Free Sex Kahani लंड के कारनामे - फॅमिली सागा
12-13-2020, 03:04 PM,
RE: Free Sex Kahani लंड के कारनामे - फॅमिली सागा
तालाब में पहुँचते ही रूपा ने बिना किसी झिझक के अपना टॉप उतार दिया..नीचे उसने ब्रा तो नहीं पर कपडे की बनियान सी पहनी हुई थी..जिसमे उसके दोनों खरबूजे समा पाने में असमर्थ से थे. वो अपने टॉप को पानी में धोने बैठ गयी, घाघरे को उसने ऊपर तक उठा कर लपेट लिया और नीचे बैठ कर उसे धोने लगी, उसकी कसी हुई पिंडलिया , जिनपर एक भी बाल नहीं था, पानी में भीग कर चमकने लगी.
रूपा ने अपने टॉप को सुखाने के लिए पेड़ के ऊपर टांग दिया.
उसकी हरकतों से पता चल रहा था की वो शरीर से तो जवान हो चुकी है पर दिमाग से वो अभी तक अल्हड सी, नासमझ है..इसलिए मेरे सामने ही उसने बिना किसी झिझक के अपना टॉप उतार दिया,
उसके गले से झांकते हुए मोटे-ताजे फलो को देखकर मैं उनकी नरमी का अंदाजा लगाने में व्यस्त था..मैंने सोच लिया की आज इसके साथ मजे ले ही लिए जाए, जितना लेट करूँगा, नुक्सान मेरा ही होगा..मैंने कुछ सोचकर अपने कपडे उतारने शुरू कर दिए..
रूपा : "लगता है आपको पुराने दिन याद आ गए, जब हम सभी यहीं नहाया करते थे...है न साब..."
मैं : "हाँ..और आज इतने सालो के बाद मैं फिर से नहा कर अपनी यादो को ताजा करना चाहता हु.."
मैंने एक-एक करके सारे कपडे उतार दिए..और अंत में अपना अंडरवीयर भी...
मैंने तिरछी नजरो से रूपा की तरफ देखा..वो पहले तो मुझे नंगा होते देखकर मुस्कुराती रही...पर जब मैंने अपना अंडरवीयर उतारा तो उसकी साँसे रुक सी गयी...उसे शायद उम्मीद नहीं थी की मैं पूरा नंगा होकर नहाऊंगा, जैसे मैं पहले नहाता था.. पानी के अन्दर जाकर मैंने तेरना शुरू कर दिया...और फिर वापिस आकर मैंने अन्दर से ही रूपा से कहा..
"अरे रूपा, तू नहीं आ रही क्या...चल न..आ जा.."
अब वो बेचारी धरम संकट में थी, उसने पहले तो बड़े चाव से बोल दिया था नहाने के लिए, पर मुझे नंगा नहाते देखकर, वो दुविधा में थी की वो ऐसे ही आये या नंगी होकर..
रूपा : "नहीं..आप नहा लो साब...मैं अभी नहीं..."
मैं : "अरे शर्माती क्यों है तू...यहाँ मेरे अलावा कौन है...चल जल्दी से आ जा..बड़ा मजा आ रहा है यहाँ..." कोई और चारा न देख उसने झिझकते हुए अपने कपडे उतारने शुरू किये..घाघरा उतारकर उसने एक कोने में रख दिया..और फिर अपनी बनियान भी उतार डाली..और आखिर में अपनी चड्डी भी..
भगवान् कसम...ऐसी लड़की मैंने आज तक नहीं देखी थी...इतनी सुन्दर, जवानी कूट-2 कर भरी हुई थी उसमे... वो पानी के अन्दर आई...और मेरे पास आकर खड़ी हो गयी.
रूपा : "साब...देखो अम्मा को मत बताना...उन्होंने पहले भी मुझे कई बार बिना कपडे के..और दुसरो के साथ नहाने को मना किया है..."
मैं : "तो फिर मेरे साथ क्यों नहा रही है अब.."
रूपा : "आपकी बात और है..मुझे तो ये सब अच्छा लगता है..और जब आपने शर्म नहीं की तो फिर मैं क्यों शरमाऊँ.."
मैंने उसके मुंह पर पानी फेंकना शुरू कर दिया. वो भी किलकारी मारकर मेरे साथ पानी में खेलने लगी..
मैंने उसे इधर उधर से छुना शुरू कर दिया..जिसका उसने कोई विरोध नहीं किया...और मैंने हिम्मत करके उसके पीछे से जाकर, उसे पकड़ लिया, मेरा तना हुआ लंड उसकी जांघो के बीच से होता हुआ आगे की तरफ निकल आया.. उसके मुंह से एक सिसकारी सी निकल गयी..
मैं : "अब बोल....अब कहाँ जायेगी..."
वो मेरे हाथो से छुटने का असफल प्रयास कर रही थी...पर हर झटके से मेरे हाथ फिसल कर कभी उसकी चूत के ऊपर तो कभी उसके उभारों से टकरा जाते...जिसकी वजह से उसकी लड़ने की शक्ति कमजोर सी पड़ जाती..
मैंने हिम्मत करके उसके एक चुचे को अपने हाथो में पकड़ा और मसल दिया. रूपा की चीख निकल गयी..वो मुड़ी और मैंने उसके होंठो पर एक जोरदार किस्स करते हुए उसकी चूत के अन्दर हाथ डालने की कोशिश करने लगा...
रूपा ने मुझे धक्का दिया और मैं तालाब के किनारे की दलदल वाली मिटटी के ऊपर पीठ के बल गिर गया..
रूपा मेरे सामने पूरी नंगी खड़ी थी, उसकी छाती तेज सांस लेने की वजह से ऊपर नीचे हो रही थी.
रूपा : "साब...बड़े बदमाश हो गए हो तुम तो...मुझे सब मालुम है की तुम क्या कर रहे थे...इतनी भी नासमझ नहीं है ये रूपा.."
मैं : "क्यों, तुझे अच्छा नहीं लगा क्या..."
रूपा : "मुझे अच्छा नहीं लगा...!! ये सब के लिए तो मैं ना जाने कब से तड़प रही थी...मेरी सहेली है एक, कम्मो, वो सब बताती है मुझे, और करने को भी उकसाती है... वो तो अम्मा ने मेरे ऊपर ना जाने कितने पहरे लगा रखे हैं...वर्ना गाँव का हर इंसान, बुड्डे से लेकर जवान तक, मेरे पीछे घूमते हैं...मेरी भी इतनी इच्छा होती है, मजे करने की, पर गाँव छोटा है साब, अम्मा का मैं ही सहारा हु, बदनाम होकर हम दोनों कहाँ जायेंगे..बस इसलिए अपने आप पर काबू रखा हुआ है...पर आज नहीं रुक सकती मैं..आज नहीं... और ये कहते हुए उसने मेरे ऊपर छलांग लगा दी. मेरा सर सिर्फ तालाब के पानी के किनारे पर होने की वजह से बाहर था, बाकी का हिस्सा दलदल वाले पानी के अन्दर था..वो मेरे ऊपर आई और मेरे होंठो के ऊपर झुककर उन्हें चूसने लगी... उसके मुंह से अभी भी आम की खुशबू आ रही थी...मैंने उसके दोनों आम को पकड़ा और उन्हें मसलते हुए, मुंह के जरिये उनकी खुशबू लेता हुआ, उसके नर्म और मुलायम होंठो को चूसने लगा.
"ओह्ह्ह ह्ह्ह् साब्ब ..........अह्ह्हह्ह्ह्हह्ह ......पहली बार आज मेरी छाती को किसी ने छुआ है....चूस डालो इन्हें आज...आम की तरह चुसो मेरी छातियों को...खा जाओ....ना.....अह्ह्हह्ह्ह्ह......"
मेरे मुंह पर उसकी ठोस चूचीयाँ किसी गेंद की भाँती दबाव डाल रही थी...उसके दोनों निप्पल बड़े ही टेस्टी थे...मुझे अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था की पहले ही दिन मुझे रूपा के रूप का खजाना लुटने को मिल गया...मैं भी अपना मुंह खोलकर पुरे मजे लेकर, उसे चूसने और चाटने में लगा हुआ था. मैंने पलटकर उसे नीचे कर दिया...दलदली मिटटी के ऊपर आते ही उसने मेरी कमर के चारो तरफ अपनी नंगी टाँगे लपेट दी... मैंने उसके दोनों हाथ नीचे दबाकर उसकी गर्दन को चुसना शुरू कर दिया..वो मेरे नीचे पानी के अन्दर मछली की तरह तड़प रही थी...
मेरा लंड उसकी चूत के ऊपर ठोकरे मार रहा था...और वो भी अपनी चूत ऊपर करके मेरे लंड को निगलने के लिए उत्साहित सी हो रही थी... मैंने उसकी चूत के ऊपर अपना लंड टिकाया ..वो थोड़ी देर के लिए मचलना भूल गयी...पर जैसे ही मैंने उसके अन्दर थोडा लंड का दबाव डाला..वो फिर से मचलने लगी...
"अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह्ह ...बाबु .....आराम से....जरा....कोरी है अभी मेरी चूत.....अह्ह्ह्ह"
पर मैं नहीं रुका..मैंने अपना लंड निकाला और एक तेज शोट मारा, अब मेरा लंड उसकी झिल्ली को फाड़ता हुआ अन्दर तक चला गया... मेरे लंड पर गर्म खून का एहसास होते ही मुझे पता चल गया की उसकी चूत फट चुकी है..मैं मन ही मन गिनती करने लगा की मैंने आज तक कितनी कुंवारी छुते फाड़ी है...पर ये वक़्त इन सब हिसाब किताब का नहीं था...
मैंने नीचे की और देखा, मेरे लंड के आस पास का पानी लाल रंग का हो चूका था, उसकी चूत से निकलता खून बाहर आने लगा था... वो अपनी आँखे बंद किये मेरे अगले धक्के का इन्तजार कर रही थी..और जब मैंने अगला धक्का मारा तो मेरा पूरा लंड उसकी चूत के अन्दर तक जाकर गड़ सा गया...और फिर मैंने उसे बाहर खींचा और फिर अन्दर...इसी तरह से लगभग 10 -15 धक्को के बाद मेरा लंड पानी की वजह से, बड़े आराम से उसकी चूत के अन्दर बाहर निकलने लगा...
अब वो भी मजे ले लेकर मुझसे चुदवा रही थी..
