Sex Vasna चोरी का माल
02-12-2022, 01:58 PM,
#11
RE: Sex Vasna चोरी का माल
माया मेमसाब
(भाग-3)
अब तक आपने पढा
माया चलो दूध ना पिलाओ! एक बार अपने होंठों का मधु तो चख लेने दो प्लीज?’
‘ना बाबा ना… केहो जी गल्लां करदे ओ… किस्से ने वेख लया ते? होर फेर की पता होंठां दे मधु दे बहाने तुसी कुज होर ना कर बैठो?’ (ना बाबा ना… कैसी बातें करते हो किसी ने देख लिया तो? और तुम क्या पता होंठों का मधु पीते पीते कुछ और ना कर बैठो) Click to expand... अब आगे-:
अब मैं इतना फुद्दू भी नहीं था कि इस फुलझड़ी का खुला इशारा न समझता। मैंने झट से उठ कर दरवाजा बंद कर लिया।

और फिर मैंने उसे झट से अपनी बाहों में भर लिया। उसके कांपते होंठ मेरे प्यासे होंठों के नीचे दब कर पिसने लगे। वो भी मुझे जोर जोर से चूमने लगी। उसकी साँसें बहुत तेज़ हो गई थी और उसने भी मुझे कस कर अपनी बाहों में भींच लिया। उसके रसीले मोटे मोटे होंठों का मधु पीते हुए मैं तो यही सोचता जा रहा था कि इसके नीचे वाले होंठ भी इतने ही मोटे और रस से भरे होंगे।

वो तो इतनी उतावली लग रही थी कि उसने अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी जिसे मैं कुल्फी की तरह चूसने लगा। कभी कभी मैं भी अपनी जीभ उसके मुँह में डाल देता तो वो भी उसे जोर जोर से चूसने लगती। धीरे धीरे मैंने अप एक हाथ से उसके उरोजों को भी मसलने लगा। अब तो उसकी मीठी सीत्कारें ही निकलने लगी थी। मैंने एक हाथ उसके वर्जित क्षेत्र की ओर बढाया तब वह चौंकी।

‘ओह… नो… जीजू… यह क्या करने लगे… यह वर्जित क्षेत्र है इसे छूने की इजाजत नहीं है… बस बस… बस इस से आगे नहीं… आह…!’

‘देखो तुम गुजरात में पढ़ती हो और पता है गांधीजी भी गुजरात से ही थे?’

‘तो क्या हुआ? वो तो बेचारे अहिंसा के पुजारी थे?’
‘ओह… नहीं उन्होंने एक और बात भी कही थी!’
‘क्या?’

‘अरे मेरी सोनियो… बेचारे गांधीजी ने तो यह कहा है कोई भी चूत अछूत नहीं होती!’
‘धत्त… हाई रब्बा ..? किहो जी गल्लां करदे हो जी?’ वो खिलखिला कर हंस पड़ी।

मैंने उसकी नाइटी के ऊपर से ही उसकी चूत पर हाथ फिराना चालू कर दिया। उसने पेंटी नहीं पहनी थी। मोटी मोटी फांकों वाली झांटों से लकदक चूत तो रस से लबालब भरी थी।

‘ऊईइ… माआआआ… ओह… ना बाबा… ना… मुझे डर लग रहा है तुम कुछ और कर बैठोगे? आह…रुको… उईइ इ……माँ…!’

अब तो मेरा एक हाथ उसकी नाइटी के अन्दर उसकी चूत तक पहुँच गया। वो तो उछल ही पड़ी- ओह… जीजू… रुको… आह…’

दोस्तो! अब तो पटियाले की यह मोरनी खुद कुकडू कूँ बोलने को तैयार थी। मैं जानता था वो पूरी तरह गर्म हो चुकी है। और अब इस पटियाले के पटोले को (कुड़ी को) कटी पतंग बनाने का समय आ चुका है।
मैंने उसकी नाइटी को ऊपर करते हुए अपना हाथ उसकी जाँघों के बीच डाल कर उसकी चूत की दरार में अपनी अंगुली फिराई और फिर उसके रस भरे छेद में डाल दी।
उसकी चूत तो रस से जैसे लबालब भरी थी। चूत पर लम्बी लम्बी झांटों का अहसास पाते ही मेरा लण्ड तो झटके ही खाने लगा था।

एक बात तो आप भी जानते होंगे कि पंजाबी लड़कियाँ अपनी चूत के बालों को बहुत कम काटती हैं। मैंने कहीं पढ़ा था कि पंजाबी लोग काली काली झांटों वाली चूत के बहुत शौक़ीन होते हैं।

मैंने अपनी अंगुली को दो तीन बार उसके रसीले छेद में अन्दर-बाहर कर दिया।

‘ओहो… प्लीज… छोड़ो मुझे… आह… रुको…एक मिनट…!’ उसने मुझे परे धकेल दिया।

मुझे लगा हाथ आई चिड़िया फुर्र हो जायेगी। पर उसने झट से अपनी नाइटी निकाल फैंकी और मुझे नीचे धकेलते हुए मेरे ऊपर आ गई। मेरी कमर से बंधी लुंगी तो कब की शहीद हो चुकी थी। उसने अपनी दोनों जांघें मेरी कमर के दोनों ओर कर ली और मेरे लण्ड को हाथ में पकड़ कर अपनी चूत पर रगड़ने लगी। मुझे तो लगा मैं अपने होश खो बैठूँगा। मैंने उसे अपनी बाहों में जकड़ लेना चाहा।

‘ओये मेरे अनमोल रत्तन रुक ते सईं…?’ (मेरे पप्पू थोड़ा रुको तो सही)

और फिर उसने मेरे लण्ड का सुपर अपनी चूत के छेद से लगाया और फिर अपने नितम्बों को एक झटके के साथ नीचे कर दिया। 7 इंच का पूरा लण्ड एक ही घस्से में अन्दर समां गया।
‘ईईईईई ईईईइ… या…!!’

कुछ देर वो ऐसे ही मेरे लण्ड पर विराजमान रही। उसकी आँखें तो बंद थी पर उसके चहरे पर दर्द के साथ गर्वीली विजय मुस्कान थिरक रही थी। और फिर उसने अपनी कमर को होले होले ऊपर नीचे करना चालू कर दिया। साथ में मीठी आहें भी करने लगी।

‘ओह .. जीजू तुसी वी ना… इक नंबर दे गिरधारी लाल ई हो?’ (ओह जीजू तुम भी ना… एक नंबर के फुद्दू ही हो)
‘कैसे?’

‘किन्नी देर टन मेरी फुद्दी विच्च बिच्छू कट्ट रये ने होर तुहानू दुद्द पीण दी पई है?’ (कितनी देर से मेरी चूत में बिच्छू काट रहे हैं और तुम्हें दूध पीने की पड़ी है।)

मैं क्या बोलता। मेरी तो उसने बोलती बंद कर दी थी।

‘लो हूँण पी लो मर्ज़ी आये उन्ना दुद्ध!’ (लो अब पी लो जितना मर्ज़ी आये दूध) कहते हए उसने अपने एक उरोज को मेरे होंठों पर लगा दिया और फिर नितम्बों से एक कोर का धक्का लगा दिया .

अब तो वो पूरी मास्टरनी लग रही थी। मैंने किसी आज्ञाकारी बालक की तरह उसके उरोजों को चूसना चालू कर दिया। वो आह… ओह्ह . करती जा रही थी। उसकी चूत तो अन्दर से इस प्रकार संकोचन कर रही थी कि मुझे लगा जैसे यह अन्दर ही अन्दर मेरे लण्ड को निचोड़ रही है।

चूत के अन्दर की दीवारों का संकुचन और गर्मी अपने लण्ड पर महसूस करते हुए मुझे लगा मैं तो जल्दी ही झड़ जाऊँगा। मैं उसे अपने नीचे लेकर तसल्ली से चोदना चाहता था पर वो तो आह ऊँह करती अपनी कमर और मोटे मोटे नितम्बों से झटके ही लगाती जा रही थी। मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फिरना चालू कर दिया। अब मैंने उसकी गाण्ड का छेद टटोलने की कोशिश की।

‘आह… उईइ… इ… माँ… जीजू बहुत मज़ा आ रहा है… आह…’

‘माया तुम्हारी चूत बहुत मजेदार है!’
‘एक बात बताओ?’
‘क… क्या?’

‘तुमने उस छिपकली को पहली रात में कितनी बार रगड़ा था?’
‘ओह… 2-3 बार… पर तुम क्यों पूछ रही हो?’
‘हाई… ओ रब्बा?’
‘क्यों क्या हुआ?’

‘वो मधु तो बता रही थी .. आह… कि… कि… बस एक बार ही किया था?’

‘साली मधु की बच्ची ’ मेरे मुँह से निकलते निकलते बचा। इतने में मेरी अंगुली उसकी गाण्ड के खुलते बंद होते छेद से जा टकराई। उसकी गाण्ड का छेद तो पहले से ही गीला और चिकना हो रहा था। मैंने पहले तो अपनी अंगुली उस छेद पर फिराई और फिर उसे उसकी गाण्ड में डाल दी। वो तो चीख ही पड़ी।

‘अबे… ओये भेन दे टके… ओह… की करदा ए ( क्या करते हो…?)’

‘क्यों क्या हुआ?’
‘ओह… अभी इसे मत छेड़ो…?’
‘क्यों?’
‘क्या वो मधु मक्खी तुम्हें गाण्ड नहीं मारने देती क्या?’
‘ना यार बहुत मिन्नतें करता हूँ पर मानती ही नहीं!’

‘इक नंबर दी फुदैड़ हैगी…? नखरे करदी है… होर तुसी वि निरे नन्द लाल हो… किसे दिन फड़ के ठोक दओ’ (एक नंबर क़ी चुदक्कड़ है वो… नखरे करती है ..? तुम भी निरे लल्लू हो किसी दिन पकड़ कर पीछे से ठोक क्यों नहीं देते?)

कहते हुए उसने अपनी चूत को मेरे लण्ड पर घिसना शुरू कर दिया जैसे कोई सिल बट्टे पर चटनी पीसता है। ऐसा तो कई बार जब मधु बहुत उत्तेजित होती है तब वह इसी तरह अपनी चूत को मेरे लण्ड पर रगड़ती है।

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‘ठीक है मेरी जान… आह…!’ मैंने कस कर उसे अपनी बाहों में भींच लिया। मैं अपने दबंग लण्ड से उसकी चूत को किरची किरची कर देना चाहता था। मज़े ले ले कर देर तक उसे चोदना चाहता था पर जिस तरीके से वह अपनी चूत को मेरे लण्ड पर घिस और रगड़ रही थी और अन्दर ही अन्दर संकोचन कर रही थी मुझे लगा मैं अभी शिखर पर पहुंच जाऊँगा और मेरी पिचकारी फूट जायेगी।
‘आईईईई ईईईईईईई… जीजू क्या तुम ऊपर नहीं आओगे?’ कहते हुए उसने पलटने का प्रयास किया।

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मेरी अजीब हालत थी। मुझे लगा कि मेरे सुपारे में बहुत भारीपन सा आने लगा है और किसी भी समय मेरा तोता उड़ सकता है। मैं झट उसके ऊपर आ गया और उसके उरोजों को पकड़ कर मसलते हुए धक्के लगाने लगा। उसने अपनी जांघें खोल दी और अपने पैर ऊपर उठा लिए।
अभी मैंने 3-4 धक्के ही लगाए थे कि मेरी पिचकारी फूट गई। मैंने उसे कसकर अपनी बाहों में जकड़ लिया। वो तो चाह रही थी मैं जोर जोर से धक्के लगाऊँ पर अब मैं क्या कर सकता था। मैं उसके ऊपर ही पसर गया।
‘ओह… खस्सी परांठे…?’

कहानी जारी रहेगी!
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02-12-2022, 02:02 PM,
#12
RE: Sex Vasna चोरी का माल
माया मेमसाब Click to expand... भाग:- 4
अभी मैंने 3-4 धक्के ही लगाए थे कि मेरी पिचकारी फूट गई। मैंने उसे कसकर अपनी बाहों में जकड़ लिया। वो तो चाह रही थी मैं जोर जोर से धक्के लगाऊँ पर अब मैं क्या कर सकता था। मैं उसके ऊपर ही पसर गया।
‘ओह… खस्सी परांठे…?’ Click to expand... मैं अभी तक 5-7 लड़कियों और औरतों को चोद चुका था और मधु के साथ तो मेरा 30-35 मिनिट का रिकॉर्ड रहता है। पर अपने जीवन में आज पहली बार मुझे अपने ऊपर शर्मिंदगी का सा अहसास हुआ।

हालांकि कई बार अधिक उत्तेजना में और किसी लड़की के साथ प्रथम सम्भोग में ऐसा हो जाता है पर मैंने तो सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था। शायद इसका एक कारण यह भी था कि मैं पिछले 10-12 दिनों से भरा बैठा था और मेरा रस छलकने को उतावला था।
मैं उसके ऊपर से हट गया, वो आँखें बंद किये लेटी रही।

थोड़ी देर बाद वो भी उठ कर बैठ गई- ओह… जीजू… तुम तो बहुत जल्दी आउट हो गए… मैं तो सोच रही थी कि सैंकड़ा (धक्कों का शतक) तो जरूर लगाओगे?
‘ओह… सॉरी… माया!’
‘ओह…मेरे लटूरी दास मैं ते कच्ची भुन्नी ई रह गई ना?’ (मैं तो मजधार में ही रह गई ना)
‘माया… पर कई बार अच्छे अच्छे बैट्स में भी जीरो पर आउट हो जाते हैं?’
‘यह क्यों नहीं कहते कि मेरी बालिंग शानदार थी?’ उसने हँसते हुए कहा।

‘हाँ… माया वाकई तुम्हारी बालिंग बहुत जानदार थी…’
‘और पिच?’
‘तुम्हारी तो दोनों ही पिचें (चूत और गाण्ड) एक दम झकास हैं… पर क्या दूसरी पारी का मौका नहीं मिलेगा?’

‘जाओ जी… पहली पारी विच्च ते कुज कित्ता न इ हूँण दूजी पारी विच्च किहड़ा तीर मार लोवोगे? किते एस वार वी क्लीन बोल्ड ना हो जाना?’ (जाओ जी पहली पारी में तो कुछ किया नहीं अब दूसरी पारी में कौन सा तीर मार लोगे कहीं इस बार भी क्लीन बोल्ड ना हो जाना)

‘चलो लगी शर्त?’ कह कर मैंने उसे फिर से अपनी बाहों में भर लेना चाहा।
‘ओके .. चलो मंजूर है… पर थोड़ी देर रुको मैं बाथरूम हो के आती हूँ।’ कहते हुए वो बाथरूम की ओर चली गई।

बाथरूम की ओर जाते समय पीछे से उसके भारी और गोल मटोल नितम्बों की थिरकन देख कर तो मेरे दिल पर छुर्रियाँ ही चलने लगी। मैं जानता था पंजाबी लड़कियाँ गाण्ड भी बड़े प्यार से मरवा लेती हैं। और वैसे भी आजकल की लड़कियाँ शादी से पहले चूत मरवाने से तो परहेज करती हैं पर गाण्ड मरवाने के लिए अक्सर राज़ी हो जाती हैं।

आप तो जानते ही हैं मैं गाण्ड मारने का कितना शौक़ीन हूँ। बस मधु ही मेरी इस इच्छा को पूरी नहीं करती थी बाकी तो मैंने जितनी भी लड़कियों या औरतों को चोदा है उनकी गाण्ड भी जरुर मारी है। इतनी खूबसूरत सांचे में ढली मांसल गाण्ड तो मैंने आज तक नहीं देखी थी। काश यह भी आज राज़ी हो जाए तो कसम से मैं तो इसकी जिन्दगी भर के लिए गुलामी ही कर लूं।

कोई दस मिनट के बाद वो बाथरूम से बाहर आई। मैं बिस्तर पर अपने पैर नीचे लटकाए बैठा था। वो मेरे पास आकर अपनी कमर पर हाथ रख कर खड़ी हो गई। मैंने उसकी कमर पकड़ कर उसे अपनी ओर खींच लिया। काली घुंघराली झांटों से लकदक चूत के बीच की गुलाबी फांकें तो ऐसे लग रही थी जैसे किसी बादल की ओट से ईद का चाँद नुमाया हो रहा हो।

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उसकी चूत ठीक मेरे मुँह के सामने थी। एक मादक महक मेरी नाक में समां गई। लगता था उसने कोई सुगन्धित क्रीम या तेल लगाया था। मैंने उसकी चूत को पहले तो सूंघ और फिर होले से अपनी जीभ फिराने लगा। उसने मेरा सिर पकड़ लिया और मीठी सीत्कार करने लगी। जैसे जैसे मैं उसकी चूत पर अपनी जीभ फिरता वो अपने नितम्बों को हिलाने लगी और आह… ऊँह… उईइ… करने लगी।

हालांकि उसकी चूत की लीबिया (भीतरी कलिकाएँ) बहुत छोटी थी पर मैंने उन्हें अपने दांतों के बीच दबा लिया तो उत्तेजना के मारे उसकी तो चीख ही निकलते निकलते बची। उसने मेरा सिर पकड़ कर अपना एक पैर ऊपर उठाया और अपनी जांघ मेरे कंधे पर रख दी। इससे उसकी चूत की दरार और नितम्बों की खाई और ज्यादा खुल गई।

मैं अब फर्श पर अपने पंजों के बल बैठ गया। मैंने एक हाथ से उसकी कमर पकड़ ली और दूसरा हाथ उसके नितम्बों की खाई में फिराने लगा। मुझे उसकी गाण्ड के छेड़ पर कुछ चिकनाई सी महसूस हुई। शायद उसने वहाँ भी कोई क्रीम जरुर लगाई थी। मेरा लण्ड तो इसी ख्याल से फिर से अकड़ने लगा। उसने मेरा सिर अपने हाथों में पकड़ कर बिस्तर के किनारे से लगा दिया और फिर पता नहीं उसे क्या सूझा, उसने अपना दूसरा पैर और दोनों हाथ बिस्तर पर रख लिए और फिर अपनी चूत को मेरे मुँह पर रगड़ने लगी।

‘ईईईईईई ईईईईईइ…’ उसकी कामुक किलकारी पूरे कमरे में गूँज गई।

और उसके साथ ही मेरे मुँह में शहद की कुछ बूँदें टपक पड़ी। मैं उसकी चूत को एक बार फिर से मुँह में भर लेना चाहता था पर इससे पहले कि मैं कुछ करता वो बिस्तर पर लुढ़क गई और अपने पेट के बल लेट कर जोर जोर से हाँफने लगी।

अब मैं उठकर बिस्तर पर आ गया और उसके ऊपर आते हुए उसे कस कर अपनी बाहों में भर लिया। मेरा खूंटे की तरह खड़ा लण्ड उसके नितम्बों के बीच जा टकराया। मैंने अपने हाथ नीचे किये और उसके उरोजों को पकड़ कर मसलना चालू कर दिया। साथ में उसकी गर्दन और कानों के पास चुम्बन भी लेने लगा।

कुंवारी गाण्ड की खुशबू पाते ही मेरा लण्ड तो उसमें जाने के लिए उछलने ही लगा था। मैंने अंदाज़े से एक धक्का लगा दिया पर लण्ड थोड़ा सा ऊपर की ओर फिसल गया। उसने अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठा दिए और जांघें भी चौड़ी कर दी। मैंने एक धक्का और लगाया पर इस बार लण्ड नीचे की ओर फिसल कर चूत में प्रवेश कर गया।

मैंने अपने घुटनों को थोड़ा सा मोड़ लिया और फिर 4-5 धक्के और लगा दिए। माया तो आह… ऊँह… या रब्बा.. करती ही रह गई। जैसे ही मैं धक्का लगाने को होता वो अपने नितम्बों को थोडा सा और ऊपर उठा देती और फिच्च की आवाज के साथ लण्ड उसकी चूत में जड़ तक समां जाता। हम दोनों को मज़ा तो आ रहा था पर मुझे लगा उसे कुछ असुविधा सी हो रही है।
‘जीजू… ऐसे नहीं..!’

‘ओह… माया बड़ा मज़ा आ रहा है…!’
‘एक मिनट रुको तो सही.. मैं घुटनों के बल हो जाती हूँ।’

और फिर वो अपने घुटनों के बल हो गई। हमने यह ध्यान जरुर रखा कि लण्ड चूत से बाहर ना निकले। अब मैंने उसकी कमर पकड़ ली और जोर जोर से धक्के लगाने लगा।
हर धक्के के साथ उसके नितम्ब थिरक जाते और उसकी मीठी सीत्कार निकलती।

अब तो वह भी मेरे हर धक्के के साथ अपने नितम्बों को पीछे करने लगी थी। मैं कभी उसके नितम्बों पर थप्पड़ लगता कभी अपना एक हाथ नीचे करके उसकी चूत के अनार दाने को रगदने लगता तो वो जोर जोर आह… याआअ… उईईईईईईइ… रब्बा करने लगती।

अब मेरा ध्यान उसके गाण्ड के छेद पर गया। उस पर चिकनाई सी लगी थी और वो कभी खुलता कभी बंद होता ऐसे लग रहा था जैसे मेरी ओर आँख मार कर मुझे निमंत्रण दे रहा हो। मैंने अपने अंगूठे पर थूक लगाया और फिर उस खुलते बंद होते छेद पर मसलने लगा।
मैंने दूसरे हाथ से नीचे उसकी चूत का अनारदाना भी मसलना चालू रखा। वो जोर जोर से अपने नितम्बों को हिलाने लगी थी। मुझे लगा वो फिर झड़ने वाली है। मैंने अपना अंगूठा उसकी गाण्ड के नर्म छेद में डाल दिया।

छेद तो पहले से ही चिकना था और उत्तेजना के मारे ढीला सा हो गया था मेरा आधा अंगूठा अन्दर चला गया उस के साथ ही माया की किलकारी गूँज गई- ऊईईईईईईई… माँ… ओये… ओह… रुको…!’

उसने मेरी कलाई पकड़ कर मेरा हाथ हटाने की कोशिश की पर मैंने अपने अंगूठे को दो तीन बार अन्दर बाहर कर ही दिया साथ में उसके दाने को भी मसलता रहा। और उसके साथ ही मुझे लगा मेरे लण्ड के चारों ओर चिकना लिसलिसा सा द्रव्य लग गया है। एक सित्कार के साथ माया धड़ाम से नीचे गिर पड़ी और मैं भी उसके ऊपर ही गिर पड़ा।

उसकी साँसें बहुत तेज़ चल रही थी और उसका शरीर कुछ झटके से खा रहा था। मैं कुछ देर उसके ऊपर ही लेता रहा। मेरा पानी अभी नहीं निकला था। मैंने फिर से एक धक्का लगाया।

‘ओह… जीजू… अब बस करो… आह… और नहीं… बस…!’
‘मेरी जान अभी तो अर्ध शतक भी नहीं हुआ?’

‘ओह… गोली मारो शतकाँ नूँ मेरी ते हालत खराब हो गई । आह…!’ वो कसमसाने सी लगी। ऐसा करने से मेरा लण्ड फिसल कर बाहर आ गया और फिर वो पलट कर सीधी हो गई।
‘इस बार तुमने मुझे कच्चा भुना छोड़ दिया…?’ मैंने उलाहना देते हुए कहा।
‘नहीं जीजू बस अब और नहीं… मैं बहुत थक गई हूँ… तुमने तो मेरी हड्डियाँ ही चटका दी हैं।’

‘पर मैं इसका क्या करूँ? यह तो ऐसे मानेगा नहीं?’ मैंने अपने तन्नाये (खड़े) लण्ड की ओर इशारा करते हुए कहा।
‘ओह… कोई गल्ल नइ मैं इन्नु मना लेन्नी हाँ..?’ उसने मेरे लण्ड को अपनी मुट्ठी में भींच लिया और उसे ऊपर नीचे करने लगी।

[Image: 3056774-b818c68-640x.jpg]

‘माया ऐसे नहीं इसे मुँह में लेकर चूसो ना प्लीज?’
‘ओये होए मैं सदके जावां… मेरे गिरधारी लाल…?’

और फिर उसने मेरे लण्ड का टोपा अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगी।

[Image: 3385136-155eba6-640x.jpg]
क्या कमाल का लण्ड चूसती है साली पूरी लण्डखोर लगती है? उसके मुँह की लज्जत तो उसकी चूत से भी ज्यादा मजेदार थी।

मेरा तो मन करने लगा इसका सर पकड़ कर पूरा अन्दर गले तक ठोक कर अपना सारा माल इसके मुँह में ही ऊँडेल दूं पर मैंने अपना इरादा बदल लिया।

आप शायद हैरान हो रहे होंगे? ओह… दर असल मैं एक बार लगते हाथों उसकी गाण्ड भी मारना चाहता था। उसने कोई 4-5 मिनट ही मेरे लण्ड को चूसा होगा और फिर उसने मेरा लण्ड मुँह से बाहर निकाल दिया।
‘जिज्जू मेरा तो गला भी दुखने लगा है!’

