Antervasna नीला स्कार्फ़
10-05-2020, 12:43 PM,
#11
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
घर पहुँचकर भी मायूसी कम नहीं हुई लेकिन चाय का घूँट गले के नीचे जाते-जाते चाची का मूड एकदम बरसात की धूप की तरह खिल उठा था।
“इसमें कौन बड़ी बात हो गई मेहमान जी? देखवकी में ई सब होईबे करता है, नहीं ऋचा बबुनी? इसी बहाने हम आपके साथ दू-चार दिन रहियो लिए। नहीं तो कहाँ से ये सौभाग्य मिलता? है ना बन्नी? ऐ श्वेता, हम ठीक बोले कि गलत?” गुमसुम बैठी श्वेता चाची की घुड़की घुली सांत्वना सुनकर सहमी हुई-सी मुस्कुरा दी।
मेरा फ़ोन लेकर चाची ने चाचा को गाँव में फ़ोन कर दिया था, “भक्क! एकदम ठीक नहीं था लड़का जी। कईसन दो एगो जीन्स पैंट पहिन कर आया था। गर्दन पर जुल्फी लटकाए था। एगो ईहाँ हमारे मेहमान जी को देखिए आ एगो ओकरा के देखिए, बड़का शहर वाला बनता है। सुनते हैं जी, ऊ कुसुमवारी वाला पंडितजी को फोन कर दीजिएगा। हाँ, कह दीजिएगा हमको रिश्ता पसंद है। अरे हाई स्कूल में टीचर है लईका, अपना खेती-पाती है, कौन बात का दुख है। और एतना बड़का-बड़का आँगन-दुआर में रहनेवाली हमारी बेटी शहर के छोटका कबूतरखाना में थोड़े खुश रह पाएगी। फिर अईसा तो नौबत नहीं आएगा न कि शहर में बसने के लिए खेत बेचना पड़े। आउर सुनिए, कह दीजिएगा कुसुमवारी वाला लोग से कि बियाह का बात होगा सीधे, देखवकी-उखवकी नहीं। सुन रहे हैं न?”
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मर्ज़ ज़िंदगी, इलाज ज़िंदगी
अजीब हाल है शिवानी का। कभी अपनी गायनोकॉलोजिस्ट से कुछ यूँ मिलना चाहती है जैसे उसके तन-मन के सारे रोगों का इलाज एक उन्हीं के पास है और कभी मिलने से ऐसे बचती है जैसे डॉक्टर न हो, बीमारी हो कोई!
लेकिन अपनी गायनोकॉलोजिस्ट के साथ एक औरत का रिश्ता उस इश्क़ की तरह होता है जिसे बनने में तो कुछ महीने लगते हैं पर भूलने में कई साल।
सिर्फ़ लेडी डॉक्टर ही नहीं हैं डॉ. गगनदीप शेरगिल। शिवानी के मन की बिना डिग्री वाली डॉक्टर भी हैं। इसलिए पीरियड्स, प्रेग्नेन्सी, फाइब्रॉयड्स और पीएमएस के अलावा शिवानी के मन के पथ की परिक्रमा करती लाइलाज बीमारियों को बिना नब्ज़ थामे यूँ ही चट से पकड़ लेती हैं।
किसी डॉक्टर की निगाहें कैसे किसी के आर-पार देख लेती होंगी, एक बार डॉ. शेरगिल की कोमल, तरल आँखों को देखिए तो समझ जाइएगा। शिवानी के लिए उनके सामने अपना झूठ छुपाना मुश्किल, सच बताना दूभर। वो डॉक्टर ठहरीं। पहले मर्ज़ के लक्षण पूछेंगी, फिर नब्ज़ टटोलेंगी, फिर नाक पर चश्मा लटकाकर अपनी धाराप्रवाह कर्सिव हैंडराइटिंग में अटर-पटर, आड़ा-तिरछा, ऊलजुलूल पता नहीं क्या-क्या लिखकर एक पर्चा शिवानी को थमा देंगी।
शिवानी की बीमारी से भी पेचीदा डॉक्टर साहिबा का पर्चा!
वैसे शिवानी के दिल का हाल बिना स्टेथोस्कोप के समझ जाती हैं वो। उसकी रग़ों में दौड़ते लहू के प्रेशर का अंदाज़ा चेहरे की रंगत देखकर पता कर लेती हैं। डॉक्टर साहिबा के बेलौस, बेबाक सवाल शिवानी को वैसे ही परेशान करते हैं जैसे अपने बेतुके ख़्याल करते हैं।
फिर भी डॉ. शेरगिल के सामने शरीर के दुःख-दर्द के साथ मन की तहें खोलना भी अक्सर ज़रूरी लगता है शिवानी को।
23 सितंबर की सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ था।
यूँ तो ये तारीख़ याद रखने की कोई वजह नहीं शिवानी के पास, लेकिन हम हर रोज़ कई सारे काम वैसे भी बेवजह ही तो करते हैं! पैदा होने से लेकर स्कूल जाने, कॉलेज में पढ़ने, शादी कर लेने तक हर काम बेवजह। यूँ कि जैसे पैदा हो गए हैं तो ज़िंदगी की कुछ रस्में निभा लेने की मजबूरी है वर्ना हर रोज़ दिन गुज़ारने की कोई और वजह शिवानी को तो नहीं दिखती। वो बेवजह किए जाती है कई काम। सुबह बिस्तर छोड़ने से लेकर रात को अपने पति के साथ बिस्तर बाँटने तक।
सब बेवजह। ज़िंदगी बेवजह।
कोई और बीमारी दिखाने आई थी शिवानी, ज़ख़्म कहीं और का कुरेद रही है। वर्ना दो-दो महीने तक न आने वाले पीरियड्स से दिल के ज़ख़्मों का क्या रिश्ता है?
“हाय खसमानूखानिए! तू मर क्यों नहीं जांदी है? हुआ क्या है तुझको? ये तेरे यूट्रस का नहीं, मन का रोग है।” गुस्से में होती हैं तो डॉ. शेरगिल की पंजाबियत उनके लहज़े में उतर आती है। फिर वो डॉक्टर नहीं होतीं, सिर्फ़ औरत होती हैं।
इसी औरत से मिलने तो चली आया करती है शिवानी हर बार।
“मन के ही रोग तो होते हैं सारे। आप तो डॉक्टर हैं। साइकोसोमैटिक डिसॉर्डर के बारे में आपसे बेहतर कौन जानेगा?”
“सायकियाट्रिस्ट जानेगा। और किसी मेंटल असाईलम में जाकर मर जा तू। तेरा दिमाग़ हो गया है ख़राब और ये बात मैं तब से कह रही हूँ जब से तू आईवीएफ का फुलफॉर्म भी नहीं जानती थी।”
“दिमाग़ ख़राब नहीं, दुरुस्त हुआ है अब तो। याद है डॉक्टर, कैसे बेसबब गुज़र जाया करते थे दिन तब? मैं तब हर महीने पीरियड्स के न आने का इंतज़ार करती थी। अब लम्हों को भी थाम कर रखना चाहती हूँ, अपने भीतर की औरत को भी। अब होश में आई हूँ तो लगता है, ज़िंदगी गुज़र गई और सपनों की टोकरी में से जादूगर ने खरगोश तो निकाले ही नहीं। रंग-बिरंगे प्लास्टिक के फूलों का गुलदस्ता हाथ में थामा ही नहीं। सिर पर लटकती छतरी ने रंग तो बदले ही नहीं। एक दोधारी तलवार बस आर-पार कर दी जादूगर ने। ये कैसी माया थी? कैसा जादू था? मेरे जीने का मक़सद सिर्फ़ दो बच्चे पैदा भर करना था?” शिवानी बड़बड़ा रही है या बोल रही है या सिर्फ़ सोच भर रही है, ये वो भी नहीं जानती।
डॉ. शेरगिल सुनती रहती हैं, सुनती रहती हैं। ऐसे आत्मालाप का कोई क्या जवाब दे?
लेकिन डॉ. शेरगिल देती हैं। इसलिए क्योंकि शिवानी की डॉक्टर भी हैं, हमदर्द भी।
“नहीं। ज़िंदगी का मकसद उन दो बच्चों की अच्छी परवरिश करना भी था। हाय फिटे मुँह! तुझे ऐसी ऊटपटांग बातें करना किसने सिखाया है? पैंतीस की उम्र में भी होश नहीं है तुझको?” डॉक्टर की आवाज़ थोड़ी नरम पड़ने लगती है।
“जाने किसने। बचपन से ही ऐसी हूँ। बुढ़ापे में अब क्या बदलूँगी?”
“ये लो कर लो बात। पैंतीस साल की उमर में बूढ़ी होने लगी हैं ये! मेरी उम्र पता है? तीस दूनी साठ कम तीन। सत्तावन साल की हूँ मैं। इतने सालों में तो हर रोज़ बदलते देखा है ख़ुद को। फिर भी कहाँ बदलते हैं हम?
जिसे तू जादू की दुनिया कहती है उसे मैं दुनिया का जादू कहती हूँ। देख तो सही आस-पास दुनिया का जादू ही तो है सब जगह! हक़ीक़त भी जादू। हर रोज़ जो मैं कई सारे बच्चों को इस दुनिया में लाने का काम करती हूँ, वो भी तो जादू है!”
“हाँ, वो तो सबसे ख़ूबसूरत जादू है। सब समझती हूँ, लेकिन मन बहलता क्यों नहीं? इस जादू से फिर ऐसे मोह-भंग क्यों? इतना डिसइल्युज़नमेंट?” शिवानी लेटी तो चेक-अप टेबल पर है लेकिन उसकी आँखें एसी के वेंट के एक फुट ऊपर कोने में अपने ही बुने जाल में लटक रही मकड़ी पर है।
“मन से पूछ न! चल उम्र के पहिए को उल्टा घुमाते हैं। दस साल या पंद्रह साल पीछे गए तो क्या-क्या बदलेगी तू?” डॉ. शेरगिल अपने दास्ताने पहनकर उसके पास चली आई हैं।
“कुछ भी नहीं। सब वैसा का वैसा ही चाहिए। मैंने ये कब कहा कि मुझे कोई शिकायत है ज़िंदगी से?”
“शिकायत न सही, मोहब्बत सही। हर हाल में तो हम जी ही लिया करते हैं, वक़्त कट ही जाता है, साल निकल ही जाते हैं…।” डॉ. शेरगिल के हाथ अब शिवानी का पेट टटोल रहे हैं और शिवानी का आत्मालाप चलता चला जाता है। किसी टेंडर प्वाइंट पर, पेट के निचले हिस्से पर कहीं, डॉ. शेरगिल का हाथ लगते ही शिवानी बोलना बंद करके एक गहरी, तकलीफ़ज़दा साँस लेती है।
“दिन, महीने, साल तो निकल ही जाया करते हैं लेकिन इस तेज़ी से गुज़रते वक़्त का कुछ बनाना पड़ता है। अपने हाथों… कोई और नहीं बनाता या बिगाड़ता हमारी ज़िंदगी।” अब शिवानी चुप है और डॉ. शेरगिल बोल रही हैं।
शिवानी के दाहिने पेट के निचले हिस्से को डॉक्टर के हाथ जैसे ही एक बार ज़ोर से दबाते हैं, शिवानी अपने दोनों हाथों से उसे पकड़ लेती है। “यहीं…यहीं इसी हिस्से में बहुत दर्द है।” शिवानी कहती है।
शिवानी के हाथों की पकड़ से ख़ुद को निकाल डॉ. शेरगिल जाँच जारी रखती हैं। हाँ, इस बार उतने बेरहम नहीं हैं उनके हाथ शिवानी के पेट को दबाते हुए।
“तुझे क्या लगता है शिवानी? लम्हे नहीं कटते या ज़िंदगी नहीं कट रही?” शिवानी को पीछे से सहारा देकर डॉ. शेरगिल ने उसे अब उठाकर बिठा दिया है।
“लम्हे ही नहीं कटते।” शिवानी उकडू बैठ गई है अब। “ज़िंदगी तो किसी तरह कट ही जाती है।”
“लम्हे ही भारी पड़ते हैं?” डॉ. शेरगिल का स्टेथोस्कोप अब शिवानी की पीठ सहला रहा है।
“शायद।”
“हाय कुड़िए! तुझे तो कोई परेशानी है ही नहीं। तू मरीज़ है ही नहीं। धीरे-धीरे खिसकते लम्हों में जीना कितना आसान होता होगा न तेरे लिए। कितनी आसानी से कटता होगा तेरा दिन! सुबह पति को दफ़्तर और बच्चों को स्कूल भेजने के बीच के लम्हे, ब्रेकफास्ट और लंच के बीच के लम्हे, डस्टिंग और गार्डेनिंग के बीच के लम्हे, बालिका वधू और द न्यूज़आवर के बीच के लम्हे… सब कुछ कितना नपा-तुला! कितना आसान! कितना ठहरा हुआ! मुझे तो वक़्त के तेज़ी से भागने का डर लगा रहता है। एक दिन सारे बालों के सफ़ेद हो जाने से डर लगता है।” डॉ. शेरगिल अब अपनी दराज़ से काग़ज़-क़लम निकालकर प्रिस्क्रिप्कशन लिख रही हैं।
“अच्छा? डॉक्टर को भी डर लगता है?” वहीं चेक-अप टेबल पर उकडू बैठे हुए शिवानी पूछती है। वैसे ही एसी वेंट से एक फुट परे लटकती अपने जाल में फँसी हुई मकड़ी को देखते हुए।
“क्यों नहीं लग सकता?” डॉ. शेरगिल अब अपने फ़ोन में कुछ देख रही हैं।
“नहीं, मुझे लगता था डॉक्टर बड़े ज़हीन होते हैं, बड़े समझदार। उन्हें दर्द की समझ होती है। इलाज का शऊर होता है।”
“डॉक्टरों को अपना इलाज करना नहीं आता। वैसे ही जैसे तुझ जैसे मरीज़ों के मर्ज़ का इलाज नहीं आता।”
“फिर? मैं और आप एक ही नाव पर? हम ऐसे ही मर जाएँगे एक दिन, किसी भलमानस चारागर के इंतज़ार में?”
