Kamukta kahani अनौखा जाल
09-12-2020, 12:49 PM,
#31
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २८)

Narration:

रात के 11 बजे कैसियो बार के सामने एक कार आ के रुकी... इम्पोर्टेड जान पड़ती है | गहरे लाल रंग की .. और उसमें से उतरा अभय! गहरे ग्रे कलर की कोट पैंट में | होंठों के किनारे एक महँगी सिगार दबाए... आँखों पर काला चश्मा | एक नज़र में ही देख के ऐसा लगे जैसे की कोई बहुत बड़ा , रईस हो... | और लगे भी क्यों न? आख़िर इस समय उसका गेटअप – मेकअप सब चेंज जो था |

धुआँ उड़ाता हुआ अन्दर दाखिल हुआ |

दरबान ने जैसे ही सलाम ठोका; अभय ने सौ के तीन पत्ती उसकी ओर बढ़ा दिए | दरबान तो ख़ुशी से उछल ही पड़ा | उसकी आँखों में कृतज्ञता के भाव उभर आए ..

यही मौका है ...

सोचा अभय ने,

और सोचने के साथ ही बोल पड़ा,

“सुनो, वो बाहर लाल गाड़ी देख रहे हो..?, हाँ... वो वाला.... वो मेरी है ... ज़रा ध्यान रखना ... |”

आवाज़ में मिठास और चापलूसी से अंदाज़ लिए बोला दरबान,

“अरे बिल्कुल देखेंगे साहब.. क्यों न देखें.. आप बस अंदर के मज़े लें... ” कहते हुए दाहिने हाथ को सीधा करते हुए सामने थोड़ा झुका |

इस छोटी सी जीत पर मुस्कुराता हुआ अभय आगे बढ़ा |

कुछ टेबल्स थे, सब पर ताश के गेम चल रहे थे |

एक पल को ठिठका अभय, फिर मन ही मन भगवान का नाम लेकर सभी टेबल्स पर गेम खेलते मौजूद लोगों को गौर से देखने लगा | देखते-देखते अपने से थोड़ी दूर मौजूद एक टेबल पर नज़रें टिकी उसकी... चार लोग खेल रहे थे .. उनमें से एक जो टेबल के बीचोंबीच बैठा था उसे गौर से देखने लगा ... और पहचानते ही एक सफलता वाली मुस्कान बिखर गई अभय के होंठों पर ..

मोना ने इसी के बारे में बताया था...

सधे कदमों से आगे बढ़ते हुए उस टेबल तक पहुँचा अभय,

और,

मैं – “खेल सकता हूँ क्या?”

आदमी – “खेलना तो सिर्फ एक बहाना है.. यहाँ तो सब अपनी किस्मत आजमाने आते हैं हुज़ूर... हाहाहा... आप भी आजमा ही लीजिए |”

मैं – “माफ़ कीजिएगा जनाब.. पर मैं क़िस्मत आजमाने के लिए नहीं खेलता |”

आदमी – “ह्म्म्म..... तो फ़िर शौक पूरा कर लीजिए...”

मैं (मुस्कराते हुए) – “कुछेक हज़ार रुपए दांव पर लगाने से भी मेरा शौक पूरा नहीं होता |”

उस आदमी ने गहरी सांस लेता हुआ सिगार का एक लम्बा कश लगाया और धुएँ के बादल छोड़ता हुआ मेरी ओर रहस्यमयी मुस्कान देता हुआ देखता रहा कुछ क्षण ..

फ़िर,

आदमी (होंठों पर मुस्कान बरक़रार रखते हुए) – “ह्म्म्म... सही जगह तशरीफ़ लाये हैं आप हुज़ूर... आपके साथ एक दांव खेलने में वाकई मज़ा आएगा.”

जवाब में मैं भी बैठ गया और अपनी पत्तियाँ देखने लगा..

वो आदमी अपनी पत्तियाँ चले, उससे पहले ही मैं बोल पड़ा – “एक मिनट जनाब.. न्यू गेम, न्यू कार्ड्स ! ”

मुझसे ऐसे अप्रत्याशित डिमांड की शायद आशा नहीं की थी उसने.. कुछ क्षण अपलक देखता रहा .. फ़िर ‘हे-हे’ कर के हँसते हुए सहमति में सिर हिलाया |

नए कार्ड्स आए.. खेल शुरू हुआ... नौसिखिया होने के कारण शुरू में कुछेक दांव हार गया.. पर जल्द ही पटरी पर आया और एक अच्छी टक्कर देने लगा ..

करीब पौन घंटा हुआ होगा.. रात के साथ साथ खेल भी काफ़ी जम रहा था... कि तभी एक आदमी आया और उसके कान में कुछ कहा..

सुनकर मेरी ओर देख कर बोला,

“माफ़ कीजिएगा.. थोड़ा अर्जेंट काम है.. थोड़ी देर के लिए उठाना पड़ेगा.. आप बैठिए .. ड्रिंक्स लीजिए. मैं अभी आया |

अभी वह उठने ही वाला था कि एक नकाबपोश महिला उसके पास आई और झुक कर उसे गले लगाई ---- उस आदमी के चेहरे पर रौनक तो ऐसे छाई मानो कई सौ वाट के बल्ब जल गये हों ---

दोनों की बॉडी लैंग्वेज ऐसी थी मानो वे दोनों एक दूसरे को बहुत भली भांति जानते पहचानते हैं ---

शरीर का खास कोई भी हिस्सा दिख नहीं रहा था उस महिला का, कपड़े पहनी ही ऐसी थी --- बुर्का नहीं --- नार्मल कोई ड्रेस --- चेहरा ढका हुआ था --- पर कपड़े थे टाइट --- और इस कारण उसके नितम्ब और वक्षस्थल अपने पूरे कटाव के साथ अपनी नुमाइश कराने पर आमादा थे --- विशेषतः उसके वक्षः ... आह !!...

खैर,

उस महिला के गले लग कर थोड़ा हटते ही आदमी चहक कर बोला,

‘मिस्ड यू डियर’

फ़िर,

दोबारा मेरी ओर देखते हुए बोला,

“प्लीज़ एक्सक्यूज़ अस”

मेरी ओर से किसी प्रत्युत्तर के प्रतीक्षा किये बिना ही वो उठ कर वहां से चलता बना |

पर वो औरत, अब भगवान जाने वो औरत थी या लड़की, मेरी ओर कुछ इस तरह देखने लगी मानो मुझे पहचानने की कोशिश कर रही है --- या शायद उसे पहचाना हुआ सा लग रहा होऊँगा ---

क़रीब दो से तीन मिनट अच्छे से मुझे देखने के बाद वह पलट कर उस आदमी के पीछे चल दी; और जाते जाते भी दो बार पीछे पलट कर मेरी ओर, मुझे ही देखी ----

मुझे भारी संदेह हुआ...

उसके जाने के तुरंत बाद ही उठ कर उसके पीछे जाना चाहता था पर ऐसा कर न सका..

रिस्क बहुत था ...

और मुझे हर पल बहुत सावधान रहना था...

आस पास के लोगों के साथ खेलते खेलते धीरे धीरे करीब एक घंटा से ज़्यादा का समय बीत गया ...

बोर होकर अपने सूखे गले को तर करने के लिए पास ही घूम रही एक बार बाला को इशारे से ड्रिंक के लिए बोला..

बड़ी ही मोहक मुस्कान से उसने हाँ में सिर नवाया और कुछ ही पलों में एक ट्रे में एक विदेशी वाइन और एक ग्लास लिए उपस्थित हुई.. सर्व की... और फिर चली गई..

विदेशी वाइन की दो तीन घूँट अभी भरा ही था कि अचानक से वहां एक ज़ोरदार साईरन की आवाज़ पूरे हॉल में गूँज उठी |

जो जहाँ बैठे थे, वहाँ से उठ कर इधर उधर भागने लगे...

मेरे साथ टेबल पर बैठे लोग भी भाग खड़े हुए...

हालात को समझने के लिए मैंने, मेरे समीप से भागते एक शख्स को पकड़ा और इस भागदौड़ का कारण पूछा ...

वो मुझे हैरानी से देखते हुए बोला,

“क्यों भई... नए हो क्या?”

“हाँ”

“ओह्हो... इसलिए...अरे भाई.. इस सायरन का मतलब है की कोई अनहोनी.. दुर्घटना हुई है.. या फ़िर पुलिस आई है... ”

“पुलिस??”

“हाँ..”

अब तक हम दोनों हॉल में ही एक कोने में बने एक संकरी गली से बाहर निकलने को आगे बढ़ चुके थे...

मैंने पूछा,

“पर पुलिस क्यों भई? यहाँ तो सब......”

“अरे भाई... जहाँ इललीगल पोकर या जुआघर चलता हो... वहाँ रेड तो मारेगी ही न पुलिस...” मेरी बात को बीच में ही काटते हुए वह बोला |

“ओह.. अच्छा...”

अब तक हम दोनों हॉल से निकल गए थे.. वह दूर खड़ी अपनी बाइक के पास चला गया...

मैंने भी थोड़ी दूर पैदल चल कर एक ऑटो पकड़ा और घर के लिए निकल पड़ा.. |

----

अगले दिन सुबह,

अपने कोचिंग के दो टीचिंग स्टाफ के साथ बैठ कर कुछ सलाह मशवरा कर रहा था ..

मीटिंग के अंतिम पड़ाव पर ही थे कि तभी मेरा लैंडलाइन टेलीफोन घनघना उठा..

पहले तो इग्नोर किया..

पर जब लगातार चार बार बज चुका, तो बाध्य हो कर उठना ही पड़ा |

रिसीव किया,

उधर से आवाज़ आई,

“मिस्टर अभय??”

“जी बोल रहा हूँ |”

“ह्म्म्म.. मैं इंस्पेक्टर दत्ता बोल रहा हूँ --- एक ज़रूरी मामले में आपसे बात करनी है --- ज़रा पुलिस स्टेशन आइयेगा --- जल्दी |”

“पर क्यों सर --- क्या हुआ --- मैं दरअसल अभी अपने इंस्टिट्यूट में ......”

“जल्दी आइए --- आएँगे तो आप ही का भला होगा --- यों समझिए कि अभी आपके पास थाने आने के अलावा और कोई ऑप्शन नहीं है --- आ जाइए --- मिलते हैं |”

इतना कह कर उधर से फ़ोन कट गया |

मैं थोड़ा उलझा हुआ से वहीँ बैठा रहा कुछ देर --- फ़ोन को क्रैडल पर रख कर रूम से बाहर निकल कर एक सिगरेट सुलगाया; दोनों स्टाफ को छुट्टी दे दिया --- दिमाग में बहुत से प्रश्न चल रहे थे --- जिनमें से कुछ का जवाब तो शायद थाने जा कर अभी मिल भी जाए ; पर --- पर बाकी प्रश्नों के उत्तर कहाँ से ढूँढू --?

इंस्टिट्यूट को बंद कर बाहर सड़क किनारे खड़े अपने स्कूटर के पास आया ---

स्टार्ट करने ही वाला था कि कुछ दूरी पर खड़े एक पेड़ के ओट में किसी को छिपते हुए देखा --- ऐसा लगा जैसे कोई नज़र रखे हुए मुझ पर --- आश्चर्य तो हुआ पर इतने दिनों में घटी कई सारी घटनाओं ने अब थोड़ा थोड़ा कर के मुझे ऐसी बातों का अभ्यस्त बना दिया था |

खैर,

बालों को ठीक करता हुआ मैं स्कूटर के मिरर में देख ही रहा था कि अचानक से मेरा ध्यान कहीं और गया ---

हमारे घर की खिड़की से मेरी चाची मुझी को देखे जा रही थी ---

थोड़ा रुक कर इधर उधर देखने के बहाने घर की ओर देखा ---

मुझे घर की तरफ़ देखता हुआ देख कर चाची एक पर्दे के पीछे शायद छिपने ही वाली होगी की मैंने उन्हें देख लिया --- उनके पास सिवाय वहीँ रुक कर मेरी ओर एक मुस्कान देने के अलावा और कोई चारा न बचा ---

मैंने भी पलट कर एक मुस्कान दिया और हाथों के इशारे से बताया की थोड़ी देर में आ रहा हूँ ---

वही मुस्कान लिए उन्होंने भी सर हिला कर अपनी सहमति जताई |

स्कूटर स्टार्ट कर मैं आगे तो बढ़ गया पर अब पेड़ के पीछे छुपे आदमी के साथ साथ चाची वाला टेंशन भी दिमाग में घर कर गया ---

न जाने क्यों मुझे दोनों ही बात आपस में कनेक्टेड से क्यों लगने लगे ----??

क्रमशः
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09-12-2020, 12:49 PM,
#32
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग २९)

थाने में,

सामने टेबल पर कुछ फ़ोटो बेतरतीब तरीके से मेरे सामने रखे हुए हैं, और मैं भी बेतरतीब तरीके से बड़े ही अचरज भाव से देख रहा था उन्हें ---

इंस्पेक्टर दत्ता – “हाँ तो मिस्टर अभय जी, पिछले पन्द्रह मिनट से तो आप यही कह रहे थे कि न तो आप उस होटल में गए थे --- और न ही इस आदमी से आपका कोई संबंध ही पहले कभी था --- तो फिर आप उसके रूम क्या करने गए थे ---? और सबसे बड़ा प्रश्न तो यह कि आपने इस आदमी की हत्या आख़िर की ही क्यों??!”

एक ओर जहाँ इंस्पेक्टर की बातें मेरे कानो को चुभते हुए दिल-ओ-दिमाग को सुन्न करते हुए मेरे पूरे अस्तित्व को मानो वहीँ समाप्त करने को तैयार थे, वहीँ दूसरी ओर अच्छे से, पूरे होशो हवास से देखने के बाद भी मुझे उन फ़ोटोज़ पर यकीं नही हो रहा था ---

फ़ोटोज़ शायद किसी वाल कैमरा (सीसीटीवी कैमरा) नुमा चीज़ से ली गयी प्रतीत हो रहे थे ---

तनिक धुंधली होते हुए भी बहुत हद तक स्पष्ट थी वो तस्वीरें ---

ब्लैक एंड वाइट उस तस्वीरों में मुझे साफ़ देखा जा सकता है --- अपने जैकेट नुमा लिबास में हाथ डाले हुए --- एक कमरे की तरफ़ जाते हुए --- पूरा मुस्तैद --- ख़ास बात यह कि उन फ़ोटोज़ में कमरे की ओर जाते हुए मैंने (या वो जो कोई भी था); आँखों पर बिल्कुल वैसा ही चश्मा लगाए हुए था, जैसा की उस दिन मैंने पहना हुआ था --- लाल ग्लास वाले --- जोकि अक्सर पार्टियों या फंक्शन में बड़े या ख़ास लोग अक्सर पहने हुए मिल जाते हैं |

“नहीं .... सर .... यकीं कीजिए.... मैं.... मैं....म... नहीं गया.....”

“नहीं गए थे या नहीं जानते इसे?” थोड़े कड़क अंदाज़ में पूछा दत्ता ने |

“आई मीन, म... गया था .... पर जानता न...नहीं ....इसे.... प्लीज़... विश्वास कीजिए आप मेरा ....”

“फ़िलहाल विश्वास नाम के शब्द को साइड में रखते हैं ---- ये बताइए की क्यों गए थे आप वहां? वो भी इतनी रात गए”

“ह्म्म्म... म.. ब... बस,... ऐसे ही --- ”

“मिस्टर अभय --- झूठ बोलने के जितने प्रयास कीजिएगा ---- आपके लिए परेशानी उतनी ही बड़ी होती जाएगी --- और मैं यहाँ कानून के लिए बैठा हूँ , आपके लिए नहीं --- इज़ दैट क्लियर??”

कड़े , सधे अंदाज़ में एक स्पष्ट निर्देश दिया दत्ता ने ----

और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इतना तो मुझे अंदाज़ा हो ही गया था कि मेरी बाल की खाल उधेड़ने तक दत्ता मुझे छोड़ने वाला नहीं था |

सामने मेज़ पर कई तस्वीरों के साथ चार – पाँच अलग अलग एंगल से खिंची गईं तस्वीरें उस आदमी की भी है जिसके साथ मैं कुछ रात पहले होटल के कैसिनो में पत्ते खेल रहा था --- और इस समय उस आदमी की जिन तस्वीरों को देख रहा हूँ वो चीख चीख कर ये बात साफ़ साफ़ कह रही हैं कि ये मर चुका है !!

एक तस्वीर पर नाम लिखा हुआ था, ‘जयचंद बंसल ’! शायद ये नाम उसी आदमी का होगा ---

टेबल पर पास पानी रखे एक ग्लास उठा कर गले को तर किया ---

कंफ्यूज था मैं ---

अभी जिस परिस्थिति में फँसा हूँ उससे निकल तो सकता हूँ पर कहीं एक समस्या से बाहर आते ही किसी दूसरी समस्या में न जकड़ जाऊं ---- अभी तक तो यही होता आया है ---

थोड़ी देर चुप रह कर पहलु बदलता रहा, पानी पीते रहा थोड़े थोड़े घूँट भर के ---

दत्ता मेरे हरेक हरकत को नोट करता रहा --- उसे ये सब काफ़ी अम्युसिंग लग रहा होगा --- मैं भी मन ही मन उसे कई सारे गन्दी गालियाँ बक चुका पिछले १५-२० मिनट में ---

होंठों के कोने में एक हलकी फीकी मुस्कान लिए बोला वह,

“चाय पीयोगे?”

“जी?.... न... नहीं... धन्यवाद ...”

“अरे धन्यवाद वाली कोई बात नहीं ; जब तक तुम मेरे सभी प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं दे देते ; तब तक यहाँ हमारे अतिथि हो ... और तब तक हम तुम्हारे बुनियादी सुविधाओं का भरपूर ख्याल रखेंगे !”

दत्ता ने ये मुझ पर तंज कसा था या उसके उस बात में कहीं कोई सत्यता का कोई पुट था--- ये पता नहीं चला ---

कारण,

तभी एक शख्स कमरे में प्रविष्ट हुआ ---

देखने में काफ़ी शालीन --- सभ्य --- संभ्रांत --- उच्च शिक्षित सा प्रतीत होता --- सुलझा हुआ एवं गंभीर |

दत्ता भी उसे देख कर अपने चेयर से उठे और अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए उसका स्वागत किया,

“आइए बिंद्रा जी, आइए .... स्वागत है आपका .... बैठिए |”

दोनों ने एक दूसरे से हाथ मिलाया, थोड़ी इधर - उधर की बातें की , फ़िर ---

“अब केस के बारे में भी कुछ बातें हो जाए क्या मि० बिंद्रा ?”

“हाँ बिल्कुल, मैं तो आया भी इसलिए हूँ (मेरी ओर देखते हुए) --- अम.... ये कौन हैं?”

“फ़िलहाल तो सस्पेक्ट हैं --- खास तो कुछ जान नहीं पाया --- अब अगर आप कुछ उचरियेगा तो कुछ मालूम भी होगा और तब इनसे थोड़ी और पूछताछ हो जाएगी |”

“ओह .. तो यही भाई साहब हैं?”

“हाँ जी, प्राइम सस्पेक्ट तो फ़िलहाल यही हैं --”

“ह्म्म्म”

मिस्टर बिंद्रा मुझे ऊपर से नीचे तक अच्छे से देखा,

फ़िर दत्ता की ओर देखकर बोला,

“आप बुरा ना माने तो क्या मैं इससे कुछ प्रश्न पूछ सकता हूँ??”

दत्ता के पेशानी पर बल पड़े, ठीक से खुद को एडजस्ट किया कुर्सी पर, सशंकित नज़रों से बिंद्रा को देखा और ‘हाँ’ में सिर धीरे से हिलाया ---

बिंद्रा ने सस्पेंस बढ़ाते हुए फ़िर पूछा,

“आप अनुमति दे रहे हैं न ? कहीं किसी भी तरह का कोई एतराज़ तो नहीं??”

“अरे नहीं नहीं .. कोई समस्या नहीं .... आप पूछिए ... जो भी पूछना है |”

दत्ता पूरी तरह प्रस्तुत तो नहीं था पर मानने के अलावा शायद बन्दे के पास और कोई चारा भी न था |

दत्ता की तरफ़ से सहमति जान कर मि० बिंद्रा मेरी ओर पलटे --- आँख और चेहरा दोनों ही गंभीर --- सोच विचार करते हुए से --- शायद मन ही मन में इस बात को जांच कर आंकलन करना चाहते हो की ये मर्डर मैंने किया है या नहीं --- या --- मैं कर भी सकता हूँ या नहीं ---

बहरहाल,

मेरी ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा,

“हेलो, आई एम आकाश बिंद्रा .. एक्सपर्ट एंड चीफ़ ऑफ़ फोरेंसिक्स डिपार्टमेंट ---!”

‘ओह तेरी !!!’

मेरे दिमाग में यही एक बात सबसे पहले कौंधी !

