Kamukta kahani अनौखा जाल
09-12-2020, 12:41 PM,
#11
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ११)

मैं अपने कमरे में बैठा हाथ में फ़ोटो लिए चुपचाप उस फ़ोटो को देखे जा रहा था और नेत्रों से अश्रुधरा अविरल बहे जा रहे थे | जो कभी भूले से भी कल्पना नहीं की थी मैंने आज वो किसी बुरे सपने के हकीकत में बदल जाने के जैसा मेरे आँखों के सामने फ़ोटो के रूप में मेरे हाथों में था | मैं असहाय सा चुपचाप खुद पे आँसू बहाने के अलावा कुछ भी करने की स्थिति में नहीं था |

*फ्लैशबैक*

उस रात चाची को वैसी स्थिति में देख कर मैं आतंक से भर गया था पर चूँकि चाची से मेरा बहुत लगाव भी था इसलिए खून भी खोल चुका था मेरा | मन ही मन ठान लिया था कि, ‘अब बस, बहुत हो गया ... अब इन लोगों को सबक सिखाना ही होगा..|’ गुस्से से दांत भींचते हुए मैं आहिस्ते से दीवार से उतरा और गली पार कर घर घुसा | करीब दस मिनट तक डोर बेल बजने के बाद चाची ने दरवाज़ा खोला था | भयानक हश्र था उनका | बाल बिखरे हुए... होंठों के साइड में हल्की लालिमा... शायद खून हो... कंधे पर के ब्लाउज बॉर्डर थोड़ा फटा हुआ... कुछेक नाखूनों के निशान...गले, कंधे और सीने के ऊपरी हिस्से पर | किसी तरह साड़ी लपेटी हुई थी.... आँख नहीं मिला रही थी... पर देखी मुझे तीरछि नज़रों से | मैं बिना उनकी नज़रों में आये उनके शरीर का हाल सामने से देख कर सीधे ऊपर अपने कमरे में चला गया | दुःख और प्रचंड गुस्से से भरा था मैं... मेरी रानी जैसी चाची को कोई ऐसे कर रहा है और मैं चुप हूँ?? मुझे चाची बहुत अच्छी लगती थी और बहुत पसंद भी थी | उनकी जैसी शारीरिक गठन और रूप वाली बहुत कम ही पाए जाते हैं | जब भी उनकी क्लीवेज नज़र आ जाए तो दोनों चूचियों के बीच मुँह घुसा देने का मन करे और अगर गांड पर नज़र जाए तो दो-तीन अच्छे से थप्पड़ मार कर मसल देने का मन करे... कमर के आस पास भी उपयुक्त मात्रा में वसा होने के कारण उनकी कमर भी अद्भुत सेक्सी लगती थी | जी करता था की घंटों उनके नाभि को चूमता हुआ कमर पे सिर डाले सोया रहूँ | पीठ की बात करना तो दूर, सोचने भर से लंड बाबाजी अपना सर उठाने लगते हैं ... साफ़..बेदाग़... मांसल...गदराया पीठ को तो जैसे घंटों चूमने, चाटने और दबोचने का मन होता था....

अगले पूरे दिन ना तो चाची को कोई फ़ोन आया और ना ही किसी भी माध्यम से कोई सन्देश.. चाची का भी उनकी तरफ़ से यह पुरज़ोर कोशिश रही की मुझे या उनके पति को किसी भी तरह का कोई संदेह न हो.... मैं किसी भी तरह बहाने कर कर चाची के आस पास ही बना रहता.. पर ऐसे की चाची को भी मुझ पर संदेह ना हो | सिर्फ एक दिन ही नहीं.. बल्कि तीन-चार दिन बीत गए ऐसे ही.. इतने दिनों में चाची एक बार के लिए भी घर से बाहर कदम नहीं रखी | थोड़ी सहमी सहमी सी ज़रूर होती पर हमेशा एक मोहक सी मुस्कान लिए बातें की | पूरी एक घरेलू औरत की तरह नज़र आई .. पति परायण एवं कर्तव्य निष्ठ... पर मेरा जासूस दिमाग कह रहा था की यह सब आने वाले किसी बड़ी सी चौंकाने वाले घटना के पहले की शांति है.... तैयारी है....|

पर मैं किसी घटना या फिर यूँ कहे की दुर्घटना की प्रतीक्षा किये बैठे नहीं रह सकता.. कुछ तो करना था .. इसलिए समय मिलते ही स्कूटर लिए उस मोहल्ले की तरफ़ निकल जाता था जहां चाची को पहली बार देखा था... उसी टेलर के दुकान में... | उसी चाय दुकान में कई घंटे निकाल देता था चाय सिगरेट लेते लेते | चाय वाले ने कई बार पूछा भी कि, किसी से कोई काम है क्या.. पहले कभी यहाँ आते नहीं देखा ...वगेरह वगेरह.. | किसी को कोई शक न हो इसलिए कुछेक बार अपने किसी दोस्त को साथ लिए चलता .. शायद चाय वाले ने भी मुझे उस टेलर दुकान की तरफ़ कई बार घूरते देखा था .. पर कहा कुछ नहीं |

मुझे भी कुछ खास चहल पहल नहीं दिख रही थी कुछ दिनों से .. जेंट्स और लेडीज आती.. कपड़ों के नाप देने... कपड़े देने..लेने.. इसके अलावा और कुछ होता नहीं दिखा | कुछेक कस्टमर से पूछा भी था की टेलर कैसा है... बदले में अलग अलग जवाब सुनने को मिले थें... कोई कहता ‘अच्छा है’.. तो कोई कहता ‘ठीक ही है’ ... तो कोई कहता .. ‘अजी, काम चल जाता है |’

काम (जासूसी) तो मेरा भी अच्छा चल रहा था पर कहते हैं की जासूसी में ज़्यादा उछल कूद बाद में बहुत भारी पड़ जाता है | और यही हुआ भी |

एक दिन अचानक चाची को एक पार्टी में जाना था | ‘वीमेन’स ग्रुप’ ने ऑर्गनाइज़ किया था | शहर के कुछ बड़े लोग भी आने वाले थे | शाम से ही चाची तैयार होने लगी थी ... मैं और चाचा भी जाने वाले थे | चाची ने कहा था की हमें लेने ग्रुप की तरफ़ से ही गाड़ी भेजी जाएगी.. और ठीक सात बजे गाड़ी आई भी | मर्सीडिज़ थी | चाचा की तो आँखें ही चौड़ी हो गयी थी और चाची को यकीं ही नहीं हो रहा था | आँखें तो मेरी भी चौड़ी हो गई थी पर गाड़ी नहीं ... चाची को देख कर ... क्या लग रही थी ! जब कमरे से सज कर निकली तभी से मेरी आँखें सिर्फ चाची पर ही थी... इतना ताड़े जा रहा था की चाची को पता तो लगा ही ... साथ ही शर्मा के लाल हो गई थी |

पारदर्शी साड़ी, स्लीवेलेस – बैकलेस डीप नेक ब्लाउज... जिसमे से आधे से ज़्यादा चूचियां बाहर की तरफ़ निकली आ रही थी.. और उसपे भी वह अत्यंत चुंबकीय आकर्षण जैसा, सुन्दर, गोरा, छह इंच लम्बा क्लीवेज के दर्शन होते रहना... गोरी बाहों में.. हाथों में चूड़ियों की छनछन खन खन ...आहा... शायद हम जैसो के लिए यही स्वर्ग है | चाचा के लिए एक तो यह सब कॉमन हो चूका था और दूसरा वो माइंड नहीं करते थे |

पार्टी में जबरदस्त फन हुआ... डांस हुआ.. हंसी मजाक हुआ... खाना पीना चला.. चाची के डांस ने तो सब को बरबस उनका दीवाना बना दिया था.. उनके हरेक थिरकन पर छलक कर बाहर आते उभार की गोलाईयां सबको होंठों पर जीभ चलाने के लिए मजबूर कर देते थे |

ड्रिंक का दौर चल रहा था ... पार्टी अपने पूरे शवाब पर थी.. चाचा भी कुछ लोगों के साथ मिलकर एक कोने में ड्रिंक करने में मशरूफ हो गए थे | चाची अपनी सहेलियों संग मजे कर रही थी ... मैं भी ड्रिंक कर रहा था पर आँखें मेरी चाची पर ही थी.... ऐसी अप्सरा को कौन भला अपने आँखों के आगे से ओझल होने देता है ?! अभी मैं उनके रूप लावण्य को आँखों से चख ही रहा था की तभी देखा की दो लोग चाची की तरफ़ बढे.. उनको देखते ही चाची की चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगीं | रंग सफ़ेद सा पड़ गया | शायद वो उन लोगों को जानती थी और उनके यहाँ होने की कल्पना नहीं की थी | उन दोनों ने चाची को कुछ कहा और चाची उनके साथ एक तरफ़ चली गई |

पार्टी वाले जगह से निकल कर वे तीनो बाहर लॉन में गए... वहां जहां थोड़ा अँधेरा था | मैं उनके पीछे ही लगा था | वे दोनो चाची को जैसे कुछ समझा रहे थे ... चाची परेशां, चिंतित और भय मिश्रित चेहरा लिए उनके हरेक बात पर सर हिला कर हाँ में जवाब दे रही थी | थोड़ी देर बात होने के बाद उनमें से एक ने इशारा कर के चाची को सड़क के दूसरी तरफ़ खड़े के बड़ी सी गाड़ी की ओर दिखाया... फिर गाड़ी की ओर इशारा किया... गाड़ी का पीछे का शीशा नीचे हुआ... देखा एक कोई शेख़ सा आदमी बैठा आँखों पर काले चश्मे लगाए उन लोगों की ओर देख रहा है.. और स्माइल भी है उसके होंठों पर... कुटिल मुस्कान... चाची देख कर सहम गई.. फ़ौरन उन दोनों की ओर पलट कर कुछ मना किया... पर दोनों नहीं माने... थोड़ी देर कुछ और कहने के बाद एक लिफाफा पकड़ाया चाची के हाथों और वहां से चले गए.. उनके जाने के बाद चाची ने लिफ़ाफ़ा बिना देखे ही अपने हैण्डबैग नुमा पर्स में डाला और फिर पार्टी वाले जगह की ओर चली दी... जाते वक़्त एक बार उन्होंने अपने आँखों पर उँगलियाँ चलाई थीं |

मैं भी पलट कर जैसे ही जाने लगा, ऐसा लगा मानो कोई मेरे पीछे खड़े मुझे देख रहा है और फ़ौरन वहां से हट गया ... मैं दौड़ कर उस जगह पहुँचा पर दूर दूर तक कोई नहीं था ... भययुक्त आशंकाओं से घिरे मन को सँभालते हुए मैं वापस पार्टी वाले जगह पहुँच गया...|

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इस घटना के करीब सप्ताह भर बाद...

सुबह का टाइम... चाचा ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे हैं... चाची किचेन में है... मैं पेपर पढ़ रहा था ... तभी डोर बेल बजी... मैंने उठ कर दरवाज़ा खोला... देखा एक लड़का है.. पोस्टमैन वाले यूनिफार्म में... हमारा रोज़ का पोस्टमैन नहीं था ये... शायद ये लड़का नया ज्वाइन किया है... मुझे एक लिफ़ाफ़ा हाथ में दिया और सलाम करते हुए चला गया... आश्चर्य.... साइन वगेरह कुछ लिए बिना ही चला गया!... लिफ़ाफे पर लिखा देखा... ‘सिर्फ तुम्हारे लिए’....

अपने रूम आ कर मैंने लिफ़ाफ़ा खोला... एक कागज़ का टुकड़ा मिला... मुड़ा हुआ ... खोल कर पढने लगा..

“ये ख़ास तुम्हारे लिए है... बहुत उतावले लगते हो... बहुत सी चीज़ों को जल्द ही जान लेना चाहते हो... इतनी जल्दबाजी अच्छी बात नहीं ... उम्मीद है ..जो भेजा है उसे देख कर फड़फ़ड़ाना बंद कर दोगे ... | और अगर नहीं किये... तो अगली बार इससे भी ज़्यादा बहुत कुछ मिल सकता है तुम्हे..| आगे तुम्हारी मर्ज़ी...|’

मैं कौतुहलवश जल्दी से लिफ़ाफ़े में रखे एक और कागज़ के टुकड़े को निकाला.. मुड़ा हुआ था ये भी .. पर शायद इसमें कुछ था | कागज़ को खोला.. देखा तीन फ़ोटो रखे हैं अंदर...

एक औरत के हैं वो फ़ोटो...

१)एक में बिस्तर पर लेटी ही है... बाएं करवट लेकर.. साड़ी उसके घुटनों तक पहुँच गए हैं | पेट और कमर का काफ़ी हिस्सा दिख रहा है .... चूची का भी कुछ हिस्सा पल्लू के नीचे से दिख रहा है |

२)उसी औरत का क्लीवेज... साड़ी पल्लू बाएं कंधे के एकदम बाएँ तरफ़ है.... और फलस्वरुप, उस महिला के गोरे उन्नत स्तनयुगल पूरी मादकता के साथ दिख रहे हैं.. अपने साथ .. अपने साथी ‘क्लीवेज’ को साथ लेकर ....

३)महिला का पीछे से फ़ोटो लिया गया है... डीप बैक कट से झांकते उसकी गोरी पीठ और गदरायी हुई... चौड़ी और थोड़ी उठी हुई गांड..

**फ़्लैशबैक एंड्स**

और अपने बिस्तर पर बैठा ...जार जार आँसू बहाए जा रहा मैं... फ़ोटो को एकटक देखता हुआ... अपनी किस्मत को कोसता... खुद को गाली दे रहा था | और ऐसा करता भी क्यों ना.... आख़िर वो तीनों फ़ोटो मेरी ‘माँ’ की थी...!........|

क्रमशः
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09-12-2020, 12:41 PM,
#12
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल

भाग १२)

फ़्लैशबैक ---

मोहित – “क्या बात कर रहा है यार... तुझे इन चीज़ों की ज़रुरत क्यों है?”

मैं – “यार, है तभी तो माँग रहा हूँ ...”

“तो बता न, क्या है ऐसी ज़रुरत?”

“अभी बता नहीं सकता...”

“कमाल है... जिससे सहायता माँग रहा है भाई ; उसे ये बताना तुझे गवारा नहीं की तेरी ज़रुरत क्या है?”

“ओफ्फ़ ... यार तुझे वो सब सामान देना है या नहीं...?”

“देना चाहता हूँ मेरे भाई... वो क्या है की ऐसे ही कोई इन सामानों की माँग तो नहीं करता है ना... इसलिए थोड़ा अजीब लग रहा है.. पर यदि तू ये बता दे की तेरी एक्साक्ट्ली ज़रुरत क्या है --- मेबी आई कैन डू समथिंग मोर तो हेल्प यू --- दैट्स इट !”

“ह्म्म्म ... तो सुन.. पर ध्यान रहे की जो बात मैं अभी तुझे बताने जा रहा हूँ... ये किसी को पता न चले ... अगर किसी को पता चल गया तो मेरा जो होगा सो बाद में, पहले तेरा ही पत्ता कट जाएगा... और वो भी ऐसा की ख़ुद तुझे ही पता न चले ...”

“यार , तू तो डराने लगा ---”

“डरा नहीं रहा --- हकीकत साझा कर रहा हूँ --- अब सुन, पिछले कुछ दिनों से कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं ... अक्सर मेरे घर का एक राउंड लगा जाते हैं ... मैं जैसे ही खिड़की या अपने रूम की बालकनी के पास पहुँचता हूँ तो वह तुरंत ही वहां से रवाना हो जाते हैं ... उनके बारे में कुछ और भी पता चला है, पर कन्फर्म नहीं हूँ --- इसलिए कंफर्म होने के लिए थोड़ा रिस्क लेना चाहता हूँ ... और इसलिए तेरा मेकअप सामान चाहता हूँ ... तू तो यार, ड्रामा और थिएटर वगेरह से तो क़रीब छ: - सात सालों से जुड़ा है --- लोगों का हुलिया बदल देना तेरा बाएँ हाथ का काम है... इसलिए तेरे पास आया हूँ... प्लीज़ भाई, हेल्प मी |”

पूरी बात सुनकर मोहित थोड़ा गंभीर होकर सोचने लगा ....

दो ही मिनट बाद हाँ में सिर हिलाते हुए कहा,

“ठीक है यार... तेरा हेल्प करूँगा... अच्छा हुआ जो तूने मुझे ये सब खुल कर बताया... अब देख, मैं तेरा ऐसा हुलिया बदलूँगा कि दूसरे तो क्या... साला तू ख़ुद अपने को नहीं पहचान पायेगा... लेकिन हाँ, अपना ध्यान रखना... और मेरा भी... तेरी बातों को सुनकर लग रहा है की कोई बहुत बड़ी बात है... और इसमें मैं फंसना नहीं चाहता... तू समझ रहा है न यार मेरी बात... मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ...”

“ऑफ़ कोर्स समझता हूँ ... तू निश्चिन्त रह... तेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा --- |”

बात खत्म होते ही दोनों ने हाथ मिलाया और मुस्कराए...

शायद कामयाबी की खुशबू अभी ही मिल गयी थी दोनों को .... ख़ास कर ‘मुझे!’