"अह्ह्ह्हह्ह ओह्ह्ह्हह्ह आशु साब.....मजा आ गया.....मम्म.....कम्मो ठीक कहती थी....इतना मजा आता है चुदाई में......अब तो रोज मजे लुंगी....अह्ह्हह्ह .....अह्ह्हह्ह.......और जोर से मारो....मेरी कुंवारी चूत को....अह्ह्ह्ह......ओह्ह्ह्ह साब........" और पहली बार चुदने की वजह से वो ज्यादा उत्तेजित होकर जल्दी ही झड़ने लगी...
मैंने अपना लंड आखिरी वक़्त में बाहर निकाल लिया... मैं उसकी चूत में झड़कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था... और मैंने अपने लंड को पकड़कर उसके चेहरे को भिगोना शुरू कर दिया...जिसे उसने मंद मंद मुस्कुराकर, अपने पर गिरते हुए महसूस किया...
पानी में थोड़ी देर तक पड़े रहने के बाद मैं साफ़ होकर बाहर आया और वहीँ एक चट्टान पर बैठ गया..वो भी मेरे पीछे आई, उसकी चाल में एक अजीब सी मादकता आ चुकी थी..वो भी मेरी गोद में आकर बैठ गयी.
मैं : "तुम्हे बुरा तो नहीं लगा न...हम इतने सालो के बाद आज मिले हैं , और पहले ही दिन मैंने..."
रूपा ने मेरे होंठो पर ऊँगली रख दी..
रूपा : " देखो साब...बचपन में हमने बच्चो वाले खेल खेले..और आज जवानी में हमने जवानों वाले खेले..तो इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है...मुझे तो आपका शुक्रिया करना चाहिए..इतने मजे आते है इस खेल में, मुझे आज एहसास हुआ..अब आप देखना, जब तक यहाँ हो, मैं कैसे मजे देती हु आपको..."
मैं उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया..
उसके बाद हमने कपडे पहने और वापिस घर की तरफ चल दिए...
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12-13-2020, 03:04 PM,
RE: Free Sex Kahani लंड के कारनामे - फॅमिली सागा
घर मे आते ही दुलारी काकी ने जब रूपा को मेरे साथ देखा और हम दोनो के भीगे कपड़े देखे तो सब समझ गयी,
दुलारी : "अरी करमजलि, तू पागल है क्या.., अपने साथ आशु बाबू को भी नहला लाई तालाब मे..कुछ तो ख़याल किया कर..मैने कितनी बार कहा है की......"
तभी मैं बीच में बोल पड़ा : " अरे काकी ...तुम इसे क्यो डांट रही हो..मैने ही इसे कहा था नहाने को..ये तो मना कर रही थी..चलो अब ये सब छोड़ो, मुझे बहुत जोरो से भूख लगी है, नाश्ते मे क्या बनाया है.."
दुलारी : "आप बैठो, मैं बनाती हू, आज आपको आलू प्याज के परोंठे खिलाउंगी , दही के साथ.."
तभी दादाजी और ऋतु भी आ गये.
दादाजी : "अरी दुलारी..तूने अभी तक नाश्ता नही बनाया..टाइम देख कितना हो गया है..और हा..इसके बाद मेरे साथ खेतो मे भी चलना, वहाँ जो माल की कटाई हुई है, उसका हिसाब देखना है मुझे."
दुलारी : "ठीक है लालाजी..आप नाश्ता करो, फिर चलते हैं.."
हम सबने नाश्ता किया. मैं बीच-2 में रूपा को देखे जा रहा था और मेरी इस हरकत को ऋतु नोट कर रही थी .
ऋतु (मेरे कान मे फुसफुसते हुए) : "भाई..क्या बात है..रूपा की जवानी पर बड़ी गंदी नज़र है आपकी..."
मैं भी धीरे से उसके कान मे बोला : "इसकी जवानी तो आज सुबह ही मेरे लंड पर कुर्बान हो चुकी है...अब तो अगले मेच की तेयारी है.."
ऋतु ने हेरत भारी नज़रों से मुझे देखा..मानो उसे मुझपर विश्वास ही ना हो..पर मेरी आँखों मे मेरी बात की सच्चाई देखकर उसे भी विश्वास हो गया क्योंकि वो जानती थी की मैं सब कुछ कर सकता हूँ..
तभी ऋतु मेरे कान मे फुसफुसाई : "भाई..वो देखो दादाजी को..कैसे दुलारी काकी को देखे जा रहे है..मुझे लगता है उनकी भी गंदी नज़र है काकी पर.." और सच मे, दादाजी की वासना से भरी हुई नज़रे दुलारी को सबके सामने चोदने मे लगी हुई थी..वो जब खाना खाने के लिए मुँह खोलते तो ऐसा लगता मानो दुलारी का मुम्मा खा रहे हो..
उनकी नज़र सामने ज़मीन पर बैठी हुई दुलारी की मस्त और चोडी गांड़ पर थी, जिसे देखकर मेरा भी लंड एक बार फिर से हुंकारने लगा.
मैं : "दादाजी..आप कहो तो हम भी चले क्या आपके साथ खेतो मे.."
दादाजी : "हां हां क्यों नही..चलो तुम भी..तुम्हे अपने खेतों का हिसाब भी दिखाता हूँ, देखना कोई गड़बड़ तो नही चल रही ना.."
दुलारी : "अरे लालाजी..मेरे रहते कोई गड़बड़ हुई है आज तक, पिछले दस सालो से मैं तुम्हारे हर हिसाब-किताब पर नज़र रखती हू..पड़ी लिखी इतनी नही हू, पर ये सब समझती हू.."
और ये बात सच भी थी..दुलारी काकी शायद 8th तक पड़ी लिखी थी..पर फिर भी सारे खेतो और बगीचो का हिसाब किताब वो बेख़ुबी रखती थी..
हम सबने नाश्ता किया और उसके बाद दादाजी के ट्रेक्टर में बैठकर खेतो की तरफ चल दिए..रूपा घर पर ही रुकी, दोपहर का खाना बनाने के लिए.
मैं दादाजी के साथ आगे बैठा था और ऋतु और दुलारी काकी पीछे ट्रॉली मे थी.
मैने मौका देखकर दादाजी के कान मे कहा : "दादाजी..आप दुलारी काकी को बड़े प्यार से देख रहे थे..चाहते क्या हो आख़िर.."!!
दादाजी (मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखते हुए) : "बेटा..अब जब तुम लोगो की वजह से मेरा शेर जाग ही चुका है तो इसे हर कोई अपना ही शिकार लगता है...और मेरे घर मे तो एक नही दो-दो शिकार है.."
उनका इशारा दुलारी के साथ-2 रूपा की तरफ भी था.
मैं : "अरे दादाजी...मैने तो दूसरे का शिकार कर भी लिया...आप क्यो इतना सोचने मे टाइम वेस्ट कर रहे हैं..दबोच लो साली को..मना थोड़े ही करेगी वो.."
मैने रूपा को चोद दिया, ये सुनकर दादाजी मुझे हेरत से देखने लगे..उन्हे भी शायद ऋतु की तरह मुझपर विश्वास नही हो रहा था..
दादाजी : "अच्छा जी..बड़ा ही तेज है तू इन कामो मे..वैसे सोच तो मैं भी रहा हू...आज देखता हू..खेतो मे..अगर मान गयी तो साली की चूत वहीं फाड़ दूँगा मैं.."
मैं : "अरे नही दादाजी..आप भी ना ठेठ गाँव वाले की तरह हो..ये औरते प्यार की भूखी होती है..इन्हे भी चुदाई मे मज़ा आता है..इन्हे आराम से, दिखा कर..ललचा कर..प्यार दिखा कर अपने काबू मे लाओ..फिर देखना, कितने मज़े देती है ये.."
दादाजी : "तू ठीक कहता है आशु..चल ठीक है..तू ही बता फिर मैं कैसे और क्या करूँ की ये दुलारी आज मेरे उपर बिछ सी जाए.."
मैने कुछ सोचकर उन्हे प्लान समझाया..वो मेरा प्लान सुनकर खुश हो गये..होते भी क्यो ना, मैं अब इस तरह के प्लान बनाने मे एक्सपर्ट जो हो चुका था...
हम सभी खेत में पहुंचे, खेतो के पास एक कमरा था , जिसे दादाजी ने चाबी से खोला, अन्दर दो चारपाई और एक लकड़ी की अलमारी थी, जिसमे ताला लगा था, दुलारी काकी ने अंदर से एक डायरी निकाली और उसमे से हिसाब देखकर दादाजी को समझाने लगी..
दादाजी की नज़रे डायरी से ज़्यादा दुलारी की मदर डेरी पर थी..जिनमे से दूध के कंटेनर ब्लाउज़ फाड़कर बाहर आने को बेताब थे..
दुलारि क़ो भी शायद दादाजी ने "नेक" इरादो का आभास हो गया था...पर दादाजी के नेचर की वजह से वो उनपर कोई शक नही कर पा रही थी....मैने दादाजी को इशारा किया और मैं ऋतु के साथ बाहर की और निकल गया.
मैं : "दादाजी...आप अपना काम करो..मैं ऋतु के साथ पूरे खेत देखकर आता हू..."
दादाजी : "ठीक है बेटा.."
और हम बाहर निकल कर कमरे के दूसरी तरफ आये , और लकड़ी की खिड़की के एक छेद से अंदर की तरफ देखने लगे. .
दादाजी हिसाब समझने के बाद दुलारी से बोले : "दुलारी..तुने तो सच में सारा हिसाब अच्छी तरह से संभाल रखा है... और बेंक में सब पैसे भी सही ढंग से जमा करवा रखे है...मुझे बड़ी ख़ुशी हुई आज...इसलिए मैं तेरी पगार आज से डबल करता हु..."
दुलारी (ख़ुशी से) : " अरे वह लालाजी...बड़ी मेहरबानी है आपकी...वैसे तो मुझे पैसो की ज्यादा जरुरत नहीं है...पर आप तो जानते हो की रूपा जवान हो गयी है..उसकी शादी ब्याह पर भी खर्चा करना है..बस उसी के लिए पैसे जोडती रहती हु..वर्ना सारा खर्चा तो वैसे भी आप ही उठाते है..."
दादाजी : "अरी तू उसकी शादी की फिकर मत कर, बड़ी धूम धाम से उसकी शादी करेंगे...अभी तो उसके खेलने खाने के दिन है..और वैसे भी तू कोनसा अभी सास बनने के लायक है..अभी भी तू किसी भी नयी दुल्हन जैसी लगती है.."
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12-13-2020, 03:04 PM,
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दादाजी की इतनी खुली बात सुनकर दुलारी को अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ..और उसके गाल शर्म से लाल सुर्ख हो गए..
दुलारी : "अरे लालाजी...आज कैसी बाते कर रहे हो...लगता है शहर की हवा लग गयी है तुम्हे..."
