raj sharma story कामलीला
07-17-2020, 11:56 AM,
#11
RE: raj sharma story कामलीला
पूरे कार्यक्रम के बाद हम मेन हाल में आये जहाँ पहले मुझे उन्होंने थोड़ा दूध पिलाया और करीब आधे घंटे के आराम के बाद हमने खाना खाया और अब ताक़त तो बची नहीं थी तो सो ही गये।
सुबह उठ कर एक विदाई वाली चुदाई की और फिर वापसी की राह पकड़ी।
चूँकि अब नौकर नौकरानी आने वाले थे सो वहाँ रुका जा नहीं सकता था इसलिए सुबह सवेरे ही निकल लेना ठीक था।
जाने से पहले मैडम जी ने मुझे हज़ार के दस नोट थमा दिये।
मैंने ऐतराज़ किया तो उन्होंने फिर वही डायलॉग मारा कि वे राजा लोग हैं, मुफ्त की सेवायें नहीं लेते।
ज्यादा विरोध करना मुझे भी उचित ना लगा, आखिर लक्ष्मी किसे बुरी लगती है, कहीं से भी आये।
बहरहाल कहानी यहीं खत्म हुई।

वो सात दिन कैसे बीते

मैंने बताया था कि निदा का घर छोड़ने के बाद मैंने कपूरथला में ठिकाना बना लिया था, लेकिन वहाँ भी ज्यादा नहीं टिक सका और इसके बाद मैं निशात गंज में एक भली फैमिली के यहाँ रहने लगा था।
इस बीच कुछ समस्याओं के चलते मैंने मोबाइल कंपनी की नौकरी भी छोड़ दी थी और कुछ दिन बेरोज़गारी के गुजरने के बाद एक प्राइवेट ब्रॉडबैंड कंपनी में नौकरी कर ली थी।
मुंबई, दिल्ली में ज़िन्दगी गुज़ारने के बाद अब लखनऊ में दिल ऐसा लगा था कि छोड़ने का मन ही नहीं होता था। भले मेरा परिवार भोपाल में रहता हो लेकिन एक खाला कानपुर में रहती थी जो डेढ़ दो घंटों की दूरी पर था, तो कभी कभी मूड फ्रेश करने वहाँ चला जाता था।
घर बस एक बार गया था और वो भी बस दो दिन के लिए।
लखनऊ में दिल ऐसा लगा था कि अब कहीं और रुकने का मन भी नहीं होता था।
कई दोस्त और जानने वाले हो गए थे और नौकरी भी ऐसी थी कि घूमने फिरने को भी खूब मिलता था और साथ ही आँखें सेंकने के ढेरों मौके भी सुलभ होते थे।
कभी चौक नक्खास की पर्दानशीं, कभी अलीगंज विकास नगर की बंगलो ब्यूटीज़, कभी अमीनाबाद की फुलझड़ियाँ तो कभी गोमती नगर की आधुनिकाएँ।
इस बीच मेरी दिलचस्पी का केंद्र दो लड़कियाँ रही थीं… एक तो जहाँ मैं रहता था वही सामने एक प्रॉपर्टी डीलिंग का ऑफिस था, वही बाहरी काउंटर पर बैठती थी।
मुझे नाम नहीं पता लगा, उम्र तीस की तो ज़रूर रही होगी, रंगत गेहुंआ थी, कद दरमियाना, सीना अड़तीस होगा तो कमर भी चौंतीस से कम न रही होगी, नितम्ब भी चालीस तक होंगे… नैन नक्श साधारण।
उसमें ऐसा कुछ भी नहीं था जो एक्स्ट्रा आर्डिनरी हो, आकर्षण का केंद्र हो- एकदम मेरी तरह।
एक आम सी लड़की, भीड़ में शामिल एक साधारण सा चेहरा और यही चीज़ मुझे उसकी ओर खींचती थी।
मैंने कई बार उसे रीड करने की कोशिश की थी… ऐसा लगता था जैसे मजबूर हो, जैसे ज़बरदस्ती की ज़िंदगी जी रही हो, उसकी आँखों में थोड़ा भी उत्साह नहीं होता था और सिकुड़ी भवें या खिंचे होंठ अक्सर उसकी झुंझलाहट का पता देते थे।
मुझे भी उसने जितनी बार देखा था इसी एक्सप्रेशन से देखा था लेकिन फिर भी मुझे उसमें दिलचस्पी थी।
ऐसे ही एक दूसरी लड़की थी जो मेरे पड़ोस वाले घर में रहती थी। टिपिकल धर्म से बन्धी फैमिली थी… लड़की एक थी और लड़के दो थे, बाकी माँ बाप दादा दादी भी थे।
लड़की में दिलचस्पी का कारण ये था कि मुझे यहाँ रहते छः महीने हो गए थे लेकिन आज तक मुझे उसकी शक्ल नहीं दिखी थी… हमेशा सर से पांव तक जैसे मुंदी ही रहती थी।
अपने तन को ढीले ढाले कपड़ों से छुपाए रहती थी और खुले में निकलती थी तो उसके ऊपर से चादर टाइप कपडा भी लपेट लेती थी, सर पे भी स्कार्फ़ बांधे रहती थी।
घर से बाहर जाती थी तो हाथों को दस्तानों से, पैरों को मोज़ों से और आँखों को गॉगल्स से कवर कर लेती थी। यानि जिस्म का एक हिस्सा भी न दिखे…
पड़ोसी होने के नाते मैंने उसके हाथ पांव देखे थे- एकदम गोरे, झक्क सफ़ेद…
या उसकी आँखें देखीं थीं… हल्की हरी और ऐसी ज़िंदादिल कि उनमें देखो तो वापस कहीं और देखने की तमन्ना ही न बचे।
कई बार मैंने उसकी आँखों में नदीदे बच्चों की तरह झाँका था और मुझे ऐसा लगता था जैसे उसके स्कार्फ़ से ढके होंठ मुस्कराए हों, लेकिन यह मेरा भ्रम भी हो सकता था क्योंकि मैं अपनी लिमिट जानता था।
भले मैंने उसकी शक्ल न देखी हो, उसके शरीर सौष्ठव का अनुमान न लगा पाया होऊं लेकिन उसके हाथ पैरों की बनावट, रंग और चिकनापन ही बताता था कि वो क्या ‘चीज़’ होगी और मैं ठहरा एक साधारण सा बन्दा, जिसमे देखने, निहारने लायक कुछ नहीं।
हालांकि मैं तीन चार बार उसके घर जा चुका था और वो भी उसके भाई के बुलाए… दरअसल उनके यहाँ भी ब्राडबैंड कनेक्शन था, भले उस कंपनी का नहीं था जहाँ मैं काम करता था लेकिन जब कुछ गड़बड़ होती थी तो मैं काम आ सकता था न।
कनेक्शन बॉक्स ऊपर छत पे लगा था और मैं अपनी छत से वहाँ पहुँच सकता था और उधर से गया भी था।
मन में उम्मीद ज़रूर थी कि शायद हाथ पैरों और आँखों से आगे कुछ दिख जाये लेकिन बंदी तो ऐसे किसी मौके पे सामने आई ही नहीं।
यह प्राकृतिक है कि जब आपसे कुछ छिपाया जाता है तो आपमें उसे देखने की प्रबल इच्छा होती है और यही कारण था कि आते जाते कभी भी वो मुझे कहीं दिखी तो मैंने दिलचस्पी दिखाई ज़रूर।
फिर अभी करीब दस दिन पहले मेरे ग्रहों की दशा बदली… शनि का प्रकोप कम हुआ।
उस दिन सुबह किसी काम पे निकलते वक़्त अपने ऑफिस तक पहुँच चुकी, उस साधारण मगर मेरी दिलचस्पी का एक केंद्र, लड़की से मेरा सामना हुआ था।
हमें तो संडे के दिन छुट्टी नसीब हो जाती थी, जो कि उस दिन था लेकिन उसे शायद अपनी ड्यूटी सातों दिन करनी पड़ती थी।
हमेशा की तरह नज़रें मिलीं, उसकी चिड़चिड़ाहट नज़रों से बयाँ हुई और जैसे कुछ झुंझलाने के लिए होंठ खुले…
लेकिन फिर एकदम से चेहरे की भावभंगिमाएँ बदल गईं और खुले हुए होंठ मुस्कराहट की शक्ल में फैल गए।
मुझे लगा मेरे पीछे किसी को देख कर मुस्कराई होगी लेकिन पीछे देखा तो कोई नहीं था और फिर उसकी तरफ देखा तो वो चेहरा घुमा कर अपने ऑफिस में घुसने लगी थी।
मैं उलझन में पड़ा रुखसत हो गया।
बहरहाल, ये मेरे सितारे बदलने की पहली निशानी थी।
फिर उसी रात पड़ोस के लड़के का फोन आया कि उसके यहाँ नेट नहीं चल रहा था, मुझे जांचने के लिये बुला रहा था, कह रहा था कि बहन को कुछ काम है और वो परेशान हो रही है।
उसी से मुझे पता चला कि दोनों भाई वालदैन समेत आज़म गढ़ गाँव गए थे किसी शादी के सिलसिले में और तीन चार दिन बाद आने वाले थे, घर पर बहन दादा दादी के साथ अकेली थी।
सुन कर मेरी बांछें खिल गईं।
उस वक़्त रात के नौ बजे थे।
आज तो मोहतरमा को सामने आना ही पड़ेगा– बूढ़े दादा दादी तो नेट ठीक करवाने में दिलचस्पी दिखाने से रहे।
मैं ख़ुशी ख़ुशी उड़ता सा उसके घर के दरवाज़े पर पहुंचा और घन्टी बजाई।
अपेक्षा के विपरीत दरवाज़ा बड़े मियाँ ने खोला।
मैंने सलाम किया और काम बताया तो उन्होंने वहीं से आवाज़ दी -‘गौसिया!’
तो उसका नाम गौसिया था।
वो एकदम से सामने आ गई… जैसे बेख्याली में रही हो, जैसे उसे उम्मीद न रही हो कि दादा जी किसी के सामने उसे बुला लेंगे और वो बेहिज़ाब सामने आ गई हो।
जैसे मैंने कल्पनाएँ की थी वो उनसे कहीं बढ़कर थी।
अंडाकार चेहरा, ऐसी रंगत जैसे सिंदूर मिला दूध हो, बिना लिपस्टिक सुर्ख हुए जा रहे ऐसे नरम होंठ कि देखते ही मन बेईमान होकर लूटमार पर उतर आये और शराबी आँखें तो क़यामत थी हीं।
आज बिना कवर के सामने आई थी और घरेलू कपड़ों में थी जो फिट थे तो उसके उभरे सीने और नितम्बों के बीच का कर्व भी सामने आ गया।
सब कुछ क़यामत था- देखते ही दिल ने गवाही दी कि उल्लू के पट्ठे, तेरी औकात नहीं कि इसके साथ खड़ा भी हो सके, सिर्फ कल्पनाएँ ही कर!
जबकि वो मुझे सामने पाकर जैसे हड़बड़ा सी गई थी और अपने गले में पड़े बेतरतीब दुपट्टे को ठीक करने लगी थी।
दादा जी कुछ बताते, उससे पहले उसने ही बता दिया कि पता नहीं क्यों नेट नहीं चल रहा और उसी ने भाई को बोला था मुझे बुलाने को।
दादा जी की तसल्ली हो गई तो उन्होंने मुझे उसके हवाले कर दिया।
वो मुझे जानते थे– अक्सर सड़क पे सलाम दुआ हो जाती थी, शायद इसीलिए भरोसा दिखाया, वर्ना ऐसी पोती के साथ किसी को अकेले छोड़ने की जुर्रत न करते।
वो मुझे वहाँ ले आई जहाँ राउटर रखा था। मैंने लाइन चेक की, जो नदारद थी… वस्तुतः मुझे प्रॉब्लम पता थी, शायद मेरी ही पैदा की हुई थी, पर फिर भी मैंने ज़बरदस्ती केबिल वगैरा चेक करने की ज़हमत उठाई।
‘कब से नहीं चल रहा?’
‘शाम से ही!’
‘पानी मिलेगा एक गिलास?’
‘हाँ-हाँ क्यों नहीं!’
पानी किस कमबख्त को चाहिए था, बस टाइम पास करना था थोड़ा…
वो पानी ले आई तो मैंने पीकर ज़बरदस्ती थैंक्स कहा, वो मुस्कराई।
‘आपका नाम गौसिया है?’
‘हाँ… क्यों?’
‘बस ऐसे ही। पड़ोस में रहता हूँ और आपका नाम भी नहीं जानता।’
‘तो उसकी ज़रूरत क्या है?’
‘कुछ नहीं।’ मैं उसके अंदाज़ पर झेंप सा गया- आप पढ़ती हैं?
‘हाँ, यूनिवर्सिटी से बी एससी कर रही हूँ। सुबह आपके उठने से पहले जाती हूँ और दोपहर में आती हूँ। घर वालों को तो जानते ही हैं। उन्नीस साल की हूँ और कोई बॉयफ्रेंड भी नहीं है, बनाने में दिलचस्पी भी नहीं। शक्ल और फिगर तो आज आपने देख ही ली… कुछ और रह गया हो तो कहिये वो भी बता दूँ?’
मैं बुरी तरह सकपका कर उसे देखने लगा, मुंह से एक बोल न फूटा।
‘आपको क्यों लगा कि मैं आपकी नज़रों को नहीं पढ़ पाऊँगी?’ उसने आँखे तरेरते हुए ऐसे कहा कि मेरा बस पसीना छूटने से रह गया। उफ़ ये लखनऊ की लड़कियाँ– सचमुच बड़ी तेज़ होती हैं।
‘सॉरी!’ मैंने झेंपे हुए अंदाज़ में कहा।
‘किस बात के लिए? इट्स ह्यूमन नेचर… आप यह दिलचस्पी न दिखाते तो मुझे अजीब लगता। एनीवे, नेट चल पाएगा क्या… या मेरे दर्शन पर ही इक्तेफा कर ली?’
‘राउटर में लाइन नहीं है। ऊपर बॉक्स चेक करना पड़ेगा। ‘
‘चलिए!’
वो मुझे छत पे ले आई।
हालाँकि उसने जो तेज़ी दिखाई थी, उससे मैं कुछ नर्वस तो ज़रूर हो गया था, उसे खुद पर हावी होते महसूस कर रहा था।
फिर भी मर्द था, हार मानने में जल्दी क्यों करना, देखा जाएगा- बुरा लगेगा तो आगे से नहीं बुलाएँगे।
‘जिस चीज़ को छुपाया जाता है उसे देखने जानने में ज्यादा ही दिलचस्पी होती है वरना मैं अपनी लिमिट जानता हूँ। लंगूरों के हाथ हूरें तब आती हैं जब वे बड़े बिजिनेसमैन, रसूखदार, या कोई सरकारी नौकरी वाले होते हैं और इत्तेफ़ाक़ से इस बन्दर के साथ कोई सफिक्स नहीं जुड़ा।’
‘आप खुद को लंगूर कह रहे हैं!’ कह कर वो ज़ोर से हंसी।
‘पावर सप्लाई ऑफ है… शायद नीचे ही गड़बड़ है।’ मैंने उसकी हंसी का लुत्फ़ उठाते हुए कहा।
वहाँ जो पावर एक्सटेंशन बॉक्स था, उसमें लगे अडॉप्टर शांत थे, यानि सप्लाई बंद थी और यही मेरा कारनामा था।
नीचे जहाँ से उसे कनेक्ट किया था वहाँ ही गड़बड़ की थी।
प्लग की खूँटी में दोनों तार इतने हल्के बांधता था कि कुछ ही दिन में वो जल जाएँ या निकल जाएँ और इस बहाने वे मुझे फिर बुलाएँ।
‘चलिए!’ उसने ठंडी सांस लेते हुए कहा।
‘बॉयफ्रेंड बनाने में दिलचस्पी क्यों नहीं। यह भी तो ह्यूमन नेचर के दायरे में ही आता है। मैं अपनी बात नहीं कर रहा। यूनिवर्सिटी में तो ढेरों अच्छी शक्ल सूरत वाले शहज़ादे पढ़ते हैं।’
‘मैं अपने नाम के साथ कोई बदनामी नहीं चाहती! मेरा एक भाई भी वहाँ पढ़ता है और इसके सिवा हमारे यहाँ शादी माँ बाप ही करते हैं और वो भी रिश्तेदारी में ही। किसी से रिश्ता बनाने का कोई फायदा नहीं जब उसे आगे न ले जाया जा सके और मेरा नेचर नहीं कि मैं किसी रिश्ते को सिर्फ एन्जॉय तक रखूँ!’
‘पर दोस्त की ज़रूरत तो महसूस होती होगी। इंसान के मन में हज़ारों बातें पैदा होती हैं, कभी ख़ुशी, कभी ग़म, कभी गुस्सा, कभी आक्रोश, और इंसान किसी से सब कह देना चाहता है। मन में रखने से कुढ़न होती है और उसका असर इंसान के पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है।’
यह बात कहते हुए मुझे उस दूसरी लड़की की याद आ गई जिसमे मुझे ऐन यही चीज़ें दिखती थीं।
‘हाँ, होती है और कुछ लड़कियाँ हैं भी पर फिर भी यह महसूस होता है कि मैं उनसे सब कुछ नहीं कह सकती… और किसी लड़के को दोस्त बनाने में डर लगता है क्योंकि मैं उन पे भरोसा नहीं कर पाती। आज हाथ पकड़ाओ तो कल गले पड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। दिन ब दिन उनकी ख्वाहिशें बढ़ने लगती हैं, वे अपनी सीमायें लांघने लगते हैं। दो बार मैं यह नाकाम कोशिश कर चुकी हूँ।’
हम नीचे आ गए जहाँ प्लग लगा था।
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07-17-2020, 11:56 AM,
#12
RE: raj sharma story कामलीला
मैंने उससे स्क्रू ड्राइवर माँगा और उसे खोल कर दुरुस्त करने लगा।
‘वैसे आप खुद को इतना अंडर एस्टीमेट क्यों करते हैं?’ उसने शायद पहली बार मुझे गौर से देखते हुए कहा।
‘कहाँ? नहीं तो। मैं जानता हूँ कि मैं क्या हूँ और मैं खामख्वाह की कल्पनाएं नहीं करता, न भ्रम पालता हूँ और इसका एक फायदा यह होता है कि मैं अपनी सीमायें नहीं लांघता कि कभी किसी की दुत्कार सहनी पड़े। अब जैसे आपने कभी मुझे दोस्त बनाया होता तो मैं हम दोनों के बीच का फर्क जानते समझते कभी अपनी सीमायें नहीं लांघता और न आपके हाथ से बढ़ कर गले तक पहुँचता।’
यह बात कहने के लिए मुझे बड़ी हिम्मत करनी पड़ी थी।
इस बार वो कुछ बोली नहीं, बस गहरी निगाहों से मुझे देखते रही।
मैंने प्लग सही किया और सॉकेट में लगा दिया, सप्लाई चालू हुई तो राऊटर में भी लाइन आ गई।
उसने लैप्पी के वाई फाई पे नज़र डाली, नेट चालू हो गया था।
‘तो मैं अब चलूँ?’
‘खाना खा के जाने का इरादा हो तो कहिये बना दूँ।’ कहते हुए वो इतने दिलकश अंदाज़ में मुस्कराई थी कि दिल धड़क कर रह गया था।
मेरे मुंह से बोल न फूटा तो मैं मुड़ कर चल पड़ा।
वो मुझे दरवाज़े तक छोड़ने आई थी और जब मुझे बाहर करके वापस दरवाज़ा बंद कर रही थी तो एक बात बोली ‘सोचूंगी।’
‘किस बारे में?’