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एक टैक्सी में बैठा हुआ हूँ मैं... और मेरा टैक्सी वाला अपने सामने के टैक्सी को फॉलो कर रहा है ... बराबर दूरी बना कर.. समान गति से.. खुद के पकड़े जाने का डर नहीं है.. मेकअप कर के बैठा हूँ.. एक मित्र है मेरा.. अच्छा काम करता है मेकअप का.. नकली दाढ़ी मूँछ लगा कर... हेयर स्टाइल बदल कर .. एक लम्बा..फ्री स्टाइल ट्राउजर .. पिंक कलर का शर्ट और उसपे ट्राउजर से मैच करता ग्रे कलर का ब्लेज़र डाला हुआ है मैंने..

दाएँ हाथ की तीन उँगलियों में तीन बेशकीमती (पर नकली) रत्न लगे अंगूठियाँ.. दाएँ हाथ की ही कलाई में एक चैन वाली घड़ी ...

बाएँ हाथ की अँगुलियों ; तर्जनी और मध्यमा के बीच एक सुलगता सिगार ... और साथ में पेपर.. आँखों पर काला चश्मा..

गारंटी दे कर कह सकता था की कोई माई का लाल मुझे नहीं पहचान सकता था |

करीब पैंतालीस मिनट का सफ़र तय करते हुए आगे वाली टैक्सी शहर के ही एक महँगे होटल के सामने रुकी | मैंने भी अपने टैक्सी को थोड़ी ही दूरी पर रुकवा दिया | आगे वाली टैक्सी का पीछे वाले दोनों दरवाज़े एक साथ खुले .. दाएँ तरफ़ से एक लम्बा सा आदमी निकला.. पठानी सूट में...

तो वहीं दूसरी तरफ़ से बाहर निकली थी कुछ समय पहले तक आदर्श गृहिणी का तमगा रखने वाली मेरी प्यारी चाची... आज चाची को भी पहचानना मुश्किल था .. हल्का आसमानी रंग की साड़ी और ब्लाउज के नाम पर बिकिनी ब्लाउज... जिसमें दो अत्यंत छोटे ब्लाउज कप्स थे..जिनका काम था चाची की उन्नत, परिपुष्ट चूचियों में से थोड़े हिस्से को कवर करना और बाकि के हिस्से को जबरदस्त प्रभाव के साथ ऊपर की ओर उठाये रखना | बस.... बाकि सब पतली रस्सियों की डोरी सी थी | और माँ कसम.... कमाल की पीस लग रही थी |

पीले गोल्डन जैसे चमकते हील वाले सेंडल पहने इठलाती , मटकती , आहिस्ते, शौख से गांड हिलाती वो उस लम्बे से आदमी के साथ अन्दर उस होटल में दाखिल हुई.. मैंने उस टैक्सी वाले को एक पचास का नोट थमाते हुए आँखों से कुछ इशारा किया ...

वो मुस्कुरा कर हाँ में सर हिलाया और मैं इतने में ही टैक्सी से उतर कर रोबीले अंदाज़ में उस होटल की ओर बढ़ चला... इधर मेरे टैक्सी वाले ने चाची वाले टैक्सी के साथ अपनी गाड़ी पार्क की और उधर ठीक उसी समय मैं उस आलिशान होटल के सुन्दर नक्काशी वाले और एक दो जगह से कांच लगे दरवाज़े को हल्का धक्का देते हुए अन्दर घुसा |

क्रमशः

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09-12-2020, 12:41 PM,
#13
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग १३)

अन्दर घुसते ही देखा, वो आदमी चाची के कमर में हाथ डाले एक टेबल की ओर बढ़ा जा रहा है | ये ऐसा होटल है, जिसके ऊपर वाले फ्लोर पर ठहरने वाले होटल जैसी सारी व्यवस्था है और नीचे, जहां अभी मैं हूँ... वो किसी रेस्टोरेंट और कैफेटेरिया का कॉम्बो जैसा है | यहाँ पिज़्ज़ा, बर्गर, हॉट डॉग्स, नूडल्स से लेकर हाई क्वालिटी की चाय, कॉफ़ी तक और तो और बियर और शराब तक अवेलेबल है | पूरी जगह की एक सरसरी सी नज़र दौड़ा कर मुआयना किया .... वो आदमी चाची को लेकर एक टेबल से लगी तीन कुर्सिओं में से एक पर बैठ गया और चाची को भी खिंच कर अपने से लग रखी दूसरी कुर्सी पर बैठाया | मैं तुरंत उनके ठीक बगल वाले टेबल पर जा कर बैठ गया | बगल में होते हुए भी वो टेबल थोड़ा पीछे था | वहां लोग बहुत नहीं थे पर थे भी | अभी तक मैंने पहली वाली ख़त्म कर एक और सिगार सुलगा लिया था | मेरे टेबल के लिए भी तीन कुर्सी थी जिनमें से एक पर मैं बैठा था ; बाकी दोनों खाली थे | मैं पेपर को सामने लिए पढने का ढोंग करने लगा | मेरे बैठने के कोई दो मिनट ही हुए होंगे की लाल कपड़े पहने एक वेटर आ गया और बड़ी शालीनता से आगे की ओर थोड़ा झुक कर सीधा होगया और बहुत ही शांत लहजे में पूछा, “व्हाट वुड यू लाइक तो हेव सर...?”

“वन कॉफ़ी प्लीज़....लेस शुगर ... एंड अ टोस्ट...!” मैंने भी बड़े ही रोबीले अंदाज़ में अपना ऑर्डर दिया...|

“ओके सर... एनीथिंग एल्स सर...|”

“म्मम्म... या.. गेट अन ऑमलेट आल्सो...|” थोड़ी बेफिक्री से कहा मैंने... |

वेटर एक बार फिर वैसे ही झुक कर सलाम कर के चला गया .. पेपर पढ़ता हुआ मैं बीच बीच में चाची की टेबल की तरफ़ देख लेता | काला चश्मा पहने होने के कारण उन दोनों को पता नहीं चल रहा था की मैं उन्हें देख भी रहा हूँ |

इसी दौरान मैंने देखा की वो आदमी अपने कुरते के पॉकेट से एक स्टील केस बाहर निकाल कर उसे खोला और उसमें से एक सिगार निकाल कर सुलगा लिया... और धुआं चाची के चेहरे पर छोड़ने लगा.. | चाची को परेशानी हो रही थी पर वो बिना कुछ कहे, हाथों से धुआं हटाते हुए थोड़ा खांसती, फिर अपने पल्लू का एक सिरा अपने नाक पर रख लेती | चाची की यह हालत देख कर मेरी भी हंसी छूटने को हो रही थी |

तभी मेरी नज़र उनके टेबल के नीचे गई ... और थोड़ा चौंक उठा ... वो आदमी अपना बायाँ हाथ चाची के दाएँ जाँघ पर रख कर पूरे जांघ को ऊपर से नीचे घुटनों तक और फिर घुटनों से ऊपर कटिप्रदेश तक ले जा रहा था | बड़े आराम से, पर साथ ही थोड़ा तेज़ और रफ़ली हाथ फेर रहा था चाची की जाँघ पर | आदमी को देख कर तो कतई ऐसा नहीं कहा जा सकता था की उसके हाथ नरम होंगे... वहीं इसके उल्ट चाची को तो नरम त्वचा का दूसरा नाम कहा जा सकता था... उस आदमी के खुरदुरे हाथ के अपने जांघ पर स्पर्श से चाची के शरीर में सिहरन दौड़ रही थी ... तभी तो रह रह कर वो काँप उठती थी | इतना ही नहीं, हद तो तब हुई जब उस आदमी ने धुआं छोड़ते हुए चाची की तरफ़ थोड़ा झुक कर उनके दाएँ गाल पर एक किस दे दिया | गाल पर किस होते ही चाची चौंक कर इधर उधर देखी ... किसी को खुलेआम अपने प्यार का इज़हार करने के मूड में था वो आदमी.. पर अच्छे से समझ आ रहा था की ये प्यार व्यार कुछ नहीं... सिर्फ वासना का गन्दा खेल खेलने की बेकरारी है |

अभी ये सब चल ही रहा था की तभी दो काम एक साथ हुआ...

वेटर मेरा ऑर्डर ले आया और उधर एक हैट पहना हुआ, लाइट ब्राउन कलर का ब्लेजर-ट्राउजर , वाइट शर्ट पर रेड टाई लगाया हुआ आदमी, देखने से उम्र यही कोई पचास – पचपन का होगा, आया और चाची वाले टेबल में, खाली वाले चेयर पर बैठ गया.. उसके बैठते ही चाची ने थोड़ा डर और थोड़ा आश्चर्य आँखों में लिए अपने साथ वाले आदमी की ओर देखा और तुरंत ही अपने जांघ पर गोल गोल घूम रहे उसके हाथ को झटक कर दूर किया.. पर उस आदमी ने बड़ी ही बेशर्म वाली मुस्कान लिए फिर से चाची की जांघ पर हाथ रखा और आँखों के इशारों से चुप रहने को कहा | करीब दस मिनट तक शान्ति बनी रही | फिर उस ब्लेजर वाले आदमी ने कोई कोड बोलने को बोला पठानी सूट वाले आदमी को ... पठानी सूट वाला आदमी मुस्कुरा कर चाची की ओर देखा और आँखों के इशारे से कुछ कहा.. चाची सहमी हुई इधर उधर देखते हुए अपने दाएँ तरफ़ से सीने पर से पल्लू को सरका कर नीचे की और बिकिनी ब्लाउज के कप को थोड़ा और नीचे कर दी... वो दोनों आदमी तो बस देखते ही रह रहे थे उस तरफ़...

बिकिनी ब्लाउज कप थोड़ा नीचे होते ही चाची के दाईं चूची के निप्पल के थोड़ा ऊपर एक लाल रंग का दिल बना हुआ था... (शायद लाल रिफिल वाले पेन से)... और उस दिल के ऊपर, ब्लैक या ब्लू कलर से कुछ लिखा हुआ था जो मेरे से पढ़ा नहीं गया | चाची ने अपने निप्पल को अंगूठे से छिपा रखा था .... चेहरे पर शरारत सी शर्मो ह्या की लालिमा छाई हुई थी और साथ ही बेईज्ज़ती और किसी अनहोनी की आशंका का डर भी सताया हुआ था |

कुछ देर तक लगातार देखने के बाद उस आदमी ने खुद को संभाला... और गला साफ़ करते हुए बोला,

“हह्म्म्म... कोड सही है... गुड..जल्दी मुलाकात हो गई |” हैट वाला बोला |

“तो अब काम की बात करें?” पठानी सूट वाला बोला |

हैट – “हाँ.. बिल्कुल... ये बताओ मेरे माल देने के बाद मुझे मेरा माल कब मिलेगा?”

सूट – “पहले माल का डेमो देखेंगे... फिर फैसला करेंगे...”

हैट – “ओके... आज डेमो लाया हूँ... दिखाऊँ ??”

सूट – “बिल्कुल... |”

हैट वाले ने अपने ब्लेजर के अन्दर के पॉकेट से एक छोटा काला डिब्बा निकाला और बड़ी ही सावधानी से टेबल पर रख दिया.. फिर इधर उधर देखते हुए वो बॉक्स खोलना चाहा ... इस पर सूट वाले आदमी ने हँसते हुए कहा... “हाहाहा ... मिस्टर सैम.. डरिये नहीं... ये जगह हम जैसे लोगों के लिए ही है..|” सैम के साथ साथ मैंने भी एक बार हल्का सा नज़र उठा कर अपने चारों तरफ़ देखा ... देखा की वहां मौजूद आधे से ज़्यादा लोग महँगे कपड़ो में थे... पर साले सबके शक्ल एक जैसी थी... माफ़िया जैसी...वो भी कोई ऐरा गेरा नहीं.... एकदम हाई प्रोफाइल...!..

सैम थोड़ा निश्चिन्त होते हुए बोला, “थैंक्स मैन ..” और तुरंत ही उस बॉक्स को खोल दिया... बॉक्स के ढक्कन को खोल कर अलग करते ही उसमें से कुछ चमक कर बाहर आने लगी.. मतलब.. रोशनी... वो रोशनी... वो चमक बाहर आने लगी... और इस चमक में एक अलग ही बात है... सूट वाले आदमी का मुँह खुला का खुला ही रह गया | उसने धीरे से उस बॉक्स में हाथ डाला और और कुछ उठा कर अपने आँखों के बिल्कुल सामने ले आया... अब मैंने अच्छे से देखा ... वो दरअसल छोटे छोटे डायमंड के टुकड़े थे... अच्छी खासी चमक वाले... चाची की भी आँखें चौधिया गईं थीं.. और आँखें फाड़े ऐसे देख रही थी जैसे की उन्हें विश्वास ही नही हो रहा है |

“ह्म्म्म... उम्दा है.. | सूट वाले ने कहा...|

हैट – “तो डील पक्की...??”

सूट – “ह्म्म्म.... हाँ.. |”

हैट – “तो कल कहाँ होंगी माल एक्सचेंज?”

सूट – “वो तुम्हे बता दिया जाएगा...|”

हैट – “ओके...”

उसके लिए भी शायद कॉफ़ी आया था | हैट वाले ने कॉफ़ी ख़त्म की और वहां से ‘गुड बाय’ कह कर चला गया | उसके चले जाते ही सूट वाले ने चाची के दाएँ स्तन पर हाथ रखा और तीन चार बार जल्दी जल्दी पर जोर से दाब दिया | चाची मारे दर्द के बिलबिला उठी, “आःह्हह्ह्ह्ह...ऊऊच्च्च्च...” ... | उस आदमी ने इतनी जोर से दबाया था की चाची की आँखों में आँसू आ गये थे...|

पर उस आदमी को चाची की हालत देख कर मज़ा आया था | वेटर को बुला कर बिल मंगाया और बिल वहीँ टेबल पर देने के बाद वो चाची को धीरे से कुछ कहा और हाथ पकड़ कर पीछे की तरफ़ लगभग खींचते हुए ले गया...| मैं थोड़ी देर बैठने के बाद अपना बिल मंगाया और बिल देने के साथ साथ उस वेटर को बीस रूपए का अलग से टिप भी दिया | वेटर खुश हो गया... दो बार एक्स्ट्रा झुक कर सलाम किया उसने... मैं मुस्करा कर पीछे की तरफ़ चला गया |

पीछे वाशरूम था... टाइल्स, मार्बल्स वाला... जाकर देखा की दरवाज़ा बंद है और अन्दर से ‘आःह्ह्ह....ओफ्फ्फ़... नहीssssssss.... छोड़ोssss .....’ मैंने न आव देखा न ताव... तुरंत दूसरी गेट से पीछे लपका और एकदम बाहर आकर ठीक वाशरूम के पीछे आ पहुँचा... पाइप और दीवारों में बने खांचों के सहारे किसी तरह चढ़ा और वेंटीलेटर से अन्दर देखा ....

अन्दर चाची फर्श पर गिरी/लेटी हुई थी ... और वो आदमी उन पर चढ़ा हुआ था | चाची की बिकिनी ब्लाउज फर्श पर ही एक तरफ़ पड़ी थी ... उसने उनकी एक चूची को चूस चूस कर लाल कर दिया ... फिर दूसरी चूची को मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा। वह अपना पूरा दम लगा कर उनकी चूचियों को चूसे जा रहा था... ऐसा लग रहा था मानो बस अब कुछ ही पलों का वह मेहमान है और मरने से पहले अपनी आखिरी इच्छा पूरी करना चाहता है | चूसते चूसते वो पुरजोर तरीके से उन्हें दबा भी रहा था |

कुछ देर तक तो वह ऐसे ही चूचियों को दबाता... चूसता ... गले और गालों को चूमता चाटता रहा... फिर थोड़ा उठ कर अपने पजामे के नाड़े को खोल कर नीचे सरकाया... फिर चाची के पैरों को पकड़ कर घुटनों से मोड़ते हुए फैलाया... फिर अपने लंड को सीधे उनकी हसीं चूत के मुँह पर रख दिया। लंड का सुपारा उनकी चूत के मुँह पर रगड़ कर उसने सुपारे को बिल्कुल सही जगह फिट किया ... उसके लंड का छुअन अपने चूत पर पाते ही चाची तेज़ सिसकारी लेने लगी... कसम से ... एकदम सड़क छाप रंडी लग रही थी...

एक अच्छे घर की बहु को इस तरह फर्श पर लेटे किसी और का लंड लेते हुए देखना मुझे जितना बुरा लग रहा था उतना ही मज़ा उस आदमी को आ रहा था | उसने अपने सुपारे को हल्का हल्का रगड़ते हुए धीरे धीरे अन्दर की तरफ धकेलना शुरू किया। हल्के से दबाव के साथ लंड का अगला हिस्सा उनकी चूत के अन्दर आधा जा चुका था। अब उसने उनकी जांघों को अपने हाथों से मजबूती से पकड़ा और एक जोर का झटका दिया और आधा लंड अन्दर घुस गया।

“आआअह्ह .... ऊऊ.....ग्गुऊंन… इस्स स्स्स… ह्म्म्म…” चाची दर्द से कराह उठी...|

उसने बिना रुके एक और झटका मारा और जड़ तक पूरे लंड को उनकी चूत में घुसेड़ दिया। चाची मारे जोर के दर्द से चिहुंक उठी... “आआह्ह्ह्ह..... माsssssss.........” | थोड़ा सा रुक कर उसने लंड को थोड़ा बाहर निकाला और फिर अंदर घुसा कर धीरे धीरे धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ चाची सिसकारियाँ भरती जा रही थीं और उनकी चूत से आती ‘फच्च...फच्च..’ की आवाज़ बता रही थी की उनकी चूत गीली होती जा रही है |

ठप्प्प… ठप्प्प्प… ठप्प्प… ठप्प्प… बस यही आवाजें सुनाई दे रही थीं उस आदमी के जोर जोर से धक्के देने से….

