Kamukta kahani अनौखा जाल
09-12-2020, 12:46 PM,
#21
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २१)

बहुत ही पीड़ा के साथ आँख धीरे धीरे खोल पाया मैं ... सिर के दाएँ तरफ़ अभी भी बहुत दर्द है --- और दर्द भी ऐसा के दर्द के मारे मुँह से ‘आह’ भी नहीं निकल रहा है | जहाँ पर लेटा था मैं, वहीँ से लेटे लेटे ही अपने चारों और नज़र घूमाया | आसपास के चीज़ों को देखने के बाद मैं समझ गया कि मैं इस समय एक अस्पताल में हूँ --- अस्पताल में होने का ख्याल आते ही मेरा हाथ अनायास ही सिर पर चला गया; ठीक उसी जगह जहाँ दर्द हो रहा था चोट के कारण .. हाथ लगाकर अनुभव किया की पट्टी बंधा था --- वाह! अर्थात मेरा उपचार भी हो गया ! उठने की कोशिश करने के बावजूद भी उठ न सका मैं --- बहुत कमजोर-सा फील कर रहा था --- चुपचाप लेटा रहा --- थोड़ी ही देर बाद उस रूम के दरवाज़े पर एक हलकी सी आहट हुई .. मैं पूर्ववत आँख बंद कर चुपचाप पड़ा रहा |

‘खट खट’ सी आवाज़ हुई रूम में .. चलने की आवाज़ थी और आवाज़ से ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था कि ये हील की आवाज़ है और रूम में एक लड़की/ औरत आई है | मेरे बगल के कुर्सी और टेबल के थोड़ा इधर उधर होने की आवाज़ आई | फ़िर, वो जो कोई भी थी; मेरे पास आ कर कुछ देर खड़ी रही | न जाने ऐसा क्यूँ लग रहा है की वो बगल में खड़ी हो कर मुझे ही देखे जा रही है | तीन-चार मिनट वहां रह कर वो वापस बेड के मेरे पैरों के पास से होते हुए मेरे दूसरे ओर आकर सिरहाने खड़ी हो गई और आसपास की चीज़ों के साथ कुछ करने लगी ; फिर प्लास्टिक फाड़ने की आवाज़ आई ---

दो सेकंड बाद ही ‘टन टन’ से एक छोटी सी शीशी के बजने की आवाज़ आई .... | थोड़ी सी शांति छाई रही | फ़िर अचानक से मुझे मेरे दाएँ बाँह पर एक बहुत तेज़ चुभन सी महसूस हुई | मुँह से कराह निकलने को रहा पर किसी तरह मुँह बंद रखने में सफल हुआ | ‘खट खट’ सी आवाज़ फिर हुई | वो जो भी थी, अब वापस जा रही थी .... इधर मेरा दिमाग धीरे धीरे सुन्न होने लगा... हाथ तो छोड़िये, अँगुलियों तक की हरकत बंद हो गयी ... मैं धीरे धीरे अपनी चेतना फिर खो बैठा... सो गया |

“कम ऑन ... पागल हो गये हो क्या... तुम्हे पता भी है की तुम क्या कह रहे हो?”

“हाँ, पता है.. पूरे होश में हूँ और इसलिए कह रहा हूँ | तुम मेरी बात समझने की कोशिश करो |”

मेरी नींद टूट चुकी थी -- मुश्किल हो रही थी आँख खोलने में अभी भी ... पर कानो को बहुत कुछ साफ़ सुनाई देने लगा था ... मैंने बिना हिले डुले कानो को उन बातों पर लगा दिया जो शायद मेरे आसपास कहीं हो रही थी ... दो आदमी बात कर रहे थे, एक बड़ा शांत था तो दूसरा बेहद उत्तेजित -- कोई ऐसा मुद्दा था जिसपे बहस चल रही थी |

“नहीं.. नहीं... बात समझने की कोशिश तुम करो.. तुम्हें पता है न बॉस का क्या हुक्म है ... साफ़ लफ़्ज़ों में कहा है उन्होंने की इस लड़के की शिनाख्त करने के बाद इसके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी जुटाया जाए और फिर काम ख़त्म होने के बाद इसे भी सलटा दिया जाए | ”

ये बात मेरे कानों में पड़ते ही मैं चौंक सा उठा | ‘सलटा दिया जाए?!’ यानि के मुझे मार देने की योजना चल रही है ??!! ओह्ह!! हे भगवान... ये कहाँ आ फंसा मैं ?

“मुझे अच्छी तरह से याद है कि बॉस ने क्या कहा है... मैं बस एक-दो दिन इसलिए रुकने को कह रहा हूँ ताकि इसे होश आने के बाद हम इससे कुछ और जानकारियाँ निकाल सकें | ज़रा ये भी तो सोचो की जो लड़का किसी ऐसे होटल में, जहाँ हर समय बड़े बड़े माफ़ियाओं और उनके चमचों का जमावड़ा लगा रहता हो, नशीली चीज़ों का और हथियारों का स्मगलिंग होता हैं, देह व्यापार होता है... वहां सकुशल पहुँच कर हर तरफ़ जासूसी कर के वापस जा रहा था... कैसे? इतनी आसानी से कैसे... ज़रूर इसके और भी साथी होंगे... कौन होंगे वो... वगेरह वगेरह... ये सब जानना हमारे लिए बहुत ही ज़रूरी है | ”

“ह्म्म्म... तुम ठीक कहते हो... ये सब जानना भी ज़रूरी है...पर ज़्यादा दिन इसे रख नहीं सकते... एक काम करते हैं.. और तीन दिन देखते हैं.. अगर इसे होश आ गया तो ठीक है... नहीं तो इसे इसके बेहोशी में ही खत्म कर देंगे... ठीक??”

“हाँ, ठीक है...| ”

जूतों की आवाज़ हुई... जाने की...| वे दोनों वहां से जा चुके थे |

और मैं इधर चुपचाप लेटा अपने हालत के बारे में सोचने पर मजबूर था | क्या हो रहा है... क्या होगा...कौन हैं ये लोग... और मैं खुद कहाँ हूँ... कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था | मैं अपना एक हाथ अपने चेहरे पर ले गया... नकली दाढ़ी मूंछ नहीं थी ! ओफ्फ़!! चोरी पकड़ी गयी मेरी... और वो भी गलत लोगों के हाथों..!

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अगले दो दिन तक मैं लेटा लेटा, आँखें बीच बीच में खोल कर कमरे और वहां आस पास के माहौल का जाएजा लेता रहा | बहुत कुछ नहीं भी तो खुद को वहां एडजस्ट करने लायक मान ही चूका था मैं | पर अभी तक ये समझ नहीं आया था कि मैं ये कहाँ और किन लोगों के साथ हूँ | इतना तो तय था की मैं हूँ किसी अस्पताल में, पर हूँ किन लोगों के बीच??

तीसरा दिन ...

सोच ही लिया हूँ की जैसे भी हो आज तो यहाँ से भाग कर रहूँगा ही | पिछले दो दिनों में मैंने एक बात नोटिस किया कि, एक वार्ड बॉय आता है मेरे कमरे में, यहाँ वहां देख कर सब चेक करता है और मेरे पैरों से थोड़ी दूर; दरवाज़े के पास रखे एक व्हील स्ट्रेचर को निकाल कर बाहर ले जाता है | सफ़ेद व्हील स्ट्रेचर पर रखा सफ़ेद चादर इतना बड़ा/लम्बा होता है कि स्ट्रेचर का निचला हिस्सा दिखाई ही नहीं देता है | अगर मुझे यहाँ से निकलना है तो इसी स्ट्रेचर के सहारे ही संभव है -- मेरे दिमाग में तरकीब सूझी |

दोपहर बारह से दो बजे तक मेरा रूम बिल्कुल खाली रहता है ..

बारह बजे से कुछेक मिनट पहले नर्स पानी और फल वगैरह रख कर चली जाती है .. फिर साढ़े बारह बजे वार्ड बॉय फिर आता है और स्ट्रेचर लेकर चला जाता है |

मेरे ही रूम में दो और मरीज़ थे .. जो एक दिन पहले ही एक साथ ही अपने अपने परिवार वालों के साथ चले गए थे | अब उस कमरे में मैं अकेला बन्दा था अब |

बारह बजे का इंतज़ार करने लगा ...

ठीक ग्यारह बज कर पचास मिनट पर एक नर्स अन्दर दाखिल हुई | मैं अधखुली आँखों से लेटा हुआ था | अधखुली तिरछी नज़रों से नर्स पर गिद्ध की तरह नज़र जमाये था |

पानी-फल रख कर वो वहां से चली गई |

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सामने की दीवार घड़ी पर नज़र दौड़ाया...

सवा बारह बज रहे हैं |

बिल्कुल सही समय है अपनी योजना पर काम करने का |

तपाक से बेड पर से उठा ... खिड़की के पास जाकर खड़ा हुआ -- बिना ग्रिल या लोहे की छड़ों वाली खिड़की थी -- खिड़की से थोड़ी नीचे एक छज्जा सा बना हुआ है... शायद नीचे एक और खिड़की होगी -- अपने दाएँ तरफ़ देखा -- वहां एक और खिड़की है ... मैं सीधा हो कर अपने रूम के दाएँ तरफ़ देखा, बाथरूम था -- मतलब बाथरूम में भी एक अच्छा खासा बड़ा सा खिड़की है ... अमूमन ऐसा होता नहीं है ... पर....

खैर, अधिक सोचने लायक समय नहीं था मेरे पास ... पर मेरा तरकीब कहीं न कहीं काम करने वाली थी यहाँ |

मैं जल्दी से बाथरूम में घुसा ; एक बाल्टी लिया .. नल के नीचे लगाया और नल चला दिया ... पानी मध्यम गति से बाल्टी में गिरने लगा और अब बाथरूम का दरवाज़ा अन्दर से लॉक कर दिया |

बाथरूम का खिड़की खोला ..

और लपक कर खिड़की से बाहर आ गया --

किसी तरह नीचे के छज्जे पर काँपते पैरों से संतुलन बना कर खड़ा था | दीवारों पर बने उभारदार बाउंड्री को पकड़ किसी तरह आगे बढ़ने लगा .... अपने रूम की खिड़की के नीचे के छज्जे की तरफ़... कष्ट तो हुआ बहुत | हाथ भी छिल गए ..पर अभी मेरा पूरा फोकस अपनी योजना को सफल बनाने पर था |

कुछ ही मिनट में मैं अपने रूम की खिड़की के पास था | वहाँ से नीचे देखने का साहस नहीं था मुझमे | बहुत ही उंचाई पर था मैं ... ज़रा सा पैर फ़िसला... और चला जाता मैं सीधे नीचे ... एकदम नीचे ..और... और एक झटके से हमेशा हमेशा के लिए ऊपर पहुँच जाता |

खिड़की के निचले हिस्से को पकड़ कर, अपने हाथों पर बल देते हुए खुद को थोड़ा ऊपर उठाया और अपने शरीर को एक हल्का झटका देते हुए सीधे रूम के फर्श पर जा गिरा | कोहनी में हलकी चोट आई पर खुद को संभालता हुआ जल्दी से दरवाज़े के पास रखे व्हील स्ट्रेचर के पास पहुँचा और उसपर पड़े उस बड़े से सफ़ेद चादर को उठा कर व्हील स्ट्रेचर के नीचे बने जगह में खुद को एडजस्ट कर लिया --- जगह भी ऐसी थी की एक लम्बा आदमी आराम से अपने पैर पसार कर लेट जाए वहां |

अब सिर्फ सही समय की प्रतीक्षा थी ..

कुछ ही देर बाद,...

दरवाज़ा खुला...

वार्ड बॉय अन्दर आया....

अन्दर घुस कर दो – तीन कदम चलते ही ठिठका....

कुछ क्षण रुक कर लगभग दौड़ते हुए बाथरूम की ओर गया ...

मैं चादर की ओट से एक आँख से देख रहा था...

दरवाज़ा धकेला... खुला नहीं...

खटखटाया ...

कोई आवाज़ नहीं... सिवाए पानी गिरने के.....

फिर कुछ पल बाथरूम के दरवाज़े से कान लगाए खड़ा रहा |

फिर थोड़ा निश्चिंत सा प्रतीत होता हुआ वो घूमा और कमरे की कुछेक चीज़ों को ठीक कर स्ट्रेचर को ले कमरे से बाहर आ गया !

मैंने राहत की सांस ली... पर अभी मंजिल दूर था |

एक बड़े से कॉरिडोर को पार करते हुए स्ट्रेचर हल्का सा मुड़ते हुए दूसरे कॉरिडोर में आ गया ....

अभी कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि अचानक से एक ज़ोर का ‘धकक्क’ से आवाज़ हुआ | मैंने वार्ड बॉय के कदमों की ओर देखा... ऐसा लगा जैसे की वो पीछे की ओर खींचा चला जा रहा है , जैसे कोई उसे खींच कर ले जा रहा हो ....

मेरा मन किसी घोर आशंका से भर उठा ... थोड़ी देर के चुप्पी के पश्चात अचानक से मेरे स्ट्रेचर को धक्का लगा... कोई उसे आगे ले जा रहा था | मैं आगे देखा... और चौंका... क्योंकि अब मुझे किसी वार्ड बॉय के पैरों के स्थान पर एक लड़की के दो टांगें दिख रही थी... ड्रेस से अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं हुआ कि ये शायद कोई नर्स होगी |

पर कौन.... एक जगह रुक कर मेरे सिरहाने के तरफ़ का चादर थोड़ा उठा और एक पैकेट दिया गया... और साथ ही एक लड़की की आवाज़ आई... “जल्दी ये लगा लो... दस सेकंड में...| ”

बिना कुछ सोचे मैंने जल्दी से पैकेट खोला और खोलते ही हैरान हो गया...

उस पैकेट में नकली दाढ़ी मूंछ और एक काला चश्मा था ....!

कुछ देर बाद मैं और वो लड़की एक लिफ्ट में थे... मैं एक व्हीलचेयर में बैठा था...नकली दाढ़ी मूंछ लगाए... बदन पर एक बड़ा सा शॉल लपेटे... |

लिफ्ट से बाहर आते ही दो आदमी हमारे पास आये...

मुझे सहारा दे कर उठाया...और अस्पताल ले बाहर ले आए |

उनके बाहर आते ही एक कार आ कर रुकी...ठीक हमारे सामने...

और फ़िर उन दोनों आदमी ने मुझे उस कार में ले जाकर पीछे की सीट पर लिटा दिया |

लेटे लेटे मैंने अस्पताल के ऊपरी मंजिल की ओर देखा, लगा जैसे थोड़ी अफरा तफरी सी लगी हुई है | शायद मेरे वहां न होने का उन लोगों को पता चल गया है | मैंने सर थोड़ा उठा कर आगे की सीट पर देखा... धक् से दरवाज़ा बंद हुआ.. ड्राइविंग सीट पर एक लड़की आ कर बैठी | कार तुरंत स्टार्ट हुआ... दोनों आदमी बाहर ही रहे..|

कार पूरे फ़र्राटे से रोड पर दौड़ पड़ी...|

“धन्यवाद... पर आप कौन...?” मैंने पूछा |

“पहले मंजिल पर पहुँचने दो... सब पता चल जाएगा...|” बहुत ही भावहीन और सपाट उत्तर मिला |

पता नहीं क्यों.. पर मैंने चुप रहना ही उचित समझा...| बहुत देर बाद कार हमारे ही घर के मोड़ वाले रास्ते पर आ रुकी... मैं हैरत में डूबा उस लड़की की ओर देखने लगा ... सोच रहा था की ये कौन है जिसे मेरे घर का एड्रेस तक मालूम है.?..

“जल्दी जाओ.. मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है..”

“पर आप हैं कौन... मेरा घर कैसे जानती हैं..? और..और......”

“सुनो.....कहा ना... ज़्यादा वक़्त नहीं है मेरे पास... मुझे जल्दी जाना है... नहीं तो उन लोगों को मुझ पर शक हो जाएगा...| पर इतना ज़रूर कहूँगी कि, ये हमारी आखिरी मुलाकात नहीं है... हम फ़िर मिलेंगे...| नाओ, गुड बाय...|” – इस बार लड़की के आवाज़ में तीखापन और झुंझलाहट साफ़ था |

मैं कार से उतर गया.. पर उतरने से पहले नकली दाढ़ी मूंछ और चश्मा पिछली सीट पर रख कर, एक बार फिर उस लड़की को धन्यवाद किया |

लड़की आगे जा कर गाड़ी घुमाई और मेरे पास आकर रुक कर बोली, “हमारे मंज़िल एक हैं..पर रास्ते अलग... और अगर तुम चाहो तो हम जल्द ही मंज़िल हासिल कर सकते है... ओनली इफ़ यू वांट... अगर तुम चाहो तो.....!”