पर जवाब न मिला और दरवाज़ा बंद हो गया।
उस रात मुझे बड़ी देर तक नींद नहीं आई, जितनी भी बात हुई अनपेक्षित थी और शांत मन में हलचल मचाने के लिए काफी थी।
उसकी आखिरी बात ‘सोचूंगी’ किसी तरह का साइन थी लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि उसका मकसद क्या था।
बहरहाल मैं उतरती रात में जाकर सो पाया।
सुबह उठा तो अजीब सी कैफियत थी… आज सोमवार था और काम का दिन था।
जैसे तैसे दस बजे जाने के लिए तैयार हुआ ही था कि फोन बज उठा।
कोई नया नंबर था लेकिन जब उठाया तो दिल की धड़कने बढ़ गईं।
‘निकल गए या अभी घर पे हो?’ आम तौर पर एकदम किसी की आवाज़ को पहचानना आसान नहीं होता लेकिन गौसिया की आवाज़ कुछ इस किस्म की थी कि लाखों नहीं तो हज़ारों में ज़रूर पहचानी जा सकती थी।
‘घर पे हूँ… निकलने वाला हूँ, बताओ?’
‘कोई बहाना मार के छुट्टी कर लो और इसी वक़्त मेरी छत पे आओ। दरवाज़ा खुला है, सीधे मेरे कमरे में आओ।’
‘इस वक़्त?’ मेरा दिल जैसे उछल के हलक में आ फंसा, धड़कनें बेतरतीब हो गईं।
‘हाँ! वैसे छत पे कोई नज़र नहीं रखे रहता लेकिन फिर भी दिखावे के लिए मॉडम वाला बॉक्स खोलकर चेक कर लेना कि लगे कुछ कर रहे हो। आस पास वाले जानते ही हैं कि क्या काम करते हो।’
फोन कट हो गया।
यह मेरी कल्पना से भी परे था, मेरे गुमान में भी नहीं था कि मुझे कभी ऐसा मौका मिलेगा।
पता नहीं क्या है उसके मन में?
बहरहाल मैंने ऑफिस फोन करके तबियत ख़राब होने का बहाना मारा और सीढ़ी से होकर ऊपरी छत पर आ गया।
मैंने आसपास नज़र दौड़ाई लेकिन कहीं कोई ऐसा नहीं दिखा जो इधर देख रहा हो। दोनों छतों के बीच की चार फुट की दीवार फांदी और उसकी छत पे पहुँच कर मॉडम वाला बॉक्स खोलकर ऐसे चेक करने लगा जैसे कुछ खराबी सही कर रहा होऊँ।
फिर उसे बंद करके सीढ़ियों के दरवाज़े पे आया जो कि खुला हुआ था और उससे होकर नीचे आ गया।
नीचे दो कमरे थे जिनके बारे में मुझे पता था कि एक उसके भाइयों का था और एक उसका।
मैंने उसके कमरे के दरवाज़े को पुश किया तो वो खुलता चला गया।
और सामने का नज़ारा देख कर मेरी धड़कने रुकते रुकते बचीं।
वो हसीन बला सामने ही खड़ी थी… लेकिन किस रूप में??
उसके घने रेशमी बाल खुले हुए थे जो उसके चेहरे और कन्धों पे फैले हुए थे… गोरा खूबसूरत चेहरा कल की ही तरह बेपर्दा था और क़यामत खेज बात यह थी कि उसने कपड़े नहीं पहने हुए थे, उसने पूरे जिस्म पर सिर्फ एक शिफॉन का दुपट्टा लपेटा हुआ था, दुपट्टे से सीना, कमर, और जांघों तक इस अंदाज़ में कवर था कि आवरण होते हुए भी सबकुछ अनावृत था।
शिफॉन के हल्के आवरण के पीछे उसके मध्यम आकार के वक्ष अपने पूरे जलाल में नज़र आ रहे थे जिनके ऊपरी सिरों को दो इंच के हल्के भूरे दायरों ने घेरा हुआ था और जिनकी छोटी छोटी भूरी चोटियाँ सर उठाये जैसे मुझे ही ललकार रही थीं।
उनके नीचे पतली सी कमर थी जहाँ एक गहरा सा गढ्ढा नाभि के रूप में पेट पर नज़र आ रहा था और पेट की ढलान पर ढेर से बालों का आभास हो रहा था… वहाँ जो भी था, वे घने बाल उसे पूरी बाकायदगी से छुपाए हुए थे।
और जो आवरण रहित था वो भी क्या कम था- संगमरमर की तरह तराशा, दूध से धुला, मखमल सा मुलायम… उसकी पतली सुराहीदार गर्दन, उसके भरे गोल कंधे, उसकी सुडौल और गदराई हुई जांघें…
उसमें हर चीज़ ऐसी ही थी जिसे घंटों निहारा जा सकता था।
मेरा खुला हुआ मुंह सूख गया था और साँसें अस्तव्यस्त हो चुकी थीं, जबकि वो बड़े गौर से मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी।
‘कल तुम कह रहे थे न कि तुम अपनी सीमायें जानते हो। मैंने तुम्हें दोस्त बनाया होता तो तुम हम दोनों का फर्क जानते समझते और अपनी सीमाओं को देखते हुए कभी मेरे हाथ से बढ़ कर मेरे गले तक न पहुँचते।’
‘तो?’ मेरे मुंह से बस इतना निकल पाया।
‘तो चलो मैंने तुम्हें अपना दोस्त समझो कि बना लिया और मेरा दोस्ती वाला हाथ तुम्हारे हाथ में है। मैं देखना चाहती हूँ कि तुम मेरे गले तक पहुँचते हो या नहीं।’
ओह ! तो यह बात थी, मेरा इम्तेहान हो रहा था।
भले उसे देखते ही मेरी हालत खराब हो गई थी, पैंट में तम्बू सा बन गया था लेकिन मैं कोई नया नया जवान हुआ छोरा नहीं था जिसका अपनी भावनाओं पर कोई नियंत्रण ही न हो।
तीस पार कर चुका था और ज़माने की भाषा में समझदार और इतना परिपक्व तो हो ही चुका था कि ऐसी किसी स्थिति में खुद को नियंत्रण में रख सकूँ।
जब तक क्लियर नहीं था तब तक मेरी मनःस्थिति दूसरी थी लेकिन अब मेरा दिमाग बदल गया।
वो मेरे सामने टहलने लगी और यूँ उसके चलने से उसके स्पंजी वक्षों और नितम्बों में जो थिरकन हो रही थी वो भी कम खतरनाक नहीं थी लेकिन मेरे लिए यह परीक्षा की घड़ी थी।
मैंने उसकी तरफ से ध्यान हटा कर उस दूसरी लड़की के बारे में सोचने लगा जो कल पहली बार मुझे देख कर मुस्कराई थी।
वो भी मुझे इसी कमी का शिकार लगती थी कि उसके पास अपने उदगार व्यक्त करने के लिए शायद कोई नहीं था और वो इस अभाव में मन ही मन घुटती रहती थी जिसका असर उसके स्वाभाव में दिखता था।
देखने से ही तीस से ऊपर की लगती थी लेकिन ज़ाहिरी तौर पर ऐसा कोई साइन नहीं नज़र आता था जिससे यह पता चलता कि वह शादीशुदा है।
एक वजह यह भी हो सकती है उसके रूखे और चिड़चिड़े मिजाज़ की।
जो परिस्थिति मेरे समक्ष थी उसमें नियंत्रण का बेहतरीन तरीका यही था कि खुद को दिमागी तौर पर वहाँ से हटा कर कहीं और ले जाया जाए।
यानि मेरा शरीर वहीं था लेकिन दिमाग कहीं और भटक रहा था और वो मुझे पढ़ने की कोशिश में थी।
जब उसने मेरी पैंट में आया तनाव ख़त्म होते देखा, साँसों की बेतरतीबी दुरुस्त होते और चेहरे पर इत्मीनान झलकते देखा तो जैसे फैसला सुनाने पास आ गई।
‘मैंने बहुत बड़ा कदम उठाया था लेकिन जाने क्यों मुझे यकीन था कि तुम वैसे ही हो जैसे मैं सोचती हूँ।’ उसने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा।
‘कैसा?’ अब मुस्कराने की बारी मेरी थी।
‘जाओ, क्रासिंग वाले पुल के नीचे इंतज़ार करो, मैं दस मिनट में वहाँ पहुँच रही हूँ।’
‘ओके… पर जाने से पहले मेरे एक सवाल का जवाब दे दो कि अगर मैं नियंत्रण खो बैठता तो?’
‘तो मैं चिल्ला पड़ती और नीचे से दादा दादी आ जाते और तुम पकड़े जाते। कौन मानता कि मैंने तुम्हें बुलाया था।’ कहते हुए उसने दरवाज़ा बंद कर लिया।
यानि जवां जोश, अधीरता और परिपक्वता में यह फर्क होता है।
मैंने बात जाने समझे बिना जल्दबाजी दिखाई होती तो गया था बारह के भाव।
इस अहसास के साथ कि मैंने परीक्षा पास कर ली थी।
ख़ुशी ख़ुशी मैं जैसे गया था वैसे ही वहाँ से निकला और बाइक से निशातगंज पुल के नीचे पहुँच कर उसकी प्रतीक्षा करने लगा।
वादे के मुताबिक वो दस मिनट में ही पहुँच गई, वैसी ही ढकी मुंदी थी जैसे हमेशा दिखती थी।
खुद से ही पास आई और बाइक पे बैठते हुए बोली- लोहिया पार्क चलो।
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07-17-2020, 11:56 AM,
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RE: raj sharma story कामलीला
मैंने आदेश का पालन किया और थोड़ी देर बाद हम लोहिया पार्क के एक कोने में घास पर बैठे थे।
‘मैं कुछ कहूँ, उससे पहले एक वादा करो कि कभी मेरे इश्क़ में मुब्तिला नहीं होगे। समझो कि मैं चाँद हूँ जो इत्तेफ़ाक़ से कुछ वक़्त के लिए तुम्हारे साथ हूँ पर तुम हासिल करने के बारे में सोचोगे भी नहीं!’
‘मैंने पहले ही कहा था कि मैं अपनी लिमिट जानता हूँ और इस बात के बावजूद कि तुम मेरे साथ इस पार्क में प्रेमिका की तरह बैठी हो मैं इस खुशफहमी में मुब्तिला नहीं कि तुम मेरे इश्क़ में पगला गई हो। बल्कि समझ रहा हूँ कि शायद तुम्हें कुछ काम है, शायद तुम्हें कुछ वक़्त के लिए ऐसे पुरुष साथी की ज़रुरत है जिससे तुम अपने मन की वे बातें शेयर कर सको जो अपनी सहेलियों से या कर नहीं पाती या करने से संतुष्टि नहीं महसूस करती।’
‘यही तुम्हारे सवाल का जवाब है कि तुम्हें लेकर मैं सोचती थी कि तुम एक मैच्योर शख्स की तरह मुझे समझोगे, न कि मेरी नज़दीकी हासिल होते ही जवां लौंडों की तरह पगला जाओगे।’
‘ठीक है, अब कहो।’
‘मेरी एक बड़ी बहन है जो शादीशुदा है, दुबई में रहती है। शायद मुझसे भी ज्यादा खूबसूरत। वो मुझसे बड़ी है, मैंने बचपन से ही उन्हें देखा समझा… जब छोटी सी थीं तभी से पढाई के साथ घर की ज़िम्मेदारी लाद ली और पर्देदारी ऐसी कि खुले में जा भी न सकें, खुल के हंस बोल भी न सकें। हमेशा पाबंदियों में जीना, लड़कों के साथ घूमना फिरना तो दूर, बात तक करना दूभर…
अम्मी अब्बू दोनों ही पुराने ख़यालात के हैं, उन्हें लगता है कि हमारा किसी लड़के से बोलना भी हमारी बदनामी का सबब बन जायेगा।
मैंने नहीं देखा कि कभी उन्होंने ज़िन्दगी अपने तरीके, अपने अंदाज़ में जी हो… हमेशा सबकी उम्मीदों को पूरा करते जवान हुईं और फिर शादी और उसके बाद वही सब अपने शौहर के लिए। वही पर्देदारी, वही पाबंदियाँ, वही एकरसता से भरी बोरिंग ज़िन्दगी।
मैं भी वही ज़िन्दगी जी रही हूँ और मेरा अंजाम भी वही होना है लेकिन मैं तो पुराने ज़माने की नहीं। अपने साथ की लड़कियों को देखती हूँ जिनमें कई मेरे मजहब ही हैं लेकिन उन पर तो ये पाबंदियाँ नहीं। वे पढ़ती हैं, खेलती हैं, पार्कों, माल में मौजमस्ती करती हैं, थिएटर में फिल्म देखती हैं, लड़कों के साथ भी घूमती हैं और उनकी शादी भी हुई तो अपने शौहर के साथ भी वही ज़िंदगी। कहीं कोई रोक टोक नहीं। कहीं किसी की बदनामी नहीं हुई जा रही, किसी के खानदान पर आंच नहीं आई जा रही।
यह सब देख कर खटकता है, किसी कमी का एहसास होता है, मन में बगावत पैदा होती है। आज जो मैंने तुम्हें आज़माने के लिए ‘शो’ दिखाया वो मेरी आज़माइश भी थी, अपनी बगावत को आज़माने की, अपनी जुर्रत को देखने की कि क्या कुछ वक़्त के लिए सही पर मैं उन बेड़ियों को तोड़ सकती हूँ जो मेरे पैरों में वालदैन ने डाल रखी हैं, मज़हब और रिवाज़ों ने डाल रखी हैं।’
‘चलो, हम दोनों आज़माइश में कामयाब रहे… अब?’
‘मुझे मेरा अंजाम पता है। वही एक जैसी बोरिंग, एकरसता से भरी ज़िन्दगी जीते आई हूँ और बी एस सी करते ही मेरी शादी करने का प्लान है यानि शौहर के घर जाकर इसी सिलसिले को कंटिन्यू करना है। दिन भर घर के काम, ससुराल वालों की उम्मीदें पूरी करो, रात में शौहर की भूख मिटाओ, फिर बच्चे पैदा करो, उन्हें बड़ा करने में खुद को खपा दो। बस।
पर इस सबके बीच मैं कुछ दिन अपने लिए जीना चाहती हूँ। वो सब करना चाहती हूँ जो बाकी लड़कियाँ करती हैं। खुद को आज़ाद महसूस करना चाहती हूँ- वालदैन से, रिवाज़ों से, मज़हब से।
कुछ दिन के लिए मैं वो ज़िन्दगी जीना चाहती हूँ जो मैं अपने बुढ़ापे तक याद रखूँ!’
‘कैसे?’
‘घर के लोग गाँव गए हैं। वहाँ मामू रहते हैं जिनके आखिरी बेटे की शादी है इसलिए इतने दिन रुकने का प्रोग्राम बना। मेरे बाकी रिश्तेदार यहीं लखनऊ में रहते हैं इसलिए इस शादी के बाद कोई ऐसा मौका नहीं बनने वाला कि मुझे यूँ आज़ाद होने का मौका मिले।
सब लोग संडे रात तक आएंगे… यानि हमारे पास पूरे सात दिन हैं और इन सात दिनों में मैं जी लेना चाहती हूँ। पिछले तीन महीने से मुझे पता था कि ऐसी नौबत आने वाली है और मैं कोई ऐसा ही साथी चाहती थी जो ये वक़्त मेरे साथ मेरे तरीके से तो गुज़ारे मगर आगे मेरे लिए प्रॉब्लम न बने क्योंकि मैं इश्क़ नहीं कर सकती और न सेक्स।
मेरा कौमार्य मेरे शौहर की अमानत है और अपनी ज़िन्दगी जीते हुए भी मैं इतनी ईमानदारी तो ज़रूर निभाऊंगी कि मुझे उस इंसान के सामने शर्मिंदा न होना पड़े जिसके साथ मुझे पूरी ज़िन्दगी गुज़ारनी है।
मुझे तुममे यह उम्मीद नज़र आती थी कि जो मैं चाहती हूँ शायद तुम उसमे काम आ सको और देखो मेरी उम्मीद गलत नहीं साबित हुई।’
‘मतलब यह कि ये सात दिन तुम उन आज़ाद लड़कियों की ज़िन्दगी जीना चाहती हो जिन्हें अपने आसपास देखती आई हो!’
‘हाँ।’
‘पर वे सिर्फ पार्कों, मॉल में ही नहीं जाती, लड़कों के साथ बाइक पे बैठ के टहलती, फिल्में ही नहीं देखती बल्कि निजी पलों में फिज़िकल भी होती हैं, न सिर्फ हगिंग, किसिंग बल्कि सहवास भी!’
‘हम भी वो सब करेंगे, सिर्फ एक चीज़ इंटरकोर्स को छोड़ कर। पर प्लीज, तुम कोई अटैचमेंट नहीं पालना वर्ना हम दोनों को ही तकलीफ होगी।’
‘नहीं, मैंने दिमाग में बिठा लिया है कि यह एक स्क्रिप्टेड शो है और चौबीस घंटे हमारे आगे पीछे कैमरे चल रहे हैं और हम बस एक्टिंग कर रहे हैं। खुश?’
‘खुश!’ उसके चेहरे पर इस घड़ी बच्चों जैसी ख़ुशी दिखाई दी जिसे उसका मनपसंद खिलौना मिल गया हो।
वो खुश थी तो मैं खुश था, इस हकीकत को समझने के बावजूद कि जैसा वह सोच रही थी वैसा नहीं होने वाला था।
कोई जोड़ा जो इतने क्लोज़ आये कि उनमें फिज़िकल एक्टिविटीज भी हों और वो भावनात्मक रूप से अटैच न हो, ऐसा मेरे जैसे मैच्योर, तजुर्बेकार शख्स के लिए तो किसी हद तक संभव भी था जिसके नीचे से पहले भी कई लड़कियाँ गुज़र चुकी हों लेकिन उसके जैसी कम उम्र की, नई नई जवान हुई लड़की के लिए नामुमकिन था- पर उसे ऐसा जाता कर मैं अपना काम नहीं बिगड़ना चाहता था।
हाँ, उसे इस बात का अहसास ज़रूर था कि फिज़िकल होने वाले कमज़ोर पलों में वह बहक सकती थी इसीलिए उसने मेरे जैसे ज्यादा उम्र के और तजुर्बेकार शख्स को इस अनुभव के लिए चुना था जो ऐसी किसी हालत में न सिर्फ खुद को सम्भाल सके बल्कि उसे भी बहकने से रोक सके।
यहाँ मैं ज़रूर उसकी अपेक्षाओं पर पूरा उतरने के लिए तैयार था।
‘तो चलो शुरू करते हैं- नए रोमांच की पहली घड़ी… मेरे लिए!’
मैं उसकी शक्ल देखने लगा।
‘एक मर्द का पहला स्पर्श!’ कहते हुए उसकी आवाज़ में अजीब सी उत्तेजना थी।
‘क्यों? पहले किसी को स्पर्श नहीं किया क्या?’
