Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
11-23-2020, 01:54 PM,
#1
Lightbulb  Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री by Vedprakash sharma

1

फ्लॅट नंबर आ-74.
यशोदा कुंज, राजनगर.
रात के ढाई बजने वाले थे.
हर तरफ सन्नाटा पसरा पड़ा था.
उस कमरे मे भी जिसमे पाँच व्यक्ति मौजूद थे.
एक के जिस्म पर पोलीस इनस्पेक्टर की वर्दी थी, वह सख़्त चेहरे वाला काफ़ी लंबा और तंदुरुस्त व्यक्ति था.
वर्दी पर लगी नेंप्लेट पर लिखा था, राघवन मजूमदार.
उसकी बगल मे खड़े अधेड़ उमरा के शख्स ने हाफ बाजू की टी-शर्ट और पॅंट पहन रखी थी.
उसके भारी-भरकम चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कमरे मे जो कुछ हो रहा था, उसका वश चलता तो उसे तुरंत रोक देता.
कमरे मे जो हो रहा था, वह बेहद रहस्यपूर्न था.
अधेड़ उम्र का एक दूसरा आदमी नाइट सूट पहने डबल बेड पर पालती मारे बैठा था. अपने ठीक सामने उसने एक के उपर एक दो तकिये रखे हुवे थे और तकियो पर था लॅपटॉप.
लॅपटॉप पर इंटरनेट खुला हुआ था.
बेड के दूसरे सिरे पर नाइट गाउन पहने एक औरत ऐसी मुद्रा मे लेटी थी जैसे कि सो रही हो.
उसकी पीठ लॅपटॉप पर काम कर रहे अधेड़ की तरफ थी.
कमरे मे मौजूद पाँचवा शख्स एक युवक था, उसके हाथो मे मौजूद ऑन वीडियो कॅमरा का रुख़ बेड की तरफ था.
लॅपटॉप पर इंटरनेट खोले बैठा शख्स अपने काम मे इस तरह से मशगूल था जैसे कमरे मे मौजूद अन्य चार व्यक्तियो की मौजूदगी का उसे एहसास ही ना हो, जैसे उसे ये भी मालूम ना हो कि एक युवक उसकी वीडियो फिल्म बना रहा है.
अचानक एक आवाज़ हुई.
लॅपटॉप पर काम करने वाले शख्स का ना केवल ध्यान भंग हुआ बल्कि चौंककर उसने दरवाजे की तरफ देखा.
आवाज़ कमरे के बाहर से हुई थी.
अजीब से खाटके की आवाज़ थी वह.
लॅपटॉप पर काम करने वाले के चेहरे पर कुछ देर तक ऐसे भाव रहे जैसे कि सोच रहा हो कि उस आवाज़ का कारण जानने के लिए बेड से उठे या नही.
फिर वह बेड से उठा और दरवाजे की तरफ बढ़ गया.
अस्चर्य की बात ये थी कि खाटके की जिस आवाज़ ने ये प्रतिक्रिया की थी, उसने इनस्पेक्टर राघवन, टी-शर्ट पहने अधेड़ या वीडियो बनाने वाले को ज़रा भी नही चौंकाया था.
जैसे उनमे से किसी ने वह आवाज़ सुनी ही ना हो.
वीडियो फिल्म बनाने वाले का कॅमरा लॅपटॉप पर काम करने वाले का पीछा करता रहा था.
टी-शर्ट पहने अधेड़ के भारी-भरकम चेहरे पर पहले से काबिज बेचैनी के भाव मे इज़ाफा ज़रूर हो गया था.
अस्चर्य की बात एक और थी, ये कि लॅपटॉप पर काम करने वाले शख्स ने अब भी उनमे से किसी की तरफ देखा तक नही, ठीक इस तरह वह दरवाजे के करीब पहुचा जैसे उसकी नालेज के मुताबिक वे लोग इस कमरे मे हो ही ना.
अकेला ही हो वह.
दरवाजे की चितकनी कमरे की तरफ से बंद थी जिशे उसने नीचे गिराया और बहुत ही आहिस्ता से, इस तरह किवाड़ खोला कि ज़रा भी आवाज़ पैदा ना हो, जैसे चाहता हो की उसके बाहर निकलने के बारे मे किसी को पता ना लगे.
छोटी सी लॉबी मे झाँका उसने.
हालाँकि लॉबी मे कोई बल्ब, ट्यूब या कफ्ल आदि रोशन नही थी फिर भी अंधेरा इतना ना था कि वहाँ मौजूद उन अन्य चार व्यक्तियो को ना देखा जा सके जिनमे से तीन के जिस्मो पर पोलीस की वर्दी थी. चौथे के हाथ मे वैसा ही वीडियो कॅमरा था जैसा कमरे मे मौजूद युवक के हाथ मे था.
उस वीडियो कॅमरा का निशाना भी वोही शख्स था जो लॉबी और कमरे के दरवाजे के बीच से लॉबी की तरफ झाँकता नज़र आ रहा था मगर अस्चर्य...घोर अस्चर्य.
दरवाजे पर खड़े शख्स के चेहरे पर अब भी ऐसा कोई भाव ना उभरा जैसे उसने लॉबी मे मौजूद 4 लोगो को देखा हो.
बल्कि अंदाज ऐसा था जैसे की लॉबी को खाली समझ रहा हो.
उसने दबे पाँव, ऐसे भाव से लॉबी मे कदम रखा जैसे चाहता हो कि किसी को उसके वहाँ आने की आहट ना मिले.
उधर, कमरे मे मौजूद औरत उसी तरह पीठ किए हुवे लेटी रही.
जैसे उसे पता ही ना हो कि वहाँ क्या हो रहा है.
इनस्पेक्टर राघवन मजूमदार ने अपनी बगल मे खड़े टी-शर्ट पहने अधेड़ शख्स का बाजू पकड़ा और लघ्भग ज़बरदस्ती अपने साथ खींचता हुआ उस दरवाजे की तरफ ले गया जिसे लॅपटॉप पर काम करने वाले ने कुछ ही देर पहले पार किया था.
अधेड़ के भारी-भरकम चेहरे पर मौजूद बेचैनी के भाव अब ऐसे भाव मे तब्दील होने लगे थे जैसे की वो अभी रो देगा. विरोधस्वरूप उसने अभी कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि इनस्पेक्टर राघवन ने अपने होंठो पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया. इनस्पेक्टर के चेहरे पर सख्ती के ऐसे भाव थे जो बता रहे थे कि यदि अधेड़ के मुँह से ज़रा सी भी आवाज़ निकली तो वह उसे कच्चा चबा जाएगा.
उनके साथ कॅमरा वाला युवक भी दरवाजे की तरफ बढ़ा.
उसने अपना कॅमरा ऑफ कर लिया था मगर लॉबी मे मौजूद युवक का कॅमरा ना सिर्फ़ केवल ऑन था बल्कि निरंतर नाइट सूट पहने शख्स की हर गतिविधि को क़ैद कर रहा था.
फर्निचर के नाम पर लॉबी मे एक डाइनिंग टेबल और उसके चारो तरफ पड़ी 6 चेर्स थी, डाइनिंग टेबल पर विस्की की बोतल और काँच के दो गिलास रखे हुवे थे.
नाइट सूट वाला दबे पाँव लॉबी के दूसरे सिरे पर मौजूद एक अन्य कमरे के दरवाजे पर पहुचा. मुँह से ज़रा भी आवाज़ निकाले बगैर उसने बंद दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला.
दरवाजा अंदर से बंद ना था क्योंकि वह उसके धकेलते ही खुल गया था, बाकी लोग पूरी खामोशी के साथ अपने-अपने स्थान पर खड़े उस रहस्यमयी तमाशे को देखते रहे जबकि अपने कॅमरा को चालू रखे कॅमरा वाला ना केवल नाइट सूट वाले के पीछे लपका बल्कि उसके पीछे-पीछे उस कमरे मे दाखिल भी हो गया जो पिछले कमरे के मुक़ाबले काफ़ी छोटा था.
इतना छोटा की उसमे डबल-बेड तक नही आ सकता था, कमरे के एक कोने मे एक फोल्डिंग पलंग पड़ा हुआ था.
उस पर दरि और साधारण सी चादर बिछी हुई थी.
पलंग के सिरहाने एक स्टूल था.
स्टूल पर पानी से भारी पलस्टिक की बोतल थी.
वीडियो कॅमरा नाइट सूट वाले की हर हरकत को क़ैद कर रहा था जबकि उसके चेहरे पर गुस्से के भाव नज़र आने लगे थे.
जबड़े कस गये थे.
चेहरा सुर्ख लाल होने लगा था.
खाली कमरे मे घूमती उसकी निगाहे एक कोने मे खड़ी दो हॉकीयो पर स्थिर हो गयी.
फिर, अजीब से जुनून मे नज़र आ रहा वह उस कोने की तरफ बढ़ा और अगले ही पल हाथ बढ़कर एक हॉकी उठा ली थी उसने.
कॅमरा उसकी हर गतिविधि को क़ैद कर रहा था जबकि वह उससे बेपरवाह हॉकी संभाले वापिस लॉबी मे आ गया.
ऐसा होते ही लॉबी मे मौजूद कॅमरा वाले युवक ने भी अपना कॅमरा ऑन कर लिया, अब नाइट सूट वाला जो भी कर रहा था वो दो कॅमरो मे शूट हो रहा था.
बाकी लोग खामोशी से उस सबको देख रहे थे.
जैसे किसी रहस्यमय फिल्म की शूटिंग चल रही हो.
हॉकी संभाले, नाइट सूट वाला अब उस दरवाजे की तरफ बढ़ रहा था जो उस दरवाजे के ठीक बगल मे था जिसमे औरत सोई हुई सी मुद्रा मे थी, सभी उसके पीछे लपके मगर इस बात का ख़याल रखा कि वीडियो बना रहे युवको के काम मे बाधा ना पड़े.
नाइट सूट वाले ने इस कमरे के दरवाजे को ज़ोर से धकेला.
वह भी अंदर से बंद नही था इसलिए एक ही झटके मे खुल गया और...और उसका खुलना था कि कमरे के डबल बेड पर मौजूद दो शख्स बुरी तरह हड़बड़ा गये, उनके जिस्मो पर पूरे कपड़े नही थे.
एक करीब 45 साल की अधेड़ औरत थी.
दूसरा लड़का था.
औरत के मुँह से शब्द निकले," म..मालिक आप "
नाइट सूट वाला तो मारे गुस्से के जैसे पागल हो चुका था.
उसने पूरी ताक़त से अपने हाथो मे मौजूद हॉकी घुमाई.
हालाँकि हॉकी औरत को लगी नही थी मगर जोरदार चीख के साथ इस तरह अपना सिर पकड़कर दूसरी तरफ उलट गयी जैसे वही लगी हो और लाश की तरह फर्श पर पड़ी रह गयी.
नाइट सूट वाले का गुस्सा जैसे कम नही हुआ था, उसने दूसरी बार हॉकी घुमाई लेकिन इस बार सहमा और डरा हुआ लड़का ये कहता हुआ बीच मे आ गया," क..क्या कर रहे हो प..पापा "
सेंटेन्स अधूरा छोड़ कर एक चीख के साथ वह बेड पर जा गिरा.
उसने अपनी कनपटी पकड़ रखी थी जबकि सचाई ये थी कि हॉकी ने उसे छुआ तक नही था.
उनका इस तरह से गिरना बता रहा था कि उस फ्लॅट मे किसी पुरानी घटना का डेमो चल रहा था.
" क..क्या हुआ, क्या हुआ " बदहवास हालत मे चीखती हुई वह औरत इस कमरे मे दाखिल हुई जिसे वे सब पिच्छले कमरे मे सोती सी छोड़कर आए थे.
कमरे की हालत देखकर वह चीखने वाली मशीन की तरह चीखने लगी और..यही क्षण था जब नाइट सूट वाले ने हॉकी एक तरफ फेंककर उसका मुँह दबोच लिया और गुर्राती सी आवाज़ मे बोला," चुप रहो इंदु, पड़ोसी जाग जाएँगे "
औरत अपने चेहरे पर आतंक और घबराहट के भाव लिए चीखने की कोशिश मे केवल गू-गू कर रही थी.
ठीक उसी वक़्त इनस्पेक्टर राघवन ने टी-शर्ट पहने भारी-भरकम अधेड़ से सख़्त लहजे मे पूछा," 4/5 जून की रात मे यही सब हुआ था ना मिस्टर. राजन सरकार "
" नही... बिल्कुल नही इनस्पेक्टर, ऐसा कुछ भी नही हुआ था " टी-शर्ट वाला अधेड़ लघ्भग चीख पड़ा," ये सब केवल आप लोगो की कल्पना है, मैं और इंदु तो.. "
" खामोश " इनस्पेक्टर चिल्लाया," ये राग अलापना बंद करो "
" कैसे कर दूं इनस्पेक्टर " राजन सरकार रो पड़ा," कैसे कर दूं, जब ऐसा कुछ हुआ ही नही, आप ही सोचिए, क्या आप अपने बेटे को मार सकते है, नही मार सकते ना, हम ने भी अपने बेटे को नही मारा, भला कोई कैसे अपने जिगर के टुकड़े को मार सकता है "
इस बार इनस्पेक्टर ने नरम लहजे मे कहा," मानता हू, तुम्हारी ये बात मैं मानता हू कि कोई भी मा-बाप सामान्य अवस्था मे या यू कहे कि होशो-हवास मे अपनी औलाद की हत्या नही कर सकते और तुमने भी ऐसा नही किया, बस दुर्भाग्य से जो होना था, हो गया. तुमने इस कमरे मे सीन ही ऐसा देखा कि अगर तुम्हारी जगह मैं भी होता तो गुस्से की ज़्यादती के कारण उसी तरह पागल हो जाता जैसे कि तुम हो गये थे, अपने बेटे को अधेड़ नौकरानी के साथ देखकर भला कौन अपने होशो-हवास काबू मे रख सकता है, इसके बावजूद तुमने उन्हे जान से मारने के लिए हॉकी नही घुमाई थी बल्कि सिर्फ़ अपने गुस्से का इज़हार कर रहे थे, लेकिन इत्तेफ़ाक से या कहो कि दुर्भाग्य से हॉकी की चोट मीना के सिर पर ऐसी जगह पड़ गयी कि वह तत्काल मर गयी, ऐसा ही दुर्भाग्य कान्हा के साथ हुआ, हॉकी का दूसरा वार भी तुमने उस पर नही किया था बल्कि मीना पर ही किया था, उसे बचाने के लिए कान्हा सामने आ गया, हॉकी उसे लगी और दुर्भाग्य से उसकी मौत भी तत्काल... "
" नही...नही...नही " राजन सरकार जैसे अपने बाल नोच लेना चाहता था," कितनी बार कहूँ कि ऐसा कुछ भी नही हुआ, मीना और मेरे बेटे को किसी और ने मारा है "
" और मैं आपसे कितनी बार कह चुका हू कि बार-बार ये बेसुरा राग अलापने से आपको या आपकी पत्नी को कोई फ़ायदा नही होने वाला " इस बार इनस्पेक्टर का लहज़ा उसे समझाने वाला था," बल्कि नुकसान ही होगा, मेरी बात को समझने की कोशिश करो, अगर आप कबूल कर लेंगे कि 'हां, ऐसा ही हुआ था' तो आप पर हत्या का नही बल्कि गैर-इरादतन हत्या का केस चलेगा, जो हुआ, उसे आक्सिडेंट माना जाएगा, ऐसे केस मे फाँसी की सज़ा का प्रावधान नही है जबकि इन सबको कबूल ना करके जो मूर्खता आप कर रहे है, उसके फलस्वरूप हत्या की धाराए लगेंगी और आप दोनो को फाँसी पर भी लटकाया जा सकता है "
" हम ऐसा नही होने देंगे " राजन सरकार के जबड़े कस गये.
चेहरा सुर्ख हो गया.
भले ही रो वह अब भी रहा था परंतु दृढ़तापूर्वक बोला," हम अपने बेटे को इंसाफ़ दिलाकर ही रहेंगे, उसके कातिल को फाँसी पर चढ़ाना ही अब हमारा एक्मात्र मकसद है "
" जब उस रात आपके इस फ्लॅट मे आप चारो के अलावा और कोई था ही नही और ना ही ऐसा कोई निशान मिला है जिससे साबित होता हो कि कोई बाहरी व्यक्ति फ्लॅट मे आया या गया हो तो कोई और कैसे मर्डर कर सकता है "
" इस वक़्त मेरे पास तुम्हारे किसी सवाल का जवाब नही है "
" हमारे सवालो के जवाब आप कभी खोज भी नही पाएँगे "
" बेशक मैं ये काम नही कर सकता मगर इस कायनात मे एक ऐसा आदमी है जो पोलीस के हर सवाल का जवाब ना केवल खोज सकता है बल्कि मुझे और मेरी पत्नी को हत्यारे साबित करने की तुम्हारी पूरी थियरी की धज्जिया उड़ा सकता है "
" हम भी तो सुने " इनस्पेक्टर राघवन के होंठो पर उसकी खिल्ली उड़ाने वाली मुस्कान उभरी थी," कौन है वो अजीम्मोशान हस्ती "
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11-23-2020, 01:55 PM,
#2
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
2