इतना कह कर लड़की गाड़ी ले कर आगे निकल गई |

और इधर मैं बेवकूफ सा खड़ा, टूटी फूटी कड़ियों को आपस में जोड़ने की नाकाम कोशिश करता; कुछ देर तक उस लड़की के गाड़ी द्वारा दूर तक छोड़े गए धूल के गुबारों को देखता रहा... फ़िर सर झटक कर घर की ओर चल दिया... दिलो-दिमाग में बहुत से उधेड़बुन लिए..................|

क्रमशः

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09-12-2020, 12:46 PM,
#22
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २२)

थाना... पुलिस थाना... अपनी कुर्सी पर बैठे इंस्पेक्टर विनय भंडारी गहरी सोच में डूबा था | सामने टेबल पर रखी चाय पड़े पड़े ही ठंडी हो चुकी थी और टेबल के दूसरे तरफ़ की कुर्सियों पर चाचा और चाची गहरी चिंता और उम्मीदों की आस लिए इंस्पेक्टर विनय भंडारी की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं | कमरे में एक भय और चिंतायुक्त सन्नाटा वाला माहौल था |

“ह्म्म्म.. आपका भतीजा पिछले दो दिन से घर से गायब है.. तो आप ये तीसरे दिन आकर रिपोर्ट क्यों कर रहे हैं? दूसरे ही दिन क्यों नहीं आ गए? क्या आपको ये उम्मीद था कि वो दूसरे दिन आ जाएगा?” – चुप्पी तोड़ते हुए इंस्पेक्टर विनय पहले बोला |

“दरअसल इससे पहले कभी उसने ऐसा नहीं किया और ना हुआ.. कुछ बताया भी नहीं था उसने.. अगर कोई परेशानी थी या कोई काम था जिसके तहत उसे बाहर कहीं जाना था तो वो हमें ज़रूर बताता |” – बड़े ही चिंतित स्वर में चाचा ने उत्तर दिया |

“मिस्टर आलोक.. क्या आपको ये उम्मीद था कि वो दूसरे दिन आ जाएगा?” – इंस्पेक्टर विनय ने चाचा के आँखों में गहराई से झाँकते हुए अपने प्रश्न को दोहराया और खास जोर भी दिया इस प्रश्न पर |

अपने चश्मे को ठीक करते हुए चाचा ने थोड़े सकपकाए अंदाज़ में उत्तर देने का प्रयास किया,

“ज..ज.....जी, ब... बताया ना, इस....इससे पहले अभय ने ऐसा कभी नहीं किया .. इसलिए थोड़ी सी उम्मीद थी कहीं न कहीं.. हमें लग रहा था की अभय की कोई न कोई खबर हमें मिल जाएगी... य...या..या शायद वो खुद ही हमें ख़बर कर देगा... इ..इस.. इसलिए............”

“ये सही कह रहे हैं इंस्पेक्टर साहब...” – इतनी देर में पहली बार मुँह खोला चाची ने, जो अब तक चुप बैठी थी |

चाची के इतना कहते ही इंस्पेक्टर विनय की नज़रें चाची की तरफ़ घूमी और नज़रें उन्ही पर जम गई ... सच कहा जाए तो नज़रें चाची पर भी नहीं, वरन उनके यौवन पर केन्द्रित हो गई थीं | रेशमी साड़ी, गर्मी के दिन के कारण; पसीने से जगह जगह से भीग जाने के कारण उनके गदराये जिस्म से चिपक गई थी |

जिस्म का एक एक कटाव और उभार साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था |

पारदर्शी वस्त्र में; संगमरमर की प्रतिमा सी नज़र आ रही थी चाची इस वक़्त |

ब्लाउज झीना था, कुछ जगहों से भीगा हुआ भी |

यहाँ तक की ब्रा का डिज़ाइन भी साफ़ नज़र आ रहा था |

चाची ने इंस्पेक्टर विनय की तरफ़ एक बार देखा ;

और फिर उसकी नज़रों को भांपते हुए अपने पल्लू को दुरुस्त किया .. पर इंस्पेक्टर विनय की नज़रें अभी भी उस पारदर्शी पल्लू के अन्दर से साफ़ नज़र आ रही करीब तीन इंच की सुन्दर क्लीवेज पर टिकी हुई थी |

इंस्पेक्टर विनय की नज़रों में एक जानी पहचानी सी आकांक्षा देख कर चाची परेशान हो उठी,

‘उफ्फ्फ़....

ये तो ऐसे देख रहा है मुझे जैसे मेरे पल्लू से होते हुए ब्लाउज और ब्रा तक को चीर देना चाहता है | क्या ये मेरी बातें सुन भी रहा है?’ मन ही मन सोची चाची |

“आं...हाँ... हाँ.... वो तो मैं सुन ही रहा हूँ...| ” खुद को संभालने की कोशिश करते हुए बोला वह पर नज़रें अभी भी चाची के उभार और उनके बीच की दरार पर थी |

बेचैन-परेशान चाची को एकाएक अपने रूप सौंदर्य का आभास हुआ...

और इसके साथ ही लाज और झेंप की सुर्खी दौड़ गई उनके चेहरे पर |

साथ ही गर्व से तन गए उनके यौवन उभार |

इंस्पेक्टर विनय ने खुद को संभालने की भरसक कोशिश करता हुआ, मन ही मन चाची के यौवन के कटावों और उभारों की ओर न देखने का दृढ़ संकल्प लेता हुआ आवाज़ में थोड़ी गंभीरता लाते हुए बोला,

“आं.. देखिये मिस्टर एंड मिसेस रॉय, मैं अपने कर्तव्य का पूर्णरूपेण पालन करूँगा और इस बात का आश्वासन देता हूँ की हमारी पुलिस डिपार्टमेंट सुबह शाम ; रात दिन एक कर के जहां से भी हो आपके भतीजे को ढूँढ निकालेगी और उसके गायब होने के पीछे के मुख्य अभियुक्तों को हरगिज़ नहीं छोड़ेगी |”

चाचा और चाची ने हाथ जोड़कर इंस्पेक्टर का अभिवादन किया, इंस्पेक्टर ने भी प्रत्युत्तर में हाथ जोड़ कर मुस्कराया | कुछेक ज़रूरी कागज़ी कार्रवाई कर के दोनों थाना से निकल गये पर इंस्पेक्टर विनय को चाची के मटकते नितम्ब उनके चले जाने के बाद भी बहुत देर तक नज़र आते रहे |

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तीन दिन बाद ---

चौथे दिन,

थाने से दूर एक दुकान के सामने खड़ा इंस्पेक्टर विनय एक हाथ में चाय का ग्लास और दूसरे में सिगरेट लिए सोच की मुद्रा में खड़ा था | उसके सामने उससे छोटे कद का एक आदमी खड़ा था जो किसी आस से विनय को लगातार देखे जा रहा था -- काफ़ी देर तक वैसे ही खड़ा रहा वह ..

अपनी सोच से तब बाहर आया जब सिगरेट सुलगता हुआ फ़िल्टर तक पहुँच गया और उसकी गर्म आंच विनय को अपनी उंगुलियों पर महसूस हुई |

एक हल्का कश लेकर सिगरेट को पैर के नीचे मसला...

और चाय की एक सिप लेता हुआ सामने खड़े आदमी से बोला,

“तुम्हें पूरा यकीन है...? जो खबर सुना रहे हो उसमें कहीं कोई भूल चूक नहीं है ना?”

“बिल्कुल सही कह रहा हूँ साहब, इस सूचना में ज़रा सा भी कोई मेल मिलावट नहीं है |” आदमी ने खैनी और पान से सड़े अपने दाँतों को भद्दे तरीके से दिखाते हुए चापलूसी अंदाज़ में अपने स्वर में मिठास लाते हुए बोला |

“ह्म्म्म... नाम क्या बताया?”

“योर होटल, सरकार ”

“वहीं पर सब होता है?”

“बिल्कुल सरकार”

“हम्म्म्म...|”

फ़िर कुछ सोचते हुए इंस्पेक्टर विनय ने पैंट के पॉकेट से सौ के दो नोट निकाल कर उस आदमी की ओर बढ़ाया; वह आदमी पहले तो खुश हुआ, फ़िर थोड़ा सहम कर कुछ बोलने का कोशिश करने ही वाला था कि तभी विनय जैसे उसके मनोभाव को पढ़ कर बोल पड़ा, “अभी के लिए ये रख ले और सुन, थोड़ा और कमाना है तो ........” कहते हुए विनय अपने पैंट के दूसरे तरफ़ के पॉकेट में हाथ डाल कर कुछ ढूँढने लगा और कुछ ही सेकंड्स में एक तीन फ़ोटो निकाल कर उस आदमी के हाथ में थमाते हुए कहा, “मुझे इन तीनों की ज़्यादा से ज़्यादा खबर चाहिए ; तीनों की तो मतलब तीनों की ही ख़बर चाहिए ... किसी एक को भी मत छोड़ना.. समझे..?”

वह आदमी तीनों फ़ोटो को जल्दी से अपने शर्ट के अन्दर के पॉकेट में रखते हुए इधर उधर देखा |

थोड़ा करीब आया...

और धीरे से बोला,

“कोई संगीन मामला है क्या सरकार?”

“ऐसा ही समझो, वैसे भी आजकल लगभग हर केस संगीन ही जान पड़ता है |” एक सिगरेट सुलगाकर लम्बा सा कश लेते हुए विनय बोला |

“ओह्ह..”

फ़िर करीब दो मिनट की शांति छाई रही |

दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा |
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09-12-2020, 12:46 PM,
#23
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
फ़िर धीरे से उसी आदमी ने कहा,

“तो क्या अब मैं जाऊँ, साहब?”

“हाँ, जाओ... और अभी से ही काम पर लग जाओ |” एक लम्बा धुंआ छोड़ते हुए विनय काफ़ी सख्त लहजे में आदेश देते हुए कहा |

“जी सरकार”

बोल कर वह आदमी उस दूकान के सामने से हट कर तेज़ी से एक ओर बढ़ गया और जल्दी ही बाज़ार के भीड़ में गायब हो गया |

इंस्पेक्टर विनय कुछ देर तक वहीँ खड़े रह कर गहन सोच की मुद्रा में सिगरेट के कश लगाता रहा और सिगरेट के खत्म होते ही अपनी जीप की ओर बढ़ गया |

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दो दीन और बीत गए..

थाने में अपने टेबल के सामने वाली कुर्सी में बैठा विनय, अपने सामने कुछ फ़ाइलों को टेबल पर रखकर किसी सोच में डूबा हुआ था -- और देख के ही साफ़ जाहिर हो रहा था कि वह अपने किसी सोच को उसके मुकाम में पहुँचाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है | अपनी सोच में इस कदर डूबा हुआ था विनय कि अभी कुछ ही मिनट पहले उसका दोस्त और उसी के साथ काम करने वाला सब इंस्पेक्टर सुशील दत्ता ‘गुड मोर्निंग’ बोल कर उसके विपरीत कुर्सी पर बैठ कर उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा था इस बात का उसे पता ही नहीं चला |

कुछ देर के इंतज़ार के बाद इंस्पेक्टर दत्ता ने जोर से खांसते हुए उसे फ़िर से ‘गुड मोर्निंग’ कहा तो एकदम से विनय अपने सोच से बाहर आया और सामने अपने मित्र/सहयोगी को देख चौंक सा गया | इधर उधर देख कर खुद को संयत करते हुए अपने कुर्सी पर ठीक से बैठते हुए अपने मित्र की ओर मुखातिब होते हुए बात शुरू की,

“बोल यार, कैसे हो?”

दत्ता बोला- “मैं तो ठीक ही हूँ यार, पर तुम बताओ ... किस सोच में डूबे थे?”

विनय- “अरे एक केस है यार ... उसी में थोड़ा उलझा हुआ हूँ |”

“अच्छा !!.. कैसा केस भाई... हमें भी बताओ.. ”

“ह्म्म्म... तो सुन; एक दम्पति है.. उनके बच्चे बाहर बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते हैं | उनका भतीजा उनके साथ ही रहता है, अच्छा लड़का है.. पढ़ा लिखा है, एक कोचिंग सेंटर भी चलाता है जिससे उसे एक अच्छी आमदनी भी होती है , फैमिली बहुत ही अच्छी है और उनका हिस्ट्री और बैकग्राउंड भी बढ़िया है ; पर कुछ दिन से उनका भतीजा लापता है -- एकदम अचानक से.. कहीं कोई ख़बर नहीं, हर संभावित जगह ढूँढा और पता लगाने की पूरी कोशिश की गई ; पर नतीजा कुछ नहीं -- अभी दो तीन पहले ही मेरे ख़बरी ने मुझे सुप्रसिद्ध योर होटल में धावा बोलने की सलाह दी है ; उसका कहना है कि कुछ सवालों के जवाब मुझे वहीँ से मिल सकते हैं |” – एक साँस में कह गया विनय |

सब कुछ ध्यान से सुनने के बाद दत्ता कुछ देर ख़ामोश रहा, फिर बड़े ही सोचने वाली निगाहों से विनय की आँखों में देखते हुए पूछा,

“तो क्या सोचा तुमने?”

“किस बारे में?” – एक किंग साइज़ सुलगाते हुए, सिगरेट का पैकेट और लाइटर दत्ता की ओर बढ़ाते हुए विनय बोला |

“केस के बारे में.. योर होटल जाने का इरादा है क्या? ” – सिगरेट सुलगाने की बारी अब इंस्पेक्टर दत्ता की थी |

“सोच तो वही रहा हूँ .. अगले आधे घंटे में वहीं जाऊँगा |”

“तो फ़िर ठीक है.. जब जाओ तो मुझे भी बुला लेना | ”

“नहीं यार... मेरे दो तीन केस और पेंडिंग हैं .. दो जमानत की अर्जी भी आने वाली है .. ऐसा करो, तुम आज मेरी जगह उन कामों को संभाल लो | मैं कुछ सिपाहियों के साथ योर होटल का एक चक्कर मार कर आता हूँ... आ के सब सुनाऊंगा.. फ़िर अगर तुम्हे लगे की ये केस दिलचस्प है और इस केस के साथ जुड़ने का मन करे तब ही हाथ लगाना केस को... ओके?”

दत्ता मुस्कराते हुए बोला, “ओके .. नो प्रोब्लम | तू चिंता ना कर दोस्त... तेरा ये दोस्त तेरे कामों को संभाल लेगा | यू कैन काउंट ऑन मी |”

इस बात दोनों ठहाके लगा कर हँस पड़े |

---

एक घंटे बाद,

योर होटल में पंद्रह सिपाहियों के साथ इंस्पेक्टर विनय ...... --

सभी सिपाही सभी कमरों की तलाशी ले रहे थे और इधर होटल का मेनेजर थोड़े घबराये अंदाज़ में विनय के सामने खड़ा था -- विनय गिद्ध की तरह उसपर दृष्टि जमाए उसके हरकत को देख रहा था -- मैनेजर का यूँ नर्वस होना विनय को कहीं न कहीं उसके पॉवर का एहसास करा रहा था पर साथ ही एक सम्भावना भी बन रही थी कि हो सकता है इस होटल में ज़रूर कुछ गड़बड़ है जिस कारण ये मैनेजर ऐसे घबरा रहा है -- पसीने की एक बूँद मैनेजर के माथे से दांये तरफ़ से होते हुए गाल तक आ पहुँची और मैनेजर काँपते हाथों से अपने ब्लेजर के सामने के पॉकेट से रुमाल निकाल कर, पसीने को पोंछ कर रूमाल वापस अपने पॉकेट में रख लिया |

अपने ओहदे और औकात पर मन ही मन गर्व करता हुआ विनय गंभीर आवाज़ में मैनेजर से पूछा,

“दो बार पूछ चुका हूँ .. ये तीसरी और आखिरी बार है ; सच सच बताओ... यहाँ क्या क्या चलता है रातों को?”

“मैं सच कह रहा हूँ साहब.. यहाँ किसी भी तरह की कोई भी गलत एक्टिविटी नहीं होती है | सब अच्छे पोस्ट पर काम करने वाले और अच्छे घरानों के लोग आते हैं यहाँ | हाँ, फ़रमाइश पर ड्रिंक्स भी परोसी जाती है.... और साहब, ड्रिंक्स रखने और पिलाने की हमें लाइसेंस प्राप्त है |” – हिम्मत करते हुए मैनेजर बोला |

“लाइसेंस मैं देख चुका हूँ और यहाँ किस और कितने अच्छे घराने के लोग आते हैं उसका अंदाज़ा मुझे है ... बस प्रूफ नहीं है | जिस दिन कोई सबूत मिला न, इतनी कठोर कार्रवाई करूँगा की शहर और जिला तो छोड़ो, पूरे देश भर में एक मिसाल होगा |” – हेकड़ी दिखाते हुए विनय बोला |

मैनेजर चुप रहने में ही भलाई समझा |

विनय फिर बोला,

“सुना है यहाँ लडकियाँ और औरतें भी वेटर का काम करती हैं ?”

“हाँ साब... जिन लड़कियों या फिर महिलाओं को पैसों की ज़रुरत होती है वो यहाँ पार्ट टाइम सर्विस देती हैं |”

“कौन सी सर्विस?” विनय ने आँखें तरेरा |

“वेटर वाली सर्विस सर, वेटर वाली....” मैनेजर घबराते हुए बात को संभालने की कोशिश करता हुआ बोला |

“ह्म्म्म... ठीक है... अच्छा .. जिन लड़कियों और महिलाओं की ‘सर्विस’ लिया जाता है इस होटल में ; उन लोगों का कोई रिकॉर्ड तो रखते होगे ना तुम लोग??”

“जी साब .. एक मिनट..” कह कर मैनेजर अपने डेस्क के पीछे गया और तीन चार रजिस्टर को इधर उधर करने के बाद एक नीली जिल्द लगी बड़ी सी रजिस्टर ले कर विनय के पास आया और उसके हाथो में रजिस्टर थमाते हुए बोला,

“आज तक जितनी भी महिलाओं और लड़कियों ने हमारे यहाँ काम किया है उन सबके नाम और फ़ोटो इस रजिस्टर में हैं |”

“हम्म, पता नहीं रखते? आई मीन उनक एड्रेस?”

“नहीं साब |”

“ह्म्म्म...”