‘अरे वो स्पर्श अलग था… यहाँ बात और है।’
मैंने उसके हाथ थाम लिए और भरी भरी कलाइयाँ सहलाने लगा।
उसने इस पहले सेक्सुअल स्पर्श को अनुभव करने के लिए आँखें बंद कर ली थीं।
उसकी सिहरन मैं अपनी हथेलियों में महसूस कर सकता था।
मैंने कलाइयों को सहलाते हुए अपने हाथ उसकी मखमली बाहों से गुज़ारते हुए उसके गोरे गोरे गालों तक ले आया।
वह काँप सी गई।
मैं अपना चेहरा उसके चेहरे के पास ले आया कि मेरी साँसें उसके चेहरे से टकराने लगीं।
मैंने अपने होंठ उसके माथे से टिका दिए…
उसके जिस्म में एक लहर सी फिर गुज़र गई।
हालाँकि एक तरह से ये एक्टिंग थी, नकलीपन था मगर फिर भी वो अपना मज़ा ले रही थी और मैं अपना मज़ा ले रहा था।
फिर उसने मुझे परे धकेल दिया।
‘अजीब सा लग रहा था… बेचैनी सी पैदा हो रही थी। पूरे जिस्म में सनसनाहट सी होने लगी थी।’ उसने कुछ झेंपे झेंपे अंदाज़ में कहा।
‘अच्छा या बुरा?’ मैंने शरारत भरे स्वर में कहा।
‘चलो फन चलते हैं। मुझे कुछ शॉपिंग करनी है।’ मेरी बात काट कर उसने अपनी बात कही।
कुछ कहने के बजाय मैं उठ खड़ा हुआ।
फन मॉल सड़क के उस ओर ही था…
हम वहाँ आ गए जहाँ घंटे भर की छंटाई के बाद उसने एक जीन्स और एक टी-शर्ट ली।
इसके बाद उसने सहारा गंज चलने को कहा और हम वहाँ से रुखसत हो गए।
वही से वाया बटलर रोड, अशोक मार्ग होते सहारा गंज ले आया।
यहाँ भी उसने घंटे भर की मगज़मारी के बाद बिग बाजार और पैंटालून से एक एक जीन्स और टॉप खरीदा।
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07-17-2020, 11:56 AM,
#14
RE: raj sharma story कामलीला
तब तक कुछ भूख भी लग आई थी तो हमने वहीं ऊपर रेस्टॉरेंट से पिज़्ज़ा खाये और इसके बाद उसकी मर्ज़ी के मुताबिक मैं उसे बड़े इमामबाड़े ले आया जहाँ काफी देर इधर उधर घूमते, बकैती करते वक़्त गुज़ारा और फिर सामान, चप्पल देखने वाले को पकड़ा कर बाउली और भुलभुलइयाँ की तरफ चले आये।
वहाँ कई कम रोशनी वाले कोनों में ऐसे जोड़े दिखे जो लिपटे चिपटे चूमाचाटी में मस्त थे और जिन्हे देख कर उसकी आरजुएँ भी सर उठाने लगीं थीं।
अतएव वह मुझे एक दर में खींच लाई।
‘देखो, मैं नहीं चाहती कि मैं सबकुछ अपने मुंह से कहूं। मैं चाहती हूँ कि तुम खुद से समझो कि मेरी उम्र की लड़की की क्या इच्छाएँ होती हैं। तुम्हें जो लगे करो… मेरी सिर्फ एक शर्त है कि मेरी वर्जिनिटी नहीं डिस्ट्रॉय होनी चाहिए वर्ना पूरी उम्र पछताऊँगी कि मैंने ऐसा कदम क्यों उठाया। इसके सिवा तुम्हें सबकुछ करने की इज़ाज़त है।’
उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा।
अब अंधे को क्या चाहिये… दो आँखें ही न!
मैंने खड़े खड़े उसे पीछे की दीवार से सटाते हुए अपनी बाँहों में बाहर लिया।
वह काँप सी गई।
ज़ाहिर है कि किसी मर्द के इतने पास आने का उसके लिए यह पहला मौका था।
मैं उसकी आँखें में झांकते हुए अपना चेहरा उसके चेहरे के इतनी पास ले आया कि हमारी साँसें एक दूसरे से टकराने लगीं।
‘इस बार मत धकेलना, चाहे जितनी भी बेचैनी हो।’
उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस मेरी आँखों में देखती रही।
मैंने अपने होंठ उसके होंठो के इतने पास ले आया कि वह उनकी गर्मी महसूस कर सके।
कुछ देर वह उनकी गर्मी बर्दाश्त करती मेरी आँखों में देखती रही। मैं उसकी भारी हो गईं साँसें अपने होंठों पर महसूस करता रहा, फिर जब लगा कि उसके होंठ अपने पहले बोसे के लिए तैयार हो चुके थे तो मैंने उसके होंठों से अपने होंठ जोड़ दिए।
उन्होंने वाकयी गर्मजोशी से मेरे होंठों का स्वागत किया, एक गहरी थरथराहट उसके जिस्म से गुज़री थी जिसे बखूबी मैंने जिस्म पर महसूस किया था और जैसे किसी नशे के अतिरेक से उसकी आँखें मुँद गईं थीं।
मैं उसके निचले होंठ को चूसने लगा और कुछ देर की झिझक, शर्म और हिचकिचाहट के बाद उसने भी मेरे ऊपरी होंठ को चूसना शुरू किया।
जब मैंने उसके ऊपरी होंठ पर अपनी पकड़ बनाई तो उसने मेरे निचले होंठ पर पकड़ बना ली और होंठों के इस ज़बरदस्त मर्दन के बीच ही मैंने उसके होंठों को चीरते हुए अपनी ज़ुबान उसके मुंह में घुसा दी।
उसने उसका भी बहिष्कार न किया और उसे चूसने लगी, कुछ देर बाद उसने अपने जीभ मेरे मुंह में दी जिसे मैं चूसने लगा।
इस बीच मेरे दोनों हाथ लगातार उसके दोनों मखमली नितम्बों को सधे हुए हाथों से दबाते सहलाते रहे थे।
हालाँकि यह सिलसिला ज्यादा लम्बा न चल पाया क्योंकि कुछ पर्यटक उधर आ निकले थे तो हम अलग हो गए और वह आँखें चुराती अपनी अस्त व्यस्त हो चुकी साँसों को दुरुस्त करने लगी।
‘चलो अब यहाँ से चलते हैं।’ उसने अपने नक़ाब को दुरुस्त करते हुए कहा और चेहरे को वापस कवर कर लिया।
हम वहाँ से बाहर निकल आये… इमामबाड़ा छोड़ कर हम बुद्धा पार्क पहुंचे और वहीं बोटिंग करते हुए बतियाने लगे।
‘दादा जी पूछेंगे नहीं कि आज इतनी देर क्यों हो गई?’
‘कहाँ देर हो गई? तीन चार बजे तक ही तो वापसी होती है। मैंने कह भी दिया है कि मेरे पेपर होने वाले हैं तो मैं हफ्ते भर थोड़ी एक्स्ट्रा पढ़ाई करुँगी जिसके चलते मैं 6-7 बजे तक वापस आऊँगी।
तुम भी हफ्ते भर की छुट्टी ले लो, अब अगले सोमवार ही जाना। तब तक मुझे वह दुनिया दिखाओ जो मुझे किसी और तरीके से नहीं दिखनी थी।’
‘ओ के मैडम!’
वहाँ हम पांच बजे तक रुके जिसके बाद मैंने उसे आईटी पर छोड़ दिया जहाँ से वो टैम्पो पकड़ के चली गई।
मैं अपने ऑफिस पहुँच गया।
ज़बरदस्ती 8 बजे तक रुका और मैनेजर से हफ्ते भर की छुट्टी की गुहार लगाई, जिसके एवज में कई ताने तो मिले पर छुट्टी भी मिल गई और 9 बजे तक मैं वापस घर पहुँच कर ऊपर अपने पोर्शन में बंद हो गया।
दस बजे गौसिया के पास पहुँचने का वादा था।
तब तक वह भी अपने सब काम निपटा कर ऊपर अपने पोर्शन में लॉक्ड हो चुकी होनी थी।
और ठीक वक़्त पर मैं अँधेरे का फायदा उठाते हुए उसके पास पहुँच गया।
ऐसा लगता था जैसे वह भी इन हालात का फायदा उठाने के लिए खुद को मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार कर चुकी थी, यह उसके कपड़ों से ज़ाहिर हो रहा था, उसने साटन की एक स्पैगेटी पहन रखी था जिसके ऊपरी सिरे से दोनो बूब्स को आधा देखा जा सकता था और नीचे जहाँ तक उसकी लम्बाई थी, सिर्फ पैंटी पहन रखी थी जिससे उसकी मखमली भरी भरी टाँगें पूरी तरह अनावृत थीं।
‘यह कब लिया?’
‘पहले कभी लिया था। बंद कमरे में कभी कभार पहन कर अपनी वर्चुअल आज़ादी को एन्जॉय कर लेती थी! बैठो यहाँ।’
‘नीचे से किसी के आने का तो कोई चांस नहीं?’ मैं बेड पर उसके पास ही बैठते हुए बोला।
‘नीचे जीने पर ही दरवाज़ा लॉक है। वैसे भी दोनों दादा दादी घुटनों के दर्द के शिकार हैं… ऊपर पिछले दो साल में तो नहीं चढ़े।’
‘हम्म… तो अब क्या करने का इरादा है?’
‘मैंने कभी कभार नेट पे ‘उसे’ देखा है या फिर बच्चों के… मुझे दिखाओ कैसा होता है?’ कहते हुए उसने ऐसे होंठों पर ज़ुबान फेरी थी जैसे अंदर तक मुँह सूख गया हो।
मैंने देर नहीं लगाई… अपनी लोअर पहुँचों में पहुंचा दी और एकदम से अंडरवियर नीचे कर दी।
अभी यहाँ आने से पहले ही, ऐसे ही किसी संभावित क्षण की अपेक्षा में मैंने छोटे भाई की शेविंग कर डाली थी पर अभी चूँकि माहौल बना भी नहीं था इसलिए सुप्त अवस्था में ही था।
‘यह…?!? यह तो बहुत छोटा है।’ वह हैरानी से उसे नज़दीक से देखने लगी- और इतना बेजान सा क्यों है?’
‘अरे आम हालत में सैनिक ऐसे ही रहता है। जब जंग लड़ने की नौबत आती है तभी तो मूड में आता है।’
उसकी निगाहों की तपिश ने छोटू को सचेत कर दिया और उसमें जान आने लगी, लिंग की त्वचा में पड़ी झुर्रियाँ फैलने लगीं और वह सीधा होने लगा, फिर देखते देखते पूरी तरह तन कर सैल्यूट करने लगा।
वह उसकी हर हरकत को गौर से देखने लगी।
‘हर चीज़ तीन स्वरूप में होती है- लार्ज, मीडियम और स्माल… यह क्या हैसियत रखता है?’
‘अलग अलग कन्टिनेंट्स में मर्दों के अलग अलग साइज़ होते हैं। इंटरनेशनल परिपेक्ष्य में देखोगी तो यह स्माल है और एशियाई रीज़न में देखोगी तो मीडियम।’
‘मतलब मेरे शौहर का इससे बड़ा हो सकता है।’
‘हाँ क्यों नहीं। इससे बड़ा भी और मोटा भी।’
‘तो वह उसमें अंदर घुसता कैसे है? मैंने कई बार शीशे में अपनी वेजाइना का छेद देखने की कोशिश की जो दिखता तक नहीं और उसमेंइतना भी आखिर कैसे घुसेगा। इससे बड़ा तो बाद की बात है।’
‘अब वर्जिनिटी का मसला न होता तो घुसा के बता देता।’
‘वर्जिनिटी का मसला न होता तो मैं यह सवाल क्यों पूछती बाबू! एक छोटे से छेद में जब ऐसी मोटी चीज़ घुसती होगी तो बेइंतहा दर्द होता होगा न?’
‘यह कुदरत का नियम है कि जब छोटी जगह में बड़ी चीज़ जगह बनाएगी तो खिंचाव दर्द पैदा ही करेगा लेकिन यह छेद ऐसी फ्लेक्सिब्लिटी रखते हैं कि एक बार में ही उस बड़ी चीज़ के लायक जगह बना लेते हैं। हाँ एण्टर करने के वक़्त दर्द ज़रूर होगा, इसे कम किया जा सकता है लेकिन बचा नहीं जा सकता।’
‘यह बार बार ठुनक क्यों रहा है?’
‘यह भी बच्चा है, मचल रहा है, अपनी जोड़ीदार की डिमांड कर रहा है। इसे छोड़ो, मैं समझा लूँगा।
तुमने देख लिया– अब मुझे देखने दो।’
‘क्या?’
‘अपना यह मक्खन मलाई जिस्म।’
‘खुद ही देख लो।’
मतलब साफ़ था कि खुद करो जो करना हो।
मैंने लोअर फर्श पे छोड़ा और पैर समेत कर पूरी तरह बैड पे आ गया, उसे भी बीच में कर लिया और उसके दोनों हाथ पकड़ कर ऊपर उठा दिए।
बगलों में रेशमी से बाल थे और वे किसी डिओ से महक रहीं थी।
मैंने बाकायदा उन्हें सूंघते हुए चूमा और उसके जिस्म में पैदा हुई थरथराहट को अपने होंठों पर महसूस किया।
फिर थोड़ा पीछे हट कर उसकी स्पैगेटी को किनारों से पकड़ कर ऊपर उठाते हुए सर से बाहर निकाल दिया।
उभरे हुए निप्पल पहले से पता दे रहे थे कि अंदर ब्रा नहीं थी और अब वे आवरण रहित, अपने पूरे सौंदर्य के साथ, पूरे आकार में मेरे सामने बेपर्दा थे।
दो बेहद खूबसूरत, गुदाज दूध से गोरे बेदाग़ मम्मे जिनके केंद्र में दो इंच का हल्का गुलाबी भूरा हिस्सा उन छोटी छोटी चोटियों को सुरक्षित किये था जो मेरी नज़रों की आंच से उभर रही थीं… तन रही थीं।
अंदाजतन वे 34 साइज़ के थे और वज़न के कारण नीचे गिर से रहे थे।
उसके गालों पर शर्म की गहरी लालिमा फैली हुई थी और उसने आँखें भींच ली थीं।
मैंने उसे कन्धों से थामते हुए लिटा लिया।
फिर अपने होंठों का एक स्पर्श उसके एक स्तन की तनी हुई चोटी पे दिया।
उसके जिस्म में फिर कंपकंपी पैदा हुई और उसने ‘सी’ करते हुए होंठ भींच लिए।
वैसा ही स्पर्श मैंने दूसरी चोटी पे दिया।
उसने हाथों की मुट्ठियों में चादर दबोच ली और पैरों की एड़ियां गद्दे में धंसा दीं।
मैं उसे चूमते हुए नीचे हुआ और उसके सपाट पेट के बीच हल्के उभरे और गहरे नाभि के गड्ढे पे रुका, जहाँ मैंने जीभ की नोक से हल्का सा स्पर्श दिया और उत्तेजना से वह कमान सी तन गई, पेट ऊपर उठ गया।
मैंने सीधे होते उसकी पैंटी में उँगलियाँ फसाईं और उसे नीचे करते एड़ियों से बाहर निकाल दिया।
उसने फिर भी मुझे नहीं रोका, बस वैसे ही आँखे बंद किये धीरे धीरे हांफती रहीं।
उदर की ढलान पर घने काले रेशमी बालों का बड़ा सा झुरमुट उस गुदाज़ मखमली योनि को ढके हुए था जो बंद कंडीशन में बस ऐसी लग रही थी जैसे पावरोटी पर एक चीरा लगा कर उसे बंद कर दिया गया हो।

अपनी सहूलियत के हिसाब से मैंने उसके घुटने मोड़ कर दोनों जांघों को यूँ फैला दिया कि वो बंद पड़ी गहरे रंग की लकीर खुल गई।
वह बस ख़ामोशी से होंठ भींचे थरथराती रही।
मैंने उस ज्वालामुखी के दहाने को दोनों अंगूठे लगाकर फैलाया।
एकदम सुर्ख सा अंदरूनी भाग मेरे सामने नुमाया हो गया।
छोटा सा सुर्ख रंग का भगांकुर… छोटी छोटी सी गहरे रंग की कलिकाएँ, नीचे हल्के गुलाबी रंग का वह भाग जो अभी अक्षत था, अछूता था, अनयूज़्ड था।
जहाँ योनिमार्ग इतना संकरा और आपस में ऐसे सटा हुआ था कि वहाँ गौर से देखने पर ही पता चलता था कि कोई छेद भी है, जो इस बात का सबूत था कि उसमें अभी लिंग तो क्या सींक भी न गई होगी।
लेकिन योनि असली नकली नहीं जानती… उसके लिए इतना काफी था कि कोई मर्द उसे उकसा रहा था, उत्तेजित कर रहा था और वो कामरस छोड़ रही थी।
उसके उस लगभग अदृश्य से छिद्र से निकलता पानी नीचे बहता उसके गुदाद्वार को गीला करते नीचे चादर तक पहुँच रहा था।
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07-17-2020, 11:56 AM,
#15
RE: raj sharma story कामलीला
मैं अपने घुटनों को पेट से लगाए झुक कर एकदम उसके पास पहुँच गया और उस खुशबू को फेफड़ों में भरने लगा जो रस से जारी हो रही थी…
कुछ कुछ खरबूज जैसी गंध थी जो मेरे तनमन में न सिर्फ रोमांच भर रही थी बल्कि मेरे लिंग को इस कदर कड़ा होने पर मजबूर कर रही थी कि लग रहा था जैसे फट ही पड़ेगा।
मैंने वहाँ पर, जहाँ उसका भगांकुर उत्तेजित अवस्था में उभरा हुआ था- अपने होंठ टिका दिये।
वह एक बार फिर ज़ोर से कांपी…
और मैंने उसके कूल्हों में उंगलियाँ धंसाते हुए अपनी जीभ नीचे छेद की तरफ से लगाकर ऊपर क्लिटरिस हुड तक ज़ोर से खींचता चला गया।
उसकी ज़ोर की सिसकारी छूट गई…
वह इतनी जोर से तड़पी कि मुझे पीछे ठेल कर अपनी टांगें समेट लीं और बिस्तर की चादर को ताक़त से खींच कर अपने जिस्म को छुपा लिया और चेहरा नीचे करके हाँफने लगी।
मैं भी पास ही बैठा अपनी साँसें दुरुस्त करने लगा।
‘गुदगुदी हो रही थी… मेरी बर्दाश्त से बाहर हो रहा था।’ उसने भारी साँसों के साथ कहा।
‘ओके- रिलैक्स! छोड़ो, हम दूसरी बात करते हैं, ये बाल कभी बनाती नहीं क्या?’
‘कभी रेज़र, ब्लेड या हेयर रिमूवर नहीं यूज़ किया। बस कैंची से कुतर कर छोटे कर लेती हूँ।’
‘अगर चाहती हो कि इस गोरे मक्खन जैसे बदन के साथ ये हिस्सा मैच करता रहे तो इन दोनों में से कोई चीज़ यूज़ न करना क्योंकि दोनों ही से आसपास की त्वचा काली पड़ जाती है, बल्कि वैक्सिंग से बाल निकलवाना। स्किन ऐसी ही बनी रहेगी।’
‘यहाँ कौन करता हैं ‘वहाँ’ की वैक्सिंग। बगलों की कराती हूँ… एक बार ऐसी ही पार्लर वाली से पूछा था तो हंसने लगी थी कि अभी हम इतने एडवांस नहीं हुए। हेयर रिमूवर से काम चलाइए।’
‘चलो अभी कैंची से काम चलाओ, बाद में अपने हबी से वैक्सिंग कराना। कल कैंची से कुतर कर छोटे कर लेना।’
‘ठीक है, अब तुम जाओ। आज के लिए इतना डोज़ काफी है और हाँ अपना मोबाइल छोड़े जाओ। सोने से पहले मैं छत पे जाकर तुम्हारी दीवार पे रख दूंगी, तुम सुबह उठते ही उठा लेना।’
‘मेरा मोबाइल क्यों?’