‘पर तुमने तो शर्त लगाई थी?’
‘केहड़ी शर्त?’ (कौन सी शर्त)
‘कि इस बार मुझे अपनी शानदार बोवलिंग से फिर आउट कर दोगी?’
‘ओह मेरी तो फुद्दी और गला दोनों दुखने लगे हैं?’

‘पर भगवान् ने लड़की को एक और छेद भी तो दिया है?’
‘कि मतलब?’
‘अरे मेरी चंपाकलि तुम्हारी गाण्ड का छेद भी तो एकदम पटाका है?’

[Image: 1874827-9962c88-640x.jpg]

‘तुस्सी पागल ते नइ होए?’

कहानी जारी रहेगी!
आपके कमेन्टस का इन्तजार है
Views मिल रहे है परन्तु लाईक कमेन्टस नही मिल रहे।
मेरा मनोबल भी कमजोर हो रहा है
आप सभी का सहयोग अपेक्षित है।
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02-12-2022, 02:05 PM,
#13
RE: Sex Vasna चोरी का माल
मामा के घर मौज मस्ती

मामी ने मामा का मुरझाया लंड अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगी।

मैं उनकी बातें सुनकर इतना उत्तेजित हो गया था कि मुट्ठ मारने के अलावा मेरे पास अब कोई और रास्ता नहीं बचा था। मैं अपना सात इंच का लंड हाथ में लिए बाथ रूम की ओर बढ़ गया। फ़िर मुझे ख़याल आया कणिका ऊपर अकेली है। कणिका की ओर ध्यान जाते ही मेरा लंड तो जैसे छलांगें ही लगाने लगा। मैं दौड़ कर छत पर चला आया।
अब आगे:-

कणिका बेसुध हुई सोई थी। उसने पीले रंग की स्कर्ट पहन रखी थी और अपनी एक टांग मोड़े करवट लिए सोई थी, इससे उसकी स्कर्ट थोड़ी सी ऊपर उठी थी। उसकी पतली सी पेंटी में फ़ंसी उसकी चूत का चीरा तो साफ़ नजर आ रहा था। पेंटी उसकी चूत की दरार में घुसी हुई थी और चूत के छेद वाली जगह गीली हुई थी। उसकी गोरी गोरी मोटी जांघें देख कर तो मेरा जी करने लगा कि अभी उसकी कुलबुलाती चूत में अपना लंड डाल ही दूँ।
मैं उसके पास बैठ गया और उसकी जाँघों पर हाथ फेरने लगा।

वाह.. क्या मस्त मुलायम संग-ए-मरमर सी नाज़ुक जांघें थी। मैंने धीरे से पेंटी के ऊपर से ही उसकी चूत पर अंगुली फ़िराई। वो तो पहले से ही गीली थी। आह.. मेरी अंगुली भी भीग सी गई। मैंने उस अंगुली को पहले अपनी नाक से सूंघा। वाह.. क्या मादक महक थी।

[Image: cdcv1ssn7yb3.jpg]

कच्चे नारियल जैसी जवान चूत के रस की मादक महक तो मुझे अन्दर तक मस्त कर गई। मैंने अंगुली को अपने मुँह में ले लिया। कुछ खट्टा और नमकीन सा लिजलिजा सा वो रस तो बड़ा ही मजेदार था।

मैं अपने आप को कैसे रोक पाता। मैंने एक चुम्बन उसकी जाँघों पर ले ही लिया, फ़िर यौनोत्तेजना वश मैंने उसकी जांघें चाटी। वो थोड़ा सा कुनमुनाई पर जगी नहीं।
अब मैंने उसके उरोज देखे। वह क्या गोल गोल अमरुद थे। मैंने कई बार उसे नहाते हुए नंगी देखा था। पहले तो इनका आकार नींबू

जितना ही था पर अब तो संतरे नहीं तो अमरुद तो जरूर बन गए हैं। गोरे गोरे गाल चाँद की रोशनी में चमक रहे थे। मैंने एक चुम्बन उन पर भी ले लिया।

मेरे होंठों का स्पर्श पाते ही कणिका जग गई और अपनी आँखों को मलते हुए उठ बैठी।

[Image: IMG-20211004-071225.jpg]

‘क्या कर रहे हो भाई?’ उसने उनीन्दी आँखों से मुझे घूरा।
‘वो.. वो.. मैं तो प्यार कर रहा था !’
‘पर ऐसे कोई रात को प्यार करता है क्या?’

‘प्यार तो रात को ही किया जाता है !’ मैंने हिम्मत करके कह ही दिया।
उसके समझ में पता नहीं आया या नहीं ! फ़िर मैंने कहा- कणिका एक मजेदार खेल देखोगी?’
‘क्या?’ उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।

‘आओ मेरे साथ !’ मैंने उसका बाजू पकड़ा और सीढ़ियों से नीचे ले आया और हम बिना कोई आवाज किये उसी खिड़की के पास आ गए। अन्दर का दृश्य देख कर तो कणिका की आँखें फटी की फटी ही रह गई। अगर मैंने जल्दी से उसका मुँह अपनी हथेली से नहीं ढक दिया होता तो उसकी चीख ही निकल जाती।

मैंने उसे इशारे से चुप रहने को कहा।
वो हैरान हुई अन्दर देखने लगी।

मामी घोड़ी बनी फ़र्श पर खड़ी थी और अपने हाथ बेड पर रखे थी, उनका सिर बेड पर था और नितम्ब हवा में थे। मामा उसके पीछे उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगा रहे थे। उनका 8 इंच का लंड मामी की गांड में ऐसे जा रहा था जैसे कोई पिस्टन अन्दर बाहर आ जा रहा हो। मामा उनके नितम्बों पर थपकी लगा रहे थे। जैसे ही वो थपकी लगाते तो नितम्ब हिलने लगते और उसके साथ ही मामी की सीत्कार निकलती- हाईई… और जोर से मेरे राजा ! और जोर से ! आज सारी कसर निकाल लो ! और जोर से मारो ! मेरी गांड बहुत प्यासी है ये हाईई…’

[Image: image.png]

‘ले मेरी रानी और जोर से ले… या… सऽ विऽ ता… आ.. आ…’ मामा के धक्के तेज होने लगे और वो भी जोर जोर से चिल्लाने लगे।

पता नहीं मामा कितनी देर से मामी की गांड मार रहे थे। फ़िर मामा मामी से जोर से चिपक गए। मामी थोड़ी सी ऊपर उठी। उनके पपीते जैसे स्तन नीचे लटके झूल रहे थे। उनकी आँखें बंद थी और वह सीत्कार किये जा रही थी- जियो मेरे राजा मज़ा आ गया !’

मैंने धीरे धीरे कणिका के वक्ष मसलने शुरू कर दिए। वो तो अपने मम्मी पापा की इस अनोखी रासलीला देख कर मस्त ही हो गई थी। मैंने एक हाथ उसकी पेंटी में भी डाल दिया।

उफ़… छोटी छोटी झांटों से ढकी उसकी बुर तो कमाल की थी, नीम गीली।

मैंने धीरे से एक अंगुली से उसके नर्म नाज़ुक छेद को टटोला। वो तो चुदाई देखने में इतनी मस्त थी कि उसे तो तब ध्यान आया जब मैंने गच्च से अपनी अंगुली उसकी बुर के छेद में पूरी घुसा दी।

‘उईई माँ…!!’ उसके मुँह से हौले से निकला- ओह… भाई यह क्या कर रहे हो?’
उसने मेरी ओर देखा। उसकी आँखें बोझिल सी थी और उनमें लाल डोरे तैर रहे थे।
मैंने उसे बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूम लिया।

हम दोनों ने देखा कि एक पुच्क्क की आवाज के साथ मामा का लंड फ़िसल कर बाहर आ गया और मामी बेड पर लुढ़क गई।

अब वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं रह गया था। हम एक दूसरे की बाहों में सिमटे वापस छत पर आ गए।
‘कणिका?’
‘हाँ भाई?’

कणिका के होंठ और जबान कांप रही थी। उसकी आँखों में एक नई चमक थी। आज से पहले मैंने कभी उसकी आँखों में ऐसी चमक नहीं देखी थी। मैंने फ़िर उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठ चूसने लगा। उसने भी बेतहाशा मुझे चूमना शुरू कर दिया।

मैंने धीरे धीरे उसके स्तन भी मसलने चालू कर दिए। जब मैंने उसकी पेंटी पर हाथ फ़िराया तो उसने मेरा हाथ पकड़ते कहा- नहीं भाई, इससे आगे नहीं !’

‘क्यों क्या हुआ?’

‘मैं रिश्ते में तुम्हारी बहन लगती हूँ, भले ही ममेरी ही हूँ पर हूँ तो बहन ही ना? और भाई और बहन में ऐसा नहीं होना चाहिए !’

‘अरे तुम किस ज़माने की बात कर रही हो? लंड और चूत का रिश्ता तो कुदरत ने बनाया है। लंड और चूत का सिर्फ़ एक ही रिश्ता होता है और वो है चुदाई का। यह तो केवल तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले समाज और धर्म के ठेकेदारों का बनाया हुआ ढकोसला है। असल में देखा जाए तो ये सारी कायनात ही इस कामरस में डूबी है जिसे लोग चुदाई कहते हैं।’ मैं एक ही सांस में कह गया।

‘पर फ़िर भी इंसान और जानवरों में फर्क तो होता है ना?’

‘जब चूत की किस्मत में चुदना ही लिखा है तो फ़िर लंड किसका है इससे क्या फर्क पड़ता है? तुम नहीं जानती कणिका, तुम्हारा यह जो बाप है ना यह अपनी बहन, भाभी, साली और सलहज सभी को चोद चुका है और यह तुम्हारी मम्मी भी कम नहीं है। अपने देवर, जेठ, ससुर, भाई और जीजा से ना जाने कितनी बार चुद चुकी है और गांड भी मरवा चुकी है !’

कणिका मेरी ओर मुँह बाए देखे जा रही थी। उसे यह सब सुनकर बड़ी हैरानी हो रही थी- नहीं भाई तुम झूठ बोल रहे हो?’

‘देखो मेरी बहना, तुम चाहे कुछ भी समझो, यह जो तुम्हारा बाप है ना ! वो तो तुम्हें भी भोगने चोदने के चक्कर में है ! मैंने अपने कानों से सुना है !’

‘क… क्या…?’ उसे तो जैसे मेरी बातों पर यकीन ही नहीं हुआ। मैंने उसे सारी बातें बता दी जो आज मामा मामी से कह रहे थे।
उसके मुँह से तो बस इतना ही निकला- ओह नोऽऽ?’

‘बोलो… तुम क्या चाहती हो? अपनी मर्जी से, प्यार से तुम अपना सब कुछ मुझे सौंप देना चाहोगी या फ़िर उस 45 साल के अपने खडूस और ठरकी बाप से अपनी चूत और गांड की सील तुड़वाना चाहती हो…? बोलो !’

‘मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा है !’
‘अच्छा एक बात बताओ?’
‘क्या?’

‘क्या तुम शादी के बाद नहीं चुदवाओगी? या सारी उम्र अपनी चूत नहीं मरवाओगी?’
‘नहीं, पर ये सब तो शादी के बाद की बात होती है?’

‘अरे मेरी भोली बहना ! ये तो खाली लाइसेंस लेने वाली बात है। शादी विवाह तो चुदाई जैसे महान काम को शुरू करने का उत्सव है। असल में शादी का मतलब तो बस चुदाई ही होता है !’

‘पर मैंने सुना है कि पहली बार में बहुत दर्द होता है और खनू भी निकलता है?’
‘अरे तुम उसकी चिंता मत करो ! मैं बड़े आराम से करूँगा ! देखना तुम्हें बड़ा मज़ा आएगा !’
‘पर तुम गांड तो नहीं मारोगे ना? पापा की तरह?’

‘अरे मेरी जान पहले चूत तो मरवा लो ! गांड का बाद में सोचेंगे !’ और मैंने फ़िर उसे बाहों में भर लिया।

उसने भी मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया। वह क्या मुलायम होंठ थे, जैसे संतरे की नर्म नाज़कु फांकें हों। कितनी ही देर हम आपस में गुंथे एक दूसरे को चूमते रहे।

अब मैंने अपना हाथ उसकी चूत पर फ़िराना चालू कर दिया। उसने भी मेरे कहने से मेरे लंड को कस कर हाथ में पकड़ लिया और सहलाने लगी। लंड महाराज तो ठुमके ही लगाने लगे। मैंने जब उसके उरोज दबाये तो उसके मुँह से सीत्कार निकालने लगी।

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‘ओह भाई कुछ करो ना? पता नहीं मुझे कुछ हो रहा है !’

उत्तेजना के मारे उसका शरीर कांपने लगा था, साँसें तेज होने लगी थी। इस नए अहसास और रोमांच से उसके शरीर के रोएँ खड़े हो गए थे। उसने कस कर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया।

अब देर करना ठीक नहीं था। मैंने उसकी स्कर्ट और टॉप उतार दिए। उसने ब्रा तो पहनी ही नहीं थी। छोटे छोटे दो अमरुद मेरी आँखों के सामने थे। गोरे रंग के दो रसकूप जिनका एरोला कोई अठन्नी जितना और निप्पल्स तो कोई मूंग के दाने जितने बिल्कुल गुलाबी रंग के ! मैंने तड़ से एक चुम्बन उसके उरोज पर ले लिया। अब मेरा ध्यान उसकी पतली कमर और गहरी नाभि पर गया।

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जैसे ही मैंने अपना हाथ उसकी पेंटी की ओर बढ़ाया तो उसने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा- भाई, तुम भी तो अपने कपड़े उतारो ना?’

‘ओह हाँ !’

मैंने एक ही झटके में अपना नाईट सूट उतार फेंका। मैंने चड्डी और बनियान तो पहनी ही नहीं थी। मेरा 7 इंच का लंड 120 डिग्री पर खड़ा था। लोहे की रॉड की तरह बिल्कुल सख्त। उस पर प्री-कम की बूँद चाँद की रोशनी में ऐसे चमक रही थी जैसे शबनम की बूँद हो या कोई मोती।

‘कणिका इसे प्यार करो ना !’
‘कैसे?’
‘अरे बाबा इतना भी नहीं जानती? इसे मुँह में लेकर चूसो ना?’
‘मुझे शर्म आती है !’

मैं तो दिलो जान से इस अदा पर फ़िदा ही हो गया। उसने अपनी निगाहें झुका ली पर मैंने देखा था कि कनिखयों से वो अभी भी मेरे तप्त लंड को ही देखे जा रही थी बिना पलकें झपकाए।

मैंने कहा- चलो, मैं तुम्हारी बुर को पहले प्यार कर देता हूँ फ़िर तुम इसे प्यार कर लेना !’

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‘ठीक है !’ भला अब वो मना कैसे कर सकती थी।

और फ़िर मैंने धीरे से उसकी पेंटी को नीचे खिसकाया, गहरी नाभि के नीचे हल्का सा उभरा हुआ पेडू और उसके नीचे रेशम से मुलायम छोटे छोटे बाल नजर आने लगे। मेरे दिल की धड़कनें बढ़ने लगी। मेरा लंड तो सलामी ही बजाने लगा। एक बार तो मुझे लगा कि मैं बिना कुछ किये-धरे ही झड़ जाऊँगा।

उसकी चूत की फांकें तो कमाल की थी। मोटी मोटी संतरे की फांकों की तरह। गुलाबी चट्ट, दोनों आपस में चिपकी हुई। मैंने पेंटी को निकाल फेंका। जैसे ही मैंने उसकी जाँघों पर हाथ फ़िराया तो वो सीत्कार करने लगी और अपनी जांघें कस कर भींच ली।

मैं जानता था कि यह उत्तेजना और रोमांच के कारण है। मैंने धीरे से अपनी अंगुली उसकी बुर की फांकों पर फ़िराई। वो तो मस्त ही हो गई। मैंने अपनी अंगुली ऊपर से नीचे और फ़िर नीचे से ऊपर फ़िराई। 3-4 बार ऐसा करने से उसकी जांघें अपने आप चौड़ी होती चली गई। अब मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी बुर की दोनों फांकों को चौड़ा किया। एक हल्की सी पुट की आवाज के साथ उसकी चूत की फांकें खुल गई।

आह ! अन्दर से बिल्कुल लाल चुटर ! जैसे किसी पके तरबूज का गूदा हो। मैं अपने आप को कै से रोक पाता। मैंने अपने जलते होंठ उन पर रख दिए।

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आह… नमकीन सा स्वाद मेरी जबान पर लगा और मेरी नाक में जवान जिस्म की एक मादक महक भर गई। मैंने अपनी जीभ को थोड़ा सा नुकीला बनाया और उसके छोटे से टींट पर टिका दिया। उसकी तो एक किलकारी ही निकल गई। अब मैंने ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जीभ फ़िरानी चालू कर दी।

उसने कस कर मेरे सिर के बालों को पकड़ लिया। वो तो सीत्कार पर सीत्कार किये जा रही थी।

बुर के छेद के नीचे उसकी गांड का सुनहरा छेद उसके कामरज से पहले से ही गीला हो चुका था। अब तो वो भी खुलने और बंद होने लगा था।

कणिका आह…उन्ह… कर रही थी, ऊईई… मा..आ एक मीठी सी सीत्कार निकल ही गई उसके मुँह से।

अब मैंने उसकी बुर को पूरा मुँह में ले लिया और जोर की चुस्की लगाई। अभी तो मुझे दो मिनट भी नहीं हुए होंगे कि उसका शरीर अकड़ने लगा और उसने अपने पैर ऊपर करके मेरी गदर्न के गिर्द लपेट लिए और मेरे बालों को कस कर पकड़ लिया। इतने में ही उसकी चूत से काम रस की कोई 4-5 बूँदें निकल कर मेरे मुँह में समां गई। आह क्या रसीला स्वाद था। मैंने तो इस रस को पहली बार चखा था। मैं उसे पूरा का पूरा पी गया।

अब उसकी पकड़ कुछ ढीली हो गई थी। पैर अपने आप नीचे आ गए। 2-3 चुस्कियाँ लेने के बाद मैंने उसके एक उरोज को मुँह में ले लिया और चूसना चालू कर दिया।

शायद उसे इन उरोजों को चुसवाना अच्छा नहीं लगा था। उसने मेरा सिर एक और धकेला और झट से मेरे खड़े लंड को अपने मुँह में ले लिया। मैं तो कब से यही चाह रहा था। उसने पहले सुपाड़े पर आई प्रीकम की बूँदें चाटी और फ़िर सुपारे को मुँह में भर कर चूसने लगी जैसे कोई रस भरी कुल्फी हो।

आह.. आज किसी ने पहली बार मेरे लंड को ढंग से मुँह में लिया था। कणिका ने तो कमाल ही कर दिया। उसने मेरा लंड पूरा मुँह में भरने की कोशिश की पर भला सात इंच लम्बा लंड उसके छोटे से मुँह में पूरा कैसे जाता।

मैं चित्त लेटा था और वो उकडू सी हुई मेरे लंड को चूसे जा रही थी। मेरी नजर उसकी चूत की फांकों पर दौड़ गई। हल्के हल्के बालों से लदी चूत तो कमाल की थी। मैंने कई ब्ल्यू फ़िल्मों में देखा था कि चूत के अन्दर के होंठों की फांके 1.5 या 2 इंच तक लम्बी होती हैं पर कणिका की तो बस छोटी छोटी सी थी, बिल्कुल लाल और गुलाबी रंगत लिए। मामी की तो बिल्कुल काली काली थी। पता नहीं मामा उन काली काली फांकों को कैसे चूसते हैं।

मैंने कणिका की चूत पर हाथ फ़िराना चालू कर दिया। वो तो मस्त हुई मेरे लंड को बिना रुके चूसे जा रही थी। मुझे लगा अगर जल्दी ही मैंने उसे मना नहीं किया तो मेरा पानी उसके मुँह में ही निकल जाएगा और मैं आज की रात बिना चूत मारे ही रह जाऊँगा।

मैं ऐसा हरिगज नहीं चाहता था।

मैंने उसकी चूत में अपनी अंगुली जोर से डाल दी। वो थोड़ी सी चिहुंकी और मेरे लंड को छोड़ कर एक और लुढ़क गई।

वो चित्त लेट गई थी। अब मैं उसके ऊपर आ गया और उसके होंठों को चूमने लगा।

एक हाथ से उसके उरोज मसलने चालू कर दिए और एक हाथ से उसकी चूत की फांकों को मसलने लगा। उसने भी मेरे लंड को मसलना चालू कर दिया। अब लोहापूरी तरह गर्म हो चुका था और हथौड़ा मारने का समय आ गया था। मैंने अपने उफनते हुए लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रख दिया। अब मैंने उसे अपने बाहों में जकड़ लिया और उसके गाल चूमने लगा, एक हाथ से उसकी कमर पकड़ ली। इतने में मेरे लंड ने एक ठुमका लगाया और वो फ़िसल कर ऊपर खिसक गया।

कणिका की हंसी निकल गई।

मैंने दोबारा अपने लंड को उसकी चूत पर सेट किया और उसके कमर पकड़ कर एक जोर का धक्का लगा दिया। मेरा लंड उसके थूक से पूरा गीला हो चुका था और पिछले आधे घंटे से उसकी चूत ने भी बेतहाशा कामरज बहाया था। मेरा आधा लंड उसकी कुंवारी चूत की सील को तोड़ता हुआ अन्दर घुस गया।

इसके साथ ही कणिका की एक चीख हवा में गूंज गई। मैंने झट से उसका मुँह दबा दिया नहीं तो उसकी चीख नीचे तक चली जाती।

कोई 2-3 मिनट तक हम बिना कोई हरकत किये ऐसे ही पड़े रहे।

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वो नीचे पड़ी कुनमुना रही थी, अपने हाथ पैर पटक रही थी पर मैंने उसकी कमर पकड़ रखी थी इस लिए मेरा लंड बाहर निकालने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। मुझे भी अपने लंड के सुपारे के नीचे जहाँ धागा होता है, जलन सी महसूस हुई। यह तो मुझे बाद में पता चला कि उसकी चूत की सील के साथ मेरे लंड की भी सील (धागा) टूट गई है।

चलो अच्छा है अब आगे का रास्ता दोनों के लिए ही साफ़ हो गया है। हम दोनों को ही दर्द हो रहा था। पर इस नए स्वाद के आगे यह दर्द भला क्या माने रखता था।

‘ओह… भाई मैं तो मर गई रे…’ कणिका के मुँह से निकला- ओह… बाहर निकालो मैं मर जाऊँगी !’

‘अरे मेरी बहना रानी ! बस अब जो होना था हो गया है। अब दर्द नहीं बस मजा ही मजा आएगा। तुम डरो नहीं ये दर्द तो बस 2-3 मिनट का और है उसके बाद तो बस जन्नत का ही मजा है !’

‘ओह… नहीं प्लीज… बाहर निका…लो… ओह… या… आ… उन्ह… या’

मैं जानता था उसका दर्द अब कम होने लगा है और उसे भी मजा आने लगा है। मैंने हौले से एक धक्का लगाया तो उसने भी अपनी चूत को अन्दर से सिकोड़ा। मेरा लंड तो निहाल ही हो गया जैसे। अब तो हालत यह थी कि कणिका नीचे से धक्के लगा रही थी। अब तो मेरा लंड उसकी चूत में बिना किसी रुकावट अन्दर बाहर हो रहा था। उसके कामरज और सील टूटने से निकले खून से सना मेरा लंड तो लाल और गुलाबी सा हो गया था।

‘उईई… मा.. आह… मजा आ रहा है भाई तेज करो ना.. आह ओर तेज या…’

कणिका मस्त हुई बड़बड़ा रही थी।

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अब उसने अपने पैर ऊपर उठा कर मेरी कमर के गिर्द लपेट लिए थे। मैंने भी उसका सिर अपने हाथों में पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया और धीरे धीरे धक्के लगाने लगा। जैसे ही मैं ऊपर उठता तो वो भी मेरे साथ ही थोड़ी सी ऊपर हो जाती और जब हम दोनों नीचे आते तो पहले उसके नितम्ब गद्दे पर टिकते और फ़िर गच्च से मेरा लंड उसकी चूत की गहराई में समां जाता। वो तो मस्त हुई ‘आह उईई माँ’ ही करती जा रही थी। एक बार उसका शरीर फ़िर अकड़ा और उसकी चूत ने फ़िर पानी छोड़ दिया।

वो झड़ गई थी ! आह…! एक ठंडी सी आनंद की सीत्कार उसके मुँह से निकली तो लगा कि वो पूरी तरह मस्त और संतुष्ट हो गई है।

मैंने अपने धक्के लगाने चालू रखे। हमारी इस चुदाई को कोई 20 मिनट तो हो ही गए थे, अब मुझे लगाने लगा कि मेरा लावा फूटने वाला है, मैंने कणिका से कहा तो वो बोली,’कोई बात नहीं, अन्दर ही डाल दो अपना पानी ! मैं भी आज इस अमृत को अपनी कुंवारी चूत में लेकर निहाल होना चाहती हूँ !’