कहते हुए विनय सबसे दूर हट कर एक कुर्सी पर जा बैठा और रजिस्टर का एक एक पन्ना ध्यानपूर्वक पलट पलट कर देखने लगा | काफ़ी देर तक बहुत से पन्ने पलटने के बाद विनय एकाएक रुक गया और एक पन्ने को बड़े ही ध्यान से देखने लगा | उस पन्ने में लगे नाम ... और ख़ास कर उस नाम के साथ लगे फ़ोटो को बार बार आरी तिरछी कर अच्छे से देख रहा था | आश्चर्य से आँखें गोल और बड़ी बड़ी हो गई थी उसकी... शायद उस फ़ोटो को पहचान गया था, “ये क्या... नाम ..’चमेली’? प..पर.. इसका नाम तो .......|” कुछ देर तक आश्चर्य से उस फ़ोटो को देखने के बाद सहसा विनय के चेहरे पर एक कुटिल और मतलबी मुस्कान छा गई | अपने आस पास पैनी नज़र दौड़ाई, सब इधर उधर देख रहे थे ... विनय पर किसी का ध्यान नहीं था .. विनय ने चुपके से उस फ़ोटो को पन्ने से उखाड़ा और जल्दी से अपने पॉकेट में डाल लिया |
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09-12-2020, 12:46 PM,
#24
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
थोड़ी देर बाद,

होटल मैनेजर को कड़ी हिदायत देने और थोड़ी हेकड़ी और डांट पिलाने के बाद विनय अपने सिपाहियों के साथ पुलिसिया जीप में बैठा वापस थाने लौट रहा था की अचानक एक दुकान के सामने उसे वही आदमी (ख़बरी) दिखाई दिया | उसे देखते ही विनय को कुछ याद आया और तुरंत जीप रोकने को बोलकर उस आदमी को बुलाने लगा,

“ए... ए मंगरू.... इधर सुन |” – पूरे पुलिसिया तेवर में चिल्लाया विनय |

वह आदमी,जिसका नाम मंगरू था , धीरे धीरे सहमे अंदाज़ में उसके पास आया | उसके पास आते ही विनय ने उसे दो ज़ोरदार थप्पड़ देते हुए कहा,

“क्या रे.... तू सुधरेगा नहीं ना..? तेरी फ़िर शिकायत आई है...!!”

मंगरू - “आह्ह्ह... नहीं साब...नहीं.... ज़रूर कुछ गड़बड़ हुयी है... आपको गलतफहमी हुई है सरकार....”

“क्या बोला... मुझे गलतफ़हमी...!! साले.... ज़बान लड़ाता है.. |” कहते हुए विनय ने उसे दो तीन थप्पड़ और रसीद कर दिए |

फिर उसका कालर पकड़ कर अपने पास खींचते हुए बहुत धीरे से बोला, “क्या रे... कोई खबर है?”

मंगरू ने भी उसी अंदाज़ में कहा, “हाँ साब... शाम को मिलो |”

उसके इतना कहते ही विनय ने उसे जोर से झिड़कते हुए कहा, “आज के बाद फ़िर इस तरह की शिकायत नहीं आनी चाहिए... समझा??!!”

“जी सरकार...” मंगरू ने हाथ जोड़ कर कहा |

विनय की जीप अपने मंजिल की ओर आगे बढ़ चुकी ... बाज़ार में मौजूद लोगों में से कोई इसे पुलिस की दबंगई तो कोई मंगरू की ही गलती समझा रहे थे पर कोई भी उन दोनों, अर्थात मंगरू और विनय के होंठों पर उभर आये अर्थपूर्ण मुस्कान को देख नहीं पाया |

उसी दिन शाम को,

उसी चाय दुकान में,

एक कोने में मंगरू और विनय बैठे थे | विनय सादे लिबास में था |

“बोल मंगरू... क्या ख़बर है?”

“साब... उस दिन जो तीन फ़ोटो आप दिए थे ... उन तीनो के बारे में पता किया... आदमी का नाम आलोक है... मिस्टर आलोक रॉय... औरत का नाम दीप्ति रॉय है.. उस आदमी की धर्मपत्नी... और लड़का जो है ..वो है इनका भतीजा.. अभय... अभय रॉय ... होनहार है .. अच्छा है.. कोचिंग सेंटर चलाता है |”

“ठीक है... आगे बोलो..|”

“साब.. ये जो आलोक है... ये आदमी अच्छा है... किसी से कोई झगड़ा नहीं.. लफड़ा नहीं... खा पी के ऑफिस जाता है और टाइम पे आता है.. थोड़ा भुलक्कड़ स्वाभाव का है... पर और कोई दोष नहीं है इसमें.. पर....|”

“पर क्या मंगरू??”

“इसकी पत्नी और भतीजा... दोनों कुछ दिन से ठीक से नहीं लग रहे हैं |”

“क्या मतलब?”

“मतलब ये की सरकार .... पिछले काफ़ी दिनों से इस महिला की कुछ गतिविधियाँ संदिग्ध सी लग रही है .. घर से निकलती रहती है और अक्सर घंटो घर नहीं आती है ... इसके भतीजे को शायद इसपर किसी तरह का कोई शक हो गया था... इसलिए शायद इस औरत के निकलने के कुछेक मिनट बाद ये भी निकल जाता और इसका पीछा करता... पर शायद कुछ हाथ नहीं लगा था लड़के के.. ”

“ह्म्म्म... अच्छा... एक बात बताओ... जिस दिन ये गायब हुआ... क्या उस दिन भी ये इस औरत का पीछा कर रहा था?” विनय बड़ी दिलचस्पी से पूछा |

“ये पता नहीं लगा सका हुजूर...|” – बेबसी से बोला मंगरू |

“ये बताओ ... ये महिला घर से निकल कर जाती कहाँ है... या.. थी?”

“पता नहीं साब... क्योंकि इसे लेने एक लाल रंग की वैन आया करती थी | अभी चार पांच दिनों से ये कहीं नहीं जाती... सारा वक़्त घर में ही बिताती है.. इसलिए पता करना थोड़ा मुश्किल है |”

“कोई बात नहीं... इतना पता लगाया... ये बहुत है.. ये लो.. अपना इनाम..|” कहते हुए विनय ने एक पाँच सौ का नोट थमाया मंगरू को |

मंगरू ख़ुशी से उस नोट को चूम कर अपने शर्ट के अन्दर वाले पॉकेट में भर लेता है ; नमस्ते कर जा ही रहा होता है कि रुक जाता है... कुछ सोचते हुए पीछे मुड़ता है और हाथ जोड़ कर बोला, “साब... एक विनती है... आगे से इतनी जोर से मत मारा करो... हेहे.. दर्द होता है |” सुन कर विनय हँस देता है | मंगरू के चले जाने के बाद एक सिगरेट सुलगाया और जेब से वही फ़ोटो निकाला जिसे वह होटल के रजिस्टर से फाड़ा था | कुछ देर तक उस फ़ोटो को अच्छी तरह से निहारने के बाद वह दो बार उस फ़ोटो पर ऊँगली फेरा और फिर लाइटर जला कर उस फ़ोटो को आग लगा दिया |

कुछ देर बाद,

शाम के साढ़े छ: बज रहे हैं ...

अभय के घर के सामने एक पुलिस जीप आ कर रुकी... और फ़िर उसमे से उतरा विनय... अपने पूरे यूनिफार्म में था वह.. -- खादी वर्दी, सिर पे टोपी, कमर पर रिवोल्वर और हाथ में छोटा सा डंडा जो अक्सर पुलिस इंस्पेक्टरों के हाथों में होता है -- सधे कदमों से चलते हुए वह बिल्डिंग की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ मेन डोर के पास पहुँचा और उसी डंडे से कुछेक बार दरवाज़ा पीटा -- थोड़े ही देर में दरवाज़ा खुला, सामने मिसेस दीप्ति शर्मा थीं अर्थात चाची .. एक सुंदर सी हलकी चमकीली पतली सी एक लाल साड़ी में... ब्लाउज भी कुछ वैसा ही था .. काला और पतला.. पर ब्रा है या नहीं ; समझना थोड़ा मुश्किल है ....| विनय चाची को साइड करता हुआ अन्दर घुसा ; चाची दरवाज़ा लगाकर धीरे क़दमों से चलते हुई उसके पास आई...

विनय – “कैसी हैं आप दीप्ति जी....?”

चाची – “जी ठीक हूँ...|”

“कौन कौन हैं घर पर...?”

“फ़िलहाल तो कोई नहीं... मेरे पति को आने में थोड़ा लेट है अभी |”

“हम्म... तो दीप्ति जी.. क्या आपने योर होटल का नाम सुना है?”

योर होटल का नाम सुनते ही चाची का चेहरा सफ़ेद पड़ गया... सकपका कर बोली,

“नहीं.. हाँ... आई मीन... हाँ सुना तो है |”

“गुड... कभी गयी हैं वहाँ ?” ये प्रश्न करते हुए विनय चाची की आँखों में देखा |

खुद को सामान्य दिखाते हुए चाची बोली, “नहीं... कभी संयोग नहीं हुआ |”

“सच?? अच्छे से सोच कर बोलिए... ऐसा कुछ है जो हमें आपकी इस बात को मानने नहीं देती |” होठों पर एक शरारती मुस्कान लिए विनय बड़े अर्थपूर्ण तरीके से प्रश्न किया |
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09-12-2020, 12:46 PM,
#25
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
“आं.. मम्म.. अह.. हो सकता है कभी गई हूँ... हर बात तो हर समय याद नही रहता है ना...” चाची थोड़ा काँप उठी इस बार |

विनय मुस्कराता हुआ दीप्ति के बहुत करीब आया, डंडे के एक सिरे को दीप्ति के चेहरे के एक तरफ़ रखते हुए धीरे धीरे नीचे गले तक आया, वहाँ दो बार गोल गोल डंडे को घूमाया और फिर डंडे को वक्षों तक ला कर पल्लू को हटा कर क्लीवेज देखने लगा ... बड़े ही हसरत के साथ... दीप्ति, जो अभी तक डर रही थी किसी तरह का कोई प्रतिरोध करने से ; पल्लू के हट जाने से तुरंत पीछे हटते हुए पल्लू को संभाली और वक्षों को भली प्रकार ढकते हुए ज़ोर से बोली,

“ये क्या बेहूदगी है इंस्पेक्टर साहब... होश में हैं? ये कोई तरीका है किसी महिला से बात करने का ?”

चाची के अचानक से इस रवैये का अंदाज़ा नहीं किया था विनय ने.. इसलिए कुछ देर के लिए हक्का बक्का सा रह गया पर बहुत जल्दी ही खुद को संभालते हुए कहा,

“तरीका हमें अच्छे से मालूम है मिसेस रॉय... आज कोई ख़ास पूछताछ नही करनी थी.. पर अगली बार सबूतों के साथ आऊंगा... और यकीं मानिए, बहुत अच्छे से पूछताछ करूँगा |” कहते हुए दीप्ति को ऊपर से नीचे तक खा जाने वाली नज़र से देखा और फ़िर एक कुटिल मुस्कान देता हुआ दरवाज़े से बाहर निकल गया |

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रात के एक बज रहे हैं...

चारों तरफ़ सन्नाटा ...

बाहर साएँ साएँ से ठंडी हवा चल रही है ....

घुप्प अँधेरा.....

और ऐसे वक़्त अभय के कमरे से दीप्ति की एक मधुर, कराहने सी आवाज़ पूरे वातावरण में तैर जाती है,

“आह:.. आःह्ह्ह... अह्ह्ह.ssssssss….इस्स्स्सssss….ssss.....आह्हsssssss.... ऐसेsss..नहीं... अब ….और ना…… तड़पाओsssssss….”

क्रमशः

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09-12-2020, 12:46 PM,
#26
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २३)

“आआह्हह्ह्ह्ह...आआऊऊऊउचचचचच.....कित.....कितना....ज़...ज़ो......ज़ोर स..सस..से करते ह...हो.... प..पागल हो क्या.....?!! आऊऊचचच... अररररे.... आह्ह:... धीरे दबाओ ....!!! ”

“आअह्ह्ह्ह...आआऊऊऊ....सससससआआआआ....सससससआआआ....आह्ह्ह्ह......!!” आवाजें अब भी आ रही थी और लगातार आ रही थी | रात के उस घनघोर अँधेरे और सन्नाटे में चाची की मदहोश और बेकरारी भरी आवाज़, माहौल को और अधिक रोमांटिक बना रही थी |

कमरे में उथल पुथल मची थी ...

नीले रंग का नाईट बल्ब जल रहा था ..

फलस्वरूप पूरे कमरे में नीला प्रकाश फैला था ...

बिस्तर पर भी...नीला प्रकाश ..

और उस नीले प्रकाश में नहाए, चाची यानि दीप्ति और अभय , दोनों एक दूसरे से चिपके, बारी बारी से पूरे बिस्तर पर एक दूसरे के ऊपर नीचे हो रहे थे |

और पागलों की तरह एक दूसरे पर चुम्बनों की बरसात कर रहे थे |

अंत में दोनों हांफते हुए थोड़ा स्थिर हुए और ऐसा होते ही दीप्ति अभय को बिस्तर पर लिटाये उसके कमर से थोड़ा नीचे होकर अपने दोनों घुटनों को अभय के शरीर के दोनों ओर रखते हुए बैठ गई | अपने नितम्बों का भार अभय के कमर से थोड़ा नीचे रखते हुए बहुत ही धीरे धीरे, इन ए वेरी इरोटिक वे, अपने कमर और नितम्बों को आगे पीछे करने लगी |

और दीप्ति के इस हरकत से अभय के कमर के नीचे का अंग धीरे धीरे सख्त होने लगा |

अंग के धीरे धीरे सख्त होने का अहसास दीप्ति को भी हुआ ; तभी तो वह अभय की ओर शरारत भरी नज़र से देखते हुए होंठों पर एक कुटिल मुस्कान लिए अपने रोब (नाईट गाउन) के सामने के फ़ीतों को बड़ी सेक्सी तरीके से धीरे धीरे खोली और खोल कर सावधानी से गाउन के दोनों पल्लों को इस तरह से साइड किया जिससे की उसका वक्ष वाला हिस्सा तो ढका रहे पर नाभि और पूरा पेट सामने दृश्यमान हो जाए |

मैं तो इस दृश्य को अपलक देखता ही रह गया |

मुझे यों बेबस सा अपनी तरफ़ देखते हुए देख कर दीप्ति को सफ़लता के बाद मिलने वाली ख़ुशी का एहसास जैसा महसूस हुआ ; बड़े ही कामुक ढंग से मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथ अभय के नंगे सीने पर घुमाने लगी और फिर कुछ देर तक ऐसे ही घूमाते रहने के बाद अभय के दोनों हाथों को पहले अपने जांघों पर, फ़िर पेट पर और फिर धीरे धीरे अपनी चूचियों पर रखी | जांघों की गर्मी, पेट की नरमी और चूचियों की नरमी और गर्मी, इन सबने मिलकर मुझे मानो एक मोहपाश में जकड़ लिया हो |

नाईट गाउन के नीचे दीप्ति (चाची) ने ब्लाउज और पेटीकोट पहना था | नीली रोशनी में दोनों कपड़े एक ही लग रहे थे | अति उत्साह में अभय की साँसे कम होती जा रही थी | वह स्वयं पर नियंत्रण की हार्दिक प्रयास कर रहा था पर चाची की कमसीन देहयष्टि उसके हर प्रयासों को हर बार और बार बार विफल कर दे रही थी | अपनी चूचियों पर उसके हाथ रख कर दीप्ति अपने हाथो का दबाव उसके हाथों पर बढ़ा दी | ये एक संकेत था अभय के लिए, उसे एक्शन में आने का...

मैं, यानि कि अभय, नीचे लेटा लेटा, एक बार चूची को जोर से दबाता फिर अगले बार उसी चूची को धीरे और आराम से नीचे से पकड़ कर ऊपर की ओर उठाते हुए हलके प्रेशर देता और उस चूची के ऊपर उठने और दबने की प्रक्रिया को बड़े लालसा और चाव से देखता |

चाची अपने वक्षों पर मेरे ऐसे ज़ोर आजमाइश से अपने अन्दर उठते उत्तेजना की लहरों को रोक पाने में असमर्थ हो रही थी और हर बार अपनी किसी एक चूची के दबने पर आँखें बंद कर होंठों को दबाते हुए, “आअह्ह्ह्ह..उउमममममममम....” की आवाज़ निकालती | रह रह कर उनकी सिसकारी इतनी मादक हो उठती की मैं जोश में और जोर से उनकी चूची को दबा देता |

लगातार चूची को दबाते दबाते मैं कमर से ऊपर तक के हिस्से को थोड़ा उठाता हुआ चाची को अपनी ओर थोड़ा झुका कर उनके गालों पर किस करने लगा -- किस करते हुए चाची के गर्दन और कन्धों पर आता और वहां उस जगह को चुमते हुए चाटने लगता -- और फ़िर बहुत ही प्रेम से चाची के गालों को चुमते हुए उनके स्तनों को दाबने लगता --- गालों, कमर और वक्षों को सहलाते हुए उनके कंधों पर से गाउन को हौले से सरका दिया और जल्द ही शरीर से भी अलग कर दिया | चाची के कंधे पर के ब्लाउज के हिस्से को मैंने खिंच कर कंधे से थोड़ा नीचे किया और उस नग्न कंधे को पागलों की तरह चाटने लगा ...........|

मेरे लार लग जाने से कन्धा नीली रोशनी में चमकने सा लगा और ऐसी हालत में चाची बहुत ही जबरदस्त सेक्सी लग रही थी |

चाची ने अब अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को पकड़ा और अपनी ओर खींचते हुए मेरे मुँह को अपने वक्षों को बीच की घाटी में भर दी ..... मेरी सांस रुकने को हो आई पर साथ ही एक अत्यंत ही अदभुत सुखद अनुभूति भी हुई -- इतना आनंद आया की मैं तो लगभग जैसे आनंद के समुद्र में गोते लगाने लगा -- घाटी में मेरे मुँह के घुसने के कुछ सेकंड्स के बाद ही चाची की दिल की धड़कन बढ़ गई -- उनका सीना तेज़ गति से ऊपर नीचे होने लगा -- सीने के ऊपर नीचे होने के फलस्वरुप दोनों चूचियां मेरे दोनों तरफ़ के गालों से बड़ी नरमी से टकराते और मेरा मुँह और अधिक घुस जाता घाटी में ...

