Hindi Antarvasna - आशा (सामाजिक उपन्यास)
10-12-2020, 01:26 PM,
#31
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
अगली शाम को आशा मैरिन ड्राइव पर समुद्र के बान्ध की दीवार पर उसी स्थान पर बैठी अशोक की प्रतीक्षा कर रही थी, जहां वह उसी दिन अशोक ने आज फोन पर उससे उसको वहीं प्रतीक्षा करने का अनुरोध किया था ।
लगभग छ: बजे अशोक आया ।
आज वह बेहद खुश नजर आ रहा था । वह आकर आशा की वगल में बेठ गया ।
“आज बहुत खुश हो ?” - आशा ने प्रश्न किया ।
“हां ।” - अशोक बोला - “बहुत खुश हूं आज मैं ।”
“आज तुमने मुझे, यहां आने के लिये क्यों कहा था ?”
“अभी बताता हूं ।” - और अशोक ने अपनी जेब में हाथ डाला और फिर बन्द मुट्ठी बाहर निकाली ।
“आज मैं तुम्हारे लिये एक चीज लाया हूं ।” - अशोक अपनी बन्द मुट्ठी आशा के सामने लाता हुआ बोला ।
“और वह चीज इस मुट्ठी में है ?”
“हां ।”
“क्या है ?”
“पहले वादा करो कि तुम उसे स्वीकार करोगी ?”
“पहले बताओ तो सही क्या है ?”
“नहीं, पहले वादा करो ।”
“अच्छा ।”
“क्या अच्छा ?”
“वादा करती हूं ।”
अशोक ने बन्द मुट्ठी उसके मुंह के सामने लाकर खोल दी । आशा के नेत्रों के सामने प्रकाश की किरणों सी फूट पड़ी । अशोक की हथेली पर एक नई नकोर अंगूठी चमचमा रही थी ।
“अंगूठी ।” - आशा के मुंह से बरबस निकल गया
“लाओ तुम्हें पहना दूं ।”
आशा ने अपना हाथ आगे नहीं बढाया ।
“देखो, तुमने वादा किया है ।”
आशा ने झिझकते हुये अपना बायां हाथ आगे बढा दिया ।
अशोक ने उसके हाथ की दूसरी उंगली में अंगूठी पहना दी ।
“कैसी है ?” - अशोक ने पूछा ।
“बहुत खूबसूरत है । कितने की होगी ?”
“पूरे पचास हजार की है ।” - अशोक बोला ।
“तुम्हारी एक एक आदत मेरी सहेली सरला से मिलती है । वह भी हर चीज की कीमत हमेशा नये पैसों में बताती है । कहती है कि मोटी मोटी रकमों का नाम लेने में बड़ा मजा आता है और उनके मनोवैज्ञानिक प्रभाव की वजह से मन में बड़ी ऊंचे दर्जे की इच्छायें पैदा होती हैं । तुम भी क्या इसीलिये पांच सौ रूपयों को पचास हजार कह रहे हो ?”
अशोक केवल मुस्कराया ।
“लेकिन पांच सौ रुपये में तो बड़ी महंगी अंगूठी है यह ।”
“आशा, शायद मेरी यह आदत तुम्हारी सरला से नहीं मिलती ।” - अशोक सहज स्वर से बोला - “यह अंगूठी पचास हजार रुपये की है ।”
“क्यों मजाक कर रहे हो ?” - आशा हंसती हुई बोली ।
“यह असली हीरे की अंगूठी है ।”
आशा की हंसी में एकदम ब्रेक लग गई । अशोक गम्भीर था । उसने एक बार अपनी उंगली में जगमगाती हुई अंगूठी को देखा, फिर अशोक के धीर गम्भीर चेहरे की ओर देखा और फिर अविश्वासपूर्ण स्वर से बोली - “नहीं ।”
“आशा ।” - एकाएक अशोक बान्ध पर से नीचे फुटपाट पर उत्तर गया - “तुम यहीं ठहरो । मैं अभी एक मिनट में आता हूं ।”
“कहां जा रहे हो ?”
“अभी आकर बताता हूं ।” - अशोक बोला - “आज मैं एक बहुत बड़े झूठ पर से पर्दा उठाने वाला हूं ।”
अशोक आगे बढा गया । फिर वह सड़क पार करके मैरिन ड्राइव की विशाल इमारतों की कतार में कहीं खो गया ।
आशा परेशान सी वहीं बैठी रही । रह रह कर उसकी दृष्टि अंगूठी की ओर उठ जाती थी । क्या यह अंगूठी पचास हजार रुपये की हो सकती है । चमकती तो बहुत है । शायद हीरा असली ही हो । लेकिन इतनी महंगी अंगूठी अशोक के पास कहां से आई ? कहीं यह चोरी का माल तो नहीं है । सूरत से अशोक ऐसा आदमी मालूम तो नहीं होता । जरूर मजाक को जरूरत से ज्यादा तूल दे रहा होगा । इतनी महंगी अंगूठी कैसे हो सकती है यह ।
“क्या सोच रही हो ?” - अशोक न जाने कब वापिस लौट आया था ।
“कुछ नहीं ।” - आशा बौखला कर बोली ।
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10-12-2020, 01:26 PM,
#32
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
“सोच रही होगी कि कहीं किसी सेठ की तिजोरी तोड़ कर तो यह अंगूठी नहीं निकाल लाया मैं ।”
“अशोक, सच बताओ । वाकई यह अंगूठी पचास हजार रुपये की है ?”
“हां ।”
लेकिन आशा के चेहरे पर विश्वास की छाया भी प्रकट नहीं हुई ।
“अभी तुम कहां गये थे ?” - उसने अशोक से पूछा ।
“फोन करने ।” - अशोक बोला ।
“किसे ?”
“अभी तुम्हें सब कुछ मालूम हो जायेगा ।”
आशा चुप हो गई ।
उसी क्षण सड़क पर एक चमचमाती हुई इम्पाला गाड़ी आकर रुकी ।
“आओ ।” - अशोक आशा का हाथ थामता हुआ बोला ।
आशा ᣛबान्ध से नीचे उत्तर आई ओर बोली - “कहां ?”
अशोक ने उत्तर नहीं दिया । वह आशा का हाथ थामे सड़क की ओर बढा । वह इम्पाला गाड़ी के समीप पहुंचा ।
इम्पाला में से एक वर्दीधारी शोफर बाहर निकला । उसने अशोक को ठोक कर सलाम किया और कार की पिछली सीट का द्वार खोल दिया ।
आशा के नेत्र फैल गये । वह भौंचक्की सी कभी अशोक को और कभी शोफर को देखने लगी
“गाड़ी में बैठो, आशा ।” - अशोक शान्ति से बोला ।
“ल ल लेकिन... लेकिन...” - आशा हकलाई ।
“बैठो तो ।” - अशोक अनुरोधपूर्ण स्वर से बोला ।
आशा झिझकती हुई गाड़ी में बैठ गई । अशोक भी उसकी बगल में बैठ गया । शोफर ने द्वार बन्द कर दिया और ड्राइविंग पर जा बैठा ।
“कहां चलू साहब ?” - शोफर ने आदरपूर्ण स्वर से पूछा ।
“जे पी कहां है ?” - अशोक ने पूछा ।
“वे तो इस समय नेपियन सी रोड पर अर्चना माथुर की कोठी पर हैं ।”
“वहां क्या है ?”
“पार्टी है, साहब ।”
“वहीं चलो ।”
शोफर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी ।
“जे पी कौन है ?” - आशा ने बौखलाये स्वर से प्रश्न किया - “और ये गाड़ी किसकी है ? हम कहां जा रहे हैं ?”
“जे पी मेरे डैडी का नाम है, गाड़ी तुम अपनी ही समझ लो और मैं इस समय तुम्हें डैडी से मिलवाने ले जा रहा हूं ।”
“नेपियन सी रोड पर अर्चना माथुर जैसी मशहूर फिल्म स्टार की कोठी पर ? पार्टी में ?”
“हां ।” - अशोक सहज स्वर से बोला ।
“तुम्हारे डैडी तो भायखला में रहते हैं न और रिटायर...”
“वह सब भूल जाओ ।”
“अशोक ।” - आशा एकाएक बड़े ही गम्भीर स्वर से बोली ।
“हां ।”
“मेरी ओर देखो ।”
“लो ।” - और अशोक उसके नेत्रों में झाकने लगा ।
“तुम कौन हो ?”
“मैं अशोक हूं ।”
“वह तो तुम हो । अशोक होने के भलावा तुम और क्या हो ?”
“अशोक होने के इलावा मैं इनसान हूं, तुम से मुहब्बत करता हूं, जल्दी ही तुम से शादी करने वाला हूं और इस समय मैं तुम्हें अपने डैडी के पास ले जा रहा हूं ताकि वे अपनी होने वाली बहू को एडवांस में आशीर्वाद दे सकें ।”
“अशोक किसी गलतफहमी में मत पड़ो । मैंने कभी भी तुम से नहीं कहा कि मैं तुम से शादी करूंगी ।”
“ठीक है लेकिन मुझे विश्वास है मैं जल्दी ही तुम्हारा इरादा बदल दूंगा ।”
“अशोक तुमने मुझे अभी भी नहीं बताया है कि तुम कौन हो ?”
उसी क्षण कार एक विशाल कोठी के कम्पाउण्ड में प्रवेश कर गई और पोर्टिको में आ रुकी ।
एक वर्दीधारी वेटर ने आगे बढकर कार का दरवाजा खोला और अशोक को सलाम किया ।
“आओ ।” - अशोक बोला ।
आशा सकुचाती हुई कार से बाहर बाहर निकल आई ।
अशोक ने उसकी बांह पकड़ी और उसे कोठी के भीतर ले चला ।
कोठी का हाल मेहमानों से भरा हुआ था । वहां मर्दों से ज्यादा औरतें थीं । सब कीमती परिधानों में लिपटे हुए लिये पुते शरीर थे । हर किसी के चेहरे पर एक विशेष प्रकार की चमक थी जो केवल पैसे वालों के चेहरे पर ही सम्भव हो सकती है । विलायती शराब के दौर चल रहे थे । लगता था कि किसी को भी शराब पीने, गगनभेदी ठहाके लगाने, और मेजबान की तारीफ में कसीदे पढने के सिवाय कोई काम नहीं था ।
“हल्लो.. अशोक !”
