DesiMasalaBoard साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन
09-13-2020, 12:17 PM,
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साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन!

जीवन की भूलभुलैया में कुछ ऐसे लम्हे आते हैं।

जिन को हम कितना ही चाहें फिर भी न कभी भूल पाते हैं।।

जब मानिनियोँ का मन लाखों मिन्नत मन्नत नहीं मानता है।

तब कभी कभी कोई बिरला रख जान हथेली ठानता है।।

कमसिन कातिल कामिनियाँ भी होती कुर्बां कुर्बानी पर।

न्यौछावर कर देती वह सब कुछ ऐसी वीरल जवानी पर।

राहों में मिले चलते चलते हमराही हमारे आज हैं वह।

जिनको ना कभी देखा भी था देखो हम बिस्तर आज हैं वह।।

वह क्या दिन थे! आज भी उन दिनोंकी याद आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वह खूबसूरत वादियां, वह दिलचश्प नज़ारे, वह जीवन और मौत की टक्कर, वह तनाव भरे दिन और रातें, वह उन्मादक बाहें, वह टेढ़ी निगाहें, वह गर्म आहें, वह दुर्गम राहें और वह बदन से बदन के मिलन की चाहें!!

यह कहानी सिर्फ मनोरंजन के आशय से लिखी गयी है। इनका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कुछ भी लेना देना नहीं है और यह कहानी किसी भी सरकारी या गैर सरकारी संस्थान या समाज की ना तो सच्चाई दर्शाता है और ना ही यह कहानी उन पर कोई समीक्षा या टिपण्णी करने के आशय से लिखी गयी है।

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सुनील एक सम्मानित और देश विदेश में काफी प्रसिद्ध राजकीय पत्रकार थे। देश की राजकीय घटना पर उनकी अच्छी खासी पकड़ मानी जाती थी। वह ख़ास तौर पर देश की सुरक्षा सम्बंधित घटनाओं पर लेख लिखते थे। देश की सुरक्षा सेवाओं से जुड़े हुए लोगो में उनका काफी उठना बैठना होता था।

उन दिनों सुनील करीब ४० साल के थे और उनकी पत्नी सुनीता करीब ३५ की होगी। सुनील और उनकी पत्नी सुनीता उनकी एक संतान के साथ एक आर्मी हाउसिंग कॉलोनी में किराए के मकान में रहने के लिए आये थे। उनका अपना घर नजदीक की ही कॉलोनी में ही निर्माणरत था।

सुनील की बीबी सुनीता करीब ३५ की होते हुए भी २५ साल की ही दिखती थी। खान पान पर कडा नियत्रण और नियमित व्यायाम और योग के कारण उसने अपना आकार एकदम चुस्त रखा था। सुनीता का चेहरा वयस्क लगता ही नहीं था। उसके स्तन परिपक्व होते हुए भी तने और कसे हुए थे। उसके स्तन ३४ + और स्तन सी कप साइज के थे।

व्यवहार और विचार में आधुनिक होते हुए भी सुनीता के मन पर कौटुम्बिक परम्परा का काफी प्रभाव था। कई बार जब ख़ास प्रसंग पर वह राजस्थानी लिबास में सुसज्जित होकर निकलती थी तो उसकी जवानी और रूप देख कर कई दिल टूट जाते थे। राजस्थानी चुनरी, चोली और घाघरे में वह ऐसे जँचती थी की दूसरों की तो बात ही क्या, स्त्रियां भी सुनीता को ताकने से बाज ना आती थीं। सुनीता को ऐसे सजने पर कई मर्दों की मर्दानगी फूल जाती थी और कईयों की तो बहने भी लग जाती थी।

सुनीता के खानदान राजपूती परम्परा से प्रभावित था। कहते हैं की हल्दीघाटी की लड़ाई में सुनीता के दादा पर दादा हँसते हँसते लड़ते हुए शहीद हो गए थे। सुनीता के पिता भी कुछ ऐसी ही भावना रखते थे और अपनी बेटी को कई बार राजपूती शान की कहानियां सुनाते थे। उनका कहना था की असली राजपूत एहसान करने वाले पर अपना तन और मन कुर्बान कर देता है, पर अपने शत्रु को वह बख्शता नहीं है। उन्होंने दो बड़ी लड़ाइयां लड़ी और घायल भी हुए। पर उन्हें एक अफ़सोस रहा की वह रिटायर होने से पहले अपनी जान कोई भी लड़ाई में देश के लिए बलिदान नहीं कर पाए।

सुनीता की कमर का घुमाव और उसकी गाँड़ इतनी चुस्त और लचीली थी की चाहे कोई भी पोशाक क्यों ना पहनी हो वह गजब की सेक्सी लगती थी। उस कॉलोनी के ब्लॉक में उनके आते ही सुनील की बीबी सुनीता के आशिकों की जैसे झड़ी लग गयी थी। दूध वाले से लेकर अखबार वाला। सब्जी वाले से लेकर हमारी कॉलोनी के जवान बूढ़े बच्चे सब उसके दीवाने थे।

स्कूल और कॉलेज में सुनीता एक अच्छी खासी खिलाड़ी थी। वह लम्बी कूद, दौड़ इत्यादि खेल प्रतियोगिता में अव्वल रहती थी। इसके कारण उसका बदन गठीला और चुस्त था। उन दिनों भी वह हर सुबह चड्डी पहन कर उनकी छत पर व्यायाम करती रहती थी। जब वह व्यायाम करती थी तो कई बार उनके सामने रहते एक आर्मी अफसर कर्नल जसवंत सिंह को सुनीता को चोरी चोरी ताकते हुए सुनीता के पति सुनील ने देख लिया था। हालांकि सुनील को कर्नल जसवंत सिंह से मिलने का मौक़ा नहीं मिला था, सुनील ने कर्नल साहब की तस्वीर अखबारों में देखि थी और उन के बारेमें काफी पढ़ा था। कर्नल जसवंत सिंह जैसे सुप्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति को अपनी बीबी को ताकते हुए देख कर सुनील मन ही मन मुस्करा देता था। कर्नल साहब के घर की एक खिड़की से सुनील के घर की छत साफ़ दिखती थी।

चूँकि मर्द लोग हमेशा सुनीता को घूरते रहते थे तो सुनील हमेशा अपनी बीबी सुनीता से चुटकी लेता रहता था। उसे छेड़ता रहता था की कहीं वह किसी छैल छबीले के चक्कर में फँस ना जाये।

सुनीता भी अपने पति सुनील को यह कह कर शरारत से हँस कर उलाहना देती रहती की, "अरे डार्लिंग अगर तुम्हें ऐसा लगता है की दूसरे लोग तुम्हारी बीबी से ताक झाँक करते हैं तो तुम अपनी बीबी को या ताक झाँक करने वालों को रोकते क्यों नहीं? यदि कहीं किसी छैल छबीले ने तुम्हारी बीबी को फाँस लिया तो फिर तुम तो हाथ मलते ही रह जाओगे। फिर मुझे यह ना कहना की अरे यह क्या हो गया? जिसकी बीबी खूबसूरत हो ना, तो उस पर नजर रखनी चाहिए।"

ऐसे ही उनकी नोंक झोंक चलती रहती थी। सुनील सुनीता की बातों को हँस कर टाल देता था। उसे सुनीता से कोई शिकायत नहीं थी। उसे अपनी बीबी पर खुदसे भी ज्यादा भरोसा था। सुनील और सुनीता एक ही कॉलेज में पढ़े थे। कॉलेज में भी सुनीता पर कई लड़के मरते थे, यह बात सुनील भाली भाँती जानता था। पर कभी सुनीता ने उनमें से किसी को भी अपने करीब फटकने नहीं दिया था।
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09-13-2020, 12:17 PM,
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बल्कि सुनीता से जब कॉलेज में ही सुनील की मुलाक़ात हुई और धीरे धीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गयी और शादी भी पक्की हो गयी तब भी सुनीता सुनील को आगे बढ़ने का कोई मौक़ा नहीं देती थी। उनमें चुम्माचाटी तो चलती थी पर सुनीता सुनील को वहीँ रोक देती थी।

सुनीता एक प्राथमिक स्कूल में अंग्रेजी शिक्षक की नौकरी करती थी। और वहाँ भी स्कूल के प्रिंसिपल से लेकर सब उसके दीवाने थे।

वैसे तो सुनील की प्यारी बीबी सुनीता काफी शर्मीली थी, पर चुदाई के समय बिस्तर में एकदम शेरनी की तरह गरम हो जाती थी और जब वह मूड़ में होती थी तो गजब की चुदाई करवाती थी। सुनीता की पतली कमर सुनील की टांगों के बिच स्थापित जनाब को हमेशा वक्त बे वक्त खड़ा कर देती थी। अगर समय होता और मौक़ा मिलता तो सुनील सुनीता को वहीँ पकड़ कर चोद देता। पर समय गुजरते उनकी चुदाई कुछ ठंडी पड़ने लगी क्यूंकि सुनीता स्कूल में और घर के कामों में व्यस्त रहने लगी और सुनील उसके व्यावसायिक कामों में।

सुनील और सुनीता कई बार बिस्तर में पड़े पड़े उनकी शादी के कुछ सालों तक की घमासान चुदाई के दिनों को याद करते रहते थे। सोचते थे कुछ ऐसा हो जाए की वह दिन फिर आ जाएँ। उनका कई बार मन करता की वह कहीं थोड़े दिन के लिए ही सही, छुट्टी लें और सब रिश्ते दारी से दूर कहीं जंगलों में, पहाड़ियों में झरनों के किनारे कुछ दिन गुजारें, जिससे वह उनकी बैटरियां चार्ज कर पाएं और अपनी जवानी के दिनों का मजा फिर से उठाने लगें, फिर वही चुदाई करें और खूब मौज मनाएं।