इतने नर्म मुलायम वक्षों की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी ... चाची की तेज़ बढ़ी हुई धड़कन उनके उत्तेजना, कामुक भावनाएँ और वासना .. सब कुछ बयाँ कर दे रहे थे |

काफ़ी देर तक मेरे मुँह को अपने क्लीवेज में घुसाकर अप्रतिम सुख देने के बाद चाची ने एक झटके से मेरे चेहरे को ऊपर उठाया और मेरी आँखों में झाँकी -- मैंने भी ऐसा ही किया -- बिल्कुल अन्दर झाँकने की कोशिश की उनके आँखों में -- वासना के अंदरूनी लहरों ने चाची की आँखों को सुर्ख लाल कर दिया था -- एक अजीब सी बेचैनी, खुमारी, जंगलीपन सा दिख रहा था उनके आँखों में उठते भावनाओं के साथ .. मैं देखता रहा उनकी आँखों में ;

और फिर ...
रुक रुक कर आगे बढ़ते हुए अपने होंठ चाची के होंठों पर रख दिया ... कुछ सेकंड्स वैसे ही रहे हम दोनों; मानो हमारे होंठ आपस में सट से गए हों -- अपने होंठों को वैसे ही रखते हुए मैं चाची के होंठों से अपने होंठ आहिस्ते से रगड़ने लगा और ऐसा मैं पूरी फीलिंग्स के साथ कर रहा था -- चाची चुपचाप बैठी मेरे कन्धों पर अपने दोनों हाथ रख कर इस कामक्रिया में पूर्ण सहयोग कर रही थी -- उनके हाव भाव से ऐसा लग रहा था कि मानो उन्होंने स्वयं को सम्पूर्णत: मुझे समर्पित कर चुकी है .... --

मेरे द्वारा लगातार उनके अंगों पर इस तरह के छेड़छाड़ से चाची गर्म होने लगी और गहरी लम्बी साँसे लेने लगी ; अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रख दूसरे हाथ को मेरे सर के पीछे से ले जा कर अपनी मुट्ठी से मेरे बाल पकड़ कर मुझे अपनी तरफ़ झुकाने लगी ...

मुझसे भी रहा न गया और अपने दोनों हाथों से चाची को अपने आगोश में ले लिया और चाची की गदराई मांसल पीठ को दबोच दबोच कर मसलने लगा -- अपने जीभ को चाची के होंठों पर फिराने लगा .. कुछ देर ऐसे करते रहने से चाची इशारा समझ गई और उन्होंने अपने होंठों को थोड़ा खोला -- इतना मौका काफ़ी था मेरे लिए !

झट से अपना जीभ चाची के नर्म होंठों से होते हुए अन्दर घुसा दिया और उनके मुँह में अपने जीभ को इधर उधर घुमाने लगा | शायद चाची के लिए यह एक बिल्कुल ही नया अनुभव सा था ... |

थोड़ा कसमसा सी गई -- शायद ऐसी पोजीशन में इस तरह से लगातार एक के बाद एक कामक्रियाएं होने के कारण थोड़ा असहज महसूस कर रही थी -- उन्होंने एक बार के लिए खुद को थोड़ा अलग करना चाहा पर मेरे मजबूत गिरफ़्त से खुद को आज़ाद नहीं कर पाई |

अंततः हार कर वो मेरा साथ देने में ही समझदारी समझी .... इधर मैं अपने जीभ से उनके जीभ मिलाने में व्यस्त था | अब तो चाची भी अपना जीभ धीरे धीरे बाहर करने लगी -- उनके ऐसा करते ही मैंने उनके जीभ को अपने होंठों के गिरफ़्त में चूसना शुरू कर दिया |
कुछ ही सेकंड्स बाद पाला बदला और अब चाची मेरे जीभ को अपने होंठों में ले चूसने लगी ; दोनों के जीभो का परस्पर द्वंद्व या कहें खेल ऐसे ही चलता रहा | काफ़ी देर बाद दोनों एक झटके से एक दूसरे से अलग हुए और तेज़ लम्बी सांस लेने लगे .... -- दोनों ही बुरी तरह हांफ रहे थे -- |

कुछ देर तक लम्बे लंबे सांस लेने के बाद चाची मेरी ओर देख कर कुछ कहना चाही पर न जाने मुझे अचानक से क्या हुआ जो मैं उनको अपनी ओर खींचते हुए उनके होंठों को पागलों की तरह चूसने लगा | चाची होंठ चुसाई में मेरा साथ देने के अलावा और कुछ न कर पाई | होंठों को चूसते हुए इस बार मेरे हाथ भी एक्शन में आ गए और वो पूरी शिद्दत से दीप्ति (चाची) के नर्म चूचियों को दबाने में लग गए | चाची के होंठों को चूसते हुए ही मैंने उनके ब्लाउज को खोलना चाहा पर अति उत्तेजना के इस पड़ाव पर मेरे से उनके ब्लाउज के हूक्स खुल नही रहे थे | मेरे होंठों से अपने होंठ लगाए ही चाची ने थोड़ा सहयोग किया और अपने हाथ ब्लाउज हुक्स तक ले जा कर दो हुक खोल दिए ; पर मुझे तो सारे हुक खुले चाहिए थे, इसलिए मैंने भी हाथ लगाए और थोड़ी दिक्कत के बाद बचे सारे हुक भी खोल डाले | पर अभी भी काम पूरा नहीं हुआ.... क्योंकि एक अंतिम हुक बच गया था | झल्ला कर मैंने ब्लाउज के दोनों कप्स के ऊपरी दोनों सिरों को पकड़ा और एक झटका देते हुए अंतिम हुक को तोड़ डाला |

हूक्स के टूटते ही चाची, “ईईईईईईई” से चिल्लाते हुए अपने दोनों हाथो से अपने वक्ष स्थल को छुपाने लगी | मैंने फ़ौरन चाची के मुँह पर अपना हाथ रख कर उनकी आवाज़ को रोकने की कोशिश की | और दूसरे हाथ की एक ऊँगली अपने होंठों पर रखते हुए चाची को चुप रहने का इशारा किया | चाची मामले की नजाकत को भांपते हुए तुरंत चुप हो गई |

मैंने फिर आराम से चाची के हाथों को सहलाते हुए उनके वक्षस्थल से हटाते हुए उनके बीच की घाटी पर नज़र डाला .... आह्ह्हा ! क्या अद्भुत सुन्दर दृश्य था ! खुले हुए ब्लाउज के कप्स को किसी तरह वक्षों से लगाए रखने की असफल प्रयास करती चाची ब्रा में कैद अपने स्तनों को अधुरा ढक पा रही है और ऊपर के हुक खुले होने के कारण दोनों स्तनों की बीच की दरार और भी कामुक तरीके से बाहर की ओर दिखाई दे रही है -- दूसरे शब्दों में कहूं तो इस समय पूरे ब्लाउज की जो हालत है वह और भी आग भड़काने वाली है ... ऐसी ख़ामोश रात, कमरे में हम दोनों और दीप्ति डार्लिंग (चाची) की ऐसी हालत ..... सब कुछ मानो आग में घी डालने का काम कर रही है | पर फ़िलहाल तो उस मनोरम दृश्य के नयन सुख का घंटों आनंद लेने का फुर्सत मेरे पास नहीं था | मेरे तो पूरे दिलो दिमाग में दीप्ति अर्थात मेरी चाची के सम्पूर्ण नग्न स्वरुप का प्रत्यक्ष दिव्य दर्शन करने की व्याकुलता छाई हुई थी ... ---

पूरी नग्नता का दर्शन पाने का एक अजीब प्यास सी लगी थी |

ब्लाउज कप्स के दोनों सिरे अलग हो चुके थे और चाची के सुडोल पुष्टता भरे वक्ष अपने पूरी कामुक तृष्णा, मादकता और अपने सौंदर्य के अभिमान के साथ बाहर निकल कर गर्व से इठलाने लगे थे | मैं एक बार फिर कुछ पलों तक इस खूबसूरत अद्वितीय मास्टरपीस को देखता रहा | मुझे उनकी चूचियों को इस तरह से घूर कर देखने पर चाची हलके शर्म और गर्व के मिश्रित भाव लिए कनखियों से मुझे देख कर मुस्कराने लगी |

मैंने हाथ आगे बढ़ा कर दोनों चूचियों को अपने मुट्ठियों से पकड़ने ; उन्हें एक बार अच्छे से छू कर देखने की कोशिश की पर चाची की उन्नत चूचियां मेरे एक हाथ में ... एक हाथ में तो क्या ... दोनों हाथों में समाने से साफ़ इंकार कर दे रहे थे | पर आज चाची को इस तरह से पाकर मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी; इसलिए बिना झुंझलाए और बिना कुछ और सोचे मैंने हौले हौले से उनकी चूचियों को बहुत अच्छे से फील करते हुए उनको मसलने लगा और चाची अपनी आँखें बंद कर चूचियों के इस तरह प्यार से मसले जाने का सुख अनुभव करने लगी | पर सिर्फ चूचियों को छूने या मसलने से मेरा मन कहाँ भरने वाला था .... सो मैंने चूचियों पर अपने हाथ टिकाये हुए ही सामने झुक कर दोनों चूचियों को चूमने लगा |

ब्रा में कैद चूची ब्रा कप्स के ऊपर से जितना निकली हुई थी ... उतने हिस्से को पूर्ण रूपेण अच्छी तरह से चुमा चाटा ... फिर अपनी उँगलियों के पोरों से ब्रा कप्स के बॉर्डर पर कामुक अंदाज़ से रगड़ने लगा और थोड़ी ही देर बाद दोनों कप्स के दो साइड में ऊँगली अन्दर घुसा दिया और बड़े प्यार और इत्मीनान से चाची की आँखों में देखते हुए दोनों ब्रा कप्स को नीचे कर दिया .... और ऐसा करते ही सौन्दर्य के दो मूर्तमान स्वरुप उछल कर मेरे सामने दृश्यमान हो गए ! उफ्फ्फ़.... क्या रंगत... क्या ढांचा... क्या उठाव और क्या कटाव था उनके उन मदमस्त कर देने वाले मदमस्त चूचियों का !!
अधिक देर न करते हुए झट से टूट पड़ा उनपर ... पहले तो ऊपर नीचे चूची को अच्छे से चुमा .. फिर एरोला के पास जा कर रुका और निप्पल के आस पास के एरिया को सूंघने लगा ... ओह्ह्ह....! एक धीमे सुगंध वाली किसी परफ्यूम का गंध आ कर समाया मेरे नाक में | सूंघते हुए एरोला और निप्पल पर अपने गर्म साँसे छोड़ता और चाची सिहर उठती ---

अब मैंने अपना जीभ निकाला और जीभ के बिल्कुल अगले सिरे को एरोला के चारों ओर गोल गोल घूमाने लगा | चाची “आआह्ह्ह....स्सस्सस...” से एक आह भरी और एक हाथ से मेरे सर को पकड़ कर अपने चूची के और पास ले आई ; पर मैंने सीधे चूची पर कुछ करने के बजाए पहले की तरह ही अपने जीभ से एरोला पर हल्का दबाव बनाते हुए जीभ को गोल गोल घूमाते रहा -- इसी के साथ मैं अब चाची की साड़ी को घुटनों से ऊपर उठाने लगा और उठाते उठाते जांघ तक ले आया और फ़िर जांघ पर हाथ फिराने लगा ... चाची के गोरे टांग और जांघ बिल्कुल मक्खन से मुलायम प्रतीत हो रहे थे ...और किसी को भी जोश में भर देने के लिए काफ़ी थे | इतने साफ़ और गोरे थे की कोई भी उन्हें घंटों चाटते रहे |

पहली बार चाची के गोरे टांग और जांघों को बहुत पास से और सामने देख रहा था मैं | देखते देखते ही एक अजीब सी खुमारी सा छाने लगा मुझ पर | ऊपर और नीचे से आधी नंगी ऐसी खूबसूरत औरत जिसके हर एक अंग-प्रत्यंग को ऊपरवाले ने बड़े ही धैर्यपूर्वक और ख़ूबसूरती से एक बेहतरीन सांचे में ढाला था | मेरा लंड बरमुडा के अन्दर से ही फुफकारें मारने लगा | पूरे शरीर के नसों में रक्त का प्रवाह हद से अधिक तीव्र हो उठा | चाहता तो वहीँ चाची को पटक कर, उन पर चढ़ कर एक अद्भुत चुदाई का नज़ारा पेश कर सकता था पर ये भी जानता था की ऐसे मौके बार बार नहीं आते इसलिए ये जो मौका मिला है .. इसका भरपूर और जी भर कर उपयोग करना चाहिए आज |

जांघों को सहलाते सहलाते मेरा हाथ ऊपर होते हुए और अन्दर घुस गया ... इतना अन्दर की मुझे कुछ होश ही नहीं रहा ....और तभी चाची चिहुंक उठी | आँख बंद थी चाची की पर देह में सिहरन सी दौड़ रही थी उनकी | मैं ध्यानपूर्वक चाची के चेहरे को देखा और फिर हाथ को अन्दर ले जाकर इस बार महसूस किया की चाची ने पैंटी पहना ही नहीं है .... और इस बात का अहसास होते ही मैं ख़ुशी से झूम उठा | मेरी दो उंगलिया उनके चूत के द्वार से टकरा रही थी और प्रत्येक छुअन से चाची पहले से अधिक मचल उठती | इधर मैं चाहता तो था की मैं चाची की मदमस्त गदराई जिस्म की बाकि के अंगो पर ध्यान दूं पर ठीक मेरे आँखों के सामने काम-सौन्दर्य से इठलाते हुए ऊपर नीचे करते चाची की गोरी-चिट्टी भरे हुए पौष्टिक चूचियां मुझे और कुछ सोचने ही नहीं दे रही थी ... इसलिए मैं अपना फोकस उनकी मदमस्त चूचियों पर दिया रहा | एक हाथ से बड़े प्यार से अंदरूनी जांघ को सहलाते हुए चूत-द्वार के साथ छेड़खानी करता और दूसरे से एरोला के आस पास चूची को पकड़ कर थोड़ा प्यार और थोड़ा सख्ती से मसल देता |

काफ़ी देर तक इसी तरह छेड़खानियाँ करता हुआ चाची को सेक्सुअली सताता रहा .... और अंत में अब निप्पल पर ध्यान दिया | एरोला के साथ हुए खिलवाड़ से निप्पल तन कर खड़े हो गये थे | एरोला के चारों ओर चूमने-चाटने से लगे लार से भीगे एरोला पर तने हुए निप्पल, खीर में ऊपर से डाले गए किशमिश की तरह लग रहे थे ... भूख से पीड़ित किसी आदमी को अपने तरफ़ लपक कर आ कर खा लेने के लिए निमंत्रण देते हुए से लग रहे थे |

और मैं तो भूखा था ही .... हवस का भूखा ...! ललचाई नज़रों से देखता और मुँह से बाहर आते लार को वापस निगलते हुए अपने होंठ निप्पल तक ले गया ... गर्म सांस निप्पल से टकरा कर चाची को मस्ती में भर दे रहे थे |

अपने होंठों से निप्पल के ऊपरी हिस्से को हलके से दबाते हुए पकड़ा और आगे की ओर खींचने लगा ... और इसी के साथ ही चाची को बेड पर लेटा कर साड़ी को कमर तक चढ़ा दिया ... ऐसा करते ही चाची की मनोरम, अप्रतिम नयन सुख देने वाली, एक झटके में ही काम उत्तेजना का संचार कर देने वाली लावण्यमयी रसभरी चूत अब सामने खुली पड़ी थी | बड़े ध्यान से देखता हुआ चूत के पास आया और उसपर निकले छोटे छोटे झांटों को अपनी उँगलियों में फंसा कर हल्के से खींचा और साथ ही चूत-द्वार पर बनी लम्बी लकीर को अपनी एक ऊँगली से दबाव बनाता हुआ ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर करता .... दोनों ओर से हो रहे हमले से चाची मस्ती में दुहरा गई और वहीँ बेड पर लेटे लेटे बेडशीट को अपने मुट्ठियों से भींचते हुए कामुक मादक सिसकियाँ लेने लगी |

कुछ देर यही खेल खेलने के बाद निप्पल को चूसने लगा .... चूसते हुए कभी ‘चक चक’ की आवाज़ निकलता तो कभी ‘सरक सरक’ की.... इधर नीचे चूत में अपनी दो उँगलियाँ घुसा कर अन्दर बाहर करने लगा | पहले तो धीरे मोशन में अंदर बाहर करता रहा फिर धीरे धीरे अपनी स्पीड बढ़ाने लगा | चूत में हो रही ज़ोर से फिंगरिंग ने चाची को उनके ऊपर उनका खुद का रहा सहा कण्ट्रोल भी खो देने को मजबूर कर दिया | उनका पूरा शरीर थिरकने सा लगा और वो ‘ऊऊउम्म्म्मम्मम्मम्मम्मम्मम’ की सी आवाजें करने और आहें भरने लगीं | जब ये सेक्सुअल टार्चर बर्दाश्त से बाहर होने लगा तो चाची अपने दोनों हाथों से मेरा सिर पकड़ कर अपने चूची पर कस कर दबा दी |

बर्दाश्त की सीमा मेरी भी पार कर चुकी थी.. मैं अब रुकने वाला नहीं था ... पूरी तल्लीनता और ज़ोरों से फिंगरिंग करने और निप्पल चूसने लगा | इधर चाची का भी जोर मेरे सिर पर बढ़ता जा रहा था और मेरे सिर को अपने चूची से ऐसे दबाए हुए थी मानो आज वो मेरा निश्चय ही दम बंद कर मारने वाली है | मेरे दोहरे आक्रमण के मार से चाची अब धीरे धीरे अपने चरम पर पहुँचने लगी ... उनका शरीर अकड़ने लगा ... वो ज़ोरों से आहें भरने लगी और साथ ही बिस्तर पर किसी जल बिन मछली की भाँति तड़पने लगी | मैं निप्पल को छोड़ अब पूरे स्पीड से चूत के दाने को मसलने और उँगलियों को अन्दर बाहर करने लगा |

चाची – “आह्ह्ह्हsssss....... अभयययययssssssss.... आअह्ह्ह्हह्ह्हssssssss....ऊऊउम्म्म्मममममssssss....”

