Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
12-07-2020, 12:11 PM,
#11
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
वो गाड़ी से उतरते हुए लडखडा गयी, मैंने उसे सहारा दिया और इस तरह मेरा उस से स्पर्श हुआ, किसी महंगे इत्र की खुशबु उसके जिस्म से मैंने अपने जिस्म में महसूस की. एक कमरे में बिस्तर था मैंने उसे वहां पर बिठा दिया. उसने फिर से बोतल मुह को लगा ली.

मैं- पहले से ही काफी नशा है और मत करो.

वो- ये जिन्दगी ही नशा है बोतल तो बस बहाना है .... खुद को सकूं देने का .

मुझे समझ नहीं आ रहा था की किस झमेले में पड़ गया हूँ मैं

मैं- तो मैं चलू , मुझे देर हो रही है , दूर जाना है

वो- चंपा को बुलाओ, कहाँ मर गयी वो .

मैं- कौन चंपा

वो- यहाँ की नौकरानी ,

मैं- यहाँ तो कोई नहीं , ताला तो हमने ही खोला है,

वो- कहाँ मर गयी हरामजादी, उसमे मालूम था मैं आउंगी आज .

तभी कमरे में एक औरत आई-

“माफ़ करना मालकिन मुझे आने में देर हुई, ”

तो ये चंपा थी, कोई चालीस- पैंतालिस साल की औरत , शायद यही कहीं आस पास रहती होगी, नौकरानी थी इस औरत की,

“कहाँ थी तू कुतिया , जल्दी से एक बोतल ला मेरे लिए ” वो चिल्लाते हुए बोली.

“जी ”चंपा बस इतना ही बोली और बाहर की तरफ मुड गयी

मैं-बस बहुत हुआ, अब और नहीं पीनी तुम्हे, एक तो चोट लगी है और ऊपर से ये तमाशा

वो- किसकी मजाल जो मुझे रोके

तभी चंपा एक बोतल ले आई , उस औरत ने ढक्कन खोला और मुह से लगा ली , मुझे भी थोडा गुस्स्सा आया मैंने वो बोतल छीनी और फेक दी,

वो- गुस्ताख, तेरी ये जुर्रत

उसने अपना हाथ मुझे मरने को किया पर मैंने उसे थाम लिया और बोला- बस , बस बहुत हुआ, अभी मेरे सामने नहीं चलेगा ये सब तू होगी किसी महल की रानी , पर ये ड्रामा कही और करना .

मैं- काकी इसको चोट लगी है कुछ मरहम वगैरा है तो ला दो लगाते है इसके .

चंपा बाहर गयी और थोड़ी से रुई और एक टियूब ले आई.

मैं- अभी दो मिनट चुप रहना मुझे दवाई लगाने दे.

न जाने मेरी बात का उस पर कैसा असर हुआ, उसने विरोध नहीं किया , मैंने उसके सर पर लगे कट पर दवाई लगाई और वापिस चुन्नी बाँध दी.

मैं- काकी कुछ खाने को है तो खिलाओ इसे और मुझे भी.

चंपा ने सर हिलाया और बाहर चली गयी.

“तुम जानते नहीं हो मुझे, इस गुस्ताखी की सजा तेरी जान भी हो सकती है ”

मैं- हाँ ले लेना मेरी जान , पहले अपनी हालत ठीक कर , अच्छा भला जा रहा था न जाने किस घडी में तू मिल गयी.
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12-07-2020, 12:11 PM,
#12
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#7
“इतनी हिमाकत आज तक किसी ने नहीं की ”वो बोली

मैं-सच कडवा होता है, शायद नहीं बताया होगा किसी ने पर मैं सच बोलता हु,

वो- उफ्फ्फ्फ़ ये, अदा तेरी लड़के, चल तेरी बात मान ली, वैसे नाम क्या है तेरा.

मैं- कबीर, वैसे इस हालत में तुम्हे घर जाना चाहिए था और तुम यहाँ हो , क्या कोई फ़िक्र नहीं तुम्हे अपने आप की , शराब के नशे में देखो क्या हालत हुई है , अपने बारे में नहीं तो घर वालो का सोचा करो, क्या उन लोगो को मालूम है तुम पीती हो,

औरत- किसे परवाह है किसी की, सब मोह है कबीर कोई किसी का नहीं इस जहाँ में

तभी चंपा आई बोली- खाना तैयार है

मैं- ले आओ
वो औरत उठी, और लडखडाते कदमो से बाहर को चलने लगी,

मैं- चंपा ये कहा जा रही है तुम ले जाओ इसे

औरत- नहीं, मुझ किसी की मदद नहीं चाहिए, मैं खुद जाउंगी.

वो बहार चली गयी , थोड़ी देर बाद एक आवाज सी हुई तो मैं बाहर गया, चंपा भी बाहर आई, उसने मुझे कोने की तरफ इशारा किया . वो बाथरूम था मैंने देखा चंपा की मालकिन फर्श पर गिरी हुई थी , सलवार पैरो में फंसी थी फर्श पर मूत की धार बह रही थी , बस यही देखना बाकि था .

“चंपा, इसकी दशा सुधारो, साफ करो सब ” मैंने कहा

चंपा ने अगले कुछ मिनट बाथरूम में बिताये और फिर वो बाहर आई , बोली- साहब, मालकिन के बदन को साफ़ कर दिया है वो बेहोश है और अब कपडे नहीं है इनके पास, ये वाले तो गीले है ,

मैं- यहाँ कपडे नहीं रखती, दारू रखती है

चंपा कुछ नहीं बोली.

मैं अन्दर से एक चादर लाया और उस औरत के बदन पर लपेटा, उसके नंगे बदन को देखा मैंने पर चंपा पास थी तो बस ..... अन्दर बिस्तर पर लाके पटका उसे. पहली बार उसके चेहरे पर एक मासूमियत देखि मैंने , खैर मुझे तो भूख लगी थी मैंने खाना खाया. चंपा ने कहा की वो पास वाले कमरे में है कुछ चाहिए तो मैं उसे बुला लू.

न जाने कब कुर्सी पर बैठे बैठे मेरी आँख लग गयी, मालूम नहीं कितनी देर सोया होऊंगा , रात की कौन सी घडी थी जग गिलास निचे गिरने की आवाज से नींद खुल गयी , मैंने देखा वो पानी पीने की कोशिश कर रही थी, चादर बदन से हटी हुई थी, मैंने अब पूरी तरह से उसके नंगे बदन को देखा.

दूध सा गोरा रंग , जैसे सफेदी की चमकार , मध्यम आकार की छातिया , पतली कमर और थोड़े से बाहर निकले कुल्हे, पतली सुराही सी गर्दन , लरजते लाल होंठ . हालाँकि कायदे से ऐसा नहीं होना था पर उस समय हालात ही ऐसे थे,. मैं उठा और जग उसके होंठो पर लगाया. हाँफते हुए वो पानी ऐसे पीने लगी जैसे बरसो बाद आज मिला हो उसे.

कुछ पीया कुछ उसके बदन पर गिर गया. मैं उसे संभाल ही रहा था की वो मेरी बाँहों में झूल गयी, ताई के साथ हुई टेम्पो वाली घटना के बाद ये दूसरा अवसर था जब कोई औरत मेरे इतने करीब थी, मेरे हाथ ने उसकी पीठ सहलाई, मुझे मेरे तन की तरंगे अहसास करवाने लगी थी,और कोई भी मर्द का ईमान डोल जाये जब इतनी सुंदर औरत उसकी बाँहों में नंगी हो.

उसने अपना सर मेरे आगोश में छुपा लिया , uffffffffff कितनी मासूम लग रही थी वो, उस लम्हे में, कुछ देर उसे ऐसे ही लिए बैठा रहा फिर उसे सुला दिया. .पिछले कुछ दिनों में मेरी जिन्दगी इस तरह से खेल खेल रही थी की मैं हैरान था, , खैर सुबह जब आंख खुली तो सूरज सर पर था, पर वो देवीजी अभी तक सो रही थी.
चंपा ने मुझे चाय पिलाई, फिर मैंने उस से कहा की कपडे सुख गए हों तो उसे पहना दे, और कुछ खिला पिला दे , जब वो उठे तो. मैं थोडा बाहर चला गया , मैंने आस पास देखा इलाके को, इस तरफ मैं जिन्दगी में पहली बार आया था . थोडा आगे जाने पर मुझे बस्ती दिखाई दी पर मैं गया नहीं उस तरफ.
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12-07-2020, 12:11 PM,
#13
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
करीब घंटे भर बाद मैं वापिस आया तो एक नए आश्चर्य ने मेरा स्वागत किया . वो उठ गयी थी और उसका व्यव्हार ऐसा था की जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं हो. एकदम सभ्य , शालीन, और हाँ उसे मेरा नाम याद था , कल की हर घटना याद थी उसे .पर मुझे चलना था तो मैंने उसे कहा - अभी जाना होगा वापिस,
वो- हाँ,चलते है .