करीब दस मिनट तक ऐसे ही लंड पेलते पेलते उसने उनकी टाँगे छोड़ दीं और अपने रूखे हाथों को आगे बढाकर उनकी चूचियों को थाम लिया। और बहुत मस्ती में भर कर चूचियाँ मसलकर चुदाई का मज़ा लेने लगा....और चाची को तो देख कर लग रहा था जैसे की उनको भी इसमें मज़ा आ रहा है । उनके मुँह से लगातार ‘ऊह्ह्ह्ह...उऊंन्ह्ह....आआह्ह्ह्ह.... ग्गुऊंन......... ग्गुऊंन...............इस्स...स्स्स्स..... ह्ह्म्मम्म...आआह्ह’ | और उनकी इस मदमस्त कराहें उस आदमी को और जोश से बार दे रही थी |

करीब बीस मिनट की चुदाई के बाद अचानक से चाची बोल पड़ी...

“उफफ्फ… मैं..... आःह... अब्ब..औरररर..... आई… मैं .... नहींsssssss.......आईई… ओह्ह्ह… ओह्ह्हह… आआऐ ईईइ।” चाची के पैर और शरीर अकड़ गए और वो एकदम से ढीली पड़ गईं।

वह आदमी भी एक ज़ोरदार , ‘आआह्ह्ह..’ से कराहा और तेज़ लम्बी साँसे लेता हुआ धीरे धीरे चाची के ऊपर लेट गया...

दोनों कुछ देर तक वैसे ही लेटे रहे... चाची ने उसे हल्का झिंझोड़ कर उठाया... आहिस्ते से कहा, “जल्दी कीजिये... कोई आ जाएगा...|” वो आदमी मुस्कुराता हुआ चाची के दोनों चूचियों को मसलते हुए उनके होंठों पर हलके से किस किया ओर बोला, “क्या चीज़ है तू.... जितना भी रगडूं... उतना और करने को जी चाहता है... ऊम्माह्ह्ह |”

दोनों जल्दी से उठ कर अपने अपने कपड़े पहन कर वाशरूम से बाहर निकल गए.. | मैं भी जल्दी से उतरा और अपने लंड को ठीक करता हुआ होटल के आगे पहुँचा और फिर अपने टैक्सी वाले के पास गया... वो मुझे दूर से देख कर ही अपने हाथ को एक विशेष अंदाज़ में हिला कर मुस्कुरा दिया... ये उसका इशारा था... कि जो काम मैंने उसे दिया था.. वो उसने कर दिया है.... मैं भी मुस्कुरा कर एक सिगार सुलगाते हुए उसकी ओर बढ़ गया |

क्रमशः

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09-12-2020, 12:41 PM,
#14
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग १४)

शाम का समय | अपने छत पर खड़ा, छत की छोटी सी बाउंड्री वाल पर कॉफ़ी का मग रखकर, टी शर्ट – बरमुडा पहने, कश लगाते हुए दूर क्षितिज़ में अस्त होते सूर्य और उसके प्रकाश से आसपास आसमान में फ़ैली लालिमा को निहार रहा था | मंद मंद हवा भी चल रही थी | दूर कहीं शायद चमेली का पौधा होगा, जिसकी खुशबू, नथुनों से टकरा कर मन को शांत और आह्लादित कर दे रही थी | भोर और शाम ... इन दोनों में एक बात कॉमन ज़रूर है.. इन दोनों ही समय में, कोई एक पॉइंट ऐसा ज़रूर होता है जब आस पास की चीज़ें अचानक से स्थिर हुई सी प्रतीत होती है.. सबकुछ शांत.. रुका रुका सा लगता है ... | लगता है जैसे समय भी अपनी धुरी पर घूमना भूल कर, इस समय की अद्वितीय सुन्दरता और शांत खड़ी सी प्रकृति की प्रशंसा हेतु शब्द ढूँढ रहा हो और शब्दों के मिलते ही वो वातावरण नुमा धागे में उन्हें पिरोकर उस समय की महत्ता, सुंदरता और अद्वितीयता को कई गुना बढ़ा देता है |

तीन सिगरेट ख़त्म कर चूका हूँ अब तक... चौथा अभी अभी सुलगाया... कॉफ़ी लगभग ख़त्म होने को आ गई है | मन अब मेरा प्रकृति की सुंदरता से हट कर जीवन के संघर्षों में आ गया है | और फ़िलहाल कुछ समय से जीवन में रहस्य, रोमांच, भ्रांति, चिंता, संदेह और दुविधाओं के चक्रव्यूह वाला एक अलग अध्याय शुरू हो गया है | जिन्में मुख्य पात्र मेरी खुद की चाची ही है... (अभी तक) ... और रहस्य, रोमांच और भय वाले इस अध्याय / इस कहानी का ताना बाना बुना जा रहा है चाची के इर्द गिर्द... पर यह बात दावे के साथ कहा जा सकता है की इस कहानी का केन्द्रीय पात्र कोई और है ... और वो जो कोई भी है वो विक्टिम भी हो सकता है या विलेन भी | हो सकता है वो इन सभी बातों से अनजान हो .. या हो सकता है की ये सब कुछ उसी के इशारों पर हो रहा हो |

इतनी सारी बातों का दिमाग में बार बार चलने के कारण सिर भारी सा होने लगा | अंतिम कश ख़त्म कर बची खुची कॉफ़ी गटक गया | अपने रूम में जा कर आराम करने का विचार आ ही रहा था कि तभी देखा, घर से दूर.. सड़क के मोड़ वाले जगह पर एक टैक्सी आ कर रुकी... कुछ देर... तकरीबन छह सात मिनट... या शायद दस मिनट तक टैक्सी वैसी ही खड़ी रही... आस पास थोड़ा अँधेरा हो चुका था और शायद टैक्सी के शीशे पर भी काली फिल्म चढ़ाई हुई थी.. | इसलिए बहुत साफ़ कुछ भी नहीं दिख रहा था | जल्द ही पीछे का दरवाज़ा खुला और और उसमें से एक महिला निकली... हाथ में एक मीडियम साइज़ का बैग लिए... | निकलने के बाद दरवाज़ा लगाई और झुक कर अन्दर बैठे किसी से बातें करने लगी | करीब दस और मिनट और बीत गया.. | टैक्सी आगे बढ़ी और फिर टर्न हो कर जिस रास्ते से आई थी.. उसी रास्ते से वापस चली गई | न अनजाने क्या मन हुआ जो मैंने खुद को एक कोने में खड़ा कर छुप गया पर नज़र बराबर सड़क पर ही थी मेरी | वो औरत धीरे धीरे चलते हुए हमारे ही घर के तरफ़ आ रही थी | कुछ करीब आते ही मैं पहचान गया उसे... वो चाची थी ! पर.. पर.. ये क्या... इनकी ड्रेस तो बदली सी है.. | सुबह जैसा देखा था अभी उसके एकदम उलट ... !

वेल्वेट मिक्स्ड डीप ब्लू रंग की साड़ी और मैचिंग ब्लाउज में बिल्कुल किसी घरेलू गृहिणी जैसी ... पर साथ ही अत्यंत सुन्दर एक अप्सरा सी लग रही थी | सड़कों के दोनों तरफ़ लगे बिजली के खंभों पर लगे बल्बों से आती सफ़ेद रोशनी से नहाई चाची की ख़ूबसूरती को जैसे पंख लग गए हो | साड़ी को अच्छे से लपेटे, चेहरे पर थकान का बोझ लिए चाची गेट तक पहुँच गई थी... इसलिए मैं भी जल्दी से नीचे चला गया... दरवाज़ा खोलने |

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तीन घंटे बाद,

चाची अपने रूम में है... और मैं अपने रूम में.. कुछ देर पहले फ़ोन आया था चाचा का .. आज आने में लेट होगा उनको.. ग्यारह बजे तक आयेंगे .. मुझे खाने का मूड नहीं था और चाची तो चाचा के आने बाद ही खाएँगी | बिस्तर पर लेटे लेटे पूरे दिन के घटनाक्रमों के बारे में सोच रहा था ... ‘माल की डिलीवरी.. ‘एक्सचेंज’... ‘डेमो’, ‘कोड’.... ये सब जितना सोचता उतना ही मेरे सिर पर किसी हथोरे की तरह चोट करते | बिस्तर पर से उठा.. पास के टेबल से बोतल उठाई और पूरा पानी गटक गया | पानी खत्म करते ही सिगरेट की तलब हो आई.. टेबल के दराज से ‘किंग साइज़’ और लाइटर निकाला और चल दिया ऊपर छत की तरफ़ .. कुछ कदम अभी चढ़ा ही था की सोचा एक बार चाची को बता दूं ..की ‘मैं छत पर जा रहा हूँ कोई काम होगा तो बुला लेना’ | साथ ही मुझे ये भी पता चल जाएगा की चाची अभी क्या कर रही है...

कोई पदचाप किये बिना मैं धीरे धीरे उनकी रूम की तरफ़ बढ़ा | दरवाज़ा पूरी तरह लगा नहीं था... हल्का सा सटा कर रखा गया था .. मैंने दरवाज़े को हल्का सा खोल कर अन्दर झाँका.. और झांकते ही आँखें चौड़ी हो गई..

चाची अन्दर अपने बदन पर सिर्फ़ एक टॉवल लपेटे आदमकद आइने (ड्रेसिंग टेबल) के सामने खड़ी थी | टॉवल भी सिर्फ़ उनके गांड से थोड़ी सी नीचे ही थी... बाकी सब साफ़ दिख रहा था .. चाची दूसरे टॉवल से अपने गीले बाल पोंछ रही थी और आईने में खुद को निहारते हुए मंद मंद मुस्कुरा रही थी | लगता है अभी अभी नहा कर निकली है |

पूरा बदन चमक सा रहा था.. ख़ास कर उनका चेहरा.. काली आँखें, धनुषाकार आई ब्रो, लाल लिप्स, और उसपे भी रह रह कर आँखों और चेहरे पर गिर आते बालों के लट.. उन्हें और भी सम्मोहक और किसी काम मूर्ति की भाँती बना रही थी | कसम से, आज पहली बार उनको देख कर मन में तरह तरह के ख्याल आ रहे थे.. और वो सभी नेक ख्याल नहीं थे इस बात का प्रमाण मेरे बरमुडा में उभर आया तम्बू साफ़ दे रहा था | बाल पोंछ कर चाची कमरे के दूसरी तरफ़ चली गई | मैं वहीँ अपने यथास्थान पर खड़ा रहा | मन और लंड अभी बहुत कुछ देखना चाहते थे शायद.. खैर, थोड़ी ही देर में चाची फिर से आईने के सामने आई ...औ..औरर... और.. जो मैंने देखा वो देखकर मुझे अपने आँखों पर यकीं ही नहीं हो रहा था !!

चाची एक अजीब सी .. अलग ही सी ड्रेस में आईने के सामने खड़ी थी.. ये कहने में कोई भूल नहीं होगी की उस ड्रेस ने चाची की यौवन को जितना निखार कर सामने लाने का बढ़िया काम कर रही थी उतना ही मेरे अन्दर काम ज्वाला को धधकाने में भी कर रही थी | किसी छोटे बच्ची की स्कर्ट जैसी लग रही थी ... अंतर सिर्फ़ इतना है की कन्धों पर पूरे कपड़े होने के बजाए वहां सिर्फ एक एक धागे की डोरी जैसी थी जो नीचे उतरता हुआ उनके स्तनों के पास छोटे और तंग कप्स जैसे बन गए थे जो उनकी चूचियों को बड़ी ही खूबसूरती से ऊपर की ओर धकेल रही थी और नतीजतन, दोनों चूचियों के बहुत सा भाग सफ़ेद सा होकर ऊपर उठा हुआ दिख रहा था और दोनों के इस तरह से आपस में सट कर लगे होने से दोनों के बीच की गहरी घाटी (क्लीवेज) भी बहुत ही उत्तेजक रूप से सामने प्रदर्शित हो रही थी | चाची खुद को निहारती, मुस्कराती हुई, अपनी ही खूबसूरती पर मंत्रमुग्ध होती हुई अपने बदन पर क्रीम/ लोशन लगा रही थी | अपनी ही चाची के उस अर्धनग्न; यौवन से भरपूर रूप लावण्य के सौन्दर्य में मैं अपनी सुध-बुध खोता सा चला जा रहा था |

क्रीम/लोशन लगाने के बाद चाची फिर पलटी और कमरे के दुसरे तरफ़ चली गई.. स्टील वाली आलमारी खुलने की आवाज़ आई ... फिर बंद होने की... थोड़ी सी खटपट और चूड़ियों की छन छन की आवाज़ आई ... दो मिनट बाद ही चाची फिर से आईने के सामने आई... इसबार अपने ऊपर एक नाईट गाउन जिसे अक्सर, अंग्रेजी में रोब (Robe) भी कहते हैं, ली हुई थी...|

शिट..!! नयनाभिराम दृश्य का बहुत जल्दी अंत हो गया !.. मन दुखी हो गया.. लंड की बात छोड़ देता हूँ फिलहाल के लिए... अब तो कुछ भी नहीं दिख रहा था | दुखी मन से चाची को अच्छे से देखा... सब ढका हुआ था सही पर नितम्ब और वक्षों के आस पास का क्षेत्र पूरे गर्व के साथ उठे हुए से थे | थोड़ा और निहारता की तभी टेलीफ़ोन की घंटी सुनाई दी... दिमाग को एक झटका सा लगा.. वासना वाली सपनों की दुनिया से बाहर निकला...

पर अधिक सोचने का समय नहीं था अभी.. इसलिए जल्दी से भागा वहां से.. इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए की मेरे से किसी तरह की कोई आवाज़ न हो जाए | अपने रूम के पास जा कर रुका और फिर दो मिनट रुक कर सीढ़ि से थोड़ा नीचे उतर कर नीचे बज रहे टेलीफोन पर नज़र रखा |

चाची आई और रिसीवर कानो से लगाईं.. थोड़ी ‘हूँ हाँ’ कर के बातचीत हुई... मेरे कान खड़े हो गए.. ये ज़रूर उन्ही लोगों का फ़ोन है.. मैं पूरे ध्यान से आगे की बातचीत सुनने के लिए तत्पर था कि तभी चाची की मखमली सी आवाज़ आई .. ‘अभय...! ओ अभय... देख किसका फ़ोन है.. तुझे ढूँढ रहा है ...!!’

अजीब था.. मेरा कोई भी परिचित नॉर्मली रात के टाइम फ़ोन नहीं करता.. सबको मना कर रखा था मैंने.. कोई तभी फ़ोन करता था मुझे जब कुछ बहुत बहुत ही अर्जेंट हो और कल पर टाला ना जा सके |

“कौन है .. चाची?” मैं सीढ़ियों से उतरते हुए पूछा |

“पता नहीं.. पहले तो बोला की मिस्टर एक्स है... फिर कहने लगा की उसे कहिये मिस्टर है.. उससे बात करना चाहता है..|” चाची ने थोड़ी बेफिक्री से कहा.. | ये कोई बम सा मेरे सिर पर गिरा | मिस्टर एक्स ?!! अब ये कौन है भला.. ज़रूर मेरा ही कोई दोस्त मस्ती कर रहा होगा... ये सोचते हुए मैं आगे बढ़ा और बे मन से धीरे से कहा, “पता नहीं कौन है... मैं तो ऐसे किसी को नहीं जानता...|” कहते हुए मेरी नज़र चाची पर गई.. वो मुझे ही देखे जा रही थी और संदेहयुक्त नज़रों से मेरी ओर देखते हुए, शरारती मुस्कान लिए फ़ोन का रिसीवर मेरी ओर बढाते हुए बोली, “हाँ जी.. आप तो किसी को नहीं जानते.. बस किसी ने ऐसे ही फ़ोन घूमा दिया और आपको पूछने लगा... भई हम कौन होते हैं ये पूछने वाले की कौन है,क्या चाहता है .... या क्या चाहती है...?” “चाहती है” कहते हुए आँखों में चमक लिए, चाची के चेहरे पर शर्म की लालिमा छा गई और साथ ही होंठों पर शरारती मुस्कान और गहरी होती चली गई | मैंने इशारे में बताने की कोशिश की कि ‘सच में.. मैं किसी को नहीं जानता..|’ पर चाची ने ध्यान न देकर रिसीवर मुझे थमा कर अपने कमरे की ओर चल पड़ी | पीछे से उनकी उभरी हुई सुडोल गांड देख कर मन एक बार फिर मचल सा गया | चाची... को पीछे से मंत्रमुग्ध सा देखता हुआ रिसीवर कानों से लगा कर माउथपीस में अनमने भाव से कहा, “हेलो, कौन....?”

