Kamukta kahani अनौखा जाल
09-12-2020, 01:07 PM,
#41
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३८)

मोना की कार अपने सामने वाले कार का पीछा कर रही थी...

कार मोना की ज़रूर है पर चला मैं रहा हूँ.

मोना बगल की सीट में बैठी बेचैनी से पहलू बदले जा रही है...

अधिक देर तक चुप नहीं रहा गया तो पूछ ही बैठी,

“तुम कुछ बताओगे भी, अभय? कहाँ जा रहे हो .. किसके पीछे जा रहे हो? क्या करने वाले हो??”

बड़ी सावधानी और पूर्ण मनोयोग से सामने वाली गाड़ी का पीछा करने के कारण पहली बार में मोना की बात को सुन न सका पर मोना ने समझा की मैं उसे और उसके प्रश्न को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश कर रहा हूँ.

इसलिए वो तुनक कर जब दोबारा अपने प्रश्न को दोहराई तब मैंने ध्यान दिया,

“ओह्ह.. सॉरी मोना. मेरा ध्यान कहीं ओर था...”

“पता है.. दिख रहा है.. पर मेरे लिए अभी ज़रूरी यह है की मैंने जो पूछा है तुमसे उसका जवाब दोगे भी या नहीं?”

“यस, श्योर...”

“तो दो...”

जवाब सुनने को लेकर एक तरह से मोना की इस तरह की हठ को देख कर मैंने भी अधिक चुप रहना उचित न समझा.

“मोना, तुम्हारे चार प्रश्न में से पहला प्रश्न का उत्तर है की मैं अभी तुम्हें बताऊँगा.. सब.. दूसरा प्रश्न की मैं कहाँ जा रहा हूँ तो सच कहता हूँ , ये मुझे भी नहीं पता. तुम्हारा तीसरा प्रश्न की किसके पीछे जा रहा हूँ तो इसका जवाब ये है कि जब हम दोनों वहाँ कॉफ़ी पीते हुए बातें कर रहे थे तो मुझे बगल के ही रास्ते पर वही लड़का दिखा जो उस दिन उस पुराने बिल्डिंग में देखा था .. वह लड़का सड़क पर खड़ा , एक कार की ड्राइविंग वाली सीट के खिड़की पर हाथों के सहारे झुक कर किसी से बातें कर रहा था. लड़के को पहचानने में मुझसे कोई भूल नहीं हो सकती. शत प्रतिशत वही लड़का था... दोनों के बीच कुछ बातें हुईं और फ़िर वह उसी कार में बैठ गया.. अभी मैं उसी कार का पीछा कर रहा हूँ. ऍम सॉरी मोना, अगर मेरे कारण तुम्हें परेशानी हो रही है तो ..... म..”

मुझे बीच में ही टोकती हुई मोना बोली,

“और चौथा??”

“चौथा क्या... ओह हाँ.. तुम्हारा चौथा प्रश्न की मैं क्या करने वाला हूँ, तो इसका उत्तर देना अभी थोड़ा मुश्किल है पर इतना तय है की जो भी करूँगा, बहुत सोच समझ कर करूँगा.”

“ह्म्म्म.. संभल कर अभय .. ज़्यादा रिस्क लेने की गलती मत करना.”

“बिल्कुल.. वो देखो.. वह कार उस मोड़ को पार कर सड़क के आगे जा कर रुकी. मैं भी अपनी कार यहीं रोक देता हूँ.....”

“अपनी कार?”

“सॉरी .. तुम्हारी कार...”

“कोई बात नहीं, सुन कर अच्छा लगा.”

“श्शश्श्श... वो देखो, वह लड़का कार से उतर गया..”

“हम्म.. उतर कर ड्राईवर से कुछ बात कर रहा है... तुम्हें कोई आईडिया है की ऐसा कौन हो सकता है?”

“नहीं मोना, मुझे कैसे मालूम होगा..?”

“डिकोस्टा?”

“नहीं.. आई मीन, मुझे नहीं लगता की ड्राइविंग सीट पे डिकोस्टा होगा.”

इस वाक्य को बड़ी दृढ़ता से कहा मैंने.

थोड़ा हैरान होते हुए मोना फ़िर पूछी,

“ऐसा क्यों?”

“इनकी बातों से.. उस दिन उस पुरानी बिल्डिंग में ये लोग जिस तरह से डिकोस्टा के बारे में बात कर रहे थे; मानो डिकोस्टा कोई बहुत ही पहुँचा हुआ चीज़ हो.. और ये लोग उसके प्यादे... इसलिए मुझे नहीं लगता की कार में बैठा शख्स डिकोस्टा हो सकता है.. अगर होता तो गाड़ी उसका ड्राईवर चला रहा होता.. वो खुद नहीं.”

“हम्म.. तुम्हारी बात में दम है. पर दिक्कत यह है की कार के सभी खिड़कियों में काले शीशे लगे हुए हैं. ठीक से कुछ दिखता भी तो नहीं.”

मोना ने चिंता ज़ाहिर की.

उसकी चिंता सही भी है. काले शीशों के जगह अगर पारदर्शी शीशे लगे होते तो थोड़ा बहुत अंदाज़ा लगा पाना आसान होता. पर अब जो है नहीं उसके बारे में सोच कर क्या फ़ायदा.

मैं अपने रिस्ट वाच की ओर देखा.. खड़े खड़े पाँच मिनट ऐसे ही बीत गए. लड़का अभी भी ड्राईवर से पूर्ववत बात किये जा रहा है. एक दो बार उसने सिर इधर उधर कर घूमाते समय एकाध बार हमारे कार की ओर भी देखा.. शायद उसे अभी भी कोई संदेह नहीं हुआ है.

पाँच मिनट और बीत गए.

मैं और मोना, दोनों ही बेचैन हो रहे थे उनके अगले कदम को ले कर.

तभी लड़का सीधा खड़ा हुआ.

अपने दाएँ हाथ को आँखों के ऊपर से सर पे रख कर कार वाले को सलाम किया.

कार स्टार्ट हुआ.

और धुआँ छोड़ते हुए आगे बढ़ गया.

लड़का कुछेक मिनट उस कार को दूर तक जाते देखता रहा , फ़िर अपने चारों ओर एक नज़र घूमा कर देख लेने बाद वह तेज़ी उस मोड़ वाले रास्ते अंदर चला गया. मेरे हाथ स्टीयरिंग पर जम गए.. आगे कुछ करता की तभी मोना पूछ बैठी,

“अब क्या करोगे?”

“मतलब?” थोड़ा आश्चर्य से पूछा.

“मतलब की, एक मोड़ वाले रास्ते में अंदर घुस गया और दूसरा कार ले कर सीधे निकल गया. तुम्हारा क्या प्लान है... किधर जाओगे... किसके पीछे जाओगे?”

“ओह्ह.” एक अफ़सोस सा आह निकला.

कार के चक्कर में लड़के को भूल ही गया था.

एक साथ दोनों के पीछे जाना संभव नहीं है.

पर किसी एक के पीछे तो जा सकता हूँ.

पर किसके पीछे जाऊं...

जल्द ही निर्णय लेना था..

और निर्णय ले भी लिया ..

मोना की ओर देख कर कहा,

“मोना, मैं सोच रहा हूँ इस लड़के के पीछे जाने का. कार वाला तो पता नहीं अब तक कहाँ से कहाँ निकल गया होगा. लड़के का पीछा किया जा सकता है आसानी से. क्या कहती हो?”

मोना सहमती में सिर हिलाते हुए बोली,

“हाँ, यही ठीक रहेगा. तुम जाओ, मैं आती हूँ.”

“मतलब.. क्या करोगी?”

“अरे बाबा.. गाड़ी को साइड में लगाना होगा न.. या फ़िर इसी तरह यहाँ छोड़ दूँ?” व्यंग्यात्मक लहजे में थोड़ा गुस्सा करते हुए मोना बोली.

मैं हल्का सा मुस्कराया और तेज़ी उस लड़के के पीछे उस मोड़ वाले रास्ते की ओर बढ़ गया.

मैं तेज़ी से चलता हुआ उस मोड़ तक पहुँचा ही की देखा वह लड़का आगे दाएँ ओर की एक गली में घुस गया. अगर सेकंड भर की देर हो जाती तो शायद लड़के को ढूँढने में थोड़ी परेशानी हो सकती थी क्योंकि ये मोड़ वाला रास्ता आगे बहुत दूर तक निकल गया है और इस सामने दाएँ वाली गली के अलावा थोड़ी ही दूरी पर बाएँ तरफ़ एक और गली का होना मालूम पड़ता है.

मैं मुड़ कर पीछे गाड़ी की ओर देखा, मोना अब तक ड्राइविंग सीट पर बैठ चुकी थी और गाड़ी को थोड़ा पीछे करते हुए सड़क के किनारे लगाने का प्रयास कर रही थी.

मैं जल्दी से उस मोड़ वाले रास्ते से आगे बढ़ा और गली तक पहुँचा.

जेब से मशहूर जापानी सिगरेट ‘कास्टर’ निकाला और सुलगा लिया और इस अंदाज़ से गली में घुसा मानो मुझे किसी की परवाह नहीं.. बस ऐसे ही गली गली घूमने वाला कोई आवारा लड़का हूँ.

गली में घुसते ही वह लड़का एक छोटे से रेस्टोरेंट में घुसता हुआ दिखा.

मैं भी रेस्टोरेंट में घुसा.

लड़का एक टेबल पर जा कर बैठा, वेटर का काम करते एक छोटे लड़के को बुलाया और दो समोसे, दो वेजिटेबल चॉप और एक चाय मँगाया. उस चौकोर टेबल की चार कुर्सियों में से एक पर बैठा था वह.

मैं उसके पीछे वाले टेबल पर जा बैठा. उसकी पीठ की ओर अपना पीठ कर सिर नीचे कर अपने शर्ट के पॉकेट से तह कर के रखे कागजों को निकाला और टेबल पर सामने रख कर बड़े ध्यान से उन कागजों को देखने का नाटक करने लगा.

ऐसा आभास हो रहा था जैसे की वह लड़का बार बार सिर पीछे कर दरवाज़े की ओर देख रहा हो. शायद किसी के आने का इंतज़ार है उसे.

उसके इस इंतज़ार में भागीदार बनने के लिए मैंने भी दो समोसे और एक चाय मँगा लिया.

कुछ ही मिनटों बाद देखा की सामने एक सफ़ेद अम्बेसेडर कार थोड़ा आगे जा कर रुकी और उसमें से एक भारी भरकम सा आदमी उतरा.

बहुत अधिक मोटा भी न था वह पर शरीर देख कर इतना तो तय था की काफ़ी खाते पीते परिवार से है और ख़ुद भी शायद बड़ा शौक़ीन है खाने पीने का. उम्र से अंदाज़न चालीस के पास होगा.

वह अंदर घुस कर चारों ओर बड़े ध्यान से देखने लगा. तभी मेरे पीछे बैठा वह लड़का अपनी जगह पर खड़ा हो कर हाथ हिला कर उसे संकेत दिया. प्रत्युत्तर में वह आदमी मुस्कराता हुआ आगे बढ़ा और भारी कदमों से चलता हुआ मुझे पार करता हुआ उस लड़के के पास पहुँचा. लड़के ने दुआ सलाम किया. बदले में उस आदमी ने भी मुस्करा कर अभिवादन किया.

“आइए मनसुख भाई, आइए. बैठिए.” लड़के ने कहा.

“हाँ हाँ आलोक.. बैठ रहा हूँ.. भई, कहीं मुझे देर तो नहीं हो गई आने में. हाहाहा.”

हाँ..! अब याद आया लड़के का नाम. आलोक ! यही नाम तो सुना था उस दिन उस पुरानी बिल्डिंग में.

उस मोटे आदमी ने हँसते हुए पूछा. बात करने तरीके से तो बड़ा हँसमुख जान पड़ता है.

इस पर लड़के ने भी ‘खी खी’ कर के हँसते हुए कहा,

“अरे नहीं मनसुख जी.. आप बिल्कुल सही टाइम पर आये हैं. बल्कि टाइम से थोड़ा पहले ही आ गए हैं.”

आवाज़ में बड़ा मीठापन लिए बोला आलोक. समझते देर न लगी की चापलूसी में माहिर है.

अभी इनकी बातों में ध्यान दे ही रहा था की तभी मोना भी मुझे ढूँढ़ते हुए वहाँ आ पहुँची. चेहरे पर आते जाते भाव साफ़ बता रहे थे की मुझे ढूँढने में उसे थोड़ी परेशानी हुई है. दरवाज़े से अंदर आते ही मैंने अपने होंठों पर ऊँगली रख कर उसे चुप रहने का संकेत किया और फ़िर अँगूठे से पीछे की ओर इशारा कर के ये भी जतला दिया की लड़का पीछे ही बैठा है.

मोना जल्द ही सावधान वाले मुद्रा में आ गई और धीरे कदमों से चलती हुई मेरे पास पहुँची और मेरे सामने वाली कुर्सी के खाली रहने के बावजूद वह मुझे उठा कर मेरे बगल की कुर्सी पर बैठ गई.

मैं दोबारा अपने सीट पर विराजमान हुआ.

गौर किया मैंने, अब तक आलोक और मनसुख भाई में दबे स्वर में बातें होने लगी हैं. मैं उनकी बातों को सुनने को आतुर होने लगा पर कोई उपाय न सूझ रहा था. उनकी खुसुर-पुसुर जारी थी.. कुर्सी पर बैठे बैठे ही मैं बेचैनी में पहलू बदलने लगा. आधा बचा समोसा और ठंडी होती चाय पर मेरा कतई तवज्जो न रहा.

मुझे बेचैन – परेशान देख मोना ने इशारों में कारण पूछा.

मैंने सामने रखे कागजों में से एक उठाया और पेन से लिख कर मोना की ओर बढ़ा दिया.

मोना ने कागज़ पे लिखे मेरे शब्दों को ध्यान से पढ़ा और पढ़ कर कागज़ को मेरी ओर सरका दी. अपने पर्स से हथेली से भी छोटा एक उपकरण निकाली, एक – दो बटन दबाई और उसको एक ख़ास कोण में घूमा कर पीछे बैठे आलोक और मनसुख भाई की ओर कर के अपनी ही कुर्सी पर रख दी. इसके लिए उसे खुद थोड़ा आगे सरकना पड़ा.

मैं हैरानी से उपकरण को देखता हुआ मोना को देखने लगा. कुछ बोलने के लिए मुँह खोलने ही वाला था की मोना ने इशारे से मुझे चुप रहने का संकेत किया और मेरे सामने से कागज़ उठा कर , मेरे हाथ से पेन लेकर उसपे कुछ लिखने लगी.

फ़िर कागज़ मुझे दी.

लिखा था,

“निश्चिन्त रहो. उन्हें उनकी बात करने दो. हम अपनी कुछ बात करते हैं; नहीं तो इन्हें शक हो सकता है. चलो अब जल्दी से कुछ रोमांटिक बातें शुरू करो. बॉयफ्रेंड – गर्लफ्रेंड वाली.”

पढ़ कर मैं आश्चर्य से उसकी ओर देखा.

वह मुस्कराई.

मुझे समझ में नहीं आया की क्या इसे बात की गम्भीरता समझ में नहीं रही है --- या शायद मुझे परेशान हाल में नहीं देखना चाहती फ़िलहाल.

अभी कुछ सोचता की तभी मोना बोल पड़ी,

“ओफ्फ्हो... क्या सिर्फ़ चुप रहने और समोसा खिलाने के लिए ही मुझे यहाँ बुलाया है. कितनी दूर से किस तरह से आई हूँ तुम्हें पता भी है?”

“अन्हं...अम्म्म्म...”

“और देखो तो.. मेरे आने से पहले ही तुम अपने हिस्से की ले कर खाने लगे हो... ?!”

मैंने गौर किया,

आलोक और मनसुख दोनों ही हमारे तरफ़ देखा, मोना की बातों को सुना, फ़िर आपस में एक-दूसरे को देख कर मुस्कराने लगे.

आलोक – “हाहा.. आजकल ऐसे लव बर्ड्स शहर में हर तरफ़ देखने को मिल रहे हैं मनसुख भाई..”

मनसुख – “हाहाहा... हाँ.. सही कहा .. वैसे एक टाइम अपना भी हुआ करता था आलोक. हर तरह के फूल रखने का शौक हुआ करता था. अब तो बस.... हाहाहा...”

आलोक – “अब तो बस क्या मनसुख भाई.. बोल भी दीजिए.. बात को यूँ अधूरा न छोड़िये |”

“हाहाहा... अब तो बस हरेक फूलों के रस को चूस कर फ़ेंक देता हूँ. हाहाहाहाहा!!”

आलोक भी खिलखिलाकर हँसते हुए मनसुख का साथ दिया..

मैंने मोना की ओर देखा.

