Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
11-17-2019, 12:51 PM,
#31
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
“ओके ... मम्मम...एक बात और, प्लीज़ एक हिंट दे दीजिये कि चाची वहां अगर होगी तो क्या कर रही होगी? ”
“ह्म्म्म,... चलो ठीक है, एक छोटा सा हिंट तो दे ही सकता हूँ, वहां तुम्हारी चाची खातिर मदारत करती है वीवीआईपी टाइप के मेहमानों का | ”
मैं चकराया, ये क्या कहा इसने?

पूछा,

“जी, एक बार फ़िर से दोहराएँगे आप.. अभी अभी आपने जो कहा, मैं उसका मतलब समझा नहीं |”
“मेहमान नवाज़ी करती है | ” – आवाज़ इस बार थोड़ा गंभीर सा लगा |

कुछ देर और चलने के बाद एक जगह गाड़ी रुकी और इतने में उस स्पीकर से आवाज़ आई,
“तुम जा सकते हो अभय, अभी तुम्हारे घर में कोई नहीं है | उस पेपर में लिखे इंस्ट्रक्शन्स को पढ़ने मत भूलना | जो और जैसा लिखा हुआ है बिल्कुल वैसा ही करना | होटल के अन्दर जाने के बाद सब कुछ तुम्हारे कॉमन सेंस और सावधानी पर डिपेंड करेगा | अपनी तरफ़ से बात बिगड़ने मत देना और अगर फ़िर भी कुछ ऐसा वैसा हो गया तो वहां मेरे आदमी होंगे मामले को सँभालने के लिए | अब जाओ | गुड बाय |”
“पर मिस्टर एक्स, मैं आपके आदमी को पहचानूँगा कैसे ?” – अत्यंत कौतुहलवश मैं पूछ बैठा |
दो क्षण रुक कर आवाज़ आई,
“टेक केयर अभय |”
और इसी के साथ एक हल्की, खट सी आवाज़ आई दूसरी ओर से | फ़िर सब शांत.... सम्बन्ध विच्छेद हो गया था | मिस्टर एक्स मदद तो करना चाहते हैं पर बहुत ही सीमित रूप से | वैन का दरवाज़ा खुला | मैं सावधानी से बैग लेकर बाहर निकला | घर से कुछ ही दूरी पर था, मोड़ को क्रॉस कर चुका था | एक कदम आगे बढ़ कर वैन से थोड़ा दूर हुआ | देखा, सामने वाले सीट पर का शीशा उठा हुआ है | काला शीशा | वैन से थोड़ी दूरी बनते ही वैन स्टार्ट हुई और आगे निकल गई |



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घर पहुँच कर देर तक आने वाले कल के बारे में सोचता रहा | शाम को उसी तरह चाची कंधे पर एक बैग लटकाए घर आई | उस समय मुझे उनके हावभाव और शायद चेहरे के नक़्शे भी कुछ बदले बदले से लगे; मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया | और दूं भी क्यों ? चाची तो बहुत पहले से ही बदलने लगी थी | वैसे भी मैं, मेरे मन में पहले से ही चल रहे बहुत से विचारों के उधेरबुन में फँसा हुआ था |

रात को डिनर के समय, मैंने अनजाने में चाची को गौर से देखा, पहले से थोड़ी और भरी भरी सी काया लग रही थी उनकी | चेहरे पर भी एक अलग ही ग्लो था; शायद फेसिअल की वजह से हुआ हो | पर था बिल्कुल ही एक अलग ही चमक उनके चेहरे पर | गाल जैसे पहले से और ज़्यादा गोरे और लाल लग रहे थे | उनके चेहरे का एक अलग ही आकर्षण बना हुआ था | अपनी ओर एकटक मुझे देखते देख चाची मुस्कुराई पर साथ ही थोड़ी संजीदा सी हो गई | चाची – भतीजे में हल्की नोंक-झोंक भी हुई पर पूरे समय संजीदगी से पेश आई और ऐसा लगा जैसे वो मेरे चेहरे के साथ साथ मेरे मन में क्या चल रहा है उसे भी पढना चाह रही हो | मैंने भी काफ़ी सतर्कता का परिचय दिया और कई सारी बातों को अपने तक ही सीमित रखा |

चाची का इस प्रकार संजीदगी दिखाना मुझे थोड़ा अजीब लगा क्योंकि चाची थोड़ी बच्ची और खिलंदरी टाइप की महिला है | बातों को ज़्यादा घूमा फिरा कर कहना या किसी विषय पर बहुत ज़्यादा सीरियस हो कर कुछ कहना तो जैसे उनको आता ही नहीं था; उनके स्वाभाव में ही नहीं था | पर आज उनके चेहरे और आँखों ने कुछ अलग ही कहानी पेश करनी चाही | अब तो ये पूरा मामला मेरे लिए और भी अधिक रोमांचकारी और जिज्ञासा भरा हो गया था | रात में काफ़ी देर तक उस कागज़ के में दिए गए दिशा-निर्देशों एवं पूरे प्लान को पढ़ते रहा, जो मिस्टर एक्स ने दिया था मुझे | अंत में दो-तीन सिगरेट खत्म कर, अगले दिन एक अलग ही काम करने के रोमांच को तन मन में समेटे मैं सोने चला गया |
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11-17-2019, 12:52 PM,
#32
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
अगले दिन,

पूरा दिन संदेह, संशय और घबराहट के बादलों के बीच बीता | शरीर का रोम रोम अत्यंत रोमांच से भरा हुआ रहा | आज जिस तरह का जासूसी मैं करने वाला था, वो पहले कभी नहीं किया था मैंने | पहली बार ऐसे किसी प्लान का हिस्सा बन कर बड़ा ही अजीब वाला ख़ुशी मिल रहा था | दिल ज़ोरों से धड़के जा रहा था और मन बार बार कई तरह के आशंकाओं से भरे जा रहा था | चाचा के ऑफिस निकल जाने के बाद चाची थोड़ी देर के लिए मार्किट के लिए निकली थी | जब आई तब उनके हाथ में कुछ प्लास्टिक बैग्स थे | मैंने ध्यान नहीं देने का नाटक किया और अपने काम में लगे रहा | पर चाची के नहाने के लिए बाथरूम घुसते ही मैं दौड़ कर उनके कमरे में गया और उन बैग्स को चेक किया | सब में तरह तरह के कपड़े थे,.... किसी में टॉप नुमा तो किसी में नई साड़ी ब्लाउज, इत्यादि | मेरे मतलब का कुछ खास नहीं मिलने पर मैं चुपचाप उनके कमरे से निकल आया | पूरा दिन हम दोनों का किसी न किसी काम में व्यस्त रहते हुए बीत गया | बीच बीच में रह रह कर चाची के चेहरे पर चिंता की कुछ लकीरें उभर आती थीं पर साथ ही उन्हें किसी बात को लेकर बहुत कन्फर्म भी दिखाई दे रहा था | दोपहर में चाचा को उनके ऑफिस फ़ोन कर अपने किसी सहेली के यहाँ जाने का बहाना कर दी, ये भी कहा की उन्हें शायद पूरी रात अपनी सहेली के यहाँ ही बीतनी पड़े; इसलिए वो (चाचा) कोई चिंता नहीं करे |


शाम पाँच बजे से ही तैयार होने लगी चाची | मेरे पूछने पर भी उन्होंने वही सब कुछ दोहराया जो उन्होंने चाचा को सुनाया था | ठीक ठाक ही मेकअप किया उन्होंने | एक अच्छी सी साड़ी पहनी , बढ़िया परफ्यूम लगाया | वक्ष: स्थल पर नज़र डालने पर ऐसा प्रतीत होता था कि शायद उन्होंने आज अन्दर एक पुश-अप ब्रा पहना है | देख में बहुत हसीं लग रही थी | ठीक सवा छ: बजे वो घर से निकल गई | मैंने छत पर से देखा, घर से दूर, वह ठीक मोड़ वाले वाले रास्ते को क्रॉस कर एक पेड़ के नीचे खड़ी हो गई | मुश्किल से पाँच मिनट हुए होंगे कि एक काली वैन आ कर रुकी चाची के सामने और चाची के उसमें सवार होते ही वो वैन चल पड़ी |