तत्परता से ; पर तनिक काँपते हाथ को संभालता हुआ आगे बढ़ाया और दोनों ने ही एक अच्छा हैण्डशेक किया –-- मेरे हाथ को यूँ कुछ मजबूती से पकड़ा था मि० बिंद्रा ने की मानो मेरे हाथ को ही उखाड़ लेना चाहते हो ---

इतने दिनों इतनी सारी घटनाएँ घट चुकी थीं मेरे साथ और ऊपर से मोना के साथ उसके आदमियों से ली गई ट्रेनिंग और दूसरी कई बातों ने मुझे कई सारी बातों का ज्ञानी और अभ्यस्त बना दिया था ---

अतएव,

इस बात को भांपते मुझे देर न लगी कि बिंद्रा मेरे हाथों की मज़बूती की जांच कर रहा है किसी कारणवश --- इनका शायद ऐसा पुलिस प्रोसीजर होता होगा --- |

“जी, मैं अभय रॉय --- बाई प्रोफेशन आई एम अ टीचर --- खुद की एक कोचिंग सेंटर भी है --- |”

“कहाँ?” वाक्य समाप्त होते ही बिंद्रा ने प्रश्न दागा |

“यहीं, कल्याण नगर में --- मुखर्जी कॉलोनी --- गली नं० ५ ... फिफ्थ हाउस --- ”

कोशिश तो मेरी यही थी की मैं आत्मविश्वास से लबरेज़ नज़र आऊं |

“ह्म्म्म --- क्या क्या पढ़ाते हैं आप?”

“अंग्रेजी ! इंग्लिश मेरा प्रिय विषय है --- और इसके अलावा दो और स्टाफ़ हैं --- एक मैथ्स और फिजिक्स सँभालते हैं और दूसरा केमिस्ट्री और हिस्ट्री --- एक स्टाफ और है, जोकि उस सेंटर का देखभाल करता है --- पियून टाइप --- |”

“हम्म – ओके --- नाईस टू नो दैट --- म्मम्म--- परिवार में कौन कौन हैं आपके ? आर यू मैरिड?”

“नो सर, एम सिंगल --- परिवार में यहाँ चाचा – चाची के साथ रहता हूँ --- उनकी दो बेटियाँ हैं --- दोनों ***** राज्य में *********** स्कूल में पढ़ती हैं --- मेरे माता पिता, ******** में रहते हैं |”

“ओके ....”

सिर थोड़ा झुका कर दाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा ऊँगली के साथ अंगूठे को अपनी ठोड़ी पर रख कुछ सोचने लगा बिंद्रा --- उसके इस प्रोफेशनल सोचने के ढंग ने थोड़ा ही सही, मुझे अब टेंशन देना शुरू कर दिया --- उसे देखते हुए एक बार दत्ता की तरफ़ भी देखा, वो भी बड़े फोकस्ड तरीके से बिंद्रा के चेहरे पर नज़रें गड़ाए था ---

अंततः शांति बिंद्रा के आवाज़ ने ही भंग किया ---

“ये बताइए मि० अभय, क्या आपका कोई मिलिट्री बैकग्राउंड है? --- आपका, आपके परिवार का? किसी भी प्रकार का कोई रिलेशन? ”

“नहीं सर”

“श्योर?”

“१००%”

“हम्म ... अच्छा, कभी कोई ट्रेनिंग ली है आपने? मिलिट्री, पुलिस इत्यादि की --- खास कर हैण्डगन चलाने की??”

“बिल्कुल नहीं सर” बिंद्रा के इस प्रश्न ने थोड़ा हैरत में डाला मुझे |

“ह्म्म्म”

बिंद्रा दोबारा उसी सोचने वाले पोजीशन में आ गया |

“बात क्या है मि० बिंद्रा --- ऐसे सवाल क्यों कर रहे हैं आप?”

“बात ही कुछ ऐसी है मि० दत्ता ....”

“क्या बात है ... कुछ बताइए भी ....”

मेरी तरफ़ देख कर दत्ता की ओर पलटा बिंद्रा,

“इसके सामने कहूँ?”

“हाँ, कोई दिक्कत नहीं है |”

“ठीक है, सुनिए फ़िर.... जो क़त्ल हुआ था, पिछले दिनों योर होटल में ; उससे एक बात तो बिल्कुल साफ़ है की वो सिर्फ़ कोई आपसी रंजिश का मामला नहीं हो सकता --- ”

“ऐसा क्यों ?? किस बिना पर आप इतनी बड़ी बात कह सकते हैं मि० बिंद्रा ...??”

“वो ऐसे, (चेयर पर आराम से पीठ टिकाया बिंद्रा ने) --- की जिस आदमी का मर्डर हुआ, जयचंद ... जयचंद बंसल ... वो किसी आम हथियार से नहीं हुआ है..”

“हाँ पता है... गन का प्रयोग किया गया है ...” बिंद्रा की बात को बीच में काटते हुए दत्ता ने कहा |

बिंद्रा मुस्कराया,

बोला,

“पहले पूरी बात तो सुन लीजिए इंस्पेक्टर साहब ... ”

दत्ता सकपकाया,

बोला,

“जी बिल्कुल... कहिए... सॉरी...”

“हाँ, तो जैसा की मैं कह रहा था, इस जयचंद आदमी की हत्या हुई किसी हैवी कैलिबर वाले गन से... पॉइंट ब्लेंक तो नहीं कहूँगा पर हाँ, गोली चली है बहुत पास से ... यूँ समझिए कि आदमी से गन की दूरी बमुश्किल १० से १५ सेंटीमीटर की रही होगी ... ”

“ओह्ह !” दत्ता के मुँह से बरबस ही निकल गया |

“हम्म, और जैसा की आपको पता ही होगा की हैवी कैलिबर की गन मुख्यतः मिलिट्री गन ही होती और ऐसी गन को चला पाना किसी बलिष्ठ आदमी या फ़िर किसी मिलिट्री मैन से ही संभव है ..... ” इतना कह कर बिंद्रा थोड़ा चुप हुआ ....

जबकि दत्ता टेबल पर अपने दोनों हाथों की कोहनियों को टिका कर दोनों मुट्ठियों को आपस में मिला कर, उनसे अपने होंठों को दबाए गहन सोच में पड़ते हुए पास पड़े फ़ोटोज़ को देखने लगा ...

बिंद्रा की बातें और दत्ता के गहन सोच को देखते हुए मेरा खुद का टेंशन हवा हो गया --- बहुत रुचिपूर्ण बातें लग रही थी --- कभी सुना नहीं इसलिए अभी पूरी एकाग्रता से उनकी बातें सुनने लगा ...

“ह्म्म्म ... ह्म्म्म.... तो ... अगर इन तस्वीरों पर गौर किया जाए तो ये लड़का... आई मीन... ये जो अभी सामने बैठा है... फ़िट ज़रूर है पर बलिष्ठ नहीं .... और .. मिलिट्री मैन तो बिल्कुल नहीं है ... तो फ़िर .....”

“एक बात और है दत्ता साहब...”

“वो क्या मि० बिंद्रा ... ”

“अभी यहाँ थाने आते समय सोचा की एकबार मि० भट्टाचार्य.. प्रदीप्तो भट्टाचार्य से मिलता आऊँ... आप तो जानते ही हैं की कितने बड़े डॉक्टर हैं वे... खास कर डेड बॉडीज के साथ उनका कुछ खास ही याराना है ... इसलिए शायद पोस्टमॉर्टेम के अधिकतर कामों को वही संभालते हैं, ....... आज तो छुट्टी है उनकी ... इसलिए घर गया उनके ... सोचा मिल कर हाल चाल पूछ लूँगा और इस केस से संबंधित कुछ बातों पर भी डिस्कशन हो जाएगी ...”

“फ़िर?”

“डिस्कशन के शुरू होते ही उन्होंने एक बम फोड़ दिया दत्ता साहब..”

“कैसा बम?”

“उनका कहना है कि ... ये... स्वर्गीय जयचंद ... इनकी मृत्यु गोली लगने के पहले ही हो चुकी थी !”

“व्हाट?!?!”

बुरी तरह चौंका दत्ता और मैं भी ----

“यस...”

“कैसे?”

“डॉ० भट्टाचार्य का कहना है कि स्वर्गीय व्यक्ति की मृत्यु गोली लगने से करीब आधा घंटा पहले ही हो चुकी थी ... ‘ज़हर’ से ..!”

“ज़हर से?”

“हाँ, साइनाइड से.”

“साइनाइड?”

“उनका कहना है कि साइनाइड कई तरह .. कई किस्म के होते हैं .... उनमें से ही किसी का इस्तेमाल किया गया है ...”

“तो क्या... पता चला की किस किस्म का साइनाइड का इस्तेमाल किया गया था?”

“फ़िलहाल नहीं ... बहुत मुश्किल है ... कारण, अधिकतर किस्मों के न तो कोई रंग होता है और न ही कोई स्मेल (गंध) ... पर हाँ, ये ज़रूर पता लगाया जा सकता है कि ज़हर कैसे दिया गया था ... ”

“तो क्या इस केस में पता चला?”

“हाँ, डॉ० भट्टाचार्य का कहना है की इस केस में ज़हर दो तरीके से दिए गए... एक, शराब में मिला कर .. और दूसरा, किसी पिन जैसी चीज़ को जिस्म में चुभो कर.. ”

“पिन जैसी...”

“हाँ, पिन जैसी.. वैसे डॉ० को इस बात को थोड़ा और जांच करना पड़ेगा की क्या ज़हर पिन से ही दिया गया था या फ़िर किसी और चीज़ का इस्तेमाल किया गया था |”

“हम्म्म्म..”

“क्या हुआ दत्ता साहब... किस सोच में डूब गए?”

बिंद्रा ने दत्ता को चिंता में डूबे देख पूछा ---

दत्ता - “और कुछ नहीं ... बस यही सोचने लगा था कि दो अलग तरीके से एक ही आदमी को मारने का क्या काम? क्या लाभ?”

“शायद कोई बहुत ही नफरत करता होगा इस बन्दे से ... और कन्फर्म होना चाहता था की यह निश्चित रूप से मर जाए ....”

“हम्म... आपके इस बात में तो दम है .... (थोड़ा रुक कर) .. अच्छा, गोली क्या किसी हैवी कैलिबर की ही गन से की गई है?”

“हाँ, ये बात पक्की है.. हैवी कैलिबर गन इस्तेमाल की गई है ... और शायद वह सेमी आटोमेटिक गन हो सकती है”

“ह्म्म्म..” दत्ता एक बार फ़िर गहरी सोच में डूब गया ..... कुछ ही मिनट बाद उसका ध्यान मेरी तरफ़ हुआ, देखते ही बोला,

“तो क्या ये शक के दायरे से बाहर है?”

बिंद्रा एकबार मेरी तरफ़ अच्छे से देखा और दत्ता की ओर देखते हुए बोला,

“फ़िलहाल तो बाहर है.. ख़ास कर हत्या के दायरे से... और किसी दायरे में इसे रखना हो तो वो आप जानो...”

दो मिनट सोच कर दत्ता ने मुझे वहां से जाने ... मतलब घर जाने की परमिशन दी... पर साथ ही ये भी कह दिया कि जब भी थाने से कॉल आये तो मैं टाइम पर पहुँच जाऊँ |

मैंने राहत की साँस ली और वहां से बाहर निकल आया --- मन ही मन ईश्वर और बिंद्रा को धन्यवाद किया --- की इनकी वजह से ही मैं इस भारी मुसीबत से छूट पाया ---

अपने स्कूटर की तरफ़ बढ़ा ही था कि थाने के मेन गेट से थोड़ी दूर --- सड़क के उस पार एक काली फ़िएट कार पर मेरी नज़र गयी --- जो मेरे देखते ही देखते एकदम से गियर चेंज कर आगे बढ़ गई ---

बहुत मन किया कि मैं उस कार के पीछे जाऊँ पर किसी नई मुसीबत में फंस जाने के डर से ऐसा कोई कदम नहीं उठाया ----- |

क्रमशः
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09-12-2020, 12:49 PM,
#33
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३०)

“अभय, देखो तो.. ये रंग कैसा रहेगा...?”

“चाची... रंग तो ठीक ही है पर सिर्फ़ रंग से ही कुछ नहीं होता न.. कपड़े की क्वालिटी तो देखो.. वो भी चेक कर लो..”

“हम्म.. ठीक कह रहे हो.. (थोड़ा रुक कर) ... ओ भैया.. और भी तो दिखाओ..”

“जी मैडम”

आज चाची को लेकर मार्किट आया हूँ .... उन्हें आज ज़रुरत के कुछ सामान के साथ साथ अपनी दो लाडलियों के लिए स्कूल बैग्स भी लेने हैं --- चाचा को तीन दिन की छुट्टी मिली है .... इसलिए उन्होंने चाची को साथ ले कर उन दोनों से मिलने जाने का प्रोग्राम बनाया है --- मुझे भी कहा था साथ चलने को पर मैंने साफ़ मना कर दिया --- मना क्या किया, कोचिंग और स्टूडेंट्स का बहाना बना कर जाने में असमर्थता साफ़ साफ़ व्यक्त कर दिया --- चाचा ने अधिक ज़ोर न दिया --- शायद सफ़र के दौरान कुछ समय चाची के साथ एकांत में बिताना चाहते होंगे ---

चाची ने थोड़ा ज़ोर ज़रूर दिया था --- पर मेरे मूड को देख उन्होंने और कुछ न कहना ही बेहतर समझा |

मार्किट में कुछ और चंद ख़रीददारी कर के वापस लौट रहा था ऑटोरिक्शा में --- सामान तो हैं ही ज़्यादा --- इसलिए मुझे और चाची को बहुत सट कर बैठना पड़ा ...

इतने दिनों से घटी इतनी सारी घटनाओं ने मेरे दिमाग में चिंताओं का एक परमानेंट घर बना दिया था --- ये सब चिंताएँ वैसे भी सर दर्द से बढ़ कर हैं मेरे लिए... अभी पिछली चिंताओं में रत्ती भर की कमी आई नहीं कि जयचंद बंसल नाम के एक मर्डर केस में मैं प्राइम सस्पेक्ट बन गया ---

कानून का डर तो सब को रहता है ; पर कानून के रक्षकों में से एक अगर कोई इंस्पेक्टर दत्ता जैसा कोई हो तो डर थोड़ा और बढ़ ही जाता है --- पिछली मुलाकात में मुझे दत्ता उन पुलिसियों में से एक लगा जो एक बार किसी के पड़ जाए तो फ़िर बाल की खाल निकाले बिना तक चैन की सांस नहीं लेते --- |

उस दिन दत्ता ने मुझे जाने अवश्य दिया था, पर हर बुलावे पर थाने आ कर हाज़िरी दूँगा, मेरे इस वादे को कर लेने भर से तो वह मानने या विश्वास करने वाला नहीं लगता मुझे ---

ज़रूर मेरे लिए किसी को रखा होगा मुखबिरी करने हेतु ;

पर किसे ....

ये जानने का कोई स्रोत या उपाय पता नहीं मुझे -- |

अचानक ऑटोरिक्शा ने हिचकोला खाया, और मैं अपनी सोच की दुनिया से बाहर आया ... बाहर आते ही जिस बात का मुझे एहसास हुआ उसने मेरे पूरे शरीर में एक उत्तेजना वाली सिहरन दौड़ा दी ...

चाची मेरे बाएँ ओर साइड में बैठी थी और सामानों की कुछ अधिकता के कारण हम दोनों को ही सट कर बैठना पड़ा था ... पर अभी चाची को देख कर लग रहा था कि वह ऐसी परिस्थिति कर पूरा लाभ लेने का तय कर चुकी है --- अपनी दायीं उन्नत उरोज को मेरे बाएँ हाथ की कोहनी से एकदम कस कर दबा कर रखी है ... मेरे कोहनी तो लगभग पूरा ही विलीन हो गया था उस पुष्ट, नरम गदराए वक्ष में ! शुरू के चंद मिनट मेरे लिए दुविधा भरे रहे, कारण; कि मैं यह तय नहीं कर पाया की मुझे करना क्या चाहिए ... देखा जाए तो नारी देह मेरे लिए एक रूचियुक्त विषय होते हुए भी कोई रहस्य नहीं रह गया था --- चाची की ही मेहरबानी थी ---- जो मैं नारी देह और इससे संबंधित अन्य अनछुए पहलूओं को जान पाया |

उस नर्म, गुदाज छुअन का आनंद लेता हुआ मैं फ़िर से एक अलग ही दुनिया में पहुँच गया ... जी करने लग गया की अभी चाची से साथ जिस्मानी प्रेम के कुछ सीढ़ियाँ चढ़ जाऊँ... ऐसे अवसर बार बार तो नहीं मिलते न.. यही सोच कर,

थोड़ा सीधा हुआ...

कोहनी से थोड़ा अच्छे से रगड़ कर दबाया उस नर्म मांसल पिंड को ---- चाची की मुँह से आरामयुक्त यौनइच्छा वाली हल्की सिसकारी निकली ...लगा की जैसे थोड़ा और सट गयी मेरे से.... अब सच में और नहीं रहा गया... कुछ करने का मन कर ही गया ---- उन सामानों के बीच थोड़ा एडजस्ट हुआ और चाची की दायीं चूची को दबाने हेतु जैसे ही अपना दायाँ हाथ उनके वक्षस्थल के समीप ले गया ; ठीक उसी समय --- रास्ते पे मौजूद खड्ड के कारण ऑटो एकबार फ़िर हिचकोला खाया... अब तक मेरे कंधे पर सर रख कर ऊँघ रही चाची इस हिचकोले से उठ गयी और सीधी होकर ख़ुद को व्यवस्थित करने लगी --- |

मन ही मन किस्मत और प्रशासन को गाली देने के अतिरिक्त और कोई चारा न रहा मेरे पास........

ऑटो से बाहर देखने लगा ---- और ठीक से २ मिनट भी न गुज़रे होंगे की सड़क के दूसरी ओर एक पहचाना सा चेहरा दिखा... चेहरा पहचाना सा तो लगा ही ; साथ ही न जाने क्यों मुझे उस चेहरे के बारे में सोचने पर विवश कर दिया .....

आँखें बंद कर अभी अभी उस देखे हुए चेहरे पर पूरे मनोयोग से याद कर दिमाग पर ज़ोर देने लगा...

यहाँ मैं ‘ईश्वर’ को धन्यवाद करना चाहूँगा , कि उनकी ही विशेष ‘ईश्वरीय’ कृपा बचपन से मुझ पर ऐसी है कि दो-एक मामलों में मैं स्वतः ही बहुत निपुण हूँ ... जैसे की अगर आँख बंद कर किसी वस्तु, व्यक्ति या विषय को लेकर थोड़ी चिंतन करूँ या दिमाग पर ज़ोर दूँ तो उस वस्तु, व्यक्ति या विषय से संबंधित बहुत सी बातें मुझे स्मरण हो आती हैं ; बशर्ते, मैं स्वयं उस वस्तु, व्यक्ति या विषय का प्रत्यक्ष साक्षी होऊँ ----

यही अब मैं कर रहा था... उस पहचाने हुए चेहरे को सोच सोच कर दिमाग पर ज़ोर देने लगा ... और चंद पलों में ही मुझे बहुत कुछ स्मरण हो आया... मैं चौंक उठा और,

“अरे साला...!!” .... मेरे मुँह से अनायास ही निकला ----

मेरे अचानक से ऐसा करने से आँखों में जिज्ञासा वाले भाव ले चाची मेरी ओर देखने लगी ---

मैं शांत बैठा रहा ... सोच रहा था की क्या करूँ .... मेरी ओर से वाँछित प्रतिक्रिया न पा कर चाची आख़िर पूछ ही बैठी,

“क्या हुआ अभय... कुछ छूट गया क्या...??”

“नहीं चाची... छूटा नहीं.... पर यदि शीघ्र कुछ न किया तो अवश्य ही छूट जाएगा..... |”

“क्या छूट जाएगा?”

“अं....म्मम्मम... क..कुछ नहीं...” चिंतित स्वर में बोला |

क्षण भर का भी समय न गवांते हुए बोला,

“भैया... ज़रा ऑटो को साइड करना..”

मेरे इतना कहते ही चाची हैरानी से मेरी ओर देखी ---- मैंने धीरे से उन्हें कहा,

“एक बहुत ही ज़रूरी काम आन पड़ा है... मुझे अभी जाना होगा... आप प्लीज़ बुरा मत मानना...”

कहते हुए चाची का दायाँ हाथ धीरे से दबा दिया.. प्रत्युत्तर में चाची भी धीरे से “हाँ” कहते हुए सहमति में अपना सर हिलाई....

ऑटोवाला अब तक ऑटो सड़क के किनारे साइड करके रोक चुका था ...

मैं लगभग छलांग सा लगाता हुआ ऑटो से उतरा और हाथ हिला कर चाची को बाय बोल कर दौड़ते हुए सड़क के दूसरी ओर चला गया ---- और फ़िर तेज़ कदमों से चलता हुआ उस पान दुकान को ढूँढने लगा जिसके सामने उस चेहरे के मालिक को कुछ मिनट पहले देखा था ---- ज़्यादा देर न लगा दोनों को ढूँढने में – पान दुकान और उस चेहरे के मालिक को ....

“हाँ... यही है वो...”

दरअसल ये वही लड़का है जो आज से प्रायः महीने भर पहले हमारे घर के पीछे चाची के उन्नत गदराए वक्षों को जी भर कर मसला था और जिसका मैंने कुछ दूरी तक पीछा भी किया था .....

उस पान दुकान से परे हट कर एक और पान दुकान थी... यही कुछ सात-आठ क़दमों के फासले पर ... वहां गया और एक सिगरेट ले कर सुलगाया... ध्यान उसी लड़के पर था... वह इधर उधर की बातें किए जा रहा था... पर ज़्यादा देर खड़े रहने की ज़रुरत नहीं हुई --- दस मिनट बाद ही वह वहां से चल दिया..

काफ़ी दूर तक यूँही पैदल चलता रहा वो...