दादाजी : "शहर में क्या-२ होता है..तुझे क्या मालुम पगली..पर हां, मैं इतना जरुर जानता हु की मैंने अपनी जिन्दगी के पिछले 10 साल ऐसे ही बर्बाद कर दिए.. पर बस अब और नहीं...जिन्दगी का क्या भरोसा..आज है, कल नहीं, इसलिए जितने मजे लेने है, आज ही ले लो बस..."
दुलारी , दादाजी की बात सुनकर उनके पास आई और उनके मुंह पर अपने कोमल हाथ रखकर बोली : "शुभ-२ बोलो लाला...आपको तो मेरी भी उम्र लग जाए..ऐसी बात मत करना आज के बाद..वर्ना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.."
दादाजी ने दुलारी की आँखों में पता नहीं क्या देखा, उन्होंने, उसके हाथो पर अपने हाथ रख दिए..और उसकी उँगलियों को चूम लिया... दुलारी के पुरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया...उसने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया : "लालाजी...ये क्या..."
दादाजी ने जब उसे घबराकर पीछे होते देखा तो उन्होंने अपराध भाव जैसा चेहरा बनाते हुए, दुलारी से मुंह फेर लिया.. दुलारी को लगा की शायद दादाजी उससे नाराज हो गए हैं..वो उन्हें अपना भगवान् मानती थी शायद इसलिए उनसे ऐसी उम्मीद नहीं की थी उसने.. वो थोड़ी देर तक सोचती रही और फिर कुछ सोचकर अपनी आँखे बंद की और एक गहरी सांस लेकर दादाजी से बोली :
"लालाजी..मैं समझती हुँ...जब से मालकिन गयी है, आपने किसी की तरफ आँख उठा कर नहीं देखा..पर आपके मन में क्या चल रहा है, ये किसी ने जानने की कोशिश नहीं की.. मेरा पति भी जब छोड़कर भाग गया था तो सिर्फ आपने मुझे सहारा दिया था और गाँव वालो के मुंह भी आपने ही बंद किये थे.. मुझे पता है की अपने शरीर को वो सुख न मिले तो कैसा लगता है...वही हाल आपका भी था लालाजी... पर अब लगता है की आपसे सबर नहीं हो पा रहा है... और मैं पिछले दस सालो से आपकी दासी बनकर रह रही हु...अगर आपकी यही इच्छा है तो मैं आज भी आपको मना नहीं करुँगी...आपको जो करना है, कर लो.."
ये कहते हुए दुलारी घूमकर दादाजी के सामने आ गयी और अपना दुप्पट्टा निकाल कर चारपाई पर फेंक दिया..और उसके दोनों मुम्मे, कुरते में फंसे हुए से, दादाजी की आँखों के सामने उजागर हो गए.
दादाजी : "नहीं दुलारी..तू मुझे गलत समझ रही है, मैं तुझे दासी की तरह नहीं..रानी की तरह रखना चाहता हु...तेरे से ब्याह करना चाहता हु मैं..."
दादाजी की बात सुनकर दुलारी के साथ-२ मेरा और ऋतू का भी मुंह खुला का खुला रह गया..ये बुढ़ापे में दादाजी को शादी की क्या सूझी...!!
दादाजी ने कुछ देर तक चुप रहने के बाद कहा : "पर तू तो जानती है...ये गाँव वाले इस तरह के रिश्ते को नहीं मानेंगे...और तुझे आगे चलकर रूपा का ब्याह भी करना है..."
दुलारी : "मैं जानती हु लालाजी...पर आपने मेरे बारे में इतना सोचा, मेरे लिए वो ही बहुत है...आप नहीं जानते की आपने मुझे कितनी बड़ी ख़ुशी दी है...
आपने ये बात करके मुझे खरीद लिया है...मेरे नीरस से जीवन में आज पहली बार बहार सी आई है...आप फिकर मत करो...कुछ रिश्तो को नाम देने की जरुरत नहीं होती लाला..
आज से और अभी से मेरा तन मन आपका है...आप जो भी कहेंगे मैं किसी नोकर की तरह नहीं, बल्कि आपकी पत्नी की तरह मानूंगी...और बाहर वालो के लिए मैं वही रहूंगी...आपकी दासी.." ये बोलते-२ उसकी आँखों से आंसू बहने लगे थे... और उसने आगे बढकर दादाजी को अपने गले से लगा लिया...दादाजी का कद दुलारी से लगभग २ फूट ज्यादा था...वो उनके कंधे से भी नीचे आ रही थी...दादाजी की धोती से झांकता हुआ उनका हथियार दुलारी के पेट से टकरा रहा था...
दादाजी ने दुलारी के चेहरे को ऊपर किया और उसके होंठो को चूमने लगे...दादाजी के चूमने भर से दुलारी उनके हाथो में पिघलने सी लगी...वो लटक सी गयी उनकी बाहों में... दादाजी ने उसके कुरते के ऊपर से ही उसके दोनों मुम्मो को पकड़ा और उन्हें मसल दिया..
दुलारी : "धीरे दबाओ लाला...पिछले कई सालो से इन्हें किसी ने छुआ भी नहीं है...आराम से..अह्ह्ह्ह.."
पर दादाजी को तो आप जानते ही हैं...उन्होंने जब सोनी की चुदाई की थी तब तो कितने जंगली से हो गए थे, ठीक वैसे ही वो आज हो रहे थे... सोनी की चूत में तो कई लंड जाकर उसे चौडा़ कर चुके थे पर उसके बावजूद दादाजी ने उसकी चूत का जो कबाड़ा किया था..बेचारी लंगडाती हुई गयी थी उनके कमरे से...और शायद उनके लंड को याद करके वो दिल्ली में अभी भी तड़प रही होगी...
आज भी दादाजी के तेवर वैसे ही थे...जो हाल सोनी का हुआ था, वोही आज दुलारी का होने वाला था...ये मुझे और ऋतू को अच्छी तरह से मालुम था... दादाजी ने दुलारी की बातो पर कोई ध्यान नहीं दिया...और उसके कुरते के ऊपर से ही उनके मुम्मे दबाते हुए उन्होंने उसे फाड़ना शुरू कर दिया...
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12-13-2020, 03:04 PM,
RE: Free Sex Kahani लंड के कारनामे - फॅमिली सागा
दुलारी मुंह फाड़े उनका वहशिपन देख रही थी...पर किसी दासी की तरह से उनका कोई विरोध भी नहीं कर रही थी...दादाजी ने उसके कपडे तार-२ कर दिए...और अब दुलारी उनके सामने पूरी नंगी खड़ी थी...
मोटे-२ स्तन थे उसके...और काले रंग के मोटे-२ निप्पल ...जो तन कर जामुन की तरह से चमक रहे थे ..थोड़े लटक जरुर गए थे...पर इतने भी नहीं .. नीचे सपाट पेट था और उसके नीचे उनकी गाँव वाली चूत...जिसपर दुनिया भर के बाल थे...लगता था की दुलारी ने उन्हें बरसो से नहीं काटा... काटती भी किसके लिए, खैर..दादाजी ने दुलारी को ऊपर से नीचे तक देखा...पर दुलारी की नजरे तो दादाजी के लंड को देखकर हैरत से फटी जा रही थी...जो धोती में तम्बू बना कर खड़ा हुआ था...
दादाजी ने अपनी धोती और उसके बाद अपना कच्छा एक झटके में उतार फेंका...और उनके लंड को देखते ही दुलारी के मुंह से चीख ही निकल गयी...
दुलारी : "हाय दैय्या...ये क्या है...लाला..तुने तो अजगर पाला हुआ है अपनी टांगो के बीच..."
उसकी चूत शायद ये सोचकर की अब यही अजगर उसकी चूत में जाएगा...रसीले पानी से सराबोर होने लगी थी.उसकी नजरो में गुलाबीपन सा तैरने लगा था... वो दादाजी के लंड को बड़ी भूखी नजरो से देख रही थी...दादाजी ने अपने ऊपर के कपडे भी उतार दिए और उनके कसरती बदन को देखकर दुलारी के मुंह से एक सिसकारी सी निकल गयी...
दुलारी : "स्सस्सस्स....लाला...आज अपने "लंड के कारनामें" दिखा दे इस दुलारी को...आज रहम मत करना मेरी चूत पर...चल लाला...चोद मुझे...सालो हो गए, किसी का लंड लिए हुए..."
दादाजी ने फुफकारते हुए लंड के साथ दुलारी को उठाया और उसे चारपाई पर पटक दिया...दुलारी ने अपनी दोनों टाँगे पकड़ी और हवा में उठा दी.. बीच में उनकी झांटो से भरी हुई रसीली चूत थी...दादाजी ने उसपर अपने अजगर का मुंह लगाया और उसपर दबाव डालकर अन्दर करने लगे...
पर असली अजगर का काम दुलारी की चूत ने किया ..वो दादाजी के लंड को अपने अन्दर निगलने लगी...और दादाजी के लंड के हर हिस्से के अन्दर जाने से वो जोर से चीखे मारकर उनके लंड का अपनी चूत में शानदार स्वागत कर रही थी...
"आआअह्ह्ह लाला......कितना मोटा है तेरा लंड....अह्ह्हह्ह्ह्ह .....फाड़ डाली तुने तो दुलारी की चूत.....अह्ह्ह्ह.....और डाल.....रहम मत कर...अज्ज्ज मेरे ऊपर ...अह्ह्ह्हह्ह.....लाला....डाल दे अपना मोटा लंड मेरी चूत में अज्ज्ज.....ओह्ह्हह्ह्ह्ह ..... लाला....हाँ....लाला...."
दादाजी तो अपने लंड की किसी हेमर मशीन की तरह उसकी चूत में ड्रिल करने में लगे हुए थे....और जल्दी ही उनकी ड्रिलिंग पूरी हुई...और उन्होंने दुलारी की चूत में एक बड़ा सा छेद कर दिया...
लंड के पुरे अन्दर तक जाने में लगभग 5 मिनट लगे थे...दुलारी की साँसे रुकी हुई थी...मुंह और टाँगे खुली हुई थी...दोनों हाथो से उन्होंने चारपाई को पकड़ा हुआ था...दादाजी कुछ देर तक रुके..और फिर धीरे-२ धक्के मारने लगे...
"अह्ह्ह्हह्ह लाला.......अह्ह्ह्हह्ह ......म्मम्मम्म.....मजा आ गया....लाला....कितना मोटा और लम्बा है तेरा लंड...अह्ह्ह्ह......अब ठीक है....तेज मार अब....चोद मुझे लाला.....जोर से चोद..."
फिर तो दादाजी ने चारपाई के पायों को भी बजवा दिया ...हर धक्के से चारपाई टूटने जैसी हालत में हो जाती थी... वो झुके और उन्होंने दुलारी के प्यारे और दुलारे मुम्मो को चूसा और लंड के धक्के मारकर उनकी चूत का बेंड बजाना शुरू रखा...