अभय – “ओह्ह्ह्हssss....दीप्तिssssss......चाचीईईईsssssssssss.....पूर्ण संतुष्ट किये बिना नहीं छोडूंगा ......आह्ह्ह: ....”

चाची – “आआआआह्ह्ह्हहहssss.....औरररररssss.... थोड़ाssssss........ज़ोरररररsss... सेsssss... आह्ह्हssss.. ओह्ह्हssss.... नहींईईssss....आम्म्ममम्मssss.... धीरेरेरेsssss........ करोssssssss....”

चाची की आवाज़ की तीव्रता बढती जा रही थी ... इतनी बढ़ गई थी की कहीं उनकी आवाज़ कमरे से बाहर न चली जाए यही सोच कर मैंने चाची के होंठों से अपने होंठ लगा दिया | इससे आवाज़ निकलनी तो बंद हो गई पर अब एक दबी हुई सी “ऊऊउम्म्म्ममममssssssssss…..” निकल रही थी |

चाची की ऐसी हालत देख कर मुझे एक और शरारत सूझी ... मैं ऊँगली करना छोड़ कर उठ बैठा ... मेरी इस हरकत से चाची ने आँखें खोल कर मेरी ओर आश्चर्य से देखी.. मैं होंठों पर एक बदमाश वाली स्माइल लिए चाची को देखते हुए उनके पैरों को पकड़ कर फैला दिया और खुद दोनों पैरों के बीच आ कर बैठ गया .. फिर खुद को थोड़ा पीछे करते हुए धीरे धीरे चाची की चूत पर झुकने लगा ... चाची मेरी इन हरकतों को आश्चर्य से बड़े ध्यान से देख रही थी और मुझे अपने टांगों के बीच झुकते देख वो मेरा आशय समझ गई और शर्म और शरारत भरी एक मुस्कान अपने चेहरे पर लाते हुए अपने टांगों को खुद ही और अधिक फैला दी.. और इधर मैं उनके मखमल सी टाँगों के बीच इतना झुक चूका था कि मेरे होंठ अब चूत के होंठों से जा मिले... थोड़ी देर तक चूत के ऊपरी और आस पास के हिस्से को सूँघता रहा .... और जब मन थोड़ा आगे बढ़ने को हुआ तब जीभ निकाल कर बड़े धीरे और स्नेहयुक्त तरीके से चूत के होंठों पर फिराने लगा | जैसे ही जीभ का अग्रभाग चूत से टकराया , चाची “इइइइइइस्सस्सस......आहहहहह.......” की आवाज़ के साथ तड़प सी उठी और आनंद के गोते लगाते हुए अपनी आँखें बंद कर ली ...|

प्रेम से चूत के आस पास के भाग को चाटते हुए दो उँगलियों से चूत के फांकों को अलग किया और जीभ को थोड़ा अंदर घुसाते हुए चूत के दीवारों को चाटने लगा | अब तो चाची का परम उत्तेजना के मारे बुरा हाल था | मेरे सिर को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर दोनों जांघों के बीच दबा दी और जांघों को मेरे सिर के पीछे से ले जा कर क्रिसक्रॉस कर के उनका गिरफ़्त भी बढ़ा दी | और मैं तो पूरी लगन से चाची के ‘चूत-रस’ का पान करने के लिए जीभ से ही चुदाई आरम्भ कर दिया |

चाची – “ऊऊउम्म्म्ममममममआह्ह्ह्ह..... अभ.....अभय्यय्य्य....... अ....अब.....न....नहीं....... नहीं.... रुक्क.... सकती.....आअह्ह्ह्ह.... ”

चाची तड़प उठी पर मेरे पास कुछ देखने सुनने का समय नहीं था.... मैं तो चिपका पड़ा था .... रसभरी चूत से ... चाट चाट कर चूत को पनिया दिया मैंने ... किसी तरह मैंने सिर को चूत पर से उठा कर बोला, “हाँ, तो मत रोको न ... होने दो जो हो जाना चाहिए...” इतना कह कर दुबारा चूत चुसाई के कार्य में लग गया |

चाची का पूरा शरीर कांपने लगा .. बेड पर लेटे लेटे कसमसाते हुए वो मेरे सिर को और भी अधिक ताकत से अपने चूत पर टिकाने लगी.. अपने सर से लेकर कमर तक के हिस्से को वो ऊपर की ओर उठाती और फिर एक झटके से नीचे करती ... कुछ देर तक यही सिलसिला चलता रहा ...

फिर अचानक,
चाची – “ऊह्ह्ह्ह....ओह्ह्ह..... आआऊऊऊऊ...............!! आअह्ह्ह्ह..... मैं... म...म... मैं... अ...अ...ब....अब.... छुट.... छूट ....आह्ह..... वाला.... है.........आअह्ह्ह्ह”

और इसी के साथ “फ्च्च्च” के आवाज़ के साथ चाची का एक बहुत ही ज़बरदस्त ओर्गास्म हो गया | पूरा का पूरा ‘चुतरस’ मेरे पूरे चेहरे पर फ़ैल कर लग गया | चिपचिपा सा.... चाची अब लंबी गहरी साँसों के साथ धीरे धीरे शांत हो होने लगी.... और.. और मैं.... मैं अब भी चूत के होंठों से अपने होंठ लगाए “चूतरस” का पूरे मनोयोग से सेवन कर रहा था .................

क्रमशः

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09-12-2020, 12:47 PM,
#27
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
पार्ट २४)

चाची निढाल सी बेड पर पड़ी रही. और मैं बड़ी तल्लीनता से चूत चाटे जा रहा था | इस वक़्त अगर कोई वहाँ कमरे में होता तो मुझे देख कर यही कहता की बेचारे को चूत की बड़ी प्यास लगी है ... क्योंकि मुझे तो चूत के पास से हटने का मन ही नहीं कर रहा था | काफ़ी देर तक ‘लप लप’ की आवाज़ से चूत को अच्छे से चाटने के बाद जब थोड़ा मन भरा, मैं उठ कर चाची के बगल में जा कर लेट गया और चाची के चेहरे को बड़े प्यार और अपनेपन से देखने लगा | चाची आँख बंद की हुई थी | कसम से, बहुत ही प्यारी लग रही थी | बिना ब्लाउज के नंगे पड़े भीगे चूची और निप्पल, ज़ोर से दाबने के वजह से कहीं कहीं से लाल हो गयी थी | पूरे पेट और नाभि पर भी मेरे चाटने से हलके लार समेत निशान बन गये थे | कमर तक उठे हुए पेटीकोट मामले को और गर्म बना रहे थे |

मैं कुछ देर तक चाची को ऊपर नीचे देखता रहा | फ़िर आगे बढ़ कर दीप्ति (चाची) का एक चूची को पकड़ा और धीरे धीरे सहलाते हुए दबाने लगा | चाची अब भी आँख बंद कर लेटी थी, चूची पर दबाव पड़ते ही ‘उऊंन्ह्ह’ से कराह दी | पर मैं बिना परवाह किये चूची को दबाता और चूमता रहा | कुछ देर ऐसे ही करते रहने के बाद उन्हें बाँहों में भरते हुए लिपकिस करने लगा | चूत के होंठ चूसने के बाद मैं अब मुँह के होंठ चूसने में व्यस्त हो गया |

पर इसमें भी ज़्यादा देर तक नही रह सका | जल्दी से बरमुडा को उतार फेंका और अपने फनफनाते खड़े लंड के सुपारे पर थूक लगाने लगा | फिर चाची की चूत पर ढेर सारा थूक लगाया और अपने लंड के सुपारे को चूत के मुहाने पर लगा कर हल्का सा दबाव बनाने लगा | चाची ज़रा सा आँख खोली और मुझे अपने चूत पर लंड रगड़ते देख कर मुस्करा दी और फिर से आँखें बंद कर आने वाले सुख की परिकल्पना में खो गई |

मैंने लंड को चूत की लकीर रूपी द्वार पर ऊपर नीचे करने के बाद अब चूत के घुसाने में ध्यान देने लगा | धीरे धीरे दबाव बढाते हुए लंड को आधा घुसाने में कामयाब हो गया | लंड के सुपारे से लेकर लंड के आधे प्रवेश तक चाची “स्स्स्सशश्श्श्शह्ह्ह्ह...आअह्ह्ह्हह्ह्ह...!” की आवाज़ निकालती रही और बेडशीट और गद्दे पर अपने नाखूनों को और अधिक बैठाती रही |

चाची – “आअह्ह्ह्हssss..... अभय्य्यsssssss.... अआरामsss...ससsssss....ssss…..सेss.... करोssssss......आह्हssssssss!!”

मेरे मुँह से बस इतना निकला,

“शुरू तो आराम से ही कर रहा हूँ पर आगे का नहीं बता सकताssss.... ओह्हssss!”

मैं अब अपने कमर को धीरे धीरे आगे पीछे करने लगा | प्रारंभिक कठिनाई के बाद जल्द ही लंड बहुत आराम से चूत के अंदर बाहर होने लगा | चाची को भी अब मज़ा आने लगा | वो दुबारा अपनी आँखें बंद कर ‘ऊऊन्न्हह्ह्ह्हsssssss.....ऊम्म्म्हहssssssssss....’ की सी आवाज़ करते हुए मीठी चुदाई का आनंद लेने लगी |

इधर मैं भी अपना स्पीड बढ़ाने लगा | आगे झुका; अपने दोनों हाथ चाची के कंधों पर रखा और पूरे ज़ोर से ऊपर नीचे करने लगा |

चाची – “आअह्ह्ह्हह्ह्ह्हssssssssss....ओफ्फ्फ़फ्फ्फ्फ़sssss.......अभय्यय्य्यsssssss....!!”

मैं – “ह्ह्म्मम्फ्फ्फ़sssss.....बोsss...बोलssss..बोलोssss..... जाss....sss… जाssssss.....जानsss....sssss... कैसाsss..... आअह्ह्हssss....... ओह्ह्हssss.... कैसाssss.... लगsss... ssssss…. रहा.....है???”

चाची – “आआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ssssss......आऊऊचच्च्च्चsssssssss......उम्म्मम्म्म्मsssss........ह्ह्मम्म्म्मsssssssss”

चाची के मुँह से कोई जवाब न पाकर अति उत्तेजना के आगोश में मैंने उनके गांड के बायीं तरफ़ ज़ोर से एक थप्पड़ मारते हुए दाएँ चूची पर भी एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया....

मैं – “अरे बोल नाsss.....चुप क्यूँ है....बोलssss...”

चाची – “आआआह्ह्ह्हहsssss.....मारो मतssssssss.....”

मैं (फ़िर से चूची पर एक थप्पड़ मारते हुए) –“जल्दी बोलssss.....”

चाची – “आआआह्ह्ह्हहsss.... अच्छा लग रहा हैsssssss.......”

चाची – “रु.....रुकनाss.... मतss....... आअह्ह्ह्हsssss...”

मैं – “कहाँ रुका हूँ मेरी जान....आह्ह........ह्हह्म्म्मफ्फ्फ़sss....”

रात के सन्नाटे में पूरे कमरे में सिर्फ आह्ह.. ओह्ह... उफ्फ्फ़.. ह्ह्ह्मम्फ्फ्फ़... की ही आवाजें गूंज रही थी |

मैंने झट से दीप्ति यानि की मेरी चाची के होंठो पर अपने होंठ रख दिए | हम दोनों ही कामोत्तेजना के आवेग में पड़ कर पशुवत व्यवहार कर रहे थे | दोनों पागलो की तरह एक दूसरे के होंठों को चूस और चूमे जा रहे थे | केवल “उऊंन्ह्हह्ह्हम्मम्म” जैसी लम्बी सी घुटी घुटी सी आवाज़ आ रही थी | जोर जोर से धक्के मारने से दोनों के जांघ आपस में टकराते हुए “ठप ठप” सी आवाजें कर रहे थे | दोनों की ही साँसे अब तेज़ी से चलने और उखड़ने लगे |

इसी तरह काफ़ी देर गुजरने के बाद..

अचानक,

चाची – “आअह्ह्हssssss....ओओओओह्ह्ह्हsssss.....आहsss... अबss.... और...नss....नहींsss..... रुक्कssss....सकती.....आआह्ह्हsss”

मैं – “आह्ह्हह्ह्म्मम्फ्फ्फ़sssss...आहहहsssss... मैं... मैंss.....भीsssss.......”

मैं अब एक चूची को दबाने और दूसरे को चूसने लगा | और दोनों ही काम बड़े ज़ोरों से करते हुए धक्के भी तेज़ देने लगा | गांड और जांघ अकड़ने लगी मेरी... चाची को इस बात का एहसास हो गया की उनकी तरह अब मैं भी अधिक देर तक टिकने वाला नहीं हूँ ... इसलिए उन्होंने अपने दोनों टांगों को ऊपर करते हुए मेरे गांड के पीछे ले जाकर दोनों टांगो को क्रिसक्रॉस करते हुए मेरे गांड को गिरफ़्त में लेते हुए चूत की तरफ़ बढ़ाये रखी | जबकि मैं तो धक्के लगाते हुए अपना ध्यान चूचियों पर दिया हुआ था .... और चूची को ऐसे दबा रहा था जैसे निकाल कर अपने साथ ही ले जाऊंगा | वहीँ दूसरी चूची को “चक्क..चक्क..” की आवाज़ से इतने ज़ोर से चूस रहा था की मानो जो कुछ भी अंदर रह गया है उसे भी मैंने निकाल लेना है .... इन हरकतों से चाची तो मारे दर्द के बुरी तरह छटपटाने लगी |

मैं – “आह्ह्ह..... दीप्ति.... मेरा निकलने वाला है....”

चाची – “अअम्मम्म... मेरा भी .... आह्ह”

और तुरंत ही दोनों एक साथ “आआह्ह्ह्हह्ह्हssssssssss” करते हुए झड़ गए |

अचानक से पूरा कमरा शांत हो गया .... बीच बीच में तेज़ साँसों के चलने की हलकी आवाज़ सी होती... फिर सब शांत.... मानो एक तूफ़ान थम गया हो | हम दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए थे | और बहुत देर तक एक दूसरे को लिपटे ही रहे ... शायद छोड़ने का इरादा नहीं था हम दोनों का |

फ़िर,

एक दूसरे के बाँहों से आज़ाद हुए और थोड़ा आराम करने के बाद मैं उठ कर अपना बरमुडा लेने वाला था कि चाची ने मेरा हाथ पकड़ कर वापस बेड पर लिटाते हुए एक बड़ा मोटा सा चादर हम दोनों के नंगे बदन पर लेते हुए बोली, “रुको अभी... कोई जल्दी नहीं है... |”

मेरे कंधे पर सिर रख कर लेटी लेटी मेरे पूरे सीने पर अपनी उँगलियों की पोरों को फ़िरा कर सहलाने लगी |

मैं भी ऊपर तेज़ी से घूमते पंखे को देखता हुआ अपने बाएँ हाथ से चाची के सिर के रेशमी बालों को सहलाते हुए कहीं खो सा गया ... और अनायास ही मेरे मुँह से निकला,

“चाची.... उस इंस्पेक्टर का क्या होगा? मुझे तो वह बड़ा हरामी जान पड़ता है... हमारी ज़िंदगी में कुछ न कुछ बखेड़ा ज़रूर खड़ा करेगा... क्या पता शायद अभी भी वो कहीं दूर बैठा कोई तिकड़म भिड़ा रहा हो |”

मेरे नंगे सीने पे घूमती चाची की उँगलियाँ अचानक से रुकी,

और कुछ सेकंड्स रुकने के बाद फिर से मेरे सीने पर चलने लगीं,

और धीरे से बोली,

“उसकी फ़िक्र तुम न करो अभय... मैंने उसका इंतज़ाम कर लिया है |”

मैं बुरी तरह से चौंका,

“क्या सच?? प... पर... पर कैसे?? क्या इंतज़ाम कर लिया है आपने ... चाची..??”

