Sex Vasna चोरी का माल
02-12-2022, 01:46 PM,
#1
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लव यू कम्मों

मैं उन दिनों गांव में अपनी दीदी के घर आया हुआ था. उनके पास काफ़ी जमीन थी, जीजा की उससे अच्छी आमदनी थी. उनकी लड़की कमली भी जवान हो चली थी. कमली बहुत तेज लड़की थी, बहुत समझदार भी थी. मर्दों को कैसे बेवकूफ़ बनाना है और कौन सा काम कब निकालना है वो ये अच्छी तरह जानती थी.

एक दिन सवेरे जीजू की तबीयत खराब होने पर उन्हें दीदी शहर में हमारे यहाँ पापा के पास ले गई. हमारे गांव से एक ही बस दोपहर को जाती थी और वही बस दूसरे दिन दोपहर को चल कर शाम तक गांव आती थी.

कमली और मैं दीदी और जीजू को बस पर छोड़ कर वापस लौट रहे थे. मुझे उसे रास्ते में छेड़ने का मन हो आया. मैंने उसके चूतड़ पर हल्की सी चिमटी भर दी. उसने मुझे घूर कर देखा और बोली- खबरदार जो मेरे ढूंगे पर चिमटी भरी…’

‘कम्मो, वो तो ऐसे ही भर दी थी… तेरे ढूंगे बड़े गोल मटोल है ना…’
‘अरे वाह… गोल मटोल तो मेरे में बहुत सी चीज़ें है… तो क्या सभी को चिमटी भरेगा?’
‘तू बोल तो सही… मुझे तो मजा ही आयेगा ना…’ मैंने उसे और छेड़ा.
‘मामू सा… म्हारे से परे ही रहियो… अब ना छेड़ियो…’
‘कमली! थारे बदन में कांई कांटा उगाय राखी है का’
‘बस, अब जुबान बंद राख… नहीं तो फ़ेर देख लियो…’

उसकी सीधी भाषा से मुझे लगा कि यह पटने वाली नहीं है. फिर भी मैंने कोशिश की… उसकी पीठ पर मैंने अपनी अन्गुली घुमाई. वो गुदगुदी के मारे चिहुंक उठी.

‘ना कर रे… मने गुदगुदी होवे…’
‘और करूँ कई… मने भी बड़ो ही मजो आवै…’ और मैंने उसकी पीठ पर अंगुलियाँ फिर घुमाई. उसकी नजरे मुझ पर जैसे गड़ गई, मुझे उसकी आँखों में अब शरारत नहीं कुछ और ही नजर आने लगा था.
‘मामू सा… मजा तो घणो आवै… पर कोई देख लेवेगो… घरे चाल ने फिर करियो…’

उसे मजा आने लगा है यह सोच कर एक बार तो मेरा लण्ड खड़ा हो गया था. उसका मूड परखने के लिये रास्ते में मैंने दो तीन बार उसके चूतड़ो पर हाथ भी लगाया, पर उसने कोई विरोध नहीं किया.

घर पहुंचते ही जैसे वो सब कुछ भूल गई. उसने जाते ही सबसे पहले खाना बनाया फिर नहाने चली गई. मैंने बात आई गई समझते हुये मैंने अपने कपड़े बदले और बनियान और पजामा पहन कर पढ़ने बैठ गया. पर मन डोल रहा था. बार बार रास्ते में की गई शरारतें याद आने लगी थी.

इतने में कमली ने मुझे आवाज दी- मामू सा… ये पीछे से डोरी बांध दो…’

मैं उसके पास गया तो मेरा शरीर सनसनी से भर गया. उसने एक तौलिया नीचे लपेट रखा था मर्दो वाली स्टाईल में… और एक छोटा सा ब्लाऊज जिसकी डोरियाँ पीछे बंधती हैं, बस यही था. मैंने पीछे जा कर उसकी पीठ पर अंगुलियाँ घुमाई…

‘अरे हाँ मामू सा… आओ म्हारी पीठ माईने गुदगुदी करो… मजो आवै है…’
‘तो यह… ब्लाऊज तो हटा दो!’
‘चल परे हट रे… कोई दीस लेगा!’ उसकी इस हाँ जैसी ना ने मेरा उत्साह बढ़ा दिया.
‘अठै कूण है कम्मो बाई… बस थारो मामू ही तो है ना… और म्हारी जुबान तो मैं बंद ही राखूला!’
‘फ़ेर ठीक है… उतार दे…’

मैंने उसका छोटा सा ब्लाउज उतार दिया. फिर उसकी पीठ पर अंगुलियों से आड़ी तिरछी रेखाएँ बनाने लगा. उसे बड़ा आनन्द आने लगा. मेरा लण्ड कड़क होने लगा.

‘मामू सा, थारी अंगुलियों माणे तो जादू है…’ उसने मस्ती में अपनी आंखें बंद कर ली.

मैंने झांक कर उसकी चूचियाँ देखी. छोटी सी थी पर चुचूक उभार लिये हुये थे. अभी शायद उत्तेजना में कठोर हो गई थी और तन से गये थे. मैंने धीरे से अंगुलियाँ उसके चूतड़ों की तरफ़ बढा दी और उसके चूतड़ों की ऊपर की दरार को छू लिया. उसे शायद और मजा आया सो वह थोड़ा सा आगे झुक गई, ताकि मेरी अंगुलियाँ और भीतर तक जा सके. उसका बंधा हुआ तोलिया कुछ ढीला हो गया था. मैंने हिम्मत करके अपना दूसरा हाथ उसकी पीठ पर सरकाते हुये उसकी चूंचियों की तरफ़ आ गया और उसकी एक एक चूची को सहला दिया. कमली ने मुझे नशीली आंखों से देखा और धीरे से मेरी अंगुलियाँ वहाँ से हटा दी. मैंने फिर से कोशिश की पर इस बार उसने मेरे हाथ हटा दिये.
कुछ असमंजस में मुझे घूरने लगी .
‘बस अब तो घणा होई गयो… अब… अब म्हारी अंगिया पहना दो…’
‘अह… अ हाँ लाओ’

मुझे लगा कि जल्दबाजी में सब कुछ बिगड़ गया. उसने अपने चूतड़ तक तो अंगुलियाँ जाने दी थी… अब तो वो भी बात गई… उसने अपना ब्लाऊज ठीक से पहना और भाग कर भीतर कमरे में बाकी के कपड़े पहनने चली गई.

रात को मैं कमली के बारे में ही सोच रहा था कि वो दरवाजे पर खड़ी हुई नजर आ गई.
‘आओ कम्मो… अन्दर आ जाओ!’ उसकी आँखों में जैसे चमक आ गई. वो जल्दी से मेरे पास आ गई.
‘मामू सा… आपरे हाथ में तो चक्कर है… मने तो घुमाई दियो… एक बार और अंगुलियाँ घुमाई दो!’ उसकी आँखों में लगा कि वासना भरी चमक है. मेर लण्ड फिर से कामुक हो उठा.
‘पर एक ही जगह पर तो मजो को नी आवै… जरा थारे सामणे भी तो करवा लियो…’ मैंने अपनी जिद बता दी. यदि चुदाई की इच्छा होगी तो इन्कार नहीं करेगी. वही हुआ…
‘अच्छा जी… कर लेवो बस…’

उसकी इजाजत लेकर मैंने उसे बिस्तर पर बैठा दिया और अपनी अंगुलियाँ उसके बदन पर घुमाने लगा. उसका ब्लाऊज मैंने उतार दिया और अपनी अंगुलियाँ उसकी चूचियों पर ले आया और उससे खेलने लगा. मेरे ऊपर अब वासना का नशा चढ़ने लगा था. उसकी तो आंखें बंद थी और मस्ती में लहरा रही थी. मेरा लण्ड कड़ा हो कर फ़ूल गया था. जब मुझसे और नहीं रहा गया तो मैंने दोनों हाथों से उसके बोबे भींच डाले और उसे बिस्तर पर लेटा दिया.
‘ये कांई करो हो… हटो तो…’ उसे उलझन सी हुई.
‘बस कमली… आज तो मैं तन्ने नहीं छोड़ूंगा… चोद के ही छोड़ूंगा!’
‘अरे रुक तो… यु मती कर यो… हट जा रे…’ उसका नशा जैसे उतर गया था.
‘कम्मो… तु पहले ही जाणे कि म्हारी इच्छा थारे को चोदवां की है?’
‘नहीं वो आप, मणे अटे दबावो, फ़ेर वटे दबावो… सो मणे लागा कि यो कांई कर रिया हो, फेर जद बतायो कि चोदवा वास्त कर रिओ है तो वो मती करो… माणे अब छोड़ दो… थाने म्हारी कसम है!’

मैंने तो अपना सर पकड़ लिया, सोचा कि मैं तो इतनी कोशिश कर रहा हू और ये तो चुदना ही नहीं चाहती है. मैंने उसका घाघरा और ब्लाऊज उतारने की कोशिश की. पर वो अपने आप को बचाती रही.

‘मामू सा… देखो ना कसम दी है थाणे… अब छोड़ दो!’

पर मेरे मन में तो वासना का भूत सवार था. मैंने उसका घाघरा पलट दिया और उसके ऊपर चढ़ गया और अपने लण्ड को उसकी चूत पर रगड़ने लगा. अब मैंने उसे अपनी बाहों में दबा कर चूमना चालू कर दिया. मेरा लण्ड उसकी चूत पर बहुत दबाव डाल रहा था. छेद पर सेटिंग होते ही लण्ड चूत में उतर गया. कमली ने तड़प कर लण्ड बाहर निकाल लिया.

‘मां… मने मारी नाक्यो रे… आईईई…’ मैंने फिर से उसे दबाने की कोशिश की.
‘देख कमली , थाने चोदना तो है ही… अब तू हुद्दी तरह से मान जा…’
‘और नहीं मानी तो… तो महारा काई बिगाड़ लेगो…’
‘तो फिर ये ले…’ मैंने फिर से जोर लगाया और लण्ड सीधा चूत की गहराईयों में उतरता चला गया…
‘हाय्… मैया री माने चोद दियो रे… अच्छा रुक जा… मस्ती से चोदना!’

मैं एक दम से चौंक गया. तो ये सब नाटक कर रही थी… वो खिलखिला कर हंस पड़ी.
‘कम्मो, जबरदस्ती में जो मजा आ रहा था… सारा ही कचरो कर मारा!’
‘अबे यूं नहीं, म्हारे पास तो आवो, थारा लवड़ा चूस के मजा लूँ… ध्हीरे सू करो… ज्यादा मस्ती आवैगी!’

उसने मुझे अपने पास खींचा और मेरा फ़नफ़नाता हुआ लण्ड अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगी. मैं मस्ती में झूम हो गया, मैं अपनी कमर यूं हिलाने लगा कि जैसे उसके मुँह को चोद रहा हूँ. मेरे लण्ड को अच्छी तरह चूसने के बाद अब वो लेट गई. उसने अपनी योनि मेरे मुँह के पास ले आई और अपनी टांगें ऊपर उठा दी… उसकी सुन्दर सी फ़ूली हुई चूत मेरे सामने आ गई. हल्के भूरे बाल चूत के आस पास थे… उसकी चूत गीली थी… मैंने अपनी जीभ उसकी भूरी सी और गुलाबी सी पंखुड़ियों पर गीलेपन पर रगड़ दी, मुझे एक नमकीन सा चिकना सा अहसास हुआ… उसके मुख से सिसकारी निकल गई.
‘आह्ह्ह मामू सा… मजो आ गयो… और करो…’ कमली मस्ती में आ गई.

मैंने अपनी जीभ उसकी गीली योनि में डाल दी. उसकी चूत से एक अलग सी महक आ रही थी. तभी उसका दाना मुझे फ़ड़फ़ड़ाता हुआ नजर आ गया. मैं अपने होठों से उसे मसलने लगा.
‘ओई… ओ… मेरी निकल जायेगी… धीरे से…चूसो…!’ वो मस्ती में खोने लगी थी. हम दोनों एक दूसरे को मस्त करने में लगे थे…
तभी कमली ने कहा- मामू सा लण्ड में जोर हो तो म्हारी गाण्ड चोद ने बतावो!’
‘इसमें जोर री कांई बात है… ढूंगा पीछे करो… और फ़ेर देखो म्हारा कमाल…!’

कम्मो ने पल्टी मारी और बिस्तर पर कुतिया बन गई. उसके दोनों सुन्दर से गोल गोल चूतड़ उभर कर मेरे सामने आ गये. मैंने उन्हें थपथपाया और दोनों चूतड़ हाथों से और अधिक फ़ैला दिए. उसका कोमल सा भूरा छेद सामने आ गया. मैंने पास पड़ी कोल्ड क्रीम उसकी गाण्ड के छेद में भर दिया और अपना मोटा सा लण्ड का सुपाड़ा उस पर रख दिया.

‘मामू सा नाटक तो मती करो… म्हारी गाण्ड तो दस बारह मोटे मोटे लण्ड ले चुकी है… बस चोदा मारो जी… मने तो मस्ती में झुलाओ जी!’

मैं मुस्करा उठा… तो सौ सौ लौड़े खा कर बिल्ली म्याऊँ म्याऊँ कर रही है. मैंने एक ही झटके में लण्ड गाण्ड में उतार दिया. सच में उसे कोई दर्द नहीं हुआ, बल्कि मुझे जरूर लग गई. मैं उसकी गाण्ड में लण्ड अन्दर बाहर करने लगा. मुझे तो टाईट गाण्ड के कारण तेज मजा आने लगा. मेरी रफ़्तार बढ़ती गई.

फिर मुझे उसकी चूत की याद आई. मैंने उसी स्थिति में उसकी चूत में लण्ड घुसेड़ दिया… सच मानो चूत का में लण्ड घुसाते ही चुदाई का मधुर मजा आने लगा. चूत की चुदाई ही आनन्द दायक है… कम्मो को भी तेज मजा आने लगा. वो आनन्द के मारे सिसकने लगी, कभी कभी जोर का धक्का लगता तो खुशी के मारे चीख भी उठती थी. उसके छोटे छोटे स्तनो को मसलने में भी बहुत आनन्द आ रहा था.

‘मामू… ठोको, मने और जोर सू ठोको… म्हारी तो पहले सु ही फ़ाट चुकी है और फ़ाड़ नाको…’
‘म्हारी राणी जी… मजो आ रियो है नी… उछल उछक कर थारे को ठोक दूंगा… पूरा के पूरा लौड़ा पीव लो जी!’
‘मैया री… लौड़ो है कि मोटो डाण्डो लगा राखियो है… मजो आ गियो रे… दे मामू सा…चोद दे!’

मेरा लण्ड उसकी चूत में तेजी से अन्दर बाहर हो रहा था. मेरा लण्ड में अब बहुत तरावट आ चुकी थी. वह फ़ूलता जा रहा था. उसकी चूत की लहरें मुझे महसूस होने लगी थी. उसने तकिया अपनी छाती से दबा लिया और मेरा हाथ वहाँ से हटा दिया.

तभी उसकी चूत लप लप कर उठी… ‘माई मेरी… चुद गई… हाई रे… मेरा निकला… मामू सा… मेरा निकला… गई मैं तो… उह उह उह.’

उसका रज छूट पड़ा. मेरा भी माल निकला हो रहा था. मैंने समझदारी से लण्ड बाहर निकाला और मुठ मारने लगा. एक दो मुठ मारने पर ही मेरा वीर्य पिचकारी के रूप में उछल पड़ा. लण्ड के कुछ शॉट ने मेरा वीर्य पूरा स्खलित कर दिया था. मैं पास ही में बैठ गया.

‘तू तो लगता है खूब चुदी हो…’
‘हाँ मामू सा… क्या करूँ… मेरे कई लड़के दोस्त हैं… चुदे बिना मन नहीं लागे… और वो छोरा… हमेशा ही लौड़ा हाथ में लिये फिरे… फिर चुदने की लग ही जावे के नहीं!’
‘तब तो आपणे घणी मस्ती आई होवेगी…’ मैंने उसकी मस्ती के बारे पूछा.
‘छोड़ो नी, बापु और बाई सा तो काले हाँझे तक आ जाई, अब टेम खराब मती कर… आजा… लग जा… फ़ेर मौका को नी मिलेगा!’ उसके स्वर में ज्वार उमड़ रहा था.

अब हम दोनों नंगे हो कर बिस्तर पर लेट गये थे और प्यार से धीरे धीरे एक दूसरे को सहला रहे थे. जवान जिस्म फिर से पिघले जा रहे थे… जवानी की खुशबू से सरोबार होने लगे थे… नीचे छोटा सा सात इंच का कड़क शिश्न योनि में घुस चुका था. हम दोनों मनमोहक और मधुर चुदाई का आनन्द ले रहे थे. ऐसा लगता था कि ये लम्हा कभी खत्म ना हो… बस चुदाई करते ही जायें…
नयी कहानी जल्दी ही
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02-12-2022, 01:47 PM, (This post was last modified: 02-12-2022, 01:47 PM by desiaks.)
#2
RE: Sex Vasna चोरी का माल
[size=large]मामा के घर मौज मस्ती
मेरा नाम हरीश है। मैं अहमदाबाद का रहने वाला हूँ, 20 साल का हूँ। कॉलेज में पढ़ता हूँ। पिछले साल गर्मियों की छुट्टियों में मैं अपने ननिहाल अमृतसर घूमने गया हुआ था। मेरे मामा का छोटा सा परिवार है। मेरे मामाजी रुस्तम सेठ 45 साल के हैं और मामी सविता 42 के अलावा उनकी एक बेटी है कणिका 18 साल की। मस्त क़यामत बन गई है वो ! अब तो अच्छे-अच्छों का पानी निकल जाता है उसे देख कर। वो भी अब मोहल्ले के लौंडे लपाड़ों को देख कर नैन-मट्टका करने लगी है।

एक बात खास तौर पर बताना चाहूँगा कि मेरे नानाजी का परिवार लाहौर से अमृतसर 1947 में आया था और यहाँ आकर बस गया। पहले तो सब्जी की छोटी सी दुकान ही थी पर अब तो काम कर लिए हैं। कॉलेज के सामने एक जनरल स्टोर है जिसमें पब्लिक टेलीफ़ोन, कम्प्यूटर और नेट आदि की सुविधा भी है। साथ में जूस बार और फलों की दुकान भी है। अपना दो मंजिला मकान है और घर में सब आराम है। किसी चीज की कोई कमी नहीं है। आदमी को और क्या चाहिए। रोटी कपड़ा और मकान के अलावा तो बस सेक्स की जरुरत रह जाती है।

मैं बचपन से ही बहुत शर्मीला रहा हूँ मुझे अभी तक सेक्स का ज्यादा अनुभव नहीं था। बस एक बार बहुत पहले मेरे चाचा ने मेरी गांड मारी थी। जब से जवान हुआ था अपने लंड को हाथ में लिए ही घूम रहा था। कभी कभार एक्स फोरम पर सेक्सी कहानियाँ पढ़ लेता था और ब्लू फ़िल्म भी देख लेता था।
सच पूछो तो मैं किसी लड़की या औरत को चोदने के लिए मरा ही जा रहा था।
मामाजी और मामी को कई बार रात में चुदाई करते देखा था। वहीं 42 साल की उम्र में भी मेरी मामी सविता एकदम जवान पट्ठी ही लगती है। लयबद्ध तरीके से हिलते मोटे मोटे नितम्ब और गोल गोल स्तन तो देखने वालों पर बिजलियाँ ही गिरा देते हैं। ज्यादातर वो सलवार और कुर्ता ही पहनती है पर कभी कभार जब काली साड़ी और कसा हुआ ब्लाउज पहनती है तो उसकी लचकती कमर और गहरी नाभि देखकर तो कई मनचले सीटी बजाने लगते हैं। लेकिन दो दो चूतों के होते हुए भी मैं अब तक प्यासा ही था।

जून का महीना था। सभी लोग छत पर सोया करते थे। रात के कोई दो बजे होंगे, मेरी अचानक आँख खुली तो मैंने देखा मामा और मामी दोनों ही नहीं हैं। कणिका बगल में लेटी हुई है। मैं नीचे पेशाब करने चला गया। पेशाब करने के बाद जब मैं वापस आने लगा तो मैंने देखा मामा और मामी के कमरे की लाईट जल रही है। मैं पहले तो कुछ समझा नहीं पर ‘हाई.. ई.. ओह.. या.. उईई..’ की हल्की हल्की आवाज ने मुझे खिड़की से झांकने को मजबूर कर दिया।

खिड़की का पर्दा थोड़ा सा हटा हुआ था, अन्दर का नजारा देख कर तो मैं जड़ ही हो गया। मामा और मामी दोनों नंगे बेड पर अपनी रात रंगीन कर रहे थे। मामा नीचे लेटे थे और मामी उनके ऊपर बैठी थी।
मामा का लंड मामी की चूत में घुसा हुआ था और वो मामा के सीने पर हाथ रख कर धीरे धीरे धक्के लगा रही थी और.. आह.. उन्ह.. या.. की आवाजें निकाल रही थी।

[Image: 07de7c1323360262.jpg]

उसके मोटे मोटे नितम्ब तो ऊपर नीचे होते ऐसे लग रहे थे जैसे कोई फ़ुटबाल को किक मार रहा हो। उनकी चूत पर उगी काली काली झांटों का झुरमुट तो किसी मधुमक्खी के छत्ते जैसा था।
वो दोनों ही चुदाई में मग्न थे। कोई 8-10 मिनट तक तो इसी तरह चुदाई चली होगी। पता नहीं कब से लगे थे।

फ़िर मामी की रफ्तार तेज होती चली गई और एक जोर की सीत्कार करते हुए वो ढीली पड़ गई और मामा पर ही पसर गई। मामा ने उसे कस कर बाहों में जकड़ लिया और जोर से मामी के होंठ चूम लिए।
‘सविता डार्लिंग ! एक बात बोलूँ?’
‘क्या?’
‘तुम्हारी चूत अब बहुत ढीली हो गई है बिल्कुल मजा नहीं आता !’