गुस्से में होंठ चबाते हुए बड़बड़ाई,

“ब्लडी बास्टर्ड.. स्वाइन..!”

मैंने जल्दी ही उसका बायाँ हाथ थाम कर उसे शांत रखने का प्रयास करने लगा. कोई भरोसा नहीं.. लड़ाकू लड़की है.. कहीं कुछ कर ना बैठे.. वरना सब गुड़ गोबर हो जाएगा.

क्रमशः

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09-12-2020, 01:07 PM,
#42
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ३९)

आलोक और मनसुख दोनों पूर्ववत सिर से सिर सटा कर आपस में फुसफुसा कर बतियाने लगे.

मैं और मोना भी धीमे स्वर में बात करने लगे पर ध्यान हमारा उधर ही था हालाँकि फ़ायदा कुछ था नहीं क्योंकि उन दोनों की फुसफुसाहट हमारे कानों तक नहीं पहुँच रही थी |

उन दोनों की बातचीत लगभग आधे घंटे तक चली.

और हम दोनों भी आधे घंटे तक आपस में गर्लफ्रेंड – बॉयफ्रेंड वाली रंग बिरंगी बातें करते रहें ताकि उन्हें कोई शक न हो.

आधे घंटे बाद मनसुख अपने जगह से उठा और आलोक को अलविदा कह कर बाहर की भारी कदमों से चल दिया.

दरवाज़े के पास पहुँच कर उसने दाएँ तरफ़ देख कर किसी को आवाज़ दी.

मिनट दो मिनट में ही उसकी एम्बेसडर धीरे धीरे पीछे होते हुए मनसुख के निकट आ कर खड़ी हुई. अपने लंबे कुरते के पॉकेट से एक मुड़ी हुई पान का पत्ता निकाला, खोला और उसमें से पान निकाल कर अपने मुँह में भर लिया. फ़िर, बड़े इत्मीनान से अपने एम्बेसडर का पीछे वाला दरवाज़ा खोल कर उसमें जा बैठा. उसके बैठते ही कार अपने आगे निकल गई.

हम दोनों, मतलब मैं और मोना, दोनों ने ही पूरा घटनाक्रम बहुत अच्छे से देखा पर दाद देनी होगी मोना की भी कि इस दौरान उसने अपनी बातों को बहुत अच्छे से जारी रखी.

थोड़ी ही देर बाद आलोक भी उठा और काउंटर पर पेमेंट कर के चला गया |

जाने से पहले एक बार उसने पलट कर मोना को देखने की कोशिश की पर चंद सेकंड पहले ही मोना अपना सिर झुका कर , थोड़ा तीरछा कर के मेरी ओर घूमा ली थी.. इसलिए बेचारा आलोक मोना के चेहरे को देख नहीं पाया..

और इस कारण उसके ख़ुद के चेहरे पर जो अफ़सोस वाले भाव आए; उन्हें देख कर मुझे हंसी आ गई.

काउंटर पर रखे प्लेट पर से थोड़े सौंफ़ उठाया, मुँह में रखा और चबाते हुए निकल गया दरवाज़े से बाहर.

उसके बाहर निकलते ही मोना ने जल्दी से उस छोटे से उपकरण को उठाया और उसके स्विच को घूमा कर अपने पर्स में रख ली.

रखने के बाद मेरी ओर देख कर बोली,

“अब आगे क्या करना है?”

“पहले ये तो बताओ की ये डिवाइस है क्या?”

“बताऊँगी.. पर यहाँ नहीं.. कार में.”

“हम्म.. यही सही रहेगा.”

“वैसे, तुम्हें वो मोटा आदमी कैसा लगता है...?”

“मतलब?”

“मतलब उसका पेशा क्या हो सकता है?”

“अम्मम्म... मुझे तो कोई बड़ा सेठ टाइप का आदमी लगता है. एक्साक्ट्ली क्या करता है ये कहना तो मुश्किल है पर इतना तय है कि ये एक बिज़नेसमैन है. तुम्हें क्या लगता है?”

“हरामी..”

“अरे?!” मैं थोड़ा चौंका.. ऐसे किसी जवाब के बारे में उम्मीद नहीं किया था.

“ओफ़्फ़ो.. तुम्हें नहीं.. उस आदमी को कह रही हूँ.”

मोना हँसते हुए बोली.

क़रीब १० मिनट तक हम दोनों वहीँ बैठे रहे.

और जब लगा की हमें निकलना चाहिए तब काउंटर पर पेमेंट कर के वहाँ से निकल कर सीधे मोना के कार तक पहुंचे और जल्दी से अंदर बैठने के बाद मोना ने पर्स से वह उपकरण निकाला और २-३ बटन दबाई.

ऐसा करते ही उस छोटे से डिवाइस में ‘क्लिक’ की आवाज़ हुई और उसमें से आवाजें आने लगीं, जो संभवतः उसी रेस्टोरेंट की थी...

शुरुआत में ‘घिच्च – खीच्च’ की आवाजें आती रही --- फ़िर धीरे धीरे क्लियर हो गया.

दो लोगों की आवाजें सुनाई दी..

एक भारी आवाज़ दूसरा थोड़ा हल्का... पतला..

पहचानने में कोई दिक्कत न हुई की ये इन स्वरों के मालिक कौन हैं ---

मनसुख और आलोक!

वाह.. तो मोना ने रिकॉर्ड किया है उनके आपसी बातचीत को ... मन ही मन दाद दिया उसके दिमाग को ... वाकई बहुत , बहुत काम की और अकलमंद लड़की है.

अधिक दाद देने का समय न मिला..

उस डिवाइस में से आती आवाज --- बातचीत के वह अंश --- जो आलोक और मनसुख भाई के बीच हुए थे --- ने बरबस ही मेरा ध्यान अपने ओर खींच लिया.

बातचीत कुछ यूँ थी...

“मनसुख जी...”

“अरे यार... कितनी बार कहा है की या तो मुझे मनसुख ‘भाई’ ही बोला करो या फ़िर मनसुख ‘जी’ ... तुम कभी भाई , कभी जी बोल कर यार मेरे दिमाग की कुल्फी जमा देते हो.. हाहाहा...”

“अब क्या बताऊँ, आपके लिए पर्सनली मेरे दिल में जो सम्मान के भाव हैं, वही वजह है की आपके लिए कभी भाई तो कभी जी निकल जाता है.. अच्छा ठीक है, आज से .. बल्कि अभी से ही मैं आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ मनसुख ‘जी’ कह कर बुला और बोला करूँगा.. ओके? ...”

“हाँ भई, ये ठीक रहेगा... हाहा..”

“वैसे मनसुख जी..”

“हाँ कहो..”

“दिमाग का कुल्फी जमना नहीं... दही जमना कहते हैं...”

“हैं?!.. ऐसा...??”

“जी... कुल्फी तो कहीं और जमती है...”

“कहाँ भई...?”

“वहाँ..”

“वहाँ कहाँ...?”

“वहाँ... “

“कहाँ???”

“ओफ्फ्फ़... मनसुख जी.. आँखों के इशारों को तो समझो...”

“ओह... ओ... वो... वहाँ..?”

“हाँ. जी..”

“हाहाहाहा..”

“हाहाहाहाहाहा”

अगले दो तीन मिनट तक सिर्फ़ हँसने की ही आवाज़ आती रही.

पर मोना और मैं, दोनों को ही उनके मज़ाक और हंसी नहीं, बल्कि आगे होने वाली बातचीत में इंटरेस्ट है.. और पूरा ध्यान वहीँ है.

“अच्छा भई, अब जल्दी से उस ज़रूरी काम के बारे में कुछ उचरो जिसके लिए तुमने मेरे को इतना अर्जेंटली बुलाया है मिलने को.”

“मनसुख जी.. मैं वही बात करने आया हूँ... उसी के बारे में.. क्या सोचा है आपने.. आपने तो कहा था की सोच कर अपना निर्णय सुनाओगे.”

“ओ. वह.. अरे नहीं... अभी तक सोचने का टाइम ही नहीं मिला....”

“मनसुख जी.....” आलोक का शिकायती स्वर ...

“अरे सच में.. आजकल बिज़नेस आसान नहीं रह गया है.. हमेशा उसमें लगे रहना पड़ता है न ...”

“किसी भी तरह का बिज़नेस कभी भी आसान नहीं था मनसुख जी.. न है और न रहेगा.. पर मैं जो डील के बारे में आपसे बात कर रहा हूँ.. ये जो प्रस्ताव है.. ये क्या किसी भी नज़रिए से कम है?”

“नहीं .. कम तो नहीं.. पर...” आवाज़ से लगा मानो मनसुख कुछ स्वीकार करने में हिचकिचा रहा था..

“पर??”

“अब क्या बताऊँ... डील है तो....”

“मनसुख जी... ज़रा ठन्डे दिमाग और एक बिज़नेसमैन के दृष्टिकोण से सोचिये... क्या पचास लाख रुपए कम होते हैं?”

“सोचना क्या है इसमें... बिल्कुल कम नहीं होते...”

“तो फ़िर समस्या क्या है?”

“समस्या यही है की मन नहीं मान रहा है.” ये आवाज़ काफ़ी सपाट सा आया. शायद मनसुख ने भी ऐसे ही सपाट तरीके से ही बोला हो वहाँ.

“अरे! अब ये क्या बात हुई मनसुख जी.. प्रस्ताव पर विचार करने का इरादा है.. विचार कर भी रहे हैं.. पर साथ ही कहते हैं की मन नहीं मान रहा है.?! ऐसे कैसे चलेगा.. और तो और आप स्वयं ये मान रहे हैं कि पचास लाख रुपया कम नहीं होते ... कुछ तो विचार क्लियर रखिए मालिक!”

काफ़ी शिकायती लहजा था ये आलोक की तरफ़ से.

बिल्कुल की छोटे से बच्चे की तरह.

मैं और मोना दोनों इसे सुनकर एक दूसरे की ओर देखते हुए हँस दिए.

“हाँ भई, मैं भी मानता हूँ की निर्णय लेने में थोड़ा विलम्ब हो रहा है मेरी ओर से ...”

“विलम्ब का कारण? .... अब ये फ़िर न कहना की मन नहीं मान रहा है.”

मनसुख की बात को बीच में ही काटते हुए आलोक पूछ बैठा..

“कारण ये है कि ये जो अमाउंट... पचास लाख की बात कर रहे हो... इसकी सिर्फ़ पेशकश हुई है.”

“तो?”

“तो ये.. की ये सिर्फ़ पेशकश है.. हासिल की क्या गारंटी है...?”

“हासिल की??!”

“हाँ भई.. देखो .. साफ़ बात कहता हूँ.. मैं एक बिज़नेसमैन हूँ .. बचपन से ही अपनी पूरी फैमिली को बिज़नेस करते देखा है.. और एक बात मोटे तौर पर सीखी है की बिज़नेस में डील के समय और ख़ुद डील में; हमेशा --- हमेशा पारदर्शिता होनी चाहिए. साथ ही दम होनी चाहिए.”

“ओके.. तो इस डील में ...?”

“इस डील में वैसा दम नहीं ... और अगर मान भी लूँ की दम है.. तो इतनी तो पक्की दिख ही रही है कि इसमें पारदर्शिता नहीं है.”

“क्या बात कर रहे हो मालिक...!”

“सही बात कर रहा हूँ बच्चे.”

मनसुख के इसबार के वाक्य में अत्यंत ही गम्भीरता का पुट था..

कुछ सेकंड्स की शांति छा गई..

शायद आलोक ने मनसुख की तरफ़ से ऐसी गम्भीरता का कल्पना नहीं किया था इसलिए शायद सहम गया था उन सेकंड्स भर के लिए.

डिवाइस से दोबारा आवाज़ आई,

“मनसुख जी... हासिल की पूरी गारंटी है..”

“कहाँ है गारंटी ... किस तरह का गारंटी...?”

“अरे मालिक... मेरा विश्वास कीजिए.. हासिल की पूरी गारंटी है.. फूलप्रूफ़ प्लान है... फ़ेल होने का सवाल ही नहीं है.”

“हाहाहा ...”

“क्या हुआ ... हँस क्यों रहे हो आप?”

“बताता हूँ.. पहले ये बताओ.. कभी जेल गए हो?”

“नहीं ... अभी तक ऐसा दुर्भाग्य नहीं हुआ है. वैसा भी नया हूँ धंधे में.. अधिक दिन नहीं हुआ है.. पर क्यों पूछा आपने ऐसा?”

“न जाने कितने ही जेल भरे पड़े हैं तुम्हारे जैसे लोगों से जो कभी समझते थे की उनका प्लान पूरा टाइट है .. फूलप्रूफ़ है.. जो कभी फ़ेल नहीं हो सकती!”

“अरे बकलोल रहे होंगे ऐसे लोग...”

“जो की तुम नहीं हो..”

“ना.. कोई सवाल ही नही इसमें.”

“क्या प्रूफ है भई इसका?”

“प्रूफ तो मैं खुद हूँ.. क्या आपको ऐसा लगता है कि मैं किसी ऐसी प्लान का हिस्सा बनूँगा जिससे मुझे जेल जाना पड़े?”

“जितना तुम्हें जान पाया हूँ; उसके आधार पर तो नहीं लगते हो.”

“तो फ़िर.. ?”

“अरे यार... समझो बात को.. पेशकश तुम्हारे हवाले से आया है. जो मास्टरमाइंड है मैं उसे नहीं जानता.. सामने अभी तक आया नहीं.. ऊपर से इतना रिस्की प्लान.. अब तुम्हीं बताओ की मैं कैसे किसी आदमी की कोई ऐसी पेशकश को स्वीकार करूँ जिसे मैं जानता तक नहीं और जो सामने नहीं आता ... यहाँ तक की फ़ोन तक पर वह बात नहीं कर सकता.”

“ओह.. तो ये बात है..”

“हाँ भई... यही बात है.”

“मैं आपको प्लान और नाम .. दोनों बताऊंगा.. पर शर्त यही एक है...”

“क्या शर्त है...?”

“मैं आपको प्लान और नाम दोनों बताऊंगा पर तभी जब आप हामी भरेंगे.”

“हाहाहा... बहुत मजाकिया हो यार.. ख़ुद सोचो.. मेरे हामी भर लेने से अगर तुम मुझे अपना प्लान और नाम --- दोनों बताओगे.. तो कहीं मुसीबत में नहीं फंस जाओगे?”

“वह कैसे?”

“अरे भई... मेरे हामी पर भारत सरकार का मुहर तो नहीं लगा होगा न...? हामी भर के बाद में मैं मुकर गया तो..? और अगर तुम्हारे प्लान के बारे में पुलिस में खबर कर दिया तो??”

“नहीं.. आप ऐसा नहीं करेंगे..”

“हैं??”

“जी.. बल्कि स्पष्ट रूप से कहूँ तो आप ऐसा कर ही नहीं सकते..”

“अच्छा..!! ऐसा कैसे... कौन रोकेगा मुझे?”

“है एक आदमी.”

“कौन.. तुम्हारा वो मास्टरमाइंड?”

“जी.”

“नाम क्या है उसका?”

“इस प्रस्ताव के लिए हामी भर रहे हैं आप?”

“अहहम्म....”

“सोच लीजिए... मैं अपनी तरफ़ से आपको एक सप्ताह और देता हूँ.. एक सप्ताह बाद हम यहीं मिलेंगे..ओके..?”

“और अगर मैं हामी न भरा तो?”

“तो कोई बात नहीं.. आप अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते...”

“और तुम्हारा वो मास्टरमाइंड?”

“वो भी अपने रास्ते.”

“पक्का ना? बाद में मुझे फ़ोर्स तो नहीं किया जाएगा.... अगर मैं मुकर गया तो..?”

“बिल्कुल पक्का... प्रॉमिस.”

“ठीक है भई... तब ठीक एक सप्ताह बाद यहीं मिलते हैं.”

“ओके.. पहले आप.”

“मतलब?”

“पहले आप ..”

“ओह समझा... मतलब मैं पहले जाऊँ?”

“जी.”

“ठीक है.. विदा!”

“जी.. विदा...”

फ़िर..

कुछ खिसकने की आवाज़ आई... चेयर होगा. फ़िर, चलने की आवाज़ और फ़िर थोड़ी निस्तब्धता..

फ़िर चेयर खिसकने की आवाज़...

फ़िर चुप्पी.

इतने पर मोना ने डिवाइस के स्विच को ऑफ कर दिया. मेरी ओर देखी.. मैं आलरेडी गहरी सोच में डूब गया था.

“क्या सोच रहे हो?”

“बहुत कुछ.”

“क्या लगता है तुम्हें .. कौन हो सकता है इनका मास्टर माइंड? और प्लान क्या हो सकता है?”

“प्लान का तो पता नहीं.. वह तो समय आने पर ही पता चलेगा.. पर...”

“पर क्या?”