थोडा लडखडा रही थी वो पर ठीक थी. उसने गाड़ी स्टार्ट की और हम रतनगढ़ की तरफ चल पड़े, थोड़ी दूर गए थे की गाड़ी झटके लेने लगी और बंद हो गयी.मैंने अपना माथा पीट लिया.

“ये भी धोखा दे गयी. ” बोली वो

मैंगाड़ी से उतरा और एक पेड़ के निचे बैठ गया

वो- करो कुछ

मैं - क्या करू, कोई मिस्त्री नहीं हूँ मैं. और ये तो पहले सोचना था कल दे मारी जब तो गाड़ी
वो कुछ नहीं बोली.
मैं- पैदल चलते है , मुझे तो दूर जाना है .
न जाने क्यों उसने हाँ कह दी.

“तो कबीर, क्या करते हो तुम ” उसने पूछा

मैं- खेती बाड़ी , छोटी मोटी मजदूरी
वो- हम्म

मैं- अपने बारे में बताओ

वो- कुछ नहीं है बताने को , वैसे मेरा नाम प्रज्ञा है
मैं- खूबसूरत नाम है बिलकुल तुम्हारे जैसा
वो हंस पड़ी, बोली- होगा ही मेरा नाम जो है
मैं- किसी रसूखदार परिवार की लगती हो , पर ऐसे नशा करके खुद का तमाशा करना ठीक नहीं लगता
वो- ये जिन्दगी खुद एक तमाशा है कबीर, और तुम जानते ही क्या हो इन रसूखदार परिवारों के बारे में, तुम्हारा सही है दिन भर काम किया और रात को चैन की नींद सो गए.
न जाने मुझे उसकी बात चुभ सी गयी, खैर उसने सच ही कहा था .
बातो बातो में हम काफी आगे आ गये थे की वो बोली- प्यास लगी है पानी पीना है .
मैंने इधर उधर देखा एक खेत में धोरा था ,
मैं- उधर पी लो
उसने कहा- कहाँ
मैं- धोरे में
वो- पागल हुए हो क्या मैं पियूंगी ये पानी
मैं- मर्जी है,
मैंने धोरे पर अपना मुह लगाया और पानी पी लिया वो मुझे देखती रही .
“मेरे पास आओ ” मैंने कहा
वो आई मैंने उसे बैठे को कहा और अपनी अंजुल भर के उसकी तरफ की , उसने अपने होंठ मेरी हथेली पर रखे, अपने आप में ये एक मुकम्मल अहसास था , मुझे महसूस हुआ की पानी वो पी रही थी प्यास मेरी बुझ रही हो .
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12-07-2020, 12:11 PM,
#14
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#8

“पहली बार इतनी दूर तक पैदल चली हूँ ”प्रज्ञा बोली

मैं- हाँ तो ठीक है न कभी कभी आम इन्सान होने को भी महसूस करना चाहिए.

प्रज्ञा- तुम्हरी बाते न जाने क्यों अच्छी लग रही है

मैं- आदमी भी अच्छा हूँ , बस समय ख़राब है ,

वो- सब वक्त का ही तो खेल है ,

न जाने क्यों मुझे लग रहा था की प्रज्ञा के मन में कोई बोझ है पर अपना क्या लेना देना था , ऐसे ही बाते करते हुए हम दोनों उस मोड़ तक आ गए थे जहाँ से हमें जुदा होना था ,

मैं- अपने ज़ख्म को वैध जी को दिखा लेना, और कोशिश करना की ऐसे नशा न करो, मैं ये तो नहीं जानता की तुम्हारी परेशानिया क्या है पर इतना तो जान लिया है की एक नेकी , एक मासूमियत है तुम्हारे दिल में , उसे मत खोना

प्रज्ञा- तुम कहाँ रहते हो.

मैं-इस जंगल के परली तरफ

प्रज्ञा- पर वहां तो अर्जुन्गढ़ है ,

मैं- उस से थोडा पहले ही कुछ खेत आते है वहीँ पर,

प्रज्ञा- तुमसे मिलकर अच्छा लगा कबीर

मैं- मुझे भी

एक दुसरे को कुछ देर देखने के बाद मैं मुड गया , एक बार भी मैंने पीछे मुड कर नहीं देखा, बेशक मैं मंदिर जाना चाहता था पर अ जाने को मैंने वापसी का रस्ता ही अख्तियार किया , कभी कभी दिल को समझा लेना ही ठीक होता है पर ये दिल जो होता हैं न ये अपने रस्ते खुद ढूंढ लेता है , और जिसे हम शिद्दत से याद करते है वो कभी कभी ऐसे मोड़ पर टकरा जाता है जब कोई उम्मीद न हो.

जंगल में थोड़ी दूर ही चला था की मुझे बकरियों की आवाज सुनाई दी , कुछ दूर आगे बढ़ने पर मुझे वो दिखाई दी , वो गहरी आँखों वाली लड़की, जिस के लिए मैं कल आया था , उसने भी मुझे देखा और चिल्लाते हुए बोली- दुश्मनों के इलाके में यूँ नहीं घूमना चाहिए, किस्मत हर बार साथ नहीं देती.

मैं उसकी तरफ बढ़ते हुए, - पर तुम तो हो न मेरे साथ , फिर किस्मत का साथ किसे चाहिए

वो- मैंने सुना है जंगल इंसानों को अक्सर खा जाते है

मैं- मैंने कहा न तुम साथ हो तो कोई डर नहीं

उसने पानी की बोतल दी मुझे, मीठा पानी पीकर सकूं मिला .

वो- और कैसे इस तरफ

मैं- आजकल न जाने क्यों मेरा हर रास्ता तुम्हारी तरफ ही जाता है, मंदिर की तरफ गया था

वो- कर लिए दर्शन

मैं- हाँ अब कर लिए

वो मुस्कुरा पड़ी.

“बाते बहुत मीठी करते हो, ” उसने आँखे ततेरते हुए कहा

मैं- ये झोले में क्या है .

वो- परांठे है ,खायेगा

मैं- खिलाओगी

उसने झोले से खाना निकाला और मुझे दिया , मैंने खाना शुरू किया वो मेरे पास बैठ गयी .

मैं- बढ़िया है , बहुत दिनों बाद मैंने ऐसा भोजन खाया ,आभार तेरा

वो- तेरे घर में कौन कौन है

मैं- कोई नहीं मैं अकेला हूँ

वो- हम्म

मैं- तू रोज आती है इधर बकरिया चराने ,

वो- नहीं रे, मनमौजी हूँ मैं जिधर दिल करे उधर चल पड़ती हूँ , अब सबके भाग में सुख थोड़ी न हैं , मेहनत मजूरी करके जी रहे है बस

अब मैं क्या कहता उसें

मैं- बुरा न माने तो एक बात कहू

वो- बोल

मैं- जबसे तू मिली है , अच्छा सा लगने लगा है .

वो- मैं तो हु ही खुशगवार

मैं- सो तो है , मतलब मुझे लगता है की जैसे कुछ नया हो रहा है

वो- ऐसा कुछ नहीं है , तू भटकता रहता है मैं भटकती रहती हु, बस आपस में टकरा जाते है और तू एक बात कभी न भूलना , तू और मैं दुश्मन है .

मैं- हाँ, तो मार दे मुझे, निभा ले दुश्मनी,

वो- बातो से हकीकत नहीं झुठला पायेगा तू

मैं- अब कहाँ दुश्मन रहे अब तो मैंने दुश्मन का नमक भी खा लिया

वो- बाते न घुमा.

मैं- अपने मन की बता, क्या तू मुझे दुश्मन मानती है .