मैंने अपने धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी और फ़िर गर्म गाढ़े रस की ना जाने कितनी पिचकारियाँ निकलती चली गई और उसकी चूत को लबालब भरती चली गई।

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on.

उसने मुझे कस कर पकड़ लिया। जैसे वो उस अमृत का एक भी कतरा इधर उधर नहीं जाने देना चाहती थी। मैं झड़ने के बाद भी उसके ऊपर ही लेटा रहा।

मैंने कहीं पढ़ा था कि आदमी को झड़ने के बाद 3-4 मिनट अपना लंड चूत में ही डाले रखना चाहिए इस से उसके लंड को फ़िर से नई ताकत मिल जाती है और चूत में भी दर्द और सूजन नहीं आती।

थोड़ी देर बाद हम उठ कर बैठ गए। मैंने कणिका से पूछा- कैसी लगी पहली चुदाई मेरी जान?’

‘ओह ! बहुत ही मजेदार थी मेरे भैया?’
‘अब भैया नहीं सैंया कहो मेरी जान !’
‘हाँ हाँ मेरे सैंया ! मेरे साजन ! मैं तो कब की इस अमृत की प्यासी थी। बस तुमने ही देर कर रखी थी !’
‘क्या मतलब?’
‘ओह, तुम भी कितने लल्लू हो। तुम क्या सोचते हो मुझे कुछ नहीं पता?’
‘क्या मतलब?’
‘मुझे सब पता है तुम मुझे नहाते हुए और मूतते हुए चुपके चुपके देखा करते हो और मेरा नाम ले लेकर मुट्ठ भी मारते हो !’
‘ओह… तुम भी ना… एक नंबर की चुदक्कड़ हो रही हो !’

‘क्यों ना बनूँ आखिरर खानदान का असर मुझ पर भी आएगा ही ना?’ और उसने मेरी ओर आँख मार दी।
फ़िर आगे बोली ‘पर तुम्हें क्या हुआ मेरे भैया?’
‘चुप साली अब भी भैया बोलती है ! अब तो मैं दिन में ही तुम्हारा भैया रहूँगा रात में तो मैं तुम्हारा सैंया और तुम मेरी सजनी बनोगी !’ और फ़िर मैंने एक बार उसे अपनी बाहों में भर लिया।

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उसे भला क्या ऐतराज हो सकता था।
यह कहानी आपको कैसी लगी मुझे कमेन्ट करके जरूर बताएँ।
Reply
02-12-2022, 02:05 PM,
#14
RE: Sex Vasna चोरी का माल
माया मेमसाब
भाग -5

[Image: 2457331722999736790.jpg]

अब तक आपने पढ़ा
ओह मेरी तो फुद्दी और गला दोनों दुखने लगे हैं!’
‘पर भगवान् ने लड़की को एक और छेद भी तो दिया है?’
‘की मतलब?’
‘अरे मेरी चंपाकलि तुम्हारी गाण्ड का छेद भी तो एक दम पटाका है!’
‘तुस्सी पागल ते नइ होए?’

अब आगे

‘अरे मेरी छमक छल्लो एक बार इसका मज़ा तो लेकर देखो… तुम तो दीवानी बन जाओगी!’
‘ना… बाबा… ना… तुम तो मुझे मार ही डालोगे… देखो यह कितना मोटा और खूंखार लग रहा है!’

‘मेरी सोनियो! इसे तो जन्नत का दूसरा दरवाज़ा कहते हैं। इसमें जो आनंद मिलता है दुनिया की किसी दूसरी क्रिया में नहीं मिलता!’

वो मेरे लण्ड को हाथ में पकड़े घूरे जा रही थी। मैं उसके मन की हालत जानता था। कोई भी लड़की पहली बार चुदवाने और गाण्ड मरवाने के लिए इतना जल्दी अपने आप को मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पाती। पर मेरा अनुमान था वो थोड़ी ना नुकर के बाद मान जायेगी।
‘फिर तुमने उस मधु मक्खी को बिना गाण्ड मारे कैसे छोड़ दिया?’

‘ओह… वो दरअसल उसकी चूत और मुँह दोनों जल्दी नहीं थकते इसलिए गाण्ड मारने की नौबत ही नहीं आई!’
‘साली इक्क नंबर दी लण्डखोर हैगी!’ उसने बुरा सा मुँह बनाया।
‘माया सच कहता हूँ इसमें लड़कियों को भी बहुत मज़ा आता है?’

‘पर मैंने तो सुना है इसमें बहुत दर्द होता है?’
‘तुमने किस से सुना है?’
‘वो .. मेरी एक सहेली है .. वो बता रही थी कि जब भी उसका बॉयफ्रेंड उसकी गाण्ड मारता है तो उसे बड़ा दर्द होता है।’

‘अरे मेरी पटियाला की मोरनी तुम खुद ही सोचो अगर ऐसा होता तो वो बार बार उसे अपनी गाण्ड क्यों मारने देती है?’
‘हाँ यह बात तो तुमने सही कही!’

बस अब तो मेरी सारी बाधाएं अपने आप दूर हो गई थी। गाण्ड मारने का रास्ता निष्कंटक (साफ़) हो गया था। मैंने झट से उसे अपनी बाहों में दबोच लिया। वो तो उईईईईईई… करती ही रह गई।

‘जीजू मुझे डर लग रहा है… प्लीज धीरे धीरे करना!’
‘अरे मेरी बुलबुल मेरी सोनिये तू बिल्कुल चिंता मत कर .. यह गाण्ड चुदाई तो तुम्हें जिन्दगी भर याद रहेगी!’

वह पेट के बल लेट गई और उसने अपने नितम्ब फिर से ऊपर उठा दिए।

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मैंने स्टूल पर पड़ी पड़ी क्रीम की डब्बी उठाई और ढेर सारी क्रीम उसकी गाण्ड के छेद पर लगा दी। फिर धीरे से एक अंगुली उसकी गाण्ड के छेद में डालकर अन्दर-बाहर करने लगा।

रोमांच और डर के मारे उसने अपनी गाण्ड को अन्दर भींच सा लिया। मैंने उसे समझाया कि वो इसे बिल्कुल ढीला छोड़ दे, मैं आराम से करूँगा बिल्कुल दर्द नहीं होने दूंगा।

अब मैंने अपने गिरधारी लाल पर भी क्रीम लगा ली। पहाले तो मैंने सोचा था कि थूक से ही काम चला लूं पर फिर मुझे ख्याल आया कि चलो चूत तो हो सकता है कि पहले से चुदी हो पर गाण्ड एक दम कुंवारी और झकास है, कहीं इसे दर्द हुआ और इसने गाण्ड मरवाने से मना कर दिया तो मेरी दिली तमन्ना तो चूर चूर ही हो जायेगी। मैं कतई ऐसा नहीं चाहता था।

फिर मैंने उसे अपने दोनों हाथों से अपने नितम्बों को चौड़ा करने को कहा। उसने मेरे बताये अनुसार अपने नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर उठाया और फिर दोनों हाथों को पीछे करते हुए नितम्बों की खाई को चौड़ा कर दिया। भूरे रंग का छोटा सा छेद तो जैसे थिरक ही रहा था। मैंने एक हाथ में अपना लण्ड पकड़ा और उस छेद पर रगड़ने लगा, फिर उसे ठीक से छेद पर टिका दिया।

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अब मैंने उसकी कमर पकड़ी और आगे की ओर दबाव बनाया। वो थोड़ा सा कसमसाई पर मैंने उसकी कमर को कस कर पकड़े रखा।

अब उसका छेद चौड़ा होने लगा था और मैंने महसूस किया मेरा सुपारा अन्दर सरकने लगा है।

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‘ऊईई .. जीजू… बस… ओह… रुको… आह… ईईईईइ…!’

अब रुकने का क्या काम था मैंने एक धक्का लगा दिया। इसके साथ ही गच्च की आवाज के साथ आधा लण्ड गाण्ड के अन्दर समां गया। उसके साथ ही माया की चीख निकल गई।

‘ऊईईइ…माँ आ अ… हाय.. म .. मर… गई इ इ इ…? ओह… अबे भोसड़ी के… ओह… साले निकाल बाहर.. आआआआ…?’
‘बस मेरी जान..’

‘अबे भेन के.. लण्ड! मेरी गाण्ड फ़ट रही है!’

मैं जल्दी उसके ऊपर आ गया और उसे अपनी बाहों में कस लिया। वो कसमसाने लगी थी और मेरी पकड़ से छूट जाना चाहती थी। मैं जानता था थोड़ी देर उसे दर्द जरुर होगा पर बाद में सब ठीक हो जाएगा। मैंने उसकी पीठ और गले को चूमते हुए उसे समझाया।

‘बस… बस… मेरी जान… जो होना था हो गया!’

‘जीजू, बहुत दर्द हो रहा है.. ओह… मुझे तो लग रहा है यह फट गई है प्लीज बाहर निकाल लो नहीं तो मेरी जान निकल जायेगी आया… ईईईई…!’

मैं उसे बातों में उलझाए रखना चाहता था ताकि उसका दर्द कुछ कम हो जाए और मेरा लण्ड अन्दर समायोजित हो जाए। कहीं ऐसा ना हो कि वो बीच में ही मेरा काम खराब कर दे और मैं फिर से कच्चा भुन्ना रह जाऊँ। इस बार मैं बिना शतक लगाए आउट नहीं होना चाहता था।

‘माया तुम बहुत खूबसूरत हो .. पूरी पटाका हो यार.. मैंने आज तक तुम्हारे जैसी फिगर वाली लड़की नहीं देखी.. सच कहता हूँ तुम जिससे भी शादी करोगी पता नहीं वो कितना किस्मत वाला बन्दा होगा।’

‘हुंह.. बस झूठी तारीफ रहने दो जी .. झूठे कहीं के..? तुम तो उस मधु मक्खी के दीवाने बने फिरते हो?’

‘ओह… माया… देखो भगवान् हम दोनों पर कितना दयालु है, उसने हम दोनों के मिलन का कितना बढ़िया रास्ता निकाल ही दिया!’

‘पता है, मैं तो कल ही अहमदाबाद जाने वाली थी… तुम्हारे कारण ही आज रात के लिए रुकी हूँ।’

‘थैंक यू माया! यू आर सो हॉट एंड स्वीट!’

मैंने उसके गले पीठ और कानों को चूम लिया। उसने अपनी गाण्ड के छल्ले का संकोचन किया तो मेरा लण्ड तो गाण्ड के अन्दर ही ठुमकने लगा।

‘माया अब तो दर्द नहीं हो रहा ना?’
‘ओह.. थोड़ा ते हो रया है? पर तुस्सी चिंता ना करो कि पूरा अन्दर चला गिया?’

मेरा आधा लण्ड ही अन्दर गया था पर मैं उसे यह बात नहीं बताना चाहता था। मैंने उसे गोल मोल जवाब दिया’ओह .. मेरी जान आज तो तुमने मुझे वो सुख दिया है जो मधुर ने भी कभी नहीं दिया?’

हर लड़की विशेष रूप से प्रेमिका अपनी तुलना अपने प्रेमी की पत्नी से जरूर करती है और उसे अपने आप को खूबसूरत और बेहतर कहलवाना बहुत अच्छा लगता है। यह सब गुरु ज्ञान मेरे से ज्यादा भला कौन जान सकता है।

अब मैंने उसके उरोजों को फिर से मसलना चालू कर दिया। माया ने अपने नितम्ब कुछ ऊपर कर दिए और मैंने अपने लण्ड को थोड़ा सा बाहर निकला और फिर से एक हल्का धक्का लगाया तो पूरा लण्ड अन्दर विराजमान हो गया।

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अब तो उसे अन्दर बाहर होने में जरा भी दिक्कत नहीं हो रही थी।

गाण्ड की यही तो लज्जत और खासियत होती है। चूत का कसाव तो थोड़े दिनों की चुदाई के बाद कम होने लगता है पर गाण्ड कितनी भी बार मार ली जाए उसका कसाव हमेशा लण्ड के चारों ओर अनुभव होता ही रहता है।

खेली खाई औरतों और लड़कियों को गाण्ड मरवाने में चूत से भी अधिक मज़ा आता है। इसका एक कारण यह भी है कि बहुत दिनों तक तो यह पता ही नहीं चलता कि गाण्ड कुंवारी है या चुद चुकी है। गाण्ड मारने वाले को तो यही गुमान रहता है कि उसे प्रेमिका की कुंवारी गाण्ड चोदने को मिल रही है।

अब तो माया भी अपने नितम्ब उचकाने लगी थी। उसका दर्द ख़त्म हो गया था और लण्ड के घर्षण से उसकी गाण्ड का छल्ला अन्दर बाहर होने से उसे बहुत मज़ा आने लगा था।

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अब तो वो फिर से सित्कार करने लगी थी। और अपना एक अंगूठा अपने मुँह में लेकर चूसने लगी थी और दूसरे हाथ से अपने उरोजों की घुंडी मसल रही थी।

‘मेरी जान .. आह…!’ मैं भी बीच बीच में उसे पुचकारता जा रहा था और मीठी सित्कार कर रहा था।
एक बात आपको जरूर बताना चाहूँगा। यह विवाद का विषय हो सकता है कि औरत को गाण्ड मरवाने में मज़ा आता है या नहीं पर उसे इस बात की ख़ुशी जरूर होती है कि उसने अपने प्रेमी या पति को इस आनंद को भोगने में सहयोग दिया है।

मैंने एक हाथ से उसके अनारदाने (भगान्कुर) को अपनी चिमटी में लेकर मसलना चालू कर दिया। माया तो इतनी उत्तेजित हो गई थी कि अपने नितम्बों को जोर जोर से ऊपर नीचे करने लगी।
‘ओह.. जीजू एक बार पूरा डाल दो… आह… उईईईईइ… या या या…’

[Image: 20210306-181522.jpg]

मैंने दनादन धक्के लगाने चालू कर दिए। मुझे लगा माया एक बार फिर से झड़ गई है। अब मैं भी किनारे पर आ गया था। आधे घंटे के घमासान के बाद अब मुझे लगने लगा था कि मेरा सैंकड़ा नहीं सवा सैंकड़ा होने वाला है। मैंने उसे अपनी बाहों में फिर से कस लिया और फिर 5-7 धक्के और लगा दिए। उसके साथ ही माया की चित्कार और मेरी पिचकारी एक साथ फूट गई।

कोई 5-6 मिनट हम इसी तरह पड़े रहे। जब मेरा लण्ड फिसल कर बाहर आ गया तो मैं उसके ऊपर से उठ कर बैठ गया। माया भी उठ बैठी। वो मुस्कुरा कर मेरी ओर देख रही थी जैसे पूछ रही थी कि उसकी दूसरी पिच कैसी थी।

‘माया इस अनुपम भेंट के लिए तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद!’
‘हाई मैं मर जांवां .. सदके जावां? मेरे भोले बलमा!’
‘थैंक यू माया’ कहते हुए मैंने अपनी बाहें उसकी ओर बढ़ा दी।

‘जीजू तुम सच कहते थे .. बहुत मज़ा आया!’ उसने मेरे गले में अपनी बाहें डाल दी। मैंने एक बार फिर से उसके होंठों को चूम लिया।

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‘जिज्जू, तुम्हारी यह बैटिंग तो मुझे जिन्दगी भर याद रहेगी! पता नहीं ऐसी चुदाई फिर कभी नसीब होगी या नहीं?’

‘अरे मेरी पटियाला दी पटोला मैं तो रोज़ ऐसी ही बैटिंग करने को तैयार हूँ बस तुम्हारी हाँ की जरुरत है!’
‘ओये होए .. वो मधु मक्खी तुम्हें खा जायेगी?’ कहते हुए माया अपनी नाइटी उठा कर नीचे भाग गई।
और फिर मैं भी लुंगी तान कर सो गया।

मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ आपको यह’माया मेम साब’ कैसी लगी मुझे बताएँगे ना?
इन्तजार है आपके कमेन्टस का
जल्दी ही एक नई कहानी शुरू होगी।
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02-12-2022, 02:06 PM,
#15
RE: Sex Vasna चोरी का माल
तीन पत्ती गुलाब-1​


प्यारे पाठको और पाठिकाओ! इस कथानक की नायिका नाम है गौरी। और जिसका नाम गौरी हो भला उसकी खूबसूरती के बारे में कोई शक़-शुबहा कैसे किया जा सकता है। पता नहीं गुलाबो ने क्या खाकर या सोच कर गौरी का नाम रखा होगा, पर उसकी खूबसूरती ठीक उसके नाम के मुताबिक ही है।
गौरी हमारी घरेलू नौकरानी गुलाबो की तीसरे नंबर की बेटी है। उम्र करीब 18 वर्ष, दरमियाना कद, घुंघराले बाल, गोरा रंग, मोटी मोटी काली आँखें, गोल चेहरा, सुराहीदार गर्दन, चिकनी लंबी बांहें, शहद भरी पंखुड़ियों जैसे एक जोड़ी होंठ और सख्त कसे हुए दो सिंदूरी आम।
हुस्न के मामले में तो जैसे भगवान ने उसे अपने हाथों से फुरसत में ही तराशा होगा और लगता है उसके लिए ख़ूबसूरती के खजाने के सारे ताले तोड़ डाले होंगे। उसकी मोटी-मोटी काली नरगिसी आँखें देखकर तो कोई भी दीवाना हो जाए और गलियों में गाता फिरे
“इन आँखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं।”
अगर आपने ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में भिड़े की लौंडिया सोनू देखी हो तो आपको गौरी की खूबसूरती का अंदाज़ा हो जाएगा। गोल चेहरा और गोरे गालों पर पड़ने वाले डिंपल देख कर तो दिल यही चाहेगा कि लंड को तो बस उसके मुखश्री में ही डाल दिया जाए।

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उसकी सबसे बड़ी दौलत है उसकी एक जोड़ी पतली मखमली केले के तने जैसी सुतवाँ टांगें और 23-24 इंच की पतली कमर के नीचे दो गोल खरबूजे जैसे चिकने तराशे हुए थिरकते नितम्ब। या खुदा! अगर शोले वाला गब्बर इन्हें देख लेता तो बस यही कहता
‘ये गांड मुझे दे दे गौरी!’
मेरा दावा है अगर वो जीन पैंट और टॉप पहनकर सड़क पर निकल जाए तो लोग गश खाकर गिर पड़ें। उसकी ठोड़ी पर बना वो छोटा सा तिल तो किसी गाँव की गौरी की याद ताज़ा करवा देता है। ऊपर से नीचे तक बस कयामत! वाह … खुदा कसम क्या साँचे में ढला मुजसम्मा तराशा है? कोई भी बस एक निगाह भर देख ले तो या अल्लाह की जगह ईलू ईलू कर उठे
मैं क्या करूँ उसके कसे हुए नितम्ब देखकर तो कोई भी अपना ईमान और तौबा दोनों ही तोड़ डाले,

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मेरी क्या बिसात है। हे लिंगदेव! अब तो बस तेरा ही आसरा है।
गुलाबो आजकल बीमार रहती है। उसकी जगह गौरी को काम पर आते हुए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। गौरी सुबह जल्दी काम पर आ जाती है और दिन में सारा काम करती है और फिर शाम को ही अपने घर वापस जाती है।
इन 5-7 दिनों में वह मधुर से इस तरह घुल मिल गयी है जैसे वर्षों की जान-पहचान हो। उसके आने से मधुर को बहुत आराम हो गया है। उसने रसोई, बर्तन, कपड़े, सफाई आदि सारा काम सलीके से संभाल लिया है।
मेरे पुराने पाठक तो जानते हैं कि मधुर स्कूल में पढ़ाती भी है पर अभी गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही हैं; बस थोड़े दिनों में स्कूल शुरू हो जाएंगे। आजकल उसके सिर पर घर की सफाई का फितूर चढ़ा है इसलिए सारे दिन गौरी के साथ लगी ही रहती है। गौरी 5-4 क्लास तक स्कूल गई है बाद में उसने पढ़ाई छोड़ दी। मधुर उसे आजकल शामम को पढ़ाती भी है। वैसे मधुर शाम को बच्चों की ट्यूशन करती थी पर आजकल उसने बच्चों की ट्यूशन करना बंद कर रखा है।
गौरी का हमारे यहाँ आने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। मैंने गौरी को पहले कभी देखा नहीं था। पता नहीं गुलाबो ने इस हीरे की कणि को इतने दिनों तक कहाँ छुपाकर रखा था।
मधुर ने बताया था कि गौरी अपनी मौसी के यहाँ फैज़ाबाद में रहती थी. अब 6-8 महीने पहले ही कालू (गुलाबो का बड़ा बेटा) की शादी में यहाँ आई थी और उसके बाद घर वालों ने उसे वापस नहीं भेजा।
मधुर कुछ बातें जानबूझकर भी छिपा जाती है। असली कारण मुझे बाद में पता चला था। दरअसल उसकी मौसी का लड़का गौरी के ऊपर लट्टू हो गया था और वह किसी भी तरह गौरी को रग़ड़ देना चाहता था।
भई सच ही है इतने खूबसूरत खजाने के लिए तो सभी की जीभ और लंड दोनों की लार टपकने लगें उस बेचारे की क्या गलती है। रही सही कसर गौरी के बाप ने पूरी कर डाली थी। कालू की शादी के बाद जैसे नंदू (गुलाबो का पति) पर तो नई जवानी ही चढ़ आई थी।
गुलाबो आजकल बीमार रहती है और पति की रोज-रोज की शारीरिक सम्बन्धों की माँग पूरी नहीं कर पाती तो वह यहाँ वहाँ मुँह मारता फिरता है। इसी चक्कर में उसने दारू के नशे में एक रात गौरी को ही पकड़ लिया था। बेचारी गुलाबो ने किसी तरह उसे छुड़ाया था।
जब गुलाबो ने मधुर को सारी बातें बताई तो मधुर ने इसे हमारे यहाँ रख लेने का निश्चय कर लिया। खैर कारण जो भी रहा हो मेरे लिए तो जैसे जीने का नया मक़सद ही मिल गया था।
हमारे सामने वाले घर में जहाँ पहले
वाली नीरू बेन रहती थी, आजकल नये किरायेदार आए हैं। बंगाली परिवार है और घर में फकत 3 जीव हैं। पति पत्नी और एक लड़की। आदमी का नाम सुजोय बनर्जी है जो किसी सरकारी दफ्तर में काम करता है। वह खुद तो मरियल सा है पर संजया बनर्जी उर्फ संजीवनी बूटी तो पटाका नहीं पूरा एटम बम है।
वैसे भी बंगाली औरतों की आँखें और बाल बहुत ही खूबसूरत होते हैं। साँवरी देह में नरगिसी आँखें विधाता बंग सुंदरी को ही देता है। पतली कमर, गोल कसे हुए नितम्ब और गहरी नाभि का छेद तो मृत्यु शैया पर पड़े आदमी को भी संजीवनी दे दे।
उम्र कोई 40-42 के लपेटे में होगी पर दिखने में 35-36 से ज्यादा नहीं लगती। सुडौल बदन की मल्लिका, गदराया सा बदन देखते ही मन करे किसी मंजरी (लता) की तरह उससे लिपट जाए। कभी नाभि दर्शना साड़ी में, कभी जीन पैंट और टॉप में कभी ट्रैक सूट में पूरे मोहल्ले में छमक-छल्लो बनी फिरती है।