चूँकि दोनों पति पत्नी मिलनसार स्वभाव के थे इसलिए सोचते थे की अगर कहीं कोई उनके ही समवयस्क ग्रुप के साथ में जाने का मौक़ा मिले तो और भी मजा आये। सुनीता के स्कूल में छुट्टियां होने के बावजूद सुनील अत्याधिक व्यस्तता के चलते कोई कार्यक्रम बन नहीं पा रहा था। सुनीता को मूवीज और घूमने का काफी शौक था पर यहाँ भी सुनील गुनेहगार ही साबित होता था। इस के कारण सुनीता अपने पति सुनील से काफी नाराज रहती थी।

सुनील को अपनी पत्नी को खुले में छेड़ने में बड़ा मजा आता था। अगर वह कहीं बाहर जाते तो सुनील सुनीता को खुले में छेड़ने का मौक़ा नहीं चुकता था। कई बार वह उसे सिनेमा हाल में या फिर रेस्तोरां में छेड़ता रहता था। दूसरे लोग जब देखते और आँखे फिरा लेते तो उसे बड़ी उत्तेजना होती थी। सुनीता भी कई बार नाराज होती तो कई बार उसका साथ देती।

नए घर में आने के कुछ ही दिनों में सुनीता को करीब पड़ोस की सब महिलाएं भी जानने लगीं क्यूंकि एक तो वह एकदम सरल और मधुर स्वभाव की थी। दूसरे उसे किसी से भी जान पहचान करने में समय नहीं लगता था। सब्जी लेते हुए, आते जाते पड़ोसियों के साथ वह आसानी से हेलो, हाय से शुरू कर कई बार अच्छी खासी बातें कर लेती थीं।

घर में सुनील जब अपने कमरे में बैठकर कंप्यूटर पर कुछ काम कर रहा होता था तो अक्सर उसे खिड़की में से सामने के फ्लैट में रहने वाले कर्नल साहब और उनकी पत्नी दिखाई देते थे। उनकी एक बेटी थोड़ी बड़ी थी और उनदिनों कॉलेज जाया करती थी।

कर्नल साहब और सुनील की पहेली बार जान पहचान कुछ अजीबो गरीब तरीके से हुई। एकदिन सुनील कुछ जल्दी में घर आया तो उसने अपनी कार कर्नल साहब के गेराज के सामने खड़ी कर दी थी। शायद सुनील को जल्दी टॉयलेट जाना था। घर में आने के बाद वह भूल गया की उसे अपनी गाडी हटानी चाहिए थी। अचानक सुनील के घर के दरवाजे की घंटी बजी। उसने जैसे ही दरवाजा खोला तो कर्नल जसवंत सिंह को बड़े ही गुस्से में पाया। आते ही वह सुनील को देख कर गरज पड़े, "श्रीमान, आप अपनी कार को ठीक तरह से क्यों नहीं पार्क पर सकते?"

सुनील ने उनको बड़े सम्मान से बैठने के लिए कहा तो बोल पड़े, " मुझे बैठना नहीं है। आप को समझना चाहिए की कई बार कोई जल्दी में होता ही तो कितनी दिक्कत होती है..."

आगे वह कुछ बोलने वाले ही थे की सुनील की पत्नी सुनीता जो कुछ ही समय पहले बाथरूम से निकली ही थी, चाय बना कर रसोई से चाय का प्याला लेकर ड्राइंगरूम में दाखिल हुई। सुनीता के बाल घने, गीले और बिखरे हुए थे और उनको सुनीता ने तौलिये में ढक कर लपेट रखा था।

ब्लाउज गीला होने के कारण सुनीता की छाती पर उसके फुले हुए स्तन कुछ ज्यादा ही उभरे हुए लग रहे थे। सुनीता का चेहरे की लालिमा देखते ही बनती थी। सुनीता को इस हाल में देखते ही कर्नल साहब की बोलती बंद हो गयी। सुनीता ने आगे बढ़कर कर्नल साहब के सामने ही झुक कर मेज पर जैसे ही चाय का कप रखा तो सुनील ने देखा की कर्नल साहब की आँखें सुनीता के वक्षों के बिच का अंतराल देखते ही फ़टी की फटी रह गयीं।

सुनीता ने चाय का कप रखकर बड़े ही सम्मान से कर्नल साहब को नमस्ते किया और बोली, "आप ज्योतिजी के हस्बैंड हैं ना? बहुत अच्छीं हैं ज्योतिजी।"

सुनीता की मीठी आवाज सुनते ही कर्नल साहब की सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। वह कुछ बोल नहीं पाए तब सुनीता ने कहा, "सर, आप कुछ कह रहे थे न?"

जसवंत सिंघजी का गुस्सा सुनीता की सूरत और शब्दों को सुनकर हवा हो गया था। वह झिझकते हुए बड़बड़ाने लगे, "नहीं, कोई ख़ास बात नहीं, हमें कहीं जाना था तो मैं (सुनीलकी और इशारा करते हुए बोले) श्रीमान से आपकी गाडी की चाभी मांगने आया था। आपकी गाडी थोड़ी हटानी थी।"

सुनीता समझ गयी की जरूर उसके पति सुनील ने कार को कर्नल साहब की कार के सामने पार्क कर दिया होगा। वह एकदम से हँस दी और बोली, "साहब, मेरे पति की और से मैं आपसे माफ़ी मांगती हूँ। वह हैं ही ऐसे। उन्हें अपने काम के अलावा कुछ दिखता ही नहीं। व्यावहारिक वस्तुओं का तो उन्हें कुछ ध्यान ही नहीं रहता। हड़बड़ाहट मैं शायद उन्होंने अपनी कार आपकी कार के सामने रख दी होगी। आप प्लीज बैठिये और चाय पीजिये।" फिर सुनीता ने मेरी और घूम कर मुझे उलाहना देते हुए कहा, "आप को ध्यान रखना चाहिए। जाइये और अपनी कार हटाइये।"

फिर कर्नल साहब की और मीठी नजर से देखते हुए बोली, "माफ़ कीजिये। आगे से यह ध्यान रखेंगे। पर आप प्लीज चाय पीजिये और (मेज पर रखे कुछ नास्ते की चीजों की और इशारा करते हुए बोली) और कुछ लीजिये ना प्लीज?"

सुनील हड़बड़ाहट में ही उठे और अपनी कार की चाभी ले कर भाग कर अपनी कार हटाने के लिए सीढ़ियों की और निचे उतरने के लिए भागे। सुनीता ठीक कर्नल साहब के सामने एक कुर्सी खिसका कर थोड़ा सा कर्नल साहब की और झुक कर बैठ गयी और उन्हें अपनी और ताकते हुए देख कर थोड़ी शर्मायी।

शायद सुनीता कहना चाह रही थी की "सर आप क्या देख रहे हैं?" पर झिझकती हुई बोली, "सर! आप क्या सोच रहे हैं? चाय पीजिये ना? ठंडी हो जायेगी।" सुनीता को पता नहीं था उसे कर्नल साहब के ठीक सामने उस हाल में बैठा हुआ देख कर कर्नल साहब कितने गरम हो रहे थे।

कर्नल साहब को ध्यान आया की उनकी नजरें सुनीता के बड़े बड़े खूबसूरत स्तन मंडल के बिच वाली खाई से हटने का नाम नहीं ले रहे थी। सुनीता का उलाहना सुनकर कर्नल साहब ने अपनी नजर सुनीता के ऊपर से हटायीं और कमरे के चारों और देखने लगे। क्या बोले वह समझ नहीं आया तो वह थोड़ी सी खिसियानी शक्ल बना कर बोले, "सुनीताजी आप का घर आपने बड़ी ही सुन्दर तरीके से सजाया है। लगता है आप भी ज्योति की तरह ही सफाई पसंद हैं।"

कर्नल साहब की बात सुन कर सुनीता हँस पड़ी और बोली, "नहीं जी, ऐसी कोई बात नहीं। बस थोड़ा घर ठीक ठाक रखना मुझे अच्छा लगता है। पर भला ज्योतिजी तो बड़ी ही होनहार हैं। उनसे बातें करतें हैं तो वक्त कहाँ चल जाता है पता ही नहीं लगता। हम जब कल मार्किट में मिले थे तो ज्योति जी कह रही थीं... "

और फिर सुनीता की जबान बे लगाम शुरू हो गयी और कर्नल साहब उसकी हाँ में हाँ मिलाते बिना रोक टोक किये सुनते ही गए। वह भूल गए की उनको कहीं जाना था और उनकी पत्नी निचे कार के पास उन का इंतजार कर रही थी। जाहिर है उनको सुनीता की बातों में कोई ख़ास दिलचश्पी नहीं थी। पर बात करते करते सुनीता के हाथों की मुद्राएँ , बार बार सुनीता की गालों पर लटक जाती जुल्फ को हटाने की प्यारी कवायद, आँखों को मटकाने का तरिका, सुनीता की अंगभंगिमा और उसके बदन की कामुकता ने उनका मन हर लिया था।
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09-13-2020, 12:17 PM,
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RE: DesiMasalaBoard साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन
जब सुनील अपनी कार हटा कर वापस आये तो कर्नल साहब की तंद्रा टूटी और सुनीता की जबान रुकी।

सुनील ने देखा की सुनीता ने कर्नल साहब को अपनी चबड चबड में फाँस लिया था तो वह बोले, "अरे जानू, कर्नल साहब जल्दी में हैं। उनको कहीं जाना है।"

फिर कर्नल साहब की और मुड़कर सुनील ने कहा, "माफ़ कीजिये। आप को मेरी वजह से परेशानी झेलनी पड़ी।"

अपनी पत्नी सुनीता की और देखते हुए बोले, "डार्लिंग अब बस भी करो। कर्नल साहब को बाहर जाना है और ज्योतिजी उनका निचे इंतजार कर रहीं है।"

सुनील कर्नल साहब की और मुड़ कर बोले, "सुनीता जैसे ही कोई उसकी बातों में थड़ी सी भी दिलचश्पी दिखाता है तो शुरू हो जाती है और फिर रुकने का नाम नहीं लेती। लगता है उसने आप को बहुत बोर कर दिया।"

कर्नल साहब अब एकदम बदल चुके थे। उन्होंने चाय का कप उठाया और बोले, "नहीं जी ऐसी कोई बात नहीं। वह बड़ी प्यारी बातें करती हैं।" सुनील की और अपना एक हाथ आगे करते हुए बोले, "मैं कर्नल जसवंत सिंह हूँ।"

फिर वह सुनीता की और घूमकर बोले, "और हाँ ज्योति मेरी पत्नी है। वह आपकी बड़ी तारीफ़ कर रही थी।"

सुनील ने भी अपना हाथ आगे कर अपना परिचय देते हुए कहा, "मैं सुनील मडगाँव कर हूँ। मैं एक साधारण सा पत्रकार हूँ। आप मुझे सुनील कह कर ही बुलाइये। और यह मेरी पत्नी सुनीता है, जिनके बारे में तो आप जान ही चुके हैं।" सुनील ने हलके कटाक्ष के अंदाज से कहा।

सुनील ने जैसे ही अपनी पहचान दी तो कर्नल साहब उछल पड़े और बोले, "अरे भाई साहब! क्या आप वही श्रीमान सुनील मडगाँव कर हैं जिनकी कलम से हमारी मिनिस्ट्री भी डरती है?"

