RajSharma Sex Stories कुमकुम
10-05-2020, 12:35 PM,
#61
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
'श्री सम्राट....।' द्वारपाल ने पुकारा। '...........।' द्रविड़राज मौन रहे, मानो उन्होंने कुछ सुना ही नहीं। 'श्री सम्राट...!' द्वारपाल ने पुन: पुकारा, नतमस्तक होकर।

वास्तव में वह एक आवश्यक संदेश लेकर द्रविड़राज के प्रकोष्ठ में लगभग आधी घड़ी में खड़ा था।

द्वारपाल की दूसरी पुकार पर सम्राट ने प्रकोष्ठ के द्वार की ओर देखा। द्वारपाल ने नतमस्तक होकर सम्राट का सम्मान प्रदर्शन किया। "द्वारदेश पर युद्ध शिविर से श्रीयुवराज का संदेश लेकर एक सैनिक उपस्थित है और लगभग आधी घड़ी से श्रीसम्राट की आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहा है...।' उसने कहा। '

आधी घड़ी से...?' द्रविड़राज चौंककर बोले-'और तुम अब मुझे सूचित कर रहे हो।'

'मैं सम्राट की सेवा में बहुत देर से खड़ा हूं, परन्तु श्री सम्राट विचारों में इतने तल्लीन थे कि व्यवधान उपस्थित करना मैंने उचित नहीं समझा...।'

'उसे तुरंत उपस्थित करो।' सम्राट ने उतावली भरे स्वर में आज्ञा दी। सैनिक आया। उसने सम्राट को सम्मान प्रदर्शन किया। 'तुम युद्ध शिविर से आ रहे हो न...? कहो, वहां का क्या समाचार है?' द्रविडराज ने पूछा।

'श्री सम्राट के अतुलित प्रताप से सब कुशल है।'

'युवराज तो सकुशल हैं।' 'स्वयं महामाया का वरदहस्त उनकी रक्षा कर रहा है, श्रीसम्राट।'

'श्रीयुवराज पर किसी अनिष्ट की आशंका तो नहीं...?'

'नहीं श्रीसम्राट।'

'युद्ध का क्या समाचार है?'

'अब तक तो सभी युद्धों में हमारी विजय हुई है, श्रीयुवराज की संचालन प्रतिभा अद्भुत है। शत्रु भी आश्चर्यचकित हो उठे हैं श्रीयुवराज का प्रबल प्रताप देखकर।'

अब तक सम्राट के निरंतर प्रश्नों के आगे, सैनिक को न तो युवराज का पत्र देने का और न रत्नहार ही उनके सम्मुख उपस्थित करने का अवसर मिला था।

जब द्रविड़राज सब तरह के प्रश्न पूछकर अपने को आश्वस्त कर चुके तो सैनिक ने उनके सामने युवराज का पत्र और रत्नहार रख दिया।

'यह क्या...?' रत्नहार देखते ही द्रविड़राज इस प्रकार चौंक उठे जैसे उनके शरीर में प्रखर विद्युत रेखा प्रवेश कर गई हो।
उन्होंने भयभीत नेत्रों से उस रत्नहार की ओर देखा। पुन: कम्पित करों द्वारा उठाकर उसे मस्तक से लगाया।

'निश्चय ही यह वही पवित्र रत्नहार है...द्रविड़कुल का उज्जवलतम दीपक यह कहां मिला? यह विलुप्त रलहार कैसे प्राप्त हुआ तुम्हें ?' द्रविड़राज ने उत्सुक नेत्रों से शीघ्रतापूर्वक युवराज नारिकेल का पत्र पढ़ा।
और उनके हृदय में ध्वंसक संघर्ष मच गया। बहुत वर्षों पूर्व की घटना उनके नेत्रों के सम्मुख तीव्र गति से चित्रित होने लगी। वे बारम्बार युवराज का पत्र पढ़ने एवं उस पवित्र रत्नहार को मस्तक से लगाने लगे। उन्हें तीव्रोन्माद-सा हो गया। 'यह पवित्र रत्नाहार शत्रु सेना के संचालक के पास से मिला है...?' पूछा उन्होंने।

'जी हां, किरातों का नायक आजकल आर्य सेना का संचालक है...।' सैनिक ने उत्तर दिया।

'किरातों का नायक...!' बोले द्रविड़राज—'क्या अवस्था होगी उसकी?'

'प्राय: बीस वर्ष।' '.....।' सम्राट चौंक पड़े सेनानायक का यह उत्तर सुनकर। उन्हें उस बीस-वर्षीय नायक की रण-कौशलता पर आश्चर्य हो रहा था। वे उस नायक के विषय में सोचने में ध्यान-मग्न हो गये थे। पास ही खड़े सैनिक ने उनका ध्यान भंग करते हुए पूछा 'श्रीसम्राट की क्या आज्ञा है...?'

'तुम जाओ, विश्राम करो...।' सम्राट ने सैनिक को आज्ञा दी।

सैनिक अभिवादन कर चला गया। द्रविड़राज ने श्वेताम्बर से अपना शरीर आच्छादित किया, पुन: उस रत्नहार को यत्नपूर्वक उस श्वेताम्बर की ओट में छिपाया, तत्पश्चात् महामाया के मंदिर की ओर महापुजारी के दर्शनार्थ चल पड़े।

'श्रीसम्राट आप...!' महापुजारी को महान आश्चर्य हुआ, द्रविड़राज का ऐसे समय में पदार्पण देखकर। साथ ही चिंता हुई उनके मुख पर दुश्चिंता की रेखायें अवलोकन कर।

'पधारिये सम्राट...।' महापुजरी ने कहा। किन्नरी एवं चक्रवाल, जो इस समय महापुजारी के पास ही उपस्थित थे ने द्रविड़राज को सम्मान प्रदर्शित किया।

'तुम लोग जाओ।' सम्राट ने चक्रवाल एवं किन्नरी को आज्ञा दी।

उनके स्वर से हृदय का उद्वेग स्पष्ट हो गया था। चक्रवाल एवं किन्नरी उठकर चले गए।

'श्रीसम्राट की मुखाकृति मलिन क्यों है?' महापुजारी ने पूछा- क्या श्रीयुवराज की चिंता श्रीसम्राट को उद्वेलित कर रही है या किसी मानसिक आवेग ने हृदय प्रदेश में उथल-पुथल उत्पन्न कर दी है?'

..........' द्रविड़राज निस्तब्ध रहे। केवल एक बार उन्होंने सिक्त नेत्रों से महामाया की स्वर्ण प्रतिमा की ओर देखा एवं मन ही मन श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।

'श्रीसम्राट ने मेरे प्रश्नों का कोई भी उत्तर देने का कष्ट नहीं किया...?' महापुजारी ने उन्हें सचेत किया, परन्तु सम्राट नीरव ही रहे।

' चक्रवाल...!' महापुजारी ने पुकारा।

'चक्रवाल को किस तात्पर्य से बुला रहे हैं आप?' सम्राट ने पूछा।

'श्रीसम्राट का हृदय उद्विग्न है—ऐसे समय में चक्रवाल की कला अमूल्य औषधि प्रमाणित होगी...।'

'नहीं? आवश्यकता नहीं...।' द्रविड़राज बोले—'एक चिंताजनक समाचार आपको सुनाने आया हूं।'

'वह क्या...?' महापुजारी ने शंकित नेत्रों से द्रविड़राज के गंभीर एवं पीत मुख की और देखा।

'युद्ध शिविर से अभी-अभी एक सैनिक आया है।'

'क्या समाचार लाया है...? युद्ध की प्रगति संतोषजनक तो है न...? श्रीयुवराज तो सकुशल हैं?'
एक साथ ही महापुजारी ने कई प्रश्न कर डाले।

'युद्ध की प्रगति अनुकूल है, युवराज भी सकुशल हैं परन्तु अवस्था सोचनीय होती जा रही है। जिन बातों को मैं सतत् प्रयत्न कर भूलने की चेष्टा करता हूं, दैव दुर्विपाक से वही बातें पुन: पुन: उपस्थित होकर मन को अशांत बना देती हैं आप ही बताइये महापुजारी जी कि ऐसी शोचनीय अवस्था में मैं किस प्रकार धैर्य धारण करूंगा...? यद्यपि मैं सम्राट हूं और एक सम्राट को साधारण मनुष्यों की अपेक्षा अधिक संयत एवं अधिक सहनशील होना चाहिये। परन्तु सहनशीलता की भी कोई सीमा होती है, महापुजारी जी। जिन-जिन असहनीय यातनाओं को मैंने मौन रहकर सहन किया है वे क्या साधारण हैं।'

'श्रीसम्राट का तात्पर्य क्या है...?' महापुजारी ने पूछा।

द्रविड़राज कुछ बोल नहीं पाये। उनका दाहिना हाथ एक क्षण के लिए श्वेत आवरण के अंतप्रदेश में गया और दूसरे ही क्षण उन्होंने महापुजारी के हाथों पर वह बहुमूल्य रत्नहार निकालकर रख दिया- 'मेरा तात्पर्य बहुत सरल हैं, महापुजारी जी...।'

...............।' महापुजारी आश्चर्य एवं महान विस्मय से चीख उठे—'यही वह रत्नहार है...। जिसके कारण राजमहिषी त्रिधारा को आजन्म निर्वासन दण्ड का भागी होना पड़ा। यही वह रत्नहार है...जिसने श्रीसम्राट का संहार विनष्टप्राय कर दिया...वही...।'

"जी हाँ वही रत्नहार है यह। हमारे कुल का उज्जवल दीपक आज अकस्मात् हमारे समक्ष पुन: उपस्थित है...अब न जाने क्या अघटित घटना घटने वाली है....?'