वो- मित्र भी तो नहीं तू

मैं- जानती है मैं रतनगढ़ सिर्फ इसलिए आया की तुझे देख, सकू, उस पहली मुलाकात को भुलाये नहीं भूल पाता मैं , मेरे कदम अपने आप तेरे रस्ते पर चल पड़ते है

वो- देख, हकीकत से न तू दूर है न मैं , तेरी जगह कोई और होता तो मैं उसकी मदद भी करती उस दिन, और ये बार बार मिलना इत्तेफाक है , तेरा मेरा सच जो है वही रहेगा.

मैं- एक सच और है जो इन सब से बहुत परे है वो है मित्रता का सच. मैं तेरी तरफ मित्रता का हाथ बढाता हूँ, तुझे मैं सच्चा लगु तो हाँ कह दे.

उसने अपना झोला उठाया और बोली- मुझे चलना चाहिए.

मैं- हाँ जाना तो है , फिर कब मिलेगी

वो- तू छोड़ दे इन रास्तो को

मैं- छोड़ दूंगा,

वो- बढ़िया है , चल चलती हूँ फिर

मैं बस उसे चलते हुए देखता रहा , थोड़ी दूर जाने के बाद वो मेरी तरफ पलटी और बोली- परसों दोपहर मंदिर के पीछे तालाब की सीढियों पर दिया जला देना,

ये क्या कह गयी वो, पूरे रस्ते मैं सोचता रहा, रह जैसे ख़ुशी से महक गयी थी ,खुमारी में मैं न जाने कब अपने खेत में पहुच गया

दूसरी तरफ प्रज्ञा हवेली पहुची, उसकी अस्त व्यस्त हालत देख कर सारे नौकर चाकर घबरा गए.

“कोई जाके वैध जी को बुला लाओ और बाग़ के रस्ते में हमारी गाड़ी ख़राब पड़ी है , कोई देख लेना उसे, ”प्रज्ञा ने हुक्म दिया और अपने कमरे में घुस गयी . सबसे पहले उसने अपने कपड़े उतारे और बाथरूम में घुस गयी ,आदमकद शीशे में उसने खुद को नंगी देखा तो नजर शीशे पर ही रुक गयी. लगा की जैसे बरसो बाद उसने अपने रूप को ऐसे निहारा था

न जाने क्यों उसे अपनी देह दहकती सी महसूस हो रही थी उसने शावर चलाया और ठन्डे पानी से भीगने लगी.

पर न जाने क्यों ये पानी भी उसके तन को और तडपा रहा था , प्रज्ञा का हाथ उसकी चूत पर चला गया .ग गुलाबी रंग का वो छोटा सा छेद, जिस पर काफी दिनों से उसने कुछ भी महसूस नहीं किया था . जैसे धधकने लगा था .जैसे ही उसकी उंगलियों ने उस छोटे से दाने को छुआ . प्रज्ञा का पूरा बदन हिल गया .

उसकी आँखे अपने आप बंद होती चली गयी, न जाने कब बीच वाली ऊँगली चूत के छेद में घुस गयी, उसके पैर थोड़े से खुल गये, खुमारी ने प्रज्ञा के सम्पूर्ण अस्तित्व पर कब्ज़ा कर लिया, तेजी से अन्दर बाहर होती ऊँगली उसे दूर कही आसमान में उडाये ले जा रही थी और फिर धम्म से वो फर्श पर गिर गयी.
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12-07-2020, 12:11 PM,
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#9

न जाने कितनी देर प्रज्ञा ऐसे ही पानी के निचे पड़ी रही , यौन सुख बहुत बार प्राप्त किया था उसने पर बहुत दिनों बाद त्रप्ति का अहसास हुआ था उसने, नहाने के बाद फिर से उसने खुद को शीशे में निहारा और निचे आ गयी, वैध इंतजार कर रहा था उसका, वैध ने सर की चोट को देखा, पट्टी की और एक दो गोली देकर चला गया. नौकरों से अपने पति और बच्चों के बारे में पूछा और फिर वापिस अपने कमरे में आ गयी .

इधर कबीर को न जाने क्या हो गया था भूख प्यास भूल गया था वो , बस एक बेख्याली थी , उस रात कबीर अपने कपडे रख रहा था की उसे कोने में पड़ा दिया दिखा तो उसने फिर से कोशिश की उसे जलाने की पर एक बार फिर उसे निराश होना पड़ा.

“दादा भी चुतिया था ” बस इतना ही कहा

दरसल इंतजार था उस दिन का जब वापिस रतनगढ़ जाना था . सुबह बस नहा कर तैयार ही हुआ था की ताई आ गयी, हाथो में खाने का डिब्बा लिए. उसे देखते ही मुझे वो सर्द अहसास हुआ जो टेम्पो में हुआ था .

ताई- खाना लायी हु तुम्हारे,

मैंने ताई की तरफ देखा और बोला- मुझे कुछ और खाना है,

ताई मेरे पास आई और बोली- क्या खायेगा मेरा बेटा

मैं- दूध पीना है मुझे .

ताई शर्मा गयी, उसे उम्मीद नहीं रही होगी की मैं ऐसे सीधा कह दूंगा उसे पर, टेम्पो में जो हुआ उसके बाद हम दोनों ही जानते थे की क्या करना है और हम दोनों की मंजूरी थी उसमे.

मैंने ताई को अपनी बाँहों में भर लिया और ताई के होंठो पर पाने होंठ रख दिए, ताई भी मेरा साथ देने लगी, उसने अपना मुह थोडा सा खोला और ताई का निचला होंठ मेरे दोनों होंठो के बीच आ गया. चुमते चुमते मैं ताई के नितम्बो को साड़ी के ऊपर से मसलने लगा. जब मेरे होंठ थकने लगते तो ताई चूसने लगती और जब वो थकती तो मैं चूसता

चूमा चाटी के दौरान मैंने ताई की साडी खोल दी अब बरी ब्लाउज की थी और जल्दी ही ताई के मोटे मोटे खरबूजे काली जाली वाली ब्रा में से बाहर आने को मचल रहे थे, मैंने कमरे को दरवाजा बंद किया और फिर से उसे बाँहों में भर लिया. वासना का तूफ़ान शुरू होने वाला था . ताई की ब्रा और पेटीकोट खोल दिए

काले रंग की कच्छी में ताई की मांसल भरी हुई जांघे, और चूत के ऊपर का फूला हुआ उभार किसी भी मर्द को उस पल पागल कर देता . एक बार फिर से मैं उसके होंठ चूसने लगा. मैंने अपने हाथ ताई की कच्छी में डाले और उसके मदमस्त नितम्बो को मसलने लगा मैंने दोनों कुलहो को फैलाया और ताई की गांड के छेद को अपनी उंगलियों से सहलाया.

ताई बुरी तरह से मुझसे लिपट गयी , उत्तेजना से भरी ताई ने मेरी पेंट खोल दी और उसने निचे सरकाते हुए मेरे लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया. अपना हाथ लंड पर ऊपर निचे करते हुए ताई ने उसके आकार का जायजा लिया और उसे जोर से हिलाने लगी. मुझे अब हद से ज्यादा मजा आने लगा था .

ताई अपने घुटनों पर बैठी और मेरी आँखों में देखते हुए लंड को मुह में भर लिया . थूक से सनी जीभ ने जैसे ही मेरे सूखे सुपाडे को छुआ, तन बदन में जैसे करंट सा लग गया , मेरे घुटने कांप गए मैंने अपने हाथो से ताई का सर थाम लिया. और वो बेरहम उसे चूसते हुए मेरे अन्डकोशो को सहलाने लगी,

“आह ताईजी ” मेरी आहे कमरे में गूंजने लगी और ताई पुरे मजे से मूझे लंड चुसाई का अहसास करवा रही थी, जैसे उसके लिए ये रोज का काम हो. मैंने उसके सर को कस क पकड़ लिया और मेरी कमर जोश से आगे पीछे होने लगी, और मुझे यकीं था की लंड ताई के गले की गहराई तक पहुच रहा है .

कुछ देर बाद उसने मुह से निकाल दिया और बिस्तर पर लेट गयी,मैंने पैरो में फंसी पेंट को साइड में फेका और बिस्तर पर चढ़ गया, ताई ने केअपनी एक चूची मेरे मुह में दे दी, बचपन में चूची से दूध बहुत पिया था पर ये एक नया अहसास था , ताई के निप्पल अकड़ने लगे थे, फिर ताई ने मेरा हाथ अपनी चूत पर रख दिया, कच्छी का अगला हिस्सा बहुत गीला था , मैंने चूत को कस कर दबाया ताई आंहे भरने लगी .