[Image: a41a0c1323360321.jpg]

‘तुम गांड भी तो मार लेते हो, वो तो अभी भी टाइट है ना?’
‘ओह तुम नहीं समझी?’
‘बताओ ना?’

‘वो तुम्हारी बहन बबिता की चूत और गांड दोनों ही बड़ी मस्त थी ! और तुम्हारी भाभी जया तो तुम्हारी ही उम्र की है पर क्या टाइट चूत है साली की? मज़ा ही आ जाता है चोद कर !’

‘तो यह कहो ना कि मुझ से जी भर गया है तुम्हारा !’
‘अरे नहीं सविता रानी, ऐसी बात नहीं है दरअसल मैं सोच रहा था कि तुम्हारे छोटे वाले भाई की बीवी बड़ी मस्त है। उसे चोदने को जी करता है !’

‘पर उसकी तो अभी नई नई शादी हुई है वो भला कैसे तैयार होगी?’
‘तुम चाहो तो सब हो सकता है !’
‘वो कैसे?’

‘तुम अपने बड़े भाई से तो पता नहीं कितनी बार चुदवा चुकी हो अब छोटे से भी चुदवा लो और मैं भी उस क़यामत को एक बार चोद कर निहाल हो जाऊँ !’
‘बात तो तुम ठीक कह रहे हो, पर अविनाश नहीं मानेगा !’
‘क्यों?’
‘उसे मेरी इस चुदी चुदाई भोसड़ी में भला क्या मज़ा आएगा?’
‘ओह तुम भी एक नंबर की फुद्दू हो ! उसे कणिका का लालच दे दो ना?’
‘कणिका? अरे नहीं, वो अभी बच्ची है !’

‘अरे बच्ची कहाँ है ! पूरे अट्ठारह साल की तो हो गई है? तुम्हें अपनी याद नहीं है क्या? तुम तो दो साल कम की ही थी जब हमारी शादी हुई थी और मैंने तो सुहागरात में ही तुम्हारी गांड भी मार ली थी !’

‘हाँ, यह तो सच है पर !’
‘पर क्या?’

‘मुझे भी तो जवान लंड चाहिए ना? तुम तो बस नई नई चूतों के पीछे पड़े रहते हो, मेरा तो जरा भी ख़याल नहीं है तुम्हें?’
‘अरे तुमने भी तो अपने जीजा और भाई से चुदवाया था ना और गांड भी तो मरवाई थी ना?’
‘पर वो नए कहाँ थे मुझे भी नया और ताजा लंड चाहिए बस ! कह दिया?’

‘ओह ! तुम तरुण को क्यों नहीं तैयार कर लेती? तुम उसके मज़े लो ! मैं कणिका की सील तोड़ने का मजा ले लूँगा !’
‘पर वो मेरे सगे भाई की औलाद है, क्या यह ठीक रहेगा?’
‘क्यों इसमें क्या बुराई है?’

‘पर वो नहीं.. मुझे ऐसा करना अच्छा नहीं लगता !’

‘अच्छा चलो एक बात बताओ, जिस माली ने पेड़ लगाया है क्या उसे उस पेड़ के फल खाने का हक नहीं होना चाहिए? या जिस किसान ने इतने प्यार से फसल तैयार की है उसे उस फसल के अनाज को खाने का हक नहीं मिलना चाहिए? अब अगर मैं अपनी इस बेटी को चोदना चाहता हूँ तो इसमें क्या गलत है?’

‘ओह तुम भी एक नंबर के ठरकी हो। अच्छा ठीक है बाद में सोचेंगे?’

और फ़िर मामी ने मामा का मुरझाया लंड अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगी।

मैं उनकी बातें सुनकर इतना उत्तेजित हो गया था कि मुट्ठ मारने के अलावा मेरे पास अब कोई और रास्ता नहीं बचा था। मैं अपना सात इंच का लंड हाथ में लिए बाथ रूम की ओर बढ़ गया। फ़िर मुझे ख़याल आया कणिका ऊपर अकेली है। कणिका की ओर ध्यान जाते ही मेरा लंड तो जैसे छलांगें ही लगाने लगा। मैं दौड़ कर छत पर चला आया।
कहानी जारी रहेगी।
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02-12-2022, 01:48 PM,
#3
RE: Sex Vasna चोरी का माल
मामा के घर मौज मस्ती

मामी ने मामा का मुरझाया लंड अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगी।

मैं उनकी बातें सुनकर इतना उत्तेजित हो गया था कि मुट्ठ मारने के अलावा मेरे पास अब कोई और रास्ता नहीं बचा था। मैं अपना सात इंच का लंड हाथ में लिए बाथ रूम की ओर बढ़ गया। फ़िर मुझे ख़याल आया कणिका ऊपर अकेली है। कणिका की ओर ध्यान जाते ही मेरा लंड तो जैसे छलांगें ही लगाने लगा। मैं दौड़ कर छत पर चला आया।
अब आगे:-

कणिका बेसुध हुई सोई थी। उसने पीले रंग की स्कर्ट पहन रखी थी और अपनी एक टांग मोड़े करवट लिए सोई थी, इससे उसकी स्कर्ट थोड़ी सी ऊपर उठी थी। उसकी पतली सी पेंटी में फ़ंसी उसकी चूत का चीरा तो साफ़ नजर आ रहा था। पेंटी उसकी चूत की दरार में घुसी हुई थी और चूत के छेद वाली जगह गीली हुई थी। उसकी गोरी गोरी मोटी जांघें देख कर तो मेरा जी करने लगा कि अभी उसकी कुलबुलाती चूत में अपना लंड डाल ही दूँ।
मैं उसके पास बैठ गया और उसकी जाँघों पर हाथ फेरने लगा।

वाह.. क्या मस्त मुलायम संग-ए-मरमर सी नाज़ुक जांघें थी। मैंने धीरे से पेंटी के ऊपर से ही उसकी चूत पर अंगुली फ़िराई। वो तो पहले से ही गीली थी। आह.. मेरी अंगुली भी भीग सी गई। मैंने उस अंगुली को पहले अपनी नाक से सूंघा। वाह.. क्या मादक महक थी।

[Image: cdcv1ssn7yb3.jpg]

कच्चे नारियल जैसी जवान चूत के रस की मादक महक तो मुझे अन्दर तक मस्त कर गई। मैंने अंगुली को अपने मुँह में ले लिया। कुछ खट्टा और नमकीन सा लिजलिजा सा वो रस तो बड़ा ही मजेदार था।

मैं अपने आप को कैसे रोक पाता। मैंने एक चुम्बन उसकी जाँघों पर ले ही लिया, फ़िर यौनोत्तेजना वश मैंने उसकी जांघें चाटी। वो थोड़ा सा कुनमुनाई पर जगी नहीं।
अब मैंने उसके उरोज देखे। वह क्या गोल गोल अमरुद थे। मैंने कई बार उसे नहाते हुए नंगी देखा था। पहले तो इनका आकार नींबू

जितना ही था पर अब तो संतरे नहीं तो अमरुद तो जरूर बन गए हैं। गोरे गोरे गाल चाँद की रोशनी में चमक रहे थे। मैंने एक चुम्बन उन पर भी ले लिया।

मेरे होंठों का स्पर्श पाते ही कणिका जग गई और अपनी आँखों को मलते हुए उठ बैठी।

[Image: IMG-20211004-071225.jpg]

‘क्या कर रहे हो भाई?’ उसने उनीन्दी आँखों से मुझे घूरा।
‘वो.. वो.. मैं तो प्यार कर रहा था !’
‘पर ऐसे कोई रात को प्यार करता है क्या?’

‘प्यार तो रात को ही किया जाता है !’ मैंने हिम्मत करके कह ही दिया।
उसके समझ में पता नहीं आया या नहीं ! फ़िर मैंने कहा- कणिका एक मजेदार खेल देखोगी?’
‘क्या?’ उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।

‘आओ मेरे साथ !’ मैंने उसका बाजू पकड़ा और सीढ़ियों से नीचे ले आया और हम बिना कोई आवाज किये उसी खिड़की के पास आ गए। अन्दर का दृश्य देख कर तो कणिका की आँखें फटी की फटी ही रह गई। अगर मैंने जल्दी से उसका मुँह अपनी हथेली से नहीं ढक दिया होता तो उसकी चीख ही निकल जाती।

मैंने उसे इशारे से चुप रहने को कहा।
वो हैरान हुई अन्दर देखने लगी।

मामी घोड़ी बनी फ़र्श पर खड़ी थी और अपने हाथ बेड पर रखे थी, उनका सिर बेड पर था और नितम्ब हवा में थे। मामा उसके पीछे उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगा रहे थे। उनका 8 इंच का लंड मामी की गांड में ऐसे जा रहा था जैसे कोई पिस्टन अन्दर बाहर आ जा रहा हो। मामा उनके नितम्बों पर थपकी लगा रहे थे। जैसे ही वो थपकी लगाते तो नितम्ब हिलने लगते और उसके साथ ही मामी की सीत्कार निकलती- हाईई… और जोर से मेरे राजा ! और जोर से ! आज सारी कसर निकाल लो ! और जोर से मारो ! मेरी गांड बहुत प्यासी है ये हाईई…’

[Image: image.png]

‘ले मेरी रानी और जोर से ले… या… सऽ विऽ ता… आ.. आ…’ मामा के धक्के तेज होने लगे और वो भी जोर जोर से चिल्लाने लगे।

पता नहीं मामा कितनी देर से मामी की गांड मार रहे थे। फ़िर मामा मामी से जोर से चिपक गए। मामी थोड़ी सी ऊपर उठी। उनके पपीते जैसे स्तन नीचे लटके झूल रहे थे। उनकी आँखें बंद थी और वह सीत्कार किये जा रही थी- जियो मेरे राजा मज़ा आ गया !’

मैंने धीरे धीरे कणिका के वक्ष मसलने शुरू कर दिए। वो तो अपने मम्मी पापा की इस अनोखी रासलीला देख कर मस्त ही हो गई थी। मैंने एक हाथ उसकी पेंटी में भी डाल दिया।

उफ़… छोटी छोटी झांटों से ढकी उसकी बुर तो कमाल की थी, नीम गीली।

मैंने धीरे से एक अंगुली से उसके नर्म नाज़ुक छेद को टटोला। वो तो चुदाई देखने में इतनी मस्त थी कि उसे तो तब ध्यान आया जब मैंने गच्च से अपनी अंगुली उसकी बुर के छेद में पूरी घुसा दी।

‘उईई माँ…!!’ उसके मुँह से हौले से निकला- ओह… भाई यह क्या कर रहे हो?’
उसने मेरी ओर देखा। उसकी आँखें बोझिल सी थी और उनमें लाल डोरे तैर रहे थे।
मैंने उसे बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूम लिया।

हम दोनों ने देखा कि एक पुच्क्क की आवाज के साथ मामा का लंड फ़िसल कर बाहर आ गया और मामी बेड पर लुढ़क गई।

अब वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं रह गया था। हम एक दूसरे की बाहों में सिमटे वापस छत पर आ गए।
‘कणिका?’
‘हाँ भाई?’

कणिका के होंठ और जबान कांप रही थी। उसकी आँखों में एक नई चमक थी। आज से पहले मैंने कभी उसकी आँखों में ऐसी चमक नहीं देखी थी। मैंने फ़िर उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठ चूसने लगा। उसने भी बेतहाशा मुझे चूमना शुरू कर दिया।

मैंने धीरे धीरे उसके स्तन भी मसलने चालू कर दिए। जब मैंने उसकी पेंटी पर हाथ फ़िराया तो उसने मेरा हाथ पकड़ते कहा- नहीं भाई, इससे आगे नहीं !’

‘क्यों क्या हुआ?’

‘मैं रिश्ते में तुम्हारी बहन लगती हूँ, भले ही ममेरी ही हूँ पर हूँ तो बहन ही ना? और भाई और बहन में ऐसा नहीं होना चाहिए !’

‘अरे तुम किस ज़माने की बात कर रही हो? लंड और चूत का रिश्ता तो कुदरत ने बनाया है। लंड और चूत का सिर्फ़ एक ही रिश्ता होता है और वो है चुदाई का। यह तो केवल तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले समाज और धर्म के ठेकेदारों का बनाया हुआ ढकोसला है। असल में देखा जाए तो ये सारी कायनात ही इस कामरस में डूबी है जिसे लोग चुदाई कहते हैं।’ मैं एक ही सांस में कह गया।

‘पर फ़िर भी इंसान और जानवरों में फर्क तो होता है ना?’

‘जब चूत की किस्मत में चुदना ही लिखा है तो फ़िर लंड किसका है इससे क्या फर्क पड़ता है? तुम नहीं जानती कणिका, तुम्हारा यह जो बाप है ना यह अपनी बहन, भाभी, साली और सलहज सभी को चोद चुका है और यह तुम्हारी मम्मी भी कम नहीं है। अपने देवर, जेठ, ससुर, भाई और जीजा से ना जाने कितनी बार चुद चुकी है और गांड भी मरवा चुकी है !’

कणिका मेरी ओर मुँह बाए देखे जा रही थी। उसे यह सब सुनकर बड़ी हैरानी हो रही थी- नहीं भाई तुम झूठ बोल रहे हो?’

‘देखो मेरी बहना, तुम चाहे कुछ भी समझो, यह जो तुम्हारा बाप है ना ! वो तो तुम्हें भी भोगने चोदने के चक्कर में है ! मैंने अपने कानों से सुना है !’

‘क… क्या…?’ उसे तो जैसे मेरी बातों पर यकीन ही नहीं हुआ। मैंने उसे सारी बातें बता दी जो आज मामा मामी से कह रहे थे।
उसके मुँह से तो बस इतना ही निकला- ओह नोऽऽ?’

‘बोलो… तुम क्या चाहती हो? अपनी मर्जी से, प्यार से तुम अपना सब कुछ मुझे सौंप देना चाहोगी या फ़िर उस 45 साल के अपने खडूस और ठरकी बाप से अपनी चूत और गांड की सील तुड़वाना चाहती हो…? बोलो !’

‘मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा है !’
‘अच्छा एक बात बताओ?’
‘क्या?’

‘क्या तुम शादी के बाद नहीं चुदवाओगी? या सारी उम्र अपनी चूत नहीं मरवाओगी?’
‘नहीं, पर ये सब तो शादी के बाद की बात होती है?’

‘अरे मेरी भोली बहना ! ये तो खाली लाइसेंस लेने वाली बात है। शादी विवाह तो चुदाई जैसे महान काम को शुरू करने का उत्सव है। असल में शादी का मतलब तो बस चुदाई ही होता है !’

‘पर मैंने सुना है कि पहली बार में बहुत दर्द होता है और खनू भी निकलता है?’
‘अरे तुम उसकी चिंता मत करो ! मैं बड़े आराम से करूँगा ! देखना तुम्हें बड़ा मज़ा आएगा !’
‘पर तुम गांड तो नहीं मारोगे ना? पापा की तरह?’

‘अरे मेरी जान पहले चूत तो मरवा लो ! गांड का बाद में सोचेंगे !’ और मैंने फ़िर उसे बाहों में भर लिया।

उसने भी मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया। वह क्या मुलायम होंठ थे, जैसे संतरे की नर्म नाज़कु फांकें हों। कितनी ही देर हम आपस में गुंथे एक दूसरे को चूमते रहे।

अब मैंने अपना हाथ उसकी चूत पर फ़िराना चालू कर दिया। उसने भी मेरे कहने से मेरे लंड को कस कर हाथ में पकड़ लिया और सहलाने लगी। लंड महाराज तो ठुमके ही लगाने लगे। मैंने जब उसके उरोज दबाये तो उसके मुँह से सीत्कार निकालने लगी।

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‘ओह भाई कुछ करो ना? पता नहीं मुझे कुछ हो रहा है !’

उत्तेजना के मारे उसका शरीर कांपने लगा था, साँसें तेज होने लगी थी। इस नए अहसास और रोमांच से उसके शरीर के रोएँ खड़े हो गए थे। उसने कस कर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया।

अब देर करना ठीक नहीं था। मैंने उसकी स्कर्ट और टॉप उतार दिए। उसने ब्रा तो पहनी ही नहीं थी। छोटे छोटे दो अमरुद मेरी आँखों के सामने थे। गोरे रंग के दो रसकूप जिनका एरोला कोई अठन्नी जितना और निप्पल्स तो कोई मूंग के दाने जितने बिल्कुल गुलाबी रंग के ! मैंने तड़ से एक चुम्बन उसके उरोज पर ले लिया। अब मेरा ध्यान उसकी पतली कमर और गहरी नाभि पर गया।

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जैसे ही मैंने अपना हाथ उसकी पेंटी की ओर बढ़ाया तो उसने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा- भाई, तुम भी तो अपने कपड़े उतारो ना?’

‘ओह हाँ !’

मैंने एक ही झटके में अपना नाईट सूट उतार फेंका। मैंने चड्डी और बनियान तो पहनी ही नहीं थी। मेरा 7 इंच का लंड 120 डिग्री पर खड़ा था। लोहे की रॉड की तरह बिल्कुल सख्त। उस पर प्री-कम की बूँद चाँद की रोशनी में ऐसे चमक रही थी जैसे शबनम की बूँद हो या कोई मोती।

‘कणिका इसे प्यार करो ना !’
‘कैसे?’
‘अरे बाबा इतना भी नहीं जानती? इसे मुँह में लेकर चूसो ना?’
‘मुझे शर्म आती है !’

मैं तो दिलो जान से इस अदा पर फ़िदा ही हो गया। उसने अपनी निगाहें झुका ली पर मैंने देखा था कि कनिखयों से वो अभी भी मेरे तप्त लंड को ही देखे जा रही थी बिना पलकें झपकाए।

मैंने कहा- चलो, मैं तुम्हारी बुर को पहले प्यार कर देता हूँ फ़िर तुम इसे प्यार कर लेना !’