मैं भी पूरी सतर्कता के साथ उसके पीछे लगा रहा --- पर यहाँ मुझे जो एक अजीब सा एहसास हुआ; वह यह की आस पास के कुछ दुकान और बिल्डिंग्स को देख कर ऐसा लगा मानो मैं इस जगह पर शायद पहले भी आ चुका हूँ --- इस बारे में सोचता हुआ मैं आगे बढ़ता, उसका पीछा करता रहा --- थोड़े ही देर में एक चाय दुकान को पार कर आगे एक टूटे फूटे झोपड़े से मकान के पास जा कर रुका... वह लड़का आगे जा कर एक छोटा रास्ता पार किया और सामने एक बिल्डिंग की ओर बढ़ गया ...

बिल्डिंग की ओर अच्छे से देखते ही मेरा दिमाग ठनका;

‘अरे! ये तो वही बिल्डिंग हैं न, जहाँ चाची को पहली बार देखा था .... उन संदिग्ध लोगों के साथ --- लाल वैन में --- बुर्के में --- अंदर से एकदम नंगी!!’

लड़का अंदर बिल्डिंग में घुसा... नीचे वाले हिस्से में (ग्राउंड फ्लोर) दर्जी का दुकान खुला था --- लड़का पहले दुकान में घुसा ... दुकान में एक बूढ़ा था --- पकी हुई लंबी सी दाढ़ी --- गले से लटकता हुआ सीने पर तार वाला चश्मा --- दोनों में कुछ बातें हुईं ... अगले ही मिनट में वह लड़का दुकान से निकल कर बगल में मौजूद सीढ़ियों के रास्ते ऊपर के फ्लोर में चला गया --- मैं उस लड़के के पीछे जाने का उपक्रम करने ही वाला था की सोचा उस बूढ़े को भी ज़रा देख लूँ ; कि वह क्या करता है....

लड़के के ऊपर गए शायद ५ मिनट भी न हुए होंगे; देखा, बूढ़ा सिलाई मशीन वाले टेबल पर से उठा, ४-६ कदम चल कर दुकान के दरवाज़े तक आया --- सामने सड़क की ओर ज़रा सा झुक कर दाएँ बाएँ देखा और फ़िर झट से दुकान का शटर गिरा दिया !

मैंने अपनी रिस्ट वाच पर नज़र डाला ....

दोपहर के १:३० (डेढ) बज रहे हैं !

लंच टाइम... !

ये तो समझ गया की बुड्ढे का दुकान का शटर गिराना और लड़के का सीढ़ियों के रास्ते ऊपर जाना; दोनों ही बातें आपस में जुड़ी हुई हैं ....

अतएव,

मैंने भी यह निश्चय कर लिया कि मुझे भी किसी भी प्रकार से उस बिल्डिंग में दाख़िल होना है .... पिछली बार कैसे गया था, इस बात को जानने के लिए सिगरेट फूंकते हुए एकाग्र होकर दिमाग पे ज़ोर दिया --- एकदम से तो नहीं पर धीरे धीरे सब याद आता गया ......

कुछ ही क्षणों में याद आ गया की पिछली बार कैसे अंदर घुसा था ---

अधजले सिगरेट को फ़ेंक कर आगे बढ़ा;

पिछली बार की ही तरह उस बिल्डिंग में घुसा... इसबार पहले से भी कहीं अधिक सतर्कता के साथ .... और ये सब संभव हो रहा था मोना और उसके आदमियों से मिली ट्रेनिंग की बदौलत .....|

गलियारे से होते हुए दूर एक कमरे से आवाजें आ रही थीं ... सधे व दबे क़दमों से उस ओर बढ़ा --- गलियारे में दाएँ बाएँ दोनों तरफ़ ५ - ५ कमरे हैं --- बाएँ वाले ५ में से ३ कमरों के दरवाज़ों पर ताले लगे हैं --- और दाएँ तरफ़ के ५ में से ४ कमरे खुले हैं... बाएँ तरफ़ के २ कमरों और दाएँ तरफ़ वाले ३ कमरों में बड़े बड़े कार्टन और लकड़ी के बक्से रखे देखा... सभी अच्छे से बंद --- पर जहाँ से आवाजें आ रही हैं ; वो है दायीं ओर की ही गलियारे में स्थित पांचवा, अर्थात अंतिम कमरा --- उस कमरे के पास पहुँचने में अधिक विलंब नहीं किया --- एक बात जो काबिले गौर है; वह ये की पिछली बार मुझे कमरे जितनी बुरे और टूटे फूटे हालत में मिलते थे, इस बार इनकी स्थिति कुछ सुधरी हुई है .... |

दरवाज़ा पल्ले से भिड़काया हुआ था --- साथ ही पास में थोड़ी जगह ऐसी है कि किसी के अचानक वहाँ आने पर वहां उस जगह में छुपा जा सकता है --- अंदर से आती आवाजों की ओर ध्यान दिया --- उनकी बातों से अंदाज़ा लगाया की अंदर मुश्किल से तीन या चार लोग होंगे --- ठहाकों के साथ कुछ दिलचस्प बातें हो रही हैं अंदर;

“......... वही तो , पर और कुछ भी कहो रहमत भाई, अपने गफूर चचा पचहत्तर के उम्र में भी मस्ती करने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते... हा हा हा ...“

“हाँ ... हो हो हो.... अपने गफूर चचा हैं बड़े रंगीन मिज़ाज के आदमी... शौक बड़े बड़े हैं इनके... हा हा हा..”

“अरे क्यों न होऊं भई... मेरी कौन सी उम्र जा रही है...” एक आदमी की नाराज़गी भरी आवाज़ आई |

“अच्छा छोड़ो उस औरत की बातें, चचा... और आलोक, तुम.... ये बताओ की अगला कन्साइनमेंट कब तक आ जाएगा... कोई पक्की ख़बर?”

“ख़बर तो है कि परसों को पहुँचेगा ...”

“ह्म्म्म.. अच्छी बात है... पर ख्याल रहे की किसी को भी कानो कान इन सब बातों की भनक तक नहीं लगनी चाहिए......”

“अरे आप बेफ़िक्र रहो रहमत भाई... इतने सारे माल पहुँच गए... ज़रा सा भी कहीं कोई दिक्कत हुआ क्या...? ये वाला भी आ जाएगा --- अच्छा, एक बात बताइए.. ये जो कन्साइनमेंट आने वाला है, इसमें भी वही माल है न जो बाकी यहाँ रखें पेटियों में हैं...??”

“हाँ, वही है... और बाकियों की तरह ही बेशकीमती है... |” अबकी बार इस आदमी की आवाज़ में गम्भीरता का पुट था |

उसकी इस बात ने मेरे दिमाग के बचे खुचे सुस्त पड़े तंत्रिकाओं को भी सचेत कर सुपर सक्रीय कर दिया.... ‘माल’ ... ‘कैसा माल’ .. “क्या और कैसा कन्साइनमेंट?” “पेटियाँ!!” .... मेरी नज़रें अपने आप ही पीछे के कमरों की तरफ़ गई... इस रूम तक आते समय जिन कमरों में पेटियाँ रखीं देखा, क्या उनमें भी ‘माल’ हैं----??

फ़िर आवाज़ आई,

“गफूर चचा, पहली खेप की जानकारी तो वही.. उसी तरीके से ही उन लोगों तक पहुँचाई जाएगी...?” लड़का बोला ...

“हाँ, और नहीं तो क्या... इस तरह से तो कोई हम पे शक भी नहीं करता है.. या यूँ कहो कि शक करने या होने का सवाल ही पैदा नहीं होता --- हा हा हा --- वो ‘छमिया’ एकदम पेरफ़ेक्ट है ऐसे कामों के लिए ... उससे ज़्यादा भी करवा लो तो कोई दिक्कत नहीं... डिकोस्टा साहब तो ख़ुद ही कह रहे थे कि उस छमिया को बस गर्म भर कर देने की देर है, फ़िर तो जो करती है... खी खी खी.... और कह रहे थे की उस दिन तो वो उछल उछल कर ली थी ...|”

गफूर की बात खत्म होते ही वह कमरा दोबारा ठहाकों से गूँज उठा...

फ़िर,

“चलो चलो ; अब निकलते हैं... आज इतना ही... चचा .. आप जा कर दुकान खोल लो.. आलोक, तुम तो अभी अपने गिफ्ट शॉप में जाओगे ...सीधे वहीँ जाना .. मैं ज़रा चाँद मियाँ से मिल के आऊँ... डिकोस्टा साहब से भी बात करनी है... उफ़. बहुत काम है.. |”

इसके बाद कमरे से कुछ खटपट की आवाजें आने लगीं.. समय नहीं था मेरे पास.. दबे पाँव जल्दी पीछे हटा और खुले हुए एक कमरे में घुस कर एक के ऊपर एक रखी हुईं पेटियों के पीछे जा छुपा ---

पेटियों के पीछे से ही उन तीनो को जाते हुए देखा.. तीनो बेपरवाह से चलते चले गए ... कमरे की तरफ़ ज़रा सा भी देखा तक नहीं... काफ़ी समय तक यूँ ही बैठा रहा.. जब मन आश्वस्त हुआ की अब कोई नहीं आने वाला है तो अपने जगह से उठा .. पास ही रखी एक पेटी को ठोक-बजा कर, हिला कर देखा.. पॉकेट से पेन नाइफ निकाला.. ट्रेनिंग के समय मोना ने ही ये सख्त सलाह दी थी कि मैं अब कोई छोटा सा हथियार रखना शुरू करूँ ... उसने ही मुझे एक पेन दिया था, जो काम भी पेन की ही तरह करता है.. साथ ही उसी में, साइड में दो छोटे चाकू और एक छोटा सा कैंची भी घुसा कर लगाया हुआ है.. बहुत काम का है.. आज ज़रूरत भी पड़ गई... किसी तरह लकड़ियों के दो परतों के बीच में चाकू को फँसा कर पेटी के अंदर देखने लायक जगह बनाया...

और ऐसा करते ही जो कुछ नज़र आया उसकी मैंने फ़िलहाल कोई कल्पना तक नहीं की थी --- अंदर मशीन गन, रिवाल्वर जैसे विदेशी हथियार भरे हुए हैं..!! पहचानने में मुझसे कोई भूल नहीं हो रही --- शत-प्रतिशत वही है --- भला आग्नेयास्त्र पहचानने में किसी से कैसे कोई भूल हो सकती है...? जल्दी से कार्टन (कार्डबोर्ड) वाले पेटियों के पास पहुँचा .. चाकू से पेटी के ऊपर दो पल्लों को जोड़ने वाले टेप को फाड़ा --- उसमें ठसाठस ठूँस के भरे प्लास्टिक के कई छोटे छोटे पैकेट्स हैं जिन में गाढ़े कत्थे और थोड़े थोड़े काले रंग मिश्रित पाउडर जैसा कुछ भरा हुआ है... सभी पैकेट्स में ... उन पैकेट्स को देखते ही मुझे एकदम अचानक से मिस्टर एक्स की बातें याद आ गईं जो उन्होंने आज से करीब दस महीने पहले कहे थे... एक अधूरे भेंट के दौरान.. अधुरा इसलिए क्योंकि मैं उसका चेहरा नहीं देख पाया था ... खैर, उन्होंने कहा था कि कुछ लोग, सीधे अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोग हमारे इस शहर में अवैध कार्यों में लिप्त हैं और अवैध हथियारों के साथ साथ चरस, कोकेन और गाँजा का व्यापार कर रहे हैं ... तो क्या अभी मैं जिन चीज़ों को देख रहा हूँ... ये वही हैं??

रिस्ट वाच पर अनायास ही नज़र गई.. ३ बजने में पन्द्रह मिनट रह गए हैं --- उफ़.. बहुत देर हो गई --- चलना होगा... पैकेट्स को अन्दर रख कर, उस कार्टन पर जल्दी से दूसरे कुछ कार्टन को रख कर मैं जल्दी से कमरे से बाहर निकला और जल्द ही बिल्डिंग से बाहर आ गया --- बिल्डिंग से बाहर आने के लिए मैंने दूसरा रास्ता चुन लिया था ... दूसरे रास्ते से निकलने से मेरे घर की ओर जाने वाला रास्ता थोड़ा दूर पड़ गया पर इतना मेहनत मेरे को स्वीकार है इस समय...

मेन रोड पे पहुँचते ही एक ऑटो कर लिया और रवाना हुआ घर की ओर...

मन में कई प्रश्न लिए...

ये लोग एक्साक्ट्ली कौन हैं...?

बक्सों, पेटियों में जो भी सामान हैं, क्या सब अवैध हैं? ---- निश्चय ही होंगे, अवैध ही हैं... पर यहाँ क्यों है?

किस ‘माल’ --- ‘छमिया’ की बात कर रहे थे वो लोग ?

और सबसे बड़ा प्रश्न....

ये साला मिस्टर एक्स कहाँ गया..? दस महीने से ऊपर हो गया अभी तक उसकी तरफ़ से मुझे कांटेक्ट क्यों नहीं किया गया??

क्रमशः

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Reply
09-12-2020, 12:49 PM,
#34
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३१)

दो दिन बाद,

पुलिस स्टेशन में...;

इंस्पेक्टर दत्ता के सामने बैठा हुआ उसे उस लड़के और साथियों के बारे में बता रहा था...

सब बताया, पर अपने स्टाइल में.. कुछ छुपाया, कुछ बदल दिया..

दत्ता मेरी बातों को सीरियसली सुन तो रहा है.. पर उसका बॉडी लैंग्वेज साफ़ बता रहा है की वो ज़रा भी सीरियस नहीं है ...

मेरी पूरी बात ख़त्म होते ही उसने टेबल पर रखी घंटी बजाई,

एक मरियल सा आदमी आया --- जिसके शरीर पे वर्दी ऐसे चढ़ाई हुई है मानो वर्दी को खूंटे पर से लटकाया गया हो ....

आते ही सैल्यूट बजाया;

“दो चाय ....”

दत्ता का ऑर्डर पूरा ख़त्म होने से पहले ही दोबारा सैल्यूट मार कर चला गया...

उसके जाते ही दत्ता मेरी ओर दोबारा ध्यान दिया...

“फ़िर से कहना.. उस लड़के को कैसे जानते हो?”

“काफ़ी दिनों से मेरे घर के आस पास चक्कर काटता था..”

“ऐसा?”

“जी, ऐसा.”

“क्यों?”

“पता नहीं... पर कल जब पीछा किया, तब जा कर ये सब पता चला...”

“क्या पता चला?”

“सर...!!??”

“अरे भई पता है ... पता है.. तुमने अभी अभी मुझे सब बताया है... पर मैं कुछ भी सोचने से पहले एकबार और तुम्हारी ज़ुबानी सुनना चाहता हूँ .. अच्छा, ये बताओ.. तुमने एक्साक्ट्ली वहाँ अंदर घुस कर क्या क्या देखा?”

“कुछ लोग थे.. गिन नहीं पाया ठीक से.. पर उनके बातचीत से अंदाज़ा लगाया कि उस समय वहाँ तीन ही लोग थें .. जब वे लोग बाहर चले गए, तब एक रूम में घुस कर उन पेटियों को चेक किया --- हथियार थे... और --- गाँजा, अफ़ीम, चरस जैसे दिखने वाले पाउडर थे छोटे छोटे प्लास्टिक पैकेट्स में..”

“ह्म्म्म.....” दत्ता सोचने की मुद्रा में आ गया..

फ़िर बोला,

“अभी सोचने वाली बात यह है कि, तुम्हें किसी देखा तो नहीं वहाँ जाते, अंदर घुसते हुए?”

“म्मम्म.. नहीं..”

“क्या नहीं?”

“मुझे नहीं लगता मुझे किसी ने देखा होगा वहाँ जाते या अंदर घुसते हुए”

“श्योर?”

“शायद...”

“शायद से काम हो जाएगा? ऐसी चीज़ें शायद से चलती हैं??” थोड़ा तुनक कर बोला दत्ता |

दत्ता की ये हरकत देख कर मुझे हँसी आ गई; पर संभल कर रहा.. दत्ता की बात में दम है.. ये बात तो मैंने सोचा ही नहीं था.. सोचा क्या नहीं था, सच कहो तो दिमाग में ऐसी किसी भी संभावना का ध्यान तक नहीं आया था.. ये तो बुरा फँसा मैं.. चिंता के बादल मेरे चेहरे पर उमड़ने-घुमड़ने लगे ....

मेरी परेशानी को समझते हुए दत्ता बोला,

“दोपहर कितने बज रहे थे उस समय?”

“डेढ़”

“आस पास चहल – पहल थी?”

“नहीं.. बहुत कम... वो जगह ही ऐसी है”

“हम्म.. उस बिल्डिंग के आस पास कितने और दुकानें हैं?”

“उस बिल्डिंग से सटी एक दुकान और है पर बंद था उस समय.. उस बिल्डिंग से थोड़ी दूर एक चाय वाले की दुकान है.. उस चाय दुकान से बाएँ करीब बीस कदम की दूरी पर एक बहुत ही दयनीय अवस्था में मौजूद एक खंडहर नुमा घर है.. चाय दुकान के दाएँ से करीब दस से पन्द्रह कदमो की दूरी पर बच्चों के फैंसी ड्रेस वाले दो दुकान हैं... एक और है.. उसपे ध्यान नहीं दिया..”

“हम्म.. अभी के लिए इतनी जानकारी काफ़ी है.. बाकी जानकारी मैं निकलवा लूँगा---”

“जी..”

“अच्छा अभय, अगर तुम उन तीनों में से किसी को भी... या तीनों को ही अगर तुम्हारे सामने लाया जाए तो क्या तुम उन्हें पहचान लोगे --- संभव है?”

“जी, उस बूढ़े को और मेरे हमउम्र लड़के को पहचानने में मुझसे कोई गलती नहीं होगी.. पर...”

“पर??”

“पर उस तीसरे शख्स को मैं देख पाने में सफ़ल नहीं हो पाया था.. अतः तीसरे बन्दे को मैं पहचान नहीं पाऊँगा...|”

“कोई बात नहीं... जिनको पहचान सकते हो उन्हीं से उगलवा लेंगे”

“जी, अच्छा है”

“पूरी बात बताते समय तुमने ये भी कहा था न कि उन लोगों ने एक और आदमी का नाम लिया था--- क्या नाम था उस आदमी का?” दत्ता अपने दाएँ हाथ की तर्जनी ऊँगली से अपने सिर के बीचों बीच हल्के से मारते हुए कहा ---

“डिकोस्टा!” मुझे भी जैसे एकाएक याद आया वह नाम |

“हाँ... डिकोस्टा !... उसका क्या कहानी है?”

“पता नहीं सर.. पर उनमें से एक; जिसका नाम रहमत था, वो कह रहा था कि उसे उस ‘डिकोस्टा’ से बात करनी है.... ‘माल-माल’ कह कर बात कर रहा था.. उसके बात करने के ढंग से ऐसा अंदाज़ा हुआ कि उसे किसी बहुत ही ज़रूरी मैटर पर डिकोस्टा से बात करनी है..”

एकबार फ़िर थोड़ा छुपा कर ; और थोड़ा मसाला लगा कर बात को सामने रखा.. |

“डिकोस्टा .... डिकोस्टा... डिकोस्टा... डि...” इस नाम को बहुत धीरे धीरे बोलते हुए, प्रायः बुदबुदाते हुए ; दत्ता टेबल पर सामने रखे पेपरवेट को उठा कर दोनों हाथों की मुट्ठियों में लेकर घुमाने लगा --- इस ‘डिकोस्टा’ नाम पर ख़ास ज़ोर देने लगा वह...

कुछ देर चुप्पी छाई रही कमरे में...

दोनों में से कोई कुछ न बोला....

मैंने सामने रखे एक समाचार पत्र को उठा कर थोड़ा थोड़ा देखने लगा --- बीच बीच में तिरछी नज़रों से दत्ता की ओर देख लेता --- दत्ता बड़ा ही सीरियस लग रहा था; उसकी आँखें और भौंहें दोनों ही सिकुड़ चुकी है --- जैसे बहुत ही ध्यान लगा कर कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो... |

अंततः उसी ने चुप्पी तोड़ी;

“अभय, जैसा की तुमने बताया था कि कुछ लोग तुम्हारे घर के चक्कर काट रहे थे, नज़र रख रहे थे .... तुम्हें क्या लगता है; क्यों कर रहे थे ऐसा वो लोग..?”

मैं थोड़ा सकपकाया,

क्योंकि मुझे अंदेशा तो था कि ऐसा कोई प्रश्न ये दत्ता कर सकता है; पर अभी तक कोई यथोचित उत्तर मुझे सूझा नहीं था --- और अब तो दत्ता ने पूछ भी लिया --- इसलिए कोई ऐसा उत्तर मुझे देना ही पड़ेगा जिससे दत्ता और उसका प्रश्न --- दोनों ही संतुष्ट हों ... |

“अं... पता नहीं सर... अब भला ये बात मुझे कैसे पता होगी?”

“ह्म्म्म... फ़िर भी....”

दत्ता की बात पूरी होने से पहले ही दरवाज़े पर दस्तक हुई.. और तुरंत ही एक संतरी भीतर आ कर “जय हिन्द सर” बोलते हुए दत्ता को सैल्यूट मार कर खड़ा हो गया ...

“जय हिन्द.. बोलो गिरधर, क्या बात है..?”

“सर, ये फ़ाइल... आपने....”

“हाँ हाँ... वो विनय वाली फ़ाइल.. लाओ इधर..”

गिरधर नामक उस संतरी ने आगे बढ़ कर फ़ाइल दत्ता के सामने टेबल पर रख दिया... और पूर्ववत् अपने स्थान पर आ कर सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया |

फ़ाइल के पन्नों को पलटते हुए दत्ता बोला,

“अच्छा गिरधर..., तुम तो विनय के साथ अधिकांश समय रहते थे न... विशेष कर जब उसे कहीं छापा वगैरह मारनी होती थी...??”

