
“सर, मुझे कोई एतराज नहीं लेकिन मेरे गये से लाश कच्ची पक्की रह गयी तो बुरा होगा, लोग बातें बनायेंगे, फर्म की साख बिगड़ेगी । इसलिये... सो आई फील दैट वन आफ दि आनन्द्स शुड गो ।”
“हूं । ओके, आई विल लुक इन टु इट ।”
“आजू बाजू भी निगाह डाल लीजियेगा । कई बार....”
“माथुर !”
“सॉरी, सर । बहरहाल कम से कम इस बात की आपको खुशी होनी चाहिये कि कातिल पकड़ा गया है ।”
“दैट्स गुड न्यूज । कौन था कातिल ?”
“मीनू सावन्त नाम की एक लड़की ।”
“क्यों किया उसने कत्ल ?”
मुकेश ने वजह सविस्तार बयान की ।
“ओह !” - वो खामोश हुआ तो बड़े आनन्द साहब बोले - “तो उस लड़की ने दो कत्ल किये ?”
“सर, मैंने साफ तो ऐसा बोला ।”
“यस । यस ।”
“यू शुड पे गुड अटेंशन टु वाट युअर जूनियर इज सेईंग ।”
“वाट ! वाट वाज दैट ?”
“नथिंग, सर ।”
“अब पोजीशन क्या है ?”
“वो लड़की गिरफ्तार है । वो शख्स भी गिरफ्तार है जिसकी खातिर उसने खून से अपने हाथ रंगे ?”
“कौन ?”
“सर, दैट इंडीकेट्स दैट यू वर नाट लिसनिंग ।”
“माथुर, माथुर....”
“अनन्त महाडिक ।”
“अब इन दोनों का क्या होगा ?”
“लड़की यकीनन लम्बी सजा पायेगी । महाडिक को भी छोटी मोटी सजा जरूर मिलेगी ।”
“हूं । और जो साइड स्टोरी तुमने सुनायी... जिसमें एक लड़की की दो बार जान लेने की कोशिश की गयी...”
“रिंकी शर्मा उर्फ तनुप्रिया पंडित । वो एक दौलतमन्द बाप की इकलौती गुमशुदा बेटी निकली है और इस वक्त चालीस करोड़ की विपुल धनराशि की मालकिन है । उसका हमलावर - मेहरचन्द करनानी - गिरफ्तार है और इरादायेकत्ल के इलजाम में दस साल के लिये नपेगा ।”
“आई सी ।”
“तमाम फसाद की जड़ आपके क्लायन्ट का दामाद विनोद पाटिल था लेकिन उसका किसी कत्ल से, किसी फसाद से कोई रिश्ता नहीं निकला है ।”
“चालीस करोड़ ! तुम्हें मालूम करना चाहिये था कि क्या उस लड़की को किसी लीगल रिप्रेजेंटेशन की जरूरत थी ! थी तो आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड....”
“सर, उसे यहां के आनन्दों के बिना ही आनन्द ही आनन्द है ।”
“क्या मतलब ?”
“सर, डू आई हैव टु ड्रा यू ए डायग्राम ?”
“माथुर !”
“एण्ड कलर इट ?”
“माथुर !”
“सॉरी, सर । सर, वो क्या है कि उसे पहले से ही उसके दिवंगत पिता के वकील रिप्रेजेंट कर रहे हैं और उनकी फर्म आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स से बहुत बड़ी है ।”
“ऐसा ?”
“ही हां ।”
“हो तो नहीं सकता, तुम कहते हो तो....”
“मैं कहता हूं ।”
“हूं ।” - उन्होंने लम्बी हूंकार भरी और फिर बोले - “चालीस करोड़ की स्माल पर्सेंटेज भी बिग बिजनेस होता.....”
“अफकोर्स, सर ।”
“जो कि हाथ से निकल गया ।”
“हाथ आया कब था ?”
“क्या ?”
“आप महज सपना देख रहे थे ।”
“मैं ! सपना देख रहा था ?”
“जी हां ।”
“मेरी उम्र सपने देखने की है ?”