" हम विजय थे ग्रेट है पूरे शेर, हम सबकुछ कर सकते है, अच्छे-ख़ासे ओमलेट को आंटे की तरह गून्थ्कर फिर से अंडा बना सकते है, दही को दूध मे तब्दील कर सकते है, चाहे तो बनी-बनाई रोटी को चक्की मे डालकर फिर से गेहू बना सकते है और काले जादू के ज़ोर से तुझे वापिस तेरी माँ के गर्भ मे पहुचा सकते है "
पूरणसिंघ के मुँह से बोल ना फूटा, वह टकटकी लगाए अपने सामने उल्टे लटके विजय को बस देखता रहा.
उस विजय को जिसके जिस्म पर इस वक़्त सिर्फ़ लाल रंग का लंगोट जैसा अंडरवेर था.
उस विजय को जिसके पूरे जिस्म पर इतना सरसो का तेल लगा हुआ था जैसे वो उससे नाहया हुआ हो.
उस विजय को जिसके जिस्म पर चोट के वे निशान सॉफ नज़र आ रहे थे जो विभिन्न मिशन्स के दौरान उसे लगी थी.
और उस विजय को जिसके दोनो पैर इस वक़्त लोहे के उन कुंडो मे फँसे हुवे थे जिनसे जुड़ी जंजीरो के दूसरे सिरे कमरे के लंतर से जॉइंट कुंडो से जुड़े हुवे थे.
पैरो को कुंडे मे फँसाए वह उल्टा लटका हुआ था.
उसका पुराना नौकर पूरणसिंघ फर्श पर सीधा खड़ा मुँह उठाए उसकी तरफ देख रहा था.
चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कि उस पल को कोस रहा हो जिस पल वह इस कमरे मे आया था.
उसने बस ये पूछने का गुनाह किया था कि 'आप नाश्ते मे क्या लेंगे' विजय ने तपाक से कहा था 'चिन्टियो का मुर्रब्बा'.
पूरणसिंघ बौखला गया था.
बात उसकी समझ मे नही आई थी इसलिए मुँह से ये लफ़्ज निकल पड़े," छींतियो का मुर्राबा कैसे बन सकता है मालिक "
विजय ने कहा," हम बना सकते है चिटियो का मुर्रब्बा "
पूरणसिंघ ने कहा था," ऐसा भला आप कैसे कर सकते है "
बस.
इसी सवाल के जवाब मे उसे विजय की उपरोक्त स्पीच सुनने को मिली थी, कभी समाप्त ना होने वाली स्पीच.
पूरणसिंघ को सूझा नही कि वो जवाब मे क्या कहे इसलिए चुपचाप विजय की तरफ देखता रह गया था लेकिन उसे विजय ही कौन कहे जो सामने वाले को चुप ही रहने दे, बोला," गूंगी का गुड क्यू बना रखा है पूरे शेर, चौन्च खोल, कुछ तो बोल "
" क्या बोलू मालिक, मेरी तो कुछ समझ मे ही नही आ रहा "
" सम्धन नही आ रही " विजय चिहुका," अबे घोनचू, सम्धन तब आती है जब आदमी का बच्चा अपने बेटे या बेटी की शादी करता है, औलाद की मदर इन लॉ को सम्धन कहा जाता है और तू तो हमारी तरह चिर कुँवारा है, आज तक तूने चूहे का बच्चा भी पैदा नही किया तो फिर सम्धन कैसे आ जाएगी "
पूरणसिंघ अपने बाल नोचने पर आमादा हो गया, बोला," मैं सम्धन की नही, समझ की बात कर रहा हू मालिक "
विजय ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि कमरे के बाहर से आवाज़ आई," कहाँ हो गुरु "
" अबे " विजय इस तरह हड़बड़ाया जैसे बहुत बड़ी आफ़त आ गयी हो," बेमौसम के मेंढक की तरह दिलजला कहाँ से टपक पड़ा "
पूरणसिंघ को तो जैसे विजय के सामने से हटने के लिए मुँह माँगी मुराद मिल गयी थी, वो ये कहता हुआ दरवाजे की तरफ लपका," मैं देखता हू मालिक "
मगर, दरवाजे तक पहुच नही सका पूरणसिंघ.
विजय ने बहुत ही तेज़ी से अपने जिस्म को एक जोरदार झटका दिया था, उसके परिणामस्वरूप एक लंबे झोट के साथ हवा मे तैरता उसका उल्टा जिस्म दरवाजे के नज़दीक पहुच चुके पूरणसिंघ के ठीक उपर पहुचा और फिर उसने नीचे की तरफ लटक रहे अपने दोनो हाथ बढ़ाकर ठीक इस तरह पूरणसिंघ की गर्दन अपनी भुजाओ मे लपेट ली जैसे बाज हवा मे परवाज़ करते हुवे कबूतर को दबोच लेता है.
अचानक खुद पर टूट पड़ी आफ़त के कारण पूरणसिंघ के हलक से चीख निकल गयी थी मगर चीखने और छटपटाने से ज़्यादा वह कुछ भी तो नही कर सका.
उसे दबोचे विजय ठीक उस तरह लंबे-लंबे झोट ले रहा था जैसे सावन के महीने मे महिलाए पेड़ पर झूले डालकर झूलती है.
फ़र्क था तो केवल इतना कि वे रस्सी या पटरी पर सीधी बैठी होती है जबकि विजय अपने विचित्र झूले पर उल्टा लटका हुआ था और पूरणसिंघ को दबोचे हुवे था.
दरवाजे पर पहुच चुके विकास ने जब उस दृश्य को देखा तो हैरान रह गया, कम से कम पहली नज़र मे उसकी समझ मे बिल्कुल नही आया था कि विजय गुरु आख़िर कर क्या रहे है.
विकास के गठे हुवे जिस्म पर इस वक़्त पीले रंग की ऐसी पॅंट थी जो नीचे से उसकी टगो से चिपकी हुई थी और उपर यानी की जाँघो के नज़दीक से थोड़ी फूली हुई थी.
काले रंग की हाफ-बाजू की टी-शर्ट मे उसके मसल्स सॉफ नज़र आ रहे थे, उसका पेट अंदर था, सीना बाहर.
पैरो मे सफेद रंग के रीबॉक के शूस पहने वह कमरे के दरवाजे पर खड़ा उस विचित्र दृश्य को देख रहा था.
माहौल मे पूरणसिंघ की चीखे गूँज रही थी मगर विजय रुकने को तैयार नही था, रुकना तो दूर वह अपने झोटो को और तेज किए जा रहा था, इतना तेज कि अब वह कमरे की दीवारो से बार-बार लगभग टच सा हो रहा था.
विकास की समझ मे शुरू मे विजय की इस हरकत का मतलब भले ही नही आया हो मगर अब.. दिमाग़ के सक्रिय होते ही समझ गया कि विजय गुरु की जो हरकत एक नज़र मे मूर्खतापूर्ण नज़र आ रही थी, उसके पीछे गहरा राज़ है.
दो मिनिट इंतजार करते रहने के बाद विकास बोला," बस गुरु, बहुत हो गया, अब छ्चोड़ दो पूरणसिंघ अंकल को "
" अजी ऐसे-कैसे छोड़ दे " विजय ने उसे उसी तरह झुलाते हुवे कहा," तेरी आवाज़ सुनते ही जैसे इस साले के हाथ बटेर लग गयी, हमारे हुकुम के बगैर हमे अकेला छोड़कर जा रहा था, हम ने जमूरे को पकड़ लिया, अभी तो सुर से सुर मिलाकर हरियाली तीज के गीत गाने है "
" जो गुनाह इन्होने किया था उसकी सज़ा पूरी हो चुकी है गुरु, प्लीज़ छोड़ दो बेचारे को "
" तुम रिक्वेस्ट कर रहे हो तो ऐसा ही कर देते है, पूरे शेर को लपकने के लिए तैयार हो जाओ "
" लपकने के लिए "
" लपकोगे नही तो इस पोज़िशन मे छोड़ने पर राम नाम सत्य नही हो जाएगा पूरे शेर का "
" बात तो ठीक... "
विकास का वाक्य पूरा नही हो पाया था क्योंकि उससे पहले ही विजय ने 'लो' कहने के साथ ही पूरणसिंघ को छोड़ दिया था.
मुँह से निकलने वाली बहुत ही लंबी चीख के साथ पूरणसिंघ का जिस्म हवा मे लहराकार फर्श की तरफ बढ़ा और इसमे शक नही कि अगर विकास ने हैरतअंगेज़ फुर्ती के साथ उसे लपक ना लिया होता तो उसे काफ़ी चोटे आती.
विकास उस वक़्त भी पूरणसिंघ को अपनी बाहो मे भरे गिरने से बचाने की कोशिश कर रहा था जब झोट लेते हुवे विजय ने तत्काल ताली बजाई और कहा," वेल डन दिलजले, वेल डन, तुम उतनी फुर्ती दिखाने के इम्तिहान मे पास हो गये हो जितनी हम चाहते थे "
" आपका भी जवाब नही गुरु " विकास ने पूरणसिंघ को सोफे पर बिठाते हुवे कहा," मेरा इम्तिहान लेने के चक्कर मे अगर पूरणसिंघ अंकल को चोट आ जाती तो "
" नही आ सकती थी दिलजले क्योंकि हमे अपनी बछिया के दाँत पता है " इन शब्दो के साथ ही उसने झोट छोटे कर लिए थे.
सोफे पर बैठे हुवे पूरणसिंघ को अब भी ऐसा लग रहा था जैसे विजय के फंदे मे फँसा हवा मे झूल रहा हो.
चक्कर से आ रहे थे उसे इसलिए सोफे पर लेट गया.
उधर, विजय का झूला रुक चुका था.
अपने शरीर को अजीब ढंग से उसने उपर की तरफ उछाला और दोनो जंजीरो को हाथो से पकड़ लिया, अपने पैर गोल कुंडे से निकाले और सीधा होकर फर्श पर कूद गया.
विकास आगे बढ़ा, श्रद्धापूर्वक उसके चरण स्पर्श करते हुवे बोला," प्रणाम गुरुदेव "
" वो तो ठीक है प्यारे दिलजले, मगर आज अकेले कैसे "
सीधे खड़े होते हुवे विकास ने पूछा," क्या मतलब "
" बंदर कहाँ गया "
जवाब विकास ने नही बल्कि दरवाजे से उभरने वाली बंदर की ची-ची ने दिया था, विजय के साथ ही विकास ने भी उधर देखा.
वाहा धनुष्टानकार मौजूद था, मौजूद ही नही था, विजय पर घुड़क भी रहा था.
चेहरे पर गुस्से के चिन्ह थे.
उसके गुस्से की वजह जानते ही विजय सकपका गया, तुरंत बोला," अरे तौबा, मेरे बाप की तौबा मोंटो प्यारे, कसम काले चिड़ीमार की, मैंने तुम्हे बंदर नही कहा "
अजीब नमूना था वह जिसे धनुषटंकार कहा जाता था.
जिस्म से बंदर, मन-मश्तिश्क से इंसान.
हमेशा की तरह इस वक़्त भी वह शानदार सूट मे था, पैरो मे नन्हे-नन्हे किंतु चमकदार जूते थे, अपने हाथो से उसने कान पकड़े, फुर्ती से उठक-बैठक लगाई और फिर विजय को भी वैसा ही करने का इशारा किया.
विजय जानता था कि धनुषटंकार की तरफ से उसे ये सज़ा बंदर कहने की है. गनीमत थी कि वह सज़ा दे रहा था वरना होता ये था कि खुद को बंदर कहने वाले के गाल पर धनुषटंकार करारा चाँटा रसीद कर देता था.
" लो मोंटो प्यारे, हमे माफ़ करो, अपना दिल सॉफ करो " कहने के साथ ही विजय ने कान पकड़कर उठक-बैठक लगानी शुरू कर दी और उसकी इस हरकत पर विकास के गुलाब की पंखुड़ियो से होंठ शरारती अंदाज मे फैल गये.
दरवाजे पर खड़ा धनुष टंकार खुश हो गया.
ख़ुसी का इज़हार करने का उसके पास एक ही तरीका था और वही उसने किया, यानी कोट की जेब से पव्वा निकालकर ढक्कन खोला, दो घूँट हलक मे उंड़ेली और ढक्कन बंद करके पववा जेब मे रखने के बाद मटकने लगा.
विजय अभी मुश्किल से तीन या चार उठक-बैठक ही लगा पाया था कि धनुष टंकार का जिस्म हवा मे लहराकर विजय की गर्दन पर आ गिरा.
" अबे..अबे...क्या करते हो गान्डीव प्यारे " विजय कहता ही रह गया जबकि उसके सीने पर सवार धनुष टंकार गले मे बाँहे डाले उसके चेहरे पर चुंबनो की झड़ी लगाता चला गया.
ये था धनुषटंकार के प्यार करने का तरीका.
चुंबनो से पेट भरने के बाद धनुष टंकार वहाँ से कूदकर उस सोफे की पुष्ट पर जा बैठा जिस पर लेटा पूरणसिंघ अब स्तिथि बेहतर होने के कारण बैठा हुआ था.
और जिस समय मोंटो जेब से एक सिगार निकालकर सुलगा रहा था उस समय विकास ने विजय से पूछा," तो ये प्रॅक्टीस हो रही थी गुरु कि आप कितनी देर तक उल्टे लटक सकते है "
" सोलाह आने ग़लत " विजय ने तपाक से कहा," सावन आने वाला है ना, हम तो ये देख रहे थे कि अपनी कल्लो भाटीयारिं के साथ किस तरह पींगे बढ़ानी है "
" आप मुझे बेवकूफ़ नही बना सकते "
" फिर किसे बना सकते है " विजय ने शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन लंबी करके महामूर्ख की तरह पलके झपकाई.
" सारी दुनिया को, मैं दावे के साथ कह सकता हू कि आप ना केवल उल्टे लटकने की प्रॅक्टीस कर रहे थे बल्कि ये भी आजमा रहे थे कि इस पोज़िशन मे कितना वेट उठाकर कितने लंबे झोट कितनी देर तक लगा सकते है, इसलिए आपने पूरणसिंघ अंकल को उठाया, मैं दावे के साथ कह सकता हू कि आपकी मूर्खतापूर्ण हर्कतो के पीछे अक्सर ऐसी ही सार्थक बाते छुपी होती है "
" कह सकते हो तो कहो, रोका किस बागडबिल्ले ने है, मगर ये तो बताओ थर्मस कहाँ है "
" थर्मस " वाकाई विकास का दिमाग़ चकरा गया.
" सुबह-सुबह आए हो, गुरु के लिए चाय-वाय तो लाए ही होगे "
विकास ठहाका लगाकर हंस पड़ा," आपका भी जवाब नही गुरु, घर आए मेहमान को चाय पिलाने से तो गये, उल्टे उसी से पूच रहे हो कि थर्मस कहाँ है और... "
" हां-हां, भौंको जितना भौंकने की हसरत है, भौंको "
" अब सुबह नही है, दोपहर के 11 बज रहे है "
" घड़ी पर तो बजते ही रहते है लेकिन तुम्हारे चेहरे पर 12 क्यो बजे है दिलजले, सुबह-सुबह तूलाराशि ने ठोक दिया क्या "
इस बार विकास थोड़ा सीरीयस नज़र आया," मैं आपसे उस मर्डर मिस्टरी पर चर्चा करने आया हू गुरु जिसने राजनगर को ही नही, सारे मुल्क को हिलाकर रख दिया है, जिसे इस देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्टरी कहा जा रहा है "
" कौन सी पेस्ट्री की बात कर रहे हो यार, हम ने तो आज तक ऐसी कोई पेस्ट्री नही खाई जिसे देश की सबसे बड़ी पेस्ट्री कहा जाए "
" मैं पेस्ट्री की नही, मिस्टरी की बात कर रहा हू गुरु "
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11-23-2020, 01:55 PM,
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RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री


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" मिस्त्री की, आमा, मिस्त्री की भला हमे क्या ज़रूरत है, ये मकान जिसकी छत के नीचे इस वक़्त तुम खड़े हो, 1857 मे बनवाया था, ठीक तब जब अंग्रेज़ो से आज़ादी के लिए पहली बार पंगा लिया गया था, तब से अब तक ज्यो का त्यो खड़ा है, मरम्मत की भी ज़रूरत नही है, फिर मिस्त्री की ज़रूरत क्यो पड़ेगी "
" क्या कहता है आपका दिमाग़ " विकास ने विजय की बातो पर ज़रा भी ध्यान दिए बगैर अपना सवाल किया," क्या अपने बेटे और नौकरानी की हत्या सरकार दंपति ने ही की है "
" हे लाल लंगोटे वाले, हमारे दिलजले को ये क्या हो गया है " हाथ जोड़कर विजय ने कमरे के लॅंटार की तरफ देखा और कहता चला गया," एक ही साँस मे कभी पेस्ट्री की बात कर रहा है, कभी मिस्त्री की और ना जाने कभी किसकी हत्या और कौन सी सरकार के दंपति की, क्या इसे मेंटल डॉक्टर की दरकार है "
" प्लीज़ गुरु, मेरे सवाल का जवाब दो "
" देते है, देना पड़ेगा, नही देंगे तो तुम एक ही घूँसे मे हमारी नाक का मालूदा बना सकते हो क्योंकि हम सॉफ-सॉफ महसूस कर रहे है कि तुम्हारा दिमाग़ अपनी जगह से सरक चुका है और सरके हुवे दिमाग़ का मानव जो कर जाए कम है, पूछो.... बल्कि धोऊ, धोऊ, क्या धोना है "
" मैंने ये पूछा कि क्या आपके ख़याल से कान्हा और मीना की हत्या राजन सरकार और उसकी पत्नी इंदु सरकार ने की है "
" आमा यार, क्यो हलकान कर रहे हो हमे, हमे क्या पता कि कौन कान्हा, कौन मीना, कौन राजन और कौन इंदु सरकार "
" मज़ाक मत करो गुरु "
" हम तुम्हे मज़ाक करते नज़र आ रहे है " उसने अपने उस जिस्म की तरफ इशारा करते हुवे कहा जिस पर अभी सिर्फ़ एक लाल लंगोटे जैसा अंडरवेर था," ये कपड़े पहनकर हम तुमसे मज़ाक करेंगे, तुम हमारी साली लगती हो या भाभी "
" मैं नही मान सकता कि जो नाम आज इस देश के बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर है, वे आपने ना सुना हो "
" नही मान सकते तो ना मानो, हमारे ठेंगे से, हम ने ये नाम नही सुने तो नही सुने, कोई ज़बरदस्ती है कि हम सबके नाम सुने "
" मैं कान्हा मर्डर मिस्टरी की बात कर रहा हू गुरु "
" तुम तो यार फिर पेस्ट्री की बात करने लगे, तुम्हे तो किसी मेंटल डॉक्टर को दिखाना ही पड़ेगा, आओ... हमारे साथ आओ " कहते हुए विजय ने विकास का बाजू पकड़ा और उसे दरवाजे की तरफ खींचता सा बोला," एक मेंटल डॉक्टर अपना यादि है, घबराओ मत, वह तुम्हे बिल्कुल दुरुस्त कर देगा, इतना दुरुस्त कि सारे जीवन के लिए पेस्ट्री खाना भूल जाओगे "
अभी वे दरवाजे के नज़दीक ही पहुचे थे और विकास ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि बाहर से कदमो की ऐसी आवाज़ सुनाई दी जो हर कदम के साथ दरवाजे के करीब आ रही थी.
और विजय इस तरह उच्छल पड़ा जैसे अचानक बिच्छू ने डॅंक मार दिया हो, मुँह से चीख सी निकली थी," बापू जान, ये तो बापू जान है दिलजले " विकास को छोड़ कर उसने अपने दोनो हाथो से अपनी छाती पर इस तरह कैंची बनाई जैसे कोई निर्वस्त्र महिला अपने जिस्म को धाँकने की कोशिश कर रही हो, साथ ही बौखलाकर चारो तरफ देखता हुआ बोला," कहा छुपु, कहा छुप्कर अपनी अस्मत बचाऊ "
कदमो की आवाज़ निरंतर दरवाजे की तरफ आ रही थी.
उनमे से एक आवाज़ पोलीस के भारी बूट्स की थी.
विजय शायद उसे ही सुनकर समझ गया था कि आने वाला ठाकुर निर्भय सिंग है.
विकास हकबकाया सा खड़ा था जबकि विजय बुदबुदा रहा था," जल तू जलाल तू.. आई बाला को टाल तू "
पर बला टलने वाली कहाँ थी.