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‘ठीक है !’ भला अब वो मना कैसे कर सकती थी।

और फ़िर मैंने धीरे से उसकी पेंटी को नीचे खिसकाया, गहरी नाभि के नीचे हल्का सा उभरा हुआ पेडू और उसके नीचे रेशम से मुलायम छोटे छोटे बाल नजर आने लगे। मेरे दिल की धड़कनें बढ़ने लगी। मेरा लंड तो सलामी ही बजाने लगा। एक बार तो मुझे लगा कि मैं बिना कुछ किये-धरे ही झड़ जाऊँगा।

उसकी चूत की फांकें तो कमाल की थी। मोटी मोटी संतरे की फांकों की तरह। गुलाबी चट्ट, दोनों आपस में चिपकी हुई। मैंने पेंटी को निकाल फेंका। जैसे ही मैंने उसकी जाँघों पर हाथ फ़िराया तो वो सीत्कार करने लगी और अपनी जांघें कस कर भींच ली।

मैं जानता था कि यह उत्तेजना और रोमांच के कारण है। मैंने धीरे से अपनी अंगुली उसकी बुर की फांकों पर फ़िराई। वो तो मस्त ही हो गई। मैंने अपनी अंगुली ऊपर से नीचे और फ़िर नीचे से ऊपर फ़िराई। 3-4 बार ऐसा करने से उसकी जांघें अपने आप चौड़ी होती चली गई। अब मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी बुर की दोनों फांकों को चौड़ा किया। एक हल्की सी पुट की आवाज के साथ उसकी चूत की फांकें खुल गई।

आह ! अन्दर से बिल्कुल लाल चुटर ! जैसे किसी पके तरबूज का गूदा हो। मैं अपने आप को कै से रोक पाता। मैंने अपने जलते होंठ उन पर रख दिए।

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आह… नमकीन सा स्वाद मेरी जबान पर लगा और मेरी नाक में जवान जिस्म की एक मादक महक भर गई। मैंने अपनी जीभ को थोड़ा सा नुकीला बनाया और उसके छोटे से टींट पर टिका दिया। उसकी तो एक किलकारी ही निकल गई। अब मैंने ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जीभ फ़िरानी चालू कर दी।

उसने कस कर मेरे सिर के बालों को पकड़ लिया। वो तो सीत्कार पर सीत्कार किये जा रही थी।

बुर के छेद के नीचे उसकी गांड का सुनहरा छेद उसके कामरज से पहले से ही गीला हो चुका था। अब तो वो भी खुलने और बंद होने लगा था।

कणिका आह…उन्ह… कर रही थी, ऊईई… मा..आ एक मीठी सी सीत्कार निकल ही गई उसके मुँह से।

अब मैंने उसकी बुर को पूरा मुँह में ले लिया और जोर की चुस्की लगाई। अभी तो मुझे दो मिनट भी नहीं हुए होंगे कि उसका शरीर अकड़ने लगा और उसने अपने पैर ऊपर करके मेरी गदर्न के गिर्द लपेट लिए और मेरे बालों को कस कर पकड़ लिया। इतने में ही उसकी चूत से काम रस की कोई 4-5 बूँदें निकल कर मेरे मुँह में समां गई। आह क्या रसीला स्वाद था। मैंने तो इस रस को पहली बार चखा था। मैं उसे पूरा का पूरा पी गया।

अब उसकी पकड़ कुछ ढीली हो गई थी। पैर अपने आप नीचे आ गए। 2-3 चुस्कियाँ लेने के बाद मैंने उसके एक उरोज को मुँह में ले लिया और चूसना चालू कर दिया।

शायद उसे इन उरोजों को चुसवाना अच्छा नहीं लगा था। उसने मेरा सिर एक और धकेला और झट से मेरे खड़े लंड को अपने मुँह में ले लिया। मैं तो कब से यही चाह रहा था। उसने पहले सुपाड़े पर आई प्रीकम की बूँदें चाटी और फ़िर सुपारे को मुँह में भर कर चूसने लगी जैसे कोई रस भरी कुल्फी हो।

आह.. आज किसी ने पहली बार मेरे लंड को ढंग से मुँह में लिया था। कणिका ने तो कमाल ही कर दिया। उसने मेरा लंड पूरा मुँह में भरने की कोशिश की पर भला सात इंच लम्बा लंड उसके छोटे से मुँह में पूरा कैसे जाता।

मैं चित्त लेटा था और वो उकडू सी हुई मेरे लंड को चूसे जा रही थी। मेरी नजर उसकी चूत की फांकों पर दौड़ गई। हल्के हल्के बालों से लदी चूत तो कमाल की थी। मैंने कई ब्ल्यू फ़िल्मों में देखा था कि चूत के अन्दर के होंठों की फांके 1.5 या 2 इंच तक लम्बी होती हैं पर कणिका की तो बस छोटी छोटी सी थी, बिल्कुल लाल और गुलाबी रंगत लिए। मामी की तो बिल्कुल काली काली थी। पता नहीं मामा उन काली काली फांकों को कैसे चूसते हैं।

मैंने कणिका की चूत पर हाथ फ़िराना चालू कर दिया। वो तो मस्त हुई मेरे लंड को बिना रुके चूसे जा रही थी। मुझे लगा अगर जल्दी ही मैंने उसे मना नहीं किया तो मेरा पानी उसके मुँह में ही निकल जाएगा और मैं आज की रात बिना चूत मारे ही रह जाऊँगा।

मैं ऐसा हरिगज नहीं चाहता था।

मैंने उसकी चूत में अपनी अंगुली जोर से डाल दी। वो थोड़ी सी चिहुंकी और मेरे लंड को छोड़ कर एक और लुढ़क गई।

वो चित्त लेट गई थी। अब मैं उसके ऊपर आ गया और उसके होंठों को चूमने लगा।

एक हाथ से उसके उरोज मसलने चालू कर दिए और एक हाथ से उसकी चूत की फांकों को मसलने लगा। उसने भी मेरे लंड को मसलना चालू कर दिया। अब लोहापूरी तरह गर्म हो चुका था और हथौड़ा मारने का समय आ गया था। मैंने अपने उफनते हुए लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रख दिया। अब मैंने उसे अपने बाहों में जकड़ लिया और उसके गाल चूमने लगा, एक हाथ से उसकी कमर पकड़ ली। इतने में मेरे लंड ने एक ठुमका लगाया और वो फ़िसल कर ऊपर खिसक गया।

कणिका की हंसी निकल गई।

मैंने दोबारा अपने लंड को उसकी चूत पर सेट किया और उसके कमर पकड़ कर एक जोर का धक्का लगा दिया। मेरा लंड उसके थूक से पूरा गीला हो चुका था और पिछले आधे घंटे से उसकी चूत ने भी बेतहाशा कामरज बहाया था। मेरा आधा लंड उसकी कुंवारी चूत की सील को तोड़ता हुआ अन्दर घुस गया।

इसके साथ ही कणिका की एक चीख हवा में गूंज गई। मैंने झट से उसका मुँह दबा दिया नहीं तो उसकी चीख नीचे तक चली जाती।

कोई 2-3 मिनट तक हम बिना कोई हरकत किये ऐसे ही पड़े रहे।

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वो नीचे पड़ी कुनमुना रही थी, अपने हाथ पैर पटक रही थी पर मैंने उसकी कमर पकड़ रखी थी इस लिए मेरा लंड बाहर निकालने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। मुझे भी अपने लंड के सुपारे के नीचे जहाँ धागा होता है, जलन सी महसूस हुई। यह तो मुझे बाद में पता चला कि उसकी चूत की सील के साथ मेरे लंड की भी सील (धागा) टूट गई है।

चलो अच्छा है अब आगे का रास्ता दोनों के लिए ही साफ़ हो गया है। हम दोनों को ही दर्द हो रहा था। पर इस नए स्वाद के आगे यह दर्द भला क्या माने रखता था।

‘ओह… भाई मैं तो मर गई रे…’ कणिका के मुँह से निकला- ओह… बाहर निकालो मैं मर जाऊँगी !’

‘अरे मेरी बहना रानी ! बस अब जो होना था हो गया है। अब दर्द नहीं बस मजा ही मजा आएगा। तुम डरो नहीं ये दर्द तो बस 2-3 मिनट का और है उसके बाद तो बस जन्नत का ही मजा है !’

‘ओह… नहीं प्लीज… बाहर निका…लो… ओह… या… आ… उन्ह… या’

मैं जानता था उसका दर्द अब कम होने लगा है और उसे भी मजा आने लगा है। मैंने हौले से एक धक्का लगाया तो उसने भी अपनी चूत को अन्दर से सिकोड़ा। मेरा लंड तो निहाल ही हो गया जैसे। अब तो हालत यह थी कि कणिका नीचे से धक्के लगा रही थी। अब तो मेरा लंड उसकी चूत में बिना किसी रुकावट अन्दर बाहर हो रहा था। उसके कामरज और सील टूटने से निकले खून से सना मेरा लंड तो लाल और गुलाबी सा हो गया था।

‘उईई… मा.. आह… मजा आ रहा है भाई तेज करो ना.. आह ओर तेज या…’

कणिका मस्त हुई बड़बड़ा रही थी।

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अब उसने अपने पैर ऊपर उठा कर मेरी कमर के गिर्द लपेट लिए थे। मैंने भी उसका सिर अपने हाथों में पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया और धीरे धीरे धक्के लगाने लगा। जैसे ही मैं ऊपर उठता तो वो भी मेरे साथ ही थोड़ी सी ऊपर हो जाती और जब हम दोनों नीचे आते तो पहले उसके नितम्ब गद्दे पर टिकते और फ़िर गच्च से मेरा लंड उसकी चूत की गहराई में समां जाता। वो तो मस्त हुई ‘आह उईई माँ’ ही करती जा रही थी। एक बार उसका शरीर फ़िर अकड़ा और उसकी चूत ने फ़िर पानी छोड़ दिया।

वो झड़ गई थी ! आह…! एक ठंडी सी आनंद की सीत्कार उसके मुँह से निकली तो लगा कि वो पूरी तरह मस्त और संतुष्ट हो गई है।

मैंने अपने धक्के लगाने चालू रखे। हमारी इस चुदाई को कोई 20 मिनट तो हो ही गए थे, अब मुझे लगाने लगा कि मेरा लावा फूटने वाला है, मैंने कणिका से कहा तो वो बोली,’कोई बात नहीं, अन्दर ही डाल दो अपना पानी ! मैं भी आज इस अमृत को अपनी कुंवारी चूत में लेकर निहाल होना चाहती हूँ !’

मैंने अपने धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी और फ़िर गर्म गाढ़े रस की ना जाने कितनी पिचकारियाँ निकलती चली गई और उसकी चूत को लबालब भरती चली गई।

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on.

उसने मुझे कस कर पकड़ लिया। जैसे वो उस अमृत का एक भी कतरा इधर उधर नहीं जाने देना चाहती थी। मैं झड़ने के बाद भी उसके ऊपर ही लेटा रहा।

मैंने कहीं पढ़ा था कि आदमी को झड़ने के बाद 3-4 मिनट अपना लंड चूत में ही डाले रखना चाहिए इस से उसके लंड को फ़िर से नई ताकत मिल जाती है और चूत में भी दर्द और सूजन नहीं आती।

थोड़ी देर बाद हम उठ कर बैठ गए। मैंने कणिका से पूछा- कैसी लगी पहली चुदाई मेरी जान?’

‘ओह ! बहुत ही मजेदार थी मेरे भैया?’
‘अब भैया नहीं सैंया कहो मेरी जान !’
‘हाँ हाँ मेरे सैंया ! मेरे साजन ! मैं तो कब की इस अमृत की प्यासी थी। बस तुमने ही देर कर रखी थी !’
‘क्या मतलब?’
‘ओह, तुम भी कितने लल्लू हो। तुम क्या सोचते हो मुझे कुछ नहीं पता?’
‘क्या मतलब?’
‘मुझे सब पता है तुम मुझे नहाते हुए और मूतते हुए चुपके चुपके देखा करते हो और मेरा नाम ले लेकर मुट्ठ भी मारते हो !’
‘ओह… तुम भी ना… एक नंबर की चुदक्कड़ हो रही हो !’

‘क्यों ना बनूँ आखिरर खानदान का असर मुझ पर भी आएगा ही ना?’ और उसने मेरी ओर आँख मार दी।
फ़िर आगे बोली ‘पर तुम्हें क्या हुआ मेरे भैया?’
‘चुप साली अब भी भैया बोलती है ! अब तो मैं दिन में ही तुम्हारा भैया रहूँगा रात में तो मैं तुम्हारा सैंया और तुम मेरी सजनी बनोगी !’ और फ़िर मैंने एक बार उसे अपनी बाहों में भर लिया।

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उसे भला क्या ऐतराज हो सकता था।
यह कहानी आपको कैसी लगी मुझे कमेन्ट करके जरूर बताएँ।
Reply
02-12-2022, 01:49 PM,
#4
RE: Sex Vasna चोरी का माल
हवसनामा (एक लम्बी कहानी)