उधर से आवाज़ आई, “हेलो अभय... मिस्टर एक्स बोल रहा हूँ |”

क्रमशः

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09-12-2020, 12:41 PM,
#15
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग १५)

“क्या मैं अभय, मिस्टर अभय से बात कर रहा हूँ??” दूसरी ओर से एक मध्यम भारी सा आवाज़ सुनाई दिया |

“जी.. बोल रहा हूँ |” मैं बोला |

“ह्म्म्म... मुझे पूरी उम्मीद थी की तुम अभी मुझे घर पर ही मिलोगे.. |” दूसरी ओर से आवाज़ आई |

“जी, वो तो ठीक है पर मैंने आपको पहचाना नहीं.. |” मैं सशंकित लहजे में बोला |

“हम्म.. जानता हूँ.. तुम मुझे नहीं पहचानोगे और ना ही तुम मुझे जानते हो .. पर मैं तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जानता हूँ.. वरन ये समझ लो की मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जानता हूँ |” दूसरी ओर से वही धीर स्थिर सी आवाज़ आई |

मेरे कान खड़े हो गए | मैं फ़ौरन पूरी सतर्कता के साथ उसकी आगे की बोली जाने वाली बातों के बारे में सोचने लगा और सबसे ज़्यादा इस बात पे फोकस था मेरा अब की आगे क्या होने वाला है, ये मुझे कैसे जानता है, क्या चाहता है इत्यादि |

“सुनो, मैं जानता हूँ की अभी तुम्हारे दिलो दिमाग में बहुत सारे ख्याल आ रहे होंगे .. आना वाजिब भी है.. मुझे तुम अपना दोस्त ही समझ लो | अपना शुभ चिन्तक.. | मैं बस अभी के लिए इतना ही कहना चाहूँगा कि तुम जो कुछ भी कर रहे हो वो खतरों से खाली नहीं है | जान भी जा सकती है | ऐसा भी हो सकता है की कोई तुम्हे मार कर फेंक दे और महीनो किसी को कुछ पता भी न चले.. | ये सब कोई बच्चो का खेल नहीं है जो तुम इन सबमें हाथ धो कर पीछे पड़ गए | बेहतर होगा की तुम किसी ओर की मदद लो... पुलिस की ही मदद ले लो |” – उस शख्स ने बड़े ही शांत पर चिंतित से स्वर में कहा |

“जी.. मैं आपके बातों और जज्बातों का कद्र करता हूँ.. अच्छा लगा की एक अजनबी-से हो कर भी आप मेरी इतनी फ़िक्र कर रहे हैं... पर बात जब परिवार की हो तो मदद के लिए खुद आगे आना चाहिए.. ऐसा मेरा मानना है | रही पुलिस की बात तो अभी उन्हें इसमें इन्वोल्व नहीं करना चाहता मैं | और मरने की बात तो छोड़ ही दीजिए .. जो जन्मा है वो मरा भी है | नथिंग स्ट्रेंज ओर डिफ्फरेंट इन इट | मैं पीछे नहीं हटने वाला | - मैंने पूरी दृढ़ता से अपनी बात रखी |

दूसरी ओर एक लम्बी सी ख़ामोशी छाई रही | सिर्फ़ गहरी सांस लेने की आवाज़ सुनाई दे रही थी |

फिर,

“ह्म्म्म.. ठीक है .. जब करने-मरने की ठान ही चुके हो तो मैं और कह भी क्या सकता हूँ | पर तुम्हारी मदद के लिए ज़रूर रहूँगा हमेशा |” – दूसरी ओर से आई आवाज़ में चिंता की लहरें थी |

“वैसे अभी मिल सकते हो क्या?” – उस आदमी ने पूछा |

“क्यों? कोई मदद करना चाहते हो क्या? किस बारे में मिलना है तुम्हें ?” मैंने रिटर्न प्रश्न किया |

“तुम्हारी चाची के बारे में बात करनी थी |” बहुत शोर्ट और गंभीर आवाज में कहा उसने |

सुनते ही मेरे सतर्कता के भी छक्के छूटे .. हाथ से रिसीवर छूटने को हो आया | थोड़ी हडबडाहट सी हुई | संभल कर मैंने भी उसी भाँति गंभीर आवाज़ में पूछा, “क्या बात करना है आपको मेरी चाची के बारे में?”

“फ़ोन पर संभव नहीं है.. तुम बस ये बताओ की क्या तुम अभी मुझसे मिलने आ सकते हो ?” – दूसरी तरफ़ से भावहीन स्वर उभरा |

“जी... बिल्कुल आ सकता हूँ.. कहाँ आना होगा मुझे?” मैंने घड़ी की ओर देखते हुए उतावलेपन में कहा |

“दस मिनट बाद ही तुम्हारे घर से पहले वाले मोड़ पर एक कार .. आई मीन एक टैक्सी आ कर रूकेगी .. तुम्हें देख कर दो बार हेडलाइट्स ऑन-ऑफ़ करेगी .. उसमें बैठ जाना.. वो तुम्हे मुझ तक पहुँचा देगी...और हाँ, एक बात और.. उस बेचारे टैक्सी ड्राईवर से कोई सवाल जवाब मत करना .. वो तो सिर्फ़ मेरे कहने पर ही तुम्हे लेने आएगा और मुझ तक छोड़ जाएगा... ओके?” – निर्देशात्मक लहजे में कहा उस शख्स ने |

मेरे ओके या कुछ और कहने के पहले ही उसने फ़ोन रख दिया था | मैंने रिसीवर क्रेडल पर रखा | नज़र दौड़ाई घड़ी पर ... सवा नौ बज रहे थे रात के | इससे पहले कभी बाहर जाना नही हुआ रात में | ये पहली बार था और जाना ज़रूरी भी | मैं सीधे अपने रूम गया, तैयार हुआ और चाची को उनके रूम के बाहर से आवाज़ दिया,
“चाची... थोड़ा काम से निकल रहा हूँ... कुछ ही देर में आ जाऊंगा |”
कह कर बाहर निकल गया मैं.. तब तक चाची अपने रूम से निकल आई थी.. सवालिया नज़रों से मुझे देख रही थी | पर मेरे पास टाइम नही था रुकने का या फिर उनके किसी बात का जवाब देने का.. मैं जो भी कर रहा हूँ और करने जा रहा हूँ .. वो तो चाची के लिए ही है न...|

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जैसा फ़ोन पे कहा गया था ठीक वैसा ही हुआ... मोड़ पे एक टैक्सी आ कर रुकी | दो बार हेडलाइट्स ऑन-ऑफ़ हुई | मैं टैक्सी के पास गया | दरवाज़ा खोला और उसमें बैठ गया | ड्राईवर ने टैक्सी के अन्दर का लाइट ऑफ़ कर रखा था.. शायद उसे ऐसा करने के लिए कहा गया था .. मैंने कुछ पूछना और सोचना उचित नहीं समझा, फिलहाल तो मंजिल पर पहुँचना ज़्यादा ज़रूरी था | करीब चालीस मिनट तक टैक्सी चलती रही | ड्राईवर चुप.. मैं चुप... एक अजीब सी विरानियत छाई हुई थी टैक्सी के अन्दर | शहर के व्यस्त सड़कों और माहौल को पीछे छोड़ते हुए एक सुनसान से रास्ते पे टैक्सी बढे चले जा रही थी |

कुछ ही देर में एक टूटे फूटे से घर के पास आ कर टैक्सी रुकी | ड्राईवर ने एक कागज़ का टुकड़ा बढ़ा दिया मेरी तरफ़ | मैं बिना कुछ बोले उस टुकड़े को ले कर टैक्सी से उतरा .. जेब से छोटी पॉकेट टॉर्च निकाल कर कागज़ को देखा | उसमें लिखा था, “अपने सीध में देखो. घर की तरफ़ .. लाल ईंटों के तरफ़ चले आओ |” मैंने नज़र उठा कर घर की तरफ़ टॉर्च की लाइट फेंकी.. पेंट भी उतर गई थी घर की.. सीमेंट पलस्टर भी आधे अधूरे से निकल आये थे | सामने तीन खम्बे थे घर के ... उनमें से एक खम्भे का बहुत बुरा हाल था | सिर्फ़ ईंटें ही बचीं थी | लाल ईंटें ...ऑफ़ कोर्स ...| मैं धीरे सधे कदमों से आगे बढ़ा |

उस खम्भे के पास पहुँच कर रुका..और इधर उधर देखने लगा |

तभी एक आवाज़ गूँजी,
“ आ गए...?! अब बिना कोई सवाल किये इस खम्भे से अपनी पीठ टिका कर पलट कर खड़े हो जाओ.. जिधर से आये, तुम्हारा मुँह उस तरफ़ होना चाहिए..|”

मैं बिना कुछ कहे ठीक वैसा ही किया जैसा की करने को कहा गया | फिर आवाज़ आई और इस बार महसूस हुआ की आवाज़ ठीक मेरे पीछे से आ रहा है और इस आवाज़ का मालिक जो भी है, वो भी मेरी तरह ही उसी खम्भे से पीठ टिकाए बात कर रहा है, “सुनो अभय.. तुम बहादुर हो इसमें अब मुझे कोई संदेह नहीं है.. मौत का डर दिखाने पर और रात को अचानक से बुलाने पर भी तुम नहीं डरे.. ये काबिले तारीफ़ है.. पर एक बात हमेशा याद रखना की बहादुरी और बेवकूफी के बीच एक बहुत महीन; बारीक सी रेखा होती है... अगर काम कर गया तो रेखा के इस तरफ़.. यानि बहादुरी का गोल्ड मैडल और अगर कहीं चूक गये और रेखा के उस तरफ़ चले गये तो समझो जिल्लतों भरी, तौहीन वाली, साथ ही जग हँसाई वाली बेवकूफी के मशहूर किस्से... | और इन दोनों का या इनमें से किसी एक का चुनाव हम नहीं हमारी नियत और वक़्त करता है ... नियत कैसी भी हो ... वक़्त बड़ा बेरहम होता है.. वो किसी का सगा नहीं... इसलिए एक बार फिर सोच लो... क्या विचार हैं तुम्हारे... क्या वाकई तुम पूरी तरह से तैयार हो .. ऐसे काम के लिए..??”

मैंने शालीनता पर साथ ही कठोरता के साथ उत्तर दिया, “आपकी बातें बहुत पसंद आई मुझे .. माफ़ी चाहूँगा .. आपका दिल दुखाते हुए.. मैं उन लोगों में से नहीं जो फैसला कर के सोचते है और पलट जाते हैं... मैं जो भी फैसला करता हूँ ... हमेशा सोच कर ही फैसला करता हूँ... अब ये बताइए की इतनी रात में मुझे यहाँ बुलाने का क्या कारण है ?”

दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, “ह्म्म्म.. ठीक है.. सुनो.. पिछले कुछ महीनो से शहर में अंडरवर्ल्ड और टेररिस्ट आर्गेनाइजेशन के लोग काफ़ी सक्रिय हो गए हैं और एकदम से बाढ़ आई हुई सी लग रही है इन लोगों की | चरस, कोकेन, गांजा, और कई तरह के दुसरे ड्रग्स सप्लाई किये जा रहे हैं मार्किट में... पुलिस भी कुछ खास नहीं कर पा रही क्यूंकि इन लोगों के काम करने का ढंग काफ़ी अलग और समझ से परे है | सिर्फ़ इतना ही नहीं.. ये लोग आर्म्स .. यानि की हथियारों की स्मगलिंग में भी शामिल हैं | और ऐसे काम में ये खुद शामिल ना होकर यहाँ के भोले भाले स्टूडेंट्स, बच्चे और यहाँ तक की घर की औरतों को भी शामिल कर रहे हैं.. और मुझे लगता है की तुम्हारी चाची भी ऐसे लोगों के साथ या तो मिली हुई है या फिर इनके चंगुल में फंस गई है | सच क्या है ये तो पता चल ही जाएगा... पर अब ये तुम सोचो की तुम्हे आगे क्या करना है.. और हाँ मैं तुम्हारी मदद के लिए हमेशा रहूँगा... पर दिखूंगा नहीं...|”

इतना सुनते ही मैं से बोल पड़ा, “तो क्या मेरी माँ भी??”

इसपर आवाज़ आई, “नहीं....मुझे नहीं लगता.. जैसा तुम सोच रहे हो.. अगर वैसा ही कुछ होता तो अभी तक तुम्हें बहुत कुछ पता चल गया होता या फिर उन लोगों ने खुद ही तुम्हें इसके बारे में कोई इशारा या सन्देश दे दिया होता... तुम्हारी माँ बिल्कुल ठीक है और सुरक्षित है.. तुम निश्चिंत रहो | उन लोगों ने किसी तरह तुम्हारे घर में घुस कर वो तस्वीरें लीं होंगी |”

मैं आश्चर्य में भरकर बोला, “तो आपको ये भी पता है की उन लोगों ने मेरी माँ की तस्व....”

मेरी बात को बीच में काटते हुए उस शख्स ने कहा, “मैंने तुम्हे पहले ही कहा था की मैं सब कुछ जानता हूँ ... अगर मेरे सब कुछ जान लेने पर तुम्हें यकीं नहीं तो अब इतना तो मानोगे ही की मैं बहुत कुछ जानता हूँ..?!” सब कुछ और बहुत कुछ पर जोर देते हुए कहा उसने |

मैं – “अच्छा, एक बात बताइए... अगर आप मुझे दिखेंगे नहीं तो मैं आपसे मदद कैसे मांगूंगा?? आपको कैसे पता चलेगा की मैं मुसीबत में हूँ भी या नहीं...?”

“वो मैं देख लूँगा.. और कभी अगर कांटेक्ट करने की ज़रूरत महसूस हुई तो मैं खुद ही कांटेक्ट कर लूँगा...| अभी इससे ज़्यादा और कुछ नहीं बता सकता |” भावहीन स्वर में बोला वो...|

मैं – “अच्छा, एक और बात.. कम से कम इतना तो बताइए की आप हैं कौन या फिर आप मेरी ही मदद क्यों कर रहे हैं??” मेरे इस प्रश्न में मेरे उतावलेपन का स्तर साफ़ नज़र आ रहा था |

“सही समय आने पर सब खुद ब खुद ही पता चल जाएगा... डोंट वरी.. आज के लिए इतना ही.. वो टैक्सी तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ देगी ... बाय...|” पहले जैसे स्वर में ही कहा उसने |

अभी मैं कुछ कहता या कोई प्रतिक्रिया देता... खट से एक आवाज़ हुई.. मैं धड़कते दिल को संभाले धीरे धीरे खम्भे के दूसरी तरफ़ गया.. घुप्प अँधेरा... टॉर्च जलाया... चारों तरफ़ ईंटें और कई दूसरी चीज़ें गिरी हुई थीं... उस शख्स का कहीं कोई नामो निशान नहीं था.. ऐसा लग रहा था जैसे की हवा में विलीन हो गया हो | मन में कई सवाल, अंदेशों और संदेहों को टटोलता – संभालता मैं टैक्सी की ओर बढ़ चला.. घर वापस जाने के लिए .......

क्रमशः

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09-12-2020, 12:41 PM,
#16
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग १६)

घर पहुँचा और हाथ मुँह धो कर सीधे छत पर | आते समय एक पैकेट सिगरेट लेते आया था | तय था की रात को नींद जल्दी और आसानी से आने वाली है नहीं | कुछ पहले से ही थे और पूरा एक अभी ले आया | कुछ देर टहलने के बाद वहीँ रखे एक चेयर पर बैठ गया | दूसरों का पता नहीं, पर जब भी मेरा दिमाग उलझ जाता या चीज़ों को बारीकी से समझने की ज़रुरत महसूस होती; मैं कश लगाने लगता | और चूँकि अभी मैं बिल्कुल ऐसी ही स्थिति में था इसलिए शुरू हो गया कश लगाने |

और साथ ही चालू हुआ दिमाग के घोड़े दौड़ाने .. |

उस शख्स की बातें बार बार दिमाग में गूँज रही थी, “पिछले कुछ महीनो से शहर में अंडरवर्ल्ड और टेररिस्ट आर्गेनाइजेशन के लोग काफ़ी सक्रिय हो गए हैं और एकदम से बाढ़ आई हुई सी लग रही है इन लोगों की | चरस, कोकेन, गांजा, और कई तरह के दूसरे ड्रग्स सप्लाई किये जा रहे हैं मार्किट में... पुलिस भी कुछ खास नहीं कर पा रही क्यूंकि इन लोगों के काम करने का ढंग काफ़ी अलग और समझ से परे है | सिर्फ़ इतना ही नहीं.. ये लोग आर्म्स .. यानि की हथियारों की स्मगलिंग में भी शामिल हैं --- और ऐसे काम में ये खुद शामिल ना होकर यहाँ के भोले भाले स्टूडेंट्स, बच्चे और यहाँ तक की घर की औरतों को भी शामिल कर रहे हैं.. और मुझे लगता है की तुम्हारी चाची भी ऐसे लोगों के साथ या तो मिली हुई है या फिर इनके चंगुल में फंस गई है |”

और इन्ही बातों में उसके द्वारा जिक्र किये गए कुछ शब्द बार बार दिमाग पर हथौड़े से पड़ रहे थे ...

