Raj Sharma Stories जलती चट्टान
08-13-2020, 12:57 PM,
#21
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
‘हाँ राजन, पूजा का नृत्य देखना हो तो आज...।’

‘तो तुम नाचोगी क्या?’ वह बात काटते हुए बोला।

‘हाँ परंतु देवताओं के सम्मुख।’

‘तो इंसान क्या करेंगे?’

‘लुक-छिपकर मंदिर के किवाड़ों से झाँकेंगे।’

‘यदि अंदर आ गए तो?’

‘तो क्या? देवताओं को प्रणाम कर कहीं कोने में जा बैठेंगे।’

‘नर्तकी नृत्य में बेसुध हो कहीं देवताओं को छोड़ मनुष्यों की ओर न झुक जाएँ।’

‘असंभव! शायद तुम्हें ज्ञात नहीं कि पायल की रुन-झुन, मन के तार और देवताओं की पुकार में एक ऐसा खिंचाव है, जिसे तोड़ना मनुष्य के बस का नहीं। मनुष्य उसे नहीं तोड़ पाता।’

‘तो हृदय को बस में रखना, कहीं भटक न जाए।’

‘ओह शायद बाबा आ गए!’ पार्वती संभलते हुए बोली। ड्यौढ़ी के किवाड़ खुलने का शब्द हुआ। राजन तुरंत अपने कमरे की ओर लपका। पार्वती ने अपनी ओढ़नी संभाली और बरामदे में लटके बंद चकोर को बाजरा खिलाने लगी। अब राजन कमरे से छिपकर उसे देख रहा था।

बाबा को देखकर पार्वती ने नमस्कार किया।

‘क्या अब सोकर उठी हो?’ बाबा ने आशीर्वाद देते हुए पूछा।
‘जी, आज न जाने क्यों आँख देर से खुली।’

‘पूजा का दिन जो था। गाँव सारा नहा-धोकर त्यौहार मनाने की तैयारी में है और बेटी की आँख अब खुली।’

‘अभी तो दिन चढ़ा है बाबा!’ वह झट से बोली।

‘परंतु नदी स्नान तो मुँह अंधेरे ही करना चाहिए।’

‘घर में भी तो नदी का जल है।’

‘न बेटा! आज के दिन तो लोग कोसों पैदल चलकर वहाँ स्नान को जाते हैं। तुम्हारे तो घर की खेती है। शीघ्र जाओ, तुम्हारे साथ के सब स्नान करके लौट भी रहे होंगे।’

‘बाबा! फिर कभी।’

‘तुम सदा यही कह देती हो, परंतु आज मैं तुम्हारी एक न सुनूँगा।’

‘बाबा!’ उसने स्नेह भरी आँखों से देखते हुए कहा।

‘क्यों? डर लगता है?’

‘नहीं तो।’

‘तो फिर?’

बाबा का यह प्रश्न सुन पार्वती मौन हो गई और अपनी दृष्टि फेर ली, फिर बोली-‘बाबा सच कहूँ?’

‘हाँ-कहो।’

‘शर्म लगती है।’ उसने दाँतों में उंगली देते हुए उत्तर दिया।

बाबा उसके यह शब्द सुनकर जोर-जोर से हँसने लगे और रामू की ओर मुँह फेरकर कहने लगे-
‘लो रामू-अब यह स्त्रियों से भी लजाने लगी, पगली कहीं की, घाट अलग है, फिर भी यदि चाहती हो तो थोड़ी दूर कहीं एकांत में जाकर स्नान कर लेना।’

‘अच्छा बाबा! जाती हूँ, परंतु जब तक एकांत न मिला नहाऊँगी नहीं।’

‘जा भी तो-तेरे जाने तक तो घाट खाली पड़े होंगे।’

‘हाँ-लौटूँगी जरा देर से।’

‘वह क्यों?’

‘मंदिर में रात को पूजा के लिए सजावट जो करनी है।’

‘और फल?’

‘पुजारी से कह रखे हैं।’

पार्वती ने सामने टँगी एक धोती अपनी ओर खींची-बाबा ने बरामदे में बिछी एक चौकी पर बैठकर इधर-उधर देखा और कहने लगे-‘क्या राजन अभी तक सो रहा है?’

‘देखा तो नहीं-उसकी भी आज छुट्टी है।’ पार्वती ने धोती कंधे पर रखते हुए उत्तर दिया।

बाबा ने राजन को पुकारा-वह तुरंत आँगन में जा पहुँचा, उसके हाथों में वही रात वाले फूल थे। ‘पार्वती उसे देखते ही एक ओर हो ली।’

राजन ने दोनों को नमस्कार किया।

‘मैं समझा शायद सो रहे हो।’

‘नहीं तो मंदिर जाने की तैयारी में था।’
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08-13-2020, 12:57 PM,
#22
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
‘तो क्या तुमने भी पूजा आरंभ कर दी।’

‘जी, आपके संग का तो प्रभाव होना ही था।’

‘तो हम समझें कि हमारे संग से पत्थर भी द्रवित हो उठे। जाओ भगवान तुम्हारा कल्याण करे।’

राजन ने एक बार और प्रणाम किया और हाथों में फूल लिए ड्यौढ़ी से बाहर हो लिया। बाहर आते ही वह एक ओर छिप गया। उसकी दृष्टि द्वार पर टिकी थी। थोड़ी ही प्रतीक्षा के बाद ड्यौढ़ी के किवाड़ खुले और पार्वती हाथ में धोती लिए बाहर आई। उसने चारों ओर घूमकर देखा, जब उसे विश्वास हो गया कि वहाँ कोई नहीं, तो नदी की ओर चल दी। राजन वहीं खड़ा रहा। जाते-जाते पार्वती ने दो-तीन बार मुड़कर देखा और फिर शीघ्रता से आगे बढ़ने लगी। जब वह ओट में हुई तो राजन उसका पीछा करने लगा।

पीछा करते-करते वह मंदिर तक जा पहुँचा। पार्वती सीढ़ियों के पास पल-भर रुकी, उन्हें खाली देख मुस्कराई और नीचे मंदिर की ओर उतर गई। घाट पर अभी तक लोग स्नान कर रहे थे। राजन वहीं खड़ा पार्वती को देखता रहा। ज्यों ही वह नदी के किनारे-किनारे चलने लगी तो वह भी शिलाओं के पीछे छिपा-छिपा उसी ओर बढ़ने लगा। पार्वती स्त्रियों वाले घाट पर भी न रुकी और एकांत की खोज में बढ़ती गई। राजन बराबर उसका पीछा कर रहा था। थोड़ी ही देर में वह घाट से काफी दूर निकल गई और नदी में पड़े पत्थरों पर पग रखती हुई दूसरी ओर चली गई। राजन शीघ्रता से एक बड़े पत्थर के पीछे छिप गया और पार्वती को देखने लगा।