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ठाकुर निर्भय सिंग दरवाजे पर नज़र आए.
मगर विजय उससे पहले ही जंप मारकर खुद को सोफे की पुष्ट के पीछे छुपा चुका था.
विकास चौंका था.
ये लिखा जाए कि चौंका भी बुरी तरह था तो ग़लत ना होगा क्योंकि उसने देखा था कि ठाकुर साहब अकेले नही थे.
उनके साथ भारी-भरकम चेहरे वाला एक और आदमी भी था.
उस आदमी को विकास ने देखते ही पहचान लिया था.
पहचानता भी क्यू नही.
उस आदमी को तो आज देश का बच्चा-बच्चा पहचानता था.
बार-बार टीवी पर जो दिखाया जा रहा था उसे.
करीब-करीब रोज अख़बारो मे उसकी फोटो छप रही थी.
वह राजन था, राजन सरकार.
वही, जिसके बारे मे विकास विजय से बाते करने आया था, वही, जिस पर अपने ही बेटे और नौकरानी की हत्या का आरोप लगा था.
राजन सरकार.
यहाँ.
ठाकुर साहब के साथ.
बात विकास के भेजे मे नही घुसी थी.
बुरी तरह चौंकने का कारण भी यही था.
" तुम लोग यहाँ " ठाकुर साहब ने विकास और मोंटो की तरफ देखते हुवे सामान्य स्वर मे पूछा.
लड़का अपनी लंबी-लंबी टाँगो के बल पर दो ही कदमो मे ठाकुर साहब के करीब पहुचा और झुक कर चरण स्पर्श किए.
उधर, ठाकुर साहब को देखते ही धनुष्टानकार ने अपनी उंगलियो के बीच सुलगते हुवे सिगार को सोफे की पुष्ट के पीछे डाला और एक ही जंप मे ठाकुर साहब के कदमो मे आ गिरा.
उसे देखकर उनके साथ मौजूद शख्स यानी कि राजन सरकार के मुँह से निकला," ये शायद धनुष्टानकार है "
" हाँ " ठाकुर साहब ने संक्षिप्त सा जवाब दिया.
" मैंने इसके बारे मे पढ़ा है "
" बताया नही तुमने " ठाकुर साहब ने विकास से पूछा," तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो "
विकास ने कहा," विजय अंकल से मिलने आए थे "
" कहाँ है वो"
विकास चुप, लेकिन मौका लगते ही पूरणसिंघ बोल पड़ा," यही है साहब, मालिक इस सोफे के पीछे है "
एक बार तो ठाकुर साहब के मुँह से निकल गया," सोफे के पीछे, क्यो " लेकिन फिर तुरंत ही उन्हे ये ख़याल आ गया कि ज़रूर विजय कोई उट-पटांग हरकत करेगा और कम से कम राजन की मौजूदगी मे वह ऐसा कुछ ना करे इसलिए बहुत ही सामान्य और प्यार भरे लहजे मे उसे आगाह सा किया," हम अपने एक बचपन के दोस्त को तुमसे मिलाने लाए है विजय "
" पर मैं नही मिल सकता बापूजान " सोफे के पीछे से विजय की ऐसी आवाज़ आई जैसे अभी रो देगा.
ठाकुर साहब को गुस्सा आया मगर उसे दबाकर अपने लहजे को प्यार की चाशनी मे डुबोते हुवे बोले," क्यो नही मिल सकते "
" क्योंकि हमारी इज़्ज़त लूट जाएगी "
" इज़्ज़त लूट जाएगी " ठाकुर साहब के दिमाग़ मे गुस्से के कीटाणु कुलबुलाए लेकिन फिर बड़ी सख्ती से उन्हे कुचलते हुवे बड़े प्यार से बोले," हम समझे नही बेटे कि तुम क्या कह रहे हो "
" समझो बापूजान, हमारी मजबूरी को समझने की कोशिश करो " सोफे के पीछे से आवाज़ आई," तुम हमारे इस ताजमहल के किसी और कमरे मे चले जाओ, हम वही पधारते है "
" क्यो, अभी और इसी कमरे मे क्यो नही मिल सकते "
" समझाओ ना दिलजले, बापूजान को तुम्ही समझा सकते हो "
ठाकुर साहब ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि विकास ने कहा," आइए नानु, हम किसी और कमरे मे चलते है, अंकल ठीक कह रहे है, वो कुछ देर मे वही पहुच जाएँगे "
" पर ऐसा क्यू " ठाकुर साहब ने कहा," इसी कमरे मे मिल लेगा तो क्या फ़र्क पड़ जाएगा, और फिर, ये क्या बात हुई कि हमारे आते ही वह सोफे के पीछे जा छुपा, घर आए मेहमान का स्वागत करने का ये कौनसा तरीका है "
इस बार विकास से पहले ही पूरणसिंघ बोल पड़ा," साहब, हम बताए कि मालिक आपके सामने क्यो नही आ रहे है "
सोफे के पीछे से आवाज़ आई," हम बाहर निकले तो सबसे पहले नाश्ते मे तेरा ही मुरब्बा बनाकर चबाएँगे पूरे शेर "
" ज़रूर चबा जाना मालिक लेकिन मेरी गर्दन पकड़कर आपने जो झोट लगाए थे, उनका मैं आपको पूरा मज़ा चखाउन्गा "
" माफी माँगते है यार, हमारी इज़्ज़त से खिलवाड़ ना कर "
ठाकुर साहब थोड़े से झल्ला गये," ये सब क्या हो रहा है "
" आप खुद ही सोफे के पीछे झाँक कर देख लीजिए साहब " पूरणसिंघ ने तपाक से कहा," सबकुछ समझ जाएँगे "
ठाकुर साहब को इस बात पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था कि उन्हे आया जानकार विजय सोफे के पीछे जा छुपा था और अब बार-बार कहने के बावजूद सामने नही आ रहा था मगर वे बात को और ज़्यादा नही बढ़ाना चाहते थे इसलिए खुद सोफे की तरफ बढ़ते हुवे बोले," तुमने शायद सुना नही विजय, हम अकेले नही आए है, हमारे साथ हमारे बचपन का दोस्त भी है "
ये बात विजय को बताकर वे एक प्रकार से आगाह कर रहे थे कि वह कोई बदतमीज़ी ना करे.
भला वे क्या जानते थे कि इस वक़्त तो वाकयि सामने ना आना विजय की मजबूरी थी.
सोफे के करीब पहूचकर उन्होने उसके पीछे झाँका.
जिस हालत मे विजय था, उसे देखकर वे चौंक पड़े.
और.... जब उन्होने विजय को देख ही लिया तो विजय भी एक झटके से खड़ा हो गया.
ना सिर्फ़ खड़ा हो गया बल्कि एक टाँग हवा मे घूमाकर सोफे की एक सीट पर रखी और जंप सी लगाकर सोफे के सामने आ गया.
उसे उस हालत मे देखकर ठाकुर साहब सकपका कर रह गये थे जबकि राजन सरकार हक्का-बक्का था.
विकास के होंठो पर मुस्कान थी.
पूरणसिंघ मुँह पर हाथ रखकर हंस रहा था.
धनुष्टानकार तो मानो लोट-पोट ही हुआ जा रहा था.
उस वक़्त विजय के जिस्म पर कोई लोच नही थी.
पूरा जिस्म लाठी की तरह तना हुआ था और फिर वो घुटनो को मोडे बगैर लाठी की तरह चलता हुआ ठाकुर साहब के करीब पहुचा तथा उनके पैरो की तरफ झुकते हुवे बोला," पानी लागू बापूजान "
" ये...ये किस हालत मे हो तुम " बौखलाए हुवे ठाकुर साहब के मुँह से बस यही शब्द निकल सके.
" क्यो, हमारी हालत मे कौन सा नुक्स है " वह सीधा होता हुआ बोला," उसी हालत मे है जिसमे आदमी का बच्चा पैदा होता है और उस हालत मे रहना कौन सा जुर्म है, ओह...सॉरी " उसने अपने अंडरवेर की तरफ देखते हुए कहा," ये कच्छा हमारे जिस्म पर एक्सट्रा है, इसे भी उतार देते है " कहने के साथ विजय के हाथ अपने अंडरवेर की तरफ बढ़े ही थे कि ठाकुर साहब चीख पड़े," विजय "
" जी पिताजी " वह तुरंत सावधान की मुद्रा मे खड़ा हो गया.
" ये क्या बदतमीज़ी है "
" जब कमीज़ ही नही पहन रखी है तो हम बद्कमीजि कैसे कर सकते है बापूजान, बद्कमीजि आपने शुरू की, हम तो इज़्ज़त बचाने की खातिर सोफे के पीछे जा छुपे थे, हमारे लाख अनुनय-विनय के बावजूद आप नही माने और वही पहुच गये "
" ओके, ओके " एक बार फिर ठाकुर साहब ने बात को ना बढ़ाने की मंशा से, जल्दी से कहा," हमे नही मालूम था कि हमारे आने से पहले तुम कसरत कर रहे थे, तुमसे कुछ बाते करनी है, हम यही बैठते है, जल्दी से चेंज करके आ जाओ "
" कौन सा पहनकर आउ "
" मतलब "
" अगर आपको हमारा ये लाल वाला लंगोट पसंद नही है तो कोई बात नही, हमारे पास हर कलर का लंगोट है, हरा, नीला, पीला, नीला, सफेद और बैंगनी भी, जिस भी कलर का कहे, पहनकर हाजिर होते है, पर महरूण कलर के लंगोट की चाय्स मत रख देना क्योंकि काफ़ी ढूँढने पर भी बाजार मे वो नही मिला "
राजन सरकार साथ ना होता तो अब तक ठाकुर साहब विजय के चेहरे पर कम से कम एक घूँसा तो जड़ ही चुके होते, उसकी मौजूदगी के कारण खिसियानी सी हँसी हंसते हुवे बोले," मज़ाक मत करो विजय और जल्दी से ढंग के कपड़े पहनकर आओ "
" ढंग के कपड़े " विजय चिहुन्का," आपको ये ढंग के कपड़े नही लग रहे है जो इस वक़्त हम ने पहन रखे है "
" विजय " ठाकुर साहब का लहज़ा थोड़ा सख़्त हुआ," हम ने जो कहा है, वो करो "
" नही करता " विजय भी अकड़कर खड़ा हो गया.
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11-23-2020, 01:55 PM,
#4
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री


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उन्होने आँखे तरेरि," तुम नही मानोगे "
" एक से लाख नही मानूँगा क्योंकि..... "
" क्योंकि "
" हम ने तो बचने की बहुत कोशिश की लेकिन आप हमारी इज़्ज़त का जुलूस निकालकर ही माने और इज़्ज़त का जुलूस जब निकल ही गया है तो अब काहे की लाज-शरम "

कहने के साथ ही वो पसर कर सोफे पर बैठ गया और आगे बोला," लीजिए, हम विराजमान हो गये, आप भी पधारिये और अपने दोस्त को भी पधारवाइए, नही पधारणा है तो खड़े-खड़े फरमाइए, कैसे आना हुआ "
" मज़ाक मत करो विजय " अब ठाकुर साहब को अपने दिमाग़ पर काबू रखना भारी पड़ रहा था," ढंग के कपड़े पहनकर आओ "
एकाएक विजय राजन सरकार से मुखातिब हुआ," आप हमारे बापूजान के परम मित्र है "
राजन सरकार ने स्वीकृति मे गर्दन हिलाई.
" आप ही बताइए, क्या आपको हमारे इस कच्छे मे कोई कमी नज़र आती है जो हम ने पहन रखा है, कोई छेद-वेद है इसमे "
" व...विजय " ठाकुर साहब के हलक से दहाड़ निकली.
विजय ने बड़े आराम से कहा," हम आपसे नही आपके मित्र से बात कर रहे है " और पुनः राजन सरकार से बोला," आप बताइए, क्या कही से कुछ चमक रहा है "
राजन सरकार की हँसी छूट गयी.
मुँह से निकला," नही "
" हमारे पूछने पर तो बापूजान इस तरह भड़क रहे है जैसे कि सांड़ को लाल कपड़ा दिखाया जा रहा हो, आप ही पूछिए कि हमारे इस कपड़े मे इन्हे क्या बुराई नज़र आ रही है, आप इनके दोस्त है, शायद ये आप पर ना भड़के "
अब अगर ये लिखा जाए तो बिल्कुल ग़लत ना होगा कि ठाकुर साहब के संयम का बाँध टूट गया.
चेहरा सुर्ख हो गया था उनका.
जिस्म गुस्से की ज़्यादती के कारण काँपने लगा था, हलक से वह दहाड़ निकल पड़ी जिसे बहुत मुश्किल से दबाए हुवे थे," तुम कपड़े चेंज करके आते होया नही "
विजय ने पुनः बहुत आराम से और शांत स्वर मे कहा," हम आपसे नही आपके दोस्त से बात कर रहे है "
उसके इस अंदाज ने तो मानो ठाकुर साहब के गुस्से की आग मे घी ही डाल दिया, भन्नाये हुवे से वो विजय की तरफ लपके ही थे कि राजन सरकार ने रोकते हुवे कहा," नो निर्भय, उत्तेजित होने की ज़रूरत नही है, मैंने विजय के मजाकिया स्वाभाव के बारे मे काफ़ी पढ़ा है, समझ सकता हू कि...... "
" मज़ाक, ये मज़ाक है " ठाकुर साहब उखड़ चुके थे," इसे मज़ाक नही, हद दर्जे की बदतमीज़ी कहते है, हिमाकत कहते है, हमे छोड़ दो राजन, आज

हम इसे बता ही दे कि अपने पिता से किस तरह से बात की जाती है "
" छोड़ दो राजन अंकल " विजय सोफे से उच्छला और इस तरह डटकर खड़ा हो गया जैसे अखाड़े मे किसी पहलवान का मुकाबला करने के लिए तैयार हो," आज छोड़ ही दो बापूजान को, हो जाए दो-दो हाथ, मिल्क का मिल्क हो जाए और वॉटर का वॉटर "
" उफ्फ " ठाकुर साहब झल्ला उठे," ऐसा कपूत भगवान कभी किसी को ना दे, राजन, मैंने तुझसे पहले ही कहा था कि ये तेरी कोई मदद नही कर सकता मगर तू ही नही माना, कहने लगा कि तेरी मदद इसके अलावा कोई और कर ही नही सकता, क्या अब भी तू अपने उसी विचार पर कायम है "
" हां " राजन बोला," मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे केस मे केवल ये और सिर्फ़ ये ही कुछ कर सकता है "
" तू पागल हो गया है "
" निर्भय प्लीज़, गुस्से को काबू मे करो "
ठाकुर साहब विजय को आग्नेय नेत्रो से घूरते हुवे गुर्राए," जब तक ये हमारी आँखो के सामने है तब तक ऐसा हो ही नही सकता कि हम हमारे गुस्से पर काबू रख पाए, बडो से बात करने की तमीज़ भी नही सीखी है इसने, अब हम यहाँ एक मिनिट भी नही ठहर सकते, तुझे चलना है तो चल नही चलना है तो मर यही "
राजन सरकार ने तुरंत कुछ नही कहा, हालात को समझने की कोशिश की और ये बात उसकी समझ मे आ गयी कि जो मौहोल बन रहा है उसमे कम से कम ठाकुर साहब की मौजूदगी मे कोई सार्थक बात नही हो सकेगी, अतः शांत और संयत स्वर मे बोला," ठीक है, तू जा, मैं विजय से बात करके आता हू "
ठाकुर साहब की सुर्ख आँखो मे अस्चर्य के भाव उभर आए जो ये बता रहे थे कि उन्हे राजन सरकार से ऐसे फ़ैसले की उम्मीद बिल्कुल भी नही थी जबकि राजन के होंठो पर मंद-मंद मुस्कान थी.
ठाकुर साहब के मुँह से निकला," एकाध बार पहले भी ऐसा हो चुका है, मेरे किसी दोस्त को इसकी मदद की दरकार हुई और मेरे मना करने के बावजूद भी मुझे सिफारिश के लिए ज़बरदस्ती खींचकर इसके पास ले आया, हमारी समझ मे आजतक नही आया कि ऐसा क्यो होता है, ये नालायक भला किसी की क्या मदद कर सकता है, और तेरा केस, तेरा केस तो ऐसा है राजन कि दुनिया के इस सबसे बड़े गधे की तो बिसात ही क्या है, खुद भगवान भी धरती पर उतर आए तो भी
तेरी कोई मदद नही कर सकते "

" बात तो तेरी ठीक है, तेरा ही क्यो, सबका यही कहना है कि हालात के जिस चक्रव्यूह मे मैं फँस गया हू उसमे से मुझे भगवान भी नही निकाल सकता, फिर भी जाने क्यो मुझे पूरा विश्वास है कि उस चक्रव्यूह से मुझे ये तेरा नलायक बेटा ही निकाल सकता है "
" तो मर यही, हम जा रहे है " भन्नाये हुवे ठाकुर साहब ने कहा और पलटकर तेज कदमो के साथ दरवाजे की तरफ बढ़ गये. फिर अचानक जाने क्या सोचकर ठितके.
पलते और गुस्से भरी आँखो से विजय को घूरते हुवे बोले," तू सुन ही चुका है कि ये मूर्ख हमारा बचपन का दोस्त है, पता नही क्या सोचकर तेरी मदद हासिल करने आया है, हमारे काफ़ी मना करने के बावजूद नही माना और ज़िद करके हमे यहाँ ले आया, अगर तुझे लगे कि ये एक पर्सेंट भी सच बोल रहा है तो क़ानून के दायरे मे रहकर, एक बार फिर सुन, क़ानून के दायरे मे रहकर जो मदद संभव हो, वो करना "
इतना कहने के बाद वे बाहर निकल गये.
विजय धम्म से सोफे पर जा गिरा.
अंदाज ऐसा था जैसे कि बहुत बड़ी मुसीबत से छुटकारा पाया हो.

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ठाकुर निर्भय सिंग के जाने के बाद कम से कम दो मिनिट तक कमरे मे पूरी तरह से सन्नाटा छाया रहा.
किसी के मुँह से बोल ना फुट सका.

विकास जानता था कि विजय गुरु ठाकुर साहब के साथ वैसी वाहियात बाते और हरकते क्यो करते है.
उस वजह को जानने के कारण दिल की गहराईयो मे जब विजय के कॅरक्टर के बारे मे सोचता था तो अंदर ही अंदर उसकी महानता को महसूस करके रोमांचित हो उठता था मगर फिर भी उसे लगता था की कभी-कभी गुरु कुछ ज़्यादा ही कर जाते है.

धनुष्टानकार और पूरणसिंघ की समझ मे ख़ासतौर पर ठाकुर साहब के प्रति विजय का व्यवहार कभी नही आया था और बेचारे राजन सरकार को तो पता ही क्या था. वह तो बस इतना ही जानता था कि उसके दोस्त ठाकुर निर्भय सिंग की अपने बेटे से नही बनती है, इसके बावजूद जब उसे अपने चारो तरफ फैले अंधेरे के बीच विजय रोशनी की किरण के रूप मे नज़र आया तो वो ठाकुर साहब के पास पहुच गया क्योंकि डाइरेक्ट विजय से वह कभी नही मिला था.

