Hindi Antarvasna - कलंकिनी /राजहंस
09-17-2020, 01:09 PM,
RE: Hindi Antarvasna - कलंकिनी /राजहंस
"ओह....." उठकर दोनों गोमती के किनारे-किनारे आगे को बढ़ने लगी थीं। एक ओर खामोशी में सोया हुआ शहर तथा दूसरी ओर गोमती की लहरें....चारों ओर फैला हुआ रात का सन्नाटा। सब कुछ बड़ा भयानक-सा लग रहा था। सामने रेलवे लाइन थी। दोनों को ठिठककर रुक जाना पड़ा था। पुल से धड़धड़ाती हुई गाड़ी शहर की दिशा में जा रही थी। गाड़ी निकल गयी तो फिर दोनों आगे बढ़ी थीं। एक मील के लगभग आगे बढ़ी थीं,सामने कुछ झोंपड़ियां दिखलायी दे रही थीं। आगे बढ़ने में भी खतरा था। बाकी रात उन्होंने वहीं झाड़ियों में बैठकर बितायी थी। सबेरे एक मजदूर औरत ने उन पर रहम खाया था। उसने ठेकेदार से कहकर एक झोंपड़ी उन्हें भी दिलवा दी थी। जगह पर ठेकेदार का कब्जा था, अतः किराये के बीस रुपये पेशगी देने पड़े थे। फिर जिंदगी का रूप बदला। उन मजदूरों के साथ में रहकर सुख भी मिला और शांति भी। जिंदगी वह चली। अब तक वही क्रम है।

"दीदी.....!" सुधा की आवाज सुनते ही अनीता की विचारधारा टूट गयी। वह अपने अतीत के साथ बुरी तरह से उलझकर रह गयी थी। समय का कुछ भी पता न चला था, यह भी पता न चला था कि सुधा कब से वहां खड़ी है। उठकर उसने अपनी वहन की ओर देखा। उसकी धुंधली और उदास आंखों में चमक आ गयी थी। सोचने लगी, क्या यह समय की निर्दयता नहीं है? सुधा ने उसे खामोश देखकर पूछा-"तुम क्या सोचने लगीं दीदी?"

"कुछ नहीं।” अनीता के सूखे अधरों ने मुस्कराने की कोशिश की, परन्तु कामयाबी नहीं मिली—“अन्दर आ जा....। देख, पसीना कितना आया है तुझे! पोंछ दूं....।"

सुधा अन्दर आकर अनीता के पास ही बैठ गयी। अनीता ने अपने आंचल से उसके चेहरे के पसीने को पोंछा और फिर उसके माथे को चूम लिया। अकस्मात ही उसकी आंखें भर आईं। सुधा से उसकी यह मनोदशा छुपी न रह सकी। वह तुरन्त बोली-“दीदी....."

"हां....।

" "क्या बात है...?"

अनीता ने अपने आंसुओं को अन्दर ही अन्दर पी लिया। मुस्कराने का प्रयत्न करते हये बोली-“बात कुछ नहीं। हां....कल सेतु इतनी देर मत लगाया कर। मेरी आंखें तुझे ही देखती रहती हैं....। न जाने क्या-क्या सोचने लगती हूं मैं....!"

“बेकार को सोचने लगती हो दीदी। यदि तुम्हारी सुधा ऐसी होती तो....!"

"सुधा, जमाने का क्या भरोसा....."
.
.
.
.
तभी सुधा को कुछ ध्यान आया। उसने अपनी धोती की गांठ में बंधी दो गोलियां निकालकर अनीता के हाथ पर रख दीं- "बुखार की हैं....गली बाले डॉक्टर के पास गयी थी।"

“पागल है तू....बेकार ही पैसे खर्च कर दिये। मैं तो यूं ही ठीक हो जाती।"

