Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
11-23-2020, 02:06 PM,
#31
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
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विजय ने पूछा," किसने किया "
" मुझे नही मालूम "
" नही " एक अन्य आदमी बोला," मेरे ख़याल से उसने इन भाई साहब पर हमला नही किया, उसने किसी पर भी हमला नही किया, अजीब पागल आदमी था साला, उसने तीनो गोलिया उपर की तरफ चलाई थी, पता नही तीसरी कैसे इन भाई साहब की गाड़ी के शीशे मे लग गयी "
" कहाँ गया "
" उधर गया है " एक अन्य व्यक्ति ने विजय की कोठी के दाई तरफ वाली उस गली की तरफ इशारा किया जो एक कीलोमेटेर बाद दूसरे हाइवे से मिल जाती थी.
" पैदल था क्या "
" अजी नही, बाइक पर था "
" किसी ने रोका नही उसे "
" अजी कौन रोकता साहब, उसके हाथ मे रेवोल्वेर था "
एक अन्या बोला," और दनादन गोली चला रहा था "
" किसी ने देखा उसे "
एक साथ काई हाथ उठे," मैंने देखा था "
" लंबे लाल बाल थे उसके, लाल ही दाढ़ी.... "
" हम गच्चा खा गये दिलजले " अधूरी बात सुनकर ही विजय चिल्लाया और साथ ही कोठी की तरफ दौड़ लगा दी.
आनन-फानन मे वे उस कमरे के पास पहुचे परंतु दरवाजे पर ही ठिठक कर रह गये, विकास ने अंदर घुसने की कोशिश की थी किंतु विजय ने पीछे से कॉलर पकड़कर वापिस खींचते हुवे कहा," कोई फ़ायदा नही दिलजले, किस्सा ख़तम हो चुका है "
सॉफ नज़र आ रहा था कि कुंडो मे अब चीकू नही, उसकी लाश लटकी हुई थी.
किसी तेज धारदार हथियार से उसकी गर्दन पर वार किया गया था जिसके कारण आधी गर्दन कट गयी थी.
खून से लथपथ सिर और चेहरा गर्दन की आधी खाल पर झूल रहा था, विकास की नज़र अभी लाश पर ही थी जबकि विजय जूतो के उन निशानो को देख रहा था जो फर्श पर पड़े खून पर बने थे.
फिर पलटकर अपने पीछे यानी कि कमरे से बाहर देखा, वहाँ भी उन्ही जूतो के निशान थे.
वे हत्यारे के वापसी के निशान थे.
विजय ने तेज़ी से उनका पीछा करना शुरू कर दिया.
अब विकास भी उसके साथ था.
निशान हल्के पड़ते जा रहे थे और कोठी की चारदीवारी तक पहुचते-पहुचते काफ़ी हल्के पड़ गये थे, खून का एक धब्बा 6 फुट उँची बाउंड्री वॉल के शीर्ष पर भी था.
उस धब्बे से बचता हुआ विजय एक ही जंप मे बाउंड्री वॉल पर चढ़ा और उसके पीछे देखा, वो सर्विस लेन थी.
बस एक जगह और धब्बा नज़र आया.
उससे आगे कोई निशान नही था, विजय ने बड़बड़ाकर जैसे खुद से ही कहा," यहाँ से वो अपनी बाइक पर सवार हो गया "
विकास सदमे की-सी अवस्था मे था, मुँह से एक ही सेंटेन्स निकला," बड़ा जबरदस्त धोखा खाया है गुरु "
विजय ने उसकी बात पर ध्यान नही दिया.
वो खुद भी भन्नाया हुआ नज़र आ रहा था, जेब से मोबाइल निकाला और विकास से दूर, लॉन के दूसरे कोने की तरफ जाते हुए वो नंबर लगाया जो धनुष्टानकार के पास रहता था.
कॉल रिसीव की गयी.
बोल तो सकता नही था मोंटो.
'ची-ची' की आवाज़ सुनाई दी.
विजय ने बहुत ही राज़दाना लहजे मे कहा," हमारी बात ध्यान से सुनो मोंटो प्यारे, हम तुम्हे बहुत ही इंपॉर्टेंट काम सौंप रहे है, वो काम आज रात ही करना है, कल सुबह हमे रिपोर्ट चाहिए "
धनुष्टानकार की 'ची-ची' सुनाई दी, जिसका इस वक़्त मतलब था," काम बताइए, मैं तैयार हू "
विजय ने बहुत धीरे-धीरे कुछ कहना शुरू किया.
पूरी बात कहने के बाद पूछा," समझ गये "
पुनः 'ची-ची' की आवाज़ सुनाई दी, जिसका इस बार मतलब था," समझ गया "
" ओके, सुबह मिलते है " विजय ने फोन काट दिया.

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अशोक बिजलानी की मौत के बाद आज चौथे दिन भी अंकिता खुद को नॉर्मल नही कर पाई थी.
रात के 11 बजे थे.
वो गुम्सुम सी अपने फ्लॅट के ड्रॉयिंग रूम मे सोफे पर पसरी हुई थी, माँ किचन मे थी की अचानक बेल बजी.
उसकी तंद्रा टूटी.
माँ ने किचन मे से ही कहा," देखो तो बेटी कौन है "
पर बेल बजाने वाला तो जैसे स्विच पर अंगूठा रखकर ही भूल गया था, वो लगातार बजे जा रही थी.
" अरे कौन है, पागल हो गया है क्या "
इधर, लगातार बजे चले जा रही बेल ने तो जैसे अंकिता पर भी झुनझूलाहट सवार कर दी.
लघ्भग दौड़ती हुई दरवाजे पर पहुचि और उसे खोलती हुई चिल्लाई," पागल हो क्या "
" म...मुझे बचा लो, मुझे बचा लो बेहन " ख़ौफ़ मे डूबे इन शब्दो के साथ बुरी तरह आतंकित एक लड़की अंकिता को लघ्भग धक्का सा देती अंदर आई और अंकिता अभी कुछ समझ भी नही पाई थी कि आगंतुक लड़की ने दरवाजा अंदर से बंद करके ना केवल चिटकनी चढ़ा दी बल्कि कीहोल से बाहर झाँकने लगी.
वो रो रही थी.
जिस्म काँप रहा था.
बाल बिखरे हुवे थे.
कपड़ो पर जगह-जगह मिट्टी लगी हुई थी, इतना ही नही, टॉप और जीन्स जगह-जगह से फटे हुवे थे.
कयि जगह छोटे लगी हुई थी उसे.
जख़्मो से खून बह रहा था.
एक चोट मस्तक पर भी थी.
" क्या हुआ " अंकिता चिल्लाई," कौन हो तुम "
" स..श...शी " उसने अपने होंठो पर उंगली रखकर करुणा भरे अंदाज मे अंकिता से चुप रहने के लिए कहा और पलटकर फिर कीहोल के पार झाँकने लगी.
वो अब भी काँप रही थी.
अंकिता ने फिर कहना चाहा," अरे, बात क्या.... "
" प...प्लीज़ बेहन " वो उसकी तरफ पलट-ती हुई धीमे स्वर मे बोली," धीरे बोलो, उसने सुन लिया तो यही आ जाएगा "
" कौन "
" मैं सब बता दूँगी पर प्लीज़, अभी चुप रहो "
तब तक अंकिता की माँ भी वहाँ पहुच चुकी थी.
उसने चौंकते हुए कहा था," कौन हो तुम, क्या हुआ "
" प्लीज़...प्लीज़ आंटी " कहने के साथ उनका तो उसने मुँह ही दबा दिया था, रोती हुई बोली," वो मेरे पीछे पड़ा है, मुझे नही पता था कि वो इतना गंदा है, मैं तो उसकी बहुत इज़्ज़त करती थी "
अंकिता ने पूछा," किसकी बात कर रही हो "
" अच्छा यहाँ आइए " वो छोटी-सी गॅलरी पार करके ड्रॉयिंग रूम मे दाखिल होती हुई बोली," वहाँ, दरवाजे के पास नही, वो बाहर हुआ तो मेरी आवाज़ सुन लेगा "
अंकिता और उसकी माँ कुछ समझ नही पा रही थी.
बौखलाई सी उसके पीछे लपकी.
ड्रॉयिंग रूम मे पहुचने तक भी वो लड़की बुरी तरह काँप रही थी, इतना ही कह सकी," व..वो मेरा बॉस है "
" कौन " अंकिता ने पूछा.
" पिता समान समझती थी लेकिन उसने.... "
तभी, लड़की की जीन्स की जेब मे पड़ा मोबाइल बजा.
उसने काँपते हाथ से ही नही बल्कि काँपते जिस्म के साथ जेब से मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर नज़र डालते ही एक बार फिर चेहरे पर वही दहशत काबिज हो गयी जो पिच्छले कुछ क्षण मे कम हुई थी, 3 ही शब्द निकले मुँह से," व...वही है "
अंकिता और उसकी माँ की समझ मे जब कुछ आ ही नही रहा था तो कहती क्या.
लड़की इस तरह घबराई हुई थी जैसे हिरनी अपने आसपास शेर की मौजूदगी महसूस करके घबराती है.
उसने उसी हालत मे पूछा," क...क्या करू, क्या करू "
" मुझे क्या पता " अंकिता बोली.
बेल लगातार बजे जा रही थी.
उसने फोन काट दिया.
फिर स्विच ऑफ ही कर दिया.
" मुझे तो ये किसी ख़तरे मे लगती है " अंकिता की माँ की समझ मे हालात जैसे कुछ-कुछ आ रहे थे," इसे बिता अंकिता, मैं पानी लेकर आती हू "
कहकर वो किचन मे चली गयी.
अंकिता को लड़की की प्राब्लम का थोड़ा-थोडा एहसास होने लगा था, उसने उसके दोनो कंधे पकड़कर सोफे पर बिठाते हुवे कहा," डरो मत, आराम से बैठो "
वो बैठ तो गयी लेकिन अब भी काँप रही थी, बार-बार गॅलरी की तरफ इस तरह झाँक रही थी जैसे किसी के आने का अंदेशा हो.
" दरवाजा बंद है " अंकिता ने कहा," कोई नही आ सकता "
लड़की ने अंकिता की तरफ ऐसी नज़रो से देखा जैसे पूछ रही हो कि क्या वो उस बात पर यकीन कर सकती है.
तभी, अंकिता की माँ पानी से भरा गिलास ले आई, बोली," ले बेटा, पानी पी ले "
" नही आंटी "
" पी ले बेटा, घबराहट दूर होगी "
लड़की ने गिलास लिया, मुश्किल से दो घूँट पीने के बाद वापिस सेंटर टेबल पर रख दिया, अंकिता से बोली," क्या तुम मेरा एक काम कर सकती हो बेहन "
" क्या "
" ज़रा बाहर देख लो, वो बिल्डिंग के आस-पास तो नही है "
" कौन "
" 50 साल का है, लंबा, हॅटा-कट्टा, धारियो वाली शर्ट, डेनिम की जीन्स और सिर पर कॅप पहने हुए है, हाथ मे रेवोल्वेर भी हो सकता है "
" र..रेवोल्वेर " माँ-बेटी के होश उड़ गये.
" ह..हां, उसी से तो धमकाया था उसने मुझे, कहने लगा कि अगर उसकी बात नही मानी तो जान से मार देगा "
" क्या बात मनवानी चाहता था वो तुमसे "
" पहले देखकर तो आओ, वो आसपास तो नही है...... प्लीज़ "
" ओके, आराम से बैठो, डरो मत " कहने के साथ अंकिता गॅलरी की तरफ बढ़ी ही थी कि लड़की बोली," इस तरह देखना कि उसे एहसास ही ना हो कि तुम उसे ही देख रही हो, ये एहसास होते ही वो समझ जाएगा कि मैं तुम्हारे फ्लॅट मे हू "
" चिंता मत करो " कहने के बाद अंकिता बाहर निकल गयी.

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जिस बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर अंकिता का फ्लॅट था, उसके गेट पर पहुचि ही थी कि ठीक सामने, सड़क पर खड़े आदमी पर नज़र पड़ते ही समूचे जिस्म मे झुरजुरी-सी दौड़ गयी.
उसने ठीक वैसे ही कपड़े पहन रखे थे जैसे लड़की ने बताए थे.
धारियो वाली शर्ट, डेनिम की जींस और कॅप.
मगर उसके हाथ मे रेवोल्वेर नही था, बल्कि सिगरेट थी.
इधर-उधर देखता बार-बार कश लगा रहा था.
बिल्डिंग के गेट की तरफ भी देखा.
अंकिता ने घबराकर खुद को तुरंत अधखुले चॅनेल के पीछे छुपा लिया, हालाँकि ऐसा ना भी करती तो वो उसे देख नही सकता था क्योंकि जहाँ वो थी, वहाँ अंधेरा था जबकि खुद वो एक स्ट्रीट लाइट के नीचे खड़ा था.
वो इस तरह उस शख्स को देखती रही जैसे चुहिया बिल से मुँह निकलकर कमरे मे घूम रही बिल्ली को देख रही हो और साथ ही महसूस करती रही, अपने जिस्म मे अजीब-सी सनसनी.
आसपास कोई और नही था.
उस वक़्त तो अंकिता के होश ही उड़ गये जब उसे बिल्डिंग के मैंनगटे की तरफ आते देखा.
रोंगटे खड़े हो गये थे उसके.
जी चाहा - चीख पड़े.
ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर लोगो को इकहट्टा कर ले मगर जेहन ने कहा," ये बेवकूफी होगी, पता नही कोई आएगा भी या नही मगर उसे ज़रूर पता लग जाएगा कि मैं यहाँ हू "
साँस रोके वो चॅनेल की आड़ मे खड़ी रही.
बल्कि ये कहा जाए तो ज़्यादा मुनासिब होगा कि साँस तो उसकी खुद ही रुक गयी थी क्योंकि अब वो उससे सिर्फ़ 3 कदम की दूरी पर था.
अधखुले चॅनेल के उस तरफ.
चॅनेल के इस तरफ आ जाता तो उसे देख लेता और कम्बख़्त देखने की कोशिश भी तो चॅनेल के अंदर ही कर रहा था.
जैसे किसी को ढूँढ रहा हो.
अंकिता का ज़ोर-ज़ोर से धड़कता दिल आवाज़ पैदा करने लगा था और वो डर रही थी की कही वो इस आवाज़ को सुन ना ले.
समझ सकती थी कि वो उसी लड़की को ढूँढ रहा है.
फिर, उसने सिगरेट का अंतिम सिरा ज़मीन पर डाला और उसे जूते से कुचल दिया.
कुछ देर वही खड़ा रहा, जैसे सोच रहा हो कि बिल्डिंग के अंदर दाखिल होना चाहिए या नही.
अंकिता की साँस मे साँस तब आई जब वो वापिस सड़क की तरफ चल दिया.
आँखे उसी पर टिकी थी.
सड़क पर पहूचकर उसने इधर-उधर देखा.
एक ऑटो की आवाज़ आई.
उसने हाथ दिया.
ऑटो रुका.
वो उसमे बैठा और ऑटो आगे बढ़ गया.
अंकिता ऐसे अंदाज मे पलटी जैसे की बहुत बड़े ख़तरे से बच गयी हो.
दौड़ती हुई फ्लॅट मे पहुचि.
मैन गेट बंद किया.
जिस वक़्त ड्रॉयिंग रूम मे पहुचि, उस वक़्त खुद उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थी, उसकी हालत देखकर माँ और लकड़ी ने एक साथ पूछा," क्या हुआ "
" वो था " अंकिता धम्म से सोफे पर बैठ गयी.
" माइ गॉड " लड़की और ज़्यादा डर गयी," वो मेरा पीछा नही छोड़ेगा, ऐसा नही समझती थी मैं उसे "
" डरो मत, वो ऑटो मे बैठकर जा चुका है "
" ऑटो मे बैठकर, उसके पास तो अपनी गाड़ी है "[/color]
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11-23-2020, 02:06 PM,
#32
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" मैंने तो नही देखी "
" ज़रूर गाड़ी वही छोड़ दी होगी जहाँ मैं कूदी थी, वहाँ से पैदल मेरा पीछे किया होगा, अब ऑटो मे गाड़ी तक गया होगा "
" शायद ऐसा ही हो "
माँ ने अंकिता से पूछा," पर तुझे क्या हुआ है "
" उसे देखकर मैं भी डर गयी थी मम्मी, बहुत करीब आ गया था मेरे, बस मुझे देख नही सका "
" मेरी बच्ची " माँ ने लड़की को छोड़कर अंकिता का सिर बाँहो मे भर लिया था," तुझे बाहर नही जाना चाहिए था "
" मुझे क्या पता था कि उससे आमना-सामना हो जाएगा "
" पर तुम्हे डरने की कोई ज़रूरत नही थी " लड़की बोली," वो मुझे ढूँढ रहा था, पीछे पड़ गया है मेरे "
" तुमने कहा था ना, उसके पास रेवोल्वेर है "
" हां, है "
" शायद इसलिए डर गयी थी "
" क्या उसने रेवोल्वेर हाथ मे ले रखा था "
" नही, ऐसा तो नही था, पर अब निसचिंत रहो, वो वापिस नही आएगा, समझ ही नही सका है कि तुम कहाँ गायब हो गयी हो "
" हो सकता है कि आसपास ही रहे और मेरे निकलते ही.... "
" अभी निकलने की कोई ज़रूरत नही है "
इस बार लड़की कुछ नही बोली.
सिर्फ़ देखती रह गयी अंकिता की तरफ.
चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उसकी एहसानमंद हो.
अंकिता खुद को काफ़ी हद तक संभाल चुकी थी.
माँ से कहा," मम्मी, क्या आप मेरे कमरे से फर्स्ट-एड बॉक्स उठा लाएँगी, देखना, कितनी चोटे लगी हुई है बेचारी को "
माँ अंकिता के रूम की तरफ चली गयी.
" अब बताओ " अंकिता पूछने लगी," नाम क्या है तुम्हारा "
" संगया " उसने कहा.
" वो कौन है "
" अमरकांत शेखावत "
" कौन अमरकांत शेखावत "
" आज राजनगर का बहुत बड़ा बिल्डर है, दो साल पहले तक रामनगर मे ही रहता था और मेरे पापा का दोस्त था "
" तुम रामनगर की रहने वाली हो "
उसने स्वीकृति मे गर्दन हिलाई.
" तो यहाँ, राजनगर मे क्यो हो "
" वही लेकर आया था "
" मतलब "
" 6 महीने पहले एक आक्सिडेंट मे पापा की मृत्यु हो गयी थी, उसके बाद बस मैं और मम्मी रह गये थे, घर मे कमाने वाले पापा ही थे, 3 महीने पहले शेखावत अंकल... "
" अंकल "
" मैं उन्हे अंकल ही कहती थी, पापा के दोस्त थे ना, और वे भी मुझे बेटी ही पुकारते थे लेकिन....लेकिन... " वो बात अधूरी छोड़कर वो फफक-फफक कर रो पड़ी.
अंकिता ने उसका सिर अपनी बाँहो मे भरा और अपनी छाती से लगाती धाँढस बंधाने वाले अंदाज मे बोली," रोओ मत, मन छोटा ना करो, तुम्हारी कहानी को मैं काफ़ी हद तक समझ चुकी हू लेकिन फिर भी, तुम्हारे मुँह से सुनना चाहती हू, बताओ, क्या हुआ, तुम्हारे अंकल ऐसे आदमी मे कब और कैसे तब्दील हुए जिससे इस कदर डरी हुई हो "