“पता नहीं मुझे न जाने ऐसा क्यों लग रहा है की जैसे मैं इनके इस.. इस मास्टर माइंड को जानता हूँ.”

“क्या.. सच में?”

“नहीं.. सच में नहीं.. आई मीन, अंदाज़ा है... बल्कि.. अंदाज़ा लगा रहा हूँ...”

“तो.. तुम्हारे अंदाज़े से ऐसा कौन हो सकता है?”

मोना के इस प्रश्न का मैंने कोई उत्तर देने के जगह एक ‘कास्टर’ सुलगा लिया.

क्रमशः

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09-12-2020, 01:07 PM,
#43
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ४०)

कार से ही घर लौटा.

मोना ने ही ड्राप किया.

कुछ देर उससे बात करने के बाद उसे विदा किया.

अपने घर के गेट के पास पहुँचते ही देखा की एक आदमी, मैले कुचेले धोती कुरता पहने, दोनों हाथों में दो बड़े थैले लिए इधर ही चला आ रहा है.

उसके निकट पहुँचते ही देखा की उन दो थैलों में पुराने अखबार और दूसरे कागजों की रद्दियाँ हैं.

चाची बहुत दिन से कह रही थी कि घर में कई महीने से अखबार जमा हो रहे हैं. कोई मिले तो बेच दो.

पर काम से फुर्सत न मुझे है और न ही चाचा को.

अभी कुछ ही समय हुआ है चाचा – चाची को घर लौटे हुए. दोनों अपने बेटियों से मिलने गए थे. शहर से बाहर.

घर के मेन डोर तक पहुँचा ही था की अचानक से एक बात कौंधी मेरे मन में...

‘यार, तीन या चार दिन पहले ही तो चाची ने अखबार बेचा, आज फ़िर?’

ये सवाल अपने आप में थोड़ा अटपटा था इसलिए मैंने जल्दी ही अपने दिमाग से ये सोच कर निकाल दिया की, ‘हो सकता है बहुत ज़्यादा अखबार जमा हो गए हों. इसलिए दो दिन में बेचा गया..’

उसके बाद खास कुछ नहीं हुआ..

एक सप्ताह बीत गया.

मेरी और मोना की.. दोनों की अपनी अपनी कोशिश ज़ारी रही इस दौरान.

और इसी एक सप्ताह में जो अजीब और गौर करने लायक बात लगा वह ये कि दो बार और अखबार बेचे गए ! और इस बार आदमी अलग था.

निस्संदेह ये संदेह योग्य बात थी और इसलिए मैंने निर्णय लिया कि अगर फ़िर से अखबार और काग़ज़ की रद्दियों के लिए कोई आया तो मैं उसका पीछा ज़रूर करूँगा.

चाची के हाव भाव भी कुछ बदले बदले से लग रहे हैं .. गत पाँच दिनों के भीतर दो बार काफ़ी पैशनेट सेक्स भी हुआ हम दोनों में. हमेशा की तरह ही चाची सेक्स के दौरान लाजवाब रही और भरपूर प्यार दी.

मैंने भी अपनी ओर से कोई कसर नहीं रहने दिया.

और एक बात जो मैंने नोटिस किया वह ये कि दोनों बार सेक्स के समय चाची की भावनाएँ और क्रियाएँ पहले से कई अधिक बढ़ गई है. काम क्षुधा बढ़ गई .. शायद तीन गुना !

अगले सप्ताह के किसी दिन जब मैं बाथरूम से नहा धो कर निकला तो नीचे से कुछ आवाजें सुनाई दी..

रूम से निकल कर नीचे झाँका तो पाया की आज फ़िर अखबार दिए जा रहे हैं. ..

इतना तो मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इतने अख़बार हमारे घर में हैं नहीं जितने की बेचे गए हैं.

आज का आदमी अलग है..

एक कम उम्र का लड़का है..

तीन दिन में तीन नए लोग.!

अब तो केवल संदेह का कोई प्रश्न ही न रहा.

मैं छुप कर चाची और उस लड़के को देखता रहा. आलोक से भी कम उम्र लग रहा था उसका.

चाची अंदर से ही दो थैलों में अख़बार भर कर लाई और उस लड़के को थमा दी.

लड़का फ़ौरन एक तराजू निकाल कर वजन तौलने लगा.

थोड़ा थोड़ा कर उसने दोनों थैलों में भरे रद्दी और अख़बार तोल डाले.

गौर करने लायक बात यह थी कि वह हर बार अख़बार के एक बंडल बड़ी सावधानी से उठाता और फ़िर तराजू के एक पलड़े पर उतनी ही सावधानी से रखता .. तोल लेने के बाद वह फ़िर से पहले की भांति ही सावधानीपूर्वक उस बंडल को अपने साथ लाए झोले में डाल लेता.

इस तरह की सावधानी आम तौर पर लोग अपने घरों में शीशे / काँच के बने चीज़ों को एक जगह से दूसरी जगह रखने के लिए होता करते हैं. आखिर बात क्या है? चाची पर पहले से ही संदेह होने के कारण मेरा मन इस बात के लिए राजी बिल्कुल नहीं था की मैं जा कर उनसे इस बारे में कुछ पूछूँ...

तोल लेने के बाद चाची और उस लड़के का आपस में थोड़ी खुसुरपुसुर बातें हुईं ... चाची ने थोड़े रूपये दिए उसे और फ़िर वह लड़का घर से निकल गया.

उसका पीछा करने का ख्याल तो अच्छा आया पर मैं हूँ फ़िलहाल सिर्फ़ एक टॉवल में ... और तैयार हो कर उसके पीछे जाने में बहुत समय हाथ से निकल जाना है.

पर आज कुछ पता करने के मूड में मैं आ गया था इसलिए दिमाग पर ज़ोर देने लगा की ऐसा क्या किया जाए जिससे लड़के का पीछा करके कुछ अच्छी जानकारी मिले.

अचानक से मुझे ‘शंकर’ का ख्याल आया.

शंकर, मोना का आदमी है जिसे मोना ने ख़ास मेरी मदद के लिए ही कहा हुआ था. शंकर मेल जोल में जितना मिलनसार है; काम के मामले में भी उतना ही गंभीर रहता है. हर तरह के काम करने का उसका एक अलग ही तरीका होता है और इतनी ख़ूबसूरती से करता है की बस पूछो ही मत. शंकर की एक ओर बात जो मुझे पहली बार सुन के अजीब लगी थी, वह ये की वो यानि की शंकर अपने काम को कैसे अंजाम देता है इसका खुलासा वो कभी किसी के सामने नहीं करता सिवाय मोना के.

शंकर से जान पहचान होने के बाद बीच बीच में हम मिलते रहे.. अपने ही केस के खातिर .. और हमेशा ही मैं उसके ‘खाने - पीने’ का ख्याल रखता .. दिल का जितना दिलेर है उतना ही उदार भी .. कभी अकेले नहीं ... हमेशा मुझे साथ बैठा कर ही खाने के साथ जाम पे जाम लगाता है.

कह सकते हैं की दोनों ही लगभग अब दोस्त हैं... और नहीं भी...

मैंने तुरंत शंकर को फ़ोन लगाया.

शंकर – “बोलो सरजी... कैसे याद किया?”

मैं – “कैसे हो?”

शंकर – “ईश्वर की कृपा है.”

मैं – “कहाँ हो?”

शंकर – “डेरे पर... क्यों... क्या हुआ?”

मैं – “दरअसल, एक बहुत ज़रूरी ........ ”

शंकर – “ ........... काम आन पड़ा है.... यही ना?”

मेरी बात को बीच में ही काटते हुए शंकर बोला.

मैं – “हाँ... देखो... अगर तुम अभी बिजी हो तो फ़िर कोई बात नहीं... मैं देखता ....”

शंकर – “अरे ... नहीं.. बिजी काहे का... मोना मैडम ने तो मुझे ऐसे ही कामों के लिए ही तो आपसे मेल मुलाकात करवाई हैं ... आप काम बोलो तो सही..”

मैंने जल्दी से शंकर को सब कह सुनाया...

सब अच्छे से सुनने के बाद,

शंकर – “हम्म.. भई, तुम्हारा ये मामला भी और मामलों की तरह ही दिलचस्प है. मैं देखूँगा ज़रूर ... पर... अभी थोड़ी मुश्किल है.”

मैं – “क्या मुश्किल है?”

शंकर – “भई, एक तो मुझे अभी अभी मोना मैडम के काम से निकलना है और दूसरा ये की जब तक मैं तैयार हो कर तुम्हारे घर के पास भी फटकूँगा; वह मुर्गा वहाँ से कब का चला चुका होगा. इसलिए अभी किसी भी तरह का जल्दबाजी कर के कोई फायदा न होगा.”

मैं – “ह्म्म्म... ठीक कहा तुमने. (थोड़ा सोचते हुए) – एक काम करते हैं, हम अगली बार के लिए तैयार रहेंगे, जैसे ही वह लड़का आएगा.. मैं तुम्हें इन्फॉर्म कर दूँगा.. ओके..? तुम्हें बस खुद को तैयार रखना होगा...”

शंकर – “हाँ, ये सही रहेगा.. और हाँ, मैं भी तैयार रहूँगा.. वैसे...”

मैं – “वैसे क्या?”

शंकर – “तुम्हें कोई आईडिया है.... की वह आज के बाद कब आएगा या आ सकता है??”

शंकर के इस प्रश्न पर थोड़ा गौर किया, दिमाग पर ज़ोर दिया और अच्छे से याद करने का कोशिश किया..

परिणाम जल्द मिला...

मैं – “हाँ याद आया.. वह पिछले तीन सप्ताह से हर सप्ताह के हर तीसरे दिन आता है.. और करीब आधे घंटे तक रहता है.”

शंकर – “हम्म.. इसका मतलब....”

मैं – “इसका मतलब ये की हमें इसके अगले बार आने के लिए तैयार रहना है... मुझे... और ख़ास कर तुम्हें..”

शंकर – “हाँ, वह तो मैं समझ ही गया.”

मैं – “तो आज से तीसरे दिन के लिए हम दोनों को सजग रहना है... चौकस एकदम...”

शंकर – “बिल्कुल... अच्छा, अभी रखता हूँ... मुझे जल्द से जल्द निकलना है.”

सम्बन्ध विच्छेद हुआ..

रिसीवर वापस क्रेडल पर रख कर मैं अपने अगले कदम के बारे में सोचने लगा..

उसी शाम एक राउंड पुलिस स्टेशन के भी लगा आया..

केस कुछ खास प्रोग्रेस नहीं किया ..

इंस्पेक्टर दत्ता हमेशा की तरह व्यस्त मिला और केस के बारे में पूछने पर इतना ही बताया की अपराधी को जल्द पकड़ लिया जाएगा.

बिंद्रा से भेंट नहीं हुई ... कारण की वह शहर से बाहर गया हुआ है.

और लापता इंस्पेक्टर विनय अभी भी लापता हैं.

मोना से अभी तक इतना ही पता चला कि मनसुख भाई का पूरा नाम मनसुख बनवारी लाल भंडारी है और वह शहर का बड़े होटल व्यवसाईयों में एक है. साथ ही टूरिस्टो को शहर घूमाने का भी काम करता है जिससे उसे अतिरिक्त मोटी आय होती है. इसके अलावा शराब का वैध – अवैध, दोनों तरह का धंधा करता है. धार्मिक भी है. हर मंगलवार को शहर के एक बजरंगबली मन्दिर में पूजा-अर्चना करने के बाद बाहर बैठे भिखारियों की पेट पूजा और असहायों की यथासम्भव सहायता करता है. धंधे वह चाहे कैसे भी करता हो; पर सुनने में आता है कि दिल से बड़ा ही दिलदार है.

होटल व्यवसाय से पहले सिनेमा घरों में टिकटें ब्लैक किया करता था.

किस्मत का बैल निकला पूरा.

जिस भी काम में हाथ आजमाया; बहुत पैसा कमाया.

अपने शागिर्दों – चमचों का पूरा पूरा ख्याल रखता है. किसी ने बहन की शादी या माँ – बाबूजी के इलाज के लिए अगर १ लाख माँगता तो उसे ३ लाख़ दे देता ... और बाद में न तो पैसे का हिसाब माँगता और ना ही लौटाने को बोलता. पुलिस और दूसरे झमेलों से भी बचाता है.

यही कुछ बात हैं जिस कारण उसके चमचे उसपे जान लुटाने को हमेशा तैयार रहते.

ख़ास बात ये कि मनसुख के चमचे मनसुख के लिए जान देना और लेना; दोनों बखूबी कर सकते हैं.

गोविंद को एक ख़ास काम में लगाया था मैंने... उसी सिलसिले में उससे भेंट करना है.

क्रमशः

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09-12-2020, 01:07 PM,
#44
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ४१)

आदत अनुसार चाय दुकान में मिले हम.

गोविंद थोड़ा बुझा बुझा सा लग रहा था ...

शायद एक साथ बहुत से काम के प्रेशर में आ गया होगा बेचारा.

मैं – “कैसे हो गोविंद?”

गोविंद – “ठीक हूँ..”

मैं – “तो फ़िर इतने बुझे बुझे से क्यों लग रहे हो?”

गोविंद – “कौन मैं?”

मैं – “नहीं तो क्या मैं?”

गोविंद - “हम्म... क्या करूँ भाई... काम ही कुछ ऐसा थमा दिया है तुमने?”

मैं – “हाँ, समझ सकता हूँ.. हम लोग फंसे ही ऐसे केस में हैं की करने को सिवाय मेहनत के और कुछ नहीं है.”

गोविंद – “कभी कभी सोचता हूँ की हम ही क्यों ...?”

मैं – “कोई न कोई तो फँसता ही.. और जो कोई भी फँसता.. वही यह कहता कि ‘मैं ही क्यों फंसा?’ इसलिए खुद को या किस्मत को कोसने से अच्छा है कि हम अपने दम पर जो और जितना हो सके.. कुछ करने की कोशिश करें.”

गोविंद – “तुम्हारे इस बात से मैं सहमत हूँ और मानता भी हूँ .. अब जब फंसे हम हैं तो हमें ही कुछ करने का प्रयास करना चाहिए. हाथ पर हाथ धरे बैठ कर किसी चमत्कार के होने या किसी फरिश्ते के आ कर हमारी सहायता करने की अपेक्षा तो बेहतर हैं की अपने स्तर से ही कुछ किया जाय.”

बोलते बोलते गोविंद के आँखों के कोनों में आँसू आ गए. ज़बान थोड़ी लड़खड़ाई.. और परे दूर कहीं देखने लगा.

मुझसे उसकी ऐसी हालत देखी नहीं जा रही पर करूँ क्या.. मैं तो खुद ऐसी ही विषम परिस्थिति में फंसा हुआ हूँ.. और परिस्थिति तो जैसे स्वयं में एक भँवरजाल हो. ख़ुद की स्थिति कुछ बेहतर होती तो उसे सब कुछ ठीक हो जाने का दिलासा भी देता .... पर....

चाय आया..

सिगरेट भी..

और थोड़ा थोड़ा कर दोनों लेने का दौर चला कुछ देर तक.

खत्म करने के बाद फ़िर से एक एक भांड़ चाय और सिगरेट मंगाया गया.

दोनों ही चुपचाप अपने अपने हिस्से का ख़त्म करने में बिजी रहे..

साथ ही मैं अपने चिंता में मग्न और वह अपने.

शुरू मैंने ही किया,

“तो क्या ख़बर है?”

गोविंद (तनिक चौंकते हुए) – “किस बारे में?”

“जो काम तुम्हें सौंपा था मैंने...”

“ओह! वो...”

“हाँ.. वो.”

“हाँ... अपने स्तर से जितना हो सका मैंने पता लगाया...”

“गुड.”

“पर अब ये कह पाना मुश्किल है कि मैंने जो और जितना पता लगाया.. वो कितना काम आएगा?!”

“ठीक है, गोविंद.. पहले बताना तो शुरू करो. काम की है या नहीं ये बाद में तय करेंगे.”

“अभय, तुमने जैसा बताया था करने को मैंने बिल्कुल वैसे ही किया. इंस्पेक्टर दत्ता और बिंद्रा, दोनों पर ही कड़ी निगरानी किया अपनी तरफ़ से.बिंद्रा तो मुझे फ़िर भी कुछ ठीक सा लगा पर ... ये....”

“दत्ता!”

“हाँ, वही ... दत्ता.. ये पता नहीं कुछ ठीक सा नहीं लगता..”

“ठीक सा नहीं लगता से मतलब तुम्हारा?”

“मतलब की गतिविधियाँ.. इसका उठाना बैठना, चलना ... सब.. सब...”

“ओफ्फ्फ़.. गोविंद ... क्या कर रहे हो.. एक ही बात रिपीट क्यों कर रहे हो और बीच बीच में रुक क्यों जाते हो?.. आगे बोलो.”

