Hindi Kahani बड़े घर की बहू
06-10-2017, 03:32 PM,
RE: Hindi Kahani बड़े घर की बहू
गुरु जी- डरो नहीं सखी यह तुम्हारा इम्तिहान है देखो तुम क्या कर सख्ती हो बहुत नाज है ना तुम्हें अपने ऊपर 
और कहते हुए उन्होंने कामया की एक हथेली को उठाकर अपने लिंग पर रख दिया था और धीरे-धीरे उसे सहलाने भी लगे थे कामया उनकी जाँघो के सहारे थोड़ा आगे बढ़ी थी जैसे उसके जीवन का वो इम्तिहान उसे पास करना ही था वो जो चाहती थी वो उसके सामने था पर तैयार नहीं था वो तैयार थी उसे अपने लिए तैयार करने को अपने हाथों को धीरे से उसने गुरु जी के लिंग पर कस लिया था और धीरे-धीरे सहलाते हुए अपने गालों पर घिसने लगी थी कामया के होंठों से फिर से सिसकारी निकलने लगी थी और वो बहुत उत्तेजित होकर अपने काम में जुट गई थी अपने शरीर पर उसे अब भी उन महिलाओं के हाथों का एहसास हो रहा था और कभी-कभी उनके होंठों का भी वो एक भट्टी बन चुकी थी अब उसे कोई भी नहीं बुझा सकता था जो हथियार उसके हाथों में था वो भी कोई काम का नहीं था पर वो जी जान लगाकर उसे तैयार करने में जुटी थी अपने होंठों को और जीब को मिलाकर वो लगातार गुरु जी के लिंग को चुबलने में लगी थी अपने हाथों को लगातार गुरु जी की जाँघो पर घिस रही थी अपनी चुचियों को भी वो गुरु जी की टांगों पर घिसती हुई कभी थोड़ा सा ऊपर उठकर उनके पेट को भी चूम लेती थी पर सब बेकार कुछ नहीं हुआ था गुरु जी अब भी वैसे ही थे ना ही कोई टेन्शन में और नहीं कोई उत्तेजना थी उनके शरीर में कमी नही लगी थी सांसों के साथ साथ अब तो उसका मुँह भी दुखने लगा था वो नहीं जानती थी कि अब आगे क्या करे पर अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पा रही थी अपनी नजर उठाकर एक बार गुरु जी की ओर देखा था उसने गुरु जी के होंठों पर वही मन मोहने वाली मुश्कान थी और कुछ नहीं 


गुरु जी देखा सखी तुम भी हार गई है ना आओ खड़ी हो जाओ 

और कहते हुए बड़े प्यार से अपने हाथों के सहारे कामया को खड़ा किया और धीरे-धीरे अपनी उंगलियों को फिर से उसकी योनि में प्रवेश करा दिया था उन महिलाओ ने भी उसके नितंबो को सहलाते हुए पीछे से अपनी उंगलियों को धीरे-धीरे उसकी योनि में घुसाने की कोशिश करती जा रही थी एक साथ तीन तीन उंगलियों उसके अंदर घुसने को तैयार थी कामया जितना अपनी जाँघो को खोल सकती थी उतना खोलकर आने वाले पल का इंतजार करने लगी थी वो जानती थी कि वो इतना उत्तेजित हो चुकी थी कि थोड़ी सी हलचल उसकी योनि में होने से ही वो झड़ जाएगी पर इंतजार था अपने शरीर के सुख का कि वो कैसा होगा खड़ी हुई कामया अपने अंदर उंगलियों को धीरे धीरे घुसते हुए एहसास करती रही और मुख से लगातार सिसकारी भरती हुई आगे की ओर होती गई थी वो लगभग गुरु जी के ऊपर गिर ही जाती पर उन दोनों महिलाओं ने उसे रुक लिया था खड़ी खड़ी कामया हिलने लगी थी उत्तजना की शिखर पर पहुँचने को तैयार कामया अपने अंदर तीन चार या पता नहीं कितनी उंगलिओ को लेकर लगातार सिसकारी भरती हुई गुरु जी से टिक गई थी अचानक ही उसकी दोनों चूचियां को उन महिलाओं ने कस कस्स कर दबाना शुरू कर दिया था एक मुँह उसके सीने पर टच होने लगा था होंठों के बीच में उसका एक निप्पल आ गया था गुरु जी उसकी चूचियां को चुस्स रहे थे वो पागलो की तरह अपने हाथों को कस कर गुरु जी के सिर को खींच कर अपने सीने पर चिपका लिया जाँघो के बीच की हलचल लगातार बढ़ गई थी और गुरु जी के होंठों का अटेक भी जोर-जोर से उसके निपल्स को चूस्ते हुए अपने सिर को थोड़ा सा जोर लगाकर उन्होंने छुड़ाया था और दूसरे चुचे पर रख दिया था 