" 3 महीने पहले वे हमारे घर पहुचे, माँ से कहा की राजनगर मे मेरा काम अच्छा-ख़ासा चल रहा है, कयि लड़के-लड़किया ऑफीस मे काम करते है, संगया भी वही कर लेगी, मैं 10 हज़ार दूँगा तो घर का खर्चा भी चल जाएगा, ज़रूरत तो हमे थी ही लेकिन मम्मी ने कहा, बात तो ठीक है शेखावत भैया, मगर संगया वहाँ रहेगी कहाँ, मैं तो इस पुश्तैनी घर को छोड़कर राजनगर जा नही सकती, तुम्हे तो मालूम है, मेरा देवर गुंडा-लफंगा है, उसकी आँखे तभी से इस घर पर गढ़ी है जब वे जिंदा थे, हम दोनो राजनगर चले गये तो वो इस पर कब्जा कर लेगा.
तब अंकल ने कहा, रहने की चिंता क्यो करती हो भाभी, जैसे और एम्प्लाइज को फ्लॅट दिए हुए है, इसे भी दे दूँगा, मेरी बेटी जैसी है, आराम से रहेगी "
" मतलब मीठी-मीठी बाते बनाई "
" हां " संगया बोली," वे बाते माँ को भी अच्छी लगी, मुझे भी, क्योंकि हमारी सारी समस्याए हल हो रही थी.
वे मुझे राजनगर ले आए.
तब पता लगा कि उन्होने किसी एंप्लायी को फ्लॅट नही दे रखा है, सब अपने घर से सर्विस करने आते है लेकिन मुझे तो एक कमरे का छोटा सा फ्लॅट दिला ही दिया.
मैंने इस किस्म की छोटी-मोटी बातो पर ध्यान नही दिया और काम करने लगी.
उन्होने मुझे रिसेप्षनिस्ट का काम सौंपा था.
कुछ दिन तक सब ठीक रहा मगर धीरे-धीरे मैं चेंज महसूस करने लगी, उन्होने मुझे बेटी कहना छोड़ दिया था.
संगया कहने लगे थे.
अपनी तरफ देखते हुवे उनकी नज़रो मे भी चेंज महसूस करने लगी थी मगर अपनी ज़रूरत के कारण उस सबको इग्नोर कर रही थी, आज शाम उन्होने कहा कि तुम्हे मेरे साथ हॉलिडे इन्न चलना है, वहाँ एक पार्टी से डील होनी है.
मेरे पास इनकार करने की कोई वजह नही थी.
वे मुझे अपने साथ गाड़ी मे ही हॉलिडे इन्न ले गये लेकिन वहाँ कोई पार्टी नज़र नही आई, उनके फोन पर पार्टी का फोन आ गया था कि आज की मीटिंग कॅन्सल है "
" पहले ही से कोई मीटिंग नही होगी " अंकिता कह उठी," वो फोन भी नाटक होगा "
" अब तो ऐसा ही लग रहा है "
" आगे "
" बोले, आ ही गये है तो यही डिन्नर कर लेते है.
मैं ना ना कह सकी और ना हां.
उन्होने डिन्नर का ऑर्डर दे दिया.
डिन्नर से पहले दो पेग आ गये.
मैंने कहा, मैं तो पीती नही हू अंकल.
वे बोले, अरे पियो ना यार, कब तक नही पियोगी, अब तुम बालिग हो गयी हो.
इतना ही नही, उन्होने काफ़ी ज़िद की लेकिन मैंने नही पी.
उन्होने कयि पेग पिए.
फिर डिन्नर किया.
वे बहकी-बहकी बाते करने लगे थे.
मैंने सोचा, नशा हो गया है.
फिर जब गाड़ी मे लौट रहे थे तो छेड़-छाड़ शुरू कर दी.
मैंने विरोध किया.
वे नही माने.
छेड़-छाड़ बदतमीज़ी मे चेंज हो गयी और ऐसा लेवेल आ गया जब मुझे सख्ती से कहना पड़ा, मुझे ये सब पसंद नही है अंकल, मैं कल ही रामनगर लौट जाउन्गि.
ये सुनकर उनके तेवर बदल गये.
जेब से रेवोल्वेर निकाल लिया.
एक हाथ से ड्राइविंग करते हुवे रेवोल्वेर मुझपर तां दिया और गुर्राए, मुझे क्या गधा समझ रखा है तूने जो हर महीने 10000 रुपये दे रहा हू और फ्लॅट भी दे रखा है, अपने पैसे की पूरी कीमत वसूल करनी आती है मुझे, नही मानी और ज़्यादा ना-नुकुर की तो भेजे मे गोली उतार दूँगा.
मैं बुरी तरह डर गयी थी.
इतनी ज़्यादा की दरवाजा खोलकर चलती गाड़ी से कूद गयी.
दूर तक लुढ़कति चली गयी थी मैं.
इस बात की उम्मीद शायद उन्होने भी नही की थी कि मैं ऐसा कर सकती हू, मैंने टाइयर्स के सड़क पर घिसटने की आवाज़ सुनी लेकिन उधर देखा तक नही और जिधर मुँह उठा बस भागती चली गयी, जाने कैसे आपके फ्लॅट पर आ गयी और बेल बजा दी "
अंकिता ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि माँ फर्स्ट एड बॉक्स लेकर आ गयी, वो जो कहना चाहती थी उसे स्थगित किया तथा स्पिरिट से संगया के जख़्मो को सॉफ करती बोली," ये आज रात यही रहेगी मम्मी, मेरे साथ, मेरे कमरे मे "
" क...क्या बात कर रही हो बेहन " चौंक कर कहते हुए संगया की आँखो मे आँसू आ गये थे," आप ऐसा क्यो करेंगी "
" कहाँ जाओगी " उसने जख़्मो पर मरहम लगाना शुरू किया.
संगया चुप रह गयी.
अंकिता ने और मरहम लगाते हुवे आगे कहा," उस फ्लॅट मे जाना तो स्यूयिसाइड करने जैसा होगा जो शेखावत ने दिला रखा है और राजनगर मे तुम्हारे पास कोई दूसरा ठिकाना नही है "
भीगी आँखो से वो अंकिता की तरफ बस देखती रही.
" वैसे भी, एक लड़की, दूसरी लड़की की मदद नही करेगी तो कौन करेगा " अंकिता कहती चली गयी," कल मैं तुम्हे खुद रामनगर की बस मे बिताकर आउन्गि "
संगया अब भी चुप रही.
" पर बात क्या है बेटी " माँ ने पूछा," हुआ क्या था "
अंकिता ने सन्छेप मे बता दिया.
माँ बोली," बिल्कुल ठीक फ़ैसला किया तूने, रात मे ये कही नही जाएगी और सुबह खुद रामनगर की बस मे बिठाना "
उसके बाद तब, जब मा अपने कमरे मे चली गयी और अंकिता संगया को अपने कमरे मे ले आई.
संगया ना-नुकुर करती रही लेकिन अंकिता ने उसे अपने कपड़े दिए, संगया ने उसका सलवार-सूट पहना और दोनो बेड पर बैठ गयी, अंकिता ने कहा," जब तुम मुझे सबकुछ बता रही थी तब मैंने बीच मे कहा था कि मैं तुम्हारी पूरी कहानी समझ चुकी हू लेकिन तुम्हारे मुँह से सुनना चाहती हू, जानती हो ऐसा क्यो कहा था "
संगया ने इनकार मे गर्दन हिलाई.
" क्योंकि सारे मर्द ऐसे ही होते है "
" क्या मतलब " संगया ने चौंकते हुए पूछा," क्या तुम्हारे साथ भी कोई ऐसा हादसा पेश आया था "
" ठीक ऐसा तो नही लेकिन ऐसा ही कह सकती हो "
" मैं समझी नही "
" वे मेरे पिता के दोस्त तो नही लेकिन मेरी बचपन की फ्रेंड के पिता थे, मैं भी उन्हे अंकल ही कहती थी और वे मुझे बेटी.
जैसे तुम्हारे पिता की असमय मृत्यु हो गयी, वैसा ही मेरे पिता के साथ भी हुआ था.
मैं और माँ अनाथ हो गये.
घर चलाने के लिए मैं नौकरी के लिए भटकने लगी.
पर ज़रूरतमंद के लिए नौकरी मिलना इतना आसान नही होता, मेरी फ्रेंड ने जब मेरी परेशानी देखी तो अपने पिता से बात की, वे तैयार हो गये.
मेरे और माँ के लिए इससे ज़्यादा ख़ुसी की बात क्या हो सकती थी, घर की ज़रूरत भी पूरी हो रही थी और मुझे पिता जैसे अंकल की छत्रछाया मे रहना था.
शुरू मे सब ठीक रहा लेकिन ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारे साथ हुआ, अंकल का व्यवहार बदलने लगा.
शुरू मे तो मुझे लगा कि शायद मेरा भरम है लेकिन जब उन्होने 2 नंबर के जोक्स और फिज़िकल छेड़खानी शुरू कर दी तो मुझे शॉक लगा, मैं तनाव मे रहने लगी.
कभी सोचती माँ को बताउ, कभी सोचती फ्रेंड से ज़िक्र करू पर कुछ निस्चय नही कर पा रही थी और ये भी नही समझ पा रही थी की उनसे भी विरोध करू तो कैसे.
किन शब्दो मे.
शायद मेरे किसी से ज़िक्र ना करने और विरोध ना करने से उनका हौंसला बढ़ गया, अब वे मुझे कुछ ज़्यादा ही फोन करने लगे.
रात को एक-एक और डेढ़-डेढ़ बजे भी फोन कर देते.
उस वक़्त वे नशे मे होते थे और ऐसी बाते करते थे जो एक पिता अपनी बेटी के साथ नही कर सकता.
जब मैं अंकल कहती तो वे कहते, ये क्या अंकल-अंकल की रट लगा रखी है अंकिता, अब तुम बड़ी हो गयी हो, हमे हमारे नाम से पुकारो करो.
अपनी कहानी को तुम्हारी कहानी से इसलिए अलग कहूँगी क्योंकि उन्होने कभी ज़बरदस्ती करने की कोशिश नही की.
उनकी कोशिश मेरी सहमति बनाने की ही थी लेकिन धीरे-धीरे स्तिथिया इतनी विकट हो गयी की मुझे लगा कोई फ़ैसला लेना पड़ेगा.
पर समझ नही पा रही थी कि क्या फ़ैसला लूँ.
नौकरी छोड़ने का मतलब था, घर के किचन को उजाड़ देना.
माँ से ज़िक्र करती तो पता नही उन्हे इस उम्र मे कितना बड़ा झटका लगता "
संगया बोली," तुम्हे अपनी फ्रेंड से ज़िक्र करना चाहिए था "
" वही किया, लेकिन " अंकिता की आँखे शुन्य मे स्थिर हो गयी और उनमे आँसू उमड़ आए.
वो कुछ बोल नही पाई.
होंठ काँप रहे थे.
" क्या हुआ बेहन " संगया ने पूछा.
" मेरी उस बेवकूफी का ऐसा परिणाम निकला कि आजतक पछता रही हू, सोचती हू कि.... "
वो फफक-फफक कर रो पड़ी.
अब, संगया ने उसे धाँढस बँधाया," रोओ मत बेहन, दिल छोटा ना करो, पर ऐसा हुआ क्या था "
" अब वो इस दुनिया मे नही है " उसने रोते-रोते कहा.
संगया जैसे शॉक्ड रह गयी," क...क्या "
" और मैं खुद को उनकी मौत का ज़िम्मेदार मानती हू, ना मैं वो बेवकूफी करती, ना वो ऐसा करते, संगया, इतना बड़ा गुनाह तो नही किया था उन्होने की मैंने उनकी जान ही ले ली "
" बताओ तो सही बेहन, हुआ क्या "
" मैंने फ्रेंड से ज़िक्र किया, वो तो बुरी तरह भड़क गयी, सीधा अपने पापा के पास पहुच गयी और वो सब कहा जो शायद उसे नही कहना चाहिए था, ये तक कि अगर आप अंकिता के बारे मे ऐसा सोच सकते है तो मेरे बारे मे भी सोच सकते है, और.... उसकी बाते शायद उनके दिल मे जा लगी, अपनी ग़लती का गहरा एहसास ही नही हुआ बल्कि अपने प्रति ग्लानि मे डूब गये, ऐसा ना होता तो उन्होने इतना बड़ा कदम ना उठाया होता "
" क्या किया उन्होने "
" आत्महत्या "
" माइ गॉड " संगया के मुँह से बस यही निकला.

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11-23-2020, 02:07 PM,
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RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
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वो आवाक नज़र आ रही थी जबकि अंकिता रोए जा रही थी, बहुत देर तक कमरे मे बस अंकिता के रोने की आवाज़े गूँजती रही, संगया ने उसका मुखड़ा अपने अंक मे छुपा लिया था, करीब 5 मिनिट बाद बोली," वाकयि अच्छा नही हुआ "
" हालाँकि मेरी फ्रेंड ने इस बारे मे कुछ कहा नही लेकिन तब से अब तक मैं उससे आँखे नही मिला पाई हू " अंकिता ने अपना आँसुओ से तर चेहरा उसकी तरफ उठाते हुए कहा," डरती हू कि कही वो ये ना कह दे कि तू मेरे पापा की मौत की ज़िम्मेदार है "
" नही बेहन, ऐसे विचार दिल मे मत लाओ, वे अपनी मौत के ज़िम्मेदार खुद बने, क्यो अपनी बेटी जैसी लड़की, जो उन्हे अंकल कहती ही नही, मानती भी थी पर बुरी नज़र डाली, तुम और कर भी क्या सकती थी, तुमने वही किया जो करना चाहिए था "
" मैंने तो इस बारे मे मम्मी को भी नही बताया, क्या बताउ, हिम्मत ही नही पड़ी.
अंकल की स्यूयिसाइड की जाँच-पड़ताल करने पोलीस आई.
उन्हे अंकल के मोबाइल से मुझे रात-बे-रात फोन करने का रेकॉर्ड मिल गया था.
उस संबंध मे सवाल किए.
मैंने झूठ बोल दिया.
हक़ीकत बताकर अंकल को कैसे रुसवा कर सकती थी.
रहे तो थे नही वे, उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को भी धूल मे मिला देने का मुझे क्या हक़ था.
तब से अंदर ही अंदर घुट रही थी.
किससे क्या कहती.
तुम आई.
तुम्हारी कहानी सामने आई तो खुद को रोक ना सकी और गुबार फुट पड़ा, मम्मी अक्सर कहती है, कोई यू ही, बगैर किसी बड़ी बात के स्यूयिसाइड नही करता, ज़रूर किसी ने उनका दिल दुखाया होगा, कोई तो होगा उनकी मौत का ज़िम्मेदार, उसे भी इतने अच्छे और नेक आदमी को स्यूयिसाइड करने के लिए मजबूर करने के लिए कभी चैन नही मिलेगा.
कैसे बताउ.
कैसे बताउ मम्मी को कि उस नेक आदमी को स्यूयिसाइड करने के लिए मजबूर करने वाली उनकी बेटी ही है और ये भी सच है कि उसे आजतक चैन नही मिला है "
" तुम फिर वही कहने लगी बेहन, मैंने कहा ना, तुम उनकी मौत की ज़िम्मेदार नही हो "
" वो तो मैं हू " उसने रोते हुए कहा," और रहूंगी "
" कौन थे तुम्हारे बॉस "
" उनका नाम लेकर मैं उन्हे रुसवा नही कर सकती "

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अगली सुबह धनुष्टानकार विजय की कोठी पर पहुचा.
उसे देखते ही विजय बोला," आओ मोंटो प्यारे, क्या हाल है तुम्हारे, यानी कि हमारे सौंपे हुए काम का क्या हुआ "
धनुष्टानकार ने अपने छोटे से कोट की जेब से एक छोटी सी डाइयरी निकाली और उसका एक पेज विजय की आँखो के सामने कर दिया, उस पेज पर केवल इतना ही लिखा था," है "
उस एक्मात्र शब्द को पढ़कर विजय की आँखो मे एक अजीब सी चमक पैदा हुई थी, बोला," यानी हमारा अनुमान दुरुस्त निकला "
धनुष्टानकार बेचारा कुछ बोल तो सकता नही था.
विजय ने सवाल किया," कहाँ खुलता है "
धनुष्टानकार ने छोटा सा पेन निकाला और डाइयरी के उसी पेज पर लिखा," ऑफीस मे "
" कैसे खुलता है "
" रिमोट से "
" कितने बजे गये थे "
" दो बजे " धनुष्टानकार ने लिखा.
" किसी ने देखा तो नही "
धनुष्टानकार ने पुनः लिखा," नही "
" ओके, अब तुम घर जाओ मोंटो प्यारे और इस बारे मे किसी को कुछ मत बताना, दिलजले को भी नही "
धनुष्टानकार आग्यकारी बच्चे की तरह तुरंत वापिस चला गया.
कुछ देर बाद.
" आओ...आओ आशा डार्लिंग " विजय आशा को सुबह-सुबह अपनी कोठी मे आया हुआ देखकर चाहक उठा," आज का सूरज तो कुछ ज़्यादा ही रोशनी लेकर निकला है, वो क्या कहा जाता है ऐसे मौको पर, ये कि, वो आए हमारे घोंसले पर, कभी हम उन्हे, कभी अपने बूचड़खाने को देखते है और अपना माथा पीट-ते है "
" माथा क्यो पीट-ते हो " आशा भी अच्छे मूड मे थी.
" क्योंकि पीटने के लिए और कुछ है ही नही, हम ने 10 साल पहले शादी के लिए कहा था, हमारी बात मान ली होती तो अब तक कम से कम 10 बच्चे होते और हम उन्हे पीट-ते-पीट-ते सालो के गाल लाल कर देते, अपना माथा पीटने की ज़रूरत ना पड़ती "
" बैठने को नही कहोगे "
" अजी सर पर बैठिए हमारे "
आशा मुस्कुराइ," लोग पॅल्को पर बिठाते है, तुम सिर पर "
" अजी झूठ बोलते है साले, भला पॅल्को पर भी कोई किसी को बिठा सकता है, पॅल्को का कचूमर नही निकल जाएगा "
" बात तो ठीक है तुम्हारी " आशा हँसी.
" जबकि सिर पर हम तुम्हे तो क्या, सूमो पहलवान को भी बिठा सकते है, तुम तो फूल हो, कमल का, निशान-ए-ब्ज्प "
" अब काम की बात करे " वो सोफे पर बैठ गयी.
" बिल्कुल, कामदेव तो खुश ही तब होंगे "
" तुम नही मानोगे "
" मान तो तुम नही रही हो जान-ए-मन, अब बताओ 'काम' की बात करने को तुमने कहा या हम ने "
" मैं उस काम की बात नही कर रही थी "
" उसकी नही तो इस काम की बात कर लेते है " विजय कहता चला गया," सुबह-सुबह निकली तो तुम बनकर एकदम टंच हो, छोटे हाथी की सूंड जैसी टाँगो से चिपकी स्काइ कलर की जीन्स, कयि जगह से फटा हुआ सफेद रंग का टॉप, मटरू की दुल्हनिया लग रही हो, फटे हुए कपड़े पहनना तो खैर लेटेस्ट फॅशन है लेकिन जिस्म पर जगह-जगह खरोचे मार लेने का फॅशन कब से आ गया "
" ये खरोचे तुम्हारा काम करने के लिए ज़रूरी थी "
" देखो डार्लिंग, तुमने फिर काम की बात छेड़ दी, हमे लगता है कि तुम काम के चक्कर मे कुछ ज़्यादा ही आ गयी हो "
" अब तुम अंकिता के साथ काम करने के लिए स्वतन्त्र हो "
" मतलब "
" उसका किसी से अफेर नही है "
" हम ने कब कहा किसी का किसी से अफेर है "
" तुमने मुझसे अंकिता के अफेर के बारे मे पता लगाने के लिए नही कहा था, ये भी कहा था कि तुम्हे उसके बॉस पर शक है "
" ओह, अच्छा, वो, तुमने को सुबह-सुबह अंकिता का ज़िक्र छेड़कर हमारे दिल का तबला बजा दिया आशा डार्लिंग और ये सुनकर तो ढोल-मृदंग भी बजने लगे है कि उसकी गुटार-गु हमारे अलावा और किसी से नही चल रही है, अपने बॉस से भी नही "
" लेकिन बॉस उससे चलानी चाहता था "
" एक तरफ़ा रेलवे लाइन "
" हां "
" डीटेल मे बताओ "
आशा ने बता दिया.
विजय ने पूछा," ये सब कैसे पता किया "
आशा ने वो भी बता दिया और बोली," बड़ी नेक बंदी है बेचारी, मुझे रामनगर की बस मे ही नही बिठाया बल्कि बस अड्डे से तभी गयी जब बस रामनगर के लिए रवाना हो गयी, मुझे बीच मे बस रुकवा कर उतरना पड़ा, वहाँ से टॅक्सी करके आई हू "
" शेखावत किसे बनाया "
" अशरफ को "
" सारी बाते अंकिता के ही हलक से निकलवाने के लिए जो टेक्नीक तुमने इस्तेमाल की, वो वाकाई तारीफ के काबिल है डार्लिंग, ये कहा जाए तो ज़रा भी ग़लत ना होगा कि तुमने रुमाल को फाड़ कर धोती बना दी है, जी चाहता है, तुम्हारा मुँह चूम लू "
" तो चूमो ना " उसने शरारती अंदाज मे कहा," रोका किसने है, मैं भी हाजिर हू, मेरा मुँह भी "
" सच्ची-मूची चूम लू " विजय ने ऐसे अंदाज मे पूछा जैसे माँ ने बच्चे से खलेने जाने के लिए कह दिया हो.
आशा को क्योंकि मालूम था कि वो वैसा कुछ भी नही करेगा इसलिए बोली," तुममे इतनी हिम्मत नही है "
" हमारी हिम्मत को मत ललकारना मिस गोगियपाशा " विजय सीना फूला कर बोला," वो तो इतनी है कि तुम्हारा मुँह तो ना पिद्दी है ना पिद्दी का शोरबा, हमारी जलाल-ए-मोहब्बत जाग जाए तो हम हिमालय की चोटी तक को चूम ले "
आशा ने खिलखिलाकर हंसते हुवे कहा," मुझे मालूम है की तुम हिमालय की चोटी को तो चूम सकते हो लेकिन मेरे होंठो को नही "
" हम कहते है ललकारो मत हमे "
" ललकार चुकी हू " वो हँसे जा रही थी.
" आए...तो ये लो.. " कहने के साथ वो सोफे से खड़ा हो गया और बगैर घुटनो को मॉड़े आशा की तरफ बढ़ता हुआ बोला," हम भी ललक गये, आ रहे है तुम्हारे गुलाबी और शरबती होंठो को चूमने, फिर मत कहना कि हम ने कोई नाजायज़ हरकत की है "
" आओ ना, धमका किसे रहे हो, मैं तो तैयार हू "
विजय ठीक उसके सामने पहुच गया, सोफे पर बैठी आशा फेस उपर उठाए उसे देख रही थी, होंठो पर अब भी शरारतपूर्ण मुस्कान थी क्योंकि जानती थी, विजय बकवास भले ही चाहे कितनी भी कर ले मगर जो कह रहा था, कर नही सकता.
विजय ने चेहरा नीचे यानी उसके चेहरे की तरफ झुकाना शुरू कर दिया, उस क्षण, आशा ने विजय के चेहरे पर भावनाओ का उमड़ता तूफान देखा था, आँखो मे तैरते लाल डोरे देखे थे और उसे लगा था, शायद विजय बह गया है, शायद उसके दिल मे भी उसके लिए वो ही भावनाए है जो उसके दिल मे उसके लिए है और शायद आज उसने अपनी उन बनावटी हरकतों के बंधन तोड़ दिए है जिनके आवरण मे वो खुद को छिपाए रखता था, शायद आज वो भी अपनी भावनाओ पर काबू नही रख सका है तभी तो, वो उसके चेहरे पर झुकता ही जा रहा है, झुकता ही जा रहा है.
दोनो के होंठ बेहद करीब आ चुके है.
आशा ने उसकी सांसो को अपने चेहरे पर महसूस किया.
बड़ी ही सुगंधित साँसे लगी थी उसे वे.
सारे शरीर मे गुदगुदी सी होती चली गयी.
अगर आप किसी को चाहते है और वो आपके करीब नही आता और लंबे वक़्त बाद, वो एक दिन आ जाता है तो आप अपनी भावनाओ पर काबू नही रख सकते.
ख़ासतौर पर एक लड़की.
लड़की जिसे चाहती है, दिल की गहराईयो से चाहती है और वो उसे चाहे ना चाहे, वो उसे अंतिम साँस तक चाहती रहती है.
आशा के साथ भी ऐसा ही था.
वो विजय को टूटकर चाहती थी.
तभी तो, ऐसा हुआ कि अभी विजय ने उसके होंठो को चूमा नही था, बस ऐसा एहसास हुआ कि चूमने वाला है कि, सारे जिस्म मे आनंद की ऐसी तरंगे दौड़ गयी की आँखे बंद होती चली गयी.
अब उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने होंठो से विजय के सुलगते हुवे होंठो के टच होने का इंतजार था.
लेकिन.
ऐसा हो ना सका.
क्योंकि ठीक तभी, विजय का मोबाइल घनघना उठा था.
" धत्त तेरे की " विजय के मुँह से निकला," इसे कहते है कांधी के ब्याह को सो जोखो, मुश्किल से मुहूरत निकला, उसमे भी खलल डालने के लिए मोबाइल टपक पड़ा "
अपने जिस्म मे सनसनी-सी महसूस करती आशा ने आँखे खोली तो सीधे खड़े विजय को जेब से मोबाइल निकालते देखा.
अपने अंदर उसे ऐसा लगा जैसे गॅस चूल्‍हे पर रखे उफनने को तैयार दूध के नीचे से अचानक गॅस हटा ली गयी हो.
सारे ज़ज्बात छिन्न-भिन्न से हो गये जबकि विजय ने मोबाइल पर कहा था," तुम हमेशा उउल-जुलूल टाइम पर फोन करते हो दिलजले, एक मिनिट....बस एक मिनिट बाद नही कर सकते थे, हम राबड़ी चाटने वाले थे कि तुमने उसमे मक्खी डाल दी "
" बड़ी अनोखी खबर है गुरु " दूसरी तरफ से कहा गया.
" अजी भाड़ मे गयी तुम्हारी अनोखी खबर, यहाँ हम जूनियर विजय पैदा करने की तैयारी कर रहे थे कि तुमने अड़ंगी अड़ा दी "
" बिजलानी के घर मे चोरी हुई है "
विजय वास्तव मे चौंका," कौन्से बिजलानी के घर मे "
" अशोक बिजलानी के "
" क्या चुराया गया "
" अभी पता नही लगा है, अंजलि का फोन संबंधित थाने मे आया था, वहाँ के इनस्पेक्टर ने पापा को फोन किया और पापा ने मुझसे कहा कि इस बारे मे आपको बता दूं "
" बड़ा समझदार हो गया है तुलाराशि, तुम पहुचो दिलजले, हम भी फ़ौरन से पहले पहुच रहे है "
" ओके " विकास ने संबंध-विच्छेद कर दिया.
मोबाइल जेब मे रखते विजय ने आशा की तरफ देखा तो जाने क्यो झेंप ने आशा के दिल-ओ-दिमाग़ पर काबू कर लिया, लाज की ज़्याददाती के कारण उसका चेहरा सुर्ख लाल होता चला गया.
उसे लगा, कुछ देर पहले वो कौनसी दुनिया मे पहुच गयी थी.
विजय बोला," मजबूरी है आशा डार्लिंग, फिलहाल जूनियर विजय को पैदा करने की कोशिश को स्थगित करते है "
आशा ने सोचा, ये क्या कह रहा है विजय.
जूनियर विजय.
आह.
कितना मीठा एहसास है.
क्या वास्तव मे ऐसा हो सकता है कि जूनियर विजय उसकी कोख से जनम ले.
ऐसा विजय, जिसका डंका सारे संसार मे बजे.
अपने अंदर ही खो गयी वो, शायद इसलिए कुछ ना कह सकी जबकि विजय कह रहा था," उम्मीद है तुमने हमारे शब्दो पर गौर फर्मा लिया होगा मिस गोगियपाशा, हम ने प्रोग्राम कॅन्सल नही किया है बल्कि स्थगित किया है "
आशा चुप रही.
सूझा ही नही कि क्या कहे.
" चलते है " कहने के बाद विजय कमरे से बाहर चला गया था जबकि आशा वही बैठी रह गयी.
जैसे मूर्ति बन गयी हो.
जैसे सोफे ने जाकड़ लिया हो.
जहाँ मे विचारो का अंधड़ चल रहा था, क्या विजय ने सच कहा कि उसने प्रोग्राम स्थगित किया है, कॅन्सल नही.
आज वो बह गया था.
अपनी भावनाओ पर काबू ना रख पाया.
इसका मतलब, फिर किसी दिन ऐसा दिन आएगा.
नही, वो हमेशा की तरह बकवास कर रहा था.
कभी लगता, वो बह गया था.
कभी लगता, बकवास कर रहा था.
आशा समझ ना सकी कि सच्चाई क्या है.
Reply
11-23-2020, 02:07 PM,
#34
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
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विजय की तो बात ही छोड़िए, अशोक बिजलानी के ऑफीस को देखकर साधारण आदमी भी ये कह सकता था कि किसी ने उसे किसी चीज़ की तलाश मे बुरी तरह खंगाला है.
ये वही ऑफीस था जिसमे विजय, विकास और ढनुश्टन्कार सबसे पहले आकर बैठे थे.
जहाँ वे अंकिता, उत्सव और दीपाली से मिले थे.
उस वक़्त शेल्फ और अलमारियो मे करीने से लगी क़ानून की ढेर सारी किताबें इस वक़्त फर्श पर कचरे की तरह बिखरी पड़ी थी.
मेज का सामान भी बुरी तरह तितर-बितर था.
सभी दराजे खुली पड़ी थी.
उनका कुछ सामान नीचे पड़ा हुआ था, कुछ उनमे ही था.
एक भी फाइल ऐसी नही थी जिसे खंगाला ना गया हो.
ऐसा लग रहा था जैसे किसी सुई को तलाश करने की कोशिश की गयी हो, उस खिड़की का काँच और ग्रिल टूटी हुई थी जो लॉन की तरफ खुलती थी, विजय-विकास ने नज़दीक से जाकर उसे देखा.
खिड़की की निचली चौखट पर मिट्टी लगी हुई थी और नीचे, कमरे के अंदर फर्श पर मिट्टी के फुट-स्टेप्स बने थे.
अर्थात जो भी आया, वही से आया था.
फुट-स्टेप्स बाकी कमरे मे भी थे परंतु अस्पष्ट-से, उन्हे केवल मिट्टी के निशान कहा जा सकता था.
हर स्थान को गौर से देखने के बाद विजय ने छत की तरफ देखा, वो 2 बाइ 2 की टाइल्स से मंधी हुई थी.
हर टीले के किनारों पर अल्यूमिनियम की पट्टी लगी हुई थी.
यानी किसी का भी जोड़ नही चमक रहा था.
जाँच-पड़ताल करने के बहाने विजय ने बिजलानी की पर्सनल दराज मे पड़ा एक छोटा-सा रिमोट उठाकर इस तरह अपनी जेब मे सरका लिया कि इस हरकत को कोई देख ना सके.
फिर वही मौजूद अंजलि से पूछा," आपका और बिजलानी साहब का बेडरूम इसी ऑफीस के उपर है ना "
" हां " उसने संक्षिप्त सा जवाब दिया.
" मकान के किसी और हिस्से से गुज़रे बगैर, वाहा से यहाँ और यहाँ से वहाँ आया-जाया जा सकता है ना "
अंजलि के चेहरे पर अस्चर्य के भाव उभर आए.
मुँह खुला का खुला रह गया.
आवाज़ ना निकल सकी उसकी.
विजय ने कहा," जवाब दीजिए "
" आपको कैसे मालूम "
विकास भी चकित रह गया था.
उसने छत की तरफ देखा, ऐसा कुछ भी नज़र नही आ रहा था जिससे पता लग सके कि वहाँ कोई रास्ता है, वो भी ना समझ सका कि विजय गुरु को ये बात कैसे मालूम है.
विजय ने अंजलि के प्रश्न के जवाब मे कहा," हमारे पास अलादीन का चिराग है, उसे घिसते है, जिन्न को प्रकट होना पड़ता है, जो जानना चाहते है, उससे सवाल करते है, उसे जवाब देना पड़ता है, इतना तो आप जानती ही होंगी कि जिन्न भगवान जी का जुड़वा भाई होता है, जैसे भगवान जी को सब पता होता है, वैसे ही उसे भी पता होता है, कहें तो दिखाए