पार्वती नदी की ओर मुख किए उछलती लहरों को देख रही थी। समीप ही एक छोटी-सी नाव पड़ी थी। नाविक का कहीं दूर तक कोई चिह्न नहीं था, यों जान पड़ता था, जैसे उसे यह एकांत स्थान मन भा गया हो।

पार्वती ने एक बार चारों ओर देखा-एक लंबी साँस ली और नदी किनारे बैठ अपने पाँव जल में डाल दिए, परंतु तुरंत ही निकाल लिए, शायद जल अत्यंत शीतल था। वह उठ खड़ी हुई और अपने बालों को खोल डाला। जब उसने जोर से अपने सिर को झटका दिया तो लंबे-लंबे बाल हवा में लहराने लगे। उसने अच्छी तरह से धोती को अपनी गर्दन पर लपेट लिया तथा नीचे के वस्त्र उतार उस शिला पर फेंक दिए, जिसके पीछे खड़ा राजन सब देख रहा था। राजन ने झट से सिर नीचे कर लिया। जब धीरे-धीरे उसकी दृष्टि ऊपर उठी तो पार्वती की लंबी-लंबी उंगलियाँ उसकी चोली के बंधन खोल रही थीं।

तभी राजन के पैर का दबाव एक पत्थर पर पड़ा। पत्थर धड़धड़ाता हुआ नीचे की ओर जा गिरा। पार्वती चौंक पड़ी, उसका मुँह पीला पड़ गया। राजन को देखते ही उसका पीला मुँह लाज के मारे आसक्त हो उठा। सिर झुकाए काँपती-सी बोली, ‘राजन तुम... तुम... तुम यहाँ।’

‘हाँ पार्वती! मैंने बहुत चाहा कि मैं न आऊँ, पर रुक नहीं सका पार्वती! मैं समझ नहीं पाया कि यह मुझे क्या हो गया?’ कहते-कहते वह चुप हो गया। राजन पत्थर के पीछे से निकला और पार्वती की ओर बढ़ने लगा। अभी उसने पहला ही पग उठाया था कि पार्वती चिल्लाई-‘राजन!’

‘राजन’ शब्द सुनते ही वह रुक गया। पार्वती ने उसी समय एक पत्थर उठाया और बोली-‘यदि एक पग भी मेरी ओर बढ़ाया तो इसी पत्थर से तुम्हारा सिर फोड़ दूँगी।’

राजन सुनकर मुस्कराया, फिर बोला-‘बस इतनी सी सजा, तो लो मैं उपस्थित हूँ।’

यह कहकर वह फिर बढ़ने लगा। पार्वती ने पत्थर मारना चाहा, परंतु उसके हाथ काँप उठे और पत्थर वहीं धरती पर गिर पड़ा। जब राजन को करीब आते देखा तो वह घबराने लगी। शीघ्रता से पाँव पानी में रख वह नदी में उतर गई। राजन वस्त्रों सहित नदी में कूद पड़ा। पार्वती मछली की भांति जल में इधर-उधर भागने लगी। अंत में राजन ने पार्वती को पकड़ लिया और बाहुपाश में बाँध जल से बाहर ले आया। पार्वती की पुतलियों में तरुणाई छा गई थी। उसने एक बार राजन की ओर देखा, फिर लाज के मारे आँखें झुका लीं। वह अभी तक राजन के बाहुपाश में बँधी थी।

राजन ने पूछा-‘पार्वती! तुम्हें यह क्या सूझी?’

‘सोचा कि तुम्हें तो लाज नहीं-मैं ही डूब मरूँ।’

‘तुम नहीं जानती पार्वती... मैं तो तुमसे भी पहले डूब चुका हूँ।’

‘क्या हवा में?’

‘नहीं तुम्हारी इन मद भरी आँखों के अथाह सागर में, जिनसे अभी तक प्रेम रस झर रहा है।’

‘राजन!’ कहते-कहते उसके नेत्र झुक गए। राजन ने काँपते हुए उसे सीने से लगा लिया।

नदी के शीतल जल में दोनों बेसुध खड़े एक-दूसरे के दिल की धड़कनें सुन रहे थे। पार्वती का शरीर आग के समान तप रहा था। ज्यों-ज्यों नदी की लहरें उसके शरीर से टकरातीं, भीगी साड़ी उसके शरीर से लिपटती जाती। राजन ने धीरे से पार्वती के कान में कहा-‘शर्माती हो।’

‘अब तो डूब चुकी राजन!’

‘देखो तुम्हारा आँचल शरीर को छोड़कर लहरों का साथ दे रहा है।’

‘चिंता नहीं।’

‘तुम्हें नहीं, मुझे तो है।’
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08-13-2020, 12:57 PM,
#23
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
‘वह क्यों?’

‘कहीं फिर से मेरा सिर फोड़ने की न सोच लो।’

‘चलो हटो, निर्लज्ज कहीं के!’

‘पार्वती...!’

‘हूँ।’

‘तुम्हारे चारों ओर क्या है?’

‘जल-ही-जल!’

‘क्या इतना जल भी तुम्हारे शरीर की जलती आग को बुझा नहीं पाया?’

‘आग, कैसी आग?’

‘प्रेम की आग।’ और इसके साथ ही राजन, पार्वती के और भी समीप हो गया। राजन के गर्म-गर्म श्वासों ने पार्वती के मुख पर जमे जलकणों को मिटा दिया। पार्वती की आँखों में एक ऐसा उन्माद था, जो राजन को अपनी ओर खींचता जा रहा था। वह बेसुध सी मौन खड़ी थी। उसके कोमल गुलाबी होंठ राजन के होठों से मिल जाना चाहते थे, परंतु मुख न खुलता था। राजन से न रहा गया, ज्यों ही वह अपने होंठ उसके करीब ले जाना चाहा, पार्वती चिल्लाई-‘राजन्।’

राजन चौंका-उसके हाथ पार्वती के शरीर से अलग हो गए-राजन बोला-‘क्या है?’

‘वह देखो सामने।’ वह हाथ से संकेत करती हुई बोली।

राजन ने घूमकर देखा-चारों ओर जल के सिवाय कुछ न था, वह फिर बोला-‘क्या है पारो?’

पर यह शब्द उसकी जबान पर आते-आते रुक गए। उसने देखा कि पार्वती उससे काफी दूर खड़ी मुस्करा रही थी। पार्वती बोली-‘धरती छोड़ अब क्या जल में ही रहने का निश्चय कर लिया है?’

‘जी हाँ, मछलियाँ जल में रहना पसंद करती हैं।’

‘मछलियाँ तो रहना पसंद करती हैं, परंतु शिकारी का जल में क्या काम?’

‘शिकारी बेचारा क्या करे, मछली को बाहर खींचते-खींचते स्वयं ही जल में खिंच गया।’

‘बिना किसी फंदे के?’

‘नहीं तो, इस बार तो ऐसा फंदा पड़ा कि मछली तथा शिकारी दोनों उसमें फंस गए।’

‘कैसा फंदा?’