सिसकारी अब धीरे धीरे चीत्कार का रूप लेने लगी थी कामया की चीत्कार अब उस कमरे में गूंजने लगी थी बहुत तेज और बहुत मदहोशी भरी योनि के अंदर एक तूफान सा भर गया था और लगता था कि अब नहीं रुकेगा पर गुरु जी के साथ-साथ वो महिलाए अपने काम को बखूबी निभा रही थी उन महिलाओं की उंगलियां तो बहुत तेजी से चल रही थी पर गुरु आई की उंगलियां बहुत ही धीमे और अजीब तरह का मजा दे रही थी कामया का सारा शरीर पसीने पसीने में हो गया था और ज्यादा देर तक वो सह नहीं पाई थी उन लोगों के आक्रमण को झड़ झडा कर अपनी योनि का पानी उसने झोड़ दिया खड़ी खड़ी वो हाँफने लगी थी पर उन लोगों का आक्रमाण अब भी नहीं रुका था योनि के अंदर तक वो महिलाए अपनी उंगलियों को पहुँचाने में लगी थी और गुरु जी अब भी उसकी चूचियां को चूस रहे थे कभी एक तो कभी दूसरी को उनके चूमने का और चूसने का तरीका भी गजब का था कोई जल्दी बाजी नहीं थी और नहीं कोई जानवर पन था 


कामया सिर्फ़ अब उन उंगलियों के सहारे ही खड़ी थी नहीं तो कब की गिर जाती पर उसकी योनि से अब भी लगातार पानी झड़ रहा था जैसे रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था कमर और पेट झटके से अंदर जाते और भी बाहर आते थे सीना कभी अंदर जाता और फिर बाहर आता था थकि हुई कामया धम्म से नीचे बैठ गई थी गुरु जी के लिंग के पास उसका मुख था और दोनों जाँघो के बीच में वो थी गुर जी अपने हाथों से एक बार फिर से उसे सहलाते हुए कुछ कह रहे थे 

गुरु जी- देखो सखी तुम्हें अपने तन पर नियंत्राण रखना सीखना होगा आज से तुम मेरे साथ तीन दिन रहोगी में तुम्हें सिखाउन्गा कि कैसे यह होता है अपने मन के अंदर भी वो इच्छा जगायो जो तुम्हारे तन में है में तुम्हें इस कला में माहिर बना दूँगा फिर देखना कि कैसे यह संसार तुम्हारे कदमो में गिरता है तन की शक्ति मन से आती है नंगा शरीर किसी काम का नहीं जब तक मन उसने जुड़ा नहीं हो ठीक है यही दीक्षा में तुम्हें आने वाले कल में दूँगा अब जाओ तुम्हें रूपसा और मंदिरा ले जाएँगी आज से तुम्हारा कमरा ऊपर है खाना खाओ और आराम करो शाम को मिलूँगा 

कामया ने किसी तरह से अपने कपड़े पहने साथ में मंदिरा ने और रूपसा ने भी हेल्प किया था एक कटु मुश्कान थी उन लोगों के चहरे पर कामया नजर नहीं मिला पाई थी उन लोगों से खड़े होने पर भी उसकी योनि से रस अब तक टपक रहा था 
चिपचिप करता हुआ उसकी जाँघो तक बह कर घुटनों तक आने लगा था गुरु जी से नजर बचा कर उन्हें थोड़ा सा झुक कर प्रणाम किया और जल्दी से कमरे के बाहर की ओर मूड गई थी 

पीछे-पीछे मंदिरा भी चली पर रूपसा वही रुक गई थी गुरु जी के पास कामया के बाहर जाते ही रूपसा एक कँटीली हँसी हँसते हुए गुरु जी की जाँघो पर अपनी हाथ रखकर बैठ गई थी और धीरे-धीरे उनके लिंग को सहलाते हुए 

रूपसा- गुरु जी बहुत दिनों बाद आपने बुलाया है हम पर थोड़ा सा कृपाकर दीजिए बहुत मन कर रहा है 

गुरु जी धीरे से अपने हाथों से रूपसा के सिर को सहलाते हुए एकटक उसकी ओर देख रहे थे मंद मंद सी मुश्कान लिए वो एक और तो कुछ कहना चाहते थे पर कहते हुए भी उनका चेहरा लगता था कि खुशी से झूम रहा था रूपसा के सिर को सहलाते हुए धीरे से बोले
गुरु जी- हाँ… क्यों रोज तो खूब मजे कर रही हो फिर मेरी जरूरत क्यों पड़ी 

रूपसा- जो बात आपके साथ है वो कहाँ औरो के साथ गुरु जी वो तो बस काम है इसलिए नहीं तो आपके सिवा आज तक इस तन से खेलने वाला और मजे देने वाला कोई है ही नहीं कृपा करे गुरु जी 

गुरु जी- तो चलो अपने हथौड़े को तैयार करो फिर देखते है 
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