“न, हम ऐसे ही जिए जाएँगे एक-एक दिन। ऐसे ही जादू भरे ख़्वाब देखते हुए। कोई मंगल ग्रह से नहीं उतरेगा हमें बचाने के लिए। डॉक्टर हूँ, इसलिए दावे के साथ ये बात कह सकती हूँ।”
“ऐसा न कहिए डॉक्टर। दिल डूबा जाता है। आप तो डॉक्टर हैं मेरी। मेरे बच्चों को लेकर आई हैं इस दुनिया में। मेरे शरीर को जाने कहाँ-कहाँ से नहीं देखा आपने। आपसे बेहतर कौन जानता होगा मुझे। मेरे मर्ज़ का कोई तो इलाज होगा।”
“है। जो थोड़ी-सी ज़िंदगी बची है, उसे जीने का इंतज़ाम करो। आउट ऑफ द बॉक्स करो कुछ…कुछ वाइल्ड…कुछ ऐसा कि मरते वक़्त अफ़सोस न बचे कोई।”
“मैं भाग जाऊँ कहीं? एक उसी का अफ़सोस नहीं होगा कभी। किसी ऐसी ट्रेन में बैठकर भाग जाऊँ जिसकी मंज़िल का पता न हो। जिसके स्टेशन्स पर लगे पतों की भाषा मुझे पढ़नी न आए। जहाँ कोई मुझे जानता न हो। जहाँ मेरी कोई ज़रूरत न हो…।”
“बैड आइडिया। कुछ और सोच। तेरे बच्चों को तेरी ज़रूरत है अभी।”
“फ्लिंग। लेट्स हैव अ फ्लिंग। एक अदद-सा वन नाइटस्टैंड। अपने अदद-से पति के चल रहे कई वन नाइटस्टैंड्स की तरह।”
“इवेन वर्स। कुल्हाड़ी पर जाकर पैर मारने की बात न कर। जो तसल्ली और स्थिरता कई सालों में यहाँ न मिली, वो किसी नई जगह पर एक रात में ख़ाक मिलेगी? कुछ और सोच।”
“नहीं सूझता। कुछ नहीं सूझता।” शिवानी फिर से चेक-अप टेबल पर औंधे लेट जाती है।
“यू आर अ क्रिएटिव पर्सन। लुक फॉर ए क्रिएटिव सॉल्यूशन।”
“माने?”
“माने अपने लिए तिलस्म रच। माया की एक दुनिया। ऑल्टरइगो तलाश कर। अपने नेमेसिस ढूँढ़ के ला। किरदारों में उन्हें रख और एक ऐसी दुनिया रच जहाँ तू नहीं लेकिन वो तेरी अपनी है। उस दुनिया में अपने प्यार के लिए अपनी शर्तें चुन। गमलों में मौसमी फूल के साथ-साथ लाल टमाटर और नींबू भी लगा। अपने दुखों पर छाती पीटने के कुछ और नए तरीक़े ईजाद कर। अपनी साड़ियों के कुशन कवर बनाकर उनका एक्ज़िबिशन लगा। चादरों पर अपने दुश्मनों की तस्वीरें पेंट कर। कितने तो तरीक़े हैं! अपने आँसुओं से कुछ और रंग बना कुड़िए।”
“ये लो कर लो बात। कहाँ तो मैं जादू की दुनिया से निकलकर रियल वर्ल्ड में जीने की बात कर रही हूँ, कहाँ आप मुझे एक और अँधेरे, अनदेखे कुएँ में ढकेल रही हैं।”
“अँधेरे में ही दिखेगी रोशनी। जहाँ हम और तुम बैठे हैं न, वहाँ सब धुँधला-धुँधला है। न उजला न स्याह, न शाम न सुबह, न अँधेरा न रौशनी। अँधेरे में उतरने की हिम्मत कर शिवानी। रौशनी का रास्ता वहीं से निकलता है।”
“ये क्या था? हमारे बीच ये कैसी बातचीत हुई? हम कैसी डॉक्टर और मरीज़ हैं?”
“हम वैसी डॉक्टर और मरीज़ हैं जो ठीक वैसे ही जिए जाती हैं जैसे दुनिया-जहान की बाक़ी और औरतें जीती हैं।”
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10-05-2020, 12:43 PM,
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RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
“अच्छा? ऐसे ही जीती हैं सब? डॉक्टर भी? मरीज़ भी? फिर तो बच जाऊँगी मैं भी, मरूँगी नहीं।”
“तू भी बच जाएगी और मैं भी और शायद वो औरत भी जिसके ट्रिप्लेट्स की डिलीवरी करानी है अगले पंद्रह मिनट में।” ये कहते हुए लेडी डॉक्टर गगन शेरगिल ने अपना सफ़ेद चोग़ा पहना, गले में स्टेथोस्कोप लटकाया और मुस्कुराते हुए अपने चेंबर से निकल गईं। सिर्फ़ ये कहने के लिए लौटती हैं कि शिवानी दवा खाती रहे और अगले महीने मिलने से पहले अपनी पेंटिंग एक्ज़ीबिशन का इन्विटेशन कार्ड ज़रूर छपवा ले।
शिवानी अपनी साड़ी के चुन्नट ठीक करते हुए सोचती है कि ज़िंदगी नाम की लाइलाज बीमारी का इलाज भी ज़िंदगी ही है शायद। जो ज़िंदगी बेरंग दिखती है उसमें कृत्रिम रंग भरे जाने चाहिए।
फिर कोने में पड़े हुए डस्टबिन की बग़ल में पड़े हुए झाड़ू को उठाकर शिवानी डॉक्टर शेरगिल की मेज़ पर चढ़कर झाड़ू की मदद से छत से लटक रही मकड़ी को आज़ाद कर देती है।
हाथ की लकीरें
“ऐ रनिया… रे रनिया। उठती है कि एक लात मारें पीठ पर? आँख के सामने से जरा देर को हटे नहीं कि पैर पसारकर सो रहती है! नौकर जात की यही तो खराब आदत है, जब देखो निगरानी करनी पड़ती है। अब उठेगी भी कि गोल-गोल आँख करके हमको ऐसे ही घूरती रहेगी?”
माँ ने बड़े प्यार से जिस बेटी का नाम ‘रानी कुमारी’ रखा होगा, उस रानी को मालकिन ने रनिया बना डाला। नाम का ये अपभ्रंश रानी से ऐसे चिपका कि मालकिन और उनके घर के लोग तो क्या, अड़ोसी-पड़ोसी और रनिया के घरवाले भी उसका असली नाम भूल गए।
सात साल की उम्र में ही रानी रनिया हो गई, और मालकिन का आलीशान घर उसकी दुनिया।
हर रोज़ बिना लात-बात के रनिया की नींद खुलती नहीं है, सो उस दिन भी क्या खुलती! जेठ की चिलचिलाती दुपहरी तो अच्छे-अच्छों की पलकों पर भारी पड़ती है, फिर रनिया का तो यूँ भी कुंभकर्ण से पुराना नाता है। उस दिन भी भरी दुपहर में खटाई डालने के लिए एक छईंटी कच्चे आम छीलने को कह दिया था मालकिन ने रनिया को, और ख़ुद चली गई थीं पलंग तोड़ने। अब नींद मालकिन की मुलाज़िम तो है नहीं कि उनके कहे से रनिया के पास आती और जाती!
ख़ैर, मालकिन की एक फटकार ने रनिया को बिल्कुल सीधा खड़ा कर दिया। वैसे कहीं भी सो रहने की पुरानी आदत है रनिया की। कहीं भी ऊँघने लगती है और और जाने कैसे-कैसे सपने देखती है! मिठाई-पकवान, साड़ी-कपड़े, बग़ल के बिन्नू, पड़ोस की मुनिया… सब आते हैं सपने में।
आजकल भाभी जी बहुत आती हैं सपने में। अभी-अभी देखा कि भाभी जी…
“ओ महारानी! खड़े होकर खाली मुँह ताकेगी हमारा कि कुछ काम-धाम भी होगा?” रनिया सोच भी पाती कि उसके सपने में भाभी जी क्यों उदास बैठीं नारंगी रंग की साड़ी में गोटा लगा रही थीं कि मालकिन ने फिर से उसकी सोच में ख़लल डाल दिया।
“अभी आँखें खोलकर सपने देखेंगे तो मालकिन हमारा यहीं भुर्ता बना देंगी,” रनिया मन ही मन बुदबुदाई। हाथ-पैर सीधा करने का वक़्त न था। मालकिन के चीखने-चिल्लाने के बीच ही बड़ी तेज़ी से काम भी निपटाने थे।
वैसे ठाकुर निवास में क़हर बाक़ी था अभी। रनिया को सोते देख भड़की मालकिन के क्रोध की चपेट में घर के बाक़ी नौकर भी आ गए। मालकिन एक-एक कर सबकी किसी-न-किसी पुरानी ग़लती की बघिया उधेड़ती रहीं। अब तो सब आकर रनिया की धुनाई कर देंगे! सबसे छोटी होने का यही तो नुकसान है।
ऐसे में एक भाभी जी का कमरा ही रनिया की शरणस्थली बनता है। रनिया ने जल्दी से घड़े से ताज़ा ठंडा पानी ताँबे की जग में उलटा और भाभी जी के कमरे की और बढ़ गई।
इन दिनों ठाकुर निवास में उसे दिन भर भाभी जी की सेवा-सुश्रुषा की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। यहाँ काम करनेवाला ड्राइवर कमेसर काका रनिया के टोले का है। रनिया को ठाकुर निवास में वही लेकर आया था। माँ ने कितनी ही मिन्नतें की थी कमेसर की, तब जाकर हवेली के अहाते में काम मिला था उसको! सात की थी तब रनिया, अब चौदह की होने चली है। तब मालकिन के पैरों में तेल लगाना इकलौता काम था। अब प्रोमोशन हो गया है उसका। मालकिन की परछाईं बना दी गई है रनिया। पिछले कुछ हफ़्तों से मालकिन ने रनिया को भाभी जी को सौंप दिया है। अपनी तिजोरी की चाभी सौंपने से पहले अपनी सबसे विश्वासपात्र नौकरानी बहुओं को सौंपना इस ठाकुर निवास का दस्तूर हो शायद!