आवाज पहचानने में आशा को देर नहीं लगी । वही स्वर था, स्वर में वही मादकता थी, वही अर्चना माथुर थी और वैसे ही कीमती परिधान में लिपटी हुई हजार वाट के बल्ब की तरह जगमगा रही थी, जैसे आशा ने उसे पहले मैट्रो सिनेमा के बाहर देखा था ।
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10-12-2020, 01:26 PM,
#33
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
“हल्लो ।” - अशोक अर्चना माथुर की ओर घूमकर मुस्कराता हुआ बोला ।
“बड़ा अच्छा किया तुम आ गये । मैं तो जे पी से तुम्हारे ही बारे में पूछ रही थी ।”
“थैंक्यू ।”
“यह कौन है ?” - अर्चना माथुर ने जैसे पहली बार आशा को देखा ।
“यह मेरी मित्र है ।”
“कौन है ? कोई जूनियर आर्टिस्ट है ? पहचानी हुई सी सूरत लगती है ।” - अर्चना माथुर उसे गौर से देखती हुई बोली ।
“नाम है आशा ।”
“नाम भी सुना हुआ सा लगता है ।” - अर्चना माथुर पूर्ववत उसे घूर रही थी - “मैं तुमसे पहले भी कभी मिली हूं ।”
“जी हां ।” - आशा दबे स्वर से बोली - “एक बार मैट्रो सिनेमा के बाहर सिन्हा साहब ने मेरा परिचय आपसे कराया था । आप ‘अरे बस्क’ देखने आई हुई थीं ।”
“ओह हां याद आ गया ।” - अर्चना माथुर नाक सिकोड़ कर बोली - “तुम तो सिन्हा की सेक्रेटरी हो ।”
“जी हां ।” - आशा धीरे से बोली । एकाएक वह स्वयं को बड़ा अपमानित अनुभव करने लगी थी ।
“अशोक तुम इसे कैसे जानते हो ?” - वह अशोक की ओर मुड़कर ऐसे स्वर से बोली जैसे किसी बेहद घटिया चीज का जिक्र कर रही हो - “और इतनी बड़ी बम्बई में तुम्हें कम्पनी के लिये इससे बेहतर हैसियत की लड़की दिखाई नहीं दी ?”
आशा का चेहरा पीला पड़ गया । वह अपने आप में सिमट कर रह गई । ठीक ही तो है, वह इन लोगों में कैसे खप सकती है । उसका तो लिबास ही उसकी चुगली कर रहा होगा ।
“शटअप, अर्चना ।” - अशोक तनिक क्रोधित स्वर से बोला - “तुम आशा की तौहीन कर रही हो । ऐसी घटिया बातें करते हुए शर्म आनी चहिये ।”
“ओह, आई एम सारी ।” - अर्चना अभिनय सा करती हुई बोली ।
अशोक आशा की बांह थामकर आगे बढ गया ।
“अशोक ।” - आशा रुआंसे स्वर से बोली - “मैं यहां से फौरन जाना चाहती हूं ।”
“तुम अर्चना की बात का बुरा मत मानो, आशा ।” - अशोक उसे समझाता हुआ बोला - दो कौड़ी की औरत है यह अक्ल तमीज से तो इसका दूर दूर तक का वास्ता नहीं है ।”
“लेकिन...”
“थोड़ी देर और ठहरो, फिर चलते हैं ।”
आशा चुप हो गई ।
अशोक उसका हाथ थामे मेहमानों में से गुजरता हुआ आगे बढता रहा । हर कोई अशोक को ‘हल्लो’ कहता था और फिर विचित्र नेत्रों से आशा को देखने लगता था । पार्टी में मौजूद हर आदमी अशोक को जानता था । अशोक अपने होठों पर फैली हुई एक नपी तुली मुस्कराहट से ही सबकी ‘हल्लो’ का उत्तर देता हुआ अन्त में हाल के दूसरे सिरे पर पहुंच गया जहां एक विशाल सोफे पर एक विशाल शरीर बैठा हुआ था । उसके आस पास पांच छ: स्त्री पुरुष और भी मौजूद थे लेकिन वह तो सबके आकर्षण का केन्द्र मालूम हो रहा था । वह एक लगभग पचास वर्ष का सुर्ख चेहरे वाला वृद्ध था । उसका सिर एक दम गंजा था । उसके एक हाथ में व्हिस्की का गिलास था, दूसरा हाथ अपनी बगल में बैठी हुई युवती की कमर में था और हो हो करके हंस रहा था । उसकी हंसी की तालमेल में ही उसका विशाल पेट हिल रहा था ।
वृद्ध की नजर अशोक पर पड़ी और वह ऊंचे स्वर से बोला - “आओ, आओ, बरखुरदार ।”
“ये मेरे डैडी हैं ।” - अशोक धीरे से बोला ।
आशा ने मशीन की तरह अपने दोनों हाथ जोड़ दिये । उस के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला ।
“और जेपी यह आशा है जिसका जिक्र मैंने आपसे किया था ।” - अशोक वृद्ध से बोला ।
जेपी की तीक्ष्ण दृष्टि आशा के सिर से लेकर पांव तक फिर गई । अपना निरीक्षण समाप्त कर चुकने के बाद वह ऊंचे स्वर से बोला - “अच्छा, यह है वह लड़की । बरखुदार तुम्हारी पसन्द की दाद देता हूं मैं । सारी बम्बई में मैंने इससे ज्यादा खूबसूरत औरत नहीं देखी ।”
न जाने क्यों आशा को अपने लिये औरत की संज्ञा का इस्ते माल बड़ा बुरा लगा । जेपी के कहने का ढंग भी उसे बड़ा अश्लील लगा ।
“यहां आओ ।” - वह आशा से बोला ।
अशोक ने आशा का हाथ छोड़ दिया ।
आशा झिझकती हुई आगे बढी ।
जेपी ने विस्की का गिलास सामने मेज पर रख दिया और अपना दूसरा हाथ बगल में बैठी हुई कमर में से निकाल लिया । वह उठकर खड़ा हो गया । फिर उसका भारी भरकम दायां हाथ आशा की पीठ पर पड़ा । जेपी की प्रशंसात्मक निगाहें आशा के चेहरे पर टिक गई । आशा ने नेत्र झुका लिये । जेपी की निगाहें चेहरे से फिसलीं और आशा के उन्नत वक्ष पर टिक गई । हाथ पीठ से फिसला और कमर पर आ गया । आशा ने उसके हाथ का स्पर्श अपनी नंगी कमर पर अनुभव किया और उसके शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ गई । हाथ कमर से भी फिसला और नीचे सरक गया । फिर उस हाथ ने आशा के शरीर के गोश्त की मुट्ठी सी भर ली ।
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10-12-2020, 01:26 PM,
#34
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
इससे पहले कि आशा कोई प्रक्रिया जाहिर कर पाती मुट्ठी खुल गई । हाथ अपने स्थान से हट गया । और फिर जेपी हो हो कर के हंसने लगा ।
आशा ने एक जलती हुई दृष्टि जेपी के लाल सुर्ख चेहरे पर डाली और फिर निगाहें झुका लीं ।
जेपी का भारी हाथ कड़ाक से अशोक की पीठ पर पड़ा और वह ऊंचे स्वर से बोला - “बाई गाड, बेटे, जिन्दगी में यही एक ढंग का काम किया है तूने । मैं तेरी पसन्द की दाद देता हूं । इसका क्या नाम बताया था तुमने ।”
“आशा ।” - अशोक प्रसन्न स्वर से बोला । प्रत्यक्ष था बाप को प्रसन्न देखकर वह भी प्रसन्न था ।
“हां, आशा ।” - जेपी आशा की ओर घूरता हुआ बोला - “देखो आशा, अशोक की मां इसके बचपन में ही मर गई थी । एक जमाने से हम दोनों बाप बेटे तनहा जिन्दगी यूं गुजर रहे हैं । एक जमाने के बाद हमारे दो प्राणियों के परिवार में एक तीसरे प्राणी की वृद्धि होने वाली है । तुम्हारी अशोक से शादी हो जाने के बाद तुम्हारी एक ही ड्यूटी होगी कि तुम हमारे परिवार को इतना बढाकर दो कि बरसों से अकेलेपन का जो अहसास हमारे दिलों में घर बनाये हुए है, वह निकल जाये । शादी के बाद तुमने हर साल परिवार में एक नये सदस्य के आगमन का इन्तजाम करना है ।”
और वह फिर यूं बेहताशा हंसने लगा जैसे उसने भारी मजाक की बात कर दी हो ।
तब तक आस पास खड़े कितने ही लोग जेपी अशोक और आशा की और आकर्ष‍ित हो गये थे और केवल इसलिये जेपी से भी ऊंची आवाज में हंस रहे थे क्योंकि जेपी हंस रहा था ।
“लेडीज एण्ड जन्टलमैन” - एकाएक जेपी उच्च स्वर से बोला - “मेरे बेटे की होने वाली पत्नी से मिलिये ।”
“लेकिन साहब, मैं...” - आशा ने कहना चाहा । लेकिन कौन सुनता था । लोग चिल्ला रहे थे, जेपी को बधाई दे रहे थे, तालियां बजा रहे थे, अशोक से जबरदस्ती हाथ मिला रहे थे ।
उसी क्षण किसी ने विस्की का एक गिलास जबरदस्ती आशा के हाथ में थमा दिया ।
“टोस्ट फार दि ब्राइड ।” - कोई उच्च स्वर से बोला । कई गिलास आशा के हाथ गिलास से टकराये । गिलास आशा से छूट छूट गया ।