अब तैयार होने की बारी मेरी थी | मैंने उस कागज़ में लिखे बातों को एक बार फिर से पढ़ा और तय किये गए समय के मुताबिक घर से निकल गया ठीक पौने सात बजे | मैं भी उसी मोड़ वाले रास्ते को पार कर रोड के दूसरी तरफ़ खड़ा हो गया | कुछ सेकंड्स में ही वही वैन (पहले वाले दिन) आकर रुकी | मैं उसमें सवार हो गया | घर से वही बैग लेकर निकला था | गाड़ी में बैठे बैठे ही मैंने वेटर वाले कपड़े पहन लिए और दूसरे कपड़े को उसी बैग में रख कर सीट के नीचे रख दिया | चेहरे पर कुछ मेकअप पोता और एक घनी पर पतली मूंछ लगाया और थोड़ी बड़ी हुयी नकली दाढ़ी भी | इसके बाद मैंने अपना हेयर स्टाइल भी बदला | अब मेरा हुलिया बिल्कुल बदल गया | कोई माई का लाल मुझे पहचान पाने में सक्षम नहीं था | अब इंतज़ार था असल एक्शन का |
कुछ ही देर में होटल के सामने था | गाड़ी कुछ दूरी पर रुकी थी | मैं वैन से उतर कर मन ही मन भगवान को याद करता हुआ पूरे आत्म-विश्वास के साथ होटल की ओर बढ़ गया | कागज़ में लिखे मुताबिक मेरे ब्लेजर के अंदरूनी पॉकेट में एक कागज़ सा टोकन होगा | उस टोकन को होटल के मुख्य द्वार पर खड़े दरवान को दिखा कर अन्दर घुसना था | मैंने ऐसा ही किया | दरवान ने टोकन देखते ही बड़े ही आदर से तुरंत ही गेट खोल कर हाथ सीधा कर अन्दर जाने का इशारा किया | अन्दर जा कर मैं सीधे ड्रिंक्स वाले काउंटर में चला गया | वहां नीली शर्ट पहने, आँखों में चश्मा लगाए एक आदमी ड्रिंक कर रहा था | मैं उसके बगल में जाकर खड़ा हुआ और थोड़ा अदब के साथ सिर को झुकाते हुए बोला,


“एनीथिंग एल्स यू वुड लाइक टू हैव ........सर?” ‘सर’ शब्द पर मैंने एक खास लहजे से जोर डाला |
सुनते ही वह आदमी एकदम से मेरी ओर पलटा ओर ऊपर से नीचे तक अच्छे से देखने के बाद हल्का सा मुस्कराया और अपने दायें हाथ की तर्जनी उंगली दिखाते हुए ‘ना’ का इशारा किया | मैं समझ गया | ये इशारा है.... मतलब की कोई खतरा नहीं... काम पर लग जाओ | मैं तुरंत वहां ऑर्डर्स लेने लगा | एक से ढेर घंटे इसी तरह काम करता रहा | नौ बजने में कुछ मिनट्स बाकी होंगे ... की तभी एक आदमी ने एक ऊँचे से जगह से माइक के सहारे ये अनाऊंस किया कि, ‘अब कुछ ही देर में हमारे स्पेशल गेस्ट्स आने वाले हैं, प्लीज़ शांति बनाये रखें |’


थोड़ी देर में वहां बहुत से अमीर आदमियो का जमावड़ा लग गया | एक से एक स्मार्ट तो एक से एक भद्दे से शकल सूरत वाले लोग थे | जितने भी लड़के वेटर थे उन लोगों को कुछ समय के लिए काउंटर के साइड या पीछे तरफ़ खड़े होने को कहा गया | मैं किसी के नज़रों में आने से बचने के लिए सब के पीछे जा कर खड़ा हो गया | करीब दस मिनट बाद वहां बहुत सी लड़कियाँ और औरतें आ कर खड़ी हो गई और जो काम हम कर रहे थे, मतलब वेटर का वो काम अब वो लोग करने लगी | सब के ड्रेस बहुत ही बेशर्मी से बहुत खुले खुले से थे | किसी के शर्ट के बटन सारे खुले थे तो किसी ने बिना साड़ी पहने बड़े गले का ब्लाउज-पेटीकोट पहन रखे थे | कई ऐसी भी लड़कियां थीं जो सिर्फ ब्रा-पैंटी में ही लोगो से ऑर्डर ले रही थीं | पर मुझे इन सब में सभी कोई रूचि नहीं थी | मेरी आँखें बेसब्री से चाची को ढूँढ रही थी | बैकग्राउंड में गाना बज रहा था, ‘रात बाकी, बात बाकी ... होना है जो... हो जाने दो...’ | कुछ लडकियां और औरतें नाचते हुए उन अमीर लोगों के पास जाती है और उनको पकड़ कर डांस फ्लोर पर ले गई | थोड़ी देर के डांस के बाद उनके हाथ पकड़ कर सीढ़ियों से ऊपर ले जाने लगी | बगल वाले एक वेटर से पता चला की आज रात ये लडकियां और औरतें इन्हीं अमीरजादो के बिस्तर गर्म करेंगी | इन अमीरजादों में कई विदेश में बसे दो नंबर का धंधा करने वाले बड़े बिजनेसमैन या फिर गैंगस्टर्स हैं | यहाँ इस होटल में जब मन करे आ जा सकते हैं | किसी न किसी पुख्ता कारण से पुलिस भी इनपर हाथ नहीं डालती है |
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11-17-2019, 12:52 PM,
#33
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
मैं अभी इन सभी बातों को सुन ही रहा था की मेरी नज़र सीढ़ियों पर चढ़ते एक आदमी और एक औरत पर ठहर गई | आदमी कोई शेख़ सा लगा | मैंने औरत पर गौर किया और ऐया करते ही दिमाग घूम गया मेरा | वो औरत और कोई नहीं, मेरी चाची ही थी ...और...और..ये क्या ड्रेस में?? एक सफ़ेद शर्ट जिसके बटन सारे खुले थे और शर्ट के निचले दोनों सिरे आपस में एक गाँठ देकर बंधे हुए थे | पेट और कमर का थोड़ा सा हिस्सा दिख रहा था | कमर पर उन्होंने एक मैक्रो मिनी स्कर्ट भी पहन रखा था | पक्की स्लट लग रही थी | मैं सबकी नज़र बचाते हुए फ़ौरन उनके पीछे पीछे सीढ़ियों पर चढ़ने लगा | काफ़ी लम्बी और घुमावदार सीढ़ी थी | सीढ़ियों के ख़त्म होते ही एक लम्बा सा कॉरिडोर शुरू हुआ जिसके दोनों तरफ़ कमरे थे | थोड़ी चहल पहल भी थी | बहुत सावधानी से चाची के पीछे पीछे चलते हुए, दूसरे लोगों को हाई हेल्लो करता हुआ आगे बढ़ रह था मैं | इस पूरे दौरान वह आदमी कभी चाची को चूमने की कोशिश करता तो कभी उनके पिछवाड़े पर अपना दायाँ हाथ रख कर हलके से मसल देता | उसके हरेक बेहूदी हरकत को चाची हँस कर टालने की कोशिश कर रही थी | थोड़ी ही देर में दोनों एक कमरे एक आगे आ कर रुके | चाची ने उस आदमी की ओर बड़ी कामुक मुस्कान देते हुए अपनी क्लीवेज की गहराइयों में दो ऊँगली डाली और एक चाबी निकाल ली और फ़िर उसी चाबी से उस कमरे का दरवाज़ा खोल कर उसमें घुस गई | वह आदमी भी चाची के पीछे पीछे अन्दर घुसा और दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दिया | उस कमरे के दरवाज़े के आगे पहुँच कर मैं बड़ी आतुरता से इधर उधर देखने लगा | मुझे कमरे के अन्दर होने वाली हरेक गतिविधि के बारे में जानना था और इसके लिए मेरा, उस कमरे के अन्दर देख पाने के लिए सक्षम हो पाना अत्यंत आवश्यक था | अधिक समय नहीं लगा | एक चीज़ पर नज़र पड़ते ही आँखें चमक उठी मेरी |