थोड़ी देर और चूची पीने के बाद मैंने कच्छी को उतार फेंका , किसी भी औरत के बदन का सबसे प्यारा हिस्सा उसकी चूत , मेरे सामने थी, ताई की चूत पर ढेर सारे बाल थे, और उन बालो के बीच काले रंग के होंठ मैंने उंगलियों से उन्हें खोला तो अन्दर का लाल हिस्सा दिखा मुझे , मैं बस देखता ही रहा गया,

ताई का बदन उत्तेजना से हिल रहा था मैंने उसके पैरो को और थोडा सा खोला और अपने चेहरे को उस पर झुका लिया , जिस तरह से ताई ने लंड चूसा था मुझे भी इच्छा हुई चूत को चूमने की. मेरी नाक उसकी चूत से टकराई तो एक सुगंध ने जैसे मुझ पर जादू कर दिया . मैंने महसूस किया की वो छेद एक कुवा है और मेरे होंठ जन्मो के प्यासे.

मैंने बिना देर किये उस तपती भट्टी पर अपने होंठ रख दिए.

“ओह kabirrrrrrrrrrrrrrr ” ताई जैसे चहकने लगी थी. चूत से रिश्ता नमकीन पानी मेरे मुह में घुलने लगा, और जब मेरी जीभ ऊपर उस छोटे से दाने से रगड़ खायी तो ताई ने मेरे चेहरे को अपने पैरो से दबा लिया और निचे से चुतड उठा उठा कर चूत चुसवाने लगी

पर जल्दी ही ताई ने मेरा मुह वहां से हटा दिया और लंड को पकड़ कर चूत पर रगड़ते हुए बोली- अब सह नहीं पाऊँगी, बहुत दिनों से प्यासी हु, अपनी ताई की प्यास बुझा बेटा

मैं भी तो प्यासा था मैंने बिना देर किये वैसा ही किया थोडा सा दवाब डालते ही ताई की चूत खुलने लगी और उसने लंड को अपने अन्दर ले लिया . ताई ने मुझे अपनी बाँहों में कस लिया और हमारे होंठ अपने आप जुड़ गए, कुछ देर बस उसके ऊपर लेटा रहा , उसके बाद हमारी चुदाई शुरू हो गयी.

आने वाले कुछ पलो में क्या हुआ कुछ होश नहीं रहा बस ये मालूम था की दो जिस्म एक दुसरे में समाये हुए है , दोनों एक दुसरे के चेहरे को चूम रहे थे , ताई की चूत में तेज तेज धक्के पड़ रहे थे और वो खुल क्र अपना रस बहा रही थी , न जाने कितनी देर तक हम ऐसा करते रहे और फिर ताई ने मुझे बुरी तरह जकड़ लिए, चूत ने जैसेकैद कर लिया लंड को और फिर वो चीखते हुए शांत हो गयी, और ठीक उसी पल मेरे लंड से पिचकारिया गिरने लगी, मैं अपने रस से ताई की चूत को भरने लगा.
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12-07-2020, 12:11 PM,
#16
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#10

हम दोनों ने एक ऐसी मंजिल को पा लिया था जिसको हर कोई बार बार पाना चाहेगा , एक बार और ली मैंने और फिर पूरा दिन तबियत से सोया. ताई के जिस्म को तो पा लिया था मैंने पर दिल पर एक बोझ भी था जिसका भार बीते सालो से उठा रहा था मैं , शायद ताई को ऐसे प्यार करना मेरा प्रायश्चित था ,

पर अगले दिन में मेरे जेहन में था माँ तारा का मंदिर , ऐसा नहीं था की मैंने कोशिश नहीं की थी वजह जानने की आखिर क्यों दुश्मनी थी इन दोनों गाँवो की , बुजुर्गो से भी पूछा पर हर किसी ने बस इतना ही कहा की उन्हें नहीं मालूम. आखिर क्यों उस पुजारी ने कहा था की दुश्मन नहीं आएगा इस मंदिर में , और ऐसा था तो क्यों पुजारी की बेटी ने वहीँ बुलाया था एक नहीं बल्कि दूसरी बार.

खैर, उसके लिए भी कहा आसान था ऐसे ही किसी का साथ पकड़ लेना, जिसे वो जानती ही नहीं , मैंने उसे कहाँ असलियत बताई थी उसे, और दुश्मन से कोई भी रिश्ता रखना ,सोचने वाली बात तो थी ही. अगले दिन रतनगढ़ पहुँचते पहुचते दोपहर ही हो गयी थी .

वैसे भी अब तो जैसे ये सब रोज का हो गया था , खैर, मैं एक बार फिर से मंदिर प्रांगन में था , शायद दोपहर को यहाँ कोई नहीं होता था , मैंने अपना शीश झुकाया और मंदिर के पीछे वाले तालाब की तरफ चल पड़ा. ये कुछ सीढिया थी जो निचे को जाती थी .मैंने जेब से दिया और बाती निकाली जिन्हें मैंने कल ही खरीद लिया था .

तीली जलाई पर लौ नहीं जली, हवा भी ऐसी नहीं चल रही थी जो तीली जल न पाए, , मैंने फिर कोशिश की पर लौ नहीं जली. , अब मैं हुआ हैरान . माचिस आधे से ज्यादा खत्म हुई पर नतीजा शून्य , करे तो क्या करे , कोफ़्त सी होने लगी , गुस्सा आये पर जोर किस पर करे.

तभी मुझे एक विचार आया मैंने मंदिर में जलते दियो में से एक दिया वहां रख दू, मैं ऐसा करने जा रहा था की मुझे पुजारी आता दिखा, उसने भी मुझे पहचान लिया

पुजारी- तू तो वही है न

मैं- हाँ

पुजारी- तुझे कहा था न की नादानी मत करना

मैं- मंदिर तो सबका है तुम रोक नहीं सकते मुझे यहाँ आने से

उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने निहायत ही मुर्खता भरा सवाल कर लिया हो

पुजारी- नादान है तू अहंकारी , केवल दर्शनों के लिए तू आये ऐसी तेरी मंशा नहीं , कोई भी प्राणों का मोह त्याग कर ऐसा नहीं करेगा, शायद तेरी इच्छा यहाँ चोरी करने की है

मैं- इतना बुरा समय भी नहीं आया है मेरा की ये पाप करना पड़े

पुजारी -तो फिर क्यों आया यहाँ ,

मैं - कहा न दर्शन के लिए

पुजारी- एक बार और मैंने तुझे यहाँ देखा तो मैं राणाजी को बता दूंगा की अर्जुन्गढ़ का एक लड़का बार बार यहाँ आता है फिर तेरा नसीब

इस बकवास से मेरा दिमाग ख़राब हो रहा था , एक तो दिए की वजह से शर्मिंदगी थी और ऊपर से ये खाल खा रहा था

मैं- सुन, तुझे जिसे बुलाना है , बताना है जा अभी जा देर न कर, , किसी के बाप में दम नहीं जो मुझे रोक सके, और क्या ये गीत गा रहा है तू,

पुजारी को ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी,

मैं- अरे मंदिर तो सबका होता है , देवता के लिए कौन अपना कौन पराया , वो किसी में भेद नहीं करता तो तू कौन है , तू तो इस पद के लायक भी नहीं .

पुजारी- काश मैं तुझे समझा पाता , खैर अब मैं तुझे रोकूंगा नहीं यहाँ आने से

एक तो मेरा काम हुआ नहीं था ऊपर से ये ड्रामा , मेरा भी मन नहीं था रुकने का तो मैं वहां से बाहर सड़क पर आ गया. मैं वही एक पेड़ की छाया में बैठ गया .कुछ देर ऐसे ही बीती , की मुझे गाँव की तरफ से एक गाड़ी आती दिखी , जो कुछ ही देर में मेरे पास आ रुकी

“तुम हमेशा ऐसे ही बैठे रहते हो पेड़ के निचे ” प्रज्ञा ने मुकुराते हुए कहा

मैं- तुम भी तो ऐसे ही मिलती हो .