“अब क्या बोलूँ... बात है ही ऐसी की बोलने से पहले दो तीन बार कर के सोचना पड़ रहा है.”

“बात क्या है ?” इस बार मैंने झल्ला कर ज़ोर देते हुए कहा.

थोड़ा रुक कर बोलना शुरू किया गोविंद,

“तुमने जैसा संदेह किया था; लगभग वैसा ही कुछ कुछ मुझे देखने को मिला.”

“यानि की...

“यानि की जाने अनजाने में इंस्पेक्टर दत्ता के हावभाव कई बार ठीक वैसे ही होते हैं जैसे की इंस्पेक्टर विनय का हुआ करता था. कुर्सी पर बैठने का अंदाज़, अँगुलियों से टेबल को बजाने का स्टाइल, सिगरेट या चाय लेने का तरीका.. सब.. सब कुछ लगभग विनय के तरीकों जैसे ही हैं.”

“पक्का?”

“पक्का तो नहीं पर लगा ऐसा ही कुछ..”

“अच्छा ये बताओ की मैंने जो कुछ भी तुम्हें इंस्पेक्टर विनय के बारे में बताया था, उसके अलावा तुमने दत्ता में कोई चेंज नोटिस किया..?”

“देखो, तुम्हारे कहे मुताबिक मैंने अपनी तरफ़ से बहुत बारीक़ निगहबानी की है दत्ता की.. और इसके अलावा भी मैं खुद इंस्पेक्टर विनय से २-३ बार मिल चुका हूँ .. अपने केस के सिलसिले में. थोड़ा बहुत तो मैंने भी उस समय विनय को नोटिस किया था और बहुत नहीं तो कुछ तो जानता ही हूँ .. आई मीन, उसके बॉडी लैंग्वेज के बारे में ... बोलने , बात करने के अंदाज़ के बारे में.....”

गोविंद की बात को बीच में काटते हुए मैंने कहा,

“तो क्या तुम्हें कुछ संदेह हुआ? दत्ता को लेकर??”

“कुछ ख़ास तो नहीं पर... थोड़ा अंदेशा ज़रूर हो रहा है..”

“किस बात को ले कर अंदेशा?”

“इंस्पेक्टर दत्ता के इंस्पेक्टर दत्ता होने को लेकर.”

“ह्म्म्म.”

गोविंद की बात को सुन कर मैं अपने सोच में खोने लगा. कुछ डॉट्स को कनेक्ट करने की कोशिश करने लगा. कुछ डॉट्स कनेक्ट होते.. तो कुछ नहीं.. फ़िर ऐसा लगता की शायद वो डॉट्स वहाँ हैं ही नहीं जिन्हें मैं कनेक्ट करने कोशिश या उनके होने की सोच रहा हूँ.

कुछ मिनट हम दोनों ऐसे ही बैठे रहे.

फ़िर एकाएक गोविंद पूछ बैठा,

“एक बात बताओ अभय, तुम्हें इंस्पेक्टर दत्ता को लेकर कब से शक होने लगा?”

“जब मैंने पहली बार उन्हें चाय पीते हुए देखा था.. वो चाय के ग्लास के मुहाने पर ठीक वैसे ही गोल गोल ऊँगली फेर रहा था जैसे इंस्पेक्टर विनय किया करता था. हालाँकि ये एक संयोग हो सकता है पर विनय का इतने दिनों तक गायब रहना और कोई ख़बर बिल्कुल ही नहीं मिलना; संदेह के बीज अपने आप ही बो दे रहे हैं. और फ़िर उस एक दिन, जिस दिन मैं थाने में दत्ता के सामने बैठा था तब दत्ता ने अपने हवालदार से मेरे ही सामने कुछ प्रश्न किये थे. यहाँ प्रश्न से अधिक गौर करने वाली बात है प्रश्न पूछने का तरीका. दत्ता एक विशेष ढंग से प्रश्न कर रहा था... जैसे की मानो कोई विशेष उत्तर ढूँढ रहा है. मतलब की कुछ ऐसा जिससे की सिर्फ़ उसे ही किसी तरह का कोई खास फ़ायदा हो सकता है.”

बोलते बोलते तनिक रुका मैं और इतने में ही गोविंद ने उत्सुकता में पूछा,

“ओह्ह.. तो ये बात है..”

“नहीं, एक बात और है.” मैं सोचने वाले मुद्रा में बोला.

गोविंद थोड़ा हैरान हुआ और अगले ही क्षण तत्परता से पूछा,

“और क्या बात है?”

“तुम्हें याद है, हम पहली बार कब मिले थे?”

“हाँ..”

“कहाँ?”

“बिंद्रा सर के ऑफिस में.”

“राईट... जिस दिन बिंद्रा ने मुझे तुमसे मिलाया, उसी समय, उन्होंने तुम्हारी ओर इशारा करते हुए ये भी कहा था कि, ‘इसका केस भी तुम्हारे (अभय) जैसा ही है.’ मतलब की मेरी चाची और तुम्हारी मम्मी..”

“मम्म.. हाँ... याद है..”

“यही.. यही एक बात मुझे उस दिन से कचोटे जा रही है ..... कि बिंद्रा को ये बात कैसे मालूम हुई.. चाची के बारे में.. बाद में पता चला की बिंद्रा को दत्ता ने बताया था.. तो फ़िर से वही सवाल रह रह के परेशान करने लगा की दत्ता को कैसे पता चला होगा... क्या विनय ने बताया ... सम्भावना तो यही बनती दिखाई दे रही थी.. पर सटीक बैठती प्रतीत नहीं हो रही थी. क्योंकि अगर विनय ने दत्ता को इस केस के बारे में.. मतलब की चाची के बारे में बताया होता तो चाची एज़ ए सस्पेक्ट पुलिस की नज़रों में कब का आ गई होती. और हालिया वारदातों के बाद तो उनका पुलिस की हिट लिस्ट ... आई मीन सस्पेक्ट हिट लिस्ट में आना तो एकदम ‘डन’ होता ... पर ऐसा हुआ नहीं... और अगर... आई रिपीट.. अगर विनय को ही दत्ता मान लिया जाए, तब तो चाची पर शिकंजा कसना चाहिए था.. और अगर दत्ता, दत्ता ही है और वाकई उसे चाची के बारे में विनय से ही पता चला है तो उसे अब तक चाची को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर देना चाहिए था.. या कम से कम एक इन्क्वारी ही सही. पर अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ ... कुछ भी नहीं..! पुलिस की यही ढील मेरे संदेह को और अधिक संदेहास्पद बना रही है.”

“ओह्ह.. तो ये परेशानी है?”

पूरी बात सुनकर गोविंद भी सोच में पड़ गया.

पेशानियों पर उसके ऐसे बल पड़े की मानो ये विकट समस्या उसके सिर आ पड़ा हो.

मैंने धीरे से कहा,

“और...”

“और??”

संशययुक्त चेहरा लिए मेरी ओर देख कर बोला गोविंद.

लाइटर से अपना ‘कास्टर’ धराते हुए बोला,

“और तो मुझे ये भी नहीं मालूम की चाची के बारे में विनय को क्या पता था और विनय से दत्ता को कितना और क्या क्या पता चला है.”

“तो?”

“तो ये की चाची और उनसे संलिप्त लोगों पर पुलिसिया ढीलाई शक के दायरे में आता भी है और नहीं भी..”

“तो?” गोविंद ने फ़िर पूछा.

“तो ये कि दत्ता मेरे संदेह के घेरे में आता है भी और नहीं भी.”

“हे भगवान!” कहते हुए गोविंद ने अपना सर पीट लिया.

थोड़ा रुक कर पूछा,

“तो अब क्या करने का सोचे हो?”

“बताता हूँ, पहले तुम मुझे दत्ता के टाइमिंग के बारे में बताओ.”

“सुबह नौ बजे आता है और शाम के पांच होते होते निकल जाता है. एकाध बार शायद काम की अधिकता होने के कारण ही उसे लेट भी हुआ है. तब छह बज जाते हैं उसे निकलने में. दोपहर में १ बजे ही वह लंच शुरू कर देता है. घर से ही टिफ़िन में ले आता है. सारा दिन थाने में ही रहता है.”

“हम्म... ओके.. और बिंद्रा.?”

“उसका भी सेम है. बिल्कुल दत्ता के जैसा. बस इतना सा फ़र्क है की दत्ता नौ बजे थाने आता है तो बिंद्रा दस बजे अपने ऑफिस!”

“हम्म.. गुड.. वैरी गुड.. अच्छी जानकारी हासिल किया है तुमने पर इतना ही काफ़ी नहीं है. कुछ दिन और नज़र रखो.. ख़ास कर उस इंस्पेक्टर दत्ता पर.”

“ओके.”

“कुछ पूछना है?”

“नहीं.”

“पक्का.. ?! और भी कुछ पूछना चाहते हो तो पूछ लो. पर इतना ध्यान ज़रूर रखना की दत्ता पर से तुम्हारी नज़र नहीं हटनी चाहिए.”

“पर दत्ता ही क्यों?”

“क्योंकि वह पुलिस है और थाने में ही रहता है.”

“तो?”

“हमें अपने मतलब की जो भी ख़बर मिलनी होगी.. थाने से ही मिलेगी. चाहे चाची के बारे में हो या मम्मी के बारे में.”

“हम्म.”

“एनीथिंग एल्स?”

“नो.”

“ओके देन .. लेट्स बकल अप एंड गेट टू वर्क.!”

“श्योर.”

“चलो, तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ देता हूँ.” मैं उठते हुए बोला.

“थैंक्यू.”

“योर वेलकम..”

--

थोड़ी ही देर बाद,

गोविंद को उसके घर के बाहर ड्राप कर मैं अपने घर की ओर चला गया.

इधर गोविंद अपने घर के दरवाज़े तक गया.

डोर बेल बजाया.

कोई आवाज़ नहीं भीतर से.

फ़िर बजाया.

कोई आवाज़ नहीं.

२-३ बार और बजाया...

नतीजा वही रहा.

झल्ला कर दरवाज़ा पीटने ही वाला था की तभी उसकी नज़र दरवाज़े से लटकते छोटे से ताले पर गई.

छोटे ताले का मतलब ये की उसकी मम्मी आस पड़ोस में ही कहीं गई है; कुछ देर में लौट आएँगी.

ताले का एक और चाबी गोविंद के पास हमेशा ही रहता है.

सो उसने जेब से चाबी निकाला और ताले को खोल कर अन्दर घुसा.

घुसते ही अपने पीछे दरवाजा लगाते हुए पास मौजूद स्विच बोर्ड को ढूँढ़ते हुए लाइट ऑन किया.

लाइट ऑन होते ही उसकी नज़र सामने रखी कुर्सी पर गई और कुर्सी पर बैठे शख्स को देख कर उसकी एक घुटी हुई सी चीख निकल गई.

“त...तुम... म..में..मेरा मतलब .... अ...आ...आप?!!!”

आगंतुक मुस्कराते हुआ बोला,

“हाँ.. मैं..दत्ता.. इंस्पेक्टर दत्ता.. मुझे भूले तो नहीं होगे तुम...”

“न..नहीं...”

“गुड.. आओ गोविंद.. तुमसे कुछ बात करनी है.. आराम से.”

बगल में ही रखे एक कुर्सी की ओर इशारा करते हुए दत्ता ने कहा.

क्रमशः

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09-12-2020, 01:07 PM,
#45
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ४२)

नाश्ता कर के उठा ही था की मेरे कमरे का फ़ोन घनघना उठा..

रिसीव किया,

क्रैडल को अभी उठा कर माउथपीस में ‘हैलो’ बोलने ही वाला था कि दूसरी ओर से एक व्याकुलता भरी आवाज़ आई,

“हैलो, अभय?”

“शंकर?.. बोलो भई .. क्या बात है... बड़े व्या...”

मेरी बात को बीच में ही काटते हुए शंकर बोला,

“तुम्हें कुछ बताना है. सोचा जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा रहेगा.”

“ठीक है. बोलो क्या सुनाना है?”

“बताता हूँ.. समय है तुम्हारे पास..?”

“हाँ है.”

“बढ़िया. सुनो तब.... ”

“हम्म.. सुन रहा हूँ.. बोलते जाओ..”

“समझ ही रहे होगे की ये तुम्हारी चाची के विषय में है..”

“हाँ.. समझ रहा हूँ.”

“बहुत अच्छे.. तो जैसा की तुमने बताया था.. मैंने फॉलो किया तुम्हारी चाची को .. आई मीन उस रद्दीवाले को. वह रद्दीवाला मनोरम पार्क के उल्टे तरफ़ बनी रद्दियों की एक दुकान में गया था और रद्दियों के जैसे आम तौर पर मोल भाव किये जाते हैं ... ठीक वैसे ही किया. दो आदमी बाहर आए.. रद्दियों के उन ढेर को उठाया और अंदर चले गए. उनके पीछे पीछे वो लड़का भी अंदर गया और तकरीबन पन्द्रह से बीस मिनट बाद लौट आया.. हाथों में कुछ नोट थे.. चेहरे से ख़ुशी टपक रही थी.. साइकिल पर चढ़ा और खुश होता हुआ अंदर गल्ले पर बैठे एक तीसरे व्यक्ति को सलाम – नमस्ते करता हुआ वहां से चला गया.”

“बस इतना ही....??!!”

“हाँ भई, इतना ही..”

मैं थोड़ी देर शांत खड़ा रहा .. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ. दूसरी और से शंकर भी चुप है .. उसकी भी सिर्फ़ सांसे ही सुनी जा सकती हैं.

जब इसी तरह कुछ और मिनट बीते तो शंकर की आवाज़ आई,

“हैल्लो.. अभय... लाइन पर हो या नहीं?”

“हाँ.. हूँ..”

“हम्म.. किस सोच में डूब गए?”

“सोच रहा हूँ की किस सोच में डूबूँ!”

“मतलब?”

“मतलब ये कि मैं सोच रहा था की कुछ बहुत इंटरेस्टिंग सा .. गोपनीय सा जानकारी हाथ लगेगी.... पर.. “

“पर....?”

“कुछ नहीं.. खैर, जाने दो...”

“जाने कैसे दूँ.. क्यों दूँ?”

“मतलब?”

“भाई मेरे.. ये शंकर कोई अनारी नहीं है.. जब कोई काम हाथ में लेता है तो पूरा कर के ही दम लेता है..”

“हाँ तो पूरा काम कर तो दिया तुमने.?!”

“नहीं!”

“नहीं??”

“हाँ.. नहीं.. अभी पूरा काम नहीं हुआ है.”

“तो क्या करना चाहते हो?”

“हाहाहा.... करना नहीं चाहता.. सुनाना चाहता हूँ.”

“क्या सुनाना चाहते हो.. अभी कुछ बाकी रह गया है क्या?”

“हाँ...”

“वो क्या?”

“तुम्हारे काम के ही बारे में है...”

“समझ रहा हूँ भई, आगे तो बोलो..”

“उस लड़के के वहाँ से चले जाने के बाद मैं भी चला आया था पर मन मान नहीं रहा था की अपनी खोज अधूरी छोड़ दूँ. इसलिए रात के दो बजे एकबार फ़िर वहाँ जाने का प्लान बनाया. रात को गया भी. उस समय तो सभी सोते ही हैं. वो एरिया भी पूरी तरह से शांत था. दुकान के ताले खोल कर अंदर गया.. कुछ न था सिवाय रद्दियों के. मायूस होने का समय न था वो... सो मैंने इधर उधर टटोल कर अपना ख़ोज जारी रखा. जल्द ही एक छोटा ख़ुफ़िया दरवाज़ा मिला जिसे अखबारों के तीन बड़े बड़े ढेर ... करीब पांच पांच फुट के बंडल के पीछे छुपाया गया था. सब हटा कर दरवाज़े को किसी तरह से खोला और अंदर घुसा. उस घुप्प अँधेरे में अपने पॉकेट टॉर्च की रोशनी में स्विच बोर्ड ढूँढने की कोशिश की ... स्विच बोर्ड मिली भी पर पांच में से एक भी स्विच ने काम नहीं किया. खैर, उसी पॉकेट टॉर्च की रोशनी में ही जब उस कमरे के चारों ओर देखा तो मेरी आँखें खुली की खुली रह गई. बड़े और माध्यम आकार के कई बक्सें रखे हुए थे. समय ना गँवाते हुए मैंने तुरंत उन बक्सों को एक एक कर खोलना शुरू किया. तकरीबन दस बक्सों को खोल कर देखा मैंने. यकीन नहीं करोगे तुम. सब में एक से बढ़ कर एक हथियार रखे हुए थे ! ज़्यादा गौर से देखने लायक समय नहीं था मेरे पास पर जितना की पहली नज़र में लगा.. शायद सब के सब फ़ुल ऑटोमेटिक हैं. वहाँ से हटा तो फ़िर आई अखबारों की बारी.. मेरा मतलब रद्दियों की बारी.. कुछ मिलेगा, इसकी उम्मीद न थी.. पर हुआ ठीक उल्टा. सभी अखबारों के हरेक दो – तीन पृष्ठों के बाद छोटे छोटे प्लास्टिक्स में कुछ काले या भूरे रंग के पदार्थ थे.. नशे का कोई सामान होगा. उस समय वहाँ से निकलने की भी जल्दबाज़ी थी इसलिए जल्दी जल्दी सब देखा और निकल आया वहाँ से.”