कमरे में एक सॉफ्ट इंस्ट्रुमेंटल थीम सोंग बज रहा है और चाची अपनी सेक्सी अदाओं से एक शेख़ टाइप के आदमी को रिझाने का प्रयास कर रही है | शेख़ एक बड़े से आरामदायक सोफ़े पर बैठ कर एक हाथ में ड्रिंक का ग्लास और दूसरे में सिगार लिए चाची के भरे जिस्म के हरेक कटाव को बड़े चाव और खा जाने वाली नज़रों से देख रहा था | चाची अलग अलग नृत्य मुद्राएँ दिखाते हुए थोड़े देर में उस शेख़ के करीब आई और थोड़ा सा आगे झुक कर शेख़ को अपने हृष्ट क्लीवेज का दीदार कराते हुए, अपने पेट पर बंधी शर्ट की गाँठ खोल कर धीरे धीरे अपने जिस्म से अलग कर एक ओर उछाल दी | चाची के गोरे से शरीर पर अब केवल एक छोटी साइज़ की ब्रा और कमर पर भी एक छोटी साइज़ की पैंटी रह गई थी जो ढकने से ज़्यादा दिखाने का काम अधिक कर रही थी | चाची के जिस्म के ऊपरी हिस्से में रह गई छोटी काली रंग की ब्रा भी कुछ ऐसी थी कि उनमें उनके यौवन के भारी दो कबूतर (चुचियाँ) समा नहीं पा रहे थे | मध्य आयु का शेख़ आँखें फाड़े चाची के अर्ध नग्न जिस्म को मानो आँखों से ही निगल जाने के लिए बुरी तरह बेताब हो चुका था | साला वो खूंसट सा शेख़, काली ब्रा की सीमाओं को तोड़कर खुले में उड़ पड़ने को तैयार ब्रा कप्स में कैद उन दो सफ़ेद से कबूतरों को ललचाई नज़रों से देख देख कर अपने होंठों पर हवसी पागलों जैसे जीभ फिराने लगा | उस कमीने की हालत ऐसी थी जैसे वो खुद बहुत मैच्यौर किस्म का हो जिसे ऐसे बातों से जल्दी फर्क नहीं पड़ता ... पर सच्चाई तो यह थी की लाख कोशिश करने के बावजूद भी वो खुद को चाची के भरे यौवन के मोहपाश से छुड़ा नहीं पा रहा था | वो अपनी आँखें चाची के जिस्म के दूसरे जगहों पर देना चाहता था पर ब्रा कप्स में कैद उन्नत यौवन उसे ऐसा करने की हरगिज़ कोई इजाज़त नहीं दे रहे थे |


चाची की चमकदार आँखों में खूबसूरती से लगे काले रंग की मसकरा (काजल) रह रह कर उस आदमी को जैसे अपनी ओर दौड़ कर आने का खुला निमंत्रण दे रही थी ; लाल लिपस्टिक से पुते उनके होंठ तो जैसे उस आदमी को मार देने का सुपारी लिए थी | चाची की बीच बीच में लचकाती – बलखाती कमर शेख़ के दिल के धड़कन को बार बार कई गुना अधिक बढ़ा दे रही थी और सच कहूं तो मैं भी चाची के इस कातिलाना रूप के मोहपाश से अछूता नहीं रह गया था | उस चोर खिड़की से देखते देखते न जाने कब मेरा एक हाथ पैंट के ऊपर से अपने हथियार को रगड़ने लगा था | और मेरा हथियार कोई ऐसा वैसा हथियार न होकर एक जहरीले नाग में बदल चुका था जिसे मानो अब सांस लेने बहुत दिक्कत हो रही थी और अब वह किसी भी तरह कैद से आज़ाद हो कर ; बाहर आ कर अपना कहर बरपाना चाहता था | वह शेख़ अपने सिगार के कश लगाना और ग्लास में बची खुची ड्रिंक को ख़त्म करने के बारे में कब का भूल चुका था | वह मंत्रमुग्ध सा एकटक चाची के हरेक कमसिन हरकत को देख रहा था | चाची को उसे अपनी तरफ़ यों देखते हुए शायद बहुत अच्छा लगा था क्योंकि उस शेख़ को देखते हुए वो भी अब हलकी हलकी विजयी मुद्रा वाली स्माइल देने लगी | शेख़ की हालत देख कर वो समझ चुकी है की शेख़ अब और कुछ भी ज़्यादा सोचने समझने की शक्ति को खो चुका है और यही बात शायद चाची को एक गर्व से परिपूर्ण मुस्कराहट देने के लिए विवश कर रहा था | चाची के चेहरे पर ऐसे गर्वित भाव और मुस्कान मैंने आज से पहले कभी नहीं देखा था |
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11-17-2019, 12:52 PM,
#34
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
वो शेख़ अपनी सुध बुध खो चुका था इसलिए वो अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रहा है | वह पूरी तरह से चाची के रूप यौवन के समुंदर में डूब चुका था | चाची शायद इसी पल के इंतज़ार में थी | वह इठलाती-बलखाती अपने नाज़ुक पैरों को सामने की ओर आरी तिरछी रखते हुए उस शेख़ के पास आई और आकर आँखों और चेहरे में कामुकता लिए उस शेख़ के आँखों में आँखें डाल कर देखने लगी मानो कह रही हो कि ‘क्या मैं ही सब करुँगी, तुम कुछ नहीं करोगे?’ | वह आदमी चुपचाप एकटक चाची को देखता रहा | चाची ने उसके दोनों हाथों से सिगार और ग्लास लेकर बगल के टेबल पर रखा और फिर दोनों हाथ पकड़ कर सहारा देते हुए उस आदमी को उठाई | वह आदमी चुपचाप उठ कर चाची को देखे ही जा रहा था, ऊपर से नीचे, वक्षों की गोलाईयाँ, कमर का कटाव, हृष्ट पुष्ट पिंडलियाँ, सुंदर गोरे तराशे हुए पैर .... सबको को निगल जाने वाली नज़रों से देख रहा था | ऐसा लग रहा है मानो उसके होंठों के एक किनारे से लार की एक पतली सी धार बह रही है | चाची को इतने पास पाकर अब तो जैसे उसके सब्र का बांध टूट ही गया | बरबस ही उसके हाथ चाची के जिस्म के चारों ओर लिपट गये | साथ ही चाची को खिंच कर अपने जिस्म से कस कर सटा लिया | चाची के सिर को किस करने के बाद हलके से दोनों गालों को चुमा और फिर बड़े प्यार से चाची के होंठों से अपने होंठों को रगड़ने लगा | कुछ मिनट प्यार से होंठों से होंठों को रगड़ते हुए अपने दोनों हाथों को पीछे ले जा कर चाची की गदराई पीठ का मसल मसल कर आनंद लेने लगा | और फ़िर अपने जीभ को थोड़ा सा निकाल कर चाची के होंठों पर चलाने लगा | कुछ सेकंड्स में ही चाची ने आँख बंद करते हुए अपने होंठों को खोल दिया और उनके ऐसा करते ही उस आदमी की जीभ चाची के मुँह में घुस गई | जीभ को कुछ देर तक अन्दर घुसाए चाची के पूरे मुँह का जाएजा लेता रहा | फ़िर अचानक से ही जीभ निकाल कर चाची की ओर कातर दृष्टि से देखने लगा मानो किसी बात की विनती कर रहा हो | चाची ने भी जैसे अपने मदहोश कर देने वाले नैनों से उसे उसकी मौन विनती की स्वीकृति दे दी और साथ ही अपनी नंगी कलाइयाँ उस आदमी के गले में हार बना कर रख दी |


और ऐसा होते ही दोनों एक दूसरे पर टूट से पड़े | दोनों एक दूसरे को अपने बहुत पास खिंच कर चुम्बनों की जैसे वर्षा ही कर दी | अधिक समय नहीं लगा दोनों के जीभ एक दूसरे के अन्दर जाने में | अब तो दोनों ही बहुत उत्तेजित नज़र आने लगे थे | दोनों ही को अब अपने आस पास की कोई सुध बुध ना रही | मिस्टर एक्स के कहे मुताबिक चाची वाकई में एक बहुत ही बेहतरीन मेहमान नवाजी कर रही है | अपने काम को बखूबी करना कोई चाची से सीखे | देख कर लग ही नहीं रहा है कि वो ये सब किसी मजबूरी से कर रही है | चाची के इस रूप को देख कर अब तो मैं भी उनका दीवाना सा बन कर रह गया | और विशेषकर उनके कामेच्छा से भरी काम क्रियाओं ने उनके प्रति मेरी कामासक्ति को और कई गुना अधिक से अधिक बढ़ा दिया | इधर उस शेख़ ने अपने जीभ को अलग करके धीरे धीरे चाची के उन्नत वक्षों की ओर बढ़ा और दोनों उन्नत उभारों के बीच से सुस्पष्ट रूप से नज़र आने वाली घाटी अर्थात क्लीवेज के ऊपरी सिरे पर प्यार से एक किस किया | फ़िर थोड़ा रुक कर तीन – चार चुम्बन लिया उसी जगह पर और फ़िर खुद को और न रोक पाते हुए उसने अपने होंठ उस पांच इंच झांकती क्लीवेज में रख दिया और धीरे धीरे होंठों के साथ साथ पहले उसका नाक और फ़िर उसका आधा से थोड़ा ज़्यादा तक का मुँह उस क्लीवेज में समा गया और बड़े प्यार से, हौले हौले, दोनों चूचियों को दाबते हुए अपने चेहरे पर साइड से दबाव बढ़ाने लगा | ये शायद चाची के कामाग्नि में घी डालने जैसा ही था |