अलादीन का चिराग "
किसी के मुँह से बोल ना फुट सका जबकि अंजलि ऐसी मुद्रा मे विजय को देखती रह गयी थी जैसे जादूगर को देख रही हो.
विजय ने सचमुच जादूगर की तरह जेब मे हाथ डालकर रिमोट निकाला, हाथ उपर किया और एक बटन दबा दिया.
ठीक बीच वाली 2 बाइ 2 की टाइल बिना कोई आवाज़ किए नीचे की तरफ लटकती चली गयी, उसका दूसरा सिरा ऐसा लग रहा था जैसे कब्जो पर टिका हुआ हो.
देखते ही देखते टाइल पूरी तरह नीचे लटक गयी.
अब वहाँ 2 बाइ 2 का एक ऐसा रास्ता था की एक व्यस्क आदमी आराम से पार हो सकता था, रास्ते के उस पार बेडरूम मे बिच्चे बेड का निचला हिस्सा नज़र आ रहा था.
विजय बोला," ये रास्ता बेडरूम मे बिछे बेड के नीचे खुलता है, एक ऐसा ही रिमोट बेडरूम मे है यानी ठीक इसी तरह वहाँ से भी इसे खोला जा सकता है, औसत आदमी की लंबाई साढ़े 5 फुट होती है, हाथ उपर कर लिए जाए तो 7 फुट उँची वस्तु को आदमी आराम से पकड़ सकता है, ऑफीस के फर्श से चत्ट की उँचाई साढ़े 9 फुट है, रास्ते के नीचे ढाई फुट उँची बिजलानी की मेज पड़ी है, बचे 7 फुट अर्थात चत्ट से यहा आने के लिए आदमी को कूदना नही पड़ेगा बल्कि आराम से मेज पर उतर जाएगा, इसी तरह आराम से यहाँ से बेडरूम मे, बेड के नीचे पहुच जाएगा "

रिप्पी चेहरे पर अस्चर्य लिए अपनी मम्मी को देख रही थी, उसके मुँह से शब्द फिसलते चले गये," इसका तो मुझे भी नही पता था "
" उन्होने इसे तेरे लिए ही बनवाया था "
" मेरे लिए "
" जब मकान बन रहा था, तब तू छोटी थी, गोद मे रहने वाली बच्ची, हमारे साथ बेडरूम मे ही सोती थी, तेरे पापा सोचा करते थे कि इतने बड़े घर मे सिर्फ़ 3 लोग रहा करेंगे,

अगर किसी समय गुंडे-बदमाश घुस आए तो उनसे बचने के लिए कोई गुप्त रास्ता होना चाहिए ताकि अगर कोई बेडरूम मे घुसने की कोशिश करे तो तुम्हे लेकर हम ऑफीस मे आ जाए और बिल्डिंग से बाहर चले जाए "
रिप्पी हैरत से अपनी मम्मी की तरफ देखती रह गयी जबकि विजय ने अंजलि से सवाल किया था," इस रास्ते के बारे मे आपने उस दिन क्यो नही बताया जिस दिन बिजलानी का मर्डर हुआ था "
" आप उसे फिर मर्डर कह रहे है "
" अब तो चान्स बढ़ गये है क्योंकि जो कमरा उस वक़्त अंदर से बंद नज़र आ रहा था, अब पता लग रहा है कि उसमे आने-जाने के लिए एक और रास्ता था "
" पर इस रास्ते के बारे मे मेरे और बिजलानी साहब के अलावा किसी को पता नही था, आप देख ही रहे है, रिप्पी तक को नही "
" सवाल उठता है, क्यो नहीं " विजय ने कहा," रिप्पी तक को इस रास्ते के बारे मे क्यो नही बताया गया "
" मुझे और उन्हे कभी इस बात की ज़रूरत ही महसूस नही हुई बल्कि ये कहा जाए तो ज़्यादा मुनासिब होगा कि हम खुद भी इस रास्ते को भूल चुके थे क्योंकि वर्षो पहले ये बना ज़रूर था मगर कभी इसकी ज़रूरत नही पड़ी, इस्तेमाल तक नही किया हम ने क्योंकि वैसा कभी हुआ ही नही जैसा सोचकर हम ने इसे बनवाया था "
" उस दिन हम ने ये संभावना व्यक्त की थी कि ये स्यूयिसाइड की जगह मर्डर भी हो सकता है, उस वक़्त स्वाभाविक रूप से आपका ध्यान इसकी तरफ जाना चाहिए था, जेहन मे ये विचार उतना चाहिए था कि कही उसी रास्ते से तो कोई बिजलानी साहब का मर्डर करके नही निकल गया "

" तो क्या अब आप पक्के तौर पर कह रहे है कि बिजलानी साहब ने स्यूयिसाइड नही किया, उनका मर्डर किया गया है और मर्डर करने वाला इसी रास्ते से फरार हो गया "
" पक्के तौर पर अभी कुछ नही कहा जा सकता लेकिन जैसा कि पहले ही कहा, चान्स बढ़ गये है "
" मुझे नही लगता ऐसा हुआ होगा " अंजलि बोली," क्योंकि पहली बात, मैं बार-बार दोहराउन्गी कि इस रास्ते के बारे मे किसी को पता नही था, दूसरी बात, उस वक़्त ऑफीस मे अंकिता, उत्सव और दीपाली के अलावा आप खुद मौजूद थे "
" आपकी पहली बात तो यही धराशायी हो जाती है कि हमे इस रास्ते के बारे मे पता है, यानी आपके इस दावे मे कोई दम नही है, जैसे हमे पता लगा, वैसे ही किसी और को भी लग सकता है "
" मैं तो इसी बात पर हैरान हू कि आपको कैसे पता लगा "
विजय ने उसकी बात पर ध्यान दिए बगैर कहा," दूसरी बात का जवाब ये है कि आप भूल रही है कि गोली की आवाज़ सुनते ही हम सब भागते-दौड़ते उपर पहुच गये थे अर्थात उसके लिए ये रास्ता क्लियर था, ऐसा क्यो नही हो सकता कि उसी समय हत्यारा भी भागता-दौड़ता इसी रास्ते से निकल गया हो "
" चलिए, उसके फरार होने के बारे मे तो आपने बता दिया मगर वो वहाँ पहुचा कैसे होगा, अंकिता, उत्सव और दीपाली तो हर रोज की तरह यहाँ 10 बजे ही आ गये थे "
" 10 से पहले जा छुपा होगा "
" जिस समय मैं उन्हे चाय देने गयी थी उस समय कमरे मे उनके अलावा और कोई नही था "
" क्या बाथरूम भी चेक किया था आपने "
" बाथरूम, नही तो "
" संभव है कि सही मौके की तलाश मे वही छुपा बैठा हो "
अंजलि विजय की तरफ देखती रह गयी.
जैसे कहने के लिए अब उसके पास कुछ शेष ना बचा हो.
अतः सन्नाटा छा गया.

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कुछ देर बाद रिप्पी बोली," इस सबके बावजूद, मेरा कहना ये है कि पापा का मर्डर नही हुआ, उन्होने स्यूयिसाइड ही किया है "
" दावे की वजह "
" मैं इस बात को जानती हूँ "
" कैसे "
" ये भी जानती हूँ कि उन्होने ऐसा क्यू किया "
अंजलि ने चौंक कर उसकी तरफ देखा, पूछा," ये क्या कह रही है तू, तू उनके स्यूयिसाइड का कारण जानती है "
" हां मम्मी " उसकी आँखे भीगी हुई थी.
विजय ने कहा," हम भी जानना चाहते है "
" नही बताउन्गी "
" क्यो "
" हरगिज़ नही बताउन्गी " कहने के साथ उसके जबड़े भिन्च गये थे," कोई जान से मार डाले तब भी नही, आपको अगर इसे मर्डर मानकर तहकीकात करनी है तो करते रहिए, आपको मुँह की खानी पड़ेगी क्योंकि मैं जानती हू कि ये आत्महत्या है और अगर इसे हत्या कहा जा सकता है तो हत्यारी मैं हूँ "
सब चौंक पड़े.
अंजलि के हलक से तो चीख-सी निकल गयी थी," र...रिप्पी, ये क्या बक रही है तू "
" ये सच है मम्मी " उसकी आँखे दबदबाई हुई थी," लेकिन किसी भी सूरत मे मैं इस सच को किसी को बता नही सकती "
" हम वो भी जानते है जिसे तुम अपनी जान की कीमत पर भी किसी को बताने के लिए तैयार नही हो "
" म...मतलब " रिप्पी इस तरह चौंकी थी जैसे अपने जिस्म पर बिच्छू देख लिया हो, मुँह से निकला," क्या जानते है आप "
" यही कि अंकिता के प्रति बिजलानी साहब के नज़रिए मे चेंज आ गया था, अब वे उसे बेटी नही बल्कि एक ऐसी लड़की समझने लगे थे जो उनकी गोद मे गिर सकती थी, अंकिता ने ये बात तुम्हे बताई थी और तुमने इस बात पर अपने पापा को लताड़ा था "
रिप्पी की हालत ऐसी हो गयी जैसे कि उसके कानो मे पिन्घला हुआ शीशा उंड़ेल दिया गया हो.
आँखे विजय के चेहरे पर स्थिर हो गयी थी.
पलके तक नही झपक पा रही थी वो.
विजय को ऐसी नज़रो से देख रही थी जैसे वो इस दुनिया का सबसे बड़ा जादूगर हो.
मुँह से बस एक ही बात निकली," आ..आपको कैसे पता "
" हमे ऐसी ही बाते पता लगाने के पैसे मिलते है रिप्पी " विजय कहता चला गया," उस वक़्त दरवाजा पीटने के साथ जो तुम ये कह रही थी कि, मुझे आपसे कोई शिकायत नही है

पापा, वो इस लिए नही कह रही थी कि वे कॅमरा नही लाए थे, बल्कि इसलिए कह रही थी क्योंकि तुम्हे उसी वक़्त अंदेशा हो गया था कि तुम्हारे पापा ने कही तुम्हारी लताड़ के कारण तो ऐसा नही कर लिया है "
" प...प्लीज़, प्लीज़ मिस्टर. विजय, ये बात इसी कमरे तक सीमित रहनी चाहिए " रिप्पी गिडगिडा उठी," और इससे फ़ायदा भी क्या होगा, पापा तो रहे नही, ये बात फैली तो उनकी इज़्ज़त भी नही रह जाएगी, इससे क्या मिल जाएगा आपको "
" कोशिश करेंगे कि ये बात सार्वजनिक ना हो "
" क्या ये बात सच है " बहुत देर से आवाक खड़ी अंजलि ने रिप्पी से पूछा," कैसी उन्होनी सी बात है ये कि अंकिता के प्रति उनके विचार चेंज हो गये थे, वो तो उनकी बेटी जैसी थी, जैसी तू, वैसी अंकिता, बचपन से इस घर मे आ रही है "
" यही तो...यही तो कह बैठी थी मैं पापा से " रिप्पी के मुँह से ऐसे भीगे हुवे शब्द निकले जैसे की अपने उस वक़्त के फैंसले पर पछता रही हो," यही कि अगर आप अंकिता के बारे मे ऐसा सोच सकते है तो कल मेरे बारे मे भी ऐसा सोच सकते है, शायद मेरे ये शब्द ही मार गये उन्हे और उन्हे लगा की जब उस बेटी की नज़रो मे ही गिर गया हूँ जिससे सबसे ज़्यादा प्यार करता हू तो जिंदा रहकर क्या करूँगा, और उन्होने खुद को ख़तम कर लिया, तभी तो कह रही थी कि अगर ये हत्या है तो हत्यारी मैं हू, सिर्फ़ मैं "
" ये क्या अनर्थ किया तूने " अंजलि भी रोने लगी," उनसे ऐसी बेवकूफी हो भी गयी थी तो उनसे ऐसी बात क्यू की, मुझसे बात क्यो नही की, मुझे क्यो नही बताया सबकुछ "

" बुद्धि मारी गयी थी मेरी, गुस्सा ही इतना तेज आ गया था कि मुझे जैसे ही अंकिता ने बताया, मैं पापा के पास जा पहुचि, मुझे क्या पता था कि वे ऐसा कर लेंगे "
" बेवकूफी तो अंकिता ने भी की, तुझसे क्यो कहा उसने, मैं मर गयी थी क्या, मैं भी तो उसकी माँ जैसी हू, मैं उन्हे अपने तरीके से टॅकल कर लेती, तब शायद वे अपनी जान नही लेते "
रिप्पी चुप रह गयी.