"अह्ह्हह्ह ऊओह्ह्ह .....म्मम्मम ...लाला......चोद.....और तेज....ये दुलारी आज से तेरी है....जब चाहे चोदना...मुझे.....रात भर...दिन भर....सुबह...दोपहर....रात....आः...पूरा दिन चोदना...." और दुलारी की प्यार भरी बाते सुनते हुए दादाजी के लंड ने कब रस छोड़ना शुरू कर दिया , शायद उन्हें भी पता नहीं चला.....
दुलारी को अपनी चूत में बाढ़ का एहसास हुआ...और उसकी चूत ने भी तीसरी बार अपना पानी छोड़कर अपने लालाजी का साथ दिया...
दादाजी ने अपना लंड बाहर निकाला...वो पूरा सफ़ेद रंग के पानी से नहाया हुआ था...जिसे दुलारी ने बड़े प्यार से अपने मुंह में भरा और चूसकर साफ़ कर दिया..
मैंने ऋतू को इशारा किया और हम दोनों अन्दर की तरफ चल दिए..
ऋतू भागती हुई मुझसे आगे चल रही थी, मानो उसे अन्दर जाने की मुझसे ज्यादा जल्दी हो...
उसने एक झटके से दरवाजा खोल दिया..और सामने नंगी लेटी हुई दुलारी हमें देखते ही डर गयी .और अपने कपडे ढ़ुढते हुए जो हाथ लगा उसे अपनी छाती के ऊपर डाल कर अपना नंगापन छुपा लिया.
दादाजी उसकी ये हालत देखकर हंसने लगे..उन्होंने अपने नंगे शरीर को छुपाने की कोई कोशिश नहीं की.
दुलारी : "ये...ये क्या लाला...ये अन्दर कैसे आ गए...हे भगवान्....अब क्या होगा..." वो अपना मुंह नीचे करके सुबकने सी लगी, उसे लगा की दादाजी से चुदाई करवाकर उसने अपनी इज्जत खो दी है हम बच्चो के सामने.
ऋतू को अब और सबर नहीं हो पा रहा था..उसने लॉन्ग स्किर्ट पहनी हुई थी..उसे नीचे से पकड़कर उसने ऊपर उठाया..और उतार दिया, नीचे उसने सिर्फ पेंटी पहनी हुई थी, ऊपर ब्रा नहीं थी..उसके सफ़ेद रंग और पिंक निप्पल वाले मुम्मे उछल कर सबके सामने आ गए...और वो उछल कर दादाजी के ऊपर चढ़ गयी.
दुलारी ने जब ये देखा तो फटी आँखों से कभी मुझे और कभी दादाजी के ऊपर चढी़ हुई ऋतू को देखती..दादाजी ने हाथ नीचे करके उसकी पेंटी को पकड़ा और उसे तार-२ करके फेंक दिया..नीचे से उसकी शराबी चूत दादाजी के हलब्बी लंड से कुश्ती लड़ने को तैयार थी.. मैं धीरे से दुलारी के पीछे गया अपनी पेंट उतारी और अंडरवीयर भी, और उसके दोनों तरफ पैर फेलाकर बैठ गया.
वो हैरानी से दादाजी और ऋतू का प्यार देखने में इतनी व्यस्त थी की उसे मेरे पीछे आने का एहसास ही नहीं हुआ. मैंने हाथ आगे करके उसके हाथों के ऊपर रख दिए, जिनसे वो अपनी लाज छुपा कर बैठी हुई थी. जैसे ही मैंने अपना हाथ लगाया, वो चोंक उठी .
दुलारी : "अरे लल्ला....ये क्या कर रहे हो....और ये क्या हो रहा है...ऋतू बिटिया और लालाजी...यानि उसके दादा...तुम्हारी बहन के साथ...मतलब..." वो हैरान परेशान सी बोलती जा रही थी.
मैंने दुलारी के हाथो के ऊपर अपने हाथ बड़े प्यार से रखे और कहा : "हाँ काकी...ये दोनों पहले भी ये सब कई बार कर चुके हैं...
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12-13-2020, 03:04 PM,
RE: Free Sex Kahani लंड के कारनामे - फॅमिली सागा
इन्फेक्ट हमारे घर में सभी एक दुसरे के साथ ये चुदाई वगेरह कर लेते हैं...इस बार दादाजी जब आये तो वो भी नहीं रह पाए ये सब देखकर... और इसका परिणाम तुम्हारे सामने है...तुम्हे भी चोद डाला दादाजी ने...मैंने और ऋतू ने सब देखा, वहां खिड़की से..बड़े मजे दिए दादाजी ने तुम्हे...है न...बोलो..."
दुलारी मेरी बात सुनकर शर्मा सी गयी...मेरा हाथ खिसककर उसके मोटे मुम्मो के ऊपर आ गया..
दुलारी : " तभी मैं कहूँ...लाला को हुआ क्या है...शहर में ऐसा क्या हो गया की उसने मुझ बुढ़िया को आते ही मसल डाला...ऐसा तो मैंने लाला को पिछले दस सालो में नहीं देखा.."
मैंने दुलारी के मुम्मे हलके-२ दबाने शुरू कर दिए.
मैं : "कोन कहता है काकी की तू बुड्डी हो गयी है...मैंने देखा था तुझे अभी...वहां से...बड़ा ही कसा हुआ बदन है तेरा...और खासकर तेरे ये दोनों...पंछी.." कहते हुए मैंने वो कपडा खींच दिया और दुलारी काकी के दोनों कबूतरों का गला दबा दिया.
दुलारी : "आयीस्स्स्सस्स्स्स....ये क्या करते हो लल्ला.....तुम्हे तो मैंने अपनी गोद में खिलाया है...."
मैं : "अब मेरी बारी है काकी.....तुम्हे अपनी गोद में खिलाने की..."
और ये कहते हुए मैंने दुलारी काकी को अपने हाथो में उठाया और उन्हें अपनी गोद में खींच लिया...वो कुछ समझ पाती इससे पहले ही उनकी भीगी हुई सी चूत मेरे लंड के ऊपर थी...
दादाजी के लंड ने मेरा काम आसान कर दिया था..चूत को चौडा़ करके..और मेरे लंड का सुपाड़ा सीधा उनकी चूत के ऊपर फिट बैठ गया.. दादाजी का लंड भी अपना बिल ढून्ढ चूका था..ऋतू ने दादाजी की छाती के ऊपर हाथ रखे और सी सी करते हुए उनके लंड की कुर्सी पर बैठ गयी और उनके नाग को अपनी चूत के बिल में जगह दे दी....
दुलारी ने ऋतू की सिसकारी सुनी तो उसकी तरफ देखा...तब तक मैंने भी उन्हें अपने लंड पर खींचा और अपने लंड़ को उसकी चूत की बोतल में उतारता चला गया..
"आआआआआह्ह्ह........स्स्स्सस्स्स्स.......दैय्य्या....रे.......बबुआ.......ई का.......किया तुने...... स्स्स्सस्स्स्स अह्ह्ह्हह्ह ...." दुलारी मेरे लंड को निगलती हुई बुदबुदा रही थी....
दादाजी ने आगे उठकर ऋतू के मुम्मे अपने मुंह में भरे और उन्हें किसी बच्चे की तरह चूसते हुए अपने लंड के धक्के उसकी चूत में लगाने लगे..
ऋतू दादाजी के सर के बाल पकड़कर उन्हें अपनी छाती से दबाकर चिल्लाती जा रही थी..." अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह दादाजी....अह्ह्ह्ह....ऊऊऊओ .....म्मम्म...कितना अन्दर तक जाता है आपका....... जोर से करो न दादाजी........और जोर से...प्लीस.....आह्ह्ह्ह....ओह्ह्ह या.....ओ या........हाँ......ऐसे ही.....येस्स....येस्सस्सस्स... ..येस्स्सस्स्स्सस्स्स.... .अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह्ह ....म्मम्मम.... " और ऋतू की चूत में से गाड़ा शहद निकलकर दादाजी के लंड का अभिषेक करने लगा.
पर दादाजी तो आज वियाग्रा खाकर आये थे जैसे...दुलारी काकी की चूत का बेंड बजाने के बाद अब वो कमसिन सी ऋतू की चूत में लंड पेलकर उसे तडपा रहे थे...
ऋतू तो निढाल सी होकर उनके लंड पर कब से कुर्बान हो चुकी थी पर दादाजी के लंड से निकलने वाले धक्के उसकी चूत में एक नए ओर्गास्म का निर्माण कर रहे थे.. और जल्दी ही वो जैसे नींद से जागी और फिर से दादाजी के धक्को का मजा लेते हुए चिल्लाने लगी..
"दादाजी.....मार डाला आपने तो आज.....अह्ह्हह्ह.....ओह्ह्हह्ह माय गोड.... म्मम्मम........ अह्ह्हह्ह........ ओफ्फ्फ्फ़ ओफ्फ्फ्फ़ ओफ्फ्फ्फ़ ओफ्फ्फ्फ़ उफ्फ्फ...." ऋतू की हालत पतली होती जा रही थी.

मेरा लंड भी इंच इंच करके दुलारी की चूत के अन्दर तक समां गया...थोडा रुकने के बाद मैंने आगे हाथ करके दुलारी के खरबूजे अपने हाथो में पकडे और उन्हें दबाने लगा.. दुलारी भी अपनी गांड को मेरे लंड के ऊपर घुमा घुमा कर मजे ले रही थी...उसने शायद कल्पना भी नहीं की थी की उसकी जिन्दगी में इतने सालो के बाद एक ही दिन में दो-दो लंड उसकी चूत की सेवा करेंगे... पर वो कहते है न की ऊपर वाले के घर में देर है अंधेर नहीं, और वो जब भी देता है छप्पर फाड़ कर देता है...आज वोही हाल दुलारी का भी था...
पहले तो दादाजी के देत्याकार लंड ने उनकी चूत की लंका में हलचल मचाई और अब मेरा लंड जाकर उसी लंका में आग लगाने का काम कर रहा था...
दुलारी : " हाय......भागवान .......अह्ह्ह्ह......मार्र्र्र.....गयी रे......क्या खाते हो तुम दादा-पोता....साले कितना अच्छा चोदते हो ....अहह.........रुक बबुआ....रुक....."