वैसे रनिया का एक घर भी है, जहाँ हर रोज़ देर शाम लौट जाती है वो। रनिया की माँ पाँच घरों में झाड़ू-पोंछे का काम करती है और बाप मटहरा चौक पर सब्ज़ियों की दुकान लगाता है। तीन बड़े भाई हैं और रनिया दो बहनों के बीच की है। सब काम पर लग गए हैं। वैसे माँ को सुबह-सुबह आने वाली उल्टियों के दौर से लगता है, अभी परिवार के सदस्यों की संख्या पर पूर्ण विराम नहीं लगने वाला।
माँ जैसा ही हाल यहाँ भाभी जी का है। अंतर बस इतना है कि आठ सालों के इंतज़ार के बाद भाभी जी पहली बार माँ बनने वाली हैं। पूरा परिवार जैसे उन्हें सिर-आँखों पर रखता है। वैसे ठाकुर निवास के नौ कमरों के मकान में रहने वाले लोग ही कितने हैं! दिन भर पूरे घर को अपने सिर पर उठाए रखने वाली एक मालकिन, ख़ूब ग़ुस्सा करने वाले एक मालिक और एक भैया जी, जो काम के सिलसिले में जाने किस नगरी-नगरी घूमा करते हैं! पाँच नौकरों और दो नौकरानियों की एक पलटन इन्हीं चार लोगों के लिए मुस्तैदी से तैनात रहती है।
रनिया भाभी जी के कमरे में पानी रख आई है। भाभी जी सो रही हैं। दरवाज़ा खुलने की आहट से भी नहीं उठतीं। दिन भर बिस्तर पर ही रहती हैं वो। शाम होते-होते छत पर चली आती हैं और छत पर तबतक बैठी रहती हैं जब तक शाम ढलकर रात में न बदल जाती हो और रनिया के घर लौटने का समय न हो जाता हो।
रनिया भाभी जी के आजू-बाजू परछाईं की तरह डोलती रहती है। लेकिन अपनी परछाईं से भला कौन बात करता है जो भाभी जी करेंगी? दोनों ने एक-दूसरे की ख़ामोशियों में सहजता ढूँढ़ ली है। एक को दूसरे के बोलने की कोई उम्मीद नहीं होती। एक उदास ख़ामोश आँखों से हुक़्म देती रहती है, दूसरी ख़ामोश तत्परता से उसका पालन करती रहती है। दोनों अपने-अपने रोल में एकदम सहज हो गए हैं।
इसलिए उस दिन अचानक भाभी जी ने चुप्पी तोड़ी तो रनिया भी चौंक गई।
बात पिछले बुधवार की ही तो है। मालकिन का आदेश था कि भाभी जी झुक नहीं पातीं, इसलिए रनिया उनके पैर साफ़ कर दें। नाख़ून काटकर पैरों में आलता भी लगा दे।
मालकिन के आदेशानुसार रनिया लोहे की बाल्टी में गर्म पानी ले आई थी। भाभी जी ने बिना कुछ कहे अपने पैर बाल्टी में डुबो दिए थे। रनिया भी बिना कुछ कहे गर्म पानी में डूबीं भाभी जी की गोरी एड़ियों की ओर देखती रही थी।
“क्या देख रही है रनिया?”, भाभी जी ने ही चुप्पी तोड़ी थी।
“आपके पाँव भाभीजी। कितने सुंदर हैं…” रनिया अपनी हैरानी छुपा न पाई थी। लेकिन ये न बोल पाई थी कि पाँव ही क्यों, भाभी जी आप ख़ुद भी तो कितनी सुंदर हैं! माँ नहीं कहती अकसर कि भैंस पर भी गोरे रंग का मुलम्मा चढ़ जाए तो लोग गाय की तरह पूजने लगें उसको! सब रंग का ही तो खेल है। और भाभी जी तो वाक़ई सुंदर हैं…
उस दिन पहली बार भाभी जी के चेहरे पर हँसी देखी थी रनिया ने, जेठ को औचक भिंगो देने वाली बारिश की तरह! हँसकर बोलीं, “हाथ की लकीरें हैं रनिया कि ये पाँव ऐसी जगह उतरे कि फूलों पर ही चले!”
फिर एक पल की चुप्पी के बाद बोलीं, “मुझे चलने के लिए इत्ती-सी फूलों की बगिया ही मिली है रनिया। तेरी तरह खुला आसमान नहीं मिला उड़ने को।”
किसी को अपनी ज़िंदगी मुकम्मल नहीं लगती। हर किसी को दूसरे का जिया ही बेहतर लगता है। रनिया को भाभी जी से रश्क होता है, भाभी जी रनिया का सोच कर हैरान होती हैं। कितना ही अच्छा होता कि ठाकुर निवास से निकल कर हर शाम कहीं और लौट सकतीं वो भी…
रनिया से उस दिन पहली बार भाभी जी ने अपने मन की बात कह डाली थी, और रनिया ने भाभी जी के इस अफ़सोस को अपने पड़ोस के कुँए में डाल आने का फ़ैसला कर लिया था मन-ही-मन।
कुछ बातें राज़ ही अच्छी। कुछ दर्द अनकहे ही भले।
उस दिन अपना काम ख़त्म करने के बाद घर आकर जब रनिया हाथ-पैर धोने के लिए कुँए के पास गई तो फिर भाभी जी के गोरे पाँवों का ख़्याल आया। हाथ की लकीरों का ही तो दोष रहा होगा कि उसे ये बिवाइयों से भरे कटी-फटी लकीरों वाले पाँव विरासत में मिले और भाभी जी को आलता लगे गोरे, सुंदर पाँव। फूलों की बग़िया और आसमान का वैसे भी कोई सीधा रिश्ता नहीं होता।
उधर भाभी जी का पेट गुब्बारे की तरह फूलता जा रहा है और इधर माँ का। दोनों के बीच रहकर रनिया का काम बढ़ता चला गया है। मालकिन तो भाभी जी को तिनका भी नहीं उठाने देतीं। भाभी जी का खाना भी बिस्तर तक पहुँचा दिया जाता है। रनिया को मालकिन ने सख़्त हिदायत दे रखी है कि भाभी जी बाथरूम में भी हों तो वो दरवाज़े के बाहर उनका इंतज़ार करती रहे।
ठाकुर निवास में पहली बार रनिया को इतने कम और इतने आसान काम मिले हैं। लेकिन भाभी जी की बोरियत देखते रहना, उनके साथ ख़ामोशी से रोज़-रोज़ दिन के कटते रहने का इंतज़ार करते रहना- इससे भारी काम रनिया ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं किया।
और माँ है कि उसके काम ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेते। माँ अभी भी उन पाँचों घरों में सफ़ाई का काम करने जाती है। इसलिए घर लौटकर रनिया और उसकी बहन चौके में जुट जाती हैं ताकि माँ को थोड़ा आराम मिल सके। कम-से-कम घर में रनिया के पास कुछ अदब के काम तो हैं!
थकी-माँदी लौटी माँ को जब रनिया आराम करने को कहती है तो माँ कहती है, “अरे घबरा मत। हमको तो आदत है ऐसे काम करने की।”
कभी-कभी बातों में भाभी जी का ज़िक्र भी चला आता है। “हम अपने हाथों में आराम की लकीरें लेकर पैदा नहीं हुए रनिया। तेरी भाभी जी सी किस्मत नहीं है मेरी कि नौ महीने बिस्तर तोड़ सकें। और वो भी कितनी बार? तेरी भाभी जी की तरह जप-तप की औलाद थोड़े है ये,” माँ अपने फूले हुए पेट की ओर इशारा करती है और वापस रोटियाँ बेलने में जुट जाती है।
हाथ की लकीरें शायद पेट से ही बनकर आती हैं, रनिया सोचती है। जप-तप वाली लकीरें। यूँ ही बन जाने वाली कटी-फटी बेमतलब की लकीरें।
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10-05-2020, 12:43 PM,
#13
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
भाभी जी के लिए शहर के सबसे बड़े डॉक्टर के अस्पताल में कमरा किराये पर ले लिया गया है। आठवें महीने में ही उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है और रनिया की ड्यूटी अब अस्पताल में लगा दी गई है।
जाने कौन-सा डर है मालकिन को कि सारा दिन पूजा-पाठ और मन्नतें माँगने में निकाल देती हैं और शाम को भाभी जी के पास प्रसाद का पूरा टोकरा लेकर चली आती हैं! अब किसी पर चीखती-चिल्लाती भी नहीं वो। क्या जाने कौन से रूप में विराजमान ईश्वर नाराज़ हो जाए? क्या जाने कब किसमें दुर्वासा ऋषि समा जाए? पूजा-पाठ के पुन्न-परताप से पोता हो जाए, इसके लिए शक्कर-सिंदूर के साथ हनुमान जी के सामने इक्यावन मंगलवारों का निर्जल व्रत भी क़बूल आई हैं।
बच्चा होना इतनी बड़ी बात तो नहीं, रनिया सोचती है अक्सर! उसकी माँ के तो हर साल एक हो जाता है।
भैया जी काम से छुट्‌टी लेकर घर लौट आए हैं। वो भी पूरे दिन भाभीजी के सिरहाने बैठे रहते हैं।
रनिया ने दोनों को अपने माँ-बाप की तरह कभी लड़ते नहीं देखा, ख़ूब बातें करते भी नहीं देखा। दोनों एक कमरे में रहकर भी कितने दूर-दूर लगते हैं। कुछ भी हो, लड़-झगड़कर ही सही, माँ-बाबू बच्चे तो पैदा कर रहे हैं न हर साल!
एक शाम रनिया अस्पताल से घर लौटती है तो माँ का अजीब-सा खिंचा हुआ चेहरा देखकर डर जाती है। रनिया की बड़ी बहन सरिता बग़ल से मुनिया की दादी को बुलाने गई है।
माँ का चेहरा दर्द से काला पड़ता जा रहा है। रनिया समझ नहीं पाती कि भागकर बाहर से किसी को बुला लाए या माँ के बग़ल में बैठी उसे ढाँढस बँधाती रहे। इससे पहले कभी उसने बच्चा होते देखा भी नहीं। हाँ, दीदियों से कुछ ऊटपटांग क़िस्से ज़रूर सुने हैं।
रनिया माँ की दाहिनी हथेली अपनी मुट्ठियों में दबा लेती है। साहस देने का और कोई तरीक़ा रनिया को आता ही नहीं।
माँ बेहोशी के आलम में कुछ-कुछ बड़बड़ाती जा रही है।
“संदूक में नीचे धुली हुई धोती है, निकाल ला… छोटे वाले पतीले में ही गर्म पानी करके देना… तेरा बाबू नहीं लौटा क्या… सरिता कहाँ मर गई, अभी तक लौटी क्यों नहीं…”
पता नहीं कितने मिनटों और कितनी चीखों के बाद पीछे से उसकी बहन सरिता मुनिया की दादी और पड़ोस की दुलारी काकी को लेकर आती है। औरतों ने दोनों लड़कियों को कमरे से बाहर निकाल दिया है और ख़ुद माँ को संभालने में लग गई हैं।
बाहर बैठी रनिया कुछ देर तो अंदर की अजीब-अजीब आवाज़ें सुनती रही है और फिर जाने कब आदतन ऊँघते-ऊँघते वहीं दरवाज़े के पास लुढ़क जाती है।
माँ के पेट से सँपोला निकला है जो उसकी छाती से चिपका सब की ओर देखकर ज़हरीली फुफकारी मार रहा है। रनिया के हाथ में छोटी-सी छड़ी है, सोने की। रनिया अपनी सुनहरी छड़ी पर साँप का ख़ून नहीं लगाना चाहती। बाबू उसकी चोटी खींच रहा है, “हाथ उठाती क्यों नहीं? कैसी पागल है तू रनिया…”
दुलारी काकी रनिया की चोटी खींच-खींचकर उसे जगा रही है।
“कितना सोती है रे तू रनिया। कुंभकरन की सगी बहन है तू तो। एक घंटे से चिल्लाकर उठा रहे हैं। चल अंदर जा। भाई हुआ है तेरा। खूब सुंदर है, माथे पर काले-काले बाल और रंग तो एकदम लाट साब वाला… भक्क-भक्क सफेद। अरे समझ में नहीं आ रहा क्या बोल रहे हैं? ऐसे क्यों देख रही है? जा, अंदर जा। माँ का ख्याल रख, समझी?”