“जी सर..”

“गायब होने से पहले उसने क्या कहीं कोई छापा मारा था?”

“यस सर, इस शहर के सबसे नामी और उतना ही बदनाम होटल कम रेस्टोरेंट ‘योर होटल’ में एकबार छापा मारा था उन्होंने...”

मैंने गौर किया, ये गिरधर बड़ा नपा तुला उत्तर दे रहा है हर प्रश्न का ... सिर्फ़ उतना ही; जितना की इससे पूछा जा रहा है ---

“क्या?? योर होटल?! उसमें छापा !! --- (चौंकते हुए बोला दत्ता; फिर पूछा) --- कुछ मिला था वहाँ से?”

“जहाँ तक मुझे पता है सर, कुछ ख़ास हासिल नहीं हुआ था ...”

“ओह”

“पर..”

“पर?”

“पर सर.....”

“बोलो गिरधर... क्या बात है?”

“सर, माफ़ कीजिएगा --- छोटी मुँह बड़ी बात --- मैं बहुत ही दिनों; --- दिनों क्या --- महीनों और सालों से विनय सर के साथ रहा हूँ --- बहुत काम किया उनके साथ --- इतना की कभी कभी तो मैं उनके एक्शन या उनके कुछ बोलने से पहले ही ; वह क्या बोलने या करने वाले हैं --- ये अंदाज़ा लगा लेता था --- और हर बार बहुत हद तक सफ़ल भी हो जाता था --- अंतिम बार, ये जो ‘योर होटल’ में छापा मारने गया था उनके साथ --- भले ही कुछ ख़ास हासिल न हुआ हो हमारी पूरी छापेमारी वाली टीम को --- पर मुझे विनय सर के हाव – भाव देख कर ऐसा लगा था कि उन्हें कुछ मिला था ---- .........”

“क्या मिला था...??” संतरी की बात को बीच में ही काटते हुए दत्ता बोल उठा ..

“पता नहीं सर”

“तो तुमने पूछा नहीं...??” दत्ता उतावला होने लगा ---

“सर, एक तो मैं उनसे छोटा ... दूसरा, मुझे तो सिर्फ़ ऐसी किसी बात का अंदाज़ा भर हुआ था... कैसे पूछ लेता साब ?” चेहरे पर अफ़सोस और बेचारगी वाले भाव लाते हुए बोला गिरधर |

“ओफ्फ्फ़...”

कहते हुए दाएँ हाथ की मुट्ठी से हल्के से टेबल पर प्रहार किया दत्ता ने --- असफ़लता वाली खीज --- ऐसी खीज जो सामान्ययता सफ़लता के बहुत पास पहुँच कर असफ़ल होने से होती है --- |

तभी उसकी नज़र मेरे तरफ़ हुई --- फ़िर उसने सामने रखे फ़ाइल की ओर देखा --- फ़िर खुद को थोड़ा संयत करता हुआ गिरधर से बोला,

“तुम अभी जाओ --- बाद में बुला लूँगा |”

“सर!” कहते हुए गिरधर ने एक ज़ोर का सलाम बजाया और खड़े खड़े एक कदम पीछे होकर पीछे मुड़ा और लंबे डग भरता हुआ कमरे से बाहर चला गया ---

उसके जाते ही मैं बोल उठा,

“एक बात पूछूँ?”

“मुझे पता है तुम क्या पूछोगे....” चेहरे पर एक मुस्कराहट लाते हुए दत्ता बोला ---

“पता है??!”

“हाँ...”

“कैसे?”

“अंदाजन ....”

“तो फ़िर कृपया जिज्ञासा शाँत करने की कृपा करने ...” चापलूसी वाले स्वर में दिखावटी विनती करता हुआ मैं बोला ---

“हाहाहा ......” मेरे प्रयास को देख कर हँस पड़ा दत्ता ---

फ़िर बोला,

“ये हमारे ही विभाग के सीनियर इंस्पेक्टर; इंस्पेक्टर विनय की गुमशुदगी की फ़ाइल है ---” कहते हुए थोड़ा निराशा हो गया दत्ता |

“गुमशुदगी --- कैसे??” कौतुहलवश समय न गँवाते हुए पूछ बैठा ....

थोड़ा शाँत रहा दत्ता,

फ़िर बोला,

“वही तो पता करना है... खैर, तुम अभी जाओ... ज़रूरत हुई तो बाद में बुला लूँगा ...... |” बुझे बुझे से स्वर में दत्ता बोला ---

“जी सर..”

मैं उठा और कमरे से बाहर निकल आया --- अपने साथ कुछ प्रश्न लिए --- |

क्रमशः

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09-12-2020, 12:50 PM,
#35
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३२)

फोरेंसिक्स डिपार्टमेंट..

सुबह के साढ़े दस बज रहे हैं..

फोरेंसिक्स चीफ़ अपने चेयर पर.. और उनके सामने मौजूद टेबल के दूसरी ओर, उनके विपरीत दिशा में दो विज़िटर्स चेयर में से एक में बैठा मैं..

कुछ ही सेकंड्स पहले दो कप कॉफ़ी सर्व किया गया ..

और अभी हम दोनों ही एक एक कप उठा कर गर्म कॉफ़ी की धीरे धीरे चुस्कियाँ ले रहे हैं...

फोरेंसिक्स चीफ़ बिंद्रा, आकाश बिंद्रा के सामने, टेबल पर कुछ डॉक्यूमेंट्स रखें हैं जिन पर वह बारी बारी से नज़रें फिरा रहा है और एक - दो फ़ाइलों के पन्ने उलट कर कुछ चेक भी किए जा रहा है..

मामला क्या है, ये मेरे को भी नहीं मालूम ---

आज सुबह नौ बजे ही मेरे कोचिंग सेंटर में बिंद्रा का फ़ोन आया था --- कुछ बहुत ही ज़रूरी बातें करनी थी ; सो अपने ऑफिस में बुलाया था --- दिखने में चालीस के आस पास का लगता है --- सुलझा हुआ व्यक्तित्व वाला आदमी है और सब के साथ शालीनता के साथ बात करना अपना पहला ड्यूटी समझता है --- और मुझे जो बात सबसे ज़्यादा पसंद आया वो यह कि ये बिंद्रा भी मेरे ही जैसा सिगरेट का शौक़ीन बंदा है ----

सुडुक सुडुक कर चुस्कियाँ लगाते हुए कुछ ही देर में कॉफ़ी का हम दोनों ने एक साथ ही इतिश्री किया ---

होंठों पर रुमाल फिरा कर दूसरे हाथ में पकड़े कागजों को सामने टेबल पर रखा बिंद्रा ने ...

मेरी ओर देखा,

एक गहरी साँस लिया ...

मैं समझ गया, अब कुछ गंभीर बातें होने वाली है ... क्योंकि औपचारिकता वाली बातें तो हमने मिलते ही शुरू कर के खत्म कर दिया था ---

“तुमसे कुछ बातें करनी थी... अम्म्म... शायद तुम्हें ज़रूरी न लगे पर मैं इन बातों को ज़रूरी समझता हूँ ...”

“मैं सभी तरह की बातों के लिए प्रस्तुत हूँ सर.. वैसे भी पिछले कुछ दिनों से जिस तरह के परिस्थितियों और चिंताओं से दो – चार हुआ और हो रहा हूँ , अब तो यही चाहता हूँ कि किसी तरह से पिंड छूटे ...”

“फ़िलहाल तो पिंड छूटने वाली बात को भूल ही जाओ, अभय ...”

“क्यों सर?” मैं बुरी तरह से चौंका ..

“क्योंकि कम से कम मुझे तो ऐसी कोई संभावना नज़र नहीं आ रही...” थोड़े बुझे स्वर में कहा बिंद्रा ने |

“ओह्ह !...” बिंद्रा की बात खत्म होते ही निराशा घर कर गई मेरे अंदर ... नीचे, पैरों की ओर देखने लगा ...

“पर अगर कुछ बातें क्लियर हो जाए, तो ये मान कर चलो की तुम्हें अधिक परेशान नहीं होना पड़ेगा..” बिंद्रा की बातों से लगा की वह मुझे उम्मीद देना चाहता है ..

उम्मीद करने और रखने में तो कोई बुराई नहीं,

सो मैंने भी पूछ ही लिया,

“पर बातें कौन सी हैं सर?”

“अभी तक इतना तो समझ ही चुके होगे की जो भी बात है... जैसी भी बात है... तुमसे ही जुड़ी हुई है....?”

“जी सर, वो तो बहुत पहले ही समझ गया था..”

“गुड, वैरी गुड... जितना दिखते हो... उससे कहीं अधिक समझदार हो...” काफ़ी प्रशंसात्मक लहजे में चहकते हुए बिंद्रा बोला ...

पर मेरा चेहरा टेंशन के कारण बोझिल सा ही बना रहा... बस, एक बहुत ही फीकी सी मुस्कान बिखेर लिया अपने चेहरे पर..

मेरी ऐसी प्रतिक्रिया देखते हुए बिंद्रा तुरंत ही संजीदा हुआ और बोला,

“बात , दरअसल तुमसे ‘योर होटल’ के बारे में करनी है अभय...”

‘योर होटल’ का नाम सुनते ही धड़कन बहुत ज़ोरों से बढ़ गई मेरी... पता नहीं क्यों, आजकल ये नाम सुनते ही मेरी हालत बहुत ही दयनीय सी हो जाती है ... घबराहट के मारे कभी कभी तो ये भी भूल जाता हूँ की मैं साँस भी ले रहा हूँ या नहीं?

“क्या बात करनी है उस होटल के बारे में सर..?”

“पिछले दिनों जो कत्ल हुआ, जिसके कारण तुम्हें पुलिस स्टेशन में हाज़िर होना पड़ा और न चाहते हुए भी सस्पेक्ट बनना पड़ा.....”

बिंद्रा की बात को बीच में ही काटते हुए मैं बोल पड़ा,

“पर सर, मैं अब तो सस्पेक्ट नहीं रहा न?”

“प्राइम सस्पेक्ट.”

“जी??”

“तुम प्राइम सस्पेक्ट नहीं हो अभय... पर सस्पेक्ट अभी भी हो..” अपने इस वाक्य पर अच्छा ज़ोर दिया बिंद्रा ने..

“ओह्ह!!” अब तो और भी निराश हुआ मैं.. संदिग्धों की सूची में मैं अभी भी हूँ... ये भी तो कोई छोटी बात नहीं..

“पर मैं ये भी नहीं कहूँगा की तुम सस्पेक्ट भी हो... क्योंकि ऐसा कोई भी प्रमाण हाथ नहीं लगा है जो तुम्हें प्राइम सस्पेक्ट बना दे और जो और जितने प्रमाण मिले हैं वो तुम्हें सस्पेक्ट बनाने के लिए काफ़ी नहीं है...”

“तो फ़िर?”

“तो फ़िर यही कि तुम उन लोगों की सूची में हो जिनके सस्पेक्ट न होने पर भी पुलिस उन पर नज़र बनाए रखने में कोई ढील नहीं देगी..”

“ह्म्म्म...”

बिंद्रा की यह बात सुन कर पूरी तरह से नहीं भी तो बहुत हद तक ऐसा अनुभव हुआ मानो सीने पर से कोई बहुत भारी बोझ हट गया हो..

इस बात को सुन कर मैं रिलेक्स हुआ, यह उसने तुरंत ही भांप लिया..

इसलिए अबकी और भी शाँत लहजे में बात करना शुरू किया बिंद्रा ने,

“समझे, मैं क्या कहना चाह रहा था?”

“जी सर, बिल्कुल...”

“गुड, तो अब जो कुछ भी कहूँगा ; उसे ध्यान से सुनना और जो कुछ भी पूछूँगा, उसका अच्छे से जवाब देना... ओके?”

“यस सर..”

“हम्म, तो जैसा की मैं कह रहा था, ‘योर होटल’ में जो खून हुआ... वह एक तरह से डबल मर्डर था..”

“एक तरह से?”

“हम्म.. यहाँ ‘एक तरह से’ का मेरा मतलब है की ..... (बोलते हुए थोड़ा रुका बिंदा, मुझे गौर से देखा, फिर शुरू हुआ) .... देखो अभय, अमूमन डबल मर्डर का मतलब होता है दो कत्ल होना.. पर कई बार पुलिस और फोरेंसिक्स वाले अपने सुविधा के लिए डबल मर्डर का तात्पर्य इस बात से भी लगाते हैं, की जिसका दो तरीके से मर्डर हुआ हो...”

“हाँ सर, आपने तो उस दिन पुलिस स्टेशन में कहा था इंस्पेक्टर दत्ता को... की उस आदमी को दो तरीके से मारने की कोशिश हुई है..”

“कोशिश नहीं अभय, दो तरीके से ही मारा गया है...”

“जी सर, वही...”

“शायद तुम्हें ये भी याद हो की किन दो तरीकों से उसे मारा गया है?”

“अन्ह्ह... जी... एक तो उसे सिर के बीचों बीच गोली मारा गया था... और दूसरा, उसे पिन जैसी किसी चीज़ से ज़हर दिया गया था ...”

मैं भरसक याद करता हुआ, शब्दों को बेहद नपे-तुले अंदाज़ में बोला |

मेरे स्मरणशक्ति को देख बिंद्रा के चेहरे पर प्रशंसा के भाव आये... पर कहा कुछ नहीं...

“गुड.. अच्छा याद है तुम्हें... पर यहाँ मैं बता दूं की ज़हर सिर्फ़ पिन से शरीर में चुभो कर ही नहीं; वरन शराब में भी मिला कर दिया गया था ---- |”

“ओह्ह... यानि ज़हर भी दो तरीके से दिया गया?”

“हाँ...”

“तब तो कुल मिला कर तीन तरीके हुए न सर ?”

“हम्म... कह सकते हो..”

“ह्म्म्म”

“वैसे अच्छी बात है कि इतने दिन पहले की बात याद रखे हो ---”

“थैंक्यू सर, वैसे ज़्यादा दिन भी तो नहीं हुआ ..”

“ह्म्म्म, खैर, जानते हो वह आदमी कौन था?”

“नहीं सर... कौन था?” मैंने बड़े ध्यान से बात सुनने वाला मुद्रा बनाया... सुनना भी था.. आख़िर जानना था अच्छे से कि कौन था वह आदमी --- ??

“उस ‘योर होटल’ के पार्टनर्स में से एक --- इस शहर के मशहूर धनाढ्यों में से एक --- ‘जयचंद बंसल’!! ”

“जयचंद बंसल ! ”

“हाँ, जयचंद बंसल ... काफ़ी पैसे वाला बंदा था वह |”

“हाँ, नाम सुना सुना सा लगता है.. शहर के सबसे बड़े रईसों में से एक इसका भी नाम था.. वैसे, शक्ल से नहीं पहचानता था इसे मैं.”

“ह्म्म्म”

“तो सर.. अभी अभी आपने कहा की ये आदमी ‘योर होटल’ के पार्टनर्स में से एक था... कितने पार्टनर्स हैं उस होटल के?”

“तीन --- तीन थे --- अब दो बचे”

“और वो दोनों कैसे लोग हैं?”

“तुम्हें क्या लगता है..?” बिंद्रा हँसते हुए बोला.

“पता नहीं.. नो गेस”

“ योर होटल जैसे होटल के पार्टनर्स हैं भई.,, ज़ाहिर है.. सही लोग तो होंगे नहीं”

“जी सर, सही बात है.”

“और भी कई बात हैं ...”

“वो क्या सर?”

“जयचंद पर काफ़ी लोगों का कर्जा था.. बहुत पैसे बकाया था... अब वो तो रहा नहीं.. इसलिए कई लोग इस बात से ख़ार खाए बैठे हैं और बार बार किसी न किसी तरह से पुलिस से कांटेक्ट कर के ख़ूनी के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाहते हैं.. कुछ ने तो अपनी ओर से भी कुछ मदद करने की पेशकश की है..”

“ओह्ह... पर इससे क्या होगा सर... ख़ूनी के बारे में अगर पता चल भी जाए तो भी तो उनके बकाए पैसे उन्हें मिलने से रहे.. क्योंकि ज़रूरी तो नहीं की ख़ूनी भी उतना ही अमीर हो ... या.... इतना पैसे वाला हो की उनके पूरे पैसे लौटा दे... सूद की बात तो रहने ही दें..”

“हम्म... ये बात तो है..”

“एक और बात सर, ये जयचंद... ये आदमी तो अपने आप ही बहुत रईस... पैसे वाला था.. तो फ़िर इसने और लोगों से उधार क्यों लिए थे... ये समझ में नहीं आया..”

“शौक बड़ी चीज़ होती है मिस्टर अभय... (चेयर पर पीठ लगाते हुए बोला बिंद्रा) ... बड़े से बड़े शौक ने कई अच्छे अच्छों को कंगाल बना दिया है.. इसके अलावा भी हो सकता है की वो कई और बिज़नेस में हाथ आज़मा रहा होगा.. उस हिसाब से और पैसे चाहिए होंगे.. अब अपने घर का पूरा तिजोरी ही तो खाली नहीं कर सकता है न कोई..? ... इसलिए दूसरों से उधार लिया होगा......”

“और दूसरों ने भी दे दिया.....?” किया तो मैंने प्रश्न ही, पर ये मेरा प्रश्न कम ; व्यंग्य अधिक था..

“पैसे वालों को हर कोई पैसा देने को तैयार रहता है... क्योंकि पता होता है उन्हें की कभी न कभी , देर सबेर उन्हें उनका पैसा ... पूरा पैसा मिल जाएगा... जबकि गरीब के साथ ऐसी बात नहीं होती...”

“हाँ सर, ये तो सही कहा आपने..”

थोड़ा रुक कर पूछा,

“अच्छा सर, आप बुरा न माने तो एक बात पूछूँ?”

“हाँ पूछो”

“सर, वो जो मर्डर हुआ ....”

“किसका... जयचंद का?” मेरी बात पूरी होने से पहले ही बिंद्रा बोल पड़ा..

“जी सर .... सर, आप उस दिन थाने में कह रहे थे कि उसका खून किसी हैवी कैलिबर वाले गन से हुआ... ”

“हैवी कैलिबर वाली बात का मैं उस दिन अंदाज़ा लगा रहा था अभय... ” मुझे फ़िर बीच में टोकते हुए बिंद्रा बोला...

“सर, प्लीज़ मुझे पूरी बात समझाइए ... आपने मेरा हाथ चेक किया , फैमिली बैकग्राउंड के बारे में पूछा, मेरे करियर, जॉब के बारे पूछा, गोली की बात की , टाइम की बात की आपने...... इत्यादि इत्यादि... ये सब आख़िर क्या था सर.... मतलब, मेरी समझ में कुछ आया ही नहीं था.... प्लीज़ एक्सप्लेन मी ऑल दीज़ थिंग्स..”

“ह्म्म्म... वो सब पुलिस प्रोसीजर होता है अभय... तुम्हारा समझ पाना मुश्किल है..”

“सर, आप समझायेंगे तो सब समझ जाऊँगा..”

“हाहाहा ... ऐसा..??” बिंद्रा हँसते हुए पूछ बैठा...

“जी सर, बिल्कुल..” मैंने भी पूरी दृढ़ता से जवाब दिया...

बिंद्रा ने कुछ सेकंड्स मेरी ओर अच्छे से देखा... मेरे चेहरे पर उभर आए गम्भीरता के भावों को समझ पाने में कोई मुश्किल न आई होगी..

मुस्कराते हुए टेबल के , अपने दाएँ ओर निचले दराज को खींचते हुए खोला, एक छोटा सा पैकेट निकाला हथेली के माप बराबर; साथ में मेटल की एक छोटी सी चीज़ थी जो मुझे उस समय समझ में नहीं आया की वह क्या चीज़ है...?

“स्मोक करते हो?” पैकेट खोलते हुए अचानक से बिंद्रा पूछा...

“ज...ज..जी?!!” अचानक हुए एक ऐसे सवाल ने मुझे हड़बड़ा दिया ....

बिंद्रा तब तक एक सिगरेट निकाल कर अपने होठों के बीच हल्के से दबा लिया था... उसी अवस्था में मुस्कराते हुए दोबारा पूछा उसने..

“सिगरेट पीते हो?”

“न.. नहीं सर..” भला बनने का कोशिश किया.... जोकि अगले ही क्षण में पकड़ा जाने वाला था...

“ओह कम ऑन अभय... अब इतनी सी बात के लिए झूठ बोलोगे... मुझे पता है तुम सिगरेट लेते हो...” कहते हुए बिंद्रा ने उस छोटे से मेटल के डिब्बे को एक साइड दबाया.. ऐसा करते ही ‘खट’ की आवाज़ से डिब्बा एक साइड से ऊपर हो कर खुल गया और आग की एक बहुत छोटी लौ नज़र आई.. बिंद्रा होठों पर दबाए सिगरेट के अगले सिरे को उस लौ के ऊपर ले गया... अगले ही क्षण सिगरेट सुलग उठा.. और नीला धुआँ फैलने लगा...

“अंह... सर... मैं.....आप... सिगरेट...” कुछ पूछने के लिए शब्दों को व्यवस्थित करने लगा..

“परसों तुम्हें न्यू मार्किट में देखा था.. अपने दो दोस्तों के साथ धुएँ उड़ा रहे थे... एक ख़त्म होते ही दूसरा सुलगा लिया था तुमने...” मेरी ओर देख कर एक अर्थपूर्ण मुस्कान दिया बिंद्रा ने...