१) अंडरवर्ल्ड

२) टेररिस्ट आर्गेनाइजेशन

३) चरस

४) कोकेन

५) गाँजा

६) ड्रग्स

७) आर्म्स..

८) हथियारों की स्मगलिंग

९) भोले भाले स्टूडेंट्स, बच्चे और यहाँ तक की घर की औरतों को भी शामिल कर रहे हैं

१०) तुम्हारी चाची

११) मिलीं हुई है या चंगुल में फंस गई है

सभी प्रमुख बिन्दुओं पर बहुत अच्छे से ध्यान दे रहा था पर हर बार दो बिंदुओ पर आ कर ठहर जाता .. पहला ये कि भोले भाले स्टूडेंट्स, बच्चे और घर की औरतों को शामिल किया जाना और दूसरा यह की मेरी चाची का इनसे मिला होना या फिर इनके चंगुल में फंसा होना.. | ऐसे लोगों के साथ चाची जैसी एक सुदक्ष एवं संस्कारी गृहिणी का मिला होना समझ से परे है, मतलब ऐसा नहीं हो सकता, पर पता नहीं क्यों मैं ऐसे किसी सम्भावना से इंकार भी नहीं कर पा रहा था --- पर चंगुल में फंसा होना...

इस बात पर गौर करने की आवश्कता है ; क्योंकि ऐसा हो तो सकता है पर ये हुआ कैसे; ये पता लगाना है और यही पता लगाना फिलहाल तो टेढ़ी खीर सा प्रतीत हो रहा है | इसके बाद जो सबसे बड़ा प्रश्न मेरे समक्ष आ खड़ा हो रहा है वो यह कि स्टूडेंट्स, बच्चे और घर की औरतों को क्यों इन कामों में लगाया जा रहा है.. क्योंकि सिंपल सी बात है की स्मगलिंग के लिए वेल ट्रेंड लोगों की आवश्यकता होती है और स्टूडेंट्स और छोटे बच्चे; ख़ास कर घर की गृहिणियां-औरतें तो बिल्कुल भी ऐसे कामों के लिए ट्रेंड नहीं होतीं और इन सब चीज़ों से अनभिज्ञ भी होती हैं .... ह्म्म्म, कहीं ऐसा तो नहीं की इन्हें इन कामों के लिए किसी खास तरह से ट्रेनिंग मुहैया कराया जा रहा है ... पर कैसे ... कैसे... ??

सोचते सोचते अचानक से टैक्सी वाले की याद आ गई और साथ ही उसे दिया गया काम जो मैंने ही उसे करने को कहा था.. एक मोटी टिप दे कर | सुबह जब मैं होटल में घुसा था तब मेरा टैक्सी वाला अपनी टैक्सी को चाची वाले टैक्सी के बिल्कुल बगल में खड़ा कर दिया और फिर कुछ देर इधर उधर की गप्पे हांकने के बाद उसने उस टैक्सी वाले से होटल और यहाँ आने वाले लोगों के बारे में घूमा फिरा कर पूछना शुरू कर दिया | थोड़ा से खुलने पर कुछ ही देर में उस टैक्सी वाले ने बहुत सी जानकारियाँ दे दी थीं मेरे टैक्सी वाले को |

बाद में जो मुझे जानने को मिला वो ये था कि,
‘उस होटल में बहुत पहले से ही अवैध गतिविधियाँ चल रही हैं --- पुलिस और प्रशासन को भी लगभग सब कुछ पता है पर मामला काफ़ी हाई प्रोफाइल होने के कारण कोई कुछ करने से बचता है --- अक्सर गलत कामों में संलिप्त लोग, अंडरवर्ल्ड के लोग यहाँ आते और दावत उड़ाते हुए देखे गए हैं | होटल के मालिक का भी कई सरगनाओ के साथ उठना-बैठना है और बहुत ही अच्छे सम्बन्ध हैं .. | सुनने में आया है की पड़ोसी और दूसरे मुल्कों के भी अंडरवर्ल्ड या अपराधी सरगना यहाँ आने लगे हैं.. पिछले काफ़ी समय से इसी होटल में कई अवैध चीज़ों की खरीद-फ़रोख्त भी हो रही है | डायमंड्स, सोने के बिस्किट्स, आर्म्स (हथियार) और दूसरे कई तरह के नशीली दवाईयों और ड्रग्स धरल्ले से बिक और बेचे जा रहे हैं यहाँ.. कहने को तो होटल है ठहरने, राहगीरों के आराम करने, खाने पीने के लिए पर अब सिर्फ़ नाम का है ...

और तो और काफ़ी समय से यहाँ, इस होटल में वेश्यावृति भी चालू है | कम उम्र की या कॉलेज जाने वाली लड़कियां यहाँ लायी जाती हैं; सरगनाओं के रातें रंगीन करने के लिए | कुछ, जिनके आगे पीछे कोई नहीं, बेचीं भी गई हैं | सुनने में आ रहा है की आज कल संभ्रांत घर की गृहिणीयों-औरतों को भी यहाँ लाया जाने लगा है | ऐसे कई अपराधी और सरगनायें हैं जिन्हें लड़कियों की तुलना में खेली खिलाई अच्छे घरों की औरतों में ज़्यादा दिलचस्पी है और उनका साथ ही उन्हें अच्छा लगता है | सिर्फ़ यही नहीं, ये लोग इन्हीं औरतों और कुछ बेहद स्मार्ट और अंग्रेजी बोलने वाली लड़कियों के माध्यम से स्मगलिंग की डीलिंग को अंजाम देते हैं |

ऐसे लोगों के चंगुल में जो भी फंसा या फंसी, उसे दो ही बचा सकते हैं,... एक, या तो ऊपरवाला ... दूसरा, ये लोग.. ऊपरवाले का तो पता नहीं, पर ये लोग अपने मोहरों को सिर्फ़ मौत दे कर ही छोड़ते हैं |’

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सोचते सोचते चेयर से उठ कर, छत की बाउंड्री वॉल तक पहुँच गया था मैं | चार सिगरेट ख़त्म कर चुका था | अभी और भी बहुत कुछ सोचना चाहता था पर कुछ देर के लिए अपने सभी विचारों पर विराम लगा दिया | बस, चाँदनी रात में छत पर खड़े रह कर इस क्षण का भरपूर आनंद लेने को दिल चाह रहा था | आँखें बंद कर धीमी चलती हवा के झोंकों का आनंद लेने लगा | कुछ ही मिनट्स बीते थे की तभी लगा, जैसे की वहां आस पास एक बहुत ही प्यारी सी खुशबू फ़ैल गई है | बहुत ही मदमस्त कर देने वाली खुशबू थी यह... कहाँ से आने लगी ये सोचने के बजाए उस खुशबू को भर भर कर अपने मन और दिलो दिमाग में ले लेने को जी करने लगा |

और तभी....,

किसी ने मेरे दाएँ कंधे पर बहुत मुलायम सा हाथ रखा... मैं चौंक कर पलटा और अपने दाएँ तरफ़ देखा... चाची थी..! उसी नाईट गाउन... ओह्ह .. सॉरी.. नाईट रोब में थी, मुस्कुराती हुई.. मुझे ज़बरदस्त तरीके से चौंकते देख कर उनकी हंसी निकल गई | ‘हाहाहाहाहा’ कर खिलखिला कर हँस दी... कसम से, बहुत ही प्यारी और साथ ही बहुत ही कातिलाना लग रही थी वो ...

“क्या हुआ भतीजे जी... इतनी बुरी तरह से कब से डरने लगे..?” हँसते हुए पूछा उन्होंने...|

“जी... वो... आप आएँगी, सोचा नहीं था मैंने... अचानक से हाथ रख दिया आपने... लगता है डराने के लिए ही किया था...|” ज़ोरों से धड़कने लगे दिल को शांत करने के असफल प्रयास में लगा मैं बच्चों सी टोन में बहाने गिना दिए |

चाची अब भी हँसे जा रही थी | हँसते हुए ही पूछा उन्होंने,

“अच्छा, ये बताओ.. यहाँ कर क्या रहे हो और कितनी देर तक खड़े रहोगे?”

“बस, जाने ही वाला था... आप कहिये.. आप यहाँ कैसे... और चाचा आयें की नहीं?”

मेरे इस प्रश्न पर चाची ने अपनी हंसी बंद कर मुझे ऐसे घूर कर देखा जैसे की मैंने बहुत ब्लंडर वाला कोई बात पूछ लिया | आवाज़ में आश्चर्य का भाव लिए पूछी,

“अरे... तुम्हें तो टाइम का बिल्कुल भी कोई अंदाजा नहीं.. जानते हो.. पूरे डेढ घंटे बीत गए हैं... तुम्हारे चाचा कब के आ भी गए और खा-पी कर सो भी गए हैं... अब चलो.. जल्दी से नीचे चल कर कुछ खा लो... मुझे भी बहुत भूख लगी है |”

“आपने खाया नहीं?” मैंने पूछा |

इसपर मेरे दाएँ गाल पर चिकोटी काटते हुए चाची बोली, “ अपने प्राण प्यारे राजा भतीजे को छोड़ कर मैं भला कैसे खा सकती हूँ ?” उनके आवाज़ में शरारत के साथ साथ शिकायत वाला लहजा भी था | उनके लम्बे नाखून मुझे मेरे गाल पर चुभते हुए से लगे पर न जाने क्यों मुझे ये चुभन बहुत प्यारा सा लगा | कुछ कह तो नहीं सकता था इसलिए सिर्फ़ मुस्करा कर रह गया | चाची को शायद मेरा शर्माना बहुत अच्छा लगा, इसलिए मेरे बहुत पास आ कर मेरे आँखों में झाँकने का प्रयास करती हुई बोली,
“वैसे इतनी रात को यहाँ अकेले अकेले कर क्या रहे हो... किससे मिलने गए थे अचानक से... कहीं कोई इश्क विश्क का चक्कर तो नहीं?”

आवाज़ में अजब सी मिठास और शरारत का मिश्रण था |

मैंने थोड़ा हँसते हुए जवाब दिया,

“नहीं चाची... ऐसी कोई बात नहीं... और वादा रहा .. जिस दिन और जिससे ऐसी कोई बात होगी.. सबसे पहले आप ही को पता चलेगा.. यहाँ तो मैं बस हर दिन आने वाली चुनौतियों के बारे में सोच रहा था... हर नया दिन.. नई चुनौती.. नए संघर्ष... नए मुश्किलें ले कर आती हैं... सोच रहा था की इन सबसे कैसे निपटू .. कैसे सुलझाऊं हरेक परेशानियों को | कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जिन्हें खुद से सुलझाना आसान नहीं... किसी से शेयर करने को जी चाहता है.. क्या पता किसी एक की परेशानियो का हल किसी दूसरे के पास हो... |”

ये कहते हुए मैं तिरछी निगाहों से चाची की ओर देखा...

चाची दूर क्षितिज में, बड़े बड़े बिल्डिंग्स में छोटे छोटे चमकते से रोशनी और आस पास के पेड़ पौधों को एकटक देखे जा रही थी... ऐसा लग रहा था मानो, मेरी एक एक बात उनके जेहन, उनकी जिस्म में उतरती चली जा रही हो | कुछ देर की चुप्पी के बाद वो बोली,

“परेशानियो को शेयर करने का जी सबका चाहता है अभय.. संघर्षों से मिलकर लड़ने को जी सबका चाहता है ... मेरा भी... पर... पर... कुछ बातें ऐसी भी हो जाती हैं कि चाह कर भी हम जो चाहते है... वो लाख चाहने पर भी कर नहीं पाते..|”

कहते हुए उनका गला भर आया था.. बहुत रुआंसा सी हो कर बोली,
"ज़िंदगी इम्तेहान लेती हैं.... अभय... ज़िंदगी इम्तेहान लेती हैं |” ऐसा लगने लगा था की जैसे अब किसी भी क्षण उनकी रुलाई फूटने वाली है ---

बात को अलग मोड़ देने के लिए मैं उनसे पूछ बैठा,

“आपको ऐसी क्या परेशानी है जो आप किसी से शेयर नहीं कर सकती... कौन से संघर्ष हैं जो मिलकर नहीं लड़ सकती...?? किसी और को नहीं तो कम से कम मुझे ही बता दीजिए... एस अ भतीजा ओर अ फ्रेंड समझ कर... आप ही तो कभी कभी कहती हैं न की मैं आपके लिए आपके फ्रेंड जैसा हूँ... तो फिर मुझी से अपनी परेशानी शेयर कर लिया कीजिए | और अगर वैसी ज़रूरत ही आन पड़ी तो मैं आपके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर संघर्ष के साथ दो दो हाथ करूँगा... |”

बेहद अपनेपन और आत्म विश्वास के साथ कहा मैंने |

मेरे सवाल करने पर जैसे उन्हें होश आया और ऐसी प्रतिक्रिया दी कि मानो उन्होंने कुछ ऐसी बात कह दी जो उन्हें नहीं कहनी चाहिए थी...

बात को संभालते हुए उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

“अरे नहीं अभय... ऐसा कुछ नहीं है मेरे साथ... फिलहाल के लिए... पर मेरी तरफ़ से भी वादा रहा की जिस दिन किसी को पता चलेगा... तो वो पहला व्यक्ति तुम होगे..|”

एक पल के लिए मेरी ओर देख कर वो दूसरी ओर देखने लगी... होंठों पर एक हल्की मुस्कान दिखी | उस मुस्कान में कोई बात छिपी थी | शायद कुछ और भी कहना था उन्हें पर शायद कहना ठीक नहीं लगा होगा |

उनकी मुस्कान को देखते हुए मेरी नज़र उनके चेहरे से फ़िसल कर उनके वक्षस्थल पर अटक गई | दूधिया चाँद की रोशनी में नहाया उनका बदन किसी संगमरमर की तराशी हुई मूर्ति की भांति लग रही थी | उनके रोब (नाईट गाउन) के आगे से बांधे जाने वाले फ़ीतों के थोड़ा ढीला हो जाने से उनके रोब से उनकी कसी चूचियों के बीच की थोड़ी सी घाटी, उनका सुन्दर क्लीवेज जैसे आमंत्रण सा देता हुआ प्रतीत हो रहा था | जी तो चाहा की अभी इन्हें अपनी बाँहों में कस लूं और इनके पूरे बदन, ख़ास कर इनके चेहरे पर चुम्बनों की बारिश कर दूँ |

पर रोक लिया खुद को ... सही समय नहीं था अभी | क़िस्मत में है या नहीं, ये तो पता नहीं पर फ़िलहाल तो सिर्फ़ इंतज़ार ही दिख रहा है सामने ... उनके बायीं कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,
“चलो चाची... खा लें... बहुत देर हो गई है |”

इसपर चाची मेरे चेहरे की तरफ़ एक बार देखी, कुछ पलों के लिए रुकी, फिर ‘हाँ’ कहते हुए मुड़ कर चल दी.. मैं रोब में उनके उभरे हुए नितम्बों को देखता हुआ आहें भरता हुआ मुड़ने ही वाला था की तभी मेरी छठी इंद्रिय सतर्क हो उठी.. मैंने तुरंत मोड़ वाले रास्ते की तरफ़ देखा ---- एक काली रंग की कार खड़ी थी वहाँ.. जो कि अब धीरे धीरे पीछे हो रही थी..................................................................|

क्रमशः

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09-12-2020, 12:43 PM,
#17
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग १७)

अगले कुछ दिनों तक मैंने कोई जासूसी नहीं की क्योंकि मुझे कोई संदिग्ध गतिविधि नहीं दिखी | मैंने सोचा की शायद अब चाची का कोई काम नहीं रह गया है | शायद उन लोगों का मन भर गया है चाची से | पर जल्दी ही मेरा यह भ्रम टूट गया | वो कहते हैं ना कि पाप और अपराध का दलदल, शुरू में एक हरा भरा खुशबूदार मैदान/ बगीचा सा लगता है जहां जब चाहो, जैसे चाहो, घूम फिर सकते हो, टहल सकते हो पर जब तक असल सच्चाई का पता लगता है; उस दलदल में सिवाय डूबने के और कोई रास्ता नहीं रह जाता है |

रोज़ की तरह, एक शाम को छत पर टहलते हुए मैंने देखा की चाची दूर रास्ते से पैदल चलती हुई आ रही है और उनके कंधे से एक बैग भी लटक रहा है ; बैग भी शायद कुछ भारी सा रहा होगा, इसलिए चाची के चेहरे से परेशानी छलक रही थी .... चूँकि कुछ दिनों से बिल्कुल भी कोई संदिग्ध गतिविधि नहीं हुई थी, इसलिए मैंने भी कोई खास ध्यान नहीं दिया और वापस अपने सिगरेट के कश लेने और कॉफ़ी की चुस्कियाँ पर ध्यान केन्द्रित करने की सोचने लगा..... |

पर इसी तरह मैंने चाची को लगातार अगले चार दिनों तक बैग लिए आते देखा | मेरा जासूस मन फिर से हिलोरें मारने लगा --- कुछ ख़ास शक तो नहीं पर मन में बस ऐसे ही एक इच्छा हुई की
‘ ये चाची रोज़ बैग में कुछ लाती है, न जाने क्या होगा अन्दर? मुझे देखना चाहिए | ’
यही सोच कर मैंने अगले दिन के शुरुआत से ही चाची पर नज़र रखनी शुरू कर दी ... नोटिस किया की चाची अपने घर के कामों को करते हुए बीच बीच में रुक जाती और बड़ी ही परेशानी में दोनों हाथों की मुट्ठियों को आपस में भींच कर रगड़ती और फिर थोड़ी देर में दोनों हाथों की अंगुलिओं को आपस में रगड़ते खुजलाते, वो बैठ जाती और जैसे किसी गहन सोच में डूब जाती |