भले ही अपने पिता के प्रति विजय का व्यवहार उसे भी पसंद नही आया था मगर मजबूर इंसान आख़िर मजबूर ही होता है.
उसका स्वार्थ क्योंकि विजय से ही साधने वाला था इसलिए ठाकुर साहब के जाने के बाद भी वो वही डाटा रहा.
अपनी बात कहने के लिए जब उसने विजय की तरफ देखा तो दंग रह गया क्योंकि सोफे पर पड़ा विजय बकायदा खर्राटे ले रहा था.
उसने विकास, धनुष्टानकार और पूरणसिंघ की तरफ देखा.
चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे इस सवाल का जवाब चाहता हो कि क्या कोई इतनी टेन्षन के बाद इतनी जल्दी इतनी निसचिंत-ता की नींद सो सकता है.
जब कही से भी उत्तर मिलता नज़र ना आया तो सोफे की तरफ बढ़ता वो सामान्य स्वर मे बोला," मिस्टर विजय "
विजय ने फाटाक से आँखे खोल दी और हकबकाए अंदाज मे चारो तरफ देखता हुआ बोला," हमारी चौखट का घंटा किसने पीटा "
" मैंने " राजन सरकार ने कहा.
विजय एक झटके से उठ बैठा और अपने दाए पैर के घुटने को मॉड्कर बाए पैर की जाँघ पर रखता हुआ बोला," कारण "
" समझ ही गये होगे कि मैं यहाँ क्यो आया हू "
" हम अंतर्यामी नही है "
" म...मतलब "
" तू यहाँ खड़ा हमे टुकूर-टुकूर क्या घूर रहा है पूरे शेर " विजय ने एकाएक पूरणसिंघ से कहा," किचन मे जाकर जमालघोटा बना, हमारे पेट मे चूहे मटरगश्ती कर रहे है " फिर एकाएक राजन से मुखातिब हुआ," क्या आप जमालघोटा लेना पसंद करेंगे "
" ज...जी " राजन सरकार सकपकाया.
" ज़्यादातर बीमारिया पेट के हाइवे से गुजरती हुई ही शरीर के बाकी हिस्सो तक पहुचती है और जमालघोटा पेट को इस तरह सॉफ कर देता है जैसे बिल्ली ने राबड़ी की कटोरी चाट ली हो इसलिए हम रोज जमाल्घोटे की एक खुराक लेते है, आप हमारे दडबे पर आए है, मेहमान है हमारे और मेहमान की खातिरदारी करना हमारा फ़र्ज़ भले ही ना हो लेकिन हमारा क़र्ज़ ज़रूर है "
" नही, शुक्रिया "
" क्या नही, आप जमाल्घोटे के बारे मे उगले गये हमारे ज्ञान से असेह्मत है या जमालघोटा लेने से इनकार कर रहे है "
" मुझे जमालघोटा नही चाहिए "
" यानी आप हमे अतिथि देव भाव का सुख नही देंगे "
" मेरे लिए तो तुम्हारी तरफ से यही सम्मान काफ़ी होगा कि मेरी बात धैर्य से सुन लो और.... "
" और "
" मेरी मदद करो "
इस बार विजय ने तुरंत कुछ नही कहा, बस टुकूर-टुकूर राजन सरकार की तरफ देखता रहा.
इस बीच पूरणसिंघ को तो जैसे निजात मिल गयी थी, वह बगैर कुछ कहे कमरे से इस तरह गायब हो गया जैसे कभी था ही नही.
" तो क्या फर्मा रहे थे हम " राजन सरकार पर निगाह केंद्रित किए हुए विजय ने एक बार फिर अपनी ज़ुबान को कष्ट दिया," ये की हम अंतर्यामी नही है, हमे कैसे मालूम कि आप अपनी तशरीफ़ का टोकरा सिर पर उठाए क्यो घूम रहे है और उसे हमारे दौलतखाने पर लाकर क्यो पटक दिया "
" तुमने मेरे बेटे कान्हा और नौकरानी मीना के मर्डर केस के बारे मे टीवी पर देखा होगा और अख़बारो मे पढ़ा होगा "
" मीडीया उसका इतना कचूमर निकाल चुका है कि उसे तो हर आँख-कान वाले ने देखा, पढ़ा और सुना है "
" उसी संबंध मे आया हू "
" कहिए, क्या कहना है "
" मैं और इंदु बेकसूर है "
" गप्प "
राजन सरकार ऐसा सकपकाया कि मुँह से शब्द ना फुट सके.
" कोरी गप्प हांकने आए है आप "
" नही विजय, कम से कम तुम तो वैसा ना कहो जैसे कि सब कह रहे है " राजन सरकार के चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे कि अभी रो देगा," तुम मेरी एक्मात्र और आख़िरी उम्मीद हो "
" मतलब "
" निर्भय तुम्हे बता ही चुका है कि मैं और वो बचपन के दोस्त है, मदद के लिए जब मैं उसके पास पहुचा तो उसने कहा,' देखो राजन, दोस्ती अपनी जगह,क़ानून अपनी जगह, भले ही मैं तेरा चाहे कितना पुराना दोस्त होउ लेकिन क़ानून के खिलाफ जाकर मैं तेरी कोई मदद नही करूँगा ' मैंने कहा,' मैं क्या अपने दोस्त को जानता नही हू, मैं केस मे तेरी सिफारिश के लिए नही आया हू बल्कि तेरे पास आने का मकसद है तेरे बेटे की मदद हासिल करना ' मेरी बात सुनकर निर्भय बुरी तरह चौंक पड़ा, उसने कहा,' वो नलायक भला तेरी क्या मदद कर सकता है ' मैंने कहा,' तुम बस एक बार मुझे उसके पास ले चलो और उसे मेरा परिचय करा दो, जो बाते करनी होगी मैं कर लूँगा ' निर्भय ने मुझे समझाने की काफ़ी कोशिश की, कहा कि तुम मेरी तो क्या दुनिया मे किसी की भी मदद करने की काबिलियत नही रखते मगर मैं नही माना और उससे ज़िद करता रहा, अंततः उसे मुझे लेकर यहा आना ही पड़ा "
" यहा आने के लिए आप इतने पगलाए हुए क्यो थे "
" क्योंकि इस दुनिया मे तुम वो अकेले शख्स हो जो सच्चाई को सामने लाने की काबिलियत रखता है "
" सच्चाई तो सारी दुनिया के सामने आ ही चुकी है, कोर्ट के फ़ैसले के बाद अब इस क़िस्से मे बचता ही क्या है "
" सच्चाई ये नही है विजय कि कान्हा और मीना का मर्डर मैंने और इंदु ने किया है "
" आप कोर्ट की अवमानना कर रहे है "
Reply
11-23-2020, 01:55 PM,
#5
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री


5

" नही, मैं कोर्ट की अवमानना नही कर रहा, सिर्फ़ ये कह रहा हू कि पोलीस ने इस केस की इन्वेस्टिगेशन ठीक से नही की है, कोर्ट के सामने आधी-अधूरी बाते रखी गयी है, इनस्पेक्टर राघवन ने उस रात का एक डेमो भी तैयार किया था और उसे कोर्ट को दिखाकर ये समझाने की कोशिश की थी कि उस रात हमारेफ्लॅट ए-74 मे क्या हुआ था, हमारे वकील ने कहा कि वो डेमो पूरी तरह से काल्पनिक था, उस रात ए-74 मे वैसा कुछ नही हुआ था लेकिन कोर्ट ने उस दलील को नही माना, उस सूरत मे कोर्ट को वो फ़ैसला देना ही था जो दिया, तुम्हे मालूम होगा, हम ने उपर की अदालत मे अपील की है और इस वक़्त उसी के आदेश पर जमानत पर है "

" हमे नही मालूम कि आपने ऐसा किस बूते पर किया है, आपके खिलाफ इतने ज़्यादा और पुख़्ता सबूत है कि.... "
राजन सरकार ने उसकी बात काटी," यकीन करो विजय, ऐसा हम ने सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारे बूते पर किया है "
" हमारे बूते पर, बात खोपड़ी मे घुसी नही, हम ने तो आपके दर्शन ही पहली बार किए है, फिर हमारे बूते पर उपर की अदालत मे अपील करने का क्या मतलब हुआ "
राजन ने अपना एक-एक शब्द जमाते हुवे कहा," मिला भले ही पहली बार . लेकिन तुम्हारे बारे मे पढ़ा बहुत कुछ है "
" क्या पढ़ा है "
" यही कि जिस केस पर तुम काम करते हो उसका दूध का दूध और पानी का पानी होकर रहता है "
" पर जनाब, आपके केस मे तो वो पहले ही हुआ पड़ा है "
" नही हुआ है ना विजय, यकीन करो " राजन सरकार उस वक़्त जल बिन मछली की मानिंद तड़प्ता नज़र आया था," हमारे मामले मे ऐसा नही हुआ बल्किअनर्थ हो रहा है, इसलिए तो ये रिक्वेस्ट लेकर तुम्हारे पास आया हू कि तुम दूध का दूध और पानी का पानी करो, मेरे बेटे को इंसाफ़ दिलाओ "
" उस बेटे को जिसे आपने खुद मार डाला "
" प्लीज़ विजय, तुम भी बार-बार वही कहकर मेरी आख़िरी उम्मीद को मत तोडो जो सब कह रहे है " राजन सरकार की आँखो मे नमी नज़र आने लगी थी," कम से कम तुम तो सोचो, एक माँ, एक पिता अपने ही जिगर के टुकड़े को कैसे मार सकते है "
" कलयुग चल रहा है मेरी सरकार, जो हो जाए सो कम है और फिर गुस्सा ऐसी बाला है जो इंसान से कुछ भी करा सकता है, जो आपने देखा, उसे देखकर किसी को भी गुस्सा आ जाएगा "
" वही तो कह रहा हू " राजन की हालत बाल नोचने जैसी हो गयी थी," मैंने ऐसा कुछ भी नही देखा जिसे देखकर गुस्सा आता "
" आधी रात के वक़्त अपने बेटे को अधेड़ नौकरानी के साथ बेड पर नही देखा आपने "
" नही देखा, बिल्कुल नही देखा, वही तो कह रहा हू, जो कुछ कोर्ट और मीडीया के ज़रिए समाज के सामने आया है, वह सारी स्टोरी पोलीस की बनाई हुई है, एकदम झूठी और काल्पनिक, सचाई का एक अंश भी नही है उसमे "
" तो फिर बंद फ्लॅट मे कौन मार गया उन्हे "
" पहेली तो ये ही है, ये पहेली हल हो जाए तो फिर.... तो फिर लोगो के सामने हक़ीकत ही ना आ जाए, समझने की कोशिश करो विजय, मैं तुम्हारे सामने इस पहेली को सुलझाने की रिक्वेस्ट करने आया हू क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है कि तुम.... "
" देखिए हुजूर, बार-बार ये अलाप करके हमे गन्ने पर चढ़ाने की कोशिश ना करे, क्योंकि हम गन्ने पऱ चढ़ने वाली वस्तु नही है " इस बार्फ़ विजय ने उसकी बात काटकर कहा," कोई और घर देखिए, हमे विश्वास है कि कोर्ट के फ़ैसले मे कोई लोचा नही है, स्टोरी वही सच्ची है जिसपर कोर्ट ने मोहरलगाई है "
इस बार कुछ बोल नही सका राजन सरकार.
चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे अभी, वही बैठकर रोने लगेगा.
सॉफ नज़र आ रहा था कि वह खुद को रोने से रोकने की भरपूर कोशिश कर रहा है.
अंततः विकास बोल पड़ा," मैं कुछ कहूँ गुरु "
" वैसे तो जब दो बुजुर्ग बाते कर रहे हो तो बच्चो को बीच मे टाँग नही अडानी चाहिए लेकिन जब अड़ा ही दी है तो घूमाओ इसे, हो सकता है कि किसी ढंग की जगह जा टिके "
" मैं आपसे इसी केस के सिलसिले मे बात करने आया था "
" क्या "
" कि आप क्या सोचते है, सरकार दंपति ने ही अपने बेटे और नौकरानी का मर्डर किया है या.... "
" तुमने हमारे विचार जान लिए होंगे "
" हां, जान तो लिए है मगर.... "
" वो पानी मे पाया जाता है "
" ....वे मेरे विचारो से मेल नही खाते "
" नही खाते तो ना खाए, हमारे ठेंगे से "
" इस बात पर विचार तो किया ही जाना चाहिए कि यदि सच्चाई वह नही हुई जो इस दुनिया के सामने आई है तो क्या होगा "
" क्या होगा "
" अनर्थ हो जाएगा गुरु, अनर्थ " विकास ने एक-एक शब्द पर ज़ोर दिया," जिनका बेटा मरा है उन्हे ही सज़ा हो जाएगी, इससे बड़ा अनर्थ और क्या होगा "
" हत्या की है तो सज़ा तो मिलनी ही चाहिए "
" मुझे नही लगता कि उन्होने हत्या की है "
" बेस "
" हालात चाहे जैसे हो जाए, माँ-बाप अपनी औलाद को नही मार सकते, वे उसकी जान नही ले सकते जिसे उन्होने जनम दिया हो "
" तुमने शायद ऑनर किल्लिंग के बारे मे नही सुना, हमारे प्यारे देश मे आजकल भी लोग इज़्ज़त की खातिर अपनी उसी प्यारी औलाद को मार देते है जिसे उन्होने जनम दिया है "
" वो इंटीरियर मे होता है गुरु, जहा अभी तक शिक्षा ने पैर नही पसारे है, राजन अंकल जैसे पढ़े-लिखे लोग ऐसी हरकत नही कर सकते "
" तुमने शायद पढ़े-लिखे अनपढ़ नही देखे "
विकास ने एक-एक शब्द पर ज़ोर दिया," करोड़ो भारतीय दिल से ये मानते है कि इन्होने ऐसा नही किया होगा "
" ये दुनिया दिल से नही, दिमाग़ से चल रही है दिलजले और अगर तुम ये कह रहे हो कि करोड़ो भारतीयो के दिल मे वो है जो तुम कह रहे हो तो हम भी कह सकते है कि करोड़ो भारतीय दिमाग़ ये स्वीकार करते है कि जैसे हालात इनके सामने पेश आए, उनमे माँ-बाप वैसा कर सकते है जैसा इन्होने किया "
" हम ने कुछ नही किया मिस्टर. विजय " एक बार फिर राजन सरकार अन्तर्नाद सा कर उठा," या यू समझ लो कि हम ने कुछ भी इसलिए नही किया क्योंकि हमारे सामने वैसे हालात ही पैदा नही हुए, जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हू, हम ने वैसा कुछ नही देखा जैसा प्रचारित किया गया है या पोलीस द्वारा जैसा डेमो बनाकर कोर्ट को दिखाया गया है "
विजय ने विकास की तरफ इशारा करते हुवे राजन सरकार से कहा," आपकी समझ मे आ गया होगा कि दिलजला आपकी भरपूर मदद कर सकता है "
" मैं विकास की नही, तुम्हारी मदद हासिल करने आया हू "
" आमा कोई ज़बरदस्ती है क्या यार, जब हमे बात ही नही जॅंच रही तो मदद क्या खाक करेंगे, और दिलजले, तुम भी कानो मे घासलेट डालकर सुनो, आज से पहले भी हम तुमसे सैंकड़ो बार कह चुके है कि जब भी घर से निकलो तो दिल को खूँटि पर टाँग के निकला करो, केवल दिमाग़ को अपने साथ रखा करो क्योंकि दिल धोखा देता है लेकिन दिमाग़ कभी धोखा नही देता, जो राग राजन सरकार साहब अलाप रहे है वो राग अलापने वाले ये पहले व्यक्ति नही है बल्कि हर मुजरिम यही राग अलापता है, कयि तो इतने शातिर होते है कि फाँसी के फंदे पर चढ़ने तक खुद को बेकसूर बताते है "

" मैं ऐसा नही हू, मैं ऐसा हरगिज़ नही हू विजय " राजन सरकार के अंदर से मानो एकाएक कोई ज्वालामुखी फट पड़ा और वह रोने के साथ ही कहता चला गया," हम अपना एकलौता बेटा खो चुके है, समाज मे जो मान-सम्मान और इज़्ज़त थी, उसकी धज्जिया उड़ चुकी है, अब जिए भी तो किसके लिए, किसलिए, हर आदमी के पास जीने का कोई ना कोई मकसद होता है, हमारे पास तो कोई मकसद ही नही बचा, यकीन मानो विजय, अब हम पति-पत्नी मे से किसी के भी अंदर
जीने की ख्वाइश नही है, हम मर जाना चाहते है, रात-दिन भगवान से यही शिकवा करते है कि तूने ये दिन दिखाने से पहले हमे उठा क्यो नही लिया, सोच कर तो देखो विजय, बेटा भी हमारा ही गया और उसकी हत्या के जुर्म मे फाँसी भी हम ही चढ़ जाएँगे, क्या कोई माँ-बाप हुंसे ज़्यादा अभागे हो सकते है, मैं खुद को और अपनी पत्नी को बचाने के लिए नही बल्कि अपने बेटे को इंसाफ़ दिलाने के लिए भटक रहा हू, इसलिए छटपटा रहा हू क्योंकि जानता हू कि कान्हा का कत्ल हम ने नही किया है, अगर हम फाँसी पर चढ़ गये तो कान्हा का हत्यारा इस समाज की छाती पर मूँग डालता रहेगा, ना
हमारे बेटे की आत्मा को शांति मिलेगी, ना हमारी रूह को सुकून, अब तो बस एक ही बात चाहते है हम, यही कि मरने से पहले अपने बेटे के कातिल को फाँसी के फंदे पर झूलते हुवे देख ले, इसी ख्वाइश को दिल मे लेकर मैं तुम्हारे पास आया था लेकिन अगर तुम भी वैसा नही कर सकते तो मैं ये मान लूँगा कि वैसा कभी हो ही नही सकता "
इतना कहकर राजन सरकार जहाँ खड़ा था वही घुटनो के बल बैठकर फुट-फुट कर रोने लगा. अपना चेहरा उसने अपने हाथो से ढँक लिया था.
विकास के चेहरे पर भी वेदना के भाव थे लेकिन विजय का चेहरा चिकने पत्थर की मानिंद सपाट था, जैसे कि उसपर राजन सरकार के किसी शब्द का कोई असर ही ना हुआ हो, करीब आधे मिनिट की खामोशी के बाद उसने कहा," दिलजले, लगता है कि राजन सरकार की स्पीच ने नरेंद्र मोदी की स्पीच बनकर तुम्हारे दिल को गहरा आघात पहुचाया है "
" उसे छोड़िए गुरु, मेरा कहना बस इतना ही है कि दूसरे आंगल से एक बार सोचकर तो देखिए, क्या ऐसा नही हो सकता कि... "
" तुम्हे मालूम है दिलजले कि हम किसी बात को हवा मे स्वीकार नही करते, बेस चाहिए, क्या इस मामले मे तुम एक भी ऐसा बेस पेश कर सकते हो जिससे कि हम दूसरे आंगल से सोचने को मजबूर हो जाए "
" सबसे बड़ा बेस तो यही है कि पोलीस कोर्ट मे इनके खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नही कर पाई, कोर्ट ने जो भी फ़ैसला सुनाया है वो परिस्थितिजन्य साक्ष्यो के आधार पर ही सुनाया है, मर्डर वेपन तक कोर्ट मे पेश नही किया जा सका "
" इन्होने सारे सबूत बड़ी सफाई से सॉफ किए है "
" ये पोलीस की दलील है जो ग़लत भी हो सकती है "
" अच्छा ये बताओ, जब कोई और कान्हा और मीना का मर्डर कर रहा था उस वक़्त ये पति-पत्नी क्या कर रहे थे "
" हम कोर्ट को भी बता चुके है " राजन सरकार ने आँसुओ से तर चेहरा उपर उठाकर कहा," सो रहे थे "
" अब बताओ दिलजले, छोटे से फ्लॅट के अंदर, इनके ठीक बगल वाले कमरे मे दो व्यक्तियो का मर्डर कर दिया गया और ये सोते रहे, कोई यकीन करेगा इस बकवास पर "
" क्यो नही किया जाना चाहिए "
" इसलिए नही किया जाना चाहिए क्योंकि मकतूलो के सिरो पर हॉकी से वार किया गया था, स्वाभाविक रूप से वे चीखे होंगे क्योंकि ऐसा कोई एविडेन्स नही मिला है जिससे पता लगता हो कि हॉकी मारने वाले ने हॉकी मारने से पहले उनके मुँह से चीख ना निकालने देने के लिए कुछ किया हो "
" यक़ीनन वे चीखे होंगे "
" और ये इतने आंटागफील थे कि बगल वाले कमरे मे होने के बावजूद वे चीखे इनके कानो पर जूँ बनकर रेंग तक ना सकी "
" बड़ा अच्छा शब्द इस्तेमाल किया आपने " विकास ने जैसे बात लपकी," हो सकता है कि ये अंतगाफील ही हो "
" मतलब "
" सबसे पहले हत्यारे ने इन्हे ही बेहोश किया हो "
" अंदर से बंद ए-74 मे बाहर से किसी भी व्यक्ति के आने का कोई निशान नही मिला है "
" आपने ए-74 का निरीक्षण किया है "
" मतलब "
" ये दावा पोलीस का है जो कि झूठा भी हो सकता है "
" पोलीस झूठा दावा क्यो करेगी "
" पोलीस को क्या आप जानते नही है, क्या आपको नही मालूम कि पोलीस मे कैसे-कैसे काबिल लोग है, सारा केस इनस्पेक्टर राघवन की समझ और उसकी इन्वेस्टिगेशन पर बेस्ड है, क्या आपको ये बताने की ज़रूरत है कि एक इनस्पेक्टर की समझ कितनी होती है, ऐसा क्यो नही हो सकता कि कोई पॉइंट राघवन की नज़र से चूक गया हो, ऐसा क्यो नही हो सकता कि उसकी जाँच मे कोई कमी हो, मेरे ख़याल से हमें अपने तरीके से इन्वेस्टिगेशन करनी चाहिए "
" अब तुम कल्पना करने लगे हो "
" पोलीस की भी तो सारी स्टोरी कल्पना ही है, उन्होने कोर्ट मे ये नही कहा कि राजन ने कान्हा और मीना को आपत्तिजनक हालत मे देख लिया था बल्कि ये कहा है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यो के आधार पर ऐसा लगता है कि राजन ने उन्हे आपत्तिजनक हालत मे देख लिया था इसलिए उसने गुस्से मे हॉकी से वार किया, गौर फरमाओ गुरु, इन शब्दो पर गौर फरमाओ कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर ऐसा लगता है, ये साक्ष्य खुद बता रहे है कि सारी स्टोरी कल्पना पर आधारित है "
विजय ने आँखे तरेरी," काफ़ी सयाने हो गये हो दिलजले "
" क्या मतलब गुरु "
" तुम्हारी इस दलील मे दो-चार किलो वजन तो है "