चाची – “किया है ना कुछ... तुम अभी इन सब बातों की फ़िक्र मत करो.. समय आने पर खुद पता चल जाएगा |”

मैं – “पर दीप्ति........”

मेरे कुछ और कहने के पहले ही चाची ने अपना सिर उठाया और मेरी ओर देखते हुए अपनी एक ऊँगली मेरे होंठों पर रख दी और एक रहस्यमयी कातिलाना मुस्कान लिए धीरे से बोली,

“श्श्श्श....... शांत...बिल्कुल शांत..... मैंने कहा न, मैंने इंतजाम कर लिया है... उस इंस्पेक्टर की चिंता मुझ पर छोड़ कर तुम सिर्फ मेरी चिंता करो... और मेरी दो बातों को अपने दिमाग में बिल्कुल फ़िट कर लो...

पहला, अपनी चाची पर भरोसा करना सीखो... और दूसरा, जब हम इस तरह से साथ हों तो मुझे मेरे नाम से नहीं बल्कि चाची कह कर पुकारो... बड़ा किंकी लगता है... हाहाहा....”

मैं हतप्रभ सा उनकी ओर देखता रहा... कुछ समझ नहीं रहा था उस वक़्त... तभी चाची थोड़ा उठ कर अपने बगल में एक छोटे से टेबल/स्टूल पर रखे एक ग्लास को उठा कर मेरी ओर बढ़ाते हुए बोली,

“लो .. अब एक अच्छे बच्चे की तरह फटाफट इसे पी जाओ...|”

मैं – “ये क्या है चाची?”

चाची – “दूध..”

मैं – “दूध?!! अभी?? ... पर क्यों..?!!”

मेरे इस सवाल पर चाची शर्माते हुए मेरे पूरे शरीर को अच्छे से एक बार सर से लेकर पाँव तक देखी, कुछ सेकंड के लिए उनकी नज़रें चादर के नीचे बन रहे मेरे लंड के उठाव पर टिकी रही ...फ़िर मेरी ओर, मेरी आँखों में झांकती हुई , मेरे सिर को सहलाते , बाएँ कान के ऊपर बिखरे सर के बालों को अपनी उँगलियों से बड़े प्यार से कान के पीछे करते हुए, होंठों पर कातिलाना मुस्कान लिए बोली,

“क्योंकिss....... मुझे..... एक राउंड और चाहिए... ”

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ..... “व्हाट”??!

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इधर शहर में ही, दूर कहीं किसी वीराने में... एक नदी के किनारे,

एक लम्बा सा आदमी... भुजाएं काफ़ी बलिष्ट सी मालूम पड़ती है उसकी... ताकतवर होगा...

एक बड़ा और काफ़ी गहरा गड्ढा खोदा...

और फ़िर एक बड़ी सी काली प्लास्टिक उस गड्ढे में डाल दिया ...

प्लास्टिक में कुछ लपेटा हुआ था.. देखने से आदमीनुमा जैसा कुछ लग रहा था .. मानो किसी आदमी को लपेटा गया हो |

प्लास्टिक को बड़ी मशक्कत से गड्ढे में डालने के बाद उस आदमी ने जल्दी से गड्ढे को भर दिया ... भरने के बाद कुदाल-फावड़ा ले कर एक ओर बढ़ा.. अभी कुछ कदम चला ही होगा कि रात के सन्नाटे में ‘च्युम’ की सी एक धीमी आवाज़ हुई... और इसी के साथ ही उधर वह आदमी किसी कटे पेड़ की भांति ज़मीन पर गिर गया |

हेडलाइट्स ऑफ़ किये एक कार आ कर रुकी उस आदमी के पास... एक आदमी उतरा.. साथ में एक बड़ी सी प्लास्टिक और चादर लिए. जल्दी से उस गिरे हुए आदमी को पहले चादर में, फिर उस प्लास्टिक में लपेटा.. फिर किसी तरह उठा कर अपने कार की डिक्की में डाला... साथ ही कुदाल वगेरह भी डिक्की में डालने के बाद कार स्टार्ट कर एक ओर तेज़ी से बढ़ गया |

क्रमशः

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09-12-2020, 12:48 PM,
#28
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २५)

थाने में मेरे गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने के पाँच दिन बाद मैं, चाचा और चाची के साथ थाने गया; मेरे साथ घटी घटनाओं का विवरण देने | ऑफ़ कोर्स बहुत सी बातों को मैं छुपाने वाला था ; पर इन बातों को छुपाने के चक्कर में जो बातें मैं कहने वाला था उन्हें कुछ ऐसे कहना पड़ता जिससे किसी को ये लगे नहीं कि मैं कहीं कुछ भी छुपा रहा हूँ | थाने जाने से पहले मैं बहुत घबराया हुआ था पर चाची की चेहरे की दृढ़ता और उनका विश्वास की थाने में मुझे कुछ न होगा वरन कुछ प्रश्न कर छोड़ दिया जाएगा, ने मुझमें भी काफ़ी हद तक हिम्मत बढ़ाई | चाची को इतना कन्फर्म मैंने आज से पहले कभी नहीं देखा था | एक तरफ़ जहां मैं अपने पास चाचा और चाची दोनों को पा कर निश्चिन्त था वहीँ दूसरी ओर मुझे किसी अनजाने डर का डर भी सता रहा था | खास कर अस्पताल में उस दिन मौजूद उन लोगों का डर |

अस्पताल की याद आते ही मुझे उस अनजान लड़की की याद आ गयी जिसने उस दिन दो-तीन लोगों की सहायता से अस्पताल से निकलने में मेरी सहायता की थी | बड़ी ही अजीब बात थी, न जान न पहचान.... फिर भी मैं तेरी कद्रदान ! क्यूँ मदद की उसने मेरी? क्या वह मेरे मकसद के बारे में कुछ जानती है? या सब कुछ जानती है ? और अगर जानती भी है तो फ़िर ‘मेरी’ मदद करने के पीछे का उसका क्या मकसद रहा होगा? नाम भी तो नहीं बताया था उसने उस दिन | और तो और , उसे मेरे घर का पता किसने बताया? अगर इस लड़की को मेरे घर का पता मालूम है तो क्या उन दूसरे खतरनाक लोगों को भी मालूम है?? हे भगवान ! कहीं वो लोग सीधे मेरे घर ही न पहुँच जाए !

थोड़ी ही देर बाद हम पुलिस स्टेशन के बाहर खड़े थे |

सभी अपने कार्यों में व्यस्त थे, किसी को किसी की सुध नहीं थी |

चाचा आगे बढ़ कर एक सिपाही से इंस्पेक्टर विनय से मिलने की बात कही |

सिपाही ने एक बार चाचा को ऊपर से नीचे तक अच्छे से देखा फिर मेरी ओर चाची की ओर एक सरसरी सी निगाह दौड़ा कर चाचा की ओर देखते हुए कहा,

“विनय साहब नहीं आये हैं, आज छुट्टी पर हैं | ”

“ओह्ह..!” चाचा ने निराशा व्यक्त की |

“क्यों, क्या काम है... अर्जेंट है क्या?” – सिपाही ने चाचा को निराश देख कर पूछा |

“जी, इंस्पेक्टर विनय ने ही बुलाया था.. एक केस के सिलसिले में...”

“कौन सा केस?” – सिपाही ने उत्सुकता में पूछा |

“मेरे भतीजे के लापता होने का केस.. लौट आया है .. इसलिए मिलना था |” चाचा ने अत्यंत संक्षेप में उत्तर दिया |

सिपाही ने मेरी ओर देखते हुए पूछा, “यही है क्या? कहाँ था इतने दिन? कहाँ चला गया था? कैसे आया?”

एक साथ प्रश्नों की बारिश सी कर दी उसने | मैं भी थोड़ा घबरा सा गया ; और चाची की ओर देखा | चाची मेरे मनोभावों को पढ़ते हुए सिपाही की ओर मुखातिब हुई और थोड़ा झिड़कते हुए बोली,

“आप इंस्पेक्टर विनय हैं क्या?”

चाची की झिड़क से सिपाही थोड़ा अकबका सा गया | खुद को तुरंत सँभालते हुए कुछ कहने जा रहा था की चाची ने फिर उसे उसी अंदाज़ में कहा,

“अगर इंस्पेक्टर साहब नहीं हैं तो उनके जगह थाना इन-चार्ज कौन हैं? जो हैं उनका नाम बताओ और अगर कोई नहीं है तो ठीक है... हम चलते हैं |”

चाची का यह रिएक्शन काफ़ी शॉकिंग था ... हमने कभी सोचा ही नहीं था कि चाची इतनी निडरता से बात कर सकती है... और तो और उस सिपाही ने भी कभी सपने में कुछ ऐसा होने के बारे में सोचा नहीं होगा -- वो बुरी तरह से हड़बड़ा गया -- चाची को अच्छे से ऊपर से नीचे तक एक बार और देखने के बाद गला साफ़ करते हुए कहा,

“खं..ख्म... हम्म... इंस्पेक्टर दत्ता साहब अंदर बैठे हैं .. इंस्पेक्टर विनय साहब की अनुपस्थिति में वही यहाँ के इन-चार्ज होते हैं..... |”

सिपाही अभी अपनी बात पूरी कर पाता, उसके पहले ही चाची ने मुझे आगे करते हुए उस सिपाही को “एक्सयूज़ मी” बोल कर कमरे में घुस गई | चाचा भी किंकर्तव्यविमूढ़ सा खुद को कुछ कहने की स्थिति में ना पाकर चुपचाप चाची को फॉलो करना ही बेहतर समझा ... अंदर घुसने के बाद हमें बगल में ही एक और कमरा मिला ... कमरे के बाहर ही बैठे एक संतरी से पूछने पर पता चला की है तो ये इंस्पेक्टर विनय का ही कमरा पर उनके छुट्टी पर होने के कारण अभी इंस्पेक्टर दत्ता यहाँ के इन चार्ज हैं और वह ही अभी कमरे में बैठे हैं -- हमारे कहने पर वो अंदर गया और इंस्पेक्टर दत्ता से मिलने की परमिशन ले कर बाहर आया,

“जाइये... साहब बुला रहे हैं |”

सुनते ही चाची कोहनी से मुझे हल्का सा मार कर इशारा करते हुए कमरे की ओर बढ़ गई, मैं उनके साथ ही घुसा जबकि चाचा थोड़ा रुक कर अंदर आए | फिर जो हुआ, उससे यह समझ में नहीं आया कि जल्दबाज़ी में हुआ या जान बुझ कर ....

हुआ यह कि, अंदर घुसते ही चाची तेज़ कदमों से चलते हुए सामने रखे चेयर तक गई पर चेयर के पिछले (पाया) पाँव से उनका पैर टकरा गया और वह गिरते गिरते बची ; पर खुद को सँभालने के क्रम में वो चेयर को पकड़े आगे की ओर झुक गई और इससे उनका पल्लू उनके कंधे पर से हट कर उनके बाँह में आ गया --

और जैसा कि मुझे पहले से ही पता है की चाची कितना लो कट ब्लाउज पहनती है, इसलिए चाची के आगे गिरते ही मैं समझ गया की इंस्पेक्टर दत्ता को दुनिया की कई लुभावनी चीज़ों में से एक के दर्शन हो रहे हैं आज -- दत्ता तो जैसे पलकें झपकाना ही भूल गया -- पलकें तो दूर की बात, उसे देख कर ऐसा लगा मानो वो उस समय साँस तक लेने भूल गया है |

चाची जल्दी से अपने आँचल को दुरुस्त करते हुए इंस्पेक्टर दत्ता को नमस्ते की...

प्रत्युत्तर में इंस्पेक्टर दत्ता ने भी किसी तरह खुद को सँभालते हुए हाथ जोड़े, लाख कोशिश करे चाची के चेहरे को देखने की पर गुस्ताख आँखें अपना रास्ता उनके वक्षों तक ढूँढ ही लेते हैं |

“ज.. जी.... आ..आप??” – हलक में फँसते शब्दों के साथ शुरुआत किया इंस्पेक्टर ने |

“जी, मेरा नाम दीप्ति है... दीप्ति रॉय, ये मेरे हस्बैंड मिस्टर आलोक रॉय हैं और ये मेरा भतीजा अभय; अभय रॉय.. दरअसल हम.............................” – और फिर चाची ने सब कुछ इंस्पेक्टर दत्ता को कह सुनाया |

मेरे गायब होने की, मेरे मिल जाने, इंस्पेक्टर विनय से हुई बातें... वगैरह वगैरह...

इंस्पेक्टर दत्ता सब कुछ बहुत शांति से और ध्यानपूर्वक सुनता रहा --

पर साथ ही मेरे पारखी नज़रों ने यह ताड़ लिया था कि दत्ता बातें सुनने के साथ ही साथ कुछ और भी करने में व्यस्त था...

वह चाची के चेहरे को एकटक निहारे जा रहा था --

होंठ, गाल, गला, भोंहें, आँखें.... सब कुछ देखे जा रहा था --

एक अजीब सा दीवानापन, अपनापन का एहसास अपने आँखों में लिए वह चाची को अपलक देखे जा रहा है --

मैं चाची की ओर देखा,

उनकी आँखें साफ़ जाहिर कर रही थी कि वह भी इंस्पेक्टर की हरेक हरकत को बखूबी समझ रही है ... पर इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ;

और कहीं न कहीं ये बात मेरे लिए राहत देने वाली बात थी... पता नहीं क्यों?

थोड़ी देर बाद,

मेज़ पर चार ग्लास चाय थे |

चाची की बातें ख़त्म हो चुकी थी ... मैं कुछ कहने की सोच रहा था और चाचा के पास कहने को कुछ ना था ...

दो सिप ले चुका था चाय का इंस्पेक्टर दत्ता ने... ग्लास के गोल मुहाने पर अपने दाएँ हाथ की तर्जनी ऊँगली को गोल गोल घूमाते हुए किसी सोच में डूबा हुआ सा लग रहा था वह ... फ़िर उसी हाथ को उठा कर दो उँगलियों को मोड़ कर अपने होंठों पर और अपनी ठोड़ी को हथेली का सहारा देते हुए बगल की खिड़की से बाहर देखने लगा --

हम तीनो चुपचाप बैठे हैं -- तीनों की ही नज़रें इंस्पेक्टर दत्ता पर जमी हुई है और किसी अप्रत्याशित प्रश्न या उत्तर की सम्भावना को ख़ारिज करने की मन ही मन उपाय और ताकत जुटा रहे हैं --

कुछ देर तक कमरे में छाई चुप्पी को भंग करते हुए इंस्पेक्टर दत्ता ने कहा,

“देखिए, मिस्टर एंड मिसेस रॉय, मैं फिलहाल कुछ ख़ास करने की स्थिति में नहीं हूँ.. दरअसल बात यह है कि इस केस को इंस्पेक्टर विनय हैंडल कर रहे थें -- वह अभी छुट्टी में हैं ; वो भी एकाएक ... उनके आने के बाद ही कोई सटीक कदम उठाने के बारे में सोचा जा सकता है ; मैं तो बस उनका रिप्लेसमेंट हूँ -- हाँ, मैं अभी के लिए आपको यह आश्वासन ज़रूर दे सकता हूँ की पुलिस की तरफ़ से आपको फुल प्रोटेक्शन और सपोर्ट है.. और आज के बाद, इन फैक्ट, आज से ही अगर आप लोगों को कहीं कुछ भी संदिग्ध सा लगे या कोई आप लोगों से किसी भी तरह कोई कांटेक्ट करने की कोशिश करे तो आप बेहिचक हमें सूचित कर सकते हैं ... -- पुलिस डिपार्टमेंट हमेशा आपके सेवा में उपस्थित है और रहेगी .. -- |”

अंतिम पंक्तियाँ – “आप बेहिचक हमें सूचित कर सकते हैं ... पुलिस डिपार्टमेंट हमेशा आपके सेवा में उपस्थित है और रहेगी ... |” कहते हुए दत्ता ने नज़रें चाची की ओर कर ली थी और बात खत्म करते करते उसकी नज़रें चाची के पारदर्शी आँचल के नीचे से नज़र आ रहे क्लीवेज पर जम गई .... |

खैर,

बाकी फॉर्मेलिटी सब पूरी करने के बाद हम तीनो उठ कर बाहर आ गए | कमरे से निकलते वक़्त मैंने सिर घूमा कर इंस्पेक्टर की ओर देखा; उसकी नज़रें चाची की बैकलेस ब्लाउज में दिख रही चिकनी बेदाग़ पीठ और उनके उभरे हुए पिछवाड़े पर टिकी हुई थी -- |

पुलिस स्टेशन से निकलने के क्रम में भूरे रंग का ओवरकोट और हैट पहना एक आदमी मुझसे जोर से टकराया और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया | मैं उसे कुछ कहता या टोकता पर चूँकि स्टेशन में ही थे हम लोग इसलिए मैंने चुप रहने में ही भलाई समझी |

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ड्राइविंग सीट पर चाचा थे और बगल में चाची बैठी थी -- मैं पीछे परेशान सा बैठा था -- परेशानी इस बात की थी कि ये इंस्पेक्टर दत्ता किसी तरह की परेशानी न बन जाए मेरे और परिवार के लिए ...

अनायास ही मेरा हाथ मेरे पैंट के पॉकेट पर गया ... कोई कागज़ सी चीज़ अंदर थी -- पर मैंने तो ऐसा कुछ नहीं रखा था ... तो फिर ?