“जी सर...” मैं झेंपते हुए बोला..

“चलो... अब जल्दी से सिगरेट निकालो और फूँकना शुरू करो.. नहीं है तो कहो, मैं अपना देता हूँ..” कहते हुए बिंद्रा ने अपना सिगरेट वाला पैकेट टेबल पर मेरी ओर सरका दिया..

“नहीं सर ... मेरे पास है... पर... आपको कैसे ...”

“अभय...... बहुत सिंपल सी बात है.. कोई बंदा अगर एक खत्म होते ही दूसरा सिगरेट सुलगा ले , इसका मतलब यही है कि उसे सिगरेट से विशेष लगाव है .. मतलब की वह चेन स्मोकर है और ऐसा बंदा एक पैकेट हमेशा अपने पास ही रखेगा इस बात की भी अच्छी सम्भावना होती है..”

मैं कुछ बोला नहीं..

सिर्फ़ मुस्कराया...

मुस्कराते हुए अपने पैंट के दाएँ पॉकेट से सिगरेट और लाइटर ; दोनों निकाला और एक सिगरेट सुलगा लिया...

दो मिनट हम दोनों में से कोई भी कुछ न बोला... सिर्फ़ धुएँ उड़ाते रहे...

फ़िर,

अचानक से बिंद्रा बोल पड़ा,

“ह्म्म्म ... तो अब सुनो अभय....”

क्रमशः

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09-12-2020, 01:06 PM,
#36
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३३)

मुँह को ऊपर की ओर कर, एक लंबा कश खींच कर धुआँ उड़ाते हुए मेरी ओर देखा और ऐश-ट्रे में राख झाड़ते हुए बोलना शुरू किया बिंद्रा ने,

“देखो अभय, पहले तुम्हें गन ... हैंडगन के बारे में कुछ बेसिक बातें बता देता हूँ ... हालाँकि इस तरह की बातें बताने का कोई तुक तो नहीं है.. ख़ास कर किसी सस्पेक्ट को... फ़िर भी अपने गट्स – फ़ीलिंग पर --- की तुम इस पूरे मामले में निर्दोष हो --- मैं तुम्हें कुछ बारीकियाँ बताने का कष्ट उठाने को तैयार हूँ ..

मैंने मन ही मन कहा,

‘बड़ी मेहरबानी आपकी’

हंसने को जी भी कर रहा था .... की बिंद्रा अब जो मुझे बताने की सोच रहा है... वो सब मोना और उसके ट्रेनर्स ने मुझे बखूबी सीखा और समझा दिया था ---

फ़िर भी बिंद्रा के मुँह से सुनने की एक इच्छा सी रही --- क्योंकि एक पुलिस वाले या ऐसे किसी डिपार्टमेंट वाले का ज्ञान पाने का इससे अच्छा मौका मुझे मिलने वाला नहीं था ... शायद...

बिंद्रा बोलना ज़ारी रखा,

“अभय, कैलिबर को जानने से पहले तुम्हें बोर के बारे में जानना होगा ....”

“बोर?”

“हाँ बोर...”

“वह क्या होता है स..”

“अरे वही तो बताने जा रहा हूँ... पहले सुनो तो भई..”

“जी सर”

“अभी के लिए तुम्हारे जानने लायक दो ही बातें हैं..

१) बोर

२) कैलिबर

बंदूक का बोर पाइप के ‘अंदर के’ डायमीटर या व्यास को बोर कहते हैं --- ‘अंदर के’ को स्पेसिफाई करना इसलिए ज़रूरी है क्यूंकि किसी खोखले पाइप के हमेशा दो डायमीटर होंगे – एक अंदर का और एक बाहर का.

अब अगर यदि कोई पाइप बहुत पतली शीट से बना हो तो उसके अंदर और बाहर का व्यास लगभग बराबर होगा.... लेकिन पाइप का मटेरियल जितना मोटा होता जाएगा, अंदर और बाहर के डायमीटर में उतना अंतर आता रहेगा...

इसी तरह,

पिस्तौल, बंदूक यहाँ तक की तोप की नली के ‘अंदर के’ डायमीटर या व्यास को बोर कहते हैं...

एक बात और समझने की ज़रूरत है कि हम पिस्तौल के ‘अंदर के’ व्यास को ही क्यूं महत्व देते हैं या दे रहे हैं?

इसका उत्तर बहुत सिंपल है – बाहर का व्यास कितना भी हो उससे फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन पाइप के अंदर के व्यास से ही पता चल पाएगा कि इसमें कितनी मोटी गोली आएगी ; यानी... किसी पिस्तौल की गोली के इर्द-गिर्द कोई पाइप बनाया जाएगा तो अंदर का डायमीटर स्पेसिफिक होगा और बाहर का डायमीटर मटेरियल की मोटाई के हिसाब से बदलता चला जाएगा....”

मैं – “ओह्ह ... ओके ...”

बिंद्रा – “समझे?”

“जी, समझ रहा हूँ ... आगे सर..?”

“ह्म्म्म... गुड.... तो अब ये बात स्टेब्लिश हुई कि – बोर, बंदूक की बैरल का अंदरूनी भाग या बैरल के अंदरूनी भाग का व्यास होता है....

अब हम आते हैं अपने दूसरे क्वेश्चन पर.. कि ‘कैलिबर’ क्या होता है?

बंदूक का कैलिबर ....

हथियारों में बोर को नापने के लिए दो प्रणालियों (कैलिबर और मिलीमीटर) का उपयोग किया जाता है...

कैलिबर शब्द दरअसल बोर का ही पर्यायवाची है लेकिन अब बन्दूकों, राइफल्स आदि के लिए माप प्रणाली बन गया है --- यदि किसी बंदूक का अंदर का व्यास x होगा तो उसमें यूज़ होने वाली गोली के बाहर का व्यास भी वही यानी x ही होगा ... --- तो यदि कोई x कैलिबर की बंदूक है तो उसमें x कैलिबर की ही गोली यूज़ होगी....

देखो अभय, एक बात अच्छे से समझ लो की इंच और कैलिबर में कोई अंतर नहीं होता है, क्यूंकि एक इंच और एक कैलिबर बराबर ही हैं, यानी .30 कैलिबर राइफल के बोर का व्यास दरअसल .30 इंच होगा...

कहीं-कहीं इस इंच या कैलिबर को दशमलब के तीन स्थानों तक शुद्ध मापा जाता था इसलिए कभी-कभी .303 कैलिबर राइफल भी पढ़, देख या सुना जा सकता है...

कभी-कभी, जब राइफल्स के नाम कैलिबर पर रखे जाते हैं तो उनमें कैलिबर शब्द ‘साइलेंट’ हो जाता है – जैसे .44 स्पेशल या .38 मैग्नम ---

अच्छा एक इंट्रेस्टिंग बात और बताता हूँ... जैसे की मैंने अभी अभी कहा था कि बोर मतलब नली के ‘अंदर का’ डायमीटर --- लेकिन शुरुआत में नापने वालों ने बाहर का डायमीटर नाप दिया और इसी के चक्कर में .38 कैलिबर पिस्तौल का बोर असल में 0.38 इंच नहीं, बल्कि 0.357 इंच होता है... या अगर ऊपर की एक और बात का रिविज़न किया जाए तो .38 कैलिबर की पिस्तौल में .357 इंच डायमीटर की गोली डाली जाती है या आदर्श रूप से डाली जानी चाहिए...

और इसी सब कन्फ्यूज़न के चलते ‘आर्म्स विशेषज्ञ’ कहते हैं कि किसी पिस्तौल के नाम से उसके बोर का पता चलना मुश्किल है.

बहुत से बहुत ‘लगभग’ पता चल जाएगा लेकिन फिर भी ज़्यादा जानकारी के लिए पिस्तौल का मैन्युअल रेफर करें. अब यही लगा लीजिए कि .44 स्पेशल और .44 मैग्नम दोनों ही .429 इंच व्यास की गोलियां यूज़ करते हैं.

बंदूक मिमी मिलीमीटर - मिलीमीटर या एमएम माप प्रणाली पर. एमएम माप प्रणाली जैसी सुनने में आती है, वैसी ही है भी. यानी यदि किसी बंदूक का बोर 5.56 एमएम है तो इसका मतलब ये हुआ कि बंदूक की नली का अंदरूनी व्यास 5.56 मिलीमीटर है.... सिंपल !

और हां, उसमें उपयोग में आने वाली गोली का व्यास (या बाहरी व्यास) भी 5.56 एमएम होना चाहिए.

“ह्म्म्म... सिनैरियो अब थोड़ा थोड़ा क्लियर हुआ सर..”

“वैरी गुड.”

“तो सर... हैवी कैलिबर मतलब?”

“मतलब की कितनी सक्षमता वाले गन का इस्तेमाल किया गया था इस मर्डर में”

“ओ.. ओके..”

“हम्म....”

“और सर... आप पॉइंट ब्लैंक जैसी कुछ बात कर रहे थे..?”

“हाँ... वो टारगेट और गन के बीच की दूरी के बारे में होती है...”

“ओ... ह्म्म्म.. ओके.”

मैं कुछ सोचता रहा.. बिंद्रा की एक एक बात मुझे किसी और ही दुनिया में ले गयी थी...

“क्या सोचने लगे अभय..?”

लगभग खत्म होने को आई सिगरेट को बिंद्रा ने ऐश-ट्रे में बुझाते हुए पूछा ... और साथ ही ऐश-ट्रे मेरी ओर सरका दिया..

मैंने अब ध्यान दिया... मेरी सिगरेट का भी वही हाल है... फ़िल्टर तक पहुँच गई है... तुरंत ऐश-ट्रे के हवाले किया उसे..

“और कुछ जानना नहीं चाहोगे..?”

इस प्रश्न को काफ़ी मतलबी और ख़ास ढंग से पूछा बिंद्रा ने... एक मुस्कान के साथ..

मैंने इंकार में सिर हिलाते हुए कंधे उचका दिया..

एक गहरी साँस छोड़ते हुए बिंद्रा फिर शुरू हुआ,

“मर्डर के दूसरे तरीके की बात कर रहा था...”

“ओह्ह.. हाँ... साइनाइड के बारे में...”

“ह्म्म्म... साइनाइड शब्द तो तुमने सुना ही होगा? इसके बारे में कुछ बता सकते हो?”

“नहीं सर... अख़बारों में पढ़ा है.. इतना पता है की बहुत घातक है यह... पर इससे ज़्यादा और कुछ नहीं जानता.”

बिंद्रा शांत सामने मेज़ की ओर देखता रहा...

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद मैंने खुद ही पूछा,

“सर, क्या आप प्लीज़ इस बारे में कुछ बताएँगें....?”

“ह्म्म्म... वही सोच रहा हूँ... की क्या किया जाय.. बताया जाए या नहीं बताया जाए...”

“प्लीज़ सर... मेरे लिए ये जानना बहुत ही ज़रूरी है..”

“”वह क्यों?” बिंद्रा चकित होते हुए पूछा..

“सर... मैंने एक ऐसे केस में फँसा हुआ हूँ.. जहाँ मैं ऊपर वाले से सिर्फ़ अपनी सलामती के अलावा और कुछ करने की स्थिति में नहीं हूँ.. ऊपर से ये केस एक मर्डर वाला केस है जिसमें मैं एक सस्पेक्ट हूँ --- जबकि मुझे होना नहीं चाहिए था --- सच पूछिए तो मुझे ये भी समझ में नहीं आ रहा है की जब मैं उस दिन नीचे टेबल पर कार्ड्स खेल रहा था तो उसी टाइम ऊपर उस जयचंद के कमरे के सामने कैसे पहुँच गया...? उस एक वीडियो फुटेज के अलावा पुलिस के पास मुझे दोषी साबित करने के लिए और कुछ नहीं है...”

“हा ...! (बिंद्रा ज़रा सा हँसा, फ़िर) --- तो तुम्हारे कहे के मुताबिक वह वीडियो वाकई तुम्हें दोषी साबित नहीं कर सकती?”

“जी सर... ”

“पर मुझे तो लगता है ...”

“क्यों सर...?”

“क्योंकि, वीडियो फुटेज तो बहुत स्ट्रोंग एविडेंस होते हैं किसी भी अपराध में.”

“पर फुटेज के साथ छेड़खानी तो की जा सकती है न, सर?”

“गुड पॉइंट... कैसे?”

“आमतौर पर जैसे होता है... वैसे.” बहुत विश्वास के साथ मैंने अपना तर्क पेश किया ...

“अभय ... अभय.... मर्डर होने के थोड़ी देर बाद पुलिस वहां पहुँच चुकी थी... और जैसे की इस तरह के हाई प्रोफाइल केसेस में होता है --- क्षणिक पूछताछ के बाद पुलिस ने तुरंत ही चल रहे रिकॉर्डिंग्स को चेक किया और ठीक जिस समय वह घटना घटी ; उसके एक घंटे आगे से लेकर एक घंटे पीछे तक के सारे रिकॉर्डिंग्स अपने साथ ले गई... वीडियो में उम्दा किस्म का चेंज --- एकदम बारीक़ वाला --- जोकि किसी के द्वारा जल्द पकड़ा न जाए, ऐसा चेंज करने के लिए कम से कम आधे घंटे का समय तो चाहिए ही ... वो भी अगर चेंज करने वाला कोई बहुत ही एक्सपर्ट टाइप का हो ... तभी संभव है...”

“ओह्ह...”

मन उदास हो गया ...

बिंद्रा ने बहुत सही पॉइंट्स गिनाए ---

थोड़ा चुप रहने के बाद बोला,

“सर, साइनाइड के बारे में कुछ बोल रहे थे आप”

“हाँ ... सुनो, बड़े ध्यान से सुनो --- साइनाइड को लेकर दो थ्योरी है --- और दोनों के ही बारे में पक्के तौर पर कुछ भी कहा नहीं जा सकता --- या तो दोनों ही थ्योरी सही है --- या फ़िर दोनों ग़लत --- या ....”

“या?”

“या दोनों थोड़ा थोड़ा सही हो सकते हैं !”

“ओह”

“ देखो, सबसे पहले साइनाइड को समझो ... रसायनशास्त्र के अनुसार, ‘साइनाइड’ को एक अम्ब्रेला टर्म कहा जा सकता है. अंब्रेला टर्म मतलब ‘साइनाइड’ उन पदार्थों का ग्रुप है जिनमें कार्बन-नाइट्रोजन (सीएन) बॉन्ड होता है.

जिस तरह सभी सांप लीथल या घातक नहीं होते, वैसे ही सभी तरह के साइनाइड भी ज़हर नहीं होते.

सोडियम साइनाइड (NaCN), पोटेशियम साइनाइड (KCN), हाइड्रोजन साइनाइड (HCN), और साइनोजेन क्लोराइड (CNCl) घातक हैं, लेकिन नाइट्राईल्स नाम के ढेरों यौगिक साइनाइड होते हुए भी ज़हर नहीं होते. बल्कि कई नाइट्राईल्स तो दवाइयों में यूज़ होते हैं. नाइट्राईल्स के खतरनाक न होने का कारण केमिस्ट्री में छुपा हुआ है, लेकिन अभी हमें केमिस्ट्री नहीं सालों, इन फैक्ट सदियों, से चली आ रही मिस्ट्री को सॉल्व करना है....

दरअसल साइनाइड, हमारे शरीर की कोशिकाओं और ऑक्सीजन के बीच दीवार का काम करता है. और हमारे शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीजन नहीं मिलेगी तो कोशिकाएं ज़्यादा देर तक जीवित नहीं रह पाएंगी. और कोशिकाएं, जिनसे मिलकर हमारा शरीर बना है, जीवित नहीं रहीं तो शरीर भी मृत.

अगर साइनाइड अपने प्योरेस्ट फॉर्म में अंदर ले लिया जाए तो सेकेंडों में व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है. मिर्गी के दौरे, कार्डिएक अरेस्ट, कोमा वगैरह के बाद, के साथ या उस सबसे पहले ही. और अगर इसकी कम मात्रा ली जाए या प्योर फॉर्म के बजाय किसी में डायल्यूट होकर आए बेहोशी, कमजोरी, चक्कर आना, सिरदर्द, भ्रम की स्थिति और सांस लेने में कठिनाई हो सकती है ....”

“बाप रे!”

“हाँ ... अब आते हैं थ्योरी वाले बातों पर --- ”

“जी सर..”

“ तो पहला थ्योरी यह है कि, सायनाइड इतना खतरनाक ज़हर है कि इसका टेस्ट किसी को पता नहीं चलता. क्यूंकि टेस्ट को बताने से पहले से ही बताने वाले की मृत्यु हो जाती है....

और दूसरा थ्योरी है की,

एक बार एक बंदे ने सायनाइड का टेस्ट पूरी दुनिया को बताने के लिए अपनी जान की कुर्बानी देने की सोची. पेन कॉपी लेकर बैठ गया. एक हाथ में पेन दूसरे में सायनाइड. एक हाथ से सायनाइड मुंह में डाला दूसरे से लिखना शुरू किया – S…

बस अंग्रेजीं का अक्षर एस(s) ही लिख पाया और मर गया. अब अंग्रेजी के एस अक्षर से कितने ही टेस्ट आते हैं –

Sweet – मीठा
Sour – खट्टा
Salt – नमकीन

तो आज तक पता नहीं चल पाया कि सायनाइड का टेस्ट कैसा है --- बस यही पता चल पाया कि सायनाइड का टेस्ट अंग्रेजी के एस(s) अक्षर से शुरू होता है....”

एक ही साँस में इतना सब कुछ कहने के बाद बिंद्रा चुप हुआ ...

“तो क्या डॉक्टरी रिपोर्ट में ये साबित हो गया कि जयचंद को साइनाइड ही दिया गया था?” मैंने पूछा.

“हाँ... पर कौन सा --- आई मीन, साइनाइड बहुत प्रकार के होते हैं --- एक्साक्ट्ली कौन सा दिया गया था, ये पता लगाना थोड़ा मुश्किल है.”

“ओ...”

इतना सब कुछ सुनने के बाद मैं अब तय करने में असमर्थ सा फ़ील करने लगा की अब आगे क्या पूछूँ..

कमरे में फ़िर से शांति छाई रही ..

टेबल पर ही बिंद्रा के पास रखी तीन टेलीफोन में से एक बज उठी --- अपनी सोच की दुनिया से बाहर आया और शायद बिंद्रा भी ---

फ़ोन में दूसरे ओर से जो कुछ भी कहा गया उसके जवाब में बिंद्रा ने बस इतना ही कहा की ‘उसे अंदर भेज दो’ ....

दो मिनट बाद दरवाज़े पर खटखटाया किसी ने...

“कम इन”

बड़े आश्वस्त स्वर में बिंद्रा ने आदेश दिया ---

लगभग मेरे ही उम्र का एक लड़का अंदर घुसा .... थोड़ा सुकड़ा हुआ... दुबला पतला ... आँखों पर चश्मा ... बाल सामान्य से थोड़े बड़े और घूमे हुए (कर्ली) --- तनिक नर्वस सा प्रतीत होता हुआ ---

“आओ आओ... (फ़िर मेरी ओर देख कर) --- अभय, ये गोविंद है... और ये है अभय... जिसके बारे में तुम्हें बताया था ---”

गोविंद नामके उस लड़के ने पहले काँपते हाथों से मुझे नमस्ते किया और फ़िर तुरंत ही अपना हाथ आगे बढ़ा दिया ... मैंने भी देरी नहीं की और हाथ मिलाया उससे --- फ़िर हम दोनों ने ही एक साथ बिंद्रा की ओर देखा ---

“देखो, मैंने सिर्फ़ परिचय करवाया... आगे का क्या बात करना है और कैसे करना है; वो तुम दोनों पर छोड़ता हूँ. नाओ यू बोथ मे लीव --- आई गोट वर्क टू डू.”

इतना कह कर बिंद्रा ने एक सिगरेट सुलगाया और पास पड़ी फ़ाइल को देखने लगा ---

बिंद्रा में अचानक से ऐसे किसी परिवर्तन की मैंने आशा नहीं किया था ... पर और करता भी क्या ---

गोविंद और मेरी आँखें मिली --- एक अनकही सहमती बनी और ‘थैंक्यू बाय’ कहते हुए हम दोनों कमरे से निकल गए ---

क्रमशः

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09-12-2020, 01:06 PM,
#37
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३४)

गोविंद और मैं बिल्डिंग से कुछ दूरी पर स्थित एक दुकान में बैठे चाय के साथ साथ सुट्टे लगा रहे थे --- यही कोई पन्द्रह मिनट बीत चुके हैं ... सिर्फ़ हाय-हैल्लो और सिवाय एक दूसरे से ये पूछने की हम दोनों क्या करते हैं; और कोई काम की बात नहीं हुई थी ... |

अंततः मैंने ही शुरुआत किया,

“तो.. क्या हुआ तुम्हारे साथ...?”

“वही जो तुम्हारी चाची के साथ हुआ...” उसने उत्तर तो दिया पर उसकी नज़रें सामने रोड पर थी और ख़ुद वो कहीं खोया हुआ सा लगा मुझे ...

“ओह्ह... तुम्हें पता है...?? पर तुम्हें कैसे पता... किसने बताया ...”

“बिंद्रा साहब ने...”

“ह्म्म्म... ओके...”

“हाँ”

“ठीक है ... मेरा तो तुम्हें पता है.. पर मुझे तुम्हारा नहीं पता... कुछ बताओ... क्या हुआ तुम्हारे साथ ??”

“मेरी मम्मी के साथ हुआ है...” वैसा ही खोया खोया सा रहते हुए उत्तर दिया वो..