प्रज्ञा - आओ बैठो

मैं- नही, वापिस जाना है मुझे , जिस काम के लिए आया था वो हुआ ही नहीं

प्रज्ञा- मैं कुछ मदद करूँ , आओ तो सही

उसने दरवाजा खोला और मैं गाड़ी में बैठ गया. उसने गाड़ी चालू की

मैं- किधर जा रही हु

वो तुम कहो उधर ही चलते है

मैं- जंगल की तरफ

उसने गाड़ी उधर ही मोड़ दी.

प्रज्ञा- कल मैं तुम्हारे बारे में ही सोचती रही

मैं- वो भला.

वो- कैसे तुम अचानक से टपक पड़े और ऐसा लगा की जैसे बरसो का साथ है

मैं- चोट ठीक है

वो- हाँ, और कल मैंने नशा भी नहीं किया

मैं- बढ़िया है न , खुबसूरत औरते खुद ही एक नशा होती है फिर उनको भला नशे की क्या जरुरत

प्रज्ञा हंस पड़ी मेरी बात सुनकर, बोली- औरतो के दिल जीतने का हुनर है तुम्हारे अन्दर.

मैं- अपना दिल थाम के रखना फिर,

आधे जंगल में आने के बाद एक टूटे चबूतरे के पास मैंने उसे गाड़ी रोकने को कहा

मैं- यहाँ बैठते है .

वो-यहाँ

मैं- महलो की रानी, आओ तो सही कभी कभी ऐसी जगहों पर भी शांति मिलती है

वो- कबीर, ताना क्यों मारते हो

मैं- चलो फिर.

हम दोनों चबूतरे पर बैठ गए,

प्रज्ञा- कुछ परेशां से लगते हो

मैं- कुछ नहीं बस काम नहीं हुआ इसके लिए

वो- किस तरह का काम

मैं- बस जीने के लिए छोटे मोटे काम कर लेता हूँ

वो- चाहो तो हमारे यहाँ कर लो काम, मैं व्यवस्था कर देती हु,

मैं- तुमने राह चलते को इतना मान दिया, अपने साथ बिठाया यही बहुत है मेरे लिए

वो- ऐसी बात मत कहो कबीर, तुमने हुए उस छोटी सी मुलाकात ने ,वो थोडा सा समय जो हम साथ थे मैं इतना तो जान गयी हूँ की सच्चे इन्सान हो तुम , यदि मैं कुछ कर सकू तुम्हारे लिए तो.

मैं- मेरा एक सवाल है , क्या मैं तुम्हे बता सकता हूँ उसके बारे में

प्रज्ञा - अरे, बिलकुल.

मैं- मैं एक दिया जलाने की कोशिश कर रहा हूँ जो जल नहीं पा रहा ,

प्रज्ञा- क्यों भला,

मैं - दिखाता हूँ

मैंने जेब से दिया निकाला और बाती को तीली दिखाई और कसम से वो जल गया

प्रज्ञा- ये तो जल रहा है

मैं- हाँ पर तारा माता के तालाब की सीढियों पर क्यों नहीं जला ये.

प्रज्ञा- क्या तुम वहां पर गए थे .

मैं- हाँ पर ऐसे क्यों पूछ रही हो.

प्रज्ञा- वहां पर वो दिया नहीं जलेगा कबीर, तुमसे ही या मुझसे भी नहीं , किसी से भी नहीं .

मैं- पर क्यों,
Reply
12-07-2020, 12:11 PM,
#17
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#11

मैं- पर क्यों,

प्रज्ञा- प्रीत का वचन कबीर,

मैं- किसका वचन

प्रज्ञा- कहानी है, किस्सा है, अफसाना तुम इसे जो भी कहो , कुछ लोग मानते है कुछ इत्तेफाक कहते है , , कहते है की किसी ने प्रीत की डोर तोड़ी थी , किसने ये कोई नहीं जानता ,ये जो मंदिर है हमारे गाँव वाला इसमें कुछ ऐसा हुआ था की तभी से इस मंदिर में कोई दीप नहीं जलता .

मैं- पर मैंने ज्योत जलते देखि,

प्रज्ञा- पुजारी वो ज्योत अपने घर से लाता है , कितने बरस तो मुझे देखते हो गए ,

मैं- पूरी बात बताओ न

प्रज्ञा- कुछ कहानिया अधूरी ही होती है कबीर,किसी को भी नहीं पता की वो कौन थे क्या हुआ था कब की बात है ,

मैं- तुमने मुझे उलझन में डाल दिया

प्रज्ञा,- कैसी उलझन

मैं- किसी ने मुझसे कहा था वो दिया जलाने को

प्रज्ञा- तो उसमे क्या हैं इस कहानी पर बहुत लोग विश्वास करते है , कोशिश करते है इसकी डोर ढूंढने को , खैर , जाने दो इस बात को तुम ऐसे जंगल में मत घुमा करो ये सुरक्षित नहीं है , कहीं कोई जानवर न मिल जाए, अभी परसों की बात है तीन लोगो की लाशें मिली है नोची हुई

मैं- क्या करू, मेरे पैर अपने आप मुझे इस तरफ खींच लाते है और अब तो मेरे पास कारण भी है

मेरी बात सुनकर प्रज्ञा के चेहरे पर लाली छा गयी .

प्रज्ञा- अच्छा जी, बाते बहुत मीठी करते हो

मैं- बताया तुमने ,पर प्रज्ञा इन दोनों गाँवो की दुश्मनी का कोई सम्बन्ध है क्या इस मंदिर से

प्रज्ञा- मुझे नहीं मालूम , और हमें इस बारे में बाते नहीं करनी चाहिए, हमारे पास और विषय है न, हैं न कबीर.

मैंने हाँ में सर हिला दिया.

प्रज्ञा से ये मेरी दूसरी मुलाकात थी पर ऐसा लगता था की जैसे वो हमेशा से मेरे साथ है , अहंकार बेशक उसके खून में था पर फिर भी कुछ तो मासूमियत थी उसमे,

“क्या सोचने लगे ” उसने पूछा

मैं- तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था

वो- पर क्या

मैं- अपनी सी लगती हो तुम

वो- हम्म, सच कहू तो मैंने भी ऐसा ही महसूस किया कबीर

तभी उसने घडी देखि और बोली- अभी मुझे जाना होगा कबीर, मैं फिर मिलूंगी

मैं- कब

वो- शायद कल

मैं- ठीक है

हमने अपने अपने रस्ते बदले और दो दिशाए हमें जुदा करने लग गयी. मेरे दिमाग में बहुत सवाल थे , जिनके जवाब अब तलाश करने ही थे, मेरे दादा मेरे नाम करते है एक दिया. और तभी मेरे दिमाग की घंटी बजी , उस दिए का कोई न कोई सम्बन्ध रतनगढ़ से था , तो क्या मेरे दादा का कोई रोल था उस खंडित वचन में, पर दादा का जमाना ज्यादा पुराना नहीं था , फिर उनके साथ के लोग क्यों नहीं जानते थे इस कहानी का सार.

मेरे सवालो का जवाब वो लड़की दे सकती थी , पर वो मिले कहाँ , पुजारी का घर नहीं जानता था मैं , पर क्या वो मंदिर में होगी , शायद हाँ वही होगी, मैं उलटे पाँव मुड गया. बिना कुछ सोचे . पर भाग देखो मेरे और मंदिर के बीच का रास्ता ऐसा लम्बा हो गया की पहुँच नहीं पाया.

पुलिया के किनारे मैंने जीप देखि, ये मेरे पिता की जीप थी , दो गाड़िया और थी, पिताजी खड़े थे और कुछ लोग गड्ढा खोद रहे थे , मैं छुप के देखने लगा, उन दूसरी गाडियों में तीन चार बोरी थी , उन्होंने गड्डे में डाली और आपस में कुछ खुसुर पुसुर करने लगे.

मैं जानता था की अपने काले कर्मो को एक बार फिर ठिकाने लगा दिया उन्होंने. ये जंगल ऐसे न जाने कितने राज़ दबाये बैठा था , यहाँ जानवर कम खाते थे लोगो को, इन्सान ज्यादा खाते थे, मुझे बहुत नफरत थी की मैं एक ऐसे घर में पैदा हुआ.