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संजया बनर्जी

इसलिए लौंडे लपाड़े उसके आगे पीछे घूमते रहते हैं।
वो शायद किसी प्राइवेट कंपनी में जॉब भी करती है और सुबह शाम कई बार शॉर्ट्स में या ट्रैक सूट में अपनी लड़की सुहाना या झबरे बालों वाले कुत्ते के साथ पार्क में घूमने जाती है।
मधुर ने भी एक दो बार इसका जिक्र तो जरूर किया था पर मैंने उस वक़्त ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। वैसे भी मधुर उसे कम ही पसंद करती है. कारण आप अच्छी तरह समझ सकते हैं।
कल सुबह-सुबह मैंने उसे सुहाना के साथ हाथ में टेनिस रॅकेट पकड़े स्टेडियम ग्राउंड जाते देखा था। आप को बता दूँ कि मैं भी टेनिस का बहुत अच्छा खिलाड़ी रहा हूँ. पर सिमरन (काली टोपी लाल रुमाल) के जाने के बाद मैंने टेनिस खेलना बंद कर दिया था। पर सोचता हूँ टेनिस क्लब फिर से ज्वाइन कर लूँ। काश … मैं फिर से 18 साल का लड़का बन जाऊं फिर तो माँ और बेटी दोनों के साथ टेनिस मैच खेल लूं, पर ऐसा कहाँ सम्भव है?
ओह … मैं इस फुलझड़ी के बारे में तो बताना ही भूल गया … यह तो बस कयामत बनने ही वाली है। पूरी टॉम बॉय लोलिता लगती है। हाय … मेरी सिमरन तुम मुझे बहुत याद आती हो। मोटी काली आँखें जैसे कोई जहर बुझी कटार हों।
नाइकी की टोपी और स्पोर्ट्स शूज पहने जब वो उछलते हुए से चलती है तो उसकी पोनी टेल घोड़ी की पूँछ की तरह हिलती रहती है।
उसके गोल गोल नितम्ब और लंबी मखमली जांघें तो अभी से बिजलियाँ गिरा रही हैं। इसके छोटे-छोटे नीम्बू तो टेनिस की बॉल से थोड़े ही छोटे लगते हैं। जब ये नीम्बू अमृत-कलश बनेंगे तो क्या कयामत आएगी इसका अंदाज़ा अभी से लगाया जा सकता है।
कभी स्कूल जाते समय वैन में चढ़ते हुए स्कर्ट के नीचे से झलकती उसकी मखमली जांघें, कभी ट्यूशन पर जाते समय छाती से चिपकाई किताबों के बोझ से दबे उसके खूबसूरत चीकू, कभी बालकनी में थोड़ी झुककर अपने फ्रेंड्स से बातें करते हुए दिखते उसके नन्हे परिंदे, कभी टेनिस के बल्ले को हाथ से गोल गोल घुमाते समय दिखती उसकी मखमली रोम विहीन स्निग्ध त्वचा वाली कांख, कभी जूतों के फीते बांधते समय दिखती उसकी जांघों के बीच फंसी कच्छी और कभी बाइसिकल चलाते समय झलकती उसकी पैंटी …
देखकर तो बस यही मन करता है काश वक़्त थम जाए और मैं बस सुहाना को जिंदगी भर ऐसे ही कुलांचें भरते, गली में इक्कड़-दुक्कड़, छुपम-छुपाई या लंगड़ी घोड़ी खेलते देखता ही रहूँ।
गुलाबी और हरे रंग की कैपरी में ढकी उसकी जांघें, नितम्ब, पिक्की और चीकू … उफ्फ … कयामत जैसे चार कदम दूर खड़ी हो। याल्लाह … इसकी खूबसूरत पिक्की (बुर) पर तो अभी बाल भी नहीं आए होंगे। मोटे-मोटे पपोटों वाली गंजी पिक्की की पतली झिर्री पर जीभ फिराने का मज़ा तो किसी किस्मत के सिकंदर को ही मिलेगा।
इसे देखकर तो सब कुछ भूल जाने का मन करता है। सुहाना नाम की इस कमसिन फितनाकार कयामत को देखकर किसी दिन मेरा दिल धड़कना भूल गया तो सारा इल्ज़ाम इसी पर आएगा।
पिछले 6 महीनों से मधुर को नयी धुन चढ़ी है। वो अब एक और बच्चा पैदा करना चाहती है। हमारा एक बेटा है जिसे मीनल अपने साथ कॅनेडा ले गयी है। मैंने मधुर को कोई बच्चा गोद लेने के बारे में कई बार समझाया है पर वो है कि मानती ही नहीं। IVF, IUI, सैरोगेसी, कृत्रिम गर्भाधान जैसी बहुत सी नयी विधाएं (तकनीकें) हैं जिनके ज़रिए मातृत्व सुख मिल सकता है।
आप तो जानते हैं कि डॉक्टरों ने मिक्कू के जन्म के समय ही बता दिया था अब मधुर फिर से कभी माँ नहीं बन पाएगी पर मधुर को पक्का यकीन है कि वह प्राकृतिक रूप से गर्भवती जरूर होगी। इस चक्कर में हम लोग लगभग रोज ही रात को भरपूर चुदाई का मज़ा लेते हैं और वो भी मेरी मनपसंद डॉगी स्टाइल में। वीर्यपात होने के बाद भी मधुर देर तक उसी मुद्रा में नितंबों को ऊपर किए रहती है ताकि वीर्य उसके गर्भाशय तक जल्दी पहुँच जाए। इस आसन में उसे देखकर बार-बार मेरा मन उसकी खूबसूरत गांड का मज़ा लेने को करता है पर इसके लिए तो जैसे उसने कसम खा ली है कि जब तक वह गर्भवती नहीं हो जाती गांडबाजी बिल्कुल बंद।
पता नहीं वो कहाँ-कहाँ से देशी नुस्खे और टोटके ढूंढकर लाती है और मुझे कभी शहद के साथ या कभी दूध के साथ खिलाती पिलाती ही रहती है। इसके अलावा मुझे शुक्र और शनि के व्रत भी करवाती है और रोज खुद भी पूजा पाठ के चक्करों में पड़ी रहती है और मुझे भी उलझाए रखती है। हर सोमवार को लिंग देव के दर्शन करने तो जाना ही पड़ता है। आप तो जानते ही हैं कि मेरा इन सब बातों में कितना यकीन होगा।
खैर कोई बात नहीं … आप भी लिंग देव से जरूर प्रार्थना करें कि मधुर की मनोकामना जल्दी से जल्दी पूरी हो जाए क्योंकि इसमें हम सभी का फायदा है। उसे एक और चश्मे चिराग (पुत्र-रत्न) की प्राप्ति होगी और मुझे उसकी खूबसूरत गांड फिर से मारने को मिलेगी और आपको जब मैं गांडबाजी का किस्सा सुनाऊंगा तो आप भी जरूर इसे आज़माने की कोशिश करेंगे और … और … अब आप इतने भी अनाड़ी नहीं है कि सब कुछ ही बताना पड़े!
मधुर की 3-4 दिन से माहवारी चल रही है इसलिए चोदन-भोजन का तो सवाल ही नहीं उठता, मेरे पास अब सिवाय मुट्ठ मारने के कोई रास्ता नहीं बचा है। मेरे जेहन में तो बस गौरी और सुहाना ही बसी रहती हैं। काश कहीं ऐसा हो जाए कि संजीवनी बूटी खुद इस फुलझड़ी को लेकर हमारे घर आ जाए और मधुर से कहे कि इसे भी थोड़ा ट्यूशन पढ़ा दिया कीजिए। मधुर ने तो आजकल वैसे ट्यूशन पढ़ाना बंद कर रखा है पर यदि मुझे मौका मिल जाए तो मैं तो सारा दिन इसे ट्यूशन के अलावा और भी बहुत कुछ पढ़ाता रहूँ।
मेरा तो मन करता है इस साली नौकरी को लात मारकर किसी लड़कियों के स्कूल में पढ़ाना ही शुरू कर दूँ और दिन भर सुहाना और मिक्की जैसी कमसिन कलियों को बस निहारता ही रहूँ। कसम खुदा की बेमोल बिक जाऊँ इस फितनाकार फुलझड़ी के लिए। ओह … पर यह कहाँ सम्भव है.
खैर चलो लिंग देव ने गौरी को तो भेज ही दिया है। सुहाना नहीं तो गौरी ही सही।
गौरी के साथ मेरा अभी सीधा संवाद नहीं हुआ है। वैसे भी मैंने उसे बोलते हुए बहुत कम देखा और सुना है। सच कहूँ तो मैंने गौरी को ढंग से देखा ही कहाँ है? एक दो बार झुककर झाड़ू लगाते हुए उसके कसे हुए उरोजों की हल्की सी झलक ही दिखी है। पता नहीं कब इन सिंदूरी आमों को देखने, छूने, मसलने और चूसने का मौका मिलेगा?
मेरा अंदाज़ा है उसकी बुर पर हल्के-हल्के बालों का पहरा होगा। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे पतले नाजुक पपोटे और गहरे लाल रंग का चीरा तो कहर बरपा होगा। पता नहीं उसके दीदार कब होंगे?
हे भगवान! वो जब सु-सु करती होगी तो कितनी पतली धार निकलती होगी और उसका मधुर संगीत तो पूरे बाथरूम में गूंज उठता होगा।पर गौरी की पिक्की को देखने का सौभाग्य पता नहीं मेरे नसीब में है या नहीं अभी क्या कहा जा सकता है?
इस गौरी नाम की चंचल हिरनी को काबू में करना वाकई मुश्किल काम लग रहा है। दिमाग ने तो काम करना ही जैसे बंद कर दिया है। क्या किया जाए … अपना तो यही फलसफा है.
कोशिश आखरी सांस तक करनी चाहिये यारो …
मिल गई तो चूत और नहीं मिली तो उसकी माँ की चूत।
मैने अपने सभी साथियों (लंड, आँखें, होंठ-मुँह-जीभ, कान-नाक, हाथ, दिल और दिमाग) की आपातकालीन बैठक (एमर्जेन्सी मीटिंग) बुलाई.
लंड तो 4-5 दिन से जैसे अकड़ा ही बैठा है। मेरी सुनता ही कहाँ है? उसने तो सबसे पहले चेतावनी सी देते हुए कह दिया है कि मुझे तो बस गौरी की चूत और गांड से कम कुछ भी मंजूर नहीं है।
आँखों ने कहा हमें तो बस उसके गोल सिंदूरी आमों और मखमली बुर का दीदार जल्दी से जल्दी करवा दो।
होंठों ने कहा कि उन्हें तो बस उसके भीगे होंठों को चूमने का एक बार मौका दिलवा दो। हाए … उसके ऊपर और नीचे के होंठों का रस कितना मधुर होगा उसे चूसकर तो आदमी का यह मनुष्य जीवन ही धन्य हो जाए। सच कहूँ तो मेरे होंठ तो उसके गालों, उरोजों और बुर को चूम लेने को इतने बेताब हैं कि बार-बार मेरी जीभ अपने आप मेरे होंठों पर आ जाती है।

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कान कहते हैं कि उन्हें तो उसकी बुर का मधुर संगीत सुनना है।
नाक कहती है गुरु उसके कमसिन बदन से आती खुशबू तो दूर तक महकती है जब वो तुम्हारे आगोश में आएगी तो उसके बदन से निकलने वाली खुशबू तो तुम्हें अपना दीवाना ही बना देगी, जरा सोचो।
हाथ और अंगुलियाँ कहती हैं गुरु … एक बार उसे अपनी बांहों में जकड़ लो, साली कबूतरी की तरह फड़फड़ा कर अपने आप समर्पण कर देगी। सोचो उसके गालों पर, नाभि के छेद पर, पेट और पेडू पर, नितंबों पर, फूली हुई हल्के बालों वाली बुर और गांड के छेद पर हाथ और अंगुलियाँ फिराने में दिल और दिमाग को कितना सुकून और लज्जत मिलेगी तुम्हें पता ही नहीं?
दिल तो जैसे मुँह फुलाए बैठा है, मेरी सुनता ही नहीं है। उसने तो मुझे जैसे धमकी ही दे डाली है कि अगर गौरी नहीं मिली तो वो किसी दिन धड़कना ही बंद कर देगा। तुम तो अपने आप को सैक्सगुरू कहते हो, पता नहीं ऐसी कितनी लौंडियों को अपने प्रेमजाल में उलझाया है क्यों नहीं कुछ उपक्रम करते? प्लीज कोई तिगड़म जल्दी भिड़ाओ ना!
और दिमाग का तो जैसे दही ही बन गया है। कुछ सूझता ही नहीं। कहता है गौरी नाम की इस गुलाब की तीसरी पत्ती को तोड़ना मरोड़ना बिल्कुल नहीं … बंद आँखों से बस धीमी-धीमी सुलगती इस आँच को अपनी अंगुलियों, अपने होंठों, अपनी जीभ और अपने हाथों से महसूस करो। उसके कुँवारे जिस्म से आती मदहोश कर देने वाली खुशबू को सूंघ कर देखो।
पर खबरदार! जल्दबाजी बिल्कुल नहीं! कहीं ऐसा न हो यह चंचल हिरनी गीली मछली की तरह तुम्हारे हाथों से फिसल जाए और फिर तुम जिन्दगी भर के लिए अपना लंड हाथ में लिए आँसू बहाते फिरो। बाकी तुम्हारी मर्ज़ी … ये लंड तो हमेशा बेहूदा हरकतें करता ही रहेगा। अभी इसे बुर चाहिए बाद में गांड माँगेगा और फिर कुछ और। तुम्हें ऐसा फंसाएगा कि कहीं के नहीं रहोगे। इस चूत के लोभी और गांड के रसिया लंड की बातों में बिल्कुल नहीं आना!!!
मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ। अब आप बताएँ मैं क्या करूँ? दिल और दिमाग दोनों अलग अलग खेमे में खड़े हैं किसकी सुनूँ? किसी ने क्या खूब कहा है कि आदमी का हौसला और औरत का भोसड़ा दुनिया में कुछ भी करवा सकता है। चलो एक शेर मुलाहिजा फरमाएँ :
जो चुदाई की तमन्ना दिल में रखते हैं उन्हें चूतें जरूर मिलती हैं।
अगर आपके हिलाने में सच्चाई है तो उसे हिचकी जरूर आएगी।
हे लिंग देव … पिछले 6 महीने से रोज सोमवार को सर्दियों में सुबह सुबह ठंडे पानी से नहाकर 2 किलोमीटर पैदल चलकर तुम्हारी मूर्ति पर दूध-जल चढ़ाने का कुछ तो सिला (प्रतिफल) मिलना ही चाहिए ना? बस एक बार इसकी गांड मारने को मिल जाए तो मैं जिंदगी में फिर कभी कुछ नहीं माँगूँगा। लगता है मुझे अब यह चौथी कसम खानी ही पड़ेगी.
कहानी का अगला भाग जल्द ही
तब तक आपके कमेन्टस का इन्तजार रहेगा।
दिल खोलकर स्नेह प्रदर्शन कीजिए
Reply
02-12-2022, 02:07 PM,
#16
RE: Sex Vasna चोरी का माल
तीन पत्ती गुलाब
भाग-2

आज पूरा दिन गौरी के बारे में सोचते ही बीत गया। उसके चक्कर में मैं आज दफ्तर से थोड़ा जल्दी घर आया था। पर गौरी नज़र नहीं आ रही थी शायद वह काम निपटाकर चली गयी थी। मधुर ने आज भूरे रंग की पैंट और टॉप पहना था। मधुर के नितम्ब और कमर इन कपड़ों में बहुत कातिलाना लगते हैं।

पैंट में कसे हुए उसके नितम्ब ऐसे लगते हैं जैसे वो कोई 18-20 साल की कॉलेज गर्ल हो। नितंबों के बीच की विभाजक रेखा ने तो आज भी मुझे अपने ऊपर लट्टू बना रखा है। सच कहूँ तो हमारे सुखी और सफल दाम्पत्य जीवन का असली राज ही यही है कि वो मुझे सेक्स के मामले में हर तरह से संतुष्ट कर देती है और किसी भी क्रिया के लिए मना नहीं करती। आप मेरी हालत का अंदाज़ा बखूबी लगा सकते हैं कि आज उसकी गांड मारने की मेरी कितनी प्रबल इच्छा हो रही थी।

मैं यह सोच रहा था अगर गौरी ऐसे कपड़े पहन ले तो कैसी लगेगी। उसकी बुर और नितंबों का जोग्राफिया तो उस कसी हुयी पैंट में साफ नज़र आ जाएगा। रात में बिस्तर पर जब मैंने मधुर को बांहों में भरना चाहा तो उसने चुदाई के लिए मना कर दिया बहाना वही माहवारी के चौथे दिन का। भेन चुद गयी इस चौथे दिन की। एक बार तो मन किया कि सुहाना और गौरी को याद करके मुट्ठ ही मार लूँ पर बाद मैंने अपना इरादा बदल दिया। सारी रात गौरी के हसीन ख्वाबों में ही बीत गई।

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शादी के बाद शुरूवाती दिनों में कई बार जब मधुर सुबह-सुबह रसोई घर में काम कर रही होती थी तो मैं चुपके से वहाँ जाकर उसे पीछे से बांहों में दबोच लिया करता था। थोड़ी देर कुनमुनाती थी और फिर हल्की सी ना-नुकर या उलाहने के बाद अहसान सा जताते हुए रसोई में ही चुदाई के लिए मान जाया करती थी। और फिर रसोई के शेल्फ पर उसे थोड़ा सा झुकाकर पीछे से उसकी चूत में लंड पेलने की लज्जत तो आज भी मुझे रोमांच से भर देती है।

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आप भी कभी इसे आजमाकर जरूर देखें पूरा दिन मधुर स्मृतियों और कल्पनाओं में ही बीत जाएगा।

अभी भी वह सुबह थोड़ा जल्दी उठ जाती है और नित्यक्रिया से निपटकर पहले पूजा पाठ करती है और फिर चाय बनाकर मुझे जगाती है।

पर आज मेरी आँख थोड़ी जल्दी खुल गयी थी। मैं बाथरूम से ब्रश करके जब बाहर आया तो देखा मधुर रसोई में ही है। शायद वह नहा चुकी थी और चाय बना रही थी। पजामे में कसे हुए उसके नितम्ब साफ दिख रहे थे। शायद उसने अंदर पैंटी नहीं पहनी थी। दोनों नितंबों के बीच की खाई तो जैसे मुझे उसे अपनी बांहों में दबोच लेने को उकसा ही रही थी।

मुझे अपनी शादी के शुरू के दिन याद आ गये। आज मैं एक बार फिर से उन्हीं लम्हों को दोहरा लेना चाहता था। मधुर अपने ध्यान में मस्त हुई कुछ गुनगुना रही थी। मैंने चुपके से उसके पीछे जाकर एक हाथ से उसके एक उरोज को कसकर पकड़ा और दूसरे हाथ से उसकी बुर को पकड़कर दोनों अंगों को जोर से भींच लिया। मेरा लंड उसके कसे नितंबों की खाई में जा टकराया।

मैंने आँखें बंद करके अपना सिर उसके कंधे पर रखते हुए अपने होंठ उसके गालों से लगा दिए। मेरा अंदाज़ा था मधुर अपने दोनों हाथ पीछे करके मुझे अपने आप से चिपका लेगी और अपने चिर-परिचित अंदाज़ में उलाहना देते हुए कहेगी … हटो परे!

“उईईई ईईईई … ” अचानक एक हल्की सी चीख उसके मुँह से निकल गयी और हाथ में पकड़ा बर्तन नीचे गिर पड़ा।
“ओहो … छ … छोड़ो मुझे … त्या तल लहे हो?” उसने अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करते हुए मुझे एक धक्का सा दिया।
मैं इस अप्रत्याशित आवाज़ को सुनकर हड़बड़ा सा गया। आज मधुर को क्या हो गया है? वो मेरी पकड़ से निकल गई और अपनी कुर्ती और पाजामे को ठीक करने लगी। उसका चेहरा सुर्ख हो गया था और साँसें लोहार की धोंकनी की तरह चलने लगी थी।

ओह … यह तो मधुर नहीं गौरी थी। लग गए लौड़े … !!! और फिर मुझे तो जैसे काठ ही मार गया।

“ओह … आ … आ … ई अम सॉरी … म … म … मुझे लगा … मेरा मतलब है … मैंने सोचा म … मधुर होगी। ओह … स … सॉरी … आ … ई आम रिअली सॉरी, प्लीज!” मैं हकलाता सा बोला। मुझे खुद पता नहीं मैं क्या बोल रहा था। इस अप्रत्याशित स्थिति के लिए मैं कतई तैयार नहीं था। बहुत बड़ी गलती हो गयी थी। हे भगवान … ! ये क्या हो गया??? अगर मधुर को पता चल गया या उसकी चींख सुनकर वो अभी आ गयी तो क्या होगा? सोचकर ही मुझे तो लकवा सा मार गया।

“वो … वो … वो मधु कहाँ है?” बमुश्किल मेरे मुँह से निकाला।
“दीदी सामने पाल्क में गाय तो लोटी डालने गयी है.” उसने मरियल सी आवाज़ में जवाब दिया। उसकी मुंडी झुकी हुई थी और एक हाथ से वह अपनी छाती को सहला रही थी।

“ग … गौरी … प्लीज … मुझे माफ करना … मुझसे अनजाने में गलती लग गयी प्लीज, आई अम सॉरी.” मैं मिमियाया।
“आप बाहल जातल बैठो मैं चाय लाती हूँ.”

“ओह … हाँ” कह कर मैं कमरे में आ गया। मैंने अपना सिर पकड़ लिया।
अब मैं आगे का सीन सोच रहा था।
हे भगवान … 2-4 मिनट में जब मधुर आएगी तो क्या होगा? पता नहीं गौरी क्या और किस प्रकार इस घटना का जिक्र मधुर से करेगी और पता नहीं मधुर क्या समझेगी और क्या प्रतिक्रिया करेगी? आज तो यकीनन लौड़े लग ही गए समझो। हे लिंग देव! रक्षा करना प्रभु … अब तो बस एक तेरा ही आसरा है। मैं इस बार सच्चे मन से तेरा सोमवार का व्रत रखूँगा और दिनभर कुछ नहीं खाऊँगा … कसम से … बस इस बार इज्जत बचा ले मेरे मौला … मेरे दीन दयाल … !!!

गौरी बिना बोले कमरे में चाय रख गयी। उसने अपनी नज़रें झुका रखी थी। मेरी भी अब उस से आँख मिलाने की हिम्मत कहाँ थी। मैं चाय लेकर बाथरूम में चला आया। इस स्थिति में मैं मधुर का सीधा सामना नहीं कर सकता था। चाय पीने की तो बिल्कुल भी इच्छा नहीं रह गयी थी, मैंने उसे टॉयलेट के हवाले किया और फ्लश चला दिया।

मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं आगे के हालात के बारे में सोचने लगा। क्या किया जा सकता है? आगे आने वाली अनचाही स्थिति का सामना कैसे किया जाए? दिमाग में कुछ नहीं सूझ रहा था। अलबत्ता मैंने अपने कान बाहर ही लगाए रखे।

तभी मुझे मधुर के कदमों की हल्की सी आहट सुनाई दी- साहब को चाय दे दी क्या?
“हओ …” यह गौरी की आवाज़ थी। वा ‘हाँ’ को ‘हओ’ बोलती है।

“आपते लिए बनाऊँ?”
“ना … मेरी इच्छा नहीं है, अभी तू पी ले.” मधुर ने लापरवाह अंदाज़ में कहा।
“अच्छा सुन! आज मार्केट चलेंगे … काम जल्दी से निपटा ले तेरे लिए कुछ ढंग के कपड़े और किताबें आदि लाने हैं.”
“हओ”

हे लिंग देव तेरा लाख-लाख शुक्र है। लगता है अभी तो जान बच गयी। मैंने भगवान का धन्यवाद किया। हालांकि मैं यह जरूर सोच रहा था अगर बाद में गौरी ने कुछ बता दिया तो क्या होगा? ओहो … गोली मारो … बाद की बाद में देखेंगे फिलहाल तो आने वाला तूफान टल गया है। दिन में अगर कुछ अन्यथा हुआ भी तो कोई बात नहीं, मैं सिर दर्द का बहाना बना लूँगा या फिर ज्यादा काम का बहाना लगाकर आज दफ्तर से देरी से आऊँगा।

मैं भी बेकार में ज्यादा ही डर रहा हूँ … मैंने शॉवर खोलकर उसके नीचे सिर लगा दिया।

आज सुबह के घटनाक्रम के बाद पूरा दिन किसी अनहोनी की आशंका में ही बीता। दिनभर यही डर लगा रहा की अभी मधुर का फोन आया, अभी फोन आया। शाम को मैं थोड़ा देरी से घर पहुँचा। मैं आज मधुर की पसंदीदा आइसक्रीम और पिज़्जा लेकर आया था।

मैंने डरते डरते घर में कदम रखे। क्या पता कोई नयी आफ़त मेरा इंतज़ार कर रही हो? मुझे लगा सब कुछ नॉर्मल सा है, मैं बेकार ही चिंता में मरा जा रहा हूँ।
गौरी शायद काम निपटाकर अपने घर चली गयी थी। मधुर भी खासे रंगीन मूड में लग रही थी। लगता है लिंग देव ने मेरी सुन ली।

कई बार मधुर जब अच्छे मूड में होती है तो अपने बालों की दो चोटियाँ बनाती है। और फिर उस रात हमारा प्रेमयुद्ध (मधुर को चुदाई, लंड, चूत और गांड जैसे जैसे शब्द पसंद नहीं हैं) बहुत देर रात तक चलता है। रात को अक्सर वह नाइटी ही पहनती है पर आज उसने सफेद रंग का कमीज़-पाजामा पहना था जिन पर काली-काली बिंदियाँ बनी थी। आज उसने दो चोटियाँ भी बनाई थी, मुझे पक्का यकीन था आज मधुर गांड देने के लिए जरूर राज़ी हो जाएगी।

पिछले 4-5 दिन से उसे माहवारी आई हुई थी और आप तो जानते ही हैं इन दिनों में मधुर चुदाई तो छोड़ो मुझे अपने आप को छूने भी नहीं देती।

आज तो खैर 5वाँ दिन … मेरा मतलब रात थी।

रात के कोई दस बजे होंगे। बार-बार सुबह की घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी। दिमाग जैसे कह रहा था “मैने चेताया था ना? जल्दबाजी में कोई पंगा मत लेना पर साला लंड तो किसी की मानता नहीं? लग गये ना लौड़े?”