"श्रीसम्राट को यह कैसे प्राप्त हुआ?'

"यह किरात नायक के पास से मिला है, जो वर्तमान युद्ध में शत्रु सेना का संचालन कर रहा है। सुनता हूं, नायक की अवस्था केवल बीस वर्ष की है...।' द्रविड़राज के मुख पर उद्वेग एवं चिंता स्पष्ट हो उठी थी।

'केवल बीस वर्ष की अवस्था में इतनी बड़ी सेना का संचालन करना असम्भव-सा प्रतीत होता है और किरातों में इतना शौर्य कहां कि वे युद्ध का तीव्र गति से संचालन कर सकें? महापुजारी बोले।

'किरात नहीं हो सकता वह महापुजारी जी।'

'श्रीसम्राट का केवल अनुमान मात्र है या विश्वास भी...?'

'न जाने क्यों हृदय में यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है, महापुजारी जी कि वह किरात नहीं हो सकता। मेरे अंत:स्थल में कौतूहल-मिश्रित हाहाकार मूत हो उठा है । उसे सहन करना असह्य हो गया हैं असीम वेदना का मार वहन करना अब मेरे लिए दुष्कर है। सांत्वना दीजिये महापुजारी जी।' द्रविड़राज ने अवरुद्ध कंठ से कहा।

महापुजारी मौन रहे।
एक क्षण के लिए उन्होंने नेत्र बंद कर न जाने क्या सोचा। तब उनकी गंभीर आकृति ने और गंभीरता धारण कर ली।

उनके नेत्रद्वय अरुणिम हो उठे। द्रविड़राज स्थिर दृष्टि से महापुजारी की उद्दीप्त मुखाकृति की और देखते रहे। 'महामाया जो कुछ करती है, अच्छा ही करती है श्रीसम्राट !' महापुजारी बोले-'प्रत्येक कार्य में उनकी आगम महिमा अंतर्हित रहती है। आपको यही उचित है कि धैर्य स्मरण कर अपनी सारी मानसिक अशांति एवं प्रलयंकार उद्वेग अपने से दूर भगा दें, इसी में आपका कल्याण है...।'

"यह असम्भव है महापुजारी जी।' द्रविड़राज व्यथित हो उठे—'मेरी दशा तो देखिये, मैं अभागा सम्राट एक साधारण व्यक्ति से भी अधिक संतप्त हूं। ऐश्वर्यवान होकर ही मैंने दुश्चिन्ता में अपना शरीर विदग्ध कर डाला है। मेरी सहायता कीजिये महापुजारी जी।'

'श्रीसम्राट क्या चाहते हैं?' महापुजारी ने पूछा।

उनके नेत्र सम्राट की मुखाकृति पर स्थिर हो गये—द्रविड़राज को ऐसा लगा मानो उन दोनों नेत्रों से दो दाहक ज्वालायें निकलकर उनके अंत:स्थल में प्रविष्ट हो गई हों और अपनी समस्त दाहक शक्ति द्वारा उनके हृदय का रक्त शोषण कर रही हों।

'मैं एक बार युद्ध में चलकर उस किरात युवक को देखना चाहता हूं।' द्रविड़राज ने कहा।

'इस से लाभ।' महापुजारी ने पूछा।

'मेरे हृदय की पुकार है यह।'

आपके हृदय में ममत्व का रोर मच रहा है, श्रीसम्राट।' महापुजारी कठोर स्वर में बोले —'सम्राट होकर आप अपने हृदय पर नियन्त्रण नहीं रख सकते।'

'मैं इस समय सम्राट नहीं, एक संतप्त व्यक्ति हूं, महापुजारी जी। मैं किसी देवी प्रकोप से अक्रांत एक दयनीय प्राणी हूं, मेरी अवस्था पर दया कीजिये-अब तक आपकी समस्त आज्ञाओं का पालन मैंने किया है, आज मेरे इस क्षुद्र अनुरोध का तिरस्कार आप न करें।'

'श्री सम्राट...!'

'अधिक विलम्ब होने से सम्भव है कोई बहुत बड़ा अनिष्ट हो जाये। जाने क्यों मेरा हृदय तीव्र वैग से प्रकम्पित हो रहा है।'

'चलिए। मैं युद्ध शिविर में चलने को प्रस्तुत हूं।' महापुजारी बोले- 'गुप्तमार्ग द्वारा चलने से हम लोग तीसरे प्रहर तक युद्ध शिविर में पहुंच जायेंगे।'

महापुजारी उठे। प्रकोष्ठ से अपना पीताम्बर लेकर कंधे पर रखा और तीव्र वेग से सम्राट के साथ बाहर हो गये।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Reply

10-05-2020, 12:35 PM,
#62
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
-- 'किन्नरी...!' चक्रवाल ने पुकारा परन्तु कुछ उत्तर न मिला। चक्रवाल ने प्रकोष्ठ के बंद द्वार पर कई थपकी दी, परन्तु भीतर से कुछ भी उत्तर न मिला। चक्रवाल को आश्चर्य हुआ एवं भय भी। न जाने प्रकोष्ठ के भीतर किन्नरी क्या कर रही है?

'किन्नरी! निहारिका...!' चक्रवाल ने पुन: कई बार पुकारा, परन्तु उत्तर न मिला था, न मिला।

चक्रवाल का हृदय आशंका से भर गया। वह किन्नरी के प्रकोष्ठ की छोटी सी खिड़की के नीचे आया। खिड़की के कपाट बंद थे, परन्तु हल्का-सा धक्का देते ही खुल गये। उसने प्रकोष्ठ के भीतर झांका। देखा, किन्नरी निहारिका अस्त-व्यस्त सी पलंग के किनारे पड़ी है। उसके नेत्र बंद है। कपोलों पर मुक्ता। सदृश अश्रु-बिन्दु झलक रहे हैं।

'निहारिका!' चक्रवाल ने तीव्र स्वर में पुकारा। निहारिका नि:शब्द रही, केवल उसका शरीर एक बार मंथरगति से प्रकम्पित हुआ एवं उसके काली घटा जैसे केश, वायु का स्पर्श पाकर आरक्त कपोलों पर लौटने लगे।

'द्वार खोलो...कब से खड़ा पुकार रहा हूं मैं...।'

'........' अब निहारिका ने धीरे से अपना मस्तक उठाकर खिड़की की ओर देखा। चक्रवाल को महान् आश्चर्य हुआ, किन्नरी की दयनीय दशा देखकर। निहारिका के नेत्र रोते-रोते एकदम रक्तवर्ण हो रहे थे।

'तुम रो रही हो...? रो रही हो तुम... मैं एक आवश्यक संदेश लेकर कब से तुम्हारे द्वार पर खड़ा हूं और तुम रो रही हो?'

"क्या करूं चक्रवाल। सब कुछ तो खो चुकी हूं उस देवता की मधुर स्मृति में, ये अश्रुकण ही तो शेष हैं जो मेरे सुख-दुख के साथी हैं। इन्हें कैसे खो सकती हूं...?'

किन्नरी ने शिथिल पैरों से आगे बढ़कर द्वार खोला। चक्रवाल भीतर प्रविष्ट हुआ।

"युद्ध-शिविर से कोई भयानक समाचार आया है....।' चक्रवाल ने कहा।

'कैसा भयानक समाचार?'

'पता नहीं, परन्तु सेना है कि युद्धक्षेत्र से एक सैनिक आया था। देखा नहीं, जब हम और तुम महापुजारीजी के पास बैठे थे, तो श्रीसम्राट ने कैसी उदीप्त भंगिमा धारण किये हुए पदार्पण किया था...याद है?'

'ओह महामाया...! क्या होने वाला है...?' किन्नरी बोली— 'मैं मरण नृत्य करना चाहती हूं चक्रवाल। मुझे कुछ ऐसी विश्वास हो रहा है कि श्रीयुवराज कदाचित् अब...।'

'कैसी बातें करती हो...।' चक्रवाल ने मधुर झिकी दी— 'महापुजारी जी एवं श्रीसम्राट में बहुत काल तक वार्तालाप हुआ है और दोनों गुप्तमार्ग द्वारा युद्ध शिविर की ओर गये हैं।'

'युद्ध-शिविर की ओर...?'सिहर उठी निहारिका—'अवश्य चिन्तनीय समाचार रहा होगा। मुझे ले चलो, चक्रवाल। मैं भी युद्ध-शिविर की ओर चलना चाहती हूं।' चलो विलम्ब न करो...उन पर जाने क्या बीत रही होगी...?'