‘प्रेम का।’

‘अब यहाँ से जाओ भी, तुम्हें तो हर समय दिल्लगी ही सूझती है।’

‘तुम्हें जाना है तो जाओ, मैं तो स्नान करके आऊँगा।’

‘परंतु बाहर कैसे निकलूँ?’

‘लाज लगती है? निर्लज्ज बन जाओ।’

‘तुम्हारी तरह।’

‘और नहीं तो डूब मरो, नदी सामने ही है।’

पार्वती मौन हो गई और कातर दृष्टि से राजन की ओर देखने लगी। उसका विचार था कि शायद वह स्नेह भरी दृष्टि देख राजन को उस पर दया आ जाए, परंतु वह वहाँ से न हिला। आखिर पार्वती बोली-‘राजन! तुम्हें मुझसे प्रेम है न?’

‘है तो।’

‘तो मेरी इतनी-सी भी बात नहीं मानोगे?’

‘क्या?’

‘यहाँ से चले जाओ।’

‘न भाई तुम्हारे ही संग चलेंगे।’

‘मैं तो कभी नहीं जाऊँगी।’

‘देखो पार्वती, मैं एक उपाय बताता हूँ-हम दोनों की बात रह जाएगी।’

‘कहो।’

‘मैं नदी में मुँह फेर सूर्य की पहली किरण देखता हूँ और तुम बाहर निकल वस्त्र बदल लो। बदलते ही मुझे पुकार लेना, इस प्रकार तुम वस्त्र भी बदल लोगी और हमारा साथ भी न छूटेगा।’
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08-13-2020, 12:58 PM,
#24
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
‘परंतु तुम पर विश्वास करूँ?’

‘एक बार करके देख लो।’

‘तो ठीक है।’

‘परंतु एक शर्त पर।’

‘वह क्या?’

‘मंदिर तक हम दोनों नदी के रास्ते चलेंगे... तैर कर।’

‘नहीं उस नाव से।’

‘मुझे स्वीकार है।’

और राजन ने मुख फेर लिया-उसने गुनगुनाना शुरू कर दिया-पार्वती कुछ क्षण तो चुपचाप खड़ी रही, फिर धीरे-धीरे पग रखते हुए नदी के बाहर जा पहुँची और वस्त्र उठा शीघ्रता से पत्थरों के पीछे हो ली। भीगे वस्त्र उतार साड़ी पहन ली। राजन अब तक मुँह फेरे मजे से गुनगुनाता जा रहा था और पार्वती की पुकार की प्रतीक्षा कर रहा था। थोड़ी देर बाद उसने पार्वती को आवाज दी-उत्तर मिला ‘अभी नहीं।’

कुछ देर चुपचाप रहने के पश्चात् राजन ने फिर कहा-‘मैं तो शीतल जल में अकड़ा जा रहा हूँ और तुमने अभी तक कपड़े भी नहीं बदले।’

पार्वती ने फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया, पल भर की चुप्पी के पश्चात् राजन ने फिर पुकारा-‘पार्वती!’ और तुरंत ही मुँह फेरकर देखा-पार्वती शीघ्रता से लौटी जा रही थी।

राजन यह देखते ही आग-बबूला हो गया और जल से बाहर निकल पार्वती के पीछे हो लिया। शीघ्र ही उसके समीप पहुँचकर क्रोध में बोला-‘तो क्या किसी के विश्वास को यों ही तोड़ा जाता है?’

‘तुम्हें विश्वास की पड़ी है और वहाँ बाबा मुझे गाली दे रहे होंगे।’ इतना कहकर पार्वती फिर तेजी से बढ़ने लगी।

‘तो झूठ क्यों बोला था?’

‘अपनी जान छुड़ाने के लिए।’

‘तो मुझे यह पता न था कि तुम मुझे एक पागल समझती हो। ठीक है... मुझे तुम्हें रोकने का अधिकार ही क्या है?’ यह कहकर राजन उन्हीं पैरों से नदी की ओर लौट गया। पार्वती ने रुके शब्दों में उसे पुकारा भी। परंतु उसने सुनी-अनसुनी कर दी और न पीछे घूमकर ही देखा।

जब वह पहले स्थान पर पहुँचा तो नदी की लहरें उसी प्रकार उतनी भरती जा रही थीं, क्योंकि उनसे खिलवाड़ करने वाला संगी तो जा चुका था।

राजन के भीगे वस्त्रों से अब तक पानी बह रहा था। उसने हाथों से पानी निचोड़ा और वैसे ही धरती पर औंधे मुँह लेटा रहा-शायद वस्त्र सुखाने के विचार से। उसका शरीर ठंड के मारे काँप रहा था, आँखें लाल हो रही थीं। ऐसा मालूम हो रहा था जैसे ज्वर आया हो। उसका सिर भारी सा हो गया था।

नदी के जल की कलकल, धूप की गर्मी और भीगे वस्त्र उसे विश्वास-सा दिला रहे थे कि अभी उसमें चेतना शेष है। अचानक वह चौंक उठा और शरीर समेट कर बैठ गया। उसके वस्त्र कुछ सूख चले थे। ठंड भी पहले से कम हो चुकी थी। उसने नदी की ओर देखा, फिर किनारे खड़ी नाव की ओर दृष्टि डाली-देखते ही भौंचक्का-सा रह गया। शीघ्रता से उठ खड़ा हुआ और नाव की ओर लपका। नाव पर पार्वती सिर ऊँचा किए बैठी थी। वह बोल उठा-‘पार्वती! तुम।’

पार्वती राजन की ओर एकटक देखती रही और राजन के प्रश्न का उत्तर दिया उसके आँसुओं ने।

राजन यह सब देखकर व्याकुल-सा हो उठा और काँपते स्वर में बोला-‘तुम यहाँ बैठी क्या कर रही हो?’

‘तुम्हारी प्रतीक्षा।’

‘वह क्यों?’

‘नदी के रास्ते मंदिर तक साथ जो जाना है।’