हक्की-बक्की रनिया उठकर भीतर चली आई है। बच्चा पैदा कर देने के बाद माँ इत्मीनान और थकान की नींद सो रही है और उसकी बग़ल में सफ़ेद धोती में लिपटा उसका भाई गोल-गोल आँखें किए टुकुर-टुकुर ताक रहा है। रनिया झुककर उसे देखती रहती है और फिर उसी की बग़ल में लेट जाती है। साँप और सोने की लाठी वाला सपना कहीं गुम हो जाता है।
रनिया की नींद देर से खुलती है। माँ तब तक वापस चौके में आ चुकी है और चूल्हा जला रही है। रनिया का नया भाई सो रहा है, बाबू काम पर जाने के लिए सब्ज़ी की टोकरियाँ निकाल रहा है और उसकी बड़ी बहन सरिता छोटकी को गोद में लिए दरवाज़े पर झाड़ू दे रही है।
जल्दी-जल्दी हाथ-मुँह धोकर रनिया भाभी जी के पास अस्पताल की ओर भाग जाती है। डेढ़ महीने हो गए हैं भाभीजी को अस्पताल में! ये डॉक्टर भी कैसा पागल है! माँ को बच्चा जनते देखकर तो डॉक्टर के पागल होने का शक और पुख़्ता हो गया है।
भाभीजी बीमार थोड़े हैं, बच्चा ही तो होना है उनको। फिर ये ताम-झाम क्यों?
फिर एक दिन अस्पताल के दरवाज़े पर कमेसर काका रोक लेते हैं उसको। काका का चेहरा सूखा हुआ, आँखें लाल। रनिया को देखकर बोल पड़ते हैं, “घर जा रनिया। तेरी जरूरत नहीं अब भाभी जी को।”
रनिया हैरान उन्हें देखती रहती है और फिर बिना कुछ कहे भाभी जी के कमरे की ओर बढ़ जाती है। रनिया सोचती है कि भाभी जी के डॉक्टर के साथ-साथ भैया जी के ड्राईवर कमेसर काका भी पागल हो गए हैं शायद!
भाभी जी के कमरे के बाहर सन्नाटा है। अंदर वे लेटी हुई हैं, बिना पेट के। भैया जी गलियारे में डॉक्टर साहब से कुछ बात कर रहे हैं और मालकिन बग़ल में कुर्सी पर आँखें बंद किए बैठी हैं। कोई रनिया की ओर नहीं देखता। कोई रनिया से ये नहीं पूछता कि उसे आने में इतनी देर क्यों हो गई।
पीछे से कमेसर काका उसका हाथ पकड़कर नीचे खींच ले जाते हैं। “लेकिन हुआ क्या है काका? भाभीजी तो कमरे में सो रही हैं। फिर सब इतने परेशान क्यों हैं? और उनको बेटी हुई या बेटा? मैंने पेट देखा उनका…”
“भाभीजी के पेट से मरा हुआ बच्चा निकला रनिया। इतने दिन से इसी मरे हुए बच्चे की सेवा कर रही थी तू। बेचारी… कैसी किस्मत लेकर आई है ये बहू।”
स्तब्ध खड़ी रनिया कमेसर काका के शब्दों के अर्थ टटोलने लगती है।
“मरा हुआ बच्चा पेट से थोड़ी निकलता है किसी के? ये कमेसर काका न कुछ भी बकते हैं। माँ के पेट से तो किन्ना सुंदर भाई निकला उसका। भाभी जी से ही पूछेंगे बाद में। अभी तो ये बुढ्ढा हमको अंदर जाने भी नहीं देगा,” ये सोचकर रनिया धीरे से अस्पताल से बाहर निकल आई है।
दोपहर को जब कमेसर काका भैया जी और मालकिन को लेकर घर की ओर निकलते हैं तो रनिया सीढ़ियाँ फाँदती-कूदती भागती हुई भाभीजी के कमरे में जा पहुँचती है।
रनिया को देखकर भाभी जी ठंडे स्वर में कहती हैं, “जा रनिया। मुझे तेरी ज़रूरत नहीं। मुझे तो अपनी भी ज़रूरत नहीं।”
रनिया घर लौट आई है। किसी से कुछ नहीं कहती, बस अपने नवजात भाई को गोद में लिए बैठी रहती है।
बैठे-बैठे ऊँघती हुई रनिया सपने में लाल सितारोंवाली साड़ी में भाभीजी को देखती है और उनकी गोद में देखती है सफ़ेद कपड़े में लिपटा बेजान बच्चा। उसके भाई की गोल-गोल काजल लगी आँखें, माँ का बढ़ा हुआ पेट, भाभी जी के आलता लगे पाँव, ख़ून-सी लाल फूलों की क्यारियाँ, हाथों की कटी-फटी उलझी हुई लकीरें… नींद में सब गड्ड-मड्ड हो गए हैं।
प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब
“तू रोज़ इधर ही सोता है?”
ये पहला सवाल तो नहीं हो सकता जो कोई किसी से पूछता हो।
लेकिन ये मुंबई है और यहाँ इतना वक़्त नहीं किसी के पास कि लंबी-चौड़ी भूमिका के साथ कोई बातचीत शुरू की जाए। इसलिए मुंबई में कोई भी सवाल पहला सवाल हो सकता है। और आख़िरी भी।
बहरहाल, सवाल पूछने के बाद स्टूडियो के रिसेप्शन पर कोने में लगे लाल रंग के सोफ़े पर क़रीब-क़रीब पसरती हुई रोहिणी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, बिना जवाब का इंतज़ार किए। रोहित को सूझा नहीं कि क्या कहे। तंग जीन्स और आधी कटी बाजू वाली टॉप से झाँकती रोहिणी की उम्र की ओर ठीक से ताका भी नहीं जा रहा था। वो पैंतीस की भी हो सकती थी और पच्चीस की भी। उम्र का कपड़ों से कोई लेना-देना नहीं होता। दरअसल उम्र का रंग-रूप, फ़ितरत, आदत… किसी से भी कोई लेना-देना नहीं होता।
ऐसी कच्ची-पक्की बातें अब समझ में आ रही हैं रोहित को, मुंबई में रहते हुए।
बॉस ने रोहित को नाइट शिफ़्ट लगाने की हिदायत दी थी, मंगल-बुध की डबल छुट्‌टी के वादे के साथ। बॉस का छुट्‌टी के नाम पर किया हुआ वायदा महबूब के वायदे से कम ख़तरनाक नहीं होता। पूरा न हो तो मुश्किल, पूरा हो तो क़यामत।
ख़ैर बॉस का वायदा पूरा नहीं ही होना था और इसमें रोहित को ज़्यादा नुक़सान दिखता भी नहीं था। स्टूडियो में रुके रहने का कोई भी मौक़ा वो खोना नहीं चाहता। एक तो जुलाई की उमस भरी गर्मी से निजात और दूसरा, नाइट शिफ़्ट की आदत तो उसे पड़नी ही चाहिए। दो साल में एसिस्टेंट एडिटर बन जाना है और पाँच साल में एडिटर। बिना दिन-रात स्टूडियो में मेहनत किए ये मुमकिन न था।
“तू जाग रहा है अब तक?” रोहिणी फिर जाग गई थी। “मेरा एडिटर तो सो गया रे। अपन के पास कोई काम भी नहीं। चल लोखंडवाला क्रॉसिंग से सिगरेट की डिब्बी लेकर आते हैं।”
रोहित की नज़रें अपने आप दूर दीवार पर टिक-टिक करती चौकोर घड़ी की ओर घूम गईं।
“नया है क्या इधर? जानता नहीं, इधर रात नहीं होती? तेरे को डर लगता है तो मैं लेकर आती है। तू इधर ही बैठ, डरपोक कहीं का। मेरा एडिटर उठ जाए तो उसको बोलना मैं पंद्रह मिनट में आएगी।”
“नहीं मैम, मैं चलता हूँ न साथ में। आप अकेले ऐसे कैसे जाएँगी?”
“तू कोई सलमान ख़ान है जो मेरा बॉडीगार्ड बनेगा?”
“नहीं मैम। मैं तो बस…”
“कुछ खाया कि ऐसे ही पड़ा है इधर? ढाई बज रहे हैं। भूख लगी हो तो नीचे वड़ा-पाव भी मिलेगा।”
“खाया मैम।”
“ऊपर जाकर उस घोड़े को बोलकर आ, हम दस मिनट में लौटेंगे। ये फालतू में नाइट लगाते हैं हम। काम तो होता नहीं कुछ, स्साली नींद की भी वाट लगती है।”
“जी।”
“तू क्या सीधा लखनऊ से आया इधर? ऐसे बात करेगा तो इधर सब तेरा कीमा बनाकर डीप फ्रीजर में डाल देंगे और टाइम-टाइम पर स्वाद ले-लेकर खाएँगे। चल अब, बोलकर आ ऊपर। फिर हम तफ़री मारकर आते हैं थोड़ी।” रोहिणी फिर सोफ़े पर लुढ़क गई थी।
सीढ़ियों से चढ़ते हुए उसने रोहिणी की ओर एक बार और चोर नज़रें फेंकी, इतनी रात गए वाक़ई ये बाहर जाएगी?
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10-05-2020, 12:43 PM,
#14
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
ऊपर एडिट सुईट में एडिटर अस्तबल के सारे घोड़े बेचने में लगा था। बोलियाँ इतनी तेज़ लग रही थीं कि खर्राटों की आवाज़ साउंडप्रूफ रूम के बाहर तक सुनाई दे। एफसीपी पर टाइमलाइन सुस्त लेटी पड़ी थी, जैसे उसे भी सिंकारा की ज़रूरत हो… या फिर शायद स्मोक की।
ये फ़िल्म स्मोक पर जाएगी, ऐसा बॉस कल ही बोल रहे थे। ज़रूरत भी है। पहला ही शॉट कितना डल है! रोहित को अचानक पहले शॉट में कमरे से दनदनाता हुआ निकलता हीरो याद आ गया था। कोई इनोवेशन नहीं, न शॉट में न एडिट में…
रोहित ने टाइमलाइन को प्ले करके देखा। अभी तो चार सीन भी एडिट नहीं हुए थे कल के बाद। ये नाइट लगाकर करते क्या हैं आख़िर? इतना टाइम एक सीन एडिट करने में लगता है?
शॉट्स की बेतरतीबी देखकर वो कुछ देर उन्हें क़रीने से सजाने के लिए मचलता रहा, फिर किसी के काम में दख़लअंदाज़ी न करने की बॉस की हिदायत को याद करके वापस एक किनारे खड़ा हो गया।
देर तक खड़े रहने के बाद भी वो तय नहीं कर पाया कि एडिटर को जगाए या वापस लौट जाए। वैसे स्टूडियो की चाभी निकाल कर बाहर से लॉक करने का भी एक विकल्प था। जो एडिटर उठ भी गया तो रोहिणी को फ़ोन तो करेगा ही। वैसे उसकी नींद देखकर लगता नहीं था कि अगले दो घंटे गहरे शोर वाली साँसें निकालने और भीतर लेने के अलावा उसका बदन कोई और हरकत भी करता। जो यमराज भी आते तो डरकर लौट जाते।
स्टूडियो को बंद करके रोहित रोहिणी के पीछे-पीछे चलता रहा। एक तो सिगरेट के धुँए से परेशानी होती, फिर उसके साथ चलते हुए बातचीत करने की अतिरिक्त सज़ा कौन भुगतता?