जल्दी से पॉकेट से वो कागज़ निकला.... किसी छोटे बच्चे के स्कूल की कॉपी के पेज की जितनी बड़ी कागज़ थी ... और उसपे साफ़ साफ़ अक्षरों में लिखा था,

“पुलिस पर ज़्यादा भरोसा करने की गलती मत करना... पुलिस भी मुजरिमों से मिली हुई हो सकती है ... पुलिस के साथ ज़्यादा घुल मिल करोगे तो लेने के देने पड़ सकते हैं .. आज संध्या साढ़े छ: बजे नीचे दिए गए पते पर मिलना ... तुम्हें तुम्हारे काम की चीज़ बतानी है -- ज़रूरी है .. इसलिए ज़रूर से आना... फ़िक्र न करो... तुम्हारा शुभ चिंतक हूँ |

पता:- **************

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**************************”

सन्देश को पढ़ कर मैं गहन सोच में डूबता चला गया .. अब ये कौन ? कौन है ये अनजान मददगार..? मिस्टर एक्स? या फिर कोई और....??

क्रमशः

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Reply
09-12-2020, 12:48 PM,
#29
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २६)

अब तक आपने पढ़ा कि, चाचा, चाची और अभय; तीनो मिलकर थाने जाते हैं रिपोर्ट लिखवाने पर इंस्पेक्टर विनय की अनुपस्थिति में इंस्पेक्टर दत्ता पूरी विषयवस्तु की जानकारी उनसे लेते हैं पर साथ ही चाची की ओर खींचा सा चला जाता है | रिपोर्ट दर्ज नहीं होती है पर ये आश्वासन ज़रूर मिलता है कि पुलिस की टीम कुछ समय तक अभय के घर की निगरानी अवश्य करेगी और अगर कभी किसी क्रिमिनल से किसी भी तरह की कोई भी धमकी देने या संपर्क करने की कोशिश की जाती है तो खुद अभय या उसका परिवार कभी भी अतिरिक्त पुलिस सहायता की बात कर सकते हैं |

इधर पुलिस स्टेशन से निकलते वक़्त अभय किसी अनजान शख्स से टकराता है जो बिना देखे या कुछ सुने ही तेज़ी से आगे की ओर बढ़ जाता है | गाड़ी में बैठे घर जाने के रास्ते में अभय को अपने पॉकेट में कागज़ का एक टुकड़ा मिलता है जिसमें उसे पुलिस से बच कर रहने और कुछ ज़रूरी बातें साझा करने के लिए शाम को एक जगह बुलाया जाता है...

अब आगे पढ़ें....

घर पहुँच कर थोड़ी देर रेस्ट किया --- फ़िर चार घंटे स्टूडेंट्स को पढ़ाया --- कुछ नए स्टूडेंट्स ने भी मेरा इंस्टिट्यूट ज्वाइन किया था | मेरे अंडर में दो और टीचर और एक स्टाफ है --- मेरी अनुपस्थिति में यही लोग सबकुछ सँभालते हैं | बहुत दिनों बाद अपने स्टूडेंट्स, टीचर्स, स्टाफ और इंस्टिट्यूट के बीच खुद को पा कर बहुत अच्छा लग रहा था … मेरे इतने दिनों से इंस्टिट्यूट में न होने और लापता होने की खबर को लेकर सबने तरह तरह के प्रश्न दागने शुरू कर दिए --- ज़्यादा बहाने नहीं बना पाया; किसी तरह सबकी जिज्ञासाओं को शांत किया ; पर सबकी चिंताएँ देख कर थोड़ा अच्छा भी लगा … सबको मेरी फ़िक्र है.. और अगर बहुत ज़्यादा फ़िक्र नहीं भी है तो भी कम से कम पूछा तो सही सबने --- |

मुझे बेसब्री से साढ़े छ: बजे का इंतज़ार था | पौने छह होते ही मैं घर से निकल पड़ा और सवा छह होते होते गंतव्य पर पहुँच गया | एक पुराना सा बिल्डिंग .. उजाड़.. चारों ओर झाड़ियाँ .. कुछ कुछ वैसा ही जैसा पहली बार मिस्टर एक्स ने मिलने के लिए जिस जगह पर बुलाया था | अंतर इतना था कि पहली वाली बिल्डिंग किसी राजा महाराजा के जमाने की लग रही थी और अब ये वाली बिल्डिंग खाली, उजाड़ हुए कुछ बीस-तीस या उससे अधिक बरस की लग रही थी | कागज़ के टुकड़े के लिखे अनुसार मुझे अब तीसरी मंजिल पर किसी एक दरवाज़े जिस पर 3 C लिखा होगा उससे हो कर अन्दर घुसना है और ठीक दस मिनट इंतज़ार करने के बाद एक लाल बत्ती जलने के बाद मुझे उठ कर उसी दरवाज़े से बाहर निकल कर उसी तीसरी मंजिल की नौवीं दरवाज़े 3 I से अन्दर घुसना होगा | वहीँ पर मुझसे मेरा शुभ चिंतक भेंट करेगा |

मैंने एक सिगरेट सुलगाया और जल्दी से उस टूटी फूटी वीरान मकान की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा | सीढ़ियों पर जगह जगह जाले, धूल की मोटी परतें और मकान के कुछ टूटे हिस्से गिरे हुए थे | धूल से एलर्जी होने के कारण नाक मुँह ढकना पड़ा | जल्द ही मैं तीसरी मंजिल के तीसरे दरवाज़े के सामने खड़ा था | दरवाज़ा हलके धक्के से ही खुल गया | अन्दर घुसने पर चौंका .. एक फाइबर वाली चेयर रखी थी सामने | नई लग रही थी | अपने हाथ घड़ी पर नज़र रखते हुए मैं उस चेयर पर बैठने से पहले चारों ओर का मुआयना कर लिया | सब ठीक ही लगा |

चेयर पर बैठा बैठा मैं बोर भी हो रहा था पर करने के लिए कुछ था नहीं | एक के बाद एक सिगरेट सुलगाता रहा | दस मिनट ; दस घंटे से लग रहे थे | पर मानना पड़ेगा की जिस किसी ने भी टाइम सेट किया है वाकई समय का बड़ा पाबंद होगा ... क्योंकि दसवाँ मिनट होते ही उस कमरे में ही सौ वाट के जल रही बल्ब से कुछ ही दूरी पर स्थित लाल बल्ब सायरन की सी आवाज़ के साथ जल उठी | सायरन वाली आवाज़ भी केवल तीन बार ही बजी | उठ कर तुरंत कमरे से बाहर निकला और लगभग दौड़ते हुए नौवें दरवाज़े के पास जा कर रुका |

दरवाज़े को को धकेलने की कोशिश की पर वो खुला नहीं | थोड़ी देर दरवाज़ा पीटा .. फिर भी नहीं खुला... | थक हार कर गुस्से में इधर उधर टहलने लगा | अगले दो-तीन मिनट में अचानक दरवाज़ा एक ‘कौंच’ की सी आवाज़ करता हुआ खुल गया पर ज़रा सा ही | मैंने तेज़ी से कदम आगे बढ़ाते हुए एक झटके में अन्दर दाखिल हुआ … और अन्दर घुसते ही मेरे ही एक और आश्चर्य मेरा इंतज़ार कर रही थी ...............

अंदर वही लड़की बैठी हुई थी ... एक चेयर पर ...जिसने हॉस्पिटल में मेरी सहायता की थी | हाथ में कुछ पेपर्स थे | आँखों पर काला चश्मा, काली शर्ट, वाइट – ग्रे की कॉम्बो वाली जीन्स पैंट .. होंठों पर हलकी लाल लिपस्टिक... सचमुच बहुत कमाल की लग रही थी | मेरे अन्दर आते ही वह भी सर उठा कर मेरी ओर देखी.. और एक हलकी सी मुस्कान चेहरे पे बिखेरते हुए हेलो बोली...| मैं तो उसमें ऐसा खोया की कुछ पलों के लिए उसके ‘हेलो’ का जवाब नहीं दे पाया | वो मतलब समझ गई ... चेहरे पर ह्या के हलके भाव लिए पेपर्स को दोबारा देखने लगी |

मुझे अपनी भूल का आभास होते ही उससे माफ़ी मांगता हुआ उसके पास गया | इशारों से उसने बगल में रखी एक और लाल फाइबर की कुर्सी में बैठने को कहा | मैं बैठ तो गया पर बदले में उस लड़की को सिवाए ‘थैंक्स’ के और कुछ नहीं कह पाया | कुछ देर तक पेपर्स पर नज़रे गड़ाए रखने के बाद उसने मेरी ओर देखा और शर्म वाली मुस्कान के साथ दुबारा ‘हाई’ कहा |

इस बार मैंने जवाब दिया उसे,

“हाई |”

लड़की – “अगर बुरा ना माने तो क्या मैं आपको तुम कह कर बात कर सकती हूँ?”

मैं – “नहीं बिल्कुल नहीं... बल्कि मैं आपको आप कह कर बुलाना चाहता हूँ |”

लड़की – “अच्छा?? वो क्यों???”

मैं – “क्योंकि आपने मेरी जान बचायी है ... अस्पताल से मुझे सुरक्षित निकाल कर | और बचाने वाला हमेशा बड़ा होता है .. इसलिए आपको ‘आप’ कह कर संबोधित करूँगा...|”

लड़की – “नहीं जी ... इसकी कोई आवश्यकता नहीं है | हम दोनों लगभग एक ही उम्र के हैं और एक की मंजिल की ओर भी | हमें एक दूसरे की मदद करनी चाहिए.. क्योंकि हमें एक दूसरे की मदद की ज़रूरत होगी भी |”

मैं (मुस्कुराते हुए) – “ज़रूर |”

मेरा जवाब सुन कर वह पेपर्स उठाने लगी ... उसका ध्यान उन पेपर्स पर था और मैं... जैसा की हर जवान लड़के के साथ होता है ... चेहरे की भले ही कितनी ही तारीफ़ क्यों न कर ले... नज़रें, नज़रों से जिस्मानी उभारों को टटोलने का काम करने ही लगते हैं | मैं भी इस मामले में बेचारा | नज़रें बरबस ही उस लड़की के चेहरे पर से फिसलते हुए उसके सुराहीदार गले और फिर.. बैठने के कारण शर्ट के थोड़े टाइट होने से उसके सीने पर और स्पष्टता से उभर आये उसके सुडोल उभारों पर अटक गए | नज़रें जो और जितना टटोल सकी उस हिसाब से 34CC या 34D तो होगा ही | पुष्ट थे | गोरे रंग पर काले लिबास और उसपे भी पुष्टकर सुडौल उभार उसे एक कम्पलीट पैकेज बना रहे थे | पर शायद अभी उसके बारे में बहुत से राज़ खुलने बाकी थे ........................

“इन पेपर्स को देखो..” एकदम से मेरी ओर उन कागजों को बढ़ाते हुए बोली |

पर तब तक मेरी नज़रें उसके उभारों को अच्छे से निहार चुकी थीं इसलिए उसके बोलने के काफ़ी पहले ही मेरा ध्यान भी उन पेपर्स पर ही था |

पेपर्स को हाथों में लिए बड़े गौर से देखने लगा | कुछ ख़ास समझ में नहीं आ रहा था | वे कागज़ दरअसल ज़ेरोक्स थे .. असली के...|

कुल बारह कागज़ थे और प्रत्येक पर किन्ही लोगों के फ़ोटो (वे भी ज़ेरोक्स) के साथ कुछ बातें लिखी हुई थीं | ज़ेरोक्स होने के कारण कुछ लिखावट समझ में आ रही थी और कुछ नहीं |

काफ़ी देर तक पन्नों को उलट पलट कर देखने के बाद भी जब कुछ ख़ास समझ में नहीं आया तो उस लड़की की तरफ़ सवालिया नज़रों से देखा | उसे शायद मेरी इसी प्रतिक्रिया की आशा थी |

क्योंकि उसकी ओर देखते ही वह हौले से मुस्करा दी और बोली,

“ये वही लोग हैं जिनकी तलाश तुम्हें है और इन्हें तुम्हारी तलाश है |”

“क्या??!!!”

सुनते ही जैसे मेरे ऊपर बिजली सी गिरी |

लगभग उछल कर कुर्सी पर सीधा तन गया और दोबारा उन पन्नों को बेसब्री से आगे पीछे पलटने लगा |

पर ‘झांट’ कुछ समझ में आ रहा था.......

मेरा उतावलापन देख कर वह अपना हाथ आगे बढाई और मेरे हाथों को थाम लिया..

उफ़..! कितने नर्म मुलायम थे उसके हाथ ..! कितना कोमल स्पर्श था !! पल भर को तो मैं जैसे सब भूल ही गया | मन में एक आवाज़ उठी कि, ‘बस... ऐसे ही हमेशा हाथ को पकड़े रहना.. |’

शांत लहजे में कहा,

“अभय... धैर्य से काम लो... उतावलापन हमेशा भारी पड़ता है |”

उसका मेरा नाम लेना मेरे कानों को मधु सा लगा | जी किया कि एक बार उससे अनुरोध करूँ की एकबार फ़िर वह मेरा नाम ले .....

आहा! कितना मधुर स्वर है इसका...

पर...

अरे, यह क्या..!!

इसे मेरा नाम .. कैसे पता...??

चौंक उठा मैं |

और तुरंत ही अचरज भरी निगाहों से उसे देखा...|

मन पढ़ने की उसने कोई डिग्री कर रखी होगी शायद ....

तभी तो मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने मेरे आँखों और चेहरे पर उभर आये आश्चर्य की रेखाओं को देखते ही कहा,

“मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ ना सही पर बहुत कुछ जानती हूँ...”

ये कहते हुए उसने मेरे इंस्टिट्यूट, मेरी पढ़ाई लिखाई, परिवार और ऐसे ही कई सारी बातों का जिक्र किया |

जैसे जैसे वह सब कहते जा रही थी वैसे वैसे मैं उसके चेहरे, आँखों, भौहों, होंठों .... सब में खोता जा रहा था |

एक अजीब सी कशिश, एक अजीब सा खींचाव था उसके हरेक अदा, हरेक बात में |

वह शायद मेरे इन मनोभावों को भी अच्छे से समझ रही थी ... तभी तो रह रह कर उसके गोरे चेहरे पर लाज की एक रेखा आती जाती रहती | आँखों पे चढ़ा काला चश्मा कुछ देर पहले उतार चुकी थी .... हल्के नीले रंग की थी उसकी आँखें... और किनारों पर बहुत ही सलीके से काजल लगा हुआ था ... और ये उसकी आँखों की सुंदरता को भी कई गुना बढ़ा रही थी |

“हेल्लो..!!” उसने थोड़ा ज़ोर से कहा |

मेरी तन्द्रा टूटी... देखा, अपने दाएँ हाथ को मेरे आँखों के सामने हिला रही थी |

“कहाँ खो जाते हो...? अभी जो ज़रूरी बातें हैं... उनपे ध्यान दो... बाकी के बातों पर ध्यान देने के लिए और भी समय बाद में मिलेगा |”

थोड़ी झुंझलाहट थी उसकी आवाज़ में... पर साथ ही आँखों और चेहरे पर शर्म और ख़ुशी (शायद) के मिश्रित भाव थे |

“आं...हाँ... तो ...आं... हम्म.... हाँ... ठीक है.... अम्म.... आ... आप मेरे बारे में इतना कुछ जानती हैं... पर आपने मुझे अपना नाम नहीं बताया..?!” झेंपते हुए बोला मैं | एक चोरी पकड़ी गयी मेरी अभी अभी |

“वैसे नाम तो मेरा मोनिका है... पर दोस्तों-रिश्तेदारों में सब मुझे मोना नाम से जानते – पुकारते हैं |” थोड़ी इतराते हुए बोली |

“तो क्या मैं भी तुम्हे मोना कहूँ?” मैंने पूछा |

“कह सकते हो...|” उसने उत्तर दिया |

फ़िर, तुरंत ही कहा,

“अच्छा... अब इससे पहले की किसी तरह के और सवाल जवाब हों.. हमें काम की बातों पर लौट आना चाहिए .... ओके?”

इसबार उसके आवाज़ में दृढ़ता थी |

मैंने हाँ में सिर हिलाया |

“तो सुनो... पहली बात... तुम और तुम्हारा परिवार... ख़ास कर तुम.. पुलिस पर भरोसा भूल से भी भूल कर मत करो.. सबकी तो नहीं बता सकती पर इस बात का काफ़ी हद तक अंदेशा है कि उस विभाग में कोई मिले हुआ है; तुम्हारे और देश के दुश्मनों से... ”

उसकी यह बात मेरे अन्दर कौंधती हुई सी लगी पर मैं शांत रहा --- सिर्फ़ इतना कहा,

“तुम बोलती जाओ...|”

मेरे सकारात्मक रवैये को देख वो खुश होती हुई बोली,

“गुड, अब आगे सुनो.. जिस इंस्पेक्टर विनय को तुम ढूँढने गये थे स्टेशन ... वह फ़िलहाल मिलने वाले हैं नहीं... लम्बी छुट्टी पर गए हैं... और शायद जब तक वो लौटे... तुम और तुम्हारे परिवार का गेम बज चुका होगा... खास कर शहर का और.... शायद देश का भी |”

जिस विश्वसनीयता के साथ उसने कहा ये बात, मुझे वाकई बहुत ताज्जुब हुआ पर चुप रहा |

क्योंकि मुझे याद आया कि, किसी महापुरुष ने एक बार कहा थे की यदि श्रेष्ठ वक्ता बनना है तो पहले श्रेष्ठ श्रोता बनो |

“ये लोग इंटरनेशनल ड्रग डीलर्स और खतरनाक माफ़िया हैं .. इनसे पार पाना इज नॉट एट ऑल इजी | तुम्हारी चाची को इन्ही लोगों ने किसी तरह अपने जाल में फंसाया है | ये लोग अक्सर कम उम्र की लड़कियों और विवाहित महिलाओं को अपना शिकार बनाते हैं ताकि इनका धंधा किसी की पकड़ में न आए ..............................................................................................”