“पियो ।” - जेपी ने आदेश‍ दिया ।
“म-मैं-मैं ।” - आशा हकलाई । उसकी आंखों में आंसू भर आये ।
“आशा शराब नहीं पीती ।” - अशोक बोला ।
“फिर क्या हुआ ? पहले नहीं पीती, तो अब पीने लगेगी ।” - जेपी लापरवाही से बोला - “बड़े लोगों में रहेगी तो बड़े लोगों जैसे काम भी तो करेगी ।”
उसी क्षण फ्लैश लाइट के तीव्र प्रकाश से आशा की आंखें चौंधिया गई ।
आंखों से चौंधियाहट हटी तो उसे अपेन सामने फिल्मी धमाका का एडीटर देवकुमार दिखाई दिया । उसके गले में कैमरा लटक रहा था और वह आशा को देखकर बड़े अर्थपूर्ण ढंग से मुस्करा रहा था ।
अशोक ने आशा के हाथ से विस्की का गिलास ले लिया और मेज पर रख दिया ।
“मेरी भी तसवीर खींची है क्या, धमाका भाई ?” - जेपी ने देवकुमार से पूछा ।
“आपकी तसवीर ही तो फिल्मी धमाका की रौनक है, बड़े सेठ ।” - देवकुमार अपना चश्मा ठीक करता हुआ बोला - “कल फिल्मी धमाका में ऐसी दुकान फाड़ न्यूज छपने वाली है और साथ में आपकी तसवीर भी होगी । कल फिल्मी धमाका में बैनर हैडलाइन्स में यह न्यूज होगी - फिल्म वर्ल्ड्स ग्रेटैस्ट शो मैन्स ओनली सन ऐन्गेज्ड टु मैरी ए स्टैनो टाइपिस्ट ।”
“स्टेनो टाइपिस्ट !” - कई स्वर एक साथ चिल्ला पड़े ।
“करोड़पति सेठ जेपी की होने वाली बहू” - देवकुमार यूं बोला जैसे अपने अखबार की सुर्ख‍ियां पढ रहा हो - “फेमससिने बिल्डिंग में फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर सिन्हा की सैक्रेट्री है ।”
“हां ।” - जेपी गर्जकर बोला - “लेकिन रहेगी नहीं । करोड़पति ही होगी । सिन्हा के दफ्तर में आज आशा का आखरी दिन था । कल आशा नौकरी छोड़ रही है ।”
“नहीं ।” - आशा तीव्र विरोधपूर्ण स्वर से चिल्लाई । लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता था ।
“अब आशा चाहेगी तो सिन्हा जैसे लोग उसकी नौकरी करेंगे ।”
और जेपी फिर सोफे पर ढेर हो गया । उसकी गंजी खोपड़ी पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं । किसी ने उसके हाथ में विस्की का नया गिलास थमा दिया ।
“भई, हम तो तुम्हारी पारखी नजर के कायल हो गये आज ।” - कोई अशोक को कह रहा था - “क्या हीरा खोज कर निकाला है । तुम्हारी बीवी बनने के काबिल कोई लड़की बम्बई में है तो यही है । फिल्म उद्योग की सारी नई पुरानी अभिनेत्रियां इसके सामने घसियारने लगती हैं ।”
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10-12-2020, 01:29 PM,
#35
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
उसी क्षण लोगों के झुड में से अर्चना प्रकट हुई और बोलने वाले ने अपने कथन में थोड़ा सा संशोधन कर दिया - “बस एक अपनी अर्चना ही है जो इसके मुकाबले की चीज मालूम होती है, बाकी तो सब घास कूड़ा है ।”
“आओ, आओ, बेगम ।” - जेपी अर्चना माथुर को देखकर ऊंचे स्वर से बोला - “तुम्हारी पार्टी में आये है। थोड़ी देर हमारे पास भी तो बैठो ।”
“तुम्हारे ही पास बैठने के लिये आई हूं, सेठ ।” - अर्चना माथुर मादक स्वर से बोली ।
वह जेपी के समीप पहुंची । उसने जेपी के सिर को दोनों हाथों में थाम लिया और उसकी गंजी खोपड़ी को घूरती हुई बोली - “मैं तुम्हारी खोपड़ी की रंगत देखकर बता सकती हूं कि तुम छ: पैग पी चुके हो ।”
“सात ।” - जेपी बोला ।
“एक पैग की गलती कोई गलती नहीं है ।” - अर्चना माथुर बोली । फिर वह नीचे झुकी और उसने जेपी की गंजी खोपड़ी पर एक चुम्बन अंकित कर दिया । जेपी की खोपड़ी पर अर्चना माथुर के होंठों के आकार के लिपस्टिक के दो अर्धवृत्त उभर आये । जेपी ने उसकी कमर में हाथ डाला और उसे अपनी गोद में खींच लिया ।
अर्चना माथुर लजाने का अभिनय करती हुई जेपी से अलग हो गई और उसकी बगल में सोफे पर बैठ गई ।
“मैडम ।” - देवकुमार आशा से कह रहा था - “मैं नहीं कहता था कि आप सिन्हा के कबूतर के दड़बे जैसे आफिस में अधिक देर नहीं टिक पायेंगी । आप ने तो दुनिया से निकलते ही हंगामा बरपा दिया है । बम्बई की कम से कम एक हजार खूब सूरत लड़कियों से दुश्मनी मोल ले ली है आपने । लड़कियां अशोक को शादी के लिये फंसाने के लिये झक ही मारती रह गई और आपने इतनी जल्दी और इतनी आसानी से सबके अरमानों पर झाड़ू फेर दिया । मैं आशा करता हूं कि जेपी की अगली फिल्म की हीरोइन भी आप ही होंगी...”
देवकुमार धारा प्रवाह बोले जा रहा था और आशा सोच रही थी कि वह कैसी पागलों की दुनिया में घुस आई है, जहां हर कोई अपनी ही हांकता है, कोई उसे बोलने का मौका ही नहीं देता, वह बोलती है तो कोई उसकी सुनता ही नहीं ।
“यह क्या हंगामा है ?” - अर्चना माथुर जेपी से पूछ रही थी ।
“तुम्हें नहीं मालूम ?” - जेपी हैरानी से बोला ।
“नहीं ।”
“कमाल है । कैसी मेजबान हो तुम ?” - जेपी हो हो कर के हंसता हुआ बोला - “भई अशोक अपनी होने वाली बीवी को तुम्हारी पार्टी में लाया है ।”
“होने वाली बीवी !” - अर्चना माथुर के माथे पर बल पड़ गये - “कौन है वह ?”
“इस पार्टी में मौजूद सबसे खूबसूरत लड़की कौन है ?”
“भई पहेलियां मत बुझाओ ।”
“वह !” - जेपी आशा की ओर संकेत करता हुआ बोला - “आशा ।”
“आशा !” - अर्चना माथुर हैरानी से बोली ।
अर्चना माथुर कुछ क्षण वहीं बैठी रही और फिर अपने स्थान से उठी । वह आशा के समीप पहुंची ।
“मुबारक हो बहन ।” - वह आशा को गले लगती हुई बोली - “तुमने मुझे पहले कभी बताया ही नहीं ।”
जैसे पहले तो मैं आप से रोज मिलती थी - आशा ने मन ही मन सोचा ।
“और तुम्हें भी मुबारक हो, अशोक ।” - अर्चना माथुर आशा के गले से अपनी बांह निकाले बिना अशोक से बोली - “तुमने भी तो पहले कभी जिक्र नहीं किया ।”
अशोक केवल मुस्कराया ।
उसी क्षण देवकुमार के कैमरे की फ्लेश लाइट फिर चमक उठी । अर्चना ने आशा की गरदन से अपनी बांह निकाल ली जैसे वह फोटो ही खींचे जाने का इंतजार कर रही थी ।
“यह तसवीर भी मैं कल के पेपर में छापूंगा” - देवकुमार प्रसन्न स्वर से बोला - “और इसका शीर्षक दूंगा - टू प्राइज फाइटर्स ।”
अर्चना माथुर ने आशा के नेत्रों में झांका और फिर मुस्कराती हुई बोली - “तुम्हारी शादी के बाद पहली पार्टी मेरे यहां होगी बहन । भूल मत जाना ।”
मुस्कराहट बेहद विषैली थी, बात कहने का ढंग ऐसा था जैसे भगवान से प्रार्थना कर रही हो कि वह दिन कभी न आये और उसके नेत्र ईर्ष्या और घृणा से जल रहे थे ।
“ऐसी कोई पार्टी नहीं होगी ।” - आशा धीरे से बोली ।
“क्यों ?” - अर्चना के माथे पर बाल पड़ गये ।
“क्योंकि मैं अशोक से शादी नहीं कर रही हूं ।”
अर्चना के चेहरे पर हैरानी के भाव छा गये ।
“आशा का मतलब है” - अशोक जल्दी से बोला - “कि फिलहाल हम शादी नहीं कर रहे हैं ।”
“मेरा मतल‍ब वही है जो मैंने कहा है ।” - आशा बोली । लेकिन उसी क्षण जेपी ने न जाने कौन सा चुटकला छोड़ दिया था कि उसके आस पास बैठे लोग बेतहाशा हंसने लगे थे और आशा की आवाज उस हल्ले में दब कर रह गई थी ।
“अशोक ।” - आशा रूआंसे स्वर से बोली - “भगवान के लिये यहां से फौरन चलो, वर्ना मैं पागल हो जाऊंगी ।”
“बस चलते हैं, थोडी़ देर और...”