राजन को अहसास हुआ मानो संसार भर का आनंद आज भगवान ने उसी के अंतर में उड़ेल दिया हो। उसकी भटकती हुई निगाहों में आशा की किरण झलक उठी। वह नाव को नदी में धकेल स्वयं भी उसमें सवार हो गया।
नाव अपने आप जल के प्रवाह की ओर बढ़ने लगी। राजन ने पार्वती को प्रेमपूर्वक गले लगा लिया। दोनों खामोश थे, शायद उनकी खामोशी देख नदी की लहर भी खामोश हो चुकी थी। परंतु दोनों के हृदय में हलचल-सी मची हुई थी।
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08-13-2020, 12:58 PM,
#25
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
पार्वती ने राजन का हाथ अपने हाथ में ले लिया और उसकी उंगलियों से खेलने लगी। राजन अपनी उंगलियाँ उसके होठों तक ले गया। पार्वती मुस्कुराती रही, फिर तुरंत ही उसने मुँह खोल उंगली को जोर से दाँतों तले दबा लिया। राजन चिल्ला उठा और झट से हाथ खींच उंगली को मुँह में रख चूसने लगा।
पार्वती ने हाथ अपनी ओर खींचा और बोली-
‘लाओ ठीक कर दूँ।’ कहकर हथेली से सहलाने लगी।
राजन हँस पड़ा और बोला-
‘यह भी खूब रही-पहले काट खाया, अब मरहम लगाने चली हो।’
‘राजन तुम्हें क्या पता कि इस प्रकार काटने और फिर उसी को सहलाने में कितना रस आता है हम औरतों को।’
राजन ने इसका कोई उत्तर न दिया-केवल मुस्करा दिया।
पार्वती सशंक सी होती हुई बोली-
‘अरे! तुम्हारे हाथ तो यूं जल रहे हैं जैसे ज्वर हो गया हो।’
‘तुमने अब जाना?’
‘तो क्या।’
‘यह तो जाने कितने समय से यूँ ही जल रहे हैं।’
‘और कुछ दवा ली?’
‘दवा? इसकी दवा तो तुम हो पार्वती।’
‘मैं और दवा? तब तो इलाज अपने आप हो गया, परंतु यह ज्वर कैसा?’
‘प्रेम का’ कहकर उसकी उंगलियाँ अपनी गर्म हथेलियों में दबा लीं।
‘तुम्हें तो प्रेम के सिवा कुछ आता ही नहीं।’
इतना कहकर वह चुप हो गई।
नाव धीरे-धीरे नदी के बहाव में स्वतः ही बढ़ी जा रही थी। दुपहरी की धूप में पार्वती के सुनहरे बाल चमक रहे थे।
राजन तो उसी के चेहरे व बालों की सुंदरता को अपलक नयनों से निहारें जा रहा था। पार्वती ने मुख ऊपर उठाया। आँखों से आँखें मिलते ही लजा-सी गई, फिर मुँह नीचे करके कहने लगी, ‘ज्वर कितने प्रकार का होता है, यह तो मैं जानती नहीं, परंतु इतना अवश्य सुना है कि होता भयानक है।’
‘यह तो तुमने ठीक सुना है। भयानक ऐसा कि पीछे जिसके पड़ जाए, छोड़ने का नाम तक नहीं लेता।’
‘लो बातों-ही-बातों में हम मंदिर तक पहुँच गए।’
‘इतनी जल्दी... अच्छा तो नाव किनारे बाँध दो।’ यह कहते हुए राजन ने पतवार हाथ में लेकर नाव तट पर लगा दी। उतरते ही दोनों मंदिर की ओर बढ़ने लगे। सीढ़ियों के समीप पहुँचते ही पार्वती रुक गई और कहने लगी-
‘समझ में नहीं आता क्या करूँ?’
‘ऐसी क्या उलझन है?’
‘रात्रि को मंदिर में पूजा है, पुजारी सजावट के लिए राह देख रहा होगा-और घर में बाबा।’
‘यही न कि हमें देर हो गई।’
‘हाँ यही तो।’
राजन कुछ समय तो चुप रहा, फिर बोला, ‘सुनो!’
‘क्या?’
‘बाबा से जाकर कह देना, मंदिर की सजावट हो गई।’
‘झूठ बोलूँ?’
‘नहीं यह सच है।’

