Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे
01-17-2019, 01:47 PM,
#21
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
लाइन अब मंदिर की छत के नीचे थी. हम उस लंबी लाइन में लग गये. यहाँ पर जगह कम थी. एक पतले गलियारे में औरत और आदमी एक ही लंबी लाइन में खड़े थे. वो लोग बहुत देर से लाइन में खड़े थे इसलिए थके हुए , उनींदे से लग रहे थे. मेरे आगे छोटू लगा हुआ था और पांडेजी पीछे खड़ा था. उस छोटी जगह में भीड़भाड़ की वजह से दोनों से मेरा बदन छू जा रहा था.

पांडेजी मुझसे लंबा था और ठीक मेरे पीछे खड़ा था. मुझे ऐसा लगा की वो मेरे ब्लाउज में झाँकने की कोशिश कर रहा है. लाइन में लगने के दौरान मेरा पल्लू थोड़ा खिसक गया था इससे मेरी गोरी छाती का ऊपरी हिस्सा दिख रहा था. मैंने पूजा की बड़ी थाली दोनों हाथों से पकड़ रखी थी तो मैं पल्लू ठीक नही कर पाई और पांडेजी की तांकझांक को रोक ना सकी.

तभी एक पंडा एक कटोरे में कुमकुम लेकर आया और मेरे माथे में कुमकुम का टीका लगा गया.

लाइन में धक्कामुक्की हो रही थी . पांडेजी इसका फायदा उठाकर मुझे पीछे से दबा दे रहा था. मेरा पल्लू भी अब कंधे से सरक गया था और कुछ हिस्सा बाँह में आ गया था. मेरे ब्लाउज का ऊपरी हिस्सा अब पल्लू से ढका नही था. मेरी बड़ी चूचियों का ऊपरी हिस्सा पांडेजी को साफ दिखाई दे रहा था. मुझे पूरा यकीन है की उसे ये नज़ारा देखकर बहुत मज़ा आ रहा होगा. 

मुझे कुछ ना कहते देख , पांडेजी की हिम्मत बढ़ गयी. पहले तो जब लाइन में धक्के लग रहे थे तब पांडेजी मुझे पीछे से दबा रहा था पर अब तो वो बिना धक्का लगे भी ऐसा कर रहा था. मेरे बड़े मुलायम नितंबों में वो अपना लंड चुभा रहा था. कुछ देर बाद वो अपनी जाँघों के ऊपरी भाग को मेरी बड़ी गांड पर ऊपर नीचे घुमाने लगा. मैं घबरा गयी और इधर उधर देखने लगी की कोई हमें देख तो नही रहा. पर उस पतले गलियारे में अगल बगल कोई ना होने से सिर्फ़ पीछे से ही किसी की नज़र पड़ सकती थी. सभी लोग दर्शन के लिए अपनी बारी आने की चिंता में थे. मेरे आगे खड़ा छोटू कोई गाना गुनगुना रहा था , उसे कोई मतलब नही था की उसके पीछे क्या चल रहा है.

पांडेजी – मैडम, आज बहुत भीड़ है. दर्शन में समय लगेगा.

“कर ही क्या सकते हैं. कम से कम धूप में तो नही खड़ा होना पड़ रहा है. यहाँ गलियारे में कुछ तो राहत है.”

पांडेजी – हाँ मैडम ये तो है.

लाइन बहुत धीरे धीरे आगे खिसक रही थी. और अब हम जहाँ पर खड़े थे वहाँ पतले गलियारे में दोनों तरफ दीवार होने से रोशनी कम थी और लाइट का भी कोई इंतज़ाम नही था. पांडेजी ने इसका फायदा उठाने में कोई देर नही लगाई. पांडेजी का चेहरा मेरे कंधे के पास था मेरे बालों से लगभग चिपका हुआ. उसकी साँसें मुझे अपने कान के पास महसूस हो रही थी. खुशकिस्मती से मेरे ब्लाउज की पीठ में गहरा कट नही था इससे मेरी पीठ ज़्यादा एक्सपोज़ नही हो रही थी. एक पल को मुझे लगा की पांडेजी की ठुड्डी मेरे कंधे पर छू रही है. उसी समय छोटू ने भी मुझे आगे से धक्का दिया. मुझे अपनी थाली गिरने से बचाने के लिए थोड़ी ऊपर उठानी पड़ी.

छोटू – सॉरी मैडम, आगे से धक्का लग रहा है.

“कोई बात नही. अब मुझे इसकी कुछ आदत हो गयी है.”

अब छोटू मुझे पीछे को दबाने लगा और उन दोनों के बीच मेरी हालत सैंडविच जैसी हो गयी. फिर पांडेजी ने मेरे सुडौल नितंबों पर हाथ रख दिया. उसने शायद मेरा रिएक्शन देखने के लिए कुछ पल तक अपने हाथ को बिना हिलाए वहीं पर रखा. औरत की स्वाभाविक शरम से मैंने थोड़ा खिसकने की कोशिश की पर आगे से छोटू पीछे को दबा रहा था तो मेरे लिए खिसकने को जगह ही नही थी. कुछ ही पल बाद पांडेजी के हाथ की पकड़ मजबूत हो गयी. वो मेरे नितंबों की सुडौलता और उनकी गोलाई का अंदाज़ा करने लगा. मेरी साड़ी के बाहर से ही उसको मेरे नितंबों की गोलाई का अंदाज़ा हो रहा था. उसकी अँगुलियाँ मेरे नितंबों पर घूमने लगी और जब भी पीछे से धक्का आता तो वो नितंबों को हाथों से दबा देता.

अचानक छोटू मेरी तरफ मुड़ा और फुसफुसाया.

छोटू – मैडम, ये जो आदमी मेरे आगे खड़ा है , इससे पसीने की बहुत बदबू आ रही है. मेरा मुँह इसकी कांख के पास पहुँच रहा है . मुझसे अब सहन नही हो रहा.

मैं उसकी बात पर मुस्कुरायी और उसको दिलासा दी.

“ठीक है. तुम ऐसा करो मेरी तरफ मुँह कर लो और ऐसे ही खड़े रहो. इससे तुम्हें उसके पसीने की बदबू नही आएगी.” 

छोटू मेरी बात मान गया और मेरी तरफ मुँह करके खड़ा हो गया. पर इससे मेरे लिए परेशानी बढ़ गयी. क्यूंकी छोटू की हाइट कम थी तो उसका मुँह ठीक मेरी तनी हुई चूचियों के सामने पहुँच रहा था. पीछे से पांडेजी मुझे सांस भी नही लेने दे रहा था. अब वो दोनों हाथों से मेरे नितंबों को मसल रहा था. एक बार उसने बहुत ज़ोर से मेरे मांसल नितंबों को निचोड़ दिया. मेरे मुँह से ‘आउच’ निकल गया.

छोटू – क्या हुआ मैडम ?

“वो…..वो …..कुछ नही.. …लाइन में बहुत धक्कामुक्की हो रही है.”

छोटू ने सहमति में सर हिला दिया. उसके सर हिलाने से उसकी नाक मेरी बायीं चूची से छू गयी. अब आगे से धक्का आता तो उसकी नाक मेरी चूची पर छू जाती. मैंने हाथ ऊँचे करके पूजा की थाली पकड़ रखी थी ताकि धक्के लगने से गिरे नही तो मैं अपना बचाव भी नही कर पा रही थी. छोटू को शायद पता नही चल रहा होगा पर उसकी नाक मेरे ब्लाउज के अंदर चूची के निप्पल पर छू जा रही थी. मेरे पति ने कभी भी ऐसे अपनी नाक से मेरे निप्पल को नही दबाया था. छोटू के ऐसा करने से मैं उत्तेजित होने लगी. मेरे निप्पल एकदम से तन गये. शायद पांडेजी के नितंबों को दबाने से भी ज़्यादा मुझे छोटू की ये हरकत उत्तेजित कर दे रही थी.

पांडेजी मेरे नितंबों को दबाकर अब संतुष्ट हो गया लगता था. उसकी अँगुलियाँ साड़ी के बाहर से मेरी पैंटी के सिरों को ढूंढने लगी. मेरे नितंबों पर उसको पैंटी मिल नही रही थी क्यूंकी वो तो हमेशा की तरह सिकुड़कर बीच की दरार में आ गयी थी. पर उसकी घूमती अंगुलियों से मेरी चूत पूरी गीली हो गयी. अब पांडेजी मेरे नितंबों के बीच की दरार में अँगुलियाँ घुमा रहा था और आख़िरकार उसको पैंटी के सिरे मिल ही गये. वो दो अंगुलियों से पकड़कर पैंटी के सिरों को दरार से उठाने की कोशिश करने लगा. उसकी इस हरकत से मैं बहुत उत्तेजित हो गयी. अब ऐसे कोई मर्द अँगुलियाँ फिराएगा तो कोई भी औरत उत्तेजना महसूस करेगी ही.

मैंने शरमाकर फिर से इधर उधर देखा पर किसी को देखते हुए ना पाकर थोड़ी राहत महसूस की. वहाँ पर थोड़ी रोशनी भी कम थी तो ये भी राहत वाली बात थी. आगे से छोटू को धक्के लगे तो सहारे के लिए उसने मेरी कमर पकड़ ली. दो तीन बार ज़ोर से उसका मुँह मेरी चूचियों पर दब गया. उसने माफी मांगी और मेरी चूचियों से मुँह दूर रखने की कोशिश करने लगा. पर मैं जल्दी ही समझ गयी की ये लड़का छोटू है बहुत बदमाश, सिर्फ़ नाम का छोटू है. क्यूंकी अब अपना मुँह तो उसने दूर कर लिया पर सहारे के लिए दोनों हाथों से मेरी कमर पकड़ ली , मेरे बदन को हाथों से छूने का मौका उसे मिल गया.

मुझे लगा आगे पीछे से इन दोनों की ऐसी हरकतों से जल्दी ही मुझे ओर्गास्म आ जाएगा. पर मुझे ये उत्सुकता भी हो रही थी की ये दोनों मेरे साथ किस हद तक जा सकते हैं , ख़ासकर ये छोटू. 

छोटू ने ब्लाउज और साड़ी के बीच की नंगी कमर पर अपने हाथ रखे थे. उसकी अँगुलियाँ और हथेली मुझे अपने बदन पर ठंडी महसूस हो रही थी क्यूंकी उसने अभी ठंडे पानी से नहाया था. कुछ देर तक उसने अपने हाथ नही हिलाए. फिर धीरे धीरे नीचे को खिसकाने लगा. अब उसके हाथ साड़ी जहाँ पर फोल्ड करते हैं वहाँ पर पहुँच गये. मेरी नंगी त्वचा पर उसके ठंडे हाथों के स्पर्श से मैं बहुत कमज़ोरी महसूस कर रही थी. मुझे ऐसा मन हो रहा था की थाली को फेंक दूं और छोटू का सर पकड़कर उसका मुँह अपनी चूचियों पर ज़ोर से दबा दूं.

पांडेजी को अच्छी तरह से पता था की मैं भले ही कोई रिएक्शन नही दे रही हूँ पर उसकी हरकतों से बेख़बर नही हूँ. उसकी अंगुलियों ने मेरी पैंटी के सिरों को पकड़ा , खींचा फिर खींचकर फैला दिया. अब वो इस खेल से बोर हो गया लगता था. कुछ देर तक उसके हाथ शांत रहे. मुझे लग रहा था अब ये कुछ और खेल शुरू करेगा और ठीक वैसा ही हुआ. सभी मर्दों की तरह अब वो मेरी रसीली चूचियों के पीछे पड़ गया. 

हम उस पतले गलियारे में दीवार का सहारा लेकर खड़े थे. मैंने महसूस किया की पांडेजी ने अपना दायां हाथ दीवार और मेरे बीच घुसा दिया और मेरी कांख को छू रहा है. मुझे बड़ी शरम आई क्यूंकी अभी तक तो जो हुआ उसे कोई नही देख रहा था पर अब अगर पांडेजी मेरी चूचियों को छूता है तो छोटू देख लेगा क्यूंकी छोटू मेरी तरफ मुँह किए था. मुझे कुछ करना होगा. लेकिन उन दोनों मर्दों के सामने मैं एक गुड़िया साबित हुई. उन दोनों ने मुझे कोई मौका ही नही दिया और उनकी बोल्डनेस देखकर मैं अवाक रह गयी.

अब लाइन जहाँ पर खिसक गयी थी वहाँ और भी अंधेरा था जिससे उन दोनों की हिम्मत और ज़्यादा बढ़ गयी. एक तरह से उन दोनों ने मुझ पर दोहरा आक्रमण कर दिया. छोटू अपने हाथ मेरी कमर से खिसकाते हुए साड़ी के फोल्ड पर ले आया था और अब एक झटके में उसने अपना दायां हाथ मेरी नाभि के पास लाकर साड़ी के अंदर डाल दिया. उसकी इस हरकत से मैं ऐसी भौंचक्की रह गयी की मेरी आवाज़ ही बंद हो गयी. क्या हो रहा है , ये समझने तक तो छोटू ने एक झटके में अपना हाथ साड़ी के अंदर घुसा दिया. उसकी इस हरकत से मैं उछल गयी और मेरी बाँहें और भी ऊपर उठ गयी. मेरी बाँह उठने का पांडेजी ने पूरा फायदा उठाया और मेरी कांख से अपना हाथ खिसकाकर मेरी दायीं चूची को ज़ोर से दबा दिया. 

“आआआअहह……..” मैं बुदबुदाई. पर मैं ज़ोर से आवाज़ नही निकाल सकती थी , मुझे अपनी आवाज़ दबानी पड़ी. क्यूंकी छोटू का हाथ मेरी साड़ी के अंदर था और पांडेजी का हाथ मेरे ब्लाउज के ऊपर था. अगर लोगों का ध्यान हमारी तरफ आकर्षित हो जाता तो मुझे बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ती.

अब तो मुझे कुछ करना ही था. भले ही वहाँ कुछ अंधेरा था पर हम अकेले तो नही थे. आगे पीछे सभी लोग थे. मुझे शरम और घबराहट महसूस हुई. मैंने दाएं हाथ में थाली पकड़ी और बाएं हाथ को अपनी नाभि के पास लायी और छोटू का हाथ साड़ी से बाहर खींचने की कोशिश करने लगी. मैं अपनी जगह पर खड़े खड़े कुलबुला रही थी और कोशिश कर रही थी की लोगों का ध्यान मेरी तरफ आकर्षित ना हो. लेकिन तभी छोटू ने नीचे को एक ज़ोर का झटका दिया और मैं एक मूर्ति के जैसे जड़वत हो गयी. शर्मिंदगी से मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और मेरे दाँत भींच गये . मैं बहुत असहाय महसूस कर रही थी . हालाँकि बहुत कामोत्तेजित हो गयी थी.

छोटू का हाथ मेरी साड़ी में अंदर घुस गया था और अब मेरी चूत के ऊपरी हिस्से को पैंटी के ऊपर से छू रहा था. उस अंधेरे गलियारे में वो लड़का छोटू मेरे सामने खड़े होकर करीब करीब मेरा रेप कर दे रहा था. अब वो अपना हाथ मेरी पैंटी के ऊपर नीचे करने लगा. कुछ पल तक मेरी आँखें बंद रही और मेरे दाँत भिंचे रहे. उसके माहिर तरीके से हाथ घुमाने से मुझे ऐसा लगा की छोटू शायद पहले भी कुछ औरतों के साथ ऐसा कर चुका है. ज़रूर वो इस बात को जानता होगा की अगर तुम्हारा हाथ किसी औरत की चूत के पास पहुँच जाए तो फिर वो कोई बखेड़ा नही करेगी. 

पांडेजी का हाथ मेरी दायीं चूची को कभी मसल रहा था , कभी दबा रहा था , कभी उसका साइज़ नापने की कोशिश कर रहा था , कभी निप्पल को ढूंढ रहा था. अब मैं पूरी तरह से कामोत्तेजित होकर गुरुजी के दिए पैड को चूतरस से भिगो रही थी. 

अब मुझे अपनी आँखें खोलनी ही थी. मैं ऐसे कैसे लाइन में खड़ी रह सकती थी ये कोई मेरा बेडरूम थोड़ी था यहाँ और लोग भी तो थे. मैं कमजोर से कमजोर होते जा रही थी. थाली पर भी मेरी पकड़ कमजोर हो गयी थी , मैं तो ठीक से खड़ी भी नही हो पा रही थी. ये दो मर्द मेरी जवानी को ऑक्टोपस के जैसे जकड़े हुए थे. पांडेजी मेरी गोल गांड पर हल्के से धक्के लगा रहा था जैसे मुझे पीछे से चोद रहा हो. मैं इतनी कमज़ोर महसूस कर रही थी की विरोध करने लायक हालत में भी नही थी. और सच बताऊँ तो उन दोनों मर्दों के मेरे बदन को मसलने से मुझे जो आनंद मिल रहा था उसे मैं बयान नही कर सकती. मैं चुपचाप खड़ी रही और छोटू के हाथ का अपनी पैंटी पर छूना, पांडेजी के मेरे भारी नितंबों पर धक्के और मेरी दायीं चूची पर उसका मसलना महसूस करती रही. सहारे के लिए मैं पीछे पांडेजी के ऊपर ढल गयी थी.

छोटू अब मेरी पैंटी के कोनो से झांट के बालों को छू रहा था. आज तक मेरे पति के अलावा किसी ने वहाँ नही छुआ था. मैं कामोन्माद में तड़पने लगी. वो तो खुश-किस्मती थी की मेरे पेटीकोट का नाड़ा कस के बँधा हुआ था और अब उसका हाथ और नीचे नही जा पा रहा था क्यूंकी हथेली का अंतिम हिस्सा मोटा होता है तो वहाँ पर उसका हाथ पेटीकोट के टाइट नाड़े में अड़ गया था. मेरी चूत से बहुत रस बह रहा था और कमज़ोरी से सहारे के लिए मेरा सर पांडेजी की छाती से टिक गया था. मुझे मालूम था की मेरे ऐसे सर टिकाने से मैं उन्हें और भी मनमानी की खुली छूट दे रही हूँ पर मैं बहुत कमज़ोरी महसूस कर रही थी. पांडेजी तो इससे बहुत उत्साहित हो गया क्यूंकी उसे मालूम पड़ गया था की उनकी हरकतों से मुझे बहुत मज़ा आ रहा है.

अब पांडेजी अपने बाएं हाथ से मेरे नितंबों को दबाने लगा और दायां हाथ तो पहले से ही मेरी दायीं चूची और निप्पल को निचोड़ रहा था. मेरे निप्पल भी अब अंगूर के दाने जितने बड़े हो गये थे. पता नही पांडेजी के पीछे खड़े आदमी को ये सब दिख रहा होगा या नही. भले ही वहाँ थोड़ा अंधेरा था पर उसकी खुलेआम की गयी हरकत किसी ने देखी या नही मुझे नही मालूम. अब लाइन गलियारे के अंतिम छोर पर थी और यहाँ दिन में भी बहुत अंधेरा था. हवा आने जाने के लिए कोई खिड़की भी नही थी वहाँ पर. कुछ फीट की दूरी पर एक दरवाज़ा था जो मैं समझ गयी की मंदिर के गर्भ ग्रह का था. उसे देखकर मैंने अपनी भावनाओं पर काबू पाने की कोशिश की पर मैं ऐसा ना कर सकी. मैं इतनी कामोत्तेजित हो चुकी थी की मेरा ध्यान कहीं और लग ही नही पा रहा था. सिर्फ़ अपने बदन को मसलने से मिलते आनंद पर ही मेरा ध्यान था.