“सर, नजर जन जमीन के सपने किसी उम्र में भी देखे जा सकते हैं । “
“मे बी यू आर राइट ।”
“आई एम ग्लैड दैट यू थिंक सो ।”
“माथुर !”
“सॉरी, सर ।”
“तुम्हारी जुबान में मैं एक खास तरह की धृष्टता का पुट महसूस कर रहा हूं । काफी देर से महसूस कर रहा हूं । और काफी हद तक उसकी वजह भी समझ पा रहा हूं ।”
“वजह सर ?”
“देवसरे तुम्हें अपनी आधी जायदाद का मालिक बना गया, पता नहीं किस पिनक में बना गया लेकिन बना गया । अगर किसी ने उसकी विल को चैलेंज न किया तो...”
“कोई नहीं करेगा । एक विनोद पाटिल कर सकता था लेकिन उसने अपना इरादा छोड़ दिया है ।”
“दैट्स रीयल गुड फार यू ।”
“इट इनडीड इज, सर ।”
“यू आर ए रिच मैन नाओ ।”
“हाऊ रिच, सर ।”
“रिचर बाई अबाउट फोर करोड़ रुपीज ।”
“जी !”
“देवसरे की तमाम चल अचल सम्पति को इवैल्यूएट कराया गया है । उसका आधा हिस्सा इतना ही बनता है ।”
“चार करोड़ !”
“कल तक तुम्हारी विधवा मां को फिक्र थी कि तुम जिन्दगी में कुछ कर पाओगे या नहीं ! अब उसे वो फिक्र करने की जरूरत नहीं ।”
“लेकिन मैंने तो कुछ भी नहीं किया ।”
“अपने आप भी हुआ तो तुम्हारे लिये हुआ । ऐसा खुशकिस्मत हर कोई नहीं होता ।”
“अब मैं क्या कहूं ! मैं तो अभी तक चमत्कृत हूं ।”
“अब सवाल ये है कि आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स में तुम्हारी क्या पोजीशन होगी !”
“जी ।”
“करोड़पति बन चुके के बाद क्या अभी भी तुम फर्म के नाम के ऐसासियेट्स वाले हिस्से से जुड़े रहना पसन्द करोगे ?”
“मैं बराबर पसन्द करूंगा, सर । आप ही मुझे डिसमिस कर दें तो बात जुदा है ।”
“माई डियर ब्वाय, आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स में किसी की डिसमिसल होती है तो उसकी नाकारेपन से होती है । अगर तुम नकारे ही बने रहना चाहोगे तो, बावजूद तुम्हारे हाथ आये चार करोड़ रुपयों के, तुम्हारी यहां समाई मुश्किल होगी । इसलिये अपने दिवंगत पिता का नाम रोशन करने की कोशिश करो, उनसे बड़े वकील नहीं तो कम से कम उनके मुकाबले का वकील बन के दिखाने की कोशिश करो ।”
“मैं पूरी कोशिश करूंगा, सर ।”
“दिल से ?”
“यस, सर ।”
“कभी अपने आप पर नाकारेपन का इलजाम नहीं आने दोगे ? कभी मेहनत से जी नहीं चुराओगे ?”
Reply
10-18-2020, 01:19 PM,
#64
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
“नैवर सर ।”
“एक सिपाही की सी मुस्तैदी के साथ हमेशा नयी असाइनमेंट के लिये तैयार रहोगे ?”
“यस, सर ।”
“आई एम ग्लैड । अब मेरे पास तुम्हारे लिये एक स्पैशल असाइनमेंट है जिसके तहत तुम्हें दिल्ली जाना होगा ।”
मुकेश जैसे आसमान से गिरा ।
“सर” - बड़ी मुश्किलल से वो बोल पाया - “माई वाइफ...”
“वाट युअर वाइफ ?”
“उसके बच्चा होने वाला है ।”
“तो क्या हुआ ? मर्द का रोल लेईंग में होता है, लांच में उसका कोई रोल नहीं होता । नो ?”
“यस ।” - मुकेश मरे स्वर में बोला ।
“तो सुनो दिल्ली में तुमने क्या करना है....”


समाप्त
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