‘क्योंकि मैं नहीं चाहती कि कभी कोई पोर्नोग्राफिक वेब हिस्ट्री मेरी आईपी के साथ अटैच पाई जाए।’
‘ओके… पर पोर्न साइट्स पता हैं। ‘
‘नहीं- वह भी बता के जाओ।’
मैंने उसे www.raj69.com और इन्डियन पोर्न विडियो साइट बताई और चोरों की तरह वहाँ से रुखसत होकर अपने कमरे में आ गया।
पर मेरी जो हालत थी उसमें नींद आ पाना मुमकिन नहीं था।
एक ही विकल्प था कि मैं हाथ के घर्षण से वीर्यपात करूँ और चुपचाप सो जाऊं… मैंने ऐसा ही किया।
अगले दिन मंगल था… मैं सुबह फोन उठा लाया था।
उसने व्हाट्सप्प पे मैसेज कर दिया था कि रात देर से सोई थी इसलिए दिन की शुरुआत ग्यारह बजे होगी।
मैं उसकी हालत समझ सकता था।
सुबह नाश्ता पानी करके मैं फोन पर टाईमपास करने लगा।
और ठीक ग्यारह बजे मुक़र्रर मुकाम पर पहुँच गया जो कि आज आर्यकन्या स्कूल की तरफ था जहाँ से मैं उसके मुताबिक बाइक चलाते रेजीडेन्सी ले आया।
बाइक साइड में स्टैंड पे जमा करके हम अंदर आ गए।
घुसते ही जो बाईं तरफ खंडहर थे वहाँ पहुँच कर जैसे ही हम थोड़ी आड़ में हुए, उसने जिस्म पे मढ़ा नक़ाब और स्कार्फ़ उतार कर अपने पर्स में ठूंस लिया।
उसके तन पे उन्ही कपड़ों में से एक जीन्स और टी-शर्ट थी जो उसने कल खरीदे थे।
बाल भी उसने इसी काया के अनुरूप पोनी टेल की सूरत में बांध रखे थे और अपने वास्तविक रूप से बिल्कुल अलग लग रही थी।
गले में स्टोल डाल रखा था जो चेहरे को कवर करने के काम आना था शायद, फ़िलहाल तो चाँद सा नूरानी चेहरा आवरण रहित था।
‘मारव्लस!’ मैं प्रशंसात्मक स्वर में बोला- ग़ज़ब लग रही हो! सेक्सी दिख रही हो! जैसी बहनजी टाइप बनी रहती हो उसके एकदम उलट!’
वह फरमाइशी ढंग से हंसी।
मैंने उसे बाँहों में दबोच लिया, उसने छटपटा कर निकलने की कोशिश की लेकिन सफलता तभी मिली जब उधर कोई और आ गया।
वहाँ से हटकर हम उधर कब्रिस्तान की तरफ निकल आये जहाँ झाड़ियों में आलरेडी कई जोड़े घुसे हुए थे।
एक झुरमुट हमें भी खाली मिल गया तो हम भी उसी में ‘फिट’ हो गए।
वहाँ इस बात की आसानी थी कि मैं उसे न सिर्फ बाँहों में दबोच सकता था बल्कि अपने हाथ उसके बूब्स की मालिश मर्दन में लगा सकता था।
न सिर्फ ऊपर से बल्कि उसकी टी-शर्ट के अंदर डाल कर ब्रा को ऊपर की तरफ धकेल कर दोनों कबूतरों को नीचे खींच लिया था और हौले हौले उन स्पंजी मम्मों क सहला दबा रहा था।
जैसी उम्मीद थी उसने रोकने की कोशिश की थी लेकिन जल्द ही इस मर्दन और रगड़न का मज़ा मिलते ही उसने हथियार डाल दिए थे।
और अब वस्तुस्थिति यह थी कि वह अधलेटी सी मेरी गोद में थी और मैं दोनों हाथों से उसके मम्मों का मर्दन कर रहा था।
‘तो कल कैसी गुज़री?’ मैंने अपने होंठ उसके कान के पास रखते हुए पूछा।
‘बहुत बुरी गुज़री। सब कुछ अच्छा लेकिन अजीब सा लग रहा था।
जो कहानी पढ़ी, जो वीडियो देखी… सबने एक अजीब सा नशा पैदा दिया, पूरा जिस्म सनसना रहा था, दिमाग पर अजीब सा नशा सवार था…
बार बार अपने वेजाइना पे हाथ लगने को जी रहा था जो चिंगारियां छोड़ रही थी। वह बस बह रही थी।
पूरे जिस्म में अजीब सी ऐंठन और बेचैनी हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कही किसी मुकाम पे पहुँचना है, जैसे इस सबका कोई अंत होना है…
लेकिन क्या, कुछ समझ में नहीं आ रहा था।’ उसने लहराती कपकपाती आवाज़ में कहा।
‘जो अभी महसूस हो रहा है।’
‘सेम… ऐसा ही, बस अच्छा लग रहा है। दिमाग पर मस्ती, नशा हावी हो रहा है। पूरे जिस्म में एक मादक सी सनसनाहट फैल रही है। दिल कर रहा है बस करते रहो।
ऐसा लगता है जैसे कुछ मेरे जिस्म में कैद है जो निकलना चाहता है। जैसे कोई लावा हो जो बार बार किनारों से टकराता हो और किनारों को तोड़ कर बाहर निकल जाना चाहता हो पर अजीब सी बेबसी महसूस हो रही है कि निकल नहीं पा रहा।’
‘आज रात हम उस लावे को बाहर निकालेंगे।’
‘कल जब सब ख़त्म करके सोने की कोशिश की तो इस बेचैनी ने सोने नहीं दिया। बची खुची रात ऐसे ही थोड़ा सोते जागते गुज़री।’
मैं उसके जिस्म को अपनी गर्म हथेलियों की हरारत बख्शता रहा और इधर उधर की बातें होती रहीं।
काफी देर वहाँ पड़े रहने के बाद वहाँ से हट के थोड़ा वक़्त अंग्रेज़ों पे चली गोलियों के निशानों की गवाही देते खंडहरों में गुज़ारा और फिर भूख लग आई तो वहाँ से निकल के अमीनाबाद जाकर नहरी कुल्चा खाया।
इसके बाद वहाँ से एकदम उलट जनेश्वर मिश्र पार्क चले आये जहाँ अगले दो घंटे रहे।
इस बीच वह अपने बचपन से लेकर जवानी तक की बातें बताती रही।
वहाँ से निकल कर थोड़ी राइडिंग पत्रकारपुरम में की, उसके बाद थोड़ा वक़्त अम्बेडकर पार्क में गुज़ारा और उसी तरफ से पेपर मिल
कॉलोनी की तरफ से होते हुए वापसी की… जहाँ एक जगह मौका देख कर उसने फिर नक़ाब और स्कार्फ़ से खुद को मढ़ लिया।
इस बार उसे फ्लाईओवर के इस सिरे पे उतार कर मैं आगे बढ़ गया।
वह वहाँ से रिक्शा से चली गई और मैं गोल घूम कर थोड़ी देर बाद घर पहुँचा जहाँ अगले 3 घंटे खाने पीने, वाक करने में गुज़ारे।
थोड़ी हाय हेलो उस दूसरी लड़की से की जिसका ज़िक्र मैंने किया था और फिर दस बजे आज के एपिसोड के लिए तैयार हो गया।
आज फिर वो एक सेक्सी से नाइटवीयर में थी। उसके चेहरे पे छाई दृढ़ता को देख कर लगता था कि वह उस अंत को जानने के लिए तैयार थी।
मेरी तो यही शर्त थी कि चाहे गुदगुदी हो या कुछ और… वह मुझे रोकेगी नहीं।
‘बस इतना ध्यान रखना मेरी वर्जिनिटी बनी रहे।’ उसने गुज़ारिश की।
‘वादा करता हूँ कि तुम्हे पछताना नहीं पड़ेगा। अब आगे तुम सब मुझ पे छोड़ दो।’
उसने आँखों से सहमति जताई।
मैं उसे हाथ से पकड़ते हुए बिस्तर पे ले आया और उसके इतने पास आ गया कि मेरी गर्म सांसें उसके चेहरे से टकराने लगीं।
उसकी आँखों में झांकते हुए मैंने उसके होंठों से अपने होंठ टिका दिए और उन्हें चुभलाने लगा… उसने सिर्फ पैंटी और सैंडो बनियान पहन रखा था जिससे उसके बदन की पूरी गर्माहट मैं अपने जिस्म पर महसूस कर सकता था।
मैंने उसकी बनियान को ऊपर सरकाते और अपने हाथ उसकी पैंटी में घुसाते हुए उसके नरम गुदाज चूतड़ों को अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
इस सख्त स्पर्श पर उसके बदन में एक लहर सी दौड़ गई।
उसने भी अपनी बाहें उठा कर मेरे गले में पिरो दीं और एक प्रगाढ़ चुम्बन में सहयोग करने लगी।
यह तो ज़ाहिर था कि थोड़ी ही देर में उसके दिमाग पर नशा हावी होने लगा और बदन से चिंगारियाँ छूटने लगीं।
उसने खुद से मुझसे अलग होते हुए मेरे बदन से मेरी टीशर्ट निकाल फेंकी और मैंने अपनी लोअर खुद अलग करके डाल दी और उतनी ही तेज़ी से उसकी बनियान और पैंटी भी उतार दी।
अब हम मादर ज़ात नंगे थे।
इस नग्नता का एहसास उसके गुलनार होते गालों और झुकी हुई पलकों से ज़ाहिर हो रहा था.. मैं तो खैर बेशर्म था ही।
मैंने उसे फिर से दबोच लिया।
दो नग्न शरीरों का आपसी स्पर्श और घर्षण दिमागी अख्तियार को बेहद कमज़ोर कर देता है- यह मेरे लिए पुराना मगर उसके लिए एकदम नया अनुभव था।
मैं उसके गुलाबी नरम होंठों से जैसे शहद को खींच निकालने की कोशिश करने लगा और इस बीच उसके शरीर पर फिरते मेरे हाथ कभी उसके नितम्बों, कभी मम्मों और कभी योनि के किनारों से घर्षण करने लगे।
मैंने यह भी महसूस किया कि वह भी बेअख्तियार अंदाज़ में मेरे लिंग को अपने हाथों में ले लेकर मसल देती थी, सहला देती थी।
बिस्तर की चादर अस्त-व्यस्त होने लगी।
मैंने उसके होंठों से खुद को हटाते हुए उसके चेहरे, गर्दन और कन्धों पर होंठ रगड़ने शुरू किये और वह खुद ही सुविधाजनक अंदाज़ में चित लेट गई और मैं अपना भार अपने घुटनों पर देते हुए उसके ऊपर आ गया।
मैं अपने होंठ उसके कन्धों से उतारते हुए उसके बाये वक्ष पर ले आया और वहाँ आकर रुक जहाँ एक छोटी सी पिंकिश भूरी चोटी उत्तेजना से तनी हुई थी।
उस पर एक हल्का चुम्बन अंकित करते हुए मैंने अपनी जीभ निकाली और उसे ज़ुबान की नोक से छेड़ने लगा।
वह ‘सी-सी’ करती अकड़ने लगी, उसके बदन की थरथराहट मैं महसूस कर सकता था।
उसने होंठ अंदर करके भींच लिए थे और अपनी एक हथेली से बिस्तर की चादर रगड़ रही थी तो दूसरी मुट्ठी में चादर को दबोच लिया था।
कुछ देर उससे किलोलें करने के बाद मैंने उसे होंठों के बीच दबोच लिया और हल्के हल्के दांतों का स्पर्श भी देते हुए चुभलाने लगा।
मेरा बायां हाथ तो सहारे के लिए गद्दे पे था लेकिन दाएं हाथ से मैं उसकी दूसरी चोटी को चुटकी में लेकर मसलने लगा।
उसकी साँसें भारी हो गईं और मुंह से दबी दबी सिसकारियाँ आज़ाद होने लगीं।
उसने अपने दोनों हाथों से अब मेरा सर थाम लिया था और सहलाने लगी थी।
थोड़ी देर बाद मैंने बाईं साइड की नोक छोड़ी तो दायीं साइड की नोक को मुंह में ले लिया और बाईं ओर की गीली हो चुकी चोटी को अपने बाएं हाथ से मसलने लगा।
बस ऐसा लग रहा था जैसे शहद भरी फूली हुई किशमिश हो जिसे चूसते चूसते चबा डालने की सख्त इच्छा हो रही थी।
जब उन किश्मिशों से जी भर गया तो उन्हें छोड़ कर नीचे सरक चला।
उसने मेरे सर से अपने हाथ हटा लिए और तकिया के कोने पकड़ लिए।
नीचे उसके सपाट गोरे पेट पर गहरा सा नाभि का गढ्ढा कम आकर्षक नहीं था… मैं जीभ की नोक से उसे छेड़ने लगा।
फिर उसके शरीर में ऐसी लहर दौड़ी जैसे उसे गुदगुदी हो रही हो लेकिन उसने मुझे धकेला नहीं।
नाभि को गीला करके मैं वहाँ उतर आया जो मेरी क्या हर मर्द की मंज़िल थी। आज, कल की तरह बाल नहीं थे, बल्कि उन्हें बड़ी नफासत से कुतर दिया गया था और अब उनके बीच की त्वचा भी स्पष्ट हो रही थी।
मैंने एक प्यार और भरोसे से भरा चुम्बन वहाँ अंकित करके खुद को उसके घुटनों से नीचे ले आया। उसके पैरों को घुटनों से मोड़ कर उन्हें अंतिम हद तक फैला दिया जिससे उसकी अनछुई, कुंवारी योनि अपने पूरे आकार में मेरे सामने खुल सके।
वह अपनी प्रकृति के अनुसार गर्म होकर रस छोड़ने लगी थी जो उसकी योनि से उतर कर उसके गुदाद्वार को गीला कर रहा था और वैसी ही ख़रबूज़े जैसी महक आ रही थी।
मैं उस खुशबू को अपने फेफड़ों में भरते हुए एकदम करीब से उसकी योनि की बनावट को देखने लगा।
ऊपर जहाँ भगांकुर था, एक हुड की तरह निकले मांस से सुरक्षित था और किनारे को भगोष्ठ ढके हुए थे जो भले अभी छोटे थे मगर अपना काम बखूबी कर रहे थे।
मैंने उन गन्दुमी पर्दों को अपनी उँगलियों से खोला तो अंदर के सुर्ख और गुलाबी भाग के दर्शन हुए।
मैं जीभ की नोक से उसके भगांकुर को छूने लगा।
उसके शरीर में लहरें पड़ने लगीं और भिंचे हुए होंठों से मस्ती और उत्तेजना में डूबी आहें छूटने लगीं।
मैंने अपना ध्यान पूरी तरह वहीं केन्द्रित कर लिया था और अपनी उंगलियों से उसके चूतड़ों को मसलने, दबाने लगा था।
बार बार के स्पर्श के बाद मैंने बाक़ायदा वहाँ अपना मुंह चिपका दिया।
उसके रस से मेरे होंठों के आसपास का हिस्सा और नाक गीले हो गए।
अब न सिर्फ मैंने अपनी जीभ की नोक से उसके लगभग बंद पड़े छेद को धंसाने लगा अपितु उसकी क्लिटोरिस को भी होंठों में दबा दबा कर खींचने लगा।
उसकी आवाज़ें तेज़ होने लगीं, उसके जिस्म में मादक लहरें उठ रही थीं और वह बार बार एकदम कमान की भांति तन जाती थी, बार बार मुट्ठियों में चादर दबोचती, छोड़ती और एकदम मेरे सर को पकड़ कर दबा देती।
मुझे उसकी तेज़ सिसकारियों से डर लग रहा था, जो कमरे की हदों को तोड़ कर बाहर तक जा रही थीं।
हालाँकि वह तब भी उतनी ही तेज़ थीं कि कोई ऊपर से उतर कर नीचे आ जाता या नीचे से दादा दादी जीने चढ़ के ऊपर दरवाज़े तक आ जाते तभी सुन पाते और यह लगभग नामुमकिन था।
फिर मैंने अपनी इंडेक्स फिंगर उस बंद पड़े छेद में उतार दी।
आम हालत में शायद यह उंगली भी उसे किसी लिंग जैसा दर्द देती लेकिन जो कामोत्तेजना से उसकी हालत हुई पड़ी थी… उसमें वह कामरस से ऐसी सराबोर और लचीली हो चुकी थी कि उसने उंगली का ज़रा भी प्रतिकार न किया।
उंगली को अंदर धंसते अनुभव करते वह चिहुंकी थी मगर यह वक़्त अनअपेक्षित प्रतिक्रिया देने के लिए अनुकूल नहीं था अतएव बस ज़ोर की ‘सी’ करके रह गई।
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07-17-2020, 11:56 AM,
#16
RE: raj sharma story कामलीला
भले आपके शरीर को चौबीस घंटे आपका दिमाग नियंत्रित करता हो लेकिन ऐसे निजी पलों में दो विपरीतलिंगी शरीरों के आपसी घर्षण के वक़्त आपके यौनांग आपके दिमाग को नियंत्रित करते हैं- यह एक कड़वी हकीकत है और उसकी इस वक़्त यही हालत थी।
मैं उंगली सिर्फ उतनी गहराई तक ले गया था कि उसकी झिल्ली को कोई क्षति न पहुंचे और उसकी सीमा जान कर मैं उतनी गहराई में ही उंगली अंदर बाहर करने लगा।
साथ ही अपने होंठ और जीभ से उसकी कलिकाओं और भगांकुर को चुभला रहा था खींच रहा था।
उसकी साँसों में जैसे गुर्राहटें सी आ गईं थीं… चेहरा एकदम लाल पड़ गया था और नशे से आँखें भी अजीब सी हो गई थीं।
वह मेरे सर के बालों को नोच डालने पर उतारू हो गई थी।
‘प…प्लीज… अब बस करो, क-कुछ निकल जाएगा… प्लीज!’ उसने भारी साँसों के बीच लड़खड़ाती हुई आवाज़ में कहा।
मैं एकदम से उछल के बिस्तर से नीचे आ गया और उसे चूतड़ों से पकड़ के एकदम किनारे ले आया और गद्दे की कगार पर उसके चूतड़ टिकाते हुए खुद फर्श पर उकड़ू बैठ गया और उसके पेट को एक हाथ से पकड़ कर फिर वैसे ही मुंह और उंगली को उनकी जगह पहुंचा दिया।
‘जो निकले निकाल दो… रोको मत, वर्ना रात भर फिर सो नहीं पाओगी।’ बीच में मैंने मुंह उठाते हुए कहा और फिर वहीं टिक गया।
उसके बदन की अकड़न बढ़ने लगी।
फिर उसके योनिद्वार से ऊपर छोटे से हुड से ढके मूत्रद्वार से एक तेज़ धार निकल पड़ी। कुछ तो मेरे मुंह में गई और कुछ मेरी गर्दन और सीने से होती नीचे फर्श पर…
उसके मुंह से एक तेज़ आह निकली थी और वह बुरी तरह अकड़ने लगी थी।
साथ ही उसके योनिद्वार से भी रस निकल पड़ा था जिसे मैंने अपनी उंगली पे अनुभव किया। इसके बावजूद भी मैंने खुद को उससे अलग नहीं किया बल्कि जो कर रहा था वैसे ही करता रहा।
यह उसका पहला पानी था जो इस तरह मूत्र के साथ निकल पड़ा था।

मूत्र निकलना कोई बड़ी बात नहीं, ऐसे समय अगर यूरीन ब्लेडर भरा हो तो स्खलन के समय जब योनि की मांसपेशियाँ फैलती सिकुड़ती हैं तो वे मूत्र को भी नियंत्रित नहीं कर पाती।
मैं वैसे ही जीभ से उसे चाटते हुए उंगली से अंदर बाहर करता रहा और वह रुक रुक कर न सिर्फ पेशाब करती रही बल्कि स्खलित भी होती रही।
जो मूत्र मेरे मुख में जा रहा था वह मैं ऐसे ही निकाले दे रहा था कि बिस्तर पे न जाए और जो गर्दन सीने पे जा रहा था वो तो नीचे जा ही रहा था लेकिन जो स्खलन का रस बह रहा था वह ज़रूर चादर को भिगा रहा था।
जी भर के स्खलित होने के बाद वह सनसनाते हुए मस्तिष्क के साथ ऐसे बेजान सी पड़ गई जैसे बेहोश हो गई हो।
मैंने उसे पैरों से थाम कर पूरी तरह बिस्तर पर कर दिया और खुद को वहीं पड़े उसके स्टोल से साफ़ करने लगा।
मेरा मुंह भी थक गया था तो मैं भी उसके बगल में पड़ गया और अपनी साँसें दुरुस्त करने लगा।
करीब पांच मिनट बाद उसने आँखें खोलीं और मुझे बड़े अनुराग से देखने लगी।
‘क्या वाकई हर बार इतना मज़ा आता है।’ उसके स्वर में अविश्वास सा था।
‘इससे ज्यादा- उंगली की जगह अगर पेनिस हो तो इससे लगभग दोगुना!’