चौथे माले से सीढ़ियों से उतरकर दोनों लोखंडवाला क्रॉसिंग की ओर मुड़ते, उससे पहले रोहिणी सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठ गई। रोहित खड़ा रहा और उसके शरीर की हरकतों को अनिश्चित आँखों से पढ़ता रहा।
पहले रोहिणी ने दाहिने हाथ से बाईं ओर का स्लीव खींचकर कंधे तक चढ़ाया, फिर बाएँ हथेली में रखे सिगरेट के डिब्बे को देर तक देखती रही। दाहिने हाथ की उँगलियों से एक सिगरेट निकाला, डिब्बे पर उसे तीन बार ठोंका, जीन्स की जेब में हाथ डालकर लाइटर निकाली और एक गहरे कश के साथ सिगरेट जलाकर वापस बैठ गई…
सिगरेट के गहरे कश लेती हुई। किसी गहरे ख़्याल में डूबी हुई।
“तू कहाँ से आया रे इधर?” रोहिणी के अप्रत्याशित सवाल से रोहित की तंद्रा टूटी और वो घबराकर वापस सड़क की ओर देखने लगा।
“मैं पूछ रही हूँ कि तू आया किधर से। बंबई का तो नहीं लगता।”
“जी, इलाहाबाद से।”
“भागकर आया?”
“जी? जी नहीं।”
“फिर लड़कर आया होगा।”
रोहित ने नज़रें झुका ली।
“अरे इसमें गिल्टी फील करने का क्या है। बंबई भागकर आओ तभी लाइफ़ बनती है इधर। सिगरेट पिएगा?”
रोहित ने सिर हिलाकर मना कर दिया। कोई लत लगे, इसके लिए चंद लम्हे बहुत होते हैं। ख़ुद को बुरी आदतों से बचाया रखा जा सके, इसके लिए पूरी ज़िंदगी भी कम पड़ जाती है।
“मैं भी भागकर आई। ज़्यादा दूर से नहीं। इधर ही, रतलाम से। वेस्टर्न रेलवे की सीधी ट्रेन आती थी इधर। आई थी हीरोइन बनने, और देख क्या बन गई।”
“वैसे दीदी, आप करती क्या हैं?”
“तूने तो दस मिनट में रिश्ता भी बना लिया। बड़ी तेज़ चीज़ है। ख़ाली रिश्ते ग़लत बनाता है,” रोहिणी की बात सुनकर रोहित झेंप गया और दो क़दम पीछे हटकर वापस सड़क किनारे पेट्रोल पंप पर खड़ी गाड़ियों के मॉडल पहचानने की कोशिश करने लगा।
“गर्लफ़्रेंड है?”
“जी?”
“गर्लफ़्रेंड? उधर इलाहाबाद में?”
“जी। है।”
“गुड। जीने की वजह है तेरे पास फिर तो। क्या पूछा तूने, क्या करती हूँ? पूछ क्या नहीं करती।”
“जी?”
“सब स्साले कंगना रनाउत की क़िस्मत लेकर थोड़े आते हैं इधर? मैं देखने में कैसी लगती हूँ रे?”
“जी?”
“जी…एच… आई… जे… के… अंग्रेज़ी इतनी ही आती है तुझको?”
“जी नहीं। जी, मतलब… इससे ज़्यादा आती है।”
“तो अंग्रेज़ी में बोल, कैसी दिखती हूँ मैं?”
“जी, ब्यूटीफुल।”
“बस? दो-चार वर्ड और गिरा मार्केट में।”
“प्रीटी… अम्म… लवली… अम्म…”
“अबे, सेक्सी बोल सेक्सी। शर्म आती है बोलने में? बोल, सेक्सी दिखती हूँ, बॉम टाइप।”
“जी, वही।”
“तेरा कुछ नहीं हो सकता। गर्लफ़्रेंड को कैसे पटाया रे?”
“वो तो अपने आप प्यार हो गया,” लतिका का सोचकर रोहित अपने आप मुस्कुराने लगता था।
रोहिणी के ठहाके ने उसे फिर एक बार लिंक रोड की सख़्त सड़क पर पटक दिया।
“नया मुर्गा है। तेरे हलाल होने में टाइम लगेगा अभी। एनीवे, मैं इधर हीरोइन बनने को आई लेकिन अब जो करा ले, सब करती हूँ। प्री प्रोडक्शन, पोस्ट प्रोडक्शन, प्रोडक्शन कंट्रोल और ज़रूरत पड़ी तो कास्टिंग काउच की सेटिंग भी। ये प्रोडक्शन वालों ने इतना बेवक़ूफ़ बनाया कि सोच लिया, प्रोडक्शन करूँगी और सबकी माँ-बहन करूँगी। अब पूरा बदला लेती हूँ। तू मेरी गालियों से डरता तो नहीं?”
“जी नहीं। हमारे यहाँ भी बोलते हैं लोग ये सब। हमारे घर में अच्छा नहीं मानते।”
“मेरे यहाँ भी नहीं मानते थे। घर छोड़ा तो तमीज़ भी छोड़ आई। तू भी स्साला सुधर जाएगा। चल अभी, तेरे को बरिस्ता में कॉफ़ी पिलाती है।”
“जी, मैं कॉफ़ी नहीं पीता।”
“तो ज़िंदगी में करता क्या है, प्यार करने के अलावा?”
“एडिटिंग सीख रहा हूँ।”
“सीख ले। फिर बताना। काम दिलाऊँगी तेरे को। बिना किसी फेवर के। तू अच्छा लगा मुझे।”
“अभी तो टाइम लगेगा। बेसिक्स पर हाथ साफ़ कर रहा हूँ।”
“कॉन्फिडेंस से बोल, सब कर लूँगा। तब काम मिलेगा। मेरे एडिटर को नहीं देखा? स्साला एक शॉट अपनी अक्ल से नहीं लगाता। छोड़ दो तो दो शिफ़्ट की एडिट में पंद्रह दिन लगाएगा। माथे पर चढ़कर काम कराती हूँ। कमबख़्त शक्ल अच्छी है उसकी, वरना रात में नींद ख़राब करने का कोई और मतलब ही नहीं बनता था।”
“जी?”
“जी क्या? नहीं जानता वो मेरा नया बॉयफ़्रेंड है? प्रोडक्शनवालों को एडिट पर बैठे देखा कभी? तुझे वाक़ई टाइम लगेगा। तेरे तो बेसिक्स भी क्लियर नहीं रे।”
बॉयफ़्रेंड की बात सुनकर रोहित के कानों में दमदार खर्राटों की आवाज़ लौट आई थी। वो अब ऐसे गहरे सदमे में था कि उसकी ज़ुबान तालू से चिपक गई थी शायद और उसकी आँखों के आगे एडिट सुईट के बाहर कल रात लटकता ‘प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब’ का बोर्ड झूल गया था।
जिस बेफ़िक्री से कल रात बोर्ड टाँग दी गई होगी एडिट सुईट के बाहर, उतनी ही बेफ़िक्री से रोहिणी अपनी तीसरी सिगरेट फूँकने में लगी थी अभी।
सहयात्री
मुझे वड़नेरा स्टेशन से ट्रेन में चढ़ना था। अहमदाबाद जाने के लिए यही ट्रेन ठीक थी। पुरी-अहमदाबाद एक्सप्रेस। सुबह सात बजे तक पहुँच ही जाऊँगा, दिनभर काम करके शाम की राजधानी लेकर दिल्ली पहुँच जाना मुमकिन हो सकेगा।
मैं एक डॉक्युमेंट्री फ़िल्म की शूटिंग के लिए अमरावती आया था। साथ में था कैमरा- डीएसआर 450। हम जैसे कैमरामैनों के लिए वरदान। ज्यादा भारी भी नहीं और शूट क्वालिटी डीजी बीटा जैसी। मेरे साथ मेरा असिस्टेंट था, विजय।
वड़नेरा स्टेशन पर ट्रेन दो ही मिनट रुकती है, इसलिए विजय को मॉनिटर और ट्राईपॉड की ज़िम्मेदारी सौंप मैं दस मिनट पहले ही बोगी के इंतज़ार में खड़ा हो गया। विजय बैठना चाहता था लेकिन यहाँ कैमरामैन यानी बॉस मैं था। पीठ पर बैगपैक। कंधे पर लटकता कैमरा। दोनों हाथों में पानी की बोतलें और बिस्कुट के पैकेट। बग़ल में एक अख़बार भी दबा लिया था मैंने। यानी हाथ भी खाली नहीं, दिमाग़ पर तो ख़ैर बोझ लिए चलते रहने की पुरानी आदत है मेरी।
लेकिन विजय पूरी तरह सफ़र का आनंद उठाने के मूड में था।
“ट्रेन आने में अभी देर है सर। चाय पिएँ क्या?” बिना मेरे जवाब का इंतज़ार किए वो सामान मेरी बग़ल में रख चाय की स्टॉल के पास चला गया।
जाने क्यों मेरा मन कहीं बैठने को नहीं कर रहा था। एक तो लोहे की कुर्सियाँ दूर थीं और ये जगह बिल्कुल सही थी मेरे लिए। बोगी यहीं आनी थी और फिर यहाँ से प्लेटफॉर्म पर लगा टीवी स्क्रीन नज़र आ रहा था जिसमें चित्रहार टाइप के गाने आ रहे थे। पहले संजीव कुमार-शबाना आज़मी का एक गाना और अब मॉनीटर पर ज़ीनत अमान और अमिताभ बच्चन लिपटे खड़े थे। गाने के बोल मुझे यहाँ तक सुनाई नहीं दे रहे थे लेकिन स्क्रीन पर चलते गानों को देखकर आदतन दिमाग़ में भी एक के बाद एक गाने गूँज रहे थे।
यहाँ से हिलने का मतलब था सामान को फिर से रखने और उठाने की मशक़्क़त और टीवी पर चल रहे थोड़े-से मनोरंजन से हाथ धोना।
विजय चाय ले आया था और चाय के साथ कुछ प्याज़ के पकौड़े भी। अगर प्लेटफॉर्म की ओर आते हुए मैंने स्टॉल पर सजे पकौड़ों पर मक्खियाँ भिनभिनाते नहीं देखा होता तो शायद पकौड़ों से भरा दोना विजय के हाथ से ले लिया होता। लेकिन फ़िलहाल मैंने अपने हाथ के बिस्कुट और पानी की बोतल बैग में घुसाकर सिर्फ़ चाय उसके हाथ से ले ली।
ट्रेन के लिए अनाउंसमेंट हो चुका था। एसी टू के डिब्बे में यहाँ से चढ़ने वाले हम दो ही यात्री थे। वैसे भी इस भीषण गर्मी में भला कौन सफ़र करता होगा!
ट्रेन आई। एसी टू के पहले कंपार्टमेंट में पहली सीट 1 नंबर। विजय को 38 नंबर सीट अलॉट हुई थी। लंबी दूरी की ट्रेनों पर किसी छोटे-से स्टेशन पर चढ़ने के कई नुक़सान हैं। पहला, आपको सीट मनपसंद मिल ही नहीं सकती। दूसरा अपनी-अपनी सीटों पर पसरे दूर से आ रहे सहयात्रियों और उनके भारी-भरकम बक्सों के बीच अपना सामान घुसाना नामुमिकन और तीसरा, गंदे टॉयलेट।
तीसरे नुक़सान का ख़्याल आते ही दिमाग़ भन्नाया। यहाँ तो नीचे की दोनों सीटों पर लोग यूँ भी पहले से कब्ज़ा जमाए थे। ट्रेन में चढ़ते-न-चढ़ते छोटे स्टेशन पर चढ़ने के तीनों नुक़सानों से सामना हो गया था।
सफ़ेद चादर के पीछे से एक उम्रदराज़ चेहरा निकला, ऐसा कि जैसे पचहत्तर के बाद शरीर और दिमाग़, दोनों ने उम्र की रस्सी पर साल की गिरहें लगाना बंद कर दिया हो। झुर्रियों के बीच से बिना दाँतों वाले अंकल मुस्कुराए, “ऊपर तो नहीं जा सकूँगा। आप सीट बदल लेंगे क्या?”