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11-23-2020, 01:55 PM,
#6
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री


6

" और यदि वे कल्पना कर सकते है तो मैं कल्पना क्यो नही कर सकता " विकास दुगने जोश के साथ बोला," उनकी कल्पना के आधार पर अगर एक कोर्ट सरकार दंपति को सज़ा सुना सकती है तो मेरी कल्पना के आधार पर उससे बड़ी कोर्ट इन्हे बरी क्यो नही कर सकती, बहरहाल, क़ानून ये कहता है कि भले ही 100 मुजरिम छूट जाए पर एक भी बेगुनाह को सज़ा नही होनी चाहिए, बड़ी कोर्ट से इन्हे बेनेफिट ऑफ डाउट क्यो नही मिल सकता "
" अब तुम कुछ ज़्यादा ही स्मार्ट बनने की कोशिश कर रहे हो दिलजले, जिन साक्ष्यो को तुम परिस्तिथिजन्य साक्ष्य कहकर हवा मे उड़ाने की कोशिश कर रहे हो या बहुत हल्के मे ले रहे हो वो इतने हल्के है नही क्योंकि कम से कम 20 साक्ष्य ऐसे है जिनके बेस पर कोर्ट ने पोलीस की स्टोरी को सच माना है "
" वे सारे साक्ष्य खड़े किए गये भी तो हो सकते है "
" कौन करेगा ऐसा "
" असल हत्यारा....या हत्यारे "
" और इसमे ये सरकार साहब भी शामिल होंगे "
विकास थोड़ा सकपकाया," अपने ही खिलाफ साक्ष्य खड़े करने मे भला ये क्यो शामिल होने लगे "
" उन 20 मे से कम से कम एक साक्ष्य तो हम ऐसा बता ही सकते है जिसे इन्होने खुद खड़ा किया है "
" ऐसा कौन सा साक्ष्य है "
" अपनी स्टोरी के तहत पोलीस ने भले ही ये साबित किया हो कि नौकरानी.... यानी मीना की हत्या भी कान्हा के बेडरूम मे ही कर दी गयी थी लेकिन उसकी लाश वहाँ से बरामद नही हुई थी, उसे दो दिन बाद शहर के बाहर के कूड़े के ढेर से बरामद किया गया था "
" और ये कहा गया कि हत्या करने के बाद सरकार दंपति ने ही उसे वहाँ पहुचाया था "
" हम कुछ और कहना चाहते है प्यारे "
" कहिए "
" उसकी शिनाख्त के लिए सरकार-ए-आली को कूड़े के ढेर पर ले जाया गया, लाश को देखकर इन्होने पहचानने से इनकार कर दिया, कहा कि मैं नही कह सकता कि ये लाश मीना की ही है जबकि लाश ज़रा भी खराब नही हुई थी, सरासर पहचानने योग्य थी, इन्ही के पड़ोसियो और मीना के बेटे ने पहचानी भी, ऐसा कैसे हो सकता है कि ये अपनी उस नौकरानी को ना पहचानते हो जो 6 महीने से ना केवल इनके घर मे काम कर रही थी बल्कि फ्लॅट मे ही रहती थी "
विकास सकपका गया.
उसे जवाब नही सूझा था.
" अब बताओ, क्या ये साक्ष्य इन्होने खुद खड़ा नही किया, अगर ये कातिल नही है, यदि इनके दिल मे कोई चोर नही था तो मीना की लाश को पचानने से इनकार क्यो किया "
विकास की ज़ुबान पर तो जैसे ताला लग गया था लेकिन राजन ने कहा," ऐसा कहने के लिए हमारे वकील ने कहा था "
" व..वकील ने " विजय चौंका.
" ये बात वकील ने मुझसे उसी समय कह दी थी जब पोलीस मेरे पास आई थी और मुझे बताया था कि वहाँ से एक औरत की लाश मिली है जहा नगर निगम शहर भर का कूड़ा डालता है और मुझे उसकी शिनाख्त के लिए चलना होगा, वकील ने कहा था कि लाश मीना की हो या ना हो, तुम्हे यही कहना है कि मैं उसे नही पहचानता क्योंकि तुम्हारे द्वारा ये कहते ही कि लाश मीना की है पोलीस तुम्ही को कातिल मान लेगी और तुम पर अपना शिकंजा कस लेगी, ऐसे हालात मे एक आम आदमी के सामने अपने वकील का कहा मानने के अलावा कोई चारा नही होता क्योंकि वो स्वयं क़ानून की पेचीदिगियों को नही समझता "
" बात तो सोलाह आने दुरुस्त है " विजय ने किसी बुजुर्ग की तरह गर्दन हिलाई," वैसे हालात मे एक आम आदमी वही करता है जो उसके वकील की सलाह होती है मगर ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही समझदार तुम्हारा वकील था कौन "
" तुमने अख़बारो मे नाम पढ़ा होगा, अशोक बिजलानी "
" देखा गुरु, आपको उन 20 परिस्थितिजन्य साक्ष्यो मे से एक का जवाब मिल गया जिसके आधार पर सरकार दंपति को दोषी माना गया है " विकास उत्साह से भर गया था," हो सकता है आगे चलकर दूसरे परिस्तिथिजन्य साक्ष्यो के जवाब भी मिल जाए लेकिन उसके लिए हमे निकलना तो पड़ेगा ही "
" अगर तुम इतनी ही ज़िद कर रहे हो दिलजले तो चलो... निकल पड़ते है, देखा जाएगा जो होगा यानी कि उस कहावत को चरितार्थ करते है कि चढ़ जेया बेटा सूली पर, भली करेगा राम "
विकास की आँखे चमकने लगी जबकि राजन सरकार ख़ुसी के मारे मानो पागल होने वाला था, उसके मुँह से चीख-सी निकली थी," म...मैं तुम्हारी बातो का मतलब नही समझा विजय, क्या इस बात का मतलब ये है कि तुम रियिन्वेस्टिगेशन के लिए तैयार हो गये हो, मेरी रिक्वेस्ट मान ली है तुमने "
" पर इसका मतलब ये नही है मेरी सरकार कि हम ने आपको बेकसूर मान लिया है " विजय ने कहा," हमारी खोपड़ी अब भी तुम्हे और तुम्हारी बीवी को ही कातिल कह रही है, हम ने 3 वजहो से निकलने का फ़ैसला लिया है, पहला, आपकी सिफारिश हमारे बापूजान ने की है, दूसरा, दिलजले की बात दिल से जा लगी है, और तीसरा, आजकल ठलुये है यानी कोई काम नही है, कोई काम नही है तो यही सही, वैसे हम सबसे पहले अशोक बिजलानी नाम के उस आला वकील से मिलना चाहेंगे जिसने तुम्हे नौकरानी की लाश को ना पहचानने की सलाह दी थी "
" थॅंक यू... थॅंक यू सो मच विजय " ख़ुसी से उच्छल पड़ा राजन सरकार, उछल्कर विजय को बाँहो मे भर लिया उसने और मोंटो की तरह उसके चेहरे पर चुंबनो की झड़ी लगा दी.
काश, विजय को इल्म होता कि अशोक बिजलानी की कोठी पर पहूचकर उसके दिमाग़ की सोचने-समझने का काम करने वाली सारी नसें हड़ताल पर चली जाने वाली थी.

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अशोक बिजलनीि की कोठी वसंत कुंज जैसे महँगे इलाक़े मे थी, हालाँकि वहाँ सभी कोठिया शानदार थी मगर बिजलानी की कोठी का तो जैसे जवाब ना था, लोहे वाले गेट के बाई तरफ वाले काले ग्रनाइट पत्थर से मंधे पिल्लर के बीचो-बीच सिल्वर कलर के अक्षरो से 'अशोक बिजलानी' लिखा था.
बंद गेट को खुलवाने के लिए राजन सरकार के ड्राइवर ने हॉर्न बजाया, उसकी ब्लू कलर की संतरो कोठी के बाहर बने रॅंप पर खड़ी थी, उसके पीछे खड़ी थी, लाल और सफेद रंग की पजेरो.
ड्राइविंग सीट पर विकास था. बगल वाली सीट पर विजय और पिच्छली सीट पर धनुष्टानकार पसरा सिगार का धुवा उड़ा रहा था.
ये गाड़ी विकास ने पिच्छले हफ्ते खरीदी थी और अपनी कोठी से विजय उसी मे सवार हो गया था.
एक वर्दीधारी दरबान ने गेट थोड़ा-सा खोलकर बाहर झाँका.
शायद वो राजन सरकार की गाड़ी को पहचानता था इसलिए गेट को पूरा खोलने का उपक्रम किया मगर सिर्फ़ उपक्रम ही किया, खोला नही, क्योंकि तभी उसकी नज़र सैन्ट्रो के पीछे खड़ी पजेरो पर पड़ गयी थी और वो उसे नही पहचानता था.
राजन सरकार समझ गया कि वो क्यो हिचक गया है इसलिए गाड़ी के अंदर से ही दरबान को अपने करीब आने का इशारा किया.
दरबान संतरो के नज़दीक पहुचा.
राजन ने अपनी तरफ का काँच उतारकर कहा," वो हमारे साथ है, आने दो "
दरबान ने स्वीकृति मे गर्दन हिलाई.
वापस गाते की तरफ गया और पूरा गेट खोल दिया.
गेट पार करने के बाद दोनो गाड़ियाँ ड्राइव-वे पर फिसलती चली गयी, दोनो तरफ पहरेदारो की मानिंद खड़े अशोक के लंबे-लंबे वृक्ष हवा के पारो पर सवार होकर झूम रहे थे, उनके पार नज़र आ रहा था हरभरा लॉन और जगह-जगह खिले रंग-बिरंगे फूल.
ड्राइव वे सीधा था और वहाँ तक था जहाँ खूबसूरत इमारत का पोर्च नज़र आ रहा था, ये कहा जाए तब भी ग़लत ना होगा कि पोर्च भी देखने लायक था.
लंबे-लंबे 4 पिल्लर्स पर टिका हुआ था वो और छत ज़मीन से करीब 24 फीट उपर थी, इतना विशाल कि उसके नीचे 4 गाड़िया पार्क की जा सकती थी.
एक साइड मे कयि लग्जरी गाड़िया खड़ी थी.
राजन सरकार के ड्राइवर ने पोर्च के ठीक बीच मे पहूचकर संतरो रोकी, विकास ने पजेरो उसके पीछे.
सैन्ट्रो से राजन सरकार और पजेरो से विजय-विकास निकले.
धनुष्टानकार विकास के कंधे पर सवार था.
" आओ विजय " कहने के साथ राजन सरकार इस तरह इमारत के मुख्यद्वार की तरफ बढ़ा था जैसे यहाँ अक्सर आता रहता हो और इमारत के मुकम्मल भूगोल से वाकिफ़ हो.
मुख्यद्वार पार करने के बाद वे 5 फुट चौड़ी और करीब 20 फुट लंबी गॅलरी मे पहुचे.
गॅलरी के उस पार लॉबी का एक हिस्सा और कुछ सीढ़िया नज़र आ रही थी परंतु वे लॉबी की तरफ नही बढ़े बल्कि उससे पहले ही गॅलरी की दाई दीवार मे एक दरवाजा था.
राजन सरकार ने उसे खोला और अंदर दाखिल हो गया.
विजय-विकास ने अनुसरण किया.
वो काफ़ी बड़ा कमरा था जिसे ऑफीस का रूप दिया गया था, बीचो-बीच विशाल और चमकदार ऑफीस टेबल पड़ी थी.
टेबल के दोनो अन्द्रूनि किनारो पर फाइल्स का ढेर नज़र आ रहा था और उसके पीछे पड़ी थी चमड़ा मंधी रिवॉल्विंग चेर.
चेर इस वक़्त खाली थी मगर विशाल मेज के दाई तरफ एक युवक और युवती अपेक्षाकृत छोटी मेज के पीछे पड़ी चेर्स पर बैठे फाइल्स का अध्ययन कर रहे थे.
युवक के जिस्म पर सफेद पॅंट-शर्ट और काला कोट था जबकि युवती सफेद सूट पर काला कोट पहने हुए थी.
उनके ठीक सामने लेकिन विशाल मेज के पार यानी मेज के बाई तरफ एक युवती कंप्यूटर पर काम कर रही थी.
उसके जिस्म पर वकील वाली ड्रेस नही थी.
वो केले के तने जैसी अपनी टाँगो मे जीन्स और जिस्म के उपरी हिस्से मे लाल रंग का टॉप पहने हुए थी.
टॉप का उपर वाला बटन खुला हुआ था, उसके कारण दोनो पर्वतो के बीच की घाटी दृष्टिगोचर हो रही थी.
निहायत ही खूबसूरत लड़की थी वो.
कमरे की हर दीवार के साथ बड़ी-बड़ी अलमारिया लगी हुई थी और उमने करीने से सजी थी, क़ानून की मोटी-मोटी किताबे.
विशाल मेज और उसके पीछे पड़ी रिवॉल्विंग चेर के पीछे एक बड़ी खिड़की थी, खिड़की पर ग्रिल और काँच लगा हुआ था.
काँच के पार लॉन नज़र आ रहा था.
कमरे मे मौजूद तीनो व्यक्तियो ने आहट सुनकर दरवाजे की तरफ देखा और देखते ही रह गये.
ख़ासतौर पर विकास के कंधे पर बैठे धनुष्टानकार को.
उनके चेहरो पर कौतूहूल के भाव उभरे थे.
राजन सरकार ने अशोक बिजलानी की खाली कुर्सी की तरफ इशारा करते हुवे कहा," कुछ देर पहले बिजलानी ने कहा था कि वह ऑफीस मे ही मिलेगा "
" वे अंदर है राजन अंकल, इंटरकम पर हमे आपके आगमन के बारे मे बता चुके है " लड़की ने कहा," बैठिए "
राजन विज़िटर चेर पर बैठता हुआ बोला," बैठो विजय "
" हम बैठते कभी नही जनाब, हमेशा पधारते है और ये लीजिए, पधार गये " कहने के साथ विजय दूसरी विज़िटर्स चेर पर बैठ गया था, विकास तीसरी पर जबकि धनुष्टानकार विशाल मेज के एक कोने पर पसर गया था.
लड़के ने कहा," नो...वहाँ नही "
धनुष्टानकार दाँत किटकिटा कर उस पर घुड़का.
लड़का ही नही, दोनो लड़किया भी डर गयी थी, हंसते हुए विकास ने कहा था," उसे ना ही छेड़ो तो बेहतर होगा "
" लेकिन " जीन्स और लाल टॉप वाली लड़की बोली," सर नाराज़ होंगे, प्लीज़, उसे वहाँ से हटा लीजिए "
" हमारा कहना तो ये मानता नही " विजय बोला," हां, लड़कियो का कहना मान जाता है, ख़ासतौर पर खूबसूरत लड़की का, बशर्ते लड़की प्यार से कहे, वैसे इसे नाम से ही पुकारो तो बेहतर होगा, इसका नाम मोंटो है "
" म...मोंटो "
" हां, इसे प्यार से कहकर देखो कि मोंटो प्लीज़, वो बैठने की जगह नही है, मेज पर मत बैठ, शायद मान जाए "
लड़की के चेहरे पर हैरत के भाव काबिज हो गये, विजय की तरफ उसने ऐसे अंदाज मे देखा था जैसे यकीन ना कर पा रही हो कि उसने वही कहा था जो उसने सुना जबकि विजय ने पुनः कहा," उसे वहाँ से हटाने का बस यही एक तरीका है "
उस लड़की के मुँह से तब भी बोल ना फूटा जबकि सफेद सूट, काले कोट वाली लड़की ने कहा," प्लीज़ मिस्टर. मोंटो, मैं आपसे रिक्वेस्ट करती हू कि आप वहाँ से हट जाए "
उसका इतना कहना था कि मोंटो के मुँह से ऐसी किल्कारी निकली जैसे खुश हो गया हो और फिर उसी लड़की के नही बल्कि दूसरी लड़की और युवक के मुँह से भी चीख निकल गयी क्योंकि धनुष्टानकार ने मेज से सीधी जंप उस लड़की पर लगाई थी, इससे पहले की कोई कुछ समझ पाता, वो लड़की के कंधे पर ही सवार नही हो गया बल्कि उसके फूले-फूले गोरे गालो पर एक चुंबन भी जड़ डाला और फिर उछल्कर वापिस विकास के कंधे पर जा बैठा.