छोटू जल्दी ही समझ गया की अब उसका हाथ और नीचे नही जा पा रहा तो उसने मेरी साड़ी के अंदर से हाथ बाहर निकाल लिया. ये मेरे लिए बहुत ही राहत की बात थी.
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01-17-2019, 01:47 PM,
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छोटू जल्दी ही समझ गया की अब उसका हाथ और नीचे नहीं जा पा रहा तो उसने मेरी साड़ी के अंदर से हाथ बाहर निकाल लिया. ये मेरे लिए बहुत ही राहत की बात थी. लेकिन अब उसका इरादा कुछ और था. वो थोड़ा झुका और मेरी साड़ी के निचले सिरों को पकड़कर मेरी टाँगों के ऊपर साड़ी खिसकाने लगा. मैं उसको रोक नहीं पायी क्यूंकी उस लड़के की बदमाशी से मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. बिना समय लगाए छोटू ने मेरे घुटनों तक साड़ी ऊपर खिसका दी और एक अनुभवी मर्द की तरह मेरी मांसल जांघों को अपने हाथों से मसलने लगा.

पांडेजी भी मौके का फायदा उठाने में पीछे नहीं रहा. उसने तुरंत अपना बायां हाथ मेरी जाँघ में रख दिया और वो मेरी साड़ी को कमर तक उठाने की जल्दी में था. पांडेजी थोड़ा बायीं तरफ खिसक गया ताकि पीछे से किसी की नज़र मेरी नंगी टाँगों पर ना पड़े. बाहर से कोई देखे तो उसे मेरी साड़ी नॉर्मल दिखती पर अगर ध्यान से देखे तो मेरी साड़ी ऊपर उठी हुई दिखती. साड़ी के अंदर उन दोनों मर्दों के हाथ मेरी जांघों पर थे. मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी की ऐसी हालत में एक मंदिर में खड़ी होऊँगी और दो अंजाने मर्द मेरी टाँगों पर ऐसे हाथ फिराएँगे.

पांडेजी ने ज़बरदस्ती मेरी साड़ी और पेटीकोट को कमर तक उठा दिया. मेरी टाँगें और जाँघें पूरी नंगी हो गयीं.

“आउच…...प्लीज़ मत करो.”

मैं धीरे से बुदबुदाई ताकि कोई और ना सुन ले.

पांडेजी शायद बहुत उत्तेजित हो गया था. उसने मेरी दायीं चूची के ऊपर से अपना हाथ हटा लिया था और दोनों हाथों से मेरी साड़ी ऊपर खींचने लगा. मैं घबरा गयी क्यूंकी उन दोनों ने मुझे नीचे से नंगी कर दिया था. छोटू खुलेआम मेरे नंगे नितंबों को दबा रहा था. मेरे एक हाथ में थाली थी . मैंने बाएं हाथ से पांडेजी को रोकने की कोशिश की और अपनी साड़ी नीचे करने की कोशिश की पर वो मेरे पीछे खड़ा था और उसके लिए मेरी साड़ी को ऊपर खींचना आसान था , मेरे विरोध से उसे कुछ फ़र्क नहीं पड़ा. 

“पांडेजी आप हद से बाहर जा रहे हो. अब बंद करो ये सब. लोगों के बीच में मैं ऐसे नहीं खड़ी रह सकती.”

मैं मना करने लगी पर उसने जवाब देना भी ज़रूरी नहीं समझा. उसकी ताक़त के आगे मेरा बायां हाथ क्या करता. उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी की मैं साड़ी नीचे नहीं कर पायी. मैं बिल्कुल असहाय महसूस कर रही थी. मेरी कमर तक साड़ी उठाकर उन दोनों ने मुझे नीचे से नंगी कर दिया था. 

“पांडेजी रुक जाओ. अब बहुत हो गया.”

पांडेजी – चुपचाप खड़ी रहो वरना मैं तुम्हारी ये हालत सबको दिखा दूँगा.

उसकी धमकी सुनकर मैं शॉक्ड रह गयी. ऐसा लग रहा था कुछ ही पलों में ये आदमी बदल गया है.

“लेकिन….”

पांडेजी – लेकिन वेकिन कुछ नहीं मैडम. अगर तुमने शोर मचाया तो मैं यहाँ अंधेरे से निकालकर तुमको इस हालत में सबके सामने धूप में ले जाऊँगा. इसलिए चुपचाप रहो.

“लेकिन मैं गुरुजी के आश्रम से आई हूँ….”

पांडेजी – भाड़ में गया गुरुजी. अगर एक शब्द भी और बोला ना तो मैं तुम्हारी पैंटी नीचे खींच दूँगा और सबके सामने ले जाकर खड़ी कर दूँगा. समझी ?

मैं समझ नहीं पा रही थी की क्या करूँ. एक तरफ तो उनके मसलने और मुझे ऐसे नंगी करने से मैं बहुत कामोत्तेजित हो रखी थी. लेकिन अब पहली बार मैं डरी हुई भी थी. मैंने शांत रहने की कोशिश की ताकि कोई बखेड़ा ना हो और लोगों का ध्यान मेरी इस हालत पर ना जाए. एक 28 साल की शादीशुदा औरत के लिए मंदिर की लाइन में ज़बरदस्ती ऐसे अधनंगी खड़ी रहना, ये तो बहुत हो गया था, पर मैंने अपने मन को दिलासा दी और शांत रहने की कोशिश की. 

लाइन बहुत धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी. पांडेजी ने मेरी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर मोडकर कमर में घुसा दिया था. और मैं इसी हालत में अधनंगी होकर बेशर्मी से लाइन में आगे चल रही थी. ठंडी हवा मेरी नंगी टाँगों में महसूस हो रही थी. उनके ऐसे ज़बरदस्ती मुझे अधनंगी करने से मैं आगे चलते हुए शरम से मरी जा रही थी. अपमानित महसूस करके आश्रम में आने के बाद पहली बार मेरी आँखों में आँसू आ गये . इससे पहले जो भी हुआ था उसमें मर्दों के मेरे बदन को छूने का मैंने भी पूरा मज़ा लिया था. पर यहाँ पांडेजी मुझसे ज़बरदस्ती कर रहा था. और मैं असहाय महसूस कर रही थी.

छोटू की नज़रें मेरी नग्नता पर ही थी. उस अधनंगी हालत में मेरे लाइन में खड़े होने और चलने का वो मज़ा ले रहा था. छोटू और पांडेजी मेरी नंगी मांसल जांघों और नितंबों पर मनमर्ज़ी से हाथ फिरा रहे थे.

अचानक मुझे महसूस हुआ पांडेजी ने धोती से अपना लंड बाहर निकालकर मेरे नंगे नितंबों पर छुआ दिया. मैंने एकदम से चौंक कर पीछे को सर घुमाया और मेरी आँखें बड़ी होकर फैल गयीं.

“उफ…..कितना बड़ा लंड “ मैंने मन ही मन कहा.

पांडेजी का लंड बहुत बड़ा था. कोई भी औरत उसके लंड को देखकर चौंके बिना नहीं रहती. पांडेजी अपने लंड को मेरे नंगे नितंबों पर छुआने लगा. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की लाइन में हमारे आगे और पीछे लोग हैं लेकिन अंधेरे और पतले गलियारे की वजह से कोई नहीं देख पा रहा था की मेरे साथ क्या हो रहा है. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था की अब आगे मेरे साथ वो दोनों क्या करने वाले हैं. मेरे नंगे नितंबों पर गरम लंड के छूने से ही मैं गीली होने लगी और अब मेरे डर की जगह कामोत्तेजना ने ले ली. 

फिर पांडेजी ने एक झटका दिया और लंड को मेरी गांड की दरार में घुसाने लगा.

“ऊऊओह…..”

मैं कामोत्तेजना से तड़पने लगी. पांडेजी मेरे कान में मुँह लगाकर मेरे जवान बदन और बड़े नितंबों के बारे में अनाप शनाप बोलने लगा. वो मेरी गांड की दरार में ज़ोर से लंड घुसा रहा था पर खुशकिस्मती से लंड अंदर नहीं जा पा रहा था क्यूंकी मैंने पैंटी पहनी हुई थी. फिर वो मेरे मुलायम नितंबों को अपने तने हुए मोटे लंड से दबाने लगा. मेरे आँखें फैल गयी और उत्तेजना से मैंने छोटू का हाथ पकड़ लिया. मेरे मुलायम नितंबों में पांडेजी का लोहे जैसा सख़्त लंड बहुत चुभ रहा था. मैं बहुत ही उत्तेजित हो गयी . वो पीछे से धक्के लगाने लगा जैसे मुझे चोद रहा हो. मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और मज़ा लेने लगी. छोटू ने मुझसे अपना हाथ छुड़ा लिया और मेरी दायीं चूची पकड़ ली. अब वो ज़ोर ज़ोर से चूची को दबाने लगा. मुझे लगा अगर ये ऐसे ही चूची दबाएगा तो मेरे ब्लाउज के सारे बटन तोड़ देगा. पांडेजी मेरे सुडौल नंगे नितंबों में हर जगह अपने लंड को चुभा रहा था , सिर्फ़ गांड के बीच की दरार पैंटी से ढकी हुई थी. 

मेरा बदन भी पांडेजी के धक्कों की ताल से ताल मिलाकर हिलने लगा. मेरे होंठ खुल गये , मुझे उन पर चुंबन की इच्छा होने लगी. अब मैं हल्की सिसकारियाँ लेने लगी और उत्तेजना से छोटू को अपने बदन से भींच लिया. मेरी चूत रस से पूरी गीली हो चुकी थी. मुझे लगा इन दोनों की छेड़खानी से मुझे ओर्गास्म आने ही वाला है. मैंने छोटू को अपने बदन से चिपका लिया था . उसका मुँह मेरी तनी हुई चूचियों पर दब रहा था. अब छोटू ने मेरे बाएं हाथ को पकड़ा और अपने निक्कर पर लगा दिया. उसने झट से अपने निक्कर की ज़िप खोली और मेरा हाथ निक्कर के अंदर डाल दिया.

“आआआआअहह…….ऊऊहह…..”

मैं सिसकारियाँ ले रही थी. मैंने छोटू का तना हुआ लंड हाथ में पकड़ा हुआ था और पांडेजी का मोटा लंड मेरी मुलायम गांड को मसल रहा था. उत्तेजना से मैं छोटू के लंड को अपनी अंगुलियों से सहलाने लगी. मैं बहुत कामोत्तेजित हो गयी थी और एक रंडी की तरह व्यवहार कर रही थी. कामोन्माद से मेरा बदन तड़प रहा था और अब मेरी चूत से बहुत रस बहने लगा. पांडेजी और छोटू की कामातुर नज़रों के सामने ही मुझे ओर्गास्म आ गया और मैं लाइन में खड़े खड़े झड़ने लगी. मुँह से सिसकारियाँ ज़ोर से ना निकले इसके लिए मुझे अपना मुँह पांडेजी के चौड़े कन्धों से चिपटाना पड़ा. ये अश्लील दृश्य कुछ पल तक चलता रहा जब तक की मैं पूरी तरह झड़ नहीं गयी.

जब मेरा ओर्गास्म खत्म हो गया तो मैं होश में आई. मुझे इतनी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी की मैं छोटू और पांडेजी से आँखें नहीं मिला पा रही थी.

पांडेजी – हाँ अब तुम एक अच्छी लड़की के जैसे व्यवहार कर रही हो.

मैंने अपने कान में पांडेजी की फुसफुसाहट सुनी. उसने फुसफुसाते हुए कुछ गंदे कमेंट्स भी किए. अब हम गर्भ गृह के पास पहुँच गये थे.

“पांडेजी अब लोग देख लेंगे. मुझे कपड़े ठीक करने दो.”

पांडेजी ने कोई जवाब नहीं दिया और मेरी कमर से साड़ी और पेटीकोट को निकालकर नीचे कर दिया. आख़िरकार अब मैं पूरी ढकी हुई थी. छोटू ने भी आगे को मुँह कर लिया और पांडेजी ने अपनी धोती ठीक कर ली. पलक झपकते ही सब कुछ नॉर्मल लग रहा था. लेकिन जो कुछ हुआ था उससे मैं अभी भी हाँफ रही थी. 

कुछ ही देर में हमारी बारी आ गयी और मैं ‘गर्भ गृह ‘ के अंदर चली गयी. वो दोनों भी मेरे साथ ही अंदर घुस गये और कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया. अब हम देवता के सामने खड़े थे. मैं इतनी गिल्टी फील कर रही थी की देवता की तरफ नहीं देख पा रही थी. मेरे लिए उस हालत में पूजा करना तो नामुमकिन था.

पांडेजी – मैडम, मुझे नहीं लगता की इस हालत में तुम पूजा कर पाओगी.

“हाँ, मैं पूजा करने की हालत में नहीं हूँ.”

पांडेजी – लेकिन तुम मुझे तो कुछ करने दे सकती हो.

“क्या ?????”

पांडेजी – मैडम, तुम्हारा काम तो हो गया. लेकिन अभी मेरा नहीं हुआ है.

“क्या मतलब ?”

पांडेजी – मतलब ये की तुम्हारा ओर्गास्म तो निकल गया. मेरा क्या मैडम ?

उसकी बात से मैं अवाक रह गयी . कुछ कहती इससे पहले ही छोटू ने मेरे हाथ से पूजा की थाली ली और एक तरफ रख दी. पांडेजी भी मेरे एकदम नज़दीक़ आ गया.

“लेकिन……तुम…....तुम ऐसा नहीं कर सकते……”

पांडेजी – मैडम , अगर तुम शोर मचाओगी तो फिर मैं क्या कर सकता हूँ तुम अच्छी तरह से जानती हो.

वो फिर से मुझे रौबीली आवाज़ में धमकाने लगा.

“ लेकिन प्लीज़ समझने की कोशिश करो. मैं शादीशुदा हूँ और वैसी औरत नहीं हूँ जैसी तुम समझ रहे हो.”

पांडेजी – मैं जानता हूँ की तुम रंडी नहीं हो . इसीलिए मैं तुम्हें अपने बिस्तर पर नहीं ले गया. समझी ?

मेरी समझ में नहीं आ रहा था की अब क्या करूँ ? मैं मन ही मन गुरुजी और विकास को कोसने लगी की उन्होने मुझे यहाँ भेज दिया.

पांडेजी – हमारे पास समय नहीं है. छोटू इसे यहाँ ला.

पांडेजी देवता के पीछे जाकर वहाँ आने का इशारा कर कर रहा था , वहाँ छोटी सी जगह थी. छोटू जल्दी से मेरे पीछे आया और मेरे हाथ पकड़े और मुझे खींचते हुए देवता के पीछे ले गया. पांडेजी ने मुझे सामने से आलिंगन में कस लिया , मेरी तनी हुई चूचियाँ उसकी छाती से दब गयी. मैं अपने को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी पर ज़्यादा कुछ नहीं कर पा रही थी , क्यूंकी छोटू ने मेरे हाथ पीछे को पकड़े हुए थे. 

पांडेजी मेरे नितंबों को दोनों हाथों से पकड़कर दबा रहा था और मेरी गर्दन और कंधे में अपना चेहरा रगड़ रहा था. मुझे थोड़ी हैरानी हुई की पांडेजी ने मेरे होठों और गालों को चूमने की कोशिश नहीं की , जैसा की मर्दों का स्वभाव होता है. उसने मुझे अपने बदन से चिपकाए रखा. 

मैं चिल्ला भी नहीं सकती थी क्यूंकी इससे लोगों के सामने और भी अपमानित होना पड़ता. तो मैंने उसकी छेड़खानी का आनंद उठाने की कोशिश की. मुझे अभी कुछ ही मिनट पहले बहुत तेज ओर्गास्म आया था लेकिन पांडेजी के मेरे बदन को छूने से मैं फिर से कामोत्तेजित होने लगी. मेरी उछलती हुई बड़ी चूचियाँ उसकी चौड़ी छाती में दब रही थीं और उनकी सुडौलता और गोलाई उसे महसूस हो रही होगी. मेरे हाथ पीछे छोटू ने पकड़े हुए थे पर मैं अपने पैरों को हिलाकर विरोध करने की कोशिश कर रही थी पर पांडेजी ने मुझे मजबूती से जकड़ रखा था.

थोड़ी देर तक मेरे सुडौल नितंबों और चूचियों को दबाने , मसलने और सहलाने के बाद उसने मुझे छोड़ दिया. उसके ऐसे मुझे अधूरा उत्तेजित करके छोड़ देने से मुझे हैरानी भी हुई और इरिटेशन भी हुई. लेकिन जल्दी ही मुझे उसके इरादे का पता चल गया. वो मेरे पीछे आया , अपनी धोती खोल दी और दोनों हाथों से एक झटके में मेरी साड़ी और पेटीकोट मेरी कमर तक ऊपर उठा दी. एक बार फिर से उन्होंने मुझे बेशर्मी से नीचे से नंगी कर दिया. अब छोटू ने मुझे सामने से आलिंगन कर लिया और पांडेजी ने मेरे हाथ पीछे को पकड़ लिए. अब पांडेजी अपने तने हुए मोटे लंड को मेरी गांड में चुभाने लगा. दो मर्दों ने आगे पीछे से मेरे बदन को जकड़ लिया था. मुझे कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ था और मैं हांफने लगी. उन दोनों मर्दों के बीच दबने से मैं स्वाभाविक रूप से कामोत्तेजित होने लगी.

मैंने अब उन दोनों के आगे समर्पण कर दिया. छोटू मुझे कस के पकड़े हुए था और मैं भी अपनी रसीली चूचियों को उसके मुँह में दबा रही थी. वो मेरे ब्लाउज के बाहर से ही चूचियों पर दाँत गड़ा रहा था. पांडेजी पीछे से धक्के लगाए जा रहा था और उसका मोटा सख़्त लंड मेरे मुलायम नितंबों को गोद रहा था. मुझे बहुत मज़ा मिल रहा था. पर दो मिनट में ही पांडेजी चरम पर पहुँच गया और उसने मेरे नंगे नितंबों पर वीर्य छोड़ दिया.

छोटू को अपने से बड़ी उमर की जवान औरत को बिना किसी रोकटोक के आलिंगन करने में बहुत मज़ा आ रहा था. उसने मुझे सभी गुप्तांगों पर छुआ. पांडेजी ने मेरे हाथ पीछे को पकड़े हुए थे इसलिए मैं छोटू को रोक नहीं पायी. उसने मुझे ब्लाउज के ऊपर से छुआ , मेरी ब्रा के स्ट्रैप को छुआ , मेरी पैंटी के ऊपर से छुआ , पैंटी के कपड़े को बाहर को खींचकर अंदर झाँका और यहाँ तक की मेरे प्यूबिक हेयर्स (झांट के बालों ) को भी खींचा.

पांडेजी ने मेरे नितंबों पर वीर्य गिरा दिया था. फिर उसने अपनी धोती से मेरे नितंबों को पोंछ दिया. उतने समय तक मेरी साड़ी कमर तक ऊपर उठी हुई थी और मैं बेशर्मी से अधनंगी खड़ी थी. शुक्र है की ये सब देवता के पीछे हो रहा था. 