“तो तुम यहां ठहरो । मैं जाती हूं ।” - और आशा ने दृढतापूर्ण ढंग से आगे कदम बढा दिया ।
“अच्छा ।” - अशोक ने उसकी बांह थाम ली - “मैं भी चलता हूं ।”
फिर अशोक ने उच्च स्वर से जेपी को सम्बोधित किया - “जेपी हम जा रहे हैं ।”
“क्यों ।” - जेपी माथे पर बल डालता हुआ बोला - “जल्दी क्या है ?”
“आशा फौरन जाना चाहती है ।”
“तुम्हें क्या जल्दी है ?” - जेपी ने आशा से पूछा ।
आशा ने उत्तर देने का उपक्रम नहीं किया ।
“और पार्टी से इतनी जल्दी जाओेगे तो अर्चना नाराज हो जायेगी ।”
“मैं अर्चना से माफी मांग लूंगा ।” - अशोक बोला ।
“लेकिन मैं माफ नहीं करूंगी ।” - अर्चना मुस्कराती हुई बोली ।
“अर्चना प्लीज...”
“ओके, ओके ! तुम्हें मैं आशा की वजह से जाने दे रही हूं । क्योंकि इस बेचारी ने तो सवेरे दफ्तर जाना होगा न ! कामकाजी लड़की है बेचारी अधिक देर तक किसी पार्टी में कैसे टिक सकती है । सुबह अगर देर तक सोई रही तो दफ्तर की बस निकल जायेगी !”
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10-12-2020, 01:30 PM,
#36
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
आशा ने अशोक की ओर देखा । अशोक की आंखों में एक गहरे आश्वासन का भाव था जैसे वह कह रहा हो कि मैं अब समझता हूं कि यह लुच्ची औरत क्या कह रही है, क्यों कह रही है ।
फिर अशोक ने एक घृणापूर्ण दृष्टि अर्चना पर डाली और आशा कर हाथ थामता हुआ बोला - “आओ आशा ।”
“फिर कभी आना ।” - अर्चना ने पीछे से अशोक को आवाज दी - “अकेले ।”
अशोक ने घूमकर नहीं देखा ।
वह इमारत के मुख्य द्वार से बाहर निकल आया ।
अगले ही मिनट में शोफर ने पार्किंग में से गाड़ी निकाल कर उनकी बगल में ला खड़ी की ।
दोनों कार की पिछली सीट पर बैठ गये ।
“कोलाबा चलो ।” - अशोक ने आदेश दिया ।
“अच्छा साहब ।” - शोफर बोला और उसने गाड़ी कोलाबा की ओर ले जाने वाली सड़क पर डाल दी ।
आशा सिर झुकाये बैठी थी ।
“आशा !” - अशोक धीरे से बोला ।
आशा ने सिर नहीं उठाया ।
“नाराज हो ?”
“आज तुमने मेरी बहुत दुर्गति करवाई है ।” - आशा धीरे से बोली ।
“आशा तुम्हारा संकेत अर्चना माथुर के व्यवहार की ओर है तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि अगली मुलाकात पर वह खुद तुमसे माफी मांगेगी और भविष्य में वह तुम्हारे साथ यूं पेश आया करेगी । जैसे तुम संसार की सबसे महत्वपूर्ण महिला हो ।”
आशा के नेत्रों के सामने जेपी के दायें हाथ का ऐक्शन घूम गया और उसकी आंखों में एकाएक शीशा सा कौंध गया । लेकिन वह चुप रही । बात जिक्र करने के योग्य नहीं थी ।
“तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला ?” - एकाएक आशा ने प्रश्न किया ।
“झूठ ! मैंने तुमसे कभी झूठ नहीं बोला ।”
“तुमने यह क्यों कहा कि तुम एक मामूली इन्श्योरेन्स एजेन्ट हो ?”
“आशा मैंने कभी यह भी नहीं कहा था कि मैं इंश्योरेन्स एजेन्ट ही हूं । तुम ही मुझे इंश्योरेन्स एजेन्ट समझ बैठी थीं । तुम उस शाम को याद करो जब ठीक चार बजे मैं सिन्हा के दफ्तर में उससे मिलने आया था । ठीक उसी समय शायद कोई इंश्योरेन्स एजेन्ट भी सिन्हा के पास आने वाला था । क्योंकि मैं ठीक चार बजे तुम्हारे सामने आ खड़ा हुआ था । इसलिये तुम कूद कर इस नतीजे पर पहुंच गई कि मैं ही इंश्योरेन्स एजेन्ट हूं । मैंने अपनी जुबान से कभी नहीं कहा कि मैं इंश्योरेन्स एजेन्ट हूं । उल्टा जब मैं सिन्हा के केबिन से बाहर निकला और तुमने मुझे से बीमे के बारे में सवाल पूछने आरम्भ कर दिये तो मैं बौखला गया था । हां मेरी इतनी गलती जरूर है कि एक मजाक में हुई शुरुआत को इतना आगे तक घसीट लाया । उस के लिये मैं तुम से माफी चाहता हूं ।”
आशा चुप रही ।
“आशा जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था तभी मैं तुम से बेहद प्रभावित हुआ था । तुम मुझे एक गरीब इंश्योरेन्स एजेन्ट समझती थीं इसलिये मुझ से सहानुभूति दिखाती थीं और शायद इसीलये तुम ने मेरे पहले निमंत्रण को भी नहीं ठुकराया था । अगर तभी मैं तुम्हें अपनी वास्तविकता बता देता तो शायद तुम मुझसे बात भी नहीं करती ।”
आशा चुपचाप सुनती रही ।
“जहां तक आज की घटना का सवाल है ।” - अशोक फिर बोला - “तो अपनी वास्तविकता मुझे कभी तो तुम पर प्रकट करनी ही थी । मैंने सोचा क्यों न आज ही यह काम कर दूं । मैं जेपी से तुम्हारे बारे में पहले ही जिक्र कर चुका था । वे तुम से मिलने के लिये बहुत उत्सुक थे । अर्चना माथुर की पार्टी में मैं तुम्हें जेपी के पास एकाएक ले जाकर तुम्हें चौंका देना चाहता था । तुम्हें हैरान कर देना चाहता था लेकिन हैरान तो पता नहीं तुम हुई या नहीं हुई लेकिन वहां जाकर बेहद परेशान जरूर हो गई तुम ।”
आशा कुछ क्षण चुप रही और फिर बोली - “मैं तो मूर्ख थी जो तुम्हें एक मामूली इंश्योरेन्स एजेन्ट समझ बैठी थी । तुम्हारी हर बात इस और संकेत करती थी कि तुम एक ऊंचे वर्ग से सम्बन्धित पैसे वाले आदमी हो । कहीं जाना हो तो तुम फौर टैक्सी ले लेने का सुझाव दे देते थे, चाय पीने की बात होती थी तो तुम बम्बई के सबसे बढिया होटलों का नाम लेते थे । तुम्हारा शानदार लिबास और तुम्हारी शक्ल सूरत तो तुम्हारी वास्तविकता की चुगली करती ही थी । नेपियन सी रोड की जिस कोठी में तुम अपने कथित ड्राइवर मित्र के साथ गैरेज के ऊपर रहते हो वह भी तुम्हारी ही होगी । तुम ने जब अपने डैडी के बारे में कहा था कि वे जिन्दगी की उस स्टेज पर पहुंच चुके हैं जहां इन्सान को कुछ करने की जरूरत नहीं होती तो मैं समझी थी कि तुम यह कहना चाहते हो कि वे रिटायर हो गये हैं और इतने बूढे हो गये हैं कि अब कुछ कर नहीं पा रहे हैं और पेन्शन पर गुजारा कर रहे हैं । जब कि वास्तव में तुम्हारा संकेत करोड़पति बात की दौलत की ओर था । करोड़ो रुपया कमा चुकने के बाद वाकई आदमी जिन्दगी की उस स्टेज पर पहुंच जाता है जहां उसे कुछ करने की जरूरत नहीं रहती । मुझे एक बार भी तुम्हारी वास्त‍विकता पर सन्देह हो गया होता तो सारी बात फौरन मेरी समझ में आ जाती ।”
“अच्छी दिल्लगी रही न ?” - अशोक मुस्कराता हुआ बोला ।
“और फिर कोई बेहद रईस आदमी ही बम्बई में इतना प्रभाव रख सकता है कि वह अप्सरा पर हाऊस फुल होने के बाद भी टिकट हासिल कर ले । अशोक तुम्हें तो मेरे साथ चार आना मार्का चाय पी कर लोकल गाड़ियों और बसों में सफर करके और मीलों पैदल चल कर बड़ी तकलीफ हुई होगी ।”
“सच पूछो तो वे मेरी जिन्दगी के सबसे सुखद क्षण थे । उतनी प्रसन्नता और आनन्द का अनुभव मैंने आज तक अपनी नामर्ल जिन्दगी में नहीं किया ।”
“कोलाबा में कहां चलू साहब ?” - उसी क्षण शोफर ने पूछा ।
“स्ट्रैंन्ड सिनेमा आ गया ?” - अशोक ने कार की खिड़की से बाहर झांकते हुये पूछा ।
“अभी आगे है साहब ।”
“स्ट्रैन्ड की बगल वाली गली में जाना है ।”
“मैं मेन रोड पर उतर जाऊंगी ।” - आशा जल्दी से बोली ।
“जब गाड़ी गली में जा सकती है तो मेन रोड पर उतरने की क्या जरूरत है ।” - अशोक बोला ।
आशा ने दुबारा विरोध नहीं किया ।
“और शम्भू ।” - अशोक ड्राइवर से बोला - “यह तुम्हारी होने वाली मालकिन है । आगे से हम से ज्यादा तुमने इनकी सुख-सुविधा का ख्याल रखना है ।”
“मैं तो सेवक हूं मालिक ।” - शोफर खीसें निपोरता हुआ बोला ।
अशोक उसे रास्ता बताता रहा । अन्त में कार उस इमारत के सामने आ कर रूक गई जिस में आशा का फ्लैट था ।
दोनों बाहर निकल आये ।
इमारत के द्वार के पास आकर आशा रुक गई ।
“अशोक ।” - वह बोली ।
“हां ।” - अशोक आशापूर्ण स्वर से बोला ।
“यह अंगूठी तुम वापिस ले लो ।” - और उसने अंगूठी को उंगली से उतारने का उपक्रम किया ।