दाँत न होने की वजह से उनकी बात उनके बोलने से कम, उनके हाथ के इशारों से ज़्यादा समझ में आई। दूसरी तरफ़ नीचे वाली सीट पर लेटी महिला ने न किताब से सिर उठाना ज़रूरी समझा, न सीट के नीचे बिखरी अपनी चप्पलों, झोलों, न्यूज़पेपर के टुकड़ों और खाने की प्लेट के बीच से मेरे लिए जगह बनाने की ज़हमत उठाना ही।
अभी तक मैं कैमरे को कंधे पर लिए-लिए ही खड़ा था, बिल्कुल उसी मुद्रा में जैसे प्लेटफॉर्म से ट्रेन पर सवार हुआ था। पीठ पर बस्ता। कंधे पर लटकता कैमरा। दोनों हाथों में पानी की बोतलें और बिस्कुट के पैकेट।
“सीट तो मैं बदल लूँगा लेकिन आप इन मोहतरमा को मेरे लिए जगह बनाने को क्यों नहीं कहते?” मैंने झल्लाते हुए कहा।
“हम साथ नहीं हैं।” किताब के पीछे से ठंडी-सी आवाज़ सुनाई दी, लेकिन अभी भी उन्होंने उठकर सामान समेटने की कोई कोशिश नहीं की।
अब मेरे तेवर में पूरी गर्मी आ चुकी थी। मैंने अपने पैरों से ही उनकी चप्पलें और जूठी प्लेट को ज़ोर से मारकर डिब्बे के गलियारे में कर दिया। मैडम का पढ़ना अब भी बंद न हुआ, न ही मेरी ठोकर की उन्होंने कोई परवाह की। कंबल के नीचे से पैरों में एक हल्की-सी हरकत हुई बस। लेकिन आँखें किताब पर ही थीं। मैं भी किताब का नाम देख चुका था अब तक- ‘प्रेमाश्रम’।
अब मैंने चिढ़कर सीट के नीचे से सामान खींचना शुरू किया। लेकिन खींचता भी कैसे? सामान लोहे की कड़ियों से बँधे थे।
“आप अपना सामान समेटेंगी या मैं ट्रेन से बाहर कर दूँ इनको?”
इतने ख़राब लहज़े में बात करने के बावजूद वो महिला अपनी जगह से नहीं उठी। उलटा घूमकर जवाब दे दिया।
“ऐसे कैसे बाहर कर देंगे आप? दूसरी सीट के नीचे इतनी जगह पड़ी है, वो नहीं दिखती?”
“नहीं दिखती। सिर्फ़ बदतमीज़ी दिखती है। शाम के साढ़े पाँच बज रहे हैं। ये कोई वक़्त है लेटे रहने का? आपसे इतना भी न हुआ कि पैर समेटकर साथ वाले मुसाफ़िर के लिए जगह बना दें? और अंकल आप। हाँ, हैलो। अंकल मैं आपसे बात कर रहा हूँ। बेशक नीचे वाली सीट ले लीजिए। लेकिन अगले तीन घंटे के लिए मुझे बैठने की जगह तो दीजिए।” बुज़ुर्ग सज्जन हड़बड़ा के उठ गए।
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10-05-2020, 12:44 PM,
#15
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
मैंने पानी की बोतलें और बिस्कुट के पैकेट सीट पर इतनी ज़ोर से फेंका कि पैकेट के भीतर से ही बिस्कुट के टूटने की आवाज़ सुनाई दी। करीब-करीब इसी गुस्से में मैं सीट पर पसरी महिला को डिब्बे के बाहर फेंक देना चाहता था। लेकिन मेरी झल्लाहट का उनपर कोई असर नहीं हुआ और वो वैसे ही लेटे-लेटे किताब पढ़ती रहीं। मैंने भी अपना चेहरा अख़बार के पीछे छुपा लिया लेकिन मेरे दिमाग़ की बड़बड़ाहट कम न हुई।
“जाने क्या समझते हैं ऐसे लोग अपने आपको! एक सीट रिज़र्व करते हैं और पूरी ट्रेन को अपने बाप की जागीर समझ लेते हैं। सिविक सेन्स तो है ही नहीं। जहाँ खाया वहीं फेंक दिया। यहाँ भी इनके लिए नौकर आए चप्पलें और सामान समेटने। पढ़ेंगे ‘प्रेमाश्रम’ और समझेंगे ख़ुद को भारी इन्टेलेक्चुअल। प्रेमचंद को ही पढ़ना है तो ‘गोदान’ पढ़ो, ‘गबन’ पढ़ो, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ पढ़ो। उनकी कहानियाँ पढ़ो। लेकिन पढ़ने चले हैं ‘प्रेमाश्रम’। कुछ और मिला ही न होगा स्टेशन के बुक स्टॉल पर। मिला होगा लेकिन समझ में ही न आया होगा। प्रेमचंद का नाम देखकर महारानी जी ने किताब उठा ली होगी बस और क्या,” मन-ही-मन मेरा भुनभुनाना जारी रहा।
“थेपला खाओगे?” बिना दाँतों वाले अंकल ने अचानक पूछा और मैंने हड़बड़ाते हुए न चाहते हुए भी उनके खाने के डिब्बे से एक टुकड़ा निकाल लिया।
मेरा थेपला उठाना ही मेरे लिए भारी पड़ गया। अंकल तो जैसे मौक़े की ताक में बैठे थे। छूटते ही उन्होंने बातों का पिटारा खोल दिया।
“मेरा नाम जेपी घोघारी है, जयप्रकाश घोघारी। यवतमाल का हूँ और अहमदाबाद जा रहा हूँ, बेटे और बहू के पास। मैं गुजराती हूँ लेकिन हमलोग तकरीबन सौ सालों से यवतमाल में ही रह रहे हैं। आप कहाँ के हैं बेटा?”
“मैं ओडिशा का हूँ।” मेरा जवाब संक्षिप्त था। ज़्यादा बोलने का मतलब था उनसे बातचीत को बढ़ावा देना, जो मैं बिल्कुल नहीं चाहता था।
“ओडिशा के? कहीं आप दूसरी ओर की ट्रेन में तो नहीं बैठ गए? ये ट्रेन पुरी से अहमदाबाद जा रही है, अहमदाबाद से पुरी नहीं।”
“जानता हूँ।” मैंने खीझते हुए कहा, “मैं अहमदाबाद ही जा रहा हूँ।”
“अच्छा अच्छा। यही तो ख़ासियत है हमारे देश की। हम वाशिंदे कहीं के होते हैं, बसते कहीं जाकर हैं। अमरीकियों की तरह नहीं होते जहाँ ईस्ट कोस्ट के लोगों ने वेस्ट कोस्ट देखा भी नहीं होगा। अब मुझे ही देख लीजिए। मैं गुजरात का। पला-बढ़ा महाराष्ट्र में। पूरी ज़िंदगी नौकरी की दिल्ली में और अब रिटायरमेंट के बाद नागपुर में रह रहा हूँ, अपने बड़े बेटे के पास। अभी छोटे बेटे के पास जा रहा हूँ, अहमदाबाद।”
मैंने क़रीब-क़रीब टालने वाले लहज़े में सिर हिलाकर कहा, “अच्छा।”
लेकिन घोघारी साहब का घों-घों करते हुए बोलना कम नहीं हुआ।
“मैं स्वतंत्रता सेनानियों और समाज सुधारकों के परिवार से हूँ। हमारे जैसा गुजराती परिवार न देखा होगा आपने। महाराष्ट्र में रखकर हमने मराठी संस्कृति को अपनाने में कोई कोताही नहीं बरती। आप गोपालकृष्ण गोखले को जानते हैं?”
“जी, जानता हूँ। इतिहास में पढ़ा है उनके बारे में।” मैं अबतक नहीं समझ पाया था कि मैं क्यों उनकी बक-बक न सिर्फ़ सुन रहा था बल्कि उन्हें बोलने के मौक़े भी दे रहा था।
मुझे अपने बैग में रखी किताबें याद आ रही थीं। कितना कुछ था पढ़ने के लिए, विलियम डैलरिम्पिल, मार्केज़ और एक नाजीरियन लेखिका जिनका नाम याद नहीं आ रहा था अभी।
“पढ़ा होगा। ज़रूर पढ़ा होगा। महान हस्ती थे गोखले। मेरे दादाजी के बहुत क़रीबी दोस्त। जानते हो मेरे दादाजी यवतमाल मिडल स्कूल के प्रिंसिपल थे। जब सन् 1915 में गोखले मरे तो उन्होंने अपने स्कूल में एक शोक-सभा आयोजित की। फिर क्या था, अंग्रेज़ों ने उन्हें नौकरी से निकालकर जेल में डाल दिया।”
“हम्म।” अचानक मुझे उसे नाइजीरियन लेखिका का नाम याद आ गया। अदीची, चिदामामन्दा गोज़ी अदिची। जाने नाम भी सही समझा था मैंने या ग़लत लेकिन इस लेखिका की फ़ेमिनिस्ट राइटिंग मेरे जैसे अक्खड़ आदमी के मन में भी हलचल पैदा करती थी। किताब निकालने के लिए मैंने अपने बैग की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि घोघारी अंकल ने मुझे बीच में रोक दिया।
“अरे! बैठो न बेटा। जानते हो, कहते हैं कि गोखले जी स्ट्रेस से मरे थे। तनाव से। बड़ी कम उम्र में ही मौत हो गई थी उनकी, 49 साल भी कोई उम्र होती है मरने की!”
“उस ज़माने में, आज से सौ साल पहले भी लोग स्ट्रेस से मरते थे? नहीं!” मेरी आवाज़ में व्यंग्य था।
“स्ट्रेस कैसे ना होता? देश ग़ुलाम था। अपने आस-पास, परिवार-समाज-देश पर आप आख़िर कितना अत्याचार देख सकते हैं? आप ज़रा भी संवेदनशील होंगे तो आपको परेशानी तो होगी ही। तनाव तो होगा ही।” सामने लेटी हुई महिला एक साँस में ही बोल गई।
इस अप्रत्याशित जवाब का कोई जवाब मैं न दे पाया।
घोघारी अंकल ने बातचीत का सिलसिला जारी रखा। कैसे उनके पिता स्कूल के दिनों में ही आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। कैसे दादाजी के घर की कुर्की की अफ़वाह सुनते ही दादी ने आठ बच्चों के पूरे परिवार को अपने पड़ोसी के तबेले में छुपा दिया था। कैसे उनका बचपन आज़ादी की कविताएँ लिखते-सुनते बीता और कैसे एक आज़ाद भारत के साठ सालों को देखने का सुख उन्हें भाव-विभोर कर देता है।
मैं अब भी निश्चेष्ट श्रोता ही बना रहा, बीच-बीच में हाँ-हूँ से ज़्यादा मेरी भागीदारी नहीं थी। लेकिन वो महिला बहुत देर तक लेटे-लेटे ही घोघारी जी से घुल-मिलकर बातें करती रहीं, जैसे मुद्दतों की दोस्ती थी उनकी।
ट्रेन दस बजे के आस-पास भुसावल पहुँची। मैंने अभी तक कुछ खाया नहीं था, इसलिए कुछ खाने के इरादे से उतरने लगा कि मुझे विजय की याद आई। इस गहन बातचीत को सुनते रहने के क्रम में मैं उसे तो भूल ही गया था।
मैं उठने लगा कि उस महिला ने मुझसे उड़िया में कहा, “ट्रेन रू ओलिहबे कि? मो पाईं पाणिर बोटल आणिबे कि? (नीचे उतरेंगे क्या? मेरे लिए पानी की एक बोतल ले आएँगे?)
“आपको कैसे मालूम चला कि मैं उड़िया बोलता हूँ?” मैंने हैरान होकर पूछा।
“आप ही ने तो सामने वाले अंकल को बताया कि आप ओडिशा से हैं?”