सुलगती चूत-1
‘हवसनामा’ के अंतर्गत मैं यह पहली कहानी लिख रहा हूँ पारूल नाम की एक चौबीस वर्षीय महिला की, जिसके जीवन में सेक्स की कितनी अहमियत थी, यह उससे बेहतर कोई नहीं समझ सकता था और सालों साल इसके लिये तड़पने के बाद आखिर एक दिन उसने इसे हासिल भी किया तो बस एक मौके के तौर पर … आगे की कहानी खुद पारुल के अपने शब्दों में।
दोस्तो, मैं एक शादीशुदा चौबीस वर्षीय युवती हूँ और मुंबई के एक उपनगर में रहती हूँ। अपनी पहचान नहीं जाहिर करना चाहती इसलिये नाम भी सही नहीं बताऊंगी और स्थानीयता भी। बाकी पाठकों को इससे कुछ लेना देना भी नहीं होना चाहिये। जो है वह मेरी कहानी में है और वही महत्वपूर्ण है।
सेक्स … आदिमयुग से लेकर आज तक, कितनी सामान्य सी चीज रही है जनसाधारण के लिये। लगभग सबको सहज सुलभ … हम जैसे कुछ अभागों वंचितों को छोड़ कर। यह शब्द, यह सुख, यह जज्बात मेरे लिये क्या मायने रखते हैं मैं ही जानती हूँ। राह चलते फिकरों में, गालियों में इससे जुड़े लंड, बुर, लौड़ा, चूत, चुदाई जैसे शब्द कानों में जब तब पड़ते रहे हैं और जब भी पड़ते हैं, मन हमेशा भटका है। हमेशा उलझा है अहसास की कंटीली झाड़ियों में।
एक मृगतृष्णा सी तड़पा कर रह गयी है। न चाहते हुए भी एक अदद लिंग को तरसती अपनी योनि की तरफ ध्यान बरबस ही चला जाता है जो क्षण भर के संसर्ग की कल्पना भर में गीली होकर रह जाती है और फिर शायद अपने नसीब पर सब्र कर लेती है। कितने किस्मत वाले हैं वह लोग जिन्हें यह विपरीतलिंगी संसर्ग हासिल है. हमेशा एक चाह भरी खामोश ‘आह’ होंठों तक आ कर दम तोड़ गयी है।
जब अपने घर में थी तब कोई तड़प न थी, कोई भूख न थी, कोई तृष्णा न थी. बस संघर्ष था जीवन को संवारने का, इच्छा थी कुछ उन लक्ष्यों को हासिल करने की जो निर्धारित कर रखे थे अपने घर के हालात को देखते हुए।
मैं एक टिपिकल महाराष्ट्रियन परिवार से ताल्लुक रखती हूँ। दिखने में भले बहुत आकर्षक न होऊं लेकिन ठीकठाक हूँ, रंगत गेंहुआ है और फिगर भी ठीक ठाक ही है. परिवार में पिता निगम में निचले स्तर का कर्मचारी था और एक नंबर का दारूबाज था और मां इधर उधर कुछ न कुछ काम करती थी। म्हाडा के एक सड़ल्ले से फ्लैट में हम छः जन का परिवार रहता था। एक आवारा भाई सहित हम तीन बहनें. एक निम्नतर स्तर के जीवन को जीते हुए इसके सिवा हमारे क्या लक्ष्य हो सकते थे कि हम पढ़ लिख कर किसी लायक हो जाये और इसके लिये कम संघर्ष नहीं था।
हमें खुद ट्यूशन पढ़ाना पढ़ता था कि कुछ अतिरिक्त आय हो सके क्योंकि पढ़ाई के लिये भी पैसा चाहिये था। बहरहाल ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई जैसे तैसे हो पाई कि बड़ी होने के नाते बाईस साल की उम्र में हमें एक खूंटे से बांध दिया गया। वह तो हमें बाद में समझ आया कि बिना दान दहेज इतनी आसानी से हमारी शादी हो कैसे गयी।
पति एक नंबर का आवारा, कामचोर और शराबी था. भले अपने घर का अकेला था लेकिन जब किसी लायक ही नहीं था तो लड़की देता कौन? हम तो बोझ थे तो एक जगह से उतार कर दूसरी जगह फेंक दिये गये। ससुर रिटायर्ड कर्मचारी थे और अब पार्ट टाईम कहीं मुनीमी करते थे तो घर की गुजर हो रही थी। लड़का इधर उधर नौकरी पे लगता लेकिन चार दिन में या खुद छोड़ देता या आदतों की वजह से भगा दिया जाता। घरवालों ने सोचा था कि शादी हो जायेगी तो सुधर जायेगा लेकिन ऐसा कुछ होता हमें तो दिखा नहीं।
फिर भी अपना नसीब मान के हम स्वीकार कर लिये और तब असली समस्या आई। पत्नी का मतलब चौका बर्तन साफ सफाई और साज श्रृंगार ही तो नहीं होता। रात में पति का प्यार भी चाहिये होता है, मर्दाना संसर्ग भी चाहिये होता है और वह तो इस मरहले पर एकदम नकारा साबित हुआ। बाजारू औरतों और नशेबाजी के चक्कर में वह बेकार हो चुका था, उसका ठीक से ‘खड़ा’ भी नहीं होता था और जो थोड़ा बहुत होता भी था तो दो चार धक्कों में ही झड़ जाता था।
शादी के बाद पहली बार जिस्म की भूख समझ में आई. मैंने उसे प्यार से संभालने और कराने की कोशिश की लेकिन बिना नशे के भी वह नकारा साबित हुआ। उस पर तो वियाग्रा टाईप कोई दवा भी कारगर साबित नहीं होती थी और मैं इसका इलाज करने को बोलती तो मुझे मारने दौड़ता कि किसी को पता चल गया तो उसकी क्या इज्जत रह जायेगी।
जैसे तैसे तो वह मेरी योनि की झिल्ली तक पहुंच पाया था लेकिन कभी चरम सुख न दे पाया। उसके आसपास भी न पहुंचा पाया और मेरी तड़प और कुंठा अक्सर झगड़े का रूप ले लेती थी जिससे उसकी सेक्स में अयोग्यता का पता बाहर किसी को चलता न चलता पर घर में सास ससुर को तो चल ही गया था। वह बेचारे भी क्या कर सकते थे।
अपनी नाकामी से मुंह छुपाने के लिये वह रात को नशे में ही लौटता कि बिस्तर में गिरते ही टुन्न हो जाये और मैं सहवास के लिये उसका गला न पकड़ सकूँ। लेकिन यह तो वह आग है जो जितना दबाने की कोशिश की जाये, उतना ही भड़कती है। गीली लकड़ी की तरह सुलगते चले जाना कहीं न कहीं आपको बगावत पर उतारू कर ही देता है। मैंने एक कोशिश घर से बाहर की जो परवान तो न चढ़ी लेकिन उसे पता चल गया और उसने अपने लफंगे दोस्तों के साथ उस युवक को ऐसा पीटा कि उसने मुझसे खुद ही कन्नी काट ली।
उसके पीछे मुझे भी धमकाया लेकिन मुझ पर खैर क्या फर्क पड़ना था. मैंने तो दिन दहाड़े ही दरवाजा बंद किया और कपड़े उतार के नंगी लेट गयी उसे चैलेंज करती कि तो आओ और मेरी भूख शांत कर दो।
उसे पता था यह उसके बस का था नहीं … गालियां बकता बाहर निकल गया। बाहर सास सब सुन रही थीं लेकिन उनके बोलने के लिये कुछ था ही नहीं और उस दिन मैंने पूरी बेशर्मी से उन्हें सुनाते हुए उंगली से अपना योनिभेदन करते चर्मोत्कर्ष तक पहुंची कि वह मेरी हालत समझें तो सही।
इसके बाद कोई और विकल्प न देख मैंने सब्र ही कर लिया और अपने हाथ से ही अपनी चुल शांत कर लेती लेकिन मर्दाना संसर्ग तो अलग ही होता है, चाहे कैसा भी हो।
धीरे-धीरे फोन से दिल बहलाने लगी. मार्केट में जियो क्या आया, कम से कम एक विकल्प तो और खुल गया। न सिर्फ एक्स फोरम पे पोर्न साहित्य पढ़ती बल्कि देर रात तक पोर्न मूवीज देखती रहती। इच्छायें जितनी दबाई जायें, वे उतनी ही बलवती होती हैं और जब इंसान के तेवर बगावती हों तो इंसान अंतिम हद तक जाने की ख्वाहिश करने लगता है।
मुझे सच में तो कुछ भी नहीं हासिल था, कल्पनाओं में अति को छूने लगी। जो वर्जित हो, घृणित हो, अतिवाद हो, वह सब मुझमें आकर्षण पैदा करने लगा। मैंने शादी से पहले कभी कोई अश्लील बात शायद ही की हो लेकिन अब तो जी चाहता कि कोई मर्द मुझसे हर पल अश्लील से अश्लील बातें करें … मेरे साथ क्रूर व्यवहार करे … क्रूरतम संभोग करे … मुझे गालियां दे … गंदी-गंदी गालियां दे … मेरे होंठों को ऐसे चूसे कि खून निकाल दे।
मेरे कपड़े फाड़ कर मुझे नंगा कर दे … मेरे वक्षों को बेरहमी से मसले, मेरे चूचुकों को दांतों से काटे, मेरे नितंबों को तमांचे मार-मार के लाल कर दे. मैं उसके मुंह पर अपनी योनि रगड़ूं, वह जीभ से खुरच दे मेरे दाने को, खींच डाले मेरी कलिकाओं को और मैं उसके मुंह पर स्क्वर्ट करूँ.
वह सब पी जाये और फिर मेरे बाल पकड़ कर, मुझे गालियां देते, पूरी बेरहमी से अपना मूसल जैसा लिंग मेरी कसी हुई योनि में उतार कर फाड़ दे मेरी योनि को। मैं चीखती चिल्लाती रहूं और वह पूरी बेरहमी से धक्के लगाते मेरी योनि का कचूमर बना दे। एकदम सख्त क्रूर मर्द बन कर मुझे एक दो टके की रंडी बना के रख दे। धीरे-धीरे सुलगती आकांक्षायें यूं ही और आक्रामक होती गयीं।
सुलगना क्या होता है यह कोई मुझसे पूछे.
साल भर इसी तरह तड़पते सुलगते गुजर गया। बस फोन, पोर्न और अपनी उंगली का ही सहारा था। वह नामर्द तो कभी बहुत उकसाने पर चढ़ता भी था तो योनि गर्म भी नहीं हो पाती थी कि बह जाता था. फोरप्ले तो उसके बस का था ही नहीं और मैं तड़पती सुलगती और उसे गालियां देती रह जाती थीं।
साल भर बाद मैंने कोई भी नौकरी करने की ठानी. उसी नामर्द ने विरोध किया लेकिन सास ससुर चुपचाप मान गये। बेटे को लेकर जो उम्मीदें उन्होंने बांधी थीं, वह साल भर में खत्म हो चुकी थीं और अब मुझे रोकने का कोई मतलब नहीं था। या बेटा कमाये या बहू, और बेटा तो ढर्रे पे आता लगता नहीं था तो अंततः मुझे नौकरी की स्वीकृति मिल गयी।
ससुर जी की वजह से ही मुझे सीएसटी की तरफ एक नौकरी मिल गयी, जो थोड़ी टफ इसलिये थी कि सुबह सात बजे से शुरू होती थी और चार बजे वापसी होती थी लेकिन आने जाने के लोकल के पास सहित बारह हजार इतने कम भी नहीं थे तो शुरुआत यहीं से सही।
इसके लिये सुबह जल्दी उठना पड़ता था, नाश्ता बना के और अपने दोपहर के लिये कुछ खाने को बना कर सात बजे हार्बर लाईन की लोकल पकड़ कर निकल लेती थी। अब सुबह जो इस लाईन पे चलता है उसे लाईन के आसपास के नजारे तो पता ही होंगे. आखिर किसी अंग्रेज ने इसी आधार पर तो भारत को एक वृहद शौचालय की संज्ञा दी थी।
आपको दोनों तरफ जगह-जगह शौच करते लोग दिखते हैं और कमबख्त बेशर्म भी इतने होते हैं कि रुख ट्रेन की ओर ही किये रहते हैं। यह स्थिति भले दूसरी औरतों के लिये असुविधाजनक होती हो लेकिन मेरे जैसी तरसती औरत के लिये तो बेहद राहत भरी थी। सुबह सवेरे मुर्झाये, अर्ध उत्तेजित और उत्तेजित लिंगों के दर्शन हो जाते थे। छोटे, मध्यम आकार के और बड़े-बड़े भी।
मैं लेडीज डिब्बे में ही बैठती थी और बाकी भले नजरें चुराती हों लेकिन मैं बड़ी दिलचस्पी से उन शौच करते लोगों को देखती थी और उनके लिंग मेरे मन में एक गुदगुदी मचा देते थे। अक्सर मेरी योनि पनिया जाती थी और होंठ शुष्क हो जाते थे. तो बाद में योनि में रुई फंसा कर घर से निकलती थी जो अपने अड्डे पर पहुंचते ही जब निकालती थी तो भीगी हुई मिलती थी।
नौकरी स्वीकार करते वक्त मन में एक उम्मीद यह भी रहती थी कि शायद वहां कोई जुगाड़ बन जाये और मेरी तरसती सुलगती योनि को एक अदद कड़क लिंग मिल जाये लेकिन वहां मालिक उम्रदराज थे और ससुर के परिचित होने की वजह से मुझे घर की लड़की जैसे समझ के नजर भी रखते थे और काम में टच में आने वाले जो लोग थे, उनसे भी इसी वजह से ऐसी कंटीन्युटी बन पाने की उम्मीद बनती लगती नहीं थी।
ले दे के बस उन लिंगों के दर्शन का ही सहारा था जो सुबह सवेरे दिखते थे। रोज-रोज देखते कुछ चेहरे पहचान में आने लगे थे। अपना तो एक फिक्स टाईम था और शायद उन्हें भी नियत समय पर कहीं जाना होता हो। उनमें से कुछ के लिंग सामान्य थे लेकिन कुछ के हैवी जो मुंह में पानी भर देते थे और मन में एक अजब सी गुदगुदाहट भर देते थे। मैं जानबूझकर उनसे आंखें मिलाती थी कि वे मुझे पहचान लें. शायद किसी मोड़ पर मिल ही जायें तो कुछ कहने सुनने की जरूरत तो नहीं रहेगी।
चार महीने यूँ ही गुजर गये और उन नियमित लोगों से निगाहों का एक परिचय बन गया। जिनके लिंग हैवी थे, उनके लिंग की तारीफ भी आंखों ही आंखों में कर जाती थी कि वे समझ लें और चूँकि बेचारे चूँकि शौच कर रहे होते थे तो शर्मा कर रह जाते थे लेकिन देखने दिखाने की दिलचस्पी में निगाहें भी ट्रेन की दिशा में गड़ाये रहते थे।
रात को उन्हीं को याद करके कल्पना करती थी बेहद आक्रामक संभोग की और जब तक स्खलित न हो जाती थी, नींद ही नहीं आती थी और रोज भगवान से प्रार्थना करती थी कि उनमें से कोई तो कहीं टकरा जाये।
इसी तड़पन के साथ दो महीने और गुजर गये, निगाहों का परिचय और गहरा हो गया लेकिन संपर्क का कोई माध्यम मेरी समझ में न आ पाया। कभी-कभी दिल करता कि पास के स्टेशन पर उतर जाऊँ और वापस चली आऊं जहां पसंदीदा मर्दों में से कोई बैठा हग रहा होता था, लेकिन स्त्री तो स्त्री … बगावत अपनी जगह लेकिन ऐसे कदम उठाने के लिये जो साहस चाहिये वह मुझमें नहीं था।
फिर एक आइडिया सूझा … ड्राईक्लीनर्स वगैरह के यहां जो कपड़ों की पहचान के लिये कागज के टैग लगाते हैं। वे थोड़े खरीद लिये और उन पर अपना नंबर लिख के रख लिया।
अपने स्टेशन से सीएसटी तक करीब आठ ऐसे मर्द थे जिनसे निगाहों का परिचय बन चुका था। वे देख के ही उत्तर भारतीय लगते थे. उनके लिंग बड़े थे और आकर्षक थे और यही हमारे परिचय का आधार थे। शुरु में तो यह होता था कि वे रोज नहीं दिखते थे, बल्कि कभी कोई दिखता तो कभी कोई. लेकिन फिर शायद उन्होंने मेरी निगाहों की भूख समझ ली तो वे भी ट्रेन की टाईमिंग के हिसाब से ही शौच के लिये आने लगे। ट्रेन आगे पीछे हो जाती थी लेकिन उन्हें कौन सा कहीं ऑफिस जाना था तो बैठे रहते।
मैं खास उन लोगों के लिये अपने हाथ में आठ ऐसे टैग दबाये खिड़की के पास बैठी रहती और जब सामना होता तो चुपके से एक टैग गिरा देती।
यहां यह बता दूँ कि इस सिलसिले की शुरुआत भले लेडीज कोच से हुई हो लेकिन हमेशा विंडो सीट मिलनी पॉसिबल नहीं होती थी तो विंडो सीट के चक्कर में मैं बाद में जनरल डिब्बे में भी बैठ जाती थी और चूँकि जहां से मुझे चलना होता था, वहीं से ट्रेन भी चलती थी तो ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि मुझे उस खास साईड में विंडो सीट न मिली हो।
बहरहाल, अंततः कई दिन के बाद मेरा यह प्रयास रंग लाया. हालाँकि बीच में कुछ और फालतू फोन भी आये जिन्होंने मेरा नंबर उसी टैग से लिया था लेकिन वे मेरे परिचय वाले न साबित हुए तो मैंने बात बढ़ानी ठीक न समझी। क्या पता कौन हो कैसा हो.
लेकिन फिर एक फोन वह भी आया जिसके लिये मैंने टैग गिराया था। थोड़ी सी पहचान बताने पर मैंने उसे पहचान लिया और चार बजे सीएसटी स्टेशन पर मिलने को कहा।
जरूर काम धंधे वाला बंदा रहा होगा लेकिन औरत का चक्कर जो न कराये। बेचारा अपने हिसाब से तैयार होकर चार बजे सीएसटी पहुंच गया जहां मैंने बताया था। पहचानने में कोई दिक्कत न हुई
उसने अपना नाम रघुबीर बताया, पूर्वी उत्तरप्रदेश का रहने वाला था और यहां दादर में रेहड़ी लगाता था। था तो शादीशुदा मगर बीवी बच्चे गांव में थे और किसी भी औरत के लिये अवलेबल था। मुझे कौन सी उससे यारी करनी थी। हालाँकि मैंने क्लियर कर दिया कि उसकी सेवा के बदले मैं कुछ पे कर पाने की स्थिति में नहीं हूँ और जगह का इंतजाम भी उसे ही करना होगा। मैं बस आ सकती हूँ और दूसरे कि वह दिन के सिवा कभी फोन नहीं करेगा।
वह दो दिन का वक्त ले कर चला गया।
इस बीच और भी कुछ फोन आये जो काम के न साबित हुए लेकिन दो दिन बाद रघु का फोन आया कि जगह का इंतजाम हो गया है. इतना सुन कर ही मेरी योनि ने एकदम से पानी छोड़ दिया।
उसने मुझे बांद्रा स्टेशन पर दो बजे मिलने को कहा और मेरे लिये यह कोई मुश्किल नहीं था क्योंकि मैं अमूमन छुट्टी नहीं लेती थी तो आज मुझे मना करने का सवाल ही नहीं था। मैं सवा बजे रवाना हुई और दो बजे बांद्रा स्टेशन पे पहुंच गयी, जहां वह मुझे इंतजार करता मिला।
वहां से वह मुझे ऑटो से रेलवे कालोनी ले आया, जहां एक बिल्डिंग के वन बेडरूम वाले फ्लैट तक ले कर इस अंदाज में पहुंचा जैसे हम पति पत्नी हों और किसी रिलेटिव के यहां मिलने आये हों। इस बीच स्टोल से चेहरा मैंने कवर ही कर रखा था कि कोई कहीं पहचान वाला मिल भी जाये तो पहचान न सके।
उस फ्लैट में एक युवक और मौजूद था. रघु ने बताया कि वह उसका गांव वाला था और यहां दो पार्टनर्स के साथ रहता था, लेकिन फिलहाल वे दोनों मुलुक गये हुए थे तो वह अकेला ही था और अपनी जगह हमें देने को तैयार था लेकिन उसकी बस अकेली यही शर्त थी कि वह भी हिस्सेदारी निभायेगा।
आम हालात में यह शर्त भले जलील करने वाली लगती लेकिन फिलहाल तो मैं इतना तड़पी तरसी और भूखी थी कि उसके दोनों पार्टनर्स और भी होते और वे भी हिस्सेदारी मांगते तो भी मैं इन्कार न करती, उल्टे यही कहती कि सब मिल कर मुझ पर टूट पड़ो और मेरी इज्जत की बखिया उधेड़ कर रख दो।
चूत की भूख क्या होती है, यह मुझसे बेहतर कौन समझ सकता था।
प्रत्यक्षतः मैंने थोड़े सोच विचार के बाद हामी भर दी।
दोपहर का टाईम था, आसपास भी सन्नाटा ही था। उसके दोस्त जिसका नाम राजू था, ने बताया कि आसपास भी सब काम वाले लोग ही रहते थे उस फ्लोर पे और इस वक्त कोई नहीं था।
बेडरूम में पहुंचते ही मैंने न सिर्फ स्टोल उतार फेंका बल्कि अपने ऊपरी कपड़े भी साथ ही उतार दिये। यहां योनि में आग लगी हुई थी, इतनी देर में ही सोच-सोच के बह चली थी कि आज उसे खुराक मिलेगी। कब से अपनी उत्तेजना को मैं दबाये थी।
भाड़ में गयी स्त्रीसुलभ लज्जा, भाड़ में गयी मर्यादायें … सहवास के नाजुक पलों में सिकुड़ना, सिमटना, स्वंय पहल न करना, यह सारे तय नियम अब मेरे लिये कोई मायने नहीं रखते थे। एक जवान जनाना बदन के अंदर कैद औरत जो जाने कब से पुरुष संसर्ग के लिये तड़प रही थी, सुलग रही थी… उसने जैसे खुद को एकदम आजाद कर दिया था। हर बंधन से मुक्त कर लिया था।
बस मैं उस क्षण खुद को औरत महसूस करना चाहती थी… सिर्फ औरत, जिसके सामने दो मर्द मौजूद थे जिनके गर्म कड़े कठोर उत्तेजित लिंग मेरी उस तृष्णा को मिटा सकते थे जो अब नाकाबिले बर्दाश्त हो चली थी।
क्रमशः
इस सीरीज के अंतर्गत मैं कुछ चुनिंदा पाठकों की कहानियाँ लिख रहा हूँ जो थोड़ी हट कर हैं और रूचिकर है।कृप्या कमेन्टस करके अवश्य बताएं आपको कैसी कहानी पसन्द है , जिससे कि मैं वैसी ही कहानी यहां चिपका सकूं।
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02-12-2022, 01:49 PM,
#5
RE: Sex Vasna चोरी का माल
हवसनामा: सुलगती चूत-2​
मैं उस नये लड़के को नहीं जानती थी लेकिन रघु को तो जानती थी, कई बार कल्पनाओं में उसके नीचे खुद को मसलवा चुकी थी और उसके लिंग को अपनी योनि में ले चुकी थी।
मेरे उतावलेपन को देखते वे थोड़े हैरान तो जरूर हुए लेकिन मेरे ब्रा और पैंटी में आते ही उनमें भी जैसे करेंट सा लगा। मैं कोई संकोच, शर्म, लिहाज के मूड में इस वक्त बिलकुल नहीं थी और भूखी शेरनी की तरह उस पर टूट पड़ी। मैंने रघु को दबोच लिया और उसके शरीर पर जोर डालती उसे बेड पर गिरा लिया और खुद उस पर चढ़ गयी।
उसके होंठों से मैंने अपने होंठ जोड़ दिये और उन्हें ऐसे चूसने लगी जैसे खा जाऊँगी। उसके मुंह की गंध अच्छी तो नहीं थी लेकिन उस घड़ी जो मेरी स्थिति थी उसमें यह चीज कोई मायने ही नहीं रखती थी। उसके होंठ छोड़े तो उसके माथे, गाल, गर्दन को बेताबी से चूमने लगी। उसकी शर्ट के बटन जल्दबाजी में मैंने तोड़ दिये और नीचे की बनियान को फाड़ डाला, जिससे उसका बालों भरा चौड़ा चकला सीना सामने आ गया। मैं उसके सीने पे होंठ रगड़ने लगी।
“मैडम तो बहुत भूखी लगती हैं राजू … तू भी आ, अकेला नहीं संभाल पाऊंगा।” रघु ने याचना सी करते हुऐ कहा।
“हां बहुत भूखी हूँ, बहुत तरसी हूँ मर्द के लिये, बहुत तड़पी हूँ। जी भर के चोदो मुझे … दो घंटे हैं तुम लोगों के पास। मेरी चूत की धज्जियां उड़ा दो। वह सब कुछ करो जो तुमने कहीं पढ़ा या देखा हो .. मैं सबकुछ महसूस करना चाहती हूँ।” मैंने लहराती हुई आवाज में उसकी पैंट खोलते हुए कहा।
“मतलब?” दोनों ही अटपटा गये।
“मतलब एक दो टके की रांड बना दो मुझे … छिनाल बना के चोदो। मुझे मारो … तकलीफ दे सकते हो तो दो। बस चेहरे पे कुछ न करना। मेरी चड्डी ब्रा फाड़ के फेंक दो। मुझे कुतिया की तरह नंगी कर दो। गंदी-गंदी गालियां दो … जो गंदे से गंदा कर सकते हो करो। मेरे पूरे बदन को काट खाओ। मेरी चूचियों को संतरे की तरह निचोड़ कर रख दो। मेरी घुंडियों को बेरहमी से मसलो, दांतों से काटो। मेरी चूत में मुंह डाल के खा जाओ, मेरा मूत पी जाओ … मेरे चूतड़ों को तमांचों से मार-मार के लाल कर दो। मेरे मुंह में मूतो, मेरा मुंह चोद डालो, मेरे मुंह में झड़ जाओ और अपने लंडों से मेरी चूत और गांड सब चोद-चोद कर भर्ता बना दो। मुझे इतना चोदो कि मैं चलने लायक भी न रह पाऊं … जो कर सकते हो, करना चाहते हो करो। मैं महीनों इस चुदाई को भूल न पाऊं।”
मेरी तड़प मेरे शब्दों से जाहिर थी और वे भी कोई नये नवेले लौंडे नहीं थे, खेले खाये मर्द थे और मर्द तो मर्द … जब सामने नंगी लेटी औरत खुद खुली छूट दे रही हो तो उन्हें तो मौका मिल गया अपने अंदर के जानवर को जगाने का।
जब तक मैं रघु के पैंट से उसके उस लिंग को बाहर निकाल कर अपने मुंह में ले कर चूसना शुरू करती, जिसे महीनों से देखती और उसकी कल्पनायें करती आ रही थी, कि राजू ने भी कपड़े उतार कर फेंक दिये और पीछे से मेरी ब्रा के स्ट्रेप पकड़ कर ऐसे खींचे कि वे टूट गये और उसने ब्रा खींच कर मेरे शरीर से अलग कर दी।
मेरी मर्दाने स्पर्श को तरसती चूचियां एकदम से खुली हवा में सांस लेती आजाद हो गयीं और उसने मेरे बाल पकड़ कर ऐसे खींचा कि रघु का लिंग मेरे मुंह से निकल गया।
“तो ऐसे बोल न हरामजादी कि तू रांड है, लौड़े चाहिये थे तुझे कुतिया। ले तेरी माँ की चूत … देख कि कैसे तेरी बुर का भोसड़ा बनाते हैं रंडी। ले मुंह में लौड़ा ले छिनाल।” उसने कई थप्पड़ मेरे गाल पर थप्पड़ जड़ दिये जिससे मेरा चेहरा गर्म हो गया और आंख से आंसू छलक आये लेकिन इस पीड़ा में भी एक मजा था।
उसका लिंग रघु के लिंग से कम नहीं था। देख कर ही मजा आ गया और मैंने लपक कर उसे मुंह में उतार लिया और हलक तक घुसा कर जोर-जोर से चूसने लगी। मुझसे मुक्त होते ही रघु भी उठ खड़ा हुआ था और उसने भी मुझे गंदी-गंदी गालियां देनी शुरू कर दी थीं जो मेरे कानों में रस घोल रही थीं। उसने भी झटपट कपड़े उतार फेंके और मेरे चूतड़ों पर थप्पड़ जमाते हुए मेरी पैंटी खींचने लगा और इतनी बेरहमी से खींची कि वह फट गयी और मेरे शरीर से निकल कर उसके हाथ में झूल गयी।
फिर एक के बाद उसने कई जोरदार थप्पड़ जड़ दिये मेरे मुलायम चूतड़ों पर … दोनों चूतड़ गर्म हो गये और एकदम से ऐसा लगा जैसे चूतड़ों में मिर्चें भर गयी हों लेकिन फिर फौरन वह कुत्ते की तरह मेरे चूतड़ों को चाटने लगा। जबकि राजू अपना लिंग मेरे मुंह में घुसाये, हाथ नीचे करके मेरे दोनों स्तनों को जोर-जोर से भींचने लगा था।
चूतड़ों को चाटते-चाटते रघु ऊपर आया तो उसने मेरी पीठ पर चिकोटी काटते मुझे नीचे गिरा लिया। फिर दोनों मुझ पर भूखे जानवर की तरह टूट पड़े।
वह थप्पड़ों तमाचों से मुझे पूरे शरीर पर मार रहे थे, साथ ही मसल रहे थे, रगड़ रहे थे … मेरे सर पर इतनी ज्यादा उत्तेजना हावी थी कि मुझे उस मार से कोई तकलीफ नहीं महसूस हो रही थी। वे दोनों मेरी चूचियों को पूरी बेरहमी और बेदर्दी से मसल रहे थे। बीच-बीच में घुंडियों को मुंह में ले कर चूसने लगते, चुभलाने लगते, दांतों से काट लेते कि मैं सी कर के रह जाती।
कहीं मेरे होंठ उसी बेरहमी से चूसने लगते और अपना लिंग बार-बार मेरे मुंह में घुसा कर मेरा मुंह चोदने लगते। बीच-बीच में वे जितनी गंदी बातें कर सकते, जितना मुझे कह सकते थे … कह रहे थे और उनकी बातों के जवाब देते मैं भी ऐसे बिहेव कर रही थी जैसे मैं कोई थर्ड क्लास रंडी होऊं।
वे मेरे पूरे जिस्म पर काट रहे थे, चाट रहे थे और मेरे चेहरे को छोड़ बाकी जिस्म पर अपनी निशानियां अंकित कर रहे थे और मैं भी कम नहीं साबित हो रही थी। उनके आक्रमण का जवाब उसी अंदाज में दे रही थी। उन्हें गिरा लेती, उन पर चढ़ जाती, उनके पूरे बदन को चूमती चाटती और कई जगह काट भी लेती। उनके लिंग बुरी तरह चूसती, उनके टट्टे भी चूसती चाटती। उनके बाल पकड़ कर उनके मुंह पर अपनी योनि ऐसे रगड़ती जैसे उसे अपनी चूत में ही घुसा लेना हो। ऐसी हालत में दूसरा मेरे मुंह को चोदने लगता। चूत से ले कर गांड तक सब चटवा रही थी और वे भी पीछे नहीं हट रहे थे। इतने आक्रामक घर्षण में जाहिर है कि चूत का बुरा हाल होना था … मैं स्कवर्टिंग करती झड़ने लगी और वे भी इतने जोरदार आक्रमण को न झेल पाये। पहले मेरा मुंह चोदते गालियां देते हुए राजू झड़ने लगा तो उसने अपना लिंग बाहर निकालना चाहा लेकिन मैंने निकालने नहीं दिया।
यह नया अनुभव था, पहले कभी तो सोचा भी नहीं था … एकदम से मुंह उसके वीर्य से भर गया। अजीब स्वाद था, न अच्छा न बुरा … मैं आज हर हद पार कर जाना चाहती थी इसलिये पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। मैं उसे निगल गयी और वह कांपता थरथराता झड़ता रहा और थोड़ा बहुत मैंने बाहर निकाल कर अपने दूधों पर मल दिया।
वह हटा तो मैंने रघु का लंड मुंह में लेना चाहा लेकिन उसने मना कर दिया कि वह चूत में ही झड़ेगा।
हालाँकि मैं झड़ चुकी थी और चूत बुरी तरह बह रही थी लेकिन लंड के लिये तो हर पल तैयार थी। मैंने उसे चित लिटाये उसके कठोर लिंग पर अपनी चूत टिकाई और बैठती चली गयी। चूत की संकरी मगर बुरी तरह पानी से भीगी दीवारें चरचराती हुई, ककड़ी की फांक की तरह फटती लंड को जड़ तक लेती चली गयी और मेरे मुंह से ऐसी राहत भरी जोर की ‘आह’ निकली थी जिसे बस मैं ही समझ सकती थी। भले झड़ चुकी थी लेकिन भट्ठी की तरह दहकती चूत को लंड से भला कैसे इन्कार होता।
आज पहली बार चूत को लंड का सही स्वाद मिला था। उस लंड के लिहाज से मेरी चूत एकदम कुंवारी ही थी और वह ऐसा फंसा-फंसा अंदर धंसा हुआ था जैसे कुत्ते कुतिया फंस जाते हैं। ऐसा नहीं था कि मुझे इस प्रवेश से दर्द नहीं हुई थी लेकिन इतनी तरसी तड़पी सुलगी हुई चूत को लंड मिला था, इस सोच से पनपी उत्तेजना उस दर्द पर भारी थी, लेकिन मैं फिर भी बिलबिलाती हुई उसे गालियां बकने लगी थीं जिसके प्रत्युत्तर में वह भी मुझे कुतिया, रंडी, छिनाल बना रहा था।
जबकि राजू झड़ने के बाद थोड़ी देर के लिये ठंडा पड़ गया था। जब मुझे लगा मैं बर्दाश्त कर सकती थी तो मैंने ऊपर नीचे होना शुरू किया। उम्म्ह… अहह… हय… याह… चूत में यह लंड का घर्षण। लग रहा था जैसे मुझे पागल कर देगा। मैं जोर जोर से सिसकारती ऊपर नीचे होने लगी और चूत गपागप लंड लेने लगी। ‘फच-फच’ की आवाज के साथ मेरे चूतड़ों के उसकी जांघों से टकराने की ‘थप थप’ भी कमरे में गूँजने लगी थी।
घचर पचर चुदते हुए जब मैं थमी तो वह नीचे से जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। लेकिन कुछ धक्कों में ही उसे अंदाजा हो गया कि उसकी उत्तेजना स्खलन के करीब पहुंच रही थी तो वह उठ कर बैठ गया और मुझे अपने ऊपर से हटाते नीचे गिरा दिया।
“अब मै झड़ने वाला हूँ रंडी … कहां लेगी मेरा माल बोल छिनाल?” वह मेरे पैरों को अपने कंधों पर रखते हुए बोला।
“मुंह में तो ले चुकी हरामी … अब मेरी चूत में बारिश कर दे। भर दे मेरी चूत को अपने माल से।” मैंने भी उसी के अंदाज में उत्तर दिया।
उसने कामरस से भीगा लिंग मेरी दहकती चूत के मुंह पर टिकाया और एक जोरदार धक्के में समूचा लंड मेरी चूत में पेल दिया कि चूत चरमरा कर रह गयी। एकदम से मेरी चीख सी निकल गयी।
“फाड़ डाली रे मेरी चूत मादरचोद!” मैंने बिलबिलाते हुए कहा।
“भोसड़ा बना के रख दूंगा तेरी बुर का बहन की लौड़ी। रोज तकती थी मेरे लौड़े को। आज देख इस लौड़े से कैसे तेरी चूत फाड़ता हूँ मादरचोद। रंडी छिनाल। तेरी माँ की चूत.. यह ले यह ले।”
“फाड़ दे … फाड़ दे हरामी। बहुत लंड मांगती थी यह। आज मजा चखा दे इसको।”
वह मेरे पैरों को अपने कंधों पे चढ़ाये थोड़ा झुक आया था और अब खूब जोर-जोर से धक्के लगा रहा था। मेरी चूत की दीवारें इस घर्षण से तप कर बहने को आ गयी थीं। लंड चलाते वह मेरी चूचियों को भी बेरहमी से दबाये डाल रहा था और मैं मुट्ठियों में बिस्तर की चादर दबोच रखी थी।
फिर जब मैंने योनि की मांसपेशियों में तीव्र अकड़न महसूस की, तभी उसके शिश्नमुंड को फूलते महसूस किया और उससे उबले गर्म-गर्म वीर्य को अपनी योनि में भरते हुए अनुभव करने लगी। झड़ते हुए मैंने पैर उसके कंधे से हटा कर नीचे कर लिये थे और उसे अपने ऊपर गिरा कर दबोच लिया था और जोर-जोर से सिसकारने लगी थी। उसने भी स्खलन की अवस्था में भेड़िये जैसी जोरदार गुर्राहटों के साथ मुझे भींच लिया था और हम दोनों ने उस चरम अवस्था में इतनी जोर से एक दूसरे को भींचा था कि हड्डियां तक कड़कड़ा उठी थीं।
थोड़ी देर में संयत होने पर वह उठ कर मुझसे अलग हुआ तो उसका मुरझाया लिंग पुल्ल से बाहर आ गया और एकदम से वीर्य बाहर उबला जिसे मैंने हाथ लगा कर हाथ पर ले लिया कि बिस्तर न खराब हो।
“बाथरूम किधर है?” मैंने राजू की तरफ देखते हुए पूछा तो उसने बायीं तरफ एक बंद दरवाजे की तरफ संकेत कर दिया।
मैं उठ कर बाथरूम चली गयी … वहां सारा वीर्य फेंका, योनि में मौजूद वीर्य निकाला और फिर सर छोड़ के बाकी बदन पानी से अच्छे से धो लिया। मैं निकली तो वे दोनों एकसाथ ही बाथरूम में घुस गये।
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02-12-2022, 01:51 PM,
#6
RE: Sex Vasna चोरी का माल
कम्मो बदनाम हुई (नई कहानी)