तीन साल पहले मैंने घर छोड़ा था , और इन तीन सालो को कैसे जिया था ये बस मैं जानता था, तन्हाई, अकेलेपन को कैसे महसूस किया था मैंने , बस मैं जानता था . सब कुछ जैसे शून्य हो गया था मेरे लिए. सांझ ढलने लगी थी , मैंने वापिस आके चारपाई बाहर निकाली और लेट गया. अगले दिन का इंतज़ार जैसे लम्बा हो गया था .

अगले एक हफ्ते तक मैं लगातार मंदिर गया, पुजारी ने जैसे मेरे होने को ना होना समझ लिया था, मैं मंदिर घंटो बैठे रहता , जंगल में तलाश करता उसे, पर वो न मिली, जैसे सब भूल गया था मैं , जिन्दगी जैसे इंतज़ार हो गयी थी , मैं उसे पुकारना चाहता था पर उसका नाम भी तो नहीं जानता था .

दुनिया कहती थी की यहाँ सबकी दुआ कबूल होती थी और एक मैं था की मुझे मिल रहा था इंतज़ार. न जाने वो कौन सी रात थी , मैं वही मंदिर में पड़ा था , की मेरी अधूरी नींद जैसे गायब हो गयी, उस पायल की आवाज को मैंने उनींदी अवस्था में भी पहचान लिया. बेहद थके होने के बाद भी मैं जैसे दौड़ पड़ा .

और फिर मैंने उसे देखा पानी की टंकी के पास से वो मेरी तरफ आ रही थी , मेरी नजरे उस से मिली और मैं जैसे दौड़ पड़ा उसकी तरफ और तभी मेरा पाँव गीले फर्श पर फिसला और मैं एक शिला से जा टकराया. दो पल में ही सब जसी घूम सा गया.आसमान के सारे तारे जैसे आँखों में उतर आये थे . बड़ी मुश्किल से खुद को सँभालने की कोशिश हुई मुझसे

“ठीक हैं , उठ जरा ” उसने मुझे सहारा देते हुए कहा

वो मुझे अन्दर ले आई और एक दिवार के साहारे बैठा दिया.

“कहाँ थी तू ” मैं बोला

वो- यही थी ,

मैं- कहाँ थी तू

वो - काम था मुझे

मैं- कितने दिनों से तेरी राह देख रहा हूँ और तू है की ..................

वो- चुप रह जरा, ले थोडा पानी पि शांत हो जा.

पानी पीकर थोडा चैन आया .

वो- मैंने तुझे कहा था की यहाँ मत आना,

मैं- किसी और ठिकाने का पता भी तो नहीं बताया तूने.

वो- पागल है तू पूरा. और ये क्या हाल बनाया हुआ है कोई तुझे देखेगा तो क्या कहेगा

मैं- फर्क नहीं पड़ता, मुझे मेरे सवाल का जवाब दे.

वो- शांत तो हो जा, और चिल्ला मत बाबा न आ जाये इधर.

वो मेरे पास आयी और मेरे चेहरे को अपने हाथो में लिया. बोली- देख मेरी तरफ, अब आ गयी हु न , अब मेरी सुन तू सुबह सुबह ही यहाँ से अपने घर जाना, मैं वादा करती हूँ कल दोपहर को तुमसे मिलूंगी. पर तू भी मुझे कह की तू ऐसे नहीं भटकेगा. कल जब हम मिलेंगे हम खूब बात करेंगे. अभी मैं रुक नहीं सकती , जाना होगा ...
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12-07-2020, 12:11 PM,
#18
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#12

“जा फिर, ” मैंने कहा

उसने मेरी आँखों में देखा , उसकी यही तो खास बात थी उसे शब्दों की जरुरत नहीं पड़ती थी, और उस कमजोर लम्हे में मैं कोई नहीं था उसे रोकने वाला. मेरा दिल चाहता था की उसे इस तरह बाँहों में भर लू, पर जो हो नहीं सकता ,

आखिर ये क्या बेचैनी थी क्यों मैं बस उसे ही देखना चाहता था . क्यों दुनिया लगने लगा था उसका चेहरा, ऐसा नहीं था की वो कोई हूर थी , पर जैसी भी थी अपनी लगी थी, खैर, अभी के लिए तो इस पराई धरती ने मुझे ठुकरा दिया था , उसके जाने के बाद भी मैं राह को देखता रहा .

पहली दफा ऐसे लगा जैसे कदम बहुत भारी से हो गए थे .

खैर, मुझे वापिस तो आना ही था. भूख से बहाली थी पर हालत ऐसी थी की जैसे किसी ने अन्दर से कुछ तोड़ सा लिया हो .नहाने के बाद मैं गाँव की तरफ निकल गया . स्कूल के रस्ते में मुझे सविता मैडम मिल गयी.

मैडम- कबीर, कैसे हो.

मैं- जी ठीक हूँ आप कैसी है

मैडम- देख कर बताओ कैसी लग रही हूँ, वैसे आज इस तरफ कैसे.

मैं- बस गाँव की याद आई, थोड़ी भूख सी लगी थी तो सोचा हलवाई की दूकान होता चलू.

मैडम- चलो मेरे साथ आओ

मैं- किधर.

मैडम- मेरे घर.

मैं-किसलिए

मैडम- खाना खाने और किसलिए

मैं- फिर कभी, आप क्यों परेशां होती है

मैडम- मैंने कहा न आओ मेरे साथ . स्कूल थोड़ी देर बाद चली जाउंगी

मैं मैडम के साथ उनके घर आया, मैडम नाश्ता ले आई.

मैडम- मैंने कहा था न इसे अपना ही घर समझो, तुम कभी भी आ सकते हो यहाँ खाने .मुझे अच्छा लगेगा.

घर का बना कुछ भी उसकी होड़ कभी नहीं हो सकती थी, मैं कभी कच्चा पक्का खुद बनाता था कभी बाहर खाता था, इस स्वाद के लिए तड़पता ही तो था मैं . मैडम के चेहरे पर म्मैने ख़ुशी की एक झलक देखि मैंने

मैडम- तुम्हारी माँ, मिली थी कुछ रोज पहले, तुम्हारे भाई की शादी होने वाली है कुछ दिनों में, सारे गाँव का न्योता है जलसे का.

मैं- बड़े लोगो के चोंचले. बस मौका चाहिए झूठी शान दिखाने का .

मैडम- तुम्हारे लिए चिंतित है ठकुराईन , बहुत याद करती है वो .

मैं- फिर भी एक बार भी नहीं आई.

मैडम- कबीर, जिन्दगी कभी कभी हमें बहुत कठिन समय दिखाती है पर परिवार ही होता है जो हमें उस कठिन समय को सहने की शक्ति देता है

मैं- आपको मानता हु अपना परिवार. इसीलिए आपको ना नहीं कहता पर मेरी भी कुछ मजबुरिया है

मैडम ने फिर कुछ नहीं कहा , उसके बाद मैं बस भटकता रहा इधर उधर, गाँव के कुछ लोग मिले, दुआ सलाम हुई , मालूम हुआ की भाई के ब्याह की खूब जोर शोर से तैयारिया कर रहे थे ठाकुर साहिब , एक दिल तो किया की चक्कर लगा ही लूँ घर के आजू बाजु पर इन्सान का अहंकार, वापिस आया खेत पर , कपडे बदले और टूटे चबूतरे वाला रास्ता पकड लिया .

इंतज़ार भी एक बहुत अजीब वाकया होता है , वक्त जैसे थम जाता है , उसने कहा थ वो आएगी , पर कब , घंटा बीता, या दो घंटे बीते मुझे करार न आये , कभी इधर देखू कभी उधर पर उसकी झलक न मिले. गुस्सा सा आने लगा पर कहू किस से इस खामोश जंगल में उस वक्त कोई भी तो नहीं था सुनने वाला. दोपहर सांझ की तरफ बढ़ने लगी थी और सांझ भी रात में बदल गयी.