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11-23-2020, 01:55 PM,
#7
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री


7

जो कुछ हुआ, पलक झपकते ही हो गया था और... जब लड़की की समझ मे आया कि क्या हो गया है तो डर के साथ-साथ चेहरे पर शरम की सुर्खी भी फैलती चली गयी जबकि धनुष्टानकार ने अपने छोटे से कोट की जेब से पव्वा निकाला, खोला और मुँह से लगाकर गटगट कयि घूँट पी गया.
दोनो लकड़िया और युवक उसे हैरत से देख रहे थे.
शायद इसलिए क्योंकि ऐसा करामाती बंदर उन्होने पहले कभी नही देखा था, आँखो मे अस्चर्य लिए वे उसे देखते रह गये थे, कमरे के हालात थोड़े सामान्य हुए तो विजय बोला," देखा, हम ने कहा था ना कि ये लड़कियो का कहना फ़ौरन मानता है " फिर उसने लाल टॉप वाली लड़की की तरफ देखा और बोला," ये ही शब्द अगर तुमने कहे होते तो ये इससे डबल खुश होता और एक किस के बाद पीछा नही छोड़ता बल्कि अब तक किस ही ले रहा होता "
किसी के मुँह से बोल ना फुट सका.
थोड़े गॅप के बाद राजन सरकार ने कहा," बिजलानी को बता दो कि हम आ गये है "
लड़के ने मेज पर रखे इन्स्ट्रुमेंट का रिसीवर उठाया.
एक बटन दबाया और दूसरी तरफ से रिसीवर उठाए जाने का इंतजार करने लगा, शायद रिसीवर उठाया गया क्योंकि उसने बहुत ही शालीन स्वर मे कहा था," राजन अंकल आ गये है सर "
"......................." शायद दूसरी तरफ से कुछ पूछा गया था.
" जी हां " लड़के ने कहा," उनके साथ दो लोग और भी है और एक बंदर भी है "
बंदर शब्द सुनते ही धनुष्टानकार भड़क उठा, लड़के के गाल पर चाँटा जड़ने के लिए विकास के कंधे से उच्छलने वाला ही था कि मौके की नज़ाकत को देखते हुवे विकास ने उसे इस तरह पकड़ लिया कि वो वो ना कर सके जो करना चाहता था.
लड़का रिसीवर क्रेडेल पर रख चुका था जबकि धनुष्टानकार विकास की पकड़ से निकलने के लिए संघर्ष करने के साथ बार-बार लड़के पर घुड़क रहा था.
लड़का घबरा गया, चेहरे पर ख़ौफ़ के भाव लिए बोला," अब इसे क्या हुआ, मुझ पर क्यो... "
" हम ने इसलिए बताया था हुजूर-ए-आला कि इसका नाम मोंटो है " विजय बोला," उस शब्द से इसे नफ़रत है जो तुमने रिसीवर पर बोला, फ़ौरन से पहले माफी माँग लो वरना ये तुम्हारी टिक्का-बोटी करके खा जाएगा और डकार भी नही लेगा "
सबकुछ बताया जाने के बावजूद लड़के की समझ मे कुछ नही आया था इसलिए वो किनकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रह गया जबकि धनुष्टानकार हर पल उग्र होता जा रहा था.
विकास ने लड़के को दाँत-ते हुवे कहा," जो गुरु ने कहा है, वो करो बेवकूफ़, अब मेरे लिए इसे संभालना मुश्किल हो रहा है "
हकबकाया हुआ लड़का धनुष्टानकार की तरफ देखता हुआ बोला," सॉरी मिस्टर. मोंटो "
मोंटो कुछ और ज़ोर से घुड़का.
" ऐसे नही " विजय बोला," दोनो हाथो से अपने दोनो कान पकड़कर पूरी श्रद्धा से माफी माँगो "
घबराए हुवे लड़के ने अपने दोनो कान पकड़ते हुवे कहा," मुझे माफ़ कर दो मोंटो जी, मुझे मालूम नही था कि... "
आगे का सेंटेन्स उसने खुद ही अधूरा छोड़ दिया.
मोंटो के चेहरे पर अब कुछ संतुष्टि के भाव नज़र आए, एक बार फिर उसने जेब से पव्वा निकालकर मुँह से लगा लिया.
वो दो या तीन घूँट ही पी पाया था कि,
'धाय'
ऐसी आवाज़ हुई जैसे कही गोली चली हो.
विजय वो पहला शख्स था जो कुर्सी से उछल्कर ना सिर्फ़ दरवाजे की तरफ लपका बल्कि उसे पार करके गॅलरी मे पहुचा.
उसके पीछे विकास था.
विकास के कंधे पर धनुष्टानकार.
कोठी के अन्द्रूनि हिस्से से यानी लॉबी की तरफ से दो औरतो के चीखने-चिल्लाने की आवाज़े आने लगी थी.
विजय-विकास उसी तरफ लपके और अब... विकास के कंधे से कूदकर धनुष्टानकार उनसे आगे-आगे दौड़ रहा था.
बिजलानी के स्टाफ की दोनो लड़किया और लड़का हकबकाए हुए से उनके पीछे दौड़ रहे थे.
वे लॉबी मे पहुचे.
औरतो के चीखने-चिल्लाने की आवाज़े उपर से आ रही थी, अब तो ऐसा भी लग रहा था जैसे वे किसी बंद दरवाजे को पीट रही हो, विजय-विकास सीढ़ियो की तरफ लपके जबकि धनुष्टानकार उनसे आगे-आगे रेलिंग पर दौड़ा चला जा रहा था.
चीख-चिल्लहटो का पीछा करते हुए वे उपर, एक ऐसी गॅलरी मे पहुचे जिसके दोनो तरफ कयि दरवाजे थे.
चीखती-चिल्लाति दोनो औरते एक ऐसे दरवाजे को ज़ोर-ज़ोर से पीट रही थी जो अंदर से बंद था.
एक अढेढ़ थी.
दूसरी युवा.
अढेढ़ के जिस्म पर साड़ी थी.
युवा ने साइलेक्स और कुरती पहनी हुई थी.
युवा लड़की बार-बार चिल्ला रही थी," खोलो... खोलो पापा, मुझे आपसे कोई शिकायत नही है "
" क्या हुआ, क्या हुआ " विजय-विकास उनके करीब जा पहुचे.
वे चौंकी.
पलटकर उनकी तरफ देखा.
चेहरे दहशत और आँसुओ से सारॉबार थे.
उनमे से कोई भी विजय-विकास को पहचानती नही थी फिर भी ये सवाल नही किया कि वे कौन है और उनके घर मे कहाँ से आ घुसे क्योंकि जहाँ मे इससे कही बड़े सवाल दहक रहे थे.
लड़की ने वही कहा भी," पापा के कमरे मे गोली चली है "
" क्या वे अंदर है " विकास ने पूछा.
ख़ौफ़ की ज़्यादती के कारण युवा लड़की सिर्फ़ स्वीकृति मे गर्दन हिला सकी.
विकास ने पलटकर विजय की तरफ देखा.
अनिष्ट की आशंका दोनो को हो चुकी थी.
अभी वे कोई फ़ैसला नही कर पाए थे कि धनुष्टानकार ने फर्श से पहली जंप विकास के कंधे पर लगाई, वहाँ एक भी क्षण गँवाए बगैर दूसरी जंप दरवाजे के ठीक उपर मौजूद वेंटिलेटर पर.
वहाँ लोहे की रोड पर मूव करने वाला काँच का पल्ला लगा हुआ था, धनुष्टानकार उसके बीच से होते हुवे दूसरी तरफ यानी की कमरे के अंदर कूद गया.
तब तक बिजलानी का स्टाफ भी वहाँ पहुच चुका था.
कुछ देर बाद अंदर की तरफ से बंद दरवाजा सरकने की आवाज़ आई और धनुष्टानकार ने पूरा दरवाजा खोल दिया.
सबकी नज़र बेड पर पड़े बिजलानी के जिस्म पर पड़ी.
चीखती हुई उसकी पत्नी और बेटी उस तरफ लपकी ही थी कि विजय ने एक साथ दोनो के बाजू पकड़ते हुवे कहा," प्लीज़ उनके नज़दीक मत जाइएगा "
" छोड़ो...छोड़ो मुझे " लेडकी ने विजय के बन्धनो से निकलने की पूरी कोशिश की," पापा जिंदा हो सकते है "
" वो मर चुके है " विजय ने कहा.
कुछ देर तक लड़की आँखे फ़ाडे विजय की तरफ देखती रह गयी, फिर ह्य्स्टीरियाइ अंदाज मे चिल्लाई," नही, ऐसा नही हो सकता, मेरे पापा नही मर सकते, तुम झूठ बोल रहे हो "

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लाश बेड पर औंधे मुँह पड़ी थी.
चेहरे का जो हिस्सा चमक रहा था वो खून से लथपथ था.
बाई तरफ की कनपटी पर बने गोली के जख्म से बहता खून अब भी चेहरे से होता हुआ बूँद-बूँद करके बेड पर बिछि पीले रंग की उस चादर को भिगो रहा था जिस पर गुलाब के बड़े-बड़े फूल बने हुवे थे.
जाहिर है की गोली लगते ही खून काफ़ी तेज़ी से बहा होगा इसलिए चेहरा और चादर खून से तर-बतर थे.
कलाइया शरीर के दोनो तरफ फैली हुई थी.
बाए हाथ मे रिवॉल्वार था.
तर्जनी ट्रिग्गर पर.
कनपटी मे घुसने के बाद गोली शायद अंदर ही कही अटक गयी थी क्योंकि सिर मे कोई जखम नही था.
एक दीवार पर टंगा एलसीडी ऑन था.
उसपर आजतक चल रहा था.
बेड की दाई दराज पर कप-प्लेट रखे थे.
लाश के करीब एक मोबाइल पड़ा था.
विजय ने उसे उठा लिया.
वो निरीक्षण कर चुका था, कमरे मे उस रोशनदान के अलावा कोई और रोशनदान नही था जिसके माध्यम से धनुष्टानकार अंदर दाखिल हुआ था.
बेड के ठीक सामने वाली दीवार मे एक विंडो ज़रूर थी जिसकी चौखटो मे फँसा एक काफ़ी बड़ा काँच लगा हुआ था.
काँच के पार, नीचे, हरा-भरा लॉन और बीच-बीच मे खिले रंग-बिरंगे फूल ही नही बल्कि वो फॉल भी नज़र आ रहा था जो इस वक़्त शांत था परंतु कल्पना की जा सकती थी की जब वो ऑन होता होगा तो कमरे से कितना दिलकश नज़ारा नज़र आता होगा.
दाई दीवार पर चन्द फॅमिली फोटोग्रॅफ लगे हुवे थे जिनमे अशोक बिजलानी, उसकी पत्नी और बेटी नज़र आ रहे थे.
उनमे एक फोटो ऐसा भी था जिसमे बिजलानी की पीठ नज़र आ रही थी, सामने नज़र आ रहे पेड़ पर एक तीतर बैठा हुआ था और बिजलानी अपने दाए हाथ मे मौजूद रिवॉल्वार से तितर पर निशाना लगाता नज़र आ रहा था.
विजय ने तुरंत पहचान लिया, फोटो मे वही रिवॉल्वार था जो इस वक़्त लाश के हाथ मे था.
बाई तरफ वाली दीवार मे एक दरवाजा था.
विजय दरवाजे को खोलकर देख चुका था बल्कि एक चक्कर अंदर भी लगा आया था.
वो बाथरूम था और उसके अंदर सामने वाली दीवार मे बाहर की तरफ खुलने वाला ठीक वैसा ही रोशनदान था जिसके ज़रिए धनुष्टानकार कमरे मे दाखिल हुआ था.
इस वक़्त कमरे मे लाश के अलावा केवल विजय, विकास और धनुष्टानकार थे, राजन सरकार सहित बाकी सबको उन्होने गॅलरी मे मौजूद एक अन्य कमरे मे पहुचकर दरवाजा बंद कर दिया था.
हालाँकि उन्हे काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी थी मगर करनी ही थी क्योंकि घटनास्थल से छेड़-छाड़ नही की जा सकती थी.

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कुछ देर बाद जब वहाँ पोलीस पहुचि तो कमरे का निरीक्षण करके वे तीनो वापिस गॅलरी मे आ चुके थे.
पोलीस के साथ रघुनाथ भी था.
हालाँकि कत्ल की वारदात पर सीधे रघुनाथ के पहुचने का कोई औचित्य नही था, कम से कम प्राथमिक स्तर पर ये काम क्षेत्रो के थानेदार का था लेकिन क्योंकि विजय का फोन सीधा उसी के पास पहुचा था, इसलिए उसे आना पड़ा.
विकास और धनुष्टानकार को देखकर रघुनाथ चौंका, शब्द मुँह से फिसलते चले गये," तुम यहाँ क्या कर रहे हो "
विजय बीच मे टपका," ये हमारे लांगेड़ू है "
" लांगेड़ू " रघुनाथ भन्नाया," ये क्या होता है "
" बात समझाई जाने के बावजूद तुम्हारी समझदानी मे नही घुसेगी तुलाराशि, फिर भी कोशिश करते है " विजय कहता चला गया," लांगेड़ू उन्हे कहते है जो किसी बड़े आदमी के पीछे उसकी दुम की तरह लगे रहते है, हर उस जगह पाए जाते है जहा वो बड़ा आदमी पाया जाता है, हर नेता के साथ तुमने कुछ ऐसे चेहरे देखे होंगे जो हर जगह पाए जाते है, उन्हे लांगेड़ू कहते है "
रघुनाथ इस बार कुछ बोला नही.
बस कड़ी नज़रो से विजय को घूरता रहा.
कुछ देर तक तो विजय ने उसकी नज़रो को बर्दाश्त किया फिर आँख मारता हुआ बोला," मोहब्बत भरी इन नज़रो से इतनी देर तक ना देखो रघु डार्लिंग, हमारा दिल सीना फाड़कर बाहर निकल आया तो वापिस अपनी जगह पर फिट करना मुश्किल हो जाएगा "
रघनाथ सकपकाया.
उसे लगा, विजय अपनी सदाबहार बकवास शुरू करने वाला है, जानता था, अगर एक बार वो शुरू हो गया तो काबू मे लाना मुश्किल हो जाएगा और कम से कम इस वक़्त, स्टाफ के सामने वो नही चाहता था कि विजय शुरू हो जाए इसलिए तुरंत ही मतलब की बात पर आता हुआ बोला," तुम लोग यहाँ क्यो आए थे "
" जी आए नही, लाए गये थे " विजय ने किसी मुलाज़िम की तरह गर्दन झुककर बेहद शराफ़त से जवाब दिया था.
" कौन लाया था "
" राजन सरकार "
" कौन राजन सरकार "
" अएल्लो, जिसे आज की डेट मे हिन्दुस्तान का बच्चा-बच्चा जान चुका है, उसे अपने सुपेरिटेंडेंट ऑफ पोलीस नही जानते, इसलिए हम तुम्हे सूपर ईडियट कहते है रघु डार्लिंग "
" बकवास मत करो विजय " रघुनाथ भड़का," सीधे-सीधे जवाब दो कि राजन सरकार कौन है "
विकास बोला," गुरु उन राजन सरकार की बात कर रहे है पापा जिन पर अपने बेटे और नौकरानी की हत्या का आरोप है "
" वो...वो राजन सरकार " रघुनाथ चौंका और पुनः विजय की तरफ पलट-ता हुआ बोला," उससे तुम्हारा क्या संबंध "
" कैसी बात कर रहे हो रघु डार्लिंग, हमे क्या समलैंगिक समझ रखा है जो पुरुषो से संबंध रखेंगे "
" तुम नही मानोगे " रघुनाथ गुर्राया.
" मान तो तुम नही रहे हो तुलाराशि, हम से ये पूछने का क्या मतलब है कि राजन सरकार से हमारा क्या संबंध है "
" मेरा मतलब था कि राजन सरकार के साथ तुम यहाँ क्यो आए "
" ये हुई ना बात "
" जवाब दो "
विजय ने छाती फूला कर कहा," हम उन्हे बेगुनाह साबित करने अपने दडबे से बाहर निकल आए है "

Reply
11-23-2020, 01:56 PM,
#8
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
8