सुनील ने कर्नल साहब का नाम एक सुप्रतिष्ठित और अति सम्मानित आर्मी अफसर के रूप में सुन रखा था। सुनील ने हँस कर कर्नल साहब से कहा, "कर्नल साहब आप क्या बात कर रहे हैं? आप कोई कम हैं क्या? मैं समझता हूँ आप जैसा शायद ही कोई सम्मानित आर्मी अफसर होगा। आप हमारे देश के गौरव हैं। और जहां तक मेरी बात है, तो आप देख रहे हैं। मेरी बीबी मुझे कैसे डाँट रही है? अरे भाई मेरी बीबी भी मुझसे डरती नहीं है। मिनिस्ट्री तो बहुत दूर की बात है।"

सुनील की बात सुनकर सब जोर से हँस पड़े। चाय पीते ही मन ना करते हुए भी कर्नल साहब उठ खड़े हुए और बोले, "आप दोनों, प्लीज हमारे घर जरूर आइये। ज्योति को और मुझे भी बहुत अच्छा लगेगा।"

कर्नल साहब बाहर से कठोर पर अंदर से काफी मुलायम और संवेदनशील मिज़ाज के थे। यह बात को नकारा नहीं जा सकता की सुनीता को देखते ही कर्नल साहब उसकी और आकर्षित हुए थे। सुनीता का व्यक्तित्व था ही कुछ ऐसा। उपरसे कर्नल साहब का रंगीन मिजाज़। सुनीता के कमसिन और खूब सूरत बदन के अलावा उसकी सादगी और मिठास कर्नल साहब के दिल को छू गयी थी। अपने कार्य काल में उनकी जान पहचान कई अति खूबसूरत स्त्रियों से हुई थी। आर्मी अफसर की पत्नियाँ , बेटियाँ, उनकी रिश्तेदार और कई सामाजिक प्रसंगों में उनके मित्र और साथीदार महिलाओं से उनकी मुलाक़ात और जान पहचान अक्सर होती थी।

जसवंत सिंह (कर्नल साहब) के अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व, सुदृढ़ शरीर, ऊँचे ओहदे और मीठे स्वभाव के कारण उनको कभी किसी सुन्दर और वांछनीय स्त्री के पीछे पड़ने की जरुरत नहीं पड़ी। अक्सर कई बला की सुन्दर स्त्रियां पार्टियों में उनको अपने शरीर की आग बुझाने के लिए इशारा कर देती थीं। जसवंत सिंह ने शुरुआत के दिनों में, शादी से पहले कई युवतियों का कौमार्य भंग किया था और कईयों की तन की भूख शांत की थी। उनमें से कई तो शादी होने के बाद भी अपने पति से छुपकर कर्नल साहब से चुदवाने के लिए लालायित रहतीं थीं और मौक़ा मिलने पर चुदवाती भी थीं।

कर्नल साहब के साथ जो स्त्री एक बार सोती थी, उसके लिए कर्नल साहब को भुल जाना नामुमकिन सा होता था। आर्मी परिवार में और खास कर स्त्रियों में चोरी छुपी यह आम अफवाह थी की एक बार किसी औरत ने अगर जसवंत सिंह का संग कर लिया (स्पष्ट भाषा में कहे तो अगर किसी औरत को कर्नल साहब से चुदवा ने का मौक़ा मिल गया) तो वह कर्नल साहब के लण्ड के बारेमें ही सोचती रहती थी।

चुदवाने की बात छोड़िये, अगर किसी औरत को कर्नल साहब से बात भी करने का मौक़ा मिल जाए तो ऐसा कम ही होता था की वह उनकी दीवानी ना हो। कर्नल साहब की बातें सरल और मीठी होती थीं। वह महिलाओं के प्रति बड़ी ही शालीनता से पेश आते थे। उनकी बातों में सरलता, मिठास के साथ साथ जोश, उमंग और अपने देश के प्रति मर मिटने की भावना साफ़ प्रतीत होती थी। साथ में शरारत, मशखरापन और हाजिर जवाबी के लिए वह ख़ास जाने जाते थे।

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09-13-2020, 12:17 PM,
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RE: DesiMasalaBoard साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन
सालों पहले की बात है। कर्नल साहब की शादी भी तो ऐसे ही हुई थी। एक समारोह में युवा कर्नल की जब ज्योति से पहली बार मुलाक़ात हुई तो उनमें ज्यादा बात नहीं हो पायी थी। किसी पारस्परिक दोस्त ने उनका एक दूसरे से परिचय करवाया और बस। पर उनकी आंखें जरूर मिलीं। और आँखें मिलते ही आग तो दोनों ही तरफ से लगी। कर्नल साहब को ज्योति पहली नजर में ही भा गयी थी। ज्योति की आँखों में छिपी चंचलता और शौखपन जसवंत सिंह के दिल को भेद कर पार गयी थी। ज्योति के बदन को देखकर उनपर जैसे बिजली ही गिर गयी थी। कई दिन बीत गए पर उन दोनों की दूसरी मुलाक़ात नहीं हुई।

जसवंत सिंह की नजरें जहां भी आर्मी वालों का समारोह या प्रोग्राम होता था, ज्योति को ढूंढती रहती थीं। ज्योति का भी वही हाल था।

ज्योति के नाक नक्श, चाल, वेशभूषा, बदन का आकार और उसका अल्हड़पन ने उन्हें पहेली ही मुलाक़ात में ही विचलित कर दिया। ज्योति ने भी तो कप्तान जसवंत सिंह (उस समय वह कप्तान जसवंत सिंह के नाम से जाने जाते थे) के बारे में काफी सुन रखा था।

जसवंत सिंह से ज्योति की दूसरी बार मुलाक़ात आर्मी क्लब के एक सांस्कृतिक समारोह के दौरान हुई। दोनों में परस्पर आकर्षण तो था ही। जसवंत सिंह ने ज्योति के पापा, जो की एक निवृत्त आर्मी अफसर थे, उनके निचे काफी समय तक काम किया था, उनके बारे में पूछने के बहाने वह ज्योति के पास पहुंचे। कुछ बातचीत हुई, कुछ और जान पहचान हुई, कुछ शोखियाँ, कुछ शरारत हुई, नजरों से नजरें मिली और आग दावानल बन गयी।

ज्योति जसवंत सिंह की पहले से ही दीवानी तो थी ही। बिच के कुछ हफ्ते जसवंत सिंह को ना मिलने के कारण ज्योति इतनी बेचैन और परेशान हो गयी थी की उस बार ज्योति ने तय किया की वह हाथ में आये मौके को नहीं गँवायेगी। बिना सोचे समझे ही सारी लाज शर्म को ताक पर रख कर डांस करते हुए वह जसवंत सिंह के गले लग गयी और बेतकल्लुफ और बेझिझक जसवंत सिंह के कानों में बोली, "मैं आज रात आपसे चुदवाना चाहती हूँ। क्या आप मुझे चोदोगे?"

जसवंत सिंह स्तंभित हो कर ज्योति की और अचम्भे से देखन लगे तो ज्योति ने कहा, "मैं नशे में नहीं हूँ। मैं आपको कई हफ़्तों से देख रही हूँ। मैंने आपके बारे में काफी सूना भी है। मेरे पापा आपके बड़े प्रशंषक हैं। आज का मेरा यह फैसला मैंने कोई भावावेश में नहीं लिया है। मैंने तय किया था की मैं आपसे चुदवा कर ही अपना कौमार्य भंग करुँगी। मैं पिछले कई हफ़्तों से आपसे ऐसे ही मौके पर मिलने के लिए तलाश रही ही।"

ज्योति की इतनी स्पष्ट और बेबाक ख्वाहिश ने जसवंत सिंह को कुछ भी बोल ने का मौक़ा नहीं दिया। वह ज्योति की इतनी गंभीर बात को ठुकरा ना सके। कप्तान जसवंत सिंह ने ने वहीँ क्लब में ही एक कमरा बुक किया। पार्टी खत्म होने के बाद ज्योति अपने माता और पिताजी से कुछ बहाना करके सबसे नजरें बचा कर जसवंत सिंह के कमरे में चुपचाप चली गयी। ज्योति की ऐसी हिम्मत देख कर जसवंत सिंह हैरान रह गए।

उस रात जसवंत सिंह ने जब ज्योति को पहली बार नग्न अवस्था में देखा तो उसे देखते ही रह गए। ज्योति की अंग भंगिमा देख कर उन्हें ऐसा लगा जैसे जगत के विश्वकर्मा ने अपनी सबसे ज्यादा खूबसूरत कला के नमूने को इस धरती पर भेजा हो। ज्योति के खुले, काले, घने बाल उसके कूल्हे तक पहुँच रहे थे। ज्योति का सुआकार नाक, उसके रसीले होँठ, उसके सुबह की लालिमा के सामान गुलाबी गाल उसके ऊपर लटकी हुई एक जुल्फ और लम्बी गर्दन ज्योति की जवानी को पूरा निखार दे रही थी।