मैं अपने नाराज लेकिन खड़े लंड को पाजामे के ऊपर से ही सहला रहा था। मधुर काम निपटाकर कमरे में आई और ड्रेसिंग टेबल के शीशे के सामने खड़ी होकर अपने आप को देखने लगी। मेरा पूरा ध्यान उसकी इन हरकतों पर ही लगा था। ऐसे मौकों पर मैं अक्सर उसे अपनी बांहों में दबोच लिया करता हूँ पर आज मेरी ऐसा करने के हिम्मत नहीं हो रही थी। मैं आज पूरी तसल्ली कर लेना चाहता था कि आज सुबह वाली बात गौरी ने उसे बताई है या नहीं।

“प्रेम?”
“हूँ?” मेरा दिल जोर से धड़का।
“मैं कुछ मोटी नहीं होती जा रही?” उसने अपना कुर्ता थोड़ा सा ऊपर उठाकर अपनी कमर की चमड़ी को अपने अंगूठे और तर्जनी अंगुली के बीच दबाकर देखते हुए पूछा।

आप तो जानते ही हैं कि ये सब औरतों के नाज़-ओ-अंदाज़ और नखरे होते हैं। उन्हें अपनी तारीफ बहुत पसंद होती है।

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मैं आज भला उसकी तारीफ क्योंकर नहीं करता- मेरी जान, तुम बहुत खूबसूरत लगती हो। कहाँ मोटी हो रही हो मुझे तो लगता है तुम कमजोर होती जा रही हो, दिनभर काम में लगी रहती हो अपना ध्यान बिल्कुल नहीं रखती!

“हटो परे … झूठे कहीं के!” उसने अपने बालों की जानबूझ कर छोड़ी गयी पतली सी आवारा लट को पीछे करते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कहा।
“सच … कहता हूँ … तुम आज भी 20-22 की कॉलेज गर्ल ही लगती हो.” मैंने मस्का लगाया।
“देखो ना कितनी चर्बी चढ़ गयी है.” उसने अपनी कमर को दोनों हाथों से घेरा बनाकर पकड़ते हुए मेरी ओर देखा।
वाह … ! क्या कातिलाना अंदाज़ था।

अब तो मेरा उठना और उसे बांहों में भर लेना लाज़मी बन गया था। मैं पलंग से उछला और जाकर पीछे से उसे बांहों में भर लिया। मेरा खड़ा लंड उसके नितंबों से जा लगा और एक हाथ से मैंने उसका एक उरोज और दूसरे हाथ से उसकी मुनिया को पकड़कर धीरे धीरे दबाना चालू कर दिया।

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“ओहो … रुको तो सही … लाइट तो बंद करने दो.”
“जानेमन अब रूकना उकना नहीं … जल्दी से मेरे दुश्मनों को परे हटाओ.” मैंने उसके पाजामे का नाड़ा खींचते हुए कहा।

“ओहो … प्रेम तुम से तो 3-4 दिन भी नहीं रुका जा सकता? आज मेरा बिल्कुल भी मूड नहीं है, कल करेंगे प्लीज … आज तो 5वाँ दिन ही है.”
“तुम्हारे 5वें दिन की ऐसी की तैसी! आज मैं तुम्हें नहीं छोड़ने वाला!” मैंने उसे बांहों में भरे हुए ही पलंग पर पटक दिया।

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इस आपाधापी में वह पेट के बल गिर पड़ी और मैं ठीक उसके ऊपर आ गया।

“मेरी जान, तुम क्या जानो कि पिछली चार रातें यानि 96 घंटे और 14 मिनट मैंने कैसे बिताए हैं?”
“हुंह … तुम्हें मेरी कोई परवाह ही नहीं है.”
“मधुर तुम बहुत खूबसूरत हो … मेरी जान … बोलो क्या चाहिए तुम्हें?” मैंने उसके कानो के पास चुंबन लेते हुए कहा।
“हटो … परे झूठे कहीं के?” मधुर ने उलाहना देते हुए से कहा।

“सच में मधुर, तुम्हारे नितम्ब बहुत खूबसूरत हैं.” कहते हुए मैंने उसके कानों की लॉब को अपने होंठों में दबा लिया।
“नो … बिल्कुल नहीं …”
“प्लीज मधुर आज कर लेने दो ना … ? देखो ना पूरे 9 महीने और 17 दिन हो गये हैं। आज पीछे से करने का बहुत मन कर रहा है प्लीज मान जाओ।
मैं उसके ऊपर से थोड़ा सा सरक गया और उसके नितंबों पर हाथ फिराने लगा। मेरा लंड तो पाजामें में जैसे उधम ही मचाने लगा था।
“ओहो … रुको … ना …” मधुर कसमसाने सी लगी।
“क्या हुआ?”

वो पलटकर पीठ के बल हो गयी और फिर बोली “प्रेम … बस एक बार मुझे गर्भवती हो जाने दो फिर चाहे तुम रोज पीछे से कर लिया करना.”
“मधुर! देखो डॉक्टर ने बताया तो है कि …”
वह मेरी बात को बीच में ही काटते हुए बोली- अरे छोड़ो जी … डॉक्टरों को क्या पता … मुझे अपने कान्हाजी और लिंग देव पर पूरा विश्वास है, मेरी मनोकामना जरूर पूरी होगी.”

मैं मन ही मन हंसने लगा। लिंग देव कुछ नहीं करेंगे ये लंड देव जरूर कुछ कर सकता है।
पर मैंने उसे समझाते हुए कहा- मधुर, हम कोई बच्चा गोद भी तो ले सकते हैं?
“नहीं प्रेम, मैं तुम्हारे अंश से ही अपनी कोख भरना चाहती हूँ.”

“आजकल IVF, IUI, सैरोगेसी जैसी बहुत सी तकनीकें और साधन हैं तो फिर ..????”
“नहीं मुझे इस झमेले में नहीं पड़ना … ” मधुर कुछ उदास सी हो गयी थी।

“प्रेम???”
“हाँ”
“बोलो ना मेरी मनोकामना पूरी होगी ना? तुम क्या कहते हो?”

अब मैं क्या बोलता? डॉक्टर्स ने तो साफ मना कर दिया है कि मधुर अब कभी दुबारा माँ नहीं बन सकेगी। पर मैं उसका नाजुक दिल नहीं तोड़ सकता था। पिछली बार उसकी माहवारी 3-4 दिन आगे सरक गयी थी तो वो कितना खुश थी। पर जैसे ही माहवारी आई वो बहुत रोई थी। मैंने उसका मन रखने के लिए तसल्ली देते हुए कहा- हाँ मधुर, कई बार चमत्कार भी हो जाते हैं … हाँ हाँ तुम्हारी मनोकामना जरूर पूरी होगी.
“ओह … थैंक यू!” कहते हुए मधुर ने हाथों से मेरा सिर पकड़कर मेरे होठों को जोर से चूम लिया।

प्यारे पाठको और पाठिकाओ! क्या आप ‘आमीन!’ भी नहीं बोलेंगे?
शेष अगले भाग में
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02-12-2022, 02:08 PM,
#17
RE: Sex Vasna चोरी का माल
तीन पत्ती गुलाब
भाग-3

मैंने अपने और मधुर के दुश्मनों को (अरे भाई कपड़ों को) परे हटा दिया और उसे बांहों में दबोच लिया। अब मधुर ने अपनी जांघें खोल दी और पप्पू को अपने हाथों से पकड़कर अपनी मुनिया के छेद पर रगड़ने लगी। मैंने एक जोर का धक्का मारकर उसका काम आसान कर दिया।
चूत तो वैसे ही प्रेमरस में भीगी हुई थी पप्पू महाराज गच्च से अंदर दाखिल हो गये।

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हम दोनों के होंठ आपस में चिपक गये। मुनिया के रसीले होंठों ने पप्पू को जोर से भींच लिया। मधुर आज पूरे शबाब और मधुर रंग में लग रही थी। आज तो वो मुझे हर तरह (सिवाय गांड के) खुश के देना चाहती थी।
मैंने उसके उरोजों को भींचते हुए उसके होंठों को चूमना शुरू कर दिया। आह … उंह और फच्च-फच्च का मधुर प्रेम संगीत सितार की तरह बजने लगा। मधुर हौले हौले अपने नितंबों को उठाकर मेरे धक्कों की ताल में अपना सुर और लय मिलाने लगी और फिर उसने अपने दोनों पैर ऊपर उठाकर मेरी कमर पर कस लिए।
चुदवाने के मामले में मधुर का कोई जवाब नहीं है। वह मर्द को कैसे रिझाया जाता है, बखूबी जानती है। उसकी चूत की अदाएँ, दीवारों को सिकोड़ना और मरोड़ना चुदाई के आनंद को दुगना कर देता है। आज भी उसकी चूत किसी 20-22 साल की नवयुवती की तरह ही है।
अन्दर बाहर होते मेरे लंड को जिस प्रकार वह अपनी चूत में भींच रही थी, मुझे लगता था कि मैं आज जल्दी झड़ जाऊँगा पर मैं ऐसा कतई नहीं चाहता था। मैं आज मधुर को लंबे समय तक रगड़ने के मूड में था।

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मेरे सपनों में तो जैसे गौरी ही बसी थी। सुबह जब मैंने उसकी बुर को हाथ में पकड़ा था तो मोटे मोटे पपोटों का थोड़ा अंदाज़ा तो हो ही गया था। उसकी केश राशि को देखकर तो कोई अनाड़ी भी अंदाज़ा लगा सकता है कि उसकी चूत पर किस प्रकार की मुलायम घुंघराली केशर क्यारी उगी होगी और बुर के दोनों फलक तो बिल्कुल गुलाबी संतरे की फाँकों के मानिंद होंगे।

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बुर के ऊपर की मदनमणि (दाना) तो किशमिश के दाने के जितनी होगी और कामरस में डूबी उसकी बुर की फाँकों और पत्तियों के अंदर का नज़ारा देखकर तो आदमी के लिए अपने होश कायम रख पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा। काश कभी ऐसा हो जाए कि यह हसीन मुजसम्मा मेरी बांहों में आ जाए तो मैं इसके लिए पूरी कायनात ही लूटा दूँ।

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मेरी यह खूबसूरत कल्पना मुझे मदहोश किए जा रही थी। कई बार मुझे एक शंका भी होती है इतनी खूबसूरत लड़की अपने कौमार्य को कैसे बचाकर रख पाई होगी? कहीं किसी ने रगड़ तो नहीं दिया होगा?
अचानक मधुर ने अपने दाँतों से मेरे होंठों को जोर से काटा तो मैं अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आया। और फिर मैंने दना-दन 5-7 धक्के जोर-जोर से लगा दिए।
मधुर आह … उइईईई ईईईईई … करने लगी। उसे लगा मैं अब अपना रस निकालने के मूड में हूँ।
“ओहो … थोड़ा धीरे करो … ओह … प्लीज … रुको … मत … मेरी जान … मेरे प्रेम!” उसने मेरे होंठों को एक बार फिर चूम लिया।
“प्रेम एक बार रुको प्लीज … ओह …”
“क्या हुआ?”
“एक बार बाहर निकालो, प्लीज जल्दी!”
मैं चाहता तो नहीं था पर मैं उसके ऊपर से हट गया। मधुर जल्दी से डॉगी स्टाइल में हो गयी। आप तो जानते ही हैं मुझे यह आसन कितना पसंद है। मधुर इस प्रकार से बहुत कम करवाती है पर इन दिनों में तो वह झड़ने के समय इसी आसान में रहना पसंद करती है। अब मैं भी उसके पीछे घुटनों के बल खड़ा होकर उसके गोल-गोल नितम्बों पर हाथ फिराने लगा।
मैंने थोड़ा नीचे होकर उसके नितंबों पर एक करारा चुंबन लिया तो मधुर के मुँह से सीत्कार सी निकल गयी। अब मैंने उसकी चूत की पंखुड़ियों को थोड़ा चौड़ा किया तो ज़ीरो वॉट के नाइट लैंप की रोशनी में उसकी चूत का कामरस में डूबा गुलाबी चीरा ऐसा लग रहा था जैसे किसी पहाड़ी से कोई बलखाती शहद की नदी निकल रही हो।
मैंने उसके मूलबंद (पेरिनियम- गुदा और चूत के बीच का 2-3 से.मी. का भाग) पर अपनी जीभ फिराई। औरतों का यह भाग बहुत संवेदनशील होता है।
मधुर की तो मीठी चीख सी निकल गयी ‘ईईई ईईईई ईईईईई ईई’
“जल्दी से डालो ना प्लीज?” कामोत्तेजना के शिखर पर पहुँची मधुर अपने नितंबों को थिरकाने लगी थी। उसने एक हाथ पीछे करके मेरे पप्पू पकड़कर मसलना चालू कर दिया।
अब देर करना तो ठीक नहीं था। मैं थोड़ा आगे सरककर अपने तातार (तन्नाया) लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रख दिया और एक जोर के झटके के साथ पूरा लंड उसकी पनियाई चूत में फिर से ठोक दिया।
“उईईईईई माआआ आआआ … ओहो … थोड़ा धीरे प्लीज?”
मैं अब कुछ सुनने के मूड में नहीं था। मैंने उसकी कमर कसकर पकड़ ली और दना-दन 5-6 धक्के लगा दिए। मधुर पहले तो थोड़ा हिनहिनाई फिर उसने अपना सिर तकिए पर रख दिया और अपनी जांघों को ढीला कर दिया और अपनी कमर और नितंबों को मेरे धक्कों के साथ आगे पीछे करने लगी।
सच कहूँ तो शादी के 8-10 साल बाद भी मधुर की चूत और गांड की लज्जत अभी भी बरकरार है। मैं मन ही मन गौरी और मधुर के नितंबों की तुलना कर रहा था। गौरी और मधुर के नितंबों में 19-20 का ही फर्क रहा होगा। पर गौरी के नितम्ब कसे हुए ज्यादा लगते हैं।
काश कभी ऐसा हो जाए कि गौरी के नग्न नितम्ब मेरी आँखों के सामने हों और मैं उनको जोर जोर से दबाकर मसलकर छूकर और चूम कर देख सकूँ। पहले उसके नितंबों पर 4-5 थप्पड़ लगाऊँ और फिर उसकी बुर और गांड के छेद पर अपनी जीभ फिरा दूँ तो उसकी दोनों ही सहेलियाँ (बुर और उसकी पड़ोसन) ईसस्स्स स्स्स्स्स कर उठे।
“क्या हुआ?”
मैं चौंका … शायद गौरी के ख्यालों में मैंने धक्के लगाने बंद कर दिए थे। मैंने उसके दोनों नितंबों पर एक-एक थप्पड़ सा लगाया और एक जोर का धक्का फिर से लगाना चालू कर दिया।
“आह … उईईई … याआआ … आह …” करते हुए मधुर ने अपनी चूत की फाँकों को जोर से कसना चालू कर दिया। अब मैं 5-6 हल्के धक्कों के बाद एक धक्का जोर से लगा रहा था।

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मधुर मीठी सीत्कार कर रही थी और उसने अपनी चूत का संकोचन भी शुरू कर दिया था।
मुझे लगा वो अब झड़ने के करीब है।
मधुर के नितंबों की खाई के बीच बना वो जानलेवा छेद जैसे खुल और बंद हो रहा था। हालांकि अब यह छेद गुलाबी की जगह काला तो नहीं पड़ा पर थोड़ा सांवला जरूर हो गया है। पर उसकी कसावट वैसी की वैसी ही है।
मैंने अपने अंगूठे पर अपना थूक लगाकर उस छेद पर फिराना चालू कर दिया। मेरा मन तो उस छेड़ में अपना अंगूठा डालने का कर रहा था पर मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आप को रोक रखा था। मैं मधुर को नाराज़ नहीं करना चाहता था।
मैं एक हाथ से उसके एक उरोज की घुंडी को पकड़ कर मसलने और दूसरे हाथ से उसके नितंबों पर थपकी सी लगाने लगा। मधुर अपने नितंबों को मेरे धक्कों के साथ जोर-जोर से आगे पीछे करने लगी थी। वह आह … उईईई … या … की आवाज़ें निकालने लगी थी और अपनी चूत का संकोचन करने लगी थी।
मैंने उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और कसकर दो धक्के लगाए। उईईई ईईई माआअ … मधुर की रोमांच भरी सीत्कार निकली और उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। अब वो कुछ ढीली पड़ने गयी। उसने अपने सिर को तकिए से लगा लिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब और खुल गये। वह जोर जोर से सांस लेने लगी।
मैं थोड़ी देर रूक गया।
“प्रेम निकाल दो … प्लीज अब रुको मत … मेरी तो कमर दर्द करने लग गयी.”
मुझे लगा 20-25 मिनट के इस घमासान से वह थक गयी है।
मेरा मूड और लंबा खींचने का था पर मधुर की हालत देखकर मैंने जोर जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए और अगले 2 मिनट में मेरा भी कामरस उसकी चूत में निकलने लगा।

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1 … 2 … 3 … 4 … पता नहीं कितनी फुहारें मेरे लंड ने छोड़ी. मुझे उनको गिनने की सुध कहाँ थी। हम दोनों तो आँखें बंद किये प्रकृति के इस अनूठे, अनमोल और नैसर्गिक आनंद को भोग कर जैसे मोक्ष को प्राप्त हो रहे थे।
मधुर ने अपनी मुनिया को जोर से सिकोड़ते हुए मेरे कामरस को जैसे चूसना शुरू कर दिया। मैं वीर्य स्खलन के बाद भी अपने लंड को उसकी चूत में डाले रहा। थोड़ी देर बाद मेरा लंड उसकी चूत से फिसलकर बाहर आ गया।

[Image: 5867726-4d0005c-640x.jpg]
मधुर थोड़ी देर उसी पॉज़ में अपने नितंबों को ऊपर किए रही।
वो मानती है कि ऐसा करने से वीर्य उसके गर्भाशय में चला जाएगा और उसके गर्भवती होने की संभावना बढ़ जाएगी।
आमीन … (तथास्तु)
मैं जब बाथरूम में अपने लंड को धोकर कमरे में वापस आया तो मधुर सीधी होकर लेट चुकी थी। मैंने उसे एक बार फिर से बांहों में भर लिया और एक चुंबन उसके होंठों पर ले लिया।
“थैंक यू मधुर इतनी प्यारी चुदाई के लिए!”
“छी … !! कितना गंदा बोलते हो तुम?”
“अरे मेरी बुलबुल अब चुदाई को तो चुदाई ही बोलेंगे ना?”
“क्यों और नाम नहीं है क्या?”
“चलो तुम बता दो?”
“स … संभोग बोल सकते हो, प्रेम मिलन बोल सकते हो, रति क्रिया … संगम … बहुत से सुंदर नाम … हैं?”
“मेरी जान चुदाई में गंदा-गंदा बोलने का भी अपना ही मज़ा है.”
उसने तिरछी निगाहों से मुझे देखा।
“ओके कोई बात नहीं अब से चुदाई बोलना बंद … कसम से … पक्का!” मैंने हँसते हुए कहा।
“हुंह … हटो परे गंदे कहीं के …”
मैने हँसकर उसके उरोजों के बीच अपना सिर रख दिया। मधुर को अपने बूब्स चुसवाना बहुत पसंद है। स्त्री के जो अंग ज्यादा खूबसूरत होते हैं उनमें स्त्री की कामुकता छिपी होती है। मधुर के तो उरोज और नितम्ब बहुत ही कामुक और खूबसूरत हैं। मैं अक्सर चुदाई से पहले और चुदाई के दौरान भी उसके उरोजों को चूसता रहता हूँ पर इन दिनों में डॉगी स्टाइल के चक्कर में यह कम नहीं हो पाता है।
मैंने उसके एक उरोज को मुँह में भर लिया। मधुर एक हाथ की अंगुलियाँ मेरे सिर के बालों में फिराने लगी।
“ओह … दांत से मत काटो प्लीज!” मैं बीच बीच में उसके पूरे उरोज को मुँह में भरकर चूस रहा था कभी कभी उसके निप्पल को दाँतों से थोड़ा दबा भी रहा था। निप्पल तो फूलकर अब अंगूर के दाने जैसे हो चले थे।
“प्रेम बुरा ना मानो तो एक बात पूछूँ?”
“हाँ …”
“ये गौरी है ना?”
मैं चौंका … ??? हे भगवान क्या गौरी ने मधुर को कहीं सब कुछ बता तो नहीं दिया? मुझे यही डर सता रहा था। मैं तो सोच रहा था बात आई गयी हो गई होगी पर … मेरी किस्मत इतनी सिकंदर कैसे हो सकती है? लग गये लौड़े!!!
“ओह … दरअसल वो … वो …” मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था क्या बोलूं? मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। बस अब तो जैसे बम विस्फोट होने ही वाला है।
“प्रेम मैं चाहती हूँ क्यों ना हम गौरी को अपने यहाँ ही रख लें?”
“क … क्या मतलब??? … ओह मेरा मतलब … वो … ?” मैं हकला सा रहा था। मुझे तो उसकी बातों पर जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था।
“देखो … उसके यहाँ रहने से मुझे और तुम्हें कितना आराम हो जाएगा। मैं चाहती हूँ वो कुछ पढ़ लिख भी ले। वह 5-4 क्लास तक तो पढ़ी है, बहुत इंटेलिजेंट भी है और आगे पढ़ना भी चाहती है पर उसके घरवाले सभी निपट मूर्ख हैं। जल्दी ही किसी दिन कोई ऊंट, बैल या मोटा बकरा देखकर उसे किसी निरीह पशु की तरह उसके खूंटे से बाँध देंगे। मैं चाहती हूँ वह किसी तरह 10वीं क्लास पास कर ले। उसके बाद कोई भला लड़का देखकर उसकी शादी करवा देंगे। तुम क्या कहते हो?”
“ओह …”
“क्या हुआ?”
“म … म … मेरा मतलब है यह तो बहुत खूब … बहुत ही अच्छी बात है.”
“हाँ … अनार की तरह इस बेचारी का जीवन तो खराब नहीं होगा.”
“हाँ जान तुम बिलकुल सही कह रही हो।”
इस मधुर की बच्ची ने तो मुझे डरा ही दिया था। इन औरतों को किसी बात को घुमा फिराकर बताने में पता नहीं क्या मज़ा आता है?
अचानक मुझे लगा मेरी सारी चिंताएँ एक ही झटके में अपने आप दूर हो गयी हैं।
मैंने एक बार फिर से मधुर को अपनी बांहों में जकड़ लिया … अलबत्ता मेरे ख्यालों में फिर से गौरी का कमसिन बदन, सख्त उरोज और नितम्ब ही घूम रहे थे.
कहानी जारी रहेगी.
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02-12-2022, 02:09 PM,
#18
RE: Sex Vasna चोरी का माल
तीन पत्ती गुलाब भाग -4
इस भयंकर प्रेमयुद्ध के बाद सुबह उठने में देर तो होनी ही थी। मधुर ने चाय बनाकर मुझे जगाया और खुद बाथरूम में घुस गयी। आज उसे अपनी मुनिया की सफाई करनी थी सो उसे पूरा एक घंटा लगने वाला था।
मैं बाहर हाल में बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अखबार पढ़ रहा था। आज गौरी नज़र नहीं आ रही थी अलबत्ता एक थोड़े साँवले से रंग की लड़की रसोई से सफाई की बाल्टी और झाड़ू पौंछा लेकर आती दिखाई दी।
ओह … यह तो गुलाबो की दूसरी लड़की थी। मुझे फिर कुछ आशंका सी हुई? गौरी क्यों नहीं आई? क्या बात हो सकती है? पता नहीं कल के वाक़ये (घटनाक्रम) के बाद उसने फ़ैसला कर लिया हो कि अब उसे यहाँ काम नहीं करना? पर मधुर तो उसे यहाँ स्थायी तौर पर ही रखने का कह रही थी … फिर क्या बात हो सकती है?

हे लिंग देव कहीं तकदीर में फिर से लौड़े तो नहीं लग गये?