आधे घंटे बाद विकास आ गया. वापसी में रास्ते भर गुस्से से मैं उससे कुछ नहीं बोली. मैं विकास से इस बात पर बहुत गुस्सा थी की मुझे पांडेजी जैसे आदमी के पास भेजा.

आश्रम में अपने कमरे में आकर मैंने देर तक नहाया और फिर लंच करने के बाद मैंने बेड में आराम किया.
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01-17-2019, 01:47 PM,
#23
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
जिस तरह का व्यवहार उस लुच्चे लफंगे पांडेज़ी ने मेरे साथ किया , उसके कारण मैं विकास से बहुत नाराज़ हो गयी थी और मन ही मन उसे कोस रही थी की मुझे ऐसे लफंगे के पास भेजा. लेकिन बाद में मुझे अहसास हुआ की विकास की इसमें कोई ग़लती नही है , वो तो सिर्फ़ गुरुजी के आदेश का पालन कर रहा था. मुझे याद आया की गुरुजी ने इस दो दिन के उपचार के शुरू में क्या कहा था. उन्होने कहा था की दो दिन तक रोज़ कम से कम दो बार ओर्गास्म लाने हैं. और इसके लिए जो भी सिचुयेशन वो देंगे वहाँ मुझे सिर्फ़ अपने शरीर से स्वाभाविक प्रतिक्रिया देनी है और अच्छा बुरा ये सब दिमाग में नही सोचना है, जो हो रहा है उसे होने देना. बिस्तर में लेटे हुए मेरे मन में मंदिर की घटना घूमने लगी. मुझे ऐसा लगा , मेरे खूबसूरत बदन की वजह से पांडेजी बहक गया होगा और मेरा ओर्गास्म निकलने के बाद भी उसने मुझे नही छोड़ा. अपना पानी निकालने के लिए उसने मेरे बदन का इस्तेमाल किया. शायद कामोत्तेजना में वो गुरुजी के निर्देशों से भटक गया होगा. आख़िरकार वो था तो एक मर्द ही , अपने ऊपर काबू नही रख पाया. 

ये सब सोचकर अब मेरा मन शांत हो गया था. बल्कि मैं गर्व महसूस करने लगी थी की 30 वर्ष के करीब पहुँचने वाली हूँ और अब भी छोटू से लेकर पांडेजी और गोपालजी जैसे छोटी बड़ी सभी उम्र के मर्द मेरे खूबसूरत बदन की तरफ आकर्षित हो रहे हैं. मुझे अब सिर्फ इस बात का अपराधबोध रह गया था की मंदिर के गर्भ गृह जैसी पवित्र जगह में मैंने उन दो मर्दों को अपने बदन से छेड़खानी करने दी. मैंने भगवान से प्रार्थना की और इस ग़लत काम के लिए क्षमा माँगी.

बिस्तर में लेटे हुए मेरे दिमाग़ में मंदिर के वही दृश्य घूम रहे थे. और इन सब में वो दृश्य सबसे शर्मिंदगी भरा था जब पांडेजी ने मुझे लाइन में अधनंगी चलने पर मजबूर किया था, मेरी साड़ी और पेटीकोट कमर तक उठा रखी थी. वो दृश्य याद आते ही मैं बहुत ही अपमानित महसूस कर रही थी. पांडेजी ने बहुत ही बेशर्म होने पर मजबूर किया. मैंने कभी इतना ह्युमिलिएटेड नही महसूस किया था. 

यही सब सोचते हुए पता नही कब मुझे नींद आ गयी. परिमल ने जब दरवाज़ा खटखटाया तो मेरी नींद खुली. वो चाय और बिस्किट्स लेकर आया था. परिमल ने ट्रे रख दी और उसकी नज़रें मेरी चूचियों पर ही थी. मैं सो रही थी इसलिए मैंने ब्रा नही पहनी हुई थी , इसलिए मेरी बड़ी चूचियाँ इधर उधर हिल रही थी. मुझे आश्चर्य हुआ की बिना ब्रा के भी ऐसे एक मर्द के सामने खड़े होकर मुझे शरम नही महसूस हो रही थी. मैंने अपनी चूचियों को देखा तो पाया की ब्लाउज में मेरे निप्पल साफ दिख रहे हैं , तभी परिमल की नज़रें बार बार उन पर जा रही थी. मैं जल्दी से पीछे मुड़ी और ब्रा पहनने के लिए बाथरूम जाने लगी.

परिमल – मैडम, जब आप आरती देखने मुक्तेश्वरी मंदिर जाओगी , उससे पहले मैं आपके लिए नया पैड ले आऊँगा.

“ठीक है. प्लीज़ जाते समय दरवाज़ा बंद कर देना.”

परिमल चला गया और मैं बाथरूम चली गयी. मैं 15 मिनट में तैयार हो गयी. फिर पैंटी में पैड लगा लिया और आश्रम से बाहर जाने से पहले दवा खा ली. जब मैं कमरे से बाहर आई तो देखा अंधेरा होने लगा था. मैं काफ़ी देर तक सो गयी थी. पर अच्छी नींद आने से अब मैं बहुत ताज़गी महसूस कर रही थी. 

विकास मुझे ले जाने के लिए नही आया था मैं उसे ढूंढने लगी. आश्रम के प्रांगण में मुझे वो खो खो खेलते हुए दिख गया. उसके साथ समीर, राजकमल , मंजू और कुछ लड़के लड़कियाँ खेल रहे थे. विकास ने मुझे देखकर हाथ हिलाया और इंतज़ार करने का इशारा किया. खेलते हुए वो इधर उधर दौड़ रहा था, मैं सिर्फ़ उसको ही देख रही थी. उसका मजबूत बदन दौड़ते हुए मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. ये साफ था की मैं विकास की तरफ आकर्षित होने लगी थी. मुझे अपने दिल की धड़कनें तेज होती हुई महसूस हुई ठीक वैसे जब कॉलेज के दिनों में मैं पहली बार एक लड़के की तरफ आकर्षित हुई थी. वो मेरा पहला और अंतिम अफेयर था.

जल्दी ही उनका खेल खत्म हो गया. विकास ने अपने हाथ पैर धोए और हम आश्रम से बाहर आ गये. आज फिर बैलगाड़ी से जाना था.

विकास – मैडम, सुबह मंदिर की घटनाओ के लिए तुम मुझसे नाराज़ हो ?

“हाँ बिल्कुल हूँ. तुम मुझे उस लफंगे के पास छोड़कर चले गये. ”

मैंने ऐसा दिखाया जैसे मैं विकास से नाराज़ हूँ. मैं चाहती थी की विकास मुझे मनाए , मुझसे विनती करे.

विकास – मैडम, मेरा विश्वास करो. मेरा इसमे कोई रोल नही है. ये तो गुरुजी का आदेश था .

“मुझे नही मालूम , क्या सच है. पर वो आदमी मुझसे बहुत बदतमीज़ी से पेश आया.”

विकास – मैडम, अगर उसने कोई बदतमीज़ी की तो ये आकस्मिक रूप से हो गया होगा. शायद तुम्हारी खूबसूरती देखकर वो अपने ऊपर काबू नही रख पाया होगा.

मैं चुप रही और विकास की तरफ से मुँह मोड़ लिया. मैं उसका रिएक्शन देखना चाहती थी की मुझे कैसे मनाता है. उसने मेरी कोहनी पकड़ी और मुझे मनाने लगा.

विकास – मैडम, प्लीज़ बुरा मत मानो. प्लीज़ मैडम.

मैं उसकी तरफ मुड़ी और मुस्कुरा दी. इस तरह से मैंने ये जता दिया की मेरे ओर्गास्म निकलने के बाद भी पांडेजी ने मेरे साथ जो किया , अब मैं उसका बुरा नही मान रही हूँ. विकास भी मुस्कुराया और बड़ी बेशर्मी से मेरी दायीं चूची को अपने अंगूठे से दबा दिया. मैं शरमा गयी पर बिल्कुल बुरा नही माना. एक ऐसा आदमी जिसे मैं सिर्फ़ दो दिनों से जानती थी , उसके ऐसे अभद्र व्यवहार का भी मैं बुरा नही मान रही थी. मैं खुद ही हैरान होने लगी थी की हर गुज़रते पल के साथ मैं बेशर्मी की नयी ऊंचाइयों को छू रही हूँ. 

जल्दी ही बैलगाड़ी आ गयी. विकास ने कहा की पहले मुक्तेश्वरी मंदिर ही जाना पड़ेगा वरना बैलगाड़ीवाला आश्रम में बता भी सकता है. विकास ने मुझसे वादा किया था की शाम को वो मंदिर नही ले जाएगा पर उसकी बात भी सही थी. आश्रम में किसी के पूछने पर बैलगाड़ीवाला बता भी सकता था की हम मंदिर नही गये. मैं बैलगाड़ी में बैठ गयी और विकास मुझसे सट के बैठ गया. हमारी तरफ बैलगाड़ीवाले की पीठ थी और बाहर भी अंधेरा होने लगा था , इससे मैं एक कम उम्र की लड़की के जैसे रोमांचित थी . मेले को जाते वक़्त बैलगाड़ी का सफ़र बोरियत भरा था पर आज का सफ़र मज़ेदार होने वाला था.

विकास – मैडम, रोड पर नज़र रखना. लोगों को हम बहुत नज़दीक़ बैठे हुए नही दिखने चाहिए.

विकास मेरे कान में फुसफुसाया. उसके मोटे होंठ मेरे कान को छू रहे थे और उसने अपनी बाँह पीछे से डालकर मुझे हल्के से आलिंगन में लिया हुआ था. इस रोमांटिक हरकत से मेरे बदन में कंपकपी दौड़ गयी और मैं बहुत शरमा गयी. मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे मैं एक कॉलेज की लड़की हूँ और अपनी पहली डेट पर जा रही हूँ. बैलगाड़ी में हमारी सीट के ऊपर गोलाई में मुड़ा हुआ कवर था , जो पीछे से खुला हुआ था. कोई भी पीछे से आता आदमी हमें देख सकता था इसलिए विकास ने जल्दी ही मेरी पीठ से हाथ हटा लिया. हमारी टाँगें एक दूसरे से सटी हुई थीं . बैलगाड़ी में झटके बहुत लगते थे और जब भी ऐसा कोई झटका लगता तो मैं विकास को टाँगों से छूने की कोशिश करती. मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था और मेरी भावनायें बिल्कुल वैसी ही थी जैसे कॉलेज के दिनों में डेटिंग पर जाते हुए हुआ करती थीं. 

मैं विकास का हाथ पकड़े हुए थी और वो मेरी पतली अंगुलियों से खेल रहा था. उसकी हथेली गरम महसूस हो रही थी और इससे मुझे और भी उत्तेजना आ रही थी. हम गांव की रोड में धीमे धीमे आगे बढ़ रहे थे. एक जगह पर सुनसानी देखकर विकास ने मेरी साड़ी के पल्लू के अंदर हाथ डाल दिया और मेरी मुलायम चूचियों को सहलाने लगा. उसके प्यार से मेरी चूचियों को सहलाने से मैं मन ही मन मुस्कुरायी क्यूंकी अभी तक तो जो भी मुझे यहाँ अनुभव हुए थे उनमे सभी मर्दों ने मेरी चूचियों को कामवासना से निचोड़ा था. बैलगाड़ी की हर हलचल के साथ विकास धीरे से मेरी चूची को दबा रहा था. मुझे इतना अच्छा लग रहा था की मैंने आँखें बंद कर ली. उसकी अंगुलियों को मैं अपने ब्लाउज के ऊपर घूमती हुई महसूस कर रही थी. उसकी अँगुलियाँ ब्लाउज के ऊपर से मेरी ब्रा में निपल को ढूंढने की कोशिश कर रही थीं.

विकास – मैडम, तुमने अपने निपल्स कहाँ छुपा दिए ? मैं ढूंढ नही पा रहा.

मैंने शरमाकर बनावटी गुस्से से उसके हाथ में थप्पड़ मार दिया. अब उत्तेजना से मेरे कान गरम होने लगे थे. पर विकास कुछ और करता तब तक मुक्तेश्वरी मंदिर आ गया. ये सुबह के मंदिर के मुक़ाबले बहुत छोटा मंदिर था. विकास ने बैलगाड़ी वाले से दो घंटे बाद आने को कहा और हम मंदिर की तरफ बढ़ गये.

विकास – मैडम, हम भगवा कपड़ों में हैं इसलिए हर कोई हमें पहचान लेगा की हम आश्रम से आए हैं. पहले हमें अपने कपड़े बदलने होंगे. मैं अपने लिए और तुम्हारे लिए बैग में कुछ कपड़े लाया हूँ. चलो मंदिर के पीछे चलते हैं और कपड़े बदल लेते हैं.

मैंने सहमति में सर हिलाया और हम मंदिर के पीछे चले गये. वहाँ कोई नही था. विकास ने बैग में से एक हाफ शर्ट और पैंट निकाला . फिर वो अपने आश्रम के कपड़े बदलने के लिए पास में ही एक पेड़ के पीछे चला गया. मैं उसका बैग पकड़े वहीं पर खड़ी रही. मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था की कहीं कोई आ ना जाए . पर कुछ नही हुआ और एक मिनट में ही विकास कपड़े बदलकर आ गया.

विकास – मैडम, अब तुम अपनी साड़ी और ब्लाउज जल्दी से बदल लो.

ऐसा कहते हुए विकास ने बैग में से एक साड़ी और ब्लाउज निकाला. मैंने उससे कपड़े ले लिए और उसी पेड़ के पीछे चली गयी. मैंने जल्दी से साड़ी उतार दी और ब्लाउज उतारने से पहले इधर उधर नज़र दौड़ाई. वहाँ कोई नही था और शाम का अंधेरा भी था , इससे मेरी हिम्मत बढ़ी और मैंने अपना ब्लाउज भी खोल दिया. अब मैं सिर्फ़ ब्रा और पेटीकोट में खड़ी थी. मैं मन ही मन अपने को दाद दे रही थी की आश्रम में आकर कुछ ही दिनों में कितनी बोल्ड हो गयी हूँ. वो ब्लाउज मेरे लिए बहुत ढीला हो रहा था. ज़रूर किसी बहुत ही बड़ी छाती वाली औरत का होगा. नयी साड़ी ब्लाउज पहनकर मैं पेड़ के पीछे से निकल आई. विकास ने मेरी आश्रम की साड़ी और ब्लाउज जल्दी से बैग में डाल दिए.

“ये किसकी साड़ी और ब्लाउज है ?”

विकास – मेरी गर्लफ्रेंड की है.

मैंने बनावटी गुस्से से विकास को देखा पर उसने जल्दी से मेरा हाथ पकड़ा और मंदिर से बाहर ले आया. रोड में गांव वाले आ जा रहे थे पर अब हम नॉर्मल कपड़ों में थे इसलिए किसी ने ज़्यादा ध्यान नही दिया.

विकास – मैडम, नदी के किनारे चलते हैं. सबसे सेफ जगह वही है. 5 मिनट में पहुँच जाएँगे.

“ठीक है. इस जगह को तुम ही बेहतर जानते हो.”

विकास – अभी इस समय वहाँ कोई नही होगा. 

जल्दी ही हम नदी के किनारे पहुँच गये और वास्तव में वो बहुत ही प्यारी जगह थी.
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01-17-2019, 01:48 PM,
#24
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
जल्दी ही हम नदी के किनारे पहुँच गये और वास्तव में वो बहुत ही प्यारी जगह थी. हम दोनों के सिवा वहाँ कोई नही था. नदी किनारे काफ़ी घास उगी हुई थी और वहाँ ठंडी हवा चल रही थी. चाँद भी धीमी रोशनी दे रहा था और हम दोनों नदी किनारे घास पे चल रहे थे , बहुत ही रोमांटिक माहौल था. 

विकास – कैसा लग रहा है मैडम ?

विकास मेरा हाथ पकड़े हुए था. फिर उसने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया. उसके पौरुष की गंध, चौड़ी छाती और मजबूत कंधों से मैं होश खोने लगी और मैंने भी उसे मजबूती से अपने आलिंगन में कस लिया. विकास मेरे जवान बदन पर अपने हाथ फिराने लगा और मेरे चेहरे से अपना चेहरा रगड़ने लगा. मैं बहुत उत्तेजित हो गयी और उसके होठों को चूमना चाहती थी. उसके चूमने से पहले ही अपनी सारी शरम छोड़कर मैंने उसके होठों का चुंबन ले लिया. तुरंत ही उसके मोटे होंठ मेरे होठों को चूमने लगे और उसकी लार से मेरे होंठ गीले हो गये. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे होठों का रस वो एक ही बार में निचोड़ लेना चाहता है. जब उसने मेरे होंठ कुछ पल के लिए अलग किए तो मैं बुरी तरह हाँफने लगी. 

“विकास….”

मैं विकास के चूमने और बाद पर हाथ फिराने से बहुत उत्तेजित हो गयी थी और सिसकारियों में उसका नाम ले रही थी. मेरी टाँगें काँपने लगी पर उसकी मजबूत बाँहों ने मुझे थामे रखा. मेरा पल्लू कंधे से गिरकर मेरी बाँहों में आ गया था. चूँकि विकास का दिया हुआ ब्लाउज बहुत ढीला था इसलिए मेरी चूचियों का ऊपरी हिस्सा साफ दिख रहा था. विकास ने अपना मुँह मेरी क्लीवेज पर लगा दिया और मेरी चूचियों के मुलायम ऊपरी हिस्से को चूमने और चाटने लगा. मैं उत्तेजना से पागल सी हो गयी. मैंने भी मौका देखकर अपने दाएं हाथ से उसके पैंट में खड़े लंड को पकड़ लिया.

“ऊऊऊऊहह…...”

विकास के मोटे लंड को पैंट के बाहर से हाथ में पकड़कर मैंने ज़ोर से सिसकारी ली . उसके लंड को पैंट के बाहर से छूना भी बहुत अच्छा लग रहा था. उसके पैंट की ज़िप खोलने में विकास ने मेरी मदद की . उसके अंडरवियर में लंड पोले की तरह खड़ा था. मैं उसके अंडरवियर के बाहर से ही खड़े लंड को सहलाने लगी. अचानक विकास ने मेरी चूचियों से मुँह हटा लिया. मैं कुछ समझ नही पाई की क्या हुआ . मेरा पल्लू गिरा हुआ था और बड़ी क्लीवेज दिख रही थी और एक हाथ में मैंने विकास का लंड पकड़ा हुआ था , मैं वैसी हालत में खड़ी थी. तभी मैंने देखा विकास नदी की ओर देख रहा है. मैंने भी नदी की तरफ देखा, एक नाव हमारी तरफ आ रही थी.

विकास – मैडम , लगता है आज हमारी किस्मत अच्छी है. मेरे साथ आओ.

विकास ने नाव की तरफ हाथ हिलाया और नदी की तरफ दौड़ा. मैं भी उसके पीछे जाने लगी. उसने नाववाले से बात की और उसको 50 रुपये का नोट दिया. नाववाला लड़का ही लग रहा था, 18 बरस का रहा होगा. 

विकास – मैडम , इसका नाम बाबूलाल है. मैं इसको जानता हूँ ,बहुत अच्छा लड़का है. इसलिए कोई डर नही , हम सेफ हैं यहाँ. ये हमको आधा घंटा नाव में घुमाएगा.

“विकास , तुम तो एकदम जीनियस हो.”