'गुप्त मार्ग द्वारा श्रीसम्राट एवं महापुजारी जी ने प्रस्थान किया है—हम लोग कैसे चलेंगे।'

'कोई द्रुतगामी रथ की व्यवस्था करो, चक्रवाल। मेरी अवस्था पर दया करो।'

'मैं अभी व्यवस्था करता हूं।' तीव्र गति से चक्रवाल किन्नरी के प्रकोष्ठ से बाहर हो गया।

लगभग घड़ी भर पश्चात् घनघोर बनस्थली को भेदन करता हुआ एक दुतगामी रथ वायुवेग से दौड़ा जा रहा था।

चालक के स्थान पर स्वयं चक्रवाल विराजमान था एवं रथ के अंतप्रदेश में आसीन थी सौंदर्यराशि किन्नरी निहारिका।

चक्रवाल का मधुर स्वर वातावरण को सरल बना रहा था जो केलि कुंज में तुमको, कंकड़ी उन्होंने मारी। क्या कसक रही है वह अब भी, तेरे उर में सुकुमारी...|

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Reply
10-05-2020, 12:35 PM,
#63
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
चौदह

पर्णिक की माता अपने झोंपड़े में किसी आवश्यक कार्य में व्यस्त थी। उसी समय झोंपड़े के द्वार से किसी ने पुकारा—'माताजी!'

पर्णिक की माता हर्ष-विह्वल हो दौड़ पड़ी, झोंपड़ी के द्वार की ओर। उसे लगा, जैसे स्वयं पर्णिक युद्धक्षेत्र से लौट आकर स्नेहमयी वाणी में उसे पुकार रहा हो, परन्तु द्वार पर दुमुख को खड़ा देखकर उसका हृदय धड़क उठा। पर्णिक का भेजा हुआ दुर्मुर्ख अभी-अभी ही वहां पहुंचा था। 'दुर्मुख तुम...!' पर्णिक की माता आश्चर्य से बोली—'युद्ध क्षेत्र से आ रहे हो न? पर्णिक सकुशल तो है...?' ___

'हां माताजी।' दुर्मख ने उत्तर दिया-'पर्णिक सकुशल है...युद्ध की प्रगति इधर कुछ ही दिनों से बड़ी भयंकरता धारण करती जा रही है। यदि युद्ध इसी प्रकार भयावह गति से चलता रहा तो हमारी पराजय निश्चित है।'
-
'आर्य सम्राट की सेना अधिक बलशाली है क्या...?'

'आर्य सम्राट की सेना।' चौंक पड़ा दुर्मुख।

एक पल तक चुप रहकर उसने न जाने क्या सोचा। तुरंत ही उसे ध्यान हो आया कि अभी तक पर्णिक की माता यही समझ रही है कि पर्णिक की किरात सेना स्वदेश के रक्षार्थ, आर्य सम्माट से युद्ध कर रही है।

अभी तक इस बात का तनिक भी आभास नहीं होने दिया था उसने कि उसका पुत्र इस समय आर्य सम्राट की सहायता कर रहा है 'नहीं माताजी। हम लोग आर्य सम्राट से युद्ध नहीं कर रहे हैं...।' दुर्मुख ने कहा।

'आर्य सम्राट से युद्ध नहीं कर रहे हो...?' आश्चर्यचकित हो उठी पर्णिक की माता—'तब किससे युद्ध कर रहे हो तुम लोग?'

'द्रविड़राज की सेना से।' दुर्मुख बोला।

'तो आर्य सम्राट की सहायता कर रहे हो तुम लोग?' तड़प उठी बह—'जो उतनी दर से तुम्हारे देश को नष्ट करने आया है, उसी की सहायता कर रहे हो तुम लोग दुर्मुख...! अपने प्राचीन गौरव की निर्मूल कर विदेशी सत्ता की जड़ें स्थापित करना चाहते हो तुम लोग। क्या पार्णिक की सम्मति से यह सब कार्य हुआ है...?'

'जी हां माताजी। उनकी पूर्ण सम्मति से।' पर्णिक की माता का उग्ररूप देखकर दुर्मुख भयभीत हो गया था।

'पर्णिक इतना निकृष्ट कैसे हो गया? मेरी शिक्षा को उसने एकदम विस्मृत कैसे कर दिया।'

'माताजी! पहले पर्णिक आर्य सम्राट की सहायता करने को सहमत नहीं थे, परन्तु स्वयं आर्य सम्राट ने उनके पास आकर सहायता की याचना की...।'

'सहायता की याचना की और पर्णिक ने उन्हें सहायता देना स्वीकार कर लिया, क्यों?'

'नहीं, उन्होंने फिर अस्वीकार कर दिया था। परन्तु जब आर्य सम्राट आपका अपमान करने लगे—'क्या तुम्हारी माता ने तुम्हें यही सिखाया है कि अपने चरणों में आये हुए भिक्षुक को ठोकर मारकर लौटा दो तो वे चिंता में पड़ गये...।'

'.........।' चौंक पड़ी पर्णिक की माता अपनी शिक्षा का विपरीत परिणाम सुनकर।

'इसी प्रकार आर्य सम्राट ने अन्य बहुत-सी बातें कहकर आपका अनादर किया। जिसे सुनकर पर्णिक को बहुत क्रोध आया। उन्होंने आर्य सम्राट को द्वन्द्व युद्ध में पराजित कर आपके अपमान का प्रतिशोध लिया, तत्पश्चात् आपके सम्मान की रक्षार्थ उन्होंने आर्य सम्राट को सहायता देना स्वीकार कर लिया।

'मेरे सम्मान की रक्षार्थ...' पुलकित हो उठी वे, परन्तु दूसरे ही क्षण उनकी मुखाकृति परिवर्तित हो गई—'मेरे सम्मान की रक्षार्थ उसने एक विदेशी की सहायता करना स्वीकार कर लिया? मेरे सम्मान की रक्षार्थ उसने अनहोनी को होनी कर दिखाया, परन्तु उसने अपनी जन्मभूमि के सम्मान की रक्षार्थ क्या किया...?''

आवेश में रो पड़ी वे—'एक क्षुद्र जननी के लिए उसने इतना किया तो क्या जननी जन्मभूमि के लिए आत्मोत्सर्ग करना उसने आवश्यक नहीं समझा? जन्मभूमि के सम्मान से अधिक उसने मेरे अपमान को महत्त्व दिया? ओह दुर्मुख! क्या किया तुम लोगों ने? क्या यही है तुम लोगों का स्वदेशाभिमान...?'

'आज कई दिनों से हमारी पराजय हो रही है। आर्य सम्राट की असंख्य सेना को शत्रु की एक सीमित सेना शिथिल करती जा रही है। स्वयं पर्णिक जो कि आजकल आर्य सेना के प्रमुख संचालक हैं अत्यधिक आश्चर्यचकित हो उठे हैं...? कल युद्ध में एक अघटित घटना घट गई, जिसके लिए मुझे यहां तक आना पड़ा...।'

'कौन सी घटना?'

'कल मध्यान्ह में जबकि युद्ध भयानक गति पर था, पर्णिक के गले से आपका दिया हुआ रत्नहार कहीं गिर गया...।'

'गिर गया?' आश्चर्य एवं उद्वेग से चीत्कार कर उठी वे—'कहां गिर गया?'

'रणक्षेत्र में।'

'आजकल आर्य सेना किससे युद्ध कर रही है...?' पर्णिक की माता ने पुन: पूछ।

'द्रविड़राज से?'

'द्रविड़राज से...? द्रविड़राज से युद्ध हो रहा है? और पर्णिक उनके विरुद्ध आर्य सेना का संचालन कर रहा है? धड़ाम से गिर पड़ी भूमि पर।
उनके नेत्रों के समक्ष अंधकार छा गया। उनके अन्त:स्थल में हाहाकार पूर्ण कोलाहल उठ खड़ा हुआ।

'महामाया! यह सब क्या हो रहा है। आज बीस वर्षों के पश्चात् अब कौन-सा प्रलयंकारी दृश्य देखने को मिलेगा...?

' उन्हें स्नेहपूर्वक उठाते हुए सांत्वनापूर्ण स्वर में दुर्मुख बोला
—'क्या है माताजी...आप इतनी उद्विग्न क्यों हो गई?' __

'प्रलय का आह्वान कर अब पूछ हरे हो मेरी उद्विग्नता का कारण? मेरे हृदय के शत्-शत् खंड करके अब चाहते हो सांत्वना देना?'

'माताजी! यदि कोई अक्षम्य अपराध हुआ है तो उसके लिए समुदाय की ओर से क्षमाप्रार्थी हूं। कल जो आपकी आज्ञा होगी, उसके अनुसार कार्य करने को हम प्रस्तुत है।'

'आज्ञा?' एक क्षण तक कुछ सोचा पर्णिक की माता ने—'मैं इसी क्षण युद्धक्षेत्र को प्रस्थान करना चाहती हूं...यह क्या? मेरी दक्षिण भुजा फड़कने का कारण? दुर्मुख! कोई प्रलयंकारी अनिष्ट सन्निकट है। तुम एक द्रुतगामी अश्व अभी लाओ। मैं इसी समय युद्ध-क्षेत्र को प्रस्थान करूंगी, नहीं तो अनर्थ हो जायेगा, प्रलय हो जायेगा।'

दुर्मुख दौड़ गया और कुछ ही देर में एक अश्व लिए हुए आ उपस्थित हुआ। एक अश्व पर दुर्मुख और दूसरे पर पर्णिक की माता सवार हो रणक्षेत्र की और चल पड़े।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Reply
10-05-2020, 12:35 PM,
#64
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
'अब क्या होगा गुप्तचर।' उस गुप्त कन्दरा में, असहाय अवस्था में पड़े हुए आर्य सम्राट अपने गुप्तचर से कह रहे थे— 'कई प्रहर हो गये, हम लोग ऐसे बुरे फंसे कि बाहर निकलने का कोई मार्ग ही नहीं रह गया। शत्रुओं ने दोनों ओर से मार्ग बंद कर दिया। है। अब हम इसी कंदरा में शोकजनक मृत्यु को प्राप्त होंगे। युद्ध का न जाने क्या समाचार होगा? कैसे एकाएक विलुप्त हो जाने से पर्णिक न जाने क्या सोचेगा? सेना तो एकदम शिथिल पड़ जाएगी।'