लम्बी गर्दन, छाती पर सख्ती से सर ऊंचा कर खड़े और फुले हुए उसके स्तन मंडल जिसकी चोटी पर फूली हुई गुलाबी निप्पलेँ ऐसे कड़ी खड़ी थीं जैसे वह जसवंत सिंह को कह रही थीं, "आओ और मुझे मसल कर, दबा कर, चूस कर अपनी और मेरी बरसों की प्यास बुझाओ।"

पतली कमर पर बिलकुल केंद्र बिंदु में स्थित गहरी ढूंटी जिसके निचे थोड़ा सा उभरा हुआ पेट और जाँघ को मिलाने वाला भाग उरुसंधि, नशीली साफ़ गुलाबी चूत के निचे गोरी सुआकार जाँघें और पीछे की और लम्बे बदन पर ज़रा से उभरे हुए कूल्हे देख कर जसवंत सिंह, जिन्होंने पहले कई खूब सूरत स्त्रियों को भली भाँती नंगा देखा था, उनके मुंह से भी आह निकल गयी।

ज्योति भी जब कप्तान जसवंत सिंह के सख्त नग्न बदन से रूबरू हुई तो उसे अपनी पसंद पर गर्व हुआ। जसवंत सिंह के बाजुओं के फुले हुए डोले, उनका मरदाना घने बालों से आच्छादित चौड़ा सीना और सीने की सख्त माँस पेशियाँ, उनके काँधों का आकार, उनकी चौड़ी छाती के तले उनकी छोटी सी कमर और सबसे अचम्भा और विस्मयाकुल पैदा करने वाला उनका लंबा, मोटा, छड़ के सामान खड़ा हुआ लण्ड को देख कर ज्योति की सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। ज्योति ने जो कप्तान जसवंत सिंह के बारे में सूना था उससे कहीं ज्यादा उसने पाया।

जसवंत सिंह का लण्ड देख कर ज्योति समझ नहीं पायी की कोई भी औरत कैसे ऐसे कड़े, मोटे, लम्बे और खड़े लण्ड को अपनी छोटी सी चूत में डाल पाएगी? कुछ अरसे तक चुदवाने के बाद तो शायद यह संभव हो सके, पर ज्योति का तो यह पहला मौक़ा था। जसवंत सिंह ने ज्योति को अपने लण्ड को ध्यान से ताकतें हुए देखा तो समझ गए की उनके लण्ड की लम्बाई और मोटाई देख कर ज्योति परेशान महसूस कर रही थी। जसवंत सिंह के लिए अपने साथी की ऐसी प्रतिक्रया कोई पहली बार नहीं थी।

उन्होंने ज्योति को अपनी बाँहों में लिया और उसे पलग पर हलके से बिठाकर कर ज्योति के सर को अपने हाथों में पकड़ कर उसके होँठों पर अपने होँठ रख दिए। ज्योति को जैसे स्वर्ग का सुख मिल गया। उसने अपने होँठ खोल दिए और जसवंत सिंह की जीभ अपने मुंह में चूस ली। काफी अरसे तक दोनों एक दूसरे की जीभ चूसते रहे और एक दूसरे की लार आपने मुंह में डाल कर उसका आस्वादन करते रहे।
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09-13-2020, 12:17 PM,
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RE: DesiMasalaBoard साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन
साथ साथ में जसवंत सिंह अपने हाथों से ज्योति के दोनों स्तनों को सहलाते और दबाते रहे। उसकी निप्पलोँ को अपनी उँगलियों के बिच कभी दबाते तो कभी ऐसी तीखी चूँटी भरते की ज्योति दर्द और उन्माद से कराह उठती। काफी देर तक चुम्बन करने के बाद हाथों को निवृत्ति देकर जसवंत सिंह ने ज्योति की दोनों चूँचियों पर अपने होँठ चिपका दिए। अब वह ज्योति की निप्पलोँ को अपने दांतो से काटते रहे जो की ज्योति को पागल करने के लिए पर्याप्त था। ज्योति मारे उन्माद के कराहती रही। ज्योति के दोनों स्तन दो उन्नत टीलों के सामान प्रतित होते थे।

जसवंत सिंह ने ज्योति की चूँचियों को इतना कस के चूसा की ज्योति को ऐसा लगा की कहीं वह फट कर अपने प्रियतम के मुंह में ही ना आ जायें। ज्योति के स्तन जसवंत सिंह के चूसने के कारण लाल हो गए थे और जसवंत सिंह के दांतों के निशान उस स्तनों की गोरी गोलाई पर साफ़ दिख रहे थे। जसवंत सिंह की ऐसी प्रेमक्रीड़ा से ज्योति को गजब का मीठा दर्द हो रहा था। जब जसवंत सिंह ज्योति के स्तनों को चूस रहे थे तब ज्योति की उंगलियां जसवंत सिंह के बालों को संवार रही थी।

जसवंत सिंह का हाथ ज्योति की पीठ पर घूमता रहा और उस पर स्थित टीलों और खाईयोँ पर उनकी उंगलयां फिरती रहीं। जसवंत सिंह ने अपनी उस रात की माशूका के कूल्हों को दबा कर और उसकी दरार में उंगलियां डाल कर उसे उन्मादित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। थोड़ी देर तक स्तनों को चूसने और चूमने के बाद जसवंत सिंह ने ज्योति को बड़े प्यार से पलंग पर लिटाया और उसकी खूबसूरत जॉंघों को चौड़ा करके खुद टाँगों के बिच आ गए और ज्योति की खूब सूरत चूत पर अपने होँठ रख दिए।

रतिक्रीड़ा में ज्योति का यह पहला सबक था। जसवंत सिंह तो इस प्रकिया के प्रमुख प्राध्यापक थे। उन्होंने बड़े प्यार से ज्योति की चूत को चूमना और चाटना शुरू किया। जसवंत सिंह की यह चाल ने तो ज्योति का हाल बदल दिया। जैसे जसवंत सिंह की जीभ ज्योति की चूत के संवेदनशील कोनों और दरारों को छूने लगी की ज्योति का बदन पलंग पर मचलने लगा और उसके मुंह से कभी दबी सी तो कभी उच्च आवाज में कराहटें और आहें निकलने लगीं।

धीरे धीरे जसवंत सिंह ने ज्योति की चूत में अपनी दो उंगलियां डालीं और उसे उँगलियों से चोदना शुरू किया। ज्योति के लिए यह उसके उन्माद की सिमा को पार करने के लिए पर्याप्त था। ज्योति मारे उन्माद के पलंग पर मचल रही थी और अपने कूल्हे उठा कर अपनी उत्तेजना ज़ाहिर कर रही थी। उसका उन्माद उसके चरम पर पहुँच चुका था। अब वह ज्यादा बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थी। ज्योति जसवंत सिंह का हाथ पकड़ा और उसे जोरों से दबाया। ज्योति के रोंगटे रोमांच से खड़े हो गए थे। ज्योति ने अपनी गाँड़ ऊपर उठायी और एक बड़ी सुनामी की लहर जैसे उसके पुरे बदन में दौड़ पड़ी। वह गहरी साँस ले कर कराह ने लगी, "कप्तान साहब काफी हो गया। अब तुम प्लीज मुझे चोदो। अपना लण्ड मेरी भूखी चूत में डालो और उसकी भूख शांत करो।"

जसवंत सिंह ने ज्योति से कहा, "तुम्हारे लिए मैं कप्तान साहब नहीं, मैं जसवंत सिंह भी नहीं। मैं तुम्हारे लिए जस्सू हूँ। आज से तुम मुझे जस्सू कह कर ही बुलाना।"

ज्योति ने तब अपनी रिक्वेस्ट फिरसे दुहराते हुए कहा, "जस्सूजी काफी हो गया। अब तुम प्लीज मुझे चोदो। अपना लण्ड मेरी भूखी चूत में डालो और उसकी भूख शांत करो।"

जस्सूजी ने देखा की ज्योति अब मानसिक रूप से उनसे चुदवाने के लिए बिलकुल तैयार थी तो वह ज्योति की दोनों टाँगों के बिच आगये और उन्होंने अपना लण्ड ज्योति के छोटे से छिद्र के केंद्र बिंदु पर रखा। ज्योति के लिए उस समय जैसे क़यामत की रात थी। वह पहली बार किसी का लण्ड अपनी चूत में डलवा रही थी। और पहली ही बार उसे महसूस हुआ जैसे "प्रथम ग्राहे मक्षिका" मतलब पहले हे निवालें में किसी के मुंह में जैसे मछली आजाये तो उसे कैसा लगेगा? वैसे ही अपनी पहली चुदाई में ही उसे इतने मोटे लण्ड को चूत में डलवाना पड़ रहा था।

ज्योति को अफ़सोस हुआ की क्यों नहीं उसने पहले किसी लड़के से चुदवाई करवाई? अगर उसने पहले किसी लड़के से चुदवाया होता तो उसे चुदवाने की कुछ आदत होती और यह डर ना लगता। पर अब डर के मारे उसकी जान निकली जा रही थी। पर अब वह करे तो क्या करे? उसे तो चुदना ही था। उसने खुद जस्सूजी को चोदने के लिए आमंत्रित किया था। अब वह छटक नहीं सकती थी।

ज्योति ने अपनी आँखें मुंदी और जस्सूजी का लण्ड पकड़ कर अपनी चूत की गीली सतह पर रगड़ने लगी ताकि उसे लण्ड को उसकी चूत के अंदर घुसने में कम कष्ट हो। वैसे भी जस्सूजी का लण्ड अपने ही छिद्र से पूर्व रस से चिकनाहट से सराबोर लिपटा हुआ था। जैसे ही ज्योति की चूत के छिद्र पर उसे निशाना बना कर रख दिया गया की तुरंत उसमें से पूर्व रस की बूंदें बन कर टपकनी शुरू हुई। ज्योति ने अपनी आँखें मूँद लीं और जस्सू के लण्ड के घुसने से जो शुरुआती दर्द होगा उसका इंतजार करने लगी।