अब मेरी नज़र उस लड़की पर पड़ी। वो नीचे बैठकर पौंछा लगा रही थी। उसने हल्के आसमानी रंग की कुर्ती और जांघिया पहन रखा था। पौंछा लगाते समय वो घुटनों के बल होकर आगे झुक रही थी। झुकने के कारण उसके छोटे-छोटे चीकुओं की झलक कभी-कभी दिख रही थी। गेहुंए रंग के दो बड़े से चीकू हों जैसे। एरोला ऊपर से फूला हुआ शायद निप्पल अभी पूरी तरह नहीं बने थे। ऐसे लग रहे थे जैसे चीकू पर जामुन का मोटा सा दाना रख दिया हो।

हे भगवान … क्या रसगुल्ले हैं। उसकी छाती का उठान भरपूर लग रहा था। बायाँ उरोज थोड़ा सा बड़ा लग रहा था। अभी उसे ब्रा पहनने की सुध कहाँ होगी। मुझे लगा मेरा लंड अंगड़ाई सी लेने लगा है।
जब से सुहाना को देखा है उसके टेनिस की बॉल जैसे उरोजों को नग्न देखने की मेरी कितनी तीव्र इच्छा होती होगी आप अंदाज़ा लगा सकते हैं।

मैं भला यह मौका हाथ से कैसे निकल जाने देता। मैं टकटकी लगाए उसके उन नन्हे परिंदों को ही देख रहा था। काश वक़्त थम जाए और यह इसी तरह थोड़ी झुकी हुई रहे और मैं इस दृश्य को निहारता रहूँ।

मुझे अचानक ख्याल आया अगर मैं इसे बातों में लगा लूँ तो वो जिस प्रकार पौंछा लगा रही है बहुत देर तक उसके इन नन्हे परिंदों की हिलजुल देखकर अपनी आँखों को तृप्त कर सकता हूँ।
“अंकल आप अपने पैल थोड़े ऊपल कल लो.” अचानक एक मीठी सी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
लगता है यह भी गौरी की तरह ‘र’ को ‘ल’ बोलती है।

“ओह … हाँ …” हालांकि मुझे उसका अंकल संबोधन अच्छा तो नहीं लगा पर मैंने चुपचाप अपने पैर ऊपर सोफे पर रख लिए. अलबत्ता मेरी नज़रें उसकी झीनी कुर्ती के अंदर ही लगी रही।
“क्या नाम है तुम्हारा?”
“मेला नाम?” उसने हैरानी से इधर उधर देखते हुए पूछा जैसे उसे यह उम्मीद नहीं थी कि मैं उस से बात करूंगा।
हे भगवान इसकी काली आँखें तो सुहाना (मेरी बंगाली पड़ोसन की युवा बेटी) से भी ज्यादा बड़ी और खूबसूरत हैं।

“हाँ तुम्हारा ही तो पूछ रहा हूँ?”
“मेला नाम सानिया मिलजा है” (सानिया मिर्ज़ा)
मुझे नाम कुछ अज़ीब सा लगा पर मैंने मुस्कुराते हुए कहा- बहुत खूबसूरत नाम है.
वह हैरान हुई मेरी ओर देखने लगी।

उसे लगा होगा उसका अज़ीब सा नाम सुनकर मैं शायद कोई अन्यथा टिप्पणी करूंगा। मुझे थोड़ा-थोड़ा याद पड़ता है एक दो बार अनार या अंगूर ने इसका जिक्र तो किया था पर उन्होंने तो इसका नाम मीठी बाई बताया था. मधुर ने एक बार हँसते हुए बताया था कि जिस दिन यह पैदा हुई थी, सानिया मिर्ज़ा ने टेनिस में शायद कोई बड़ा खिताब जीता था तो गुलाबो ने इस नये कॅलेंडर का नाम सानिया मिर्ज़ा ही रख दिया था।
खैर नाम जो भी हो इसके चीकू तो कमाल के हैं।

मैं उसे बातों में लगाए रखना चाहता था- वो आज गौरी क्यों नहीं आई?
“कौन गौली?” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।
“अरे वो तुम्हारी बड़ी बहन है ना?”
“ओह … अच्छा … तोते दीदी?”
“हाँ हाँ!”

गौरी ‘क’ और ‘र’ का उच्चारण ठीक से नहीं कर पाती इसीलिए घर वालों ने शायद उसे ‘तोते’ नाम से बुलाना शुरू कर दिया होगा। कई बार बचपन में अंगूठा चूसने वाले बच्चों के साथ या अनचाहे बच्चे जिनकी परवरिश ठीक से ना हुई हो उनके साथ अक्सर ऐसा होता है। यह एक प्रकार का मेंटल डिस-ऑर्डर (दिमागी असंतुलन) होता है या फिर कई बार जीभ में लचीलापन कम होने की वजह से भी ऐसा होता है।
ओह … मैं भी क्या बेहूदा बातें ले बैठा।

“उस पल आज छिपकली गिल गई.”
“छिपकली? कमाल है छिपकली कैसे गिर गई?”
“मुझे क्या मालूम?”
“ओह!”
“उस पल तो हल महीने गिलती है?”

ओह … मैं भी निरा उल्लू ही हूँ। यह तो माहवारी का जिक्र कर रही थी। मुझे थोड़ी हंसी सी आ गई। एक बार तो मेरे मन में आया उसे भी पूछ लूँ कि कभी उस पर छिपकली गिरी या नहीं? पर ऐसा करना ठीक नहीं था।

सानिया मेरे से कोई एक कदम की दूरी पर उकड़ू सी बैठी थी। अब मेरी नज़र उसकी जांघों के बीच चली गयी। पट्टेदार जांघिया उसकी पिक्की के बीच की लकीर में धंसा हुआ सा था। याल्लाह … !!! उसके पपोटे तो किसी जवान लड़की की तरह लग रहे थे।
उसकी जांघों का ऊपरी हिस्सा अन्य हिस्सों के बजाए कुछ गोरा नज़र आ रहा था। उम्र के हिसाब से उसकी जांघें भी थोड़ी भारी लग रही थी। नितम्ब भी गोल गोल खरबूजे जैसे ही तो थे। बस कुछ समय बाद तो यह मीठी बाई छप्पन छुरी बन जाएगी।

मैं मन्त्र मुग्ध हुआ इस नज़ारे को अपनी आंकों में कैद कर लेना चाहता था। काश वक़्त थम जाए और मैं इस मीठी कचोरी को ऐसे ही देखता रहूँ।
“तुम किस क्लास में पढ़ती हो?”
“मैं?” उसे बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि मैं इतना बड़ा आदमी (उसकी नज़र में) उस से इस प्रकार घुलमिल कर बात कर रहा हूँ।

“मम्मी स्कूल भेजती ही नहीं?”
“ओह … क्या तुम पढ़ना चाहती हो?” मैंने पूछा।
“हाँ मैं तो बहुत पढ़ना चाहती हूँ औल बड़ी होकल पुलिस बनाना चाहती हूँ?”
“अरे वाह! ठीक है मैं तुम्हारी मधुर दीदी से बोलूँगा तुम्हारी मम्मी को समझाएगी और तुम्हें पढ़ने स्कूल जरूर भेजेगी।

“सच्ची में?” उसे शायद मेरी बातों का यकीन ही नहीं हो रहा था।
“हाँ पक्का! अच्छा तुम्हारा जन्मदिन कब आता है?”
“पता नहीं? … क्यों?” उसने हैरान होते पूछा।
“क्या घरवाले तुम्हारा जन्मदिन नहीं मनाते?
“किच्च … कभी नहीं मनाया.” उसने बड़े उदास स्वर में कहा।

“ओह … चलो कोई बात नहीं … तुम्हें मधुर के जन्मदिन पर बढ़िया गिफ़्ट दिलवाएँगे.”
“अच्छा?” उसकी आँखों की चमक तो ऐसे थी जैसे किसी अंधे को आँखें मिलने वाली हो।
“तुमने आज नाश्ते में क्या खाया?”
“कुछ नहीं.” उसने अपनी मुंडी नीचे कर ली।

हे भगवान कैसे माँ-बाप हैं बेचारी को बिना खिलाये पिलाए ही काम पर भेज दिया।
“चलो तुम भी चाय और बिस्किट ले लो.” मैंने कहा.
“ना … दीदी गुस्सा होंगी, उनसे पूछ कल ही लूँगी.” उसने बड़ी मासूमियत से कहा।

साली यह मधुर भी एकता कपूर की तरह पूरी हिटलर-तानाशाह बनी रहती है। मज़ाल है उसकी मर्ज़ी के बिना कोई चूं भी कर दे।

खैर मैं तो उसे बातों में उलझाए जून महीने के अन्तिम दिनों की गर्मी में पसीने में भीगे उसके कमसिन और मासूम सौंदर्य का रसास्वादन कर रहा था कि अचानक बेडरूम का दरवाजा खुलने की आवाज़ आई।
मधुर नहाकर आ गई थी; मैंने फिर से अखबार में अपनी आँखें गड़ा दी।

आप सोच रहे होंगे कि किसी कमसिन लड़की के बारे में ऐसे ख्याल रखना तो मेरे जैसे पढ़े लिखे और तथाकथित सामाजिक प्राणी के लिए और वैसे भी अगर नैतिक दृष्टि से भी देखा जाए तो कतई शोभा नहीं देता। ठीक है! मैं आपसे पूछता हूँ मैंने किया क्या है? मैंने तो एक कुशल भंवरे की तरह अपने बावरे नयनों से केवल इस नाज़ुक कली के अछूते सौंदर्य का दीदार या उसके कमसिन बदन की थोड़ी सी खुशबू अपने नथुनों में भर ली है और वो भी बिना उसकी कोमल भावनाओं को कोई ठेश पहुँचाए। आप बेवजह हो हल्ला मचा रहे हैं।
दोस्तो, आप कुछ भी कहें या सोचें मैं अपने अंदर के रावण को तो मार सकता हूँ पर अपने अंदर के इमरान हाशमी को कभी मरने नहीं दूंगा।

गौरी 4 दिनों के बाद के बाद आज सुबह आई है। कहने को तो बस 4 दिन थे पर मेरे लिए यह इंतज़ार जैसे 4 वर्षों के समान था। गौरी अपने साथ कुछ कपड़े लत्ते और छोटा-मोटा सामान भी लेकर आई है। लगता अब तो यह परमानेंट यही रहेगी। मधुर ने उसके लिए स्टडी रूम में एक फोल्डिंग बेड लगा दिया है। मधुर ने उसे शायद कपड़े भी पहनने के लिए दे दिए हैं। पटियाला सलवार और कुर्ती पहने गौरी किसी पंजाबी मुटियार से कम नहीं लग रही है। इसे देख कर तो बस मुँह से यही निकलेगा … ओए होये … क्या पटियाला पैग है।

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ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद आज से मधुर का स्कूल जाना शुरू हो गया है। उसे सुबह 8 बजे से पहले ही स्कूल जाना होता है। गौरी ने उसके लिए नाश्ता बना दिया था। मैं हॉल में सोफे पर बैठे हुए अखबार पढ़ने का नाटक कर रहा था अलबत्ता मेरे कान रसोई में ही लगे थे।

गौरी रसोई घर के दरवाजे के पास खड़ी थी। मधुर जरा जल्दी में थी और उसे समझा रही थी- साहब ने चाय तो पी ली है. उनके लिए नाश्ते में पोहे बना देना और लंच का तुम्हें बता ही दिया है। तू भी खा पी लेना और हाँ … मिर्चें कम डालना.
“हओ.”

“और सुन आज कपड़े धोकर प्रेस कर लेना दिन में। मैं दो बजे तक आ जाऊँगी आज से तुम्हारी नियमित रूप से पढ़ाई शुरू करनी है बहुत छुट्टी मार ली तुमने!”
“हओ.” गौरी ने चिर परिचित अंदाज़ में अपनी मुंडी हाँ में हिलाई।

मधुर ने बाहर जाते समय मेरे ऊपर एक उड़ती सी नज़र सी डाली तो मैंने अखबार की ओट से उसे एक हवाई किस दे दिया। मधुर मुस्कुराते हुए चली गयी। कसकर बाँधी हुई साड़ी में उसके नितम्ब आज बहुत कातिल लग रहे थे।

मैं अभी अपने आगे के प्लान के बारे में सोच ही रहा था कि गौरी रसोई से बाहर आई और थोड़ी दूर से ही उसने पूछा- आपते लिए नाश्ता बना दूँ?
“ना … अभी नहीं, मैं नहा लेता हूँ फिर नाश्ता करूंगा … अभी तो बस एक कप कड़क कॉफी पिला दो.”
गौरी अपने चिर परिचित अंदाज़ में ‘हओ’ बोलते हुए वापस रसोई में चली गयी।

मैं सोफे पर बैठा उसी के बारे में सोचने लगा। दिल के किसी कोने से फिर आवाज़ आई गुरु देर मत करो गौरी फ़तेह अभियान शुरू कर दो। लंड फिर से ठुमकने लगा था।

थोड़ी देर में गौरी ट्रे में कॉफी का कप लेकर आ गयी।
“सल तोफी” (सर कॉफी) गौरी ने कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए कहा। उसने अपनी मुंडी नीचे ही कर रखी थी। मधुर ने शायद उसे मेरे लिए ‘सर’ और अपने लिए ‘मैडम’ का संबोधन गौरी को बताया होगा तभी उसने ‘सर’ कहा था।
“थैंक यू गौरी” मैंने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा।

वह खाली ट्रे उठाकर रसोई में वापस जाने के लिए मुड़ने ही वाली थी कि मैंने पूछा- गौरी, मुझे तुमसे एक जरूरी बात करनी है.
“अब मैंने त्या तिया?” उसने हैरानी से डरते हुए मेरी ओर देखा.
“अरे बाबा तुमने कुछ नहीं किया … मुझे तुमसे माफी मांगनी है.”
“तीस बात ते लिए?”
“ओह … वो उस दिन मैंने तुम्हें गलती से पकड़ लिया था ना?”
“तोई बात नहीं.”
“ना … ऐसे नहीं”
“तो?” उसने सवालिया निगाहों से मेरी ओर देखा।

“तुम्हें बाकायदा मुझे माफ करना होगा.”
“हओ … माफ तल दिया”
“ना ऐसे नहीं?”
“तो फिल तैसे?”
“तुम्हें बोलना होगा कि मैंने आपको माफ कर दिया”
गौरी कुछ सोचने लगी और फिर उसने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा- मैंने आपतो माफ तल दिया.” गौरी के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गयी और मेरी भी हंसी निकल गयी।
“थैंक यू गौरी.”

“वो दरअसल मुझे लगा मधुर होगी? इसलिए सब गड़बड़ हो गयी.”
“तोई इतना जोल से दबाता है त्या? पता है आपने तितना जोर से दबा दिया था मेले तो 3-4 दिन दल्द होता लहा?” उसने उलाहना देते हुए अपने हाथों से अपने दोनों कबूतरों को सहलाते हुए कहा।
“सॉरी … यार … गलती हो गयी। अब देखो मैं इसलिए तो तुमसे माफी माँग रहा हूँ ना?’
“ठीत है.”
“मैं तो डर रहा था कहीं तुम यह बात मधुर को ना बता दो?”
“हट!!! ऐसी बातें तीसी तो बताई थोड़े ही जाती हैं, मुझे शलम नहीं आती त्या?”
उसने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैं कोई चिड़िमार हूँ। हाए मेरी तोते जान परी मैं मर जावां …

“वैसे गौरी एक बात तो है?”
“त्या?”
“तुम ब्यूटी विद ब्रेन हो.”
“मतलब?” उसने हैरानी से मेरी ओर देखा। उसे शायद इसका अर्थ समझ नहीं आया होगा।
“इसका मतलब है तुम खूबसूरत ही नहीं साथ में बहुत अक्लमंद (समझदार) भी हो. इसे सुंदरता और समझदारी का संगम कहते हैं”
मैं तो आज पूरा 100 ग्राम मक्खन लगाने के मूड में था।

“हूँ.” गौरी मंद-मंद मुस्कुरा रही थी, उसे अपनी तारीफ अच्छी लगी थी।
“अक्सर खूबसूरत लड़कियाँ दिमाग से पैदल ही होती हैं पर तुम्हारे मामले में उल्टा है। लगता है भगवान ने झोली भरकर तुम्हें खूबसूरती और समझदारी दी है। जैसे खूबसूरती के खजाने के सारे ताले तोड़ कर तुम्हें हुश्न से नवाजा है। क्यों सच कहा ना मैंने?”
“हा … हा …” गौरी अब जोर जोर से हंसने लगी थी।

वैसे मेरे प्रेमजाल की भूमिका ठीक से शुरू हो गयी थी और अब आगे की रूपरेखा तो शीशे की तरह मेरे दिमाग में बिल्कुल साफ थी। चिड़िया के उड़ जाने का अब कोई खतरा और डर नहीं था। अब तो इसे मेरे प्रेमजाल में फंसाना ही होगा।
“अरे हाँ गौरी … तुमने मूव या आयोडेक्स वगेरह कुछ लगाया था या नहीं?”
“किच्च?” उसने अपनी जीभ से किच्च की आवाज़ निकालकर मना किया। हे भगवान ये जब मना करने के अंदाज़ में ‘किच्च’ की आवाज़ निकालती है तो इसके गालों में पड़ने वाले डिंपल तो दिल में धमाल नहीं दंगल ही मचा देते हैं।

“कहो तो मैं लगा देता हूँ?”
“हट …” अब तो उसकी मुस्कान जानलेवा ही लगने लगी थी।
मैंने अब कॉफी के कप पर नज़र डालते हुए कहा- गौरी! तुमने अपने लिए भी कॉफी नहीं बनाई या नहीं?
“किच्च”
“क्यों?”
“मैं तो तोफी पीती ही नहीं”
“अरे??? वो क्यों?”
“वो … वो म … मौसी मना तलती है.”
“कमाल है मौसी मना क्यों करती है भला?”
“वो तहती है यह बहुत गलम होती है.”
“हाँ ठीक ही तो है कॉफी का मज़ा तो गर्म-गर्म ही पीने में आता है?”

“अले आप समझे नहीं?”
“क्या?”
“वो … वो …” गौरी कुछ बोलते हुए शर्मा सी रही थी।
“वो … वो क्या? प्लीज साफ बोलो ना?”
“वो … मुझे शलम आती है?”
“कमाल है कॉफी पीने में शर्म की क्या बात है?”
“ओहो … पीने में नहीं?”
“तो फिर?”
“वो मौसी तहती हैं तुवारी लड़तियों तो तोफी नहीं पीनी चाहिए.” उसने शर्माकर अपनी मुंडी नीचे कर ली।
“अरे … ??? वो क्यों? इसमें क्या बुराई है?”
“नहीं … मुझे बताते शलम आ रही है.” गौरी की शक्ल अब देखने लायक थी।
“प्लीज बोलो ना?”
“वो … वो..” उसने अपना गला साफ करते हुए बड़ी मुश्किल से मरियल सी आवाज़ में कहा- तोफी पीने से सु-सु में जलन होने लगती है.
मारे शर्म के गौरी तो दोहरी ही हो गयी।

ईसस्स् स्स्स्स… हाए मैं मर जावां।

उसका पूरा चेहरा सुर्ख (लाल) सा हो गया था और अधर जैसे कंपकपाने लगे थे। उसके माथे और कनपटी पर जैसे पसीना सा झलकने लगा था। अब मुझे समझ आया वो मेरे सामने सु-सु का नाम लेने में शर्मा रही थी। मैं मन में सोच रहा था साली अब भी इसे सु-सु ही बोलती है। अब तो यह पूरी भोस (बुर) बन चुकी होगी। इसे तो पूरे लंड की मलाई भी घोंट जाने में जलन नहीं हो सकती यह तो कॉफी है।

“अरे यह सब बकचोदी (बकवास) है?” मेरे मुंह से अचानक निकल गया।
गौरी ने मेरी ओर हैरानी से देखा। उसे बकचोदी शब्द शायद अटपटा लगा होगा। पर मैं चाहता था वह इन लफ्जों को सुनने की आदि हो जाए और उसे झिझक या शर्म महसूस ना हो।
“ऐसा कुछ नहीं होता … निरी बकवास और चुतियापे वाली बात है यह!” मैंने उसे समझाते हुए कहा- देखो! मैं और मधुर तो अक्सर साथ-साथ कॉफी पीते हैं उसे तो कभी सु-सु में जलन नहीं हुई.
“पल मैंने तो पहले तभी नहीं पी.”
“कोई बात नहीं आज तुम भी पहली बार पीकर तो देखो … कई चीजें जिंदगी में पहली बार करने में बड़ा मज़ा आता है.” मैंने हँसते हुए कहा।

उसने कुछ कहा तो नहीं लेकिन मैं उसके मन में चल रही उथल-पुथल का अनुमान अच्छी तरह लगा सकता था।
“अरे भई मैंने कहा ना डरो मत … कुछ नहीं होगा. और अगर सु-सु में जलन हुई भी तो उसमें कोल्ड क्रीम लगा लेना … बस.” मैंने उसे यकीन दिलवाने की कोशिश की।

मैंने उसकी उलझन खत्म करने के लिहाज़ से कहा- अरे … यह कॉफी तो बातों-बातों में ठंडी हो गयी, अब तुम फटाफट दो कप कड़क कॉफी और बना लाओ फिर साथ साथ पीते हैं.
उसे कॉफी का कप पकड़ाते हुए मैंने कहा।

अब उस बेचारी के पास कॉफी बनाकर लाने के अलावा और कोई रास्ता कहाँ बचा था।
वह कॉफी का कप उठाकर धीरे धीरे रसोई की ओर जाने लगी।

हे भगवान इसके नितम्ब तो कमाल के लग रहे हैं। जब यह चलती है तो जिस अंदाज़ में ये गोल गोल घूमते हैं दिल पर जैसे छुर्रियाँ ही चलने लगती हैं। दिल तो कहता है गुरु इसने तो मुझे हलाल ही कर दिया। पता नहीं कब इनको करीब से नग्न देखने और मसलने का मौका मिलेगा। मेरा तो मन करता है इसे घोड़ी बनाकर इसके नितंबों पर जोर जोर से थप्पड़ लगाकर लाल कर दूँ और फिर प्यार से इन पर अपनी जीभ फिराऊँ और फिर अपने पप्पू पर थूक लगाकर उसे गहराई तक इसकी मखमली गांड में उतार दूँ और फिर आधे घंटे तक हमारा यह घमासान दंगल चलता रहे।

मैं इन ख्यालों में डूबा हुआ था कि गौरी कॉफी बनाकर ले आई। मेरे लिए उसने मग में कॉफी डाली थी और अपने लिए गिलास में। उसने कॉफी का कप मुझे पकड़ा दिया और खुद गिलास लेकर नीचे फर्श पर बैठने लगी तो मैंने उसे कहा- अरे नीचे क्यों बैठती हो, चलो उस टी टेबल पर बैठ जाओ.
मैंने सोफे और सेंट्रल टेबल के पास रखी स्टूल (टी टेबल) की ओर इशारा करते हुए कहा।

मेरा मन तो कर रहा था इसे अपने पास सोफे पर नहीं बल्कि अपनी गोद में ही बैठा लूँ पर वक़्त की नज़ाकत थी अभी यह सब बोलने का या करने का माकूल समय नहीं आया था।

गौरी एक हाथ से उस स्टूल को थोड़ा सा खिसकाकर उस पर बैठ गयी। उसके गोल-गोल नितम्ब शायद उस स्टूल पर पूरे नहीं आ रहे होंगे तो सुविधा के लिए उसने अपनी एक टांग दूसरे पर रख ली। ऐसा करने से उसकी मांसल पुष्ट जांघें और उनके बीच पहनी पैंटी की आउटलाइन्स साफ दिखने लगी थी।

हे भगवान! उसकी सु-सु तो बस एक बिलांद के फ़ासले पर ही होगी। पता नहीं उसे देखने का मौका मेरे नसीब में कब आएगा।
मुझे लगता है उसकी बुर पर हल्के मुलायम बालों का पहरा होगा। बीच की दरार तो रस से भरी होगी और उसकी भीनी भीनी खुशबू तो दिलफरेब ही होगी।

मैं टकटकी लगाए उसकी जांघों के संधि स्थल को ही निहार रहा था। गौरी ने मुझे ऐसे करते हुए शायद देख लिया था तो उसने अपनी कुर्ती को थोड़ा सा खींचकर अपनी जांघों पर कर लिया। भेनचोद ये लड़कियाँ भी आदमी की नज़रों को कितनी जल्दी पकड़ लेती हैं? काश मेरे मन की बात भी समझ जाए!