चाची के मुँह से ‘आह..उह्ह्ह...’ की सिसकारी छूट निकली | वह अधेड़-सा शेख़ सा दिखने वाला आदमी लगातार अपने मुँह को क्लीवेज में घुसाए, चेहरे के दोनों ओर से चूचियों को दबा कर उनकी नरमी और गर्मी का एहसास किये जा रहा था और इधर चाची धीरे धीरे ही सही, पर भरपूर गरम हुए जा रही थी | इधर वो शेख़ क्लीवेज में मुँह घुसाए, ‘चुक..चुक’ सी आवाजें ऐसे निकाल रहा था जैसे मानो वो पूरे क्लीवेज का ही रसास्वादन चूस चूसकर कर लेना चाहता हो | अपने रूखे हाथों से वह चाची की कोमल गदराई पीठ पर हाथ फिरा-फिरा कर उस पीठ का मस्ती से आनंद लेता हुआ ब्रा के हुक खोल दिया और फ़िर पागलों की तरह पूरे पीठ पर बेरोक-टोक हाथ घुमाने लगा | ब्रा स्ट्रैप्स को धीरे धीरे अलग करते हुए, गले को चाटते हुए, कोमल, स्मूथ कन्धों के ऊपर से नीचे सरकाने लगा | चाची किसी भी तरह की कोई बाधा नहीं दी | काले ब्रा स्ट्रैप्स आधे गोरी बाँहों तक आ गए थे | ब्रा कप्स तो जैसे चाची के वक्षों से चिपक ही से गए हों | हद से ज़्यादा, बहुत ही कमसिन लग रही थी चाची | अभी तो पोर्न स्टार्स भी फ़ेल लग रहे थे चाची के सामने | ब्रा स्ट्रैप्स को वैसे ही छोड़ वह आदमी फ़ौरन अपने दोनों हाथ चाची के कमर पर ले गया और वहां से सीधे उनके नितम्बों पर, पैंटी के ऊपर हाथ रख कर नितम्बों को ज़ोर से मसल कर दबाने लगा |
“आह्ह्ह्ह.....” चाची मारे दर्द के कराह उठी |


अभी मैं कुछ और देखता की तभी एक जोड़ी जूतों की आवाज़ आई | मैं जल्दी से स्टूल से उतर कर, स्टूल को एक तरफ़ रख, बाथरूम में घुस कर दरवाज़ा लगा दिया | वह जूतों का मालिक सधे क़दमों से चलता हुआ बाथरूम के बंद दरवाज़े के पास आ कर कुछ देर के लिए रुका ; और फिर आगे बढ़ गया | मैं दरवाज़े से कान लगाए उसके कदमों के आहट को सुनता रहा | धीरे धीरे उन कदमों की आवाज़ मंद होती चली गई | जब आवाज़ आनी बिल्कुल बंद हो गई तब मैं धीरे से बाथरूम का दरवाज़ा खोला और बाहर आ गया | चाची की काम क्रियाएँ देखने का समय नहीं था मेरे पास अभी | मैं शीघ्रता से उस लम्बे कॉरिडोर में आगे बढ़ने लगा | अभी कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि एक रूम से आती कुछ आवाजें और सिगरेट के धुंए के गंध ने मुझे रूक जाने को विवश कर दिया | मैं आहिस्ते से उस कमरे की ओर मुड़ा और अन्दर से बंद दरवाज़े के की-होल से अंदर देखने की चेष्टा करने लगा | कुछ लोग अंदर बैठे सिगरेट के धुएं उड़ाते हुए, ग्लासों में जाम छलकाते हुए कहकहे लगा रहे थे | अधिकतर ने काले चश्में और कोट-टाई पहने हुए थे..... उनके चेयर के नीचे कुछ ब्रीफकेसेस भी रखे थे |


“हम्म्म्म.... ज़रूर यहाँ कोई सौदा हो रहा था, जोकि शायद अब सफ़ल हो गया है लगता है |” मैंने मन ही मन कहा | अभी कुछ और देखता-सुनता या समझता ; तभी एक ज़ोरदार कोई चीज़ मेरे सिर के पीछे आ लगी और बिना एक सेकंड गवांए, मेरे आँखों के आगे धीरे धीरे अँधेरा छाने लगा और मैं वहीँ गिर कर बेहोश हो गया |
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11-17-2019, 12:52 PM,
#35
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
बहुत ही पीड़ा के साथ आँख धीरे धीरे खोल पाया मैं | सिर के दाएँ तरफ़ अभी भी बहुत दर्द है | और दर्द भी ऐसा के दर्द के मारे मुँह से ‘आह’ भी नहीं निकल रहा है | जहाँ पर लेटा था मैं, वहीँ से लेटे लेटे ही अपने चारों और नज़र घूमाया | आसपास के चीज़ों को देखने के बाद मैं समझ गया कि मैं इस समय एक अस्पताल में हूँ | अस्पताल में होने का ख्याल आते ही मेरा हाथ अनायास ही सिर पर चला गया; ठीक उसी जगह जहाँ दर्द हो रहा था चोट के कारण .. हाथ लगाकर अनुभव किया की पट्टी बंधा था | वाह! अर्थात मेरा उपचार भी हो गया ! उठने की कोशिश करने के बावजूद भी उठ न सका मैं | बहुत कमजोर-सा फील कर रहा था | चुपचाप लेटा रहा | थोड़ी ही देर बाद उस रूम के दरवाज़े पर एक हलकी सी आहट हुई .. मैं पूर्ववत आँख बंद कर चुपचाप पड़ा रहा | ‘खट खट’ सी आवाज़ हुई रूम में .. चलने की आवाज़ थी | और आवाज़ से ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था कि ये हील की आवाज़ है और रूम में एक लड़की/ औरत आई है | मेरे बगल के कुर्सी और टेबल के थोड़ा इधर उधर होने की आवाज़ आई | फ़िर, वो जो कोई भी थी; मेरे पास आ कर कुछ देर खड़ी रही | न जाने ऐसा क्यूँ लग रहा है की वो बगल में खड़ी हो कर मुझे ही देखे जा रही है | तीन-चार मिनट वहां रह कर वो वापस बेड के मेरे पैरों के पास से होते हुए मेरे दूसरे ओर आकर सिरहाने खड़ी हो गई और आसपास की चीज़ों के साथ कुछ करने लगी | फिर प्लास्टिक फाड़ने की आवाज़ आई | दो सेकंड बाद ही ‘टन टन’ से एक छोटी सी शीशी के बजने की आवाज़ आई .... | थोड़ी सी शांति छाई रही | फ़िर अचानक से मुझे मेरे दाएँ बाँह पर एक बहुत तेज़ चुभन सी महसूस हुई | मुँह से कराह निकलने को रहा पर किसी तरह मुँह बंद रखने में सफल हुआ | ‘खट खट’ सी आवाज़ फिर हुई | वो जो भी थी, अब वापस जा रही थी .... इधर मेरा दिमाग धीरे धीरे सुन्न होने लगा... हाथ तो छोड़िये, अँगुलियों तक की हरकत बंद हो गयी ... मैं धीरे धीरे अपनी चेतना फिर खो बैठा... सो गया |


“कम ऑन ... पागल हो गये हो क्या... तुम्हे पता भी है की तुम क्या कह रहे हो?”

“हाँ, पता है.. पूरे होश में हूँ और इसलिए कह रहा हूँ | तुम मेरी बात समझने की कोशिश करो |”

मेरी नींद टूट चुकी थी | मुश्किल हो रही थी आँख खोलने में अभी भी ... पर कानो को बहुत कुछ साफ़ सुनाई देने लगा था | मैंने बिना हिले डुले कानो को उन बातों पर लगा दिया जो शायद मेरे आसपास कहीं हो रही थी | दो आदमी बात कर रहे थे, एक बड़ा शांत था तो दूसरा बेहद उत्तेजित | कोई ऐसा मुद्दा था जिसपे बहस चल रही थी |

“नहीं.. नहीं... बात समझने की कोशिश तुम करो.. तुम्हें पता है न बॉस का क्या हुक्म है ... साफ़ लफ़्ज़ों में कहा है उन्होंने की इस लड़के की शिनाख्त करने के बाद इसके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी जुटाया जाए और फिर काम ख़त्म होने के बाद इसे भी सलटा दिया जाए | ”

ये बात मेरे कानों में पड़ते ही मैं चौंक सा उठा | ‘सलटा दिया जाए?!’ यानि के मुझे मार देने की योजना चल रही है ??!! ओह्ह!! हे भगवान... ये कहाँ आ फंसा मैं ?