मैं रुका तो काकी ने मुझे पीछे हाथ करके जमीन पर लेटने को कहा...मैं लेट गया...काकी ने एक पैर मेरे पेट से घुमा कर अपना चेहरा मेरी तरफ किया...मेरा लंड उनकी चूत के अन्दर पूरा घूम सा गया..उनकी सिसकारी सी निकल पड़ी....अपनी चूत में ऐसा घर्षण पाकर....फिर से वेसा ही सेंसेशन पाने के लिए वो फिर से मेरे पेरो की तरफ घूम गयी.....और फिर से उनके मुह से वही मादक सिसकारी निकल गयी..... लगता था की मेरा लंड पूरा जाकर उनके गर्भाशय से टकरा रहा था और घुमने की वजह से मेरा सुपाडा एक अलग ही एहसास दे रहा था उन्हें अन्दर ही अन्दर और साथ ही चूत की दीवारों पर भी लंड के घर्षण का अलग ही मजा मिल पा रहा था...और फिर से वही मजा लेने के लिए दुलारी फिर से मेरी तरफ घूम गयी..उन्हें इस तरह से लंड को अपनी चूत में घुमाने में मजा आ रहा था...
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12-13-2020, 03:04 PM,
RE: Free Sex Kahani लंड के कारनामे - फॅमिली सागा
पर बार-२ घुमने में उन्हें काफी परेशानी हो रही थी..उन्होंने आस पास देखा और अपनी साडी उठा ली..मुझे कुछ समझ नहीं आया की वो करना क्या चाहती है.. उन्होंने साडी के एक छोर का गोला बनाया और ऊपर की तरफ घुमा कर फेंका...वो कमरे के के ऊपर की बीम के ऊपर से होता हुआ वापिस नीचे आ गया...
काकी ने पास पड़ा हुआ चार फूट का एक डंडा उठाया और साडी के दोनों सिरे एक -२ कोने पर बाँध दिए...और झुला सा बना दिया..जो उनके सर से लगभग दो फूट की ऊँचाई पर झूल रहा था..
मेरी समझ में अब भी कुछ नहीं आ रहा था की चुदाई के वक़्त काकी को ये झुला बनाने की क्या सूझी....पर उसके बाद जो दुलारी ने किया उसे देखकर मैं दंग रह गया.. उन्होंने डंडे को बीच से पकड़ा और फिर से उसी तरह से घूमना शुरू कर दिया..
मेरा लंड उनकी चूत के अन्दर ही था और वो मेरे ऊपर बैठ कर, ऊपर हाथ करके डंडा पकडे हुए, घुमती जा रही थी, वो जैसे-२ घुमती जाती, साडी छोटी होकर ऊपर की तरफ सिमटती जा रही थी...जिसकी वजह से उनकी चूत ऊपर की तरफ जाती हुई महसूस हो रही थी...
लगभग 6 -7 चक्कर लगाने के बाद उनकी चूत मेरे लंड से निकलने के कगार पर आ पहुंची...और ऊपर की तरफ साडी भी इकठ्ठा होकर एक तनाव सा बना रही थी...जिसे काकी ने अपने पेरों जमीन पर रखकर रोका हुआ था... और जब उन्होंने देखा की मेरा लंड उनकी चूत से निकलने ही वाला है तो उन्होंने अपने दोनों पैर उठा कर घुटने अपनी छाती से चिपका लिए...और साडी में बना हुआ घुमावदार तनाव उनके शरीर को किसी लट्टू की तरह घुमाता हुआ मेरे लंड के ऊपर तेजी से बिठाने लगा....
मेरी तो हालत ही खराब हो गयी...वो जिस तेजी से घूमकर वापिस मेरे लंड पर आ रही थी, मुझे लगा की मेरे लंड में कोई फ्रेक्चर न हो जाए... पर दुलारी की चूत के अन्दर इतना रस निकल रहा था जिसकी वजह से न तो उन्हें और ना ही मुझे कोई तकलीफ हुई...और वो घुमती हुई सी...चिल्लाती हुई सी... मेरे लंड पर वापिस धप्प से आकर बैठ गयी....
"अह्ह्हह्ह्ह्हह्ह ...ओह्ह्ह्हह्ह्हह्ह ......अ.......अ.....अ...आआअ.........आआ......म्मम्मम्मम......ह्ह्हह्ह्ह्ह ह्ह्ह ,......."
मैं दुलारी के दिमाग की दाद दिए बिना नहीं रह सका...उसने अपनी चूत को ऊपर तक ले जाकर मेरे लंड पर छोड़ दिया और घुमती हुई सी, ड्रिल होती हुई मेरे लंड पर वापिस कब्ज़ा कर लिया था..
वो मेरे ऊपर पड़ी हुई हांफ रही थी...शायद वो झड चुकी थी...मेरे चेहरे पर उनके बाल फेले हुए थे...वो ऊपर उठी और मेरी आँखों में देखकर मुस्कुराने लगी...
वो बिलकुल अपनी बेटी जैसी मुस्कुरा रही थी...मासूमियत से भरी थी उनकी मुस्कान...मैंने आगे बढ़ कर दुलारी के होंठ चूस लिए...बिलकुल ठन्डे थे वो होंठ...बर्फ जैसे ...पर बड़े ही मीठे थे वो...गाँव का मीठापन छुपा था उनमे... मैं तो उन्हें चूसता रहा और नीचे से धक्के मारता रहा...और जल्दी ही मेरे लंड का ज्वालामुखी दुलारी की चूत की पहाड़ियों के अन्दर फूट पड़ा...और हम दोनों एक दुसरे के मुंह को चूसते हुए..चाटते हुए...सिसकारी मारते हुए झड़ते हुऐ...चिपक कर एक दुसरे के ऊपर लेटे रहे.
दादाजी ने अब ऋतू को घोड़ी बना दिया था...और अपना लंड वापिस पीछे से लेजाकर उसकी चूत में डालने लगे...पर जब उन्होंने गोल सा...चमकता हुआ सा...सुनहरे रंग का गांड का छेद दिखाई दिया तो उनकी नीयत बदल गयी...और उन्होंने अपने हाथ में थूक लगाकर लंड के सुपाडे पर फिराई और उसे टिका दिया ऋतू की गांड के छेद पर...
ऋतू ने जब दादाजी को पार्टी बदलते देखा तो वो कुनमुनाने लगी...उसे गांड मरवाने में भी मजा आता था पर दादाजी के लंड से गांड मरवाना यानी अपनी ऐसी तैसी करवाना...पर वो कुछ कर नहीं सकती थी...
उसने अपनी चूत के ऊपर अपना पंजा रखा और उसे जोरो से घिसने लगी...पीछे से दादाजी ने अपना घोडा ऋतू की गांड के अस्तबल में डाल दिया.. गांड के अन्दर जाते ही दादू का घोडा हिनहिनाने लगा और ऋतू भी दादाजी के लंड को अन्दर डालकर मजे से अपनी गांड के धक्के पीछे की तरफ फेंकने लगी.
"अह्ह्हह्ह्ह्ह ओग्ग ओह्ह्हह्ह दादाजी......क्या कर दिया.......अह्ह्ह्हह्ह ...आपका लंड तो अभी भी .....मुझे पहली बार जितना दर्द देता है.....यहाँ.....अह्ह्हह्ह.......अह्ह्ह्ह ........."
दादाजी हँसते रहे और उसकी गांड मारते रहे....उसकी गांड के छेद का कसाव इतना तेज था उनके लंड के चारो तरफ की दादाजी जल्दी ही मैदान में धराशायी हो गए और उनके लंड ने अपना माल ऋतू की गांड के छेद में छोड़ दिया..
ऋतू की पीठ पर झुककर उन्होंने उसके दोनों मुम्मे पकड़ लिए और उन्हें दबाते हुए , उसके कंधे चुमते हुए...उसके साथ चिपटे रहे...
हम चारों ने एक दुसरे को देखा और मुस्कुरा दिए..
सच कहूँ यहाँ गाँव में आकर मुझे चुदाई करने में ज्यादा मजा आ रहा था..
इस तरह दुलारी और उसकी बेटी रूपा के साथ-2 ऋतु की चुदाई करते हुए गाँव में दादाजी और मैनें 10-12 दिन तक खुब मजे़ उठाये।
हमारी छुट्टियाँ खत्म होने वाली थी तो मैंने और ऋतु ने दादाजी से विदा ली और शहर वापस लौट आये..
शहर आकर भी चूदाई का सिलसिला चलता रहा ..
अन्नू ,सोनी , ऋतु और मम्मी को मैं और पापा साथ साथ मिलकर चोदते रहे...

~समाप्त~
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12-24-2020, 12:18 AM,
RE: Free Sex Kahani लंड के कारनामे - फॅमिली सागा
(12-13-2020, 03:04 PM)हैल्लो दोस्तों, आज में अपनी एक नई कहानी सुनाने दोबारा आया हूँ. मेरा नाम अजय है और में दिल्ली में रहता हूँ. दोस्तों जब से मेरा लंड खड़ा होना शुरू हुआ है, तब से में औरतों की चुदाई कर रहा हूँ और मैंने आज तक बहुत तरह की चूत मारी है और में पिछले कुछ सालों से सेक्सी कहानियाँ पढ़ता आ रहा हूँ, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है. Wrote: दोस्तों में आज आपके चाहने वालों को अपनी नौकरानी के साथ उसकी चुदाई की कहानी बताने जा रहा हूँ, जिसका नाम पूर्णिमा था. दोस्तों उसका शरीर बहुत भरा हुआ और उसका रंग सावला है, लेकिन उसके बूब्स बहुत बड़े आकार के है. जब वो पहली बार मेरे घर आई तो वो मुझे बहुत अच्छी लगी, क्योंकि मुझे शुरू से ही सावली रंग की लड़कियाँ बड़ी अच्छी लगती है, उसको पहली नज़र में देखते ही मैंने सोच लिया था कि कभी ना कभी में इसकी चुदाई जरुर करूंगा, इसलिए में उस पर अपना जाल डालने लगा, जिसकी वजह से कुछ दिनों में ही वो मुझसे बहुत खुलकर हंसी मजाक करने लगी थी और बड़ी हंस हंसकर बातें किया करती थी.
वो हर रोज सुबह सबसे पहले मेरे कमरे में आकर मुझे नींद से जगाती और तभी मेरा दिल करता था कि में उसी समय उसको पकड़ लूँ और इसके मुहं में अपना लंड डाल दूँ, लेकिन घर में सब लोगों के होने की वजह से में कुछ नहीं कर पाता था और वैसे में उसकी हरकतों से समझ चुका था कि उसके मन में भी ऐसा ही कुछ चल रहा था, लेकिन वो कहने में बहुत देर लगा रही थी.