'नहीं जानता था कि गुप्त कंदरा में इतना रहस्य प्रच्छन्न है, नहीं तो श्रीमान् को मैं कभी यहां आने की सम्मति न देता।' गुप्तचर ने कहा।

'हमारी सारी आशाओं का तुषारापात हो गया, हमारी सारी अभिलाषाएं धूल-धूसरित हो गई !' आर्य सम्राट हताश वाणी में बोले।
mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm
-- 'मुझे दृढ़ विश्वास है, महापुजारी।' द्रविड़राज ने कहा। द्रविड़राज एवं महापुजारी पौत्तालिक तीव्रगति से गुप्त मार्ग द्वारा युद्ध की ओर अग्रसर हो रहे थे।

उस गुप्त मार्ग में प्रकाश आने की पूर्ण व्यवस्था थी। इस समय दिन होने के कारण कन्दरा में मद्धिम प्रकाश फैल रहा था।

'महामाया करें, आपका अनुमान सत्य हो, श्रीसम्राट।' महापुजारी बोले।

'मेरे हृदय में ममत्व का दारुण रोर मचा हुआ है। अवश्य मेरा अनुमान सत्य प्रमाणित होगा।' द्रविड़राज ने कहा।

दोनों व्यक्तियों ने अपनी चाल तेज कर दी। इस समय द्रविड़राज की विचित्र दशा थी। उनके हृदय में हर्ष एवं रुदन का ज्वालामुखी फूट पड़ा था।

कभी वह चाहते थे करुण चीत्कार करना और कभी चाहते थे हर्षतिरेक से हंस पड़ना।

आज वर्षों की शोकाग्नि के पश्चात् हर्षाग्नि प्रज्जवलित हुई थीं, परन्तु उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे देवीचक्र अब भी उनके सर्वथा प्रतिकूल कार्य कर रहा है।

'यह क्या...?' द्रविड़राज एकाएक आश्चर्यचकित हो उठे अपने सामने से सुविशाल प्रवेश द्वार को बंद देखकर कहा-यह द्वार किसने बंद किया...?' क्या यहाँ बाहरी मनुष्य भी उपस्थित हैं।'

'हो सकता है कि श्रीयुवराज ही ने इसे बंद किया हो।' महापुजारी बोले। द्रविड़राज ने हाथ बढ़ाकर उस विशाल प्रवेश द्वार के पार्श्व में न जाने क्या किया। दूसरे ही क्षण बह प्रवेश द्वार धड़-धड़ शब्द करता हुआ खुल गया। द्रविड़राज एवं महापुजारी दोनों व्यक्ति चौक कपड़े, सुरंग में दूरी पर दो मनुष्यों की स्पष्ट आकृति का अवलोकन कर।

'कौन है ? कौन है? जो द्रविड़राज की क्रोधाग्नि में भस्म होना चाहता है।' द्रविड़राज का कठोर गर्जन गूंज उठा, उस गुप्त सुरंग में।

'मैं हूं। आर्य सम्राट तिग्मांशु।' दूसरी ओर से उत्तर आया।

'आर्य सम्राट तिग्मांशु ! यहां ...।' द्रविड़राज आश्चर्य से अधीर हो उठे।

उन्होंने महापुजारी की ओर देखा और महापुजारी ने उनकी ओर। दोनों व्यक्ति उस ओर बढ़े जिधर आर्य सम्राट एवं गुप्तचर खड़े हुए स्वयं द्रविड़राज के पदार्पण पर आश्चर्य कर रहे थे।

दोनों महान् सम्राट एक-दूसरे के समक्ष आ खड़े हुए। दोनों ने अपनी प्रथानुसार एक-दूसरे को अभिवादन किया। तत्पश्चात् द्रविड़राज बोले-'आर्य सम्राट से साक्षात् कर मैं अतीव प्रसन्न हुआ।'

'मेरा अहोभाग्य कि श्रीमान् के दर्शन हुए। कहा आर्य सम्राट ने।

'मगर आर्य सम्राट के यहां पधारने का कारण...?' महापुजारी ने पूछा।

'हम बंदी हैं।'

'बंदी...? बन्दी हैं आप...?' द्रविड़राज बोले-'किसने बंदी बनाया आपको...?'

'स्वयं युवराज नारिकेल ने।' आर्य सम्राट ने उत्तर दिया।

"युवराज नारिकेल...!' द्रविड़राज के मुख पर दुख के भाव प्रकट हो उठे—तनिक भी सभ्यता नहीं उसमें। नहीं जानता कि एक सम्राट के साथ, दूसरे सम्राट को किस प्रकार व्यवहार करना चाहिये।'

'परन्तु अपराध मेरा ही था, श्रीमान्। मैं आपके इस गुप्तमार्ग का पता लगाने आया था।'

'आपने अपराध किया था, परन्तु दुर्व्यवहार तो उसका दंड नहीं हो सकता। अपने घर में आये शत्रु से मित्र का सा आचरण करना ही द्रविड़कुल की परम्परा रह आई है, आर्य सम्राट।

'यहां आपके इस समय कष्ट उठाने का कारण।'

'यही बात मैं आपसे पूछना चाहता हूं, जम्बूद्वीप पर आपके असमय में आक्रमण करने का कारण...?'
द्रविड़राज के स्वर में कुछ तीव्रता आ गई।

'मित्रता का हाथ खींच लेने और याचना ठुकरा देने पर ही आक्रमण हुआ है, श्रीमान्।

' 'याचना?' आश्चर्यचकित होकर पूछा द्रविड़राज ने।

'जी हां। सहअस्तित्व की भावना निहित थी हमारी याचना में, परन्तु द्वार पर आये हुए याचक की बातों पर आपने कोई ध्यान नहीं दिया?'

'आप याचक हैं, आर्य सम्राट! आपने मुझसे भिक्षा की याचना की थी? यदि ऐसा हुआ होता तो द्रविड़राज इतने निकृष्ट नहीं थे। क्या आपकी सभ्यता में इसी को याचना कहते हैं? क्या आपके धर्म का यही उपदेश है कि जो भिक्षा न दे, उस पर बल प्रयोग कर भिक्षा प्राप्त करें।

'....' आर्य सम्राट मौन रहे।

'कहते हैं, आपने भिक्षा मांगी थी...।' क्या भिक्षा दत भेजकर मांगी जाती है और दत को यह कहने का भी अधिकार दिया जाता है कि भिक्षा न देने पर बलपूर्वक सर्वस्व अपहरण कर लिया जायेगा? यदि भिक्षा मांगनी थी तो उचित था कि आप स्वत: हमारे समक्ष उपस्थित होते और महापुजारी जी के चरणों पर मस्तक रखकर दया की भिक्षा मांगते। यदि महापुजारी जी का दयार्द्र हृदय आपकी पुकार पर द्रवित होता तो मैं उनकी आज्ञानुसार अपना सारा साम्राज्य आपके चरणों में अर्पित कर देता।'

'अब तक मैं अपनी नीति के अनुसार कार्य करता हूं...।' आर्य सम्राट बोले।

"ओह !' हंस पड़े द्रविड़राज'आपने सोचा था कि जिस प्रकार अन्य माण्डलिक राजाओं ने आपका आधिपत्य स्वीकार कर लिया है, उसी प्रकार द्रविड़राज भी कर लेंगे। यह भी नहीं समझा था आपने कि द्रविड़राज में आत्मसम्मान है, देश पर बलिदान हो जाने की भावना है। आपने बलप्रयोग की धमकी दी थी। आज संयोगवश हम दोनों का साक्षात्कार हो गया है। हम लोग आज निश्चय कर लेंगे कि कौन किस प्रकार बलप्रयोग कर सकता है।'

"आर्य सम्राट का कृपाण विपक्षी पर आघात करने के लिए सदैव प्रस्तुत रहता है, श्रीमान्।' आर्य सम्राट ने कहा।

'धन्यवाद...।' द्रविड़राज बोले—'यहां पर्याप्त स्थान नहीं है, मेरे साथ आइये।' द्रविड़राज आगे बढ़ चले। एक स्थान पर सुरंग बहुत प्रशस्त थी। वहीं आकर वे रुक गए। द्रविड़राज एवं आर्य सम्राट ने अपने-अपने कृपाण संभाल लिए। दोनों प्रतिद्वन्द्वी एक-दसरे के समक्ष खड़े होकर घात-प्रतिघात करने में तल्लीन हो गए। कृपाणों की भयानक झंकार से गुप्तमार्ग गुंजरित होने लगा।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Reply
10-05-2020, 12:36 PM,
#65
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
पंद्रह
यह पर्णिक के ही बुद्धि चातुर्य का परिणाम था कि आर्य सेना अब तक युद्ध में संलग्न थी।
आर्य-सम्राट तिग्मांशु का विलुप्त होना अत्यंत सावधानीपूर्वक गोपनीय रखा गया था। केवल दो-चार गुप्तचरों एवं स्वयं पर्णिक के अतिरिक्त आर्य सेना का कोई व्यक्ति आर्यसम्राट के विलुप्त होने की बात नहीं जानता।