“ऐसा मत करो आशा ।” - अशोक ने उसका हाथ थाम लिया और विनयपूर्ण स्वर से बोला - “मेरा दिल टूट जायेगा ।”
“लेकिन अशोक मैं नहीं चाहती कि इस अंगूठी की वजह से तुम किसी बहम में पड़ो । मैं तुम से शादी नहीं कर सकती । मैं पति के रूप में तुम्हारी कल्पना नहीं कर सकती ।”
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10-12-2020, 01:30 PM,
#37
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
“इतनी जल्दी फसला मत करो, आशा, इतनी जल्दी फैसला मत करो । शादी इन्सान की जिन्दगी का एक बहुत बड़ा निर्णय होता है । यह निर्णय तुम कोरी भावुकता में पड़ कर मत करो । तुम इस बात पर कुछ दिन गम्भीरता से विचार करो, अपने मन और मस्तिष्क को नई परिस्थ‍ितियों से दो चार होने दो और उसके बाद अपना उत्तर दो । मुझे पूरा विश्वास है कि तब तुम्हें मुझ से शादी करने में कोई ऐतराज वाली बात दिखाई नहीं देगी । लेकिन यह मत भूलना कि अपनी जिन्दगी में मुहब्बत के मामले में अगर मैंने किसी के बारे में पूरी ईमानदारी से सोचा है तो वह तुम हो ।”
अशोक एक क्षण रुका और फिर बोला - “और मैं वादा करता हूं कि तुम्हारी उंगली में इस अंगूठी की मौजदूगी की वजह से मैं किसी बहम में नहीं पडूंगा । मैं तुम से यह कभी नहीं कहूंगा कि इस अंगूठी को तुम मेरे प्रति कोई सामाजिक या नैतिक बन्धन समझो ।”
“लेकिन इतनी कीमती अंगूठी मैं उंगली में कैसे पहने रह सकती हूं ।” - आशा चिंतित स्वर में बोली - “इस अंगूठी के लालच में तो मुझे डर है कि कोई मेरी उंगली ही काट कर न ले जाये, मेरी हत्या ही न कर दे ।”
“ऐसा कुछ नहीं होगा ।” - अशोक उसका हाथ थपथपाता हुआ आश्वासनपूर्ण स्वर से बोला - “तुम खामखां चिन्ता कर रही हो ।”
आशा अनिश्चित सी चुपचाप खड़ी रही ।
“ओके ?” - अशोक बोला ।
“ओके ।” - आशा ने अनिश्चित स्वर से उत्तर दिया ।
“गुड नाइट ! मैं कल तुम्हें फोन करूंगा ।”
“गुड नाइट ।” - फोन वाली बात जैसे आशा ने सुनी ही नहीं ।
शोफर कार का पिछला दरवाजा खोले खड़ा था । अशोक के भीतर बैठ जाने के बाद उसने द्वार बन्द कर दिया । फिर वह आशा की ओर मुड़ा और शिष्ट स्वर से बोला - “नमस्ते, बीबी जी ।”
“नमस्ते ।” - आशा बोली ।
शोफर ड्राइविंग सीट पर जा बैठा ।
गाड़ी आगे बढ गई ।
एक बार आशा को गाड़ी की पिछली खिड़की से बाहर निकल कर हिलता हुआ अशोक का हाथ दिखाई दिया और फिर गाड़ी दृष्टि से ओझल हो गई ।
आशा ने सिर उठाकर इमारत की ऊंचाई की ओर झांका उसके फ्लैट की बत्ती जल रही थी ।
आशा भारी कदमों से इमारत के भीतर प्रवेश कर गई ।
सरला उसे बाहर गलियारे में ही खड़ी मिल गई ।
“हाय, आशा, कौन था यह ?” - सरला ने उत्तेजित स्वर से पूछा ।
“किसकी बात कर रही है ?”
“अरे, उसी की जो अभी तुझे ये... लम्बी गाड़ी पर गली में छोड़कर गया है । मैं खिड़की में से सब देख रही थी ।”
आशा फ्लेट में प्रवेश कर गई थी ।
“मरी बता न कौन था ।” - सरला उसके पीछे पीछे चलती हुई बोली - “ऊपर से तो मुझे यूं लग रहा था जैसे शशि कपूर हो । कौन था वह... हाय मैं मर जावां ।”
तब तक उसकी दृष्टि आशा की उंगली में मौजूद अंगूठी पर पड़ चुकी थी । उसने आशा को जबरदस्ती पलंग पर धकेल कर बिठा दिया । वह स्वयं उसकी बगल में बैठ गई और उसका अंगूठी वाला हाथ अपने हाथ में थाम लिया ।
“यह अंगूठी कहां से लाई है ? हाय कितनी सुन्दर है !” - सरला प्रशंसात्मक स्वर से बोली ।
आशा चुप रही ।
“सोने की है ?” - सरला ने पूछा ।
“हां ।” - आशा ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया ।
“और यह इसमें जड़ा शीशा कितना जगमगा रहा है । मैंने एक बार अर्चना माथुर की उंगली में ऐसी हीरे की अंगूठी देखी थी । यह भी एकदम हीरा ही मालूम होता है ।”
“यह हीरा ही है ।”
सरला के नेत्र फैल गए ।
“अच्छा ।” - वह बोली - “फिर तो इसकी कीमत कम से कम एक लाख होगी ।”
“नहीं । पचास हजार । नये पैसे नहीं रुपये ।”
“इसकी कीमत पचास पजार रुपये है !” - सरला के नेत्र उबल पड़े ।
“हां ।”
“मजाक कर रही हो ।” - सरला अविश्वासपूर्ण स्वर से बोली ।
“मैं सच कह रही हूं ।”
“पचास हजार रुपये की अंगूठी..। तुम्हारे पास कहां से आई यह ?”
“उसी लड़के ने दी है । जो अभी मुझे यहां छोड़कर गया है ।”
“लेकिन यह है कौन ? आशा, किस्सा क्या है ? तू एक ही बार में सारी बात क्यों नहीं बताती है । उत्कंठा के मारे मेरा दम निकला जा रहा है ।”
आशा ने से आधोपान्त सारी घटना कह सुनाई ।
सरला मुंह बाये आशा की बात सुनती रही ।
“हे भगवान ।” - अन्त में वह बोली - “यह जेपी सेठ का लड़का है और तुमसे मुहब्बत करता है, तुमसे शादी करना चाहता है ।”
“हां ।” - आशा बोली ।
“तुमने पहले कभी बताया ही नहीं मुझे ।”
“अब तो बता रही हूं ।”
“आशा तेरी तो तकदीर खुल गई । जिस आदमी को तूने सहज ही अपनी उंगली पर लपेट लिया है, उसे हासिल करने के लिये तो बम्बई की हर एक ग्रुप की औरतों मे कम्पीटीशन चल रहा है । बम्बई में कम से कम एक हजार ऐसी चुड़ेलें हैं जो उसे अपने पर आशिक करवाने के लिये अपना कुछ भी दांव पर लगाने के लिये तैयार फिरती हैं । और उनमें से कई तो ऐसी ऊंची नाक वाली हैं कि वे किसी छोटे मोटे रईस के पुत्तर से तो दुआ सलाम तक नहीं रखती ।”
आशा चुप रही ।
“तू तो बड़ी छुपी रुस्तम निकली आशा ! मैं तो आसमान पर छलांग लगाने की बातें ही करती रह गई, किसी रईस के पुत्तर को या खुद रईस को फांस कर ऐश की जिन्दगी गुजारने के ख्वाब ही देखती रह गई और तूने चूपचाप ही बम्बई के सबसे तगड़े दुम्बे को हलाल करके रख दिया । आशा, अब तो तू मेरी भी जून संवार दे ।”
“कैसे ?”
“जेपी सेठ बम्बई का सबेस बड़ा शौ मैन है और तू उसकी बहू बनने वाली है । तू अगर मेरा जिक्र भी कर देगी तो मैं हीरोइन बन जाऊंगी ।”
“लेकिन मैं जेपी सेठ की बहू नहीं बनने वाली हूं ।”
“क्या ?” - सरला चिल्ला पड़ी ।
“मैं अशोक से शादी नहीं कर रही हूं ।”
“क्या बक रही है ?”
“मैं ठीक बक रही हूं ।”
“लेकिन क्यों ?”
“वजह तुम्हारी समझ में नहीं आयेगी मैं तुम्हें वजह बताऊंगी तो मुझे और गलियां दोगी ।”
“लेकिन फिर भी पता तो लगे ।”
“तुम सिर्फ इतना जान लो कि मुझे अशोक से मुहब्बत नहीं है ।”
“नहीं है तो हो जायेगी । जिसकी पचास हजार रुपये की अंगूठी स्वीकार कर सकती है उससे मुहब्बत होते देर नहीं लगेगी तुम्हें ।”
“अंगूठी, उसने मुझे जबरदस्ती दी है ।”
“चलो, फेरे भी वह तुमसे जबरदस्ती ही ले लेगा । बहरहाल कहानी आगे तो बढेगी ।”
आशा चुप रही ।
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10-12-2020, 01:30 PM,
#38
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
“अब जल्दी ही तुम वहां पहुंच जाओगी जहां के मैंने केवल ख्वाब देखे हैं । और कुछ दिनों बाद तो मैं कभी अगर संयोगवश तुम्हारी एक झलक ही देख पाया करूंगी जब तुम खूबसूरत विलायती गाड़ी में बैठी सर्र से मेरी बगल में से गुजर जाया करोगी । लेकिन आशा, बाद में चाहे हो मुझे भूल जाना लेकिन कम से कम एक बार तो मेरी भी हालत सुधारने के लिये थोड़ा सा ब्रेक लगा ही देना ।”
“क्या बक रही है पागल ।” - आशा बोली - “मैं कहीं नहीं जा रही हूं । कहा न मैं अशोक से शादी नहीं कर रही हूं ।”
“जेपी सेठ से मेरी सिफारिश तो करोगी न ।” - सरला अपनी ही हांकती रही - “वह अपनी अगली फिल्म में मुझे हीरोइन नहीं बना सकता तो कम से कम कोई लम्बा सा महत्वपूर्ण रोल तो दे ही दे ।”
“जेपी से मेरा इस प्रकार का सम्बन्ध कभी भी नहीं बनने वाला है कि मैं उसके सामने किसी की सिफारिश कर पाऊं ?”