बाबूलाल – विकास भैय्या, जल्दी बैठो. यहाँ पर ऐसे खड़े रहना ठीक नही .

मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा, बहुत ही रोमांटिक माहौल था. चाँद की धीमी रोशनी , नदी में छोटी सी नाव में हम दोनों. मेरी पैंटी गीली होने लगी थी अब मैं और सहन नही कर पा रही थी.

“विकास , बाबूलाल से दूसरी तरफ मुँह करने को बोलो. वो हमें देख लेगा.”

विकास – मैडम, उधर को मुँह करके बाबूलाल नाव कैसे चलाएगा ? ऐसा करते हैं, हम ही उसकी तरफ पीठ कर लेते हैं.

“लेकिन विकास , वो तो हमारे इतना नज़दीक़ है. मुझसे नही होगा.”

विकास – मैं मदद करूँगा मैडम.

“अपने कपड़े उतारो” विकास मेरे कान में फुसफुसाया.

मैंने बनावटी गुस्से से विकास को एक मुक्का मारा. 

विकास – मैडम, देखो कितना सुहावना दृश्य है. बाबूलाल की तरफ ध्यान मत दो , वो तो छोटा लड़का है. ये समझो यहाँ सिर्फ़ मैं और तुम हैं और कोई नही.

सुबह मंदिर में उस छोटे लड़के छोटू ने मेरे साथ जो किया उसके बाद अब मैं इस छोटे लड़के को पूरी तरह से इग्नोर भी नही कर सकती थी . सुबह छोटू को मैंने नहाते हुए देखा था , उसका लंड देखा और फिर मेरे पूरे बदन में उसने हाथ फिराया था. 

नाव बहुत छोटी थी और बाबूलाल मुश्किल से 7 – 8 फीट की दूरी पर बैठा था. अगर मैं या विकास कुछ भी करते तो उसको सब दिख जाता. किसी दूसरे मर्द के सामने विकास के साथ कुछ करना तो बहुत ही शर्मिंदगी भरा होता . पर सच्चाई ये थी की मैं अब और देर भी बर्दाश्त नही कर पा रही थी. पिछले दो दिनों से मेरे ब्लाउज और ब्रा के ऊपर से मेरी चूचियों को बहुत दबाया और निचोड़ा गया था , पर ऐसे आधे अधूरे स्पर्श से मैं उकता चुकी थी. अब मैं चाहती थी की विकास की अँगुलियाँ मेरे ब्लाउज और ब्रा को उतार दें, मैं अपनी चूचियों पर उसकी अंगुलियों का स्पर्श चाहती थी. लेकिन ये नाववाला मेरे अरमानो पर पानी फेर रहा था. फिर से एक अजनबी आदमी के सामने अपने बदन से छेड़छाड़ को मैं राज़ी नही हो पा रही थी.मेरी उलझन देखकर विकास मेरे कान में फुसफुसाया.

विकास – मैडम , तुम इस बाबूलाल के ऊपर क्यूँ समय बर्बाद कर रही हो. ये तो छोटा लड़का है.

छोटा लड़का है , इसका मतलब ये नही की मैं इसके सामने कपड़े उतार दूं. सिर्फ़ 7 – 8 फीट दूर बैठा है. लेकिन मैं विकास से कुछ और बहस करती इससे पहले ही उसने मुझे पकड़ा और बैठे हुए ही घुमा दिया और मेरी पीठ बाबूलाल की तरफ कर दी.

“आउच…”

विकास ने मुझे कुछ और नही बोलने दिया और बैठे हुए ही अपने आलिंगन में कसकर मुझे चूमने लगा. पहले तो मैंने विरोध करना चाहा क्यूंकी नाववाले के सामने वो खुलेआम मुझे अपने आलिंगन में बांधकर चूम रहा था पर कुछ ही पलों बाद मैं भी सब कुछ भूलकर विकास का साथ देने लगी.

विकास – मैडम, तुमने शुरू तो किया पर अधूरा छोड़ दिया.

“क्या…?”

विकास – तुमने मेरी ज़िप खोली , अब अंडरवियर नीचे कौन करेगा ?

“क्यूँ ? अपनी गर्लफ्रेंड को बोलो, जिससे तुम मेरे लिए ये साड़ी लाए हो.”

हम दोनों खी खी करके हँसने लगे और एक दूसरे को आलिंगन में कस लिया. मैंने विकास को निचले होंठ पर चूमा और उसने मेरे निचले होंठ को देर तक चूसा. उसने मेरे हाथ को अपने पैंट की ज़िप में डाल दिया. फिर विकास ने मेरा पल्लू हटाया और मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगा. वो दोनों हाथों से मेरे ब्लाउज के हुक एक एक करके खोलने लगा और मेरे होंठ उसके होठों से चिपके हुए थे. मुझे पीछे बैठे लड़के का ख्याल आया और मैंने विरोध करने की कोशिश की पर उसके चुंबन ने मुझे बहुत कमज़ोर बना दिया. मैं फिर से उसकी ज़िप में हाथ डालकर खड़े लंड को सहलाने लगी.

“ऊऊहह…..”

विकास का लंड हाथ में पकड़ना बहुत अच्छा लग रहा था. अपने पति का खड़ा लंड मैंने कई बार हाथों में पकड़ा था पर विकास का लंड पकड़ने में बहुत मज़ा आ रहा था , सच कहूं तो मेरे पति से भी ज्यादा. मैंने उसके अंडरवियर की साइड में से लंड को बाहर निकाल लिया. उसका लंड लंबा और तना हुआ था. मैं उसके सुपाड़े की खाल को सहलाने लगी और मेरी पैंटी हर गुज़रते पल के साथ और भी गीली होती जा रही थी.

मैं विकास के गरम लंड को सहला रही थी और अपने होठों पर उसके चुंबन का आनंद ले रही थी तभी मेरी चूचियों पर ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ. मैंने देखा विकास ने मेरे ब्लाउज के सारे हुक खोल दिए थे और अब मेरी सफेद ब्रा उसे दिख रही थी.

“उम्म्म्मम…..उम्म्म्म….”

मैं नही नही कहना चाह रही थी पर मेरे होंठ उसके होठों से चिपके हुए थे इसलिए मेरे मुँह से यही निकला. विकास मेरे बदन से ब्लाउज को निकालने की कोशिश कर रहा था. 

विकास ने ज़बरदस्ती मेरे ब्लाउज को खींचकर निकाल दिया , वो ब्लाउज ढीला था इसलिए उसे खींचने में ज़्यादा परेशानी भी नही हुई. जब तक उसने मेरा पूरा ब्लाउज नही उतार दिया तब तक उसने मुझे चूमना नही छोड़ा. 

ब्लाउज उतरने के बाद मेरी पीठ में कंपकपी दौड़ गयी. मैंने ब्लाउज को विकास से छीनने की कोशिश की पर उसने ब्लाउज को पीछे फेंक दिया और अब मेरी साड़ी उतारने लगा. उसने मुझे खड़ा कर दिया और कमर से साड़ी उतारने लगा. देखते ही देखते अब मैं विकास की बाँहों में सिर्फ ब्रा और पेटीकोट में खड़ी थी. मैंने पीछे मुड़कर देखा और मैं तो जैसी जड़वत हो गयी क्यूंकी बाबूलाल मेरी साड़ी और ब्लाउज को नाव से उठा रहा था और मेरी तरफ कामुकता से देख रहा था. औरत होने की स्वाभाविक शरम से मेरी बाँहें मेरी ब्रा के ऊपर आ गयीं .

विकास – मैडम , अपने कपड़ों की चिंता मत करो. बाबूलाल उनको सम्हाल कर रखेगा.

उस बदमाश बाबूलाल को देखकर मैं बहुत शरम महसूस कर रही थी , वो मेरी साड़ी और ब्लाउज को अपनी गोद में लिए हुए बैठा था और मुस्कुरा रहा था.

विकास – मैडम , तुम इतना क्यूँ शरमा रही हो ? वो छोटा सा लड़का है. 

“कुछ तो शरम करो विकास. मैं उसके सामने अपने कपड़े नही उतार सकती, छोटा लड़का है तो क्या हुआ.”

विकास ने बहस करने में कोई रूचि नही दिखाई और मुझे फिर से आलिंगन करके चूमना शुरू कर दिया. अब वो खुलेआम मेरे अंगों को छूने लगा था. एक हाथ से वो मेरी चूचियों को दबा रहा था और दूसरे हाथ से मेरे नितंबों को सहला रहा था , साथ ही साथ मेरे होठों को चूम रहा था. मैं उसकी हरकतों से उत्तेजित होकर कसमसाने लगी. मैंने उसके मजबूत बदन को आलिंगन में कस लिया और उसकी पीठ और नितंबों पर नाखून गड़ाने लगी. 

विकास – मैडम , एक बार मुझे छोड़ो.

“क्यूँ….?”

मेरे सवाल का जवाब दिए बिना , विकास अपने कपड़े उतारने लगा. मैं मुस्कुराते हुए उसे कपड़े उतारते हुए देखने लगी. कुछ ही पलों बाद अब वो सिर्फ अंडरवियर में था और बहुत सेक्सी लग रहा था. नाव अब बीच नदी में थी और चाँद की रोशनी में पानी चमक रहा था. अंधेरे की वजह से नदी के किनारे अब साफ नही दिखाई दे रहे थे. विकास कुछ कदम चला और बाबूलाल को अपने कपड़े दे आया क्यूंकी हवा चल रही थी और सम्हाल कर ना रखने पर कपड़ों के पानी में गिरने का ख़तरा था.

अब माहौल बहुत गरमा गया था और सच कहूँ तो मैं भी अब उस रोमांटिक माहौल में विकास की बाँहों में नंगी होने को उत्सुक थी. सिर्फ़ बाबूलाल की वजह से मैं दुविधा में थी. कपड़े उतरने के बाद विकास ने मुझे अपनी बाँहों में लिया और मेरी ब्रा को चूचियों के ऊपर उठाने की कोशिश करने लगा. मैंने उसे वैसा करने नही दिया तो उसने मेरी चिकनी पीठ में हाथ ले जाकर मेरी ब्रा के हुक खोलने की कोशिश की. मुझे मालूम था की बाबूलाल मेरी नंगी गोरी पीठ देखने का मज़ा ले रहा होगा क्यूंकी सिर्फ 1 इंच का ब्रा का स्ट्रैप पीठ पर था.

“विकास प्लीज़ , मत खोलो.”

मैंने अपनी आँखें बंद कर ली क्यूंकी विकास ने मेरी ब्रा का हुक खोल दिया था और अब मेरी पीठ पूरी नंगी हो गयी थी और मेरी चूचियां ढीली ब्रा में उछल गयीं. मैं उस हालत में उत्तेजना में काँपते हुए खड़ी थी और ठंडी हवा मेरी उत्तेजना को और भी बढ़ा दे रही थी. विकास ने जबरदस्ती मेरी बाँहों को मेरी छाती से हटाया और मेरी ब्रा को खींचकर निकाल दिया. अब मैं ऊपर से पूरी नंगी थी , शरम से मैंने अपनी आँखें बंद कर रखी थी. मैं अब बीच नदी में एक खुली नाव में एक ऐसे आदमी की बाँहों में अधनंगी खड़ी थी जो मेरा पति नही था और वो भी उस नाववाले की आँखों के सामने.

विकास – बाबूलाल यहाँ आओ , ये भी रखो.

बाबूलाल – ठीक है विकास भैय्या.

मैंने थोड़ी सी आँखें खोली और देखा उस हिलती हुई नाव में बाबूलाल मेरी ब्रा लेने आ रहा था. मुझे शरम महसूस हो रही थी पर मैं जानती थी की अगर सम्हाल के नही रखी तो तेज हवा से पानी में गिर सकती है. मैंने अपना सर विकास की छाती में टिकाया हुआ था और मेरी नंगी चूचियों को भी उसकी छाती से छुपा रखा था. मैं बाबूलाल के वापस अपनी जगह में जाने का इंतज़ार करने लगी.

बाबूलाल – विकास भैय्या , मैडम की ब्रा तो पसीने से भीगी हुई है. इसको पहनकर तो उसे ठंड लग जाएगी.

बाबूलाल अब मेरी ब्रा को उलट पुलट कर देख रहा था और मेरी ब्रा के कप्स के अंदर देख रहा था. विकास ने मुझे अपने आलिंगन में लिया हुआ था और बाबूलाल से बात करते हुए उसका एक हाथ मेरे तने हुए निपल्स को मरोड़ रहा था.

विकास – इसको खुले में रखो ये ….

बाबूलाल ने विकास की बात काट दी.

बाबूलाल – विकास भैय्या , मैं इसको पोल में बाँध देता हूँ. तेज हवा से मैडम की ब्रा जल्दी ही सूख जाएगी.

“क्या…???”

ऐसी बेतुकी बात सुनकर मैं चुप नही रह सकी. बाबूलाल मेरी ब्रा को एक पोल से हवा में लटका कर लहराने के लिए छोड़ देगा. मैं सीधे बाबूलाल से बात करने के लिए सामने नही आ सकती थी क्यूंकी मेरे बदन के ऊपरी हिसे में कपड़े का एक धागा भी नही बचा था इसलिए मैं विकास के बदन से छुपी हुई थी.

“विकास प्लीज़ इस लड़के को रोको.”

विकास – मैडम , यहाँ कौन देख रहा है. अगर कोई दूर से देख भी लेगा तो समझेगा की पोल में कोई सफेद कपड़ा लटका हुआ है. कोई ये नही समझ पाएगा की हवा में ये तुम्हारी ब्रा लहरा रही है.

ऐसा कहते हुए विकास मुझे बाबूलाल के सामने चूमने लगा. उसके ऐसा करने से मेरी नंगी चूचियां बाबूलाल को दिखने लगी. वो एक निक्कर पहने हुआ था और उसमें बना तंबू बता रहा था की इस लाइव शो को देखकर उसे बहुत मज़ा आ रहा है. मैं विकास के चुंबन का आनंद ले रही थी पर मुझे उस लड़के को देखकर शरम भी आ रही थी. देर तक चुंबन लेकर विकास ने मेरे होंठ छोड़ दिए. तब तक बाबूलाल ने एक पोल में मेरी ब्रा लटका दी थी और उस तेज हवा में मेरी ब्रा सफेद झंडे की तरह लहरा रही थी.
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01-17-2019, 01:48 PM,
#25
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
बाबूलाल ने एक पोल में मेरी ब्रा लटका दी थी और उस तेज हवा में मेरी ब्रा सफेद झंडे की तरह लहरा रही थी.

विकास ने बाबूलाल की इस हरकत पर रिएक्ट करने का मुझे मौका नही दिया. उसने बाबूलाल की तरफ पीठ कर ली और मुझे भी दूसरी तरफ घुमा दिया. अब मैं बाबूलाल की तरफ पीठ करके खड़ी थी और मेरे पीछे विकास खड़ा था. विकास का लंड उसके अंडरवियर से बाहर निकला हुआ था और पेटीकोट के बाहर से मेरे गोल नितंबों पर चुभ रहा था. शरम से मेरी बाँहें अपनेआप मेरी नंगी चूचियों पर चली गयी और मैंने हथेलियों से तने हुए निपल्स और ऐरोला को ढकने की कोशिश की. मेरे हल्के से हिलने डुलने से भी मेरी बड़ी चूचियाँ उछल जा रही थीं , विकास ने पीछे से अपने हाथ आगे लाकर मेरी चूचियों को दबोचना और मसलना शुरू कर दिया.

मैं अपनी जिंदगी में कभी भी ऐसे खुले में टॉपलेस नही हुई थी , सिर्फ़ अपने पति के साथ बेडरूम में होती थी. लेकिन पानी के बीच उस हिलती हुई नाव में मुझे स्वर्ग सा आनंद आ रहा था. विकास के हाथों से मेरी चूचियों के दबने का मैं बहुत मज़ा ले रही थी . उसके ऐसा करने से मेरी चूचियाँ और निपल्स तनकर बड़े हो गये और मेरी चूत पूरी गीली हो गयी. मैं धीमे धीमे अपने मुलायम नितंबों को उसके खड़े लंड पर दबाने लगी.

विकास ने अब अपना दायां चूचियों से हटा लिया और नीचे को मेरे नंगे पेट की तरफ ले जाने लगा. मेरी नाभि के चारो ओर हाथ को घुमाया फिर नाभि में अंगुली डालकर गोल घुमाने लगा.

“आआआह……...उहह……”

मैं धीमे धीमे सिसकारियाँ ले रही थी और मेरे रस से गुरुजी के दिए पैड को भिगो रही थी. विकास मेरी नंगी कमर पर हाथ फिराने लगा फिर उसने अपना हाथ मेरे पेटीकोट के अंदर डाल दिया. उसकी अँगुलियाँ मेरी प्यूबिक बुश (झांट के बालों) को छूने लगीं और धीरे से वहाँ के बालों को सहलाने लगीं. अपनेआप मेरी टाँगें आपस में चिपक गयी लेकिन विकास ने पीछे से मेरे नितंबों पर एक धक्का लगाकर जताया की मेरा टाँगों को चिपकाना उसे पसंद नही आया. मैंने खड़े खड़े ही फिर से टाँगों को ढीला कर दिया. विकास ने फ़ौरन मेरे पेटीकोट के नाड़े को खोल दिया , जैसे ही पेटीकोट नीचे गिरने को हुआ मुझे घबराहट होने लगी. मैंने तुरंत हाथों से पेटीकोट पकड़ लिया और अपने बदन में बचे आख़िरी कपड़े को निकालने नही दिया.

“विकास , प्लीज़ इसे मत उतारो. मैं पूरी …..” (नंगी हो जाऊँगी)

विकास – मैडम , मैं तुम्हारा नंगा बदन देखना चाहता हूँ.

वो मेरे कान में फुसफुसाया और मेरे पेटीकोट को कमर से नीचे खींचने की कोशिश करने लगा.

“विकास , प्लीज़ समझो ना. वो हमें देख रहा होगा.”

विकास – मैडम , बाबूलाल की तरफ ध्यान मत दो. वो छोटा लड़का है. वैसे भी जब मैं तुम्हें चूम रहा था तब उसने तुम्हारी चूचियाँ देख ली थीं , है ना ? अब अगर वो तुम्हारी टाँगें देख लेता है तो क्या फर्क पड़ता है ? बोलो .”

विकास ने मेरे जवाब का इंतज़ार नही किया और मेरे हाथों को पेटीकोट से हटाने की कोशिश करने लगा. उसने पेटीकोट को मेरी जांघों तक खींच दिया और फिर मेरे हाथों से पेटीकोट छुड़ा दिया. पेटीकोट मेरे पैरों में गिर गया और अब मैं पूरी नंगी खड़ी थी सिवाय एक छोटी सी पैंटी के , जो इतनी छोटी थी की मेरे बड़े नितंबों को भी ठीक से नही ढक रही थी. मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपने बाथरूम में खड़ी हूँ क्यूंकी खुले में ऐसे नंगी तो मैं कभी नही हुई. 