इस समय भी आर्य-सेना पूर्ण वेग से आक्रमण-प्रत्याक्रमण कर रही थी। समरांगण में रक्त की सरिता प्रवाहित हो रही थी। प्रत्येक सैनिक अपने विपक्षी पर विजय पाने की आशा से ओत प्रोत था।

एक सुंदर अश्व पर आसीन् पर्णिक अतीव चतुरतापूर्वक आर्य सेना का संचालन कर रहा था।

द्रविड़ सेना का नामधारी संचालक धेनुक, क्रोधोन्मत्त होकर तीक्ष्ण कृपाण से शत्रु का मान मर्दन कर रहा था।

उसका अतुलित पराक्रम देखकर द्रविड़ सैनिक उत्साहित होकर शत्रुओं का प्रबल आक्रमण कर रहे थे।

पर्णिक को महान् आश्चर्य हुआ, द्रविड़ों की उस छोटी-सी सेना को विकराल आर्य सेना से सफलतापूर्वक युद्ध करते हुए अवलोकन कर। साथ ही उसे क्रोध भी हो आया, धेनुक का प्रलव सदृश सहारा देखकर।

'सावधान विपक्षी के संचालक उसने गर्जन किया।

'आर्य सेना के संचालक को विदित हो...।' धेनक बोला—'कि मझ जैसे क्षद्र सैनिक को संचालक कहकर अपने उस महान् व्यक्ति का अपमान किया है, जो द्रविड़ सेना का वास्तविक संचालक है...धेनुक इस अपमान का प्रतिशोध लेने को तत्पर है।'

"आ जाओ। आज पर्णिक का भी हस्त-कौशल देख लो....मैं देखना चाहता है कि द्रविड़ सेना का यह गुप्त संचालक है कौन? मैं प्रण करता हूं, आज मैं वह प्रलयवर्षा करूंगा कि बाध्य होकर उस गुप्त संचालक को युद्ध भूमि में आना ही होगा।'
-- ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Reply
10-05-2020, 12:36 PM,
#66
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
अपने शिविर में बैठे हुए युवराज नारिकेल, सैनिक द्वारा लाये हुए युद्ध के समाचारों को प्रतिक्षण सुन रहे थे एवं उसे आवश्यक आज्ञा देकर पुन: रणक्षेत्र की ओर भेज रहे थे, परन्तु उनका हृदय आज न जाने क्यों अत्यधिक व्यग्न था।

सहसा युवराज का ध्यान भंग हो गया—युद्धभूमि से आये एक सैनिक का आर्तनाद सुनकर।

'अनर्थ! प्रलय! विनाश!' उस सैनिक के मुख से स्पष्ट स्वर निकल रहा था।

'क्या है. . है क्या...?' युवराज को घोर आश्चर्य हुआ उस सैनिक को पत्ते की तरफ कांपते देखकर।

'धेनुक मारा गया, श्रीयुवराज! आर्य सेना का प्रबल वेग सम्भालना असम्भव हो गया है...द्रविड़ सेना तीव्र बैग से पलायन कर रही है।'

"पलायन!' तड़प उठे युवराज।

'जी हां, श्रीयुवराज। यदि शीघ्र ही आप युद्धक्षेत्र में पदार्पण न करेंगे तो कुछ ही क्षणों में आर्य सेना...चलिए श्रीयुवराज, विलम्ब न कीजिये। बिना आपके चले द्रविड सेना के पैर स्थिर नहीं हो सकते।

'असंयत न होओ सैनिक युवराज गंभीर स्वर में बोले—'मैं चलता हूं, मेरा अश्व ठीक करो।'

वह सैनिक दौड़ता हुआ शिविर से बाहर चला गया। युवराज ने अतिशीघ्र सैनिक वस्त्र धारण किये और शिविर से बाहर आ गये। दो अश्व प्रस्तुत थे। एक पर उछलकर युवराज आसीन हो गये और दूसरे पर वह सैनिक तीव्र वेग से दोनों व्यक्तियों ने रणभूमि की ओर प्रस्थान किया। धेनुक के धराशायी होते ही समस्त द्रविड़ सेना हतोत्साह हो गई और उस समय जबकि आर्य सेना ने उन पर प्रबल शक्ति द्वारा आक्रमण करना प्रारंभ कर दिया तो द्रविड़ सेना रुक न सकी और भाग चली इधर-उधर जंगल व पहाड़ों के मध्य।

आर्य-सेना अपनी विजय पर हर्षोल्लास हो जय-जयकार कर उठी।

'ठहरो...।' विद्युत के समान युवराज का तीव्र गर्जन, सूर्य छिद्र से चतुर्दिक गूंज उठा।
तीव्र गर्जन के साथ ही भागती हुई द्रविड़ सेना के पैर जहां के तहां रुक गये, मानो किसी देवी शक्ति ने उनके पैर भूमि पर जकड़ दिये हों _ 'लौट जाओ...!' वीरत्व पर लगे कलंक को अपने रक्त से धो डालो-अपने शोणित से तृषित मेदिनी की तृष्णा शांत कर दो।' युवराज को देखते ही द्रविड़ सेना का उत्साह द्विगुणित हो गया।

पलकमात्र में द्रविड़ सेना पुन: रणभूमि की ओर पलट पड़ी। देखते ही देखते पुन: घोर युद्ध प्रारंभ हो गया।

युवराज नारिकेल अपनी तीक्ष्ण कृपाण से शत्रुओं को गाजर मली की तरह काटने लगे। उनका हस्त-लाघव देखकर द्रविड़ सेना अतीव उत्साह के साथ शत्रुओं का मर्दन करने लगी। एक क्षण में ही आर्य सेना में हाहाकार मच गया।

द्रविड़ सेना का वह गुप्त संचालक रण में आ पहुंचा है श्रीमान्। एक सैनिक ने दूर खड़े हुए पर्णिक से कहा- देखिये, भागती हुई द्रविड़ सेना पुन: लौट पड़ी है और चपलतापूर्वक हमसे युद्ध कर रही हैं ऐसा ही बंग रहा तो हमारा पराजय निश्चित है।'

'मैं देखता हूं उस गुप्त संचालक को...।' पर्णिक तीव्रगति से उस ओर बढ़ा। दूसरे ही क्षण दोनों सेनाओं के संचालक एक-दूसरे के समक्ष खड़े थे, आश्चर्यचकित नेत्रों से एक-दूसरे को देखते हुए।

"किरात कुमार पर्णिक!' युवक के मुख से आश्चर्यचकित स्वर निकल पड़ा। भला उस किरात युवक को वे भूल कैसे सकते थे जिससे एक दिन भयानक वनस्थली के मध्य युद्ध हुआ था।

'युवराज आप!' पर्णिक की आश्चर्यचकित हो उठा।

'ओह !' इतने दिनों के पश्चात् आज हम लोगों का मिलन हो रहा है।

"हां युवराज! और ऐसे स्थान पर, ऐसे सुखमय वातावरण में कि हम दोनों अपनी विगत शत्रुता की अग्नि-ज्वाला को भली प्रकार शांत कर सकते हैं' पर्णिक बोला।

'यथार्थ कहते हो तुम। महामाया की कृपा से हमारे हृदयों में प्रज्जवलित प्रतिशोधाग्नि की प्रखर ज्वाला ने अन्ततोगत्वा हम दोनों को एक अत्यंत उचित स्थान पर एकत्रित कर ही दिया। यह युद्ध स्थल है और हम दोनों हैं एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी। आज हम दोनों की आकांक्षाएं अवश्य पूर्ण होगी, किरात कुमार।' युवराज ने कहा। __

'पर्णिक प्रस्तुत है, युवराज! आइये, आज हमारी शक्ति का निर्णय हो जाये।' पर्णिक ने अपना कार्मुक हाथ में ले लिया।

'तुम मेरे शत्रु हो और स्वदेशद्रोही भी...तुमने स्वदेश की पुकार के विरुद्ध विदेशी की सहायता की है, अत: तुम्हें प्राणदंड देना मेरा परम कर्तव्य है। युवराज ने भी अपना कामुक निकाल लिया।

पर्णिक ने कार्मुक पर तीर चढ़ाया और युवराज ने थी।

कान तक कार्मुक खींचकर पर्णिक ने अपना तीर युवराज के वक्ष को लक्ष्य करके छोड़ दिया।

युवराज के भी कार्मुक से तीव्र वेग से तीर निकला और बीच में ही दोनों तीर आपस में टकराकर छिन्न-भिन्न हो भूमि पर गिर पड़े।

इस बार युवराज ने तीर छोड़ा, परन्तु रण-विशारद पर्णिक ने युवराज के तीर का लक्ष्य अपने तीर से विलक्ष कर दिया। दोनों ओर से तीरों को बौछार होने लगी।
-- ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Reply
10-05-2020, 12:36 PM,
#67
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
'संभालिए, आर्य-सम्राट!' द्रविड़राज बोले। इस समय उस प्रशस्त सुरंग में आर्य-सम्राट एवं द्रविड़राज परस्पर युद्ध में तल्लीन थे। घड़ी भर में कृपाण युद्ध हो रहा था, परन्तु अभी तक कोई भी किसी पर विजय नहीं पा सका था।

दोनों सम्राट नाना प्रकार के कौशल, युद्ध में प्रयोग कर रहे थे। महापुजारी एवं गुप्तचर खड़े थे, मौन होकर।

'अद्भुत है। आपका प्रतिघात अद्भुत है, द्रविड़राज।' आर्य सम्राट आश्चर्य से बोले।

'सावधान आर्य सम्राट।'