शंकर अपनी बात ख़त्म कर रुका.

उसके हरेक शब्द मेरे दिमाग में घर कर गए.

पूरा वाक्या ऐसा था की तुरंत कुछ बोलते नहीं बना मुझसे.

कुछ मिनट लगे मन को स्थिर करने में..

फ़िर पूछा,

“अच्छा पहले एक बात बताओ...”

“हाँ पूछो.”

“रात को तुम जिस समय वहाँ पहुंचे थे.. वो पूरी तरह सूनसान था?”

“हाँ भई, था.. कन्फर्म.”

“जब वहाँ से निकले... तो इस बात को अच्छे से जांच – परख लिया था कि कोई तुम्हारे पीछे तो नहीं लगा हुआ है..या नज़र बनाए हुए है?”

“हाँ.. अच्छी तरह पता है मुझे... कोई न था आस पास... और दूर दूर तक भी होने का सवाल होता दिख नहीं रहा है.”

“ऐसा क्यों?”

“क्योंकि मैंने अपने दो आदमी थोड़ी थोड़ी दूर पर छोड़ रखा था.”

“हम्म.”

“पर तुम ऐसा पूछ क्यों रहे हो?”

“पूछना नहीं चाहिए?”

“पूछना चाहिए.. ज़रूर पूछो.. जो और जितना पूछना चाहो पूछ लो.”

“ये सवाल बेकार है?”

“बेकार तो नहीं पर वाकई ज़रूरी है क्या?” इस बार शंकर सच में सशंकित हो उठा.

मैं हँस पड़ा...

बोला,

“खुद सोचो शंकर... एक ऐसी जगह जहाँ इतने आधुनिक हथियार और नशीले सामान रखे गए हों... उस जगह पहरा देने के लिए एक ... एक आदमी तक नहीं??”

मेरे इस सवाल पर शंकर भी सोच में पड़ गया..

बोला,

“हाँ.. बात तो सही है.. कम से कम एक आदमी तो होना ही चाहिए था वहाँ...भई, यहाँ तो पूरी दाल ही काली लग रही है.”

“मुझे तो दाल ही नज़र नहीं आ रही.” शंकाओं के कई बीज एक साथ मेरे मन में भी बो गए.

बस इतना ही निकला मुँह से,

“आधुनिक हथियार... ऑटोमेटिक... और वो पैकेट... निश्चित रूप से ड्रग्स ही होंगे उन पैकेटो में.”

“वही होंगे.”

कुछ क्षणों के लिए हम दोनों ही चुप रहे, फ़िर इस बात पर की कल मैं दोबारा उसे इसी समय फ़ोन करूँगा.. मैंने फ़ोन रख दिया.

क्रमशः

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09-12-2020, 01:07 PM,
#46
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ४३)

“क्या... क्या कहा तुमने??”

शंकर एकदम से हड़बड़ा गया.

खाना खाते खाते एकदम से रुक गया और आश्चर्य से आँखें बड़ी बड़ी कर मेरी ओर देखने लगा.

रविवार का दिन है और आज हम दोनों लज़ीज़ नाम के एक बार - कम – रेस्टोरेंट में बैठे खाना खा रहे हैं.

शंकर अपने पुराने काम का रिपोर्ट दे रहा था .... कि तभी मैंने टोकते हुए उसे ऐसी बात बताई की उसका खाना कुछ सेकंड्स के लिए गले में ही अटका रह गया.

ग्लास में से पानी गटक के दुबारा पूछा,

“क्या कह रहे हो तुम...?”

मैं बिल्कुल शांतचित सा बैठा, एक बड़े चम्मच से बिरयानी अपने मुँह में डालते हुए बोला,

“वही जो तुमने अभी अभी सुना.”

“तुम वहाँ जाना चाहते हो..?”

“हाँ..”

“पर क्यों?”

“देखना चाहता हूँ... ख़ुद.”

“मुझ पर भरोसा नहीं?”

“है.. पर अपनी आँखों देखी से तसल्ली होने में एक अलग बात है.”

“पर... एक्साक्ट्ली क्या देखना चाहते हो?”

“देखना उन्ही सामानों को चाहता हूँ जिनके बारे में तुम बता रहे थे उस दिन.”

“कोई विशेष कारण?”

इतनी देर में मेरे दिमाग में आज से कुछ समय पहले उस पुराने बिल्डिंग में मेरे ही द्वारा देखे गए उन पेटियों में बंद हथियार और ड्रग्स के सामान वाला सीन चलने लगा था.

दोनों जगह .. दो अलग जगह ... में मौजूद हथियार और ड्रग्स का आपस में कोई लिंक है भी या नहीं; इस बात को जाने बिना मैं शंकर को फ़िलहाल ज़्यादा कुछ बताने के मूड में नहीं था.

इसलिए जवाब कुछ वैसा ही दिया,

“कारण तो उन सामानों को देखने के बाद ही बता पाऊँगा और रही बात विशेष की... तो ये भी उन सामानों पर निर्भर करता है.”

मेरे इस तरह गोल मोल जवाब देने से शंकर समझ गया कि मैं तुरंत कुछ कहना सुनना नहीं चाहता. अतः वो भी चुपचाप मेरे साथ ही खाने लगा.

----

रात डेढ़ बजे हम दोनों मिले.. मनोरम पार्क के कुछ पहले.

शंकर के साथ उसके दो आदमी भी थे.

उन दोनों को शंकर ने अलग अलग जगह तैनात होने का निर्देश दिया और फ़िर मुझे साथ लेकर उस तरफ़ चल दिया जहाँ उस रद्दी वाले की दुकान है.

ताला खोलना शंकर के बाएँ हाथ का काम लगा. दो ही सेकंड में ताला और दरवाज़ा दोनों खुला.

दोनों साथ ही भीतर दाख़िल हुए.

घुप्प अँधेरा छाया हुआ है ... हाथ को हाथ नहीं सूझता...

हम दोनों ने अपना अपना पॉकेट टॉर्च निकाला और बड़ी सावधानी से अंदर चलते चले गए.

जल्द ही हम अंदर के एक कमरे में घुसे जहाँ अखबारों को एक के ऊपर एक रख कर करीब करीब ५ – ६ फ़ीट के आठ आदमकद बंडल बना कर रस्सियों से बाँध कर एक लाइन से आपस में सटा कर खड़ा कर के रखा गया है.

शंकर दो बंडलों को हटाने लगा... मैंने भी उसकी सहायता में हाथ लगाया..

उन खड़े बंडलों के हटते ही एक छोटा दरवाज़ा नज़र आया. ताला लगा था. शंकर ने फ़िर अपना कमाल दिखाया. ताला खोल कर अंदर घुसे.

शंकर ने स्विच बोर्ड दिखाया..

मैंने कुछ स्विच को ट्राई किया पर बत्ती जली नहीं.

अंततः हमें अपने टॉर्च पर ही भरोसा करना पड़ा.

टॉर्च की रोशनी जितनी दूर जा सकती है उतनी दूर तक देखने का प्रयास किया.

रूम बहुत बड़ा है ... और चारों तरफ़ पेटियाँ ही पेटियाँ.

शंकर ने तीन चार पेटियों की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया.

उसी ने अपने पैंट के एक पॉकेट से चाकू निकाला और एक पेटी के बाजू से घुसा कर थोड़ा खोला .. दोनों की इकट्ठी टॉर्च की रोशनी में साफ़ नज़र आया की उसमें मशीन गन रखी हुई है.. एक नहीं.. पाँच!!

इसी तरह दो और पेटियाँ खोला हमने और पहले वाले पेटी की तरह ही बाकी दोनों में भी अत्याधुनिक हथियार रखे हुए थे.

फ़िर शंकर मुझे दूसरी तरफ़ ले गया ..

वहाँ रखे पेटियों को भी उसने उसी तरीके से खोला ... यहाँ इन पेटियों में छोटे छोटे पैकेट्स हैं जिनमें भूरे रंग के थोड़े थोड़े परिमाण में कोई पदार्थ भरा हुआ है.

मैंने शंकर को चार पेटियों को खोले रखने को कहा और हर पेटी में से चार से पाँच पैकेट निकाल कर बड़े ध्यान से देखता और नाक के क़रीब ला कर सूँघता.. फ़िर उन पैकेट्स को पेटियों में रख कर पेटियों को पूर्ववत बंद कर दिया.

शंकर को ले कर मैं उसी दिशा में आखिर के पेटियों के पास पहुँचा और उन्हीं में से चार पेटियों को खोल कर पैकेट्स निकाल कर गौर से देखा और सूंघा...

यही काम मैंने बीच के पेटियों में भरे पैकेट्स के साथ भी किया.

शंकर को पूछने को हुआ पर मैंने इशारे से उसे पहले बाहर चलने को बोला ...

उस कमरे से बाहर निकल कर दरवाज़े पर ताला लगाया..

अखबारों के उन बंडल को पूर्ववत अपने स्थान पर रखा.

फ़िर उस कमरे से निकल कर हम सधे क़दमों से बाहर के कमरे में पहुंचे .. उस कमरे के चारों ओर टॉर्च की रोशनी से अच्छे से देखा. साधारण कमरा था.. और थोड़ी गंदगी भी थी.

बगल में ही एक मध्यम आकार का पाँच दराजों वाला टेबल था .. जिसमें दो दराज खुले पड़े थे.. अंदर कुछ नहीं था.

बाकी के तीन दराज लॉक्ड थे.

दोनों बाहर निकले.

मेन दरवाज़े पर ताला लगाया शंकर ने.

मेरी ओर मुड़ा.. कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि उसके शर्ट के अंदर के पॉकेट में कोई चीज़ एक धीमी बीप की आवाज़ के साथ जल उठी. हम दोनों ही हड़बड़ा गए. शंकर ने अंदर हाथ डाल कर बाहर निकाला तो देखा कि वह एक छोटा सा गोल आकार का कोई खिलौना है. मेरे चेहरे पर थोड़ा झुँझलाहट उभर आया पर साथ ही एक मुस्कान भी.

“खिलौना रखने लगे?” व्यंग्य करता हुआ बोला.

पर देखा की शंकर बड़े आश्चर्य से उस खिलौने को देखता हुआ अपने पीछे के रोड की ओर देख रहा है.

“क्या हुआ?”

मैंने बड़ी तत्परता से उससे पूछा.

“सुनो, जल्दी कहीं छुप जाते हैं.”

शंकर गजब के तरीके से हड़बड़ा कर बोला.

मेरे कुछ पूछने या सोचने से पहले ही वो मुझे दुकान के चंद कदमों की दूरी पर मौजूद झाड़ियों के पीछे ले गया.

“हुआ क्या?”

काफ़ी सशंकित लहजे में पूछा मैं. घबराहट भी होने लगी थोड़ी बहुत.

झाड़ियों के पीछे छुपते हुए शंकर बोला,

“कोई इसी ओर आ रहा है.”

“तो?”

“खतरा है.”

“किससे? ज़रूरी थोड़े है कि जो कोई भी इस ओर आ रहा है; वो हमारे जान पहचान का होगा या फ़िर...”

“या फ़िर..?”

“या फ़िर ‘हमारी ही’ ओर आ रहा है?”

“वो पता नहीं.. पर रिस्क कौन ले?”

“हूं.”

शंकर की इस बात में दम है.. मैंने भी फिलहाल के लिए शांत रहना उचित समझा.

हालाँकि मेरा दिल इस बात का ज़ोर ज़ोर से चेतावनी देने लगा था कि आने वाला हो न हो, ज़रूर उस दुकान से वास्ता रखने वाला ही कोई हो सकता है.

अगले दो मिनट में ही हम दोनों का आशंका सही सिद्ध हुआ.

तीन कार आ कर रुकी.

तीनों की तीनों काली फ़िएट... लंबी..

कुछ लोग उतरे ..

अँधेरे में किसी का भी चेहरा पहचान पाना बहुत मुश्किल था.

दो आदमी सीधे दुकान की ओर गए.. दरवाज़ा खोला और अंदर घुस गए.

मैं और शंकर दोनों ही दम साधे चुप उन झाड़ियों के पीछे खुद को छुपाए बैठे तो हैं पर मच्छरों के आक्रमण और उनके डंक से खुद को संभाल या बचाए रख पाना बहुत मुश्किल हो रहा था.

कुछ ही देर में दुकान के अंदर गए दोनों आदमी बाहर निकले.

उनमें से एक आदमी बीच वाले कार के पिछले दरवाज़े के खिड़की के पास थोड़ा झुककर बोला,

“अंदर सब माल चौकस है...........”

यहीं पर मुझे कुछ ऐसा सुनाई दिया जिससे की मेरा माथा ठनका.

‘अंदर सब माल चौकस है.....’ इतने से वाक्य के अंत में उस आदमी ने कुछ ऐसा कहा जिससे की मेरे कान खड़े हो गए. अंतिम उस शब्द ने मुझे हैरत में डाल दिया पर तुरंत ही मैंने इसे अपना भ्रम माना और ज़्यादा तवज्जो नहीं दिया.

इसी बीच मैंने शंकर की ओर देखा..

वो मेरी ओर एक नज़र देख कर दुबारा उस तरफ़ देखने लगा.

मेरी ही तरह वो काफ़ी चौकन्ना था.

उस पर से मैं नज़रें हटाने ही वाला था कि अचानक से मेरा ध्यान शंकर के दाएँ हाथ की तरफ़ गई... और इसी के साथ ही मानो मेरे पूरे शरीर में करंट सा दौड़ गया. आँखें आश्चर्य से बाहर निकलने को हो आईं.

हो भी क्यों न ...

शंकर के दाएँ हाथ में एक रिवाल्वर थी!

रेडी टू बी फायर अपॉन!!

रिवाल्वर मेरे लिए कोई नई बात बिल्कुल नहीं थी पर ये मैंने उम्मीद ही नहीं किया था की शंकर आज अपने साथ कोई रिवाल्वर ले आएगा. सच कहूं तो अपने साथ किसी तरह का कोई हथियार लाने का विचार तो मेरे दिमाग में आया ही नहीं था. वो तो बस आदतनुसार हमेशा की तरह एक पॉकेट नाइफ ही है आज मेरे पास.

और एक पॉकेट टॉर्च!

“पर इतना तो तय है कि मुखबीर हमारे गैंग में से ही कोई है.”

इस आवाज़ पर मेरा ध्यान फ़िर उन लोगों की ओर गया.

वे लोग आपस में ही बातें कर रहे थे....

“पर अंदर माल तो चौकस है जी...”

“हाँ .. है... पर अभी के लिए..”

“तो क्या किया जाए.. आपका क्या आदेश है... और पीछे उसका क्या करना है?”

“उसे बाहर निकालो और यहाँ मेरे सामने ले आओ.”

बीच वाले कार में बैठे शख्स ने बाहर खिड़की के सामने खड़े आदमी को आदेश दिया जिसका उसने और उसके दो और साथियों ने बड़ी मुस्तैदी से पालन किया.

पीछे वाले कार का पिछला दरवाज़ा खोल कर उसके अंदर से एक आदमी को लगभग खींचते – घसीटते हुए निकाला गया.

और बीच वाले कार के पिछले दरवाज़े के ठीक सामने चंद क़दमों के फासले पर ला कर उसके टांगो पर लात मार कर उसे घुटने के बल बैठाया.

“लाइट्स !”

दूसरा आदेश आया...

इसका भी फ़ौरन पालन हुआ.

तीन आदमियों ने तीन टॉर्च... शायद बड़ी वाली टॉर्च होगी... ज़्यादा पॉवर वाली.. उस बैठे हुए आदमी के चेहरे पर फोकस करके जलाया.. आदमी की आँखें चौंधिया गई.

वहाँ से दूर बैठे शंकर और मुझे अब कुछ स्पष्ट दिखने लगा.

उस आदमी के दोनों हाथ पीछे की ओर बंधे हुए थे और मुँह में एक कपड़ा ठूँस कर ऊपर से एक और कपड़ा बाँध दिया गया था जिससे वो लाख़ चाह कर भी चीख न सके.

उस बीच वाले कार का पिछला दरवाज़ा खुला...

एक शख्स बाहर निकला..

सधे कदमों से चलता हुआ उस आदमी के कुछ निकट पहुँचा ..

टॉर्च की रोशनी में भी उस आदमी का चेहरा डर से थर्राया हुआ था.. पूरा बदन काँप रहा था.. बोल न पाने की सूरत में बंधे मुँह से ही ‘घ... घं..’ करके कुछ बोल पाने का व्यर्थ प्रयास कर रहा था.