[Image: GIF-210827-103342.gif]
मेरा नाम कुसुम है पर प्यार से सभी मुझे कम्मो कहते हैं। मैं पूरी 18 की हो चुकी हूँ। मेरी चूत में खुजली तो बहुत पहले से ही शुरू हो गई थी पर अब बर्दाश्त से बाहर हो गया था। हर समय चूत में चींटियाँ से रेंगती रहती थी और लगता था अंदर कोई छोटी सी मछली फड़फड़ा रही है। चूत और जांघें सब टाईट हो जाती थी।

जब भी किसी जवान लड़के या मर्द को देखती तो मेरी चूत अपने आप गीली होकर आँसू बहाने लगती और मैं सिवाय उसकी पिटाई करने के और कुछ न कर पाने को मजबूर थी। मेरी चूत एक अदद लंड के लिए तरस रही थी और मुन्नी की तरह मेरा मन भी किसी मोटे लंड के लिए बदनाम हो जाने को करने लगा था। सच कहूँ तो अब तक मैंने अपनी इस निगोड़ी चूत से बस मूतने का ही काम लिया था।

“कम्मो बदनाम हुई लंड जी तेरे लिए”

घर में मर्द के नाम पर बस ताऊजी ही थे। पापा का बहुत पहले देहांत हो गया था। कोई भाई था नहीं। मैं तो दिन रात इसी जुगाड़ में रहती थी कि कब मौका हाथ आये और मैं अपनी फड़कती मचलती चूत की खुजली मिटाऊँ।

आज वो मौका मिल ही गया। ताईजी अपने मायके गई हुई थी और मम्मी अपने ऑफिस चली गई थी। (वो एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती हैं) मैं ताऊजी के कमरे की सफाई कर रही थी। घर में मेरे और ताऊजी के सिवा और कोई नहीं था। मैंने तय कर लिया था कि चाहे जो हो जाए मैं आज चुदवा कर ही रहूंगी। सफाई के दौरान मुझे पलंग के नीचे पड़ा एक कंडोम मिला। मैं सब जानती तो थी पर ताऊजी से चुदाई की बात शुरू करने का यह अच्छा बहाना मुझे मेरी किस्मत ने दे दिया था।

मैंने उस कंडोम को मुट्ठी में दबा लिया और सब कुछ सोच लिया। मुझे थोड़ी शर्म भी आ रही थी और झिझक भी थी। मैंने बिना ब्रा के स्कर्ट और टॉप डाल लिया और नीचे छोटी सी कच्छी पहन ली। फिर मैं ताऊजी के पास बालकनी में जाकर खड़ी हो गई जहां वो कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। मैंने अपनी मुट्ठी ऐसे बंद कर रखी थी जैसे मेरी मुट्ठी में कोई कारूँ का खजाना हो।

“ओह, कम्मो बेटी” आओ… आओ… कैसे आना हुआ? कुछ परेशान सी लग रही हो? क्या बात है?” ताऊजी ने मेरी मखमली जांघें घूरते हुए कहा।

“बस यूँ ही चली आई अकेले में मन नहीं लग रहा था !” मैंने अपने हाथ की मुट्ठी जोर से कस ली कुछ ऐसा नाटक किया जैसे मैं कुछ छिपा रही हूँ।

“तुम कुछ उदास भी लग रही हो बताओ ना क्या बात है, कोई परेशानी हो तो मुझे बताओ?” ताऊजी अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए।

मैं चुपचाप सर झुकाए खड़ी रही। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था की बात कैसे शुरू की जाए। सोच कर तो बहुत कुछ आई थी पर अब मेरी हिम्मत जवाब देने लगी थी।

ताऊजी मेरे करीब आ गए और फिर उन्होंने मेरी ठुड्डी ऊपर उठाई और मेरे गालों को सहलाते हुए पूछा “क्या हुआ मेरी प्यारी बेटी को ? मेरी रानी क्यों उदास है ?”

मैंने थोड़ा सकपकाने का सटीक अभिनय करते हुए अपनी बंद मुट्ठी पीठ के पीछे कर ली और कहा,“नहीं क…… कुछ नहीं !”

उन्होंने मेरे नितंबों के पीछे लगा हाथ पकड़ लिया और मेरा हाथ आगे कर के मुट्ठी खोलते हए बोले “जरा देखें तो सही हमारी प्यारी बिटिया ने क्या छुपा रखा है ?”

जैसे ही मैंने मुट्ठी खोली कंडोम नीचे गिर गया। मैं अपनी मुंडी नीचे किये खड़ी रही। मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था। पता नहीं अब क्या होगा। क्या पता ताऊजी नाराज़ ही ना हो जाएँ।

“धत्त तेरे की…. बस इत्ती सी बात के लिए परेशान हो रही थी मेरी रानी बिटिया?” उन्होंने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा।

“ताऊजी ये आपके कमरे में मिला था यह क्या है ?”

“ओह ये…. वो…ये…?” ताऊजी थोड़ा झिझक से रहे थे।

“ओह ताऊजी बताइये ना?” क्या है यह गुब्बारा तो नहीं हो सकता ?” मैंने उनकी आँखों में झांकते हुए पूछा।

मैंने महसूस किया कि उनकी साँसें तेज हो गई थी और पैंट का उभार भी साफ़ दिखाई देने लगा था। फिर वो हंसते हुए बोले “ओह…..अरे बेटी यह तो गर्भ निरोध है।”

“वो क्या होता है ?” मैं सब जानती तो थी पर मैंने अनजान बनते हुए पूछा।

“तुम्हें नहीं पता ? ओह… दरअसल इसे शारीरिक मिलन से पहले लिंग पर पहना जाता है।”

“क्यों?”

“ताकि लिंग से निकालने वाला रस योनि में ना जा पाए !”

“पर ऐसा क्यों ?” मैं अब पूरी बेशर्म बन गई थी।

“ऐसा करने से गर्भ नहीं ठहरता !” ताऊजी की हालत अब खराब होने लगी थी। उनकी पैंट में घमासान मचा था। मेरी चूत भी भी जोर जोर से फड़फड़ाने लगी थी।

“पर इसे लिंग पर कैसे पहनते हैं? मुझे भी दिखाइए ना पहनकर ?” मैंने ठुनकते हुए कहा।

“हाँ….हाँ मेरी प्यारी बेटी ! आओ मैं तुम्हें सब ठीक से समझाता हूँ !” कह कर उन्होंने मुझे अपनी बाहों में भर कर चूम लिया और फिर मुझे अपने से चिपकाये हुए अपने कमरे में ले आये।

“बेटी मैं तो कब से तुम्हें सारी बातें समझाना चाहता था। देखो ! सभी लड़कियों को शादी से पहले यह सब सीख लेना चाहिए। मैं तो कहता हूँ इसकी ट्रेनिंग भी कर लेनी चाहिए।”

“किसकी.. म….मेरा मेरा मतलब है कैसे ?”

“देखो बेटी ! एक ना एक दिन तो सभी लड़कियों को चुदना ही होता है। अगर शादी होने से पहले एक-दो बार चुद लिया जाए तो बहुत अच्छा रहता है। ऐसा करने से सुहागरात में किसी तरह की कोई समस्या नहीं आती। अगर तू पहले ही बता देती तो मैं तुम्हें सारी चीजें पहले ही ठीक से समझा देता !”

“कोई बात नहीं अब आप मुझे सारी चीजें समझा दो मेरे अच्छे ताऊजी !”

ताऊजी ने मुझे एक बार फिर से अपनी बाहों में भर कर चूम लिया और मेरे अनारों को भींचने लगे। मैं पूरी तरह गर्म हो गई थी। थोड़ी देर की चूसा-चुसाई के बाद वो बोले, “बेटी अब तुम अपने सारे कपड़े उतार दो।”

“नहीं, मुझे शर्म आती है ! आपके सामने सारे कपड़े कैसे उतारूं ?” मैंने शर्माने की अच्छी एक्टिंग की।

“अरे बेटी इसमें शर्माने की क्या बात है मैंने तो तुम्हें बचपन में बहुत बार नंगा देखा है। बस अब तुम सारी शर्म लाज छोड़ दो। मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूँ तुम नहीं जानती !”