" राजन सरकार को बेगुनाह साबित करने "
" जी " विजय ने अपना सारा जिश्म आकड़ा लिया.
" दिमाग़ खराब हो गया है तुम्हारा, जिसे कोर्ट दोषी करार दे चुकी है, उसे तुम बेगुनाह साबित करोगे "
" दिमाग़ हमारा नही, तुम्हारे आइ.जी. साहब का खराब हो गया है, उन्ही के मारे हम इस वक़्त यहाँ खड़े है "
" क्या मतलब "
" मतलब कयि किलोमीटर लंबा है तुलाराशि, उसे समझने के फेर मे पड़े तो सारी उम्र यही गुजर जाएगी "
" तुमने अभी तक मेरे इस सवाल का जवाब नही दिया कि तुम लोग यहाँ क्यो आए थे "
इससे पहले कि विजय कुछ कहता, विकास ने संक्षेप मे सबकुछ बता दिया, ऐसा शायद उसने इसलिए किया क्योंकि जानता था, विजय गुरु रघुनाथ को सीधा जवाब देने वाले नही है.
रघुनाथ ने कहा," मतलब गोली तुम्हारे सामने चली "
" हमारी आँखो के नही, कानो के सामने "
रघुनाथ ने उसे घूरा और बोला," तुम किसी बात का सीधा जवाब नही दे सकते "
" जवाब बिल्कुल सीधा है डार्लिंग, तुम्हे आड़ा-तिरच्छा नज़र आए तो हम क्या कर सकते है, तुम्हारा क्या पता, कल चश्मदीद गवाह बनाकर हमे कोर्ट मे खड़ा कर दो, हम वहाँ भी यही कहेंगे कि हम ने गोली की आवाज़ सुनी थी लेकिन वो हमारे सामने नही चली थी "
" सुन चुका हू "
" बड़ी मेहरबानी क़ी हम पर मगर हमारे ख़याल से प्रोटोकॉल के मुताबिक अब तुम्हे लाश की सुध लेनी चाहिए क्योंकि हो सकता है कि इतनी देर हो जाए कि लाश तुम्हारा इंतजार करते-करते थक जाए और खुद ही उठकर पोस्टमॉर्टम के लिए पहुच जाए, बहरहाल इंतजार की भी कोई हद होती है मिया "
रघुनाथ की सोचो को झटका लगा.
बोला," कहाँ है लाश "
" आइए, कराते है दर्शन " कहने के साथ विजय उस कमरे की तरफ बढ़ा जिसमे लाश थी.
रघुनाथ और इलाक़े का थानेदार और दो पुलीसीए भी उसके पीछे बढ़े, विकास और उसके कंधे पर बैठा धनुष्टानकार तो था ही.
कमरे मे पहुचने के बाद रघुनाथ कुछ देर तक बेड के चारो तरफ घूम-घूमकर लाश का निरीक्षण करता रहा, फिर बोला," लगता तो यही है कि इसने आत्महत्या की है "
विजय ने बड़े आराम से कह दिया," मर्डर भी हो सकता है "
" मर्डर, मर्डर कैसे हो सकता है " रघुनाथ चिहुन्का," तुमने खुद ही तो बताया, गोली की आवाज़ सुनकर जब तुम लोग यहाँ पहुचे तो कमरा अंदर से बंद था जिसे रोशनदान के रास्ते से घुसकर धनुष्टानकार ने खोला और... कमरे मे आने-जाने का कोई अन्य रास्ता कम से कम मुझे तो नज़र नही आ रहा "
" पहली बात, ये सारी कथा तुम्हे हम ने नही, दिलजले ने सुनाई है, दूसरी बात, आँखो की जगह अगर बटन फिट कर दिए जाए तो नज़र भी क्या आ सकता है "
" मतलब " वो गुर्राया.
" मुकम्मल घटनास्थल का मुआयना अभी आपने किया ही कहाँ है सूपर ईडियट साहब, करो तो शायद ये भी नज़र आ जाए कि इस कमरे मे मर्डर करने के बाद कोई कैसे ऊडन-छु हो सकता है "
एक बार फिर रघुनाथ कुछ नही बोला.
सिर्फ़ उसे घूरता रहा.
इधर, विजय की बात ने विकास को बुरी तरह चौंका दिया था, उसके ख़याल से भी ये मामला सीधा-सीधा स्यूयिसाइड का था और अभी तक उसका ये विचार था कि विजय गुरु के मुताबिक भी ऐसा ही है मगर विजय गुरु के उपरोक्त कथन ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया, परंतु ये बात उसकी समझ मे नही आई कि ये मर्डर कैसे हो सकता है.
उसके ख़याल से भी वहाँ हत्यारे के भाग निकालने लायक कोई रास्ता नही था.
कमरे का स्कॅन सा कर रही रघुनाथ की नज़र बाथरूम के बंद दरवाजे पर स्थिर हो गयी.
वो उसकी तरफ बढ़ा.
बाथरूम मे पहुचा.
उसका मुआयना करता बोला," मुझे तो ऐसी कोई जगह नज़र नही आ रही जहाँ से कोई दाखिल हो सके या निकल सके "
" वो क्या है " विजय ने रोशनदान की तरफ इशारा किया.
" वो " रघुनाथ की नज़र रोशनदान पर स्थिर हो गयी," तुम्हारा दिमाग़ खराब हो गया है क्या, भला इतने छोटे रोशनदान से कोई कैसे आर-पार निकल सकता है "
" जैसे अपना धनुष्टानकार घुसा "
" धनुष्टानकार की बात और है, मैं किसी व्यक्ति की बात कर रहा हू, कोई व्यक्ति इस रोशनदान से.... "
" क्यो नही हो सकता रघु डार्लिंग " विजय रघुनाथ की बात काटकर बोला," बिजलानी मिया का हत्यारा अपने मोंटो जैसा कोई जीव क्यो नही हो सकता, जैसे चिंपू जी, लंगूर या कोई और जीव, ऐसे भी कुछ लोग होते है जिनकी कद-काठी वैसे जीवो जैसी होती है जिनके हम ने नाम लिए, ऐसा क्यो नही हो सकता कि ऐसी ही कद-काठी का कोई शख्स रोशनदान के माध्यम से कमरे मे आया हो और हमारे यहाँ पहुचने से पहले ही बिजलानी साहब का एक बटा दो करके निकल गया हो "
रघुनाथ ने टिप्पणी की," कौड़ी ज़रा दूर की है "
" पर कौड़ी तो है ना "
विकास बोल पड़ा," निसचित्ऋूप से घटनास्थल पर आपने कुछ और भी देखा है गुरु, कुछ ऐसा, जिससे आपको लग रहा है कि ये मर्डर भी हो सकता है, केवल रोशनदान के बूते पर तो आपने ये बात नही कही हो सकती "
" सुना प्यारे तुलाराशि, तुमसे ज़्यादा भेजा तो तुम्हारे कपूत की खोपड़ी मे ही क्रिकेट खेल रहा है "
" ऐसा और क्या नज़र आ रहा है तुम्हे "
" ढुंढ़ो मेरी जान, छोटा सा घटनास्थल है " विजय ने चुनौती देने वाले लहजे मे कहा," पूरे के पूरे घटनास्थल पर घूम-घूमकर देखो कि ऐसा कौन सा दूसरा सुत्र है जिससे लगता है कि अशोक बिजलानी का क्रियाक्रम किसी और ने भी किया हो सकता है "
रघुनाथ पर तो जो प्रतिक्रिया हुई, सो हुई ही, विकास का भी जहाँ झंझणा उठा था, इसमे कोई शक नही कि उसने भी विजय के साथ ही घटनास्थल का निरीक्षण किया था मगर वैसी कोई बात नज़र नही आई थी जिसके कारण इस दिशा मे सोच सकता था कि यहा जो कुछ हुआ वो स्यूयिसाइड की जगह मर्डर भी हो सकता है.
अब उसने हर चीज़ को बारीकी से देखना शुरू किया, रघुनाथ भी वैसा ही कर रहा था और... वे दोनो ही क्यू, धनुष्टानकार की आँखे भी जैसे एक्स-रे मशीन मे तब्दील हो चुकी थी, थानेदार और उसके साथ आए पुलिसियो की हालत भी ठीक वैसी ही थी.
उन्होने बाथरूम ही नही, दोबारा कमरे का भी निरीक्षण किया मगर कही ऐसा कुछ नज़र नही आया जिसके बूते पर इसे मर्डर कहा जा सकता, अंततः हार-सी मानते हुवे रघुनाथ ने कहा," मुझे तो कही कुछ नज़र नही आ रहा "
" तुम भी हार गये दिलजले " विजय ने ऐसे लहजे मे पूछा जैसे कि उसने कोई पहेली पूछी थी और वे जवाब नही दे पा रहे थे.
विकास को कहना पड़ा," हां "
" अशोक बिजलानी राइट हॅंडर था जबकि खुद को वो लेफ्ट हॅंड से गोली मारता नज़र आ रहा है "
सभी चौंके, विकास ने पूछा," आपको कैसे मालूम कि वो राइट हॅंडर था "
" इस फोटो को देखो " विजय ने दीवार पर लगे फोटो की तरफ इशारा किया," इसमे बिजलानी पेड़ पर बैठे तितर को निशाना बनाता नज़र आ रहा है, रिवॉल्वार यही है मगर दाए हाथ मे "
विकास सहित, वहाँ मौजूद हर जीव के दिमाग़ मे विस्फोट सा हुआ, बात बिल्कुल दुरुस्त थी, थानेदार और दोनो पुलीसीए मन ही मन कह उठे," क्या आदमी है ये, जिस बात पर किसी का ध्यान नही गया, ये उसे पकड़े बैठा था "
" बात तो ठीक है गुरु " विकास आती-उत्साहित अंदाज मे कह उठा," इसका मतलब तो ये हुआ कि ये 100 पर्सेंट मर्डर है "
" नही दिलजले, इसका मतलब 100 पर्सेंट वो नही हुआ जो तुम समझ रहे हो बल्कि हम ये कहेंगे कि तुममे कमी ही ये है कि किसी भी छोटे-से पॉइंट के अपनी समझदानी मे घुसते ही अंतिम नतीजे पर पहुच जाते हो जबकि ऐसा नही होना चाहिए, एक सुलझे हुवे इन्वेस्टिगेटर को अंतिम नतीजे पर पहुचने से पहले मामले को हर आंगल से जाँच और परख लेना चाहिए "
" सॉफ नज़र आ रहा है गुरु, बिजलानी ने खुद को गोली नही मारी बल्कि किसी और ने मारकर इसे आत्महत्या साबित करने की कोशिश की है, या तो हत्यारे को बिजलानी के राइट हॅंडर होने का पता नही था या वो इस महत्त्वपूर्ण तथ्य को भूल गया "
" ऐसा भी हो सकता है और नही भी "
" आप कहना क्या चाहते है "
" मामला फिफ्टी-फिफ्टी का है " विजय बोला," ये मर्डर भी हो सकता है और स्यूयिसाइड भी "
" वो कैसे "
" कुछ लोग कुछ ख़ास काम राइट हॅंड से करते है, कुछ लेफ्ट हॅंड से, जैसे सचिन तेंदुलकर, वो बॅटिंग राइट हॅंड से करता है, साइन लेफ्ट हॅंड से और... कुछ लोग ऐसे भी होते है जो सारे काम दोनो हाथो से कर सकते है, एक साथ दो हाथो से लिख सकते है "
" ये बात तो ठीक है " विकास पस्त-सा हो गया था," फिर नतीजे पर कैसे पहुचा जाए "
" शायद राजन से बात करने के बाद कोई जूस निकले "
" वो कहाँ है " रघुनाथ ने पूछा.
विजय बगैर कुछ कहे दरवाजे की तरफ बढ़ गया.
अगर विजय की भाषा मे कहा जाय तो वे सभी लांगेड़ुओ की तरह उसके पीछे लपके थे.

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" ये...ये क्या हो गया विजय " कमरे मे दाखिल होते हुवे राजन सरकार ने कहा," मैं तो सोच भी नही सकता था कि बिजलानी स्यूयिसाइड कर लेगा "
" आपसे किसने कहा कि उसने स्यूयिसाइड की है "
" इसमे किसी के कहने वाली क्या बात है, गोली की आवाज़ सुनकर हम सब साथ ही वहाँ पहुचे थे, कमरा अंदर से बंद था, बंद कमरे मे गोली चलने का मतलब... "
विजय उसकी बात काटकर कहता चला गया," कयि बार ऐसा भी हो जाता है जनाब की बख़्तरबंद कमरे मे गोली चलती है लेकिन वो स्यूयिसाइड नही होती, कोई मर्डर करके ऐसे रास्ते से उडनच्छू हो जाता है जो पहली नज़र मे किसी को नज़र नही आ रहा होता और फिर इस बात को आपसे बेहतर कौन समझ सकता है, आपका का तो खुद कहना है कि चारो तरफ से बंद ए-74 मे कोई आया और कान्हा-मीना का मर्डर करके ऐसा फरार हुआ कि आज तक हाथ नही आया, धार पर आप रखे गये "
" क...कह तो तुम ठीक रहे हो पर क्या ऐसा हुआ है "
" अभी कुछ नही कहा जा सकता कि कैसा हुआ है " विजय ने सामने पड़ी कुर्सी की तरफ इशारा किया," विराजिए "
असमंजस मे नज़र आ रहा राजन सरकार उस कुर्सी पर बैठ गया जिसकी तरफ विजय ने इशारा किया था.
विजय, विकास और रघुनाथ सामने बैठे थे.
धनुष्टानकार विकास के कंधे पर.
विजय ने काफ़ी सोच-समझकर अपना अड्डा इस कमरे मे जमाया था, थानेदार और दोनो पुलिसियो की ड्यूटी उन सबको एक-एक करके इस कमरे मे भेजने की लगाई थी जिनसे वो पूछ-ताछ करना चाहता था.
पहला नंबर राजन सरकार का ही था.
विजय ने कहना शुरू किया," हम आपके और अपने बापूजान के अनुरोध पर कान्हा मर्डर केस की रियिन्वेस्टिगेशन करने निकले थे मगर पहले ही स्टेप पर एक अलग ही लफडे मे फँस गये, या अगर यूँ भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी कि कान्हा मर्डर केस की शुरूवात काफ़ी धमाकेदार और सनसनीखेज हुई है, उतनी ही पेचीद्गियो भरी जितनी कि कान्हा मर्डर केस है "
" मैं समझा नही कि तुम क्या कहना चाहते हो "
" आपकी तो बिसात क्या है, कयि बार तो खुद हमारी समझ मे भी नही आता हुजूर कि हम क्या कह रहे है और क्या कहना चाहते है " विजय अपनी धुनक मे कहता चला गया," फिलहाल ये बताइए कि बिजलानी को कब से जानते थे "
" करीब 10 साल से "
" पहली मुलाकात कब, कहाँ और कैसे हुई "
" तुम जानते ही होगे, अपनी जवानी मे मैं हॉकी का बहुत अच्छा खिलाड़ी था, अपने प्रदेश को रेप्रेज़ेंट किया था मैंने, इसलिए उम्र ढलने पर रेलवे ने अपनी टीम का कोच नियुक्त किया, बिजलानी अक्सर उस वक़्त स्टेडियम मे आ जाया करता था जब मैं अपने साथियो के साथ प्रॅक्टीस कर रहा होता था, खुद को फिट रखने के लिए दो-चार हाथ वो भी आजमा लेता था "
Reply
11-23-2020, 01:56 PM,
#9
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री


9

" स्टेडियम मे तो और लोग भी आते होंगे "
" आते है "
" दोस्ती उसी से क्यो हुई "
राजन सरकार के चेहरे पर सॉफ लिखा नज़र आ रहा था कि वो विजय के सवालो का मतलब नही समझ पा रहा है," ये भी कोई सवाल हुआ, किसकी दोस्ती कब, कहाँ, किससे हो जाए, इस बारे मे क्या कहा जा सकता है "
" दोस्त को अपना वकील कब नियुक्त किया आपने "
" जाहिर है तब, जब मुझ पर और इंदु पर कान्हा और मीना के मर्डर का लांछन लगा, उन हालात मे मेरे लिए उससे अच्छा वकील और कौन हो सकता था जिसे मैं 9 साल से जानता था "
" मीना की बॉडी कान्हा के मर्डर के 2 दिन बाद मिली थी, कम से कम तब तक आप पर उनके मर्डर का कथित लांछन नही लगा था, ये माना जा रहा था कि मीना कान्हा का मर्डर करने के बाद फरार हो गयी है और.... "
" और "
" मीडीया के मुताबिक ये खबर आप ही ने उड़ाई थी " विजय कहता चला गया," कान्हा की हत्या की खबर मिलने पर जैसे ही पोलीस ए-74 पर पहुचि, आपने ये खबर उड़ा दी कि मीना कान्हा का मर्डर करके फरार हो गयी है, मीना के गायब होने के कारण पोलीस को भी यही लगा क्योंकि कम से कम उस वक़्त कोई ये बात स्वपन मे भी नही सोच सकता था कि अपने बेटे की हत्या आपने की होगी और उसे मीना के मत्थे मंधने के मकसद से, उसे भी मारकर कूड़े मे डाल आए होंगे, इसलिए वही हुआ जिस मकसद से आपने ये बात उड़ाई थी यानी पोलीस ए-74 की सघन छान-बीन करने की जगह मीना की तलाश मे जुट गयी, कहा तो ये भी गया कि मीना को तलाश करने के लिए आपने पोलीस पर प्रेशर बनाया, उसके लिए हमारे बापूजान के नाम का भी इस्तेमाल किया गया "
" मैंने वैसा उस मकसद से बिल्कुल नही किया था जैसा आज समझा जा रहा है बल्कि इसलिए किया था क्योंकि मुझे खुद भी ऐसा लगा था कि मीना कान्हा का मर्डर करके फरार हो गयी है "
" ऐसा क्यो लगा था आपको "
" क्योंकि कान्हा मरा पड़ा था और हमारे अलावा फ्लॅट मे सिर्फ़ मीना रहती थी जो गायब थी, साथ ही, कान्हा के गले मे हमेशा पड़ी रहने वाली सोने की चैन और डाइमंड की वो अंगूठी भी गायब थी जिस अकेली की कीमत 5 लाख थी, स्वाभाविक रूप से उस वक़्त मुझे ऐसा लगा था कि मीना ने उन्ही दोनो चीज़ो के लालच मे कान्हा का मर्डर किया और उन्हे लेकर फरार हो गयी "
" वे दोनो चीज़े आजतक भी बरामद नही हुई है, मीना की लाश बरामद हो जाने के बावजूद "
" मैं इस बारे मे क्या कह सकता हू "
" आपने थाने मे जाकर रिपोर्ट लिखवाई, ये कि आपकी नौकरानी मीना आपके बेटे कान्हा की हत्या करने के बाद उसकी सोने की चैन और डाइमंड की अंगूठी लेकर फरार हो गयी है, आपने ये भी लिखवाया कि मीना बिहार की रहने वाली थी "
" हां, मैंने ये रिपोर्ट लिखवाई थी "
" उस वक़्त आपको पता नही था कि मीना अब इस दुनिया मे नही है, उसका भी मर्डर किया जा चुका है "
" मुझे ही क्या, किसी को भी पता नही था "
" फिर आपने ये क्यो लिखवाया कि मीना बिहार की रहने वाली थी, ये 'थी' शब्द क्यो लिखवाया आपने, इससे तो ध्वनित होता है कि उस वक़्त आपको मालूम था कि मीना अब नही है "
" पोलीस इस शब्द को लेकर मेरे पीछे पड़ गयी थी जबकि मेरे 'थी' लिखवाने के पीछे केवल इतनी मंशा थी कि वो बिहार की रहने वाली थी लेकिन पिच्छले काफ़ी लंबे समय से राजनगर मे ही रहती थी, हमारे यहाँ से पहले इसी शहर मे किसी और के यहा नौकरी करती थी, अगर कोई इतने दिन से आपके शहर मे रहता है और किसी विशेष समय पर गायब हो जाता है तो स्वाभाविक रूप से सबके मुँह से यही निकलता है कि वो फलाना जगह का रहने वाला था, या इस बात को यू भी कहा जा सकता है कि अगर उस समय मीना सामने होती तो मेरे मुँह से यही निकलता कि वो बिहार की रहने वाली है लेकिन क्योंकि उस वक़्त मेरे सामने नही थी इसलिए मुँह से यही निकला, वो बिहार की रहने वाली थी, इसका मतलब ये हरगिज़ नही है कि उस वक़्त मुझे ये मालूम था कि उसकी हत्या की जा चुकी है या अब वो इस दुनिया मे नही है "
" हमे अब भी नही लग रहा कि आप सच बोल रहे है "
" मुझे दुख है कि तुम फिर वही सब कहने लगे जो मीडीया ने फैला रखा है " कहते हुवे राजन के चेहरे पर वेदना ही वेदना नज़र आ रही थी," आख़िर तुम समझ क्यो नही रहे कि मैं अपने माथे पर लगे इस कलंक को धोने के लिए तुम्हारे दर पर पहुचा था "
" ओके, इतना तो मानोगे कि जब तक मीना की लाश नही मिली थी तब तक आपके माथे पर कोई कलंक नही लगा था "
" ये बात ठीक है "
" मतलब तब तक आपने अशोक बिजलानी को अपना वकील नियुक्त नही किया था "
" तब तक कोई केस ही नही था तो.... "
" पर आपने हम से ये कहा था जनाब कि मीना की लाश की शिनाख्त ना करने की सलाह वकील ने दी थी "
" वकील से मेरा तात्पर्य बिजलानी से ही था, मेरे बुलाने पर वो उसी सुबह मेरे घर पहुच गया था जिस दिन ये खबर उड़ी कि मेरे बेटे की हत्या हो गयी है, वो तभी से मेरे संपर्क मे था "
" और जब पोलीस ने ये कहा कि उन्हे कूड़े के ढेर पर एक औरत की लाश मिली है और आपको उसकी शिनाख्त के लिए उनके साथ जाना है तो बिजलानी ने ये कहा कि वो लाश मीना की हो या ना हो लेकिन तुम्हे उसकी शिनाख्त मीना के रूप मे नही करनी है "
" सच यही है "
विजय ने उसे बहुत गौर से देखते हुवे कहा था," पर इस सच की पुष्टि करने वाला तो अब इस दुनिया मे रहा नही "
" क्या बताऊ " राजन के चेहरे पर विवशता के चिन्ह नज़र आए," इसे दुर्भाग्य ही कह सकता हू अपना, वही दुर्भाग्य जो 4/5 जून की रात से मेरा पीछा कर रहा है "
" क्या ऐसा कोई दूसरा आदमी है जो हमे ये बता सके कि बिजलानी ने आपको वो सलाह दी थी "
" ऐसा और कोई आदमी नही है क्योंकि.... "
" क्योंकि "
" केस के संबंध मे मैंने कोई बात किसी और से शेअर नही की, ये सलाह भी बिजलानी ने ही दी थी, उसने कहा था कि केस के बारे मे किसी से कोई बात नही करनी है क्योंकि मुँह से निकलने के बाद बात पराई हो जाती है "
" कोर्ट मे, जिरह के दरम्यान जब ये बात आई होगी कि आपने मीना की लाश को पहचाना क्यो नही, तब तो कहा होगा "
" मैंने कहा था कि उस वक़्त मेरी मानसिक अवस्था ठीक नही थी, मैं डरा हुआ था, समझ मे नही आ रहा था कि क्या करू, इसलिए मीना की लाश को पहचानने से इनकार किया "
" क्यो " विजय चौंका," ऐसा क्यो कहा, ये क्यो नही कहा कि उसे ना पहचानने की सलाह बिजलानी ने दी थी "
" ऐसा कहने के लिए भी बिजलानी ने ही कहा था, उसने ये भी कहा था कि यदि तुमने वो कहा जो सच है तो एक तरह से कोर्ट के सामने हम ये कबूल कर लेंगे कि हम ने जानबूझकर मीना की शिनाख्त के वक़्त झूठ बोला और ये बात हमारे खिलाफ चली जाएगी जबकि अगर ये कहा कि उस वक़्त मेरी मानसिक अवस्था ठीक नही थी तो बचाव के रास्ते खुले रहेंगे "
विजय ने उसकी आँखो मे आँखे डालते हुवे पूछा," आपको ये नही लगा कि आपका वकील ही आपको फँसा रहा है "
" क...क्या " राजन सरकार बुरी तरह चौंका था," बिजलानी, बिजलानी फँसा रहा था मुझे, ये तुम क्या कह रहे हो विजय "
" लगता तो ऐसा ही है "
" नही " वो अविश्वशनीया स्वर मे कहता चला गया," ऐसा नही हो सकता, बिजलानी भला ऐसा क्यो करेगा "
" इस क्यो का जवाब खोजने के लिए तो खैर अभी काफ़ी पापड बेलने पड़ेंगे लेकिन फिलहाल लगता ऐसा ही है क्योंकि बकौल आपके उसने मीना की शिनाख्त ना करने की जो सलाह दी, काफ़ी बुद्धि घुमाने के बावजूद वह किसी भी तरह हमे आपके हित मे नज़र नही आती बल्कि आपका बंटाधार करने वाली ही लगती है "
राजन सरकार के चेहरे पर अभी भी ऐसे भाव काबिज थे जैसे चाहकर भी विजय की बात पर विश्वास ना कर पा रहा हो.
एकाएक विजय ने पैंतरा बदला, बोला," ऐसा भी तो हो सकता है कि उसने वो सलाह आपको दी ही ना हो "
" क...क्या मतलब " राजन सरकार और बुरी तरह चौंका.
" आपने हम से झूठ बोला हो "
" ज..झूठ, तुमसे " वो पागला-सा गया," भला तुमसे झूठ क्यो बोलूँगा मैं, आदमी भला उससे झूठ क्यो बोलेगा जिसकी मदद हासिल करने का तलबगार हो "
" एग्ज़ॅक्ट्ली यही, आपने हमारी मदद हासिल करने के लिए ही झूठ बोला हो सकता है "
" य..ये तुम क्या कह रहे हो "
" हम ने पहले भी फरमाया था जनाब कि हम कहा नही करते, सिर्फ़ फरमाया करते है और फिलहाल ये फर्मा रहे है कि ऐसा भी तो हो सकता है कि हमारे पास आने से पहले ही आप जानते थे कि आपकी रिक्वेस्ट मात्र से हम रियिन्वेस्टिगेशन पर निकलने वाले नही है, इसलिए आप एक कौड़ी लेकर आए, ऐसी कौड़ी जिसके बारे मे सुनते ही हम आपके साथ चल पड़े और वो कौड़ी थी की आपका ये कहना कि मीना की लाश को ना पहचानने की सलाह बिजलानी की थी, मुमकिन है आपने अनुमान लगा लिया हो कि इस बात की पुष्टि करने के लिए हम आपके साथ चल पड़ेंगे "
अपनी रुलाई को दबाने की कोशिश मे राजन की आवाज़ भर्रा गयी," जो बात हम सोच तक नही सकते, जिसकी कल्पना तक नही कर सकते, वो तुम कह रहे हो, काश....काश बिजलानी जिंदा होता तो वो तुम्हे बताता कि वो सलाह उसी ने दी थी "
" संभव है कि वो इसलिए दुनिया मे ना हो "
राजन के हलक से चीख सी निकल गयी," क्या मतलब "
" उसे इसलिए मार डाला गया हो कि कही वो आपकी पोल ना खोल दे, ये ना कह दे कि आप झूठ बोल रहे है "
" इसका मतलब...इसका मतलब " राजन सरकार बुरी तरह बौखला गया था," इसका मतलब तो ये हुआ कि तुम ये कहना चाहते हो कि बिजलानी को मैंने मार डाला "
" इस फानी दुनिया मे सबकुछ मुमकिन है "
" ओह माइ गॉड " वो अन्तर्नाद सा कर उठा," किस जंजाल मे फँस गया हू मैं, कैसी दलदल है ये जिसमे से निकलने की जितनी कोशिश कर रहा हू उतना ही धंसता जा रहा हू, जिसे अपना रहनुमा समझ रहा था, जिसके पास अपना मुक्तिदाता समझकर गया था, वही मुझे एक और हत्या का दोषी मान रहा है, ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि तुम मेरी इस बात से ज़रा भी कन्विन्स नही हुवे हो कि मैं और इंदु बेगुनाह है, पर ये तो सोचो विजय कि मैं हर पल तुम्हारे साथ था, भला मैंने बिजलानी की हत्या कैसे की हो सकती है "
" चालाक हत्यारे मर्डर स्पॉट पर खुद मौजूद ना रहकर ही मर्डर करते है और जो शातिर होते है वो पहले से ही ऐसी कोई आएलिबाई गढ़कर रखते है जैसे, मुमकिन है आपने गढ़ी हो, भला हम से पुख़्ता गवाह आपको और कहाँ मिलता "
" बस....बस....बस विजय " लघ्भग रो रहे राजन ने अपने दोनो कानो पर हाथ रख लिए थे," मैं और ज़्यादा नही सुन सकता, मुझे नही करनी अपने बेटे के मर्डर की रियिन्वेस्टिगेशन, मुझे नही जूझना उसे इंसाफ़ दिलाने के लिए, ग़लती हुई जो मदद माँगने तुम्हारे पास पहुचा, चाहो तो लौट सकते हो "
" हम मे कमी ही ये है जनाब कि अब हम खुद भी चाहे तो नही लौट सकते, या तो निकलते ही नही.... निकल पड़े है तो इस मामले का एक बटा दो करने के बाद ही लंबी तानकर सोएंगे "