“नहीं आना था तो सीधा ही कह देती, शायद मैं ही था जो उम्मीद लगा बैठा उस से ” मैंने अपने आप को गुस्से से कहा अब मेरा रुकने का मन नहीं था और मैं क्यों करू उसका इंतज़ार , गलती तो मेरी ही थी न एक दो मुलाकातों को हद से जायदा आगे समझ लिया था मैंने

वो तमाम रात अँधेरे में कटी , और मैंने फैसला कर लिया की भूल हुई सो हुई अब रतनगढ़ की तरफ मुह नहीं करूँगा. उधेड़बुन और निराशा ने जैसे मेरे अस्तित्व को हिला कर रख दिया था . न जाने मुझे क्यों ये रात भी उसी तरह से भारी लग रही थी जैसी कुछ साल पहले एक रात आई थी . बस उस रात मैं मजबूर था आज रात बेबस , मैं सोचता था क काश वो रात आई ही नहीं होती .

खैर, समय था बीतने लगा. किसी अधूरे ख्वाब के जैसे भुला दिया गया . करीब पंद्रह- बीस दिन बीत गए थे . मैं अपनी जमीं पर कुछ गड्ढे खोद रहा था की मैंने एक कार को मेरी तरफ आते देखा .
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12-07-2020, 12:11 PM,
#19
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
#१३

ये कार प्रज्ञा की थी . जल्दी गाड़ी मेरे पास आ गयी ,मैंने कुदाली साइड में रखी और शर्ट पहनते हुए उस तरफ गया. वो तब तक उतर चुकी थी

प्रज्ञा- कबीर, बड़ी मुश्किल से ढूंढा तुम्हारा ठिकाना , और तुम इतने दिन से कहाँ गायब थे .

मैं- आओ, बताता हूँ

बिजली नहीं आ रही थी तो ,मैं अन्दर से दो कुर्सिया ले आया और हम पेड़ के निचे बैठ गए.

मैं- कुछ कामो में उलझा था

वो- कम से कम मुझे तो बता सकते थे न .

मैं- बताना चाहता था पर तुम भी मंदिर की तरफ नहीं आई , फिर मैं नहीं जा पाया.

वो- बहुत दिनों से याद कर रही थी तुम्हे आज फिर मैं आ ही गयी.

मैं- अच्छा किया. चाय पियोगी

वो- नहीं , कोई जरुरत नहीं . तुम बस बैठो मेरे पास

मैं- पहले से और खूबसूरत लग रही हो.

वो- क्या तुम भी ऐसे झूठ बोलने की जरुँत नहीं तुम्हे.

मैं- नहीं सच में ,

वो- शायद शराब छोड़ने का असर है

मैं- अच्छी बात है जो तुमने छोड़ दी.

वो-तुमने कहा था तो बस छोड़ दी. , और बताओ क्या चल रहा है

मैं- कुछ खास नहीं, बस छोटे मोटे काम ही

वो- मैंने कहा न, तुम हमारे लिए काम कर सकते हो , मैं तुम्हारे रहने की व्यवस्था भी अपने उधर ही करवा दूंगी.

मैं- नहीं, प्रज्ञा ,मेरी अपनी कुछ मजबुरिया है .

वो- चले जाने को , एक ख़ुशी की बात बताती हूँ हमने शहर में एक होटल ख़रीदा है , जिसकी ख़ुशी में एक पार्टी है तुम आओगे न , देखो मना मत करना .

मैं- पर वहां और लोग भी तो होंगे, ऐसे में मैं कैसे, और किसी ने पूछा तो क्या कहोगी,

वो- तुम ये मत सोचो तुम मेहमान होंगे हमारे. मुझे अच्छा लगेगा

मैं- प्रज्ञा, तुम बड़े लोग मैं एक मामूली, ये तो तुम्हारा बड़प्पन है जो तुमने मुझे इस काबिल समझा है पर ये दुनिया , .................. कही मेरे कारण तुम्हे परेशानी ना हो .

प्रज्ञा- कैसी बाते करते हो तुम कबीर, हम दोस्त हैं न , और अपनी दोस्त की ख़ुशी में शरीक होना तो अच्छी बात होती है न .

मैं- ठीक है , पर आना कब है

वो- परसों

प्रज्ञा के आने से बहुत अच्छा लगा था , कुछ ही मुलाकातों में अपनों से भी अपनी लगने लगी थी , तमाम बातो को दरकिनार करते हुए जिस तरह से हमारा ये दोस्ती का रिश्ता बन गया था ,सुख था इसमें . दो ढाई घंटे वो मेरे साथ रही फिर लौट गयी.

पिछले कुछ समय में जीवन में परिवर्तन सा आ गया था, मैं ताई से दुबारा सम्भोग करने की उम्मीद कर रहा था , पर शायद विवाह की तैयारियों में लगी थी, कई दिन बल्कि चुदाई वाले दिन के बाद सही वो इस तरफ नहीं आई थी. पीठ का \जख्म भर गया था पर दिल घायल था .

शाम को मैं गाँव में गया था कुछ काम से और चौपाल पर मेरी मुलाकात मेरे पिता से हुई. कायदे से हम दोनों को एक दुसरे को नजरअंदाज कर देना चाहिए था पर उस दिन ऐसा हुआ नहीं .मुझे देखते ही उनके कदम पाने आप मेरी तरफ बढ़ गए.

“कर्ण की शादी है, तुम्हे मालूम तो होगा ही ” पिताजी ने कहा

मैं- सुना मैंने

पिताजी- सारे गाँव का न्योता है आ जाना तुम भी

मैं- छोटे लोग अमीरों की दावतो का हिस्सा नहीं होते

पिताजी- बड़े लोग अक्सर ऐसे आयोजनों पर गरीबो को बक्शीश देते है , रूपये पैसे उपहार देते है तुम्हे भी मिलेगा.

मैं- ये हाथ देखो मेरे, मजदूरी के लोहे में तप चुके है , पूरा दिन पसीना बहाते है तो शाम को जो रोटी मिलती है न , कोई राजा महाराजा भी उस स्वाद को नहीं दे सकता बक्शीश में ,

पिताजी- चलो मजदूरी के बहाने ही आ जाना, वैसे भी आजकल बड़ी मुफलिसी में दिन गुजर रहे है तुम्हारे.

मैं- गरीबी ही सही, किसी का हक़ तो नहीं मारा , किसी के घर में अँधेरा करके अपनी खुशिया रोशन नहीं की

पिताजी- ये तुम कह रहे हो. मेरे घर के एक हिस्से में तुम्हारी वजह से अँधेरा है ,हर पल मैं एक कमी महसूस करता हु,

मैं- पर मैं ऐसा नहीं समझता, मैंने जो किया सही किया और मुझे एक पल भी शर्मिंदगी नहीं है , हाँ दुःख है , बहुत दुःख है , पर फिर भी सकूं है की जिन्दगी में एक अच्छा काम किया

पिताजी की आँखों में मैंने अपने लिए अपार नफरत महसूस की , आस पास के लोगो की वजह से उन्होंने और फिर कुछ नहीं कहा, वापिस मुड गए वो . मैं सविता मैडम के घर की तरफ बढ़ गया .पर वहां ताला लगा था , मालूम हुआ शहर गयी है .

अगला दिन भी बस यूँ ही बीत गया , पर उस से अगला दिन खास था , मुझे शहर जाना था , प्रज्ञा ने होटल का पता दे दिया था. बेशक मेरा मन नहीं था पर दोस्ती थी, निभानी थी, ताई ने पैसो की गड्डी दी थी , उनमे से कुछ नोट खर्च करके मैंने अपने लिए नए कपडे खरीद लिए थे, तैयार होकर एक नयी शाम के लिए होटल पहुच गया .

एक दम शानदार होटल था, पांच मंजिल का, बनाने वाले ने पूरा मन लगाकर ऐसी शानदार इमारत बनाई होगी. सामने ही दोनों तरफ अप्सराओ की संगमरमर वाली मुर्तिया थी , एक बीचोबीच एक शानदार पानी का फव्वारा था और जब मैं अन्दर गया तो मैं हैरान रह गया. मैंने कल्पना की की, पुराने ज़माने में राजा महाराजो का क्या रुतबा रहा होगा.

न जाने कितने मेहमान थे वहा पर, कोई गिनती नहीं , एक कोने पर कुछ गायक फ़िल्मी गाने गा रहे थे, कितने ही बैरे घूम रहे थे खाने पीने का सामान लिए.

मैं जानता था की प्रज्ञा अमीर है पर इतनी अमीर ये मुझे आज मालूम हुआ . मेरी नजरे उस चेहरे को तलाश कर रही थी जिसके न्योते पर मैं यहाँ आया था . मैं वही एक कोने में बैठ गया . और जूस पीते हुए तमाशे को देखने लगा. करीब आधे घंटे बाद मैंने उसे देखा . और देखता ही रह गया.