“हम्म.. पर गुज़री तो तुम्हारे ऊपर....”

मैं सांत्वना देते हुए कहा, पर शायद उसे बुरा लग गया...

तनिक रूखे स्वर में बोला,

“क्यों... मेरी मम्मी पर नहीं गुज़री है क्या...?”

इस अप्रत्याशित व्यवहार के लिए मैं बिल्कुल भी तैयार नहीं था..

थोड़ा रूककर धीरे से पूछा,

“कैसे हुआ ये?”

“पता नहीं...”

उसने फ़िर लगभग उसी अंदाज़ में छोटा सा उत्तर दिया, पर इसबार थोड़ा शांत रहा..

मैंने दोबारा कुछ पूछा नहीं..

चाय खत्म कर सिगरेट भी फेंकने ही वाला था कि गोविंद धीरे से बोला,

“उनको ब्लैकमेल किया था उन लोगों ने..”

कहते हुए थोड़ा रुआंसा हो गया..

मैंने इस बार कोई पहल नहीं किया, उसे सांत्वना देने का या सहानुभूति जताते हुए कुछ कहने का... दोबारा उसके रूखेपन को बर्दाश्त करने का मन नहीं था.. एक तो अपने दिमाग का ही संतुलन बिगड़ रहा है रह-रह कर, ऊपर से ये महाशय ऐसे रिएक्ट कर रहे हैं मानो दुनिया भर के दुःख दर्द इसके ही अंदर पेल दिया गया हो...

शायद इस बात को वह भी ताड़ गया, तभी अधिक प्रतीक्षा किए बिना स्वयं ही चालू हो गया,

“इस बात को हुए छह महीने से भी अधिक हो गया... ऐसा क्या हुआ जो उन्हें ये सब करना पड़ रहा है; पता नहीं... पर इतना ज़रूर पता है कि ये सब शुरू हुआ था किसी दुकान से... तब से लेकर आज --- आज तक --- उनको वही गंदे काम करने पड़ते हैं --- (अब वह सुबकने लगा) --- हर दोपहर निकलती है --- और देर रात घर आती है --- शुरू में कितना टूट चुकी थी वो --- हँसते खेलते चेहरे की रंगत उड़ गयी थी --- पर --- पर उन लोगों के निर्देश पर, फ़िर से मम्मी ख़ुद को वेल मेंटेंड रखने लगी --- रखने क्या लगी रखने के लिए मजबूर हुई --- छह महीने पहले शुरू हुआ वाकया अभी तक अनवरत चल रहा है ---”

उस समय तक यदि चाय दुकान में भीड़ न हो गई होती तो शायद वह फूट – फूट कर रोना शुरू कर दिया होता ---

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला,

“देखो दोस्त, जो कुछ भी हुआ; माना की उसमें तुम्हारा कोई नियंत्रण न रहा हो --- पर अब भी कुछ करने योग्य न हो, मैं नहीं मानता ---हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा --- कुछ तो करना ही होगा .......”

मेरी बात को बीच में ही काटते हुए गोविंद बोला,

“पर हम कर भी क्या सकते हैं --- हम और आप एक तरफ़ --- और वे लोग --- उफ़ --- क्या बताऊँ --- इतना समझ लीजिए की उनके खिलाफ़ किसी भी तरह का कोई भी एक्शन लेना घातक सिद्ध हो सकता है ...|”

उसकी बात में दम था, पर मुझे फ़िलहाल वो सब बकवास लगा --- इतना ही बोला,

“तुम अपनी मम्मी को इस दलदल से बाहर निकालना चाहते हो या नहीं? --- केवल हाँ या ना में जवाब दो ...”

“हाँ --- चाहता हूँ”

“तो फ़िर ठीक है ... अभी के लिए बस इतना अपने पल्ले बाँध लो की चाहे जो हो जाए तुम पीछे नहीं हटोगे --- राईट?! --- इन लोगों के खिलाफ़ जो भी बन पड़े, बेहिचक करोगे --- करना ही होगा... आज के लिए इतना ही... चलो घर चलते हैं --- मुझे भी देर हो रही है |”

कहते हुए मैं उठ गया; कदम आगे बढ़ाता की तभी गोविंद ने आवाज़ दिया,

“सुनिए...”

मैं पीछे पलटा,

“जी?”

वो उठा ---

मेरे पास आया ---

और झट से मुझे कस कर गले लगा लिया..

दो सेकंड बाद अलग होते हुए धीरे से कहा,

“आपके हौसले की मैं दाद देता हूँ, आपके हिम्मत और बातों ने मुझे उजाले की नई किरण दिखाई है... आशा करता हूँ की मैं और आप, जैसा चाहते हैं; सब कुछ वैसा ही हो...”

“बहुत धन्यवाद... (मैं थोड़ा हँसा) --- पर इतना ध्यान रहे की इस मार्ग में संकट बहुत होंगें --- प्राणघातक संकट --- कठिन से कठिन चुनौती --- स्वीकार है?”

“सब स्वीकार है”

एक नई ऊर्जा और आत्म विश्वास दिखा उसके उत्तर एवं हाव-भाव में ...

बिना कुछ कहे ही वह आगे बढ़ा और बिल चुकता किया...

फ़िर,

दोनों ने एक दूसरे को विदा कहते हुए अपने अपने रास्ते निकल लिए ...

मेरे दिमाग में एक साथ कई बातें घूम रही थीं --- किसी की सलाह लेना चाह रहा था --- और ऐसे मामलों में केवल एक ही शख्स है जिस तक मेरी पहुँच है और जो ख़ुद ऐसे मामलों में एक्सपर्ट है....

---------------

शाम छह बज रहे हैं,

एक कॉफ़ी कैफ़े में मोना और मैं --- आमने सामने बैठे हैं --- सामने टेबल पर हम दोनों के अपने अपने कॉफ़ी मग के साथ ---

काफ़ी देर तक मोना मेरे सभी बात को सुनी..

बड़े ध्यान से...

कोई जल्दबाजी नहीं ...

किसी भी तरह की टोकाटोकी नहीं की...

यहाँ तक की मेरे बात के खत्म हो जाने के अगले पाँच मिनट तक भी वह चुपचाप बैठी रही;

अंतर केवल इतना ही हुआ कि मेरे बात करने के दौरान वह मुझे देखे जा रही थी और अब, जब मैं बात खत्म कर चुका हूँ; वह अपने कॉफ़ी मग के गोल सिरे पर गोल गोल ऊँगली घूमाए जा रही है ---

अधिक देर तक मुझसे चुप रहा नहीं गया और पूछ ही बैठा,

“क्या सोच रही हो?”

“कुछ नहीं..”

“तो फ़िर चुप क्यों हो?”

“कुछ सोच रही हूँ...”

“अरे... कर लो बात... यार मैं अभी अभी तुमसे पूछा कि क्या सोच रही हो तो तुमने कहा की कुछ नहीं --- लेकिन फ़िर तुरंत ही कहती हो की कुछ सोच रही हो --- व्हाट्स द मैटर?”

“एक मिनट.”

आँखों को पैने कर कॉफ़ी को ही देखे जा रही थी वह... मेरे बार बार पूछने पर शायद डिस्टर्ब हो गई...

थोड़ी ही देर बाद उसने खुद ही बात शुरू की,

“मम्म...अभय....”

“बोलो... अब मन हुआ कुछ बोलने का?” थोड़ी नाराज़गी के साथ व्यंग्य भी दिखाया...

“हाँ...”

“तो बोलो?”

“ये इंस्पेक्टर दत्ता के विषय में तुम्हारे क्या सुविचार है?”

“सुविचार?! उस इंस्पेक्टर के बारे में? ना भई --- कोई विचार नहीं है ...”

“पक्का?”

“हाँ पक्का...”

“ओह”

“क्यों... उस दत्ता के बारे में क्यों पूछ रही हो?”

“कुछ नहीं, बस जानकारी ले रही हूँ... वैसे, जहाँ तक मुझे पता है और तुम्हारी बातों को सुनने के बाद ये कन्फर्म है कि इंस्पेक्टर विनय और दत्ता दोनों ही अच्छे मित्र हैं ...”

“हाँ, सम्भव है... और संभव क्या... मुझे पूरा विश्वास है की दोनों ज़रूर बहुत ही अच्छे मित्र हैं... उस दिन जो मैंने दत्ता को विनय की चिंता में गमगीन होते देखा --- उससे तो यही निष्कर्ष लगाया जा सकता है.”

“ह्म्म्म ... अच्छा, क्या तुम्हें पता है कि इंस्पेक्टर दत्ता किसे रिपोर्ट करता है --- आई मीन, उसका बॉस कौन है?”

“नहीं... ये तो नहीं पता.”

“हम्म.. ओके.. और ये बिंद्रा? इसके बारे में क्या कहते हो?”

“कुछ ख़ास नहीं... बंदा दिखता तो बड़ा हेल्पफुल टाइप का... और देखो, उन्होंने मेरी हेल्प भी की ... कई जानकारियाँ शेयर की ...”

“तुमने माँगी थीं वो सब जानकारी?”

“नहीं.”

“पूछा था?”

“नहीं.”

“तो फ़िर?”

मैं एक पल को ठहरा, थोड़ा सोचा...

फ़िर उत्तर दिया,

“मोना, तुम जो कहना चाह रही हो वो मैं समझ रहा हूँ... और सच पूछो तो मैं भी इस बारे में सोच चुका हूँ ...”

“अच्छा?! ज़रा बताओ तो मैं क्या कहना चाह रही हूँ और तुमने किस बारे में क्या सोचा है?” हैरानी से ज़्यादा उसके स्वर में व्यंग्य के पुट थे ...

“यही की यूँ अचानक से बिंद्रा के मन में ऐसी समाज सेवा करने की... या, सीधे शब्दों में मेरी सहायता करने की बात क्यों सूझी? और इतनी सारी बातें एक के बाद एक मुझसे क्यों साझा किया... सम्भव है की ऐसा उन्होंने वाकई तरस खा कर किया होगा ... पर दूसरी सम्भावनाओं को दरकिनार नहीं किया जा सकता है... और...”

“और?” कॉफ़ी का एक सिप लेती हुई मोना पूछी..

“..... और... ये गोविंद का क्या चक्कर है....”

“तुम्हें शक है उसपर?” उत्सुकता झलका... मोना के शब्दों और चेहरे पर...

“हाँ... है तो सही...” मैं भी चिंतित हो उठा..

“क्यों?”

“पता नहीं.. कोई पुख्ता वजह नहीं है..”

“ह्म्म्म... ओके... तो अब क्या करने का इरादा है?”

“इस बारे में कुछ सोचा तो है... पर जो कुछ भी करना है... वह तुम्हारे हेल्प के बिना हो ही नहीं सकता...”

“वाह! तो जनाब ने मुझे किसी योग्य समझा...” कहते हुए खिलखिला कर हँस पड़ी मोना.. पर मुझे सीरियस देख अगले ही क्षण चुप हो गई..

“सॉरी... बोलो... क्या और कैसी हेल्प चाहिए?”

जवाब में उसे एक एक कर बहुत कुछ समझाता चला गया....

मोना मेरी हर बात को बड़े ध्यान से सुनती रही...

अंत में,

“तो ......”

“तो..??”

“क्या कहती हो... हो जाएगा ये? कहीं बहुत ज़्यादा तो नहीं माँग लिया?”

“हाहाहा... इसे कहीं ज़्यादा भी कहते तो वो भी हो जाता... टेंशन न लो... हो जाएगा सब... मैं खुद मॉनिटर करुँगी सब...”

“थैंक्यू सो मच मोना..”

“थैंक्यू से काम नहीं चलेगा मिस्टर.... मेरी कॉफ़ी ठंडी हो गई है... एक और मंगवाओ...”

“हाहा... ओके..” हँसते हुए मैंने एक और कॉफ़ी मँगवाया |

क्रमशः

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09-12-2020, 01:06 PM,
#38
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३५)

कुछ बातें चाची से फ़िर कर लेना बहुत ज़रूरी था.. फ़िर मतलब... दोबारा! .. कुछ नई बातें और कुछ पुरानी .. काफ़ी दिनों बाद आज बहुत बढ़िया मौका मिला..

क्या है कि जिस विषय पर बात होनी है उसके लिए चाची का एक अलग मूड होना भी उतना ही ज़रूरी है... मतलब, आशिकमिजाजी, हल्का और ऊपर से आज दिन भी खुशनुमा ...

चाची हमेशा की ही तरह किचेन का काम निपटा कर टीवी देखने बैठी.. मैं भी सोफ़े पर उनके बगल में आकर बैठ गया ... कुछ देर टीवी देखने के बाद आख़िरकार मैंने निश्चय किया बात शुरू करने का ...

“चाची..”

“हाँ अभय..बोलो”

“अमम्म...एक बात करनी है आपसे..”

“तो करो.” लापरवाही से बोली चाची.

दो मिनट चुप रहा ... फ़िर बोला,

“बात आपके कमरे में चल कर करें?”

“क्यों... मेरे कमरे में क्यों... ? पूरे घर में हम दोनों ही हैं सिर्फ़... यहीं बोलो... ..(थोड़ा रुक कर मेरी ओर शरारती मुस्कान और आँखों में चमक लिए)... कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे कमरे में ही तुम्हें नए आइडियाज आते हैं...?!”

बात ही ऐसी कर दी चाची ने की मैं झेंप गया...

मेरे शर्म को देख चाची ज़ोर से हँस पड़ी,

और मेरे दाएँ गाल पर चिकोटी काटते हुए हँसते हुए बोली,

“ओए होए... शर्मा रहा है मेरा भतीजा... इतने काण्ड करने के बाद भी..”

सुनते ही मैं चौंक कर उनकी ओर देखा ...

मुझे चौंकते देख शायद उन्हें और भी मज़ा आया और उसी हँसते अंदाज़ में बोली,

“क्या गलत कहा मैंने... अकेला पाते ही तू मेरे साथ काण्ड नहीं करने लगता है क्या...?!”

“ओ.....” मैंने चैन की साँस ली..

“क्यों ... क्या हुआ.... तूने कोई और काण्ड समझा क्या?” चाची ने तुनक कर पूछा..

मैं भी तुरंत डिफेन्स में आया,

“नहीं... मैं और क्या समझूंगा ... पर सुनो न चाची.. इट्स वैरी इम्पोर्टेन्ट... चलो , जल्दी चलो...”

“ओके.. चल...”

चाची तो थी ही असमंजस में... मेरे बॉडी लैंग्वेज ने उन्हें और भी टेंशन में डाल दिया..

पर मैंने नार्मल दिखने का दिखावा करते रहना उचित समझा..

इससे चाची जितना हल्के मूड में रहेगी, उतना ही मेरे लिए अच्छा होगा.

मैं पहले ही उनके कमरे में आ पहुँचा और सीधे उनके बिस्तर के एक साइड पर जा बैठा...

टीवी बंद कर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए चाची को थोड़ा टाइम लगा...

रूम में घुसते ही मुझे बेड पर बैठे देखा .. शायद उनके मन में कोई और ही विचार आ गया होगा, जिस कारण वो फ़िर एक शरारत सी मुस्कान दे बैठी...

पर मैं यथावत गम्भीर मुद्रा में बैठे रहा..

और ये बात उन्हें अजीब लगा..

इससे पहले तो हमेशा कमरे में उनके आते ही उनसे लिपट जाता था.. पर आज मेरा यूँ शांत और गंभीर बैठे रहना उन्हें स्पष्ठ रूप से किसी अनहोनी का आभास दिलाने लगा..

आ कर पास बैठी,

दाएँ कंधे पर हाथ रखते हुए पूछी,

“क्या हुआ अभय... इतने सीरियस क्यों? क्या बात हुई?”

“अगर किसी अनहोनी की अपेक्षा कर रही हो चाची तो निश्चिन्त रहो.. अनहोनी या अनिष्ट वाली कोई बात नहीं है |”

मेरे इतना कहते ही चाची तुरंत राहत की साँस ली,

“ओह अभय... तो फ़िर बात क्या है?”

“चाची, एक ऐसी बात है जो मैं आपसे जानना चाहता हूँ.. विस्तार से.. बिना किसी लाग लपेट के ... या काट - छांट के.. ”

“ओके... क्या पूछना है..?” संशययुक्त स्वर में चाची बोली.

“सब बताओगी ना...?”

“हाँ”

“विस्तार से?”

“हाँ बिल्कुल..”

“पक्का...?”

“उफ्फ्फ़...हाँ भई.. हाँ... अब बोलो तो ....”

“प्रॉमिस?”

“ओके.. प्रॉमिस... अब बोलो...”

“ठीक है... चाची, बात थोड़ी पुरानी है... पर बहुत नहीं... इस बारे में हम पहले भी बात कर चुके थे.. पर मुझे फ़िर से बात करनी है.. और हाँ.. ऐसा नहीं है की मुझे सुनने में मज़ा आता है इसलिए सुनना चाहता हूँ... मैं , बस जानना चाहता हूँ... अच्छे से... सविस्तार...”

“हम्म्म्म... ओके....” मेरी आँखों में आँखें डाल कर इतना ही बोली चाची... शायद उनको अब अंदाज़ा होने लगा है की मैं किस बारे में बात करना चाहता हूँ ...

एक गहरी साँस लिया, थोड़ा ठीक से बैठा,

और,

फ़िर प्रश्न किया,

“चाची... आपके साथ ये सब कब से हो रहा है और कैसे शुरू हुआ... और सबसे ज़रूरी सवाल... कब तक चलेगा??”

एक ही साँस में कह गया...

चाची धीरे से मुस्कराई और तुरंत ही पहलू बदली..

चेहरे पर मायूसी उतर आई...

होंठ काँप गए उनके..

सामने खुली खिड़की के बाहर देखने लगी..

एकबार फ़िर मुस्कराने की कोशिश की ... पर इसबार सफ़ल न हो सकी ..

धीरे से बोली,

“सब बता तो दी थी.. फ़िर क्यों पूछ रहे हो?”

“चाची प्लीज़... प्लीज़ मुझे दोबारा बताओ... मैं सुनना चाहता हूँ... प्लीज़ ... और मुझ पर भरोसा रखो.. मेरा कोई गलत मतलब नहीं है..”

चाची सिर घूमा कर मेरी ओर देखी...

बहुत उदासी छाई हुई थी...

आँखों में बहुत सी जिज्ञासाएँ लिए हुए ---

बेड के किनारे रखे उनके हाथ को उठा कर अपने दोनों हाथों में लेते हुए हल्के से दबाया और बहुत धीरे से, लगभग फुसफुसाते हुए कहा,

“प्लीज़....”

कुछ सेकंड्स मेरी ओर देखती रही वह..

शायद निर्णय न कर पा रही हो... कि उन्हें फ़िर से उस दागदार घटना के बारे में बोलना चाहिए या नहीं...

इधर उनकी चुप्पी से मैं भी थोड़ा परेशान होने लगा...

मुझे हर हाल में जानना व सुनना था...

कि चाची के साथ यह सब कब और कैसे शुरू हुआ --- और --- कितने दिनों से चल रहा है ...

पिछली बार मैं जो और जितना जाना था वो इनकी डायरी से जाना था...

चाची को डायरी लिखने का शौक है .. और आदत भी ...

रोज़ डायरी लिखती है ....

हर छोटी – बड़ी बात और घटनाओं के बारे में विस्तार से लिखती है... मानो कोई उपन्यास लिख रही हो ... या फ़िर, किसी को बहुत कुछ समझाना चाहती हो...

सुबह उठने से लेकर अपने वार्डरोब तक की बातों को लिख डालती है..

चाचा के साथ किस बात को लेकर झगड़ा हुआ --- या --- बेटियों के साथ फ़ोन पर कितनी देर बात की --- या --- मार्किट कितने बजे गई और कब लौटी --- यहाँ तक की मैंने सुबह क्या खाया और रात को डाइनिंग टेबल पर क्या क्या बात हुईं --- सब ---- सबकुछ लिखती हैं वो --- एक ‘बिंदु’ तक मिस नहीं करती ...

उन पर शक होने के बाद मैंने उन पर नज़र रखना शुरू किया था.. और जल्द ही उनकी इस आदत के बारे में पता चला था..

एकदिन मौका भी मिल गया था उस डायरी को पढ़ने का..

कुछ ही वाक्य पढ़ पाया था.. की तभी चाची आ गई..

पहले उन्हें हैरानी हुई.. क्योंकि पहली बार मुझे अपने कमरे में देखा..

फ़िर थोड़ी विचलित हुई..

डायरी छीनने की कोशिश की..

नहीं सकी तो गुस्सा करने लगी --- बहुत कुछ बोली --- लगभग ऐसी कोई भी बात जो उन्हें सूझ सकती हो... जिसे बोलने पर मैं उन्हें वह डायरी दे दूँ ...

दिया भी...

और साथ ही पूछा भी...

शुरू में ना नुकुर किया ...

करना बनता भी था..

पर मुझसे सकी नहीं...

हार माननी ही पड़ी और सब कुछ बताना पड़ा...

बताते बताते रुआंसी हो उठी थी...

मैं भी इमोशनल हो गया ..

पहले उनका हाथ अपने हाथों में लेकर सान्तवना देने की कोशिश किया ...

फ़िर कन्धों को सहलाया..

फ़िर पीठ...

धीरे धीरे वो भी उतनी ही हल्की होती गई...

अपने शरीर को मुझ पर ढीला कर छोड़ती गई..

और इसी तरह हम दोनों ने ही एक दूसरे को एक दूसरे के ऊपर छोड़ते हुए सरेंडर कर गए..