चेहरे पर रह रह कर उभर आती चिंता की लकीरें साफ़ इशारा करतीं की वो किसी ऐसे सोच में डूबी है जिसके बारे में वो सोचना तो नहीं चाहती पर बिना सोचे कोई उपाय भी नहीं है | फिर अचानक से सिर को झटक कर खड़ी हो जाती और अपने पल्लू से अपना चेहरा पोंछती हुई काम पर लग जाती |

कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि, वह अपने पल्लू के बिल्कुल निचले सिरे को किनारे से पकड़ कर अपने ऊँगली पर गोल गोल लपेटते हुए दूर कहीं देखते हुए किसी बहुत ही ज़बरदस्त सोच में डूब जाती और ऐसा डूबती कि कई बार तो उनको होश भी नहीं रहता की कब उनका पल्लू उनके दाएँ चूची को अनावरित करता हुआ बिल्कुल साइड में सरक गया है और कई बार तो उनका पल्लू ही पूरा का पूरा चूचियों पर से हट कर नीचे गिर चुका होता है ---

पर वो अपनी ही सोच में मगन रहती थी --- ब्लाउज के बिल्कुल बीचों-बीच से होकर सामने नज़र आता उनका पांच इंच का हेल्दी क्लीवेज और दोनों तरफ़ के ब्लाउज कप्स से ऊपर उठ कर झाँकते उनके हृष्ट पुष्ठ चूचियों के ऊपरी गोरे गोरे सुडोल उभारों को देखकर, बरमुडा के अन्दर कड़ा होकर खड़े-हाँफते मेरे लंड में एक ऐँठन सी पैदा होने लगती .... लंड भी शायद मुझे कोसते गाली देते हुए कहा होगा की, ‘साले, अब तो झड़ ले |’ पर सच कहूं तो मैंने सोच ही रखा था अपने दिमाग के किसी कोने में की जिस दिन झडूंगा, चाची के अन्दर ही झडूंगा |’

एक दिन चाची, चाचा के ऑफिस जाते ही नहाने चली गई और करीब चालीस-पैंतालीस मिनट बाद अच्छे से तैयार हो कर, मुझे दरवाज़ा अच्छे से लगा लेने और ठीक समय पर खाना खा लेने की हिदायत दे कर एक बैग उठा कर चली गई | पूछने पर सिर्फ़ इतना ही बोली कि, ‘ज़रूरी काम है.. शाम को ही आ पाऊँगी |’ अब तो मेरा शक और गहराया |

शक का बीज तो पहले ही बो गया था; अब चाची के इन बातों ने उस बीज को आवश्यक खाद-पानी भी दे गया | थोड़ी देर कुछ सोचा और फिर रोज़ की तरह अपने काम में लग गया | शाम को चाची उसी तरह एक बैग कंधे पर लिए घर आई और तुरंत अपने कमरे में घुस गई | उनकी चाल में भी कुछ परिवर्तन सा लग रहा था .... शायद लंगड़ा रही थी... दर्द से हल्का कराह भी रही थी --- मैं बिना कुछ बोले अगले दिन का इंतज़ार करने लगा |

अगले दिन चाचा के ऑफिस के लिए निकलते ही, आधे घंटे के बाद चाची नहाने के लिए जैसे ही बाथरूम में घुसी, मैं उनके कमरे में घुस गया और उस बैग को ढूँढने लगा | बैग का रंग ब्लैक और ग्रे के बीच का था | जिधर भी नज़र दौड़ा सकता था और जो भी उलट पुलट कर देख सकता था, मैंने सब देखा और किया पर कुछ हाथ नहीं लगा | मायूस होकर मैं लौटने ही वाला था कि मेरा नज़र एक बार के लिए पलंग पर गया और मैं झट से झुक कर पलंग के नीचे देखा ---

एक बैग नज़र आया !!
वह बैग मुझे पलंग के नीचे सिरहाने की ओर मिला --- मैंने बैग को काफ़ी सावधानी से नीचे से निकाला और खोल कर देखने लगा ... अन्दर एक कपड़े रखने वाला प्लास्टिक था ... मोटा वाला प्लास्टिक ... प्लास्टिक को खोला तो देखा वाकई उसमें कपड़े रखे थे ; पर वो साड़ी नहीं थी --- कपड़े को निकाल कर मैं देखना चाहता था पर मन हिचकिचा रहा था --- पर अगले दो मिनट में ही मेरी उत्सुकता ने मेरे मन पर विजय पाया और मैंने कपड़े बाहर निकालकर देखा और देखते ही मेरी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गई | वो कपड़े दरअसल, स्लीवलेस टॉप, (जोकि सामने से बहुत डीप नेक वाला था) और मैक्रो मिनी स्कर्ट थे !!!

क्रमशः

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09-12-2020, 12:43 PM,
#18
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग १८)

कुछ ही देर बाद चाची नहा धो कर बाथरूम से निकली ---

तब तक मैं अपने कमरे में पहुँच चुका था ...

अभी कुछ देर पहले जो कुछ देखा, उससे अभी भी आश्चर्य और असमंजस की स्थिति में था |

चाची का यूँ बैग छुपा कर रखना और उस बैग से ऐसे कपड़ों का मिलना चाहे और कुछ भी हो, कम से कम संयोग तो हरगिज़ नहीं हो सकता है ... तो क्या चाची इन कपड़ों को बाहर कहीं पहनती है? और अगर पहनती भी होगी तो क्यों और किसलिए?

और सबसे बड़ा प्रश्न – किसके लिए?

पौन घंटे बीता होगा कि चाची की आवाज़ आई,
“अभयssss..!! मैं मार्किट के लिए निकल रही हूँ | दरवाज़ा लगा दो.... शाम में लौटूँगी |”

मैं तो उनके निकलने के ही इंतज़ार में था ---

चाची एक गहरी नीली फ्लोरल साड़ी और मैचिंग शॉर्ट स्लीव ब्लाउज पहन कर, पिछवाड़ा मटकाते हुए घर से बाहर निकली | आज उनके स्तन युगल भी साड़ी के नीचे से थोड़े तने हुए से लग रहे थे ... उनके वक्षों के तने हुए होने की बात मैंने पिछले पाँच-छह दिनों से नोट किया था पर सही तरह से ध्यान आज दे पाया | उनके वक्ष तो सदैव ही से मुझे बेहद आकर्षक लगते रहे हैं; पर इन दिनों बात कुछ बदले – बदले से हैं .... और इतना ही नहीं, उनके चेहरे की रंगत भी कुछ खिली खिली सी लग रही है पिछले कुछ दिनों से --- चेहरे पर थकान बहुत ज़्यादा होने के कारण शायद मैंने या चाचा ने पहले नोटिस नही किया हो पर अब मैंने ये भी नोट कर लिया ... चाचा का मुझे पता नहीं |

खैर, मैं भी अगले पांच मिनट में तैयार हो कर घर का दरवाज़ा लॉक कर लपका चाची के पीछे | स्कूटर निकाल कर चाची के पीछे हो लिया | मोड़ के पास पहुँच कर देखा कि चाची एक पेड़ के नीचे खड़ी है और बार बार अपना रिस्ट वॉच देख कर सड़क के दाएँ - बाएँ देख रही है |

‘ह्म्म्म....किसी के आने का इंतज़ार हो रहा है |’ मैंने मन में सोचा ....

कुछ ही सेकंड्स के अन्दर एक काली वैन आकर चाची के सामने रुकी और चाची पलक झपकते ही उसमें बैठ गई |

‘अरे, ये तो वही वैन है |’ – सहसा मेरे मुँह से निकला .... मेरे इतना कहते कहते वैन आगे बढ़ चुकी थी --- अब और कुछ सोचने का समय न था |

पीछा करने के उद्देश्य से मैंने स्कूटर पर किक लगाया ; पर वह स्टार्ट नहीं हुआ ---

तीन – चार बार ऐसे ही किक मारा पर वह स्टार्ट न हुआ ...

झल्लाकर मैंने स्कूटर को बगल के एक दुकान के सामने खड़ी कर; दुकान वाले को उसपे ज़रा ध्यान देने को बोलकर सड़क को पार कर उसी जगह पहुँचा जहां थोड़ी देर पहले चाची थी और आने वाले हर टैक्सी को रुकने का इशारा करने लगा | तीन टैक्सी बिना रुके – देखे निकल गई और इधर मारे झुँझलाहट के मेरा पारा धीरे धीरे चढ़ने लगा था --- |

अभी एक और टैक्सी को रूकने का इशारा करता; उससे पहले ही एक नीली वैन आकर ठीक मेरे सामने रुकी | उसके शीशों पर काली फिल्म चढ़ाई हुई थी इसलिए अन्दर कौन बैठा या बैठे हैं ये जानना मुश्किल था --- अपने सामने एक अनजानी गाड़ी को अचानक से यूँ आकर खड़ी होते देखकर मुझे बेहद आश्चर्य भी हुआ और डर भी लगा ....

इससे पहले की मैं कुछ सोचता, ड्राईवर के बगल वाली सीट वाला कला शीशा नीचे हुआ......

अन्दर उस सीट पर आँखों पर काला चश्मा लगाए, होंठों में एक लम्बी सी सिगार सुलगाए एक आदमी बैठा था --- बिना कुछ बोले एक कागज़ का टुकड़ा बढ़ाया मेरी ओर उसने ---- कागज़ पर लिखे शब्दों को पढ़कर मैं आश्चर्य से उस आदमी को देखा |

जवाब में आदमी ने भावहीन चेहरा बनाए, सिर को ज़रा सा हिलाकर पीछे की ओर इशारा किया और इसके साथ ही वैन का पीछे का दरवाज़ा खुल गया --- उस कागज़ के टुकड़े को हाथ में मरोड़कर मुट्ठी में भींचते हुए मैं चुपचाप वैन के अन्दर बैठ गया --- मेरे बैठते ही वैन का दरवाज़ा बंद हुआ और वैन अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा |

(चाची कहाँ गई..? अपने मर्ज़ी से गई या किसी मजबूरी में...? वो नीला वैन किसका था और वो आदमी कौन था? कागज़ को पढ़कर अभय क्यों चौंका? वैन अभय को लेकर कहाँ गई??.................. जानने के लिए जुड़े रहिए इस कहानी के साथ |)

क्रमशः

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09-12-2020, 12:43 PM,
#19
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग १९)

अन्दर सीट बड़ा ही आरामदायक था | पर्दे लगे थे आस पास | एक मीठी, भीनी भीनी सी खुशबू फ़ैली थी अन्दर | अन्दर बैठने पर मैं ड्राईवर और उसके बगल में बैठे उस काले चश्मे वाले आदमी को देख नहीं पा रहा था और शायद वो भी मुझे नहीं देख पा रहे होंगे; क्योंकि उनके सीट के ठीक पीछे एक मेटलिक दीवार था जिस कारण मैं उनको देख नहीं पा रहा था और शायद वो मुझे | अभी और जायज़ा ले ही रहा था की तभी,

“हेल्लो अभय.. हाऊ आर यू?” – एक आवाज़ गूँजा |

मैं आवाज़ की दिशा की तरफ़ मुड़ा, सामने वाली सीट के ही बिल्कुल किनारे में एक छोटा टेप रेकॉर्डर सा बॉक्स रखा था --- आवाज़ वहीँ से आई थी --- मैं एकटक दृष्टि लगाए रखा उस पर --- आवाज़ दुबारा आई ..

“हैरान मत हो अभय, ये स्पीकर कम माइक्रोफोन है ---- तुम मुझे सुन सकते और मैं तुम्हे | ”

“जी, आप कौन?” – घबराये स्वर में मैंने पूछा |

“ह्म्म्म... आवाज़ क्लियर नहीं पहुँच रही होगी तुम तक शायद... इसलिए पहचान नहीं पाए ; मैं एक्स हूँ.. मिस्टर एक्स.. तुम्हारा शुभचिंतक |” – दूसरी ओर से आवाज़ आई |

“ओहह.. तो ये आप हैं ... जी, बड़ी ख़ुशी हुई आपसे मिलकर .. आई मीन, आपकी आवाज़ सुनकर |” – मैं अभी भी घबराया हुआ था |

“ह्म्म्म... थैंक्स, तुम पहले आदमी हो जिसे मुझसे मिलकर या मेरी आवाज़ सुनकर ख़ुशी हुई | खैर, तो अब ये बताओ की तुम भरी दिन में ही इस तरह से जासूसी क्यों करने लगे? तुम्हें मैंने समझाया था न कि इस तरह का कोई भी काम करने की गलती; गलती से भी मत करना...|” – दूसरी तरफ़ से आई आवाज़ में नाराज़गी साफ़ महसूस की जा सकती थी |

“मैं इसे तुम्हारी दृढ़ता समझूँ या ढीटता ....??” – फ़िर आवाज़ आई |

दो पल ठहर कर थोड़ी हिम्मत जुटा कर होंठों पर जीभ फ़ेर कर भीगोते हुए बोला, “अंग्रेजी में एक कहावत है, अ मैन इज़ जज्ड बाई हिज़ एक्शन नट बाई हिज़ इंटेंशन .. अब आप ही तय कीजिए.. मेरी इस हरकत को आप क्या नाम देना चाहेंगे?”

कुछ सेकंड्स की शान्ति छाई रही ---

और फ़िर आवाज़ आई,

“देखो अभय, मैं तुम्हे दिशा दे सकता हूँ, निर्देश नहीं.. और न आदेश | तुम्हें कौन सी बात माननी है और कौन सी नहीं माननी.. क्या करना है और क्या नहीं..ये सब तुम्हारे ही फैसलों पर निर्भर है --- अगर तुम्हें लगता है की हमसे तुम्हारा कोई फायदा नहीं तो तुम चाहो तो हमारे रास्ते अलग हो सकते हैं |”

इस बार चौंका मैं --- मेरी नादानी की वजह से कहीं मैं अपने इस अनजाने मददगार को खो न दूँ --- एक तो वैसे भी काफ़ी कुछ क्लियर नहीं है चाची या उनसे जुड़े घटनाओं और गतिविधियों के बारे में और ऊपर से इसकी ऐसी पेशकश ….. उफ़.. बुरा फँसा मैं ---!

मैंने जल्दी से बात को संभालने की कोशिश की ……

“जी, देखिये, बात मेरी परिवार की है --- चाचा और चाची, दोनों से ही मुझे बहुत प्यार मिला है --- तो फ़िर, ऐसे में जब उनके आस पास कोई संकट हो और चाची भी उस से घिरी हो; तो आप ही बताइए की क्या मैं चुप रह सकता हूँ ऐसे हालात में? कुछ तो करना ही था मुझे ; और जब तक पूरी विषयवस्तु अच्छे तरह से स्पष्ट नहीं हो जाती तब तक मैं सिवाए जासूसी के और कर भी क्या सकता हूँ ??”

इन तर्कों के साथ मैंने अपनी मजबूरी बतानी और नादानी छुपानी चाही | इधर स्पीकर से भी कुछ पलों के लिए कोई आवाज़ नहीं आई |; फिर अचानक से वही खरखराती आवाज़ गूँजी उन वैन में ....

“तुम्हारे बातों में दम है... पर एक बात बताओ...”

“जी, पूछिए...” – मैं तपाक से बोल पड़ा |

“तुम्हें इतना यकीं क्यूँ है की तुम्हारी चाची वाकई किसी मुसीबत में है....ऐसा भी तो हो सकता है की वो खुद कोई मुसीबत हो?? ”

इस बात ने जैसे एक बम सा गिराया मेरे सिर पर ....

“जी???...ज.....ज......जी, आ.... आप.... आप क्या कहना चाहते हैं?” – मेरे मुँह से शब्द किसी तरह निकले |

“मैं पक्के तौर पर कुछ भी कह रहा हूँ अभय, और न ही मैं ऐसे किसी नतीजे पर पहुँचा हूँ ... सिर्फ़ शक समझो इसे... क्या ये कोई हैरानी की बात नहीं कि जिस चाची के तुम किसी तरह के किसी संकट में होने बात कर रहे हो, परेशान रहते हो और इस बात को अब एक महिना होने को आ गया ; वो चाची अभी तक पूरी तरह से महफूज़ है | उसे कोई परेशानी ज़रूर है पर वो तुमसे या तुम्हारे चाचा से अभी तक शेयर नहीं की... चलो ठीक है, शायद परेशानी शेयर करने लायक नहीं हो .. पर ऐसी कौन सी परेशानी है जिससे वो सुबह शाम परेशान रहती है लेकिन फ़िर भी बहुत ही अच्छे तरीके से खुद ही हैंडल कर ले रही है?? सोचो अभय, ज़रा सोचो.. वो अक्सर घर से किसी न किसी बहाने निकलती है और देर शाम को या देर से घर लौटती है... अब ये मत कहना की आजकल कुछ दिनों से तुमने अपनी चाची को अपने साथ कोई बैग लाते हुए नहीं देखा... देखा तो ज़रूर होगा.. है ना ...? वो बैग क्यों लाती है और उस बैग में क्या होता होगा... इस बारे में सोचा तुमने? जानने की कोशिश की?”