“क्या ?”
“क्योंकि मेरी नजर में वह एक बेहद नीच प्रवृत्त‍ि का आदमी है । अगर भगवान मुझे दुबारा उसकी सूरत न दिखाये तो इसे मैं अपना सौभाग्य मानूंगी ।”
“अपने होने वाले ससुर के बारे में बड़े भयानक विचार रखती है ।”
“अरे, बाबा, कहा न वह मेरा ससुर-वसुर नहीं बनने वाला ।” - आशा चिड़े हुए स्वर से बोली - “मैंने अशोक से शादी नहीं करनी है ।”
“अच्छा तो फिर कोई ऐसा तरीका बता जिससे हम दोनों अपनी तकदीर एक दूसरे से बदल लें । हे भगवान यह कहां का इन्साफ है, मैं पैसे वाले मर्दों को अपने पर आशिक करवाने के लिये जमाने भर के हथकंडे इस्तेमाल करती हूं और ये खसमा खानी खूंटा तुड़ाई हुई गाय की तरह बिदक बिदक कर भागती है और एक तुम हो कि पैसे वाले मर्द दिल और दौलत हथेली पर रखकर तुम्हारे पीछे पीछे घूमते हैं और तुम्हारे कान पर जूं नहीं रेंगतीं । कोई तुम्हें पसन्द ही नहीं आता, किसी से तुम्हें मुहब्बत नहीं किसी की तुम्हें सूरत पसन्द नहीं, कोई तुम्हें भाई जैसा लगता है, कोई बाप जैसा लगता है । शायद तुम्हारे लिये तो भगवान अपने कारखाने का कोई सबसे नया माडल भेजेगा जिसके साये पर पहले से ही एक लेबल चिपका होगा जिस पर लिखा होगा - आशा का पति ।”
“क्यों बेकार की बकवास कर रही है ?”
“अच्छा, एक बात बता, तुझे उससे नफरत नहीं है न ?”
“नहीं । अशोक बड़ा भोला लड़का है ।”
“तो फिर तू जरूर जरूर शादी कर ले उससे । आशा, जिस से शादी होती है, उससे मुहब्बत अपने आप हो जाती है । तुम अशोक से शादी कर लो, तुम्हारा काया पलट हो जायेगा, तुम्हारी जिन्दगी का ढर्रा ही बदल जायेगा । एक बार पैसे वालों के बीच में पहुंच जाओगी तो तुम्हें यह सोचने की जरूरत नहीं रहेगी कि आज की जिन्दगी में इनसान को चार पैसे कमाकर आपना पेट भर लेने की खातिर कितनी जद्दोजहद करनी पड़ती है । फिर तुम्हें किसी सिन्हा साहब के दफ्तर में दिन भर टाइपराइटर के बखिये उधेड़ने की जरूरत नहीं रह जायेगी, फिर तुम्हें साहब लोगों की घटिया से घटिया बात पर यस सर, यस सर नहीं कहना पड़ेगा, उनकी गन्दी और कमीनी हरकतों पर सब्र का घूंट पी कर नहीं रह जाना पड़ेगा, रोज सुबह शाम बस की लाइन में नहीं खड़ा होना पड़ेगा, लोकल ट्रेनों के धक्के नहीं खाने पड़ा करेंगे, दिन भर काम करके शाम को थके हारे लौटने पर खाना नहीं पकाना पड़ेगा, कपड़े नहीं धोने पड़ेंगे, बरतन नहीं मांजने पड़ेंगे, फिर इस बात कि चिन्ता नहीं रहेगी कि साहब के लालसा से झुलसते हुये दिल पर अपनी जवानी का फाहा नहीं रखा तो वह कहीं नौकरी से न निकाल दे । आशा, ऐसा मौका जिन्दगी में बार बार नहीं आता । अगर तुमने यह मौका छोड़ दिया तो तुम्हारे जैसी अहमक लड़की सारी दुनिया में चिराग लेकर ढूढने से नहीं मिलेगी ।”
“शायद तुम ठीक कह रही हो ।” - आशा ने धीरे से स्वीकार किया ।
“तो फिर कर रही हो न अशोक से शादी ?” - सरला ने आशापूर्ण स्वर से पूछा ।
“मैं सोचूंगी । फिलहाल मैंने कोई फैसला नहीं किया है ।” - आशा उंगली में पहनी हुई अंगूठी को दूसरे हाथ की उंगली से छूती हुई बोली ।
“चूल्हे में जाओ ।” - सरला नाराज स्वर से बोली - “अगर मेरी इतनी बकवास सुन चुकने के बाद भी तुम अभी सोचोगी ही ।”
“लेकिन जल्दी क्या है ? अशोक कहीं भागा थोड़े ही जा रहा है ।”
“ऐसे काम जितनी जल्दी हो जायें उतना ही अच्छा ।”
“क्यों ? क्या अच्छाई है इसमें ?”
“सम्भव है देर करने से अशोक का इरादा ही बदल जाये ।”
“जिस आदमी का इरादा इतनी जल्दी और इतनी आसानी से बदल सकता हो उससे तो मैं वैसे ही शादी नहीं करूंगी ।”
“अगर अशोक अपने इरादे का पक्का निकला तब तो शादी करोगी उससे ?”
“कहा न मैं सोचूंगी ।”
“अच्छा बहस छोड़ ।” - सरला एकाएक बदले स्वर से बोली - “एक बात सच सच बता दे ।”
“क्या ?”
“सच सच बतायेगी न ?”
“हां ।”
“अगर मेरे से झूठ बोले तो तुझे सांप डसे ।”
“कहा न सच सच बताऊंगी ।”
“तू किसी और से मुहब्बत करती है ?”
आशा एकदम चुप हो गई ।
“बोल न ?”
आशा के मन के किसी अन्धेरे कोने में एक धुंधली सी तसवीर उभरी ।
“देख आशा, अगर मुझसे कुछ छुपायेगी तो मैं कभी नहीं बोलूंगी तुझ से ।”
“हां, शायद ।” - आशा अनिश्चित स्वर से बोली ।
“कौन है वो ?”
“तुम उसे जानती नहीं । वह सिन्हा साहब के दफ्तर में काम करता था ।”
“अब नहीं करता ?”
“नहीं । सिन्हा साहब ने उसे नौकरी से निकाल दिया है ।”
“क्यों ?”
“वे कहते हैं कि वे उसके काम से सन्तुष्ट नहीं थे ।”
“और वास्तविकता क्या है ?”
“क्या मालूम ? शायद वही सच हो जो सिन्हा साहब ने कहा है ।”
“अब कहां है वह ?”
“पता नहीं ।”
“तुमने तलाश करने की कोशिश की थी ?”
“की थी लेकिन मिला नहीं ।”
“वह तुमसे मुहब्बत करता था ?”
“हां ! बहुत । लेकिन सिन्हा साहब के डर की वजह से कभी खुल कर कुछ कह नहीं पाता था ।”
“कभी इस प्रकार की बातचीत नहीं हुई ?”
“नहीं ।”
“उसे मालूम है कि तुम भी उससे मुहब्बत करती हो ?”
“मुझे नहीं मालूम ।”
“क्या नाम था उसका ?”
“अमर ।”
“सिन्हा साहब के दफ्तर में क्या था वह ?”
“क्लर्क था ।”
“मुश्किल से तीन सौ रुपये मिलते होंगे उसे ।”
“ढाई सौ रुपये ।”
“अगर आज अमर फिर तुम्हारे सामने आ जाये तो अशोक को छोड़कर तुम उससे शादी कर लोगी ।”
आशा ने उत्तर नहीं दिया ।
“तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया ।”
“मैं तुम्हारे बहुत सवालों का जवाब दे चुकी हूं ।” - आशा घबरा कर बोली ।
“आशा तुम...”
आशा ने सरला की बात नहीं सुनी । वह एकाएक अपने स्थान से उठी और बाथरूम में घुस गई ।
सरला अपने दायें हाथ की पहली उंगली से अपना माथा ठोकती हुई चुपचाप बैठी बाथरूम के बन्द दरवाजे को घूरती रही ।
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10-12-2020, 01:30 PM,
#39
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
Chapter 3
सोमवार को आशा दफ्तर पहुंची ।
शनिवार रात की घटनाओं को वह काफी हद तक भूल चुकी थी । लेकिन फेमस सिने बिल्डिंग में प्रवेश करते ही उसे ऐसा अनुभव होने लगा कि उस के द्वारा भुलाई हुई बातें सारी बम्बई को मालूम हो चुकी हैं । हर कोई उसे विचित्र नेत्रों से घूर रहा था । अजनबी भी आशा को विश कर रहे थे । कई लोग तो उसके साथ यूं पेश आ रहे थे कि जैसे उसे वर्षों से जानते हों ।
शुरुआत दफ्तर के चपरासी से हुई ।
आशा को देखकर वह चाबी लगे खिलौने की तहर सीट से उछल कर खड़ा हो गया और एक कान से दूसरे कान तक खींसे निपोरता हुआ बोला - “नमस्ते बीबी जी ।”
“नमस्ते ।” - आशा बोली ।
उसने बड़ी तत्परता से आशा के लिये उसके केबिन का द्वार खोला ।
चपरासी के व्यवहार का अन्तर आशा से छुपा नहीं रहा ।
“आज क्या बात है, भई ।” - आशा केबिन में प्रवेश करते हुई बोली ।
“कुछ नहीं बीबी जी ।” - चपरासी भी उसके साथ साथ ही भीतर आ गया ।
“आज छापे में आपकी तसवीर छपी है ।”
“अच्छा ।”
“जी हां । अशोक बाबू के साथ, जे.पी. सेठ के साथ, अर्चना माथुर के साथ । साथ ही खबर भी छपी है कि आप जल्दी ही अशोक बाबू के साथ शादी करने वाली हैं ।”
“कहां छपा है यह ?” - आशा हैरानी से बोली ।
“फिल्मी धमाका में, दिखाऊं ?”