“पर कंडोम तो आपको पहन कर दिखाना है मेरे कपड़े क्यों उतार रहे हैं?”

“ओ…हो…. चलो मैं भी अपने कपड़े उतार दूँगा तुम क्यों चिंता करती हो पहले तुम्हें कुछ और बातें समझाना जरुरी है।”

उसके बाद उन्होंने मेरे सारे कपड़े उतार दिए और मुझे अपनी बाहों में भर कर फिर से चूमना शुरू कर दिया। पहले मेरे होंठों को चूमा और फिर मेरे अनारों को चूसते रहे। फिर धीरे धीरे उन्होंने मेरी चूत को टटोला और उसकी गीली फांकों को चौड़ा करते हुए अपनी एक अंगुली मेरी चूत की दरार में डाल दी। मेरी चूत में तो पहले से ही पानी की धारा बह रही थी। अंगुली का स्पर्श पाते ही ऐसा लगा जैसे चूत के अंदर एक मीठी सी आग भड़क गई है। मैं उनकी कमर पकड़ कर जोर से लिपट गई। ताऊ जी अपनी अंगुली को जल्दी जल्दी अंदर-बाहर करने लगे। मेरी सीत्कार निकालने लगी।
कहानी आगे जारी रहेगी
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02-12-2022, 01:51 PM,
#7
RE: Sex Vasna चोरी का माल
मामा के घर मौज मस्ती
मेरा नाम हरीश है। मैं अहमदाबाद का रहने वाला हूँ, 20 साल का हूँ। कॉलेज में पढ़ता हूँ। पिछले साल गर्मियों की छुट्टियों में मैं अपने ननिहाल अमृतसर घूमने गया हुआ था। मेरे मामा का छोटा सा परिवार है। मेरे मामाजी रुस्तम सेठ 45 साल के हैं और मामी सविता 42 के अलावा उनकी एक बेटी है कणिका 18 साल की। मस्त क़यामत बन गई है वो ! अब तो अच्छे-अच्छों का पानी निकल जाता है उसे देख कर। वो भी अब मोहल्ले के लौंडे लपाड़ों को देख कर नैन-मट्टका करने लगी है।

एक बात खास तौर पर बताना चाहूँगा कि मेरे नानाजी का परिवार लाहौर से अमृतसर 1947 में आया था और यहाँ आकर बस गया। पहले तो सब्जी की छोटी सी दुकान ही थी पर अब तो काम कर लिए हैं। कॉलेज के सामने एक जनरल स्टोर है जिसमें पब्लिक टेलीफ़ोन, कम्प्यूटर और नेट आदि की सुविधा भी है। साथ में जूस बार और फलों की दुकान भी है। अपना दो मंजिला मकान है और घर में सब आराम है। किसी चीज की कोई कमी नहीं है। आदमी को और क्या चाहिए। रोटी कपड़ा और मकान के अलावा तो बस सेक्स की जरुरत रह जाती है।

मैं बचपन से ही बहुत शर्मीला रहा हूँ मुझे अभी तक सेक्स का ज्यादा अनुभव नहीं था। बस एक बार बहुत पहले मेरे चाचा ने मेरी गांड मारी थी। जब से जवान हुआ था अपने लंड को हाथ में लिए ही घूम रहा था। कभी कभार एक्स फोरम पर सेक्सी कहानियाँ पढ़ लेता था और ब्लू फ़िल्म भी देख लेता था।
सच पूछो तो मैं किसी लड़की या औरत को चोदने के लिए मरा ही जा रहा था।
मामाजी और मामी को कई बार रात में चुदाई करते देखा था। वहीं 42 साल की उम्र में भी मेरी मामी सविता एकदम जवान पट्ठी ही लगती है। लयबद्ध तरीके से हिलते मोटे मोटे नितम्ब और गोल गोल स्तन तो देखने वालों पर बिजलियाँ ही गिरा देते हैं। ज्यादातर वो सलवार और कुर्ता ही पहनती है पर कभी कभार जब काली साड़ी और कसा हुआ ब्लाउज पहनती है तो उसकी लचकती कमर और गहरी नाभि देखकर तो कई मनचले सीटी बजाने लगते हैं। लेकिन दो दो चूतों के होते हुए भी मैं अब तक प्यासा ही था।

जून का महीना था। सभी लोग छत पर सोया करते थे। रात के कोई दो बजे होंगे, मेरी अचानक आँख खुली तो मैंने देखा मामा और मामी दोनों ही नहीं हैं। कणिका बगल में लेटी हुई है। मैं नीचे पेशाब करने चला गया। पेशाब करने के बाद जब मैं वापस आने लगा तो मैंने देखा मामा और मामी के कमरे की लाईट जल रही है। मैं पहले तो कुछ समझा नहीं पर ‘हाई.. ई.. ओह.. या.. उईई..’ की हल्की हल्की आवाज ने मुझे खिड़की से झांकने को मजबूर कर दिया।

खिड़की का पर्दा थोड़ा सा हटा हुआ था, अन्दर का नजारा देख कर तो मैं जड़ ही हो गया। मामा और मामी दोनों नंगे बेड पर अपनी रात रंगीन कर रहे थे। मामा नीचे लेटे थे और मामी उनके ऊपर बैठी थी।
मामा का लंड मामी की चूत में घुसा हुआ था और वो मामा के सीने पर हाथ रख कर धीरे धीरे धक्के लगा रही थी और.. आह.. उन्ह.. या.. की आवाजें निकाल रही थी।

[Image: 07de7c1323360262.jpg]

उसके मोटे मोटे नितम्ब तो ऊपर नीचे होते ऐसे लग रहे थे जैसे कोई फ़ुटबाल को किक मार रहा हो। उनकी चूत पर उगी काली काली झांटों का झुरमुट तो किसी मधुमक्खी के छत्ते जैसा था।
वो दोनों ही चुदाई में मग्न थे। कोई 8-10 मिनट तक तो इसी तरह चुदाई चली होगी। पता नहीं कब से लगे थे।

फ़िर मामी की रफ्तार तेज होती चली गई और एक जोर की सीत्कार करते हुए वो ढीली पड़ गई और मामा पर ही पसर गई। मामा ने उसे कस कर बाहों में जकड़ लिया और जोर से मामी के होंठ चूम लिए।
‘सविता डार्लिंग ! एक बात बोलूँ?’
‘क्या?’
‘तुम्हारी चूत अब बहुत ढीली हो गई है बिल्कुल मजा नहीं आता !’

[Image: a41a0c1323360321.jpg]

‘तुम गांड भी तो मार लेते हो, वो तो अभी भी टाइट है ना?’
‘ओह तुम नहीं समझी?’
‘बताओ ना?’

‘वो तुम्हारी बहन बबिता की चूत और गांड दोनों ही बड़ी मस्त थी ! और तुम्हारी भाभी जया तो तुम्हारी ही उम्र की है पर क्या टाइट चूत है साली की? मज़ा ही आ जाता है चोद कर !’

‘तो यह कहो ना कि मुझ से जी भर गया है तुम्हारा !’
‘अरे नहीं सविता रानी, ऐसी बात नहीं है दरअसल मैं सोच रहा था कि तुम्हारे छोटे वाले भाई की बीवी बड़ी मस्त है। उसे चोदने को जी करता है !’

‘पर उसकी तो अभी नई नई शादी हुई है वो भला कैसे तैयार होगी?’
‘तुम चाहो तो सब हो सकता है !’
‘वो कैसे?’

‘तुम अपने बड़े भाई से तो पता नहीं कितनी बार चुदवा चुकी हो अब छोटे से भी चुदवा लो और मैं भी उस क़यामत को एक बार चोद कर निहाल हो जाऊँ !’
‘बात तो तुम ठीक कह रहे हो, पर अविनाश नहीं मानेगा !’
‘क्यों?’
‘उसे मेरी इस चुदी चुदाई भोसड़ी में भला क्या मज़ा आएगा?’
‘ओह तुम भी एक नंबर की फुद्दू हो ! उसे कणिका का लालच दे दो ना?’
‘कणिका? अरे नहीं, वो अभी बच्ची है !’

‘अरे बच्ची कहाँ है ! पूरे अट्ठारह साल की तो हो गई है? तुम्हें अपनी याद नहीं है क्या? तुम तो दो साल कम की ही थी जब हमारी शादी हुई थी और मैंने तो सुहागरात में ही तुम्हारी गांड भी मार ली थी !’

‘हाँ, यह तो सच है पर !’
‘पर क्या?’

‘मुझे भी तो जवान लंड चाहिए ना? तुम तो बस नई नई चूतों के पीछे पड़े रहते हो, मेरा तो जरा भी ख़याल नहीं है तुम्हें?’
‘अरे तुमने भी तो अपने जीजा और भाई से चुदवाया था ना और गांड भी तो मरवाई थी ना?’
‘पर वो नए कहाँ थे मुझे भी नया और ताजा लंड चाहिए बस ! कह दिया?’

‘ओह ! तुम तरुण को क्यों नहीं तैयार कर लेती? तुम उसके मज़े लो ! मैं कणिका की सील तोड़ने का मजा ले लूँगा !’
‘पर वो मेरे सगे भाई की औलाद है, क्या यह ठीक रहेगा?’
‘क्यों इसमें क्या बुराई है?’

‘पर वो नहीं.. मुझे ऐसा करना अच्छा नहीं लगता !’

‘अच्छा चलो एक बात बताओ, जिस माली ने पेड़ लगाया है क्या उसे उस पेड़ के फल खाने का हक नहीं होना चाहिए? या जिस किसान ने इतने प्यार से फसल तैयार की है उसे उस फसल के अनाज को खाने का हक नहीं मिलना चाहिए? अब अगर मैं अपनी इस बेटी को चोदना चाहता हूँ तो इसमें क्या गलत है?’

‘ओह तुम भी एक नंबर के ठरकी हो। अच्छा ठीक है बाद में सोचेंगे?’

और फ़िर मामी ने मामा का मुरझाया लंड अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगी।kl

मैं उनकी बातें सुनकर इतना उत्तेजित हो गया था कि मुट्ठ मारने के अलावा मेरे पास अब कोई और रास्ता नहीं बचा था। मैं अपना सात इंच का लंड हाथ में लिए बाथ रूम की ओर बढ़ गया। फ़िर मुझे ख़याल आया कणिका ऊपर अकेली है। कणिका की ओर ध्यान जाते ही मेरा लंड तो जैसे छलांगें ही लगाने लगा। मैं दौड़ कर छत पर चला आया।
कहानी जारी रहेगी।
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02-12-2022, 01:52 PM,
#8
RE: Sex Vasna चोरी का माल
कम्मों बदनाम हुई-2
अब तक आपने पढ़ा
ताऊ जी अपनी अंगुली को जल्दी जल्दी अंदर-बाहर करने लगे। मेरी सीत्कार निकालने लगी।
अब आगे
कितना आनंददायक पल था। आह….. मेरी चूत उनका लंड लेने के लिए बैचैन होने लगी थी। उनका लंड भी तो मझे चोदने के लिए इठलाने लगा होगा।

अब उन्होंने मुझे कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी जांघें उठा कर कुर्सी के हत्थों पर रख दी। छोटे छोटे नरम झांटों से ढकी मेरी चूत की दरार अब कुछ खुल सी गई थी और अंदर का गुलाबी रंग झलकने लगा था अब ताऊजी ने मेरी चूत को पहले तो अपने हाथों से सहलाया और फिर अपना मुंह नीचे करके उसे सूंघा और फिर उस पर अपने होंठ टिका दिए। उनकी गर्म साँसें जैसे ही मेरी चूत पर महसूस हुई मुझे लगा मेरी चूत ने एक बार फिर पानी छोड़ दिया है। मेरी सिसकारी निकल गई और मैंने ताऊजी का सर कस कर पकड़ लिया और अपनी जांघें कस लीं। मेरी किलकारी सी निकलने लगी थी। ताऊजी बिना रुके मेरी चूत चूसे चूमे जा रहे थे।

“क्यों मेरी रानी मज़ा आ रहा है ना ?”

“हाँ.. आह… बहुत मज़ा आ रहा है… बस ऐसे ही करते रहो…उईईई…आह्ह्ह्ह्ह….”

थोड़ी देर चूसने के बाद बोले, “हाँ हाँ मेरी रानी बस तुम देखती जाओ जब चोदूंगा तो देखना और भी मज़ा आएगा।”

मैंने अपने मन में सोचा ‘मैं तो कब से चुदवाने को मरी जा रही हूँ मर्ज़ी आये उतना चोद लो ’ पर मेरे मुंह से तो बस सीत्कार ही निकल रही थी, “आह….उईईइ….माँ…..”

“एक बात बताऊँ ?”

“हुम्म”

“तुम्हारी चूत बहुत खूबसूरत है बिल्कुल तुम्हारी मम्मी की तरह !”

“आपको कैसे पता?”

“जब मैंने तुम्हारी मम्मी पहली बार चोदा था तो उसकी चूत भी बिलकुल ऐसी ही थी। बिलकुल मक्खन-मलाई !”

हे भगवान ! ताऊजी ने तो मेरी मम्मी को भी चोद लिया है। मम्मी भी बड़ी चुदक्कड़ है। चलो कोई बात नहीं अब तो रहा सहा डर भी खत्म हो गया। अब तो माँ-बेटी दोनों खूब मज़े ले ले कर चुदवाया करेंगी।

“कम्मो बेटी तेरी माँ चूत तो बड़े मज़े ले ले कर चुदवाती है, पर गांड नहीं मारने देती।”

मैं क्या बोलती- बस हाँ हूँ करती रही। मुझे अपनी चूत चटवाने में बहुत मज़ा आ रहा था। मेरा तो पानी दो बार निकल चुका था जिसे ताऊजी ने गटक लिया था। अब उन्होंने अपनी जीभ से मेरा दाना सहलाना चालू कर दिया था। वो उसे अपने होंठों और जीभ से मसल रहे थे जब उसे दांतों में लेकर होले से दबाते तो मेरे सरे शरीर में रोमांच के मारे झुरझुरी सी दौड़ जाती।

थोड़ी देर चूत चाटने और चूसने के बाद ताऊजी ने भी अपने कपड़े उतार दिए मैं उनका लंबा और मोटा लंड देख कर सकपका ही गई थी। मेरे मुंह से निकला “हाय राम इतना बड़ा?”

“क्या हुआ मेरी रानी ऐसे क्या देख रही हो?”

“आपका तो बहुत बड़ा और मोटा है?”

“ओह…मेरी रानी बड़े और मोटे से ही तो ज्यादा मज़ा आता है।”

“पर इतने मोटे और लंबे लंड से मेरी चूत कहीं फट गई तो?”

“अरे मेरी रानी कुछ नहीं होगा !” तुमसे छोटी छोटी लौंडियाँ बड़े मज़े ले ले कर पूरा लंड घोंट जाती हैं। बस एक बार ज़रा सा दर्द होगा उसके बाद तो समझो सारी जिंदगी भर का आराम और सुख है”

मैं तो आँखें फाड़े बस उस काले भुजंग को देखती ही रह गई।

“अब मोटा-पतला छोड़ो अपना मुंह खोल कर इसे चूसो। मुझे भी कुछ सुख मिल जाए। अब शर्माना छोड़ो मेरी प्यारी बेटी।”

“हुम्म…”

“तुम्हारी मम्मी तो बहुत मज़े लेकर चूसती है इसे.…” कह कर ताऊजी ने अपना काला भुजंग लंड मेरे होंठों से लगा दिया।

मैं भी लंड चूसने का स्वाद लेना चाहती थी। मैंने उनके लंड को हाथ में पकड़ लिया और पहले तो सुपारे को चाटा फिर उसे मुंह में भर कर चुस्की लगाई। ताऊजी की सीत्कार निकलने लगी।

“वाह मेरी रानी तू तो अपनी मम्मी से भी बढ़िया चूसती है…. आह्ह… मेरी रानी जोर जोर से चूसो मेरी जान… रुको मत…बस चूसती रहो..आह…आह…मेरी रानी आह…… शाबाश मेरी बेटी….. बड़ा मज़ा आ…रहा है… आह..”

उन्होंने मेरा सर पकड़ रखा था और अपनी कमर हिलाते हुए अपने लंड को मेरे मुंह में ऐसे अंदर-बाहर करने लगे जैसे मेरा मुंह न होकर कोई चूत ही हो। थोड़ी देर में ताऊजी का लंड झटके से खाने लगा। मुझे लगा मेरे मुंह में ही निकल जाएगा। मैंने उनका लंड अपने मुंह से बाहर निकाल दिया।

अब ताऊजी मेरी चूत मारने के लिए तड़फने लगे थे। उन्होंने मुझे उठा कर बेड पर लेटा कर दोनों टांगें को फैला कर चौड़ा कर दिया। ऐसा करने से मेरी चूत साफ़ नज़र आने लगी। अब वो मेरी जांघों के बीच आकर प्यार से मेरी चूत को सहलाने लगे। फिर उन्होंने अपने लंड को हाथ से पकड़ा और मेरी चूत पर रगड़ने लगे। जैसे ही उनका तन्नाया लंड मेरी फांकों से टकराया मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। सारा शरीर एक अनोखे आनंद में डूबने लगा।

“ओह….कंडोम चढ़ा लो ना !” मैंने मुस्कुरा कर कहा।

“अरे नहीं मेरी रानी.. कंडोम लगा कर मज़ा नहीं आएगा। चूत में पहली अमृत वर्षा तो बिना कंडोम के ही होनी चाहिए !” उन्होंने हँसते हुए कहा।

अब उन्होंने मेरी चूत की गुलाबी फांकों को चौड़ा किया और अपने लंड पर थूक लगा कर चूत की दरार पर घिसने लगे। फिर उन्होंने छेद पर सुपारा रखा और बोले, “मेरी प्यारी बेटी बस एक बार सुपारा अंदर चला गया तो फिर मज़े ही मज़े हैं। बस एक बार थोड़ा सा दर्द होगा मेरी रानी बेटी जरा सा सह लेना अपने ताऊ के लिए।”

मैंने हाँ में मुंडी हिला दी… मुझे कहाँ होश था। मैं तो खुद चुदाई के लिए मरी जा रही थी। फिर ताऊजी ने एक हाथ मेरे सर के नीचे लगा लिया और दूसरे हाथ से मेरी कमर पकड़ कर एक जोर का धक्का लगा दिया।

मेरी चूत भी अंदर से गीली थी। उनके लंड पर भी थूक लगा था। उनका आधा लंड मेरी कुंवारी चूत को फाड़ता हुआ अंदर चला गया। मुझे लगा मेरी चूत को किसी ने चाकू से चीर दिया है…. जैसे किसी बिच्छू ने डंक मार दिया है। भयंकर दर्द के कारण मेरी चीख निकल गई। मुझे लगा गर्म गर्म सा तरल पदार्थ मेरी चूत से बहने लगा है। शायद यह झिल्ली फटने से निकला खून था। मैं कसमसाने लगी तो ताऊजी ने मुझे कस कर अपनी बाहों में भींच लिया। आधा लंड चूत में भीतर तक धंस चुका था। चूत पूरी तरह फट चुकी थी।

मैंने उनकी बाहों से निकलने की जी-तोड़ कोशिश की पर वो बड़े धुरंधर थे। भला मुझे कसे अपने पंजों से निकलने देते। मेरी आँखों से आंसू निकलने लगे। मैं दर्द के मारे छटपटा रही थी पर ताऊजी ने मुझे भींचे रखा और फिर उन्होंने मेरे होंठों को चूमना चालू कर दिया। मैंने उनके नीचे से निकलने की बहुत कोशिश की पर वो मेरे ऊपर पड़े थे और बुरी तरह मुझे अपनी बाहों में जकड़े हुए थे। उनका आधा लंड मेरी चूत में फस था। मैं तो बस किसी कबूतरी की तरह फड़फड़ा कर ही रह गई।

“बस… बस… बेटी सब हो गया… डरो नहीं… बस मेरी रानी बिटिया… बस थोड़ा सा बर्दाश्त कर लो फिर देखना बहुत मज़ा आएगा।”

“मैं मर जाउंगी… उईईई माँ…. ओह आप हट जाओ ! मुझे नहीं चुदना !”