उस दिन हमारा काम क्रिया काफ़ी लम्बा चला...

मेरा तो पहली बार था इसलिए मन भी नहीं भर रहा था...

और उनको भी कोई ख़ास जल्दी नहीं थी उठ कर जाने की...

उस दिन के बाद भी कुछेक दिन हमारे बीच नग्न रूप का वह अनुपम कामक्रीड़ा चला...

और जैसा की मैं पहले ही बता चुका हूँ; कि नारी देह रहा तो था वैसे मेरे लिए एक अबूझ पहेली की तरह... पर चाची की ही मेहरबानी से ये पहेली अत्यंत सरलता से सुलझ गई..

और उनके पास जो है... मुझे नहीं लगता किसी और के पास होगा.. यहाँ तक की शायद मोना के पास भी नहीं...

पर एक बात जो मुझे उस दिन से लेकर आज तक खटकती रही है ; वह यह कि शायद उस दिन चाची ने मुझे खुल कर सभी बातें न बताई हो.. यकीनी तौर पर नहीं कह सकता पर शक तो रहा ही...

और घटनाक्रमों ने कुछ ऐसे मोड़ लिए हैं कि आज मुझे एकबार फ़िर चाची के साथ उन्हीं बातों पर डिस्कस करने का मौका मिल गया ...

“क्या जानना चाहते हो अभय..?”

“सब कुछ...”

“सब कुछ..??”

“हाँ... शुरू से..”

“पर मैं तो तुम्हें सब कुछ बता चुकी थी...”

“फ़िर से जानना है मुझे, चाची... और प्लीज़... प्लीज़... बताना शुरू करो.. नो मोर क्वेश्चन्स...” मेरे स्वर में इस बार अत्यधिक उत्सुकता एवं उतावलापन था.. जिसे चाची स्पष्ठ फ़ील कर सकी..

हाँ में सिर हिलाते हुए बोली,

“ठीक है अभय... सुनो..”

उनका इतना कहना था कि मेरे कान सजग हो गए..

पूरा का पूरा ध्यान उनके मुँह से निकलने वाले शब्दों पर केन्द्रित हो गए...

मन … और शरीर का रोम रोम उत्सुकता और एक रहस्य जानने वाले रोमांच के अनुभूति से भर उठा...

इधर चाची ने भी कहना शुरू कर दिया ....

क्रमशः

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09-12-2020, 01:06 PM,
#39
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३६)

“बात साल भर पहले की है अभय.. बेटियों को बोर्डिंग स्कूल में दिए मुश्किल से तीन महीने ही बीते होंगे... तुम तब यहाँ नहीं थे.......”

“अच्छा?”

“हाँ.. ”

“आगे --- ??”

“तुम आए थे बाद में... अपने फ्रेंड्स लोग के साथ यहाँ – वहां घूमना; मतलब की , मार्किट जाना, सिनेमा जाना.... वगैरह वगैरह .. और कहीं अगर नहीं भी जाऊँ तो २-३ फ्रेंड्स को घर पर ही बुला लेती थी...”

“हम्मम.”

“जैसा की तुम जानते ही हो, की शीला मेरी सबसे क्लोज़ फ्रेंड है... बेस्ट फ्रेंड... ”

“हाँ... जानता हूँ... वह काफ़ी ओपन माइंडेड औरत हैं.. ” मैंने कहा.

शीला आंटी को काफ़ी दिनों से जानता हूँ मैं.. खुले विचारों वाली.. घूमना फिरना पसंद करने वाली औरत है वह...

उनके खुले विचार उनके पहनावा से भी जान पड़ता है..

मतलब,

की ड्रेस कोई सा भी हो --- क्लीवेज दिखना - दिखाना उनके लिए साँस लेने जैसा एकदम नार्मल सी बात है ... खुले गले के कपड़े पहनना, कभी टाइट तो कभी बहुत ढीला पहनना ... लेटेस्ट फैशन ट्राई करना ... शो ऑफ़ करना ... ये सब उनका पसंदीदा और डेली का काम है ...

कोई ड्रेस अच्छा है या नहीं ; इसको जानने का उनका तरीका भी काफ़ी अनोखा है ... और वह ये कि किसी ड्रेस को पहन कर मार्किट में निकलने पर उन्हें घूर घूर कर देखने वालों की संख्या कितनी है ---

अगर देखने वाले लार टपकाते हुए घूर रहे हैं – ताड़ रहे हैं तो ड्रेस बहुत बहुत ही अच्छा है ... शानदार है ...

पर,

देखने वाले सिर्फ़ देखने के लिए देखे और फ़िर अपने अपने काम में लग जाए ; या सिर्फ़ देखे , गंदी मुस्कान न दे ... फ़िर चाहे वह ड्रेस कितना भी कीमती क्यों न रहा हो... उसकी सिलाई और बनावट चाहे कितना ही उम्दा क्यों न हो.. वह हमेशा के लिए शीला आंटी के ‘बेकार’ वाली लिस्ट में शुमार हो जाती ---

दूसरों को , ख़ास कर मर्दों को भाव नहीं देती , पर दूसरे अगर उसे भाव न दे तो उन्हें काफ़ी अखर जाता ...

महँगे होटलों में खाना और महँगे पर्स से लेकर रिस्ट बैंड पहनना, कोई नई बात नहीं उनके लिए...

और भी कई शौक होंगे उनके ....

और हैं भी...

हस्बैंड उसके ऐसे भी कुछ कहते नहीं हैं ... खुद भी बड़े शौक़ीन किस्म के हैं ... रातों को सेक्स में नए नए तरीकों से मज़े लेने के लिए नए नए भड़काऊ कपड़े ख़रीद कर देते हैं उसे... साथ ही, उसे अपनी बीवी दूसरे मर्दों को रिझाती हुई बहुत अच्छी लगती है ...

अब जब पति के तरफ़ से ही इतनी छूट है तो फ़िर बीवी तो ऐसी होगी या करेगी ही..

धीरे धीरे उसके नाज़ और नखरे मुझे भी बहुत बहाने लगे --- मैं भी उसके जैसी शो ऑफ करना चाहने लगी, उसके जैसी बनना चाहने लगी... उसे भी यह पता चलने में देर न लगी .. एकदिन मुझसे पूछ ही बैठी और मैंने भी अपने सभी अरमानों को खुल कर उसे कह सुनाया ..

उस दिन तो कोई विशेष बातचीत न हुई इस बारे में; हम दोनों में...

अगले ३ दिन नार्मल ही बीता ...

हम सिर्फ़ मार्किट गए, सिनेमा गए, फ़िर रेस्टोरेंट में कुछ हल्का खायी और वापिस अपने अपने घर आई.. फ़िर अगले २ दिन नहीं आई वह.. मैंने फ़ोन भी किया; पर उधर से जवाब मिला की उस वक़्त वह घर पर नहीं है ... मैंने नार्मल बात समझ के अपने नियमित दिनचर्या में व्यस्त हो गयी...

तीसरे दिन शीला हमारे द्वारे उपस्थित हुई.. मैं बहुत ख़ुश हुई .. हूँ भी क्यों न --- उसके साथ का ही असर था जो मुझे हर दिन कम से कम १ घंटे के लिए मार्किट घूमना, घर से कुछ देर के लिए बाहर रहना ज़रूरी लगने लगा --- |

थोड़ी देर इधर – उधर की बातें करने के बाद मैं तैयार होने चली गयी .. एक सेमी ट्रांसपेरेंट सी साड़ी पहनी जिसमें से मेरा पेट और नाभी बहुत हद तक दिखता है .. ये साड़ी शीला की ही गिफ्ट हुई थी; मेरे जन्मदिन पर --- ब्लाउज पहनी जोकि काफ़ी अच्छी फिटिंग की थी और शार्ट स्लीव भी --- अंडरआर्म्स और वक्षस्थल के पास परफ्यूम लगाई और शीला के सामने जा खड़ी हुई ...

उस वक़्त शीला मैगज़ीन पढ़ रही थी.. सर उठा कर मुझे देखी तो उसका मुँह खुला का खुला ही रह गया.. उसके चेहरे पर आते – जाते भाव ने साफ़ बता दिया की वह मुझे देख कर दांग रह गई है ... उसकी शक्ल - ओ - सूरत ने मुझे शर्माने पर मजबूर कर दिया..

वह उठी ..

सधे कदमों से चलती हुई मेरे पास पहुँची; ऊपर से नीचे तक अच्छे से देखी --- एक हल्की सीटी मारी, घूम कर मेरे पीछे पहुँची ..

एक सीटी फ़िर मारी --- और अचानक से मेरे नितम्बों पर अपने दोनों हाथ रख धीरे धीरे सहलाने लगी और सहलाते हुए ही धीरे धीरे उसके दोनों हथेली ऊपर उठते हुए मेरे कमर तक पहुँचे --- कुछ क्षण वहाँ रुक कर ऊपर उठे और साड़ी के नीचे से ही मेरे मेरे वक्षों को कुछेक बार सहलाने के बाद दबाना शुरू कर दी...

जैसा की तुम्हें पहले ही बताई थी की कभी कभी बहुत बोर होने पर हम दोनों अकेले में एक दूसरे के शरीर के साथ थोड़ी देर के लिए मस्ती शुरू कर देते थे ... यहाँ भी वही हुआ .. पर वो बोर तो नहीं हो रही थी और ना ही मैं बोरियत महसूस कर रही थी --- फ़िर वो ऐसी मस्ती क्यों करने लगी?? ---

मैं मना की उसे पर वह नहीं सुनी --- वक्षों पर उसके नरम हाथ और खेलने के तरीके ने धीरे धीरे मुझ पे भी ख़ुमारी छा दिया ..

कुछ देर ऐसे ही मस्ती के बाद वो अपना मुँह मेरे कानों के बहुत पास ले आई और धीरे से बोली कि ऐसे ड्रेसेस में बहुत हुआ --- अब मुझे कुछ अलग ट्राई करना चाहिए ---

सुन कर मुझे बहुत हैरानी हुई...

हैरानी इस बात का की ये जो अभी पहनी हुई हूँ ; यही क्या कम है जो अब ये मुझे कुछ अलग ट्राई करने को कह रही है....?

“क्या कह रही हो... अलग ट्राई करूँ??”

“यस स्वीटी... अलग... उम्म्म...”

कहते हुए मेरे पीछे से और सट गई शीला और मेरे वक्षों पर भी ज़ोर बढ़ा दी...

उसकी गर्म साँसें अब मेरे पीठ और कंधे पर आते महसूस होने लगे.. मुझे अच्छा लग रहा था पर मन अब मेरे ही द्वारा किए गए प्रश्न के सही उत्तर को सही सही जानने को उत्सुक होने लगा ...

उससे परे हटी और उसकी ओर पलट कर दोबारा अपने उसी प्रश्न को पूछ बैठी..

जवाब में पहले तो वह मुस्कराई ...

और फ़िर मेरे पास आई...

मेरा हाथ पकड़ी ..

और सीढ़ियों की ओर बढ़ गई..

वो आगे और मैं पीछे.. मेरा हाथ उसके हाथ में... लगभग खींचते हुए; पर प्यार से ... मुझे मेरे ही बेडरूम में --- मतलब की यहाँ --- जहाँ अभी हम दोनों बैठे हैं --- ले आई..

ठीक इसी आईने के सामने ले आई और लाकर मुझे आईने के सामने खड़ी कर के ख़ुद मेरे पीछे आ गई ..

“मुझे यहाँ क्यों ले आई शीला?”

“बताती हूँ .. पर पहले अच्छे से आईने में ख़ुद को देखो कुछ सेकंड्स...”

“हम्म.. देख रही हूँ --- और --- रोज़ ही तो देखती हूँ ख़ुद को...”

“ठीक है.. आज... अभी ... मेरे कहने से ही एकबार फ़िर बहुत अच्छे से देखो...”

“ठीक है.”

कह कर मैं ख़ुद को देखने लगी ... आईने में...

पर कुछ समझ में नहीं आया...

आए भी तो कैसे ...

जो डेली देखती हूँ उसमें आज अचानक किसी और के कहने से मैं भला अलग क्या देख लूँगी ...

फ़िर भी,

यह सोच कर कि अगर ये कह ही रही है ऐसा करने को तो ज़रूर कोई बात होगी... शायद... शायद मेरी आज की ड्रेसिंग थोड़ी अलग हो गई होगी... कुछ मिस कर गई होंगी मैं...

मैं उलझन में पड़ गई क्योंकि मैं अपनी ड्रेसिंग और कपड़ो को लेकर काफ़ी सजग रहती हूँ .. छोटी से छोटी डिटेल काफ़ी मायने रखती है मेरे लिए.. इसलिए छटपटाहट बढ़ने लगी थी मेरी...

मैं उसकी ओर देखी पर --- वह तो बस मुस्कराती हुई मुझे देखे ही जा रही थी...

मुझे असमंजस में देख उसे शायद अच्छा लग रहा होगा..

थोड़ी ही देर बाद वह मेरे पीछे आ कर खड़ी हुई ..

मेरे कमर के दोनों ओर अपना नर्म हाथ रखी, सहलाई... और बोली,

“स्वीटी.. अभी क्या दिख रहा है तुम्हें आईने में?”

“मैं दिख रही हूँ .. मेरे पीछे तुम दिख रही हो...” मैंने असमंजस में ही उत्तर दिया..

“और??” वो शरारती हंसी हँसते हुए बोली..

“और क्या... कुछ नहीं...”

“ह्म्म्म ... एक्साक्ट्ली..” उसका चेहरा थोड़ा संजीदा हो गया.. और आईने में ही मुझे देखते हुए मेरी आँखों में देखी..

मैं भी उसका मतलब समझने के लिए उसके आँखों में देखी...

दो सेकंड बाद ही वह मुस्कराते हुए बोली,

“अब देखो.. और समझो...”

कहते हुए उसने अचानक से सीने पर से मेरा आंचल सरका दिया... मैंने हकबका कर आंचल पकड़ने की कोशिश की लेकिन उसने बीच में मेरे हाथ पकड़ ली...

“थोड़ी देर शांत खड़ी रह..” झिड़क दी मुझे..

धीरे से मुझसे पूछी,

“क्या दिख रहा है अब?”

शर्म के कारण मेरे बोल न निकले..

पर वह फ़िर एक शरारती मुस्कान देती हुई ब्लाउज के ऊपर से मेरे स्तनों को नीचे से अपने दोनों हथेलियों से थोड़ा सा उठाई .. इससे सामने जितना भी पहले दिख रहा था ; उससे भी २ गुना ज़्यादा क्लीवेज अब नज़र आने लगा..

थोड़ी देर वैसी ही रह कर हलके से कुछेक बार स्तनों को दबा कर वह मेरे ब्लाउज के पहले हुक को खोल दी..

उसके इस सारे क्रियाकलापों को मैं मुग्ध सी देखे जा रही थी..

पहले हुक को खोलने के बाद उसने उस खुले हुए ब्लाउज के दोनों सिरों को पकड़ी और अंदर की ओर मोड़ कर घुसा दी..

मेरा दूधिया क्लीवेज अब पहले से भी अधिक दिखने लगा..

ख़ुद की ही क्लीवेज देख कर मैं खुद ही मुग्ध होने लगी.. इस बात को शीला भी ताड़ गई.. और हौले से मेरे गाल को चूमती हुई बोली,

“डिअर, तुम्हें अब कुछ दिखना चाहिए... और .... दिखाना चाहिए... ऐसे... समझी?!”

“हम्म”

पता नहीं क्यों मेरे मुँह से बस इतना ही निकला..

“इसलिए आज मैं तुम्हें कहीं ले जाना चाहती हूँ...”

“कहाँ?”

“वह तो वहाँ जा कर ही तुम्हें पता चल जाएगा.. अब जल्दी तैयार हो जाओ... या...फ़िर कहो तो मैं तैयार कर दूं..?” फ़िर शरारत हुआ उसका..

“नहीं .. नहीं... मैं ख़ुद तैयार हो जाऊंगी...”

मुझे हकबकाते देख कर वो खिलखिला कर हँस दी...|

अपने कपड़ों को ठीक करते हुए मैं सोचती रही कि आख़िर शीला मुझे कहाँ ले जाना चाहती है और क्यों.. वैसे तो उसने कह ही दिया था की जा कर मुझे ख़ुद पता चल जाएगा पर ... पर ...एक उत्सुकता तो रह ही जाती है..

तैयार हो कर हम दोनों मार्किट के लिए निकल पड़ी ...

हमारे आपस में बात करने के दौरान वह काफ़ी गुमसुम सी .. चुपचाप सी लगी ... मैंने पूछा, पर हँस कर टाल दी..

जल्द ही हम दोनों एक टेलर दुकान के सामने खड़े थे.

ब्लाउज के कपड़े थे मेरे पास.. नए..

साड़ी की शौपिंग तो पहले ही कर रखी थी और एक आज खरीदी..

अंदर घुसे दोनों..

शायद शीला का पहले से उस टेलर दुकान में आना जाना रहा था.. तभी तो अंदर घुसते ही सीधे एक काउंटर में पहुँची और झट से धीमे आवाज़ में वहाँ बैठे एक व्यस्क व्यक्ति से कुछ बातें करना शुरू कर दी.. जब तक मैं उसके पास पहुँची उसकी उस आदमी से बात ख़त्म हो चुकी थी.. जब मैं वहाँ पहुँची तो मुझे दिखा कर बोली की ‘इसके लिए बनाने हैं..’

टेलर ने मुझे ऊपर से लेकर नीचे थक बहुत अच्छे से देखा .. ज़्यादा नहीं.. बस एक नज़र.. पर अच्छे से.. और शीला की ओर देखते हुए सहमती में सिर हिलाता हुआ अपने पीछे के एक दरवाज़े को खोल कर अंदर घुस गया ...

नाप लेने का समय आया .. कोई लेडी टेलर न होने के कारण शीला ने ख़ुद नाप ले लेने का निश्चय किया..

मैं एक कमरे में गई..

कमरा काफ़ी अच्छा था.. सीलिंग फैन भी था जो अच्छे स्पीड में चल रहा था..

सामने ही एक आदम कद आईने के सामने जा कर मैं खड़ी हो गई और ख़ुद को निहारने लगी..

और ख़ुद से ही पूछ बैठी की क्या आज ही ब्लाउज बनाने देना है.. और क्यों... मैं इतनी बुरी भी तो नहीं लगती हूँ.. इन फैक्ट, मैं तो बुरी हूँ ही नहीं... मेरा तो चेहरा भी ऐसा है की कोई भी एक नज़र अच्छे से देखे तो फ़िदा हो जाए..

तो फ़िर इतना एक्सपोज़ करने की ज़रूरत क्या है..

तभी शीला अंदर आई ..

अपने साथ मेज़रिंग टेप भी साथ ले आई ..

मुझे देखी .. मुस्कराई ... थोड़ी नर्वस भी लगी ..

मैंने कुछ पूछना चाहा पर मौका न मिला --- मुझे दोबारा आईने के सामने घूमा कर खड़ी की और आँचल हटा कर माप लेने लगी.. माप लेते लेते ही फ़िर से उसे शरारत सूझी और --- ”

“ह्म्म्म... समझा...” इतनी देर बाद मैं बोला; स्वर में उत्सुकता का बोध हुआ शायद चाची को..

अपनी बात फ़िर से कहना शुरू की.. इसबार थोड़ी और ऊर्जा के साथ..

“हम दोनों ही उस छोटे से कमरे में बहक गए थे उस दिन.. उसके द्वारा मेरे गालों , कन्धों , गर्दन पर किए गए चुम्बन और नाज़ुक अंगों के साथ किए गए छेड़खानी ने मुझे उस दिन पता नहीं क्या कर दिया था.. मैं धीरे धीरे उसका साथ देती चली गई.. मतलब...मतलब....”

“समझा..” मैं फ़िर बीच बोला..

“क्या समझे..?”

“यही की उस दिन उस टेलर दुकान में आप दोनों ही बहक गई थीं और उस छोटे से कमरे में आप दोनों ने सभी हदें पार दी थीं...”

मेरे चेहरे पर अविश्वसनीयता; पर स्वर में दृढ़ता देख कर चाची मुस्कराई...

बोली,

“नहीं.. हदें तो पार नहीं की थीं पर .... पर बहुत कुछ हो गया था... (थोड़ा रुक कर) ... और वैसे भी, दो महिला में हदें क्या पार होना...?!”

उनकी इस बात पर मैंने कुछ कहना चाहा पर मुँह बंद रखना बेहतर समझा... कहीं टॉपिक न चेंज हो जाए.. |

इसके बाद चाची और भी बहुत कुछ कहती चली गई.. और मैं सुनता चला गया.. परन्तु हैरानी, अचरज, अविश्वसनीयता जैसे बातें भी मेरे अंदर घर करती चली गईं .. हो भी क्यों न... बातें थीं ही कुछ ऐसी ---- |

क्रमशः

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09-12-2020, 01:06 PM,
#40
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३७)

“एक मिनट ... एक मिनट ....”

कॉफ़ी की चुस्की लेते हुए बीच में ही हड़बड़ा कर बोल पड़ी मोना..

आज एक अलग कैफ़े में हम दोनों मिले हैं.. जहाँ एक बड़ा सा लॉन है; उस कैफ़े का ही है.. कैफ़े के अंदर वातानुकूलित कमरे में बैठने के अलावा बाहर उस बड़े से लॉन में बैठने की भी सुविधा है.. ग्राहकों को जहाँ मन वहाँ बैठ सकते हैं..

हम दोनों ने बाहर ही बैठने का निर्णय किया था.

काफ़ी अच्छा लग रहा है आज ...