“मुझे अच्छी तरह से याद है कि बॉस ने क्या कहा है... मैं बस एक-दो दिन इसलिए रुकने को कह रहा हूँ ताकि इसे होश आने के बाद हम इससे कुछ और जानकारियाँ निकाल सकें | ज़रा ये भी तो सोचो की जो लड़का किसी ऐसे होटल में, जहाँ हर समय बड़े बड़े माफ़ियाओं और उनके चमचों का जमावड़ा लगा रहता हो, नशीली चीज़ों का और हथियारों का स्मगलिंग होता हैं, देह व्यापार होता है... वहां सकुशल पहुँच कर हर तरफ़ जासूसी कर के वापस जा रहा था... कैसे? इतनी आसानी से कैसे... ज़रूर इसके और भी साथी होंगे... कौन होंगे वो... वगेरह वगेरह... ये सब जानना हमारे लिए बहुत ही ज़रूरी है | ”

“ह्म्म्म... तुम ठीक कहते हो... ये सब जानना भी ज़रूरी है...पर ज़्यादा दिन इसे रख नहीं सकते... एक काम करते हैं.. और तीन दिन देखते हैं.. अगर इसे होश आ गया तो ठीक है... नहीं तो इसे इसके बेहोशी में ही खत्म कर देंगे... ठीक??”

“हाँ, ठीक है...| ”

जूतों की आवाज़ हुई... जाने की...| वे दोनों वहां से जा चुके थे |

और मैं इधर चुपचाप लेटा अपने हालत के बारे में सोचने पर मजबूर था | क्या हो रहा है... क्या होगा...कौन हैं ये लोग... और मैं खुद कहाँ हूँ... कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था | मैं अपना एक हाथ अपने चेहरे पर ले गया... नकली दाढ़ी मूंछ नहीं थी ! ओफ्फ़!! चोरी पकड़ी गयी मेरी... और वो भी गलत लोगों के हाथों..!


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अगले दो दिन तक मैं लेटा लेटा, आँखें बीच बीच में खोल कर कमरे और वहां आस पास के माहौल का जाएजा लेता रहा | बहुत कुछ नहीं भी तो खुद को वहां एडजस्ट करने लायक मान ही चूका था मैं | पर अभी तक ये समझ नहीं आया था कि मैं ये कहाँ और किन लोगों के साथ हूँ | इतना तो तय था की मैं हूँ किसी अस्पताल में, पर हूँ किन लोगों के बीच??


तीसरा दिन ...

सोच ही लिया हूँ की जैसे भी हो आज तो यहाँ से भाग कर रहूँगा ही | पिछले दो दिनों में मैंने एक बात नोटिस किया कि, एक वार्ड बॉय आता है मेरे कमरे में, यहाँ वहां देख कर सब चेक करता है और मेरे पैरों से थोड़ी दूर; दरवाज़े के पास रखे एक स्ट्रेचर को निकाल कर बाहर ले जाता है | सफ़ेद स्ट्रेचर पर रखा सफ़ेद चादर इतना बड़ा/लम्बा होता है कि स्ट्रेचर का निचला हिस्सा दिखाई ही नहीं देता है | अगर मुझे यहाँ से निकलना है तो इसी स्ट्रेचर के सहारे ही संभव है | मेरे दिमाग में तरकीब सूझी |


दोपहर बारह से दो बजे तक मेरा रूम बिल्कुल खाली रहता है ..
बारह बजे से कुछेक मिनट पहले नर्स पानी और फल वगैरह रख कर चली जाती है .. फिर साढ़े बारह बजे वार्ड बॉय फिर आता है और स्ट्रेचर लेकर चला जाता है |
मेरे ही रूम में दो और मरीज़ थे .. जो एक दिन पहले ही एक साथ ही अपने अपने परिवार वालों के साथ चले गए थे | अब उस कमरे में मैं अकेला बन्दा था अब |
बारह बजे का इंतज़ार करने लगा ...
ठीक ग्यारह बज कर पचास मिनट पर एक नर्स अन्दर दाखिल हुई | मैं अधखुली आँखों से लेटा हुआ था | अधखुली तिरछी नज़रों से नर्स पर गिद्ध की तरह नज़र जमाये था |
पानी-फल रख कर वो वहां से चली गई |
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11-17-2019, 12:52 PM,
#36
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
सामने की दीवार घड़ी पर नज़र दौड़ाया...

सवा बारह बज रहे हैं |

बिल्कुल सही समय है अपनी योजना पर काम करने का |

तपाक से बेड पर से उठा | खिड़की के पास जाकर खड़ा हुआ | बिना ग्रिल या लोहे की छड़ों वाली खिड़की थी | खिड़की से थोड़ी नीचे एक छज्जा सा बना हुआ है... शायद नीचे एक और खिड़की होगी | अपने दाएँ तरफ़ देखा | वहां एक और खिड़की है ... मैं सीधा हो कर अपने रूम के दाएँ तरफ़ देखा, बाथरूम था | मतलब बाथरूम में भी एक अच्छा खासा बड़ा सा खिड़की है | अमूमन ऐसा होता नहीं है ... पर....

खैर, अधिक सोचने लायक समय नहीं था मेरे पास | पर मेरा तरकीब कहीं न कहीं काम करने वाली थी यहाँ |

मैं जल्दी से बाथरूम में घुसा | एक बाल्टी लिया .. नल के नीचे लगाया और नल चला दिया | पानी मध्यम गति से बाल्टी में गिरने लगा | और अब बाथरूम का दरवाज़ा अन्दर से लॉक कर दिया |

बाथरूम का खिड़की खोला |

और लपक कर खिड़की से बाहर आ गया |

किसी तरह नीचे के छज्जे पर काँपते पैरों से संतुलन बना कर खड़ा था | दीवारों पर बने उभारदार बाउंड्री को पकड़ किसी तरह आगे बढ़ने लगा .... अपने रूम की खिड़की के नीचे के छज्जे की तरफ़... कष्ट तो हुआ बहुत | हाथ भी छिल गए ..पर अभी मेरा पूरा फोकस अपनी योजना को सफल बनाने पर था |

कुछ ही मिनट में मैं अपने रूम की खिड़की के पास था | वहाँ से नीचे देखने का साहस नहीं था मुझमे | बहुत ही उंचाई पर था मैं ... ज़रा सा पैर फ़िसला... और चला जाता मैं सीधे नीचे ... एकदम नीचे ..और... और एक झटके से हमेशा हमेशा के लिए ऊपर पहुँच जाता |
खिड़की के निचले हिस्से को पकड़ कर, अपने हाथों पर बल देते हुए खुद को थोड़ा ऊपर उठाया और अपने शरीर को एक हल्का झटका देते हुए सीधे रूम के फर्श पर जा गिरा | कोहनी में हलकी चोट आई पर खुद को संभालता हुआ जल्दी से दरवाज़े के पास रखे स्ट्रेचर के पास पहुँचा और उसपर पड़े उस बड़े से सफ़ेद चादर को उठा कर स्ट्रेचर के नीचे बने जगह में खुद को एडजस्ट कर लिया | जगह भी ऐसी थी की एक लम्बा आदमी आराम से अपने पैर पसार कर लेट जाए वहां |
अब सिर्फ सही समय की प्रतीक्षा थी ..


-----


कुछ ही देर बाद,...

दरवाज़ा खुला...

वार्ड बॉय अन्दर आया....

अन्दर घुस कर दो – तीन कदम चलते ही ठिठका....

कुछ क्षण रुक कर लगभग दौड़ते हुए बाथरूम की ओर गया ...

मैं चादर की ओट से एक आँख से देख रहा था...

दरवाज़ा धकेला... खुला नहीं...

खटखटाया ...

कोई आवाज़ नहीं... सिवाए पानी गिरने के.....

फिर कुछ पल बाथरूम के दरवाज़े से कान लगाए खड़ा रहा |


फिर थोड़ा निश्चिंत सा प्रतीत होता हुआ वो घूमा और कमरे की कुछेक चीज़ों को ठीक कर स्ट्रेचर को ले कमरे से बाहर आ गया !

मैंने राहत की सांस ली... पर अभी मंजिल दूर था |

एक बड़े से कॉरिडोर को पार करते हुए स्ट्रेचर हल्का सा मुड़ते हुए दूसरे कॉरिडोर में आ गया ....

अभी कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि अचानक से एक ज़ोर का ‘धकक्क’ से आवाज़ हुआ | मैंने वार्ड बॉय के कदमों की ओर देखा... ऐसा लगा जैसे की वो पीछे की ओर खींचा चला जा रहा है , जैसे कोई उसे खींच कर ले जा रहा हो ....