जैसे जैसे उस आवाज़ ने कई सारे पॉइंट्स गिनाए और उन पॉइंट्स के साथ प्रश्न किए .. मैं सोच में डूबता गया और मेरी पेशानिओं में बल पड़ते गए | उस वैन में ऊपर की ओर दो साइड से दो छोटे छोटे टेबल फैननुमा पंखे लगे थे जिनसे अच्छी हवा भी मिल रही थी पर फ़िर भी मेरे माथे पर पसीने की कुछ बूँदें छलक आई थीं.. मैंने पॉकेट से रुमाल निकाल कर माथे को पोछा और इसी के साथ ही दूसरी ओर से आवाज़ आई,

“पोछ लो अभय, पसीने को पोछ लो... पर साथ ही मेरे दागे गए सवालों के बारे में भी सोचो |”

“क्या आप बता सकते हैं कि अभी मेरी चाची कहाँ होगी?” रूमाल को वापस पॉकेट में रखते हुए मैंने पूछा |

“बता सकता हूँ पर बताऊंगा नहीं .. इसकी अपनी वजह है --- खैर, तुम कल शाम साढ़े छह बजे फ्री रहना --- सात बजे तुम्हें योर होटल कम रेस्टोरेंट में पहुँचना है; वहां पहुँचने पर तुम्हें एक अलग ही चाची दिखेगी, आज और अभी वो जिसके साथ होगी, कल भी उसी के साथ होगी और आज जो कर रही होगी शायद कल भी वही करेगी.. मैं चाहता हूँ की तुम खुद अपनी आँखों से सब देखो |”

संशय भरे लहजे में मैंने पूछा, “आं... म्मम्म... पर आप खुद भी तो बता सकते हैं..”

“हाँ, ज़रूर बता सकता हूँ पर बताना आसान नहीं है.. बेहतर यही होगा की कल तुम खुद ही सब देख आओ |”

कुछ सोचते हुए मैं बोला,

“पर मैं ऐसे ही तो नहीं जा सकता न.. मेरा निजी अनुभव कहता है कि वो लोग और वो जगह बहुत खतरनाक है |”

“हाँ, सही कह रहे हो .... अपने सीट के नीचे देखो --- एक बैग होगा वहाँ |” – दूसरी ओर से आवाज़ आई |

मैंने तुरंत सीट के नीचे देखा, एक काले रंग का मध्यम आकार का बैग रखा था |

“बैग को निकालो और खोल कर देखो |” – फ़िर आवाज़ आई |

मैंने उस आवाज़ के कहे अनुसार तुरंत उस बैग को सीट के नीचे से निकाला और चेन खोल कर अन्दर देखा ; हल्के नारंगी रंग के कपड़े रखे थे, शायद ब्लेजर होगा | एक पैंट भी था .. नारंगी रंग का और साथ था एक सफ़ेद शर्ट |

मैं आश्चर्य और आँखों में ढेर सारे प्रश्न लिए उन कपड़ों को अभी देख ही रहा था कि फ़िर से आवाज़ आई –

“हैरानी हो रही होगी तुम्हें और साथ ही सोच भी रहे होगे की ये सब आखिर क्या है?... हैरान न हो.. ये कपड़े दरअसल उसी योर होटल के वेटर्स के यूनिफार्म में से एक है ; कल तुम्हें इन्हीं कपड़ो में योर होटल में जाना है --- इससे लोग तुम्हें उसी होटल का ही एक वेटर समझेंगे --- कई बार होटल का मालिक ख़ास मौकों पर वेटर की कमी होने पर बेरोज़गार लड़कों को एक रात के लिए काम पर रख लेता है ; और अगले दिन अच्छी खासी रकम देकर अलविदा कर देता है --- यहाँ एक बड़ी बात ये है की वो एक बार लड़कों को रखने के बाद दोबारा उनकी जांच नहीं करता इसलिए तुम बेफ़िक्र हो कर वहाँ घुस सकते हो और फ़िर सावधानी से अपना काम कर के निकल सकते हो.... और हाँ, तुम्हें कपड़े कहाँ बदलने हैं, होटल में घुसने के बाद तुम्हें क्या क्या करना है, कैसे सर्विस शुरू करनी है...ये सब इसी बैग में एक पेपर में लिख कर रखा हुआ है ; घर जा कर अच्छे से पढ़ लेना... ओके? ”

“ओके ... मम्मम...एक बात और, प्लीज़ एक हिंट दे दीजिये कि चाची वहां अगर होगी तो क्या कर रही होगी? ”

“ह्म्म्म,... चलो ठीक है, एक छोटा सा हिंट तो दे ही सकता हूँ, वहां तुम्हारी चाची खातिर मदारत करती है वीवीआईपी टाइप के मेहमानों का | ”

मैं चकराया, ये क्या कहा इसने?

पूछा,

“जी, एक बार फ़िर से दोहराएँगे आप.. अभी अभी आपने जो कहा, मैं उसका मतलब समझा नहीं |”

“मेहमान नवाज़ी करती है | ” – आवाज़ इस बार थोड़ा गंभीर सा लगा |

कुछ देर और चलने के बाद एक जगह गाड़ी रुकी और इतने में उस स्पीकर से आवाज़ आई,

“तुम जा सकते हो अभय, अभी तुम्हारे घर में कोई नहीं है --- उस पेपर में लिखे इंस्ट्रक्शन्स को पढ़ने मत भूलना --- जो और जैसा लिखा हुआ है बिल्कुल वैसा ही करना --- होटल के अन्दर जाने के बाद सब कुछ तुम्हारे कॉमन सेंस और सावधानी पर डिपेंड करेगा --- अपनी तरफ़ से बात बिगड़ने मत देना और अगर फ़िर भी कुछ ऐसा वैसा हो गया तो वहां मेरे आदमी होंगे मामले को सँभालने के लिए .... अब जाओ | गुड बाय |”

“पर मिस्टर एक्स, मैं आपके आदमी को पहचानूँगा कैसे ?” – अत्यंत कौतुहलवश मैं पूछ बैठा |

दो क्षण रुक कर आवाज़ आई,

“टेक केयर अभय |”

और इसी के साथ एक हल्की, खट सी आवाज़ आई दूसरी ओर से | फ़िर सब शांत.... सम्बन्ध विच्छेद हो गया था | मिस्टर एक्स मदद तो करना चाहते हैं पर बहुत ही सीमित रूप से | वैन का दरवाज़ा खुला | मैं सावधानी से बैग लेकर बाहर निकला | घर से कुछ ही दूरी पर था, मोड़ को क्रॉस कर चुका था | एक कदम आगे बढ़ कर वैन से थोड़ा दूर हुआ | देखा, सामने वाले सीट पर का शीशा उठा हुआ है | काला शीशा | वैन से थोड़ी दूरी बनते ही वैन स्टार्ट हुई और आगे निकल गई |

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घर पहुँच कर देर तक आने वाले कल के बारे में सोचता रहा | शाम को उसी तरह चाची कंधे पर एक बैग लटकाए घर आई | उस समय मुझे उनके हावभाव और शायद चेहरे के नक़्शे भी कुछ बदले बदले से लगे; मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया ... और दूं भी क्यों ? चाची तो बहुत पहले से ही बदलने लगी थी | वैसे भी मैं, मेरे मन में पहले से ही चल रहे बहुत से विचारों के उधेरबुन में फँसा हुआ था |

रात को डिनर के समय, मैंने अनजाने में चाची को गौर से देखा, पहले से थोड़ी और भरी भरी सी काया लग रही थी उनकी ---

चेहरे पर भी एक अलग ही ग्लो था; शायद फेसिअल की वजह से हुआ हो ---

पर था बिल्कुल ही एक अलग ही चमक उनके चेहरे पर ... गाल जैसे पहले से और ज़्यादा गोरे और लाल लग रहे थे --- उनके चेहरे का एक अलग ही आकर्षण बना हुआ था | अपनी ओर एकटक मुझे देखते देख चाची मुस्कुराई पर साथ ही थोड़ी संजीदा सी हो गई |

चाची – भतीजे में हल्की नोंक-झोंक भी हुई पर पूरे समय संजीदगी से पेश आई और ऐसा लगा जैसे वो मेरे चेहरे के साथ साथ मेरे मन में क्या चल रहा है उसे भी पढना चाह रही हो | मैंने भी काफ़ी सतर्कता का परिचय दिया और कई सारी बातों को अपने तक ही सीमित रखा |

चाची का इस प्रकार संजीदगी दिखाना मुझे थोड़ा अजीब लगा क्योंकि चाची थोड़ी बच्ची और खिलंदरी टाइप की महिला है | बातों को ज़्यादा घूमा फिरा कर कहना या किसी विषय पर बहुत ज़्यादा सीरियस हो कर कुछ कहना तो जैसे उनको आता ही नहीं था; उनके स्वाभाव में ही नहीं था ....

पर आज उनके चेहरे और आँखों ने कुछ अलग ही कहानी पेश करनी चाही --- |

अब तो ये पूरा मामला मेरे लिए और भी अधिक रोमांचकारी और जिज्ञासा भरा हो गया था ...

रात में काफ़ी देर तक उस कागज़ के में दिए गए दिशा-निर्देशों एवं पूरे प्लान को पढ़ते रहा, जो मिस्टर एक्स ने दिया था मुझे ... --- अंत में दो-तीन सिगरेट खत्म कर, अगले दिन एक अलग ही काम करने के रोमांच को तन मन में समेटे मैं सोने चला गया |

क्रमशः

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Reply

09-12-2020, 12:46 PM,
#20
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २०)

अगले दिन,

पूरा दिन संदेह, संशय और घबराहट के बादलों के बीच बीता ......

शरीर का रोम रोम अत्यंत रोमांच से भरा हुआ रहा ....

आज जिस तरह का जासूसी मैं करने वाला था, वो पहले कभी नहीं किया था मैंने .....

पहली बार ऐसे किसी प्लान का हिस्सा बन कर बड़ा ही अजीब वाला ख़ुशी मिल रहा था ....

दिल ज़ोरों से धड़के जा रहा था और मन बार बार कई तरह के आशंकाओं से भरे जा रहा था --- चाचा के ऑफिस निकल जाने के बाद चाची थोड़ी देर के लिए मार्किट के लिए निकली थी , जब आई तब उनके हाथ में कुछ प्लास्टिक बैग्स थे --- मैंने ध्यान नहीं देने का नाटक किया और अपने काम में लगे रहा ; पर चाची के नहाने के लिए बाथरूम घुसते ही मैं दौड़ कर उनके कमरे में गया और उन बैग्स को चेक किया | सब में तरह तरह के कपड़े थे,.... किसी में टॉप नुमा तो किसी में नई साड़ी ब्लाउज, इत्यादि --- | मेरे मतलब का कुछ खास नहीं मिलने पर मैं चुपचाप उनके कमरे से निकल आया | पूरा दिन हम दोनों का किसी न किसी काम में व्यस्त रहते हुए बीत गया | बीच बीच में रह रह कर चाची के चेहरे पर चिंता की कुछ लकीरें उभर आती थीं पर साथ ही उन्हें किसी बात को लेकर बहुत कन्फर्म भी दिखाई दे रहा था | दोपहर में चाचा को उनके ऑफिस फ़ोन कर अपने किसी सहेली के यहाँ जाने का बहाना कर दी, ये भी कहा की उन्हें शायद पूरी रात अपनी सहेली के यहाँ ही बीतनी पड़े; इसलिए वो (चाचा) कोई चिंता नहीं करे |

शाम पाँच बजे से ही तैयार होने लगी चाची ....

मेरे पूछने पर भी उन्होंने वही सब कुछ दोहराया जो उन्होंने चाचा को सुनाया था ....

ठीक ठाक ही मेकअप किया उन्होंने --- एक अच्छी सी साड़ी पहनी , बढ़िया परफ्यूम लगाया --- वक्ष: स्थल पर नज़र डालने पर ऐसा प्रतीत होता था कि शायद उन्होंने आज अन्दर एक पुश-अप ब्रा पहना है | देखने में बहुत हसीं लग रही थी .... ठीक सवा छ: बजे वो घर से निकल गई | मैंने छत पर से देखा, घर से दूर, वह ठीक मोड़ वाले वाले रास्ते को क्रॉस कर एक पेड़ के नीचे खड़ी हो गई | मुश्किल से पाँच मिनट हुए होंगे कि एक काली वैन आ कर रुकी चाची के सामने और चाची के उसमें सवार होते ही वो वैन चल पड़ी |

अब तैयार होने की बारी मेरी थी ....
मैंने उस कागज़ में लिखे बातों को एक बार फिर से पढ़ा और तय किये गए समय के मुताबिक घर से निकल गया ठीक पौने सात बजे | मैं भी उसी मोड़ वाले रास्ते को पार कर रोड के दूसरी तरफ़ खड़ा हो गया | कुछ सेकंड्स में ही वही वैन (पहले वाले दिन) आकर रुकी --- मैं उसमें सवार हो गया --- घर से वही बैग लेकर निकला था --- गाड़ी में बैठे बैठे ही मैंने वेटर वाले कपड़े पहन लिए और दूसरे कपड़े को उसी बैग में रख कर सीट के नीचे रख दिया --- चेहरे पर कुछ मेकअप पोता और एक घनी पर पतली मूंछ लगाया और थोड़ी बड़ी हुयी नकली दाढ़ी भी | इसके बाद मैंने अपना हेयर स्टाइल भी बदला .... अब मेरा हुलिया बिल्कुल बदल गया ... कोई माई का लाल मुझे पहचान पाने में सक्षम नहीं था --- |

अब इंतज़ार था असल एक्शन का |

कुछ ही देर में होटल के सामने था |

गाड़ी कुछ दूरी पर रुकी थी ...

मैं वैन से उतर कर मन ही मन भगवान को याद करता हुआ पूरे आत्म-विश्वास के साथ होटल की ओर बढ़ गया --- कागज़ में लिखे मुताबिक मेरे ब्लेजर के अंदरूनी पॉकेट में एक कागज़ सा टोकन होगा --- उस टोकन को होटल के मुख्य द्वार पर खड़े दरवान को दिखा कर अन्दर घुसना था .... मैंने ऐसा ही किया --- दरबान ने टोकन देखते ही बड़े ही आदर से तुरंत ही गेट खोल कर हाथ सीधा कर अन्दर जाने का इशारा किया | अन्दर जा कर मैं सीधे ड्रिंक्स वाले काउंटर में चला गया | वहां नीली शर्ट पहने, आँखों में चश्मा लगाए एक आदमी ड्रिंक कर रहा था --- मैं उसके बगल में जाकर खड़ा हुआ और थोड़ा अदब के साथ सिर को झुकाते हुए बोला,

“एनीथिंग एल्स यू वुड लाइक टू हैव ........सर?” ‘सर’ शब्द पर मैंने एक खास लहजे से जोर डाला |

सुनते ही वह आदमी एकदम से मेरी ओर पलटा ओर ऊपर से नीचे तक अच्छे से देखने के बाद हल्का सा मुस्कराया और अपने दायें हाथ की तर्जनी उंगली दिखाते हुए ‘ना’ का इशारा किया |

मैं समझ गया |

ये इशारा है....! मतलब की कोई खतरा नहीं... काम पर लग जाओ .... मैं तुरंत वहां ऑर्डर्स लेने लगा | एक से ढेर घंटे इसी तरह काम करता रहा | नौ बजने में कुछ मिनट्स बाकी होंगे ... की तभी एक आदमी ने एक ऊँचे से जगह से माइक के सहारे ये अनाऊंस किया कि, ‘अब कुछ ही देर में हमारे स्पेशल गेस्ट्स आने वाले हैं, प्लीज़ शांति बनाये रखें |’

थोड़ी देर में वहां बहुत से अमीर आदमियो का जमावड़ा लग गया | एक से एक स्मार्ट तो एक से एक भद्दे से शकल सूरत वाले लोग थे | जितने भी लड़के वेटर थे उन लोगों को कुछ समय के लिए काउंटर के साइड या पीछे तरफ़ खड़े होने को कहा गया | मैं किसी के नज़रों में आने से बचने के लिए सब के पीछे जा कर खड़ा हो गया | करीब दस मिनट बाद वहां बहुत सी लड़कियाँ और औरतें आ कर खड़ी हो गई और जो काम हम कर रहे थे, मतलब वेटर का वो काम अब वो लोग करने लगी --- सब के ड्रेस बहुत ही बेशर्मी से बहुत खुले खुले से थे --- किसी के शर्ट के बटन सारे खुले थे तो किसी ने बिना साड़ी पहने बड़े गले का ब्लाउज-पेटीकोट पहन रखे थे --- कई ऐसी भी लड़कियां थीं जो सिर्फ ब्रा-पैंटी में ही लोगो से ऑर्डर ले रही थीं ; पर मुझे इन सब में सभी कोई रूचि नहीं थी ... मेरी आँखें बेसब्री से चाची को ढूँढ रही थी ..... बैकग्राउंड में गाना बज रहा था, ‘रात बाकी, बात बाकी ... होना है जो... हो जाने दो...’ कुछ लडकियां और औरतें नाचते हुए उन अमीर लोगों के पास जाती है और उनको पकड़ कर डांस फ्लोर पर ले गई | थोड़ी देर के डांस के बाद उनके हाथ पकड़ कर सीढ़ियों से ऊपर ले जाने लगी | बगल वाले एक वेटर से पता चला की आज रात ये लडकियां और औरतें इन्हीं अमीरजादो के बिस्तर गर्म करेंगी --- इन अमीरजादों में कई विदेश में बसे दो नंबर का धंधा करने वाले बड़े बिजनेसमैन या फिर गैंगस्टर्स हैं | यहाँ इस होटल में जब मन करे आ जा सकते हैं .... किसी न किसी पुख्ता कारण से पुलिस भी इनपर हाथ नहीं डालती है |

मैं अभी इन सभी बातों को सुन ही रहा था की मेरी नज़र सीढ़ियों पर चढ़ते एक आदमी और एक औरत पर ठहर गई | आदमी कोई शेख़ सा लगा | मैंने औरत पर गौर किया और ऐसा करते ही दिमाग घूम गया मेरा ... वो औरत और कोई नहीं, मेरी चाची ही थी ...! और...और..ये क्या ड्रेस में?? एक सफ़ेद शर्ट जिसके बटन सारे खुले थे और शर्ट के निचले दोनों सिरे आपस में एक गाँठ देकर बंधे हुए थे ... पेट और कमर का थोड़ा सा हिस्सा दिख रहा था .... कमर पर उन्होंने एक मैक्रो मिनी स्कर्ट भी पहन रखा था ... पक्की स्लट लग रही थी |

मैं सबकी नज़र बचाते हुए फ़ौरन उनके पीछे पीछे सीढ़ियों पर चढ़ने लगा ...

