non veg kahani व्यभिचारी नारियाँ
05-06-2019, 11:36 AM,
#15
RE: non veg kahani व्यभिचारी नारियाँ
राज के लंड का गर्म सुपाड़ा शाजिया को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि उसकी चूत में गरमागरम लोहे का ढेला ढूँसा हो। उसके फड़कते लंड की शाखा ऐसे प्रतीत हो रही थी जैसे लोहे की गरम छड़ चूत की दीवरों को खोद रही हो। उसका लंड इतना अधिक गरम था कि शाजिया को लगा कि वो जरूर उसकी चूत को अंदर से जला रहा होगा पर उसकी खुद की चूत भी कम गरम नहीं थी। शाजिया की चूत भी भट्टी की तरह उस लंड पर जल रही थी जैसे कि राज का लंड तंदूर में सिक रहा हो।

शाजिया ने पहले हिलना आरंभ किया। राज तो स्थिर था और शाजिया ने अपनी चूत उसके लंड पर दो-तीन इंच पीछे खींची और फिर वापिस लंड की जड़ तक ठाँस दी। “चोद मुझे... चोद मुझे" शाजिया मतवाली हो कर विलाप-सा करने लगी।
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राज ने अपने घुटनों पर जोर दे कर अपना लंड इतना बाहर खींचा कि सिर्फ उसका सुपाड़ा चूत के अंदर था। शाजिया की क्लिट उसके लंड पर धड़कने लगी। राज ऐसे ही कुछ क्षण रुका तो शाजिया की चूत के होंठ फिर से उसके लंड को अंदर खींचने के लिए जकड़ने लगे। शाजिया के भरे-भरे चूत्तड़ पिस्टन की तरह हिल रहे थे उसकी ठोस गाँड बिस्तर पे मथ रही थी। बिस्तर पे मथ रही थी। “पेल इसे मेरे अंदर... राज?” शाजिया चिल्लायी। वो अपनी चूत को लंड से भरने को उतावली हो रही थी। उसे अपनी चूत अचानक खोखली लग रही थी। “ठेल दे अपना पूरा मूसल अंदर तक

राज ने हुँकार कर अपनी गाँड खिसकायी और शाजिया को एक धीरे पर लंबा सा झटका खिलाया। उसका लंड चीरता हुआ उसकी धधकती चूत में अंदर तक धंस गया। चूत के अंदर धंसी उसके लंड की शाखा ने शाजिया की गाँड को बिस्तर से ऊपर उठा दिया। राज ने एक बार फिर बाहर खींच कर इस तरह अपना लंड अंदर पेल दिया कि शाजिया की गाँड और ऊपर उठ गयी और उसका लंड इस तरह नीचे की दिशा में चूत पेल रहा था कि अंदर-बाहर होते हुए गरम लंड का प्रत्येक हिस्सा शाजिया की चूत पर रगड़ खा रहा था।

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शाजिया भी उतनी ही तीव्रता से अपनी आगबबुला चूत ऊपर-नीचे चलाती हुई राज के जंगली झटकों का जवाब दे रही थी। उसकी चूत इतनी दृढ़ता से लंड पर चिपक रही थी कि राज को लंड बाहर खींचने के लिए वास्तव में जोर लगाना पड़ रहा था।
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राज का लंड शाजिया के चूत-रस से भीगा और चिपचिपाता और दहकता हुआ बाहर निकलता और फिर चूत में अंदर चोट मारता हुआ घुस जाता जिससे शाजिया के चूत-रस का फुव्वारा बाहर छूट जाता। राज के आँड भी चूत-रस से तरबतर थे। शाजिया का पेट भी चूत के झग से भर गया था और गरम चूत-रस उसकी जाँघों के नीचे और उसकी गाँड की दरार में बह रहा था। जब भी उसकी चूत से रस का फव्वारा फूटता तो मोतियों जैसी बड़ी-बड़ी बूंदें उसकी चूत और दोनों टाँगों के बीच के त्रिकोण पर छपाक से गिरतीं।।

चुदाई के आनंद और शराब के नशे से शाजिया मतवाली हुई जा रही थी। उसने राज से चिपकते हुए अपनी जाँचें राज के चूतड़ों पर कस दीं। शाजिया के सैंडलों की ऊची ऐड़ियाँ राज की गाँड पर ढोल सा बजाने लगीं।

राज लगातार चोद रहा था और जब भी उसका लंड चूत में उँसता तो उसके आँड झूलते। हुए शाजिया की झटकती गाँड पे टकराते। साथ ही शाजिया की चूत से और रस बाहर चू जाता। मैं... मैं झड़ी।'' शाजिया हाँफी, “ओह... चूतिये... मैं झड़ने वाली हैं... तू भी झड़ जा... मादरचोद... भर दे मेरी चूत अपने गरम, चोद-रस से..."
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फिर राज ने एक असाधारण काम किया। उसने अपना लंड चूत से बाहर निकाल लिया।

शाजिया संत्रासपूर्वक चिल्लायी और यह सोच कर कि शायद गल्ती से निकल गया होगा, उसने अपना हाथ बढ़ा कर लंड पकड़ लिया और फिर से अपनी चूत में डालने की चेष्टा करने लगी। वो गरम चुदक्कड़ औरत झड़ने के कगार पर थी और उसे डर था कि लंड के वापस चूत में घुसने के पहले ही वो कहीं झड़ ना जाये।

॥ राज कुटिलता से मुस्कुराया। राज जानता था कि सिर्फ ऐसी ही स्थिति में वो हर समय धौंस देने वाली अपनी अकडू मालकिन को अपने इशारे पर नचा सकता था। शराब और चुदाई के मिलेजुले नशे में वो कुछ भी खुशी से करने को फुसलायी जा सकती थी।

राज ने शाजिया के चूत्तड़ पकड़ कर उसे धीरे से पलट दिया। जब वो शाजिया को बिस्तर पे पेट के बल पलट रहा था तो वो उसके हाथों में मछली की तरह फड़फड़ा रही थी। फिर उसने शाजिया को जाँघों से पकड़ कर पीछे की ओर ऊपर खींचा जिससे शाजिया अपने घुटनों पे उठ कर झुक गयी और उसकी गाँड राज के लंड की ऊचाई तक आ गयी। राज भी ठीक शाजिया के पीछे झुका हुआ था। राज का लंड शाजिया की गाँड के घुमाव के ऊपर मिनार की तरह उठा हुआ था। उसका लंड की शाखा शाजिया के चूत-रस से भीगी हुई चिपचिपा रही थी और उसके लंड का सुपाड़ा ऐसे दमक रहा था जैसे कि प्रकाश-गृह (लाइट हाऊस) की मिनार के ऊपर लगा आकाश-दीप हो और नीचे अपने टट्टों में छिपी पथरीली गोलियों के चेतावनी दे रहा हो।

शाजिया का सिर नीचे था और गाँड ऊपर हवा में थी। उसका एक गाल बिस्तर पे सटा हुआ था और उसके लंबे काले बाल बिस्तर पर फैले हुए थे। शाजिया की ठोस, झटकती गाँड उसकी इस मुद्रा की अधिकतम ऊँचाई तक उठी हुई थी। यह मुद्रा शाजिया के लिए नई नहीं थी। उसकी भारी चूचियाँ बिस्तर पर सपाट दबी हुई थीं और जब वो अपनी गाँड हिलाने लगी तो उसकी तराशी हुई जाँचें कसने और ढीली पड़ने लगीं और उसकी प्यारी गाँड कामुक्ता से ऊपर-नीचे होने लगी।
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