विकास – मैडम , तुम बिना कपड़ों के बहुत खूबसूरत लग रही हो. शादी के बाद भी तुम्हारा बदन इतना सेक्सी है …..उम्म्म्म……

विकास मेरे होठों को चूमने लगा और मेरे नंगे बदन पर हर जगह हाथ फिराने लगा. विकास ने मुझे नंगी कर दिया था पर फिर भी हैरानी की बात थी की इतनी कामोत्तेजित होते हुए भी मुझे चुदाई की तीव्र इच्छा नही हो रही थी. सचमुच गुरुजी की दवा अपना असर दिखा रही थी. मुझे ऐसा लगा की शायद विकास इस बात को जानता है. अब उसने धीरे से मुझे नाव के फर्श में लिटा दिया . अभी तक मैं विकास के बदन से ढकी हुई थी पर नीचे लिटाते समय बाबूलाल की आँखें बड़ी और फैलकर मुझे ही देख रही थी. फिर मैं शरम से जड़वत हो गयी जब मैंने देखा वो हमारी ही तरफ आ रहा था.

“विकास…..”

मैंने शरम से आँखें बंद कर ली और विकास को अपनी तरफ खींचा और उसके बदन से अपने नंगे बदन को ढकने की कोशिश की. लेकिन विकास ने मेरी बाँहों से अपने को छुड़ाया और मेरा पेटीकोट उठाकर बाबूलाल को दे दिया. और मुझे बेशरमी सी एक्सपोज़ कर दिया. मैं एक 28 बरस की हाउसवाइफ , बीच नदी में एक नाव में नाववाले के सामने पूरी नंगी थी सिवाय एक छोटी सी पैंटी के. मेरी भारी साँसों से मेरी गोल चूचियाँ गिर उठ रही थी और उनके ऊपर तने हुए गुलाबी निपल्स , उस दृश्य को बाबूलाल और विकास के लिए और भी आकर्षक बना रहे थे. मेरे पेटीकोट को विकास से लेते समय बाबूलाल ने अपनी जिंदगी का सबसे मस्त सीन देखा होगा. उस छोटे लड़के के सामने मैं नंगी पड़ी हुई थी और वो मेरे पूरे नंगे बदन को घूर रहा था , मुझे बहुत शरम आ रही थी पर उसके ऐसे देखने से मेरी चूत से छलक छलक कर रस बहने लगा.

बाबूलाल – विकास भैय्या, तेज हवा चल रही है , इसलिए मुझे बार बार उठकर यहाँ आने में परेशानी हो रही है. अगर मैडम पैंटी उतार दें तो मैं साथ ही ले जाऊँ.

उसकी बात सुनकर मैं अवाक रह गयी. अब यही सुनना बाकी रह गया था. मुझे कुछ समझ नही आ रहा था की मैं कैसे रिएक्ट करूँ इसलिए मैं चुपचाप पड़ी रही.

विकास – बाबूलाल , अपनी हद में रहो. अगर तुम्हारी मदद की ज़रूरत होगी तो मैं तुमसे कहूँगा.

विकास ने उस लड़के को डांट दिया . मुझे बड़ी खुशी हुई. पर मेरी खुशी कुछ ही पल रही.

विकास – तुम क्या सोचते हो ? मैडम क्या इतनी बेशरम है की वो तुम्हारे सामने पूरी नंगी हो जाएगी ?

बाबूलाल – सॉरी विकास भैय्या.

विकास – क्या तुम नही जानते की अगर कोई औरत सब कुछ उतार भी दे तब भी उसकी पैंटी उसकी इज़्ज़त बचाए रखती है ? अगर पैंटी सही सलामत है तो समझो औरत सुरक्षित है. है ना मैडम ?

विकास ने मेरी पैंटी से ढकी चूत की तरफ अंगुली से इशारा करते हुए मुझसे ये सवाल पूछा. मुझे समझ नही आया क्या बोलूँ और उन दोनों मर्दों के सामने वैसी नंगी हालत में लेटे हुए मैंने बेवक़ूफ़ की तरह हाँ में सर हिला दिया. पता नही बाबूलाल को कुछ समझ में आया भी या नही पर वो मुड़ा और नाव के दूसरे कोने में अपनी सीट में जाकर बैठ गया. विकास ने अब और वक़्त बर्बाद नही किया. वो मेरे बदन के ऊपर लेट गया और मुझे अपने आलिंगन में ले लिया. हम फुसफुसाते हुए आपस में बोल रहे थे.

विकास – मैडम, तुम्हारा बदन इतना खूबसूरत है. तुम्हारा पति तुम्हें अपने से अलग कैसे रहने देता है ?

मैंने उसे देखा और अपने बदन पर उसके हाथों के स्पर्श का आनंद लेते हुए बोली…..

“अगर वो मुझे अलग नही रहने देता तो तुम मुझे कैसे मिलते ?”

विकास ने मेरे चेहरे और बालों को सहलाया और मेरे होठों के करीब अपने होंठ ले आया. मैंने अपने होंठ खोल दिए. उसके हाथ मेरे पूरे बदन को सहला रहे थे और ख़ासकर की मेरी तनी हुई रसीली चूचियों को. फिर विकास मेरी गर्दन और कानों को अपनी जीभ से चाटने लगा , मैंने आँखें बंद कर ली और धीमे से सिसकारियाँ लेने लगी. और फिर वो पहली बार मेरे निपल्स को चूसने लगा , एक निप्पल को चूस रहा था और दूसरे को अंगुलियों और अंगूठे के बीच मरोड़ रहा था. इससे मैं बहुत कामोत्तेजित हो गयी.

“आआआआहह…...”

मैं उत्तेजना से सिसकने लगी. विकास मेरी पूरी बायीं चूची को जीभ लगाकर छत रहा था और दायीं चूची को हाथों से सहला रहा था. मैं हाथ नीचे ले जाकर उसके खड़े लंड को सहलाने लगी. फिर वो मेरी दायीं चूची के निप्पल को ज़ोर से चूसने लगा जैसे उसमें से दूध निकालना चाह रहा हो. और बायीं चूची को ज़ोर से मसल रहा था , इससे मुझे बहुत आनंद मिल रहा था. जब उसने मेरी चूचियों को छोड़ दिया तो मैंने देखा चाँद की रोशनी में मेरी चूचियाँ विकास की लार से पूरी गीली होकर चमक रही थीं. मेरे निपल्स उसने सूज़ा दिए थे. शरम से मैंने आँखें बंद कर ली. 

विकास अब मेरे चेहरे और गर्दन को चाट रहा था. पहली बार मेरे पति की बजाय कोई गैर मर्द मेरे बदन पर इस तरह से चढ़ा हुआ था. पर जो आनंद मेरे पति ने दिया था निश्चित ही उससे ज़्यादा मुझे अभी मिल रहा था. विकास के हाथ मेरी चूचियों पर थे और हमारे होंठ एक दूसरे से चिपके हुए थे. हम दोनों एक दूसरे के होंठ चबा रहे थे और एक दूसरे की लार का स्वाद ले रहे थे. फिर विकास खड़ा हो गया और मेरे निचले बदन पर उसका ध्यान गया.

विकास – मैडम , प्लीज़ ज़रा पलट जाओ.

मैं नाव के फर्श पर लेटी हुई थी और अब नीचे को मुँह करके पलट गयी. मेरी पैंटी सिर्फ़ मेरे नितंबों के बीच की दरार को ही ढक रही थी , इसलिए विकास की आँखों के सामने मेरी बड़ी गांड नंगी ही थी. पैंटी उतरने से मेरी चूत के आगे लगा पैड गिर जाता इसलिए विकास ने नितंबों के बीच की दरार से पैंटी के कपड़े को उठाया और दाएं नितंब के ऊपर खिसका दिया. फिर उसने मेरी जांघों को फैलाया और मेरी गांड की दरार में मुँह लगाकर जीभ से चाटने लगा.

“उूउऊहह…...”

मैं कामोत्तेजना से काँपने लगी. मेरी नंगी गांड को चाटते हुए विकास भी बहुत कामोत्तेजित हो गया था. पहले उसने मेरे दोनों नितंबों को एक एक करके चाटा फिर दोनों नितंबों को अपनी अंगुलियों से अलग करके मेरी गांड की दरार को चाटने लगा. वो मेरी गांड के मुलायम माँस पर दाँत गड़ाने लगा और मेरी गांड के छेद को चाटने लगा. उसके बाद विकास मेरी गांड के छेद में धीरे से अंगुली करने लगा.

“आआआअहह…... ओह्ह ….”

उसकी अंगुली के अंदर बाहर होने से मेरी सांस रुकने लगी. उसने छेद में अंगुली की और उसे इतना चाटा की मुझे लगा छेद थोड़ा खुल रहा है और अब थोड़ा बड़ा दिख रहा होगा. मैंने भी अपनी गांड को थोड़ा फैलाया ताकि छेद थोड़ा और खुल जाए.

विकास – बाबूलाल , नाव में तेल है क्या ?

मैं विकास के अचानक किए गये सवाल से काँप गयी. कामोत्तेजना में मैं तो भूल ही गयी थी की नाव में कोई और भी है जो हमारी कामक्रीड़ा देख रहा है. 

बाबूलाल – हाँ विकास भैय्या. मैं ला के दूँ क्या ?

विकास ने हाँ में सर हिलाया और वो एक छोटी तेल की शीशी ले आया. मैं नीचे को मुँह किए लेटी थी इसलिए मुझे बाबूलाल के सिर्फ़ पैर दिख रहे थे. वो मेरे नंगे बदन से सिर्फ़ एक फीट दूर खड़ा था. तेल देकर बाबूलाल चला गया. विकास ने अपने खड़े लंड पर तेल लगाकर उसे चिकना किया.

विकास – मैडम अब आपको थोड़ा सा दर्द होगा पर उसके बाद बहुत मज़ा आएगा.

अब तेल से भीगे हुए लंड को उसने मेरी गांड के छेद पर लगाया.

“विकास प्लीज़ धीरे से करना….”

मैंने विकास से विनती की. विकास ने धीरे से झटका दिया , उसके तेल से चिकने लंड का सुपाड़ा मेरी गांड के छेद में घुसने लगा. मुझे ज़्यादा तकलीफ़ नही हुई क्यूंकी चिकनाई की वजह से उसका लंड छेद में धीरे धीरे अंदर घुसता चला गया. अब वो लंड को गांड में अंदर बाहर करने लगा. मैंने नाव के फर्श को पकड़ लिया . विकास ने मेरे बदन के नीचे हाथ घुसाकर मेरी चूचियों को पकड़ लिया और उन्हें दबाने लगा.

“ओह्ह …..बहुत मज़ा आ रहा है…...”

मैंने विकास को और ज़्यादा मज़ा देने के लिए अपनी गांड को थोड़ा ऊपर को धकेला और अपनी कोहनियों के बल लेट गयी . इससे मेरी चूचियाँ हवा में उठ गयी और दो आमों की तरह विकास ने उन्हें पकड़ लिया. सच कहूँ तो मुझे थोड़ा दर्द हो रहा था पर शुक्र था की विकास ने तेल लगाकर चिकनाई से थोड़ा आसान कर दिया था. और वैसे भी वो किसी हड़बड़ाहट में नही था बल्कि बड़े आराम आराम से मेरी गांड की चुदाई कर रहा था. हम दोनों ही धीरे धीरे से कामक्रीड़ा कर रहे थे. वो धीरे धीरे अपना लंड घुसा रहा था और मैं अपनी गांड पीछे को धकेल रही थी , जब तक की उसका लंड जड़ तक मेरे अंदर नही घुस गया. अब उसने धक्के लगाने शुरू किए और मैं उसके हर धक्के के साथ कामोन्माद में डूबती चली गयी. कुछ देर तक वो धक्के लगाते रहा और मैं काम सुख लेती रही. कुछ देर बाद मैं चरम पर पहुँच गयी और मुझे ओर्गास्म आ गया. 

“आआआअहह…...ओह्ह ….” 

पैंटी में लगे पैड को मैंने चूतरस से पूरा भिगो दिया. मेरे साथ ही विकास भी झड़ गया. हम दोनों कुछ देर तक वैसे ही लेटे रहे और ठंडी हवा और नदी की पानी के आवाज़ को सुनते हुए नाव में उस प्यारी रात का आनंद लेते रहे. फिर विकास उठा और अपने अंडरवियर से मेरी गांड में लगा हुआ अपना वीर्य साफ किया. मुझे पता भी नही चला था की कब उसने अपना अंडरवियर उतार दिया था और वो पूरा नंगा कब हुआ. मेरी गांड पोंछने के बाद उसने मेरी पैंटी के सिरों को पकड़कर मेरे दोनों नितंबों के ऊपर फैला दिया. अब मैं कोई शरम नही महसूस कर रही थी , वैसे भी मुझे लगने लगा था की अब मुझमें थोड़ी सी ही शरम बची थी. फिर मैं सीधी हुई और बैठ गयी , मेरा मुँह बाबूलाल की तरफ था. वो मेरी नंगी चूचियों को घूर रहा था. लेकिन मैंने उन्हें छुपाने की कोशिश नही की बल्कि बाबूलाल की तरफ पीठ कर दी. मैंने विकास के लंड को देखा जो अब सारा रस निकलने के बाद केले की तरह नीचे को लटक रहा था. 

“विकास , प्लीज़ मेरे कपड़े दो. मैं ऐसी हालत में अब और नही रह सकती.”

विकास – बाबूलाल , मैडम के कपड़े ले आओ. मैडम , अब तुम नदी के किनारे की तरफ जाना चाहोगी या कुछ देर और नदी में ही ?

“यहीं थोड़ा और वक़्त बिताते हैं.”

विकास – ठीक है मैडम, अभी बैलगाड़ी के मंदिर में आने में कुछ और वक़्त बाकी है.

बाबूलाल ने विकास को मेरे कपड़े लाकर दिए और मैं जल्दी से कपड़े पहनने लगी . मैंने ब्रा पहनी और विकास ने पीछे से हुक लगा दिया. मैं इतना कमज़ोर महसूस कर रही थी की मैंने उसके ‘पति की तरह’ व्यवहार को भी मंजूर कर लिया. मेरी ब्रा का हुक लगाने के बाद वो फिर से मेरी चूचियों को सहलाने लगा.

“विकास अब मत करो. दर्द कर रहे हैं.”

विकास – लेकिन ये तो फिर से तन गये हैं मैडम.

मेरे तने हुए निपल्स को छूते हुए विकास बोला. वो ब्रा के ऊपर से ही अपने अंगूठे और अंगुली के बीच निपल्स को दबाने लगा. मैंने भी उसके मुरझाए हुए लंड को पकड़कर उसको माकूल जवाब दिया.

“लेकिन ये तो तैयार होने में वक़्त लेगा, डियर.” 

हम दोनों हंस पड़े और एक दूसरे को आलिंगन किया. फिर मैंने ब्लाउज पहन लिया और पेटीकोट अपने ऊपर डाल लिया. विकास ने मुझे साड़ी नही पहनने दी और कुछ देर तक उसी हालत में बिठाए रखा.

विकास – मैडम, ऐसे तुम बहुत सेक्सी लग रही हो.

बाबूलाल को भी काफ़ी देर तक मेरे आधे ढके हुए बदन को देखने का मौका मिला और इस नाव की सैर के हर पल का उसने भरपूर लुत्फ़ उठाया होगा. समय बहुत धीरे धीरे खिसक रहा था और उस चाँदनी रात में ठंडी हवाओं के साथ नाव नदी में आगे बढ़ रही थी. हम दोनों एक दूसरे के बहुत नज़दीक़ बैठे हुए थे, एक तरह से मैं विकास की गोद में थी और उस रोमांटिक माहौल में मुझे नींद आने लगी थी. नाव चुपचाप आगे बढ़ती रही और मुझे ऐसा लग रहा था की ये सफ़र कभी खत्म ही ना हो.
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01-17-2019, 01:49 PM,
#26
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
नाव चुपचाप आगे बढ़ती रही और मुझे ऐसा लग रहा था की ये सफ़र कभी खत्म ही ना हो.

तभी विकास की आवाज़ ने चुप्पी तोड़ी.

विकास – मैडम , जानती हो अब मुझे अपराधबोध हो रहा है.

“तुम ऐसा क्यूँ कह रहे हो?”

विकास – मैडम , आज पहली बार मैंने गुरुजी के निर्देशों की अवहेलना की है. उन्होने मंदिर में आरती के लिए ले जाने को बोला था और हम यहाँ आकर मज़े कर रहे हैं.

वहाँ का वातावरण ही इतना शांत था की आदमी दार्शनिक बनने लग जाए. मुझे लगा विकास का भी यही हाल हो रहा है.

“लेकिन विकास, लक्ष्य तो मुझे……..” 

विकास – नही नही मैडम . मैं अपने आचरण से भटक गया. अब मुझे बहुत अपराधबोध हो रहा है.

“कभी कभी जिंदगी में ऐसी बातें हो जाती हैं. विकास मुझे देखो. मैं एक शादीशुदा औरत हूँ और मैं भी तुम्हारे साथ बहक गयी.”

विकास – मैडम , तुम्हारी ग़लती नही है. तुम यहाँ अपने उपचार के लिए आई हो और गुरुजी के निदेशों के अनुसार तुम्हारा उपचार चल रहा है. मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं एक अपराधी हूँ. जो कुछ भी मैंने किया उसे मैं कभी भी गुरुजी को बता नही सकता , मुझे ये बात उनसे छुपानी पड़ेगी.

विकास कुछ देर चुप रहा . फिर बोलने लगा. वो एक दार्शनिक की तरह बोल रहा था.

विकास – मैडम , क्या कोई ऐसी घटना हुई है जिसके बाद तुम्हें गिल्टी फील हुआ हो ? जब तुमने मजबूरी या अंजाने में कुछ किया हो ? अगर नही तो फिर तुम नही समझ पाओगी की इस समय मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ.

मैं सोचने लगी. तभी मुझे याद आया…..

“हाँ विकास, शायद तुम सही हो.”

विकास – मैडम , तुम्हें याद है उस दिन तुम्हारी मनस्थिति कैसी थी ? तब तुम मेरी मनस्थिति समझ पाओगी.

“हम्म्म …….विकास मेरे जीवन में भी एक ऐसी घटना हुई है, पर तब मैं छोटी थी.”

विकास – उम्र से कोई फरक नही पड़ता मैडम, बात भावनाओं की है. मुझे बताओ क्या हुआ था तुम्हारे साथ ?

मैंने गहरी सांस ली, विकास ने मेरे पुराने दिनों की घटना को याद करने पर मजबूर कर दिया था.

“लेकिन विकास, ये कोई ऐसी घटना नही है जिसे मैं गर्व से सुनाऊँ. वो तो मेरे ह्युमिलिएशन की कहानी है पर उस उम्र में मैं नासमझ थी और इस बात को नही समझ पाई थी.”

विकास – देखो मैडम , कुछ हो जाने के बाद ही समझ आती है. तुम्हारी घटना में , उस दिन हो सकता है तुम्हारी कुछ विवशता रही होगी. वही मेरे साथ भी हुआ. आज सुबह अगर तुमने मुझ पर ज़ोर नही डाला होता तो शायद मैं गुरुजी के निर्देशों की अवहेलना करने की हिम्मत नही कर पाता. 

“हम्म्म ……ठीक है अगर तुम इतने ही उत्सुक हो तो मैं तुम्हें सब कुछ बताने की कोशिश करती हूँ की उस दिन क्या हुआ था….”