“अरे बेटी अब अंदर चला ही गया है तो क्यों नखरे कर रही हो। बस दर्द तो दो मिनट का है, फिर देखना तुम खुद कहोगी कि जोर जोर से करो।”

ताऊजी अपनी कोहनियों के बल हो गए थे ताकि उनका पूरा वज़न मेरे ऊपर ना पड़े। पर उन्होंने अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी। हम थोड़ी देर ऐसे ही पड़े रहे।

अब मेरा दर्द थोड़ा कम हो गया था। ताऊजी ने मुझे फिर से चूमना चालू कर दिया। कभी मेरे गालों पर आये आंसुओं को चाटते कभी होंठों को चूमते। कभी मेरे अनारों को चूसते कभी हल्के से दबाते। अब मुझे भी कुछ मज़ा आने लगा था।

फिर ताऊजी ने एक धक्का और लगाया और उनका बाकी का लंड भी अंदर चला गया। पर इस बार मुझे ज्यादा दर्द नहीं हुआ। मैंने डर के मारे अपने दांत भींच लिए और आँखें बंद किये पड़ी रही। अब तो मैं भी चाह रही थी कि वो चुदाई शुरू कर ही दें। मैंने जितना हो सकता था अपनी जांघें चौड़ी कर ली। इससे उनको बड़ी राहत मिली और उनका लंड आराम से अंदर बाहर होने लगा। ताऊजी ने मुझे बाहों में जकड़ रखा था और अब धीरे धीरे धक्के लगाने लगे।

अब मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था। मेरी चूत में जैसे कोई मीठी छुरी उतर रही थी। जैसे ही ताऊजी का लंड अंदर जाता मेरी चूत की फांकें अंदर की ओर धंस जाती। चूत के चारों और उगे छोटे छोटे बाल चूत के रस से भीग गए थे। ताऊजी के लंड से मेरी पूरी चूत जैसे भर सी गई थी। कितना बड़ा और मोटा लंड है ताऊजी का पर पूरा का पूरा चला गया है। थोड़ा फंस-फंस कर अंदर-बाहर हो रहा है।

भगवान ने चुदाई भी क्या खूब चीज बनाई है। काश…. यह वक्त रुक जाए और सारी जिंदगी बस इस चुदाई में ही बीत जाए। मैंने अपनी सहेलियों से सुना था कि जब वीर्य की धार अन्दर निकलती है तो बहुत ठंडक मिलती है। मैंने अपने हाथों से उनकी कमर पकड़ ली। अब तो मेरे नितंब और कमर भी अपने आप उछलने लगे थे। सच कहूँ तो मैं अनूठे आनंद में डूबी थी।

थोड़ी देर चोदने के बाद ताऊजी बोले, “बेटी संभालना… आह्ह….!” और फिर ताऊजी जोर जोर से धक्के लगाने लगे। उनकी साँसें फूलने लगी थी। वो जोर जोर से धक्के लगाने लगे थे जैसे कोई बिगड़ैल सांड हों। मुझे लगा कि अब इस प्यासी धरती को बारिश की पहली फुहार मिलने ही वाली है। मैंने भी अपनी बाहें उनकी कमर से कस लीं।

मुझे लगा मेरा शरीर भी कुछ अकड़ने लगा है और लगा जैसे मेरा सु-सु निकल जाएगा। सारा शरीर और मेरा रोम-रोम जैसे रोमांच में डूबने लगा था। ओह्ह…. इस आनंद को शब्दों में तो बताया ही नहीं जा सकता। मुझे लगा मेरी चूत से पानी जैसा कुछ निकल गया है। अब तो मेरी चूत से फच्च फच्च जैसी आवाजें आनी शुरू हो गई थी। मैंने अपने पैर हवा में ऊपर उठा लिए। मेरी चूत तो जैसे पानी छोड़ छोड़ कर पागल ही हुई जा रही थी। इस अद्भुत आनंद के मारे मैं तो सिसियाने लगी थी। मेरा मन कर रहा था ताऊजी मुझे और जोर जोर से चोदें।

मैं चिल्लाई “मेरे प्यारे ताऊजी… मेरे सनम… मेरे राजा अब रुकना नहीं… आह.. मैं तो मर गई मेरी जान… आह..”

मैं ताऊजी से जोर से चिपक गई। मैं तो दुबारा झड़ गई थी। फिर 2-4 धक्के मारने के बाद ताऊजी की भी पिचकारी अंदर फूट गई। ताऊजी गूं… गूं…. की आवाज़ के साथ शहीद हो कर मेरे ऊपर पड़ गए। मैं उनका सर सहलाने लगी। मेरी तो खुशी के मारे किलकारी ही निकल गई थी। इसी के साथ मेरे पैर धड़ाम से नीचे गिर गए और मैं किसी कटी पतंग की तरह आसमान की बुलंदियों से नीचे जमीन पर गिरने लगी।

हम लोग थक कर जोर-जोर से लम्बी साँसों के साथ मीठी सीत्कारें कर रहे थे पर एक दूसरे की बाहों से अलग नहीं होना चाहते थे। ताऊजी ने मुझे एक बार फिर से चूम लिया।

उस दिन ताऊजी ने मुझे तीन बार चोदा। मैंने उनका पूरा साथ दिया। मैं तो एक बार और भी चुदवा लेती पर उनके लौड़े में अब जान कहाँ बची थी। मैंने उनका लंड भी एक बार चूस कर देखा और उसकी मलाई भी खाई पर मलाई थोड़ी ही निकली। चलो कोई बात नहीं कल फिर खा लूंगी। और कल ही क्यों ? अब तो रोज खाया करूंगी। अब मुझे बिना मलाई खाए और चुदवाये नींद ही नहीं आएगी।

आपकी कुसुम… अ … र र… कम्मो….

बस दोस्तों ! यह थी कम्मो के बदनाम होने की दास्ताँ। सच बताना कैसी लगी कम्मो की चुदाई ? मज़ा आया या नहीं ? आपका खड़ा हुआ या नहीं और मेरी प्यारी पाठिकाओं की पेंटी गीली हुई या नहीं ?
इससे आगे की कहानी मैं जल्दी ही आपको “कम्मो की गांड गुलाबी चूत शराबी” के नाम से जल्दी ही सुनाऊंगा पर कम्मो के बदनाम होने पर आपके कमेन्टस का इन्तजार है।
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02-12-2022, 01:53 PM,
#9
RE: Sex Vasna चोरी का माल
माया मेमसाब
नई कहानी

बाद मुर्दन के जन्नत मिले ना मिले ग़ालिब क्या पता
गाण्ड मार के इस दूसरी जन्नत का मज़ा तो लूट ही ले

बाथरूम की ओर जाते समय पीछे से उसके भारी और गोल मटोल नितम्बों की थिरकन देख कर तो मेरे दिल पर छुर्रियाँ ही चलने लगी। मैं जानता था पंजाबी लड़कियाँ गाण्ड भी बड़े प्यार से मरवा लेती हैं। और वैसे भी आजकल की लड़कियाँ शादी से पहले चूत मरवाने से तो परहेज करती हैं पर गाण्ड मरवाने के लिए अक्सर राज़ी हो जाती हैं। आप तो जानते ही हैं मैं गाण्ड मारने का कितना शौक़ीन हूँ। बस मधु ही मेरी इस इच्छा को पूरी नहीं करती थी बाकी तो मैंने जितनी भी लड़कियों या औरतों को चोदा है उनकी गाण्ड भी जरूर मारी है। इतनी खूबसूरत सांचे में ढली मांसल गाण्ड तो मैंने आज तक नहीं देखी थी। काश यह भी आज राज़ी हो जाए तो कसम से मैं तो इसकी जिन्दगी भर के लिए गुलामी ही कर लूं।
इसी कहानी से…

हमारी शादी को 4-5 महीने होने को आये थे और हम लगभग रोज़ ही मधुर मिलन (चुदाई) का आनंद लिया करते थे। मैंने मधुर को लगभग हर आसन में और घर के हर कोने में जी भर कर चोदा था। पता नहीं हम दोनों ने कामशास्त्र के कितने ही नए अध्याय लिखे होंगे। पर सच कहूं तो चुदाई से हम दोनों का ही मन नहीं भरा था। कई बार तो रात को मेरी बाहों में आते ही मधुर इतनी चुलबुली हो जाया करती थी कि मैं रति पूर्व क्रीड़ा भी बहुत ही कम कर पाता था और झट से अपना पप्पू उसकी लाडो में डाल कर प्रेम युद्ध शुरू कर दिया करता था।

एक बात आपको और बताना चाहूँगा। मधुर ने तो मुझे दूध पीने और शहद चाटने की ऐसी आदत डाल दी है कि उसके बिना तो अब मुझे नींद ही नहीं आती। और मधुर भी मलाई खाने की बहुत बड़ी शौक़ीन बन गई है। आप नहीं समझे ना? चलो मैं विस्तार से समझाता हूँ :

हमारा दाम्पत्य जीवन (चुदाई अभियान) वैसे तो बहुत अच्छा चल रहा था पर मधु व्रत त्योहारों के चक्कर में बहुत पड़ी रहती है। आये दिन कोई न कोई व्रत रखती ही रहती है। ख़ास कर शुक्र और मंगलवार का व्रत तो वो जरूर रखती है।
उसका मानना है कि इस व्रत से पति का शुक्र गृह शक्तिशाली रहता है। पर दिक्कत यह है कि उस रात वो मुझे कुछ भी नहीं करने देती। ना तो वो खुद मलाई खाती है और ना ही मुझे दूध पीने या शहद चाटने देती है।

लेकिन शनिवार की सुबह वह जल्दी उठ कर नहा लेती है और फिर मुझे एक चुम्बन के साथ जगाती है।
कई बार तो उसकी खुली जुल्फें मेरे चहरे पर किसी काली घटा की तरह बिखर जाती हैं और फिर मैं उसे बाँहों में इतनी जोर से भींच लेता हूँ कि उसकी कामुक चित्कार ही निकल जाती है और फिर मैं उसे बिना रगड़े नहीं मानता। वो तो बस कुनमुनाती सी रह जाती है।
और फिर वो रात (शनिवार) तो हम दोनों के लिए ही अति विशिष्ट और प्रतीक्षित होती है। उस रात हम दोनों आपस में एक दूसरे के कामांगों पर शहद लगा कर इतना चूसते हैं कि मधु तो इस दौरान 2-3 बार झड़ जाया करती है और मेरा भी कई बार उसके मुँह में ही विसर्जित हो जाया करता है जिसे वो किसी अमृत की तरह गटक लेती है।

रविवार वाले दिन फिर हम दोनों साथ साथ नहाते हैं और फिर बाथरूम में भी खूब चूसा चुसाई के दौर के बाद एक बार फिर से गर्म पानी के फव्वारे के नीचे घंटों प्रेम मिलन करते रहते हैं। कई बार वो बाथटब में मेरी गोद में बैठ जाया करती है या फिर वो पानी की नल पकड़ कर या दीवाल के सहारे थोड़ी नीचे झुक कर अपने नितम्बों को थिरकाती रहती है और मैं उसके पीछे आकर उसे बाहों में भर लेता हूँ और फिर पप्पू और लाडो दोनों में महा संग्राम शुरू हो जाता है।

उसके गोल मटोल नितम्बों के बीच उस भूरे छेद को खुलता बंद होता देख कर मेरा जी करता अपने पप्पू को उसमें ही ठोक दूँ। पर मैं उन पर सिवाय हाथ फिराने या नितम्बों पर चपत (हलकी थपकी) लगाने के कुछ नहीं कर पाता। पता नहीं उसे गाण्ड मरवाने के नाम से ही क्या चिढ़ थी कि मेरे बहुत मान मनोवल के बाद भी वो टस से मस नहीं होती थी।

एक बात जब मैंने बहुत जोर दिया तो उसने तो मुझे यहाँ तक चेतावनी दे डाली थी कि अगर अब मैंने दुबारा उसे इस बारे में कहा तो वो मुझ से तलाक ही ले लेगी।

मेरा दिल्ली वाला दोस्त सत्य जीत तो अक्सर मुझे उकसाता रहता था कि गुरु किसी दिन उल्टा पटक कर रगड़ डालो। शुरू शुरू में सभी पत्नियाँ नखरे करती हैं वो भी एक बार ना नुकर करेगी फिर देखना वो तो इसकी इतनी दीवानी हो जायेगी कि रोज़ करने को कहने लगेगी।

ओह…यार जीत सभी की किस्मत तुम्हारे जैसी नहीं होती भाई।

एक और दिक्कत थी। शुरू शुरू में तो हम बिना निरोध (कंडोम) के सम्भोग कर लिया करते थे पर अब तो वो बिना निरोध के मुझे चोदने ही नहीं देती। और माहवारी के उन 3-4 दिनों में तो पता नहीं उसे क्या बिच्छू काट खाते हैं वो तो मधु से मधु मक्खी ही बन जाती है। चुदाई की बात तो छोड़ो वो तो अपने पुट्ठे पर हाथ भी नहीं धरने देती।
इसलिए पिछले 3 दिनों से हमारा चुदाई कार्यक्रम बिल्कुल बंद था और आज उसे जयपुर जाना था, आप मेरी हालत समझ सकते हैं।

आप की जानकारी के लिए बता दूं राजस्थान में होली के बाद गणगौर उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। कुंवारी लड़कियाँ और नव विवाहिताएं अपने पीहर (मायके) में आकर विशेष रूप से 16 दिन तक गणगौर का पूजन करती हैं मैं तो मधु को भेजने के मूड में कतई नहीं था और ना ही वो जाना चाहती थी पर वो कहने लगी कि विवाह को 3-4 महीने हो गए हैं वो इस बहाने भैया और भाभी से भी मिल आएगी।

मैं मरता क्या करता। मैं इतनी लम्बी छुट्टी लेकर उसके साथ नहीं जा सकता था तो हमने तय किया कि मैं गणगोर उत्सव के 1-2 दिन पहले जयपुर आ जाऊँगा और फिर उसे अपने साथ ही लेता आऊँगा। मैंने जब उसे कहा कि वहाँ तुम्हें मेरे साथ ही सोना पड़ेगा तो वो तो मारे शर्म के गुलज़ार ही हो गई और कहने लगी- हटो परे… मैं भला वहाँ तुम्हारे साथ कैसे सो सकती हूँ?’

‘क्यों?’

‘नहीं… मुझे बहुत लाज आएगी? वहाँ तो रमेश भैया, सुधा भाभी और मिक्की भी होंगी ना? उनके सामने मैं… ना बाबा ना… मैं नहीं आ सकूंगी… यहाँ आने के बाद जो करना हो कर लेना!’

‘तो फिर मैं जयपुर नहीं आऊँगा!’ मैंने बनावती गुस्से से कहा।
‘ओह…?’ वो कातर (निरीह-उदास) नज़रों से मुझे देखने लगी।
‘एक काम हो सकता है?’ उसे उदास देख कर मैंने कहा।
‘क्या?’

‘वो सभी लोग तो नीचे सोते हैं। मैं ऊपर चौबारे में सोऊँगा तो तुम रात को चुपके से दूध पिलाने के बहाने मेरे पास आ जाना और फिर 3-4 बार जम कर चुदवाने के बाद वापस चली जाना!’ खाते हुए मैंने उसे बाहों में भर लेना चाहा।

‘हटो परे… गंदे कहीं के!’ मधु ने मुझे परे धकेलते हुए कहा।
‘क्यों… इसमें गन्दा क्या है?’

‘ओह .. प्रेम… तुम भी… ना.. चलो ठीक है पर तुम कमरे की बत्ती बिल्कुल बंद रखना… मैं बस थोड़ी देर के लिए ही आ पाऊँगी!’ मधु होले होले मुस्कुरा रही थी।
मैं जानता था उसे भी मेरा यह प्रस्ताव जम गया है। इसका एक कारण था।

चुदाई के बाद मधु लगभग रोज़ ही मुझे छुहारे मिला गर्म दूध जरूर पिलाया करती है। वो कहती है इसके पीने से आदमी सदा जवान बना रहता है। वैसे मैं तो सीधे उसके दुग्धकलशों से दूध पीने का आदि बन गया था पर चलो उसका मेरे पास आने का यह बहाना बहुत ही सटीक था।

मधु के जयपुर चले जाने के बाद वो 10-15 दिन मैंने कितनी मुश्किल से बिताये थे, मैं ही जानता हूँ। उसकी याद तो घर के हर कोने में बसी थी। हम रोज़ ही घंटों फ़ोन पर बातें और चूमा चाटी भी करते और उन सुहानी यादों को एक बार फिर से ताज़ा कर लिया करते।

मैं गणगोर उत्सव से 2 दिन पहले सुबह सुबह ही जयपुर पहुँच था। आप सभी को वो छप्पनछुरी ‘माया मेम साब’ तो जरुर याद होगी?
अरे भई मैं सुधा भाभी की छोटी बहन माया की बात कर रहा हूँ जिसे सभी ‘माया मेम साब’ के नाम से बुलाते हैं?
पूरी पटाका (आइटम बम) लगती है जैसे लिम्का की बोतल हो। और उसके नखरे तो बस बल्ले बल्ले… होते हैं। नाक पर मक्खी नहीं बैठने देती। दिन में कम से कम 6 बार तो पेंटी बदलती होगी।

माया में साब अहमदाबाद में एम बी ए कर रही है पर आजकल परीक्षा पूर्व की छुट्टियों में जयपुर में ही जलवा अफरोज थी। एक बार मेरे साथ उसकी शादी का प्रस्ताव भी आया था पर मधु ने बाज़ी मार ली थी।

सच कहूं तो उसके नितम्ब तो जीन्स और कच्छी में संभाले ही नहीं संभलते। साली के क्या मस्त कूल्हे और मम्मे हैं। उनकी लचक देख कर तो बंद अपने होश-ओ-हवास ही खो बैठे। और ख़ास कर उसके लचक कर चलने का अंदाज़ तो इतना कातिलाना था कि उसे देख कर मुझे अपनी जांघों पर अखबार रखना पड़ा था।

जब कभी वो पानी या नाश्ता देने के बहाने झुकती है तो उसके गोल गोल कंधारी अनारों को देख कर तो मुँह में पानी ही टपकने लगता है। पंजाबी लडकियाँ तो वैसे भी दिलफेंक और आशिकाना मिजाज़ की होती हैं मुझे तो पूरा यकीन है माया कॉलेज के होस्टल में अछूती तो नहीं बची होगी।

दिन में रमेश (मेरा साला) तो 3-4 दिनों के लिए टूर पर निकल गए और मधु अपनी भाभी के साथ उसके कमरे में ही चिपकी रही। पता नहीं दोनों सारा दिन क्या खुसर-फुसर करती रहती हैं। मेरे पास माया मेम साब और मिक्की के साथ कैरम बोट और लूडो खेलने के अलावा कोई काम नहीं था।

माया ने जीन का निक्कर पहन रखा था जिसमें उसकी गोरी गोरी पुष्ट जांघें तो इतनी चिकनी लग रही थी जैसे संग-ए-मरमर की बनी हों। उसकी जाँघों के रंग को देख कर तो उसकी चूत के रंग का अंदाज़ा लगाना कतई मुश्किल नहीं था। मेरा अंदाज़ा था कि उसने अन्दर पेंटी नहीं डाली होगी। उसने कॉटन की शर्ट पहन रखी थी जिसके आगे के दो बटन खुले थे।

कई बार खेलते समय वो घुटनों के बल बैठी जब थोड़ा आगे झुक जाती तो उसके भारी उरोज मुझे ललचाने लगते। वो फिर जब कनखियों से मेरी ओर देखती तो मैं ऐसा नाटक करता जैसे मैंने कुछ देखा ही ना हो। पता नहीं उसके मन में क्या था पर मैं तो यही सोच रहा था कि काश एक रात के लिए मेरी बाहों में आ जाए तो मैं इसे उल्टा पटक कर अपने दबंग लण्ड से इसकी गाण्ड मार कर अपना जयपुर आना और अपना जीवन दोनों को धन्य कर लूं।

काश यह संभव हो पाता। मुझे ग़ालिब का एक शेर याद आ रहा है :

बाद मुर्दन के जन्नत मिले ना मिले ग़ालिब क्या पता
गाण्ड मार के इस दूसरी जन्नत का मज़ा तो लूट ही ले!