“इतना जो डर रहे हो... ये डर उस समय लगना चाहिए था जब तुम हमारे खिलाफ़ मुखबिरी के लिए तैयार हुए थे...”

इतना कहने के साथ ही सामने खड़े उस शख्स ने अपना हाथ उस आदमी की ओर सीधा किया ... टॉर्च की रोशनी में हाथ में थामा हुआ रिवाल्वर चमक सा उठा..

नाल की सीध उस आदमी के आँखों के ठीक बीचों बीच थी..

एक हल्की आवाज़ हुई...

“च्यूम!!!”

और इसी के साथ वह वहीँ धराशायी हो गया....

वो शख्स मुड़ा और जा कर कार में बैठ गया.

“अब इस बॉडी का क्या करना है?”

“करना क्या है.. ले जा कर उसी ठिकाने में जा कर फेंक आओ जहाँ यह सुबह शाम पैग पे पैग लगाता है.”

“जी, ठीक है.”

“चलो .. जल्दी करो... अब जल्दी निकलो सब यहाँ से..”

उस मरे हुए को पीछे के कार में लाद दिया गया ...

पहली वाली और बीच वाली कार एक साथ स्टार्ट हो कर बैक हो कर एक ओर निकल गई और तीसरी कार दूसरी ओर घूम कर चली गई.

उन लोगों के चले जाने के काफ़ी देर बाद हम दोनों को ख़ुद के वहाँ होने का एकाएक अहसास हुआ.

“ठीक हो?” शंकर ने पूछा...

“हाँ.. तुम?”

“हम्म.. मैं भी..चलो निकल चलते हैं यहाँ से.”

“हाँ .. जल्दी चलो.”

शंकर ने अपने शर्ट के अंदर हाथ डाल कर वही खिलौना नुमा चीज़ निकाला और ख़ास तरीके से तीन बार दबाया... इस बार आवाज़ नहीं हुआ पर वह हल्की नीली और हरी रोशनी से जल उठा.

थोड़ी ही देर... अंदाजन दस – बारह मिनट में एक एम्बेसडर आ कर दुकान के सामने रुकी.

फ़ौरन शंकर के हाथ में मौजूद वह खिलौना तीन बार धीमी ‘बीप’ के आवाज़ के साथ जल उठी.

शंकर ने मुझे चलने का इशारा किया.

दोनों झाड़ियों से निकले और एम्बेसडर की ओर बढ़ गए.

हमारे बैठते ही एम्बेसडर एक ओर चल दिया.

शंकर और मैं पीछे बैठे थे. गाड़ी शंकर का ही आदमी चला रहा था और ड्राइविंग सीट के बगल में ही शंकर का दूसरा आदमी बैठा था.

खिड़की से बाहर देखते हुए मैं रह रह के बार बार उस बीच वाले कार में बैठे शख्स और उसकी आवाज़ के बारे में सोच रहा था. बल्कि सच कहूं तो सोचने के लिए विवश हुआ जा रहा था. ऐसा होने का कारण फिलहाल मेरे लिए थोड़ा अस्पष्ट है. तह तक पहुँचने में समय लगेगा.

मैंने सिर दायीं ओर घूमा कर शंकर को देखा.

वह भी मेरी ही तरह खिड़की से बाहर देख रहा था.

साथ ही किसी चिंता में था.

उन लोगों के जाने के बाद से ही शंकर तनिक विचलित सा उठा था. चिंतित था. ऐसा लग रहा था मानो वो दिमाग पर ज़ोर दे कर कुछ सोच या समझ पाने का भरपूर प्रयास कर रहा हो.

मैंने भी उसे कह तो दिया था कि मैं ठीक हूँ पर सच कहूं तो पहली बार सामने से किसी का खून होते देख कर मेरे तो रोंगटे ही खड़े हो गए थे.

आसमान बादलों से भर जाने के कारण तारे अब दिखाई नहीं दे रहे थे.

तेज़ हवा भी चलने लगी थी अब तक.

खिड़की पर अपना हाथ रख कर ठोढ़ी रखते हुए आँखें बंद कर लिया मैंने.

अब इतना तो तय था की आने वाले दिनों में बहुत कुछ होने वाला है.....

मेरा खुद का जीवन भी अब एक नई करवट लेगा और इसका ज़िम्मेवार भी मैं ही होऊँगा.

क्रमशः

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09-12-2020, 01:07 PM,
#47
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ४४)

सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही चाची की नींद खुली.

खिड़की से आती सुनहरी धूप का कुछ हिस्सा बिस्तर के थोड़े से भाग के साथ साथ उनके चेहरे पर भी आ रही थी.

पहले तो हाथ उठा कर अपने आँखों पर रख कुछ और देर सोयी रही ... फ़िर जब मन नहीं माना तो उठने का निर्णय कर ही ली.

अंगड़ाईयाँ लेते हुए करवट बदली ...

इसी के साथ उनकी नज़र पड़ी उनके ठीक बगल में लेटा, दुनिया जहाँ से बेख़बर बेसुध सा सोता अभय यानि मुझ पर..!

चेहरा उन्हीं की ओर कर पेट के बल लेटा हुआ था ..

निश्चित ही उन्हें उस समय मेरा चेहरा बहुत भाया होगा.. तभी तो बरबस ही अपना एक हाथ मेरे बाएँ गाल पर रख कर सहला दी...

बहुत देर तक मुझे देखते हुए मंद मंद मुस्कराता उनका चेहरा इस बात की तस्दीक कर रहा था कि निश्चय ही उनके मन में प्यार की उमंगें नई तारतम्यता के साथ अंदर ही अंदर नए नए हिल्लोरें मारे जा रहा है.

एकाएक ही उन्हें एक बात का अहसास हुआ.

और वो यह कि,

वह समय मेरे साथ पलंग पर बिल्कुल नंगी हैं..!!

मैं भी....

पूर्ण निर्वस्त्र....

हमारे कपड़े पलंग पर तो क्या... कदाचित उस कमरे में ही नहीं होंगे..!

अपनी नग्नता का अनुभव होते ही चाची स्वयं को ढकने के लिए आस पास चादर ढूँढने लगी.

चादर मेरे शरीर के नीचे ही दबा पड़ा था.

खींच कर अपने तरफ़ करने की व्यर्थ प्रयास जब उनकी सफ़ल न हुई तब चादर के थोड़े से हिस्से को इतना ही खींची की उस हिस्से से किसी तरह अपने जांघों के बीच शोभायमान यौनांग... अर्थात अपनी योनि के ऊपर किसी तरह रखते हुए ढक ली.

उसके बाद फ़िर थोड़ी देर तक मुझे देखती रही.

फ़िर,

खुद ही को घसीट कर मेरे और करीब आ गई.

अपना एक हाथ मेरे गाल पर रखी.. जब मेरी ओर से कोई हरकत नहीं हुई तो ... और भी बड़े ध्यान से देखी...

उनकी मुस्कराहट और भी बड़ी हो गई.

अपने हथेलियों के नर्म स्पर्शों से मेरे पीठ को सहलाने लगी और कंधे पर दो किस दे बैठी.

पीठ पर रेंगती हथेली को आहिस्ते से बिस्तर और मेरे कमर के बीच बन रहे थोड़े से गैप में घुसा दी और धीरे धीरे मेरे यौनांग की ओर अग्रसर होने लगी.

जब उनकी अँगुलियों के पोर मेरे ट्रिम किए झांटो के आस पास पहुँचे तब एक हल्की सी गुदगुदी हुई मुझे और मैंने तनिक इस तरह करवट लिया कि वो गैप और बड़ी हो गई.

चाची को और आसानी हुई ...

बड़े आराम से हथेली और आगे सरक गई.

और तभी,

उनकी आँखें आश्चर्य से बड़ी बड़ी हो गई.. चेहरे पर शर्मो ह्या की लालिमा छा गई.

सुबह सुबह किस मर्द का जननांग अपने बुलंदी के शिखर पर नहीं होता...

यही हुआ था मेरे साथ भी...

मैं भले ही थका हारा, दुनिया से बेख़बर... सुध बुध खोया सो रहा था... पर मेरा छोटा अभय तो कब का जाग गया था.

और जागा भी था तो इतना सख्ती से कि चाची की हथेली उसे अपने गिरफ़्त में लेते ही एक अलग सा रोमांच महसूस करने लगी.

छन छन से चूड़ियों को बजाते हुए उनकी हथेली मेरे छोटे अभय के सिर से लेकर नीचे तक ऊपर नीचे होने लगी.

थोड़े ही देर बाद,

स्पष्ट अनुभव किया की उनकी हथेली एक भिन्न व विशिष्ट तरीके से मेरे जननांग से खिलवाड़ कर रही है जोकि इस बात का द्योतक है.... की चाची अब पूर्णरूपेण रोमांचित हो चुकी हैं और निश्चित ही एकबार पुनः प्रेम युक्त वासना से परिपूर्ण संसर्ग हेतु स्वयं को तैयार कर चुकी हैं.

अब तक मैं भी पीठ के बल सीधा लेट चुका था ..

चाची खुद को अपने जगह से उठा कर मेरे से बिल्कुल सट कर लेट गई और साथ ही खुद को थोड़ा ऊपर उठाते हुए अपने बाएँ वक्ष को कुछ इस तरह मेरे मुँह पर रख दी जिससे की तनिक सख्त हो चुका उनका निप्पल सीधे मेरे होंठों के अंदर प्रविष्ट कर गया...

उनके हथेली का भी ऊपर नीचे होने की गति काफ़ी बढ़ चुकी है...

मेरे से और रहा नहीं गया ...

और अपने दोनों बाहें फैला कर उन्हें कस कर बाँहों में लेते हुए अपने चेहरे को उनकी दो सुडौल, पुष्ट स्तनों के मध्य दबा दिया;

ये सोचते हुए कि ..

किसी ने सत्य ही कहा है,

“औरत को ताज चाहिए न तख़्त....

सिर्फ़ एक लंड चाहिए सख्त!”

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उसी दिन... सुबह १० बजे के अखबार में मुखपृष्ट के एक कोने में छपी एक ख़बर पर मेरी नज़र टिक गई.

मनोरंजन सिनेमा हॉल के पीछे वाली गली में मौजूद एक शराब का ठेका जो विगत कई वर्षों से फल फूल रहा है, वहाँ उसके सामने परसों रात जो लाश मिली थी उसकी अब तक शिनाख्त नहीं हो पाई है.

सूत्रों के अनुसार,

‘ये हत्या शराब के नशे में की गई हो सकती है.. पैसे के लेन-देन या किसी तरह की कोई उधार चुकता न होने के कारण ऐसे मामले पिछले कई दिनों से बढ़ गए हैं. वैसे, संभावना ये भी जताई जा रही है कि मृत व्यक्ति कदाचित पुलिस की मुखबिरी के कारण मारा गया हो सकता है. पुलिस फ़िलहाल कुछ भी कहने से इंकार कर रही है और पूछे जाने पर सिर्फ़ इतना ही भरोसा दिया जा रहा है की अपराधी को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा.’

इस ख़बर के ऊपर ही उस मृत व्यक्ति का फ़ोटो भी छपा था..

मैं फ़ोटो को गौर से देख कर उसे पहचानने की कोशिश करने लगा..

और,

इधर चाची रसोई घर से मुझे गौर से देख रही थी....

क्रमशः

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09-12-2020, 01:07 PM,
#48
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
भाग ४५)

अखबार को पढ़ने के कुछ देर बाद मैं घर से निकल कर ‘नशा’ बार में पहुँचा जहाँ शंकर के होने की बात थी.

बार में शंकर मुझे बियर पीटा हुआ मिला.

मेरे बैठते ही एक मेरे लिए भी मँगवाया...

कुछ देर बियर की चुस्कियों के बाद जब दिमाग थोड़ा स्थिर हुआ तो बात बढ़ाने का दायित्व मैंने ही लिया,

“कुछ पढ़ा – सुना तुमने?”

शंकर – “हाँ”

“क्या लगता है?”

“किस बारे में?”

“अख़बार में छपी ख़बर के बारे में... उस हत्या के बारे में”

मेरे इस प्रश्न के साथ ही शंकर का चेहरा थोड़ा बुझ सा गया, चेहरे पर ऐसे भाव आए मानो खुद को किसी बात के लिए दोषी ठहराने का उसका जी कर रहा हो.

थोड़ा दुखी स्वर में बोला,

“मैं उसे जानता था.”

मैं – “किसे? वह आदमी जिसकी हत्या हुई?”

“हाँ”

सुनते ही मैं चौंकते हुए पूछा,

“क्या कह रहे हो?”

शंकर ने पूर्ववत दुखी स्वर में कहा,

“सच कह रहा हूँ.”

“कैसे जानते थे उसे?”

“अपने ही कम के लिए मैंने उसे नियुक्त किया था.. जासूसी के लिए.”

“किसकी जासूसी?”

“इंस्पेक्टर दत्ता की.”

अब तक दिमाग में जो नशा छाना शुरू हुआ था... शंकर के इस एक उत्तर ने एक झटके में सब धुआं बना कर हवा में उड़ा दिया...

अबकी बार तो और भी बुरी तरह से चौंक गया और ऊँची आवाज़ में बोल पड़ा,

“क्या?? इंस्पेक्टर दत्ता की?!!”

शंकर – “अरे आराम से भाई... मरवाओगे क्या?”

मैं अपलक शंकर की ओर देखने लगा..

बियर का एक अच्छा सा घूँट लेते हुए शंकर ने सिर्फ़ सहमति में अपना सिर हिलाया.

मुझे तो अभी भी अपने कानों पर यकीं नहीं हो रहा था.. खुद को संयत करता हुआ हुआ बोला,

“थोड़ा ठीक से बताओ मामला क्या है?”

बियर के ग्लास को दाएँ तरफ़ थोड़ा परे रख कर एक सिगरेट सुलगाया शंकर ने;

फ़िर,

“मैंने उसे महीने भर पहले नियुक्त किया था.. शहर में हो रहे आपराधिक घटनाओं और उनमें संलिप्त अपराधियों का यूँ बच कर निकल जाना कहीं न कहीं मेरे दिमाग में यह संदेह बैठा रहे थे कि हो न हो इन घटनाओं के बारे में जानकारी पूर्व ही किसी दूसरे पार्टी को मिल जा रही है और वह पार्टी निश्चय ही एक खास पॉवर रखती जो ऐसी घटनाओं में संलिप्त लोगों को सुरक्षित बचा ले जाती है. तुम्हारे कहे अनुसार मैंने बहुत जाँच की.. ख़ोज की पर सफलता हाथ न लगी. तब मैंने अपनी ओर से एक चाल चलने की सोची.

जितने भी पुलसिये ख़बरी/मुखबीर थे; सबके बारे में पता लगाने के लिए अपने आदमी फ़िट कर दिया. परिणाम जल्द ही मंगरू के रूप में मिला, उसे पैसे की सख्त ज़रुरत थी और उससे भी बड़ी बात यह कि वो किसी समय इंस्पेक्टर विनय का ख़बरी हुआ करता था. विनय के अचानक गायब हो जाने के बाद से बहारे की कमाई पर प्रभाव पड़ा था . मैंने अपने आदमियों के द्वारा मंगरू से बात की.. हमारे साथ काम करने के लिए मनाया. वो राज़ी हुआ और लगा हमारे लिए काम करने .. पर .. सिर्फ़ दो महीने ही काम कर सका.. पर इन दो महीनों में उसने बहुत सारे कमाल की ख़बरें ला कर दी. उसे ने ये ख़बर भी दी थी की पुलिस महकमा हर संभव प्रयास करने के बाद जब इंस्पेक्टर विनय को खोजने में नाकाम रही तब यह निर्णय लिया जाने लगा था कि विनय के केस को बंद कर दिया जाए..

पर पुलिस कमिश्नर निरंजन बोस , एसीपी आदित्य तिवारी और ख़ुद इंस्पेक्टर दत्ता ने एक कोशिश और करने का सोचा है. इन तीनो का कहना है कि अंतिम बार एक वृहद् और गहन छानबीन पर शायद इंस्पेक्टर विनय का कुछ पता चल सकता है. ख़ुद मंगरू का मानना है कि इंस्पेक्टर विनय को किसी ने गायब नहीं किया है.. बल्कि वह ख़ुद गायब हुआ है. हालाँकि उसका ऐसा मानने का कोई पुख्ता कारण उसके पास भी नहीं था.

और भी कई ख़बर मिलने की उम्मीद थी उससे... पर.....”

चेहरे पर अफ़सोस वाले भाव लिए शंकर ने सिर हिलाया .. फ़िर पास रखे बोतल को उठा कर अपने और मेरे ग्लास में परोसा ... और फ़िर बियर और सिगरेट दोनों बारी बारी से पीने लगा...