फ्लॅशबॅक :-

मुझे आज भी अच्छी तरह से वो दिन याद है, तब मैं 18 बरस की थी और स्कूल में पढ़ती थी. वो शनिवार का दिन था. सीतापुर में हमारा संयुक्त परिवार था. मेरे पिताजी और चाचजी का परिवार एक ही साथ रहता था. मेरी दादीजी भी तब जिंदा थी. इतने लोग होने से घर में हर समय कोई ना कोई रहता था. पर उस दिन कुछ अलग था. मेरी मा के एक रिस्त्ेदार की मृत्यु हो गयी थी तो मेरी मा, पिताजी, चाचिजी और मेरी दीदी नेहा सब उस रिस्त्ेदार के घर चले गये. मेरी दादीजी भी उनके साथ चली गयी. मैं घर में अकेली रह गयी. मेरे चाचू नाइट ड्यूटी पर थे , जब वो ड्यूटी से वापस आए तक तक सब लोग जा चुके थे.

चाचू अपनी नाइट ड्यूटी से सुबह 8 बजे वापस आते थे और फिर नाश्ता करके अपने कमरे में सोने चले जाते थे फिर दोपहर में उठते थे. हमारे घर में रोज़ सुबह 6 बजे आया आती थी , वो खाना बनती थी, कपड़े धोती थी और झाड़ू पोछा करके चली जाती थी. उस दिन मेरी छुट्टी थी , चाचू सोने चले गये तो मैं अकेली बोर होने लगी. फिर मैंने सोचा नेहा दीदी की अलमारी में से कहानियाँ या फिल्मी कितबे निकालकर पड़ती हूँ. वो मुझे कभी अपनी किताबों में हाथ नही लगाने देती थी. ‘तेरे मतलब की नही हैं’ कहती थी इसलिए मुझे बड़ी इक्चा होती थी की उन किताबों में क्या है . आज मेरे पास अक्चा मौका था. हमारे घर में रदिवादी माहौल था और मुझे लड़कियों के स्कूल में पदाया गया , मैं उस समय मासूम थी, उत्सुकता होती थी पर जानती कुछ नही थी.

मैंने चाचू के कमरे में झाँका, सो रहे हैं या नही. चाचू लापरवाही से सो रहे थे. उनकी लुंगी कमर तक उठी हुई थी. उनकी बालों से भारी टाँगे नंगी थी. उनका नीले रंग का कच्छा भी दिख रहा था. कच्छे में कुछ उभार सा दिख रहा था. मुझे कुछ समझ नही आया वो क्या था, मैंने धीरे से उनका दरवाज़ा बंद किया और चली आई. फिर दीदी की अलमारी खोलकर उसमें किताबें ढोँढने लगी. नेहा दीदी उन दीनो कॉलेज में पड़ती थी. मैंने देखा वो फिल्मी किताबें नही थी पर हिन्दी कहानियों की किताबें थी. उन कहानियों के नाम बड़े अजीब से थे, जैसे ‘नौकरानी बनी बीवी, रुक्मिणी पहुची मीना बेज़ार, डॉक्टर या शैतान, भाभी मेरी जान’ वगेरेह वगेरेह.

हर कहानी के साथ पिक्चर्स भी थी और उनमें कुछ पिक्चर्स बहुत कम कपड़े पहने हुए लड़कियों और औरतों की भी थी. उन पिक्चर्स को देखकर मेरे कान गरम होने लगे और मेरे बदन में कुछ होने लगा. एक कहानी में बहुत सारी पिक्चर्स थी, एक आदमी एक लड़की को होठों पर चुंबन ले रहा था, दूसरी फोटो में दोनो हाथों से उसकी चुचियाँ दबा रहा था वो लड़की सिर्फ़ ब्रा पहने थी. अगली फोटो में वो आदमी उसकी नंगी टॅंगो को चूम रहा था और लड़की से सिर्फ़ पैंटी पहनी हुई थी. लास्ट फोटो में लड़की ने ब्रा भी नही पहनी हुई थी और वो आदमी उसके निपल्स को चूस रहा था. वो फोटोस देखकर मेरी साँसे भारी हो गयी और मैंने जल्दी से किताब बंद कर दी. 

“रश्मि , रश्मि….”

चाचू मुझे आवाज़ दे रहे थे.

“आ रही हूँ चाचू, एक मिनट…”

मैंने जल्दी से वो किताबें दीदी की अलमारी में रखी और चाचू के पास चली गयी. जब मैं चाचू के कमरे में पहुँची तो अभी भी मेरी साँसे भारी थी. मैंने नॉर्मल दिखने की कोशिश की पर…

चाचू – रश्मि , दो कदम चलने में तू हाँफ रही है ? क्या बात है ?

“कुछ नही चाचू, ऐसे ही.”

चाचू मेरी चुचियों की तरफ देख रहे थे. मेरे टॉप और ब्रा के अंदर चुचियाँ मेरी गहरी सांसो के साथ उपर नीचे हो रही थी. मैंने बात बदलनी चाही.

“चाचू आप मुझे बुला रहे थे , कोई काम है क्या ?”

खुसकिस्मती से चाचू ने उस बात पर ज़ोर नही दिया की मैं क्यूँ हाँफ रही थी. पर मेरे दोनो संतरों को घूरते हुए उन्होने मुझसे फल काटने वाला चाकू लाने को कहा. मैं उनके कमरे से चली आई और सबसे पहले अपने को शीशे में देखा. मैं तोड़ा हाँफ रही थी और उससे मेरा टॉप तोड़ा उठ रहा था. उस समय मेरी चुचियाँ छोटी पर कसी हुई थी एकद्ूम नुकीली. तब मैं पतली थी पर मेरे नितंब बाकी बदन के मुक़ाबले कुछ भारी थे. उन दीनो मैं घर में टॉप और स्कर्ट पहनती थी. 

उन दीनो मेरी लंबाई बाद रही थी और मेरी स्कर्ट जल्दी जल्दी छोटी हो जाती थी. मेरी मम्मी बाहर के लिए लंबी और घर के लिए छोटी स्कर्ट पहेन्ने को देती थी. वो पुरानी स्कर्ट को फेंकती नही थी. घर में छोटी स्कर्ट पहनने पर मम्मी कुछ नही कहती थी पर बाहर के लिए वो ध्यान रखती थी की घुटनो से नीचे तक लंबी स्कर्ट ही पहनु. मैं दीदी के साथ सोती थी और सोते समय मैं पुरानी स्कर्ट पहन लेती थी जो बहुत छोटी हो गयी थी. 
पिछले दो साल से मैं घर पे भी हमेशा ब्रा पहने रखती थी. क्यूंकी मेरी मम्मी कहती थी,”तेरी दूध अब बड़ी हो गयी है रश्मि. हमेशा ब्रा पहना कर.”

मैंने चाकू लिया और चाचू के कमरे में चली गयी. जब मैं अंदर घुसी तो वो कपड़े बदल रहे थे. अगर चाची घर में होती तो वो निसचीत ही टॉवेल यूज करते या दीवार की तरफ मुँह करते , लेकिन आज वो खुले में क्पडे बदल रहे थे. मुझे ऐसा लगा जैसे वो मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे. जैसे ही मैं अंदर आई वो अपनी लुंगी उतरने लगे. बनियान उन्होने पहले ही उतार दी थी. अब वो सिर्फ़ कच्छे में थे. मैंने शरम से नज़रें झुका ली और चाकू टेबल पर रखकर जाने लगी.

चाचू – रश्मि , अलमारी से मेरी एक लुंगी देना.

“जी चाचू…”

मैंने अलमारी खोली और एक लुंगी निकाली. जब मैं मूडी तो देखा चाचू मुझसे सिर्फ़ दो फीट पीछे खड़े हैं. वो बड़े अजीब लग रहे थे , पुर नंगे सिर्फ़ एक कच्छे में, और उस कच्छे में बड़ा सा उभार सॉफ दिख रहा था. मुझे बहुत अनकंफर्टबल महसूस हो रहा था और बार बार मेरी निगाहें उनके कच्छे पर चली जा रही थी. मैंने चाचू को लूँगी दी और जल्दी से कमरे से बाहर आ गयी. मैं अपने कमरे में आकर सोचने लगी आज चाचू अजीब सा व्यवहार क्यूँ कर रहे हैं. ऐसे मेरे सामने तो उन्होने कभी अपने कपड़े नही उतारे थे.

दीदी की किताबें देखकर मुझे पहले ही कुछ अजीब हो रहा था और अब चाचू के व्यवहार से मैं और कन्फ्यूज़ हो गयी. दिमाग़ को शांत करने के लिए मैंने हेडफोन लगाया और म्यूज़िक सुनने लगी.आधे घंटे बाद मैं नहाने चली गयी. हमारा घर पुराना था इसलिए उसमेंसबके लिए एक ही बाथरूम था. मैंने दूसरे कपड़े लिए, फिर ब्रा पैंटी और टॉवेल लेकर नहाने के लिए बाथरूम चली गयी.
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01-17-2019, 01:49 PM,
#27
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हमारा घर पुराना था इसलिए उसमें सबके लिए एक ही बाथरूम था. मैंने दूसरे कपड़े लिए, फिर ब्रा, पैंटी और टॉवेल लेकर नहाने के लिए बाथरूम चली गयी.

मैंने नहा लिया था तभी चाचू की आवाज़ आई…....

चाचू – रश्मि, एक बार दरवाज़ा खोल जल्दी, मेरी अंगुली कट गयी है.

धप, धप…...चाचू बाथरूम के दरवाज़े को खटखटा रहे थे. पर मैं उलझन में थी. क्यूंकी मैंने नहा तो लिया था पर मैं नंगी थी और मेरा बदन पानी से गीला था.

“चाचू मैं तो नहा रही हूँ.”

चाचू – रश्मि , मेरा बहुत खून निकल रहा है, जल्दी से दरवाज़ा खोल.

चाचू दरवाज़ा खोलने पर ज़ोर दे रहे थे इसलिए मैं जल्दी जल्दी अपने गीले बदन को टॉवेल से पोछने लगी.

“चाचू, एक मिनट प्लीज़. कपड़े तो पहनने दो.”

चाचू अब कठोर आवाज़ में हुक्म देने लगे.

चाचू – इतना खून निकल रहा है इधर, तुझे कपड़े की पड़ी है. तू नंगी ही निकल आ.

चाचू की बेहूदी बात सुनकर मुझे झटका लगा पर मैंने सोचा शायद उनका बहुत खून निकल रहा है इसलिए वो चाह रहे हैं की मैं बाथरूम से तुरंत बाहर आ जाऊँ. मैं जल्दी जल्दी टॉवेल से बदन पोछने लगी पर चाचू अधीर हो रहे थे.

चाचू – रश्मि , क्या हुआ ? अरे नंगी आने में शरम आती है तो टॉवेल लपेट ले. लेकिन भगवान के लिए जल्दी निकल.

“जी चाचू.”

मैंने जल्दी से अपने बदन पर टॉवेल लपेट लिया लेकिन मुझे लग रहा था की मेरे जवान बदन को टॉवेल अच्छे से नही ढक पा रहा है. लेकिन इस बारे में सोचने का वक़्त नही था क्यूंकी चाचू दरवाज़े को पीटने लगे थे और मुझे दरवाज़ा खोलना पड़ा. दरवाज़ा खोलते ही चाचू तुरंत अंदर घुस आए और नल खोलकर पानी के नीचे अपनी अंगुली लगा दी. मुझे ये देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ की अंगुली में बड़ा कट नही लगा था , कम से कम जितना हल्ला वो मचा रहे थे और ज़बरदस्ती मुझसे दरवाज़ा खुलवा लिया था , उसे देखकर तो मुझे लगा था शायद ज़्यादा कट गया होगा.

चाचू – कितना खून निकल रहा है, देख रश्मि.

“हाँ चाचू.”

मुझे चाचू के खून से ज़्यादा अपने बिना कपड़ों के बदन की फिक्र हो रही थी. मैंने टॉवेल से अपनी हिलती डुलती चूचियों को ढक रखा था पर मेरी गोरी जाँघें और टाँगें पूरी नंगी थीं. मैंने अपनी चूचियों के ऊपर टॉवेल में गाँठ लगा रखी थी पर मुझे हिलने डुलने में डर लग रहा था , कहीं टॉवेल खुल ना जाए और मैं नंगी हो जाऊँ. चाचू अपनी अंगुली धोते हुए बीच बीच में मुझे देख रहे थे.

चाचू – रश्मि , तू तो अब सचमुच बड़ी हो गयी है.

मैं हँसी और मासूमियत से जवाब दिया.

“चाचू , आज मालूम पड़ा आपको ?”

चाचू – नही रश्मि वो बात नही. टॉवेल में तो तुझे आज पहली बार देख रहा हूँ ना , इसलिए.

मैं शरमा गयी और खी खी कर हँसने लगी. मुझे समझ ही नही आया क्या जवाब दूँ.

चाचू – आज तक टॉवेल में तो मैंने सिर्फ़ तेरी चाची को देखा है.

हम दोनों हंस पड़े.

चाचू – गुड , अब खून बहना लगभग रुक गया है . अब किसी चीज़ को लपेट लेता हूँ.

ऐसा कहते हुए चाचू इधर उधर देखने लगे. मैंने अपने कपड़े उतार कर धोने के लिए बाल्टी में रखे हुए थे और पहनने वाले कपड़े , मेरी नीली स्कर्ट और सफेद टॉप हुक में लटका रखे थे. मेरी ब्रा और पैंटी नल के ऊपर रखी हुई थी क्यूंकी टॉवेल से बदन पोछकर उनको मैं पहनने ही वाली थी पर चाचू ने जल्दबाज़ी मचा कर दरवाज़ा खुलवा दिया. चाचू ने नल के ऊपर से मेरी पैंटी उठा ली, मैं तो हैरान रह गयी.

चाचू – फिलहाल इसी से काम चला लेता हूँ. बाद में पट्टी बांध लूँगा.

“पर चाचू वो तो मेरी ……”

चाचू ने मेरी गुलाबी पैंटी उठा ली थी , मैंने ऐतराज किया.

चाचू – ‘वो तो मेरी’ क्या ? तू भी ना. जा कमरे में जा और दूसरी पैंटी पहन ले.

ऐसा कहते हुए चाचू ने मेरी पैंटी को फैलाया और देखने लगे. मुझे बहुत शरम आई क्यूंकी वो अपने चेहरे के नज़दीक़ लाकर ध्यान से मेरी पैंटी को देख रहे थे. मैंने वहाँ पर खड़े रहना ठीक नही समझा और अपने कमरे में जाने लगी.

“चाचू मैं कमरे में जाकर कपड़े पहन लेती हूँ. फिर आकर आपकी पट्टी बांध दूँगी.”

चाचू – ठीक है जा, पर जल्दी आना.

अपने कमरे में आकर मैंने राहत की सांस ली और जल्दी से दरवाज़ा बंद कर दिया. इतनी देर तक चाचू के पास नंगे बदन पर सिर्फ टॉवेल लपेट कर खड़े रहने से अब मेरी साँसें भारी हो गयी थीं. मैंने कपड़ों की अलमारी खोली और एक सफेद ब्रा और सफेद पैंटी निकाली. उसके ऊपर नीला टॉप और मैचिंग नीली स्कर्ट पहन ली. लेकिन जब मैंने अपने को शीशे में देखा तो उस नीली स्कर्ट में मेरी टाँगें दिख रही थी. वो स्कर्ट पुरानी थी और छोटी हो गयी थी. मैं हिचकिचायी की पहनूं या उतार दूं, फिर मैंने सोचा घर में ही तो हूँ. वो स्कर्ट मेरे घुटनों से ऊपर आ रही थी और मेरी आधी जाँघें दिख रही थीं.

फिर मैं चाचू की अंगुली में पट्टी बांधने उनके कमरे में चली गयी. चाचू बेड में बैठे हुए थे . जैसे ही मैं अंदर गयी उन्होंने मुझसे बड़ा अजीब सवाल पूछा.

चाचू – रश्मि, तू मुझसे झूठ क्यूँ बोली ?

मैं चाचू के पास आई. मैंने देखा उन्होंने अपनी अंगुली में मेरी गुलाबी पैंटी को लपेट रखा है. ये देखकर मुझे बहुत शरम महसूस हुई.

“झूठ ? कौन सा झूठ चाचू ?”

चाचू – तू बोली की ये तेरी पैंटी है.

“हाँ चाचू , ये मेरी ही तो है.”

चाचू – एक बात बता रश्मि. तू तेरी चाची से बड़ी है या छोटी ?

मुझे समझ नही आ रहा था , चाचू कहना क्या चाहते हैं.

“छोटी हूँ. चाचू ये भी कोई पूछने वाली बात है ?”

चाचू – वही तो. अब बोल की ये कैसे हो सकता है की तेरी चाची तुझसे छोटी पैंटी पहनती है ?

“क्या..??”

मुझे आश्चर्य हुआ और चाचू के ऐसे भद्दे कमेंट पर झुंझुलाहट भी हुई. पर चाचू बात को लंबा खींचते रहे.

चाचू – तू जब चली गयी तो मैंने देखा की ये पैंटी तो तेरी चाची जो पहनती है उससे बड़ी है. ये कैसे हो सकता है ?

मैं मासूमियत से बहस करते रही पर इससे सिचुयेशन मेरे लिए और भी ज़्यादा ह्युमिलियेटिंग हो गयी.

“चाचू, आप को कैसे पता होगा चाची के अंडरगार्मेंट्स के बारे में ? आप तो खरीदते नही हो उनके लिए .”

चाचू – सिर्फ़ खरीदने से ही पता चलता है ? रश्मि तू भी ना.

“चाचू , आप हवा में बात करोगे तो मैं मान लूँगी क्या ?”

चाचू – रश्मि, मैं तेरी चाची को रोज देखता हूँ . सुबह नहाकर मेरे सामने पैंटी पहनती है. और तू बोल रही है मैं हवा में बात फेंक रहा हूँ ?

अपनी चाची के बारे में ऐसा कमेंट सुनकर मैं स्तब्ध रह गयी. मेरी चाची का मेरी मम्मी के मुक़ाबले भारी बदन था. उसकी बड़ी चूचियाँ और बड़े नितंब थे. मैं अपने मन में उस दृश्य की कल्पना करने लगी , जैसा की चाचू ने बताया था , चाची नहाकर बाथरूम से बाहर आ रही है और चाचू के सामने पैंटी पहन रही है.

मैं सोचने लगी , चाची क्या नंगी बाहर आती है बाथरूम से ? या फिर आज जैसे मैं निकली चाचू के सामने वैसे ?

अपने चाचू के सामने ऐसी बातें सोचकर मेरा गला सूखने लगा.

चाचू – ठीक है, तू यकीन नही कर रही है ना. मेरे साथ आ इधर.

चाचू खड़े हो गये और अपनी अलमारी के पास गये. मैं भी उनके पीछे गयी. उन्होंने अलमारी खोली और कुछ पल कपड़े उलटने पुलटने के बाद चाची की दो पैंटीज निकाली. चाचू ने चाची की पैंटी मुझे दिखाई , मेरे बदन में गर्मी बढ़ने लगी. वो पैंटी इतनी छोटी थी की शरम से मेरा सर झुक गया.

चाचू – अब बोल रश्मि , क्या मैं ग़लत बोल रहा था ?

चाचू ने अपनी अंगुली से मेरी पैंटी खोल दी और चाची की पैंटी से नापने लगे.

चाचू – तू 18 साल की है और तेरी चाची 35 साल की है. दोनों की पैंटी देखकर मुझे तो उल्टा लग रहा है. 

चाचू अपनी बात पर खुद ही हंस पड़े. मुझे कुछ जवाब देना था, पर जो मैंने कहा उससे मैं और भी फँस गयी.