मेरा मन किसी घोर आशंका से भर उठा ... थोड़ी देर के चुप्पी के पश्चात अचानक से मेरे स्ट्रेचर को धक्का लगा... कोई उसे आगे ले जा रहा था | मैं आगे देखा... और चौंका... क्योंकि अब मुझे किसी वार्ड बॉय के पैरों के स्थान पर एक लड़की के दो टांगें दिख रही थी... ड्रेस से अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं हुआ कि ये शायद कोई नर्स होगी |

पर कौन.... एक जगह रुक कर मेरे सिरहाने के तरफ़ का चादर थोड़ा उठा और एक पैकेट दिया गया... और साथ ही एक लड़की की आवाज़ आई... “जल्दी ये लगा लो... दस सेकंड में...| ”


बिना कुछ सोचे मैंने जल्दी से पैकेट खोला और खोलते ही हैरान हो गया...


उस पैकेट में नकली दाढ़ी मूंछ और एक काला चश्मा था ....!


कुछ देर बाद मैं और वो लड़की एक लिफ्ट में थे... मैं एक व्हीलचेयर में बैठा था...नकली दाढ़ी मूंछ लगाए... बदन पर एक बड़ा सा शॉल लपेटे... |

लिफ्ट से बाहर आते ही दो आदमी हमारे पास आये...

मुझे सहारा दे कर उठाया...और अस्पताल ले बाहर ले आए |


उनके बाहर आते ही एक कार आ कर रुकी...ठीक हमारे सामने...





और फ़िर उन दोनों आदमी ने मुझे उस कार में ले जाकर पीछे की सीट पर लिटा दिया |
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11-17-2019, 12:53 PM,
#37
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
लेटे लेटे मैंने अस्पताल के ऊपरी मंजिल की ओर देखा, लगा जैसे थोड़ी अफरा तफरी सी लगी हुई है | शायद मेरे वहां न होने का उन लोगों को पता चल गया है | मैंने सर थोड़ा उठा कर आगे की सीट पर देखा... धक् से दरवाज़ा बंद हुआ.. ड्राइविंग सीट पर एक लड़की आ कर बैठी | कार तुरंत स्टार्ट हुआ... दोनों आदमी बाहर ही रहे..|



कार पूरे फ़र्राटे से रोड पर दौड़ पड़ी...|

“धन्यवाद... पर आप कौन...?” मैंने पूछा |

“पहले मंजिल पर पहुँचने दो... सब पता चल जाएगा...|” बहुत ही भावहीन और सपाट उत्तर मिला |

पता नहीं क्यों.. पर मैंने चुप रहना ही उचित समझा...| बहुत देर बाद कार हमारे ही घर के मोड़ वाले रास्ते पर आ रुकी... मैं हैरत में डूबा उस लड़की की ओर देखने लगा ... सोच रहा था की ये कौन है जिसे मेरे घर का एड्रेस तक मालूम है.?..

“जल्दी जाओ.. मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है..”

“पर आप हैं कौन... मेरा घर कैसे जानती हैं..? और..और......”

“सुनो.....कहा ना... ज़्यादा वक़्त नहीं है मेरे पास... मुझे जल्दी जाना है... नहीं तो उन लोगों को मुझ पर शक हो जाएगा...| पर इतना ज़रूर कहूँगी कि, ये हमारी आखिरी मुलाकात नहीं है... हम फ़िर मिलेंगे...| नाओ, गुड बाय...|” – इस बार लड़की के आवाज़ में तीखापन और झुंझलाहट साफ़ था |

मैं कार से उतर गया.. पर उतरने से पहले नकली दाढ़ी मूंछ और चश्मा पिछली सीट पर रख कर, एक बार फिर उस लड़की को धन्यवाद किया |

लड़की आगे जा कर गाड़ी घुमाई और मेरे पास आकर रुक कर बोली, “हमारे मंज़िल एक हैं..पर रास्ते अलग... और अगर तुम चाहो तो हम जल्द ही मंज़िल हासिल कर सकते है... ओनली इफ़ यू वांट... अगर तुम चाहो तो.....!”

इतना कह कर लड़की गाड़ी ले कर आगे निकल गई |


और इधर मैं बेवकूफ सा खड़ा, टूटी फूटी कड़ियों को आपस में जोड़ने की नाकाम कोशिश करता; कुछ देर तक उस लड़की के गाड़ी द्वारा दूर तक छोड़े गए धूल के गुबारों को देखता रहा... फ़िर सर झटक कर घर की ओर चल दिया... दिलो-दिमाग में बहुत से उधेड़बुन लिए..................|


थाना... पुलिस थाना... अपनी कुर्सी पर बैठे इंस्पेक्टर विनय भंडारी गहरी सोच में डूबा था | सामने टेबल पर रखी चाय पड़े पड़े ही ठंडी हो चुकी थी | और टेबल के दूसरे तरफ़ की कुर्सियों पर चाचा और चाची गहरी चिंता और उम्मीदों की आस लिए इंस्पेक्टर विनय भंडारी की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं | कमरे में एक भय और चिंतायुक्त सन्नाटा वाला माहौल था |

“ह्म्म्म.. आपका भतीजा पिछले दो दिन से घर से गायब है.. तो आप ये तीसरे दिन आकर रिपोर्ट क्यों कर रहे हैं? दूसरे ही दिन क्यों नहीं आ गए? क्या आपको ये उम्मीद था कि वो दूसरे दिन आ जाएगा?” – चुप्पी तोड़ते हुए इंस्पेक्टर विनय पहले बोला |

“दरअसल इससे पहले कभी उसने ऐसा नहीं किया और ना हुआ.. कुछ बताया भी नहीं था उसने.. अगर कोई परेशानी थी या कोई काम था जिसके तहत उसे बाहर कहीं जाना था तो वो हमें ज़रूर बताता |” – बड़े ही चिंतित स्वर में चाचा ने उत्तर दिया |
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11-17-2019, 12:53 PM,
#38
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
“मिस्टर आलोक.. क्या आपको ये उम्मीद था कि वो दूसरे दिन आ जाएगा?” – इंस्पेक्टर विनय ने चाचा के आँखों में गहराई से झाँकते हुए अपने प्रश्न को दोहराया और खास जोर भी दिया इस प्रश्न पर |

अपने चश्मे को ठीक करते हुए चाचा ने थोड़े सकपकाए अंदाज़ में उत्तर देने का प्रयास किया,

“ज..ज.....जी, ब... बताया ना, इस....इससे पहले अभय ने ऐसा कभी नहीं किया .. इसलिए थोड़ी सी उम्मीद थी कहीं न कहीं.. हमें लग रहा था की अभय की कोई न कोई खबर हमें मिल जाएगी... य...या..या शायद वो खुद ही हमें ख़बर कर देगा... इ..इस.. इसलिए............”

“ये सही कह रहे हैं इंस्पेक्टर साहब...” – इतनी देर में पहली बार मुँह खोला चाची ने, जो अब तक चुप बैठी थी |

चाची के इतना कहते ही इंस्पेक्टर विनय की नज़रें चाची की तरफ़ घूमी और नज़रें उन्ही पर जम गई ... सच कहा जाए तो नज़रें चाची पर भी नहीं, वरन उनके यौवन पर केन्द्रित हो गई थीं | रेशमी साड़ी, गर्मी के दिन के कारण; पसीने से जगह जगह से भीग जाने के कारण उनके गदराये जिस्म से चिपक गई थी |

जिस्म का एक एक कटाव और उभार साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था |

पारदर्शी वस्त्र में; संगमरमर की प्रतिमा सी नज़र आ रही थी चाची इस वक़्त |

ब्लाउज झीना था, कुछ जगहों से भीगा हुआ भी |

यहाँ तक की ब्रा का डिज़ाइन भी साफ़ नज़र आ रहा था |

चाची ने इंस्पेक्टर विनय की तरफ़ एक बार देखा ;

और फिर उसकी नज़रों को भांपते हुए अपने पल्लू को दुरुस्त किया | पर इंस्पेक्टर विनय की नज़रें अभी भी उस पारदर्शी पल्लू के अन्दर से साफ़ नज़र आ रही करीब तीन इंच की सुन्दर क्लीवेज पर टिकी हुई थी |

इंस्पेक्टर विनय की नज़रों में एक जानी पहचानी सी आकांक्षा देख कर चाची परेशान हो उठी |

‘उफ्फ्फ़....

ये तो ऐसे देख रहा है मुझे जैसे मेरे पल्लू से होते हुए ब्लाउज और ब्रा तक को चीर देना चाहता है | क्या ये मेरी बातें सुन भी रहा है?’ मन ही मन सोची चाची |

“आं...हाँ... हाँ.... वो तो मैं सुन ही रहा हूँ...| ” खुद को संभालने की कोशिश करते हुए बोला वह पर नज़रें अभी भी चाची के उभार और उनके बीच की दरार पर थी |


बेचैन-परेशान चाची को एकाएक अपने रूप सौंदर्य का आभास हुआ...