एक दिन जब में और पूर्णिमा घर पर अकेले थे, तब मुझे लगा कि आज वो पूरे जोश में थी और में भी उसको घर में अकेला देखकर अपने होश खो बैठा. उस दिन पूर्णिमा ज्यादा गरमी होने की वजह से अपना सभी काम खत्म करके नहाने के लिए बाथरूम में चली गई. फिर मैंने सही मौका देखकर दरवाजे के एक छेद से उसको नहाते हुए देखना शुरू किया, पहले उसने अपने कपड़े खोले, वो कभी भी ब्रा नहीं पहनती थी, जिसकी वजह से उसके बड़े आकार के काले बूब्स को देखकर मेरा पप्पू तनकर पहले से ज्यादा खड़ा हो गया.
अब पूर्णिमा ने अपने पूरे कपड़े खोल दिए और तब उसका भरा हुआ बदन देखने लायक था. सावला रंग और बहुत अच्छा बदन था और उसकी चूत भी बहुत सुंदर थी, जिस पर छोटे छोटे बाल थे और उसकी गांड भी बहुत बड़ी थी, लेकिन पूर्णिमा को यह पता नहीं था कि में उसको देख रहा हूँ और फिर नहाते नहाते कुछ देर बाद पूर्णिमा अपनी चूत में उंगली करने लगी और वो लगातार ऊँगली करने लगी. फिर यह सब देखकर मुझे बड़ा मज़ा आने लगा और यह सब काम देखकर में समझ गया कि यह साली भी चुदाई की प्यासी है, इसकी चूत को भी किसी लंड का इंतजार है, जो उसकी खुजली को खत्म करे और करीब 15 मिनट तक अपनी उंगली को अंदर-बाहर करने के बाद वो शांत हो गयी और अब वो झड़ चुकी थी, लेकिन वो अपने इस काम से मुझे संतुष्ट नहीं लग रही थी.
फिर में चुपचाप अपनी अंडरवियर में अपना लंड खड़ा करके अपने कमरे में जाकर बेड पर लेट गया और आखें बंद करके उसकी चूत के बारे में सोचने लगा, जिसकी वजह से मेरा लंड अंदर ही हल्के हल्के झटके देने लगा.
फिर नहाने के बाद जब वो मेरे कमरे में आई तो उसकी नज़र सीधी मेरे खड़े लंड पर गयी, जिसको देखकर उसका दिल तो कर रहा था, लेकिन वो बहुत देर तक वहीं पर खड़ी होकर मेरे लंड को देखती रही. उसके बाद वो मुझसे पूछने लगी कि भैया क्या में आपको दूध दे दूँ? तो मैंने उससे बोला कि हाँ दे दो और वैसे भी आज मुझे दूध की बहुत ज़रूरत है, वो पूछने लगी कि साथ में क्या लोगे? तो में बोला कि तुझको, मेरे मुहं से यह बात सुनकर वो शरमा गई.
तब मैंने झटके से उसका हाथ पकड़कर अपनी तरफ उसको खींचकर उससे बोला कि क्या तू आज मेरे साथ में मज़ा करेगी? वो बोली कि हाँ आप जो भी कहेंगे में वो ही करूंगी और तब मैंने उसको कहा कि चल आज हम एक दूसरे को अपने अपने मन की बात बताते है, जो भी तेरी इच्छा है और वो तू मुझे बता आज में तेरी सभी इच्छा पूरी करूंगा और मेरे मुहं से यह बात सुनकर पूर्णिमा का चेहरा ख़ुशी से खिल गया. अब वो बोली कि भैया में एक औरत बनना चाहती हूँ, आज आप मुझे एक औरत बना दो, मुझे ऐसा अच्छा मौका दोबारा पता नहीं कब मिलेगा?
तो मैंने उससे पूछा कि तुमने पहले भी कभी किसी से अपनी चूत मरवाई है? वो बोली कि नहीं चूत तो मैंने कभी नहीं मरवाई, लेकिन मैंने अपनी गांड बहुत बार मरवाई है, मुझे उसका बहुत अच्छा अनुभव है. अब मैंने उससे पूछा कि तुमने अपनी गांड किससे मरवाई? फिर वो बोली कि मेरे भाई से, वो साला बड़ा गांडू है, उसने ही पहली बार मेरी गांड मारी थी और वैसे उसके सारे दोस्त भी गांडू है, क्योंकि उन सभी ने भी हमेशा मेरी गांड मारी और उनमें से किसी ने भी एक बार मेरी चूत नहीं मारी.
फिर मैंने उससे बोला कि हाँ तभी तेरी गांड बड़ी बड़ी सी लग रही है. उसके बाद मैंने उसको बोला कि चल पूर्णिमा आज में भी सबसे पहले तेरी चूत की खुलजी को मिटा देता हूँ, तेरी इस इच्छा को आज में पूरा कर देता हूँ, चल अब तू अपने सारे कपड़े खोलकर मेरे सामने आ जा.
अब मेरे मुहं से यह शब्द सुनकर पूर्णिमा ने बहुत खुश होकर अपने सारे कपड़े खोल दिए और वो बिल्कुल नंगी होकर मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी और तब मैंने उससे पूछा कि अब तू मुझे बता कि में कहाँ से शुरू करूं? पूर्णिमा बोली कि आप प्लीज़ मेरी चूत से शुरू कीजिए, वहाँ पर आज बहुत आग लगी है. फिर मैंने उसको शांत करने की अपनी तरफ से कई बार कोशिश की, लेकिन वो अब भी प्यासी ही है. अब यह बात सुनकर मैंने उसकी चूत को अपनी तरफ किया और तब मैंने देखा कि उसके चूत बहुत सुंदर थी और उसके चारो तरफ़ काले काले बाल थे.
मैंने उसकी चूत को जब पहली बार छुआ तो पूर्णिमा के मुहं से सिसकियाँ निकल पड़ी और मैंने अपने लंड को उसकी चूत के मुहं पर रगड़ना शुरू कर दिया, वो अभी तक वर्जिन थी और आज मुझे उसकी सील को तोड़ना था.
फिर बहुत देर तक अपने लंड को उसकी चूत पर रगड़ने के बाद मैंने उसकी चूत में अपना लंड डाला दिया और पूर्णिमा मेरा पूरा साथ दे रही थी, क्योंकि उसको अपनी गांड में लंड लेने का बहुत अनुभव हो चुका था, जब मेरा लंड उसकी चूत में पूरा चला गया, तो उसके मुहं से एक जोरदार चीख निकल पड़ी. फिर मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ? वो बोली कि कुछ नहीं यह ख़ुशी की चीख थी, प्लीज आप अपने इस लंड से आज मेरी चूत को फाड़ दो, आज आप इसका भोसड़ा बना दो और इसको शांत कर दो.
तब मैंने उसकी बातें सुनकर खुश होकर चूत में लगातार अपना लंड अंदर बाहर करना शुरू कर दिया. तब मैंने महसूस किया कि वर्जिन होने की वजह से उसकी चूत बहुत टाईट थी, इसलिए मुझे अपने लंड को अंदर बाहर करने में बहुत मज़ा आ रहा था, में जोश में था और कुछ देर बाद पूर्णिमा की चूत से खून भी निकलने लगा और करीब दस मिनट के बाद पूर्णिमा पूरे जोश में आ गई और वो बार बार मुझसे कह रही थी कि भैया आपका लंड बहुत दमदार है, मुझे बहुत मज़ा आ रहा है और मेरा दिल करता है कि में यह लंड मेरी चूत में सारी ज़िंदगी ऐसे ही अंदर लेकर रखूं, इससे अपनी चुदाई ऐसे ही करवाती रहूँ और आप ऐसे ही ज़ोर धक्के मारते रहे.
फिर मैंने कहा कोई बात नहीं पूर्णिमा डार्लिंग जब भी तुझे यह मेरा लंड लेना हो, तू आकर मुझसे अपनी चूत को मरवा लेना. फिर पूर्णिमा बोली कि भैया आप मेरी चूत को आज सारे दिन चोदना, क्योंकि पूरे दिन आज हम घर में अकेले ही है और मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, आप अगर ज़ोर से मुझे चोदोगे तो मुझे और भी अच्छा लगेगा.
अब उसकी यह बात सुनकर मैंने अपनी स्पीड को बढ़ा दिया और उस बीच पूर्णिमा दो बार झड़ चुकी थी, लेकिन अभी भी वो अपनी चूत को मरवाना चाहती थी और वो मुझे बार बार तेज़ी के साथ अपनी चूत में मेरा लंड डालने को कह रही थी, मुझे भी उसकी टाईट चूत में अपने लंड को धक्के मारने में बहुत मज़ा आ रहा था, लेकिन अब मेरे झड़ने का समय था और जैसे ही मेरा पानी निकला तो उसकी चूत में मेरे वीर्य से भरी तब पूर्णिमा कहने लगी, यह आपने क्या कर दिया? मैंने पूछा क्यों मैंने क्या किया? वो कहने लगी कि आपने मेरी चूत में वीर्य को छोड़ दिया. तब वो बोली कि भैया यह पानी चूत के लिए नहीं था, यह तो आपको मेरे मुहं में डालना था और वो बोली कि उसका भाई और उसके सारे दोस्त मेरी गांड मारने के बाद अपना पानी मेरे मुहं में डालते है और मुझे मुहं में यह पानी पीना बहुत अच्छा लगता है.
फिर में बोला कि कोई बात नहीं मेरी डार्लिंग, अगली बार में तेरा मुहं अपने वीर्य से जरुर भर दूंगा. अब तू बता तेरी चूत की खुजली कुछ कम हुई या नहीं?
तब पूर्णिमा ने एक उंगली अपनी चूत में डालकर कहा कि हाँ अभी भी हो रहा है. फिर मैंने उससे कहा कि चल तू बस पांच मिनट रुक जा, अभी अभी मेरा लंड झड़ा है और कुछ देर के बाद में तेरी दोबारा चुदाई करूंगा.
अब पूर्णिमा बोली कि ठीक है, तब तक में आपका लंड चूस लेती हूँ. फिर मैंने बोला अच्छी बात है हाँ चूस ले और तब पूर्णिमा ने मेरे लंड को बड़े प्यार के साथ चूसना शुरू कर दिया और वो अपनी जीभ से मेरे लंड को चाट रही थी. उसकी जीभ मेरे लंड के टोपे पर चारो तरफ घूम रही थी और वो मेरे लंड के छेद में भी अपनी जीभ को डालने की कोशिश कर रही थी, जिसकी वजह से मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. फिर मैंने उससे कहा कि पूर्णिमा तुम तो बहुत ही प्यासी लगती हो?
वो बोली कि हाँ भैया मुझे शुरू से ही लंड बहुत अच्छे लगते है. तभी तो मैंने अपने गांडू भाई और उसके दोस्तों से कुछ नहीं कहा और उन्होंने इस बात का फायदा उठाकर बहुत बार मेरी गांड मारी. फिर मैंने उससे पूछा क्या तुम्हें गांड मरवाने में मज़ा आता है?