“जी चाचू मुझे तो इसकी साइज देखकर शरम आ रही है."

चाचू – तू शरम की बात कर रही है, लेकिन तेरी चाची तो बोलती है आजकल ये सब फैशन है. ये देख . ये सब मैगजीन्स देखके तो वो ये सब ख़रीदती है.

चाचू ने दो तीन इंग्लिश मैगजीन्स मेरे आगे रख दी. मैंने एक मैगजीन उठाकर देखी, उसका नाम ‘कॉस्मोपॉलिटन’था. मैंने उसके पन्ने पलटे तो उसमें सिर्फ़ ब्रा और पैंटी पहनी हुई लड़कियों की बहुत सारी फोटोज थीं. कुछ लड़कियाँ टॉपलेस भी थीं, इतनी सारी अधनंगी फोटोज देखकर मेरा सर चकराने लगा. मुझे बहुत हैरानी हुई की चाची ऐसी मैगजीन्स देखती है. मेरी मम्मी तो हमें फिल्मी मैगजीन्स भी नही देखने देती थी क्यूंकी उनमें हीरोइन्स की बदन दिखाऊ फोटोज होती थीं.

मैं चाचू के सामने ऐसी अधनंगी फोटोज देखकर बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रही थी. मुझे समझ नही आ रहा था की क्या करूँ , कैसे इस सिचुयेशन से बाहर निकलूं ? लेकिन चाचू ने मुझे और भी ज़्यादा ह्युमिलियेटिंग बातों और सिचुयेशन में घसीट लिया.
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01-17-2019, 01:49 PM,
#28
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मुझे समझ नही आ रहा था की क्या करूँ , कैसे इस सिचुयेशन से बाहर निकलूं ? लेकिन चाचू ने मुझे और भी ज़्यादा ह्युमिलियेटिंग बातों और सिचुयेशन में घसीट लिया.

चाचू – तो रश्मि मैंने साबित कर दिया ना की ये पैंटी तेरी नहीं हो सकती. मुझे लगता है की ये जरूर तेरी मम्मी की होगी.

मेरी पैंटी की तरफ इशारा करते हुए चाचू बोले. मैं अभी भी मासूमियत से अपनी बात रख रही थी.

“नहीं नहीं ये मम्मी की नहीं है. मम्मी तो …..”

मेरी ज़ुबान से मेरी मम्मी का राज चाचू के सामने खुल ही गया था की मैं चुप हो गयी. मेरी मम्मी तो अक्सर पैंटी पहनती ही नहीं थी सिर्फ पीरियड्स के दिनों को छोड़कर. लेकिन ये बात मैं चाचू से कैसे बोल सकती थी ? मैंने जल्दी से बात बदलनी चाही.

“चाचू एक काम करते हैं. चलिए मैं आपको अपनी अलमारी दिखाती हूँ , अगर उसमें इसी साइज की और भी पैंटी मिल जाएँ तब तो आपको यकीन हो जाएगा ना ?”

चाचू – ये ठीक रहेगा चल.

मैंने मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया की ठीक समय पर मैंने अपनी जबान को लगाम लगाई और मम्मी का राज खुलने से बच गया पर मुझे क्या पता था की कुछ ही देर में मुझे बहुत से राज खोलने पड़ेंगे. चाचू और मैं मम्मी के कमरे में आ गये. चाचू मेरे मम्मी पापा के बेडरूम में शायद ही कभी आते थे. 

मैंने चाचू के सामने कपड़ों की अलमारी खोली. इसमें सिर्फ औरतों के कपड़े थे. मेरी मम्मी , नेहा दीदी और मेरे. उसमें तीन खाने थे. सबसे ऊपर के खाने में मम्मी के कपड़े थे, बीच वाले खाने में मेरे और सबसे नीचे वाले खाने में नेहा दीदी के कपड़े थे. मैंने अपने वाले खाने में कपड़े उल्टे पुल्टे और एक पैंटी निकालकर चाचू को दिखाई.

“ये देखिए चाचू, सेम साइज की है की नहीं ?”

चाचू ने पैंटी को पकड़ा और दोनों हाथों से फैलाकर देखने लगे. ऐसा लग रहा था की पैंटी फैलाकर वो देखना चाह रहे हैं की वो पैंटी मेरे नितंबों को कितना ढकती है. उनके खुलेआम ऐसा करने से मुझे बड़ी शरम आई. तभी उनकी नजर एक पैंटी पर पड़ी जो सबसे नीचे वाले खाने में थोड़ी बाहर को निकली थी.

चाचू – ये किसकी है ? भाभी की ?

“नहीं चाचू. ये तो नेहा दीदी की है.”

मैंने मासूमियत से जवाब दिया. चाचू ने उस पैंटी को भी निकाल लिया और दोनों पैंटी को कंपेयर करने लगे. नेहा दीदी की पैंटी भी मेरी पैंटी से थोड़ी छोटी थी. इसकी वजह ये थी की मेरी पैंटी मम्मी ख़रीदती थी और वो बड़ी पैंटी लाती थी जिससे स्कर्ट के अंदर मेरे नितंबों का अधिकतर हिस्सा ढका रहे. लेकिन नेहा दीदी अपनी पैंटी खुद ही ख़रीदती थी. 

कई बार मैंने देखा था की नेहा दीदी की पैंटी उसके बड़े नितंबों को ढकती कम है और दिखाती ज़्यादा है. जब मैंने उससे पूछा,”दीदी इस पैंटी में तो तुम्हारा आधा पिछवाड़ा भी नहीं ढक रहा”. तो नेहा दीदी ने जवाब दिया, “जब तू बड़ी हो जाएगी ना तब समझेगी ऐसी पैंटी पहनने का मज़ा.”

चाचू – रश्मि ये देख. ये पैंटी भी तेरी वाली से छोटी है.

“चाचू इसमें मैं क्या कर सकती हूँ. मम्मी मेरे लिए इसी टाइप की ख़रीदती है.”

चाचू – अरे तो ऐसा बोल ना. इसीलिए मुझे समझ में नहीं आ रहा था.

भगवान का शुक्र है. चाचू को समझ में तो आया. 

चाचू अभी भी नेहा दीदी की पैंटी को गौर से देख रहे थे.

चाचू – रश्मि एक बात बता. तू बोली की भाभी तेरे लिए ख़रीदती है. तो नेहा के लिए भी ख़रीदती है क्या ?

“नहीं चाचू. दीदी अपनी इनर खुद ख़रीदती है. एक दिन तो मम्मी और दीदी की इस बारे में लड़ाई भी हुई थी. मम्मी को तो इस टाइप की अंडरगार्मेंट्स बिल्कुल नापसंद है.”

चाचू – देख रश्मि, मैं तो भाभी को इतने सालों से देख रहा हूँ. वो बड़ी कन्सर्वेटिव किस्म की औरत है.

अब मैं अपने को रोक ना सकी और मासूमियत से मम्मी के निजी राज खोल दिए. उस उमर में मैं नासमझ थी और नहीं समझ पाई की चाचू बातों में फँसाकर मुझसे अंदरूनी राज उगलवा रहे हैं और उनका मज़ा ले रहे हैं.

“चाचू आप नहीं जानते , मम्मी सिर्फ मेरे और दीदी के बारे में ही कन्सर्वेटिव है.”

चाचू – नहीं नहीं , ये मैं नहीं मान सकता. भाभी जिस स्टाइल से साड़ी पहनकर बाहर जाती है. घर में जिस किस्म की नाइटी पहनती है…..

मैंने अलमारी के सबसे ऊपरी खाने से कपड़ों के नीचे दबी हुई एक नाइटी निकाली और चाचू की बात काट दी.

“ये देखिए चाचू. ये क्या कन्सर्वेटिव ड्रेस है ?”

वो गुलाबी रंग की नाइटी थी और साधारण कद की औरत के लिए बहुत ही छोटी थी.

चाचू – वाउ.

“मम्मी ये कभी कभार सोने के वक़्त पहनती है.”

चाचू – ये तो कोई फिल्मी ड्रेस से कम नहीं.

“हाँ चाचू.”

चाचू अब मम्मी की नाइटी को बड़े गौर से देख रहे थे, ख़ासकर कमर से नीचे के हिस्से को. और फैलाकर उसकी चौड़ाई देख रहे थे.

चाचू – इसकी जो लंबाई है और भाभी की जो हाइट है, ये पहनने के बाद भाभी तो आधी नंगी रहेगी. तूने तो देखा होगा तेरी मम्मी को ये पहने हुए, मैं क्या ग़लत बोल रहा हूँ रश्मि ?

चाचू की बात सुनकर मैं शरमा गयी और सिर्फ सर हिलाकर हामी भर दी. मैंने ज़्यादा बार मम्मी को इस नाइटी में नहीं देखा था.

चाचू – लेकिन इस नाइटी के साथ तो भाभी की कन्सर्वेटिव पैंटी नहीं जमेगी. इसके साथ तो तेरी चाची जैसी पहनती है, वो वाली पैंटी चाहिए.

वो कुछ पल के लिए चुप रहे फिर मुस्कुराते हुए गोला दाग दिया.

चाचू – क्या रे रश्मि, भाभी इस नाइटी के नीचे पैंटी पहनती भी है या नहीं ?

“आप बड़े बेशरम हो. क्या सब पूछ रहे हो चाचू.”

लेकिन मुझे याद था की एक बार मम्मी को जब मैंने ये वाली नाइटी पहने हुए देखा था तो उन्होंने इसके अंदर कुछ भी नहीं पहना था. रात को मम्मी बेड में लेटी हुई थी और पापा उस समय नहा रहे थे. मुझे मम्मी की चूत भी साफ दिख गयी थी. मुझे देखकर मम्मी ने जल्दी से अपने पैरों में चादर डाल ली थी.

चाचू नाइटी को ऐसे देख रहे थे जैसे मम्मी को उसे पहने हुए कल्पना कर रहे हों. मुझे उनकी लुंगी में उभार दिखने लगा था. वो ऐसा लग रहा था जैसे उनकी लुंगी में कोई छोटा सा पोल खड़ा हो. उसको देखते ही मैं असहज महसूस करने लगी. पर जल्दी ही चाचू की रिक्वेस्ट ने मेरी असहजता की सभी सीमाओं को लाँघ दिया.

चाचू – रश्मि तू थोड़ी हेल्प करेगी ? मैं एक चीज देखना चाहता हूँ.

“क्या चीज चाचू ?”

मैंने मासूमियत से पूछा. चाचू मेरी आँखों में बड़े अजीब तरीके से देख रहे थे. उन्होंने मम्मी की सेक्सी नाइटी अपने हाथों में पकड़ी हुई थी.

चाचू – रश्मि मैं तेरी चाची के लिए एक ऐसी नाइटड्रेस खरीदना चाहता हूँ. 

“तो खरीद लीजिए ना, किसने रोका है ? लेकिन आप क्या चीज देखने की बात कर रहे हो ?”

चाचू – देख रश्मि, भाभी को तो मैं देख नहीं सकता इस ड्रेस में. लेकिन खरीदने से पहले किसी को तो देख लूँ इस ड्रेस में. तू क्यू ना एक बार पहन इसको ? कम से कम मुझे आइडिया तो हो जाएगा.

“क्या…...???”

चाचू – रश्मि इसमें सोचने वाली तो कोई बात है नहीं. तेरी मम्मी जब पहन सकती है, तो तू क्यू नहीं ? और आज तो घर में कोई नहीं है.

मैं ऐसा तो नहीं कहूँगी की मेरी कभी इच्छा नहीं हुई उस ड्रेस को पहनने की. पर मुझे कभी उसको पहनने का मौका ही नहीं मिला. पर ये तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी की उसको किसी मर्द के सामने पहनूं. लेकिन अब मैं चाचू को सीधे सीधे मना भी तो नहीं कर सकती थी.

“पर चाचू….”

अब चाचू की टोन भी रिक्वेस्ट से हुकुम देने की हो गयी.

चाचू – रश्मि अभी तो तू मेरे सामने सिर्फ टॉवेल में खड़ी थी. तो इसे पहनने में शरम कैसी ?

“लेकिन चाचू….”

चाचू – बकवास बंद. ये स्कर्ट और टॉप उतार और ये ड्रेस पहन ले.

अब मुझे चाचू का हुकुम मानना ही पड़ा. मैंने चाचू से नाइटी ली और अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया. उन दिनों मेरी लंबाई तेज़ी से बढ़ रही थी और मैं मम्मी से भी थोड़ी लंबी हो गयी थी. आज मैंने और दिनों की अपेक्षा कुछ छोटी स्कर्ट पहनी हुई थी पर ये नाइटी तो और भी छोटी थी. मुझे लगा इस ड्रेस में तो मैं बहुत एक्सपोज हो जाऊँगी.

मैंने अपने सर के ऊपर से टॉप उतार दिया और फिर स्कर्ट को फर्श पे गिरा दिया. मैंने दोनों को हुक पर टाँग दिया. अब मैं सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी. मेरी कसी हुई चूचियाँ सफेद ब्रा में गर्व से तनी हुई थीं. मेरी पैंटी मेरे नितंबों का ज़्यादातर हिस्सा ढके हुए थी. मैंने वो नाइटी अपने बदन के आगे लगा कर देखी तो मुझे लगा की ये तो मेरे नितंबों तक ही पहुँचेगी. मैंने कभी भी इतनी छोटी ड्रेस नहीं पहनी थी. मेरी छोटी से छोटी स्कर्ट भी मेरी आधी जांघों तक आती थी. स्वाभाविक शरम से मेरा हाथ अपनेआप मेरे नितंबों पर पहुँच गया और मैंने पैंटी के कपड़े को खींचकर अपने नितंबों पर फैलाने की कोशिश की ताकि मेरे मांसल नितंब ज़्यादा से ज़्यादा ढक जाए, पर पैंटी जितनी हो सकती थी उतनी फैली हुई थी और अब उससे ज़्यादा बिल्कुल नहीं खिंच रही थी.

चाचू – रश्मि सो गयी क्या ? एक सिंपल सी ड्रेस पहनने में तू कितना टाइम लेगी ?

“चाचू जरा सब्र तो कीजिए.”

मैंने मम्मी की नाइटी अपने सर से नीचे को डाल ली. खुशकिस्मती से ड्रेस मेरी चूचियों को ठीक से ढक रही थी लेकिन कंधों पर बड़ा कट था. इससे मेरी सफेद ब्रा के स्ट्रैप दोनों कंधों पर खुले में दिख रहे थे. ये बहुत भद्दा लग रहा था पर उस नाइटी के कंधे ऐसी ही थे. नाइटी की लंबाई कम होने से वो सिर्फ मेरे गोल नितंबों को ही ढक पा रही थी. 

उस नाइटी का बीच वाला हिस्सा बहुत झीना था. इस बात पर पहले मेरा ध्यान नहीं गया था. पर पहनने के बाद मैंने देखा , इस पतली नाइटी में तो मेरी नाभि और पेट का कुछ हिस्सा दिख रहा है. मैं सोचने लगी,” मम्मी ऐसी ड्रेस कैसे पहन लेती है ? इस उमर में भी वो इतनी बेशरम कैसे बन जाती है ?”

मैंने अपने को शीशे में देखा और मुझे बहुत लज्जा आई , मेरा मुँह शरम से लाल हो गया. मैं ऐसी बनके चाचू के पास जाऊँ या नहीं ? मैं दुविधा में पड़ गयी.

खट …खट …..चाचू दरवाज़ा खटखटाने लगे.

चाचू – रश्मि जल्दी आ.

अब मेरे पास कोई चारा नहीं था सिवाय इसके की मैं दरवाज़ा खोलूं और उस बदन दिखाऊ नाइटी में चाचू के सामने आऊं.
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01-17-2019, 01:49 PM,
#29
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खट …खट …..चाचू दरवाज़ा खटखटाने लगे.

चाचू – रश्मि जल्दी आ.

अब मेरे पास कोई चारा नहीं था सिवाय इसके की मैं दरवाज़ा खोलूं और उस बदन दिखाऊ नाइटी में चाचू के सामने आऊं. हिचकिचाते हुए मैंने दरवाज़ा खोल दिया पर शरम की वजह से मैं कमरे से बाहर नहीं आ पाई. दरवाज़ा खुलते ही चाचू अंदर आ गये और मुझे देखने लगे. मैं सर झुकाए और अपनी टाँगों को चिपकाए हुए खड़ी थी. चाचू की आँखों के सामने मेरी गोरी जाँघें और टाँगें पूरी नंगी थीं.

चाचू – वाउ . रश्मि तू तो बड़ी सेक्सी लग रही है इस ड्रेस में. किसी हीरोइन से कम नहीं.

चाचू के मुँह से ‘सेक्सी’शब्द सुनकर मुझे एक पल को झटका लगा . वो मुझसे काफी बड़ी उम्र के थे और मैंने पहले कभी चाचू से इस तरह के कमेंट्स नहीं सुने थे. लेकिन सच कहूँ तो उस समय अपनी तारीफ सुनकर मुझे खुशी हुई थी. वो मेरे नजदीक़ आए और मेरे पेट को ऐसे छुआ जैसे उन्हें उस ड्रेस में मैं अच्छी लगी हूँ. मैंने देखा उनकी नजरें मेरे पूरे बदन में घूम रही थीं. मैं उस कमरे में चाचू के सामने अधनंगी हालत में खड़ी थी. मैंने ख्याल किया की अब चाचू बाएं हाथ से अपनी लुंगी के आगे वाले हिस्से को रगड़ रहे हैं, बल्कि लुंगी के अंदर वो अपने लंड को सहला रहे थे, ये देखकर मैं बहुत असहज महसूस करने लगी.

चाचू – रश्मि एक काम करते हैं , मेरे कमरे में चलते हैं.

ऐसा कहते हुए चाचू ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे कमरे से बाहर खींच लिया. फिर वो अपने कमरे की तरफ जाने लगे. मेरे पास भी उनके पीछे जाने के सिवा कोई चारा नहीं था. चलते समय ड्रेस का पतला कपड़ा मेरे हर कदम के साथ ऊपर उठ जा रहा था. मुझे चिंता होने लगी की कहीं पीछे से मेरी पैंटी तो नहीं दिख जा रही है. मैं खुद अपने पीछे नहीं देख सकती थी इसलिए मुझे और भी ज़्यादा घबराहट होने लगी. पर जल्दी ही ये बात मुझे खुद चाचू से पता चल गयी.

जब हम चाचू के कमरे में पहुचे तो उन्होंने लाइट्स ऑन कर दी. कमरे में पहले से ही उजाला था इसलिए मुझे समझ नहीं आया की चाचू ट्यूबलाइट और एक तेज बल्ब को क्यूँ जला रहे हैं. कमरे में तेज रोशनी होने से मुझे ऐसा लगा जैसे मैं और भी ज़्यादा एक्सपोज हो गयी हूँ.

“चाचू, लाइट्स क्यूँ जला रहे हो ? उजाला तो वैसे ही हो रहा है.”

चाचू – क्यूँ ? तुझे क्या परेशानी है लाइट्स से ?

“नहीं चाचू परेशानी नहीं है. पर ये ड्रेस इतनी छोटी है की…....”

चाचू – की तुझे शरम आ रही है. है ना ?

मैंने हामी में सर हिला दिया.

चाचू – चल तू आधी नंगी है तो मैं भी वही हो जाता हूँ. तब चीज बराबर हो जाएगी और तुझे शरम नहीं आएगी.