मुझे अब कॉफी की याद आई। मैंने एक चुस्की ली। कॉफी ठीक ठाक ही बनी थी पर मुझे तो गौरी को इंप्रेस (प्रभावित) करना था। कॉफी की तारीफ करना तो बहुत लाज़मी बन गया था अब। और यह सब तो मेरे प्लान का ही हिस्सा था।
“वाह …” मेरे मुँह से निकाला।
गौरी ने चौंककर मेरी ओर देखा।
“वाह … गौरी तुमने तो बहुत बढ़िया कॉफी बनाई है?”
“अच्छी बनी है?” उसने आश्चर्य मिश्रित खुशी के साथ पूछा।
“अरे अच्छी नहीं … लाजवाब कहो बहुत ही मस्त बनी है.”
गौरी मंद मंद मुस्कुराने लगी थी।

“गौरी तुम्हारे हाथों में तो जादू है यार … बहुत ही मस्त कॉफी बनाती हो.” इस बार मैंने ‘मस्त’ शब्द पर ज्यादा ही जोर दिया था।

अब बेचारी गौरी क्या बोलती अपनी तारीफ सुनकर उसके पास सिवाय मुस्कुराने के क्या बचा था। मेरी कोशिश थी मैं उसके दिमाग में यह बैठा दूँ कि वह बहुत ही खास (स्पेशल) है और साथ ही उसे यह अहसास भी करवा दूँ कि वह बहुत ही खूबसूरत भी है।
उसे रंगीन सपने दिखाना बहुत ही जरूरी था। मैं चाहता था कि उसकी कल्पनाओं को पंख लग जाएँ और वह ख्वाबों की हसीन दुनिया में उड़ना सीख ले तो मेरा काम अपने आप बन जाएगा।

“मेरा तो मन करता है गौरी तुम्हारे इन हाथों को ही चूम लूं?” मैंने हँसते हुए कहा।
“अले ना बाबा … ना?” गौरी ने थोड़ा सा डरने और पीछे हटने का नाटक सा किया।
“मैं सच कह रहा हूँ?”
“ना आपता तोई भलोशा नहीं है? त्या पता छूते-छूते मेली अंगुलियाँ ही खा जाओ?” कहकर उसने तिरछी नज़रों से मुझे देखा और हँसने लगी।
“अरे मैं तो मज़ाक कर रहा हूँ” मैंने हँसते हुए कहा।

“अरे तुम भी पीओ ना?”
“हओ” गौरी ने कुछ झिझकते हुए कॉफी का गिलास हाथ में पकड़ लिया।
“आप दीदी तो नहीं बताओगे ना?”
“क्या?”
“तोफी पीने ते बारे में?”
“प्रॉमिस … पक्का … देखो तुमने भी तो हमारी वो बात मधुर को नहीं बताई तो भला मैं कैसे बता सकता हूँ?”
“ठीत है.” अब उसने एक चुस्की सी लगाई, उसने थोड़ा सा मुँह बनाया शायद कॉफी कुछ कड़वी लगी होगी।

“क्यों है ना मस्त?”
“थोड़ी तड़वी सी है?”
“अरे तुम पहली बार पी रही हो ना इसलिए ऐसा लग रहा है। जब इसकी आदत पड़ जाएगी तो बहुत मज़ा आएगा.”
“अच्छा?”

मैंने मन में कहा- हाँ मेरी जान पहली बार बहुत सी चीजें कड़वी और कष्टदायक लगती है बाद में मज़ा देती हैं। आगे आगे देखती जाओ तुम्हें तो मेरे साथ और भी बहुत सी चीजें पहली बार ही करनी हैं।

बाहर रिमझिम बारिश हो रही थी और मेरे तन-मन में शीतल फुहार सी बहने लगी थी। बेकाबू होती अल्हड़ और अंग अंग से फूटती जवानी का बोझ उठाना शायद अब गौरी के लिए बहुत मुश्किल होगा। मेरे आगोश में आने के लिए अब इसकी बेताब जवानी मचलने ही वाली है। बस थोड़ा सा इंतज़ार …

बातें तो और बहुत हो सकती थी पर मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही थी। हम दोनों ने कॉफी खत्म कर ली थी।
“थैंक यू गौरी इतनी मजेदार कॉफी के लिए!”

गौरी कॉफी के कप उठाकर रसोई में चली गयी और मैं बाथरूम में। गौरी फ़तेह अभियान का पहला सबक सफलता पूर्वक पूरा हो चुका था अब मंजिल-ए-मक़सूद ज्यादा मुश्किल और दूर तो नहीं लगती है।
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02-12-2022, 02:09 PM,
#19
RE: Sex Vasna चोरी का माल
भाग-5
ये साली नौकरी भी जिन्दगी के लिए फजीता ही है। यह अजित नारायण (मेरा बॉस) भोंसले नहीं भोसड़ीवाला लगता है। साला एक नंबर का हरामी है। पिछले 4 सालों से कोई पदोन्नति (प्रमोशन) ही नहीं कर रहा है। आज मैं इससे हिसाब चुकता कर ही लेता हूँ। मैं इंतज़ार कर रहा था कि कब वह आए और मैं उसे बात करूँ।

आज भोंसले ऑफिस में थोड़ी देरी से आया था। मैं उसके कॅबिन में जाने की सोच ही रहा था कि चपरासी ने आकर बताया कि बॉस बुला रहे हैं।
“गुड मॉर्निंग सर!” मैंने कॅबिन में घुसते हुए कहा।
“आओ प्रेम बैठो, तुमसे कुछ बात करनी है.”

बात तो मुझे भी करनी थी पर चलो पहले इसकी सुन लेते हैं मैंने कहा- जी बोलें?
“प्रेम एक खुशखबर है?”
“क … क्या?”
“प्रेम मेरा ट्रांसफर पुणे हो रहा है। दरअसल मैंने ही इसके लिए HRD से रिक्वेस्ट की थी।”
“हूं …”

भोंसले आज बड़ा खुश नज़र आ रहा था वरना तो हर समय उसके चेहरा राऊडी राठोड़ ही बना रहता है।
“वो दरअसल पारू को पुणे में मेडिकल में सीट मिल गयी है.” वह अपनी लड़की (पारुल) के बारे में बात कर रहा था। पारो नाम की यह फुलझड़ी पता नहीं कैसी होगी पर उसका नाम सुनकर तो मुझे लगा मैं इसके लिए देवदास बन जाऊँ तो मज़ा आ जाए।

मुझे विचारों में खोया देखकर भोंसले बोला- क्या सोचने लगे प्रेम?मेरी बीवी ने घर में एक नयी कामवाली रखी.
“क … कुछ नहीं सर … आपको बहुत-बहुत बधाई हो सर!”
“थैंक यू प्रेम!”
“सर, यहाँ अब कौन आएगा?”
“यह तो पता नहीं … पर प्रेम मैंने तुम्हारे नाम की सिफारिश कर दी है। प्रमोशन के साथ इनक्रिमेंट भी मिलेगा। मुझे लगता है 2-3 दिन में कन्फर्मेशन का मेल आ जाएगा.”
“थैंक यू सर!”

“प्रेम! लेकिन तुम्हें 3 महीने की ट्रेनिंग पर पहले बंगलूरू हो जाना होगा.”
“ओह?”
“क्या हुआ? कोई दिक्कत?”
“नो सर! ऐसी कोई बात नहीं है पर ट्रेनिंग पर जाना कब होगा?”
“देखो अगर अभी प्लान कर सकते हो तो हफ्ते दस दिन में प्लान कर लो, वरना दीपावली के बाद जा सकते हो। मैं सोचता हूँ अभी आगे त्योहारों का सीज़न आ रहा है तुम्हें अपने टार्गेट्स बहुत अच्छे से पूरे कर लेने चाहिएं। मेरे ख्याल से दीपावली के आसपास ठीक रहेगा?”
“ठीक है सर!”
“प्रेम अभी स्टाफ से इस बारे में कोई बात मत करना। कल सन्डे है तुम घर पर आ जाना वहीं डिटेल डिस्कस करेंगे.”
“ओके सर.”
“ओके गुडलक!”

मैं कॅबिन से बाहर आ गया। भेनचोद यह किस्मत भी जैसे लौड़े हाथ में ही लिए फिरती है। एक हाथ से कुछ देती है दूसरे हाथ से छीन लेती है। एक तरफ प्रमोशन की खुशी है दूसरी तरफ तीन महीने के लिए बाहर जाना होगा। गौरी को किसी तरह अपने जाल में फंसाने के लिए पूरा प्लान बनाया था। चिड़िया दाना चुगने के लिए छटपटाने लगी है और अब अगर ऐसे में बंगलूरू जाना पड़ा तो सब किया धरा गुड़ गोबर हो जाएगा। लग गये लौड़े!!!

शाम को घर जाते समय मैं यह सोच रहा था कि मधुर को इस बारे में कैसे बताऊँ?
जब घर पहुँचा तो गौरी ने दरवाजा खोला। मधुर कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

मैं सोफे पर बैठ गया; गौरी पानी लेकर आ गयी।
आज गौरी ने हल्के सलेटी रंग का पाजामा और टॉप पहन रखा था। लगता है उसने आज फिर से अंदर ब्रा नहीं पहनी है। मेरी नज़र उसके गोल-गोल रस भरे सिंदूरी आमों के निप्पल पर पड़ी जो मटर के दाने जितने तो जरूर होंगे।

“वो मधुर नहीं दिख रही?”
“मैडम पड़ोस में गुप्ताजी ते यहाँ गयी हैं.”
“कुछ बताकर गयी?”
“हओ … गुप्ताजी ती बेटी ती सगाई हुई है तो उनते यहाँ लेडीज संगीत में गई हैं.”
“ओह … कब तक लौटेंगी?”
“एत घंटे ता बोला है.”
“हम्म” मैं सोच रहा था मधुर तो गीत और डांस का आज कोई मौका नहीं छोड़ने वाली।

“आपते लिए चाय बनाऊँ?”
“ना … थोड़ी देर रूककर पीते हैं.”
‘हओ’ कहकर गौरी रसोई में जाने लगी।

उसका टॉप उसके नितंबों से थोड़ा सा ऊपर था। पाजामा थोड़ा तंग था इसलिए उन कसी हुई दोनों गोलाइयों के बीच की दरार में धंसा हुआ सा था। इसे देखकर तो मेरा लंड फड़फड़ाने ही लगा।
आइलाआआआ …
उसने शायद अंदर पैंटी भी नहीं पहनी थी। इसे किसी तरह बहाने से बातों में लगाकर पास बैठा लूँ तो सु-सु की पूरी रूपरेखा बड़े आराम से देखी जा सकती है।

मैंने उसे टोका- वो तुम्हारी पढ़ाई लिखाई कैसी चल रही है?
“ठीत है.”
“हूँ! आज क्या पढ़ाया मैडम ने?” पढ़ाई करते समय गौरी मधुर को मैडम ही बोलती है तो मैंने भी मधुर के लिए मैडम ही बोला था।
“आज तो मैडम ने मैथ्स पढ़ाया.”

“समझ आया या नहीं?” मैंने हँसते हुए पूछा।
“किच्च …”
“क्यों?”
“बड़ा मुश्तिल लगता है?”
“अरे दिल लगाकर करो तो कोई काम मुश्किल नहीं लगता?”
“मुझे टेबल याद नहीं लहते तो दीदी बड़ा गुस्सा होती हैं.”

“तो एक काम किया कर?”
“त्या?”
“तुम रोज़ कॉफी पिया करो” मैंने कुछ संजीदा (गंभीर) लहजे में कहा।
“उससे त्या होगा?”
“इससे तुम्हारी याददास्त बहुत तेज हो जाएगी.”
“अच्छा?” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा कहीं मैं उसे ऊल्लू तो नहीं बना रहा।
“हाँ भई सच में। अच्छा वो सुबह कॉफी पीने के बाद तुम्हारी सु-सु में कोई जलन तो नहीं हुई ना?” मैंने हँसते हुए पूछा।
“हट … तैसी बात तलते हो?” गौरी तो अब गुलज़ार ही हो गयी।
इस्स्स … उसके शर्माने की अदा तो मेरे कलेजे का जैसे चीरहरण ही कर लिया।

मुझे लगा गौरी शर्माकर रसोई में भाग जाएगी। वह वहीं खड़ी रही। उसे मेरी इन बातों का उसे कतई बुरा नहीं लग रहा था और मैं भी तो उसे बातों में लगाए रखना चाहता था। मैंने बात का विषय बदलने के लिहाज़ से पूछा- गौरी तुमने तो बताया ही नहीं?
“हट!”
“क्या हट?”
“मुझे ऐसी बातों से शलम आती है?”
“अरे बाबा मैं तुम्हारी सु-सु की नहीं … कोई और बात पूछ रहा हूँ?”
“त्या?” उसने आश्चर्य से मेरी और देखा।
“वो मधुर के साथ तुम उस दिन बाज़ार गयी थी तो क्या-क्या खरीदा?”
“ओह … अच्छा वो …?”
“हाँ?
“तपड़े और तिताबें खरीदे” (कपड़े और किताबें खरीदे)
“क्या-क्या लिया पूरी बात बताओ ना?”
“दो सूट, एक जीन पैंट-टॉप, जूते, चप्पल औल दो जुलाब जोड़ी, त्लीम, बैंगल्स, एत लंगीन चश्मा औल एत पायल ती जोड़ी।

कमाल है? मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी साली कंजूस मधुमक्खी एक पुराना फटा कपड़ा किसी को नहीं देती गौरी के ऊपर इस तरह मेहरबान कैसे हो गयी है?

“अरे वाह! तुम्हारे तो मज़े हो गये? लगता है मधु तुम्हारे ऊपर बहुत ही मेहरबान हो गयी है?”
“हाँ, दीदी मुझे बहुत प्याल तलती हैं.” गौरी हँसने लगी थी।
“हाँ, यह तो मुझे भी मालूम है.”

“पता है दीदी त्या बोलती है?” उसने अपनी आँखें चौड़ी करते हुए कहा।
“क्या?” मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
“वो बोलती हैं : मेरा बस चले तो जिंदगी भर तुम्हें यहीं रख लूँ.”

मैं तो इस फ़िकरे का मतलब कई देर तक ही नहीं अलबत्ता कई दिनों तक बाद में भी सोचता रहा।

“गौरी देखो मधुर ने तुम्हें इतने चीजें और कपड़े दिलवाए और तुमने तो हमें पहनकर भी नहीं दिखाए?” मैंने उलाहना देते हुए कहा।
“वो सब मैं दीदी ते जनम दिन पल पहनूँगी.”
“ओह … पर उसमें तो एक महीना बाकी है.”
“हओ”

“गौरी वैसे जीन पैंट और टॉप में तुम बहुत खूबसूरत लगोगी.” गौरी के चहरे पर लंबी मुस्कान फ़ैल गयी।
“तुम ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ देखती हो ना?”
“हओ … वो तो मैं तभी मिस नहीं कलती हूँ? आपने त्यों पूछा?”
“उसमें भिड़े की जो लड़की है ना? पता नहीं क्या नाम है?”
“उसता नाम सोनू है.” गौरी जल्दी से बोल पड़ी।

“पता है उसे देखकर मेरा मन क्या करता है?”
“त्या?”
“इसको खूँटी से लटकाकर इसकी टांगें पकड़कर खींच कर लम्बा थोड़ा लम्बा कर दूं?”
“हा.. हा … हा … वो बेचाली तो मल ही जायेगी?”
“अरे नहीं यह थोड़ी लम्बी होकर बिल्कुल तुम्हारी तरह बहुत ही खूबसूरत लगेगी.”

सोनू के साथ अपनी तुलना सुनकर गौरी को शायद अच्छा लगा रहा था इसीलिए वो मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

“एक बात और भी है?”
गौरी अपनी सुन्दरता के ख्यालों मे डूबी हुयी थी। वह कुछ बोली तो नहीं पर उसने रसीली मुस्कान के साथ मेरी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा।
“गौरी सच कहता हूँ तुम अगर जीन पैंट पहन लो तो बिल्कुल वैसी ही खूबसूरत लगोगी.”

ईसस्स्स … अब तो गौरी जैसे रूपगर्विता ही बन गयी थी वह मंद-मंद मुस्कुराए जा रही थी। उसके चहरे पर जैसे लाली सी बिखर गयी थी। उसकी तेज होती साँसों के साथ उसके ऊपर नीचे होते उरोजों को देख कर उसके दिल की धड़कन का अंदाज़ा बखूबी लगाया जा सकता था।

उसने कुछ सोचते हुए कहा- आपतो एत बात बताऊं?
“क्या?”
“आप दीदी से तो नहीं तहोगे ना?”
“किच्च …” मैंने भी गौरी के अंदाज़ में ना करने के अंदाज़ में अपनी जीभ से ‘किच्च’ की आवाज़ निकालते हुए कहा “देखो! तुम भी हमारी सारी बातें मधुर को थोड़े ही बताती तो फिर मैं भला कैसे बता सकता हूँ? बोलो?”
“फिल ठीत है.”

वो थोड़ा सा रुकी और फिर कुछ सोचते हुए बोली- दीदी ने तल मुझे साड़ी पहनना सिखाया था.
गौरी अब थोड़ा लजा सी रही थी।
“ओए होये … क्या बात है? जरूर लाल रंग की होगी?”
“आपतो तैसे पता? दीदी ने बताया?”
“अरे नहीं! मैंने तो अंदाज़ा ही लगाया है?”
“हूँ”
“गौरी तुम तो उसमें बहुत ही खूबसूरत लगी होगी?”

“हओ … पता है दीदी ने त्या बोला?”
“क्या?”
वो बोली- ‘तुम तो इस साड़ी में पूरी दुल्हन सी लग रही हो.’ फिर उन्होने मेले गालों पल ताजल ता टीता लगाते हुए तहा ‘गौरी तुम बहुत ही मासूम और सुंदर हो तिसी ती नज़र ना लग जाए!’

“हाँ गौरी, यह बात तो सोलह आने सच है। तुम सुंदर ही नहीं बहुत हसीन और खूबसूरत भी हो.” बेचारी गौरी के पास अब रूपगर्विता मुस्कान के सिवा और क्या बचा था।

मैंने बातों का सिलसिला जारी रखते हुए कहा- गौरी, तुमने कोई सैल्फी ली या नहीं?
“मेले पास मोबाइल थोड़े ही है तैसे लेती? हाँ दीदी ने अपने साथ मेली 4-5 सैल्फी जलूल ली थी.”
“हूँ” ये साली मधुर भी कई बातें बताती ही नहीं है।

अचानक मेरे दिमाग में एक जबरदस्त आइडिया ऐसे आया जैसे किसी हसीन कन्या को देखकर लंड उछलकर कच्छे में खड़ा हो कर सलाम बोलने लग जाता है। क्यों ना गौरी को कोई पुराना मोबाइल दे दिया जाए। फिर तो मैं उसे अपनी सैल्फी लेना और वाट्स-एप्प चलाना भी सिखा दूंगा। फिर तो मज़े से वह और भी बहुत कुछ देख और दिखा सकती है। मैंने और मधुर ने पिछले साल 4जी सेट ले लिया था तो पुराने मोबाइल तो बेकार ही पड़े हैं। चलो आज रात को किसी बहाने से मधुर को बोलता हूँ गौरी को कोई पुराना मोबाइल दे दे।

“गौरी एक बात तो है?”
“त्या?”
“तुम्हारी शादी जिसके साथ होगी वो कितना भाग्यशाली होगा. लगता है उसने इस जन्म में या पिछले जन्म में जरूर लाख मोती दान किए होंगे.” कहकर मैं हँसने लगा।
अब गौरी भी जोर-जोर से हँसने लगी थी। मैं यही तो चाहता था कि उसे अपनी खूबसूरती पर नाज़ हो जाए।
गौरी असमंजस भरी निगाहों से मुझे ताकती रही। उसे कोई जवाब जैसे सूझ ही नहीं रहा था।

“पता नहीं वह भाग्यशाली कौन होगा? काश हमारी भी किस्मत ऐसी होती?”
“तैसी?”
“तुम्हारे जैसी?”
गौरी कुछ नहीं बोली। वो कुछ सोचने लगी थी। पता नहीं गौरी को कुछ समझ आया या नहीं पर इतना तो तय है उसे मेरी इन बातों से कतई बुरा नहीं लग रहा था अलबत्ता वो मेरे साथ और बातें करने के लिए बेजार (उत्सुक) नज़र आ रही थी।

“पल दीदी तो खुद इतनी सुन्दल हैं। आप भी तो बड़ी तिस्मत वाले हो? फिल आप ऐसा त्यों बोलते हो?” गौरी ने अचानक कई सवाल कर दिए थे। साली दिखने में लॉल लगती है पर इन मामलों में पूरी एलीबाई है। कोई बात नहीं देखते हैं।
“हाँ … मधुर भी तुम्हारी तरह सुंदर तो है।”
“दीदी ने आपते बाले में भी एत बात बताई थी.” उसने रहस्यमय ढंग से मुस्कुराते हुए कहा।

जिस अंदाज़ में वो मंद-मंद मुस्कुरा रही थी मुझे लगा कहीं मधुर ने कुछ गड़बड़ तो नहीं कर दी? मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था।
हे भगवान! कहीं फिर से लौड़े तो नहीं लग गये?
“क … क्या बताया?” मैंने हकलाते से पूछा।
मेरी इस हालत पर अब गौरी मज़े ले रही थी।

इतने में गेट पर मधुर के आने की आहट सुनाई दी। गौरी दौड़कर रसोई में भाग गयी और मैं जल्दी से कपड़े बदलने बाथरूम में। भेनचोद ये मधुमक्खी (मधुर) भी खलनायक की तरह हमेशा गलत मौके पर ही एंट्री मारती है।

मधुर आज खुश नज़र आ रही थी। मुझे लगता है आज मधुर ने खूब ठुमके लगाए होंगे। खुले बाल और लाल रंग की नाभिदर्शना साड़ी … उफफ्फ … पता नहीं गौरी को यही साड़ी पहनाई थी या कोई दूसरी पर कुछ भी कहो मधुर इस समय बाजीराव की मस्तानी ही लग रही थी। मधुर रसोई में घुस गयी। वो शायद गौरी को रात के खाने के बारे में समझा रही थी।

मैं हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलकर बाहर आकर टीवी देखने लगा। आज शनिवार था तो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ तो आने वाला था नहीं मैं कॉमेडी शो देखने लग गया।
कहानी जारी रहेगी
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02-12-2022, 02:10 PM,
#20
RE: Sex Vasna चोरी का माल
भाग -6
मधुर आज खुश नज़र आ रही थी। मुझे लगता है आज मधुर ने खूब ठुमके लगाए होंगे। खुले बाल और लाल रंग की नाभिदर्शना साड़ी … उफफ्फ … पता नहीं गौरी को यही साड़ी पहनाई थी या कोई दूसरी! पर कुछ भी कहो मधुर इस समय बाजीराव की मस्तानी ही लग रही थी।

मधुर रसोई में घुस गयी। वो शायद गौरी को रात के खाने के बारे में समझा रही थी।
मैं हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलकर बाहर आकर टीवी देखने लगा। आज शनिवार था तो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ तो आने वाला था नहीं … मैं कॉमेडी शो देखने लग गया।

खाना निपटाने के बाद हम अपने कमरे में आ गये। मधुर शीशे के सामने खड़ी होकर अपने आप को निहार रही थी।
“मधुर आज तो गुप्ताजी के यहाँ पार्टी में तुमने खूब रंग जमाया होगा?”
“ना बस थोड़ा सा ही डांस किया.”
“वैसे तुम इस साड़ी में बहुत ही खूबसूरत लगती हो.”
मधुर ने कोई जवाब नहीं दिया वो बाथरूम में घुस गयी।

मैंने अपने पाजामे का नाड़ा खोल दिया था और अपने अंगड़ाई लेते पप्पू को हाथ से सहलाने लगा। कोई 15 मिनट के बाद वो बाथरूम से बाहर आई और फिर बिस्तर पर मेरी ओर करवट लेकर लेट गयी। उसने ढीला सा गाउन पहन रखा था। उसने बालों की चोटी नहीं बनाई थी बाल खुले थे।

अब उसने एक हाथ से मेरे पप्पू को पकड़ लिया और सहलाने लगी। उसने मेरे होठों पर एक चुम्बन लिया और फिर मेरी आँखों में झांकते हुए बोली- प्रेम!
“हूं …” मैं भी उसे अब अपनी बांहों में भर लेना चाहा।
“वो आज गुलाबो फिर आई थी?”
“पर तुमने उसे उस दिन 8-10 हज़ार रुपये दे तो दिए थे? अब और क्या चाहिए उसे?”
“ओहो … तुम्हें तो आजकल कुछ याद ही नहीं रहता? वो मैंने तुम्हें बताया था ना?”
“भई अब मुझे क्या पता तुमने कब और किस बारे में बताया था?” मेरा मूड कुछ उखड़ सा गया था। ये मधुर भी कब की बात कब करती है पता ही नहीं चलता।

“वो दरअसल उन लोगों ने नगर परिषद में ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अंतर्गत गरीब परिवार वालों को घर में शौचालय (टॉयलेट) बनाने के लिए मिलने वाले अनुदान के लिए अप्लिकेशन लगा रखी है। तुम्हारा वो एक फ्रेंड अकाउंटेंट है ना नगर परिषद में?”
“हाँ तो?”
“वो निर्मल निर्मल करके कोई है ना?”
“हाँ निर्मल कुशवाहा? क्या हुआ उसे?”
“अरे उसे कुछ नहीं हुआ गुलाबो की फाइल उसी के पास पेंडिंग पड़ी है। तुम कहकर बेचारी का यह काम करवा दो ना प्लीज?”