इसी तरह वह एक के बाद एक कई खुलासे करते गई और हैरत से मेरी आँखें चौड़ी होते गई, साथ ही दिमाग में नई सोच पैदा हो गई कि इसे इतना कुछ कैसे पता??

अगले २० मिनट तक लगातार बोलने के बाद वह चुप हुई ... मुझे शांत देख कर पूछी,

“कुछ पूछना है तुम्हें?”

“हाँ... फिलहाल बस एक ही सवाल.. तुम्हें इतना सब कुछ कैसे पता.. कौन हो तुम.. क्या करती हो? सीबीआई हो? सीआईडी? एनआईए? या रॉ??”

“हाहा.. नहीं.. मैं इन सब में से कुछ भी नहीं हूँ.... और असल में क्या हूँ..ये तुम्हें धीरे धीरे पता लग ही जाएगा.. अभी जो सबसे ज़रूरी है वह यह कि क्या तुम ऐसे लोगों का पर्दाफाश करने में मेरी मदद करोगे?”

मैं थोड़ा सोचते हुए बोला,

“मम्म.. पर तुम तो वैसे ही बहुत एक्सपर्ट हो... तुम्हें मेरी सहायता क्यों चाहिए?”

“क्योंकि मैं जो भी करुँगी या कर पाऊँगी वो सब कुछ पीठ पीछे होगा... मुझे कोई ऐसा चाहिए जो डायरेक्ट इन सबमें इन्वोल्व हो सके.....”

“तुम्हारा मतलब जो इन लोगों के साथ उठना बैठना कर सके...?? इनके साथ रह सके..?? अरे यार.. तुम तो मुझे मरवाने पर तूली हो..”

“पहले पूरी बात सुनो अभय... मैंने क्या अभी तक ऐसा कुछ किया है जिससे तुम या तुम्हारे परिवार वालों को किसी भी तरह की कोई दिक्कत या किसी तरह का कोई खतरा दिखा या आया हो ??” बहुत स्पष्टता और दृढ़ता के साथ बोली मोना |

“नहीं...” छोटा सा उत्तर दिया मैंने भी |

“तो फिर पूरा भरोसा रखो मुझ पर ...” उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखते हुए कहा |

मैं क्या करता... बैचलर बंदा .. तुरंत पिघल गया |

“ठीक है.. मैं तैयार हूँ | बताओ.. क्या करना होगा मुझे?” ऐसा कहते हुए एक लम्बी सांस ली मैंने |

“गुड.. तो सुनो.. मैं... और मेरे साथ जो और जितने भी हैं... वो सभी अगले कुछ दिनों तक तुम्हें कई चीज़ों में ट्रेनिंग देंगे... तुम्हे बस इतना करना है की बगैर किसी सवाल के, वो लोग जो और जैसा सिखाएँगे तुम्हें ... तुम बस वैसे ही सीखते रहना | नो वर्ड्स... ओके?” अपने होंठों पर ऊँगली रखते हुए बोली |

मुझे उसका यह अंदाज़ बड़ा पसंद आया | डांटते हुए कुछ समझाना..!

“तो फिर चलो, आज की हमारी यह भेंट यहीं समाप्त होती है .. ओके? दो दिन बाद से तुम्हारी ट्रेनिंग शुरू होगी | कब और कहाँ आना होगा तुम्हें, ये हम तुम्हें अपने तरीके से बता देंगे... अब, जाने से पहले... एनी क्वेश्चन?”

“नहीं, कोई क्वेश्चन तो नहीं... पर एक छोटी सी शर्त है... |”

“कैसी शर्त?”
“मैं जब से ट्रेनिंग के लिए आऊँ... जहाँ भी आना पड़े.... आप वहाँ ज़रूर होंगी... दरअसल क्या है कि, कुछ अजनबियों के बीच एक जाना पहचाना चेहरे अगर मौजूद हो... तो काम का मज़ा दुगना आता है.. और..... ”

“और.....?”

“और मन भी लगा रहता है |” मैं झेंपते हुए बोला |

सुनकर वो कहकहा लगा कर हँस पड़ी | हँसते हुए बोली,

“मुझे कहीं न कहीं आपकी किसी ऐसी बात बोलने की उम्मीद थी.... खैर, कोई बात नहीं... मैं ज़रूर रहूँगी.. दरअसल क्या है है कि, जिस इंसान पर भरोसा कर रही हूँ... उस भरोसे की कसौटी पर वह कितना खरा उतरता है .. यह ज़रूर देखना चाहूँगी.. इससे मेरा समय भी कटेगा और....”

“और.......?”

“आपको सही सही गाइड करने का भी मौका मिलेगा |” नज़रें नीचे पेपर्स की ओर करते हुए एक शरारत सी कातिलाना मुस्कान लिए बोली |

दोनों उठे.. और बाहर निकले... अभी कुछ कदम आगे चले ही थे कि, सीढ़ियों के पास अचानक से वह फ़िसली.. नीचे गिरने ही वाली थी कि.. मैंने लपक कर उसका हाथ पकड़ लिया... और ज़ोर से अपनी तरफ़ खींचा.. वह लगभग मेरे बहुत करीब आ गई.. सट ही गयी होती अगर बीच में अपनी दायीं हथेली न लायी होती | हम दोनों एक दूसरे को देखते रहे कुछ मिनटो के लिए... एक दूसरे के आँखों में.. शायद कुछ देर और देखते रहते... की तभी एक छोटा सा पत्थर नीचे सीढ़ियों पर लुड़का.. आवाज़ से हम दोनों की तन्द्रा टूटी.. होश में आये जैसे.. अलग होकर दोनों ने एक दूसरे को गुड बाय कहा |

उसने इशारे से मुझे दूसरे तरफ़ की सीढ़ियों से जाने को कहा ... और खुद पलट कर दूसरी तरफ़ के एक दरवाज़े के पीछे हो गई ... मैं नीचे उतर आया था ... एक ऑटो वाला पहले से खड़ा था --- साथ में एक आदमी भी --- मुझे उसी से जाने को कहा --- मैंने कुछ कहा या सोचा नहीं ... ऑटो में बैठ गया ; मेरे बैठते ही ऑटो चल पड़ा |

क्रमशः

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Reply

09-12-2020, 12:48 PM,
#30
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २७)

ट्रेनिंग शुरू हुई | काफ़ी सख्त ट्रेनिंग थी | रत्ती भर की भी गलती होने से काफ़ी डांटा जाता | पर मन मार कर सीखना तो था ही | इसके अलावा और तो कोई चारा भी नहीं था |

समय गुज़रता रहा | मोना हर दिन आती | मेरा हौसला बढ़ाती | ट्रेनिंग भी दिन ब दिन और टफ होता गया |

पर पूरे धैर्य और हौसले से मैं लगा रहा ट्रेनिंग पर |

चार महीने लगे ...

ट्रेनिंग खत्म होने में.... |

इन चार महीने में कई दफ़े ऐसे हुए जब मैं और मोना बहुत क्लोज आते आते रह गये | और हों भी क्यों न.. साथ में लंच, बातें, यहाँ तक की कई बार डिनर भी हमने साथ ही किया |

एक दूसरे के बारे में काफ़ी कुछ जाना भी हमने; जैसे की .... परिवार में कौन कौन हैं, पढ़ाई कहाँ तक हुई है, आगे की क्या योजना है... इत्यादि...

उसके बारे में जो पता चला, वह ये है कि उसके माँ बाप का उसके बचपन में ही देहांत हो गया था --- वह अपने एक रिश्तेदार के यहाँ रह कर पली बढ़ी ..

जब बढ़ी हुई तब उसे पता चला कि उसके माँ बाप की मृत्यु किसी दुर्घटना या बीमारी के वजह से नहीं बल्कि उनकी हत्या हुई थी और उन्ही हत्यारों की खोज में वो इंडियन सीक्रेट सर्विसेस के कांटेक्ट में आई और बाद में अपनी खुद की टीम बना कर देश और समाज को गंदे लोगों के गिरफ़्त से छुड़ाने के काम में लग गई ...

और इसी क्रम में उसका मुझसे भेंट हुआ और अपने विश्वस्त सूत्रों से मेरे बारे में पता लगा ली ---

हम दोनों इतने घुल मिल गये थे कि मैंने अपनी चाची से भी उसे मिलवा दिया था ; चाची को शायद, --- ‘शायद’ मेरा किसी हमउम्र लड़की से मेल मिलाप होना अच्छा नहीं लगा हो पर वह मेरे लिए खुश भी बहुत हुई --- मोना भी बाद में चाची की तारीफ़ करने से खुद को रोक नहीं पाई और उनकी प्रशंसा में कहा था की चाची में अब भी आज की कमसीन लड़कियों को मात देने का पूरा दम है |

ट्रेनिंग ख़त्म होने के कुछ ही दिनों बाद मोना के माध्यम से खबर मिली कि शहर में पिछले काफ़ी दिनों से ड्रग्स और अवैध हथियारों की खरीद फ़रोख्त बहुत बढ़ गई है और ऐसे अवैध धंधे करने वाले अक्सर शहर के मशहूर ; पर साथ ही उतना ही बदनाम, “कैसियो बार” में जमा होते हैं ... और सबसे बड़ी बात की ये ‘कैसियो बार’ चलता है ‘योर होटल’ में ... होटल के ही एक भाग को पूरी तरह से इस तरह के बार और अन्य चीज़ों के लिए छोड़ा गया था..

इस बार में बार के साथ साथ कैसिनो की भी सुविधा उपलब्ध है और शौक़ीन लोग कैसिनो में वक़्त बीताने ज़रूर आते हैं --- कुछ सिर्फ़ ऐय्याशी और पैसे उड़ाने के लिए तो कुछ अपनी किस्मत आज़माकर अमीर होने के लिए --- |

एक दिन शहर से दूर एक पार्क में मिले हम --- मैं और मोना --- यह पार्क शहर के भीड़भाड़वाले क्षेत्र से थोड़ी दूरी पर स्थित है --- ‘फैमिली पार्क’ के नाम से बनी तो थी यह पार्क पर जल्द ही यहाँ फैमिली से ज़्यादा युवा जोड़े आने लगे थे --- कुछ समय आपस में , एकांत में , दूसरे लोगों की नज़रों , सवालों और फ़िर मिलने वाले तानों से बचने की लिए ये पार्क बहुत ही सुरक्षित स्थान है ---

इसी पार्क में मैं और मोना आज मिले ---

ऐसे तो हमारा अक्सर मिलना होता था ...

पर,

इस पार्क में ये पहली बार हम मिले ---

मिलते ही औपचारिक कुशल-क्षेम पूछने के बाद उसने मुझे कुछ पेपर्स दिए,

“ये क्या है मोना?”

“कुछ लोगों के नाम, उनका इतिहास और कर्मों का लेखा-जोखा ...”

“अच्छा,.. ओके.. पर... तुमने तो शायद ये नाम पहले ही दिखा दिया था.. राईट?”

“हाँ, वो नाम अलग थे... और ये अलग हैं... पर कर्म सभी के एक जैसे हैं --- पाप से भरपूर --- पापी साले !”

कहते हुए उसने मुँह ऐसा बनाया मानो कोई बहुत ही कड़वी चीज़ खा ली हो ---

“ह्म्म्म... मतलब....”

“मतलब, ड्रग और इललीगल आर्म्स डील --- सेक्स रैकेट भी ---!”

“तो ..... अब आगे क्या करना है हमें?”

“हमें नहीं अभय; तुम्हें .... तुम्हें करना है ... मैं पहले ही कह चुकी हूँ की मैं पर्दे के पीछे रहूँगी.... सामने से वार तो तुम्हें ही करना है...”

स्थिर, गंभीर स्वर में बोली मोना....

“ठीक है... तो... क्या करना है मुझे?”

इस प्रश्न के उत्तर में बहुत कुछ समझाती चली गई और साथ ही उसका प्लान भी...

सब कुछ सुन और समझ लेने के बाद....

“ठीक है... समझ तो गया सब... पर...”

“पर क्या?”

“मुझे वहाँ कोई दिक्कत हो गई तो?”

“छोटी मोटी दिक्कत को तो तुम आसानी से सम्भाल ही लोगे इस बात का मुझे पूरा विश्वास है --- रहा सवाल किसी तरह के बड़े दिक्कतों का तो वहाँ मेरे दो आदमी रहेंगे --- तुम्हारी सुरक्षा के लिए --- वे दोनों सम्भाल लेंगे ..... बात समझे ---??”

“हम्म... समझा”

“और ये लो... इसे हमेशा अपने पास रखना”

मेरे तरफ़ एक छोटा सा पैकेट बढ़ाते हुए बोली ...

“ये क्या है मोना?”

“खोल कर देखो तो सही...”

मुस्करा कर बोली...

“खोल कर तो देखूँगा ही... पर उससे पहले जो मुझे साफ़ समझ में आ रहा है वह यह है कि तुमने मुझे फ़िर से एक गिफ्ट दिया है --- वो भी बिना किसी बात के... समझ में नहीं आता की तुम लड़कियों को गिफ्ट इतने अच्छे क्यों लगते हैं ....??”

“हाहाहा...”

“हम्म... हँस लो... कितनी बार कोशिश किया अपनी तरफ़ से गिफ्ट देने का... पर तुम लेती ही नहीं... क्यों?”

“सही समय आने पर दे देना.... या फ़िर शायद मैं ख़ुद ही ले लूँ”

ये बात वह बोली तो मुस्कराते हुए पर इसमें एक गहरा अर्थ छुपा हुआ है, ये मैं समझ गया ....

गिफ्ट खोला,

अंदर एक बहुत ही सुंदर घड़ी (रिस्ट वाच) रखा हुआ है... बहुत ही सुंदर... शब्द नहीं है प्रशंसा के लिए...

अपलक देखता रहा....

मुझे कुछ न बोलते देख वो बोली,

“पसंद आया?”

“बहुत!”

मुझे खुश देख वो भी बहुत खुश हुई...

एक दूसरे को बाँहों में भर लिया हम दोनों ने...

बहुत देर तक एक दूसरे के आलिंगन में रहे ....

काफ़ी देर बाद,

“अभय, अब असल मैदान में उतरने का वक़्त आ गया है |”

मोना ने चिंतित पर दृढ़ स्वर में कहा |

“पता है मोना... अं..” चिंता में डूबा, सिगरेट के कश लेता हुआ दूर कहीं देखता हुआ मैं बोला |

“किस सोच में डूबे हो?” मेरी ओर देखते हुए पूछी मोना |

“आगे की योजना के बारे में ... हालाँकि तुम सब समझा चुकी हो... फिर भी....”

“फिर भी क्या अभय...??” इस बार मोना के होंठ के साथ स्वर भी कंपकंपाए |

“योजना के सफल होने के अधिकतम सम्भावना के बारे में सोच रहा हूँ |”

“ऐसा क्यों... क्या तुम्हें मेरी योजना पर भरोसा नहीं?” सशंकित लहजे में मोना ने पूछा |

“ऐसी बात नहीं है मोना... दरअसल, मेरी यह आदत ही है की जब तक काम पूरा न हो जाए ... मैं उस काम के बारे में सोचना बंद नहीं करता... यों समझो की सोचना बंद नहीं कर पाता |”

“ह्म्म्म... सच कहूं तो मैं भी ऐसा ही कुछ मन ही मन कर रही थी |”

“वो क्या?”

“मेरी बस एक ही चिंता है अभय...” मोना का गला थोड़ा भर्राया |

“वह क्या?”

एक लम्बी सांस छोड़ कर दूर क्षितिज की ओर देखते हुए, मेरे कंधे पर सर टिकाते हुए बोली,

“मैं तुम्हे खोना नहीं चाहती अभय... ” हलकी रुलाई फूट ही पड़ी आखिर उसकी |

उसे चुप कराने की व्यर्थ कोशिश करता हुआ मैं बोला,

“हम दोनों को कुछ नहीं होगा मोना.. रिलेक्स... माना की हम जिस रास्ते पर आगे बढ़ रहे है वहां खतरा ही खतरा है पर उस रास्ते पर चलना तो आखिर है ही हमें... अब जब कदम आगे बढ़ा ही दिया तो फिर सोच कर क्या फ़ायदा?”

मोना कुछ नहीं बोली... बस मेरे कंधे से अपना सिर टिकाए रही... चुप...निस्तब्द... खुद को रोने से रोकने की कोशिश करते हुई...

उसे दिलासा तो दे दिया पर मैं खुद आशंकाओं से घिरा हुआ था ....

और सबसे बड़ी चिंता मुझे मोना को ले कर भी थी ...

पता नहीं आखिर मैं कुछ दिनों से उस पर भरोसा नहीं कर पा रहा हूँ... हालाँकि ऐसा होने की कोई पुख्ता वजह नहीं है ....

पर ...

फिर भी...

मैं इस बात को कतई नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता कि ये लड़की लोमड़ी से भी ज़्यादा तेज़ दिमाग वाली है ...

कुछ तो ऐसा है जो मुझे नज़र नहीं आ रहा.. समझ नहीं आ रहा ...

बट आई ऍम श्यौर .... एवरीथिंग इज नॉट राईट...

क्रमशः

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