उसने एक ‘आह’ सी भरते हुए आँखें बंद कर लीं।
कुछ पल तक कुछ सोचती रही, फिर आँखें खोल कर मुझे देखने लगी- क्या लड़की ऐसे ही डिस्चार्ज होती है… मतलब ऐसे ही स्क्वरटिंग करते हुए?
‘नहीं, ऐसा रेयर ही होता है या जानबूझकर किया जाए। मतलब जब यूरीन ब्लेडर भरा हो और सहवास किया जाए तो स्खलन के वक़्त वेजाइनल मसल्स से कंट्रोल हट जाता है… तब ऐसे होता है। ऐसा आम कंडीशन में होने लगे तो समझो कि हर सेक्स के बाद बिस्तर की हालत खराब हो जाए। यह रस नहीं था तुम्हारा… बल्कि पेशाब था।’
‘जो तुम्हारे मुंह में जा रहा था। तुम्हे गन्दा नहीं लगा?’
‘नहीं। मैंने इन पलों में तुम्हें मन से स्वीकार किया था… तुम्हारी कोई भी चीज़ मेरे लिए अस्वीकार्य या घृणित नहीं है। सिर्फ स्खलन के लिए योनि और लिंग का घर्षण किया जाए वहाँ यह बातें मायने रखती हैं पर ऐसे मामले में नहीं।’
‘तुम क्या कह रहे थे कि ये स्क्वर्टिंग जानबूझकर भी की जाती है?’
मैंने अपने मोबाइल पर एक पोर्न साइट खोली और उसे स्क्वर्टिंग वाली फ़िल्में दिखाने लगा जिनमे लड़कियाँ स्तम्भन या स्खलन के दौरान ज़ोर जोर से पेशाब की धाराएँ छोड़ती हैं।
वह गहरी दिलचस्पी से वह छोटी छोटी फ़िल्में देखने लगी और ऐसे ही एक घंटा गुज़र गया।
इस बीच वह धीरे धीरे फिर गर्म हो गई थी, इसका अहसास मुझे तब हुआ जब मैंने उसकी उंगलियाँ अपने शांत पड़े लिंग पर महसूस की।
उसकी उँगलियों की सहलाहट से उसमें फिर जान पड़ने लगी।
मैंने फोन को किनारे रख दिया और उससे सट कर उसकी आँखों में झाँकने लगा।
‘हम रात भर यह करेंगे।’ कहते हुए उसके स्वर में अनिश्चितता थी।

‘देखते हैं… कब तक तुम बर्दाश्त कर सकती हो खुद को इस हाल में!’ मैंने शरारत से मुस्कराते हुए कहा और उसे चिपटा कर अपने ऊपर खींच लिया।
‘तुम्हारे मुंह से कुछ महक आ रही है।’
‘तुम्हारी ही है।’
‘क्या हर बार ऐसे ही डिस्चार्ज होना पड़ेगा मुझे?’
‘यह तुम्हारे ऊपर डिपेंड है। स्खलन सिर्फ लिंग योनि के घर्षण से संभव नहीं होता बल्कि दिमाग को वहाँ, उस पॉइंट पर पहुंचना पड़ता है। अगर तुम चाहो तो अपने दिमाग को दूसरे तरीके से भी वहाँ ले जा सकती हो… हम एक दूसरे को ज़बरदस्त ढंग से रगड़ेंगे, चूमेंगे, सहलाएंगे और तुम अपने शरीर के हर हिस्से से उस घर्षण की उत्तेजना को फील करते हुए अपने दिमाग को पूरी एकाग्रता से वहाँ ले जाने की कोशिश करोगी जहाँ चरमोत्कर्ष का बिंदु है।
किसी भी पल में खुद को रोकोगी या संभालोगी नहीं बल्कि दिमाग से यह ठान लोगी कि तुम्हे स्खलित होना है।’
‘कोशिश करती हूँ। ज़ाहिर है कि मेरे लिए सब कुछ नया है, अजीब है, तो मुझे नहीं पता कि हो पाएगा या नहीं पर कोशिश करुँगी।’
मैंने उसकी पीठ अपने सीने पेट से सटाते हुए उसके दोनों बूब्स ज़बरदस्त ढंग से मसलने शुरू किये, होंठ फिर उसके होंठों से सटा दिए…
उसने कुछ झिझक तो ज़रूर महसूस की क्योंकि मेरा मुंह उसके कामरस और मूत्र से सना था लेकिन दिमाग पर हावी होते नशे ने वह झिझक कुछ ही पल में मिटा दी और वह खुद से सहयोग करने लगी।
एक हाथ उसके वक्ष पर छोड़ कर दूसरे को मैं नीचे ले गया और उसकी योनि के ऊपरी भाग को सहलाने रगड़ने लगा।
कुछ ही पलों में वह ऐंठने मचलने लगी।
बिस्तर की चादर फिर अस्त व्यस्त होने लगी और हमारे नग्न शरीरों के बीच ऐसी रगड़ घिसाई शुरू हो गई जैसे कोई फ्रेंडली मल्ल युद्ध चल रहा हो।
यहाँ उसमें ज़रा भी शर्म या झिझक बाकी नहीं रही थी और वह सब कुछ खुल कर एन्जॉय कर रही थी, जिसमें सारी चीज़ें उसने पोर्न क्लिप्स में देखी रही होंगी।
उसके मुंह से रह रह कर कामोत्तेजना से भरी सिसकारियाँ फूट रही थीं जो मेरे कानों में रस घोल रही थीं।
बिस्तर इस धींगामुश्ती के लिए छोटा पड़ गया। हम कहीं अधलेटे बिस्तर पर हो जाते कहीं बिस्तर छोड़ कर कमरे की दीवारों से जा चिपकते, कहीं ठन्डे फर्श पर लोटने लगते।
अजीब नज़ारा था… बस ऐसा लग रहा था जैसे कोई पागल प्रेमी जोड़ा ज़माने से बेखबर, अपने प्राकृतिक रूप में उस छोटी सी जगह में कामक्रीड़ा में ऐसा मस्त हो कि न दुनिया की खबर रह गई हो न अपनी।
हमारी भारी साँसें और मस्ती में डूबी सिसकारियाँ कमरे की सरहदों को तोड़ रही थीं।
इस बीच उसके नितम्बों को ज़बरदस्त ढंग से दबाते, मसलते मैंने कई बार कुछ कुछ क्षणों के लिए अपनी उंगली उसके न सिर्फ योनिद्वार में घुसाई बल्कि उसके पीछे के छेद में भी घुसाई, जिसे महसूस करके वह कुछ पलों के लिए रुकी, अटकी, झिझकी लेकिन फिर मेरे आदेशानुसार उसने उस उंगली को भी कामक्रीड़ा का एक अंग मान कर स्वीकार कर लिया।
मेरे हाथ को बार बार अपनी योनि पर ले जाकर और अपनी योनि को मेरी जांघ पर रगड़ कर उसने संकेत दिया कि वह वहाँ और ज्यादा घर्षण चाहती थी।
तो मैं बिस्तर पर चित लेट गया और उसकी योनि को उँगलियों से फैला कर, उनके बीच अपने लेटे, पेट से सटे लिंग को सेट करके, उसे अपने ऊपर बिठा लिया और उसे कहा कि वह आगे पीछे करे।
इस तरह उसकी गर्म, तपती हुई योनि को मेरे गर्म लिंग का घर्षण, उसके योनि छिद्र से लेकर, क्लिटरिस हुड तक मिलेगा और उसे बिना अंदर बाहर किये भी ज़बरदस्त मज़ा आएगा।
वो उत्तेजित अवस्था में होंठ भींचे अपनी कमर को आगे पीछे करने लगी जिससे न सिर्फ उसकी योनि को स्खलन की तरफ ले जाने में सहायता मिली बल्कि इससे मुझे भी इतना आनन्द आया कि मैं भी स्खलन के उस अंतिम मुकाम की तरफ बढ़ चला।
उसकी रस से भरी बहती हुई योनि मेरे लिंग को अंडकोषों तक गीला कर रही थी।
मेरे ऊपर बैठी कामोत्तेजना में डूबी वह ऐसे आगे पीछे हो रही थी जैसे हम सामान्य सहवास कर रहे हों।
उसके वक्ष उसके हिलने के साथ आगे पीछे झूल रहे थे जिन्हे मैंने थाम लिया और जोर जोर से मसलने लगा।
पर यह पल उसके लिए ज्यादा विस्फोटक थे जो पहली बार इस दौर को जी रही थी। उसकी मानसिक दशा जल्दी ही वहाँ पहुँच गई जहाँ उसकी योनि उसके मस्तिष्क को नियंत्रित करने लगी।
वह मेरे ऊपर इस तरह झुकी कि उसके बूब्स मेरे सीने से आ लगे और वह अपने हाथ को नीचे ले जाकर मेरे लिंग के अग्रभाग को अपने ज्वालामुखी की तरह धधकते, भाप छोड़ते ढहाने में घुसाने की कोशिश करने लगी।
ज़ाहिर था कि छेद खुला हुआ तो नहीं था कि एकदम से वह घुसाने में कामयाब हो जाती।
एक तो बंद की हद तक टाइट छेद और ऊपर से उसका और मेरा इतना सारा लुब्रिकेंट… लिंग फिसल फिसल कर नीचे चला जाता या ऊपर चला जाता।
उस घड़ी ख्वाहिश तो मेरी भी हो रही थी कि वह कामयाब हो जाये और मुझे भी एक अनछुए, कुंवारे छेद में स्खलन का सुख प्राप्त हो लेकिन मुझे अपनी प्रतिज्ञा याद गई।
बावजूद इसके कि मैं सब्र वाला, तजुर्बेकार और बड़ी हद तक खुद पर नियंत्रण रखने वाला था… मुझे सम्भलने में कई पल लग गए, पर गनीमत रही कि तब तक वह लिंग को अंदर घुसाने में कामयाब नहीं हो गई।
मैंने उसकी पीठ पर पकड़ बनाई और पलटनी खाते हुए उसे नीचे ले आया और खुद उसके ऊपर हो गया।
नीचे लिंग की रगड़ जारी रखते हुए मैं उसके होंठ चूसने लगा।
‘भाड़ में जाए वर्जिनिटी… अब मेरी बर्दाश्त से बाहर है।’ वह अपने होंठों को मेरी पकड़ से छुड़ा कर हाँफते हुए बोली- इसे अंदर डालो और मुझे वैसे ही जोर जोर से फ़क करो जैसे कोई मर्द किसी औरत को करता है।
‘हाँ हाँ क्यों नहीं… पर इतनी जल्दी क्यों? अभी तो शुरुआत है। वह स्खलन का आखिरी तरीका है जो आखिर में सिखाऊँगा। अभी एक बार इस तरह भी तो मज़ा लो। मैं न कहीं भागा जा रहा हूँ न मेरा वह! सब तुम्हारा है मेरी जान। थोड़ा सब्र करो… फिर मैंने तुम्हें वैसे ही फ़क करूँगा जैसे तुम चाह रही हो।’ मैंने उसे बहलाते हुए कहा।
उसने होंठ भींच लिए।
‘क्लोज़ योर आइज़ एंड जस्ट इमैजिन… तुम्हारी दोनों टाँगें घुटनों से मुड़ी फैली हुई हैं और मैं उनके बीच तुम्हारे छेद में अपना लिंग घुसाए हुए हूँ और धक्के पर धक्के लगा रहा हूँ। तुम अपनी कमर उठा उठा कर उसे और अंदर ले रही हो और आह आह करती मुझे और जोर से धक्के लगाने को कह रही हो।’
मैं उसकी योनि पर अपने गर्म लिंग का घर्षण देते उसे कल्पनाओं की दुनिया में ले आया- फिर तुम डॉगी स्टाइल में आ जाती हो और मैं तुम्हारे पीछे आ कर अपना लिंग तुम्हारी योनि में उतार कर धक्के लगाने लगता हूँ। मेरा पेनिस बार बार तुम्हारी गहराई में जाकर तुम्हारी बच्चेदानी को छू कर आता है और मेरे पेट से बार बार टकराते तुम्हारे चूतड़ आवाज़ कर रहे हैं। तुम बेहद अच्छा महसूस कर रही हो, तुम्हें मज़ा आ रहा है… तुम्हें बहुत मज़ा आ रहा है।
‘हाँ… हाँ… बहुत मज़ा आ रहा है।’ वह कांपती लहराती आवाज़ में बड़बड़ाई- फिर से मुझे ऐसा महसूस हो रहा है जैसे कुछ निकल पड़ेगा। आह… आह, हम्म्म… बस निकलने वाला है। आह-आह…
फिर उसकी आहें जोर की सिसकारियों में बदल गईं और जिस्म इस तरह कांपने लगा जैसे झटके लग रहे हों।
उसने अपने दोनों हाथों से मुझे पीठ की तरफ से पकड़ के ऐसे सख्ती से दबोच लिया जैसे मुझे अपने अंदर समा लेना चाहती हो।
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07-17-2020, 11:56 AM,
#17
RE: raj sharma story कामलीला
गौसिया की पकड़ इतनी सख्त थी कि मुझे अपनी हड्डियाँ कड़कड़ाती महसूस हुईं।
इस जकड़न और घर्षण ने मुझे भी चरमोत्कर्ष तक पहुंचा दिया था और मैंने भी उसे पीठ की तरफ से पकड़ के ऐसे सख्ती से खुद से चिपटाया कि उसने भी वैसा ही महसूस किया होगा।
उस घड़ी हमारे जिस्मों के बीच हवा के गुज़र सकने की अंतिम सम्भावना भी ख़त्म हो गई थी और देख कर ऐसा लगता था जैसे हम एक दूसरे की हड्डियाँ तोड़ कर एक दूसरे में समां जाना चाहते हों।
दिमाग में सनसनाहट इस कदर हावी थी कि कुछ पलों के लिए उसके साथ मैं भी बेसुध हो गया।
स्खलन का अंतिम दौर भी ख़त्म हो चुका और दिमाग की सनसनाहट कुछ कम हुई तो हमारी पकड़ ढीली पड़ी और हमने एक दूसरे को आज़ाद किया।
कुछ क्षणों पश्चात वह कुछ उठ कर अपने पेडू पर वहाँ देखने लगी जहाँ मेरे लिंग ने गाढ़ा सफ़ेद वीर्य उगला था जो अब हवा के संपर्क में आते ही हल्का पड़ने लगा था।
उसने अपनी एक उंगली उस वीर्य में डुबाई फिर उसे अपनी आँखों के पास लाकर गौर से देखने लगी।
‘ऐसा होता है वीर्य!’ उसने बुदबुदाते हुए कहा।
‘मर्द का रस… कह सकती हो कि शुक्राणुओं का समूह जो बाहरी हवा के संपर्क में आते ही मर जाते है और मर कर पानी की शक्ल में फैल जाते हैं।’
उसने उंगली को नाक के पास ले जाकर सूंघा- कैसी सड़े आटे जैसी तो महक है। कैसे लड़कियाँ इसे मुंह में ले लेती हैं या निगल लेती हैं? छीः’ उसने मुंह बनाते हुए कहा और अपना वही स्टोल उठा कर जिससे मैंने पहले पोंछा था, पहले उंगली पोंछी और फिर अपने पेट से उसे साफ़ करके उठ कर अपनी योनि के नीचे मौजूद चादर पर पड़े गीले धब्बे को देखने लगी।
‘इट्स ह्यूमन नेचर! मन में होता है कि यह कोई नुकसानदेह चीज़ नहीं है और फिर जो स्वाद बार बार ज़ुबान को लगे, उसकी आदत हो जाती है। फिर वह अच्छा या बुरा नहीं लगता। फिर जिन्हें तुम स्पर्म मुंह में लेते या निगलते देखती हो वो पोर्न एक्ट्रेस होती हैं जिनका यह काम है, जिसके वे पैसे लेती हैं। ज़रूरी नहीं कि उनकी तरह हर लड़की वैसा करे।’
‘हमारे वीर्य का रंग ऐसा क्यों नहीं होता।’
‘क्योंकि उसमें स्पर्म नहीं होते और वैसे भी वह वीर्य नहीं होता।’
‘एनीवे, थैंक्स।’ वह उस तरफ से ध्यान हटा कर मेरी तरफ देखते हुए अनुराग भरे स्वर में बोली- मैं बहक गई थी, मेरा खुद पर कोई काबू नहीं रह गया था। मुझे बेहद मज़ा आ रहा था और मैं चाहती थी कि तुम उसे अंदर करके मेरे मज़े को दोगुना कर दो। पर शुक्रगुज़ार हूँ तुम्हारी कि तुमने ऐसे नाज़ुक पलों में भी खुद पर कंट्रोल रखा और मुझे ज़िन्दगी भर शर्मिंदा होना से बचा लिया।
‘अगर तुम कामयाब हो जाती तो… शर्मिंदा होने के सिवा अपने किसी टिपिकल रवायती शौहर को क्या एक्सक्यूज़ देती।’
‘यही कि साइक्लिंग करने में झिल्ली फट गई थी। बाकी वह ऐसे दो चार बार करने से जो ढीली होती भी तो जब तक शादी होगी तब तक फिर टाइट हो जायेगी कुंवारी जैसी। पर यह मेरे खुद के अपनी नज़र में गिर जाने वाली बात होती।’
‘मैं पूरी कोशिश करूँगा कि तुम्हे खुद से शर्मिंदा होने से बचा सकूँ।’
हमने फिर बिस्तर दुरुस्त किया और लेट कर बातें करने लगे।
‘क्या कह रहे थे कि अंदर डालना डिस्चार्ज होने का आखिरी तरीका है जो आखिर में सिखाओगे।’ वह शरारत भरे स्वर में मुझे देखते हुए बोली।
‘तुम्हें बहला रहा था। बात सही है लेकिन वह तुम्हें मैं नहीं बल्कि तुम्हारा हबी सिखाएगा।’
‘वैसे ज्यादा मज़ा किसमें आता है… लम्बे मोटे वाले में या नार्मल में?’