शाम को हम सभी साथ बैठे चाय पी रहे थे। माया तो पूरी मुटियार बनी थी। गुलाबी रंग की पटियाला सलवार और हरे रंग की कुर्ती में उसका जलवा दीदा-ए-वार (देखने लायक) था। माया अपने साथ मुझे डांस करने को कहने लगी।

मैंने उसे बताया कि मुझे कोई ज्यादा डांस वांस नहीं आता तो वो बोली- यह सब तो मधुर की गलती है।
‘क्यों? इसमें भला मेरी क्या गलती है?’ मधु ने तुनकते हुए कहा।
‘सभी पत्नियाँ अपने पतियों को अपनी अंगुली पर नचाती हैं यह बात तो सभी जानते हैं!’

उसकी इस बात पर सभी हंसने लगे। फिर माया ने ‘ये काली काली आँखें गोरे गोरे गाल… देखा जो तुम्हें जानम हुआ है बुरा हाल’ पर जो ठुमके लगाए कि मेरा दिल तो यह गाने को करने लगा ‘ये काली काली झांटे… ये गोरी गोरी गाण्ड…’

कहानी जारी रहेगी!
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02-12-2022, 01:56 PM,
#10
RE: Sex Vasna चोरी का माल
माया मेमसाब
(भाग -२)
बाद मुर्दन के जन्नत मिले ना मिले ग़ालिब क्या पता
गाण्ड मार के इस दूसरी जन्नत का मज़ा तो लूट ही ले!
शाम को हम सभी साथ बैठे चाय पी रहे थे। माया तो पूरी मुटियार बनी थी। गुलाबी रंग की पटियाला सलवार और हरे रंग की कुर्ती में उसका जलवा दीदा-ए-वार (देखने लायक) था। माया अपने साथ मुझे डांस करने को कहने लगी।
मैंने उसे बताया कि मुझे कोई ज्यादा डांस वांस नहीं आता तो वो बोली ‘यह सब तो मधुर की गलती है।’
‘क्यों? इसमें भला मेरी क्या गलती है?’ मधु ने तुनकते हुए कहा।
‘सभी पत्नियाँ अपने पतियों को अपनी अंगुली पर नचाती हैं यह बात तो सभी जानते हैं!’
उसकी इस बात पर सभी हंसने लगे। फिर माया ने ‘ये काली काली आँखें गोरे गोरे गाल… देखा जो तुम्हें जानम हुआ है बुरा हाल’ पर जो ठुमके लगाए कि मेरा दिल तो यह गाने को करने लगा ‘ये काली काली झांटे… ये गोरी गोरी गाण्ड…’ Click to expand...
[Image: BD-HOT-WIFE-68.jpg]

[Image: BD-HOT-WIFE-15.jpg]
अब आगे
सच कहूँ तो उसके नितम्बों को देख कर तो मैं इतना उत्तेजित हो गया था कि एक बार तो मेरा मन बाथरूम हो आने को करने लगा। मेरा तो मन कर रहा था कि डांस के बहाने इसे पकड़ कर अपनी बाहों में भींच ही लूँ!

वैसे मधुर भी बहुत अच्छा डांस करती है पर आज उसने पता नहीं क्यों डांस नहीं किया वरना तो वो ऐसा कोई मौका कभी नहीं चूकती।

खाना खाने के बाद रात को कोई 11 बजे माया और मिक्की अपने कमरे में चली गई थी। मैं भी मधु को दूध पिला जाने का इशारा करना चाहता था पर वो कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

मैं सोने के लिए ऊपर चौबारे में चला आया। हालांकि मौसम में अभी भी थोड़ी ठंडक जरुर थी पर मैंने अपने कपड़े उतार दिए थे और मैं नंगधडंग बिस्तर पर बैठा मधु के आने का इंतज़ार करने लगा।
मेरा लण्ड तो आज किसी अड़ियल टट्टू की तरह खड़ा था। मैं उसे हाथ में पकड़े समझा रहा था कि बेटा बस थोडा सा सब्र और कर ले तेरी लाडो आती ही होगी।

मेरे अन्दर पिछले 10-15 दिनों से जो लावा कुलबुला रहा था मुझे लगा अगर उसे जल्दी ही नहीं निकाला गया तो मेरी नसें ही फट पड़ेंगी। आज मैंने मन में ठान लिया था कि मधु के कमरे में आते ही चूमाचाटी का झंझट छोड़ कर एक बार उसे बाहों में भर कर कसकर जोर जोर से रगडूंगा।

मैं अभी इन खयालों में डूबा ही था कि मुझे किसी के आने की पदचाप सुनाई दी। वो सर झुकाए हाथों में थर्मस और एक गिलास पकड़े धीमे क़दमों से कमरे में आ गई। कमरे में अँधेरा ही था मैंने बत्ती नहीं जलाई थी।

जैसे ही वो बितर के पास पड़ी छोटी स्टूल पर थर्मस और गिलास रखने को झुकी मैंने उसे पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया। मेरा लण्ड उसके मोटे मोटे नितम्बों की खाई से जा टकराया। मैंने तड़ातड़ कई चुम्बन उसकी पीठ और गर्दन पर ही ले लिए और एक हाथ नीचा करके उसके उरोजों को पकड़ लिया और दूसरे हाथ से उसकी लाडो को भींच लिया।

उसने पतली सी नाइटी पहन रखी थी और अन्दर ब्रा और पेंटी नहीं पहनी थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसके नितम्ब और उरोज इन 10-15 दिनों में इतने बड़े बड़े और भारी कैसे हो गए। कहीं मेरा भ्रम तो नहीं। मैंने अपनी एक अंगुली नाइटी के ऊपर से ही उसकी लाडो में घुसाने की कोशिश करते हुए उसे पलंग पर पटक लेने का प्रयास किया।

वह थोड़ी कसमसाई और अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करने लगी। इसी आपाधापी में उसकी एक हलकी सी चीख पूरे कमरे में गूँज गई… ‘ऊईईई… ईईईई… जीजू ये क्या कर रहे हो…? छोड़ो मुझे…!’

मैं तो उस अप्रत्याशित आवाज को सुनकर हड़बड़ा ही गया। वो मेरी पकड़ से निकल गई और उसने दरवाजे के पास लगे लाईट के बटन को ऑन कर दिया। मैं तो मुँह बाए खड़ा ही रह गया।

लाईट जलने के बाद मुझे होश आया कि मैं तो नंग धडंग ही खड़ा हूँ और मेरा 7 इंच का लण्ड कुतुबमीनार की तरह खड़ा जैसे आये हुए मेहमान को सलामी दे रहा है। मैंने झट से पास रखी लुंगी अपनी कमर पर लपेट ली।

‘ओह… ब…म… माया तुम?’
‘जीजू… कम से कम देख तो लेना था?’
‘वो… स .. सॉरी… मुझे लगा मधु होगी?’

‘तो क्या तुम मधु के साथ भी इस तरह का जंगलीपन करते हो?’
‘ओह .. सॉरी…’ मैं तो कुछ बोलने की हालत में ही नहीं था।
वो मेरी लुंगी के बीच खड़े खूंटे की ओर ही घूरे जा रही थी।

‘मैं तो दूध पिलाने आई थी! मुझे क्या पता कि तुम मुझे इस तरह दबोच लोगे? भला किसी जवान कुंवारी लड़की के साथ कोई ऐसा करता है?’ उसने उलाहना देते हुए कहा।

‘माया… सॉरी… अनजाने में ऐसा हो गया… प्लीज म… मधु से इस बात का जिक्र मत करना!’ मैं हकलाता हुआ सा बोला।

मेरे मुँह से तो आवाज ही नहीं निकल रही थी, मैंने कातर नज़रों से उसकी ओर देखा।

‘किस बात का जिक्र?’

‘ओह… वो… वो कि मैंने मधु समझ कर तुम्हें पकड़ लिया था ना?’
‘ओह… मैं तो कुछ और ही समझी थी?’ वो हंसने लगी।
‘क्या?’

‘मैं तो यह सोच रही थी कि तुम कहोगे कि कमरे में तुम्हारे नंगे खड़े होने वाली बात को मधु से ना कहूं?’ वो खिलखिला कर हंस पड़ी।
अब मेरी जान में जान आई।

‘वैसे एक बात कहूं?’ उसने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘क… क्या?’
‘वैसे आप बिना कपड़ों के भी जमते हो!’
‘धत्त शैतान…!’

‘हुंह… एक तो मधु के कहने पर मैं दूध पिलाने आई और ऊपर से मुझे ही शैतान कह रहे हो! धन्यवाद करना तो दूर बैठने को भी नहीं कहा?’

‘ओह… सॉरी? प्लीज बैठो!’ मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह विचित्र ब्रह्म माया मेम साब इतना जल्दी मिश्री की डली बन जायेगी। यह तो नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देती।

‘जीजू एक बात पूछूँ?’ वो मेरे पास ही बिस्तर पर बैठते हुए बोली।
‘हम्म…?’
‘क्या वो छिपकली (मधुर) रोज़ इसी तरह तुम्हें दूध पिलाती है?’
‘ओह… हाँ… पिलाती तो है!’

‘ओये होए… होर नाल अपणा शहद वी पीण देंदी है ज्या नइ?’ (ओहो… और साथ में अपना मधु भी पीने देती है या नहीं) वो मंद मंद मुस्कुरा रही थी। सुधा भाभी और माया पटियाला के पंजाबी परिवार से हैं इसलिए कभी कभी पंजाबी भी बोल लेती हैं।

अजीब सवाल था। कहीं मधु ने इसे हमारे अन्तरंग क्षणों और प्रेम युद्ध के बारे में सब कुछ बता तो नहीं दिया? ये औरतें भी बड़ी अजीब होती हैं पति के सामने तो शर्माने का इतना नाटक करेंगी और अपनी हम उम्र सहेलियों को अपनी सारी निजी बातें रस ले ले कर बता देंगी।

‘हाँ… पर तुम क्यों पूछ रही हो?’

‘उदां ई? चल्लो कोई गल नइ! जे तुस्सी नई दसणा चाहंदे ते कोई गल नइ… मैं जान्नी हाँ फेर?’ (ऐसे ही? चलो तुम ना बताना चाहो तो कोई बात नहीं… मैं जाती हूँ फिर) वो जाने के लिए खड़ी होने लगी।

मैंने झट से उसकी बांह पकड़ते हुए फिर से बैठते हुए कहा- ओह… तुम तो नाराज़ हो गई? वो… दरअसल… भगवान् ने पति पत्नी का रिश्ता ही ऐसा बनाया है!’

‘अच्छाजी… होर बदले विच्च तुस्सी की पिलांदे ओ?’ (अच्छाजी… और बदले में आप क्या पिलाते हो) वो मज़ाक करते हुए बोली।

हे लिंग महादेव! यह किस दूध मलाई और शहद की बात कर रही है? अब तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई थी। लगता है मधुर ने इसे हमारी सारी अन्तरंग बातें बता दी हैं। जरुर इसके मन भी कुछ कुलबुला रहा है। मैं अगर थोड़ा सा प्रयास करूँ तो शायद यह पटियाला पटाका मेरी बाहों में आ ही जाए।

‘ओह .. जब तुम्हारी शादी हो जायेगी तब अपने आप सब पता लग जाएगा!’ मैंने कहा।

‘कि पता कोई लल्लू जिहा टक्कर गिया ताँ?’ (क्या पता कोई लल्लू टकर गया तो)

‘अरे भई! तुम इतनी खूबसूरत हो! तुम्हें कोई लल्लू कैसे टकराएगा?’

‘ओह… मैं कित्थे खूबसूरत हाँ जी?’ (ओह… मैं कहाँ खूबसूरत हूँ जी)
मैं जानता था उसके मन में अभी भी उस बात की टीस (मलाल) है कि मैंने उसकी जगह मधु को शादी के लिए क्यों चुना था। यह स्त्रीगत ईर्ष्या होती ही है, और फिर माया भी तो आखिर एक स्त्री ही है अलग कैसे हो सकती है।

‘माया एक बात सच कहूं?’
‘हम्म…?’
‘माया तुम्हारी फिगर… मेरा मतलब है खासकर तुम्हारे नितम्ब बहुत खूबसूरत हैं!’
‘क्यों उस मधुमक्खी के कम हैं क्या?’
‘अरे नहीं यार तुम्हारे मुकाबले में उसके कहाँ?’

वो कुछ सोचती जा रही थी। मैं उसके मन की उथल पुथल को अच्छी तरह समझ रहा था।
मैंने अगला तीर छोड़ा- माया मेम साब, सच कहता हूँ अगर तुम थोड़ी देर नहीं चीखती या बोलती तो आज… तो बस…?’
‘बस… की?’ (बस क्या?)

‘वो… वो… छोड़ो… मधु को क्या हुआ वो क्यों नहीं आई?’ मैंने जान बूझ कर विषय बदलने की कोशिश की। क्या पता चिड़िया नाराज़ ही ना हो जाए।
‘किउँ… मेरा आणा चंगा नइ लग्या?’ (क्या मेरा आणा अच्छा नहीं लगा?)
‘ओह… अरे नहीं बाबा वो बात नहीं है… मेरी साली साहिबा जी!’

‘पता नहीं खाना खाने के बाद से ही उसे सरदर्द हो रहा था या बहाना मार रही थी सो गई और फिर सुधा दीदी ने मुझे आपको दूध पिला आने को कहा…’

‘ओह तो पिला दो ना?’ मैंने उसके मम्मों (उरोजों) को घूरते हुए कहा।

‘पर आप तो दूध की जगह मुझे ही पकड़ कर पता नहीं कुछ और करने के फिराक में थे?’

‘तो क्या हुआ साली भी तो आधी घरवाली ही होती है!’
‘अई हई… जनाब इहो जे मंसूबे ना पालणा? मैं पटियाला दी शेरनी हाँ? इदां हत्थ आउन वाली नइ जे?’ (ओये होए जनाब इस तरह के मंसूबे मत पालना? मैं पटियाला की शेरनी हूँ इस तरह हाथ आने वाली नहीं हूँ)

‘हाय मेरी पटियाला की मोरनी मैं जानता हूँ… पता है पटियाला के बारे में दो चीजें बहुत मशहूर हैं?’
‘क्या?’
‘पटियाला पैग और पटियाला सलवार?’
‘हम्म… कैसे?’
‘एक चढ़ती जल्दी है और एक उतरती जल्दी है!’
‘ओये होए… वड्डे आये सलवार लाऽऽन आले?’

‘पर मेरी यह शेरनी आधी गुजराती भी तो है?’ (माया गुजरात के अहमदाबाद शहर से एम बी ए कर रही है)
‘तो क्या हुआ?’
‘भई गुजराती लड़कियाँ बहुत बड़े दिल वाली होती हैं। अपने प्रेमीजनों का बहुत ख़याल रखती हैं।’
‘अच्छाजी… तो क्या आप भी जीजू के स्थान पर अब प्रेमीजन बनना चाहते हैं?’
‘तो इसमें बुरा क्या है?’

‘जेकर ओस कोड़किल्ली नू पता लग गिया ते ओ शहद दी मक्खी वांग तुह्हानूं कट खावेगी?’ (अगर उस छिपकली को पता चल गया तो वो मधु मक्खी की तरह आपको काट खाएगी) वो मधुर की बात कर रही थी।

‘कोई बात नहीं! तुम्हारे इस शहद के बदले मधु मक्खी काट भी खाए तो कोई नुक्सान वाला सौदा नहीं है!’ कहते हुए मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

मेरा अनुमान था वो अपना हाथ छुड़ा लेगी। पर उसने अपना हाथ छुड़ाने का थोड़ा सा प्रयास करते हुए कहा- ओह… छोड़ो जीजू क्या करते हो… कोई देख लेगा… चलो दूध पी लो फिर मुझे जाना है!’

‘मधु की तरह तुम अपने हाथों से पिला दो ना?’
‘वो कैसे… मेरा मतलब मधु कैसे पिलाती है मुझे क्या पता?’

मेरे मन में तो आया कह दूं ‘अपनी नाइटी खोलो और इन अमृत कलशों में भरा जो ताज़ा दूध छलक रहा है उसे ही पिला दो’ पर मैंने कहा- वो पहले गिलास अपने होंठों से लगा कर इसे मधुर बनाती है फिर मैं पीता हूँ!’

‘अच्छाजी… पर मुझे तो दूध अच्छा नहीं लगता मैं तो मलाई की शौक़ीन हूँ!’
‘कोई बात नहीं तुम मलाई भी खा लेना!’ मैंने हंसते हुए कहा।

मुझे लगा चिड़िया दाना चुगने के लिए अपने पैर जाल की ओर बढ़ाने लगी है, उसने थर्मस खोल कर गिलास में दूध डाला और फिर गिलास मेरी ओर बढ़ा दिया।

‘माया प्लीज तुम भी इस दूध का एक घूँट पी लो ना?’
‘क्यों?’
‘मुझे बहुत अच्छा लगेगा!’
उसने दूध का एक घूँट भरा और फिर गिलास मेरी ओर बढ़ा दिया।

मैंने ठीक उसी जगह पर अपने होंठ लगाए जहाँ पर माया के होंठ लगे थे। माया मुझे हैरानी से देखती हुई मंद मंद मुस्कुराने लगी थी। किसी लड़की को प्रभावित करने के यह टोटके मेरे से ज्यादा भला कौन जानता होगा।

‘वाह माया मेम साब, तुम्हारे होंठों का मधु तो बहुत ही लाजवाब है यार?’
‘हाय ओ रब्बा… हटो परे… कोई कल्ली कुंवारी कुड़ी दे नाल इहो जी गल्लां करदा है?’ (हे भगवान् हटो परे कोई अकेली कुंवारी लड़की के साथ ऐसी बात करता है क्या) वो तो मारे शर्म ले गुलज़ार ही हो गई।

‘मैं सच कहता हूँ तुम्हारे होंठों में तो बस मधु भरा पड़ा है। काश! मैं इनका थोड़ा सा मधु चुरा सकता!’
‘तुमने ऐसी बातें की तो मैं चली जाऊँगी!’ उसने अपनी आँखें तरेरी।
‘ओह… माया, सच में तुम्हारे होंठ और उरोज बहुत खूबसूरत हैं… पता नहीं किसके नसीब में इनका रस चूसना लिखा है।’
‘जीजू तुम फिर…? मैं जाती हूँ!’

वो जाने का कह तो रही थी पर मुझे पता था उसकी आँखों में भी लाल डोरे तैरने लगे हैं। बस मन में सोच रही होगी आगे बढ़े या नहीं। अब तो मुझे बस थोड़ा सा प्रयास और करना है और फिर तो यह पटियाला की शेरनी बकरी बनते देर नहीं लगाएगी।

‘माया चलो दूध ना पिलाओ! एक बार अपने होंठों का मधु तो चख लेने दो प्लीज?’
‘ना बाबा ना… केहो जी गल्लां करदे ओ… किस्से ने वेख लया ते? होर फेर की पता होंठां दे मधु दे बहाने तुसी कुज होर ना कर बैठो?’ (ना बाबा ना… कैसी बातें करते हो किसी ने देख लिया तो? और तुम क्या पता होंठों का मधु पीते पीते कुछ और ना कर बैठो)

कहानी जारी रहेगी!
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