मंगरू के इस तरह से मर जाने का अफ़सोस अब मुझे भी होने लगा..

अपने हिस्से का बियर पीते हुए बोला,

“ज़रूर उसके बारे में किसी ने ख़बर लीक कर दिया था.”

शंकर – “तुम्हें ऐसा लगता है?”

“बिल्कुल.. तुम्हीं सोचो.. उसके बारे में तो सिर्फ़ तुम और तुम्हारे आदमी जानते थे... और शायद पुलिस महकमे में इंस्पेक्टर विनय के अलावा १-२ पुलिस वाले जानते होंगे. वो भेदिया जो कोई भी है.. इन्हीं लोगों में से कोई एक होगा...”

कहते हुए अपना ग्लास खाली किया और तुरंत ही एक सिगरेट सुलगा कर धुआँ छोड़ता हुआ बोला,

“पर एक बात समझ में नहीं आई.”

“वो क्या?”

“जिन लोगों ने उस रात मंगरू की हत्या की... उस दुकान के सामने ला कर क्यों की...? .. वो तो उसे कहीं और भी मार सकते थे... तो फ़िर.......”

“उस दुकान.....की ख़बर मंगरू ने ही दी थी.”

मेरी बात को बीच में काटते हुए शंकर बोला.

सुनकर आश्चर्य नहीं हुआ मुझे.. क्योंकि अब तक मुझे थोड़ा थोड़ा अंदाज़ा हो गया था..

थोड़ा रुक कर बोला,

“ओह.. तभी उन में से दो आदमी उस दुकान में जाकर कुछ चेक किया और आ कर कहा की सब ठीक है... अगर कुछ ठीक नहीं होता या गायब होता तो वे लोग मंगरू से वहीँ सब कुछ उगलवाने की कोशिश करते .”

“हम्म.. ऐसा ही होता शायद. और वो दुकान तो नहीं.. गोदाम बोलना ही बेहतर है.”

“हाँ .. सही कहा तुमने.. अच्छा एक बात बताओ.. कोई भी गुप्त ख़बर देना जब देना होता था तो तुम्हें कैसे देता था..?”

“कौन...? मंगरू??”

“हाँ..”

“मैंने ख़ुद उसे एक बिल्डिंग के बारे में बताया था .. वह बिल्डिंग मेरे ही एक दोस्त का है जो अब यहाँ नहीं रहता.. वो बिल्डिंग.. जोकि एक घर है.. उसमें जाने के लिए एक बड़ा सा लोहे का गेट के अंदर से होकर घुसना पड़ता है.. घुसने के बाद घर तक जाने के लिए थोड़ी दूर चलना पड़ता है.. उससे पहले गेट से अंदर की ओर दस कदम चलने पर दाएँ साइड पेड़ - पौधों के झुरमुठ में एक लैटर बॉक्स / मेल बॉक्स है जो लकड़ी के तीन मोटे डालों के सहारे एक छोटा घर नुमा आकार में टिका हुआ है... ये मेल बॉक्स हमेशा एक स्पेशल ताले से बंद रहता है और खुलता भी है तो स्पेशल चाबी से ही.. ये स्पेशल ताला और चाबी मैंने खुद ही बनाया था... बॉक्स स्टील का है और चिट्ठी डालने के लिए ऊपरी हिस्से में एक पतला सा गैप है. मंगरू के लिए मेरा निर्देश यही था कि उसे जब भी कोई विशेष या कोई गुप्त बात बतानी हो तो एक कागज़ में लिख कर उसी मेल बॉक्स में डाल डाल दे. सप्ताह के सातों दिन मैं ख़ुद वहाँ जा कर उस मेल बॉक्स को चेक करता था. बहुत बार उसमें से मंगरू के लिखे कई कागज़ मिले जिनमें अक्सर दूसरे कई और चिट्ठीयों के अलावा मंगरू के भी लिखे कागज़ होते थे..”

“हम्म.. तो .. उस दुकान .. या गोदाम.. जो भी कहो... उसके बारे में मंगरू ने तुम्हें तुम्हारे इसी बताए तरीके से ख़बर दिया था?”

“हाँ.. पहले तो उसकी इस ख़बर में मुझे कुछ झोल लगा था.. इसलिए मैंने अपने आदमी भेजा और इसको अपने सामने उपस्थित किया.. फ़िर आराम से पूछा.. उसने मुझे बताया की उसे शक है कि एक दुकान में कुछ बहुत ही गलत काम हो रहा है.. क्या गलत काम हो रहा है ...यह वो बता न पाया.. लेकिन अपने शक पर उसे इस कदर भरोसा था कि यहाँ तक कह दिया था की अगर वहाँ कुछ न मिले तो मैं चाहूँ तो उसे फ़ौरन मरवा दूँ.. और देखो.. मिलने को तो बहुत कुछ मिला पर फ़िर भी वो मारा गया.”

निराशा के भाव एक बार फ़िर उसके चेहरे पर दिखाई देने लगे.

“लगता है तुम्हारा ख़ास आदमी बन गया था वह..”

“ख़ास का तो पता नहीं.. पर ऐसे आदमी.. इतने काम के आदमी हमेशा मिला नहीं करते.”

“मंगरू ने कुछ बताया था तुम्हें... की उसे उस दुकान पर कैसे शक हुआ था...?”

“हाँ.. मैंने भी यही पूछा था.. तो उसने बताया था की पिछले २-३ महीने से कुछेक इलाकों के घरों पर उसे अनायास ही संदेह हुआ था.. उसका मानना था की इन घरों में कुछ ऐसा था जिसका सम्बन्ध उस दुकान से था ...और वो भी गैर कानूनी रूप से. इससे ज़्यादा कुछ न बोला वो.”

“तुम्हें चेहरे से पहचानता था वो?”

“नहीं... मैं जल्द अपने किसी भी आदमी के सामने ऐसे ही नहीं आता.. सिर्फ़ दो ने ही मुझे देखा है और काफ़ी भरोसे के हैं.. मंगरू से मैं हमेशा अँधेरे की ओट में बात करता... चाहे कुछ भी हो जाए.. अपने चेहरे पर रोशनी नहीं पड़ने देता और आवाज़ भी बदल कर बात करता...”

“हम्म.. ठीक है..”

“अभय.. अब तुम एक बात बताओ.. आख़िर क्या बात है की तुम उस रात उस दुकान... सॉरी.. गोदाम में .. एक एक कर कई साड़ी पेटियों को खोल खोल कर देख रहे थे... और कुछ पेटियों में से तुमने पैकेट्स निकाल कर सूंघा भी था... क्यों?”

“हाहा.. क्यों.. तुम्हें नहीं सूझी उन पैकेट्स को सूँघने की?”

“सूझी थी.. पर ज़रूरी नहीं समझा..”

“अगर सूँघते तब पता लगता..”

“ठीक है.. अब तुम्हीं बता दो.”

“शुरू के और अंत के पेटियों में जो पैकेट्स थे उनमें वाकई ड्रग्स थे और असली थे... पर बीच के पेटियों में........”

“बीच के पेटियों में??”

“बीच के पेटियों में जो पैकेट्स थे वो ड्रग्स के नहीं थे.. ड्रग्स जैसे दिखने में ज़रूर थे ... मगर ड्रग्स नहीं थे...”

“व्हाट?!!” अविश्वास से शंकर की आँखें चौड़ी हो गईं.. कुछ इस तरह से चौंका था वो कि कुछ पलों के लिए उसे ये समझ ही नहीं आया की अब आगे क्या बोले..

मैंने बात जारी रखा,

“इतना ही नहीं.. वहाँ कई पेटियाँ ऐसी भी थीं जिनमें अत्याधुनिक हथियार रखे हुए थे.. राईट?”

“हाँ..”

“वेल,... कुछ पेटियों में नकली ड्रग्स की तरह ही नकली हथियार रखे हुए थे..”

मेरी इस बात को सुन कर शंकर मेरी ओर एकटक देखता रहा.. शायद वो अपने हिसाब से ड्रग्स और हथियारों के नकली होने के गणित को सुलझाने लगा होगा या फ़िर नकली ड्रग्स वाली बात के जैसा ही नकली हथियारों के बारे में सुन कर उसे दोबारा अपने कानों पर विश्वास न हो रहा हो..

किसी तरह उसके मुँह से निकला,

“इन सबका मतलब क्या हुआ?”

“मतलब यही हुआ की कोई इन नकली सामानों के साथ असली सामानों की अदला बदली करना चाहता है.. ऐसा मेरा अंदाज़ा है...”

“सच बताओ.. ऐसा तुम्हारा अंदाज़ा है या तुम कुछ जानते हो इस मामले में और मुझे बताना नहीं चाहते.. ? क्योंकि जब से तुम्हारे साथ हूँ... आज तक तो तुम्हारा कोई अंदाज़ा गलत नहीं हुआ.”

“ऊपरवाले की दया है.”

“चलो ड्रग्स का तो मान लिया की वो नकली थे.. लेकिन.. ये तुम कैसे कह सकते हो कि हथियार भी नकली थे..?”

“बैरल से ..”

“ओह... ह्म्म्म”

फ़िर जैसे अचानक से शंकर को कुछ याद आया; तपाक से बोला,

“अरे.. देखो... एक और खास बात तो मैं तुम्हें बताने ही भूल गया था...”

“ठीक है.. अब याद आ गया है तो बोल दो.”

“मुझे अपने एक और काबिल ख़बरी से पता चला है की इस शहर में अवैध हथियारों का धंधा कोई अगर कर सकता है तो वो है डिकोस्टा .. हालाँकि और भी कई ऐसे हैं जो ये धंधा यहाँ कर सकते हैं पर डिकोस्टा के जैसा नहीं.”

डिकोस्टा!

ये नाम मेरे कानों में पड़ते ही मेरे शरीर में जैसे करंट सा लगा..

तुरंत ही याद आ गया की ये नाम मैंने उस दिन उस टूटे से मकान के ऊपरी तल्ले पर वहाँ मौजूद कुछ लोगों के मुँह से सुना था..

अनभिज्ञ बनता हुआ बोला,

“अब भई.. ये डिकोस्टा कौन है?”

“क्राइम की दुनिया में एक उभरता और चमकता नाम है.. नाम क्या सितारा बोलो सितारा... ऐसे ऐसे कारनामों को अंजाम दिया है इसने की क्या बताऊँ... इस देश के लगभग आधे से ज़्यादा शहरों में इसके ठिकाने हैं और उतने ही पुलिस थानों में इसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है. तुमने कभी सुना नहीं इसके बारे में ? ... कमाल है.”

“सुना हूँ... पर कभी ज़्यादा जानने को न अवसर मिला और न दिल किया.”

“हम्म.. ओके.. एक खास बात और है..”

“वो क्या?”

“उसके क्राइम और फाइनेंस .... साथ ही जीवन से जुड़ी कई बातें एक फ़ाइल में कलमबद्ध है और हमारे ही शहर के इसी पुलिस थाने में रखा हुआ है. अगर वो किसी को मिल जाए तो समझो एक तरह से डिकोस्टा का कच्चा चिट्ठा हाथ लग गया.”

मैंने तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया. सिर्फ़ उसकी बातों को सुनता रहा.

थोड़ी देर बाद शंकर उठता हुआ बोला,

“अच्छा.. चलता हूँ.. कोई और ख़िदमत हो तो याद करना.”

“हाँ.. ठीक है...”

“घर में सब कैसे हैं...?”

“ठीक ही हैं... चाचा तो दो हफ्ते के लिए बाहर गए हुए हैं... घर पर मैं और चाची ही हैं बस.”

चाची की बात करते ही मुझे पिछले तीन चार दिनों से मेरा उनके साथ लगातार हो रहे संसर्ग याद आ गए..

“ओके.. अच्छे से रहना... निकलता हूँ अब.”

“हम्म.. ओके. टेक केयर.”

शंकर के जाने के बीस मिनट बाद मैं भी वहाँ से निकल कर सीधे घर पहुँचा.

और वहाँ से बगल में ही स्थित अपने इंस्टिट्यूट में गया.

वहाँ मेरे एक स्टाफ़ ने बताया कि किसी मोना नाम की लड़की का पिछले आधे घंटे में तीन बार फ़ोन आ चुका है और कहा है की मैं इंस्टिट्यूट आते ही उसे फ़ोन करूँ.

मैंने तुरंत मोना को फ़ोन लगाया.. उसने कहा की कुछ ज़रूरी बात करनी है इसलिए मैं फ़ौरन इंस्टिट्यूट से निकलूँ और हम लोगों के पसंदीदा कैफ़े में पहुँचू जल्द से जल्द..

उठ कर निकलने ही वाला था कि फ़ोन फ़िर घनघना उठा..

रिसीवर उठाया.. गोविंद था दूसरी ओर.

उसे भी कुछ इम्पोर्टेन्ट बात करनी है .. कहा की मिलना ज़रूरी है..

मैंने उसे उसी कैफ़े का नाम और एड्रेस दिया और जल्द पहुँचने को बोल कर वहाँ से निकल गया.

------

कैफ़े में बने एक अलग केबिन में मैं कॉफ़ी और सिगरेट लिए था और मोना एक कोल्डड्रिंक बोतल लिए बैठे थी..

५ मिनट पहले ही मैंने उसे कबाड़ीवाले, रद्दी कागज़, अख़बार और उस रात घटी घटनाओं के बारे में सब खुल कर बताया ... पर नकली ड्रग्स और हथियार के बारे में कुछ नहीं बताया.

अगले कुछ मिनटों तक वो कोल्ड ड्रिंक पीती रही और मैं भी धुआँ उड़ाता रहा.

फ़िर एकाएक पूछी,

“तुम्हें क्या सच में ऐसा लगता है कि तुम उस आवाज़ को पहचानते हो?”

“हाँ .. बिल्कुल.”

“कैसे भला..”

“क्योंकि उस आवाज़ को मैं हमेशा ही सुनता रहता हूँ.”

ये वाक्य बोलते बोलते मैं एकदम से सीरियस हो गया.. आँखें और और भवें सिकुड़ कर ऐसे हो गए जैसे कुछ सोच रहा हूँ और जो कुछ भी मैं सोच रहा हूँ ; उसपे मेरा पूरा भरोसा है.

मेरे इस तरह के गोल मोल बातों से मोना थोड़ा खीझ उठी,

“ओफ़्फ़ो... अरे साफ़ साफ़ बोलो न की अगर तुम उसे जानते या पहचानते हो तो आखिर वो है कौन?”

“दीप्ति!”

“अं..? क..कौन....?”

“दीप्ति..”

“कौन दीप्ति...”

मैं धीरे से मुस्कराया... मोना की ओर देखा और धीरे से ही पूछा,

“तुम नहीं जानती??”

मोना मेरी ओर विस्मय से अपलक देखती रही.. मुँह खुला ही रह गया.. पलकें झपकाना जैसे भूल ही गई..

बड़ी मुश्किल से उसके गले से आवाज़ निकली,

“स.. सच....?”

“हाँ.. सच...”

“कोई मजाक तो नहीं ना?”

“बिल्कुल नहीं.”

“ओह माई गॉड!! ... आई कैन नॉट बिलीव दिस..!!”

खुद को कुर्सी पर फैला कर पसरते हुए बोला,

”या.. मी टू.”

“आर यू श्योर??!!!... व ... वो .... नहीं नहीं... तुमसे कोई बहुत बड़ी गलती हो रही है.. ये वो नहीं हो सकती यार..”

“विश्वास करना बहुत ही कठिन है ये मैं जानता हूँ.. पर जो सच है उसे मैं बदल तो नहीं सकता न...”

मोना अपने सिर पर हाथ रख टेबल से कोहनी टिका कर बैठ गई..

अविश्वास और आश्चर्य से उसकी आँखें अभी भी बाहर की ओर निकली जा रही थीं.

तभी गोविंद केबिन में घुसा.

मैंने पहले ही काउंटर/रिसेप्शन में बोल रखा था की अगर कोई मुझे यानि अभय को खोजता हुआ आए तो उसे प्लीज़ मेरे केबिन में भेज दे.

गोविंद के साथ ही उस कैफ़े में काम करने वाला एक लड़का भी आया था.. इस बात को जाँच लेने की ये मुझे ही ढूँढ रहा था.

मेरे सिर हिला का सहमति देते ही वह लड़का वहाँ से चला गया.

गोविंद मेरे सामने की एक कुर्सी पर बैठ गया ... बैठते हुए आश्चर्य से मोना की ओर देखा और फ़िर मेरी ओर.

“मेरी पहचान की है..तुम बोलो.. क्यों मिलना चाह रहे थे.?”

“अम्म... कुछ.. कहना है.. “

“क्या कहना है..?”

गोविंद मोना की ओर देखा.. मानो समझ नहीं पा रहा हो कि इसके सामने कहना ठीक होगा या नहीं..