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कुछ देर बाद विजय ने कहा," जो हो गया, वो हो चुका है, अब कुछ भी वापिस नही आ सकता, हम इंसानो के साथ अक्सर ऐसा होता है कि हम से कोई ऐसी ग़लती हो जाती है जिसके लिए सारे जीवन पछताने के अलावा कुछ नही रह जाता, मगर पछताने से भी क्या होता है, गया हुआ इंसान वापिस तो नही आ सकता "
आँखो मे अभी तक आँसू भरे रिप्पी ने कहा," बस ये बता दीजिए मिस्टर. विजय की आपको ये सब पता कहा से लगा "
विकास ने भी बड़ी उम्मीद से विजय की तरफ देखा क्योंकि वो ये जानने के लिए मरा जा रहा था की उसे ये बात और गुप्त रास्ते के बारे मे कब और कैसे पता लगा लेकिन उस वक़्त उसकी उम्मीदो पर पानी फिर गया जब विजय ने सपाट स्वर मे रिप्पी के सवाल का जवाब दिया," नही बता सकते "
रिप्पी सकपका-सी गयी.
मुँह से बोल ना फुट सका.
बस देखती रह गयी विजय की तरफ.
फिर बोली," क्या आपका मानना अब भी ये ही है कि पापा की हत्या की गयी है "
" फिफ्टी-फिफ्टी "
" कैसे "
" जो शंका आपको है अगर वही हुआ है तो उन्होने आत्महत्या की है लेकिन ये रास्ता हमे सोचने पर मजबूर करता है "
" सिर्फ़ रास्ते के बसे पर ये सोचना क्या कुछ ज़्यादा ही उँची छलाँग नही है कि कोई उनका मर्डर करके यहाँ से फरार हो गया "
" बेस सिर्फ़ ये रास्ता ही नही है "
" और क्या है "
" ये " विजय ने ओफीस की हालत की तरफ इशारा करते हुवे कहा," किसने किया है ये, किसिके पेट मे क्यो दर्द हुआ "
सब चुप.
विजय ने पुनः कहा," उसे किस चीज़ की तलाश थी "
सन्नाटा.
" वो चीज़ उसे मिली या नही "
कोई क्या जवाब देता.
" जवाब दीजिए मोह्तर्मा, दोनो मे से कोई तो जवाब दीजिए " विजय कहता चला गया," दिमाग़ पर ज़ोर डालकर सोचने की कोशिश कीजिए कि मिस्टर. बिजलानी कि ऐसी कौन-सी चीज़ हो सकती है जिसकी किसी को इतनी शिद्दत से तलाश है कि उसने उनके ऑफीस का ये हाल किया "
अंजलि ने रिप्पी की तरफ देखा, रिप्पी ने अंजलि की तरफ, जैसे दोनो एक-दूसरे से पूछ रही हो कि क्या तुम किसी ऐसी चीज़ के बारे मे जानती हो मगर किसी के चेहरे पर ऐसा भाव नही उभरा जिसे पॉज़िटिव कहा जा सके.
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11-23-2020, 02:07 PM,
#35
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
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अंजलि ने तो कह भी दिया," मुझे तो ऐसी कोई चीज़ नही सूझ रही और मुझसे वो कोई चीज़ छुपाते भी नही थे "
" तुम्हे " विजय ने रिप्पी से पूछा.
" आपको ऐसा क्यू लगता है कि जिस चीज़ के लिए किसी ने यहाँ की ऐसी हालत की है वो पापा की ही होगी "
" ये ऑफीस ही तुम्हारे पापा का है "
" ऑफीस क्यू, पूरा घर ही पापा का है " रिप्पी ने कहा," वे अपनी चीज़ कही भी रख सकते थे "
" ये बात बिल्कुल करेक्ट कही तुमने " विजय बोला," पूरा घर बिजलानी साहब का है, वे अपनी कोई भी चीज़ कही भी रख सकते थे, फिर ऑफीस को ही क्यू खंगाला गया, पूरे घर को क्यो नही खंगाला गया, इसका तो एक ही मतलब निकलता है, वो जो कोई भी है, उसे मालूम था कि जिस चीज़ की उसे तलाश है उसे बिजलानी साहब ने अपने ऑफीस मे ही रखा होगा "
" कौन हो सकता है ऐसा आदमी "
" ये सवाल हमे आपसे पूछना चाहिए "
" हमे तो बिल्कुल अनुमान नही है "
" संदीप के बारे मे क्या ख़याल है "
" स...संदीप "
विजय ने इस एक्मात्र शब्द पर ज़ोर दिया," जी "
" उनके बारे मे आपको क्या पता "
" आप सवाल बहुत कर रही है " विजय बोला," कभी ये कि हमे रास्ते के बारे मे कैसे पता, कभी ये कि अंकिता के बारे मे बिजलानी साहब के बदले हुवे विचारो के बारे मे कैसे पता और अब, संदीप के बारे मे क्या पता जबकि हम 100 बातों का एक जवाब दे चुके है, ये कि हमे ऐसी बातो का पता लगाने के पैसे मिलते है, इतने लंबे भाषण का केवल एक ही मतलब है, यही कि, सवाल ना करे बल्कि सवालो के जवाब दे "
" वे अच्छे आदमी नही है " अंजलि के चेहरे पर घृणा फैल गयी थी," लेकिन बिजलानी साहब की हत्या नही कर सकते "
" ये कैसा जवाब हुआ, जब एक आदमी अच्छा है ही नही तो हत्या क्यू नही कर सकता "
" क्योंकि उन्हे ऐसी ज़रूरत ही नही बची है "
" मतलब क्या हुआ इस अटपटी बात का "
" सबकुछ तो वर्षो पहले लूट चुके है वे हमारा " अंजलि कहती चली गयी," अब क्या बचा है जिनके लिए इनकी हत्या करेंगे "
" मतलब "
" जब आपको इतना सब मालूम है तो ये भी मालूम होगा कि रिप्पी के दादाजी की जायदाद को लेकर दोनो भाइयो मे झगड़ा हुआ था, मुक़दमेबाजी भी हुई थी, उस दौर मे अगर बिजलानी साहब की स्वाभाविक मौत भी हो जाती तो भी मुझे यही शक होता कि कही संदीप ने ही तो मर्डर नही कर दिया है लेकिन अब, जबकि वे हमारा सबकुछ हड़प चुके है, क़ानून से भी मुक़दमा जीत चुके है, हमारे बीच कोई संबंध ही नही रहा, ना भाईचारा, ना दुश्मनी, अब भला उन्हे इनका मर्डर करने की क्या ज़रूरत रह गयी है "
" झगड़े की जड़ तो आप ही थी "
" हां, ये सच है, झगड़े की जड़ तो मैं ही थी " अंजलि के चेहरे पर कड़वाहट सी फैलती नज़र आई," बल्कि अगर ये कहा जाए कि झगड़े की जड़ मेरा और अशोक का प्यार था तो ज़्यादा मुनासिब होगा, जब अशोक ने अपने पिता से कहा कि वे मुझसे शादी करना चाहते है तो वे भड़क गये, वे किसी भी हालत मे इस शादी के लिए तैयार नही थे, पर अशोक का कहना था कि वे मेरे बगैर नही जी सकते.
दोनो मे ठन गयी.
संदीप ने उन हालात का फ़ायडा उठाया.
वे ये कहकर पापा को भड़काते रहते की अशोक ने आपकी सुनी ही कब है जो आज सुनेगा.
पर मेरी मदर-इन-लॉ बहुत अच्छी थी.
वे पापा को समझाती रही.
कहती रही कि बच्चे की मर्ज़ी से ही शादी कर दी जाए तो क्या बुराई है और एक दिन उन्हे इसके लिए तैयार कर ही लिया.
शादी हो गयी.
मैं उस घर मे पहुच गयी लेकिन संदीप के दिल मे तो जैसे बरछिया चल रही थी, उन्होने पापा को भड़कना बंद नही किया.
मेरी छोटी-मोटी बातो से उनके कान भरते रहे.
किसी घटना मे अगर मेरी ग़लती नही भी होती थी तो वे उसे पापा के सामने इस तरह से पेश करते थे जैसे मैंने जाने उनका कितना बड़ा अपमान कर दिया हो.
पापा तो पहले ही दिल से मुझे स्वीकार ना कर सके थे.
उस पर संदीप का जहर.
धीरे-धीरे वो जहर पापा की शिराओ मे मेरे लिए नफ़रत बनकर दौड़ने लगा और एक महीने से भी पहले एक दिन ऐसा आ गया कि उन्होने मुझे और अशोक को घर से निकाल दिया.
उस वक़्त पापा ने माँ की भी एक ना सुनी.
अशोक भी बहुत खुद्दार आदमी थे.
मैंने कहा बड़े तो गुस्से मे कह ही देते है, हमे घर नही छोड़ना चाहिए मगर उन्होने मेरी भी एक ना सुनी "
" मगर हम ने तो सुना है कि अशोक बिजलानी साहब शुरू से ही विद्रोही किस्म के थे, अपने पिता की एक नही सुनते थे, पिता चाहते थे कि अशोक पुस्तैनि काम देखे मगर अशोक ने ज़िद करके वकालत की पढ़ाई की, वकील बने "
" इसमे क्या ग़लत किया उन्होने " अंजलि ने पूछा," कोई युवा लड़का अपनी इच्छा से अपना जीवन गुजारना चाहता है, अपनी इच्छा से अपना कॅरियर चुनता है तो इसमे ग़लत क्या है "
विजय को चुप रह जाना पड़ा क्योंकि अंजलि ग़लत नही कह रही थी, वो कहती चली गयी," बस, इसी किस्म की बातो का लाभ उठाकर संदीप पापा के दिल मे जहर भरते थे "
" हम ने सुना है कि आप संयुक्त परिवार मे रहना ही नही चाहती थी, अपने सास-ससुर, जेठ के प्रति आपके दिल मे कोई सम्मान नही था इसलिए सबका अपमान करती रहती थी, यहा तक की अपनी सास का भी अपमान किया और हालात ऐसे बना दिए की आपके ससुर आपको और अशोक को घर से निकाल दे "
" संदीप ने ही कहा होगा, और किससे सुना होगा आपने, आपसे भी उन्होने वही बाते कही है जिन्हे पापा से कहकर उनके दिल मे मेरे और अशोक के प्रति जहर भरते थे, मेरा दिल ही जानता है कि मैं संयुक्त परिवार मे रहने की कितनी ख्वाइश्मन्द थी, लेकिन ऐसा हो ना सका क्योंकि संदीप ऐसा नही चाहते थे "
" क्यो नही चाहते थे "
" इस रहस्य से पापा के उठवाने वाले दिन परदा उठा, तब, जब उनकी वसीयत खोली गयी, छोटे बेटे के नाम फूटी कौड़ी नही की गयी थी, ये था, इनके और मेरे प्रति पापा के दिल मे जहर भरने का कारण, इतना जहर भर दिया गया था कि पापा की अरबो की जायदाद के अकेले मालिक बन बैठे.
अशोक भड़क गये.
इतने ज़्यादा की मेरे समझाने पर भी ना माने, मैंने काफ़ी कहा, हमे किसी की जायदाद का करना ही क्या है, आपका कमाया हुआ आज क्या नही है हमारे पास, एक ही बेटी है, अरबो का क्या करना है मगर वे नही माने, जायदाद मे हिस्सेदारी का मुक़दमा कर दिया लेकिन संदीप की पेशब्ंदी इतनी पुख़्ता थी कि ये उसे वकील होने के बावजूद ना तोड़ सके और मुक़दमा हार गये "
विजय समझ सकता था कि एक ही स्टोरी को दोनो पक्षो द्वारा पेश करने मे इतना फ़र्क तो स्वाभाविक है.
हर पक्ष बात को अपने तरीके से कहता है.
पर एक बात महसूस की थी उसने कि अंजलि ने एक बार भी संदीप के लिए अपशब्द का प्रयोग नही किया था.
तू-तडाक की भाषा तक नही.
उसे एक बार भी उसे नही बल्कि उन्हे ही कहा था.
इसलिए उसे लगा, इस स्टोरी का अंजलि वाला पक्ष सच के ज़्यादा करीब हो सकता है.
काफ़ी देर की चुप्पी के बाद विजय ने कहा," आपको पूरा यकीन है कि बिजलानी साहब की हत्या संदीप बिजलानी ने नही की हो सकती "
" संदीप पर सुई की नोक के बराबर भी यकीन नही है लेकिन फिर वही कहूँगी, अब उन्हे इनकी हत्या करने की क्या ज़रूरत थी "
" बहरहाल, अशोक वकील थे, हो सकता है कि वे जायदाद मे अपना हिस्सा लेने के लिए किसी और जुगत मे लगे हो, इस बारे मे संदीप को भनक लग गयी हो, अशोक की इस बार की तैयारी इतनी पुख़्ता हो कि संदीप को लगा हो कि इस पैंतरे पर वो क़ानूनी लड़ाई मे हार जाएगा इसलिए उसने ऐसी नौबत आने से पहले जड़ को ही ख़तम करने का निस्चय कर लिया हो "
अंजलि एकदम से कुछ ना कह सकी.
विजय की तरफ देखती रह गयी वो.
फिर बोली," मेरे ख़याल से आप कल्पनाएं कर रहे है "
" बेशक, है तो अभी ये कल्पना ही "
" मुझे नही लगता कि ये सच हो सकता है "
" वजह "
" बिजलानी साहब ऐसी कोई तैयारी नही कर रहे थे "
" आपको क्या पता "
" कह चुकी हूँ, वे मुझसे कुछ नही छुपाते थे और..... "
" और "
" मैं जानती हूँ कि वे ये मानते थे कि अब कुछ नही हो सकता, वे अक्सर कहते थे, कम्बख़्त ने ऐसी पेशब्ंदी की है की लड़ने का कोई रास्ता ही नही छोड़ा है "
" हो सकता है कि कोई रास्ता सूझ गया हो "
" सूझता तो मुझे ज़रूर बताते "
" मुमकिन है की ये सोचकर ना बताया हो कि आप फिर समझाने की कोशिश करेंगी, इस झंझट से दूर रहने के लिए कहेंगी "
" आप इस बात पर इतना ज़ोर क्यू डाल रहे है "
" ऑफीस की हालत के कारण "
" मतलब "
" ये कोशिश जायदाद हासिल करने के लिए बिजलानी साहब द्वारा तैयार किए गये उन कागज़ातो को हासिल करने के लिए की गयी हो सकती है, जिनकी वजह से उनका कत्ल किया गया "
अंजलि के दिमाग़ को झटका लगा.
इस बार तो वो विजय की तरफ देखती ही रह गयी.
कुछ बोल ना सकी.
जबकि विजय ने आगे कहा," क्या यहाँ की हालत ये नही बता रही कि किसी ने ऐसे ही किसी डॉक्युमेंट को तलाशने की कोशिश की है "
" है तो ये अब भी कल्पना ही लेकिन.... "
" लेकिन "
" आपके इस तर्क के बाद लगता है कि..... हो सकता है "
इस बार रिप्पी बोली," ऐसा होता तो संदीप ने कागजात हासिल करने की कोशिश पापा के मर्डर से पहले या मर्डर के वक़्त की होती, बाद मे क्यू करता "
विजय ने उसकी तरफ देखा, कहा," तुम अपने ताउजी को उनका नाम लेकर पुकारती हो "
" उसका तो नाम लेने मे भी मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी जीभ पर किसी ने अंगारे रख दिए हो " रिप्पी के चेहरे पर असीम घृणा के भाव थे," वो मेरा ताउ कैसे हो सकता है जिसने मेरे मम्मी-पापा पर इतने ज़ुल्म किए हो "
" ओके " विजय ने कहा," तुम्हारे सवाल का जवाब ये है कि हो सकता है कि इस बात का ख़याल ही उसे बाद मे आया हो कि मर्डर के साथ-साथ वे कागज भी गायब कर देने चाहिए थे, मुमकिन है कि वे तुम्हारे हाथ लग जाए और तुम उनके बेस पर किसी और वकील के द्वारा मुक़दमा ठोक दो "
" कर तो वो कुछ भी सकता है लेकिन.... "
" लेकिन "
" मुझे तो अब भी यही लगता है कि पापा ने आत्महत्या ही की है और उसकी ज़िम्मेदार मैं हूँ "
" अच्छा एक बात बताइए " एकाएक विजय पुनः अंजलि से मुखातिब हुआ," अगर संदीप आए और आपसे ये कहे कि आपके और रिप्पी के सिर पर भी अब अशोक का साया नही रहा और उसका अपना कोई परिवार नही है, ऐसे हालात मे क्यू ना हम साथ रहे, रिप्पी को अभिभावक मिल जाएगा और उसे परिवार, तो क्या आप इस ऑफर को कबूल करेंगी "
" नही " रिप्पी के दाँत भिन्च गये थे.
विजय ने अंजलि से कहा," हम ने आपसे पूछा है "
" आपके द्वारा की गयी ये एक ऐसी कलपना है जो कभी भी, किसी भी हालत मे साकार नही हो सकती "
विजय ने उसकी आँखो मे आँखे डालकर पूछा था," वो आ नही सकता या आ भी गया तो आप कबूल नही करेंगी "
" वो आएगा ही नही "
" वजह "
" उनकी मौत वाले दिन आया था, रिप्पी ने इतना अपमानित करके भगा दिया कि अब कभी नही आएगा "
" मान लो आ जाए "
" ऐसी बात कैसे मान लूँ जो हो ही नही सकती "
" हो सकती है, उसने ये बात हम से कही है "
अंजलि बुरी तरह चौंकी," आपसे कही है "
" हाँ "
" ये कि वो हमे अपने साथ रखना चाहता है "
" हां "
" हो ही नही सकता "
" हम ने बताया ना, हो चुका है, उसने हम से कहा है, अब तो केवल हम आपके विचार जानना चाहते है "
" नही "
" क्या नही "
" हम किसी हालत मे साथ नही रहेंगे "
" वक़्त बड़े से बड़े जख्म को भर देता है "
" उनके दिए हुए जख्म ऐसे नही है जो भर जाए.... और क्यो रहे, ज़रूरत क्या पड़ी है हमे, हमे क्या कमी है "
" बात आर्थिक सुरक्षा की नही, सामाजिक सुरक्षा की है "
" हमारी सामाजिक सुरक्षा को ही क्या ख़तरा है, कुछ दिनो मे रिप्पी की पढ़ाई पूरी हो जाएगी और ये उनकी कुर्सी संभाल लेगी "
" मतलब आप संदीप के ऑफर को कबूल नही करेंगी "
" किसी कीमत पर नही "
विजय ने ठंडी साँस ली, मुँह से निकला," ओके "
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11-23-2020, 02:07 PM,
#36
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
39

" गुरु " एकाएक विकास बोला," अब मैं कुछ बोलूं "
" अभी तक ही हम ने क्या तुम्हे रोका हुआ था प्यारे "
" इस बार आप एक सिरे से दूसरे सिरे तक धोखा खा रहे है "
" वो कैसे "
" कातिल के बारे मे तो अभी मैं कुछ नही कह सकता लेकिन यहाँ आने वाला शख्स संदीप बिजलानी नही है "
" और कौन है "
विजय के सवाल का जवाब देने की बजाय विकास अंजलि से मुखातिब होता हुआ बोला," क्या आप किसी ऐसे लंबे और तंदुरुस्त आदमी को जानती है जिसके बाल और दाढ़ी का रंग लाल हो "
" जियो दिलजले " विजय कह उठा," जियो, एक बार फिर तुमने शरलॉक होम्ज़ बनकर दिखा दिया "
" हमारी समझ मे बिल्कुल नही आ रहा है कि आप लोग आपस मे क्या बाते कर रहे है " रिप्पी ने कहा था.
" उसे छोड़ो, ये बताओ कि क्या आपमे से कोई उस हुलिए के आदमी को जानता है जो दिलजले ने बताया "
" दिलजला कौन, इसका नाम तो विकास है ना "
" प्यार से हम इसे दिलजला ही कहते है, जैसे चतुरसेन को चींटू कहा जाता है, मंगलसेन को मींटू, पर महत्त्वपूर्ण ये नही है, ये है कि आपको इसके सवाल का जवाब देना चाहिए "
" हम ने कभी कोई ऐसा आदमी नही देखा " अंजलि ने कहा.
रिप्पी विकास से बोली," आपको ऐसा कैसे लगा की ये सब इस हुलिए वाले आदमी ने किया है "
" मॅजिक, गुड़िया " विजय ने उंगलिया नचाई थी," मॅजिक, हम दोनो जासूस नही बल्कि इस देश के बहुत बड़े जादूगर है "
वे उनकी तरफ देखती रह गयी.
" हमे दुख है कि फिलहाल आप हमारे किसी काम नही आ रही है " विजय बोला," कम से कम ये तो बता दीजिए कि ये घटना कब घटी यानी की लाल दाढ़ी वाला कब आया "
" रात के किसी समय "
" किस समय "
" नही बता सकते "
" क्यो नही बता सकते "
" रात को तो हमे कुछ पता ही नही लगा "
" कब पता लगा "
" जब सफाई करने वाली आई, ऑफीस खोला तो चीख पड़ी, अंदर नही घुसी बल्कि वापिस दौड़ती हुई लॉबी की तरफ आई, हम उसके चीखने के कारण चौंक भी गयी थी और ये सोचकर डर भी गयी थी कि अब क्या हो गया, जब पूछा कि क्या हुआ है, वो इस तरह चीख क्यो रही है जैसे भूत देख लिया हो, तब उसने अटकती हुई आवाज़ मे बताया कि ऑफीस मे कोई चोर घुसा है, हम दौड़कर आई तो ये हाल देखा, तुरंत पोलीस को फोन किया "
" यानी आप अंदर नही घुसी "
" आपके आने से पहले नही "
" तो फिर ये कैसे कह सकती है कि आपको नही पता कि क्या चोरी हुआ है, जब जाँच-पड़ताल करेंगी, ये देखेंगी कि कहाँ क्या रखा हुआ था, तभी तो जानेगी कि क्या गायब है "
" हमारा यहाँ आना ना के बराबर होता था क्योंकि ये ऑफीस है और ऑफीस मे हमारा कोई काम नही था "
" ये तो जानती होंगी कि कहाँ क्या रखा था "
" नही जानती, क्योंकि यहा ऑफीस से कनेक्टेड चीज़ें ही रखी होती थी, घर से कनेक्टेड नही "
" कोई कीमती चीज़ "
" वकील के ऑफीस मे किसी कीमती चीज़ का क्या काम "
" बात तो दुरुस्त है, किसी वकील के ऑफीस मे कोई ऐसी चीज़ नही होती जो समान रूप से सबके लिए कीमती हो लेकिन किसी विशेष आदमी के लिए कोई ऐसी विसेश चीज़ हो सकती है जो उसके लिए उसकी जान से भी ज़्यादा कीमती हो "
" ऐसी क्या चीज़ हो सकती है "
" किसी केस विसेश की ऐसी फाइल जिसमे किसी की जान अटकी हो, या कोई ऐसा डॉक्युमेंट जिसे कोई आदमी विसेश दुनिया के सामने ना आने देना चाहता हो, जैसे, अपनी जायदाद हासिल करने के लिए बिजलानी साहब द्वारा तैयार किए गये वैसे कागजात जिनका ज़िक्र हम पहले ही कर चुके है "
" ऐसी चीज़ो के बारे मे तो अंकिता, उत्सव और दीपाली ही बता सकते है, क्योंकि वही उनके साथ काम करते थे "
" बुला लीजिए उन्हे "
" जी "
" फोन करके बुला लीजिए, तब तक हम यही है, वैसे भी अभी तो फिंगरप्रिंट्स डिपार्टमेंट के लोगो को भी आना है, लाल दाढ़ी वाले के उंगलियो के निशान भी तो चाहिए हमे "