‘इसका रिश्ता भी दिमाग से होता है। अगर तुमने मन में सोच बना ली कि लम्बे मोटे सामान ज्यादा मज़ा देते हैं और तुम्हें वो नहीं मिलता तो तुम कभी किसी छोटे सामान से संतुष्ट नहीं हो पाओगी लेकिन अगर तुमने इसे नैचुरली लिया या दिमाग में यह धारणा बैठ गई कि वह ज्यादा तकलीफदेह होगा तो तुम्हें मध्यम आकार के लिंग से ही पूरी संतुष्टि भी मिलेगी और हर तरह का मज़ा भी आएगा। पर हाँ उसकी लम्बाई इतनी तो ज़रूर हो कि हर तरह के आसन में वह योनि में इतनी गहराई तक तो ज़रूर पहुंचे कि घर्षण का मज़ा दे सके।’
‘तुम्हारा दे सकेगा हर आसन में मज़ा?’
‘अगर लड़की मोटी है या उसके नितम्ब ज्यादा हैं या कम भी हैं और पीछे की तरफ ज्यादा निकले हैं, या चर्बी से भरे सख्त हैं और उनमे स्ट्रेचिब्लटी नहीं है तो मैं हर आसन में कामयाब नहीं हो सकता। यह मेरी लिमिटेशन है।’
‘बड़ी साफगोई से खुद की कमी स्वीकार कर लेते हो।’
‘इससे मैं बड़े बड़े दावे करने से बच जाता हूँ और मुझे शर्मिंदा नहीं होना पड़ता।’
‘अब तक कितनी लड़कियों से सेक्स किया है?’
‘गिनना पड़ेगा। छोड़ो उन्हें… चलो वीडियो देखते हैं। फर्स्ट सेक्स के… जो आइन्दा ज़िन्दगी में तुम्हारे काम आएंगे।’
पहले हमने फर्स्ट सेक्स वाले ढेरों वीडियो देखे जिसमे प्रथम सहवास और उससे जुड़ी प्रतिक्रियाओं के दृश्य थे, पर वहाँ लड़कियाँ उस तरह रियेक्ट नहीं करती जैसे रियल में करती हैं…
दूसरे यह भी था कि उनमें ज्यादातर वीडियो फर्जी होते हैं जिसमे ब्लॅड निकालने के लिए किसी ट्रिक का सहारा लिया जाता है।
कुछ देर में जब उनसे जी भर गया तो हम भिन्न भिन्न केटेगरी के वीडियो देखने लगे।
जब मैंने उसे ब्लैक मॉन्स्टर डिक वाले वीडियो दिखाये जिनमें काले हब्शी पुरुषों के लिंग घोड़ों जैसे लम्बे और मोटे थे बहुत जल्दी उसमें अरुचि पैदा हो गई कि इतने बड़े भी किस काम के जो न पूरा योनि के अंदर समां सके और न ही सामान्य तरीके से स्तम्भन किया जा सके।
शुक्र है कि बड़े सामान के आकर्षण से उसे मुक्ति मिली और करीब डेढ़ घंटे बाद उसने फिर गर्मी चढ़ने के आभास देना शुरू किया।
‘कोई और तरीका भी होता हो तो वो भी बताओ।’ उसने मेरे लिंग को मुट्ठी में दबोच कर दबाते हुए कहा।
‘ओके, तुम अपना हाथ जगन्नाथ वाला तरीका भी सीख लो जो शादी होने तक तुम्हारे काम आएगा।’ मैंने उसे खुद से अलग करते हुए कहा।
मैं बेड की पुश्त से टिक कर बैठ गया और अपने पांव फैलाते हुए अपने सामान पर तकिया रख लिया ताकि उसके नितम्बों का स्पर्श फिर न उसे सरकशी पर उतारू कर दे।
फिर गौसिया को उसकी पीठ की तरफ से खुद से सटाते हुए ऐसी अधलेटी अवस्था में लिटाया कि उसका सर मेरी ठोढ़ी से नीचे रहे।
‘अब तुम अपने बाएं हाथ से अपने दाएं बूब को दबओगी, सहलओगी और दाएं हाथ की उँगलियों से अपनी वेजाइना के क्लिटरिस हुड यानि भगांकुर को सहलाती दबाती रहोगी। जब कि मैं सीधे हाथ से तुम्हारे बाएं बूब का मर्दन करूँगा और उलटे हाथ से मोबाइल को सामने रखूँगा जिसमें हम 15-16 मिनट वाली ऐसी मूवी देखेंगे जिसकी हीरोइन के तौर पर तुम खुद को इमैजिन करोगी।’
‘ओके।’
मैंने मुंह में ढेर सी लार बनाई और उसके सीधे हाथ की उँगलियों को मुंह में लेकर उन्हें उस लार से गीला कर दिया।
वहाँ सूखी उँगलियों से जल्दी ही जलन होने लगती है इसलिए हमेशा ध्यान रखना कि चिकनाई ज़रूरी है।
मैंने उसे चेताते हुए कहा।
उसने सहमति में सर हिलाया।
फिर वो अपने सीधे हाथ से अपनी योनि के ऊपरी सिरे को बड़े प्यार से सहलाने लगी और उलटे हाथ से अपने दाएँ मम्मे को इस तरह दबाने लगी कि साथ ही उसका निप्पल भी मसला जाए।
जबकि मैंने उलटे हाथ में थमे मोबाइल को आँखों के सामने कर लिया और सीधे हाथ से उसके बाएँ मम्मे को उसी तरह दबाने सहलाने लग जैसे वह कर रही थी।
मोबाइल पर वह मूवी चल रही थी जिसमें एक महिला और दो पुरुष थे और कुछ देर के योनि भेदन के पश्चात गुदा मैथुन होना था और अंत में आगे पीछे से एक साथ उसके दोनों छेद बजाये जाने थे।
यह वीडियो मैंने जानबूझ कर चुनी थी कि उसे सम्भोग का यह रास्ता भी दिखा सकूँ।
वह मूवी देखती खुद को उस लड़की के रूप में कल्पना करने लगी जो अभी लिंग चूषण में मस्त थी।
साथ ही गौसिया के दोनों बूब्स दो अलग अलग हाथों द्वारा मसले जा रहे थे।
अभी वो अपनी क्लिटरिस को बड़े प्यार से और हल्के हाथों से सहला रही थी।
फिर तीनों की पोजीशन बदली और एक मर्द लड़की की टांगों के बीच आकर उसकी योनि से मुंह सटा कर उसकी कलिकाओं को छेड़ने चुभलाने लगा और दूसरा लड़की के मुंह के पास खड़ा रहा और लड़की उसके बड़े से लिंग को चूसती रही।
फिर तीनों तैयार हो गये तो एक मर्द नीचे लेट गया और लड़की उसके लिंग को अपनी योनि में लेते हुए उस पर बैठ गई जबकि दूसरा वैसे ही खड़ा उसे लिंग चूषण कराता रहा।
अब गौसिया के योनि को सहलाने वाले हाथ में कुछ तेज़ी आने लगी थी।
थोड़ी देर बाद दोनों मर्दों ने पोजीशन बदल ली।
इस तरह थोड़ी देर बाद उन्होंने आसन बदल लिए और लड़की तिरछी लेट कर अपनी एक टांग उठा कर अपनी चूत चुदवाने लगी।
ऐसी सूरत में भी दोनों मर्द वही स्थिति अपनाए रहे कि एक योनि में डालता तो दूसरा मुंह में…
और थोड़ी देर में अपनी जगह बदल लेते।
गौसिया की उत्तेजना धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी।
जब इस पोजीशन से उनका जी भर गया तो लड़की को पीठ के बल लिटा लिया और एकदम सामने से उसे ठोकने लगे, एक अंदर डालता, दूसरा चुसाता और फिर जगह की अदला बदली।
इस आसन के बाद उन्होंने उसे घोड़ी बना लिया और पीछे से ठोकने लगे।
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07-17-2020, 11:56 AM,
#18
RE: raj sharma story कामलीला
जब यह सिलसिला पूरा हो गया तो एक ने लड़की को उसी पोजीशन में रखते हुए लड़की के पीछे के छेद में उंगली करनी शुरू की और लड़की ‘फ़क माय एस’ का जाप करने लगी।
फिर उसी छेद पर ढेर सी लार उगल कर वह उसमें अपना लिंग धंसाने लगा।
गौसिया के हाथ थम गए और वह चेहरा मेरी तरफ घुमा कर मुझे देखने लगी।
‘यह क्या कर रहे हैं?’ उसने थोड़ा अटकते हुए कहा।
‘गुदा मैथुन…’ तुम इतनी अंजान तो नहीं कि ऐनल सेक्स के बारे में जानती न हो?’
‘जानती हूँ पर वह तो लड़के एक दूसरे के साथ करते हैं?’
‘हाँ लड़के करते हैं क्योंकि उनके पास ऑप्शन नहीं होता पर लड़कियाँ भी कराती हैं। जैसे वेजाइनल सेक्स का एक मज़ा होता है वैसे ही ऐनल सेक्स का और ओरल सेक्स का एक अलग मज़ा होता है। इन मजों की आपस में तुलना बेमानी है।
समझो कि तीन अलग तरह के ज़ायके हैं, एक दूसरे से अलग।
एक औरत के पास तीन सुराख़ होते हैं- दो नीचे एक ऊपर…
और तीनों से ही सेक्स का मज़ा लिया जा सकता है, दिया जा सकता है।
सामान्यतया हम वेजाइनल सेक्स ही करते हैं लेकिन ऐनल सेक्स और ओरल सेक्स भी एक्जिस्ट करते हैं यार!’
अब तक वो मर्द अपना पूरा लिंग लड़की के पिछवाड़े यानी गांड में घुसा चुका था और अंदर बाहर करने लगा था।
‘इसमें भी मज़ा आता है?’ उसने थोड़ी बे-यकीनी से कहा।
‘अच्छा, मज़ा नहीं आता तो क्या ऐसे ही लोग पागलों की तरह करते हैं? तुम फिलहाल एन्जॉय करो… सवाल जवाब बाद में कर लेना। बस कल्पना करो कि यह तुम हो और अपने जिस्म के हर हिस्से से मज़ा ले रही हो।’
वह चुप होकर फिर फिल्म पर ध्यान केंद्रित करने लगी और हाथ थोड़े स्लो सही पर वापस शुरू हो गए जबकि मैं उसे उत्तेजित करने के लिए अपना हाथ भी नीचे ले गया और एक इंच तक अपनी बिचली उंगली उसके छेद में धंसा दी।
वह ‘उफ़’ करके रह गई।
मैंने उंगली को हरकत देनी शुरू की तो उसके हाथों में भी तेज़ी आने लगी।
उधर मूवी में एक मर्द हटा तो दूसरा आ गया और पहला चुसाने लग गया।
यह देख उसे फिर झटका लगा।
‘ऐसी नाज़ुक हालत में गन्दा बुरा कुछ नहीं और वैसे भी ऐसे एक्ट से पहले छेद को अंदर तक साफ़ कर लिया जाता है।’ मैंने उसके मन में पैदा हुई उलझन दूर करते हुए कहा।
वह बोलते बोलते रह गई।
थोड़ी देर बाद स्थिति यह बन गई- एक मर्द नीचे लेटा और लड़की उसके लिंग को योनि में लेते हुए उसके सीने पर इस तरह झुक गई कि उसका पीछे का छेद सामने आ गया, जिसमें दूसरे मर्द ने अपना लिंग घुसा दिया और इस तरह वो दोनों तरफ से ठुकने लगी।
काफी देर इस पोजीशन में रहने के बाद उन्होंने आसन बदला और वह लड़की सीधी होकर लेटे हुए मर्द पर इस तरह बैठी कि उसका लिंग पीछे के छेद में धंस गया और योनि खुल कर सामने आ गई जिसमें दूसरे मर्द ने अपना लिंग घुसा दिया और चुदाई करने लगा।
अब गौसिया चरम पर पहुँचने लगी थी, यह उसकी कंपकपाहट से महसूस हो रहा था।
उसके मुंह से ‘आह-उफ़’ जैसी कामुक सीत्कारें निकलने लगी थीं।
और जैसे मूवी वाले हीरो खलास हुए उधर गौसिया ने भी झटका खाया और एड़ियाँ बिस्तर में धंसा कर ऐंठ गई, कमर ऊपर उठ कर तन गई थी।
एक हाथ से उसने मेरी जांघ का गोश्त लगभग नोच डाला था और दूसरे हाथ से अपनी योनि को मसले दे रही थी।
इस बार भी स्खलन के दौरान वो अपनी मूत्र नलिका पर नियंत्रण नहीं रख पाई थी और छोटी छोटी सी फुहारें छोड़ रही थी।
फिर जैसे अंतिम झटका कह कर मेरी गोद में ही फैल गई।

मैंने भी अपने हाथ गिरा लिए थे और रिलैक्स करने लगा था।
करीब दस मिनट तक हम ऐसे ही पड़े रहे फिर जिस्म में थोड़ी जान आई तो वह उठ कर गीला हो चुका बिस्तर देखने लगी।
‘पहली बार तुमने बचा लिया था, इस बार भीग ही गया।’ उसने मायूसाना अंदाज़ में कहा।
‘थोड़ा ही है… सूख जायेगा।’
‘तुम उठो, तुम्हारी पीठ और जांघ देखूँ।’
मैं उठा तो वह मेरी पीठ देखने लगी। जहाँ उसने पिछली बार स्खलन के दौरान उंगलियाँ धंसाई थीं वहाँ ज़रूर उसके नाखूनों ने गोश्त उड़ा दिया होगा और खून निकाल लिया होगा।
वैसे ही इस बार जहाँ जांघ पकड़ी थी, उसकी उँगलियाँ छप गई थीं और जहाँ नाख़ून धंसे थे, वहाँ खून से बनी लकीरें दिख रही थीं।
‘सॉरी!’ उसने खेद भरे स्वर में कहा।
‘कोई बात नहीं। ऐसी हालत में यह होता है।’
‘मैं दवा लगा देती हूँ। फिर तुम जाओ… आज के लिए इतना काफी है। अब सोना भी है! बल्कि आज तो जी भर के सोना है।’ वह साइड टेबल से कोई एंटी-बायोटिक क्रीम निकाल कर लगाते हुए बोली- ऐसा लग रहा है जैसे जिस्म के अंदर कोई मैल था, कोई लावा था जो कैसे भी निकल नहीं पाता था और निकलने की कोशिश में मुझे भारी बेचैनी देता था, रातों की नींद छीन लेता था, मुझे तड़पने कसमसाने पर मजबूर कर देता था… वह आज निकल गया। आज जैसे मैंने किसी भार से मुक्ति पा ली।’
दवा लगने के बाद मैंने अपने कपड़े पहने और रुखसत हो गया।
अगले दिन बुधवार था… यानि उसकी आज़ाद ज़िन्दगी का तीसरा दिन।
हम करीब ग्यारह बजे पुलिस लाइन और न्यू हैदराबाद के बीच वाली सड़क पर मिले जहाँ से उसे लेकर मैं आई टी की तरफ से होते कपूरथला की तरफ निकाल लाया, जहाँ नोवल्टी में उसके पसंदीदा हीरो सलमान खान की फिल्म चल रही थी।
हमने साढ़े बारह बजे वाले शो का टिकट ले लिया और नेहरू वाटिका की तरफ चले आये।
वह कल के अदभुत अनुभव के बारे में बातें कर रही थीम कई सवाल पूछ रही थी जिनके अपनी तरफ से मैं तसल्ली बख्श जवाब दे रहा था।
ऐसे ही सवा बारह बज गए तो हम थिएटर की तरफ आ गए और नियत समय पर हाल में घुस गए… जहाँ अगले तीन घंटे हमने पेस्ट्री और पॉपकॉर्न के साथ सलमान भाई की फिल्म के मज़े लिए।
उसने यहीं अपने नक़ाब से कल की तरह छुटकारा पा लिया था और उम्मीद के अनुसार उन्ही कपड़ों से मलबूस थी जो उसने मेरे साथ ही फन और सहारागंज से लिए थे।
फिल्म देख कर बाहर निकले तो भूख लग रही थी।
वहीं पीछे गली में मौजूद रेस्तराँ में हमने हल्की पेट पूजा की और भारी ट्रेफिक के बीच लॉन्ग ड्राइव करके इको गार्डन की तरफ चले आये जहाँ हमने शाम तक का वक़्त गुज़ारा।
वह परसों से ही ऐसे बातें कर रही थी जैसे बरसों से भरी बैठी हो, जैसे अपना सब कुछ कह देना चाहती हो।
हर छोटी बड़ी बात… कभी बच्चों की तरह खुश होकर, कभी ग़मगीन हो कर, कभी सहज रूप में… कभी कुछ याद करते उसकी पलकें भीग जातीं और मैं बड़े धैर्य से उसकी हर बात सुनता रहता, उसे प्रोत्साहन देता रहता।
बीच में वह मुझसे मेरी बातें भी पूछती और मैं कुछ सच्ची कुछ झूठी बातें कह जाता।
मैं एक पल के लिए भी इस बात को नहीं भूलता कि यह सिलसिला हमेशा नहीं चलना था इसलिए ऐसी कोई बात नहीं बताता था जिससे वह कभी मुझे पाने की कोशिश करती भी तो ढूंढ पाती।
मैं उसकी ज़िन्दगी का शायद पहला क्रश था इसलिए उसका मुझसे जुड़ जाना स्वाभाविक था लेकिन मैं वह ज़िन्दगी नहीं जी सकता था।
उस तरह की ज़िन्दगी से मेरा भरोसा उठ चुका था।
शादी में धोखा खाने और ढेरों लड़कियों औरतों को दोप्याजे गोश्त की तरह इस्तेमाल करने के बाद अब मुझमें वो जज़्बात ही नहीं बचे थे जिसकी उसे दरकार थी।
मेरी मानसिकता अब उस मुकाम पर पहुँच चुकी थी जहाँ मर्द को किसी औरत के पेट के अंदर मौजूद कोख नहीं नज़र आती, नज़र आती है तो पेट की ढलान पर मौजूद योनि।
जहाँ औरत के सीने से छूटती ममता की धाराएँ, उनके नीचे भावनाओं से ओतप्रोत दिल नहीं नज़र आता… नज़र आते हैं तो दो उरोज…
मैं जानता हूँ यह मेरी कमी है, बुराई है लेकिन मैं अब इसी के साथ जीने के लिए अभिशप्त हूँ और इसके लिए रत्ती भर भी अफ़सोस नहीं करता।
‘सुनो!’ उसने मुझे टहोका तो मेरी तन्द्रा टूटी।
‘हूँ।’ मैं अपने ख्यालों से बाहर आ कर उसे देखने लगा।
‘मुझे नहीं पता तुम इस सिलसिले को कैसे ले रहे हो लेकिन मुझे अपना डर है कि कहीं मैं न दिल लगा बैठूँ, क्योंकि मैं महसूस कर रही हूँ कि तुम मुझे अच्छे लगने लगे हो, मुझे तुम्हारी परवाह होने लगी है। यह ठीक साइन नहीं हैं मेरे लिए।’
‘फिर? इस सिलसिले को यहीं ख़त्म कर देते हैं।’
‘नहीं, यह मेरी ज़िन्दगी का पहला और आखिरी मौका है। इसके बाद मुझे कोई और चांस नहीं मिलने वाला अपने तरीके से यूँ ज़िन्दगी जीने का और इसके लिए अगर मुझे कीमत के रूप में अज़ीयत झेलनी पड़ी तो मुझे वह भी मंज़ूर है। मैं अब पीछे नहीं हट सकती।’
‘फिर?’