मधुर मेरे ऊपर थोड़ा सा झुक सी गयी थी और उसने मेरे सिर को हाथों में पकड़कर अपने होंठ मेरे होंठों से लगा दिए। उसकी गर्म साँसें मेरे चेहरे से टकराने लगी थी। अब उसने अपनी एक मांसल जांघ मेरे दोनों पैरों के बीच फंसा ली थी। मधुर को जब कोई काम करवाना होता है तो वो इसी प्रकार मेरे ऊपर आ जाती है और फिर हम विपरीत आसन में (जिसमें पुरुष नीचे और स्त्री ऊपर रहती है) खूब चुदाई का मज़ा लेते हैं।

“तो क्या गुलाबो के यहाँ टॉयलेट नहीं है?” मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी।
“यही तो बात है? तुम जरा सोचो बेचारों को कितनी बड़ी परेशानी होगी? जवान बहू बेटियों को भी बाहर खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है.”

आईलाआआ … ! क्या गौरी भी खुले में सु-सु करने जाती है?
ओह … उस बेचारी को तो बड़ी शर्म आती होगी?
ईसस्स्स्स … !
वो शर्म के मारे सु-सु करने से पहले इधर उधर जरूर देखती होगी … फिर अपनी आँखें झुकाए हुए धीरे धीरे अपनी पैंटी नीचे करती होगी और उकड़ू बैठ कर अपनी खूबसूरत मखमली बुर से
सु-सु की पतली सी धार निकालती होगी.

याल्ला … इसे देखकर तो लोगों के लंड खड़े हो जाते होंगे … और फिर वो सभी मुट्ठ मारने लग जाते होंगे!
ये तो सरासर गलत बात है जी … बेहूदगी है ये तो … इससे तो हर जगह गंदगी फ़ैल जाएगी और सरकार के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की तो … ?

“क्या हुआ?” मधुर की आवाज़ से मैं चौंका।
“ओह … हाँ बहुत खूबसूरत?”
“क्या बहुत खूबसूरत?” मधुर ने फिर टोका।
मैं तो गौरी की सु-सु की मधुर आवाज़ की कल्पना में ही में डूबा था मैं बेख्याली में पता नहीं क्या बोल गया।

मैंने बात सँवारी- हाँ … मेरा मतलब था बहुत सुन्दर विचार है मैं उससे बात करूँगा … तुम निश्चिन्त रहो समझो उसका काम हो गया.
“थैंक यू प्रेम!” कहकर मधुर ने मेरे ऊपर आकर अपनी चूत में मेरे लंड को घोंट लिया। और फिर आधे घंटे तक उसने अपनी चूत और नितम्बों से खूब ठुमके लगाए। मुझे आश्चर्य हो रहा था आज मधुर ने डॉगी स्टाइल में करने को क्यों नहीं कहा। आज तो वह खालिश घुड़सवारी के मूड में थी।

काश कभी ऐसा हो कि गौरी भी इसी तरह मेरे ऊपर आकर घुड़सवारी करने को कहे तो मैं झट से मान जाऊँ। फिर तो उसके नितम्बों पर थपकी लगाता रहूँ और उसकी मस्त गांड के छेद में भी अपनी अंगुली डालकर उसे और भी प्रेमातुर कर दूँ।

इन्हीं ख्यालों में खोया मैं मधुर की पीठ, कमर और बालों में हाथ फिराता रहा। पता नहीं कब हमारा स्खलन हुआ और कब नींद आ गई।

सुबह कोई 8 बजे मधुर ने मुझे जगाया। मधुर नहा कर तैयार हो चुकी थी। मुझे लगा कि वह कहीं जाने वाली है। पर आज तो सन्डे था? फिर मधुर आज इतनी जल्दी कैसे तैयार हो गयी?
“प्रेम! आज मुझे आश्रम जाना है। तुम भी चलोगे क्या?”

ओह … तो मधुर मैडम आज आश्रम जाने वाली हैं। मेरे लिए गौरी के साथ समय बिताने का बहुत अच्छा मौक़ा था।
मैंने बहाना बनाया- ओह … सॉरी जान! मुझे आज बॉस के घर जाना है, मैं नहीं चल पाऊंगा।
“तुम्हें तो बस कोई ना कोई बहाना ही चाहिए?”
“अरे नहीं यार वो आज भोंसले से प्रमोशन के बारे में बात करनी है उसने ही बुलाया है।”
“ठीक है.” कहकर मधुर रसोई की ओर चली गई और मैं बाथरूम में।

गौरी चाय बना कर ले आई थी। मधुर और मैं चाय पीने लगे। मैं सोच रहा था ये मधुर भी इन बाबाओं के चक्कर में पड़ी रहती है। चलो धार्मिक होना अपनी जगह अच्छी बात पर है आजकल इन बाबाओं के दिन अच्छे नहीं चल रहे। किसी दिन किसी बाबा राम या रहीम ने ठोक-ठाक कर इस पर सारी कृपा बरसा दी तो यह फिर मधु की जगह हनी (हनीप्रीत) बन जायेगी।

इतने में बाहर गाड़ी के हॉर्न की आवाज आई।
“अच्छा प्रेम मैं जाती हूँ वो मोहल्ले की सारी लेडीज भी आज आश्रम जा रही हैं। आज गुरूजी का जन्मोत्सव है। हम लोग दोपहर तक लौट आयेंगे।”
“अरे कुछ खा-पीकर तो जाओ?”
“नहीं … वहाँ आरती और भजन के बाद नाश्ता-भोजन आदि की सारी व्यवस्था की हुई है। तुम्हारे नाश्ते और लंच के लिए मैंने गौरी को बता दिया है।”
इतने में फिर हॉर्न की आवाज आई। ओहो … क्या मुसीबत है … ‘आईईईई … ‘ बोलते हुए मधुर बाहर लपकी।

मधुर के जाते ही गौरी रसोई से बाहर आ गई।
आज गौरी ने गोल गले की टी-शर्ट के नीचे लेगीज पहन रखी थी। काले रंग की लेगीज में कसे हुए नितम्ब देख कर तो मेरा लंड उछलने ही लगा था। किसी तरह उसे पाजामें में सेट किया। साली ये गौरी भी आजकल इतनी अदा से अपने नितम्बों को जानबूझकर लचकाते हुए चलती है कि इंसान क्या फरिश्ते का भी मन डोल जाए।

“आपते लिए नाश्ते में त्या बनाऊँ?”
“मधुर ने बताया होगा?”
“दीदी ने तो सैंडविच बनाने को बोला है पल आपतो तुछ औल पसंद हो तो वो बना देती हूँ?” रहस्यमई ढंग से मुस्कुराते हुए गौरी ने पूछा।
मैंने मन में सोचा मेरी जान मेरा मन तो बहुत कुछ खाने पीने और पिलाने का करता है। बस एक बार हाँ कर दो फिर देखो क्या-क्या खाता और खिलाता हूँ।
पर मैंने कहा “नहीं आज सैंडविच ही बना लो। तुम्हें भी तो पसंद हैं ना?”
“हओ.”
“तुम्हें सैंडविच बनाना तो आता है ना?”
“हओ … दीदी ने सिखाया है”
“ठीक है पर जरा कड़क बनाना। कड़क और टाईट चीजों में ज्यादा मज़ा आता है.”
“वो ब्लेड लानी पलेगी.” गौरी मुस्कुराकर मेरी देखते हुए बोली।
“तुम बाहर मिठाई लाल की दुकान से जाकर ब्रेड ले आओ फिर हम दोनों मिलकर सैंडविच बनाकर खाते हैं।”

गौरी ब्रेड लाने पड़ोस में बनी दुकान पर चली गयी। जाते समय जिस अंदाज़ से वह अपनी कमर को लचका रही थी मुझे लगता है कल उसके सौंदर्य की जो प्रशंसा की थी यह उसी का असर है।

उसके जाने के बाद मैं बाथरूम में घुस गया। मैं अक्सर सन्डे या छुट्टी के दिन सेव नहीं बनता पर आज मैंने नहाने से पहले शेव भी की और अच्छा परफ्यूम भी लगा लगाया।

जब मैं बाथरूम से बाहर आया तो देखा गौरी अभी ब्रेड लेकर नहीं आई है। कमाल है ब्रेड लाने में कोई आधा घंटा थोड़े ही लगता है। ये भी कहीं गप्पे लगाने में लग गयी होगी? इतने में गौरी हाथ में ब्रेड और कुछ सब्जियाँ हाथ पकड़े आ गई।

“गौरी.. बहुत देर लगा दी? कहाँ रह गयी थी?
“वो … संजीवनी आंटी?”
“कौन संजीवनी?”
“वो … सामने वाली बंगालन आंटी!”
“ओह … क्या हुआ उसे?”
“हुआ तुछ नहीं.”
“तो?”
“उसने मुझे लोक लिया था.”
“क्यों?” मेरी झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी।
“वो … वो मुझे घल पल ताम तलने ता पूछ लही थी.”
“फिर?”
“मैंने मना तल दिया.”
“क्यों?”
“अले आपतो पता नहीं वो एत नंबल ती लुच्ची है.”
“लुच्ची? क्या मतलब … कैसे? ऐसा क्या हुआ?” मैंने हकलाते हुए से पूछा।

“आपतो पता है वो … वो … ” गौरी बोलते बोलते रूक गयी। उसका पूरा चेहरा लाल हो गया और उसने अपनी मोटी-मोटी आँखें ऐसे फैलाई जैसे वो राफेल जैसा कोई बड़ा घोटाला उजागर करने जा रही है। अब आप मेरी उत्सुकता का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
“वो … वो क्या … ?? साफ बताओ ना?” मेरे दिल की धड़कन और उत्सुकता दोनों ही प्राइस इंडेक्स की तरह बढ़ती जा रही थी।
“वो … वो … तुत्ते से तलवाती है.”
“तुत्ते … ?? क्या मतलब?? तुत्ते क्या होता है?” मुझे लगा शायद वो डिल्डो (लिंग के आकार का एक सेक्स टॉय) की बात कर रही होगी। फिर भी मैं अनजान बनते हुए हैरानी से उसकी ओर देखता रहा।
“ओहो … आप भी … ना … … वो तुत्ता नहीं होता???” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा जैसे मैं कोई विलुप्त होने के कगार पर पहुंची प्रजाति का कोई जीव हूँ और फिर उसने दोनों हाथों से इशारा करते हुए कहा- वो … भों … भों …

और फिर हम दोनों की हंसी एक साथ छूट पड़ी।
हाय मेरी तोते जान!!!
मेरी जान तो उसकी इस अदा पर निसार ही हो गयी। उसकी बातें सुनकर मेरा लंड तो खूंटे की तरह खड़ा हो गया था।
मेरा मन तो उसे जोर से अपनी बांहों भरकर चूम लेने को करने लगा। पर इससे पहले कि मैं ऐसा कर पाता गौरी मुँह में दुपट्टा दबाकर रसोई में भाग गई। उसे शायद अब अहसास हुआ कि वो अनजाने में क्या बोल गई है।

मैं उसके पीछे रसोई में चला आया। शर्म के मारे उसने अपना सर झुका रखा था। उसके चहरे का रंग लाल सा हो गया था और साँसें तेज चलने लगी थी।
“अरे क्या हुआ?”
“किच्च …” उसने ना करने के अंदाज़ में अपनी मुंडी हिलाते हुए अपने मुंह से आवाज निकाली।
“तो फिर रसोई में क्यों भाग आई?”
“वो … वो … आप बाहल बैठो, मैं नाश्ता बना तल लाती हूँ”

“गौरी यह तो गलत बात है?”
“त्या?”
“एक तो तुम बात-बात में शर्माती बहुत हो?”
गौरी ने अपनी निगाहें अब भी झुका रखी थी।
“आओ हॉल में बैठ कर सैंडविच के लिए तैयारी मिलकर करते हैं तुम सारा सामान लेकर हॉल में आ जाओ.”
“हओ”

थोड़ी देर बाद गौरी ट्रे में ब्रेड, प्याज, हरि मिर्च, धनिया, उबले आलू आदि लेकर हॉल में आ गई। उसने सामान टेबल पर रख दिया और स्टूल पर बैठ गई। मुझे लगा गौरी कुछ गंभीर सी लग रही है। मैं चाहता था वो सामान्य हो जाए। इसके लिए उसके साथ कुछ सामान्य बातें करना जरुरी था।

मैंने बातों का सिलसिला शुरू किया- गौरी एक काम कर?
“हओ?”
“मैं प्याज, टमाटर, हरी मिर्च और धनिया काट देता हूँ और तुम जल्दी से आलू छील लो.”
“हओ.”
हम दोनों अपने काम में लग गए।

साला ये प्याज काटना भी सब के बस के बात नहीं। जैसे सभी औरतें छिपकली से डरती हैं उसी तरह ज्यादातर आदमी प्याज काटने से डरते हैं। मैंने पहले 3-4 हरी मिर्च काटी और फिर प्याज छीलकर काटने लगा। ऐसा करते समय गलती से मेरा हाथ आँख के पास लग गया।
लग गए लौड़े!
एक तो प्याज की तीखी गंध और ऊपर से हरी मिर्च? थोड़ी जलन सी होने लगी और आँखों में आंसू भी निकल आये। मेरी नाक से सुं-सुं की आवाज निकलने लगी।

“ओहो … क्या मुसीबत है?” मैंने रुमाल से अपनी नाक साफ़ करते हुए कहा.
अब गौरी का ध्यान मेरी ओर गया। उसे हँसते हुए मेरी ओर देखा।

“मैंने आपतो बोला था मैं तर लूंगी आप मानते ही नहीं?”
“ओहो … मुझे क्या पता था प्याज काटना इतना मुश्किल काम है? मैंने 2-3 बार फिर नाक से सुं-सुं किया। आँखों और नाक से पानी अब भी निकल रहा था।
“आप जल्दी से हाथ धोकल ठन्डे पानी ते छींटे मालो”
“ओह … हाँ … मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और फिर अंदाजे से वाश बेसिन की ओर जाने लगा।

इतने में मैं पास रखी स्टूल से टकराते-टकराते बचा। गौरी सब देख रही थी। वह उठी और मेरा बाजू पकड़ कर वाश बेसिन की ओर ले जाने लगी। मैंने अपनी आँखें बंद ही रखी। उसकी कोमल कलाइयों का स्पर्श मुझे रोमांचित किये जा रहा था। आज पहली बार उसमें मुझे छुआ था।
“आप जल्दी से साबुन से हाथ धोओ मैं, ठन्डे पानी ती बोतल लाती हूँ.” कहकर गौरी रसोई की ओर भागी।
मैं गूंगे लंड की तरह वहीं खड़ा रहा।

इतने में गौरी ठन्डे पानी की बोतल लेकर आ गई।
“अले आपने हाथ धोये नहीं?”
“मेरी तो आँखें ही नहीं खुल रही हाथ कैसे धोऊँ?”
“ओहो … आप लुको” कहकर उसने एक हाथ से मेरी मुंडी थोड़ी नीचे की और फिर बोतल से ठंडा पानी हाथ में लेकर मेरी आँखों और चहरे पर डालने लगी।

उसके कोमल हाथों का स्पर्श और उसके बदन से आती जवान जिस्म की खुशबू मेरे-अंग अंग में एक शीतलता का अहसास दिलाने लगी।
हालांकि अब जलन तो नहीं हो रही थी पर मैंने नाटक जारी रखते हुए कहा- ओहो … थोड़ा पानी और डालो आराम मिल रहा है.
“हओ.”

और फिर गौरी ने मेरी आँखों और चहरे पर पानी के थोड़े छींटे और डाले।
मेरा मन तो कर रहा था काश! गौरी मेरे चहरे पर इसी तरह अपनी नाजुक हथेली और अँगुलियों को फिराती रहे और मैं अभिभूत हुआ इसी तरह उसकी नाजुकी को महसूस करता रहूँ।
“लाओ आपते हाथ भी धो देती हूँ.”

मैंने आँखें बंद किये अपने हाथ उसके हाथों में दे दिए। गौरी ने साबुन पकड़ाई और वाश बेसिन की नल खोल दी। मैं तो चाह रहा था गौरी खुद ही मेरे हाथों को भी धो दे पर फिर मैंने साबुन से अपने हाथ धो लिए। फिर गौरी ने हैंगर पर टंगा तौलिया उतार कर मेरे चहरे को पौंछ दिया।

शादी के शुरू-शुरू के दिनों में मधुर कई बार इस प्रकार मेरे चहरे पर आये पसीने को रुमाल या अपने दुपट्टे से पौंछा करती थी। और फिर मैं उसे अपनी बांहों में भरकर जोर से चूम लिया करता था। इन्ही ख्यालों में मेरा लंड फिर से खड़ा होकर उछलने लगा था। शायद उसे भी गौरी के नाजुक हाथों का स्पर्श महसूस करने का मन हो रहा था।
“अब आँखें खोलो?”
मैंने एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह एक आँख खोली और फिर बंद कर ली।

गौरी मेरी इस हरकत को देख कर हंसने लगी।
“गौरी अगर तुम आज नहीं होती तो मेरी तो हालत ही खराब हो जाती! थैंक यू।”
“मैंने आपतो बोला था मैं तल लुंगी पर आप मानते ही नहीं? गौरी ने उलाहना सा दिया।

मैंने मन में सोचा ‘मेरी जान! मैं ऐसा नहीं करता तो तुम्हारे इन नाजुक हाथों का स्पर्श कैसे अनुभव कर पाता?’

“आप भी एत नंबल ते अनाड़ी हो? ऐसे मिल्ची (मिर्ची) वाले हाथ तोई चहरे पर थोड़े लगता है? अनाड़ी ता खेलना औल खेल ता सत्यानाश?” कह कर गौरी हंसने लगी।

साली ने किस प्रकार कहावत की ही बहनचोदी कर दी थी। मेरा मन तो कर रहा था उसे असली कहावत ही सुना दूं ‘अनाड़ी का चोदना और चूत का सत्यानाश’
पर अभी सही समय नहीं था। इसकी चूत का कल्याण या सत्यानाश होगा तो मेरे इस लंड से ही होगा।

“कोई बात नहीं, मैं अनाड़ी सही पर तुमने समय पर अपने हाथों के जादू से इस मुसीबत को दूर कर दिया।”
अब गौरी के पास मंद-मंद मुस्कुराने के सिवा और क्या विकल्प बचा था।

अब हम वापस आकर बैठ गए थे। गौरी ने बचा हुआ प्याज काटा और फिर धनिया लहसुन आदि काट कर प्लेट में रख लिया और उठकर रसोई की ओर जाने का उपक्रम करने लगी।
मैं गौरी का साथ नहीं छोड़ना चाहता था तो मैं भी उसके पीछे-पीछे रसोई में चला आया।
“मैं नाश्ता तैयार तलती हूँ आप नहा लो और चहले पल सलसों का तेल या त्लीम लगा लो”
“तुम ही लगा दो ना?”
“हट!”

“गौरी आज नाश्ता करने के बाद नहाऊंगा। मैं आज तुम्हारी सैंडविच बनाने की जादूगरी देखना चाहता हूँ कि तुम किस प्रकार सैंडविच बनाती हो?”
“इसमें त्या ख़ास है? आप देखते जाओ बस.”
और फिर गौरी ने उबले आलू और मसाले आदि को तेल में भूना और फिर ब्रेड के बीच में लगाकर टोस्टर ऑन कर दिया।
“साथ में चाय बनाऊं या तोफ़ी (कॉफ़ी)?”
“आज तो चाय ही पियेंगे। क्या पता कॉफ़ी पीकर फिर से जलन ना होने लग जाए?” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
“हट!” आजकल गौरी ने इन बातों से शर्माना थोड़ा कम तो कर दिया है।

10 मिनट में उसने 5-6 सैंडविच तैयार कर लिए और साथ में चाय भी बना ली।
“गौरी एक काम कर?”
“हओ”
“यह सब बाहर हॉल में ले चलो वहीं सोफे पर बैठकर इत्मीनान से दोनों नाश्ते का मजा लेंगे.”

हम दोनों नाश्ते की ट्रे, प्लेट और चाय का थर्मस लेकर बाहर आ गए।

गौरी स्टूल पर बैठने लगी तो मैंने कहा- यार अब यह तकलुफ्फ़ छोड़ो!
गौरी ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।
मैंने उसे कहा- तुम भी स्टूल के बजाय सोफे पर ही बैठ जाओ ना … आराम से खायेंगे.
गौरी असमंजस की स्थिति में थी।
“ओहो … बैठ जाओ ना सर्व करने और नाश्ता करने में आसानी रहेगी.”

गौरी ने कुछ बोला तो नहीं पर कुछ सोचते हुए मेरे पास वाले सिंगल सोफे पर बैठ गई। मैं तो चाहता था वो मेरे वाले सोफे पर ही साथ में बैठ जाए पर चलो आज साथ वाले सोफे पर बैठी है कल मेरे बगल में बैठेगी और फिर मेरी गोद में। लंड महाराज तो बैठने के बजाय और ज्यादा अकड़ गए।

गौरी ने मेरे लिए एक प्लेट में प्लेट में सैंडविच रख दिए और ऊपर सॉस डाल कर मुझे पकड़ा दिया।
“तुम भी तो लो?”
“मैं बाद में ले लूंगी.”
“तुम भी कमाल करती हो? साथ का मतलब साथ खाना होता है। लो पकड़ो प्लेट!” मैंने अपने वाली प्लेट उसे थमा दी। और फिर दूसरी प्लेट में अपने लिए एक सैंडविच लेकर ऊपर चटनी दाल ली।

“गौरी आज चाय गिलास में पियेंगे. मुझे कप में चाय पीने में बिल्कुल मजा नहीं आता.”
मेरी इस बात पर गौरी हंसने लगी।
“मुझे भी गिलास में ही पीना पसंद है।”
“अरे वाह! देखो हमारी पसंद कितनी मिलती है?”
और फिर हम दोनों हंसने लगे।

सैंडविच स्वादिष्ट बने थे। जैसे ही मैंने दांतों से एक कौर तोड़ा तो मेरे मुंह से निकल गया- लाजवाब मस्त!
गौरी ने इस बार मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा। उसे शायद इसी बात के उम्मीद थी कि मैं जरूर उसकी तारीफ़ करूँगा।
“विश्वास नहीं हो तो खाकर देखो?”

अब गौरी ने भी खाना शुरू कर दिया। उसने कुछ कहा तो नहीं पर उसके चहरे से झलकती मुस्कान ने बिना कहे बहुत कुछ कह दिया था।
“गौरी गिलास में चाय भी डाल लो!”
चिर परिचित अंदाज में गौरी ने “हओ” कहा और थर्मस से दो गिलास में चाय डाल ली।

मैंने पहले चाय की एक चुस्की ली। चाय का स्वाद अजीब सा था शायद गौरी चाय में चीनी डालना भूल गई थी।
“वाह चाय तो लाजवाब है पर …” मैंने बात अधूरी छोड़ दी।
गौरी ने हैरानी से मेरी ओर देखा- त्या हुआ?
“लगता है तुम चीनी डालना भूल गई?”
“ओह … सॉली (सॉरी) में अभी चीनी लाती हूँ.”

“गौरी एक काम करो?”
“त्या?”
“तुम इस गिलास को अपने होंठों से छू लो तुम्हारे होंठों की मिठास ही इसे मीठा कर देगी.” कहकर मैं जोर जोर से हंसने लगा।
गौरी को पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया पर बाद में वो ‘हट’ कहते हुए शर्मा कर रसोई में चीनी लाने चली गई।

उसने चीनी के दो चम्मच मेरे गिलास में डाल कर उसे हिलाया और फिर उसी चम्मच से अपने गिलास में भी चीनी डाल कर उसे हिलाने लगी।
“अरे मेरी जूठी चाय वाली चम्मच से ही तुमने अपने गिलास में भी चीनी मिला ली?”
“तो त्या हुआ? अपनो में तोई जूठा थोड़े ही होता है.”

इस फिकरे का अर्थ मेरी समझ में नहीं आ रहा था। पता नहीं गौरी मेरे बारे में क्या सोचती होगी? क्या पता उसे मेरी मेरी इन भावनाओं का पता है भी या नहीं? पर मुझे नहीं लगता वो इतनी नासमझ होगी कि मेरे इरादों का उसे थोड़ा इल्म (ज्ञान) ना हो। खैर इतना तो पक्का है अब वो मेरी छोटी-मोटी चुहल से ना तो इतना शर्माती है और ना ही बुरा मानती है।
कहानी जारी रहेगी
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