जसवंत सिंह ने अपना लण्ड हलके से ज्योति की चूत में थोड़ा घुसेड़ा। ज्योति को कुछ महसूस नहीं हुआ। जसवंत सिंह ने यह देखा कर उसे थोड़ा और धक्का दिया और खासा अंदर डाला। तब ज्योति के मुंह से आह निकली। उसके चेहरे से लग रहा था की उसे काफी दर्द महसूस हुआ होगा। जसवंत सिंह को डर लगा की कहीं शायद उसका कौमार्य पटल फट ना गया हो, क्यूंकि ज्योति की चूत से धीरे धीरे खून निकलने लगा। जसवंत सिंह ने अपना लण्ड निकाल कर साफ़ किया। उनके लिए यह कोई बार पहली बार नहीं था। पर ज्योति खून देखकर थोड़ी सहम गयी। हालांकि उसे भी यह पता था की कँवारी लडकियां जब पहली बार चुदती हैं तो अक्सर यह होता है।
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09-13-2020, 12:17 PM,
#6
RE: DesiMasalaBoard साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन
ज्योति ने सोचा की अब घबरा ने से काम चलेगा नहीं। जब चुदवाना ही है तो फिर घबराना क्यों? उसने जसवंत सिंह से कहा, "जस्सू जी आप ने आज मुझे एक लड़की से औरत बना दिया। अब मैं ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहती। आप मेरी चिंता मत कीजिये। मैं आपके सामने टाँगे फैला कर लेटी हूँ। अब प्लीज देर मत कीजिये। मुझे जी भर कर चोदिये। मैं इस रात का महीनों से इंतजार कर रही थी।"

जसवंत सिंह अपनी टाँगें फैलाये नग्न लेती हुई अपनी खूबसूरत माशूका को देखते ही रहे। उन्होंने ज्योति की चूत के ऊपर फैले हुए खूनको टिश्यू पेपर अंदर डाल कर उससे खून साफ़ किया। उन्होंने फिर ज्योति की चूत पर अपना लण्ड थोड़ा सा रगड़ कर फिर चिकना किया और धीरे धीरे ज्योति की खुली हुई चूत में डाला। अपने दोनों हाथों से उन्होंने माशूका के दोनों छोटे टीलों जैसे उरोजों को पकड़ा और प्यार से दबाना और मसलना शुरू किया। अपनी माशूका की नग्न छबि देखकर जस्सूजी के लण्ड की नर्सों में वीर्य तेज दबाव से नर्सों को फुला रहा था। पता नहीं उन रगों में कितना वीर्य जमा था। जस्सूजी ने एक धक्का और जोर से दिया और उस बार ज्योति की चूत में आधे से भी ज्यादा लण्ड घुस गया।

ना चाहते हुए भी ज्योति के मुंह से लम्बी ओह्ह्ह निकल ही गयी। उसके कपोल पर प्रस्वेद की बूँदें बन गयी थीं। जाहिर था उसे काफी दर्द महसूस हो रहा था। पर ज्योति ने अपने होँठ भींच कर और आँखें मूँद कर उसे सहन किया और जस्सू जी को अपने कूल्हे ऊपर उठाकर उनको लण्ड और अंदर डालने के लिए बाध्य किया।

धीरे धीरे प्रिय और प्रियतमा के बिच एक तरह से चोदने और चुदवाने की जुगल बंदी शुरू हुई। हालांकि ज्योति को काफी दर्द हो रहा था पर वह एक आर्मी अफसर की बेटी थी। दर्द को जाहिर कैसे करती? जस्सूजी के धक्के को ज्योति उतनी ही फुर्ती से ऊपर की और अपना बदन उठाकर जवाब देती। उसके मन में बस एक ही इच्छा थी की वह कैसे अपने प्रियतम को ज्यादा से ज्यादा सुख दे जिससे की उनका प्रियतम उनको ज्यादा से ज्यादा आनंद दे सके। जस्सू जी मोटा और लम्बा लण्ड जैसे ही ज्योति की सनकादि चूत के योनि मार्ग में घुसता की दो आवाजें आतीं। एक ज्योति की ओहह ह... और दुसरी जस्सूजी के बड़े और मोटे अंडकोष की ज्योति की दो जाँघों के बिच में छपाट छपाट टकरा ने की आवाज। यह आवाजें इतनी सेक्सी और रोमांचक थीं की दोनों का दिमाग सिर्फ चोदने पर ही केंद्रित था।

देर रात तक जसवंत सिंह और ज्योति ने मिलकर ऐसी जमकर चुदाई की जो की शायद जसवंत सिंह ने भी कभी किसी लड़की से नहीं की थी। ज्योति के लिए तो वह पहला मौक़ा था। स्कूल और कॉलेज में कई बार कई लड़कों से उसकी चुम्माचाटी हुई थी पर कोई भी लड़का उसे जँचा नहीं। .जसवंत सिंह की बात कुछ और ही थी। अच्छी तरह चुदाई होने के बाद आधी रात को ज्योति ने जसवंत सिंह से कहा, "मैं आपसे एक बार नहीं हर रोज चुदवाना चाहती हूँ। मैं आपसे शादी करना चाहती हूँ।"

जसवंत सिंह उस लड़की ज्योति को देखते ही रहे। कुछ सोच कर उन्होंने ज्योति से कहा, "देखो ज्योति। मैं एक खुला आजाद पंछी हूँ। मुझे बंधन पसंद नहीं। मैं यह कबुल करता हूँ की आपके पहले मैंने कई औरतों को चोदा है। मैं शादी के बंधन में फँस कर यह आजादी खोना नहीं चाहता। इसके अलावा तुम तो शायद जानती ही हो की मैं इन्फेंट्री डिवीज़न में हूँ। मेरा काम ही लड़ना है। मेरी जान का कोई भरोसा नहीं। अगले महीने ही मुझे कश्मीर जाना है। मुझे पता नहीं मैं कब लौटूंगा या लौटूंगा भी की नहीं। मुझसे शादी करके आप को वह जिंदगी नहीं मिलेगी जो आम लड़की चाहती है। पता नहीं, शादी के चंद महीनों में ही आप बेवा हो जाओ। इस लिए यह बेहतर है की आपका जब मन करे मुझे इशारा कर देना। हम लोग जम कर चुदाई करेंगे। पर मेरे साथ शादी के बारे में मत सोचो।"

ज्योति हंस कर बोली, "जनाब, मैं भी आर्मी के बड़े ही जाँबाज़ अफसर की बेटी हूँ। मेरे पिताजी ने कई लड़ाइयाँ लड़ी हैं और मरते मरते बचे हैं। रही बात आपकी आजादी की तो मैं आपको यह वचन देती हूँ की मैं आपको शादी के बाद भी कभी भी किसी भी महिला से मिलने और उनसे कोई भी तरह का शारीरिक या मानसिक रिश्ता बनाने से रोकूंगी नहीं। यह मेरा पक्का वादा है। मैं वादा करती हूँ की मुझसे शादी करने के बाद भी आप आजाद पंछी की तरह ही रहोगे। बल्कि अगर कोई सुन्दर लड़की आपको जँच गयी, तो मैं उसे आपके बिस्तर तक पहुंचाने की जी जान लगा कर कोशिश करुँगी। पर हाँ. मेरी भी एक शर्त है की आप मुझे जिंदगी भर छोड़ोगे नहीं और सिर्फ मेरे ही पति बन कर रहोगे। आप किसी भी औरत को मेरे घर में बीबी बनाकर लाओगे नहीं।"

जसवंत सिंह हंस पड़े और बोले, "तुम गजब की खूबसूरत हो। और भी कई सुन्दर, जवान और होनहार लड़के और आर्मी अफसर हैं जो तुमसे शादी करने के लिए जी जान लगा देंगे। फिर मैं ही क्यों?"

तब ज्योति ने जसवंत सिंह के गले लगकर कहा, "डार्लिंग, क्यूंकि मैं तुम्हारी होने वाली बीबी हूँ और तुम लाख बहाने करो मैं तुम्हें छोड़ने वाली नहीं हूँ। मुझे तुम्हारे यह मोटे और तगड़े लण्ड से रोज रात चुदवाना है, तब तक की जब तक मेरा मन भर ना जाए। और मैं जानती हूँ, मेरा मन कभी नहीं भरेगा। मैं तुम्हारे बच्चों की माँ बनना चाहती हूँ। अब तुम्हारी और कोई बहाने बाजी नहीं चलेगी। बोलो तुम मुझसे शादी करोगे या नहीं?"

जसवंत सिंह ने अपनी होने वाली पत्नी ज्योति को उसी समय आपने बाहुपाश में लिया और होँठों को चूमते हुए कहा, "डार्लिंग मैंने कई औरतों को देखा है, जाना है और चोदा भी है। पर मैंने आज तक तुम्हारे जैसी बेबाक, दृढ निश्चयी और दिलफेंक लड़की को नहीं देखा। मैं तुम्हारा पति बनकर अपने आप को धन्य महसूस करूंगा। मैं भी तुम्हें वचन देता हूँ की मैं भी तुम्हें एक आजाद पंछी की तरह ही रखूंगा और तम्हें भी किसी पराये मर्द से शारीरिक या मानसिक सम्बन्ध बनाने से रोकूंगा नहीं। पर हाँ मेरी भी यह शर्त है की तुम हमेशा मेरी ही पत्नी बनकर रहोगी और पति का दर्जा और किसी मर्द को नहीं दोगी। "

उस बात के कुछ ही महीनों के बाद जसवंत सिंह और ज्योति उन दोनों के माँ बाप की रज़ामंदी के साथ शादी के बंधन में बंध गए। यह थी कर्नल साहब और उनकी पत्नी ज्योति की प्रेम कहानी।

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09-13-2020, 12:17 PM,
#7
RE: DesiMasalaBoard साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन
जिस दिन कर्नल साहब की औपचारिक रूपसे सुनील और उसकी पत्नी सुनीता से पहली बार सुनील और सुनीता के घर में मुलाक़ात हुई और कर्नल साहब का पहले गरम और बादमें सुनीता को देख कर नरम होना हुआ, उस रात को सुनील ने अपनी पत्नी सुनीता को हलके फुल्के लहजे में कहा, "लगता है, कर्नल साहब पर तुम्हारा जादू चल गया है। आज तो तुम्हें वह बड़े घूर घूर कर देख रहे थे। तुम भी तो कर्नल साहब को देख कर चालु हो गयी थी! कहीं तुम भी तो?..."