“दिखाओ ।”
चपरासी लपकता हुआ केबिन से बाहर निकला और उल्टे पांव वापिस लौटा ।
उसने फिल्मी धमाका का नया अंक आशा के सामने रख दिया ।
आशा देव कुमार और उसके द्वारा खींची हुई तसवीरों को एकदम भूल चुकी थी । उसने अखबार देखा । मुख पृष्ठ पर वही सुर्खी छपी हुई थी जिसका अर्चना की पार्टी में देवकुमार ने जिक्र किया था । बैनर हैडलाइन्स में छपा हुआ था ।
फिल्म वर्ल्ड्स ग्रेटैस्ट शोमैन्स ओनली सन ऐन्गैज्ड टू मैरी ए स्टैनो टाइपिस्ट ।
तस्वीरों में आशा के हाथ में पहन हुई हीरे की अंगूठी विशेष रूप से जगमगा रही थी ।
आशा एक ही सांस में नीचे छपा सारा विवरण पढ गई ।
अन्त में उसने अखबार रख दिया और अपना सिर थाम लिया । ‘फिल्मी धमाका’ में देव कुमार ने अनजाने में भी जानबूझ कर भारी शरारत कर दी थी । समाचार पढकर ऐसा मालूम होता था जैसे वह और अशोक बड़े लम्बे अरसे से एक दूसरे से इश्क लड़ा रहे हों और दोनों ने बहुत सोच समझ कर भविष्य में होने वाली शादी का ऐलान किया है । यही नहीं ‘फिल्मी धमाका’ में छपे विवरण से ऐसा मालूम होता था जैसे आशा और अशोक विशेष रूप से अपने सम्बन्ध को लोगों की जानकारी में लाने के लिये ही अर्चना माथुर की पार्टी में गये थे । सबसे बखेड़े वाली बात यह थी कि पार्टी में जेपी सेठ ने खुद घोषित किया था कि आशा उसके बेटे की होने वाली बहू है । इस बात का पार्टी में आशा ने कितना विरोध किया था इसका जिक्र कहीं भी नहीं था ।
चपरासी अखबार ले कर चला गया ।
आशा परेशान हो उठी । उसके और अशोक के सम्बन्ध की पहले ही पिछले दिन जेपी और स्वयं अशोक द्वारा बहुत पब्लिसिटी हो चुकी थी । अशोक तो अपने ड्राइवर तक से उसका परिचय ड्राइवर की होने वाली मालकिन के रूप में करवा चुका था । रही सही कसर फिल्मी धमाका ने पूरी कर दी थी । आशा को चिन्ता थी कि अगर इसी प्रकार हर किसी को इस आधारहीन बात की जानकारी होती गई तो उसके लिये अशोक को शादी से इन्कार करना दूभर हो जायेगा ।
दफ्तर के सारे कर्मचारियों ने बारी बारी और झुण्डों में आकर उसे बधाई दी । आरम्भ में तो आशा ने लोगों को बड़ी नम्रता से यह समझाने की कोशिश की कि वह अशोक से शादी नहीं कर रही है । एक भारी गलतफहमी की वजह से ही इतना बड़ा हंगामा हो गया है लेकिन कौन सुनता था ? हर कोई यही समझता था कि आशा बात को टालने के लिये ऐसा कर रही है । अन्त में आशा ने लोगों को समझाने का प्रयत्न ही छोड़ दिया । जहां तक बधाई का सवाल था, वह चुपचाप सुन लेती थी लेकिन जब लोग और ऊट-पटांग प्रश्न पूछने लगते थे तो इसके लिये स्वयं को नियोजित करना कठिन हो जाता था जैसे -
“शादी कब हो रही है ?”
“इश्क कैसे लड़ा ?”
“किस ने किस को फंसाया ?”
“अभी भी वह दफ्तर में क्यों बैठी है ?”
“कब तक बैठेंगे ?”
“वह अभी से कोलाबा छोड़कर अशोक की कोठी पर रहने लगेगी या शादी तक इन्तजार करेगी ।”
वगैरह...
और एक शिकायत ऐसी थी जो हर जुबान पर जरूर-जरूर आती थी ।
तुमने हमें पहले कभी बताया ही नहीं ।
इस शिकायत के उत्तर में उसका जी चाहता कि वह कह दे - जी हां मेरे से गलती हो गई । लेकिन अगली बार ऐसी गलती नहीं करूंगी । अगली बार जब कोई ऐसी या इससे मिलती जुलती घटना हो गई तो मैं इश्तहार छपवा कर सारी बम्बई में बंटवा दूंगी ।
आखिर में बारी आई सिन्हा साहब की ।
सिन्हा साहब ने उसे अपने दफ्तर में बुलाया सम्मानपूर्वक कुर्सी पर बिठाया - नहीं नहीं डिक्टेशन लेने की कोई जरूरत नहीं है । कहा और फिर मुस्कराते हुए भारी तकल्लुफपूर्ण स्वर से बोले - “तुम ने हमें पहले कभी बताया ही नहीं ।”
“क्या सर ?” - आशा ने सहज स्वर से पूछा ।
“यही कि तुम अशोक को जानती हो और उसके और तुम्हारे सम्बन्ध इस हद तक आगे बढ चुके हैं । शायद यही वजह थी कि तुम ने हम में कभी दिलचस्पी नहीं ली ।”

“ऐसी कोई बात नहीं है सर ।”
“खैर छोड़ो । हमारी भी बधाई स्वीकार करो । अब तो हमें फौरन ही नई सेक्रेटरी तलाश करनी पड़ेगी ।”
“लेकिन मैं नौकरी तो नहीं छोड़ रही हूं ।” - आशा उतावले स्वर में बोली ।
“क्यों बच्चों जैसी बात करती हो !” - सिन्हा हंसता हुआ बोला ।
“एक करोड़पति के लड़के से ब्याह करने के बाद तुम साढे तीन सौ रुपये की नौकरी किया करोगी क्या ? तुम्हारी आंख एक इशारे पर जेपी सेठ तो वह एस्टब्लिशमेंट खरीद लेगा जहां तुम काम करती हो ।”
“सिन्हा साहब एक मिनट मुझे अपनी बात कहने का मौका तो दीजिये ।” - आशा विनयपूर्ण स्वर से बोली ।
“क्या कहना चाहती हो तुम ?” - सिन्हा के स्वर में मजाक का पुट था ।
“आप किसी गलतफहमी में मत पड़िये, मैं अशोक से शादी नहीं कर रही हूं । इसलिये आप सचमुच ही कोई नई सैक्रेट्री तलाश करनी आरम्भ मत कीजियेगा ।”
केवल एक क्षण के लिये सिन्हा के चेहरे पर गम्भीरता के लक्षण दिखाई दिये और वह ठठा कर हंस पड़ा ।
“भई वाह ।” - वह हंसता हुआ बोला - “यह बम्बई के फिल्म उद्योग का स्टैन्डर्ड पब्लिसिटी स्टंट कहां से सीख लिया तुमने ?”
“पब्लिसिटी स्टंट !” - आशा के मुंह से निकला ।
“और क्या ? यह तो बम्बई का सबसे अधिक घिसा-पिटा पब्लिसिटी स्टंट है । यानी कि जो बात सारी बम्बई कहती है उस से एक सांस में दस बार की रफ्तार से इनकार किये जाओ । आज सारी बम्बई में तुम्हारा ही चर्चा हो रहा है, मैडम, और तुम हो कि बात की हकीकत को सरासर झुठलाने की कोशिश कर रही हो ।”
“लेकिन मैं सत्य बोल रही हूं ।”
“खैर छोड़ो । यह वक्तव्य तुम प्रेस वालों को देना । फिल्मी क्लाइमैक्स के बाद यह फिल्मी ऐण्टी क्लाइमैक्स उन्हें बहुत पसन्द आयेगा । मुझे तो एक बात बताओ ?”
“पूछिये ।”
“अशोक को फांस कैसे लिया तुमने ।”
आशा का चेहरा कानों तक लाल हो गया ।
“ओह, आई एम सॉरी ।” - सिन्हा अपने प्रश्न की प्रतिक्रिया देखकर एक क्षमा क्षमायाचनापूर्ण स्वर से बोला - “मेरा यह मतलब नहीं था । बाई गॉड आई डिड नाट मीन ऐनी ओफेन्स आई एम सॉरी अगेन ।”
आशा चुप रही । सिन्हा ही नहीं हर कोई बात को सुनते ही कूदकर इस नतीजे पर पहुंच जाता था जरूर आशा ने ही अशोक को फांसा होगा ।
आशा उठ खड़ी हुई और बोली - “मैं जाऊं ?”