'द्रविड़राज का कृपाण प्रबल वेग से लपका आर्य-सम्राट की ओर परन्तु आर्य-सम्राट ने अतीव सावधानी से उस प्रतिघात का निवारण कर लिया।

'द्रविड़राज को विदित हो।' आर्य-सम्राट केवल एक ही व्यक्ति द्वारा पराजित हुए हैं—अन्यथा इस संसार का कोई वीर सम्राट को विजित नहीं कर सका है...।'

द्रविड़राज कुछ न बोले। उनका घात-प्रतिघात तीव्र वेग से चल रहा था।

आर्य-सम्राट अत्यंत ही विस्मयग्रस्त होकर बोले—'आश्चर्य है द्रविडराज, आपकी युद्ध प्रणाली एकदम वैसी ही है जैसी किरात नायक पर्णिक की।'

'किरात-नायक पर्णिक आश्चर्य-विस्फारित नेत्रों से आर्य-सम्राट की ओर देखते हुए बोले द्रविड़राज। _

'जी हां। उस युवक से मैं युद्ध कर चुका हूं वह भी आप ही जैसा घात-प्रतिघात करता है...इस संसार में केवल वही व्यक्ति है, जिसने आर्य-सम्राट को पराजित किया है।'

'उसने पराजित किया है आपको?' विस्मय से द्रविड़राज पूछ बैठे—'उस बच्चे ने आपको पराजित किया है? आश्चर्य!' और द्रविड़राज का कृपाण रुक गया—'मुझे अब आपसे युद्ध करने की आवश्यकता नहीं।'

'क्यों?'

'जब आप उस बच्चे को पराजित न कर सके तो मुझ पर विजय पाना आपकी दुराशा मात्र है।' द्रविड़राज ने कहा।

परन्तु न समझ सके आर्य-सम्माट द्रविड़राज की इस अद्भुत पहेली को। कुछ अस्थिर होकर उन्होंने शीघ्रता से कहा।
'हैं मेरे बाम नेत्र के इस तरह फड़कने का कारण....?' चलिए महापुजारी जी, अत्यधिक विलम्ब हो गया...अब रणक्षेत्र की ओर चलना परम आवश्यक है....सन्ध्याकाल सन्निकट है।'

'सन्निकट है...अब आपकी मृत्यु सन्निकट है युवराज सावधान !' पर्णिक ने कृपाण का भरपूर घात किया युवराज पर, परन्तु युवराज ने अतीव शीघ्रतापूर्वक उस घात को रोक लिया।

जब दोनों विकट प्रतिद्वन्द्वी बाण-युद्ध में एक-दूसरे पर विजय। प्राप्त कर सके, तो कृपाण-युद्ध में तल्लीन हो गये।

आर्य एवं द्रविड़ सेनायें अपने संचालकों का यह विकट युद्ध देखकर देखकर अतीव उत्साह के साथ युद्ध कर रही थीं।

'तुमने हमारे कुल के पवित्र रत्नाहार की चोरी की थी पर्णिक तुम्हारा अपराध अक्षम्य है।' युवराज ने कहा।

'मैंने आपका रत्नहार चुराया है, युवराज...!' पर्णिक व्यंग्यपूर्ण स्वर में हुंकार उठा —'असत्य है यह बात-मेरी माताजी का वह रत्नहार था। आप असत्य भाषण करने का दुस्साह न करें।

'दुस्साहस...!' क्रोध से कांप उठे युवराज और उनका कृपाण वायुमंडल में नृत्य कर उठा तीन वेग से।

'अस्त्र-संचालन परिहास नहीं है युवराज। पर्णिक को सरलता से परास्त करना परिहास नहीं...।' पर्णिक ने सावधान किया।

'साबधान किरात कुमार ... !' युवराज गरजे—'मेरा घात सम्भालो।' युवराज का कृपाण पर्णिक की ओर लपका। पर्णिक ने अपना कृपाण, घात के निवारणार्थ युवराज के कृपाण के आगे कर दिया। परन्तु युवराज का प्रहार इतने प्रबल वेग से हुआ कि पर्णिक का कृपाण भयानक झन्नाटे के साथ उसके हाथों से छूटकर दूर जा गिरा।

युवराज का कृपाण सन्निकट ही था कि पर्णिक के वक्ष में प्रवेश कर अपनी रक्त-पिपासा शांत करता परन्तु न जाने क्यों युवराज का हाथ एकाएक कांप गया।

उनका हृदय करुण चीत्कार कर उठा। 'रुक क्यों गये युवराज...?' पर्णिक ने गर्वयुक्त वाणी में कहा—'शत्रु की दया का मैं आकांक्षी नहीं। आप विजेता हैं—मेरे रक्त से अपनी कृपाण की प्यास बुझा लें...आप न जानते होंगे युवराज–कि पर्णिक की माता ने उसे वीरतापूर्वक मरना सिखाया है।'

'और तुम नहीं जानते होंगे, पर्णिक युवराज बोले-'कि युवराज के पिता ने उन्हें निर्बलों को क्षमा कर देने की सीख दी है।'
Reply
10-05-2020, 12:36 PM,
#68
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
"धन्य हैं आपके पिता...।'

'केवल मेरे ही पिता नहीं, तुम्हारी भी पिता-जम्बद्वीप के प्रत्येक प्राणी के पिता है वे।' युवराज बोले-'अपना कृपाण उठाओ...अभी तुमसे मेरी रणलालसा शांत नहीं हुई है....।'

युवराज ने पर्णिक का कृपाण स्वयं उठाकर उसके हाथ में दे दिया।

'युवराज बड़े सहृदय हैं...।' पर्णिक ने कहा। दोनों दुर्दान्त प्रतिद्वन्द्वी कृपाण युद्ध में संलग्न हो गये।

पुन: दोनों की मुखाकृति पर क्रोध की लालिमा दौड़ गई और दोनों एक-दूसरे पर भयंकर घात-प्रतिघात करने लगे।
उसी समय उच्च-स्वर में एक श्रृंगाल आर्तनाद कर उठा।
--
. ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
श्रृंगाल आर्तनाद कर रहे हैं अंग फड़क रहे हैं...सर्वनाश होने वाला है, चक्रवाल।'

'महामाया का स्मरण करो...।' चक्रवाल ने गंभीर स्वर में कहा। इस समय रथ घनघोर जंगल के मध्य से चला जा रहा था। स्वयं चक्रवाल रथ संचालन कर रहा था और भीतर बैठी थी किन्नरी निहारिका। उसका हृदय तीव्रगति से स्पन्दित हो रहा था।

"रथ और वेग से चलाओ चक्रवाल...। संध्या सन्निकट है. न जाने क्यों हृदय-प्रदेश पर एक अनिर्वचनीय भय की सृष्टि होती जा रही है। मुझे शीघ्र से शीघ्र रणक्षेत्र में पहुंचा दो। मैं उन्हें एक बार देखना चाहती हूं-केवल एक बार।' उसके नेत्रों में अश्रु-कण झिलमिला उठे थे।

'यह तुम क्या कह रही हो...?'
'ऐसा प्रतीत होता है, चक्रवाल ! मानो शीघ्र ही मेरा सर्वनाश होना चाहता है। तुम मेरे ऊपर दया करो। रथ और बैग से ले चलो।'

चक्रवाल ने अश्वों को चाबुक मारी। अश्व तीव्र गति से भाग चला। रथ के भारी पहियों द्वारा उठता धड-धड़ शब्द शून्य बनस्थली को कम्पित करने लगा।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
'जी चाहता है, सदैव इसी प्रकार हमारा तुम्हारा युद्ध होता रहे।' युवराज कहते रहे थे –'दिवस के प्रोज्जवल प्रकाश में, रात्रि के प्रगाढ़ अंधकार में, ग्रीष्म की विदग्धकारी ऊष्णता में, वर्षा के अविरल बिन्दुपात में एवं हेमन्त की शीतलता में हमारे ये कृपाण इसी प्रकार संचालित रहें। ओह! कितना अच्छा प्रतीत हो रहा है, तुमसे युद्ध करना पर्णिक, अद्भुत हो तुम...?'

'युवराज अन्यमनस्क क्यों होते जा रहे हैं?'