काफ़ी लम्बी और घुमावदार सीढ़ी थी --- सीढ़ियों के ख़त्म होते ही एक लम्बा सा कॉरिडोर शुरू हुआ जिसके दोनों तरफ़ कमरे थे --- थोड़ी चहल पहल भी थी ... | बहुत सावधानी से चाची के पीछे पीछे चलते हुए, दूसरे लोगों को हाई हेल्लो करता हुआ आगे बढ़ रह था मैं --- इस पूरे दौरान वह आदमी कभी चाची को चूमने की कोशिश करता तो कभी उनके पिछवाड़े पर अपना दायाँ हाथ रख कर हलके से मसल देता --- उसके हरेक बेहूदी हरकत को चाची हँस कर टालने की कोशिश कर रही थी | थोड़ी ही देर में दोनों एक कमरे एक आगे आ कर रुके ... चाची ने उस आदमी की ओर बड़ी कामुक मुस्कान देते हुए अपनी क्लीवेज की गहराइयों में दो ऊँगली डाली और एक चाबी निकाल ली और फ़िर उसी चाबी से उस कमरे का दरवाज़ा खोल कर उसमें घुस गई .... वह आदमी भी चाची के पीछे पीछे अन्दर घुसा और दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दिया --- उस कमरे के दरवाज़े के आगे पहुँच कर मैं बड़ी आतुरता से इधर उधर देखने लगा | मुझे कमरे के अन्दर होने वाली हरेक गतिविधि के बारे में जानना था और इसके लिए मेरा, उस कमरे के अन्दर देख पाने के लिए सक्षम हो पाना अत्यंत आवश्यक था --- अधिक समय नहीं लगा --- एक चीज़ पर नज़र पड़ते ही आँखें चमक उठी मेरी |

कमरे में एक सॉफ्ट इंस्ट्रुमेंटल थीम सोंग बज रहा है और चाची अपनी सेक्सी अदाओं से एक शेख़ टाइप के आदमी को रिझाने का प्रयास कर रही है ...

शेख़ एक बड़े से आरामदायक सोफ़े पर बैठ कर एक हाथ में ड्रिंक का ग्लास और दूसरे में सिगार लिए चाची के भरे जिस्म के हरेक कटाव को बड़े चाव और खा जाने वाली नज़रों से देख रहा था .... |

चाची अलग अलग नृत्य मुद्राएँ दिखाते हुए थोड़े देर में उस शेख़ के करीब आई और थोड़ा सा आगे झुक कर शेख़ को अपने हृष्ट क्लीवेज का दीदार कराते हुए, अपने पेट पर बंधी शर्ट की गाँठ खोल कर धीरे धीरे अपने जिस्म से अलग कर एक ओर उछाल दी | चाची के गोरे से शरीर पर अब केवल एक छोटी साइज़ की ब्रा और कमर पर भी एक छोटी साइज़ की पैंटी रह गई थी जो ढकने से ज़्यादा दिखाने का काम अधिक कर रही थी ... चाची के जिस्म के ऊपरी हिस्से में रह गई छोटी काली रंग की ब्रा भी कुछ ऐसी थी कि उनमें उनके यौवन के भारी दो कबूतर (चुचियाँ) समा नहीं पा रहे थे | मध्य आयु का शेख़ आँखें फाड़े चाची के अर्ध नग्न जिस्म को मानो आँखों से ही निगल जाने के लिए बुरी तरह बेताब हो चुका था ... साला वो खूंसट सा शेख़, काली ब्रा की सीमाओं को तोड़कर खुले में उड़ पड़ने को तैयार ब्रा कप्स में कैद उन दो सफ़ेद से कबूतरों को ललचाई नज़रों से देख देख कर अपने होंठों पर हवसी पागलों जैसे जीभ फिराने लगा ... उस कमीने की हालत ऐसी थी जैसे वो खुद बहुत मैच्यौर किस्म का हो जिसे ऐसे बातों से जल्दी फर्क नहीं पड़ता ... पर सच्चाई तो यह थी की लाख कोशिश करने के बावजूद भी वो खुद को चाची के भरे यौवन के मोहपाश से छुड़ा नहीं पा रहा था | वो अपनी आँखें चाची के जिस्म के दूसरे जगहों पर देना चाहता था पर ब्रा कप्स में कैद उन्नत यौवन उसे ऐसा करने की हरगिज़ कोई इजाज़त नहीं दे रहे थे |

चाची की चमकदार आँखों में खूबसूरती से लगे काले रंग की मसकरा (काजल) रह रह कर उस आदमी को जैसे अपनी ओर दौड़ कर आने का खुला निमंत्रण दे रही थी ; लाल लिपस्टिक से पुते उनके होंठ तो जैसे उस आदमी को मार देने का सुपारी लिए थी... |

चाची की बीच बीच में लचकाती – बलखाती कमर शेख़ के दिल के धड़कन को बार बार कई गुना अधिक बढ़ा दे रही थी और सच कहूं तो मैं भी चाची के इस कातिलाना रूप के मोहपाश से अछूता नहीं रह गया था |
उस चोर खिड़की से देखते देखते न जाने कब मेरा एक हाथ पैंट के ऊपर से अपने हथियार को रगड़ने लगा था ; और मेरा हथियार कोई ऐसा वैसा हथियार न होकर एक जहरीले नाग में बदल चुका था जिसे मानो अब सांस लेने बहुत दिक्कत हो रही थी और अब वह किसी भी तरह कैद से आज़ाद हो कर ; बाहर आ कर अपना कहर बरपाना चाहता था | वह शेख़ अपने सिगार के कश लगाना और ग्लास में बची खुची ड्रिंक को ख़त्म करने के बारे में कब का भूल चुका था ... वह मंत्रमुग्ध सा एकटक चाची के हरेक कमसिन हरकत को देख रहा था | चाची को उसे अपनी तरफ़ यों देखते हुए शायद बहुत अच्छा लगा था क्योंकि उस शेख़ को देखते हुए वो भी अब हलकी हलकी विजयी मुद्रा वाली स्माइल देने लगी | शेख़ की हालत देख कर वो समझ चुकी है की शेख़ अब और कुछ भी ज़्यादा सोचने समझने की शक्ति को खो चुका है और यही बात शायद चाची को एक गर्व से परिपूर्ण मुस्कराहट देने के लिए विवश कर रहा था | चाची के चेहरे पर ऐसे गर्वित भाव और मुस्कान मैंने आज से पहले कभी नहीं देखा था |

वो शेख़ अपनी सुध बुध खो चुका था इसलिए वो अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रहा है --- वह पूरी तरह से चाची के रूप यौवन के समुंदर में डूब चुका था --- चाची शायद इसी पल के इंतज़ार में थी --- वह इठलाती-बलखाती अपने नाज़ुक पैरों को सामने की ओर आरी तिरछी रखते हुए उस शेख़ के पास आई और आकर आँखों और चेहरे में कामुकता लिए उस शेख़ के आँखों में आँखें डाल कर देखने लगी मानो कह रही हो कि ‘क्या मैं ही सब करुँगी, तुम कुछ नहीं करोगे?’ ..... | वह आदमी चुपचाप एकटक चाची को देखता रहा ... | चाची ने उसके दोनों हाथों से सिगार और ग्लास लेकर बगल के टेबल पर रखा और फिर दोनों हाथ पकड़ कर सहारा देते हुए उस आदमी को उठाई --- वह आदमी चुपचाप उठ कर चाची को देखे ही जा रहा था, ऊपर से नीचे, वक्षों की गोलाईयाँ, कमर का कटाव, हृष्ट पुष्ट पिंडलियाँ, सुंदर गोरे तराशे हुए पैर .... सबको को निगल जाने वाली नज़रों से देख रहा था .... ऐसा लग रहा है मानो उसके होंठों के एक किनारे से लार की एक पतली सी धार बह रही है | चाची को इतने पास पाकर अब तो जैसे उसके सब्र का बांध टूट ही गया --- बरबस ही उसके हाथ चाची के जिस्म के चारों ओर लिपट गये | साथ ही चाची को खिंच कर अपने जिस्म से कस कर सटा लिया --- चाची के सिर को किस करने के बाद हलके से दोनों गालों को चुमा और फिर बड़े प्यार से चाची के होंठों से अपने होंठों को रगड़ने लगा .... |

कुछ मिनट प्यार से होंठों से होंठों को रगड़ते हुए अपने दोनों हाथों को पीछे ले जा कर चाची की गदराई पीठ का मसल मसल कर आनंद लेने लगा और फ़िर अपने जीभ को थोड़ा सा निकाल कर चाची के होंठों पर चलाने लगा | कुछ सेकंड्स में ही चाची ने आँख बंद करते हुए अपने होंठों को खोल दिया और उनके ऐसा करते ही उस आदमी की जीभ चाची के मुँह में घुस गई --- जीभ को कुछ देर तक अन्दर घुसाए चाची के पूरे मुँह का जाएजा लेता रहा | फ़िर अचानक से ही जीभ निकाल कर चाची की ओर कातर दृष्टि से देखने लगा मानो किसी बात की विनती कर रहा हो | चाची ने भी जैसे अपने मदहोश कर देने वाले नैनों से उसे उसकी मौन विनती की स्वीकृति दे दी और साथ ही अपनी नंगी कलाइयाँ उस आदमी के गले में हार बना कर रख दी |

और ऐसा होते ही दोनों एक दूसरे पर टूट से पड़े --- दोनों एक दूसरे को अपने बहुत पास खिंच कर चुम्बनों की जैसे वर्षा ही कर दी ... अधिक समय नहीं लगा दोनों के जीभ एक दूसरे के अन्दर जाने में .... अब तो दोनों ही बहुत उत्तेजित नज़र आने लगे थे | दोनों ही को अब अपने आस पास की कोई सुध बुध ना रही --- मिस्टर एक्स के कहे मुताबिक चाची वाकई में एक बहुत ही बेहतरीन मेहमान नवाजी कर रही है .. ! अपने काम को बखूबी करना कोई चाची से सीखे ! देख कर लग ही नहीं रहा है कि वो ये सब किसी मजबूरी से कर रही है ... चाची के इस रूप को देख कर अब तो मैं भी उनका दीवाना सा बन कर रह गया --- और विशेषकर उनके कामेच्छा से भरी काम क्रियाओं ने उनके प्रति मेरी कामासक्ति को और कई गुना अधिक से अधिक बढ़ा दिया | इधर उस शेख़ ने अपने जीभ को अलग करके धीरे धीरे चाची के उन्नत वक्षों की ओर बढ़ा और दोनों उन्नत उभारों के बीच से सुस्पष्ट रूप से नज़र आने वाली घाटी अर्थात क्लीवेज के ऊपरी सिरे पर प्यार से एक किस किया | फ़िर थोड़ा रुक कर तीन – चार चुम्बन लिया उसी जगह पर और फ़िर खुद को और न रोक पाते हुए उसने अपने होंठ उस पांच इंच झांकती क्लीवेज में रख दिया और धीरे धीरे होंठों के साथ साथ पहले उसका नाक और फ़िर उसका आधा से थोड़ा ज़्यादा तक का मुँह उस क्लीवेज में समा गया और बड़े प्यार से, हौले हौले, दोनों चूचियों को दाबते हुए अपने चेहरे पर साइड से दबाव बढ़ाने लगा | ये शायद चाची के कामाग्नि में घी डालने जैसा ही था |

चाची के मुँह से ‘आह..उह्ह्ह...’ की सिसकारी छूट निकली ... वह अधेड़-सा शेख़ सा दिखने वाला आदमी लगातार अपने मुँह को क्लीवेज में घुसाए, चेहरे के दोनों ओर से चूचियों को दबा कर उनकी नरमी और गर्मी का एहसास किये जा रहा था और इधर चाची धीरे धीरे ही सही, पर भरपूर गरम हुए जा रही थी | इधर वो शेख़ क्लीवेज में मुँह घुसाए, ‘चुक..चुक’ सी आवाजें ऐसे निकाल रहा था जैसे मानो वो पूरे क्लीवेज का ही रसास्वादन चूस चूसकर कर लेना चाहता हो .... अपने रूखे हाथों से वह चाची की कोमल गदराई पीठ पर हाथ फिरा-फिरा कर उस पीठ का मस्ती से आनंद लेता हुआ ब्रा के हुक खोल दिया और फ़िर पागलों की तरह पूरे पीठ पर बेरोक-टोक हाथ घुमाने लगा | ब्रा स्ट्रैप्स को धीरे धीरे अलग करते हुए, गले को चाटते हुए, कोमल, स्मूथ कन्धों के ऊपर से नीचे सरकाने लगा --- चाची किसी भी तरह की कोई बाधा नहीं दी --- काले ब्रा स्ट्रैप्स आधे गोरी बाँहों तक आ गए थे --- ब्रा कप्स तो जैसे चाची के वक्षों से चिपक ही से गए हों --- हद से ज़्यादा, बहुत ही कमसिन लग रही थी चाची --- अभी तो पोर्न स्टार्स भी फ़ेल लग रहे थे चाची के सामने ... ब्रा स्ट्रैप्स को वैसे ही छोड़ वह आदमी फ़ौरन अपने दोनों हाथ चाची के कमर पर ले गया और वहां से सीधे उनके नितम्बों पर, पैंटी के ऊपर हाथ रख कर नितम्बों को ज़ोर से मसल कर दबाने लगा |

“आह्ह्ह्ह.....” चाची मारे दर्द के कराह उठी |

अभी मैं कुछ और देखता की तभी एक जोड़ी जूतों की आवाज़ आई .... मैं जल्दी से स्टूल से उतर कर, स्टूल को एक तरफ़ रख, बाथरूम में घुस कर दरवाज़ा लगा दिया .... वह जूतों का मालिक सधे क़दमों से चलता हुआ बाथरूम के बंद दरवाज़े के पास आ कर कुछ देर के लिए रुका ; और फिर आगे बढ़ गया --- मैं दरवाज़े से कान लगाए उसके कदमों के आहट को सुनता रहा --- धीरे धीरे उन कदमों की आवाज़ मंद होती चली गई .... जब आवाज़ आनी बिल्कुल बंद हो गई तब मैं धीरे से बाथरूम का दरवाज़ा खोला और बाहर आ गया ... चाची की काम क्रियाएँ देखने का समय नहीं था मेरे पास अभी ... मैं शीघ्रता से उस लम्बे कॉरिडोर में आगे बढ़ने लगा ... अभी कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि एक रूम से आती कुछ आवाजें और सिगरेट के धुंए के गंध ने मुझे रूक जाने को विवश कर दिया ... मैं आहिस्ते से उस कमरे की ओर मुड़ा और अन्दर से बंद दरवाज़े के की-होल से अंदर देखने की चेष्टा करने लगा ... कुछ लोग अंदर बैठे सिगरेट के धुएं उड़ाते हुए, ग्लासों में जाम छलकाते हुए कहकहे लगा रहे थे | अधिकतर ने काले चश्में और कोट-टाई पहने हुए थे..... उनके चेयर के नीचे कुछ ब्रीफकेसेस भी रखे थे |

“हम्म्म्म.... ज़रूर यहाँ कोई सौदा हो रहा था, जोकि शायद अब सफ़ल हो गया है लगता है |” मैंने मन ही मन कहा .... |

अभी कुछ और देखता-सुनता या समझता ; तभी एक ज़ोरदार कोई चीज़ मेरे सिर के पीछे आ लगी और बिना एक सेकंड गवांए, मेरे आँखों के आगे धीरे धीरे अँधेरा छाने लगा और मैं वहीँ गिर कर बेहोश हो गया |

क्रमशः

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