तब वो बोली कि पहले पहले तो नहीं आता था, लेकिन अब मुझे बहुत मज़ा आता है. अब मैंने उससे पूछा क्या में भी आज तेरी गांड मारूं? तब पूर्णिमा बोली कि हाँ भैया जी आप कुछ भी कर सकते है. अब में उसकी गांड मारने की सोच रहा था और वो मेरे लंड को चूस चूसकर खड़ा कर रही थी. फिर उसी समय वो बोली कि आप मेरी गांड मारने के बाद एक बार फिर से मेरी चूत जरुर मारना.
फिर मैंने कहा कि मेरी प्यारी, रंडी, नौकरानी आज में तुझे अपनी चुदाई से बहुत खुश कर दूंगा और गांड मारने के बाद में तेरी चूत भी मारूंगा और यह बात सुनकर पूर्णिमा खुश हो गई और उसने तुरंत मेरा लंड चूसना छोड़ दिया और कहा कि गांड मरवाने का एक अलग तरीका होता है, इतना कहकर वो घोड़ी बन गई और मुझसे कहने लगी कि भैया आप पहले मेरी गांड के छेद में अपनी उंगली डालिए और अपने लंड के लिए उसमें रास्ता बना दो और वो कहने लगी कि भैया आप इसमें अपना थूक भी लगा सकते है.
फिर पूर्णिमा की काली गांड देखकर मेरा लंड तनकर खड़ा हो चुका था, पहले मैंने अपनी एक उंगली को उसकी गांड के छेद में डाल दिया और अंदर बाहर करने लगा, लेकिन मेरा दिल उसको चोदने और चाटने को कर रहा था. फिर मैंने बहुत देर तक अपनी उंगली को अंदर बाहर किया, जिसकी वजह से उसकी गांड खुल गई थी.
फिर मैंने अपनी जीभ से उसके छेद को चोदना शुरू किया और उस समय पूर्णिमा घोड़ी बनी हुई थी और अब वो मुझसे बोली कि भैया जी आपकी जीभ से मुझे बहुत मज़ा आ रहा है और आप अपनी जीभ को मेरी चूत में अंदर भी डालोगे ना? वहां पर और भी ज्यादा मज़ा आएगा. फिर मैंने उससे कहा कि हाँ ठीक है, में तेरी चूत में भी डाल दूंगा, पहले तेरी गांड के छेद को तो मुझे चाटने दे और मैंने बहुत देर तक अपनी जीभ से उसकी गांड के छेद को चोदा, लेकिन अब मेरा लंड बेकाबू हो रहा था. फिर मैंने लंड उसकी गांड में डाल दिया.
दोस्तों पूर्णिमा को गांड मरवाने का पहले से ही बहुत अच्छा अनुभव था, इसलिए मुझे कोई भी परेशानी नहीं हुई और मेरा पूरा का पूरा लंड उसकी गांड के छेद के अंदर जा रहा था. दोस्तों यह सच बात है कि गांड में चूत से ज्यादा मज़ा होता है और अब मेरा मन कर रहा था कि में पूर्णिमा की गांड मारता ही रहूँ, लेकिन दस मिनट के बाद मुझे लगा कि मेरा लंड अब झड़ने वाला है और उस समय पूर्णिमा ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थी और वो बहुत खुश थी. फिर मैंने पूर्णिमा से कहा कि मेरा वीर्य अब निकलने वाला है. तब पूर्णिमा ने बोला कि प्लीज भैया आप इसको रोक लो, अभी मुझे अपनी गांड और मरवानी है. फिर मैंने उससे कहा कि पूर्णिमा डार्लिंग यह अब रुकने वाला नहीं है, पूर्णिमा ने मेरे आंड पकड़ लिए और वो उनको धीरे धीरे दबाने लगी, लेकिन अब मुझसे रहा नहीं जा रहा था और उसकी गांड की खुशबू मेरे सर पर चड़ रही थी. फिर मैंने उससे पूछा क्या में अपना पानी अंदर ही छोड़ दूँ? वो बोली कि नहीं भैया आप यह पानी मेरे मुहं में डालना. मैंने अपना लंड उसकी गांड से बाहर निकाला और पूर्णिमा ने अपना मुहं खोल लिया, जिसकी वजह से मेरे वीर्य की एक धारा उसके मुहं में चली गई और पूर्णिमा ने मेरे लंड को अपने मुहं में ले लिया.
दोस्तों औरत के मुहं में अपना वीर्य निकालने का मज़ा ही कुछ और आता है, जब मेरा वीर्य निकल रहा था और तब पूर्णिमा उसको चूसने लगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा वीर्य निकले और उसने थोड़ा वीर्य अपने बूब्स पर भी लगा लिया और वो अपने बूब्स पर उसको अच्छी तरह से मसलने लगी, जब मेरे लंड से वीर्य निकलना बंद हो गया तो वो मुझसे कहने लगी कि भैया जी औरत के लिए यह पानी बहुत अच्छा होता है.
फिर में बेड पर लेट गया और पूर्णिमा अपनी चूत में उंगली करते हुए मुझसे पूछने लगी, क्या भैया आप मेरी चूत को चाटोगे? प्लीज़ आप मेरी चूत को चूसो आपको बड़ा मज़ा आएगा. फिर मैंने उससे कहा कि चल ला अपनी चूत को मेरे मुहं के पास रख, तब पूर्णिमा मेरे ऊपर चड़कर बैठ गई और उसने अपनी चूत को मेरे मुहं के ऊपर रख दिया और में नीचे लेटे हुए उसकी चूत को चाटने लगा और जैसे ही मेरी जीभ उसकी चूत में लगी तो पूर्णिमा ज़ोर ज़ोर से सिसकियाँ लेने लगी और वो मुझसे बोली कि आप मेरी चूत के ऊपर बने छोटे से दाने को अपने मुहं में ले लो और उसको अपनी जीभ से सहलाओ.
दोस्तों में उसका मतलब समझ गया और वो अपनी चूत का दाने के बारे में मुझसे बोल रही थी, उसका इशारा समझकर में उससे मज़ाक़ करने लगा और में पूछने लगा क्या औरत का लंड? पूर्णिमा बोली कि हाँ भैया जी उसको औरत का लंड ही कहते है, यह बिल्कुल चूत के ऊपर उठा हुआ होता है और तब मैंने उसकी चूत के दाने को अपनी जीभ से हिलाना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से पूर्णिमा कांपने लगी और उसकी चूत से गुलाबजल निकलने लगा और वो झड़ रही थी.
फिर वो मुझसे बोली कि आप मेरा यह रस पी लो, यह मर्दो के लिए बहुत अच्छा होता है. फिर में चूसने लगा और कुछ देर बाद मुझे उसकी चूत से निकलता हुआ वो रस अच्छा लगने लगा और मैंने उसको बहुत मज़े से चूसा और बहुत देर तक पूर्णिमा की चूत को चाटने के बाद जब में उठा और तब पूर्णिमा मुझसे बोली कि भैया जी अभी मेरी चूत की खुजली नहीं मिटी है.
फिर मैंने उसको कहा कि पूर्णिमा डार्लिंग अगर तू अपनी चूत को मुझसे हर दिन मरवाना चाहती हो तो तुम्हें मेरे लिए और भी औरतों को लाना पड़ेगा और में तुम्हारे साथ साथ उसको भी चुदाई के मज़े दूंगा. फिर पूर्णिमा मुझसे बोली भैया अगर आप कहें तो क्या में अपनी माँ को अपने साथ यहाँ पर ले आऊँ? मैंने उससे कहा कि तेरी माँ तो बूढी हो गई होगी, उसके साथ वो मज़ा कहाँ मिलेगा, जो एक जवान चूत से मिलता है? वो बोली कि नहीं भैया वो तो आज भी किसी से काम नहीं है. आप एक बार उसकी चूत मारोगे तो हर रोज़ आप उसको जरुर अपने पास बुलवाओगे.
फिर मैंने उससे कहा कि ठीक है, अगर तू अपनी माँ की इतनी तारीफ करती है तो आज घर पर कोई भी नहीं है, इसलिए तू अभी अपने घर चली जा और अपनी माँ को अपने साथ में लेकर आजा. फिर पूर्णिमा ने कपड़े पहन लिए और तभी वो बोली कि मेरे घर में मेरी एक भाभी भी है, उसको भी लंड लेने का बहुत शौक है, में उनका क्या करूं?
तब मैंने उससे कहा कि क्या वो मुझसे भी अपनी चुदाई करवाएगी? तब पूर्णिमा बोली कि हाँ मेरा भाई तो गांडू है, उसको चूत में मज़ा नहीं आता, इसलिए मेरी भाभी आपसे चुदाई करवा सकती है, क्योंकि उसकी चूत लंड लेने के लिए हमेशा तैयार रहती है. अब मैंने खुश होकर उससे कहा कि ठीक है तू उन दोनों को अपने साथ में लेकर जल्दी से आजा और पूर्णिमा उनको लेने चली गई. फिर मैंने उसके चले जाने के बाद नाश्ता किया और करीब 15 मिनट के बाद पूर्णिमा अपनी माँ और अपनी भाभी को लेकर आ गई.
फिर उन तीनों को देखकर में बहुत खुश हुआ, क्योंकि उसकी माँ और उसकी भाभी सुंदर होने के साथ साथ बहुत सेक्सी मस्त माल लग रही थी. उनका गोरा रंग, कपड़ो से बाहर झांकते हुए बूब्स को देखकर में चकित बहुत आकर्षित हुआ और फिर मैंने उनसे पूछा क्या वो मेरे साथ सेक्स करना पसंद करेगी? तो वो दोनों मेरे मुहं से यह बात सुनकर शरमाने लगी.
अब पूर्णिमा बोली कि मैंने इस दोनों को आते समय रास्ते में सब कुछ बता दिया है और इसलिए यह लोग भी आपसे अपनी अपनी चूत मरवाने के लिए तैयार है, पूर्णिमा का जवाब सुनकर मैंने उससे कहा कि चलो आज में तुम तीनों को चोदूंगा और तुम्हें चुदाई के पूरे मज़े दूंगा. अब मैंने पूर्णिमा की माँ से कहा कि चल अपने कपड़े उतार और फिर पूर्णिमा की माँ ने तुरंत अपने सारे कपड़े उतार दिए, वो उम्र में 40 साल के करीब थी और उसकी भाभी की उम्र 25 साल की होगी और पूर्णिमा की माँ मेरे लंड को घूर घूरकर देख रही थी.