'नहीं तो...अब तो हम अनन्त काल तक युद्ध करने में तल्लीन रहेंगे। वह देखो, सूर्य की अंतिम किरणे अस्तांचल की ओट में अन्तर्हित होने जा रही हैं। प्रतीच्याकाश पर रक्त रंजित प्रदोष का नृत्य क्या ही मनोरम प्रतीत हो रहा है। तुम देख रहे हो न...?'
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
-- 'देख रही हूं, वह युद्ध शिविर है न?' पर्णिक की माता ने सामने के शिविरों की और संकेत कर दुर्मुख से पूछा। दुर्मुख ने मस्तक हिलाकर स्वीकृति दी। दोनों इस समय आर्य-शिविर के सन्निकट आ पहुंचे थे। 'मुझे शीघ्र उस स्थल पर ले चलो, जहां युद्ध हो रहा है।' पर्णिक की माता ने कहा और घोड़े से उतर पड़ी बह।

द्रविड़राज युगपाणि भी आर्य सम्राट एवं महापुजारी के साथ अभी-अभी ही गुप्त मार्ग से बाहर निकलकर युद्ध शिविर में पहुंचे थे।

पर्णिक की माता की दृष्टि द्रविड़राज पर घड़ी और द्रविड़राज की दृष्टि पर्णिक की माता पर। एक क्षण के लिए दोनों स्तब्ध रह गये 'राजमहिषी...!' आर्त स्वर में पुकारा द्रविड़राज ने।

'नाथ...।' दौड़कर पर्णिक की माता गिर पड़ी उनके चरणों पर।

'प्रिये...।' हर्षतिरेक से द्रविड़राज के मुख से शब्द ही नहीं निकल रहे थे—'मुझे क्षमा कर दो देवी।'

वे थीं राजमहिषी त्रिधारा।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Reply
10-05-2020, 12:36 PM,
#69
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
- - 'अब रहने दीजिये युवराज। संध्या का आगमन हो रहा है, अब युद्ध स्थगित कर देना चाहिये।' पर्णिक ने कहा।

"अब तो युद्ध रुकना असम्भव है पर्णिक संध्या का आगमन एवं रात्रि का प्रगाढ़ अंधकार इस युद्ध में बाधा नहीं पहुंचा सकते...।' युवराज ने कहा।

उन पर न जाने कैसा उन्माद-सा छा गया था। पर्णिक धीरे-धीरे क्रुद्ध होता जा रहा था, युवराज का युद्ध के लिए हठ देखकर।

'अब बचाना युवराज।' वह चिल्लाया और उसका कृपाण प्रलयंकर गति से युवराज की ओर बढ़ा।

युवरजा इस समय कुछ भूले-से हो रहे थे। उनके नेत्र पश्चिमाकाश की अरुणिमा पर केन्द्रित हो रहे थे। पर्णिक की तड़प सुनकर वे सचेत हुए। उन्होंने प्रतिघात के अपना कृपाण सम्भाला। उसी समय दौड़कर आते द्रविड़राज का स्वर गूंज उठा युद्धस्थली में— 'युवराज रोक लो कृपाण...!'

झटके के साथ युवराज का कृपाण रुक गया, अपने पिता का स्वर सुनकर। परन्तु पर्णिक का कृपाण न रुका। तीव्र वेग से आते हुए विकराल कृपाण ने युवराज के वक्ष का चुम्बन कर ही लिया। उनके मुख से एक करुण चीत्कार निकलकर दिशाओं को प्रताड़ित कर उठी। वे चेतनाहीन होकर भूमि पर गिर पड़े—कटे हुए वृक्ष की तरह। घाव भयानक था।

'क्या हुआ...? क्या हुआ...?'द्रविड़राज दौड़े आये युवराज के पास। पर्णिक की माता भी आई। देखा—युवराज का जीवन प्रदीप बुझने के समीप था।

'युवराज! मेरे लाल...।' द्रविड़राज रो पड़े। __

'पिताजी...?' युवराज ने नेत्र खोले—'मैंने अपने विपक्षी पर विजय पाई है। द्रविडराज की उज्जवल कीर्ति पर कलंक-कालिमा नहीं लगाने दी है...मैंने उसे निर्बल जानकर क्षमा कर दिया है।

'कौन है तुम्हारा वह विपक्षी युवराज?

"वह है पिताजी...। यह ... यही एक दिन जंगल में मुझसे मिला था...।' युवराज ने अपने अशक्त करों से पर्णिक की और संकेत किया, जो इस समय प्रस्तरवत् खड़ा आश्चर्यचकित नेत्रों से आश्चर्यमय घटना देख रहा था।

'यही है तुम्हारा विपक्षी...?' द्रविड़राज हाय कर उठे—'वत्स! यह तुम्हारा लघु भ्राता है।'

'लघु भ्राता...।' युवराज कांप उठे।

उन्होंने उठने का प्रयत्न किया, परन्तु चेतनाहीन होकर गिर पड़े। पर्णिक ने झपटकर उन्हें संभाला। धीरे-धीरे युवराज ने पुन: अपने नेत्र खोले।

पर्णिक ने देखा, उन नेत्रों में मृत्यु की स्पष्ट छाया विराजमान है। अब जीवन की आशा दुराशामात्र है।

"पर्णिक!' युवराज ने कांपते स्वर में पुकारा। 'भ्रातृवर...' रो पड़ा अभागा पर्णिक—'मुझे क्षमा करो भ्रातृवर।'

और युवराज ने पर्णिक के मस्तक पर अपना शिथिल हाथ रख दिया। पर्णिक की माता चेतनाहीन होकर एक और लुढ़की पड़ी थी। महापुजारी उन्हें चेतना में लाने का प्रयत्न कर रहे थे।

'आपने हमें विनष्ट कर दिया आर्य-सम्राट!' द्रविड़राज बोले। आर्य-सम्राट सिक्त नेत्रों से यह सारा दृश्य देखते हुए खड़े थे।

'हम क्षमा चाहते हैं द्रविड़राज। हम हारे, आप जीते। कल हमारी सेना जम्बूद्वीप से प्रस्थान कर देगी | आर्य सम्राट तिग्मांशु बोले।

'नहीं आर्य सम्राट! आपने जिस लालसा से जम्बूद्वीप में पदार्पण किया है वह अवश्य पूर्ण होगी...यह देखिये, आज युगों की असहनीय ज्वाला में विदग्ध होने के पश्चात यह देवी मुझे प्राप्त हुई है। एक दिन मैंने अपने इसी मुख द्वारा इन्हें आजन्म निर्वासन की दण्डाज्ञा सुनाई थी और आज इसी अपने अधूरे न्याय पर पश्चाताप कर रहा हूँ। इन्होंने न्याय धर्म का पालन किया था, परन्तु पति धर्म का पालन में न कर सका था। आज इस देवी के साथ में भी निर्वासन दण्ड स्वीकार कर पति धर्म पालन करूंगा...आज से यह सारा विशाल साम्राज्य आपका है और वह मेरा पर्णिक आपका सहकारी...आप भिक्षुक हैं...मैंने आपको अपना विशाल साम्राज्य एवं वीर पुत्र प्रदान कर दिया। द्वार पर आये हुए भिक्षुक को द्रविड़राज निराश नहीं लौटाते, आर्य-सम्राट! अब हम दोनों पति-पत्नी जंगलों में विचरण करते हुए निर्वासन दण्ड की पूर्ति करेंगे।'

और द्रविड़राज फूट-फूटकर रो पड़े। आर्य सम्राट के नेत्रों से भी अश्नु-बिन्दु गिरकर भूमि का सिंचन करने लगे। --

नोट : यह इतिहास प्रसिद्ध बात है कि द्रविड़ और आर्यों के युद्ध के पश्चात् यह सारा देश आर्यों के हाथ में आ गया था। इसे हमने इस प्रकार दिखाया है कि द्रविड़राज ने आर्य सम्राट को साम्राज्य प्रदान कर दिया। पाठकों। यह उपन्यास ऐतिहासिक प्रतीत होगा, परन्तु वास्तव में ऐतिहासिक नहीं है—हिस्टोरीकल टच मात्र दिया गया है इस उपन्यास में जिस काल का वर्णन है, यदि उस काल के इतिहास से पाठक मिलान करने लगेंगे, तो इसमें बहुत-सी अत्युक्तियां पायेंगे।
—लेखक

द्रविड़राज के नेत्रों की ज्योति क्षीण होती जा रही थी। उनकी म्लान मुखाकृति पर मृत्यु के क्रूर लक्षण दृष्टिगत होने लगे थे। उनके मरणासन्न हृदय में भयानक अंधकार प्रसार पाता जा रहा था। उसी प्रगाढ़ अंधकार में युवराज ने देखा कलामयी किन्नरी की मनोहारी प्रतिमा। युवराज का शरीर उस प्रतिमा को देखकर प्रकम्पित हो उठा। एक क्षण के लिए उनके नेत्रों की ज्योति लौट आई।

उन्होंने देखा, किन्नरी निहारिका विह्वल भंगिमा लिए उसी ओर एक रथ पर से उतरकर दौड़ी जा रही है और गायक चक्रवाल भी उसके पीछे भागा आ रहा है। उसके नेत्रों से अश्रुकण लुढ़ककर उसके गालों को भिगो रहे हैं।
Reply

10-05-2020, 12:36 PM,
#70
RE: RajSharma Sex Stories कुमकुम
'किन्नरी!' युवराज के मुख से अस्फुट स्वर निकले।

'देव!' किन्नरी हाहाकार करती हुई युवराज के रक्तरंजित शरीर पर पछाड़ खाकर गिर पीड़ी।

'किन्नरी! कलामयी!'