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खिड़की के माध्यम से ही विजय-विकास लॉन मे भी घूम आए.
लॉन मे एक जगह की घास खुदी हुई थी.
वहाँ भी जूतो के निशान मिले और वे ये भी समझ गये कि चोर के जूतो के तलो मे वो मिट्टी वहाँ से लगी थी जिसे वो अपने साथ ऑफीस मे ले गया.
बाकी सब जगह घास थी और उनपर जूतो के निशान मिलने का कोई सवाल ही नही था.
फिर भी, वे अनुमान से पीछा करते हुवे कोठी की चारदीवारी के उस तरफ पहुच गये जहाँ से चोर कोठी मे दाखिल हुआ था.
वो कोठी की साइड रोड वाला हिसा था.
विकास ने कहा," अंधेरे मे उसे पता नही लगा होगा गुरु कि लॉन के उस हिस्से की घास खुदी हुई है और ना ही ये पता लगा होगा कि उसने दो स्टेप उस हिस्से मे लिए है "
" बिल्कुल ठीक कह रहे हो प्यारे " विजय बोला," पता लग जाता तो मिट्टी को ऑफीस तक नही ले जाता बल्कि जूतो के तलो को घास पर सॉफ करने के बाद आगे बढ़ता "
विकास ने वो सवाल किया जो बहुत देर से जेहन मे कुलबुला रहा था," आपको गुप्त रास्ते के बारे मे कैसे पता लगा "
" मोंटो ने बताया "
विकास चौंका," मोंटो ने "
" कल हम ने फोन पर मोंटो से कहा था कि तुम्हे ये पता लगाना है कि बिजलानी के बेडरूम मे कोई गुप्त रास्ता है या नही, आज सुबह उसने रिपोर्ट दी थी कि बेडरूम मे बिच्छे बेड के नीचे से ऑफीस मे खुलने वाला एक रास्ता है, वो रिमोट से खुलता है जो बेड की दराज मे रखा है, अगर नीचे से खोलना हो तो बिजलानी की मेज की दाई दराज मे एक दूसरा रिमोट है "
" आपने मोंटो को ये काम क्यो सौंपा था "
" हमारी मर्ज़ी "
" मर्ज़ी का कोई कारण तो होगा "
" शोध करवा लो प्यारे, मर्ज़ी का कोई कारण नही होता "
" मैं नही मान सकता " विकास कहता चला गया," आपको ख्वाब तो चमका नही होगा कि बिजलानी के कमरे मे गुप्त रास्ता हो सकता है, मोंटो को ये काम सौंपने से ही जाहिर है कि आपको किसी वजह से डाउट हो गया था, मैं उसी के बारे मे जानना चाहता हूँ, आपको किस वजह से ये डाउट हुआ कि बिजलानी के बेडरूम मे गुप्त रास्ता हो सकता है "
" ख्वाब ही चमका था हमे "
विकास ने उसे घूरा," यानी कि नही बताओगे "
" तुम्हारे घूर्ने पर हमे एक झकझकी याद आ रही है "
विकास को लगा अब वे झकझकी सुनाने लगेंगे, उससे बचने के लिए सवाल किया," अंकिता के प्रति बिजलानी की बदली हुई नीयत के बारे मे कैसे पता लगा "
विजय ने आशा द्वारा किए गये काम के बारे मे बता दिया.
" ये काम आशा आंटी को आपने इसलिए सौंपा होगा क्योंकि उनके संबंधो पर तो आपको पहले से ही शक था "
" समझदार हो दिलजले " विजय बोला," समझदार ना होते तो ऑफीस मे मिले मिट्टी के फुटस्टेप्स को देखते ही ये ना ताड़ लेते कि वे लाल बाल और लाल ही दाढ़ी वाले के है "
" जूता तो वो नही था गुरु जिसका निशान चीकू के खून मे बना था लेकिन उसी का नंबर था, मेरे लिए इतना काफ़ी था "
" ये लाल दाढ़ी वाला अचानक ज़रूरत से कुछ ज़्यादा सक्रिय हो गया है दिलजले, क्या वजह समझते हो इसकी "
" यही कि हमारी इन्वेस्टिगेशन सही दिशा मे चल रही है, उसी कारण उस पर बौखलाहट सवार हो गयी है और अब वो हमारे रास्ते रोकना चाहता है, उसके द्वारा ऐन समय पर चीकू की हत्या इस बात का सबूत है कि अगर हम चीकू से अपने कुछ सवालो के जवाब पा लेते तो शायद अपराधी के और करीब पहुँच सकते थे, इसलिए उसे इतना बड़ा रिस्क लेकर उसका मर्डर करना पड़ा "
" और बिजलानी के ऑफीस से कोई ऐसी चीज़ गायब की जो हमे उस तक पहुचा सकती थी "
" 100 पर्सेंट "
" क्या चीज़ हो सकती है वो "
" इस बारे मे अभी कोई अनुमान नही लगा पा रहा हूँ लेकिन ये तो नज़र आने लगा ही है कि कान्हा और मीना के हत्यारे सरकार दंपति नही है, गहरी साजिश के तहत उन्हे ट्रॅप किया गया है "
" ऐसा कैसे नज़र आने लगा है तुम्हे "
" ऐसा ना होता तो कौन है ये लाल दाढ़ी वाला, क्यू उसने चीकू को 10 लाख रुपये देकर चंदू की भावना का लाभ उठाते हुवे सरकार दंपति की हत्या की साजिश रची, उसके पेट मे इतना दर्द क्यो हो रहा है कि हमारा रास्ता रोकने के लिए चीकू का मर्डर करने जैसा रिस्क लिया, क्या गायब किया है ऑफीस से "
" तुम तो वाकाई शरलॉक होम्ज़ बनते जा रहे हो प्यारे "
विकास चुप रह गया.

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जब अंकिता, उत्सव और दीपाली पहुचे उस वक़्त फिंगरप्रिंट्स डिपार्टमेंट के लोग अपना काम कर रहे थे इसलिए उन्हे ड्रॉइग्रूम मे ही बैठा लिया गया.
ये सुनकर वे भी हैरान हो गये कि रात किसी समय किसी ने ऑफीस की जमकर तलाशी ली है.
विजय ने महसूस किया कि अंकिता उदास थी, उसका चेहरा उतरा हुआ था और वो अंजलि और रिप्पी से आँख नही मिला रही थी जबकि उत्सव और दीपाली केवल चुप थे.
विजय ने उनसे पूछा," क्या लगता है तुम्हे, क्या तुम तीनो से कोई ये गेस कर सकता है कि किसको किस चीज़ की तलाश हो सकती है "
तीनो एक-दूसरे की तरफ देखने लगे.
फिर सबका नेतृत्व करती दीपाली बोली," हम इस बारे मे क्या कह सकते है "
" बिजलानी साहब किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ तो मुक़दमा नही लड़ रहे थे जो क्रिमिनल किस्म का हो "
" जिनके भी खिलाफ मुक़दमा लड़ा जाता है उनमे से ज़्यादातर क्रिमिनल ही होते है लेकिन..... "
" लेकिन "
" ऐसा कोई शख्स ऐसा क्यो करेगा "
" मुमकिन है उसने अपने केस से संबंधित फाइल चुराई हो "
" उससे उसे क्या फ़ायदा होगा " उत्सव ने कहा," वैसी फाइल तो कोर्ट मे भी होगी और उसके अपने वकील के पास भी "
" तुम तीनो को मालूम होगा कि बिजलानी साहब के भाई यानी संदीप बिजलानी ने पिता की पूरी जायदाद हड़प ली थी, बिजलानी साहब ने उस पर मुक़दमा किया था मगर हार गये थे "
अंकिता ने कहा," मालूम है "
" उन्होने दूसरा प्रयास नही किया "
" नही "
" क्यो "
पुनः अंकिता ने ही कहा," उनका मानना था, संदीप बिजलानी ने कोई रास्ता नही छोड़ा है "
" यानी क़ानूनी रूप से वे पूरी तरह हार मान चुके थे "
" हां "
अंजलि बोली," मैंने पहले ही कहा था कि वे मुझसे कुछ नही छुपाते थे, ऐसा करने के बारे मे सोचते भी तो पहले मुझे बताते "
विजय चुप रह गया.
जब फिंगरप्रिंट्स डिपार्टमेंट का काम ख़तम हो गया तो विजय के निर्देश पर अंकिता, दीपाली और उत्सव ने ऑफीस मे जाकर ये जानने कि चेष्टा की कि वहाँ से क्या चीज़ गायब है.
भरपूर छानबीन के बावजूद वे कुछ ना बता सके.
अंततः विजय, विकास और धनुष्टानकार वहाँ से चले गये.

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गाड़ी मे बैठते ही विजय ने इनस्पेक्टर राघवन को फोन लगाया और तुरंत राजन सरकार के घर पहुचने के लिए कहा.
विजय ने संबंध-विच्छेद किया ही था कि विकास ने पूछा," क्या अब हमे राजन अंकल के घर चलना है "
" समझदार को इशारा काफ़ी है "
" वजह "
" वहाँ पहुचने पर देखना कि हम क्या धमा-चौकड़ी मचाते है " इतना कहने के बाद वो खर्राटे लेने लगा था.
फ्लॅट पर पहुचते ही विजय ने राजन सरकार से कहा," कुछ देर के लिए मसेज. चंदानी को बुला लीजिए "
" क्यो " उसने पूछा.
" धमा-चौकड़ी मचानी है "
" धमा-चौकड़ी क्या "
" सारे शब्दो का अर्थ सब लोगो के जानने के लिए नही होता " विजय कहता चला गया," जो कहा जा रहा है वो कीजिए, तब तक हम सरकारनी से बात करते है "
विकास को लगा, निस्चय ही विजय गुरु के दिमाग़ मे कुछ चल रहा है, तभी तो उन्होने राघवन को यहाँ पहुचने के लिए कहा है और अब चंदानी को बुलाया है.
विजय ने इंदु सरकार से कहा," सरकारनी जी, हमे आपसे कुछ प्राइवेट लिमिटेड बातें करनी है, क्या आप कुछ देर के लिए हमारे साथ अंदर वाले कमरे मे बंद होंगी "
इंदु ने सवालिया नज़रो से राजन की तरफ देखा.
राजन ने कहा," सबकुछ बता ही चुका हूँ, विजय ना होता तो पता नही हम बचते भी या नही, जो ये पूछे, सच-सच बताओ "
वे बेडरूम मे पहुच गये.
विजय ने 4-5 जून की रात और 5 जून की सुबह की घटनाओ के बारे मे सवाल किए, मकसद ये जानना था कि उनके और मिस्टर. सरकार के बयानो मे फ़र्क तो नही है.
विजय ने ऐसा कोई फ़र्क नही पाया जिससे उसके कान खड़े हो सकते, तब, विजय ने पूछा," बिल्कुल सच बताईएगा, अपने पति और मिसेज़. चंदानी के संबंधो के बारे मे आप क्या सोचती है "
" बिल्कुल झूठ है " इंदु ने दृढ़तापूर्वक कहा," इनस्पेक्टर राघवन की बनाई हुई बात है जिसे मीडीया ले उड़ा और बेवजह उनकी इज़्ज़त उछाली गयी, हमारे साथ-साथ बेचारे वे भी पिस गये "
" चलिए, उस बात को छोड़िए " विजय ने कहा," किडनॅप के बारे मे बताइए, क्या हुआ था "
उसने अपने बेहोश होने तक की बात बता दी.
" उसके बाद " विजय ने पूछा," यानी जब होश आया तो आपने खुद को कहाँ किस हाल मे पाया "
" मैं एक खंडहर मे थी, उसी मे, जिसमे से आप लोग लेकर आए, उसके एक कमरे की छत बरकरार थी, मैंने जब आँखे खोली तो एक कुर्सी के साथ बँधी थी उसी कमरे मे, तीनो मेरे सामने थे "
" तीनो,.... वे तो चार थे "
" चौथा उस वक़्त वहाँ नही था "
" कहाँ था "
" मुझे नही मालूम "
" ओके, चंदू था उनमे "
" हां "
" आपने कुछ पूछा उससे "
" हां, ये पूछा था कि उसने ऐसा क्यो किया, उस पर तो जैसे खून सवार था, बोला, तूने और तेरे पति ने मेरी माँ की हत्या की है, मैं तुम दोनो मे से किसी को नही छोड़ूँगा.
मैंने समझाने की बहुत कोशिश की कि हम ने उसकी माँ को नही मारा, ये भी कहा कि हम भला अपने ही बेटे को कैसे मार सकते है, मगर वो कुछ सुनने को तैयार ही नही था "
" सरकार साहब से वो तुम्हारे सामने ही बात करता था "
" हां, लेकिन हर बार सिम बदल लेता था और मोबाइल पर रुमाल भी डाले रहता था ताकि आवाज़ पहचानी ना जा सके "
" अगर वो चाहता था कि सरकार साहब उसे पहचान ना सके तो खुद बात क्यो करता था, कोई और कर लेता "
" बंटी ने उससे कहा था कि मैं बात कर लेता हू, लेकिन उस पर तो जुनून सवार था, बोला, मैं ही बात करूँगा "
" यानी आपको उसके साथियो के नाम भी पता लग गये थे "
" हां "
" कैसे "
" वे एक-दूसरे को नाम से ही पुकार रहे थे "
" क्या चीकू ने फोन पर किसी और से बात की थी "
" नही, लेकिन.... "
" क्या बताना चाहती है "
" जब मुझे होश आया तब वही नही था, केवल चंदू, बॉब्बी और बंटी थे, वो करीब दो घंटे बाद आया, उसके आते ही बंटी ने पूछा था, छोड़ आया, उसने कहा, हां, और 5 दिन की छुट्टी भी ले आया हूँ, अब इस काम से निपटकर ही काम पर लौटूँगा "
हालाँकि विजय समझ चुका था कि उस वक़्त उसने संदीप की गाड़ी छोड़कर आने की बात कही होगी लेकिन फिर भी पूछा," वो क्या छोड़कर आने की बात कर रहा था "
" ये मैं नही जान सकी लेकिन बॉब्बी ने ये ज़रूर कहा था कि 5 दिन की छुट्टी क्यो ली है, क्या इस काम मे 5 दिन लगेंगे, उसने कहा, ऐसे कामों मे टाइम का कुछ पता नही लगता, वो उन सबमे सबसे ज़्यादा चालाक और ख़तरनाक था और वही सबको लीड कर रहा था, बाकी सब वही करते जो वो कहता "
विजय को लगा, इंदु से कोई नयी या उपयोगी जानकारी निकालने की उम्मीद नही है इसलिए उसे लेकर ड्रॉयिंगरूम मे आ गया.

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राघवन ही नही, चंदानी दंपति भी आ चुके थे.
चंदानी का पूरा नाम हेमंत चंदानी था, वो एक गोरा-चिटा, लंबे कद का तंदुरुस्त अधेड़ था, परिचय होने पर विजय से हाथ मिलाते हुए उसने कहा," आपने केवल कंचन को बुलाया था, मैं भी साथ आ गया, कहो तो बैठू, कहो तो चला जाउ "
" अरे नही-नही जनाब, बैठिए, हम तो खुद चाहते थे कि आप भी इस शिखर सम्मेलन मे शामिल हो "
" चलिए, बैठ जाते है " वो सोफे पर बैठ गया.
विजय ने बात शुरू की," ये मीटिंग हम ने बहुत बड़े विरोधाभास को दूर करने के लिए बुलाई है और विरोधाभास ये है कि आप चारो के मुताबिक मिस्टर. सरकार और मिसेज़. चंदानी को लेकर जो बात मीडीया मे फैली वो झूठी थी "
" हम आज भी कहेंगे, उसमे कोई सच्चाई नही थी " ये बात राजन ने राघवन की तरफ उंगली उठाकर कही थी," उस अफवाह का ज़िम्मेदार ये है, ये इनस्पेक्टर जो तुम्हारी बगल मे बैठा है, इसने हमे आज तक नही बताया कि उस अफवाह का आधार क्या था "
" हमे बता दिया है "
" तो बताइए, क्या आधार था उसके पीछे "
" कान्हा के दो दोस्त "
" कौन से दोस्त "
" इसका कहना ये है कि ये बात इसे शुभम और संचित ने बताई "
" झूठ बोलता है ये " एकसाथ चारो ने पुरजोर विरोध किया.
" क्यो राघवन मियाँ "
" मैं आपको बता चुका हूँ सर, अब वे दोनो और उनके घरवाले इस बात को आक्सेप्ट नही करेंगे "
" उस बात को छोड़ो, ये बताओ, उन्होने वो कहा था या नही "
" कहा था "
" क्या कहा था "
" आपको बता चुका हू "
" दोहराओ "
उसने वही सब कह दिया जो विजय को बताया था.
" एकदम झूठी कहानी बना रहा है ये " बुरी तरह उत्तेजित होकर ये बात हेमंत चंदानी ने कही थी," हमारे जीवन मे कभी कोई ऐसी रात आई ही नही जब मैंने और इंदु ने इतनी पी ली हो कि हम बेसूध हो गये हो "
कंचन बोली," इंदु और हेमंत की तो बात ही छोड़ो, हम चारो मे से कभी भी कोई इतना बेसूध नही हुआ, कारण ये है कि हममे से किसी ने कभी दो पेग से ज़्यादा पी ही नही, दो पेग पीना और डिन्नर करना हमारा रुटीन था "
विजय के हलक से गुर्राहट-सी निकली थी," झूठ राघवन नही, आप चारों बोल रहे है "
" क्या मतलब " उसकी गुर्राहट ने चारो को हकबका दिया.
" हम खुद शुभम से बात कर चुके है "
चारो की सिट्टी-पिटी गुम.
काटो तो खून नही.
चारो उसकी तरफ देखते रह गये.
जैसे पत्थर की शिलाओ मे चेंज हो गये हो.
पलके तक नही झपक रही थी उनकी.
चौंकते हुवे राघवन ने विजय से कहा था," क्या आपके सामने उसने वो सब कबूल कर लिया "
" तुम अभी अपनी बोलती पर ढक्कन लगाए रखो प्यारे, इस वक़्त हम इनसे बात कर रहे है "
राघवन चुप रह गया.
राजन सरकार ने कहा," हम भी उससे बात करना चाहेंगे "
" क्या आप अब ये कहना चाहते है कि राघवन की तरह अब हम भी किसी दुर्भावना से ग्रस्त होकर झूठ बोल रहे है "
" नही विजय, हम ये नही कहना चाहते "
" मतलब तो यही हुआ आपकी बात का "
" नही, ये मतलब नही है "
" और क्या मतलब है "
" हम ये जानना चाहते है कि शुभम झूठ क्यो बोल रहा है "
" आप हर उस शख्स को झूठा कहना शुरू कर देते है जो आपकी पोल खोलता है, पहले राघवन को कहा, फिर मुझे कहने की कोशिश की और अब शुभम को कह रहे है "
" ऐसा कुछ भी नही है विजय, बात को समझने की....... "
" बात समझने की कोशिश आपको करनी है मिस्टर. सरकार " विजय उसकी बात काटकर बहुत ही कड़े लहजे मे कहता चला गया," कुछ चीज़ें ऐसी सामने आई है जिनसे हमे ये आभास हो रहा है कि आपको और मिसेज़. इंदु को फँसाया गया है, आपने कान्हा और मीना की हत्या नही की लेकिन इससे पहले कि हम इस बात को सिद्ध करे, झूठ बोलकर आप खुद ही बाधक बन रहे है, मेरे दिमाग़ को अटकाए हुए है आप, हो सकता है कि आप दोनो के बीच रेग्युलर संबंध ना हो, सिर्फ़ उसी रात, नशे की ज़्यादती के कारण हो गया हो और बाद मे आप दोनो पछताए भी हो, हम समझ सकते है कि नशे की झोंक मे ऐसा हो जाता है, दुर्भाग्य ये हुआ कि वो सब होते कान्हा ने देख लिया, हम आपको यकीन दिलाते है कि बात इस कमरे से बाहर नही जाएगी, उतने ही लोगो मे रहेगी जितने इस वक़्त यहाँ है लेकिन प्लीज़.... गुस्सा मत दिलवाइए, सच बोलिए, वो सच जो हमे पहले से ही मालूम है "
इस सबके बावजूद राजन ने कहा," हम सच ही बोल रहे है "
विजय अपने बाल नोचने को तैयार हो गया, बोला," आप समझ क्यो नही रहे है सरकार साहब कि शुभम की उम्र के बच्चे झूठ नही बोला करते, ऐसा झूठ तो बिल्कुल नही जिसमे उन्हे कोई फ़ायदा ना हो, शुभम और संचित को ये झूठ बोलकर भला क्या मिलेगा "
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11-23-2020, 02:08 PM,
#37
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
40