‘मैं बस यह चाहती हूँ कि अगर मैं तुमसे अटैच हो भी जाऊँ तो तुम मैच्योरली हैंडल करना।
मैं तो नई उम्र की ऐसी लड़की हूँ जिसका दिल आईने के समान होता है, जो बार बार सामने पड़ रहा है, जो बार बार नज़दीक आता है वही दिल में बस जाता है, पर तुम इस दौर से गुज़र चुके हो, अगर मैं बहक जाऊं तो तुम सम्भालना।
संडे के बाद तुम मेरा नंबर ब्लॉक कर देना, व्हट्सप्प पर मुझे ब्लॉक कर देना कि अगर मैं कंट्रोल खो दूँ और तुमसे संपर्क करना भी चाहूँ तो कर न सकूँ।
तुमसे बात करने की कोशिश करुं तो मुंह फेर कर चले जाना।
कभी सामने आ भी जाऊँ तो रास्ता बदल कर निकल जाना। मैं जानती हूँ मुझे बहुत तकलीफ होगी पर इलाज अक्सर तकलीफ ही देता है।’
‘तुम फ़िक्र न करो। तुम जैसा चाहती हो वैसा ही होगा। चलो, अब चलें।’ मैंने उठते हुए कहा।
फिर हम वहाँ से चल पड़े।
इस बार मैंने उसने वहीं से नक़ाब ओढ़ लिया और मैंने उसे गोल मार्किट लाकर छोड़ दिया जहाँ आज बुध बाजार लगी हुई थी।
यहाँ उसे कुछ खरीदारी करके फिर घर चले जाना था, पर उतारते ही उसने रात के लिए कुछ चीज़ों की फरमाइश की, जिसने मुझे थोड़ा हैरान कर दिया पर फिर भी मैंने हामी भर दी और उसे छोड़ कर रुखसत हो गया।
और जैसा कि दो रोज़ से मामूल बन चुका था, दस बजे मैं तैयार होकर उसके मंगाए सामान के साथ उस के कमरे में पहुँच गया।
आज वह सेक्सी कपड़ों में नहीं थी बल्कि ढीली ढाली नाइटी पहने हुए थी।
वैसे भी इसका क्या फर्क पड़ता था जब पता था कि मेरे आते ही उसे उतरना था।
‘कपड़े खुद ही उतार दो… रात के इस वक़्त बिना कपड़ों के ही अच्छी लगती हो और दस्तरख़ान हो तो बिछा लो।’ मैंने सामान बिस्तर पर डाला, अपने कपड़े उतार के फेंके और बिस्तर पर बैठ गया।
जबकि उसने दस्तरख़ान फोल्ड करके आधा बिस्तर पर डाला, पहले से मौजूद दो गिलास वहाँ रखे और अपनी नाइटी उतार कर मेरे पहलू में आ जमी।
मैंने पैकेट से मैकडॉवेल और सोडे की बोतलें निकाल कर रखीं और उनके ढक्कन खोलने लगा।
गौसिया ने पैकेट में रह गए सिगरेट के पैकेट, लाइटर और नमकीन के पैकेट को निकाल लिया।
‘तुम्हें इस सब की इच्छा थी?’ मैंने ढक्कन खोलने के बाद सोडे से मिक्स करके दो छोटे पैग बनाते हुए कहा।
‘यूँ समझों कि यही डॉक्टर जैकाल और मिस्टर हाइड वाली थ्योरी है। मैं अपने अंदर की मिस हाइड को उसकी सभी इच्छाएँ पूरी करने के बाद बाहर निकाल फेंकना चाहती हूँ ताकि आइन्दा ज़िन्दगी में मेरे अंदर सिर्फ मिस जैकाल बचे।
मैं कभी इस कश्मकश में नहीं पड़ना चाहती कि सिगरेट का स्वाद कैसा होता है या शराब पीने के बाद कैसा महसूस होता है।
आज़ाद ज़िन्दगी का मतलब यही कि इन दिनों में मैं अच्छा बुरा सब कर लेना चाहती हूँ।
अच्छा तो पूरी ज़िन्दगी करने के मौके मिलेंगे मगर बुरा करने का कोई सिंगल मौका भी शायद मुझे दोबारा न मिले।’
‘चियर्स!’ मैंने उसके हाथ में गिलास थमा कर अपने गिलास से उसे टच करते हुए कहा।
‘और अगर किसी बुराई, किसी ऐब की लत लग गई तो?’
‘नामुमकिन! मुझे जो भी चीज़ या सुविधा आज हासिल है, सब तुम्हारे सौजन्य से है। चार दिन बाद तुम नहीं होगे मेरे पास… फिर मुझे कौन मुहैया कराएगा सब चीज़ें या ये सेक्स में सराबोर लम्हे?’
फिर हमने दो सिगरेट सुलगा लीं और उसके कश लगाते हुए नमकीन के साथ पैग का लुत्फ़ लेने लगे।
‘तुम इन चीज़ों का शौक पहले भी करते रहे हो या मेरी वजह से आज पीने बैठ गए?’
‘अपने घर परिवार से दूर अकेले जीवन यापन करते शख्स के लिए कुछ भी वर्जित और हराम नहीं रह जाता। हाँ, बस किसी चीज़ की आदत कभी नहीं बनाई।’
बीच में हमने होंठ भी एक दूसरे से टकराए और पैग चुसकते मैंने उसके मम्मों को भी दबाया सहलाया और योनि को भी रगड़ा और उसने भी मेरे लिंग को वैसी भी प्रतिक्रियात्मक रगड़न दी, जिससे उसमें भी जान पड़ने लगी थी।
‘कमरे में भरा सिगरेट का धुआँ तो निकल जायेगा मगर गंध रह जाएगी। उसका क्या करोगी?’
‘रूम फ्रेशनर से कमरे को इतना महका दूंगी कि सिगरेट की गंध बाकी न रहे। पर अभी नहीं, यह सब संडे को करूँगी, तब तक सब ऐसे ही चलेगा।’
‘एक और बनाऊँ?’ पैग ख़त्म हो गया तो मैंने पूछा।
‘अभी नहीं, पहली बार है, हो सकता है नशा ऐसा चढ़े की होश ही न रहे। वैसे इसमें ऐसा कुछ ज़ायका तो होता नहीं फिर क्यों कमबख्त मुंह लग के लोगों से छूटती नहीं।’
‘उसकी तासीर नशे में है ज़ायके में नहीं।’
सब सामान हमने हटा कर साइड टेबल पर पहुँचा दिया और बेड के सिरहाने से लग कर टांगें फैल कर बैठ गए।
अब उसकी फरमाइश पर मैंने मोबाइल पर उसके शब्दों में ‘ऑसम’ मूवी लगा दी।
वह मेरी साइड से लगी अपना गाल मेरे बाएँ कंधे से सटा कर मूवी देखने लगी और साथ ही अपने हाथ से मेरे लिंग को इस तरह ऊपर नीचे करने लगी जैसे हस्तमैथुन करते हैं और एक हाथ से मोबाइल सम्भाले दूसरे हाथ से मैं उसकी योनि के ऊपरी सिरे से खिलवाड़ करने लगा।
‘दिमाग में सनसनाहट हो रही है और अजीब सा महसूस हो रहा है।’ थोड़ी देर बाद उसने कहा।
तो मैंने उसकी आँखें देखीं जो नशे से बोझिल हो रही थीं।
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07-17-2020, 11:57 AM,
#19
RE: raj sharma story कामलीला
मुझे लगा कि कहीं नशे में लुढ़क न जाये और रात का मज़ा ही किरकिरा हो जाये… मैंने मोबाइल किनारे रखा और उसे थाम लिया।
‘अपना दिमाग मुझमें लगाओ, अपनी वेजाइना से उठती लहरों में लगाओ।’ मैंने उसे अपनी बाँहों में लेते हुए कहा।
और अगले पलों में हम एक दूसरे को रगड़ने में लग गए, एक दूसरे को चूमने, सहलाने, चुभलाने, दबाने, मसलने में लग गए और कुछ ही पल गुज़रे होंगे कि उसके नशे से शिथिल पड़ते शरीर में कामोत्तेजना की ऐसी गर्माहट पैदा हो गई कि शराब का नशा कहीं पीछे छूट गया।
रह गया तो वासना का नशा… जो सर चढ़ कर बोल रहा था।
मैंने अपने होंठों से कुछ बाकी न रखा था और जब उसके भगोष्ठ और भगांकुर को होंठ और जीभ से ज़बरदस्त ढंग से चूस और चाट रहा था तो उसने बेचैनी से मुझे ऊपर खींच लिया और खुद मेरे ऊपर चढ़ कर मुझे चूमने रगड़ने लगी।
‘यार आज करो!’ चूमाचाटी के बीच नशे से थरथराती आवाज़ में उसने कहा- उफ़… मैं और नहीं बर्दाश्त कर सकती। मुझे भी इस डंडे को अपने जिस्म में लेने का सुख चाहिए। कुछ करो, कैसे भी करो।’
एक तो शराब का नशा और उसमे जवानी का नशा, यौनांग से उठती मादक लहरें और उत्तेजना से कंपकपाते शरीर। जिस्म की गर्माहट ऐसी कि बुखार भी पीछे छूट जाए।
यहाँ खुद पर नियंत्रण बनाए रखना मेरे लिए बेहद मुश्किल था और उसके लिए तो खैर नामुमकिन ही था।
हम एनल सेक्स कर सकते हैं… अगर तुम चाहो।’ मैंने खुद को थोड़ा सँभालते हुए कहा।
‘करो… कुछ भी करो… कहीं भी घुसा दो पर इसे मेरे अंदर कर दो।’
‘क्या यहाँ कोई ऐसी चीज़ है जो बाहरी लुब्रिकेंट का काम कर सके- जैसे तेल, जेली?’
‘मस्टर्ड आयल है, कभी कभी मैं हाथ पैरों में लगाती हूँ।’
‘दे दो… ऐसे ही नहीं कर सकते। उसे पहले ढीला करना पड़ेगा।’
उसने मेरे ऊपर से हटते हुए साइड टेबल की दराज़ से क्रीम का छोटा डिब्बा निकाल कर मुझे थमा दिया।
मैंने उसका ढक्कन हटा कर उसे टेबल पर ही रख लिया और बेड पर उसी तरफ मुंह करते हुए ऐसे लेटा कि ज़रूरत पड़ने पर मैं तेल ले सकूं।
मैंने उसे अपने ऊपर इस तरह आने को कहा कि वह चौपाये जैसी पोज़ीशन में रहे, उसके घुटने मेरी पसलियों के गिर्द रहें और उसकी योनि मेरे मुंह पर रहे और खुद उसका मुंह वहाँ रहे जहाँ मेरा लिंग था।
ये 69 पोज़ीशन थी जो इस खेल की नई खिलाड़ी के लिए कुछ अजीब थी।
मैंने उसके नितम्बों को अपने चेहरे के सामने अपनी सुविधानुसार एडजस्ट किया और दोनों को सहलाते दबाते उसकी योनि में मुंह डाल दिया।
मैं न सिर्फ उसकी क्लिटरिस के साथ उत्तेजक ढंग से छेड़छाड़ कर रहा था बल्कि उसके बंद छेद को भी जीभ से दबा रहा था।
धीरे धीरे उसकी सीत्कारें का क्रम बढ़ने लगा।
इस पोजीशन में मेरा लिंग ऐन उसके मुंह के सामने था और उसे आमंत्रित कर रहा था।
वह तीन दिनों से पोर्न मूवी देख रही थी तो क्या इतना भी न समझी होगी कि वह उसके गीले मुंह के लिए कोई वर्जित फल नहीं बल्कि एक लज्जतदार चीज़ है जो मुझे वैसा ही सुख देगी जैसे इस वक़्त उसे मिल रहा है।
मैं अपना काम करते हुए दिमाग वहीं लगाए था कि कब वह अपनी झिझक और शर्म की बाधा को तोड़ के मेरे भाई को अपने मुंह की क़ुरबत बख्शती है…
और जब उसकी योनि ने उसके दिमाग पर नियंत्रण बना लिया तो उसने एकदम से लिंग को मुंह में दबोच लिया और बेताबी से ऐसे चूसने लगी जैसे आइसक्रीम चूस रही हो।
शिश्नमुंड के छेद पर मौजूद प्रीकम की बूँदों ने उसे रोका होगा लेकिन उसने कामयाबी से यह बाधा पार कर ली तो अब कोई अड़चन ही नहीं थी जो उसे यूँ ज़बरदस्त ढंग से लिंग चूषण करने से रोक सके।
उसके मुंह से बहती लार को मैंने अपने अंडकोषों और उनसे होकर अपने गुदाद्वार तक जाते महसूस किया था।
चूषण के साथ ही वह मेरे अंडकोषों को भी अपनी उँगलियों से सहलाने लगी थी।
अब उधर मेरा ध्यान देना मेरी सेहत के लिए ठीक नहीं था वर्ना मेरा पारा भी चढ़ने लगता अतएव मैंने अपना सम्पूर्ण ध्यान उसके चूतड़ों और योनि पर केंद्रित कर लिया और बड़ी लगन से योनि चूषण करते हुए अब अपनी दो उंगलियाँ सरहाने रखे तेल में डुबा लीं और उसके पीछे वाले सिकुड़े सिमटे छेद को सहलाने दबाने लगा।
‘तुम इस छेद को बिलकुल ढीला छोड़ दो… इसे किसी भी हालत में सिकोड़ोगी नहीं।’
उसने एक ‘आह’ भरी सिसकारी के साथ सहमति जताई।
मैं उसे योनि से चार्ज तो कर ही रहा था… जिससे उसके दर्द पर उसकी उत्तेजना हावी रहे। और जब लगा कि उँगलियों पर लगा तेल चुन्नटों से होता अंदर तक पहुँच चुका होगा तो अपनी बिचली उंगली थोड़ा दबाव देते अंदर उतार दी।
उसके जिस्म की अकड़न में एक पल के लिए ठहराव आया तो सही लेकिन एक उन्नीस साल की लड़की के लिए उंगली कोई मायने नहीं रखती थी और वह मैं कल भी कर चुका था।
मैंने जीभ से अपना काम करते हुए उंगली को गहराई में ले जाकर उसके रेक्टम की प्रवेशद्वार वाली दीवारों को सहलाने रगड़ने लगा, उंगली को गोल गोल घुमाते हुए।
‘आह, ओफ्फो… यह भी अच्छा लग रहा है… कितने… मज़े देते हो तुम… आह… और करो… ऐसे ही… और.. आह… मज़ा आ रहा है…’वह अस्फुट से शब्दों के साथ टूटती लड़खड़ाती आवाज़ में बोली।
उसे एन्जॉय करते देख मैंने दूसरी उंगली भी छेद में उतार दी।
उसके मुंह से दर्द भरी कराह निकली और उसने कुछ पलों के लिए छेद को सिकोड़ा मगर फिर ढीला छोड़ दिया और ऐसा लगा जैसे अपना ध्यान लिंग चूषण पर लगा लिया हो।
अच्छा ही था… इससे मुझे आसानी होती।
मैं दोनों उंगली अंदर ही रखते हुए इस तरह चलाने लगा कि एक बाहर की तरफ आ रही होती तो दूसरी अंदर की तरफ जा रही होती। इस तरह न सिर्फ उसे रगड़न मिल रही थी बल्कि छेद भी दो उँगलियों का आदि होकर ढीला हो रहा था।
एक सख्त कसे हुए छल्ले को मैं अपनी उँगलियों पर महसूस कर सकता था।
हालांकि यह पोज़ीशन ऐसी थी कि मैं उँगलियों पर तवज्जो देता तो मुझे अपना मुंह उसकी योनि से पीछे खींचना पड़ता और मुंह पर तवज्जो देता तो उँगलियों को गति नहीं दे सकता था।
दूसरे इस तरह मेरे पंजे यूँ मुड़े हुए थे की जॉइंट की हड्डी दर्द करने लगी थी।
अंततः मैंने उसे अपने ऊपर से हटा दिया।
खुद उठ कर उसी साइड में जिधर तेल रखा था, बेड से नीचे खड़ा हो गया और गौसिया को उसी तरह चौपाये की पोजीशन में रखते हुए एकदम किनारे खींच लिया।
उसकी कमर पर दबाव बना कर उसे इस तरह नीचे कर दिया कि उसके बूब्स और चेहरा गद्दे में धंस गए और इस तरह उसके नितम्बों वाला हिस्सा ही उठा रह गया जो मेरे एन सामने था और उसके दोनों गीले और बह रहे छेद बिल्कुल सही पोजीशन में मेरे सामने थे।
मैंने उँगलियों पर तेल लेकर उसके छेद में टपकाया और उसे उँगलियों से अंदर करते हुए, साथ ही दोनों उंगलियाँ भी अंदर उतार दीं।
इस काम में मैं अपना सीधा हाथ इस्तेमाल कर रहा था।
बाएं हाथ से मैंने उसकी पूरी तरह गीली, बहती-चूती योनि को रगड़ने सहलाने लगा जिससे वह फिर चार्ज होने लगी और जो कुछ पलों का अवरोध आया था, उससे उबरने लगी।
थोड़ी देर बाद जब लगा कि अब वह सह लेगी तो खाली वाला हाथ योनि से हटा कर मैंने उसमें तेल लिया और अपने लिंग को तेल से इस तरह सराबोर कर लिया कि दूल्हा चमकने लगा।
‘सुनो, मैं अब डालने जा रहा हूँ। कितना भी दर्द हो, यह सोचकर बर्दाश्त करना कि इस दर्द से कोई मर नहीं जाता और एकदम चिंहुक कर ऊपर नीचे न होना… चिकनाई बहुत है, फिसल कर नीचे के छेद में जा सकता है और गया तो झिल्ली तक पहुँचने से पहले रुक भी नहीं पाएगा।’ मैंने उसे चेतावनी देते हुए कहा।
‘अब तुम खुद अपनी क्लिटरिस को सहलाते हुए अपने को गर्म रखो, मेरा ध्यान अंदर डालने में है।’
उसने सर हिलाते हुए डालने का इशारा किया और खुद नीचे से अपना सीधा हाथ अपनी योनि तक ले आई और उसे सहलाने रगड़ने लगी।
मैंने उसके नितम्बों को सहलाते हुए सीधे हाथ से लिंग को पकड़ कर उसके छेद से टिकाया और अपनी उँगलियों से लिंग के अग्रभाग को उसके छेद पर दबाने लगा।
चुन्नटों भरा घेरा काफी सख्त था लेकिन चिकनाई इतनी ज्यादा थी कि चुन्नटों को खुलने में देर नहीं लगी।
और जैसे ही उसने पहली बाधा पार की, वह एकदम अंदर सरका और उसी पल में वह चिहुंक कर ‘अम्मी’ के उद्घोष के साथ चीखी।
अगला पल मेरे लिए अपेक्षित था इसलिए मैंने उसके कूल्हों के ऊपर, कमर पर अपनी उँगलियाँ धंसा दीं और उसके तड़प कर मेरे लिंग से बाहर निकल जाने की सम्भावना ख़त्म कर दी।
‘रिलैक्स- रिलैक्स… थोड़ा बर्दाश्त करो। अभी छेद अपने आप एडजस्ट कर लगा… तुम अपनी वेजाइना को सहलाओ।’

वह गूं गूं करती रही और मैंने अपने आधे घुसे, बल्कि यह कहा जाये तो ज्यादा सही होगा कि उसके कसे हुए छेद में आधे फंसे लिंग को और अंदर घुसाने की कोशिश की तो वह मचलने लगी।
‘मुझे लेट्रीन फील हो रही है… जाने दो।’ वह कांखते कराहते हुए ऐसे बोली कि लगा वाकयी में उसकी कैफियत ऐसी ही रही होगी।
मैंने अपना लिंग बाहर खींच लिया…’पक’ की आवाज़ के साथ खुला हुआ दरवाज़ा बंद हो गया और वह उठ कर कमरे से अटैच बाथरूम की तरफ भागी और दरवाज़े के पीछे गायब हो गई।
मैं बिस्तर पर गिर कर उसका इंतज़ार करने लगा।
पांच मिनट बाद वह वापस आई तो उसके चेहरे पर शर्मिंदगी के भाव थे।
‘सॉरी…’ वह निदामत भरे लहजे में बोली और मेरे पास ही सर झुकाए बैठ गई।
‘इट्स ओके… पहली बार में हो जाता है… इसमें कोई बड़ी बात नहीं। यह तभी हो सकता है जब तुम मानसिक रूप से इसके लिए तैयार हो। अगर तुम ठीक नहीं महसूस कर रही तो कोई बात नहीं। हम ऐसे ही एन्जॉय करते हैं न।’ मैं उसके पास बैठ कर उसकी पीठ को सांत्वना भरे अंदाज़ में सहलाते हुए बोला।
वह थोड़ी देर अपनी घनेरी पलकें ऊपर उठा कर मेरी आँखों में देखती रही फिर निश्चयात्मक स्वर में बोली- नहीं, जो होगा आज होगा… यह मेरी ज़िन्दगी का वह वक़्त है, वह मौका है जो एक बार चला गया तो फिर कभी नहीं आएगा। मुझे पता नहीं था कि ऐसे वक़्त में कैसा महसूस होता है लेकिन अब पता है और मैं खुद को इसके लिए तैयार कर चुकी हूँ।
‘ऐज़ यू विश!’