'देव...!' यह क्या हो गया, देव। तुमने मुझसे ऐसा छल क्यों किया...?' किन्नरी ने अपनी हथेलियों से युवराज का मुख पकड़ लिया—'बोलो देव! मुझे असहाय बनाकर तुम्हें क्या मिला? मुझे विनष्ट कर देने में तुम कौन-सी निधि पा गये—मुझसे नाता तोड़कर तुमने कौन सा संसार बसा लिया...?' किन्नरी के आरक्त कपोल अश्रु धारा से भीग गये थे।

चक्रवाल एक वृक्ष के नीचे अश्रुपूर्ण नेत्रों से खड़ा था। 'तुम मुझे छोड़कर जा रहे हो, सदैव के लिए जा रहे हो...कहां जा रहे हो, देव...न जाओ। मेरा संसार नष्ट कर, तुम अपना दूसरा संसार बसाने न जाओ।'

'जाना ही होगा किन्नरी...।' युवराज अत्यंत शिथिल वाणी में बोले—'यमदूत मेरा आह्वान कर रहे हैं...मैं प्रसन्न हूं-अत्यंत प्रसन्न हूं, शोक केवल इस बात का है कि नन्दन कानन में समग्र ऐश्वर्य की प्राप्ति करके भी, तुम्हारी मधुर मूर्ति का दर्शन न कर सकुंगा-जहां चन्द्र एवं तारागणों की कला अवलोकन करने को मिलेगी-वहां तुम्हारी मुग्धकारी कला न मिल सकेगी देखने को....।'

'तुम जो रहे हो स्वर्गीय अप्सराओं की कला का रसास्वादन करने, तुम भूल जाओगे इस भू किन्नरी की कला को? जाओ। मेरा संसार विनष्ट कर देने से, यदि तुम्हारा संसार हरा-भरा हो सके तो जाओ। मेरे हृदय में अनिर्वचनीय आनंद की सृष्टि कर, अब सदैव के लिए चले जा रहे हो, मधुर प्रेम का नाता तुड़ाकर...।'

'तुड़ाकर सभी से मधुर प्रेम नाता।
चढ़ा भाग्य की नाव पर बहा जा रहा हूं।' चक्रवाल गाने में तन्मय था।

ऐसा न कहो न कहो, कलामयी! मेरा रोम-रोम तुम्हारी सर्वतोमुखी कला द्वारा परिपूर्ण है। मैं ही जानता हूं कि तुम्हें सदैव के लिए त्याग देने में मुझे कितनी वेदना हो रही है, मैं कितना व्यथित हूं।'

युवराज के मुख से रक्त की धार बह चली, परन्तु वे शिथिल एवं अस्फुट-स्वर में कहते ही गये—'तुम्हारी कला! ओह...उसका स्मरण न दिलाओ, कलामयी। तुम्हारी कला पर यदि सब-कुछ निछावर कर दूं तो भी वह पूर्ण नहीं हो सकती। जब तुम अपनी समग्र प्रभा का एकत्रीकरण कर, अपनी सम्पूर्ण कला का संचरण कर, महामाया के समक्ष नृत्य करती थीं तो मुझे ऐसा लगता था मानो तुम्हारे अवयव के संचालन के साथ जगत के यावत कार्य संचालित हो रहे हैं, मानो तुम्हारे नृत्य के साथ-साथ प्रकृति नटी का समस्त सौंदर्य नर्तन करने में तल्लीन है। मैं तुम्हारा यह अपूर्व नर्तन अवलोकन करते-करते मुग्ध हो जाता था, आत्मविस्मृत-सा हो उठता था, उस समय तुम कलामयी ! सुंदर प्रतिमा-सी प्रतीत होती थी। देवी-सा प्रोज्जवल मुख हो जाता था तुम्हारा। मानो स्वयं जगत् रचयित्री देवी महामाया अपने अपूर्व नर्तन से अपनी शक्ति की प्रभा बिखेर रह हो। उस समय मैं स्वयं मातेश्वरी महामाया का प्रतिरूप मानकर, तुम्हें भक्तिपूर्वक सादर प्रणाम करता था। तुम्हारा सौंदर्य मातेश्वरी महामाया-सा देदीप्यमान है, कलामयी? जहाँ उपासना की सद्भावना विराजमान है, वहां कलुषता की कालिमा का आभास कहां ...।'

युवराज की वाणी अवरुद्ध होनी लगी। उनके मुख पर आसन्न मृत्यु के स्पष्ट लक्षण प्रकट होने लगे। फिर भी उनके मुख से अत्यंत क्षीण स्वर निकला—'अब विदा दो कलामयी...।'

उनके नेत्रों से अश्रुकण प्रवाहित हो चले। निहारिका उनके मुख की ओर अपलक नयनों से निहारती रही। निहारो नयीं प्रयेसी राह पर अब, सदा के लिए मैं चला जा रहा हूं। तुड़ाकर सभी से मधुर प्रेम नाता, चढ़ा भाग्य की नाव पर बहा जा रहा हूं। एक वृक्ष के नीचे बैठा हुआ चक्रवाल सिक्त स्वर में गा रहा था। किन्नरी ने अपने आंचल द्वारा युवराज के अथकण पोंछ पुन: आंचल के छोर से थोड़ा-सा कुंकुम निकालकर युवराज के ललाट पर लगा दिया।

युवराज का शरीर तीव्र वेग से कम्पित हो उठा। वायु गर्जन करता हुआ प्रवाहित होने लगा। वृक्षों पर बैठे हुए पक्षीगण आर्तनाद करते हुए दूर उड़ चले। किन्नरी निहारिका युवराज के निर्जीव शरीर पर चेतनाहीन होकर गिर पड़ी। शीघ्र ही चंदन की चिता तैयार की गई। उस पर युवराज का निर्जीव शरीर रख दिया गया। रुदन करते हुए पर्णिक ने अपने देवतुल्य भ्राता की चिता में अग्नि दी। अश्नुपूर्ण नेत्रों से महापुजारी पौत्तालिक ने महामाया का प्रार्थना की एवं शांति पाठ पड़ा। वायु का वेग पाकर चिता की प्रखर ज्वाला धू-धू कर प्रज्जवलित हो उठी।

और उसी के साथ-साथ प्रज्जवलित हो उठा निहारिका का सन्तप्त हृदय। उसने अपने कंठ प्रदेश से वह रत्नमाला एवं अनामिका से मुद्रिका निकाली, जिसे स्वयं युवराज नारिकेल ने उसे प्रदान किया था।

एक क्षण तक वह कुछ विचार करती रही, तत्पश्चात हाथ बढ़ाकर उसने वे दोनों वस्तुएं उस प्रज्जवलित चिता की गोद में फेंक दी।
चक्रवाल देख रहा था। वह दौड़कर उसके पास आया—'यह क्या किया तुमने।' वह बोला—'उनके अनुपम उपहारों को अपने से विलग क्यों कर दिया तुमने, निहारिका।'

'जाने दो...जाने दो चक्रवाल...।' निहारिका रो पड़ी—'इन वस्तुओं को उनके साथ ही जाने दो। मेरे पास रहकर ये सदा मुझे सन्तप्त करती रहनीं।'

चक्रवाल कुछ न बोला। उसके भी नेत्र अश्नुपूर्ण थे।

'चलो चक्रवाल... ! यहां से कहीं दूर निकल चलो...?' मैं यहां नहीं रह सकती—रहूं भी तो किसके लिए।'

'चलोगी...?' चक्रवाल ने शून्य दृष्टि से किन्नरी के मुख की ओर देखा—'व्योम की ओर चलोगी निहारिका।

'चलूंगी। जहां कहीं भी ले चलो।' निहारिका ने कहा।

चक्रवाल रथ की ओर बढ़ा।
निहारिका ने उसका अनुसरण किया। दोनों आकर रथ पर आकर बैठ गये। रथ तीव्र गति से भयानक बनस्थली का वक्ष भेदन करता हुआ भाग चला। चक्रवाल की मधुर स्वर-लहरी रुदन स्वर में परिवर्तित होकर अलाप उठी तुड़ाकर सभी से मधुर प्रेम नाता। चढ़ा भाग्य की नाव पर बहा जा रहा हूं। उस समय भगवान अंशुमाली ने अस्तांचल के कोड में अपना प्रोज्जवल मुख छिपा लिया था। वृक्षों के हरित पल्लव वेदनापूर्ण गति से हिल रहे थे। प्रतीच्याकाश पर रक्तरंजित लालिमा अभी तक विद्यमान थी मानो प्रकृति किन्नरी के कलापूर्ण करों ने शुभ्र नभमण्डल के देदीप्यमान ललाट पर कुंकुम की एक अरुणिम रेखा खींच दी हो।


*** समाप्त ***
Reply


Possibly Related Threads...
Thread Author Replies Views Last Post
Thumbs Up Thriller Sex Kahani - सीक्रेट एजेंट desiaks 91 3,377 Yesterday, 03:07 PM
Last Post: desiaks
  Behen ki Chudai मेरी बहन-मेरी पत्नी sexstories 21 288,118 10-26-2020, 02:17 PM
Last Post: Invalid
Thumbs Up Horror Sex Kahani अगिया बेताल desiaks 97 6,851 10-26-2020, 12:58 PM
Last Post: desiaks
Lightbulb antarwasna आधा तीतर आधा बटेर desiaks 47 9,385 10-23-2020, 02:40 PM
Last Post: desiaks
Thumbs Up Desi Porn Stories अलफांसे की शादी desiaks 79 4,655 10-23-2020, 01:14 PM
Last Post: desiaks
  Naukar Se Chudai नौकर से चुदाई sexstories 30 328,827 10-22-2020, 12:58 AM
Last Post: romanceking
Lightbulb Mastaram Kahani कत्ल की पहेली desiaks 98 13,282 10-18-2020, 06:48 PM
Last Post: desiaks
Star Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर) desiaks 63 11,661 10-18-2020, 01:19 PM
Last Post: desiaks
Star bahan sex kahani भैया का ख़याल मैं रखूँगी sexstories 264 910,304 10-15-2020, 01:24 PM
Last Post: Invalid
Tongue Hindi Antarvasna - आशा (सामाजिक उपन्यास) desiaks 48 19,339 10-12-2020, 01:33 PM
Last Post: desiaks



Users browsing this thread: 1 Guest(s)