बहुत ही तनावपूर्ण सन्नाटा छा गया वहाँ.
ऐसा, कि जिसे तोड़ने की हिम्मत कोई नही कर पा रहा था, अंततः इंदु बोली," इजाज़त दो तो मैं कुछ कहूँ विजय "
" हम सिर्फ़ सच सुनना चाहते है "
" मेरे ख़याल से शुभम और संचित सच बोल रहे है "
" किस्सा ख़तम " विजय बोला.
राजन, कंचन और हेमंत ने बुरी तरह चौंक कर इंदु की तरफ देखा था, चेहरो पर ऐसे भाव थे जैसे कह रहे हो कि ये तुम क्या कह रही हो, इंदु ने आगे कहा," लेकिन इसके बावजूद ये बात एकदम झूठ है कि राजन और कंचन के बीच कोई संबंध है या उस रात वैसा कुछ हुआ था, जैसा शुभम और संचित ने बताया "
" दोहरी बात का क्या मतलब हुआ " विजय फिर भन्ना गया.
" विजय, मेरी बात थोड़ी शांति से सुनो "
" सुनाइये "
इंदु ने भूमिका बाँधी," ये तो मानोगे कि औलाद को उसकी माँ से ज़्यादा कोई नही जान सकता "
" क्या मतलब हुआ इस बात का "
" पहले हां या ना कहो, मैं ठीक कह रही हूँ या ग़लत "
" बात ठीक है "
" उस नाते बता रही हू, बचपन से ही कान्हा एक ऐसा लड़का था जिसमे कहानिया गढ़ने की प्रवृत्ति थी, वो ऐसी-ऐसी कहानिया गढ़कर सुना देता था जिन्हे सुनकर सुनने वालो को सहज ही उससे सहानुभूती हो जाती थी जबकि कहानी झूठी होती थी "
थोड़े चौंके हुवे लहजे मे विजय ने पूछा," क्या आप ये कहना चाहती है कि कान्हा ने शुभम और संचित से झूठ बोला था "
" अगर शुभम और संचित ये बात कह रहे है कि कान्हा ने उनसे ये सब कहा था तो मैं दावे के साथ कह सकती हू कि वो बात कान्हा ने उन्हे अपने मन से गढ़कर सुनाई थी "
" अब आप हदें पार कर रही है "
" ऐसा क्यो सोच रहे है आप "
विजय ने कहा," जब आप कान्हा को ही झूठा कहने लगी है तो और हम क्या कह सकते है "
" फ़र्क को नही समझ पा रहे हो विजय, मैं कान्हा को झूठा नही कह रही, ये बता रही हू कि उसकी प्रवृत्ति क्या थी "
" जब सारी आड ख़तम हो गयी तो आपने कान्हा की आड़ ले ली " विजय कहता चला गया," अब कान्हा तो यहाँ आकर ये बताने से रहा कि जो कुछ भी उसने शुभम और संचित से कहा वो सच था या उसकी बनाई हुई कहानी "
" आप उसकी क्लास टीचर से बात कर सकते है " इंदु अपनी बात से पीछे नही हटी," डॉक्टर रजनीश से बात कर सकते है "
" डॉक्टर रजनीश कौन हुआ "
" शहर के प्रसिद्ध पाइकॉलजिस्ट है, कान्हा जब स्कूल से लौटने पर अक्सर मुझसे ये कहने लगा कि आज बस मे उसे फलाना लड़के ने मारा, आज उसने अकेले ही 4 लड़को को चित्त कर दिया तो एक दिन मैं स्कूल पहुच गयी, उसकी क्लास टीचर से कहा कि बस मे रोज ये क्या होता है तो उसने कहा, क्या पिच्छले हफ्ते आप और आपके हज़्बेंड कान्हा को दो दिन की छुट्टी मे गोआ घुमाने ले गये थे, मैंने कहा, नही तो, तब उसने बताया कि पिच्छले हफ्ते कान्हा अपना होमवर्क पूरा करके नही आया था, मैंने कारण पूछा तो उसने यही बताया की गोआ जाने के कारण ऐसा नही कर सका था, मैं ये सुनकर हैरान रह गयी, क्लास टीचर ने कहा, कान्हा मे ये प्रवृत्ति है, कभी वो अपनी किसी ग़लती को छुपाने के लिए, कभी दूसरो की सहानुभूति पाने के लिए और कभी खुद को बहादुर साबित करने के लिए झूठी कहानियाँ गढ़कर सुना देता है, मैंने मालूम कर लिया है क्योंकि दूसरे बच्चो ने मुझसे शिकायत की थी, बस मे कभी वैसी घटनाए नही घटी जैसे उसने आपको बताई है, मेरे ख़याल से आप उसे किसी साइकॉलजिस्ट को दिखाइए, पहले भी काई बच्चो मे ऐसी प्रवृत्ति पाई जाती रही है, ये एक किस्म की बीमारी है जो टीवी बच्चो के दिमाग़ मे परोस रहा है, तब मैं डॉक्टर रजनीश से मिली, उसने क्लास टीचर की बात की पुष्टि की, कहा की आजकल बच्चो मे ये बीमारी आम बात हो गयी है "

विजय सोचने पर मजबूर हो गया क्योंकि ऐसे बच्चो की कयि कहानियाँ वो खुद भी अख़बारो मे पढ़ चुका था.
जहाँ मे उस बच्चे की स्टोरी उभरी जिसने सारे स्कूल मे ये बात फैला दी थी कि उसके पापा रोज उसकी मम्मी को बहुत मारते है क्योंकि पापा एक दूसरी औरत को चाहते है जबकि जाँच मे पता लगा कि एक सिरे से दूसरे सिरे तक वैसा कुछ भी नही था, ना उसके पापा उसकी मम्मी को मारते थे ना ही दूसरी औरत का अस्तित्व था, ये कहानी उसने एक सीरियल को देखकर गढ़ी थी, उस सबको याद करके विजय ने केवल इतना ही कहा," तो आप ये कहना चाहती है कि कान्हा ने वो सब बीमारी के तहत कह दिया होगा "
इंदु बोली," ये बात मैं इस आधार पर कह रही हूँ क्योंकि अच्छी तरह जानती हू कि मैंने किसी भी रात इतनी पी ही नही है कि बेसूध हो गयी होउ "
" और वो.... अपने संबंध मीना से बताने वाली बात " विजय ने कहा," वे संबंध तो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से भी साबित हो चुके है, मौत से पहले दोनो सेक्स कर रहे थे "
" उस संबंध मे मैं कुछ नही कह सकती, डॉक्टर रजनीश के मुताबिक ऐसे बच्चो के बारे मे ये पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि वे मनगढ़ंत कहानी सुना रहे है या सच बोल रहे है "
" लगता है, डॉक्टर रजनीश से मिलना पड़ेगा "
" मैं उनका अड्रेस दे दूँगी "
" कान्हा की क्लास टीचर का भी "
" ज़रूर "
" अब आपको इनस्पेक्टर राघवन को तो माफ़ कर ही देना चाहिए क्योंकि साबित हो चुका है, वो स्टोरी कम से कम इसने नही गढ़ी थी, जो कहा, शुभम और संचित ने कहा, और उनसे कान्हा ने, ये पता लगाना शेष रहा कि ये बात उसने सच कही थी या बीमारी के कारण गप्प मारने वाली आदत के तहत "
चारो चुप रहे.
विजय ने राघवन से कहा," अब हमे नगर निगम के उस ट्रक ड्राइवर का नाम-पता चाहिए राघवन प्यारे जिसे मीना की लाश सबसे पहले देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था "
" वो आपके जेहन मे कहाँ से आ गया "
" हमारे जेहन के ड्रॉयिंगरूम मे सबकुछ सज़ा रहता है प्यारे, मगर उसे बाहर तभी निकालते है जब ज़रूरत होती है "
" उसका अड्रेस मुझे मुँहज़ुबानी तो याद नही है, इस केस की फाइल मे दर्ज होगा "
" अपने किसी ऐसे चेले-चपाटे को फोन करो जो इस वक़्त थाने मे हो, उससे कहो फाइल मे देखकर उसका नाम-पता बताए "
राघवन ने अपना मोबाइल निकाला, थाने बात की और उसके बाद विजय को बताया," उसका नाम जगदीश चंडोला है "
" अड्रेस "
राघवन ने बता दिया.

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विजय-विकास जगदीश चंडोला के घर की तरफ निकले थे मगर रास्ते मे ही विजय के मोबाइल पर रघुनाथ का फोन आ गया, रिसीव करते हुवे विजय ने कहा," कहो प्यारे तुलाराशि, क्यो परेशान हो "
" मेरे मोबाइल पर उत्सव की माँ का फोन आया था "
" उत्सव " विजय चौंके बगैर ना रह सका.
" भूल गये, बिजलानी का असिस्टेंट "
" वो तो याद है प्यारे लेकिन क्यूँ " विजय ने पूछा," उसकी माँ का फोन तुम्हारे मोबाइल पर क्यो पधारा "
" रो रही थी, कह रही थी कि किसी लाल दाढ़ी वाले आदमी ने उनके घर मे घुसकर उसकी और उत्सव की बहुत पिटाई की है "
विजय और बुरी तरह चौंका," क्यो "
" ये उसे पता नही था लेकिन शायद उत्सव को पता है क्योंकि दाढ़ी वाले ने उसे दूसरे कमरे मे ले जाकर सवाल-जवाब किए थे "
" फोन तुम्हे ही क्यो किया गया "
" मैंने भी ये सवाल पूछा था, उसने बताया, उत्सव ने आप ही को फोन करने के लिए कहा है और ये भी कहा है कि मैं इस बारे मे मिस्टर. विजय और विकास को बता दूं "
" तुम्हारा नंबर कहाँ से मिला "
" फोन मेरे सरकारी नंबर पर आया था, वो रोज अख़बारो मे छपता है ताकि आम आदमी मुझसे सीधा संपर्क कर सके "
" और कोई जानकारी "
" अभी तो नही है, मैंने इलाक़े के इनस्पेक्टर को भेज दिया है "
" अड्रेस दो प्यारे, हम वहाँ पहुच रहे है "
" मैं भी पहुचु क्या "
" फिलहाल ज़रूरत नही है, अपने इनस्पेक्टर से ज़रूर कह देना कि हमे अपने तरीके से जाँच और पूछताछ करने दे " कहने के तुरंत बाद विजय ने संबंध-विच्छेद किया और विकास से बोला," जगदीश मिया को बाद मे भुगत लेंगे दिलजले, फ्फिलहाल यू-टर्न ले लो "
" क्या हुआ "
जिस वक़्त विजय उसे बता रहा था उस वक़्त उसके मोबाइल पर एसएमएस आने की टोन उभरी.
उसने देखा, रघुनाथ ने उत्सव का अड्रेस भेजा था.
विजय ने विकास को बताया.
" ये लाल बालों वाला तो अपनी सक्रियता मे ज़रूरत से भी ज़्यादा तेज़ी दिखा रहा है गुरु "
" लगता है, उसे बड़ी शिद्दत से किसी चीज़ की तलाश है "
" क्या चीज़ हो सकती है वो "
" फिलहाल ये तो नही कहा जा सकता मगर इतना तय है कि अगर वो चीज़ हमारे हाथ लग गयी तो हम उसकी दाढ़ी नोच लेंगे "
" मतलब "
" शायद उसे ऐसा ही लगता है इसलिए इतना पगलाया हुआ है और हम से पहले उस चीज़ तक पहुचना चाहता है "
विकास चुप रह गया.
उत्सव के घर पहुचने मे 30 मिनिट लगे.
वो आज़ाद रोड पर स्थित, 'चिरंजीवी' नामक बिल्डिंग मे थर्ड फ्लोर पर, थ्री बेडरूम फ्लॅट मे रहता था.
फ्लॅट के बाहर तीसरी मंज़िल पर रहने वाले लोगो की छोटी-सी भीड़ लगी हुई थी.
उनमे महिलाए ज़्यादा थी.
विजय समझ सकता था कि दोपहर के इस वक़्त जेंट्स अपने काम पर होंगे, पुरुषो मे ज़्यादातर रिटाइर किस्म के लोग थे या घारलू नौकर टाइप के.
फ्लॅट के गाते पे दो पोलीस वाले खड़े हुवे थे जो उस छोटी-सी भीड़ को अंदर घुसने से रोकने का काम कर रहे थे.
उन्होने विजय-विकास को भी रोका.
विकास ने पूछा," तुम्हारा इनस्पेक्टर कहाँ है "
" अंदर है " एक ने कहा.
" उनसे कहो, मिस्टर. विजय आए है "
" क्या मैं जान सकता हूँ आप.... "
" जो कहा गया है वो करो " विकास के लहजे मे ऐसी फटकार थी कि वो अपनी बात पूरी ना कर सका और तुरंत अंदर चला गया.
मुश्किल से आधे मिनिट बाद वापिस आकर बोला," साहब ने आपको अंदर बुलाया है "
विजय-विकास ने ड्रॉइग्रूम मे कदम रखते ही देखा, उत्सव और एक अधेड़ औरत ज़ख्मी थे.
समझा जा सकता था कि वो उत्सव की माँ है.
उत्सव कुछ ज़्यादा ही ज़ख्मी था.
जिस्म के काई हिस्सो से खून निकल रहा था.
जबड़े सहित मुँह पर जबरदस्त चोटे थी.
ऐसी हालत थी उसकी जैसे टॉर्चर किया गया हो जबकि माँ के मस्तक पर बस एक गुल्ला पड़ा हुआ था.
उस वक़्त तो वे संभले हुए थे लेकिन हालत बता रही थी कि दोनो खूब रोए है.
इनस्पेक्टर ने विजय-विकास का स्वागत पूरी गरम्जोशी से किया, करता भी क्यो नही, सुपेरिटेंडेंट साहब का फोन जो आ गया था.
" इन लोगो का कहना ये है सर की.... "
इनस्पेक्टर ने कुछ बताने की कोशिश की ही थी कि विजय ने उसकी बात काटकर सपाट लहजे मे कहा," हम आ गये है जनाब, आप फुटास की गोली ले सकते है "
" ज...जी " वो कुछ समझ ना पाया.
विकास ने कहा," हम देख लेंगे, आप थाने जाइए "
" क...क्या अब यहाँ पोलीस की ज़रूरत नही है "
" हम जो आ गये है " विजय ने कहा," पोलीस के ताउ जी "
ना इनस्पेक्टर की कुछ समझ मे आया, ना कुछ कहते बना, थोड़ा संभला तो बस इतना ही कह सका," हम चले जाएँगे तो भीड़ अंदर घुस आएगी, तब शायद आपको दिक्कत हो "
विकास समझ चुका था कि विजय कोई भी कार्यवाही उसकी मौजूदगी मे नही करना चाहता इसलिए इनस्पेक्टर से बोला," आप भी बाहर खड़े हो जाइए और किसी को अंदर ना आने देना "
असमंजस मे फँसा इनस्पेक्टर बाहर चला गया.
" हां तो तीज-त्योहार प्यारे " विजय ने उत्सव से कहा," कौन कबड्डी खेल गया तुम्हारे साथ "
" वो शायद वही था जिसका ज़िक्र आपने बिजलानी सर के ऑफीस मे किया था "
" कैसे कह सकते हो "
" वो लंबा और तांदुरुस्त था, बाल और दाढ़ी लाल थे "
" कैसे आया, तुम उस वक़्त क्या कर रहे थे, शुरू से बताओ "
" उत्सव तभी-तभी आया था, अपने कमरे मे था, मैं किचन मे " उत्सव की माँ बोली," बेल बजी, मैं सीधे स्वाभाव दरवाजा खोलने गयी, खोलते ही जैसे आअफ़त टूट पड़ी, कुछ समझ भी नही पाई थी कि उसका मजबूत हाथ मेरे मुँह पर आ जमा, मैंने चीखने की कोशिश की लेकिन आवाज़ मुँह से बाहर ना निकल सकी, मुझे लिए-लिए वो मुड़ा और दरवाजा वापिस बंद कर दिया "
" फिर "
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11-23-2020, 02:08 PM,
#38
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
41

" उस वक़्त तो मेरे होश ही उड़ गये जब उसने अपने दूसरे हाथ मे मौजूद रेवोल्वर मेरी कनपटी से सटा दी और बहुत ही ख़तरनाक स्वर मे गुर्राया, उत्सव कहाँ है.
मैं समझ गयी कि वो उत्सव को कोई नुकसान पहुचाने आया है इसलिए इशारे से कहा कि वो घर पर नही है.
वो फिर गुर्राया, झूठ बोलने की कोशिश मत कर, मुझे मालूम है कि वो कुछ ही देर पहले बिजलानी के यहाँ से आया है और इस वक़्त फ्लॅट मे ही है, बस ये बता, कौन से कमरे मे है.
मैंने फिर भी इनकार किया लेकिन तभी अपने कमरे मे मौजूद उत्सव ने मुझे माँ कहकर पुकारा.
मैं उसे सावधान करना चाहती थी लेकिन मुँह से 'गु-गु' की आवाज़ के अलावा कोई आवाज़ ना निकल सकी.
वो समझ चुका था कि उत्सव अपने कमरे मे है.
उसने बहुत ज़ोर से रेवोल्वर मेरे माथे पर मारा.
मेरे हलक से चीख निकली थी मगर उस चीख को उसके हाथ ने मेरे मुँह से बाहर नही निकलने दिया.
उस वक़्त मेरी आँखो के सामने रंग-बिरंगे तारे नाच रहे थे और मैं अपना होश खोती जा रही थी कि उत्सव मुझे पुकारता ड्रॉयिंगरूम मे आ गया, अपनी मिचमिचाती आँखो से मैं बस ये देख पाई कि वो उत्सव की तरफ रेवोल्वर तानते हुवे गरजा था, हिलने की कोशिश की तो दोनो को मार दूँगा.
बस, उसके बाद मुझे कुछ नही पता, मैंने एक धदाम की आवाज़ सुनी थी, वो मेरे फर्श पर गिरने की आवाज़ थी.
मैं बेहोश हो चुकी थी और जब मैं होश मे आई तो..... "
" एक मिनिट.... एक मिनिट " विजय ने उसे टोका," होश मे आने का किस्सा बाद मे बताईएगा, उससे पहले तीज-त्योहार को बताने दीजिए कि आपके बेहोश होने के बाद क्या हुआ "
" मुझे भूख लगी थी, इसलिए बार-बार मा को पुकार रहा था " उत्सव ने कहना शुरू किया," लेकिन जब रेस्पॉन्स ना मिला तो ड्रॉयिंगरूम मे आ गया, यहा का दृश्य देखकर तो होश ही उड़ गये, स्वाभाविक रूप से मेरे मुँह से चीख निकलने वाली थी लेकिन जब उसने रेवोल्वर टानकर हम दोनो को मारने की धमकी दी तो चीख हलक मे ही घुटकर रह गयी.
मुँह खुला का खुला ही रह गया था.
उसने रेवोल्वर हिलाते हुवे कहा था, अंदर चल.
'म...मा' मैंने फर्श पर पड़ी माँ की तरफ देखा.
'कुछ नही हुआ है उसे' वो गुर्राया 'सिर्फ़ बेहोश हुई है, कुछ देर बाद होश मे आ जाएगी'
मेरे मुँह से स्वतः ये शब्द निकले 'तुम वही हो ना जिसने सर के ऑफीस मे कुछ तलाश करने की कोशिश की थी'
'अंदर चल' वो फिर गुर्राया.
मेरी सिट्टी-पिटी गुम हो चुकी थी.
उसका आदेश मानने के अलावा कोई चारा ना था.
मुझे कमरे मे ले जाने के बाद बोला 'कहाँ है वो'
'क्या' मैंने पूछा.
'वही, जिसे मैंने बिजलानी के ऑफीस मे ढूँढने की कोशिश की थी और जिसकी तलाश मे मैं यहाँ आया हूँ'
'म..मुझे क्या पता कि तुम क्या ढूँढ रहे हो'
'ज़्यादा होशियार बनने की कोशिश मत कर, तुझे पता है'
'कसम से' मैं लगभग रो ही पड़ा था 'मुझे नही पता'
'मुझे बेवकूफ़ बनाने की कोशिश मत कर, ऐसा हो ही नही सकता कि तुम तीनो मे से किसी को उसके बारे मे पता ना हो'
मैं इतना ही कह सका 'मुझे नही पता कि तुम किन तीनो की बात कह रहे हो मगर मुझे कुछ नही पता'
लेकिन उसने विश्वास नही किया.
जेब से रेशम की डोरी निकालकर मुझे एक कुर्सी के साथ बाँध दिया, अपनी जेब से निकालकर मेरे मुँह मे एक रुमाल ठूंस दिया, इस कदर की चाहकर भी मुँह से आवाज़ नही निकाल सकता था और तब, उसने मुझे टॉर्चर करने का सिलसिला शुरू कर दिया.
बहुत मारा मुझे.
बार-बार कहे चले जा रहा था कि मुझे उस चीज़ के बारे मे मालूम है और मैं जानबूझकर नही बता रहा हू.
उसने सॉफ-सॉफ कहा था कि अगर मैं उसे नही बताउन्गा तो वो मेरी माँ को मार डालेगा.
पर जब मुझे कुछ पता ही नही था तो बताता क्या.
उसकी पिटाई के कारण कुछ देर तक मैं बेसूध सा हो गया.
जब पुनः सुध मे आया तो देखा, वो मेरे कमरे की तलाशी ले रहा था, ठीक बिजलानी सर के ऑफीस की तरह उसने कमरे मे मौजूद एक-एक चीज़ खंगाल डाली थी.
सारा सामान उलट-पुलट कर दिया था.
लेकिन अपनी इच्छित वस्तु उसे नही मिली थी.
तब उसने पलटकर फिर मेरी तरफ देखा.
करीब आया और फिर पूछने लगा, पता नही किस चीज़ को ढूँढने का जुनून सवार था उसपर.
उसकी भरपूर कोशिश के बावजूद जब मैं कुछ ना बता सका तो शायद उसे यकीन हो गया कि मुझे वास्तव मे कुछ नही मालूम है.
वो चला गया "
विजय ने पूछा," तुम्हे बँधा छोड़कर "
" मुँह मे रुमाल भी ठूँसा छोड़ गया था ताकि चीख ना सकूँ "
" आज़ाद कैसे हुवे "
" मैंने किया " उसकी माँ बोली," होश मे आते ही मैं खड़ी हो गयी थी.
हालाँकि सिर चकरा रहा था मगर मुझे उत्सव की चिंता थी.
दौड़ती हुई उसके कमरे मे पहुचि.
इसकी हालत देखकर हलक से चीख निकल गयी.
झपटकर खोला.
मुँह से रुमाल निकाला.
ये माँ कहकर मुझसे लिपट गया और रोने लगा.
मैं भी रोने लगी थी.
मेरी चीख अगल-बगल के फ्लॅट वालो ने सुन ली थी.
वे अंदर आ गये थे "
उत्सव बोला," तब मैंने माँ से सुपेरिटेंडेंट साहब को फोन करने के लिए कहा, ये भी कहा कि इस बारे मे आपको बता दे "
" हमे क्यों " विजय ने पूछा.
" क्योंकि आप ही इस केस को देख रहे है, आपने ही लाल बालो वाले का ज़िक्र किया था, पर आपका नंबर मेरे पास नही था, सुपेरिटेंडेंट साहब का नंबर अख़बार से लिया "
" खुद फोन क्यो नही किया "
" मैं उस वक़्त ज़्यादा बोलने की हालत मे नही था, मुँह से खून आ रहा था, देख नही रहे, जबड़ा अभी तक सूजा हुआ है "
" दिलजले " एकाएक विजय विकास से मुखातिब होता हुआ बोला," तुलाराशि को फोन करो, वो फ़ौरन से पहले अंकिता और दीपाली की सुरक्षा का इंतज़ाम करे, वहाँ भी ऐसा हो सकता है "
विकास तुरंत अपना मोबाइल निकालकर चालू हो गया.
विजय बगैर किसी से कुछ कहे उत्सव के बेडरूम मे पहुचा.
वहाँ की हालत वैसी ही थी जैसी बिजलानी के ऑफीस की थी, एक कुर्सी, उसके नीचे फर्श पर प्लास्टिक की रस्सी और रुमाल पड़ा हुआ था, विजय ने झुक कर रुमाल उठा लिया.
वो सफेद रंग का ऐसा रुमाल था जिसके चारो तरफ सफेद रंग की पट्टियाँ थी, हल्का-हल्का गीला था वो, विजय समझ सकता था, उस पर उत्सव का थूक लगा हुआ है.
वापिस ड्रॉयिंगरूम मे आया, लगा, इस फ्लॅट, उत्सव या उसकी माँ से अब उसे ऐसी कोई जानकारी मिलने वाली नही है जो उपयोगी हो तो विकास के साथ बाहर निकल गया लेकिन जाते-जाते फ्लॅट के बाहर मौजूद इनस्पेक्टर से ये कहना ना भूला," फिंगरप्रिंट्स वालो को बुलाकर उस सामान से निशान ज़रूर उठवा लेना जो उत्सव के बेडरूम मे बिखरा पड़ा है "