सुनीता हँस कर नकली गुस्से में सुनील की छाती पर हल्का सा घूँसा मार कर बोली, "धत्त! क्या पागलों जैसी बात कर रहे हो। ऐसी कोई बात नहीं है। कर्नल साहब हमारे पडोसी हैं। अगर मैं इतनी लम्बी और मोटी उनके सामने बैठूंगी या खड़ी रहूंगी, तो उनको मेरे अलावा कुछ दिखाई भी तो नहीं देगा। तब तो वह मुझे ही देखेंगे ना? तुम ना हर बार कुछ ना कुछ उलटा पुल्टा सोचते रहते हो। तुम्हें हमेशा कोई ना कोई नयी शरारत सूझती रहती है। वह बड़े चुस्त और तंदुरस्त हैं। रोज सुबह वह कैसी दौड़ लगाते हैं? और तुम? देखो तुम्हारी यह तोंद कैसी निकली हुई है? ज़रा कर्नल साहब से कुछ सीखो।"

सुनील ने महसूस किया की उसकी बीबी सुनीता भी कर्नल साहब के तेज तर्रार व्यक्तित्व और कसरत के कारण सुगठित बदन से काफी प्रभावित लग रही थी।

कुछ देर बाद सुनीता ने पूछ ही लिया, "कर्नल साहब क्या करते हैं?"

सुनील ने कहा, "आर्मी में कर्नल हैं। बड़े ही सुसम्मानित अफसर हैं। उनको कई बड़े सम्मानों से नवाजा गया है। कहते हैं की लड़ाई में वह अपनी जान पर खेल जाते हैं। कई बार उन्होंने युद्ध में अकेले ही बड़ी से बड़ी चुनौतियों का मुकाबला किया है। कई मैडल उन्होंने इतनी कम उम्र में ही पा लिए हैं। जल्द ही हमें अब उनके घर जाना ही होगा। बाकी सब अगली बार उनसे मिलते ही या तो तुम उनसे सीधे ही पूछ लेना या फिर मैं उनको पूछ कर तुम्हें बता दूंगा।"

सुनीता अपने पति की बात सुनकर थोड़ी सकपका गयी और बोली, "ऐसी कोई बात नहीं। मैं तो वैसे ही पूछ रही थी।"

वैसे ही आते जाते जब भी कभी सुनील से मुलाकात होती तो कर्नल साहब उसे बड़े ही अंतरंग भाव से अपने घर आने का न्योता देना ना चूकते। एक रात को सुनील ने सुनीता से कहा, "आज कर्नल साहब मिले थे। पहले उन्होंने कई बार मुझे तुम्हारे साथ उनके घर आने के लिए आग्रह किया था। पर आज तो वह अड़ ही गए। उन्होंने कहा की अगर हम उनके घर नहीं गए तो वह नाराज हो जाएंगे।"

सुनीता ने कहा, "हाँ, आज ज्योति जी भी मुझे मार्किट में मिली थीं। वह मुझे बड़ा आग्रह कर रही थी की हम उनके घर जाएँ। मुझे लगता है की अब हमें उनके घर जल्द ही जाना चाहिए।"

सुनील और सुनीता ने कर्नल साहब को फ़ोन कर अगले शुक्रवार की शाम उनके वहाँ पहुँच ने का प्रोग्राम बनाया। उनके पहुँचते ही कर्नल साहब ने व्हिस्की, रम, जिन, बियर इत्यादि पेय पेश किये, जबकि उनकी पत्नी ज्योति ने साथ साथ कुछ हलके फुल्के नमकीन आदि पहले से ही सजा के रखे हुए थे। कर्नल साहब और अपने पति सुनील के आग्रह के बावजूद, सुनीता ने कोई भी कड़क पेय लेने से साफ़ मना कर दिया। हालांकि वह कभी कभी बियर पी लेती थी। सुनील ने देखा की कर्नल साहब को यह अच्छा नहीं लगा पर वह चुप रहे। कर्नल साहब की पत्नी ज्योति ने सब का मन रखने के लिए एक ग्लास में बियर डाला। कर्नल साहब और सुनील ने व्हिस्की के गिलास भरे।

जब प्राथमिक औपचारिक बातें हो गयीं तब सुनीता के बार बार पूछने पर कर्नल साहब ने बताया की वह आतंकी सुरक्षाबल में कमांडो ग्रुप में कर्नल थे। उन्होंने कई बार युद्ध मैं शौर्य प्रदर्शन किया था जिसके कारण उन्हें कई मेडल्स मिले थे। सुनील की पत्नी सुनीता के पिताजी भी आर्मी में थे और आर्मी वालों को सुनीता बड़े सम्मान से देखती थी। सुनीता की यह शिकायत हमेशा रही की वह आर्मी में भर्ती होना चाहती थी पर उन दिनों आर्मी में महिलाओं की भर्ती नहीं होती थी। उसे देश सेवा की बड़ी लगन थी और वह एन.सी.सी. में कडेट रह चुकी थी। जाहिर है उसे आर्मी के बारे में बहोत ज्यादा उत्सुकता और जिज्ञाषा रहती थी।

जब सुनीता बड़ी उत्सुकता से कर्नल साहब को उनके मेडल्स के बारेमें पूछने लगी तो कर्नल साहब ने खड़े होकर बड़े गर्व के साथ एक के बाद एक उन्हें कौनसा मैडल कब मिला था और कौनसे जंग में वह कैसे लड़े थे और उन्हें कहाँ कहाँ घाव लगे थे, उसकी कहानियां जब सुनाई तो सुनीता की आँखों में से आंसू झलक उठे। कर्नल साहब भी युद्ध के उनके अनुभव के बारेमें सुनीता को विस्तार से बताने लगे। आधुनिक युद्ध कैसे लड़ा जाता है और पुराने जमाने के मुकाबले नयी तकनीक और उपकरण कैसे इस्तेमाल होते हैं वह कर्नल साहब ने सुनील की पत्नी सुनीता को भली भाँती समझाया।

सुनीता के मन में कई प्रश्न थे जो एक के बाद एक वह कर्नल साहब को पूछने लगी। कर्नल साहब भी सारे प्रश्नों का बड़े धैर्य, गंभीरता और ध्यान से जवाब दे रहे थे। उस शाम सुनील ने महसूस किया की उसकी पत्नी सुनीता कर्नल साहब के शौर्य और वीरता की कायल हो गयी थी।

काफी देर तक कर्नल साहब की पत्नी ज्योति और सुनील चुपचाप सुनीता और कर्नल साहब की बातें सुनते रहे। कुछ देर बाद सुनील जब बोर होने लगा तो उसने कर्नल साहब की पत्नी ज्योति से पूछा, "ज्योति जी, आप क्या करती हैं?"

ज्योति ने बताया की वह भी आर्मी अफसर की बेटी हैं और अब वह आर्मी पब्लिक स्कूल में सामाजिक विज्ञान (पोलिटिकल साइंस) पढ़ाती हैं। बात करते करते सुनील को पता चला की कर्नल साहब की बीबी ज्योति ने राजकीय विज्ञान में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की है और वह राजकीय मसलों पर काफी कुछ पढ़ती रहती हैं। ज्योति बोलने में कुछ शर्मिलि थीं। सुनील की बीबी सुनीता की तरह वह ज्यादा नहीं बोलती थी। पर दिमाग की वह बड़ी कुशाग्र थी। उनकी राजकीय समझ बड़ी तेज थी। सुनील की पत्नी सुनीता और कर्नल साहब आर्मी की बातों में व्यस्त हो गए तो सुनील और ज्योति अपनी बातों में जुट गए।

ज्योति के बदन की सुकोमल और चिकनी त्वचा देखने में बड़ी आकर्षक थी। उसका बदन और खासकर चेहरा जैसी शीशे का बना हो ऐसे पारदर्शक सा लगता था। उसका चेहरा एक बालक के सामान था। वह अक्सर ब्यूटी पार्लर जाती थी जिसके कारण उसकी आँखों की भौंहें तेज कटार के सामान नुकीली थीं। उसके शरीर का हर अंग ना तो पतला था और ना ही मोटा। हर कोने से वह पूरी तरह सुआकार थी। उसके स्तन बड़े और फुले हुए थे। उसकी गाँड़ की गोलाई और घुमाव खूबसूरत थी।

सुनील को उसके होँठ बड़े ही रसीले लगे। सुनील को ऐसा लगा जैसे उन में से हरदम रस बहता रहता हो। उससे भी कहीं ज्यादा कटीली थी ज्योति की नशीली आँखें। उन्हें देखते ही ऐसा लगता था जैसे वह आमंत्रण दे रही हों। सुनील और कर्नल साहब की पत्नी ज्योति ने जब राजकीय बातें शुरू की तो सुनील को पता चला की वह राजकीय हालात से भली भाँती वाकिफ थीं।

बात करते हुए ज्योति ने कहा की वह काफी समय से सुनील से मिलने के लिए बड़ी उत्सुक थी। उसने सुनील की पत्नी सुनीता से सुनील के बारे में सुना था। ज्योति ने सुनील के कई लेख पढ़े थे और वह सुनील की लिखनी से काफी प्रभावित थी।
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09-13-2020, 12:17 PM,
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RE: DesiMasalaBoard साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन
जब सुनील ने ज्योति से बात शुरू की तब उसे पता चला की बाहर से एकदम गंभीर, संकोचशील और अमिलनसार दिखने वाली ज्योति वाकई में काफी बोल लेती थी और कभी कभी मजाक भी कर लेती थी। जब उन्होंने पोलिटिकल विज्ञान और इतिहास की बातें शुरू की तो ज्योति अचानक वाचाल सी हो गयी। सुनील को ऐसा भी लगा की शायद अपने पति कर्नल साहब के प्रति उनके मन में कुछ रंजिश सी भी है। सुनील ने मन ही मन तय किया की वह जल्द ही पता करेगा की उन दोनों में रंजिश का क्या कारण हो सकता था।