और इसके साथ ही लाज और झेंप की सुर्खी दौड़ गई उनके चेहरे पर |

साथ ही गर्व से तन गए उनके यौवन उभार |

इंस्पेक्टर विनय ने खुद को संभालने की भरसक कोशिश करता हुआ, मन ही मन चाची के यौवन के कटावों और उभारों की ओर न देखने का दृढ़ संकल्प लेता हुआ आवाज़ में थोड़ी गंभीरता लाते हुए बोला,

“आं.. देखिये मिस्टर एंड मिसेस शर्मा, मैं अपने कर्तव्य का पूर्णरूपेण पालन करूँगा और इस बात का आश्वासन देता हूँ की हमारी पुलिस डिपार्टमेंट सुबह शाम रात दिन एक कर के जहां से भी हो आपके भतीजे को ढूँढ निकालेगी और उसके गायब होने के पीछे के मुख्य अभियुक्तों को हरगिज़ नहीं छोड़ेगी |”

चाचा और चाची ने हाथ जोड़कर इंस्पेक्टर का अभिवादन किया, इंस्पेक्टर ने भी प्रत्युत्तर में हाथ जोड़ कर मुस्कराया | कुछेक ज़रूरी कागज़ी कार्रवाई कर के दोनों थाना से निकल गये पर इंस्पेक्टर विनय को चाची के मटकते नितम्ब उनके चले जाने के बाद भी बहुत देर तक नज़र आते रहे |
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11-17-2019, 12:53 PM,
#39
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
तीन दिन बाद,

चौथे दिन,

थाने से दूर एक दुकान के सामने खड़ा इंस्पेक्टर विनय एक हाथ में चाय का ग्लास और दूसरे में सिगरेट लिए सोच की मुद्रा में खड़ा था | उसके सामने उससे छोटे कद का एक आदमी खड़ा था जो किसी आस से विनय को लगातार देखे जा रहा था | काफ़ी देर तक वैसे ही खड़ा रहा वह ..

अपनी सोच से तब बाहर आया जब सिगरेट सुलगता हुआ फ़िल्टर तक पहुँच गया और उसकी गर्म आंच विनय को अपनी उंगुलियों पर महसूस हुई |

एक हल्का कश लेकर सिगरेट को पैर के नीचे मसला...

और चाय की एक सिप लेता हुआ सामने खड़े आदमी से बोला,

“तुम्हें पूरा यकीन है...? जो खबर सुना रहे हो उसमें कहीं कोई भूल चूक नहीं है ना?”

“बिल्कुल सही कह रहा हूँ साहब, इस सूचना में ज़रा सा भी कोई मेल मिलावट नहीं है |” आदमी ने खैनी और पान से सड़े अपने दाँतों को भद्दे तरीके से दिखाते हुए चापलूसी अंदाज़ में अपने स्वर में मिठास लाते हुए बोला |

“ह्म्म्म... नाम क्या बताया?”

“योर होटल, सरकार ”

“वहीं पर सब होता है?”

“बिल्कुल सरकार”

“हम्म्म्म...|”

फ़िर कुछ सोचते हुए इंस्पेक्टर विनय ने पैंट के पॉकेट से सौ के दो नोट निकाल कर उस आदमी की ओर बढ़ाया; वह आदमी पहले तो खुश हुआ, फ़िर थोड़ा सहम कर कुछ बोलने का कोशिश करने ही वाला था कि तभी विनय जैसे उसके मनोभाव को पढ़ कर बोल पड़ा, “अभी के लिए ये रख ले और सुन, थोड़ा और कमाना है तो ........” कहते हुए विनय अपने पैंट के दूसरे तरफ़ के पॉकेट में हाथ डाल कर कुछ ढूँढने लगा और कुछ ही सेकंड्स में एक तीन फ़ोटो निकाल कर उस आदमी के हाथ में थमाते हुए कहा, “मुझे इन तीनों की ज़्यादा से ज़्यादा खबर चाहिए ; तीनों की तो मतलब तीनों की ही ख़बर चाहिए ... किसी एक को भी मत छोड़ना.. समझे..?”

वह आदमी तीनों फ़ोटो को जल्दी से अपने शर्ट के अन्दर के पॉकेट में रखते हुए इधर उधर देखा |

थोड़ा करीब आया...

और धीरे से बोला,

“कोई संगीन मामला है क्या सरकार?”

“ऐसा ही समझो, वैसे भी आजकल लगभग हर केस संगीन ही जान पड़ता है |” एक सिगरेट सुलगाकर लम्बा सा कश लेते हुए विनय बोला |

“ओह्ह..”

फ़िर करीब दो मिनट की शांति छाई रही |

दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा |

फ़िर धीरे से उसी आदमी ने कहा,

“तो क्या अब मैं जाऊँ, साहब?”

“हाँ, जाओ... और अभी से ही काम पर लग जाओ |” एक लम्बा धुंआ छोड़ते हुए विनय काफ़ी सख्त लहजे में आदेश देते हुए कहा |

“जी सरकार”

बोल कर वह आदमी उस दूकान के सामने से हट कर तेज़ी से एक ओर बढ़ गया और जल्दी ही बाज़ार के भीड़ में गायब हो गया |

इंस्पेक्टर विनय कुछ देर तक वहीँ खड़े रह कर गहन सोच की मुद्रा में सिगरेट के कश लगाता रहा और सिगरेट के खत्म होते ही अपनी जीप की ओर बढ़ गया |


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दो तीन बीत गए..

थाने में अपने टेबल के सामने वाली कुर्सी में बैठा विनय, अपने सामने कुछ फ़ाइलों को टेबल पर रखकर किसी सोच में डूबा हुआ था | और देख के ही साफ़ जाहिर हो रहा था कि वह अपने किसी सोच को उसके मुकाम में पहुँचाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है | अपनी सोच में इस कदर डूबा हुआ था विनय कि अभी कुछ ही मिनट पहले उसका दोस्त और उसी के साथ काम करने वाला सब इंस्पेक्टर सुशील दत्ता ‘गुड मोर्निंग’ बोल कर उसके विपरीत कुर्सी पर बैठ कर उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा था इस बात का उसे पता ही नहीं चला |

कुछ देर के इंतज़ार के बाद इंस्पेक्टर दत्ता ने जोर से खांसते हुए उसे फ़िर से ‘गुड मोर्निंग’ कहा तो एकदम से विनय अपने सोच से बाहर आया और सामने अपने मित्र/सहयोगी को देख चौंक सा गया | इधर उधर देख कर खुद को संयत करते हुए अपने कुर्सी पर ठीक से बैठते हुए अपने मित्र की ओर मुखातिब होते हुए बात शुरू की,

“बोल यार, कैसे हो?”

दत्ता बोला- “मैं तो ठीक ही हूँ यार, पर तुम बताओ ... किस सोच में डूबे थे?”

विनय- “अरे एक केस है यार ... उसी में थोड़ा उलझा हुआ हूँ |”

“अच्छा !!.. कैसा केस भाई... हमें भी बताओ.. ”

“ह्म्म्म... तो सुन; एक दम्पति है.. उनके बच्चे बाहर बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते हैं | उनका भतीजा उनके साथ ही रहता है, अच्छा लड़का है.. पढ़ा लिखा है, एक कोचिंग सेंटर भी चलाता है जिससे उसे एक अच्छी आमदनी भी होती है , फैमिली बहुत ही अच्छी और उनका हिस्ट्री और बैकग्राउंड भी बढ़िया है | पर कुछ दिन से उनका भतीजा लापता है | एकदम अचानक से.. कहीं कोई ख़बर नहीं, हर संभावित जगह ढूँढा और पता लगाने की पूरी कोशिश की गई ; पर नतीजा कुछ नहीं | अभी दो तीन पहले ही मेरे ख़बरी ने मुझसे सुप्रसिद्ध योर होटल में धावा बोलने की सलाह दी है ; उसका कहना है कि कुछ सवालों के जवाब मुझे वहीँ से मिल सकते हैं |” – एक साँस में कह गया विनय |
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11-17-2019, 12:53 PM,
#40
RE: Gandi Sex kahani भरोसे की कसौटी
सब कुछ ध्यान से सुनने के बाद दत्ता कुछ देर ख़ामोश रहा, फिर बड़े ही सोचने वाली निगाहों से विनय की आँखों में देखते हुए पूछा,
“तो क्या सोचा तुमने?”