‘तो क्या मंदिर...’
‘यह सब तुम मुझ पर छोड़ दो।’
‘तुम पर!’
‘विश्वास... क्यों नहीं-अच्छा तो मैं चली। हाँ, मंदिर अवश्य सजाना।’
‘मंदिर सजाते समय देवताओं से आशीर्वाद ले ही लूँगा।’
‘शायद तुम यह नहीं जानते कि जब तक मैं न जाऊँ, देवता किसी की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते।’
‘और यदि हम आ गए और देवताओं ने अपने नेत्र मूँद लिए तो?’
‘देखा जाएगा।’ पार्वती से बड़ी लापरवाही से कहा और घर की ओर भागी।
ज्यों-ज्यों घर करीब आ रहा था, पार्वती के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी। वह भय से काँप रही थी, बाबा के सम्मुख इतना बड़ा झूठ कैसे बोलेगी? यह सोचते-सोचते घर तक वह पहुँच गई। ड्यौढ़ी में कदम रखते ही चुपके से उसने झाँका। सामने कोई न था। वह शीघ्रता से आँगन पार कर अपने कमरे में जाने लगी। अभी वह किवाड़ के करीब पहुँची ही थी कि बाबा की पुकार ने उसे चौंका दिया-वह बरामदे में बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे।
‘इतनी देर कहाँ लगा दी?’
‘स्नान को जो गई थी।’
‘स्नान में क्या इतनी देर।’
‘वहाँ से मंदिर भी तो जाना था।’
‘सीधी मंदिर से आ रही हो क्या?’
‘जी बाबा सजावट ऐसी हुई कि जिसे देखते ही आप आश्चर्य में पड़ जाएँ।’
‘तुम्हारे नृत्य की या मंदिर की?’
‘मंदिर की।’
‘परंतु रामू भी तो अभी पुजारी से मिलकर आया है।’
‘तो क्या कहा इसने?’
‘कि पार्वती तो सवेरे से आई ही नहीं।’
‘आई नहीं?’ पार्वती कुछ चुप हो गई और बाबा के मुख की ओर देखने लगी, जो अपने उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे। पार्वती बाबा को देख यूँ बोली-
‘ओह! अब समझी।’
‘क्या?’
‘बाबा सच कहूँ!’
‘कैसा सच?’
‘पुजारी ने इसलिए कहा था कि कहीं आप मुझे बुला न लें और उसकी सजावट अधूरी रह जाए।’
‘पगली कहीं की! भला मैं ऐसा क्यों करने लगा?’
‘उसने तो यही सोचा होगा, बाबा!’
‘अच्छा सोचा! जरा-सा झूठ बोलकर दो घंटे से मुझे बेचैन कर रखा है।’
‘बाबा आपको मालूम है कि वह मेरे बिना मंदिर का काम किसी दूसरे से नहीं करवाता और न ही किसी पर विश्वास करता है।’
‘तब तो दोनों ने मिलकर मंदिर में बिलकुल परिवर्तन कर दिया होगा।’
‘हाँ बाबा।’
‘तब तो मंदिर की सजावट अभी देख आऊँ।’
‘न बाबा, ऐसी क्या जल्दी है-हमेशा देखने वाली वस्तु कुछ प्रतीक्षा के पश्चात् ही देखनी चाहिए।’
‘ऐसा लगता है जैसे तुम्हें आज ‘सीतलवादी’ को जगमगा देना हो।’
‘रात्रि आने के पहले क्या कहा जा सकता है?’
‘अच्छा-भोजन करो। मैं रामू से पूजा की तैयारी करवा देता हूँ।’
‘थालियाँ साफ करनी होंगी। दीयों के लिए घी की बत्तियाँ और।’
‘तुम चिंता न करो, मैं सब कराए देता हूँ।’
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08-13-2020, 12:58 PM,
#26
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
बाबा ने रामू को पुकारा और पार्वती ने कमरे में प्रवेश किया। ज्यों-ज्यों सायंकाल का समय समीप आ रहा था, पार्वती का दिल बैठा जा रहा था। न जाने मंदिर में क्या हो रहा होगा। पुजारी अपने मन में मुझे गालियाँ दे रहा होगा। यदि राजन ने भी कुछ न किया तो शाम को बाबा क्या कहेंगे? इन्हीं विचारों में डूबी पार्वती सायंकाल की प्रतीक्षा करने लगी। इधर पूजा की सब सामग्री तैयार हो गई। उसने कई बार चाहा कि वह सब कुछ रामू द्वारा मंदिर में राजन को कहलवा भेजे, परंतु साहस न पड़ा।
आखिर साँझ हो गई।
ज्यों-ज्यों अंधेरा बढ़ रहा था, त्यों-त्यों सीतलवादियों के मुख पर उल्लास की किरण चमकने लगी और लोग मंदिर की ओर चल पड़े। इधर पार्वती शृंगार में मग्न थी। आज उसने अपने को खूब सजाया परंतु उसका हृदय अज्ञात आशंका से धड़क रहा था, यदि मंदिर की सजावट न हुई तो वह बाबा को क्या उत्तर देगी।
आज तो वह बड़ी आशाएँ हृदय में लिए हुए मंदिर जाने की तैयारी कर रही थी। जब वह नृत्य के लिए देवताओं के सम्मुख आएगी और पास बैठा पुजारी उसे घूर-घूरकर ताकेगा तो क्या वह नृत्य कर सकेगी? यही विचार आ-आकर उसको खाए जाते थे।
वह यह सोच रही थी कि उसके कानों में बाबा की आवाज सुनाई दी-उसने झट से शृंगार दान बंद किया और साड़ी का पल्लू ठीक करते-करते कमरे से बाहर आ गई। बाबा उसे सजा-धज देख मुस्करा पड़े। पार्वती ने लज्जा के मारे मुँह फेर लिया। बाबा रह न सके, तुरंत ही उसे प्रेमपूर्वक गले से लगा लिया। उनके नेत्रों में ममता के आँसू उमड़ आए। वे उसे देख ऐसे प्रसन्न हो रहे थे, जैसे माली अपने बढ़ते हुए पौधों को देख प्रसन्न हो उठता है। पार्वती ने पास खड़े रामू से दुशाला ले बाबा को ओढ़ा दिया। एक हाथ में फूलों की टोकरी तथा दूसरे में पूजा की थाली ले बाबा के साथ मंदिर की ओर बढ़ चली। रामू भी उसके पीछे-पीछे हो लिया।
बाबा व रामू दोनों प्रसन्नचित्त दिखाई दे रहे थे।
और-
पार्वती के मुख पर उदासी और घबराहट थी।
ज्यों ही वे आबादी से निकलकर मंदिर की ओर बढ़ने लगे, पार्वती के मुख पर उदासी की रेखाएँ प्रसन्नता में बदल गईं। मंदिर की दीवार तथा चबूतरे प्रकाश से जगमगा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो संसार भर का प्रकाश किसी ने इन पहाड़ियों में एकत्रित कर दिया हो। मंदिर में मनुष्यों का कोलाहल सुनाई पड़ रहा था। ज्यों-ज्यों मंदिर करीब आ रहा था, पार्वती के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो रहा था उसे।
अब तो वह मंदिर में शीघ्र पहुँचने के लिए बेचैन हो उठी। न जाने आज उसकी आँखें क्या देखने वाली हैं?
थोड़ी देर में तीनों मंदिर आ पहुँचे। बड़े द्वार पर लोगों की काफी भीड़ थी। पार्वती ने बाबा का हाथ थामा और उन सीढ़ियों की ओर ले गई, जहाँ से वह प्रतिदिन मंदिर जाती थी। यह मार्ग आम लोगों के लिए न था, केवल पुजारी तथा नदी को जाने वाले लोग ही इधर से आते-जाते थे। उन सीढ़ियों पर भी दीये जल रहे थे।