“ओ हो! तो आप किताब पढ़ने का स्वांग रच रही थीं। आपका ध्यान तो दरअसल हमारी बातों पर था।” मैं फिर अपने व्यंग्य पर उतर आया था।
महिला ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। घूमकर लेट भर गईं। मुझे अपने ऊपर बड़ी कोफ़्त हुई। ये कमबख़्त ज़ुबान अपने नियंत्रण में कभी होती क्यों नहीं? फिसलने और ज़हर उगलने की बुरी आदत है उसको। लेकिन माफ़ी माँगने की हिम्मत भी न हुई।
मैंने अंकल की ओर घूमकर पूछा, “आपको कुछ चाहिए क्या?” अंकल ने हाथ के इशारे से मना किया, कहा कुछ नहीं।
मैं भारी मन से प्लेटफॉर्म पर उतर गया। कुछ खाने की इच्छा नहीं हुई। विजय के लिए खाना पैक कराकर मैं दूसरे दरवाज़े से डिब्बे में चढ़ा और उसे खाने का पैकेट पकड़ाकर फिर प्लेटफॉर्म पर उतरकर टहलने लगा।
एक बार जी में आया, जाकर माफ़ी माँग लूँ। लेकिन अहं ने डिब्बे के दरवाज़े पर एक बाँस का मोटा बल्ला डाल दिया था। उछलकर लाँघना भी मुश्किल, झुकना तो ख़ैर नामुमकिन। मैं अपनी ऊहापोह से जी चुराने के लिए सिगरेट के गहरे कश लेता रहा। ट्रेन के एक रात के सफ़र में लोग जन्म-जन्मांतर का रिश्ता बनाने की कोशिश क्यों करते हैं? मतलब ठीक है, क़िस्मत कहिए कि हम एक साथ एक बोगी में अगल-बग़ल की सीटों पर डाल दिए गए लेकिन इसका मतलब तो ये है नहीं न कि गले ही पड़ जाया जाए? जब अपने सहयात्री के गले पड़ना अपेक्षित नहीं होता तो फिर भी अपने सहयात्री के बर्ताव या उसके साथ किए गए बर्ताव पर इतना दिमाग़ क्यों ख़राब कर रहा हूँ मैं? ये घोघारी अंकल जो भी हैं, और ये उड़िया में रिश्ता निकालने वाली महिला जो भी है, इन दोनों से मेरा नाता बस आज भर का है- बस इस सफ़र भर का। ये सोचकर मैंने एक और सिगरेट जला ली। लगा कि जैसे अचानक कोई बोझ उतर गया है।
ट्रेन खुलने के सिग्नल के बाद जब पानी की बोतल लिए डिब्बे में वापस पहुँचा तो कम्पार्टमेंट की बत्तियाँ बुझाकर मेरे दोनों सहयात्री सो चुके थे। मैं भी ऊपर वाली सीट पर लेटे-लेटे रीडिंग लाइट जलाकर कुछ पढ़ने की कोशिश करता रहा, फिर सो गया।
कंपार्टमेंट का सन्नाटा, पटरियों पर दौड़ती ट्रेन का शोर और घोघारी अंकल के खर्राटे की घर्र-घर्र ने फिर दिमाग़ को लुकाछिपी के किसी खेल की ओर धकेल दिया। इसी ट्रेन में तो मिली थी शालिनी।
एक सफ़र, बस एक सफ़र में रिश्ते नहीं बनते। ट्रेन में मिलनेवाले लोग दुबारा नहीं मिला करते। सफ़र पूरा होने के साथ दोस्तियाँ भी ख़त्म हो जाती हैं और बात-बेबात हुई चर्चाएँ भी। लेकिन मेरी और शालिनी की दोस्ती इसी ट्रेन में शुरू हुई थी। फिर ज़िंदगी के लंबे सफ़र में वो रिश्ता टूट भी गया था। ट्रेन के सहयात्रियों की नियति यही होती है शायद। उसके बाद मैंने ट्रेन में बहुत सफ़र किया, लेकिन दोस्ती कभी नहीं की। दोस्ती तो क्या, बात तक नहीं की। मेरे व्यक्तित्व का ये रूखापन ट्रेन में चढ़ते ही अपनी चरम सीमा तक चढ़ते हुए असंवेदनशीलता की हद तक पहुँच जाता था।
सुबह नींद खुली तो ट्रेन अहमदाबाद पहुँचने वाली थी। सभी यात्री अपने-अपने सामान समेटने लगे थे। घोघारी अंकल भी अपनी चप्पलें समेटकर बैग में रखने लगे थे। मैं भी नीचे उतरकर जूते पहनने लगा। किसी से बात करने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं हुई। सामनेवाली सीट पर लेटी महिला वैसे ही दूसरी ओर घूमकर सोती रहीं। दो अच्छे सहयात्रियों की तरह हम एक-दूसरे से किया बर्ताव भूल चुके थे।
ट्रेन के अहमदाबाद पहुँचते ही कुलियों के साथ-साथ एक चौबीस-पच्चीस साल का शख़्स डिब्बे में घुस आया और हमारे सामने लेटी महिला के पास आ खड़ा हुआ।
“दीदी, दीदी। तमो फोन बॉन्द काहि कि ओछि? मू बहूत सोमोयो रू चेष्टा कारूछि? कितनी चिंता हो रही थी मुझे। फोन तो ऑन रखतीं।”
“नहीं रे, फ़ोन डिस्चार्ज हो गया था। इसलिए बंद हो गया। अब मैं चार्ज करने के लिए पावर प्वाइंट तक पहुँचूँ तब ना?” पिछले चौदह घंटों में पहली बार मुझे महिला के चेहरे पर हँसी की एक लकीर नज़र आई थी।
“किसी की मदद ले लेती। अपने सहयात्रियों से कह देती।” भाई की आवाज़ में अब भी परेशानी घुली थी।
“सहयात्रियों से मदद माँगने का न हक़ रहा न चलन,” इस बार व्यंग्य महिला की आवाज़ में था।
इसी बातचीत के बीच भाई नीचे से सामान खींच-खींचकर सीट पर रखता गया। सामान से साथ एक व्हील चेयर और एक जोड़ी बैसाखियाँ भी थीं। सामान निकालने के बाद उसने अपनी बहन को पकड़कर बिठाया और तब मुझे अहसास हुआ कि महिला की दाहिनी टाँग की जगह एक कृत्रिम टाँग लगी थी।
मुझे जाने ऐसा क्यों लगा कि मुझपर घड़ों पानी पड़ गया हो। मैं अब न उस महिला से आँख मिला पा रहा था न घोघारी अंकल से। जाते-जाते उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया तो भी मेरा ध्यान व्हील चेयर पर ही था। भाई ने कुली की मदद से एक-एक करके सामान उतारा और अपनी बहन को भी डिब्बे से उतारकर व्हील चेयर पर बिठाया।
मैं भारी मन से सीट पर ही बैठा रहा। विजय के आने तक डेढ़ महीने पहले लंदन की मेट्रो पर लगे पोस्टर पर पढ़ी हुई दो लाइनें अपने मन में जाने कितनी बार दुहराई थी मैंने उस दिन, “इवन इफ़ यू आर ट्राइंग टू बी पोलाइट / ट्राई नॉट टू मेक स्पेस टू टाइट।”
सच ही कहा है किसी ने, किसी का सब्र और स्वभाव दोनों की पहचान करनी हो तो उसके साथ ट्रेन में सफ़र करिए। उस दिन पुरी-अहमदाबाद एक्सप्रेस के उस सफ़र के बाद मैं अचानक समझ गया था कि शालिनी ने मुझे क्यों छोड़ा होगा…
नीला स्कार्फ़
शांभवी चुपचाप अपना सामान ठीक करती रही। बिस्तर पर एक जंबो साइज़ सूटकेस पड़ा था और रंग-बिरंगे तह किए कपड़े बिस्तर पर समेट लिए जाने के मक़सद से बिखरे पड़े थे। तीन महीने की पैकिंग तो बहुत ज़्यादा नहीं होती, लेकिन विदेश प्रवास का हर लम्हा अच्छी तैयारी माँगता है- मौसम और कल्चर के अनुकूल।
वैसे भी शांभवी को सब कुछ क़ायदे से करने का ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर है। कपड़े क़ायदे से तह करती है, पहनती है, वापस रखती है। जो मूर्त है और नज़र आता है, सब सलीक़े में बँधा हुआ है- जैसे फ्रिज में डाले जा रहे डिब्बे, फल, सब्ज़ी, बर्तन… रसोई की दराज़ें… लिविंग रूम के कुशन… गुलदानों में लगे फूल… अमितेश के साथ सात सालों की गृहस्थी।
जो अमूर्त है और दिखाई नहीं देता, सब बेसलीक़ा है- जैसे रिश्ते, मन, सुख, दुख, शिकायतें…
और सलीक़े से तह किए रखे कपड़ों के बीच एक बेसलीक़ा-सा सिल्क का नीले रंग का स्कार्फ़ फ़र्श पर लोट-पोट कर किस अमूर्त बेरुख़ी के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत दर्ज़ करा रहा था? शांभवी की नज़र उस स्कार्फ़ पर पड़ी तो उसने बस यूँ ही उठाकर मुचड़ी हुई अवस्था में ही अपने हैंडबैग में ठूँस लिया।
ये कमबख़्त स्कार्फ़ भी न… बेवजह न जाने क्या याद दिला गया था शांभवी को! याद बेरहम कसाई है। बेवजह वक़्त-बेवक़्त दिल को, लम्हों को, तजुर्बों को चीरने-काटने की बुरी आदत है उसको। कैसी ज़िद्दी होती हैं यादें कि हमारी पकड़ से कभी इधर, कभी उधर, कभी यहाँ, कभी वहाँ फिसलती रहती हैं और हमारे ही वजूद पर लिसलिसी-सी पड़ी रहती हैं। न पोंछना आसान, न धोना।
इस बार नीले स्कार्फ़ की डोर यादों के जिस वृक्ष से जा उलझी थी, उस वृक्ष पर लटकी हुई थी एक तारीख़- 26 दिसंबर की।
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10-05-2020, 12:44 PM,
#16
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
शांभवी को अमितेश की उँगलियों में फँसी हुई अपनी एक मुट्ठी में उतर आई पसीने की नरमी की याद सिहरा गई थी अचानक। नीले स्कार्फ़ ने याद दिलाया कि कैसे सात साल पहले उस बुधवार को अपनी एक हथेली से अमितेश को थामे, दूसरी हथेली में कोल्ड कॉफी के ख़ाली ग्लास में पाइप से बुलबुलों की बुड़-बुड़ भरते जनपथ के चक्कर काटते रहे थे दोनों। कोई और ख़ास वजह नहीं, लेकिन शांभवी को याद है कि 26 दिसंबर वाला वो बुधवार उसकी शादी के बाद के पहले महीने के पाँचवें दिन आया था।
शांभवी को एक और ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर है- तारीख़ें याद रखने का। चीज़ें, बातें, चेहरे, घटनाएँ- सबको तारीख़ों की गाँठ में बाँधकर मन में रख लिया करती है। इसलिए तारीख़ें भूल नहीं पाती। इसलिए उसे अच्छी तरह याद है कि नीले रंग का ये सिल्क का स्कार्फ़ उसने 26 दिसंबर को अमितेश के साथ जनपथ धाँगने के क्रम में ख़रीदा था।
ये नीला स्कार्फ़ सिर्फ़ एक एक्सेसरी हो सकता था, ज़रूरत नहीं। पता नहीं क्यों ख़रीद लिया था ये नीला स्कार्फ़ उसने?