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" क्या कहते हो गुरु " वहाँ से रवाना होते ही विकास ने सवाल किया था," आख़िर वो क्या चीज़ हो सकती है जिसकी तलाश मे वो इस कदर पगलाया घूम रहा है "
" पूछो मत दिलजले, बुद्धि झन्नात हुई पड़ी है "
" एक बात तो तय है "
" उगलो "
" अभी वो चीज़ उसके हाथ नही लगी है जिसकी उसे तलाश है, बिजलानी के ऑफीस मे मिल गयी होती तो उत्सव के घर पहुचने की क्या ज़रूरत थी और ये हम जानते ही है कि उत्सव के घर से उसे वो चीज़ नही मिली है "
विजय ने कोई टिप्पणी नही की.
विकास भी शांत रह गया.
फिर कुछ देर बाद बोला," मैं तो अभी तक ये ही निस्चय नही कर सका हूँ कि अशोक बिजलानी ने स्यूयिसाइड की है या उसकी हत्या की गयी है, आपको क्या लगता है "
" हमे इस पचडे मे पड़ने की जगह अपने मैंन मिशन पर ध्यान देना चाहिए, उस पर, जिसके लिए दडबे से निकले थे "
" मतलब "
" एक लाइन मे कहा जाए तो हमारा मिशन ये पता लगाना है कि कान्हा और मीना का मर्डर सरकार दंपति ने ही किया है या किसी ने उन्हे ट्रॅप किया है "
" बात तो आपकी ठीक है "
" हम वही पता लगाने की तरफ बढ़ रहे है "
" आप तो जगदीश चंडोला के घर जा रहे है "
" इस गुत्थी का जवाब वही मिलेगा "
" वो कैसे "
" ये तो मानोगे कि अगर मीना की लाश ना मिली होती तो सरकार दंपति किसी हालत मे गिरफ़्त मे नही आए होते, भले ही उन्होने कान्हा और मीना का मर्डर किया था या नही "
" ये बात तो सिद्ध हो चुकी है, अगर मीना की लाश ना मिलती तो लोग आज भी ये ही मान रहे होते कि वो कान्हा की चैन और अंगूठी के लालच मे उसकी हत्या करके फरार हो गयी लेकिन.... "
" लेकिन "
" कान्हा-मीना मर्डर केस मे जगदीश चंडोला का इन्वॉल्व्मेंट ही कितना है, सिर्फ़ इतना की अपनी ड्यूटी के तहत कूड़े के ढेर पर कूड़ा डालने गया था, मीना की लाश देखी और वो किया जो उस हालात मे ड्यूटी बनती थी यानी पोलीस को सूचना दे दी "
विजय ने कहा," हमे ये मालूम करना है कि किस्सा इतना ही है या इससे कुछ ज़्यादा है "
" ज़्यादा या कम क्या हो सकता है "
" ऐसा क्यो नही हो सकता की लाश पर उसकी नज़र इत्तेफ़ाक़न या स्वाभाविक रूप से ना पड़ी हो बल्कि किसी ने जानबूझकर पड़वाई हो, उसके द्वारा पोलीस को सूचना देना षड्यंत्र का हिस्सा हो "
" कैसा षड्यंत्र "
" वही, जो किसी ने सरकार दंपति के लिए रचा हो "
" बात अभी भी ठीक से समझ मे नही आई "
" समझने के लिए बचा ही क्या है दिलजले, सीधी-सी बात है, अगर जगदीश चंडोला की नज़र स्वाभाविक रूप से लाश पर पड़ी थी और उसने सच्चे शहरी का कर्तव्य निभाने के तहत उसके बारे मे पोलीस को सूचित किया था तो, इसे सरकार दंपति का दुर्भाग्य माना जाएगा, इसके उलट, यदि जगदीश चंडोला के पीछे कोई था यानी लाश जानबूझकर बरामद की गयी थी तो जाहिर है, सरकार दंपति पर मुसीबतो का पहाड़ उनके दुर्भाग्य के कारण नही गिरा बल्कि गहरी साजिश के तहत गिराया गया.
विकास चुप रह गया.
विजय ने आगे कहा था," मज़े की बात ही ये है दिलजले कि पोलीस ने अपनी इन्वेस्टिगेशन मे जगदीश चंडोला को सबसे उपेक्षित किरदार बनाया हुआ है जबकि हमारे हिसाब से वो सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी है, सीधी-सी बात है, अगर लाश पर उसकी नज़र स्वाभाविक रूप से पड़ी और उसने अपने शरीफ शहरी होने का फर्ज़ निभाया है तो दोषी सरकार दंपति ही है यानी कुदरत ने उन्हे फँसाया है लेकिन अगर जगदीश चंडोला के थ्रू वो लाश किसी ने जानबूझकर बरामद करवाई तो स्वतः सिद्ध हो जाता है कि वे गुनहगार नही बल्कि किसी शातिर खिलाड़ी के षड्यंत्र के शिकार है "

" बात तो ठीक है आपकी लेकिन और भी तो ढेर सारे सवालो के जवाब ढूँढने होंगे, जैसे ये कि, चारो तरफ से बंद फ्लॅट मे कोई बाहरी व्यक्ति मर्डर कैसे कर गया और उन्हे पता क्यो नही लगा "
" ऐसे काई सवालो के जवाब हमारी खोपड़ी मे सेट हो चुके है और बाकियो के ढूँढ लेंगे, अगर एक बार ये क्लियर हो जाए कि वो बेगुनाह है तो ऐसे सवालो के जवाब ढूँढना आसान हो जाएगा "
" ये क्या बात कही आपने की कुछ सवालो के जवाब आपकी खोपड़ी मे सेट हो चुके है, मुझे भी तो कुछ बताइए "
" अभी वक़्त नही आया है " कहने के बाद विजय शांत हो गया और ऐसा शांत हुआ की विकास की काफ़ी कोशिशो के बावजूद मुँह से एक भी शब्द निकालने को तैयार नही हुआ.

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माथा तो विजय-विकास का जगदीश चंडोला के घर के बाहर लगी भीड़ को देखकर ही ठनक गया था, भीड़ मे काफ़ी गहमागहमी थी.
सब काफ़ी उत्तेजित नज़र आ रहे थे.
मुकम्मल मौहोल ये बता रहा था कि कुछ ही देर पहले वहाँ कोई सनसनीखेज घटना घटी है.
पोलीस वाले भी मौजूद थे.
वे इनस्पेक्टर से मिले.
इनस्पेक्टर उन्हे पहचानता था.
ये भी जानता था कि विकास सुपेरिटेंडेंट साहब का बेटा है, इसलिए, बड़े सम्मान के साथ मिला.
घर के अंदर से महिलाओ के रोने की आवाज़े आ रही थी.
" क्या हुआ है " विजय ने इनस्पेक्टर से पूछा.
इनस्पेक्टर ने जब कहा की," किसी ने जगदीश चंडोला नाम के आदमी का मर्डर करने की कोशिश की है " तो विजय-विकास के जिस्म मे सनसनी-सी दौड़ गयी.
एक-दूसरे की तरफ देखा उन्होने.
दोनो की ज़ुबान पर जैसे ताला लटक गया था.
कुछ देर बाद विजय ने पूछा," तुम्हे कैसे पता लगा "
" किसी पड़ोसी ने थाने फोन किया था "
" जगदीश चंडोला किस हालत मे है "
" अभी तो पहुचा ही हूँ सर " उसने बताया," कि आप आ गये, घर के अंदर भी नही जा पाया हूँ "
" आओ, देखते है " कहने के साथ ही विजय उस मकान की तरफ बढ़ गया जिसका प्लास्टर जगह-जगह से उखड़ा हुआ था.
ईंटे चमक रही थी.
उसी की क्यो, वहाँ सभी मकानो की हालत वैसी ही थी, वे क्वॉर्टर नगर निगम ने अपने करम्चारियो को रहने के लिए दे रखे थे और ना जाने कब से उनकी सुध नही ली गयी थी.
अभी वे भीड़ के बीच से गुजर ही रहे थे कि एक युवा लड़के ने इनस्पेक्टर से कहा," मैंने उसे देखा है सर, वो बाइक पर था, लाल रंग के बाल थे उसके, वैसी ही दाढ़ी भी थी "
" क्या किया उसने " विजय ने पूछा.
" आप पूछ रहे है क्या किया, ये पूछिए क्या नही किया उसने " जोश और उत्तेजना मे भरा लड़का कहता चला गया," जगदीश अंकल की जान लेने मे कोई कसर नही छोड़ी उसने, लगातार उनके पीछे भाग रहा था, उन पर दो गोलिया भी चलाई.... "
" दो नही, तीन " एक महिला ने उसकी बात काटी," एक घर के अंदर भी तो चलाई थी, तभी तो हम सब अपने घरो से निकले "
एक बुड्ढ़ा बोला," अगर हम सब इकट्ठा ना हो गये होते तो आज वो जगदीश की लाश बिछाकर ही जाता "
" पर क्यो, वो जगदीश को क्यो मारना चाहता था "
विजय के इस सवाल पर वहाँ सन्नाटा पसर गया.
विजय ने कहा," किसी को पता हो तो बताओ "
" ये तो हमे नही पता " एक अधेड़ बोला," बस इतना जानते है कि उसने कोई कसर नही छोड़ी थी, मैं वहाँ, पेड़ के नीचे बैठा था कि गोली चलने की आवाज़ सुनी, उस वक़्त मैं ये नही समझा था कि गोली चली है, बल्कि सोचा था, किसी बच्चे ने पटाखा छोड़ा है पर उसके तुरंत बाद बचाओ-बचाओ चिल्लाता जगदीश अपने घर से भागता हुआ बाहर निकला, उसके पीछे वो निकला, उसके हाथ मे रेवोल्वर था, मेरे देखते ही देखते उसने जगदीश पर दो गोलिया चलाई, वो तो उसका मुक़द्दर अच्छा था कि एक गोली तो उस पत्थर मे जा लगी जिसके पीछे से भागता हुआ जगदीश उस वक़्त गुजर रहा था, दूसरी उसके उपर से गुजर गयी क्योंकि घबराहट मे जगदीश ठीक उसी वक़्त ठोकर खाकर गिर गया था "
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11-23-2020, 02:08 PM,
#39
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
42

" तुमने उसे पकड़ने की कोशिश नही की "
" आप पकड़ने की बात करते है, हम ने तो साले को खदेड़ दिया था, ना खदेड़ते तो आज वो जगदीश अंकल को मार ही डालता " ये बात एक अन्य युवक ने कही थी," अकेले की तो किसी की हिम्मत नही पड़ी लेकिन जब सभी अपने घरो से निकल आए और मारो-मारो का शोर मचा दिया तो वो घबरा गया... "
" मैंने तो एक पत्थर भी मारा था उसे " एक औरत बोली.
अधेड़ भी बोला," मैंने भी "
चारो तरफ से आवाज़े उठने लगी थी कि," मैंने भी पत्थर मारा था "
शोर थोड़ा शांत हुआ तो विजय ने पूछा," जब सब लोग पत्थर मारने लगे तो उसने क्या किया "
" तभी तो छोड़ा जगदीश का पीछा " अधेड़ ने कहा," वापिस दौड़कर अपनी बाइक के पास आया, उसे स्टार्ट करके भाग गया "
" तुम लोगो को उसे पकड़ लेना चाहिए था "
" अजी पकड़ लेते, कहना आसान है, यहाँ होते तो देखते, उसके हाथ मे रेवोल्वर था, किसी को भी मार सकता था "
" क्या किसी ने उसे पहले भी इस बस्ती मे देखा था "
कयि आवाज़े उभरी," नही "
" किसी ने बाइक का नंबर नोट किया हो "
" मैंने कोशिश की थी " एक युवक बोला," लेकिन पढ़ा नही गया, नंबर प्लेट पर मिट्टी लगी हुई थी "
एक अधेड़ की आवाज़," अजी साले ने जानबूझकर लगा रखी होगी, ऐसे लोग बड़े हरामी होते है "
" जगदीश तो ज़रूर जानता होगा उसे "
" पता नही जानता है या नही, पर उस बेचारे को तो अपना ही होश नही है, एक बार गिरा तो फिर उठ भी नही पाया, बुरी तरह काँप रहा था, हम सबने उठाकर घर के अंदर पहुचाया "
" अच्छा उससे बात तो कर ले " विजय ने कहा," रास्ता दो "
भीड़ ने रास्ता दिया.
वे आगे बढ़े.