“हां, हां ।” - सिन्हा जल्दी से बोला - “शौक से । शौक से ।”
आशा बाहर निकल आई ।
बारह बजे के लगभग एक लम्बा-तगड़ा आदमी आशा से मिलने आया । उस ने अपने गोद मे भारी भरकम कैमरा लटकाया हुआ था ।
“मेरा नाम कामतानाथ है ।” - उसने बताया ।
“अच्छा ।” - आशा अनिश्चित स्वर से बोली ।
“मैं हिन्दोस्तान का नम्बर वन फोटोग्राफर हूं ।” - कामतानाथ गर्वपूर्ण स्वर से बोला - “हिन्दोस्तान की तमाम फिल्मी पत्रिकाओं में मेरी खींची हुई तस्वीरें छपती हैं । फैनफेयर वाले तो अपने स्टाफ फोटोग्राफरों की तसवीरें रिजेक्ट करके मेरी तसवीरें छापते हैं । बम्बई के सारे बड़े फिल्मी कलाकर तसवीरें खिंचवाने के लिये मुझे विशेष रूप से फोन करके अपनी कोठी पर बुलवाते हैं ।”
“यहां कैसे तशरीफ लाये आप !” - आशा तनिक उकताये स्वर से बोली ।
“मैं अपने स्टूडियो में आप की कुछ तसवीरें खीचना चाहता हूं ।” - कामनानाथ का कहने का ढंग ऐसा था जैसे वह आशा को फोटोग्राफी के लिये सब्जैक्ट चुन कर उस पर भारी अहसान कर रहा हो - “आप पर फीचर तैयार करना चाहता हूं । इसलिये आप से अपॉइंटमेंट चाहता हूं ।”
“कैसे फीचर ?”
“यह अभी मत पूछिये । बाईगाड, आशा जी, मेरे दिमाग में आप की तसवीरों के लिये ऐसे धाकड आइडिया आये हैं कि एक बार जो आपकी तसवीर देख लेगा उसी का उड़नतख्ता हो जायेगा और उसे मजबूरन कहना पड़ेगा कि कामतानाथ मान गये तुम्हें । तुम वाकई हिन्दोस्तान के नम्बर वन फोटोग्राफर हो । कहिये, क्या ख्याल है ।”
और कामतानाथ ने भवें कपाल पर चढा कर आंखें मटकाई ।
“लेकिन आप एकाएक मुझ पर इतने मेहरबान क्यों हो रहे हैं ?”
“क्या मतलब ?”
“आप मेरी तसवीरें क्यों खीचना चाहते हैं ?”
“क्योंकि कि आप बेहद खूबसूरत हैं और आप का चेहरा बेहद फोटोजेनिक है ।”
“आपकी मुझसे इस अक्समात दिलचस्पी की यही एक वजह है ।”
“जी हां ।” - कामता नाथ बोला । उसके स्वर में मौजूद हिचकिचाहट आशा से छुप न सकी ।
“खूबसूरत तो मैं पहले भी थी, चेहरा भी मेरा अब फोटोजेनिक नहीं हुआ है लेकिन पहले तो अपने कभी दर्शन नहीं दिये ।”
“पहले मुझे आपके बारे में जानकारी नहीं थी ।” - कामतानाथ के मुंह से बरबस निकल गया ।
“अब कैसे हो गई है ?”
कामता नाथ को जवाब नहीं सूझा । वह आशा के सीधे हमले से काफी हद तक बौखला गया था । शायद उसने तो सोचा था कि आशा अपने फोटोफीचर के नाम पर बल्लियों उछलने लगेगी और उसका अच्छा खासा अहसान मानेगी कि उतने आशा को तसवीर खींचने के काबिल समझा ।
“आपको एकाएक मेरी जानकारी इसलिये हो गई है ।” - आशा कठोर स्वर से बोली - “क्योंकि अब मैं एक मामूली स्टैनो टाइपिस्ट नहीं रही हूं, क्योंकि मैं करोड़पति फिल्म निर्माता जेपी सेठ की बहू बनने वाली हूं और यह बात पिछले चौबीस घन्टे में बम्बई के फिल्म उद्योग में जंगल की आग की तरह फैल गई है । आपको मेरी खूबसूरती में और मेरे फोटोजेनिक फेस में इतनी दिलचस्पी नहीं है, जितनी दिलचस्पी आपको मेरे सम्भावित रुतबे में है । कहिये, यही बात है ।”
“यही बात है ।” - कामतानाथ कठिन स्वर से बोला ।
आशा फिर नहीं बोली ।
कामतानाथ कुछ क्षण पिटा हुआ सा मुंह लेकर बैठा रहा ।
दूसरी बार जब कामतानाथ बोला तो उसके स्वर में से दबदबे और आत्मप्रशंसा का पुट एकदम गायब हो चुका था ।
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10-12-2020, 01:30 PM,
#40
RE: Hindi Antarvasna - Romance आशा (सामाजिक उपन्यास)
“देखिये, मैडम ।” - वह बड़े दीन स्वर से बोला - “आज की तारीख में आपका और जेपी सेठ के लड़के अशोक का सम्बन्ध बम्बई की सबसे सैन्सेशनल न्यूज है । फिल्मी अखबारों में आपकी न्यूज भी छपेगी और तसवीरें भी । आपके पास पहुंचने वाला मैं पहला फोटोग्राफर हूं लेकिन विश्वास कीजिये अभी यहां कई आयेंगे । आम तौर पर फिल्मी अखबारों वाले किसी विशेष समाचार को कवर करने वाली उन्हीं तसवीरों को छाप देते हैं जो उनकी टेबल पर सबसे पहले जाती है । इसीलिये मैं सबसे पहले आपके पास पहुंचा हूं । मैडम, आपको तो कई फोटोग्राफरों को ओब्लाइज करना पड़ेगा । इसलिये आपको तो कुछ फर्क पड़ेगा नहीं, मुझे चार पैसे मिल जायेंगे ।”
“लेकिन मैंने तसवीरें नहीं खिंचवानी हैं, मैंने न्यूज नहीं बनना है ।” - आशा कड़े स्वर से बोली ।
“देखिये, नाराज मत होइये । अगर आपकी नाराजगी की वजह मेरा व्यवहार है तो मैं आपसे हजार माफी चाहता हूं । अगर आप इस समय मुझसे बात करने के मूड में नहीं हैं तो मैं फिर आ जाऊंगा, लेकिन मुझ पर इतना अहसान जरूर कीजिये कि मेरे इलावा किसी दूसरे फोटोग्राफर को अप्वायन्टमैन्ट मत दीजियेगा । इतना जरूर याद रखियेगा कि सब से पहले मैं आपके पास आया था ।”
आशा चुप रही ।
“अच्छा नमस्ते, आशा जी ।” - कामतानाथ उठ खड़ा हुआ ।
आशा ने छुटकारे गहरी सांस ली ।
उसी क्षण केबिन में चपरासी प्रविष्ट हुआ । चपरासी के साथ लगभग दस वर्ष का एक मैला कुचैला लड़का था ।
“बीबी जी ।” - चपरासी बोला - “यह एक छोकरा आपको पूछ रहा है ।”
“क्या है ?” - आशा ने छोकरे से पूछा ।
“आपको यह पैकेट देने का है ।” - छोकरा बोला और उसने एक भूरे कागज में लिपटा हुआ छोटा सा पैकेट आशा के सामने रख दिया ।
“किसने भेजा है तुम्हें ?” - आशा ने पूछा ।
“अपुन को उसका नाम नहीं माजूम ।” - छोकरा बोला - “अपुन तो सामने ईरानी की चाय की दुकान में वेटर है । साब अपुन को बोला कि यह पैकेट ऊपर दूसरे माले में सिन्हा एन्ड सन के दफ्तर में आशा बीबी को दे के आने का है । सौ अपुन चला आया । इतना सा काम का साबने अपुन को रुपया दियेला है ।”
आशा उत्सुकतापूर्ण ढंग से पैकेट खोलने लगी ।
आशा का ध्यान अपनी ओर से बंटते देखकर छोकरा चुपचाप खिसक गया ।
भूरे कागज की डबल पैकिंग हटा देने के बाद जो वस्तु प्रकट हुई वह सफेद कागज में लिपटा हुआ एक चाकलेट का पैकेट था ।
आशा का दिल धड़कने लगा । उसने कांपते हाथों से चाकलेट की बार को कागज से अलग किया और खोल लिया ।
कागज पर अमर के चिर परिचित हैड राइटिंग में में था:
मुबारक हो । अगूठी बहुत खूबसूरत थी । या शायद आप की उंगली में थी, इसलिये खूबसूरत लग रही थी । आशा है, जल्दी ही दुल्हन के लिबास में भी आपकी तसवीर देखने को मिलेगी ।
आशा ने कागज को उलट पलट कर देखा । और कुछ नहीं लिखा था ।
एकाएक वह अपनी सीट से उठी और बाहर की ओर भागी । दफ्तर के बाकी लोग आश्चर्य से उसे देखने लगे । आशा लपकती हुई बाहर निकली और सीढियों के रास्ते नीचे भागी ।
छोकरे को उसने इमारत के मुख्य द्वार से बाहर निकलते समय पकड़ लिया ।
“क्या है, बीबी जी ?” - छोकरा हड़बड़ाकर बोला - “क्या कमाल है ?”
“सुनो ।” - आशा हांफती हुई बोली - “वो साहब कहां हैं जिन्होंने तुम्हें पैकेट दिया था ?”
“वह साहब तो तभी चला गया था ।” - छोकरा बोला ।
“कहां ?”
“अपुन को क्या मालूम ?”
“शायद चाय की दुकान में ही ?”
“नहीं है, बाबा, अपुन ने खुद उसको बस में चढते देखा था ।”
लेकिन फिर भी आशा ईरानी के रेस्टोरेन्ट में पहुंची ।
अमर वहां नहीं था ।
आशा ने हेनस रोड के दोनों ओर दूर दूर तक द्दष्टि दौड़ाई । अमर उसे कहीं दिखाई नहीं दिया ।
आशा भारी कदमों से चलती हुई वापिस लौट आई ।
***
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