राजन ने शायद इस विचार से जला रखे थे कि यह वह रास्ता है, जहाँ दोनों का प्रथम मिलन हुआ था।
जब तीनों सीढ़ियों के करीब पहुँचे तो पार्वती रुक गई। सीढ़ियों पर फूलों की कलियाँ बिछी हुई थीं। पार्वती ने एक जलता दीया उठाया और अपनी पूजा की थाली के अन्य दीये जला लिए और थाली उठाकर मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने लगी। उसके कोमल गुलाबी तलवे उन फूलों की कलियों पर पड़ रहे थे, जो राजन ने उसकी राह में बिछा रखी थीं। वह अपनी दुनिया में खो गई। उसे कोई ध्यान न रहा कि उसके बाबा भी उसके साथ-साथ आ रहे हैं। बाबा भी मौन थे। वे सोचने लगे, पार्वती शायद देवताओं की दुनिया में खो गई है।
परंतु पार्वती के दिल में तो आज दूसरी ही धुन थी। पहले जब वह सीढ़ियों पर चढ़ती तो उसे यूँ लगता था, जैसे देवता उसे अपनी ओर खींच रहे हों, परंतु आज उसे सिवा राजन के किसी दूसरे का ध्यान न था। इन सीढ़ियों पर बिछी एक-एक कली आज उसे राजन की याद दिला रही थी। जब वह बरामदे में पहुँची तो प्रसन्नता से फूली न समाई। कारण, मंदिर की सजावट में कोई कसर न छोड़ी गई थी। ‘सीतलवादी’ की हवा भी फूलों की महक से भर उठी। मंदिर प्रकाश से जगमगा रहा था।
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08-13-2020, 12:58 PM,
#27
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
अचानक पार्वती के विचारों का ताँता किसी आवाज ने तोड़ दिया। ये उसके बाबा थे, जो पुजारी तथा कंपनी के मैनेजर से बातों में संलग्न थे। मैनेजर ने शायद आज पहली बार पार्वती को देखा था।
‘यह मेरी पार्वती है...।’ बाबा ने मुस्कुराते हुए मैनेजर से, जो अब तक पार्वती को टकटकी बाँधे देख रहा था, कहा। मैनेजर ने हाथ जोड़कर उसे नमस्ते की, परंतु उत्तर में पार्वती घबरा-सी गई। उसके हाथ रुके हुए थे। तुरंत ही उसने फूलों की टोकरी बाबा को और थाली रामू के हाथों में देते हुए अपने हाथ उठाए और मुस्कुराते हुए नमस्ते का उत्तर दिया।
यह सब कुछ इस तरह से हुआ कि तीनों जोर से हँस पड़े। पार्वती लाज के मारे गुलाबी ओढ़नी और पूजा की सामग्री लेती हुई मंदिर की ओर जाने लगी। उसके कानों में पुजारी के शब्द पड़े। वह मैनेजर और बाबा से कह रहा था-
‘आज यह सब कुछ जो आप देख रहे हैं, पार्वती की कृपा से हुआ।’
सुनकर पार्वती के मन में गुदगुदी-सी उठी और उसने मंदिर में प्रवेश किया। घंटियाँ बड़े जोरों से बज रही थीं। उसने मंदिर के अंदर वाले कमरे में जाकर पूजा की सामग्री एक ओर रख दी। फिर अलमारी से घुँघरू निकाल पैरों में बाँध लिए और उस गीत की धुन को मुँह से गुनगुनाने लगी, जिस पर उसे नृत्य करना था। वह उठी और किवाड़ के पीछे से मंदिर में बैठे लोगों को झाँकने लगी।
उसकी आँखें केवल राजन को देखना चाहती थीं, परंतु वह कहीं भी दिखाई नहीं दिया। मैनेजर और उसके बाबा भी एक ओर बैठे पूजा की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब कहीं भी राजन न दिखाई पड़ा तो पार्वती उदास-सी हो गई। आखिर वह इतनी सजावट के बाद चला क्यों गया? वह तो कहता था कि नृत्य मैं अवश्य देखूँगा।
पार्वती को किसी के आने की आहट सुनाई दी। उसने पलटकर देखा, पुजारी सामने खड़ा था, जो उसे देखते ही बोला-
‘क्यों पार्वती... क्या देर है? पूजा का समय तो हो गया।’
‘ओह! तो मैं अभी आई।’ पार्वती उत्तर देते हुए पूजा वाली थाली की ओर बढ़ी। जाते-जाते रुक गई और पुजारी से कहने लगी-
‘जानते हो, जिसने यह सारी सजावट की है, वह कहाँ है?’
‘तुम्हारा मतलब राजन से... वह तो चला गया।’
‘क्यों?’
‘मैं क्या जानूँ-कहता तो था कि पूजा के समय तक आ जाऊँगा।’
‘परंतु दिखाई तो नहीं दे रहा।’
‘भीड़ में न मालूम कहीं जा बैठा हो, तुम जल्दी करो।’
यह कहता हुआ पुजारी बाहर चला गया-पार्वती ने पूजा की थाली उठा ली और उसमें पूजा के लिए फल रख बाहर जाने लगी। अभी उसने पहला कदम उठाया ही था कि पिछले किवाड़ से कोई अंदर आया।
पार्वती ने मुड़कर देखा-राजन खड़ा था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा, आँखें मिलीं और झुक गईं। राजन ने पार्वती की ओर गुलाब का फूल बढ़ाया और उसकी आँखों में आँखें डुबाता-सा खड़ा रह गया।
‘यह क्या?’ पार्वती ने पूछा।
‘प्रेम की भेंट।’
‘तो क्या यह कम था जो तुमने मेरे लिए किया।’
‘वह तो तुम्हारे देवताओं को प्रसन्न रखने के लिए था।’
‘और यह?’
‘यह अपनी प्रसन्नता के लिए।’
‘अच्छा तो लाओ।’
पार्वती के हाथ खाली न देखकर राजन बोला-
‘इन फूलों में रख दूँ क्या?’
‘न... न... यह तो पूजा के फूल हैं, जो देवताओं पर चढ़ाए जाएँगे।’
‘तो क्या यह फूल इस योग्य भी नहीं कि साथ रख दिया जाए।’ राजन ने कुछ-कुछ बिगड़ते हुए कहा और अपना हाथ पीछे खींच लिया।
पार्वती समझ गई और मुस्कराते हुए बोली-
‘नहीं, ऐसी बात तो नहीं, परंतु हर वस्तु अपने स्थान पर ही शोभा पाती है।’
‘तो इसका स्थान...।’
‘मेरे बालों में।’ पार्वती राजन की बात काटते हुए बोली और घूमकर अपना सिर उसकी ओर कर दिया। राजन ने प्रेम से वह फूल उसके बालों में खोंस दिया और उसे एक बार चूम लिया। पूजा की घंटी बजी तो दोनों चौंक उठे। राजन मुस्कुराता हुआ एक ओर चला गया। पार्वती पूजा की थाली ले बाहर की ओर बढ़ी। जाते-जाते एक क्षण के लिए रुकी, घूमकर कनखियों से राजन को देखा। राजन अभी मुस्कराता खड़ा था।
पार्वती धीरे-धीरे डग भरती देवता की मूर्ति की ओर बढ़ी, धरती पर फूल बिछे हुए थे-परंतु फिर, उसके पैर डगमगा रहे थे। उसके हृदय की धड़कन उसे भयभीत कर रही थी, जैसे उसने कोई बड़ा पाप किया हो। मूर्ति के करीब पहुँचकर उसने थाली नीचे रख दी तथा फूल उठाकर देवताओं के चरणों में अर्पित करने लगी।
उसके हाथ काँप रहे थे।
ज्यों ही वह देवताओं के सामने झुकी पुजारी ने राग अलापना आरंभ कर दिया। उसके साथ ही सब लोग देवताओं के सामने झुक गए। पार्वती धीरे-धीरे ऊपर उठी, परंतु आज उसे ऐसा लगा रहा था जैसे देवता उसे क्रोध की दृष्टि से देख रहे हों।