--------------------------------

लकड़ी का दरवाजा पार करते ही छोटा-सा आँगन था.
आँगन मे काफ़ी औरते इकट्ठा थी.
कयि रो रही थी.
एक जवान लड़की तो दहाड़े मार-मारकर रो रही थी.
कुछ महिलाए उसे चुप कराने की, सांत्वना देने की कोशिश कर रही थी, पता लगा, वो जगदीश की बेटी थी.
आँगन के अगल-बगल दो कमरे थे.
एक कमरे मे औरतो की भीड़ थी.
वहाँ से भी रोने की आवाज़े आ रही थी.
इनस्पेक्टर ने रास्ता बनवाया.
वे कमरे मे पहुचे.
जगदीश एक चारपाई पर लेटा हुआ था.
आँखे बंद थी.
उसके कपड़े कयि जगह से फटे हुए थे.
चेहरे समेत जिस्म के कयि हिस्सो मे चोट लगी हुई थी.
उन पर हल्दी लगा दी गयी थी और दो महिलाए हाथ के पंखे से उसकी हवा कर रही थी.
एक महिला कह रही थी," हम ने किसी का क्या बिगाड़ा था, क्यो सुहाग उजाड़ना चाहता था नास्पीटा मेरा, कम्बख़्त का नाश होगा, कोई उसे ही गोली से उड़ा देगा "
औरते उसे शांत करने की कोशिश कर रही थी.
इनस्पेक्टर, विजय और विकास समझ गये कि वो जगदीश की पत्नी होगी, कुछ देर बाद इनस्पेक्टर ने कहा," देखिए, बड़े साहब आए है, ये जगदीश से पूछताछ करेंगे, जल्दी ही उसे ढूँढ निकालेंगे, हम आपको यकीन दिलाते है कि वो 24 घंटे मे जैल मे होगा "
सबने उसकी तरफ देखा.
आँख खोलकर जगदीश ने भी.
इनस्पेक्टर के कयि बार कहने और पोलीसवालो की मशक्कत के बाद औरतो को कमरे से निकाला गया लेकिन जगदीश की पत्नी वही जमी रही बल्कि बेटी भी अंदर आ गयी.
विजय ने उसी से पूछा," जिस वक़्त ये सब हुआ उस वक़्त तुम लोग कहाँ थे "
" मैं और माँ तो सब्जी लेने गये हुए थे " रोती हुई लड़की ने बताया," वापिस आए तो बस्ती मे हंगामा मचा हुआ था, सब लोग बापू को उठाए हुए घर की तरफ ला रहे थे "
" यानी कि उस वक़्त जगदीश घर मे अकेला था "
पत्नी बोली," मैं होती तो नास्पीटे का मुँह नोच लेती "
विजय ने कुछ देर उनसे बातें की, फिर तब, जब उत्तेजना थोड़ी कम हुई तो बोला," अगर तुम लोग चाहती हो कि वो पकड़ा जाए और उसे सज़ा मिले तो कुछ देर के लिए बाहर चली जाओ, हमे जगदीश से थोड़ी पूछताछ करनी पड़ेगी "
फिर भी, वे एक बार के कहने पे नही गयी.
समझाने-बुझाने के से अंदाज मे इनस्पेक्टर ने उनका हाथ पकड़ा और आँगन मे छोड़ कर आया, तब, विजय के इशारे पर विकास ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.
विजय ने जगदीश से पहले सवाल किया," कौन था वो "
" म...मैं नही जानता " उसके होंठ काँप रहे थे.
विजय ने सॉफ महसूस किया कि उसने झूठ बोला था लेकिन फिलहाल इस बात पर ज़ोर ना देकर अगला सवाल किया," क्यो मारना चाहता था वो तुम्हे "
" म...मुझे कुछ भी नही पता "
" अच्छा ये बताओ, क्या हुआ था, जिस वक़्त वो आया था, उस वक़्त तुम क्या कर रहे थे "
" कुछ नही साहब, मैं तो अपने कमरे मे लेटा हुआ था "
" इसी कमरे मे "
" नही साहब, मेरा कमरा वो बगल वाला है "
" अच्छा चलो, तुम लेटे हुए थे, फिर क्या हुआ "
" उसे देखते ही चौंका और फिर चारपाई से खड़ा हो गया, पूछा कि वो कौन है और इस तरह सीधा घर मे क्यो घुसा चला आया, उसने कोई भी जवाब देने की जगह अपनी जेब मे हाथ डाला और रेवोल्वर निकाल लिया, मेरे तो होश फाख्ता हो गये साहब, लगा कि वो मुझे मारने वाला है, जान बचाने के लिए बस एक ही बात सूझी और मैं उसपर झपट पड़ा, शायद उसे ऐसी उम्मीद नही थी, शायद उसने सोचा होगा कि मैं रेवोल्वर देखकर इतना डर जाउन्गा कि कुछ कर ही नही सकूँगा इसलिए वो भी हड़बड़ा गया और हड़बड़ाहट मे ही उससे गोली चल गयी पर वो गोली मुझे नही लगी थी, वो पीछे वाली दीवार से जा टकराया था, मैं मौका देखकर कमरे से भाग निकला, 'बचाओ-बचाओ' चिल्लाता हुआ घर से बाहर निकला मगर उसने मेरा पीछा नही छोड़ा साहब, घर के बाहर भी... "
" वो सब हम सुन चुके है " उसकी बात काटकर विजय ने सख़्त लहजे मे कहा," हमे बेवकूफ़ मत समझो जगदीश, एक अंजान आदमी किसी के घर मे घुसे और बगैर कुछ कहे-सुने जेब से रेवोल्वर निकालकर उसे मारने की कोशिश करे ऐसा कही होता है "
" आ...ऐसा ही हुआ है साहब "
" हम मान ही नही सकते, हम क्या कोई भी नही मानेगा, वो जो तुम्हे जान से मारने के इरादे से आया था, उसके पीछे कोई ना कोई कारण रहा होगा, बेवजह कोई किसी को नही मारता और मारने के लिए उस हद तक तो हरगिज़ नही जाता जिस हद तक वो गया, हमे लोगो ने बताया कि उसने बाहर भी तुम्हारा पीछा किया, दो गोलिया चलाई, ऐसा करके खुद अपने लिए भी बहुत बड़ा रिस्क लिया उसने, इतना रिस्क कोई छोटे-मोटे कारण से नही लेता "
" व...वो सब तो ठीक है साहब पर मुझे सच मे कुछ नही पता "
" सोच लो " विजय ने चेतावनी-सी दी," अगर तुम कुछ नही बताओगे तो वो नही पकड़ा जाएगा और यदि वो नही पकड़ा गया तो जिस हद तक जाकर उसने तुम्हे मारने की कोशिश की है उसे देखते हुए हम दावे के साथ कह सकते है कि बहुत जल्दी वो दूसरा हमला करेगा, दूसरा भी कामयाब ना हुआ तो तीसरा करेगा, तीसरा नाकाम होने पर चौथा करेगा, मतलब ये कि वो तब तक तुम पर हमला करता रहेगा जब तक तुम्हे मार ना दे क्योंकि इतना तो तुम भी समझ गये होगे कि उसका मकसद ही तुम्हारी हत्या करना है "
जगदीश का चेहरा पीला पड़ गया.
होंठ काँपे मगर आवाज़ ना निकल सकी.
" बोलो " विजय ने चोट की," तुम उसे जानते हो ना "
उसकी आँखो से आँसू निकले, गर्दन हां मे हिली.
" कौन है वो "
" न...नाम नही जानता "
" और क्या जानते हो "
" वो एक साल पहले, बस एक बार मुझसे मिला था "
" कहाँ "
" नगर पालिका मे ही "
" किसलिए मिला था "
" स..साहब " वो रो पड़ा," मुझे सज़ा तो नही होगी "
" सच बोलॉगे तो कुछ नही होगा "
" उसने मुझे एक लाख रुपये दिए थे "
" किसलिए "
" कहा था, आज जब तुम कूड़े के ढेर पर कूड़ा डालने जाओ तो कूड़े के पाँचवे पहाड़ के ढलान पर, नीचे की तरफ देखना, वहाँ एक लाश पड़ी नज़र आएगी.
'लाश', मेरे छक्के छूट गये.
'एक औरत की लाश है वो'
'त..तो मैं क्या करूँ'
'अगर मैं तुमसे ना मिलता और इस बारे मे ना बताता, तब तुम्हे वहाँ लाश नज़र आती तो क्या करते'
'प...पोलीस को खबर करता'
'अब भी वही करना है. इससे ज़्यादा कुछ नही'
मेरी समझ मे कुछ नही आया था इसलिए कुछ बोल ना सका, बस देखता रहा उसकी तरफ, उसने जेब से हज़ार के नोटो की एक गद्दी निकालकर मेरी तरफ बढ़ाई और बोला,' इस काम के मेरी तरफ से ये लाख रुपये रखो'
हज़ार के नोटो की गॅडी देखकर तो मेरी घिग्घी बँध गयी साहब, भला हमे उतने नोट एकसाथ देखने को कहाँ मिलते है, और वो उन्हे देने के लिए मेरी तरफ बढ़ रहा था, लगा, इतने से काम के वो भला एक लाख रुपये क्यो देगा, ज़रूर लफडे का काम है, मैं किसी मुसीबत मे फँस सकता हूँ.
इसलिए कहा,'नही, मैं ये पैसे नही ले सकता'
'क्यो' वो मुस्कुरा रहा था.
'ज़रूर ये कोई दो नंबर का काम है'
'तुमने एक लाश देखी और उसके बारे मे पोलीस को खबर कर दी, इसमे दो नंबर का क्या हो गया, तुमने तो खुद ही कहा, वैसे भी लाश को देख लेते तो पोलीस को खबर करते'
'त...तभी तो कह रहा हू कि सिर्फ़ इस काम के आप मुझे एक लाख रुपये क्यो देंगे, ज़रूर कुछ और भी करना चाहते होंगे'
'तुम्हारी कसम, और कुछ नही कराउन्गा तुमसे' उसने दृढ़ता से कहा,' बस इसी काम के लिए एक लाख रुपये है'
'पर ऐसे काम के, जिसे मैं वैसे भी करता, आप मुझे एक लाख रुपये क्यो दे रहे है'
'लाख रुपये कामना चाहते हो तो इस लफडे मे ना पडो'
'कुछ तो फ़ायदा होगा आपका'
'आदमी को दूसरे का नही, अपना फ़ायदा देखना चाहिए' इस बार उसने धमकाते हुवे कहा था,' इस गॅडी को पकड़ते हो या तुम्हारे किसी दूसरे भाई-बंधु को देखूं, वहाँ कूड़ा डालने जाने वाले तुम अकेले नही हो, बस यू समझो कि तुम्हारा नसीब अच्छा है जो इस काम के लिए तुम्हे चुना'
उसका इतना कहना था कि मैंने तुरंत गॅडी पकड़ ली साहब, पर उससे बार-बार कहा कि मैं लाश की सूचना पोलीस को देने के अलावा और कुछ नही करूँगा.
उसने कहा,' इसके अलावा एक काम और करना है तुम्हे, ये कि कभी किसी को नही बताना है की मैंने तुम्हे इस काम के लिए रुपये दिए है, सबके सामने बस यही आना चाहिए कि तुमने लाश देखी और पोलीस को सूचना दे दी'
मैंने कहा कि,' मैं भला क्यो किसी को बताने लगा'
और... वो दिन और आज का दिन, उसके द्वारा मुझे कोई और काम बताने की तो बात ही दूर, मुझे अपनी शकल तक नही दिखाई.
बस आज ही सामने आया था "
" अब नये सिरे से बताओ " विजय ने कहा," आते ही उसने क्या कहा "
" एक साल बाद उसे अपने दरवाजे पर देखकर मैं चौंक पड़ा बल्कि ये कहूँ तो ग़लत ना होगा कि चारपाई से उच्छल पड़ा था, वो बहुत जल्दी मे था, आते ही बोला,' तेरे पास कुछ लोग आने वाले है, वे तुझसे ये पूछेंगे कि तूने लाश की सूचना पोलीस को अपनी तरफ से दी थी या इसके लिए किसी ने कहा था, तुझे मेरे बारे मे या हमारे बीच मे हुई डील के बारे मे कुछ नही बताना है, बस ये कहना है कि तेरी नज़र इत्तेफ़ाक से लाश पर पड़ी और तूने उसकी सूचना पोलीस को दे दी'
'ह..हां' हड़बड़ाहट मे मेरे मुँह से यही निकला,' यही कहूँगा, ये तो उसी दिन तय हो गया था और मैंने आजतक किसी को कुछ बताया भी नही है मगर बात क्या है, कुछ लफडा हो गया है क्या'
'कुछ ख़ास नही' उसने कहा,' बस ये जवाब दे देगा तो कुछ नही होगा, बात आगे बढ़ेगी ही नही'
मैं क्योंकि डर गया था इसलिए मुँह से निकला,' म..मुझे तो कुछ नही होगा ना'
उसने ध्यान से मुझे देखा.
शायद मेरे चेहरे पर छाई घबराहट को.
कुछ देर ऐसा लगा जैसे कुछ सोच रहा हो.
फिर बड़बड़ाकर जैसे खुद से ही कहा,' नही, तू ये काम नही कर पाएगा, उनके सामने तो बिल्कुल नही टिक सकेगा, चीकू जैसा पक्का खिलाड़ी टूट गया, वो तुझसे सबकुछ उगलवा लेंगे'
'कौन' मैंने पूछा.
कुछ देर उसके चेहरे पर दुविधा के-से भाव रहे फिर ऐसे भाव उभर आए जैसे किसी सहक्त निस्चय पर पहुच गया हो और जेब मे हाथ डालकर रेवोल्वर निकाल लिया.
मेरी तो हालत खराब हो गयी.
मुँह से निकला,' य...ये क्यो निकाला है'
'एक ही रास्ता है जगदीश' उसने दाँत पीसे थे.
'क...क्या'
'तेरा ख़ात्मा' कहने के साथ वो रेवोल्वर मुझ पर तानने के लिए हाथ सीधा कर ही रहा था कि मुझे लगा, मेरी जिंदगी एक सेकेंड से ज़्यादा की नही है.
मरता क्या ना करता वाली हालत हो गयी थी मेरी.
उसका रेवोल्वर वाला हाथ मेरी तरफ तन चुका था और ज़ोर से चीखते हुए मैंने उसका वही हाथ पकड़कर उपर उठा दिया.
गोली चली मगर वो मुझे नही लगी थी क्योंकि उसका हाथ उपर की तरफ उठ चुका था.
हम दोनो गुत्थम-गुत्था हो चुके थे.
उससे भिड़ ज़रूर गया था मैं लेकिन बहुत बुरी तरह डरा हुआ था, इसलिए चीख भी रहा था ताकि कोई मेरी मदद के लिए आ जाए, उसने मेरे चेहरे पर घूँसा मारा.
मैं पीछे वाली दीवार से जा टकराया.
इस ख़ौफ़ ने मुझे तुरंत ही उछल्कर खड़ा होने पर मजबूर कर दिया की अगर ज़रा-सी भी चूक हो गयी तो वो मुझे गोली मार देगा.
मैंने देखा, उस वक़्त वो चारपाई के नीचे पड़ा अपना रेवोल्वर उठाने की कोशिश कर रहा था.
मैं समझ गया, गुत्थमगुत्था के बीच वो वहाँ गिर गया होगा.
उस क्षण बचने के लिए मुझे बाहर की तरफ दौड़ लगाने के अलावा कुछ नही सूझा और वही मैंने किया लेकिन वो तो....
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11-23-2020, 02:09 PM,
#40
RE: Gandi Kahani सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री
43

वो वही सब कहे चले जा रहा था जो घर के बाहर मौजूद भीड़ पहले ही बता चुकी थी मगर विजय के कान उसके शब्द नही सुन रहे थे क्योंकि इस वक़्त उसकी नज़र जगदीश के गले मे पड़े काले धागे पर थी बल्कि... काले धागे पर भी नही, उसमे पिरोइ गयी एक छोटी-सी चाबी पर, उसने पूछा," ये चाबी कहाँ की है "
" य...ये " वो थोड़ा बौखलाया.
चाबी को उसके गले मे देखकर विजय ने इतना अनुमान तो लगा ही लिया था कि जहाँ की भी वो है, उसमे जगदीश की कोई ख़ास ही कीमती चीज़ होनी चाहिए क्योंकि इस तरह गले मे चाबी तो आदमी तभी लटका सकता है और.... उसके बारे मे प्रश्न करने पर वो जिस तरह बौखलाया, उससे तो उसे और शक हो गया इसलिए थोड़े कड़े स्वर मे बोला," उसी के बारे मे पूछ रहा हू "
" मेरी पर्सनल अलमारी की चाबी है साहब "
" कहाँ है वो अलमारी "
" मेरे कामरे मे "
" उसी कमरे मे जिसमे तुम्हारी और उसकी फाइट हुई थी "
" जी "
विजय ने दोनो कमरो के बीच के दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए पूछा," वो कमरा इस दरवाजे के पार है ना "
उसने स्वीकृति मे गर्दन हिलाई.
विजय ने विकास से कहा," इसे खोलना दिलजले "
विकास ने आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया.
दरवाजा पार करके वे उस कमरे मे पहुचे.
विजय की नज़रो ने बारीकी से निरीक्षण करना शुरू किया.
कमरे की हालत जगदीश को सच्चा सिद्ध कर रही थी.
वहाँ हाथापाई के निशान मौजूद थे.
छत के एक किनारे पर गोली लगने का निशान भी था.
सारे कमरे का निरीक्षण करती विजय की निगाहे उस अलमारी पर जम गयी जिस पर छोटा-सा परंतु मजबूत ताला लटका हुआ था.
बाकी किसी अलमारी मे ताला नही था.
विजय ने वही से दरवाजे के उस पार चारपाई पर लेटे जगदीश से पूछा," तुम्हारे गले मे इसी की चाबी है ना "
उसने फिर स्वीकृति मे गर्दन हिलाई.
" चाबी दो "
" क...क्यो साहब " वो चारपाई से उठ बैठा.
" हम देखना चाहते है कि इसमे ऐसा क्या है जिसकी वजह से तुम इसकी चाबी गले मे लटकाए घूमते हो "
" अजी ग़रीब के ताले मे क्या हो सकता है साहब " चारपाई से उठकर वो दरवाजा पार करके उसी कमरे मे आ गया था," बिटिया के नाम की एक-आध एफडी करा रखी है, एक बीमा पॉलिसी है और बॅंक की किताब है, सब उसकी शादी मे काम आएगा "
" हम उन्हे देख लेंगे तो क्या गजब हो जाएगा "
" य...ये तो नही कहा मैंने "
" तो चाबी दो "
" उसे देखकर क्या करेंगे साहब, आप तो हम पर हुए हमले के कारण आए है ना, उसका भला अलमारी से क्या मतलब "
" जो कहा जा रहा है वो करो " विजय गुर्राया.
जगदीश सहम गया लेकिन उसके चेहरे पर अब भी ऐसे भाव थे जैसे चाबी ना देना चाहता हो और उन्ही भाव ने विजय को और ज़्यादा प्रेरित किया, पुनः गुर्राया," चाबी देते हो या नही "
" देख लीजिए साहब, देख लीजिए इस ग़रीब आदमी ने अपनी अलमारी मे कितनी धन-दौलत छुपा रखी है " नाराज़गी भरे अंदाज मे कहने के साथ उसने गले से काला धागा निकाला और उसमे पिरोइ हुई चाबी से ताला खोलता हुआ बोला," मैं ही दिखा देता हूँ कि इसमे क्या रखा हुआ है, देखिए...ये देखिए, ये एफडी है, ये बॅंक की पासबुक है और ये बीमा पॉलिसी, इनके अलावा कॅश रुपये भी है, कुल जमा 15 हज़ार पाँच सौ, ये सब मैंने बेटी की शादी के लिए जोड़ रखा है, इस पर भी इनकमटेक्स लगाएँगे क्या "
उसका अंदाज ऐसा था जैसे उन लोगो को अलमारी से दूर रखना चाहता हो, शायद इसलिए विजय ने विकास से कहा," अलमारी की तलाशी लो दिलजले "
" तलाशी " वो चिहुका," आप क्या तलाश कर रहे है "
" वही, जिसे तुम छुपाना चाहते हो "
वो हक्का-बक्का रह गया," क...क्या छुपाना चाहता हूँ मैं "
" अभी पता नही लेकिन सामने आ जाना चाहिए "
" मैं कुछ भी नही छुपा रहा हूँ साहब, पता नही आप क्या ढूँढ रहे है, जो था, आपको दिखा चुका हूँ, इसके अलावा तो बस मेरी नौकरी के कागजात और पढ़ाई के सर्टिफिकेट आदि रखे हुए है "
" कुछ नही छुपाना चाहते तो मुझे तलाशी लेने से रोकने की कोशिश क्यो कर रहे हो " कहने के साथ विकास ने उसे एक तरफ हटा दिया.
उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए जैसे अनर्थ होने जा रहा हो, एक से लाख ना चाहता हो कि विकास उसकी अलमारी को हाथ भी लगाए मगर उसके वश मे उसे रोकना नही था.
विकास ने अलमारी का सामान चारपाई पर डालना शुरू कर दिया और सारा सामान चारपाई पर डालने के बाद जब अलमारी के फर्श पर बिच्छा अख़बार भी हटा दिया तो जगदीश बोला," क्या कर रहे है साहब, आख़िर ये कर क्या रहे है आप "
मगर विकास की नज़र अलमारी के फर्श पर मौजूद लोहे के एक छोटे से ढक्कन पर अटक गयी थी.
उसमे एक छोटा-सा कीहोल था.
विकास ने जगदीश से पूछा," इसकी चाबी कहाँ है "
" अरे साहब, उसमे भला क्या रखा है "
विजय ने विकास से पूछा," क्या है दिलजले "
" अलमारी मे एक लॉकर जैसी जगह है गुरु और ये किसी चाबी से खुलेगा "
" कहा है चाबी " विजय ने जगदीश को घूरा.
" काफ़ी दिन से खोई हुई है साहब, मुझे भी उसे खोलने की ज़रूरत नही पड़ी क्योंकि उसमे कुछ है ही नही "
" तुम्हारी बीवी से पूछ लेते है "
" अरे गोमती को क्या पता साहब, उसे तो मैंने सख्ती से इसमे हाथ ना लगाने की हिदायत दे रखी है, अनपढ़ औरत है, पता नही किस ज़रूरी कागज को कहाँ डाल दे "
" चाबी दे रहे हो या लॉकर का ताला तोड़ दे "
" मैंने कहा ना साहब, चाबी खोई हुई है "
" तोड़ दो दिलजले "
विकास को तो हुकुम मिलने की देर थी.
उसने अपना काम शुरू कर दिया और जिस वक़्त वो लॉकर के ताले को तोड़ने की कोशिश कर रहा था उस वक़्त जगदीश के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उस पर आफ़त टूट पड़ने वाली हो लेकिन कुछ कर ना पा रहा हो.
लॉकर टूटा.
विकास ने उसमे हाथ डाला.
गहरे नीले सनीले के कपड़े की एक थैली हाथ मे आई.
विकास ने उसे निकाला और उस वक़्त वो उसे खोल रहा था जब जगदीश पछाड़-सी खाकर विजय के कदमो मे गिर पड़ा और बुरी तरह गिड़गिडता हुआ बोला," उन्हे मत ले जाना साहब, उन्हे मत ले जाना, उन्ही के दम पर तो मैं अपनी बेटी की शादी किसी अच्छे घराने मे करने के सपने देखता रहा हूँ "
" किनकी बात कर रहे हो "
" ये इनकी बात कर रहा है गुरु " कहने के साथ विकास ने थैली मे से निकालकर जो डाइमंड की अंगूठी और सोने की चैन दिखाई तो विजय को अपने संपूर्ण शरीर मे सनसनी-सी दौड़ती महसूस हुई.
वो सनसनी जिसे विकास पहले ही महसूस कर चुका था.
उन दोनो के जहनो मे इसके अलावा और कोई ख़याल नही आया कि ये अंगूठी और चैन कान्हा की होंगी.
विजय थोड़ा-सा झुका और जगदीश का कॉलर पकड़कर उसे उपर उठाता हुआ बोला," तेरे पास कहाँ से आई ये "
" कुछ मत पूछिए साहब, कुछ मत पूछिए " बुरी तरह रो रहा था वो," इन्हे बचाने के लिए ही तो मेरी ये हालत हुई है "
" क्या मतलब "
" इन्हे ही तो लेने आया था वो "
" कौन "
" लाल दाढ़ी वाला "
" उसका इनसे क्या मतलब "
" एक तरह से उसी ने तो दी थी, कहा था, जिस लाश की मैं बात कर रहा हूँ, तुझे उसके गले से एक सोने की चैन और डाइमंड की अंगूठी मिलेगी, वो तेरी, तू रख लेना, बदले मे बस लाश की सूचना पोलीस को देना "
" तो तेरे और उसके बीच ये सौदा हुआ था कि अंगूठी और चैन के बदले तू लाश की सूचना पोलीस को देगा, एक लाख की कोई बात नही हुई थी, वो तूने बनाई थी "
" ब....बनानी पड़ी साहब, ना बनाता तो आप ये ना कहते कि मैंने फ्री मे दाढ़ी वाले का कहना क्यो माना, इसलिए ताकि आपको चैन और अंगूठी की भनक ना लगे, और क्या करता, सच्चाई बता देता तो ये चैन और अंगूठी आपको ना सौंपनी पड़ती, मेरे सारे सपने टूट जाते, इन्हे तभी से अपने पास संभालकर रखे हुए हूँ कि बेटे की शादी के मौके पर बेचुँगा, पर आप इन तक.... "
" मोबाइल कहाँ है "
" मोबाइल कौनसा साहब "
" वो भी तो तुझे उस लाश के पास से ही मिला होगा "
" सच्ची कह रहा हूँ साहब " उसने अपने गले को चुटकी मे भरते हुवे कहा," अपनी बेटी की कसम खाकर कहता हूँ कि मोबाइल तो मुझे कोई नही मिला, बस ये ही दोनो चीज़ें मिली थी "
" इतना हरामी नज़र तो नही आ रहा था तू, जितना निकला "
" मैंने कुछ नही किया साहब, मैंने तो.... "
" लाश से चैन और अंगूठी चुराई, कहता है कि कुछ नही किया "
" मैंने तो वही किया साहब जो लाल दाढ़ी वाले ने कहा था "
" उसकी माँ की थी लाश वो जो तूने उसके कहने से.... "
" मुझे क्या पता साहब किसकी लाश थी, मुझे तो बस ये लगा कि बिना कोई जुर्म किए लाखो का माल हाथ लग रहा है, शान से बेटी की शादी करूँगा, मुझे क्या पता था कि.... "
" और अभी-अभी क्या कहा था तूने " विजय उसकी बात काट कर कहता चला गया," वो इन्ही दोनो चीज़ो को लेने आया था "
" हां साहब, उसने आते ही पूछा था,' वो अंगूठी और चैन कहाँ है' मैंने कह दिया,' अब एक साल बाद कहाँ ढूँढ रहे हो उन्हे, उन्हे तो मैं बेचकर खा भी चुका हूँ'
उसने यकीन नही किया.
कहने लगा,' वे मुझे दे दे, उनकी जगह मैं तुझे उतने पैसे दे दूँगा जितने की वे है क्योंकि उनका तेरे पास रहना ख़तरनाक है'
मैंने फिर अपनी बात दोहरा दी.
उसने आँखे तरेरकार कहा,' सच बोल रहा है ना'
'माँ कसम' मैंने कहा.
तब उसने वही कहा जो पहले ही बता चुका हू, यही कि कुछ लोग आने वाले है, उनसे तुझे यही कहना है कि लाश पर तेरी नज़र इत्तेफ़ाक से पड़ गयी थी लेकिन फिर जाने क्यो उसका विचार बदल गया और उसने मुझे मारने का फ़ैसला कर लिया "
" इस थोड़ी-सी देर मे तू इतने झूठ बोल चुका है, इतनी बातो को घुमा चुका है कि क्या पता, अब भी सच बोल रहा है या झूठ "
" अब क्या झूठ बोलूँगा साहब " वो पूरी तरह टूटा हुआ नज़र आ रहा था," सारे झूठ तो इन्ही को बचाने के लिए बोल रहा था, अपनी जान तक दाँव पर लगा दी मैंने लेकिन नही बचा सका "
" और अब जैल की हवा जो खाएगा "
" ज...जैल " उसके होश उड़ गये," वो क्यो साहब "
" लाश मिलने पर पोलीस को सूचना देना जुर्म नही था लेकिन उससे अंगूठी और चैन चुराकर तूने घृणित जुर्म किया है "
" नही साहब, नही....मुझे माफ़ कर दो " एक बार फिर वो विजय के कदमो मे गिरकर रोने लगा था लेकिन विजय के खाते मे ऐसे लोगो के लिए रहम कहाँ.
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