अब में उससे बोला कि आप इसको देखने के अलावा चूस भी सकती है. तभी पूर्णिमा की माँ ने जल्दी से मेरे लंड को पकड़ लिया और वो उसको बड़े प्यार से हिलाने लगी, में उस समय कुर्सी पर बैठा हुआ था और पूर्णिमा की माँ नीचे बैठकर मेरा लंड चाट रही थी. फिर मैंने उसकी भाभी से कहा कि वो अपने बूब्स को मेरे मुहं के पास लेकर आए और उसकी भाभी ने जल्दी से अपना ब्लाउज खोल दिया और अपने बूब्स को वो मेरे मुहं के पास लेकर आ गई और में उसके बूब्स को दबाने लगा और साथ में उनको चूस भी रहा था. पूर्णिमा की माँ अब भी मेरे लंड को चाट रही थी और उसकी भाभी खड़े खड़े अपनी चूत में उंगली कर रही थी. फिर मैंने पूर्णिमा से बोला कि चल तू अपनी भाभी की मदद कर और उसकी चूत में ऊँगली करके इसको कुछ शांति दे.
फिर पूर्णिमा अपनी नंगी भाभी की चूत में अपनी उंगली को डालकर अंदर बाहर करने लगी और तभी उसकी भाभी मुझसे बोली कि भैया मुझे अपनी चूत में पूर्णिमा की उंगली नहीं आपका लंड चाहिए, प्लीज अब तो आप कुछ करो मुझे अब ज्यादा देर नहीं रुका जाता.
तब में बोला कि तुम उसकी बिल्कुल भी चिंता मत करो और तुम्हें कुछ देर बाद वो भी जरुर मिल जाएगा. फिर मैंने पूर्णिमा की माँ से बोला कि अब मुझे तेरी बहु को चोदना है. फिर वो बोली कि बेटा पहले तुम मुझ पर तरस खाओ, पहले तुम मुझको चोद लो, में इससे ज्यादा भूखी हूँ, यह तो फिर भी हर कभी अपनी गांड में लंड लेती रहती है, लेकिन मुझे तो लंड बहुत मुश्किल से देखने को मिलता है, लेना तो बहुत दूर की बात है. फिर मैंने उससे कहा कि चलो में आपकी बात रख लेता हूँ, में पहले तेरी चुदाई कर लेता हूँ और अब पूर्णिमा की भाभी उसकी माँ को गुस्से से देखने लगी.
फिर मैंने उसको बोला कि कोई बात नहीं डार्लिंग मेरे लंड में बहुत ताक़त है, वो आज तुझे भी जरुर मिलेगा. अब वो बोलने लगी कि यह बुढ़िया बहुत बड़ी कमीनी है, यह घर पर मुझसे बोल रही थी कि में नहीं मरवाउंगी, में तो बस लंड को छूकर अपने मुहं में लेकर उसके मज़े लूंगी, लेकिन अब इसको देखो यह लंड को देखकर ललचाने लगी है और यह कैसी बीच बीच में उचक रही है? तो माँ बोली कि बहु इतना सुंदर, मोटा, लंबा लंड देखकर मैंने अपना इरादा बदल लिया है और में क्या दुनिया की कोई भी चूत इस लंड को देखकर इससे अपनी चुदाई एक बार जरुर करवाना चाहेगी और इस लंड को देखकर उसकी भी नियत खराब हो जाएगी.
दोस्तों अब में उसकी चूत में अपना लंड डालकर धक्के मारने लगा और पूर्णिमा की माँ ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी, आह्ह्ह उफ्फ्फ्फ़ स्स्सीईईईईइ वाह मुझे बहुत मज़ा आ रहा है, बेटा तू आज ज़ोर ज़ोर से धक्के देकर मेरी चूत को मार मुझे तेरा लंड बहुत अच्छा लगा और फिर कुछ देर धक्के देने के बाद मैंने अपना लंड चूत से बाहर किया और उससे कहा कि चल अब तू घूम जा, में तेरी गांड के मज़े भी ले लेता हूँ.
फिर पूर्णिमा की माँ मेरे कहते ही तुरंत घूम गई और मैंने उसकी गांड में अपना लंड डालकर उसके भी मज़े लिए और इधर पूर्णिमा और उसकी भाभी अपनी बारी का इंतजार कर रही थी और उसके साथ में वो दोनों अपनी अपनी चूत में उँगलियाँ भी कर रही थी और पूर्णिमा की माँ को करीब 15 मिनट तक चोदकर में उससे बोला कि चल अब तू हट जा और अब तेरी बहु की बारी है.
फिर पूर्णिमा की भाभी मेरे मुहं से यह बात सुनकर जल्दी से मेरे पास आ गई और उसने मेरे होंठो को चूमना शुरू किया और वो मुझसे कहने लगी कि भैया गलती से मेरी शादी एक गांडू से हुई है, इसलिए मेरी चूत अपनी चुदाई की बहुत भूखी है, आप प्लीज़ अपने लंड को इसमें डालकर मुझको शांत कर दे. अब मैंने उसके बूब्स को चूसना शुरू कर दिया और ज़ोर से दबाने भी लगा.
पूर्णिमा की माँ मेरी गांड को चाटने लगी और वो मुझसे बोली कि बेटा में तब तक तेरी गांड को चाट लूँ. फिर मैंने कहा कि हाँ ठीक है और में पूर्णिमा की भाभी के बूब्स को चूसता, चूमता हुआ नीचे उनकी चूत पर पहुंच गया और तब मैंने देखा कि उसकी चूत एकदम साफ थी और उसने अपनी चूत के सारे बाल पहले से ही साफ किए हुए थे. अब यह देखकर मैंने उसको बोला कि वो बेड पर लेट जाए और वो झट से बेड पर लेट गई और में उसकी रसभरी चूत को चाटने लगा.
इधर पूर्णिमा की माँ मेरी गांड के छेद को चाट रही थी और अब पूर्णिमा से भी रहा नहीं गया और वो भी अब बहुत जोश में आकर मेरे लंड को हिलाने सहलाने लगी, जिसकी वजह से हम सभी को बड़ा मज़ा आ रहा था. दोस्तों पूर्णिमा की माँ सबसे अच्छा कर रही थी और वो अपनी आधी जीभ को मेरी गांड के छेद में डाल रही थी और साथ में वो अपनी एक उंगली को भी मेरी गांड में डाल रही थी, यह काम मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, क्योंकि आज तक मेरी गांड में किसी ने भी अपनी उंगली नहीं की थी और पूर्णिमा एक अनुभवी रंडी की तरह मेरे लंड को चाटती जा रही थी, एक दो बार तो वो मेरे लंड से वीर्य निकालकर पी भी चुकी थी.
अब पूर्णिमा की भाभी भी बहुत सारा रस निकालने लगी. वो झड़ गई और मैंने अपना लंड पूर्णिमा के मुहं से बाहर निकाल लिया और तुरंत उसकी गीली चूत में डाल दिया और लंड चूत के अंदर जाते ही उस वजह से उसका चेहरा ख़ुशी से खिल गया और वो मुझसे कहने लगी कि भैया अब आप यह लंड कभी भी बाहर नहीं निकालना, इस पर अब मेरा पूरा हक़ है, आज से आप मेरी जमकर चुदाई करना, आप बहुत अच्छे हो और मुझे आज पूरी तरह से खुश संतुष्ट करना.
फिर मैंने उससे कहा कि तू मेरी रंडी है, तेरी चूत अब मेरी है और में इसकी हर रोज चुदाई करूंगा और में हर दिन तेरी चूत का रस ऐसे ही पी जाऊंगा और फिर में उसको ज़ोर ज़ोर से धक्के देकर चोदने लगा. फिर पूर्णिमा की माँ अपनी बारी का इंतजार कर रही थी और अब वो मुझसे पूछने लगी, बेटा क्या कभी तुमने अपनी गांड मरवाई है?
में उस समय भाभी की चुदाई कर रहा था, तो मैंने कहा कि नहीं. फिर वो बोली कि तुम भी एक बार मरवाकर तो देख लो, इसमें कितना मज़ा आता है? तो मैंने कहा कि साली तू मुझे अपनी गांड मरवाने को बोल रही है, चल भाग जा यहाँ से.
फिर वो बोली कि बेटा इतना गुस्सा क्यों होते हो? में तो तेरे मज़े के लिए कह रही थी, क्यों वैसे जब में तेरी गांड के छेद में अपनी उंगली डाल रही थी, तब तो तूने मुझसे कुछ भी नहीं कहा? अब मैंने उससे पूछा तो तू मुझसे क्या चाहती है हरामजादी? तब वो बोली क्या में तेरी गांड के छेद में अपनी उंगली डाल दूँ.
फिर मैंने उससे कहा कि हाँ चल डाल दे, उसमें पूछने की कौन सी बात है? दोस्तों अब तक पूर्णिमा की भाभी तीन चार बार झड़ चुकी थी और उसकी चूत से इतना रस निकल रहा था कि आप पूछो मत और उधर पूर्णिमा की माँ मेरी गांड में अपनी उंगलियां डालती जा रही थी और वो साथ में मेरे आंड को भी दबा रही थी और धीरे धीरे उसने अपनी तीन उंगलियों को मेरी गांड में डाल दिया, जिसकी वजह से मुझे भी अब उसके इस काम से मज़ा आने लगा था.
फिर वो मुझसे पूछने लगी, क्यों बेटा मज़ा आ रहा है ना? मैंने कहा कि हाँ मुझे बड़ा मज़ा आ रहा है, लेकिन अब वो मुझसे अपनी गांड मरवाना चाहती थी, जब मैंने अपना लंड भाभी की चूत से बाहर निकाला.तभी पूर्णिमा की माँ ने तुरंत आगे बढ़कर मेरे लंड को अपने मुहं में ले लिया और वो लंड को ज़ोर ज़ोर से चाटने लगी और अब में झड़ने वाला था और मैंने अपना सारा वीर्य पूर्णिमा की माँ के मुहं में निकाल दिया और मेरे गरम गरम वीर्य को वो बड़े मज़े लेकर पीने लगी थी.
तभी पूर्णिमा और उसकी भाभी भी नीचे बैठ गई थी, क्योंकि वो चाहती थी कि उन दोनों को भी मेरा थोड़ा वीर्य पीने को मिल जाए और फिर मैंने उन तीनों को बारी बारी से अपना वीर्य पिला दिया. अब में बहुत थक चुका था और में लेट गया, लेकिन वो तीनों अब भी बारी बारी से एक एक करके मेरे लंड को चाटे जा रही थी और यह सब देखकर मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था. दोस्तों आज कल में पूर्णिमा उसकी भाभी और माँ तीनो की बहुत जमकर चुदाई करता हूँ.
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