मंदिर की जगमगाहट शायद आज उसे प्रसन्न न कर सकी।
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08-13-2020, 12:58 PM,
#28
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
राग के अलाप के साथ-साथ पार्वती ने नृत्य आरंभ कर दिया। नृत्य के मध्य उसने घूमकर देखा... दर्शकों के सिर देवता के सम्मुख झुके थे, परंतु दूर किवाड़ के साथ खड़े राजन के मुख पर वही मुस्कराहट थी। एक बार फिर दोनों की दृष्टि मिल गई और पार्वती बेचैन हो उठी और उसने आँखें मूँद लीं।
वह ढोलक और अलाप के राग के साथ-साथ नृत्य करती रही। न जाने आज राजन के नेत्रों में ऐसा क्या था कि मंदिर के देवता-गीत का अलाप, ढोलक व घुँघरुओं की रुनझुन कोई भी उसकी आँखों से राजन की सूरत को दूर न कर पाती थी और वह नाचे जा रही थी।
उसके पाँव की गति ढोलक के शब्द और रागों के अलाप के साथ-साथ बढ़ती गई-मंदिर गूँज उठा।
आज से पहले पार्वती ने कभी ऐसा नृत्य नहीं किया था। उसे ऐसा मालूम हो रहा था जैसे वह केवल राजन के लिए ही नृत्य कर रही है।
उसने और भी उत्साह से नाचना आरंभ कर दिया।
वह राजन का ध्यान छोड़ अपने आपको देवता के चरणों में अर्पित करना चाहती थी।
परंतु...।
उसके एक ओर तो राजन खड़ा मुस्करा रहा था और दूसरी ओर देवता क्रोध से पार्वती को देख रहे थे।
शायद आज मनुष्य तथा देवता का संघर्ष हो रहा था।
राजन की मुस्कुराहट बता रही थी कि आज वह अत्यंत प्रसन्न है।
इधर घुँघरुओं की रुनझुन और तीव्र होती गई। सीतलवादी की हवा ने तूफान का रूप ग्रहण कर लिया। वायु की तीव्रता से घंटियाँ अपने आप बजने लगीं। फूलों की कलियाँ देवता के चरणों में से उड़कर किवाड़ की ओर जाने लगीं। कलियों ने उड़कर जब राजन के कदम चूमे तो वह समझा, सफलता मेरे चरण चूम रही है।
पुजारी ने राग का अलाप समाप्त कर दिया, परंतु पार्वती की पायल की झंकार अभी तक उठ रही थी। सब लोग सिर उठा झंकार को सुनने लगे। सबकी दृष्टि पार्वती के कदमों के साथ नाच रही थी।
बाबा और पुजारी असमंजस में पड़े हुए थे कि आज पार्वती को क्या हो गया?
मंदिर की दीवारों पर जलते हुए चिराग रिमझिम कर उठे थे। पायल की बढ़ती हुई झंकार उसके लिए एक तूफान साबित हुई, लोगों के हृदय काँप उठे। वायु ने भी जोर पकड़ा, बाबा अपना स्थान छोड़ पार्वती की ओर बढ़े।
और पार्वती को देखा वह कि नाच-नाचकर चूर हो चुकी थी। शरीर पसीने में तर था-फिर भी वह धुन में नाचे जा रही थी। अपने आप में इतना खो चुकी थी कि बाबा की पुकार भी न सुन पाई।
बाबा ने दो बार करीब से पुकारा। अंत में नाचते-नाचते वह देव मूर्ति के चरणों पर गिर गई।
बाबा पुकार उठे-‘पार्वती!’
और उसके साथ ही पुजारी, बाबा, मैनेजर आदि उसकी ओर बढ़े-परंतु राजन अब भी दूर खड़ा मुस्करा रहा था।
राजन ने एक दृष्टि मंदिर की ऊँची दीवारों पर डाली और मंदिर से बाहर चला गया-बाहर भयानक तूफान था। बादल आकाश में छा गए थे। राजन धीरे-धीरे उस तूफान में मंदिर की सीढ़ियाँ उतर रहा था।
उसे लग रहा था, जैसे उसके अंदर बैठा कोई कह रहा है आज इंसान ने देवता पर विजय पाई है। इंसान हुआ है विजयी और देवता हुआ है पराजित।
तीन
प्रतिदिन की तरह राजन आज भी अपने कार्य में संलग्न था। छुट्टी होने में अभी दो घंटे शेष थे। आज चार रोज से उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। इसका कारण वह मकान था, जो मैनेजर ने राजन को कृपा रूप में दिलाया था और राजन को लाचार हो, पार्वती का साथ छोड़ना पड़ा था।
एक-न-एक दिन तो उसे छोड़ना ही था।
यह सोच-सोचकर वह मन को धीरज देता था और काम में जुट जाता था। उसे हर साँझ को बेचैनी से इंतजार होता, जब वह छुट्टी के बाद मंदिर की सीढ़ियों पर पार्वती से मिलता।
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08-13-2020, 12:58 PM,
#29
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
आज भी वह इस धुन में पार्वती की प्रतीक्षा कर रहा था, पार्वती ने उसे आज नाव की सैर का वचन दिया था। वह प्रतिदिन पूजा के फूलों में एक लाल गुलाब का फूल भी लाती और जब मुस्कराते हुए राजन को भेंट करती तो वह उसे प्रेमपूर्वक उसी के बालों में लगा देता। दोनों फूले न समाते थे।
ज्यों-ज्यों छुट्टी का समय निकट आ रहा था, राजन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। इतने में सामने से कुंदन आता दिखाई दिया। राजन काम छोड़ उसकी ओर लपका और बोला-
‘सुनाओ भाई! आज इधर कहाँ?’
‘तुम्हें तो समय ही नहीं-मैंने सोचा... मैं ही मिलता चलूँ।’
‘तुम जानते हो भैया मैं छुट्टी के पश्चात् घूमने चला जाता हूँ। जब लौटता हूँ तो थका-हारा बिस्तर पर पड़ जाता हूँ।’
‘कम से कम अपनी कुशल-क्षेम का समाचार तो देते रहा करो। यदि अकेले न होते तो इसकी आवश्यकता न रहती।’
‘तुम समझते हो मेरा कोई नहीं।’
‘कौन है जो... ओह! ठाकुर बाबा-उन्हें तो मैं भूल ही गया और बातों-बातों में यह भी भूल ही गया कि मैनेजर साहब ने तुम्हें बुलाया है।’
‘मुझे?’
‘हाँ-यही कहने तो आया था।’
‘तो इसलिए हाल पूछा जा रहा था।’
‘राजन हम एक ही समय में दो काम कर लिया करते हैं। तुम्हारी तरह नहीं-काम यहाँ हो रहा है और मन नदी के किनारे-फिर दोनों-के-दोनों अधूरे।’
इस पर दोनों खिलखिलाकर हँसने लगे। कुंदन हाथ मलता ड्यूटी पर चला गया और राजन मैनेजर के कमरे की ओर।
जब वह मैनेजर के कमरे से बाहर निकला तो बहुत प्रसन्न था। उसके हाथ में एक बड़ा-सा पार्सल था, जिसमें उसका प्यार ‘मिंटो वायलन’ था। पहले तो हरीश ने उसे फिजूलखर्ची पर डाँटना चाहा-परंतु यह सोचकर कि शौक का कोई मूल्य नहीं, मौन हो गया। एक युवक शायद दूसरे युवक के दिल को शीघ्र ही पहचान गया था।