“किस बारे में?” – एक किंग साइज़ सुलगाते हुए, सिगरेट का पैकेट और लाइटर दत्ता की ओर बढ़ाते हुए विनय बोला |

“केस के बारे में.. योर होटल जाने का इरादा है क्या? ” – सिगरेट सुलगाने की बारी अब इंस्पेक्टर दत्ता की थी |

“सोच तो वही रहा हूँ .. अगले आधे घंटे में वहीं जाऊँगा |”

“तो फ़िर ठीक है.. जब जाओ तो मुझे भी बुला लेना | ”

“नहीं यार... मेरे दो तीन केस और पेंडिंग हैं .. दो जमानत की अर्जी भी आने वाली है .. ऐसा करो, तुम आज मेरी जगह उन कामों को संभाल लो | मैं कुछ सिपाहियों के साथ योर होटल का एक चक्कर मार कर आता हूँ... आ के सब सुनाऊंगा.. फ़िर अगर तुम्हे लगे की ये केस दिलचस्प है और इस केस के साथ जुड़ने का मन करे तब ही हाथ लगाना केस को... ओके?”

दत्ता मुस्कराते हुए बोला, “ओके .. नो प्रोब्लम | तू चिंता ना कर दोस्त... तेरा ये दोस्त तेरे कामों को संभाल लेगा | यू कैन काउंट ऑन मी |”

इस बात दोनों ठहाके लगा कर हँस पड़े |

---

एक घंटे बाद,

योर होटल में पंद्रह सिपाहियों के साथ इंस्पेक्टर विनय | सभी सिपाही सभी कमरों की तलाशी ले रहे थे और इधर होटल का मेनेजर थोड़े घबराये अंदाज़ में विनय के सामने खड़ा था | विनय गिद्ध की तरह उसपर दृष्टि जमाए उसके हरकत को देख रहा था | मैनेजर का यूँ नर्वस होना विनय को कहीं न कहीं उसके पॉवर का एहसास करा रहा था पर साथ ही एक सम्भावना भी बन रही थी कि हो सकता है इस होटल में ज़रूर कुछ गड़बड़ है जिस कारण ये मैनेजर ऐसे घबरा रहा है | पसीने की एक बूँद मैनेजर के माथे से दांये तरफ़ से होते हुए गाल तक आ पहुँची और मैनेजर काँपते हाथों से अपने ब्लेजर के सामने के पॉकेट से रुमाल निकाल कर, पसीने को पोंछ कर रूमाल वापस अपने पॉकेट में रख लिया |

अपने ओहदे और औकात पर मन ही मन गर्व करता हुआ विनय गंभीर आवाज़ में मैनेजर से पूछा,

“दो बार पूछ चुका हूँ .. ये तीसरी और आखिरी बार है ; सच सच बताओ... यहाँ क्या क्या चलता है रातों को?”

“मैं सच कह रहा हूँ साहब.. यहाँ किसी भी तरह की कोई भी गलत एक्टिविटी नहीं होती है | सब अच्छे पोस्ट पर काम करने वाले और अच्छे घरानों के लोग आते हैं यहाँ | हाँ, फ़रमाइश पर ड्रिंक्स भी परोसी जाती है.... और साहब, ड्रिंक्स रखने और पिलाने की हमें लाइसेंस प्राप्त है |” – हिम्मत करते हुए मैनेजर बोला |

“लाइसेंस मैं देख चुका हूँ और यहाँ किस और कितने अच्छे घराने के लोग आते हैं उसका अंदाज़ा मुझे है ... बस प्रूफ नहीं है | जिस दिन कोई सबूत मिला न,

इतनी कठोर कार्रवाई करूँगा की शहर और जिला तो छोड़ो, पूरे देश भर में एक मिसाल होगा |” – हेकड़ी दिखाते हुए विनय बोला |

मैनेजर चुप रहने में ही भलाई समझा |

विनय फिर बोला,

“सुना है यहाँ लडकियाँ और औरतें भी वेटर का काम करती हैं ?”

“हाँ साब... जिन लड़कियों या फिर महिलाओं को पैसों की ज़रुरत होती है वो यहाँ पार्ट टाइम सर्विस देती हैं |”

“कौन सी सर्विस?” विनय ने आँखें तरेरा |

“वेटर वाली सर्विस सर, वेटर वाली....” मैनेजर घबराते हुए बात को संभालने की कोशिश करता हुआ बोला |

“ह्म्म्म... ठीक है... अच्छा .. जिन लड़कियों और महिलाओं की ‘सर्विस’ लिया जाता है इस होटल में ; उन लोगों का कोई रिकॉर्ड तो रखते होगे ना तुम लोग??”

“जी साब .. एक मिनट..” कह कर मैनेजर अपने डेस्क के पीछे गया और तीन चार रजिस्टर को इधर उधर करने के बाद एक नीली जिल्द लगी बड़ी सी रजिस्टर ले कर विनय के पास आया और उसके हाथो में रजिस्टर थमाते हुए बोला,

“आज तक जितनी भी महिलाओं और लड़कियों ने हमारे यहाँ काम किया है उन सबके नाम और फ़ोटो इस रजिस्टर में हैं |”

“हम्म, पता नहीं रखते? आई मीन एड्रेस?”

“नहीं साब |”

“ह्म्म्म...”


कहते हुए विनय सबसे दूर हट कर एक कुर्सी पर जा बैठा और रजिस्टर का एक एक पन्ना ध्यानपूर्वक पलट पलट कर देखने लगा | काफ़ी देर तक बहुत से पन्ने पलटने के बाद विनय एकाएक रुक गया और एक पन्ने को बड़े ही ध्यान से देखने लगा | उस पन्ने में लगे नाम ... और ख़ास कर उस नाम के साथ लगे फ़ोटो को बार बार आरी तिरछी कर अच्छे से देख रहा था | आश्चर्य से आँखें गोल और बड़ी बड़ी हो गई थी उसकी... शायद उस फ़ोटो को पहचान गया था, “ये क्या... नाम ..’चमेली’? प..पर.. इसका नाम तो .......|” कुछ देर तक आश्चर्य से उस फ़ोटो को देखने के बाद सहसा विनय के चेहरे पर एक कुटिल और मतलबी मुस्कान छा गई | अपने आस पास पैनी नज़र दौड़ाई, सब इधर उधर देख रहे थे ... विनय पर किसी का ध्यान नहीं था .. विनय ने चुपके से उस फ़ोटो को पन्ने से उखाड़ा और जल्दी से अपने पॉकेट में डाल लिया |

थोड़ी देर बाद,

होटल मैनेजर को कड़ी हिदायत देने और थोड़ी हेकड़ी और डांट पिलाने के बाद विनय अपने सिपाहियों के साथ पुलिसिया जीप में बैठा वापस थाने लौट रहा था की अचानक एक दुकान के सामने उसे वही आदमी (ख़बरी) दिखाई दिया | उसे देखते ही विनय को कुछ याद आया और तुरंत जीप रोकने को बोलकर उस आदमी को बुलाने लगा,

“ए... ए मंगरू.... इधर सुन |” – पूरे पुलिसिया तेवर में चिल्लाया विनय |

वह आदमी,जिसका नाम मंगरू था , धीरे धीरे सहमे अंदाज़ में उसके पास आया | उसके पास आते ही विनय ने उसे दो ज़ोरदार थप्पड़ देते हुए कहा,

“क्या रे.... तू सुधरेगा नहीं ना..? तेरी फ़िर शिकायत आई है...!!”

मंगरू - “आह्ह्ह... नहीं साब...नहीं.... ज़रूर कुछ गड़बड़ हुयी है... आपको गलतफहमी हुई है सरकार....”

“क्या बोला... मुझे गलतफ़हमी...!! साले.... ज़बान लड़ाता है.. |” कहते हुए विनय ने उसे दो तीन थप्पड़ और रसीद कर दिए |

फिर उसका कालर पकड़ कर अपने पास खींचते हुए बहुत धीरे से बोला, “क्या रे... कोई खबर है?”

मंगरू ने भी उसी अंदाज़ में कहा, “हाँ साब... शाम को मिलो |”

उसके इतना कहते ही विनय ने उसे जोर से झिड़कते हुए कहा, “आज के बाद फ़िर इस तरह की शिकायत नहीं आनी चाहिए... समझा??!!”

“जी सरकार...” मंगरू ने हाथ जोड़ कर कहा |

विनय की जीप अपने मंजिल की ओर आगे बढ़ चुकी ... बाज़ार में मौजूद लोगों में से कोई इसे पुलिस की दबंगई तो कोई मंगरू की ही गलती समझा रहे थे पर कोई भी उन दोनों, अर्थात मंगरू और विनय के होंठों पर उभर आये अर्थपूर्ण मुस्कान को देख नहीं पाया |

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