खूबसूरत तो वो थी , पर कातिलाना खूबसूरती क्या होती है मैंने उस खास लम्हे में जाना था .
Reply

12-07-2020, 12:11 PM,
#20
RE: Hindi Antarvasna - प्रीत की ख्वाहिश
14

अगर मैं कहूँ की महफ़िल की हर नजर जैसे बस एक चेहरे पर थी तो गलत नहीं होगा. काली साड़ी में लिपटा गुलाब जिसे किसी गुलदस्ते किसी बाग़ की जरुरत नहीं थी, उसके साथ जो आदमी था शायद उसका पति रहा होगा. ऊँचा लम्बा कद, रौबीला चेहरा और दोनों की जोड़ी बहुत शानदार थी.

वो जोड़ा बड़ी शालीनता से सब मेहमानों की बधाई स्वीकार कर रहा था .उस ईमारत में जैसे तमाम जहाँ की खुशिया उतर आई थी, मैं बड़ी शिद्दत से चाहता था की प्रज्ञा मेरी तरफ देखे पर वो व्यस्त थी, घिरी थी मेहमानों से. बेशक यहाँ मैं भी था पर उसका अपने लोगो के साथ होना मुझसे ज्यादा जरुरी था.

जैसे सारा सहर ही मेहमान था , पर मुझे प्रज्ञा के अलावा और कोई नहीं जानता था . इस बीच कुछ घंटे ऐसे ही गुजर गए. दिल बहलाने को मैं होटल में घुमने लगा. हर मंजिल पर अलग सजावट थी , हल्का फुल्का खाना भी खाया , बेशक चारो तरफ लोग थे पर फिर भी दिल अकेला था, पिताजी के साथ हुई छोटी सी बहस का इस वक्त याद आना जी खट्टा कर गया .जलते दिल को और जलाने के लिए मैंने भी हाथ में जाम उठा लिया.

एक दो तीन चार, ........................... कलेजे को नहीं मै अपनी रूह को जैसे जलाना चाहता था . पता नहीं ये चौथी थी या पांचवी मंजिल थी . इस खुली बालकनी में ठंडी हवा जलते दिल को जैसे सकून सा दे रही थी ,

“यु अकेले अकेले जाम लेना हम जैसे साथियों पर गुनाह है कबीर ” जैसे ही मेरे कानो में ये आवाज पड़ी मैंने तुरंत घूम कर देखा, प्रज्ञा मेरे पीछे खड़ी थी .

“एक जाम मेरे हाथ में है एक बोतल मेरे सामने है ” मेरे मुह से अपने आप निकल गया .

प्रज्ञा- तो जनाब शायरी भी करते है .

मैं- बस अभी ये ख्याल आया.

प्रज्ञा- माफ़ करना मैं थोडा देर से मिली तुमसे, तुम तो जानते ही हो इतने मेहमानों के बीच थोडा समय लग ही जाता है

मैं- तुम इस लम्हे में साथ हो , और क्या चाहिए.

प्रज्ञा- लाओ एक पेग दो मुझे.

मैं- पर तुमने तो नशा छोड़ दिया न

प्रज्ञा- दोस्त के साथ ऐसे लम्हे बहुत कम मिलेंगे जिन्दगी में जब तुम होंगे मैं होउंगी और ये हसीं रात होगी, कल हम रहे न रहे ये याद तो होगी जो मेरे होंठो पर मुस्कान लाएगी.

मैंने इक जाम उसकी तरफ बढाया , उसने एक ही सांस में खींच दिया.

“हम्म, कड़क है ” उसने कहा

मैं- बस ठीक है .

प्रज्ञा ने एक पेग और लिया बोली- जानते हो दोस्त,हमारे रिश्ते में क्या खास है ,

मैं- बताओ.

वो- मैं तुम्हारे अन्दर खुद को देखती हूँ, तुम तमाम वो काम कर सकते हो जो मैं नहीं,इस खास होने के अहसास ने मुझे अपने आप से कब का दूर कर दिया .

मैं- पर तुम खास हो .

वो- तुम्हे भी ऐसा लगता है

मैं- मेरी दोस्त हो तो खास हो न

प्रज्ञा- बंद करो ये झूठी तारीफे

मैं मुस्कुरा दिया

प्रज्ञा- मैं हमेशा से ही तुम्हारे जैसी स्वछंद रहना चाहती थी , बागो में तितली जैसे, पर इस ख़ास होने ने कभी आम नहीं होने दिया .

मैं- मेरे साथ तो आम ही हो तुम

प्रज्ञा- इसीलिए तो तुम खास हो मेरे लिए. खैर खाना खाया तुमने

मैं- खा लूँगा बाद में

प्रज्ञा- आओ मेरे साथ , आज का खाना हम साथ खायेंगे

मैं- ये बेहद खास रात है , तुम्हे अपने परिवार के साथ होना चाहिए इन खास लम्हों में .

प्रज्ञा- काश ऐसा होता , राणाजी व्यस्त है अपने दोस्तों के साथ, बच्चे निकल गये घर के लिए . उनको इस तरह के तमाशे पसंद नहीं . तुम आओ मेरे साथ . और तुम भी मेरा परिवार ही हो, दुबारा ऐसा कहा तो नाराज हो जाउंगी समझे तुम .

मैं- हाँ बाबा समझा.

प्रज्ञा- तो फिर आओ मेरे साथ.

लगभग मुझे खींचते हुए वो एक कमरे में ले आई, कमरा क्या था जैसे एक छोटा महल हो . वो मेरे पास ही सोफे पर बैठ गयी. साडी का पल्लू गिरा हुआ. पर उसे कहाँ परवाह थी .

मैं- होटल बहुत ही शानदार है

वो- छोड़ो इन बातो को , मुझसे सिर्फ तुम्हारी और मेरी बाते करो

मैं- वही तो कर रहे है .

वो- बताओ क्या खाओगे.

मैं- जो तुम अपने हाथो से खिलाओगी.

वो- हाँ मेरे दोस्त, पर फरमाइश तो मेहमान की होगी न

उसने खाना मंगवाया .

मेरी दोस्त मेरे पहलु में बैठी अपने हाथो से मुझे खाना खिला रही थी , खाने के कौर के साथ साथ मेरे होंठ उसकी उंगलियों को भी छू रहे थे, पर उसे कोई परवाह नहीं थी, तब भी नहीं जब मैंने उसकी ऊँगली को चूम लिया. बेशक ये छोटे छोटे अहसास थे पर ये अहसास मुझे और प्रज्ञा को एक अलग डोर में उलझा लाये थे. एक ऐसी डोर जो हमारा आने वाला कल लिखने वाली थी .

ऐसा स्नेह मुझसे किसी ने नहीं किया था , मेरी आँखों में आंसू आ गए , मैं आभारी था उसका.

“क्या हुआ ” उसने पूछा

मैं- कुछ नहीं , बस ऐसे ही .

वो- दिल की बात दोस्त को बतानी चाहिए न

मैं- इतना स्नेह किसी ने नहीं दिया मुझे

प्रज्ञा- अब ये सब बोलकर मुझे पराया मत करो कबीर.

प्रज्ञा ने एक बोतल और खोल ली उसने गिलास में शराब डाली और एक घूँट लेकर गिलास मेरी तरफ बढाया

“दोस्ती के नाम ” मैंने गिलास अपने होंठो से लगा लिया, सांसो में जैसे उसकी सांसो की खुशबु घुल गयी.

खाने के बाद हम बैठे थे.

“आज हम रुकेंगे सुबह मैं तुम्हे घर छोड़ दूंगी. ” उसने कहा

मैं- ठीक है .

तमाम तरीके के हंसी मजाक करते हुए, हम शराब पीते रहे , उसने अपना सर मेरी गोद में रखा और सोफे पर लेट गयी. मेरे आगोश में आ गयी, मेरी निगाहें उसकी छातियो पर थी , उसके खूबसूरत चेहरे पर थी, घुटनों तक आई साड़ी पर थी पर मेरे मन में रत्ती भर भी वासना नहीं थी.

शायद यही भरोसा उसे मेरे इतने करीब ले आया था. न जाने कब मेरी आँख भी लग आई.
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