‘पर नशा ख़त्म हो गया। फिर से बनाओ!’ वह बिस्तर की पुश्त से टिकती हुई बोली।
‘जैसी मैडम की मर्ज़ी।’ मैंने मुस्कराते हुए कहा और उठ कर ड्रिंक बनाने लगा… साथ ही दो सिगरेट भी सुलगा लीं।
हम फिर से शराबनोशी और स्मोकिंग करने लगे।
और इस बार जो रगड़घिस का दौर चला तो वह काफी वायलेंट तरीके से पेश आई। मैंने उसके बूब्स, योनि और चूतड़ों के साथ उसे वैसे ही रगड़ा कि फिर थोड़ी देर में ‘सी-सी’ करती पानी छोड़ने की कगार पर पहुँच गई।
इस बार छेद ढीला करने के लिये मैंने उसे डॉगी स्टाइल वाली पोजीशन में नहीं किया बल्कि चित लिटा कर बेड के किनारे खींच लाया और पांव घुटनों से मोड़ कर पीछे कर दिए। उसके दोनों छेद यूँ समझिए कि गद्दे की कगार पर आ गए थे।
खुद मैं नीचे उकड़ूं बैठ गया और उसकी योनि से ज़ुबानी छेड़छाड़ करने लगा।
उंगलियाँ फिर से तेल में डुबाईं और पहले बंद पड़े छेद को प्यार से सहलाया, फिर पहले एक उंगली और फिर कुछ देर में दोनों ही उंगलियाँ अंदर उतार दीं।
वह खुद अपने हाथों से अपने वक्ष को मसलने लगी थी और अपने निप्पलों को रगड़ने, खींचने लगी थी।
कुछ क्षणोपरांत जब वह तैयार हो गई तो खुद से उसने इशारा किया कि अब करो वर्ना ऐसे ही निकल जाएगा।
तब मैंने खड़े होकर उसके कूल्हों के नीचे कुशन रख कर छेदों को थोड़ा और ऊपर किया ताकि मुझे ज्यादा नीचे न होना पड़े और एक बार और अपने लिंग को तेल से सराबोर कर दिया।
इस बार जब शिश्नमुंड को छेद पर रख कर दबाया तो उसे अंदर सरकने में इतनी ताक़त न लगी।
जब वह अंदर गया तो मैंने उसका चेहरा देखा… उसने होंठ भींच लिए थे और खुद अपनी लार में उँगलियाँ गीली करके अपनी योनि पर ले आई थी और उसे रगड़ने सहलाने लगी थी।
धीरे धीरे करके इस बार मैंने अपने लिंग को उसके छेद में इतना धंसा दिया कि मेरा पेट उसके चूतड़ों से आ सटा।
‘पूरा अंदर हो गया?’ उसने कराहते हुए पूछा।
‘हाँ, अभी छेद खुद ही एडजस्ट कर लेगा। बस तुम खुद को गर्म किये रहो।’ मैंने आहिस्ता आहिस्ता लिंग को बाहर खींचते हुए कहा।
मैं जानता था कि भले वह चरम पर पहुँच चुकी हो लेकिन यह दर्द उसे वापस पीछे खींच लाएगा।
मैं उसका हाथ उसके वक्ष पर करके खुद अपने एक हाथ से उसके भगांकुर को सहलाने लगा और दूसरे हाथ से लिंग को पकड़े बाहर निकाल लिया।
‘पक’ की आवाज़ तो फिर हुई लेकिन इस बार बेहद हल्की…
मैंने फिर से लिंग को वापस घुसाया… ज़ाहिर है कि उसे फिर खिंचाव का दर्द बर्दाश्त करना पड़ा।
पूरा लिंग अंदर सरकाने के बाद मैंने फिर उसे वापस खींच लिया।
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07-17-2020, 11:57 AM,
#20
RE: raj sharma story कामलीला
यह प्रक्रिया मैंने करीब बारह पंद्रह बार दोहराई और उसका दर्द हर बार हल्का पड़ते एकदम गायब हो गया जिसका एक कारण यह भी था कि मैंने लगातार उसके भगांकुर को सहलाते मसलते उसे गर्म करता रहा था और वह खुद भी अपने मम्मों को निप्पलों समेत रगड़ती मसलती, गर्म करती रही थी और साथ ही उसका छेद भी ढीला होकर इतना खुल गया कि अब लिंग को अंदर बाहर होने में कोई बाधा नहीं महसूस हो रही थी।
उसमें कसाव अब भी था मगर वैसा नहीं कि लिंग अंदर बाहर न हो सके।
‘अब ठीक है… हम कर सकते हैं। सुनो… तुम ऐसा करना जब मैं अंदर घुसाऊँ तो छेद को बाहर की तरफ फेंकते हुए उसे बाहर निकालने की कोशिश करो जैसे लैट्रीन करते वक़्त करते हो और जब मैं उसे बाहर की तरफ खींचूं तो तुम छेद को सिकोड़ कर उसे रोकने की कोशिश करो।’
इसके लिए ज़रूरी था कि मैं यह अंदर बाहर करने की प्रक्रिया को धीरे धीरे करूँ।
मैंने ऐसा ही किया और उसने ऐन मेरे निर्देशानुसार वैसा ही किया जिससे उसे अजीब सा मज़ा आया।
‘हम्म… अच्छा लग रहा है।’ उसने अपना हाथ अपनी योनि पर लगाते हुए कहा और खुद से वह करने लगी जो मैं कर रहा था जिससे मेरे हाथ फ्री हो गए और मैं उसके मुड़े हुए पैरों के घुटनों को पकड़ कर बाआहिस्तगी से चोदन करने लगा।
थोड़ी देर उसी अवस्था में सम्भोग करने के बाद मैंने लिंग बाहर निकाल लिया और उसे फिर पहले जैसी पोजीशन में आने को कहा।
वो फिर डॉगी स्टाइल में झुक कर बैठ गई और मैंने उसकी कमर को दबाते हुए इसे इस तरह बिस्तर से सटा दिया कि सिर्फ नितम्ब ही उठे हुए रह गए।
अब फिर गीला और ढीला पड़ चुका गेहुंए रंग का छेद मेरे सामने था।
उसके नितम्बों पर प्यार भरी सहलाहट देते हुए मैंने फिर लिंग अंदर घुसा दिया।
एक पल के लिए लगा कि उसे तकलीफ हुई हो लेकिन फिर वह सम्भल गई और खुद से आगे पीछे होने लगी।
जब मैं अंदर की तरफ घुसाता तो वह अपने चूतर पीछे की तरफ धकेलती और जब बाहर निकालता तो वह अपने चूतड़ों को आगे खींचती।
इस तरह वह घर्षण को और ज्यादा अच्छे से महसूस कर सकती थी… इस स्थिति में वह अपना एक हाथ नीचे लाकर अपनी योनि को भी रगड़ने लगी थी।
थोड़ी देर के धक्कों में ही न सिर्फ वह बल्कि मैं भी उत्तेजना के चरम पर पहुँचने लगे।
‘जोर जोर से करो।’ उसने ‘आह’ सी भरते हुए कहा।
मुझे भी यही अनुभूति हो रही थी। मैंने धक्कों की स्पीड तेज़ कर दी।
कमरे में मेरे पेट और उसके कूल्हों के टकराने से होती ‘थप-थप’ की आवाज़ें फैलने लगीं।
साथ ही उसकी मस्ती और उत्तेजना में डूबी कराहें कमरे के माहौल में और आग भरने लगीं।
मेरी साँसें भी भारी हो गई थीं और दिमाग स्खलन के उस चरम बिंदु पर पहुँचने लगा था।
फिर वह जोर की ‘आअह्ह’ करते हुए अकड़ गई।
योनि को रगड़ने वाला हाथ हटा कर उसने बिस्तर की चादर को दबोच लिया और जैसे अपनी सारी उत्तेजना उस चादर और गद्दे में जज़्ब करने लगी, जबकि मैं भी उसके जिस्म के साथ ही पीछे के छेद में आये कसाव को अपने लिंग पर महसूस करते हुए बह चला था और मेरी भी आहें छूट गईं।
मैंने अकड़ते हुए तीन चार झटके लगाए और उसके पैरों को एड़ियों से पकड़ कर ऐसे खींचा कि पैर बेड से नीचे रहे और बाकी जिस्म बेड पर फैल गया और साथ ही उसकी पीठ और चूतड़ों की तरफ से उससे सटा मैं भी उसी के ऊपर फैल गया और उसे पूरी ताक़त के साथ अपने नीचे दबाते हुए, हल्की गुर्राहटों के साथ स्खलित होने लगा।
जब ट्यूब खाली हो गई तो कुछ देर दिमाग में होती झनझनाहट से जूझने के बाद मैं उसके ऊपर से हट कर उसके पहलू में फैल गया और लम्बी लम्बी साँसें लेने लगा।
मज़ा आ गया।’ थोड़ी देर बाद उसने करवट ली और मेरी आँखों में देखते हुए बोली- अब मैं इमैजिन कर सकती हूँ कि जब आगे से इस तरह सोहबत करते होंगे तो कितना मज़ा आता होगा।’
‘अभी तुम्हारे मज़े ने दर्द से लड़ कर जीत पाई है। जब दर्द की गुंजाईश नहीं बचेगी और तब करेंगे तो इससे ज्यादा मज़ा आएगा।’
‘तुम्हारा पेस्ट अंदर ही है।’
‘हाँ- धीरे धीरे निकल जायेगा या ऐसा करो बाथरूम जाकर बैठो और थोड़ा जोर लगाओ, सब निकल जायेगा।’
‘अंदर भी रह जाये तो कोई प्रॉब्लम है क्या?’
‘नहीं। क्या प्रॉब्लम होगी… मुझे एच आई वी थोड़े है और वैसे भी रेक्टम ऐसी जगह है जहाँ बैक्टीरिया की भरमार होती है। वहाँ स्पर्म भला क्या नुक्सान पहुंचा पाएंगे।’
‘फिर रहने दो, फाइनली जब तुम जाओगे तो साफ़ कर लूंगी। अभी जहाँ जो भी बहता चूता है उसे बहने चूने दो। चादर चेंज करनी ही है। चलो एनल सेक्स वाली मूवी दिखाओ, कौन कौन से आसन इस्तेमाल होते हैं।’
फिर हम कायदे से लेट कर एनल सेक्स वाली मूवी देखने लगे।
करीब घंटे भर बाद फिर गर्म हुए… पर इस बार हमने खेलने के अंदाज़ में कई आसनों से गुदामैथुन का मज़ा लिया। उसका छेद इतने बार में इतना ढीला हो गया था कि अब आराम से हम हर पोजीशन में सहवास कर सकते थे।
फिर काफी खेल चुके तो मैंने फिर उसकी चटाई शुरू की और उसे उत्तेजना के शिखर तक पहुँचा कर वापस लिंग अंदर घुसाया और जोर जोर से धक्के लगाने शुरू किये।
इतनी देर खेलने का असर पड़ा और दोनों जल्दी ही डिस्चार्ज हो गए।
फिर लेट कर फ़िल्में देखीं, कुछ कहानियाँ पढ़ीं और फिर एक एक पैग लेके वापस जुटे।
हालाँकि अब मैं स्खलित नहीं होना चाहता था क्योंकि यह एक दिन का नहीं था, अभी लगातार चार रातें झेलना था। इस बात को ध्यान में रखते हुए मैंने उसे ही चरमोत्कर्ष तक पहुँचा दिया और खुद को बचाए रखा।
बुध की रात का काम तमाम हुआ और मैं थका हारा वापस पहुँच कर सो गया।
अगला दिन
अगले दिन वह सुबह कुछ जल्दी ही यूनिवर्सिटी चली गई, जहाँ से मैंने उसे बारह बजे पिक किया।
वहाँ से निकल कर इंजीनियरिंग कॉलेज के पास पहुँचे जहाँ हमने थोड़ा खाया पिया फिर रिंग रोड पे चलते, खुर्रम नगर चौराहे से मुड़ कर कुकरैल पिकनिक स्पॉट आ गए।
अब उसका रोज़ का मामूल था कि वह घर से वैसे ही बंद गोभी की तरह ढकी मुंदी निकलती, कहीं मौका देख कर अपने लबादे को पर्स में ठूंस लेती, नीचे जीन्स टॉप टाइप का पहनावा होता और वापसी में वह फिर से नक़ाब स्कार्फ मढ़ लेती और जैसी घर से निकलती थी वैसे ही घर पहुँचती।
यह इलाका भी प्रेमी जोड़ों के लिए काफी मुफीद था और यहाँ हर तरह के करम हो जाते थे।
बहरहाल, हमें तो वैसे भी अपने कर्मों के लिए सुविधा उपलब्ध थी इसलिए हमने इधर उधर लेटे बैठे वक़्त गुज़ारा और इधर उधर की बातें करते न सिर्फ चूमाचाटी की, बल्कि मौका देख कर उसने लिंग चूषण भी किया, जबकि मैंने उसके मम्मों का मर्दन चूषण किया और उसके दोनों छेदों में उंगली भी खूब की, जिससे उसका वहाँ भी पानी छूट गया था।
उसे पीछे के छेद में दर्द था और हल्की सूजन भी महसूस हो रही थी इसलिए उसके दर्द और सूजन की दवा हमने इंजीनियरिंग कॉलेज के पास से ही ले ली थी जिसकी वजह से अब उसे दर्द से तो राहत थी।
आज उसे पांच बजे ही रिहा कर दिया, वह घर निकल गई और मैं अपने कुछ दोस्तों साथियों के पास, जहाँ मुझे इतना वक़्त लग गया कि मैं गौसिया के पास दस के बजाय साढ़े दस बजे पहुंचा।
‘कहाँ अटक गए थे?’ उसने थोड़ी नाराज़गी भरे स्वर में कहा।
‘थोड़ा मसाज आयल का जुगाड़ कर रहा था।’
‘मसाज आयल! वह किसलिए?’
‘आज तुम मसाज का मज़ा लोगी। बेड पर कोई साफ़ पुरानी चादर डाल लो।’ मैंने उसे मसाज आयल की शीशी दिखते हुए कहा।
फिर महफ़िल सजी… रात रंगीन हुई।
हमने सिगरेट पी- एक एक पैग लगाया और फिर वह नंगी होकर लेट गई।
कपड़े मैंने भी उतार दिए थे ताकि तेल न लगे।
फिर उसके होंठों पर एक जोरदार चुम्मी के साथ मैंने उसे औंधा लिटाया और उसकी पीठ से मालिश शुरू की।
अपनी उँगलियों को सख्त नरम करते हुए उसकी रीढ़, कॉलर बोन, शोल्डर और हाथ के पक्खों को मसलता रहा, फिर कमर पर थोड़ी सख्त मालिश की और कमर से नीचे मखमली नितम्बों को तो ऐसे भींच भींच कर मसला कि उसकी योनि गीली हो गई।
दोनों कूल्हों को फैला कर छेद को अच्छे से तेल से भिगाया, मसला और उंगली को अंदर बाहर करते छेद की भी मालिश की।
वहाँ दवा की वजह से अब दर्द तो नहीं था मगर हल्की सूजन अब भी थी लेकिन जिस्म की गर्माहट और उत्तेजना उसे आगे के लिए तैयार कर देने वाली थी।
फिर वहाँ की अच्छे से सेवा हो गई तो उसकी भरी भरी जांघों और मांसल पिंडलियों को अच्छे से मसाज किया।
इसके बाद उसे सीधा करके लिटा दिया और थोड़ी सी मालिश गर्दन और कन्धों की करने के बाद ढेर सा तेल उसके गर्म होकर तन गए वक्षों पर लगा दिया और उन्हें ऐसे मसलने लगा जैसे आटा गूंध रहा होऊँ।
वह दांतों से होंठ कुचलती, बड़े प्यार भरे अंदाज़ में मुझे देखती ‘सी-सी’ कर रही थी।
उसने अपने हाथ उसने मोड़ कर सर की तरफ डाल लिए थे।
मैं अपने घुटनों के सहारे उसके पेट पर बैठा उसके स्तनों का भरपूर मर्दन कर रहा था।
जब दोनों मम्मों की अच्छे से मालिश हो गई और दोनों चोटियाँ नुकीली होकर तन गईं तो नीचे उसकी जांघों पर आकर मैं उसके पेट की मालिश करने लगा।
अब उसने अपने हाथ नीचे कर लिए थे और खुद से अपने वक्षों को दबाने सहलाने लगी थी।
मैंने अपने मालिश करते हाथ नीचे उतारे और उदर की ढलान पर एक लकीर के रूप में दिख रही योनि की फांकों को खोल कर देखा। वह गीली होकर बहने लगी थी।
उसके ऊपर से हट कर मैं उसकी टांगों के बीच आ गया और उसके पांव घुटनों से मोड़ कर फैला दिए, फिर थोड़ा तेल लगा कर योनि के ऊपरी हिस्से को रगड़ने लगा, उसकी गहरे रंग की कलिकाओं को खोल कर उन्हें मसलने लगा।
मैं ऊपर से नीचे तक पूरी योनि के आसपास मालिश करने लगा और सबसे अंत में तेल में डूबी उँगलियों से उसके दाने को मसलने लगा।
वह थोड़ी देर ‘आह-उफ़… सी सी’ करती बड़बड़ाती रही फिर जब लगा कि उसका पानी ही छूट जायेगा तो उसने एकदम से अपने पांव समेट कर मुझे धकेल दिया।
मैं बिस्तर पर लुढ़क गया और वह बैठ कर हंसने लगी।
‘डिस्चार्ज होने वाली थी मैं, अच्छा अब तुम लेटो, मैं तुम्हारी मसाज करती हूँ।’ उसने अपनी पोजीशन दुरुस्त करते हुए कहा।
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