समय बीतता ही गया पर कर्नल साहब और सुनील की पत्नी सुनीता को जैसे समय का कोई पता ही नहीं था। कर्नल साहब की बातें ख़तम होने का नाम नहीं ले रही थीं और सुनीता एक के बाद एक बड़ी ही उत्सुकता से प्रश्न पूछ कर उनको गजब का प्रोत्साहन दे रही थी। इधर सुनील और ज्योति की बातें जल्द ही ख़त्म हो गयीं। सुनील अपनी घडी को और देखने लगा तब ज्योति ने एक बात कही जिससे शायद ज्योति की रंजिश के बारेमें सुनील को कुछ अंदाज हुआ।

कर्नल साहब की पत्नी ज्योति ने कहा, "इनका (कर्नल साहब का) व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा अनोखा है की कोई भी सुन्दर स्त्री से यह जब बात करने लगते हैं तब उनकी बातें ख़तम ही नहीं होतीं। और जब कोई सुन्दर स्त्री उनसे बात करने लगती है तो वह स्त्री भी उनसे सवाल पूछते थकती नहीं है। इनकी बातें ही इतनी रसीली और नशीली होती हैं की बस।"

सुनील कर्नल साहब की बीबी ज्योति की बात सुनकर समझ नहीं पाया की ज्योति अपने पति की तारीफ़ कर रही थी या शिकायत। जाहिर है की पत्नी कितनी ही समझदार क्यों ना हो, कहीं ना कहीं जब किसी और औरत के साथ अपने पति के जुड़ने की बात आती है तो वह थोड़ा नकारात्मक तो हो ही जाती है।

उनकी बात सुनकर सुनील हँस पड़ा और बोला, "देखिये ना ज्योति जी, हम दोनों भी तो काफी समय से बातचीत में इतने तल्लीन थे की समय का कोई ध्यान ही नहीं रहा। मैं भी आपके पति जैसा ही हूँ। बस एक फर्क है। आप जैसी खूबसूरत और सेक्सी औरत को देखकर मैं भी बोलता ही जा रहा हूँ। पर क्या इसमें मेरा कसूर है? कौन भला आपकी और आकर्षित नहीं होगा? मैं भी तो अपने आप पर नियत्रण नहीं रख पा रहा हूँ।" फिर थोड़ा रुक कर सुनील ने कहा, "ज्योति जी मेरी बात का कहीं आप बुरा तो नहीं मानेंगे ना?"

ज्योति ने सुनील की और शर्माते हुए तिरछी नज़रों से देखा और मुस्कुरायी और बोली, "वाह रे सुनील साहब! आप ने तो एक ही वाक्य में मुझे बहुत कुछ कह दिया! पहले तो आप ने बातों बातों में ही अपनी तुलना मेरे पति के साथ कर दी। फिर आपने मुझे सेक्सी भी कह डाला।और आखिर में आप ने यह भी कह दिया की आप मेरी और आकर्षित हैं। ज़रा ध्यान रखिये। आप कांटो की राह पर मत चलिए, कहीं पाँव में कांटें न चुभ जाएँ। आप का मुझे पता नहीं पर मेरे पति को आप नहीं जानते। वह इतने रोमांटिक हैं की अच्छी से अच्छी औरतें भी उनकी बातों में आ जाती हैं। देखिये कहीं आपकी पत्नी उनके चक्कर में ना फँसे।"

सुनील जोर से हँस पड़ा। उसने पट से जवाब दिया, "मुझे कोई चिंता नहीं है ज्योति जी। पहले तो मैं मेरी पत्नी को बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। वह ऐसे ही किसीकी बातों में फँसने वाली नहीं है। दूसरे अगर मान भी लिया जाए की ऐसा कुछ हो सकता है तो आप हैं ना मेरा बीमा। अगर उन्होंने मेरी पत्नी को फाँस दिया तो वह कहाँ बचेंगे?" इतना कह कर सुनील चुप हो गया। ज्योति सुनील की बात जरूर समझ गयी होंगी, पर कुछ न बोली।

कर्नल साहब के घर पर हुई पहली मुलाकात के चंद दिन बाद सुनील की पत्नी सुनीता के पिता, जो एक रिटायर्ड आर्मी अफसर थे, का हार्ट अटैक के कारण अचानक ही स्वर्गवास हो गया। सुनीता का अपने पिता से काफी लगाव था। पिता के देहांत के पहले रोज सुनीता उनसे बात करती रहती थी। देहांत के एक दिन पहले ही सुनीता की पिताजी के साथ काफी लम्बी बातचीत हुई थी। पिताजी के देहांत का समाचार मिलते ही सुनीता बेहोश सी हो गयी थी। सुनील बड़ी मुश्किल से उसे होश में ला पाया था।

सुनीता के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था। सुनीता की माताजी का कुछ समय पहले ही देहांत हुआ था। पिताजी ने कभी सुनीता को माँ की कमी महसूस नहीं होने दी। सुनील अपनी पत्नी सुनीता को लेकर अपने ससुराल पहुंचा। वहाँ भी सुनीता के हाल ठीक नहीं थे। वह ना खाती थी ना कुछ पीती थी। पिताजी के क्रिया कर्म होने के बाद जब वह वापस आयी तो उसका मन ठीक नहीं था। सुनील ने सुनीता का मन बहलाने की बड़ी कोशिश की पर फिर भी सुनीता की मायूसी बरकरार थी। वह पिता जी की याद आने पर बार बार रो पड़ती थी।
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09-13-2020, 12:18 PM,
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RE: DesiMasalaBoard साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन
सुनीता के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था। सुनीता की माताजी का कुछ समय पहले ही देहांत हुआ था। पिताजी ने कभी सुनीता को माँ की कमी महसूस नहीं होने दी। सुनील अपनी पत्नी सुनीता को लेकर अपने ससुराल पहुंचा। वहाँ भी सुनीता के हाल ठीक नहीं थे। वह ना खाती थी ना कुछ पीती थी। पिताजी के क्रिया कर्म होने के बाद जब वह वापस आयी तो उसका मन ठीक नहीं था। सुनील ने सुनीता का मन बहलाने की बड़ी कोशिश की पर फिर भी सुनीता की मायूसी बरकरार थी। वह पिता जी की याद आने पर बार बार रो पड़ती थी।

जब यह हादसा हुआ उस समय कर्नल साहब और उनकी पत्नी ज्योति दोनों ज्योति के मायके गए हुए थे। ज्योति अपने पिताजी के वहाँ थोड़े दिन रुकने वाली थी। जिस दिन कर्नल साहब अपनी पत्नी ज्योति को छोड़ कर वापस आये उसके दूसरे दिन कर्नल साहब की मुलाक़ात सुनील से घर के निचे ही हुई। कर्नल साहब अपनी कार निकाल रहे थे। वह कहीं जा रहे थे। सुनील को देख कर कर्नल साहब ने कार रोकी और सुनील से समाचार पूछा तो सुनील ने अपनी पत्नी सुनीता के पिताजी के देहांत के बारे में कर्नल साहब को बताया। कर्नल साहब सुनकर काफी दुखी हुए। उस समय ज्यादा बात नहीं हो पायी।

उसी दिन शामको कर्नल साहब सुनील और सुनीता के घर पहुंचे। ज्योति कुछ दिनों के लिए अपने मायके गयी थी। सुनील ने दरवाजा खोल कर कर्नल साहब का स्वागत किया। कर्नल साहब आये है यह सुनकर सुनीता बाहर आयी तो कर्नल साहब ने देखा की सुनीता की आँखें रो रो कर सूजी हुई थीं।

कर्नल साहब के लिए सुनीता रसोई घर में चाय बनाने के लिए गयी तो उसको वापस आने में देर लगी। सुनील और कर्नल साहब ने रसोई में ही सुनीता की रोने की आवाज सुनी तो कर्नल साहब ने सुनील की और देखा। सुनील अपने कंधे उठा कर बोला, "पता नहीं उसे क्या हो गया है। वह बार बार पिताजी की याद आते ही रो पड़ती है। मैं हमेशा उसे शांत करने की कोशिश करता हूँ पर कर नहीं पाता हूँ। चाहो तो आप जाकर उसे शांत करने की कोशिश कर सकते हो। हो सकता है वह आपकी बात मान ले।" सुनील ने रसोई की और इशारा करते हुए कर्नल साहब को कहा। कर्नल साहब उठ खड़े हुए और रसोई की और चल पड़े। सुनील खड़ा हो कर घर के बाहर आँगन में लॉन पर टहलने के लिए चल पड़ा।

कर्नल साहब ने रसोई में पहुँचते ही देखा की सुनीता रसोई के प्लेटफार्म के सामने खड़ी सिसकियाँ ले कर रो रही थी। सुनीता की पीठ कर्नल साहब की और थी।

कर्नल साहब ने पीछे से धीरे से सुनीता के कंधे पर हाथ रखा। सुनीता मूड़ी तो उसने कर्नल साहब को देखा। उन्हें देख कर सुनीता उनसे लिपट गयी और अचानक ही जैसे उसके दुखों का गुब्बारा फट गया। वह फफक फफक कर रोने लगी। सुनीता के आँखों से आंसूं फव्वारे के सामान बहने लगे। कर्नल साहब ने सुनीता को कसके अपनी बाँहों में लिया और अपनी जेब से रुमाल निकाला और सुनीता की आँखों से निकले और गालों पर बहते हुए आंसू पोंछने लगे।

उन्होंने धीरे से पीछे से सुनीता की पीठ को सहलाते हुए कहा, "सुनीता, तुमने कभी किसी आर्मी अफसर की लड़ाई में मौत होते हुए देखि है?"