छुट्टी होने में शायद अभी एक घंटा बाकी था। कब छुट्टी हो और वह पार्वती के पास पहुँचे। उसे विश्वास था कि वह यह ‘मिंटो वायलन’ देख प्रसन्नता से उछल पड़ेगी और जब वह उसे बजाएगा तो वह उस धुन पर नाच उठेगी।
इन्हीं विचारों में खोया-खोया काम कर रहा था कि मैनेजर व माधो वहाँ आ पहुँचे। राजन ने दोनों को नमस्कार किया। मैनेजर राजन के समीप होकर बोला-
‘राजन आज छुट्टी जरा देर से होगी।’
राजन के सिर पर मानो कोई वज्र गिर पड़ा हो। उसके चेहरे का रंग फीका पड़ गया। फटी दृष्टि से हरीश को देखने लगा। राजन को यों देख दोनों आश्चर्य में पड़ गए। फिर माधो ने पूछा-
‘क्यों राजन! तबियत तो ठीक है?’
‘तबियत...!’ वह संभल कर बोला-‘हाँ...हाँ ठीक है। कुछ और ही सोच रहा था।’
‘तुम तो जानते ही हो कि कल काम बंद रहेगा। तार पर थैलियों के स्थान पर बिजली से चलने वाला एक बड़ा टब लगवाया जाएगा। वह एक ही बार में कोयले की दस थैलियों को नीचे ले जाएगा।’
‘तो फिर!’
‘आज जितना कोयला है, वह सब नीचे पहुँचा दो। प्रातःकाल मालगाड़ी जाती है। यह करीब दो घंटे का काम होगा, इसके बदले कल दिन भर छुट्टी, अब तो प्रसन्न हो न?’
‘जी...!’ राजन ने धीरे से उत्तर दिया, वह वहीं खड़ा रहा। उसे यह भी पता न चला कि दोनों कब चले गए। उसके मन में बार-बार यही विचार उत्पन्न हो रहा था कि पार्वती राह देखेगी। जब वहाँ न पहुँचेगा तो निराश होकर घर लौट जाएगी। उसने घूमकर एक दृष्टि कोयले के ढेर पर डाली। उसके मुँह से यह शब्द निकल पड़े-‘इतना ढेर, दो घंटे का काम-केवल दो घंटे का?’ अचानक उसका चेहरा तमतमा आया और वह मजदूरों की ओर बढ़ा और उन्हें काम के लिए कहा-फिर स्वयं ही बेलचा उठा कोयले को थैलियों में भरने लगा। मजदूरों ने भी मन से उसका साथ दिया। इस प्रकार वह सब मिलकर काम करने लगे। सबके हाथ मशीन की भांति चल रहे थे। सारे दिन की थकावट का उन पर कोई असर न था। आज वह घंटों का काम मिनटों में समाप्त करना चाहते थे।
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08-13-2020, 12:58 PM,
#30
RE: Raj Sharma Stories जलती चट्टान
दूसरी ओर माधो अचंभे में था कि आज थैलियाँ इतनी तेजी से क्यों आ रही हैं? अभी एक समाप्त भी न हो पाती तो झट से दूसरी जा पहुँचती। वह यह सोचकर आश्चर्यचकित था कि आज इतनी फुर्ती कैसी? परंतु बेचारा माधो क्या जाने कि प्यार की मंजिल तक पहुँचने के लिए मनुष्य कैसे फुर्तीला हो उठता है?
मैनेजर का अनुमान गलत था परंतु फिर भी सबने मिलकर काम दो घंटे में समाप्त कर लिया। काम के बाद मजदूर इसलिए प्रसन्न थे कि दो घंटे के पश्चात् उन्हें पूरे दिन की छुट्टी है। परंतु राजन के लिए यह दो घंटे भी कितने कीमती थे। उसने काम की समाप्ति पर अपने कपड़ों को झाड़ा और रजिस्टर उठा स्टेशन की ओर देखा। सूरज डूब चुका था-अभी उसे हिसाब मिलाने भी जाना था। नीचे जाने को भी समय चाहिए, पहले तो उसने सोचा न जाऊँ, परंतु फिर अपनी जिम्मेदारी का ध्यान आते ही ऐसा न कर सका। आखिर उसने जाने का निश्चय कर ही डाला।
अचानक उसे कुछ सूझा और वह रुक गया। पार्सल एक मजदूर को देते हुए बोला-‘इसे जरा मेरे घर छोड़ देना।’
राजन ने दोनों हाथों से तार के साथ लटके कड़े को मजबूती से पकड़ लिया, सब मजदूर आश्चर्य में थे कि उसे क्या सूझी। राजन थोड़ी देर में थैली की तरह नीचे जाने लगा। एक-दो मजदूर उसे रोकने को भागे भी परंतु वह हवा के समान निकल गया। नीचे गहरी और पथरीली घाटियाँ देख उसे घबराहट हुई और उसने अपनी आँखें मूँद लीं। जब उसने आँखें खोलीं तो अपने आपको एक रेल के डिब्बे में पाया। शरीर दर्द के मारे चकनाचूर हो रहा था। राजन ने हाथ में पकड़ा रजिस्टर माधो की ओर बढ़ाया-जो उसकी मूर्खता पर हँस रहा था।
हिसाब मिलाने के बाद राजन सीधा मंदिर की ओर चल दिया।
अंधेरा हो चुका था, परंतु उसे आशा थी कि शायद पार्वती उसकी प्रतीक्षा कर रही होगी। परंतु जब वह वहाँ पहुँचा तो उसे निराश होना पड़ा। उसने चारों ओर देखा-पार्वती वहाँ नहीं थी, यह सोच कि शायद मंदिर में हो। जब वह सीढ़ियों पर चढ़ने लगा तो उसके कदम अकस्मात् सामने कुछ देखकर रुक गए।
सीढ़ियों पर लाल गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी हुई थीं और किसी ने लंबी प्रतीक्षा के बाद क्रोध में तोड़कर वहाँ फेंक दी थीं।
राजन, धरती की ओर झुका और प्रेमपूर्वक बिखरी कलियाँ चुनने लगा-बटोरकर घर की ओर चल पड़ा-असफलता की चोट से आहत-सा।
सारी रात वह सो न सका-ज्यों ही सोने की कोशिश करता, उसे पार्वती का ध्यान आ जाता। न जाने वह क्या सोचेगी? उसे रह-रहकर मैनेजर पर क्रोध आ रहा था।
उसके साथी आनंद से सो रहे थे-शायद उन्हें अगले दिन की छुट्टी की बहुत प्रसन्नता थी, परंतु राजन की आँखों में नींद कहाँ।
जब आधी रात तक वह सो न सका तो बिस्तर को छोड़ उसने कलकत्ता से आया पार्सल खोला। थोड़ी देर बाद एक चमकदार ‘मिंटो वायलन’ बाहर निकालकर तार ठीक करने लगा। तार तो ठीक हुए, पर मन में भरी व्यथा और आवेग वायलिन के खिंचे तारों में फूट उठे। सारी रात वह वायलन बजाता रहा।
प्रातःकाल उसे काम पर तो जाना नहीं था। वह स्नान आदि के पश्चात् शीघ्र ही बाबा के घर जा पहुँचा, पार्वती बरामदे में खड़ी बाबा से बातें कर रही थी, उसे देखते ही मुँह फेरकर अंदर चली गई। बाबा नमस्कार का उत्तर देते हुए बोले-‘राजन! तुम तो यहाँ का रास्ता ही भूल गए।’
‘नहीं बाबा, समय ही नहीं मिला।’
‘अब समय क्यों मिलने लगा, नया मकान कैसा है?’
‘बस, सिर छिपाने को काफी है, अपनी कहिए, तबियत कैसी है?’
‘हमारी चिंता न किया करो बेटा! जैसी पहले थी, वैसी अब भी है-पार्वती की तो सुध लो।’
‘क्यों, उसे क्या हुआ?’ राजन ने घबराते हुए पूछा।
‘होना क्या है, जब से तुम गए हो, उदास रहती है। तुम थे तो बातों में समय कट जाता था, अब सारा दिन बैठे करे भी क्या?’
‘ओह! परंतु गई कहाँ? अभी तो...।’
‘शायद अंदर गई है।’
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