Reply

11-23-2020, 01:56 PM,
#10
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री


10

" चाहता तो मैं भी यही हू कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए, यही फरियाद लेकर तुम्हारे पास गया था मगर लाख मिन्नतो के बावजूद सारे जमाने की तरह तुम भी मुझे कान्हा और मीना का हत्यारा मान रहे ही और अब तो एक और हत्या मेरे गले मढ़ दी, बिजलानी का हत्यारा भी मुझेही बता रहे हो, ऐसी बात कह रहे हो जिसके बारे मे मैं सोच भी नही सकता "
" आप गच्चा खा गये सरकार साहब "
" कैसा गच्चा "
" अगर आप हमारे एक-एक शब्द पर गौर फरमाएँगे तो पाएँगे कि हम ने पूरे तौर पर आपको बिजलानी का हत्यारा नही कहा बल्कि सिर्फ़ संभावना व्यक्त की है, ये कहा है कि ऐसा क्यो नही हो सकता, वैसे भी, हम मे ये खराबी है कि जब तक हमारे हाथ पुख़्ता सबूत नही लग जाते तब तक सब पर शक करते है लेकिन जंबूरा किसी का नही पकड़ते, आपका भी नही पकड़ा "
इस बार राजन सरकार कुछ नही बोला.
चेहरे पर हैरत के भाव लिए विजय की तरफ बस देखता रहा.
जैसे सोच रहा हो, कैसा प्राणी है ये.
सबकुछ कहकर भी कुछ नही कहता.
जबकि विजय ने अब बिल्कुल उल्टा राग छेड़ दिया था," ऐसा भी तो हो सकता है कि ये सब किसी ने आपको फँसाने....और गहरा फँसाने के लिए किया हो "
ये शब्द स्वतः राजन के मुँह से फिसला," मतलब "
" किसी को पता हो कि आप हमारे पास फरियाद लेकर पहुचे है, हमे ये हक़ीकत बताई है कि बिजलानी ने आपसे मीना की लाश की शिनाख्त करने के लिए कहा था, उसने बिजलानी का एक बटा दो ये सोचकर कर दिया हो कि हम आप पर शक करे, वही सब सोचे जो कुछ देर पहले कह रहे थे "
राजन सरकार की इच्छा अपने बाल नोच डालने की हुई, सॉफ-सॉफ लग रहा था कि उसकी समझ मे ये नही आ रहा था कि विजय किस किस्म का जीव है, अपनी खिसियाहट और झल्लाहट को छुपाए रखने की कोशिश करता वो बोला," तुम जो सोचते हो, वो सोचते रहो विजय लेकिन प्लीज़, मुझसे कुछ भी डिसकस ना करो

क्योंकि मेरा सिर फटने लगा है, तुम्हारी एक भी बात मेरी समझ मे नही आ रही है, कभी कुछ कहते हो, कभी कुछ "
" ग़लती आपकी नही है जनाब, जब हमारी बात हमारी ही समझ मे नही आ रही है तो आपकी तो बिसात ही क्या है "
राजन सरकार उसे ऐसी नज़रो से देखता रहा जैसे संसार के सबसे विचित्र प्राणी को देख रहा हो.
" फिर भी बात को आगे बढ़ाते है " विजय ही बोला," क्या आप किसी ऐसे आदमी को जानते है "
" कैसे आदमी को "
" जो आपकी कब्र खोद रहा हो "
" मतलब "
" अगर आप बेगुनाह है तो कोई ना कोई तो है जो आपकी कब्र खोद रहा है बल्कि खोद चुका है, अब आपको उसमे केवल दफ़नाना बाकी है क्योंकि आपके बेगुनाह होने की सूरत मे आपके खिलाफ इतने सबूत किसी असामाजिक तत्त्व की कोशिश के बगैर पैदा नही हो सकते, कोई तो है जिसने आपको ऐसा जाल मे उलझाया है जिसके कारण हम जैसे सूरमा भी आपको अपने बेटे और नौकरानी का हत्यारा मानने लगे है "
" ये तो मैं भी मानता हू "
" मानते हो तो फिर जानते क्यो नही हो, हमारा मतलब, हमे बताओ कि वो कौन हो सकता है "
" मैंने काफ़ी सोचा, तभी से सोच रहा हू जबसे इस जंजाल मे फँसा, पर लाख सोचने के बावजूद मेरी नज़र किसी पर नही ठहरी, कुछ समझ मे नही आया,

मैंने तो आज तक किसी को सुई चूभोने जितना दर्द भी नही दिया, फिर कोई मुझे क्यो इतने ख़तरनाक और गहरे चक्रव्यूह मे फँसाएगा "
" अक्सर ऐसा होता है हुजूर कि अपनी नज़र मे हम ने किसी का बाल भी बांका नही किया होता लेकिन कोई होता है जिसके पॉइंट ऑफ व्यू से हम ने उसके साथ बहुत बुरा किया होता है "
" मैं ऐसे किसी आदमी को नही जानता "
" नही जानते तो गोली मारिए इस बात को और ये बताइए कि बिजलानी लेफ्ट हॅंडर था या राइट हॅंडर "
" वो दोनो हाथो से काम कर सकता था "
" कैसे कह सकते हो "
" वो 10 साल से मेरा दोस्त था, मैं ये बात जानता हू, हॉकी खेलते वक़्त भी वो दोनो हाथो का इस्तेमाल किया करता था "
एकाएक विजय ने अपने सवालो की दिशा बदली," उसका क्या नाम है जो कंप्यूटर के पीछे बैठी थी, जिसने जीन्स और लाल रंग का टॉप पहन रखा था "
" क्या तुम अंकिता के बारे मे पूछ रहे हो "
" अगर उसका नाम अंकिता है तो हां "
" क्या जानना चाहते हो उसके बारे मे "
अचानक विजय बहुत ही रहस्यमय अंदाज मे राजन सरकार के फेस पर झुका और अपना मुँह उसके दाए कान के नज़दीक ले जाकर इतने धीमे स्वर मे बोला की आवाज़ विकास, रघुनाथ अथवा धनुष्टानकार के कानो तक ना पहुच सके," अंकिता और बिजलानी के बीच गुटार-गु चल रही थी ना "
" क....क्या " राजन सरकार एक बार फिर उच्छल पड़ा, मुँह से हैरत मे डूबी चीख निकली," गुटार-गु से क्या मतलब "
" समझिए सर " विजय आँख मारकर राजदाराना लहजे मे कहता चला गया," ऐसी बातो को इशारे मे समझने की आदत डालिए, गुटार-गु कबूतर औरकबूतरी के चोंच से चोंच मिलकर मोहब्बत करने को कहते है "
" य..ये तुम क्या कह रहे हो "
" जो आपने सुना "
" तुम्हारा दिमाग़ खराब हो गया है क्या विजय " राजन सरकार के चेहरे पर असचर्या का सागर ठहाके लगा रहा था," अंकिता बिजलानी की बेटी जैसी है "
" बेटी जैसी है, बेटी तो नही है ना "
राजन सरकार चीख सा पड़ा," बेटी ही है "
" वो कैसे "
" अंकिता रिप्पी की स्कूल फ्रेंड है "
" रिप्पी कौन हुई "
" बिजलानी की बेटी "
" नाम बताने के लिए शुक्रिया "
" प्लीज़ विजय, प्लीज़... इतनी गंदगियो तक मत सोचो, अंकिता इस घर मे आज से नही आ रही, बचपन से आ रही है, तब से, जब रिप्पी और अंकिता फौर्थ-फिफ्थ मेपढ़ती थी, अपने पिता की मृत्यु के बाद जब अंकिता नौकरी तलाश कर रही थी और उसे नही मिल रही थी तो रिप्पी ने ही उसे अपने पापा के ऑफीस मे लगवाया, तुम इतनी घटिया बात सोच भी कैसे सकते हो "
" लोग ऐसी घटिया बात सोच सके, इसके लिए भी समाज के लोग ही ज़िम्मेदार होते है "
" मतलब "
" तरुण तेजपाल का नाम सुना है "
" त...तरुण तेजपाल " राजन सरकार के मुँह से निकलने वाले लफ्ज़ यू लड़खड़ाए जैसे उसकी जीभ जल गयी हो," हां, सुना है "
विजय सपाट स्वर मे कहता चला गया," बड़ी इज़्ज़त थी जिसकी, पत्रकारिता की दुनिया मे जिसका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था, अपने स्टिंग ऑपरेशन्स मेजिसने कयि घोटालो का परदा-फ़ाश किया था, उस जैसे शख्स पर भी अपनी बेटी की दोस्त से छेड़खानी करने का आरोप लगा था "
राजन सकपका गया था," सब तो तेजपाल नही हो सकते "
" उस घटना ने बताया, कुछ तो हो ही सकते है "
" बिजलानी ऐसा नही था "
" वक़्त बताएगा की कौन कैसा है या था " विजय सीधा होता बोला," यहा आपकी क्लास ख़तम होती है और शुरू होती है मिसेज़. बिजलानी की क्लास, उन्हे भेज दीजिए "
राजन के बाहर जाने का अंदाज बता रहा था कि जितनी देर बैठा रहा था उतनी देर उसे अपना दिमाग़ विजय की गिरफ़्त मे जकड़ा-सा महसूस हो रहा था.जैसे निजात मिली थी उसे.

------------------------------

" बात समझ मे नही आई विजय " राजन के बाहर जाते ही रघुनाथ बोला," तुम इस केस के बारे मे किस ढंग से सोच रहे हो "
" मोहब्बत भरी ये बाते अगर तुम जैसे कूध्मगज की समझ मे आने लगे रघु डार्लिंग तो हमे विजय दा ग्रेट कहे ही कौन "
" तुमने राजन सरकार से बिजलानी और अंकिता के संबंधो वाली बात किस आधार पर पूछी "
" 'आधार' शब्द अब कुँवारा नही रह गया है प्यारे, इसकी शादी अब 'कार्ड' से हो गयी है " विजय अपनी ही रौ मे बोला," पूरा शब्द 'आधार कार्ड' बन गया है, यानी वो जो ये बताएगा कि आप है, अगर आपके पास आधार कार्ड नही है तो भले ही आप होते रहे मगर सरकारी रेकॉर्ड कहेगा कि आप नही है "
" मेरे सवाल का इस बकवास से क्या मतलब "
" मतलब तैल लेने चला गया है तुलाराशि " विजय ने फिर उसका सवाल हवा मे उड़ा दिया," जब लौटेगा तो बता देंगे "
रघनाथ समझ गया था कि फिलहाल विजय उसके किसी भी सवाल का जवाब देने के मूड मे नही है इसलिए चुप रह गया लेकिन तभी विकास ने कहा," लेफ्टहॅंड और राइट हॅंड वाली थेओरी की तो हवा निकल गयी गुरु, राजन सरकार ने वही बताया जिसकी आपको शंका थी, ये कि बिजलनी दोनो हाथो से काम करसकता था "
" तुम थियरी की बात कर रहे हो दिलजले, यहाँ हमारी खुद की हवा निकली पड़ी है "
" वो कैसे "
" ये बात भेजे मे घुसकर नही दे रही कि बिजलानी मिया मारे क्यो, ख़ासतौर पर ठीक उस वक़्त क्यो मरे जब हम पूछताछ करने उसके ऑफीस मे पधारे हुवे थे "
" मैं भी यही कहना चाहता हू "
" तो फिर कहते क्यो नही "
" हमारे आने तक..... बल्कि जूनियर वकील के फोन करने तक वो जिंदा था, उसके कुछ देर बाद गोली चली और बिजलानी मर गया, क्या मतलब हुआ इस बात का "
" तुम्हारे बच्चे जिए दिलजले और सारी उम्र उसी तरह तुम्हारा खून पीते रहे जिस तरह तुम हमारा पी रहे हो, हमे दुख है कि तुम भी ठीक उसी लाइन पर सोच रहे हो जिस पर हम सोच रहे है, दुख इसलिए है क्योंकि अगर तुम भी हमारे ही अंदाज मे सोचने लगे तो हमे कोई धेले को भी नही पूछेगा "
" तो अब आप फाइनली किस नतीजे पर पहुचे, बिजलानी ने आत्महत्या की है या उसका मर्डर किया गया है "
" ये मर्डर है प्यारे "
" लेफ्ट हॅंड-राइट हॅंड का राज खुलने के बाद भी "
" अगर उसने खुद को गोली मारी है तब भी "
" मतलब "
" मैं तुम्हारे बापूजान को बता चुका हू, मतलब तैल लेने गया हुआ है, उसके लौट-ते ही बता दूँगा "
" राजन सरकार से पूच-ताछ करते वक़्त आप बिजलानी की मौत की इन्वेस्टिगेशन कम, कान्हा मर्डर केस की इन्वेस्टिगेशन करते ज़्यादा नज़र आ रहे थे "
" हम तो मिया दडबे से निकले ही उस केस की इन्वेस्टिगेशन के लिए है जिसकी सिफारिश बापूजान ने ही नही तुमने भी की थी "
" वो तो ठीक है मगर ताज़ा-ताज़ा केस तो बिजलानी का है "
" अब अगर हम ने ये कहा कि हमारे ख़याल से बिजलानी की आत्महत्या भी कान्हा मर्डर केस की ही एक कड़ी है तो तुम हम पर सैंकड़ो सवाल ठोक दोगे इसलिए हम ऐसा नही कह रहे है "
" तो ये तो आपने मान ही लिया कि बिलजानी का मर्डर नही हुआ, उसने स्यूयिसाइड की है "
" यदि आदमी का कोई बच्चा खुद को गोली मार लेता है तो उसे स्यूयिसाइड ही कहा जाता है "
" भले ही बाद मे ये साबित हो जाए कि किसी ने उसे ऐसा करने के लिए मजबूर किया था "
" ये क़ानूनी पचड़ा है और हमे इसमे सिर नही..... "
विजय ने स्वयं ही अपने शब्द मुँह मे रोक लिए क्योंकि उसी समय मिसेज़. बिजलानी दरवाजा खोलकर कमरे मे दाखिल हुई थी.
उसका खूबसूरत मुखड़ा दर्द का समुंदर नज़र आ रहा था.
रोते-रोते आँखे सुर्ख ही नही हो गयी थी बल्कि सूज भी गयी थी.
आँसू थे कि रह-रहकर अब भी बहने लगते थे जिन्हे वो अपने हाथ मे मौजूद रुमाल से पौन्छने की असफल कोशिश कर रही थी.
दरवाजे के नज़दीक खड़े-खड़े उसने सवालिया नज़रो से विजय, रघुनाथ, विकास और धनुष्टानकार की तरफ देखा.
विजय ने उस कुर्सी की तरफ इशारा करके बैठने को कहा जिसपर कुछ देर पहले राजन सरकार बैठा था.
वो ऐसे कदमो से चलती हुई कुर्सी तक आई जैसे खुदको गिरने से बचाने का प्रयास कर रही हो और आहिस्ता से बैठ गयी.
विजय ने शालीन लहजे मे कहा," हालाँकि मैं समझता हू कि गम का जो पहाड़ आप पर टूटा है उससे आप टूट गयी होंगी और किसी सवाल का जवाब देने का मन नही होगा मगर हम अपनी जगह मजबूर है, क्या करे हमारा काम ही ऐसा है और फिर, ये तो आप भी चाहती होंगी कि आपके पति का कातिल पकड़ा जाए "
" क...कातिल " उसने चौंक कर विजय की तरफ देखा.
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