"नहीं दीदी।" सुधा ने पानी दिया। गोली खाकर अनीता लेट गयी। सुधा को अभी खाने के लिये कुछ बनाना था। अतः वह अपने काम में व्यस्त हो गयी। लेटते ही अनीता की आंखों के सामने फिर अतीत की घटनायें घूमने लगीं। सैकड़ों मोड़ों से गुजरती हुई उन दोनों वहनों की जिंदगी कहां से कहां पहुंच गयी थी। अभी आगे का भी क्या पता था, मंजिल कहां मिलेगी। सुवह....शाम और रात के दायरे में चक्कर काटता हुआ समय ही अनीता तथा सुधा का जीवन बन गया था। वहीं काम, एक घुटन और विगत की ओर से आते हुये विचार। दोनों सोचतीं और कभी-कभी अपने आंसुओं को बहाकर संतोष कर लेतीं। अक्सर विनीत की बातें करते-करते रात ढल जाती। दोनों जी भरकर रोतीं। अब इन दोनों को रतन के दिये हुये मास्क लगाने की कोई जरूरत नहीं रह गयी थी। मैले कुचैले कपड़ों में लिपटी इन दोनों वहनों को देखकर कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि ऊपर से उदास और खामोश दीखने वालीं ये लड़कियां किसी का खून भी कर सकती हैं। हां, बस्ती में इन दोनों के विषय में लेकर कभी-कभी काना-फूसी होने लगती थी। लेकिन किसी में इतना साहस न था कि इनके मुंह पर कोई कुछ कह पाता। वह इसलिये कि एक बार इसी तरह की बात पर अनीता ने एक मजदूर के गाल पर थप्पड़ मार दिया था। उस दिन के बाद किसी में इतना साहस नहीं हुआ था कि इनके सामने कुछ कह देता। आज दीवाली थी। अपनों के नाम पर दोनों वहनें बैठी हुई आंसू बहा रही थीं। कौन किस को धैर्य बंधाता? भावों का बांध टूटने पर साहस जैसे वहकर बहुत दूर चला गया था, जिनकी जिंदगी में शुरू से ही मुसीबतों के तूफान चल रहे हों, उनके लिये दीवाली क्या लेकर आयेगी। अन्त में बड़ी होने के नाते अनीता ने अपने आंसुओं को पोंछकर सुधा के आंसू पोंछे और उसे अपने सीने से लगा लिया।

"रो मत....!"

"दीदी....!"

"सुन यदि हमने जिंदगी से हार मान ली तो हमारे पास आज जो भी सांसं शेष हैं, वे भी टूट जायेंगी। रोना छोड़ दो और साहस से काम लो।"

“न जाने भइय्या कहां होंगे दीदी...."

क्या पता!” अनीता ने गहरी सांस लेकर कहा-"अब विनीत भइय्या को याद करने से भी क्या मिलेगा....चल उठ।"

"दीदी....."

"आज दीवाली है। लोग अपने घरों की सफाई कर रहे हैं, हमारी झोंपड़ी में सफाई करने को रखा ही क्या है। हां, कल दिन के मैले कपड़े पड़े हैं।"

*"मैं धो लाऊंगी दीदी।"

“नहीं, तू बाजार से कुछ सामान ले आना। कपड़े मैं धो लाऊंगी।"

"दीदी, न जाने क्यों मुझे बाजार जाते हुये डर-सा लगता है। पुलिस के किसी भी आदमी को देखकर बुरी तरह घबरा उठती हूं।"

अनीता ने सुधा की ओर देखा-"पगली! अब तो पुलिस वालों ने उस केस को ही भुला दिया होगा। खैर, बाजार में चली जाऊंगी।"

थोड़ी देर बाद सुधा कपड़ों की गठरी लेकर गोमती के किनारे पहुंची। सुवह का समय था, सूरज की चटकीली धूप बड़ी प्यारी लग रही थी। सहसा ही उसकी दृष्टि दांयी ओर सड़क पर से गुजरते हए एक जोड़े पर पड़ी। दोनों एक दूसरे के हाथों में हाथ डालकर चले जा रहे थे। देखकर उसका अन्तर्मन कसमसाकर रह गया, वह जवान थी, जबानी उसके बदन से फूट-फूटकर निकल रही थी। उसके मन में कुछ भाबनायें थीं, कुछ उमंगें थीं। परन्तु बक्त ने जैसे सभी कुछ जलाकर रख दिया था। सांसें भी बोझ बन रही थीं। उसने जबरन अपनी दृष्टि को उस ओर से खींच लिया और अपने काम में व्यस्त हो गयी। तभी वह चौंकी। किसी पुरुष की छाया पानी में पड़ी थी। चौंककर वह पलटी। बस्ती का मंगल बहां खड़ा था। मंगल अभी कुंआरा था। बस्ती के लोग उसे दादा भी कहते थे। सुधा जानती थी कि वह अच्छा आदमी नहीं है। वह उठकर खड़ी हो गयी। भीगी हुई धोती अभी तक उसके हाथ में थी। साहस करके उसने पूछा-"क्या बात है....?"
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