“कोई दिक्कत नहीं.. तुम इसके सामने बेहिचक सब कुछ कह सकते हो.”

मेरे इतना कहते ही गोविंद; बन्दूक की नली से निकली गोली की तरह बोल पड़ा,

“पुलिस को एक ख़ास बात पता चली है... पर पूरी तरह नहीं....”

बोलते बोलते वो हांफने लगा इसलिए उसे बीच में ही रोकते हुए पानी दिया.

पानी पिया.. थोड़ा शांत हुआ वो.

थोड़ा रुक कर बोलना शुरू किया उसने,

“पुलिस को ये बात पता चली है कि शहर में दो ख़ास जगह अवैध हथियारों और ड्रग्स की नई खेप आई है.. भारी मात्रा में.. और हाल फिलहाल नहीं तो भी कुछ दिनों या महीनों के अंदर शायद इस शहर में कुछ बड़ा होने वाला है. इन्हीं हथियारों में कुछ बम इतने ख़तरनाक हैं की उनमें से अगर दस भी फट जाएँ... शहर के अलग अलग जगहों में तो पूरा शहर पलक झपकते ही राख के ढेर में बदल सकता है.”

“हम्म.. ये तो वाकई बहुत परेशान और चिंता करने वाली बात है....”

“हाँ है तो सही.. पूरा पुलिस महकमे में इसी एक बात से हड़कंप मचा हुआ है. अगले दो तीन दिनों के अंदर अंदर ही पूरे शहर भर में तलाशी ली जाएगी. कोना कोना छाना जाएगा.”

“ह्म्म्म.. ठीक है... और दूसरी बात..?”

“कौन सी दूसरी बात?”

“तुमने आते ही कहा था न कि पुलिस को एक ख़ास बात पता चली है... पर पूरी तरह नहीं ... क्या पता नहीं चला है उन्हें पूरी तरह..?”

“ओह हाँ... वो ... पुलिस को अवैध हथियारों के बारे में तो पता चल गया है.. ये भी पता चला है की ऐसे अवैध माल दो जगहों पर मौजूद हैं... पर हैं कहाँ... ये पता नहीं चल पाया है... और इसलिए शायद पुलिस दो तीन दिन का टाइम ले रही है.”

“पुलिस अपनी जगह सही है.. पर मुझे कुछ और पता चला है और ख़बर पूरी तरह से सही है.”

“कैसी ख़बर?”

मैंने गोविंद को भी उस दुकान / गोदाम के बारे में सब कह सुनाया पर कुछ परिवर्तनों के साथ.. परिवर्तन बस इतना ही था की :-

पहला, उस दुकान की गतिविधियाँ संदिग्ध हैं और अवैध हथियारों की खेप अभी तक आया नहीं हैं ... वो आएगा आज से एक सप्ताह के बाद.

दूसरा, उस दरजी वाले दुकान के ऊपरी मंजिल पर अवैध हथियारों के कई खेप का आना जाना पिछले ५ महीनों से चल रहा है.

तीसरा, हमारे ही पुलिस थाने में माफ़िया डिकोस्टा से संबंधित एक फ़ाइल है जिसमें उसके बहुत से काले कारनामों और उसके पिछले कुछ सालों में पकड़ाए अवैध माल और उनसे संबंधित लेन – देन का पूरा ब्यौरा है. अगर उस फ़ाइल को स्टडी किया जाए तो डिकोस्टा के बारे में हमें या पुलिस को गौर करने लायक कुछ मिल सकता है.

जैसे मैंने शंकर की बातें सुनने के बाद तुरंत ही कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया था.. वैसे ही मेरी बातें सुनने के बाद गोविंद और मोना में से किसी ने भी तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया. पर एक बात मैंने नोटिस की और उसी से तनिक अचंभित भी हुआ.

हम तीनों के लिए ही एक एक बोतल कोल्डड्रिंक मँगवाया..

कोल्डड्रिंक पीते पीते ही मैंने अचानक ऐसा कुछ कहा की मोना और गोविंद; दोनों के ही होश उड़ गए.

साफ़ था, दोनों ने ही ऐसा कुछ एक्स्पेक्ट नहीं किया था.

“मोना.. गोविंद.. अब मैं जो बात कहने जा रहा हूँ.. उसे अच्छे से सुनो.. कान से सुनो और दिमाग में बैठा लो. एक सप्ताह बाद जब वो हथियारों का माल आएगा... तब उसके दो दिन बाद ही हमें वहाँ से उन हथियारों को हटाना होगा. किसी भी कीमत पर वे हथियार उन लोगों के किसी भी काम में नहीं आने चाहिए.”

गोविंद घबरा उठा.. हकलाते हुए कहा,

“म...म...मतलब...”

“मतलब की हमें माल गायब करना होगा.” मैंने निर्णायक स्वर में कहा.

“ठीक है.. पर होगा कैसे.. कोई तरकीब सोची है तुमने?” मोना पूछी.

मेरे कहने से पहले गोविंद बोल उठा,

“पर हम पुलिस को भी तो इन्फॉर्म कर सकते हैं...और क्या पता तुम्हारा ये तरकीब काम करेगा या नहीं?”

“हाँ .. तरकीब काम भी ज़रूर करेगा. पुलिस को बिना बताए करना होगा.. अगर बता दिया तो बहुत बड़ा रिस्क हो जाएगा... कैसे बताएँगे कि हमें ऐसी ख़बरें कहाँ से या कैसे मिली... मेरा ये तरकीब काम तो ज़रूर करेगा पर यहाँ थोड़ा खतरा है. हमें दो अलग दिन दो जगहों से दो चीज़ें गायब करनी है... एक तो हथियारों का वो माल और दूसरा................”

धीरे धीरे मैं दोनों को अपना प्लान समझाने लगा.

समझाते हुए मैंने देखा की गोविंद जहाँ घबरा रहा था.. मोना उतनी ही दृढ़ता से मेरी बातों को सुन व समझ रही थी.

करीब आधे घंटे के बाद प्लान समझाने के साथ साथ कोल्ड ड्रिंक भी ख़त्म हुआ.... इतनी देर में दो राउंड और कोल्ड ड्रिंक मंगवा लिया था मैंने.

अपने हिस्से की कोल्डड्रिंक खत्म करता हुआ गोविंद उठा,

“अच्छा, अब मैं चलता हूँ.. कुछ और भी काम हैं..”

“क्या काम है?”

“घर के ही काम हैं.”

“प्लान से संबंधित कुछ पूछना है?” मैंने दोनों की ओर देखा... दोनों ने ही ना में सिर हिलाया.. तब मैं गोविंद की ओर देखता हुआ बोला,

“अच्छा ठीक है.. तुम जाओ... पर जब कॉल करूँ तो मिलना...”

“हाँ .. बिल्कुल..”

चेहरे पर हंसी लिए गोविंद वहाँ से निकल गया.. मैं ऐसी हंसी को बहुत अच्छे से पहचानता हूँ.. बनावटी हंसी थी वो.. हँस कर कुछ छुपाने की कोशिश करना चाह रहा था. जाने से पहले कोल्डड्रिंक के पैसे देना चाहा पर मेरे मना करने पर सीधे ही निकल लिया.

मैं उठ कर केबिन से बाहर निकला और कैफ़े के मेन दरवाज़े; जो मोटे लकड़ियों से बना हुआ था...उसका ओट ले कर सामने... बाहर सड़क को पार कर दूसरी तरफ़ जाते गोविंद को देखने लगा..

गोविंद सड़क पार कर सामने के कई दुकानों में से एक के बाजू में गया.. वहाँ एक पीसीओ है.. लाल रंग का.. उसके सामने पहुँचा.. दरवाज़ा खोला.. एक कदम अंदर रखा... तनिक रुका... लगा की जैसे कुछ सोच रहा है... फ़िर पलट कर कैफ़े की ओर देखा... मैं तुरंत दरवाज़े की ओट में पूरी तरह आ गया.. दो मिनट रुक कर सिर को ज़रा सा बाहर निकालते हुए सड़क के उस पार देखा.. पीसीओ बंद था.. अंदर कोई नहीं था.. आश्चर्य.. कहाँ गया...

कैफ़े से बाहर निकल कर स्कूटर की ओर गया... उसको बस ऐसे ही इधर उधर देखते हुए चोर नज़रों से सड़क के दोनों ओर देखा.. गोविंद कहीं नहीं दिखा.

वापस कैफ़े में घुसा और केबिन की ओर बढ़ा..

केबिन के पास पहुँच कर अंदर घुसने ही वाला था कि मुझे याद आया,

‘जब गोविंद मुझे बता रहा था की पुलिस को शहर में दो जगह अवैध हथियारों का जखीरा होने का पता चला है और जब मैं भी उसे दो जगहों का पता बता रहा था तब मोना के चेहरे पर बेचैनी वाले भाव उभर आए थे.. और जैसे ही मैंने यह कहा कि थाने में डिकोस्टा से संबंधित फ़ाइल है जो उसका पूरा कच्चा चिट्ठा खोल सकते हैं तो उस समय मोना की आँखों में एक चमक थी.... मेरे प्लान को सुनते समझते हुए गोविंद जितना घबरा रहा था ; मोना लेकिन उतनी ही तत्पर और दृढ़ दिख रही थी.’

चक्कर क्या है....

------
Reply
09-12-2020, 01:07 PM,
#49
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
इधर,

पुलिस हेडक्वार्टर में,

इंस्पेक्टर दत्ता पुलिस कमिश्नर निरंजन बोस के कमरे में उनके ठीक सामने बैठा हुआ था..

“बोलो दत्ता, क्या कह रहे थे?”

“सर, हमें ख़बर मिली है शहर के दो ऐसी जगहों पर अवैध हथियारों का जखीरा है जहाँ अमूमन आम या ख़ास, किसी का भी जल्द नज़र जाना संभव नहीं है. सही से बता पाना भी अभी संभव नहीं है कि उन हथियारों में क्या क्या और किस किस्म के गोला बारूद और गन हैं.. पर इतना ज़रूर है कि इनसे इस शहर में तबाही आसानी से लाई जा सकती है.....स”

दत्ता की बात को बीच में ही काटते हुए कमिश्नर बोला,

“वन मिनट दत्ता... हमारा शहर बहुत बड़ा नहीं है.. मतलब ये कोई महानगर नहीं है.. पर इतना भी छोटा नहीं है की एक या दो दिन में ही छापा मार कर उन हथियारों को कहीं से भी बरामद कर लिया जाए. जो कुछ भी करना है; जल्द से जल्द और बहुत होशियारी से करना है. कहीं ऐसा न हो की हमने रेड डालने शुरू किए और उन लोगों ने या तो हथियारों को ठिकाने लगा दिया या फ़िर समय से पहले ही इस शहर में कोई बहुत बड़े दुर्घटना को अंजाम दे दिया. समझे?”

“जी सर, मैं समझ गया.. उन हथियारों का और उनसे संबंधित लोगों का पकड़ा जाना वाकई बहुत ज़रूरी है क्योंकि शायद तभी हमें डिकोस्टा के बारे में भी कोई महत्वपूर्ण सूचना मिले..”

डिकोस्टा नाम सुनते ही जैसे कमिश्नर को सांप सूँघ गया.

तुरंत ही अपनी कुर्सी पर सीधा होता हुआ बोला,

“व्हाट?! क्या नाम लिया तुमने अभी.. डिकोस्टा??!!”

“यस सर, दैट इनफेमस मोस्ट वांटेड टेररिस्ट... अंडरवर्ल्ड माफ़िया.. ‘डिकोस्टा’ ... देश के कई बड़े शहरों व नगरों में अपना नेटवर्क फ़ैलाने के बाद उसकी बुरी नज़र अब हमारे इस शांत शहर की ओर है. वो यहाँ क्या करने वाला है ये तो सही सही नहीं कहा जा सकता फ़िलहाल ... पर इतना तो तय है कि उसके इरादे ठीक तो बिल्कुल नहीं है.”

“दत्ता... अगर वह हमारे शहर की ओर नज़र लगाने की कोशिश कर रहा है तो हम भी पूरी मुस्तैदी से उसकी यह नज़र उतारने की कोशिश करेंगे. इन फैक्ट, कोशिश नहीं .. करना ही होगा. हंड्रेड परसेंट रिजल्ट के साथ. क्लियर?”

“यस सर.”

“नाउ यू मे लीव.. नेक्स्ट टाइम आई एक्स्पेक्ट यू टू रिपोर्ट मी विथ सम पॉजिटिव न्यूज़.”

दत्ता कुर्सी से उठ कर सैल्यूट मारता हुआ बोला,

“यस सर. ऐसा ही होगा.”

“हम्म. जय हिन्द.”

“जय हिन्द सर.”

हेडक्वार्टर से निकल कर दत्ता जीप चलाते हुए सीधे अपने थाने पहुँचा.

अपनी कुर्सी पर बैठते हुए टेबल पर रखे घंटी को बजाया.

संतरी गिरधर तुरंत उपस्थित हुआ.

“गिरधर... एक ग्लास पानी लाना.. प्यास से मरा जा रहा हूँ.”

“यस सर.”

मुड़ कर तेज़ी से बाहर गया और फ़ौरन ही एक ग्लास पानी के साथ अंदर आया गिरधर.

ग्लास थमाने के बाद वहीँ खड़ा रहा वो.

दो घूँट पानी पी कर दत्ता उसकी ओर देखते हुए पूछा,

“क्या बात है गिरधर... कुछ कहना है?”

“जी सर.. एक लड़के का बार बार फ़ोन आ रहा था.. आपको ढूँढ रहा था.. मैंने कहा भी की अगर कोई बहुत ज़रूरी बात है तो मुझे बता सकता है पर वो माना नहीं. अभी कुछ देर पहले भी उसका फ़ोन आया था. तब मैंने कह दिया की एक घंटे बाद करे .. तो उसने आधे घंटे बाद फ़िर फ़ोन करने की बात कह कर फ़ोन काट दिया.”

“ओह.. कोई नाम वाम बताया उसने अपना?” पानी पीते हुए दत्ता ने पूछा.

“जी सर... गोविंद... गोविंद नाम बताया था उसने अपना.”

गोविंद नाम सुनते ही दत्ता एकदम से चौंक उठा.

कुछ बोलता या सोचता.. की तभी उसके टेबल पर रखा फ़ोन घनघना उठा.

लपक कर फ़ोन उठाया दत्ता ने..

“हैलो..” कहते हुए दत्ता ने हाथ के इशारे से गिरधर को जाने को कहा.

“हैलो ... दत्ता सर?”

“हाँ बोल रहा हूँ.. आप कौन?”

“सर... मैं ... मैं ... गोविंद..”

“हाँ गोविंद .. बोलो.. क्या बात है?”

“सर........”

उधर से गोविंद ज्यों ज्यों कुछ बोलता गया .. त्यों त्यों कभी दत्ता की पेशानियों में बल पड़े तो कभी बड़ी सी मुस्कान उनके चेहरे पर छा गई.

अंत में,

‘गुड.. वैरी गुड’ बोल कर दत्ता ने रिसीवर क्रेडल पर रखा और चेयर से पीठ टिका कर आराम से बैठते – मुस्कुराते हुए कुछ सोचने लगा.

दूसरी ओर,

रात के दस बजे,

अपने घर की छत पर खड़ा मैं दूर क्षितिज की ओर देखता हुआ सिगरेट सुलगा रहा था... एक साथ दिमाग में कई नाम और चेहरे आ और जा रहे थे. साथ ही अपने बनाए प्लान पर कुछ से कुछ सोच रहा था....

वहीँ,

शहर में ही एक बड़े से बिल्डिंग में... अपने आलिशान कमरे में .... सिल्क गाउन में.. अपने बिस्तर पर पसर कर टाँगें फैलाए, हाथों में ब्रैंडी की ग्लास लिए ... उससे थोड़ा थोड़ा सिप लेती मोना के दिमाग में भी कुछ चल रहा था...

पूरा परिदृश्य ही मानो..

एक फ्रेम में आ गया हो... और उस फ्रेम के तीन भाग हो गए हों... बाएँ वाले भाग में .. थाने में अपने कमरे में .. चेयर में बैठा दत्ता.. दाएँ वाले में भाग में थोड़ा थोड़ा कर के ब्रैंडी पीती मोना ... और बीच वाले भाग में .. मैं.... छत पर खड़ा.. धुआँ उड़ाता हुआ...

तीनों के ही दिमाग में कुछ बन पक रहा था.. तीनों ही जैसे अपने अपने दिमाग में कोई प्लान.. कोई जाल बुन रहे थे..

या तो तीनों के बनाए प्लान ... जाल ... में से कोई एक सफ़ल होगा...

या फ़िर तीनों ही सफ़ल होंगे...

या फ़िर,

शायद बने कोई.... अद्भुत जाल....!

क्रमशः

***************************
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09-12-2020, 01:08 PM,
#50
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
Shy
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