इस तरह बाहर किसी लॉन में किसी ‘ख़ास’ के साथ बैठ कर कॉफ़ी पीना एक अलग ही अनुभूति का संचार करा रहा था मन में..

एक गोल टेबल के आमने सामने कुर्सियाँ लगा कर एक दूसरे के सामने बैठ कर गप्पे लगा रहे थे दोनों..

बातों ही बातों में चाची से संबंधित एक दो बातें उठीं और फ़िर तो उन्हीं से संबंधित ही बातें होने लगीं..

और जब उनके बारे में बात हो ही रही थी तो मैंने उनकी उस कहानी के बारे में भी मोना को बता दिया...

कहानी के एक जगह मुझे अचानक से बीच में ही टोकती हुई मोना बोल पड़ी, कॉफ़ी की चुस्की बीच में ही छोड़ते हुए,

“एक मिनट.. मतलब तुम कह रहे हो की....ओह सॉरी.. आई मीन, तुम्हारी चाची का कहना है की उस दिन उस कमरे में जो कुछ भी हुआ था ; उन लोगों ने उसकी रिकॉर्डिंग कर ली थी...??”

“हम्म.. उनका तो.. मतलब, चाची का तो यही कहना है...”

“ओह.. और उसी रिकॉर्डिंग के आधार पर ही तुम्हारी चाची को वे लोग ब्लैकमेल करते रहे..?”

“करते रहे नहीं मोना... बल्कि अभी भी कर रहे हैं..|”

बड़ी कठिनाई से उचारा मैंने यह वाक्य.. बड़ा कष्ट और लज्जित सा बोध होने लगा अचानक से मुझे --- इस बात को स्वीकार करने में कि वे लोग आज भी चाची को ब्लैकमेल करते हैं..

“हम्म.. और जैसे हालात हैं, तुम तो शायद पुलिस स्टेशन भी नहीं जा सकते..”

मेरे निराश चेहरे को देख मोना ने बातचीत का रूख पलटने की कोशिश की --- और सफ़ल भी रही --- क्योंकि मैं तो ख़ुद ही अपनी असफ़लता पर से ध्यान हटाना चाह रहा था..

“जा क्यों नहीं सकता.. पर जाऊँगा नहीं.. क्योंकि कोई फ़ायदा नहीं होगा ... मैं आलरेडी एक सस्पेक्ट हूँ.. भले ही प्राइम ना सही.. पर हूँ तो... और वैसे भी उस इंस्पेक्टर दत्ता को मेरे किसी भी बात का यकीं न करने का जैसे कहीं से ऑर्डर मिला हो.. या शायद ख़ुद ही यकीं न करने का कसम खाया है..”

“तो ... क्या सोचा है तुमने...?”

“किस बारे में?”

“अरे बाबा.. इस बारे में .... तुम्हारी चाची के केस में... आगे क्या करने का सोचा है?”

तनिक झुँझलाते हुए मोना पूछी ---

मैं - “ओह.. पता नहीं.. पर जल्द ही कुछ करूँगा..”

“हम्म.”

कुछ सोच कर मैं बोला,

“अच्छा मोना, मैंने जो काम कहा था; तुमने किया वो?”

“नहीं..”

बिल्कुल सपाट अंदाज़ में मोना ने उत्तर दिया..

मैं चौंका ..

उत्तेजित हो उठा और उसी अंदाज़ में पूछा,

“क्या कह रही हो यार.. क्यों नहीं की?”

“क्योंकि मैं काम करवाती हूँ... करती नहीं..”

बाएँ हाथ से अपने बालों को सहलाती हुई बोली वो.. भाव खाते ... शेखी बघारते हुए...

“ओफ़्फ़ो.. अच्छा.. ठीक.. तुम काम करवाई..?”

“ऑफ़ कोर्स करवाई...”

लापरवाही से बोली वह..

मैं - “फ़िर...?”

“फ़िर क्या?”

“नतीजा क्या निकला..??”

“बहुत नहीं ...”

“थोड़ा?”

“हाँ !”

“तो देवीजी.. वही उचारिये...”

“अवश्य बालक... सुनो... गोविंद का केस बिल्कुल वैसा ही है जैसा की उसने ने बताया था.. अन्ह्ह्हम्म..क्या नाम था उसका...?!”

“बिंद्रा?”

“हाँ.. बिंद्रा..! उसने सही कहा था तुम्हें गोविंद के बारे में.. उसकी मम्मी के साथ वाकई बुरा हुआ.. सेम केस एज़ योर्स..”

“ओह्ह.. बहुत बुरा हुआ..”

“और भी ख़बर हैं जनाब.. सुनना नहीं चाहेंगे?”

“अरे तो सुनाओ तो सही यार... इतना गोल गोल क्यों घूम रही हो..?”

“इंस्पेक्टर दत्ता और बिंद्रा... दोनों सही आदमी हैं.. पर एक थोड़ा कम सही है और दूसरा थोड़ा ज़्यादा सही है ... अब कौन कितना हैं.. ये नहीं पता.. पर दोनों मिले हुए हो सकते हैं.. मैं ये तो नहीं कहती कि दोनों गलत कामों के लिए मिले हुए हैं.. मतलब, की दोनों अक्सर आपस में हरेक केस के बारे में चर्चा करते रहते हैं.. तुम्हारी चाची के बारे में दत्ता ने ही बिंद्रा को बताया है........”

“पता है...” मैं बीच में बोल पड़ा...

मोना की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गई..

“पता है...!! कैसे?!”

“बस पता है यार... तुम आगे तो बताओ..”

“भई वाह..! कमाल के निकले तुम.. पहले ही पता कर लिया..!”

“पता लगाया मैडम.. पता हो गया... अब कृप्या अपनी कहानी को कंटिन्यू कीजिए...”

मैंने मुस्कराते हुए मनुहार करते हुए बोला..

बदले में वह भी मुस्कराई.. पर सेकंड भर के लिए .. फ़िर संजीदा होते हुए अपनी बात शुरू की,

“देखो अभय, शायद हमारे शहर में आने वाले दिनों में कोई संकट.. कोई बड़ा संकट गहराने वाला है.. तुमने जिस बात को लेकर आशंका जताई थी.. वो गलत नहीं थी.. आई मीन, फ़िलहाल गलत नहीं लगता..”

“क्यों”

“शहर के कई हिस्सों में दूसरे जगहों से अवैध रूप से हथियारों की ख़रीद फ़रोख्त हो रही है.. इस देश को कमज़ोर करने के उद्देश्य से इस देश के भावी पीढ़ी यानि की युवा वर्ग को नशे के दलदल में धकेला जा रहा है.. ड्रग्स के जरिए.. और ये सब बहुत ही सुनियोजित तरीके से हो रहा है..

“ओके....?” मैं असमंजस सा बोला.. थोड़ी नासमझी वाली बात थी...

“तुम समझ रहे हो ना.. मैं जो कुछ भी कह रही हूँ |”

“अं..हम्म ..हाँ...म..मैं...”

“हम्म.. समझी ...”

“क्या...?”

“यही की तुम क्या समझ रहे हो..”

ताना सा देते हुए बोली मोना..

“मैं क्या समझ रहा हूँ?”

“कुछ नहीं!”

झल्लाते हुए बोली वह..

“तो फ़िर ठीक से समझाओ न...”

शिकायत मेरे शब्दों में भी साफ़ झलकी.

थोड़ा रुकी.. एक साँस ली... नया गरमागर्म आया कॉफ़ी का एक घूँट ली.. होंठों पर हल्का सा जीभ फ़ेरी और शुरू हुई..

“देखो अभय, मैं सीधे पॉइंट पर आती हूँ...म..”

“हाँ.. यही सही रहेगा.” उसकी बात को बीच में ही काटते हुए मैं बोला.. क्या करूँ.. बहुत उतावला हुआ जा हूँ.

थोड़ी नाराज़गी वाले अंदाज़ में मेरी ओर देखी --- मुझे अपने भूल का अहसास हुआ और जीभ काटते हुए सॉरी बोला.

वह दोबारा बोला शुरू की,

“अब बीच में मत टोकना... अच्छे से सुनो.. सीधे मतलब की.. पॉइंट की बात... ये सब कुछ जो हो रहा है --- मतलब की जो कुछ तुम्हारे साथ हो रहा है और उस दिन जो कुछ भी तुमने उस बिल्डिंग में देखा, वह सब एक बहुत बड़े आर्गेनाइजेशन के कारोबार का छोटा सा हिस्सा है --- अब इससे पहले की तुम ये पूछो कि कौन सा आर्गेनाइजेशन; तो मैं ये बता दूं की वो आर्गेनाइजेशन किसी का भी हो सकता है पर है वह एक टेररिस्ट गैंग का ही.. वैसे तो टेररिस्ट गैंग्स का भारत से रिश्ता थोड़ा पुराना है पर यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि कुछ ख़ास विदेशी गैंग्स का भारत की ओर झुकाव नब्बे के दशक में हुआ.. सन १९९० में सोवियत रूस का बँटवारा हुआ तो उसके बँटवारे के साथ ही बहुत से छोटे देशों का अभ्युदय हुआ.. एकाएक बने कुछ देशो के लिए तात्कालिक रकम जुटाना बहुत बड़ा चैलेंज था और इस चैलेंज का जवाब उन्होंने कुछ टेररिस्ट गैंग्स को ड्रग्स और हथियार बेचने के रूप में दिया.. और इससे यकीनन ऐसे छोटे देशों को बहुत बहुत फायदा हुआ --- और टेररिस्ट गैंग्स ने भी जम कर चाँदी काटी --- पर जल्द ही अंतरराष्ट्रीय दबाव के वजह से ऐसे गैंग्स का पतन शुरू हो गया.. कई मारे गए --- कई जेल में डाल दिए गए तो कई के तो दिनों क्या महीनों तक कोई ख़बर न मिली; लापता से हो गए.. और जब लंबे समय तक इनके बारे में कोई ख़बर न मिली तो अंतरराष्ट्रीय समूह ने इन्हें मरा हुआ समझ लिया और ‘presumed dead’ की श्रेणी में डाल दिया. पर वास्तव में ये लोग मरे नहीं थे.. अपितु, खुद को गुमनाम रख कर अपने लिए सुरक्षित ठिकाना तलाश कर रहे थे और जल्द ही इनकी ख़ोज समाप्त हुई भारत पर.. हमारा ये देश हमेशा की तरह तब भी राजनीतिक अस्थिरता में उलझा हुआ था.. इन लोगों ने इस बात का बख़ूबी फ़ायदा उठाया और जल्द ही इस देश में अपना कारोबार और साम्राज्य; दोनों स्थापित कर लिया --- जो कुछ भी इनके पास था, हथियारों से कमाया हुआ; उसे यहाँ ड्रग्स के व्यापार में लगाया.. बहुत शातिर थे वे लोग --- ख़ुफ़िया विभाग और पुलिस; यहाँ तक की संबंधित मंत्रालयों तक को ख़बर लग गई थी और इस दिशा में समुचित कदम भी उठाए जाने लगे थे --- पर --- जैसा की मैंने अभी अभी कहा.. वे लोग बहुत ही शातिर थे --- हर विभाग और उनके द्वारा उठाए गए कदमों में पेंच निकालना.. चाहे कसना हो, ढीला करना या सिर्फ़ लगाना --- वे लोग हमेशा दो ; .... नहीं, दो नहीं ... करीब करीब चार कदम आगे रहते | अपना कारोबार फ़ैलाने के लिए केवल बड़े शहर ही नहीं, वरन छोटे शहरों पे भी अपना ध्यान दिया और ड्रग्स के सप्लाई से लेकर मार्किट में बेचने तक बड़े ही सुनियोजित ढंग से किया जाने लगा.. और इसी तरह हमारा शहर भी छोटा शहर होने के बाद भी सुरक्षित न रहा और जल्द ही इनके इस गोरखधंधे में ... इनके ... इनके ‘जाल’ में कसता – फँसता चला गया... |”

इतना कह कर मोना रुकी.. मैं उसकी ओर बहुत ध्यान से देखे जा रहा था जबसे वो बात कहना शुरू की थी..

अंतिम के कुछ वाक्यों को कहते समय उसके चेहरे पर कुछ अलग ही भाव आए थे और जब खत्म की उस समय बहुत बुरा सा मुँह बना ली .. स्पष्ट था की ये सब कहते हुए उसे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा.. ऐसा होता भी है आम तौर पर.. लडकियाँ ऐसी बातें कहना – सुनना पसंद नहीं करती है. ये भी तो आखिरकार लड़की ही है.. जो कुछ भी बोली, मेरी लिए.. वरना शायद ऐसी बातों की ओर इसका कभी तवज्जो ही नहीं जाता |

“अहह.. मोना..??”

वो सुनी नहीं.. दूर कहीं देखते हुए खोई सी लगी.

मैंने दोबारा पुकारा, तनिक ज़ोर से..

“मोना?!”

“ओह.. हाँ... क्या हुआ..”

वह हडबडा उठी और खुद को संभालते हुए बोली.

मैं थोड़ा मुस्कराया , फ़िर पूछा,

“कहाँ खो गई थी?”

“ऐसे लोगों के कारनामों के बारे में सोचने लगी थी...”

उत्तर तो वह दी पर कुछ ऐसे मानो वह ऐसे प्रश्न से कोई मतलब नहीं रखना चाहती..

“एक बात पूछूँ?”

“पूछो!”

“ये लोग महिलाओं और लड़कियों को अपना मोहरा क्यों बनाते हैं?”

“इजी टारगेट होते हैं इसलिए.”

“इजी टारगेट?”

“हम्म.. इन्हें फंसाना थोड़ा आसान होता है ... किसी तरह कुछेक आपत्तिजनक पिक्चर ले लो.. या परिवार के बारे में कुछ बोल कर इमोशनल करते हुए ब्लैकमेल करो.. नहीं मानी तो सीधे पूरे परिवार को खत्म करने की धमकी दे दो.. इसी तरह के कुछेक बातों से इन्हें .. हमें अपने नियन्त्रण में लेने में आसानी होती है. हम लोग होती ही ऐसी हैं. अपनों से .. अपने परिवार से प्यार करने वाली. उन्हें बिल्कुल भी तकलीफ या ज़रा सी भी खरोंच लगते नहीं देख सकती. साथ ही इमोशनली भी मर्दों के तुलना में थोड़ी सॉफ्ट होती हैं.”

“तो इससे इन लोगों को फ़ायदा?”

“फ़ायदा तो है ही. पुलिस या जाँच टीम कभी भी महिलाओं और लड़कियों पर शक नही करते.. आई मीन, शक की सुई जल्द हम पर नहीं आती. अक्सर शॉपिंग वगैरह करती रहती हैं --- इसलिए ड्रग्स का सामान इनके सामानों के साथ मिला कर या ड्रग्स को ही अच्छे से पैक कर के इन्हें प्लास्टिक बैग्स में दे देते हैं.. कई कई बार तो ऐसी महिलाएँ अपने परिवार के सामने से ही ड्रग्स ले कर निकल जाती हैं और किसी को ज़रा सी भी भनक तक नहीं लगती!”

“माई गॉड! .. ऐसा?”

“हाँ.. बिल्कुल ऐसा.. और साथ ही एक और बात पता चली है..”

मोना ने इस बार पहले से भी अधिक मतलबी सुर में कहा तो मेरा उत्सुकता बढ़ जाना स्वाभाविक था.. और ऐसा हुआ भी.. उसकी बातों को सुनने हेतु और अधिक आतुर हो उठा..

मोना बोली,

“वैसे कुछ खास फ़ायदा होने वाला नहीं होगा.. फ़िर भी कहती हूँ , सुनो..”

“अरे जल्दी बोलो.” मैं व्याकुल होने लगा.

“तुम जिस केस में सस्पेक्ट हो.. मतलब, जयचंद बंसल मर्डर केस ... उसी से रिलेटेड है....”

“वो क्या?”

“उस आदमी की हत्या ‘किम्बर के सिक्स’ गन से हुई है..”

“किम्बर के सिक्स??”

“हम्म.. बहुत ही उम्दा हैण्ड गन है.. चलती है तो मक्खन की तरह.. एक हैण्डगन में सात से बारह गोलियाँ आ जाती हैं.. और लक्ष्य को प्रभावित करने में अद्भुत क्षमता है.”

“तो? ये सब मुझे क्यों बता रही हो... मैं ये जान कर क्या करूँगा?”

“इसमें एक खुशखबरी छुपी है.” एक प्यारी राहत भरी मुस्कान दी मोना ने अब |

“वो क्या?”

“किम्बर के सिक्स जैसे उम्दा क्वालिटी के गन मार्किट में आसानी से नहीं मिलते हैं और आम आदमी के पहुँच और जानकारी ... दोनों से दूर है. हाँ, अगर बेचने वाले, डीलर वगैरह से किसी की अच्छी जान पहचान हो तो ये गन मिलने में देर नहीं. तो इससे इस बात का अंदाज़ा आसानी से लगा सकते हो की ये गन ज़रूर विशिष्ट दर्जे के लोग या संस्था ही अफ्फोर्ड कर सकते हैं --- और तुम्हारे मामले में अगर देखा जाए तो हत्या में प्रयुक्त गन; किम्बर के सिक्स, ज़रूर किसी ऊँची पहुँच वाले अपराधी ने की है.”

“या... शायद किसी टेररिस्ट गैंग ने..?!” मैंने आशंका व्यक्त किया.

“हम्म.. संभव है.”

“यानि की मैं सस्पेक्ट नहीं रह सकता अधिक दिन.” आशा की एक नई किरण दिखी इसलिए मैं ख़ुशी से उछल ही पड़ा लगभग.

“ऐसा?” मोना नाटकीय अंदाज़ में आँखें बड़ी बड़ी कर के पूछी.

“हाँ...”

“क्यों भला... समझाओ ज़रा.”

“अरे यार.. हद हो तुम. अभी अभी तो तुमने कहा न की जैसा गन हत्या में प्रयुक्त हुआ है वह आसानी से मिलता नहीं.... मैं तो ठहरा एक आम आदमी... एक टीचर. मैं कहाँ से लाऊँगा ऐसा गन. राईट? तो इससे मैं तो आसानी से इस संदेह से मुक्त हो जाऊँगा. है न?”

“नहीं बरखुरदार...संदेह के फंदे में थोड़ी सी ढील ज़रूर पड़ी है पर पूरी तरह से छूटे नहीं हो.” एक आह सी भरती हुई बोली मोना.

“क्या?! क्यों? कैसे??!”

उसके निर्णायक बात सुनकर मैं चौंकता हुआ सा हड़बड़ा कर बोला. एक साथ तीन प्रश्न दाग दिया.

“वो ऐसे, मैंने कहा था की ऐसे गन आसानी से मार्किट में नहीं मिलते.. ये नहीं कहा की ये मिलते ही नहीं. दूसरा, मैंने ये भी कहा की गन बेचने वाले या डीलर वगैरह से जान पहचान होने पर भी ऐसे गन्स की मिलकियत आसानी से हासिल हो जाती है. अब चाहे वो आम आदमी हो या कोई ऊँचे दर्जे का आसामी. तीसरे, तुम उस वीडियो फुटेज और तस्वीरों को भूल रहे हो जिनके बारे में तुमने मुझे बताया था की इंस्पेक्टर दत्ता उन्हें एक बहुत अहम सबूत मान रहा है.. और देखा जाए तो वह हैं भी. पहले दो बातों को अगर छोड़ भी दिया जाए तो इस तीसरी बात का क्या जवाब है तुम्हारे पास... बोलो.”

मोना के बात में दम था.

मैंने अपना सिर ही पीट लिया.

हर राह दिखते ही बंद हो जाती है.

अगले कुछ मिनटों तक हम दोनों इधर उधर देखते हुए कुछ सोचते रहे. मोना भी किसी गहरी सोच में डूबी हुई सी लगने लगी. कुछ देर कुछ सोचने के बाद मेरी ओर देख कर कुछ बोलने वाली ही थी की मुझे भी कहीं खोए हुए से देख कर वह रुक गई और अगले ५-१० सेकंड थक मुझे देखते रही. मैं मोना को अच्छे से जानता हूँ. वह बहुत ही होशियार और चालाक लड़की है. बाएँ हाथ से क्या कर रही है ये दाएँ हाथ को पता नहीं लगने देती और दाएँ से क्या कर रही है यह वो बाएँ को पता नहीं लगने देती है.

मेरी ओर अपलक देखते हुए कुछ सोचती रही और अंततः बोली,

“क्या सोच रहे हो?”

“कुछ ख़ास नहीं. बस यही की आगे कोई कदम उठाने से पहले मुझे अपनी चाची पर कुछ दिन नज़र रखना पड़ेगा.”

“वह क्यों?”

“पता नहीं......अरे..!!”

एक ओर देखते हुए मैं अपनी सीट पर लगभग उछलते हुए बोला.

“क्या हुआ?!”

मोना भी चौंकते हुए पूछी.

“ये ... ये ... तो वही है.!”

“कौन... कौन क्या है अभय?”

मोना बेचैनी से पूछी.

मैंने उस समय उसकी बात का जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा. उल्टे उससे पूछा.

“मोना, तुम गाड़ी लायी हो ना?”

“हाँ..” हैरत में ही जवाब दिया मोना ने.

“चलो.. जल्दी चलो.”

“अरे बिल तो देने दो.”

मैंने बिना सोचे पॉकेट में हाथ डाला --- एक साथ कुछ नोट निकाला --- और वहीँ टेबल पर रख कर मोना का हाथ पकड़ कर गेट की ओर तेज़ी से चल पड़ा..

क्रमशः

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