सुनीता ने अपना मुंह ऊपर उठाकर कर्नल साहब की और देखा। रोते रोते ही उसने अपनी मुंडी हिलाते हुए इशारा किया की उसने नहीं देखा। तब कर्नल साहब ने कहा, "मैंने एक नहीं, एक साथ मेरे दो भाइयों को दुश्मन की गोली यों से भरी जवानी में शहीद होते हुए देखा है। मैंने मेरी दो भाभियों को बेवा होते देखा है। मैं उनके दो दो बच्चों को अनाथ होते हुए देखा है। और जानती हो उनके बच्चों ने क्या कहा था?"

कर्नल साहब की बात सुनकर सुनीता का रोना बंद हो गया और वह अपना सर ऊपर उठाकर कर्नल साहब की आँखों में आँखें डालकर देखने लगी पर कुछ ना बोली। कर्नल साहब ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "मैं जब बच्चों को ढाढस देने के लिए गया, तो दोनों बच्चे मुझसे लिपट कर कहने लगे की वह भी लड़ाई में जाना चाहते है और दुश्मनों को मार कर उनके पिता का बदला जब लेंगे तब ही रोयेंगे। जो देश के लिए कुर्बानी देना चाहते हैं वह वह रो कर अपना जोश और जस्बात आंसूं के रूप में जाया नहीं करते।"

कर्नल साहब की बात सुनकर सुनीता का रोना और तेज हो गया। वह कर्नल साहब से और कस के लिपट गयी बोली, "मेरे पिता जी भी लड़ाई में ही अपनी जान देना चाहते थे। उनको बड़ा अफ़सोस था की वह लड़ाई में शहीद नहीं हो पाए।"

कर्नल साहब ने तब सुनीता का सर चूमते हुए कहा, "सुनीता डार्लिंग, जो शूरवीर होते हैं, उनकी मौत पर रो कर नहीं, उनके असूलों को अमल में लाकर, इनके आदर्शों की राह पर चलकर, जो काम वह पूरा ना कर पाए इन कामों को पूरा कर उनके जीवन और उनके देहांत का गौरव बढ़ाते हैं। यही उनके चरणों में हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनके क्या उसूल थे? उन्होंने किस काम में अपना जीवन समर्पण किया था यह तो बताओ मुझे, डिअर?

उनकी बात सुनकर सुनीता कुछ देर तक कर्नल साहब से लिपटी ही रही। उसका रोना धीरे धीरे कम हो गया। वह अपने को सम्हालते हुए कर्नल साहब से धीरे से अलग हुई और उनकी और देख कर उनका हाथ अपने हाथ में ले कर बोली, "कर्नल साहब, आप ने मुझे चंद शब्दों में ही जीवन का फलसफा समझा दिया। मैं आपका शुक्रिया कैसे अदा करूँ?"

कर्नल साहब ने सुनीता की हथेली दबाते हुए कहा, "तुम मुझे जस्सू, कह कर बुलाओगी तो मेरा अहसान चुकता हो जाएगा। "

सुनीता ने कहा, "कर्नल साहब मेरे लिए आप एक गुरु सामान हैं। मैं आपको जस्सू कह कर कैसे बुला सकती हूँ?"

कर्नल साहब ने कहा, "चलो ठीक है। तो तुम मुझे जस्सू जी कह कर तो बुला सकती हो ना?"
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09-13-2020, 12:18 PM,
#10
RE: DesiMasalaBoard साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन
सुनीता कर्नल साहब की बात सुनकर हंस पड़ी और बोली, "जस्सूजी, आपका बहुत शुक्रिया, मुझे सही रास्ता दिखाने के लिए। मेरे पिताजी ने अपना जीवन देश की सेवा में लगा दिया था। उनका एक मात्र उद्देश्य यह था की हमारा देश की सीमाएं हमेशा सुरक्षित रहे। उस पर दुश्मनों की गन्दी निगाहें ना पड़े। उनका दुसरा ध्येय यह था की देश की सेवा में शहीद हुए जवानों के बच्चे, कुटुंब और बेवा का जीवन उन जवानों के मरने से आर्थिक रूप से आहत ना हो।"

कर्नल ने कहा, "आओ, हम भी मिलकर यह संकल्प करें की हम हमारी सारी ताकत उन के दिखाए हुए रास्ते पर चलने में ही लगा दें। हम निर्भीकता से दुश्मनों का मुकाबला करें और शहीदों के कौटुम्बिक सुरक्षा में अपना योगदान दें। यही उनके देहांत पर उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी और उनका सच्चा श्राद्ध होगा।"

सुनीता की आँखों में आँसू आ गये। सुनीता कर्नल से लिपट गयी और बोली, "जस्सूजी, जितना योगदान मुझसे बन पडेगा मैं दूंगी और उसमें आपको मेरा पथ प्रदर्शक और मार्ग दर्शक बनना होगा।"

कर्नल ने मुस्कराते हुए कहा, "यह मेरा सौभाग्य होगा। पर डार्लिंग, मुझमें एक कमजोरी है और मैं तुम्हें इससे अँधेरे में नहीं रखना चाहता हूँ। जब मैं तुम्हारी सुन्दरता, जांबाज़ी और सेक्सीपन से रूबरू होता हूँ तो अपने रंगीलेपन पर नियत्रण नहीं रख पाता हूँ। मैं आपका पूरा सम्मान करता हूँ पर मुझसे कभी कहीं कोई गलती हो जाए तो आप बुरा मत मानना प्लीज?"

सुनीता ने भी शरारती मुस्कान देते हुए कहा, "आप के रँगीलेपन को मैंने महसूस भी किया और वह दिख भी रहा है।"

क्या सुनीता का इशारा कर्नल की टाँगों के बिच के फुले हुए हिस्से की और था? पता नहीं। शायद सुनीता ने जब कर्नल साहब को जफ्फी दी तो जरूर उसने कर्नल साहब का रँगीलापन महसूस किया होगा।

जब सुनीता कर्नल साहब के साथ चाय लेकर मुस्काती हुई ड्राइंग रूम में वापस आयी तो उसे मुस्काती देख कर सुनील को यकीन ही नहीं हुआ की यह वही उसकी पत्नी सुनीता थी जो चंद मिनट पहले अपना रोना रोक ही नहीं पा रही थी। सुनील ने कर्नल साहब की और मुड़ कर कहा, "कर्नल साहब, आपने सुनीता पर क्या जादू कर दिया? मुझे यकीन ही नहीं होता की आपने कैसे सुनीता को मुस्काना सीखा दिया। मैं आपका बहुत बहुत शुक्र गुजार हूँ। सुनीता को मुस्कराना सीखा कर आज आपने मेरी जिंदगी में नया रंग भर दिया है। आपने तो मेरी बिगड़ी हुई जिंदगी बना दी मेरी परेशानी दूर करदी।"

कर्नल साहब ने हंस कर कहा, "सुनील भाई, मैंने सुनीता को हँसता कर दिया है इसका मतलब यह नहीं की आप उस पर अचानक ही चालु हो जाओ। रात को उसे ज्यादा परेशान मत करना। उसे थोड़ा आराम करने देना।"

कर्नल साहब की बात सुनकर सुनील हँस पड़ा। सुनील की पत्नी सुनीता शर्म से अपना मुंह चुनरी में छुपाती हुई रसोई की और भागते हुए बोली, "जस्सूजी अब बस भी कीजिये। मेरी ज्यादा खिचाई मत करिये।"

इसके काफी दिनों तक कर्नल साहब कहीं बाहर दौरे पर चले गए। उनकी और सुनील की मुलाकात नहीं हो पायी। इस बिच सुनीता ने बी.एड. का फॉर्म भरा। सुनीता की सारे विषयों में बड़ी अच्छी तैयारी थी पर उसे गणित में बहुत दिक्कत हो रही थी। सुनीता गणित में पहले से ही कमजोर थी। सुनीता ने अपने पति सुनील से कहा, "सुनील, मैं गणित में कुछ कोचिंग लेना चाहती हूँ। मेरे लिए नजदीक में कहीं गणित का एक अच्छा शिक्षक ढूंढ दो ना प्लीज?"

सुनील ने इधर उधर सब जगह पता किया पर कोई शिक्षक ना मिला। सुनील और सुनीता से काफी परेशान थे क्यूंकि परीक्षा का वक्त नजदीक आ रहा था। उस दरम्यान सुनीता की मुलाक़ात कर्नल साहब की पत्नी ज्योति से सब्जी मार्किट में हुई। दोनों मार्किट से वापस आते हुए बात करने लगीं तब सुनिता ने ज्योति को बताया की उसे गणित के शिक्षक की तलाश थी। तब ज्योति ने सुनीता की और आश्चर्य से देखते हुए पूछा",सुनीता, क्या सच में तुम्हें नहीं मालुम की कर्नल साहब गणित के विषय में निष्णात माने जाते हैं? उन्हें गणित विषय में कई उपाधियाँ मिली हैं। पर यह मैं नहीं कह सकती की वह तुंम्हें सिखाने के लिए तैयार होंगें या नहीं। वह इतने व्यस्त हैं की गणित में किसीको ट्यूशन नहीं देते।"

जब सुनीता ने यह सूना तो वह ख़ुशी से झूम उठी। वह ज्योति के गले लग गयी और बोली, "ज्योतिजी, आप मेहरबानी कर कर्नल साहब को मनाओ की वह मुझे गणित सिखाने के लिए राजी हो जाएं।"

ज्योति सुनीता के गाल पर चूँटी भरते हुए बोली, "यार कर्नल साहब तो तुम पर वैसे ही फ़िदा हैं। मुझे नहीं लगता की वह मना करेंगे। पर फिर भी मैं उनसे बात करुँगी।"

उस हफ्ते सुनीता ने ज्योति और कर्नल साहब को डिनर पर आने के लिए दावत दी। तब कर्नल साहब ने सुनील के सामने एक शर्त रखी। पिछली बार सुनील की पत्नी सुनीता ने कुछ भी सख्त पेय पिने से मना कर दिया था। कर्नल साहब ने कहा की आर्मी के हिसाब से यह एक तरह का अपमान तो नहीं पर अवमान गिना जाता है। कर्नल साहब का आग्रह था की अगर वह सुनील के घर आएंगे तो सुनीताजी एक घूंट तो जरूर पियेंगी।
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