“नहीं चाचू मेरा वो मतलब नहीं……..”

मैं अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी की चाचू ने अपनी लुंगी फर्श पर गिरा दी. मुझे कुछ कहने का मौका दिए बिना उन्होंने अपनी बनियान भी उतार दी. अब वो मेरे सामने सिर्फ कच्छे में खड़े थे और उसमें उभार मुझे साफ दिखाई दे रहा था. कच्छे के अंदर उनका लंड कपड़े को बाहर को ताने हुए बहुत अश्लील लग रहा था. उस समय तक मैंने कभी किसी मर्द को अपने सामने ऐसे नंग धड़ंग नहीं देखा था. मुझे अपने जवान बदन में गर्मी बढ़ती हुई महसूस हुई.

चाचू ने मुझे तेज रोशनी वाले बल्ब के नीचे खड़े होने को कहा. मैंने वैसा ही किया , मेरी आँखें चाचू के कच्छे में खड़े लंड पर टिकी हुई थीं. चाचू की नजरें मेरी गोरी टाँगों पर थी. अब वो मेरे बहुत नजदीक़ आ गये और गौर से मेरे पूरे बदन को देखने लगे. 

चाचू – रश्मि , तेरी ब्रा तो दिख रही है.

“जी चाचू. कंधों पर कोई कवर नहीं है ना इसलिए ब्रा के स्ट्रैप दिख रहे हैं.”

चाचू – ये एक एडवांटेज है तेरी चाची को अगर वो ये ड्रेस पहनती है. क्यूंकी उसके बाल लंबे हैं तो कंधा उससे ढक जाएगा.

“जी चाचू.”

अब चाचू ने मेरे कंधे में ब्रा के स्ट्रैप को छुआ. मेरे कंधे नंगे थे, वहाँ पर सिर्फ ड्रेस के फीते और ब्रा के स्ट्रैप थे. चाचू के मेरी ब्रा के स्ट्रैप को छूने से मेरे बदन में कंपकपी दौड़ गयी.

चाचू – ये क्या फ्रंट ओपन ब्रा है रश्मि ?

वो मेरी ब्रा के स्ट्रैप को छूते हुए पूछ रहे थे. मेरे बहुत नजदीक़ खड़े होने से उनको मेरी थोड़ी सी क्लीवेज भी दिख रही थी. मैं उनको ऐसे अपना बदन दिखाते हुए और उनके अटपटे सवालों का जवाब देते हुए बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रही थी.

“नहीं चाचू. ये बैक ओपन है. फ्रंट ओपन इतनी रिस्की होती है , एक बार हुक खुल गया था तो……..”

चाचू – हम्म्म ……लेकिन तेरी उमर की बहुत सारी लड़कियाँ फ्रंट ओपन ब्रा पहनती हैं क्यूंकी बैक ओपन ब्रा की हुक खोलना और लगाना आसान नहीं है.

“हाँ वो तो है. मैं भी तो कितनी बार नेहा दीदी को बोलती हूँ हुक लगाने के लिए.”

“शुक्र कर आज किसी को बुलाना नहीं पड़ा, नहीं तो मुझे तेरी ब्रा का हुक लगाना पड़ता.

मैं शरमा गयी और खी खी कर हंसने लगी. वो मेरी मासूमियत से खेल रहे थे पर उस समय मुझे इतनी समझ नहीं थी.

चाचू – रश्मि , मैं यहाँ कुर्सी में बैठता हूँ. तू एकबार मेरे सामने से दरवाज़े तक जा और फिर वापस आ.

“पर क्यूँ चाचू ?”

चाचू – तू जब यहाँ आ रही थी मुझे लगा की ड्रेस के नीचे से तेरी पैंटी दिख रही है, तेरे चलने पर दिख रही है. ऐसा तो होना नहीं चाहिए.

ये सुनकर मैं अवाक रह गयी. मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा. शर्मिंदगी से मैं सर भी नहीं उठा पा रही थी. 
मैंने वैसा ही किया जैसा चाचू ने हुकुम दिया था. चलने से पहले मैंने ड्रेस को नीचे खींचने की कोशिश की पर बदक़िस्मती से वो छोटी ड्रेस बिल्कुल भी नीचे नहीं खिंच रही थी.

चाचू – रश्मि तेरी पैंटी तो साफ दिख रही है ड्रेस के नीचे से. तूने सफेद रंग की पैंटी पहनी है ना ?

चाचू के कमेंट से मैंने बहुत अपमानित और शर्मिंदगी महसूस की. मुझे समझ नहीं आ रहा था की क्या करूँ , इसलिए चुपचाप सहन कर लिया. मैंने सर हिलाकर हामी भर दी की सफेद पैंटी पहनी है.

चाचू – अच्छा अब एक बार मेरे पास आ. मैं जरा देखूं इसे कुछ किया जा सकता है की नहीं.

मेरे पास कहने को कुछ नहीं था , मैं चाचू की कुर्सी के पास आ गयी. वो मेरे सामने झुक गये और अब उनकी आँखें मेरी गोरी गोरी जांघों के सामने थीं. अब दोनों हाथों से उन्होंने मेरी ड्रेस के सिरों को पकड़ा और नीचे खींचने की कोशिश की पर वो नीचे नहीं आई.

चाचू – रश्मि , ये ड्रेस तो और नीचे नहीं आएगी. लेकिन एक काम हो सकता है शायद.

मैंने चाचू को उलझन भरी निगाहों से देखा. वो खड़े हो गये.

चाचू – ये जो ड्रेस के फीते तूने कंधे पर बाँधे हैं ना , उनको थोड़ा ढीला करना पड़ेगा, तब ये ड्रेस थोड़ा नीचे आएगी.

उनके सुझाव से मेरे दिल की धड़कन एक पल के लिए बंद हो गयी.

“पर चाचू उनको ढीला करने से तो नेकलाइन डीप हो जाएगी.”

चाचू – देख रश्मि, ये ड्रेस तो तेरी मम्मी की चॉइस है. दाद देनी पड़ेगी भाभी को. या तो पैंटी एक्सपोज करो या फिर ब्रा.

अब ये तो मेरे लिए उलझन वाली स्थिति हो गयी थी. मैंने चाचू पर ही बात छोड़ दी.

“चाचू मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है. मम्मी ने ये कैसी ड्रेस खरीदी है.”

चाचू – तू सिर्फ चुपचाप खड़ी रह. मैं देखता हूँ.

अब चाचू ने मेरे कंधों पर ड्रेस के फीतों को ढीला कर दिया. फीते ढीले करते हुए चाचू ने ड्रेस के अंदर झाँककर मेरी ब्रा से ढकी हुई चूचियों को देखा जो मेरे सांस लेने से ऊपर नीचे हो रही थीं. चाचू ने शालीनता की सभी सीमाओं को लाँघते हुए मेरी ड्रेस को इतना नीचे कर दिया की मेरी आधी ब्रा दिखने लगी और ब्रा के दोनों कप्स के बीच पूरी क्लीवेज दिख रही थी. ड्रेस को इतना नीचे करके अब वो मेरे कंधों पर फीते बाँधने लगे. मैंने विनती करते हुए विरोध करने की कोशिश की .

“चाचू, प्लीज ऐसे नहीं. मेरी आधी दूध दिख रही हैं.”

चाचू – कहाँ दिख रही हैं. मैं तो सिर्फ ब्रा देख पा रहा हूँ.

“आप आज बड़े बेशरम हो गये हो चाचू.”

चाचू ने मेरे कंधों पर फीते ढीले करके बाँध दिए और अब ड्रेस मेरे नितंबों से थोड़ी नीचे तक आ गयी.

चाचू – अब जाके तेरी पैंटी सेफ हुई. एकबार घूम जा.

मैं चाचू की तरफ पीठ करके घूम गयी.
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01-17-2019, 01:50 PM,
#30
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
चाचू – अब जाके तेरी पैंटी सेफ हुई. एकबार घूम जा.

मैं चाचू की तरफ पीठ करके घूम गयी. वो फिर से कुर्सी में झुक गये थे , इससे मेरे बड़े नितंब उनके चेहरे के सामने हो गये. तभी चाचू ने मेरी पैंटी देखने के लिए मेरी नाइटी ऊपर उठा दी. उनकी इस हरकत से मैं स्तब्ध रह गयी और शर्मिंदगी से पीछे भी नहीं मुड़ पायी.

“आउच. चाचू क्या कर रहे हो ?”

मैंने पैंटी से ढके हुए अपने नितंबों पर चाचू की अँगुलियाँ घूमती हुई महसूस की. वो धीमे से मेरे नितंबों को दबा रहे थे. एक हाथ से उन्होंने मेरी ड्रेस को ऊपर उठाया हुआ था और दूसरा हाथ मेरे नितंबों पर घूम रहा था. उनकी इस हरकत से मैं बहुत अटपटा महसूस कर रही थी और शरम से मेरा मुँह लाल हो गया था पर सच कहूँ तो मेरी चूत से रस बहने लगा था. फिर चाचू ने अपना हाथ आगे ले जाकर पैंटी के ऊपर से मेरी चूत को छुआ और उसे सहलाया. मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर पायी और शरम से चाचू से थोड़ी दूर छिटक गयी. 

चाचू – क्या हुआ रश्मि ?

मेरे मुँह से आवाज ही नहीं निकल रही थी. मैं अपने चाचू की तरफ पीठ करके अधनंगी खड़ी थी और वो भी सिर्फ कच्छा पहने हुए थे. मेरी दोनों चूचियाँ ड्रेस नीचे करने के कारण ब्रा के ऊपर से दिख रही थीं. 

अब चाचू कुर्सी से उठ गये और मेरे पास आए.

“चाचू , ये आप ठीक नहीं कर रहे हो.”

हिम्मत जुटाते हुए मैंने अपने पीछे खड़े चाचू से कहा.

चाचू – क्या ठीक नहीं किया मैंने ? मतलब क्या है तेरा ?

अचानक चाचू के बोलने का लहज़ा बदल गया और उनकी आवाज कठोर हो गयी. 

चाचू – क्या बोलना चाहती है तू ?

चाचू में अचानक आए इस बदलाव से मैं थोड़ी डर गयी.

“चाचू मेरा वो मतलब नहीं था.”

चाचू ने मुझे अपनी तरफ घुमाया और मुझसे जवाब माँगने लगे. उनके डर से मेरे मुँह से कोई शब्द ही नहीं निकल रहे थे.

चाचू – रश्मि मैं जानना चाहता हूँ की क्या ठीक नहीं किया मैंने ?

चाचू गुर्राते हुए बोले. मैं बहुत डर गयी थी.

चाचू – तू मेरी गोद में खेल कूद के बड़ी हुई है. तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसा बोलने की ?

चाचू का गुस्सा देखकर मैं इतना डर गयी की मैंने उनके आगे समर्पण कर दिया. घबराहट से मेरी आँखों में आँसू आ गये. मैं चाचू के गले लग गयी और माफी माँगने लगी.

“चाचू मुझे माफ कर दीजिए . मेरा वो मतलब नहीं था.”

मैंने नहीं समझा था की चाचू इस स्थिति का ऐसा फायदा उठाएँगे.

चाचू – क्या माफ. अभी तूने बोला की मैं ये ठीक नहीं कर रहा हूँ. तू बता मुझे क्या ग़लत किया है मैंने ? नहीं तो भाभी को आने दे , मैं उनसे बात करता हूँ.

वो थोड़ा रुके फिर…….

चाचू – भाभी को अगर पता लगा की उनकी ये प्राइवेट ड्रेस मैं देख चुका हूँ तेरे जरिए . तू सोच ले क्या हालत होगी तेरी.

मम्मी से शिकायत की बात सुनते ही मैं बहुत घबरा गयी. चाचू उल्टा मुझे फँसाने की धमकी दे रहे थे. उस समय मैं नासमझ थी और मम्मी का जिक्र आते ही डर गयी. और उस बेवक़ूफी भरे डर की वजह से कुछ ही देर बाद चाचू के हाथों मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा अपमान मुझे सहना पड़ा.

चाचू ने मुझे अपने से अलग किया और मेरे नंगे कंधों को पकड़कर कठोरता से मेरी आँखों में देखा. मम्मी का जिक्र आने से मेरी आवाज काँपने लगी.

“चाचू प्लीज , मम्मी को कुछ मत बोलना.”

चाचू – क्यूँ ? मुझे तो बोलना है भाभी को की उनकी छोटी लड़की अब इतनी बड़ी हो गयी है की अपने चाचा पर अंगुली उठा रही है.

“चाचू प्लीज. मैं बोल तो रही हूँ, आप जो बोलोगे मैं वही करूँगी. सिर्फ मम्मी को मत बोलिएगा.”

चाचू – देख रश्मि , एक बार तेरी चाची भी ग़लत इल्ज़ाम लगा रही थी मुझ पर . लेकिन अंत में उसको मेरे आगे समर्पण करना पड़ा. वो भी यही बोली थी , ‘आप जो बोलोगे मैं वही करूँगी’.

चाचू कुछ पल रुके फिर ….

चाचू – वो मेरी बीवी है जरूर लेकिन मुझ पर ग़लत इल्ज़ाम लगाने का सबक सीख गयी थी उस दिन. पूछ क्या करना पड़ा था तेरी चाची को ?

“क्या करना पड़ा था चाची को ?”

चाचू – बंद कमरे में एक गाने की धुन पर नाचना पड़ा था उसको , नंगी होकर.

“नंगी …………???”

मैंने चाची को नंगी होकर नाचते हुए कल्पना करने की कोशिश की, उसका इतना मोटा बदन था , देखने में बहुत भद्दी लग रही होगी. फिर मुझे डर लगने लगा ना जाने चाचू मुझसे क्या करने को कहेंगे. मैंने चाचू से विनती करने की कोशिश की.

“चाचू मुझ पर रहम करो प्लीज.”

चाचू – चल किया.

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. मैंने चाचू को विस्मित नजरों से देखा.

“सच चाचू ?”

चाचू – हाँ सच. तुझे मैं नहीं बोलूँगा की तू मेरे सामने नंगी होकर नाच.

मुझ पर जैसे बिजली गिरी. मैं चुप रही और सांस रोककर इंतज़ार करने लगी की वो मुझसे क्या चाहते हैं.

चाचू – तुझे कुछ खास नहीं करना रश्मि. सिर्फ मेरे सामने ये ड्रेस उतार दे और अब तो मेरे लंच का टाइम हो गया है, मुझे खाना परोस दे. फिर तेरी छुट्टी.

अगले कुछ पलों तक मुझे ये विश्वास ही नहीं हो रहा था की चाचू मुझसे अपने सामने मेरी ड्रेस उतारने को कह रहे हैं. फिर मैं चाचू से विनती करने लगी पर उनपर कुछ असर नहीं हुआ. अब मैं अपनी ड्रेस उतारने के बाद होने वाली शर्मिंदगी की कल्पना करके सुबकने लगी थी. जब मुझे एहसास हुआ की मैं चाचू को अपना मन बदलने के लिए राज़ी नहीं कर सकती तब मैं कमरे के बीच में चली गयी और ड्रेस उतारने के लिए अपने मन को तैयार करने लगी.

मैंने अपने कंधों से ड्रेस के फीते खोले और मुझे कुछ और करने की जरूरत नहीं पड़ी. फीते खोलते ही ड्रेस मेरे पैरों में गिर गयी. अब मैं चाचू के सामने सिर्फ ब्रा और पैंटी में खड़ी थी. मेरे जवान गोरे बदन के उतार चढ़ाव तेज लाइट में चमक रहे थे. चाचू मुझे कामुक नजरों से देख रहे थे. शर्मिंदगी से मुझे अपना मुँह कहाँ छुपाऊँ हो गयी.

चाचू – चल अब खाना परोस दे.

“चाचू आप एक मिनट रूको, मैं जल्दी से अपने कमरे से एक मैक्सी पहन लेती हूँ . फिर आपका खाना परोस देती हूँ.”

चाचू – रश्मि मैंने क्या बोला था ? मैंने बोला था ‘मेरे सामने ये ड्रेस उतार दे और मुझे खाना परोस दे’. मतलब ये ब्रा और पैंटी पहने हुए तू किचन में जाएगी और मेरे लिए खाना परोसेगी.

मैं गूंगी गुड़िया की तरह चाचू का मुँह देख रही थी.

चाचू – रश्मि , फालतू में मेरा टाइम बर्बाद मत कर. आगे आगे चल. मुझे देखना है की तेरी गांड सिर्फ पैंटी में कैसी लगती है.

चाचू का हुकुम मानने के सिवा मेरे पास कोई चारा नहीं था. मैं सिर्फ ब्रा और पैंटी में चाचू के कमरे से बाहर आई और चाचू मेरे पीछे चल रहे थे . वो अश्लील कमेंट्स कर रहे थे और मैं शर्मिंदगी से सुबक रही थी. उसी हालत में मैं किचन में गयी और चाचू के लिए खाना गरम करने लगी. चाचू किचन के दरवाज़े में खड़े होकर मुझे देख रहे थे. किचन में जब भी मैं किसी काम से झुकती तो मेरी दोनों चूचियाँ ब्रा से बाहर निकलने को मचल उठती, उन्हें उछलते देखकर चाचू अश्लील कमेंट्स कर रहे थे.

फिर मैंने डाइनिंग टेबल में चाचू के लिए खाना लगा दिया. वो खाना खा रहे थे और मैं उनके सामने सर झुकाए हुए अधनंगी खड़ी थी. मुझे ऐसा लग रहा था की एक मर्द के सामने ऐसे अंडरगार्मेंट्स में खड़े रहने से तो नंगी होना ज़्यादा अच्छा है. आख़िरकार चाचू के खाना खा लेने के बाद मेरा ह्युमिलिएशन खत्म हुआ.

चाचू – जा रश्मि , अब अपने कमरे में जाकर स्कर्ट ब्लाउज पहन ले. दिल खट्टा मत कर. और एक बात याद रख, आज जो भी हुआ इसका जिक्र अगर तूने किसी से किया तो तेरी खैर नहीं.

मैं अपने कमरे में चली गयी और दरवाज़ा बंद कर दिया. बहुत अपमानित महसूस करके मेरी रुलाई फूट पड़ी और मैं बेड में लेटकर रोने लगी. कुछ देर बाद मैं नॉर्मल हुई और फिर मैंने स्कर्ट टॉप पहनकर अपने बदन को ढक लिया. 



…………………. फ्लैशबैक समाप्त ………………...




“विकास ये थी मेरी कहानी. उस दिन को याद करके मुझे बाद के दिनों में भी शर्मिंदगी महसूस होती थी. मैंने उस दिन इतना अपमानित महसूस किया की दिन भर रोती रही. “

विकास – सही बात है मैडम. कैसे हमारे अपने रिश्तेदार हमारा शोषण करते हैं और हम कुछ नहीं कर पाते. मेरी भावनाएँ तुम्हारी भावनाओं जैसी ही हैं.

हमने इस बारे में कुछ और बातें की . कुछ देर बाद हमारी नाव नदी किनारे आ गयी और वहाँ से हम वापस मंदिर आ गये. बैलगाड़ी पहले से मंदिर के पास खड़ी थी. मैं आधी संतुष्ट (विकास के साथ ओर्गास्म से) और आधी डिप्रेस्ड ( बचपन की उस घटना को याद करने से) अवस्था में आश्रम लौट आई.
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