पता नहीं क्यों शादी कर ली थी उसने? और ज़ेहन में पता नहीं क्यों ये ख़्याल अचानक आ गया था। लेकिन ज़ेहन में आए ख़्याल अक्सर बेसिर-पैर के ही होते हैं।
ख़्याल को झटककर, नीले स्कार्फ़ की याद से जी छुड़ाकर शांभवी वापस अपने काम में लगी ही थी कि बिस्तर के पायताने पड़े लाल जैकेट ने कुछ और याद दिला दिया… नए साल पर 12 जनवरी को मॉल में अमितेश के साथ हुई पहली तकरार…
बड़ी बेतुकी बात पर लड़े थे दोनों। जैकेट को लेकर। छोटा है। बड़ा है। मैटिरियल अच्छा नहीं है। बड़ा महँगा है। इस लंबी-चौड़ी बहस में पूरे पैंतालीस मिनट निकल गए थे जिसके बाद अमितेश की ज़िद पर शांभवी ने जैकेट ख़रीदकर सुलह कर ली थी। ये और बात है कि सिर्फ़ तीन बार पहना था उसने इस जैकेट को। शांभवी को लाल रंग से मितली आती है।
ये सारी बातें उसे आज ही क्यों याद आ रही हैं? इन सारी बातों को वो अपने साथ फ्लाइट में बिठाकर नहीं ले जाना चाहती, इसलिए शांभवी ने लाल वाला जैकेट वापस हैंगर में टाँगकर अलमारी में लटका दिया था।
इतनी ही देर में ये भी याद आ गया था कि जिस दिन ये जैकेट लिया था, उसी दिन दोनों ने घर के लिए पर्दे भी ऑर्डर किए थे। आसमानी रंग के पर्दों पर सुनहरे रंग की छींट। ‘जैसे शांत-से आसमान से हर वक़्त गुज़रती रहती हो धूप की सुनहरी लकीरें’, अमितेश ने कहा था पर्दे लगाने के बाद। ड्राईंग रूम में अब भी वही पर्दे लटक रहे थे, हालाँकि शांभवी ने अपने कमरे में सफ़ेद रंग की चिक डाल दी थी और अमितेश के कमरे में ब्लाइंड्स लग गए थे।
सिर्फ़ पर्दों का रंग-रूप ही नहीं बदला था, रिश्तों की सूरत-सीरत भी बदल गई थी। हालाँकि दोनों के घर के ऊपर का आसामान तमाम मटमैली अंदरूनी आँधियों के बावजूद बाहर से शांत और साफ़-सुथरा ही दिखता था। बादलों के बीच से धूप भी अपने वक़्त पर निकल आया करती थी। लेकिन आसमान बँट गया था। कमरे अलग हो गए थे। धूप को देखने-समझने के दोनों के टाइम-ज़ोन अलग हो गए थे, इतने अलग कि कई बार एक ही कमरे में होते हुए भी दोनों एक जगह, एक स्पेस में नहीं होते थे।
“कब तक लौटोगी?” बहुत देर तक बीन बैग पर ख़ामोश बैठे उसे पैकिंग करते देखते हुए अमितेश ने पूछा था। जब बात करने को कोई बात न हो तो सवाल काम आते हैं।
उसी कमरे में बैठा था अमितेश, इस उम्मीद में कि जाने की तैयारी करते हुए शांभवी कुछ कहेगी- कोई चाहत, कोई शिकायत। कोई आदेश, कोई निर्देश। लेकिन जब ख़ामोशी आदत में शुमार हो जाए जो सामने वाले की उपस्थिति को नज़रअंदाज़ कर देना भी फ़ितरत बन जाती है।
“जानते तो हो।” शांभवी ने छोटा-सा जवाब दे दिया। बिना सिर उठाए, बिना अमितेश के चेहरे, उसकी आँखों की ओर देखे। बात करने को कोई बात न हो तो सवालों का कोई मुकम्मल जवाब भी नहीं मिलता।
अमितेश चुप हो गया और सिर पीछे की ओर टिकाए वहीं बीन बैग पर बैठे-बैठे शांभवी के कमरे में बिखरी हुई आवाज़ों से मन बहलाता रहा। लेकिन कपड़े तह करने और सूटकेस में रखने के क्रम में आवाज़ भी भला कितनी निकल सकती है? थककर वो अपने कमरे में चला गया। अपने कमरे में, जिसे वो अब भी टीवी वाला कमरा कहता है। कई महीनों से उस कमरे में अकेले रहते, उसी में सोते-जागते हुए भी।
एक घर में दो लोग साथ-साथ रहते हुए अकेले रहते हों तो भी एक-दूसरी की मौज़ूदगी की आदत नहीं जाती। किसी का साथ हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत होता है, चाहे वो भ्रम के रूप में ही क्यों न बना रहे। भ्रम में जीना और फिर भी रूमानी ख़्वाहिशों-ख़्यालों को बिस्तरा-ओढ़ना बनाकर हर रात सो जाना ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच होता है। ज़िंदगी का बेशक न होता हो, शादियों का तो होता है। जो साथ है, उसके बिछड़ जाने का डर और जो बिछड़ गया है उसके एक दिन लौट आने की उम्मीद- शादियाँ इसी भरोसे पर चलती रहती हैं।
तीन महीने के लिए जा रही थी शांभवी, सिर्फ़ तीन महीने के लिए… इस बिछड़ने को बिछड़ना थोड़े कहते हैं, अमितेश ने अपने-आप को समझाया। लेकिन ऐसा क्यों लग रहा था कि शांभवी लौटेगी नहीं अब? इस तरह चले जाने और फिर एक दिन किसी तरह लौट आने से तो उसका बिछड़ जाना ही बेहतर हो शायद। सोचते-सोचते बहुत उदास हो गया था अमितेश। रास्तों के बीहड़ में खो गए रिश्ते ढूँढ़कर, उसे खींचकर ले भी आएँ तो उनसे जुड़ी तकलीफ़देह यादों का क्या किया जाए?
शांभवी के कमरे की हालत ने भी बेसाख़्ता उदासी से भर दिया था उसको। मेहँदी का उतरता रंग, गहरा होता दिन, पहाड़ों से उतरती धूप, ख़त्म होती नज़्म, ख़ाली होता कॉफ़ी का प्याला, तेज़ी से कम होती छुट्टियाँ, मंज़िल की तरफ़ पहुँचती रेल, किसी छोटे-से क्रश की ख़त्म होती हुई पुरज़ोर कशिश और लंबे सफ़र की तैयारी करता कोई बेहद अज़ीज… इनमें से एक भी सूरत दिल डुबो देने के लिए बहुत है!
शांभवी ने एक लिस्ट फ्रिज पर चिपका दी। बाई, खाना बनानेवाली, बढ़ई, धोबी, प्लंबर, चौकीदार, अस्पताल, किराने की दुकान, यहाँ तक कि होम डिलीवरी के लिए रेस्टुरेंट्स के नंबर भी। एक घर को चलाने के लिए कितने काम करने पड़ते हैं, पिछले कई सालों में ये ख़्याल तक न आया था अमितेश को। उसे तो एक महीने पहले बाई का नाम मालूम चला था वो भी इसलिए क्योंकि शांभवी ने नोट लिख छोड़ा था मेज़ पर, ‘प्लीज़ टेल कांता टू कम ऐट थ्री टुडे।’ एक कर्ट-सा, बेहद औपचारिक-सा नोट। शांभवी की फ़ॉर्मल हैंडराइटिंग की तरह। शांभवी के उस औपचारिक, लेकिन बेहद सौम्य और शांत बर्ताव की तरह जिसके साथ जीने की आदत हो गई थी अमितेश को।
वॉशिंग मशीन चलाते हुए, धोबी को इस्तरी के लिए कपड़े देते हुए, कूड़ा बाहर निकालते हुए, ब्लू पॉटरी वाली दो प्लेटों में खाना लगाते हुए, अपने कमरे की सफ़ाई करते हुए, होली-दीवाली पर पर्दे साफ़ करवाते हुए शांभवी ऐसी ही रहने लगी थी पता नहीं कब से। ऐसी ही फ़ॉर्मल। कर्ट। औपचारिक। ख़ामोश। अमितेश मानना नहीं चाहता था ख़ुद से लेकिन, इन्डिफरेंट भी। एकदम उदासीन। बेरुख़ी की हद तक।
फिर भी घर चल रहा था… अमितेश के ये न जानते हुए भी कि धोबी इस्तरी के कितने पैसे लेता है। बाई की तनख़्वाह क्या है और दस किलो आटा मँगाना हो तो किसको फ़ोन करना होता है। तीन महीनों के लिए ये सब करना पड़ेगा अमितेश को।
तीन महीने में जाने क्या-क्या करना पड़ेगा! तीन महीने में ज़िंदगी भर के लिए ख़ुद को शांभवी के बिना जीने के लिए तैयार करना पड़ा तो? यदि शांभवी लौटकर न आई तो?
गाड़ी एयरपोर्ट के बाहर एक तेज़ स्क्रीच के साथ रुकी थी। घर में पसरी ख़ामोशी गाड़ी में भी साथ लदकर आई थी और ब्रेक की आवाज़ ने तोड़ी थी वो ख़ामोशी। उसके बाद गाड़ी के गेट की आवाज़ों ने, फिर बूट से खींचे गए सूटकेस की आवाज़ ने बहुत सारी हलचल पैदा कर दी थी अचानक।
शांभवी शायद कुछ नहीं सोच रही थी लेकिन अमितेश के मन का द्वंद्व पूरे रास्ते नज़र आया था। घर से एयरपोर्ट पहुँचने में वो तीन बार ग़लत रास्तों पर मुड़ा था। उसका वश चलता तो वो गाड़ी घर की ओर ही मोड़ लेता। लेकिन उसका वश चलता कब है, ख़ासकर शांभवी पर!
शांभवी तेज़ी से बूट से सूटकेस निकालकर उसे खींचते हुए ट्रॉली की ओर बढ़ गई थी। कोई जल्दी नहीं थी। डिपार्चर में वक़्त था अभी। लेकिन ट्रॉली में सामान डालकर वो अमितेश से बिना कुछ कहे प्रवेश गेट की ओर मुड़ गई। अमितेश ने भी रोकने की कोई कोशिश नहीं की। शांभवी को तब तक जाते हुए देखता रहा जब तक उसके गले में पड़े स्कार्फ़ का गहरा मखमली नीलापन भीड़ के कई रंगों में गुम नहीं हो गया। अमितेश का मन अचानक उसके घर की तरह ख़ाली हो गया था।
चेक-इन के लिए लंबी कतार थी भीतर। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तो यूँ भी हज़ार झमेले होते हैं। कस्टम क्लियरेंस और अपना सामान चेक-इन करके बोर्डिंग पास लेने के बाद शांभवी लैपटॉप खोलकर एक कोने में बैठ गई।
डिपार्चर में अभी भी समय था। इतनी देर में कई काम हो सकते थे। ई-मेल के जवाब लिखे जा सकते थे, जी-टॉक पर दोस्तों से बात हो सकती थी, फेसबुक पर दूसरों के स्टेटस मैसेज पर कमेंट किए जाने जैसे बेतुके लेकिन अतिआवश्यक काम निपटाए जा सकते थे, कुछ दिलचस्प ट्वीट के ज़रिए आभासी दुनिया के दोस्तों से बातचीत का कोई तार पकड़ा जा सकता था।
लेकिन शांभवी ने इतने सालों में जब ये सब कभी किया नहीं तो अब पौने दो घंटे में क्या करती? यूँ ही बंद रहने की आदत घर से बाहर पता नहीं कब फ़ितरत बन गई थी उसकी। इसलिए बिना कुछ किए बेमन से ऑफ़िस के कुछ ई-मेल पढ़ती रही, निर्विकार भाव से उनका जवाब देती रही। इधर-उधर सर्फ़िंग करती रही। फिर पता नहीं कब और क्यों उसने ‘फोटोज़’ नाम के एक फोल्डर पर क्लिक कर दिया।
जब हम ट्रांज़िट में होते हैं तो अपनी यादों के सबसे क़रीब होते हैं शायद। या होना चाहते हैं। नॉस्टेलजिया सबसे शुद्ध रूप में घर से बाहर किसी सफ़र के दौरान ही घर करता है।
एक सफ़र से जुड़ती शांभवी की पिछली कई जीवन-यात्राओं की यादें, सब-की-सब यादें इन फोल्डरों में बंद थीं। शादी के पहले की, शादी की, हनीमून की, दोस्तों की, परिवार की और उन तारीख़ों की, जिन्हें साल-दर-साल अपनी याद में दर्ज़ करती गई थी शांभवी।
शादी के सात साल, सात साल की तारीख़ें और वो एक तारीख़ जिसने सबकुछ यूँ बदला कि जैसे यही तय था। ये टूटन, ये बिखरन… और बिखरे हुए में जीते चले जाना उस अधूरेपन के साथ, जिसकी कमी अब अमितेश को खल रही थी।
तेरह फरवरी। याद है तारीख़ शांभवी को। इसलिए याद है कि तीन फरवरी की डेट उसने मिस कर दी थी। कुछ दिनों के इंतज़ार के बाद होश आया तो सेल्फ़-टेस्टिंग प्रेग्नेंसी किट ने उस डर पर मुहर लगा दी, जिस डर ने पूरी रात अमितेश को जगाए रखा था।
“वी कान्ट। हम इतनी जल्दी नहीं कर सकते शांभू।” कमरे में चहल-क़दमी करते अमितेश ने बेचैन होकर कहा था। “कितना कुछ करना है अभी। यू हैव अ करियर। मुझे अपना काम सेटल करना है। हम तैयार नहीं हैं। वी जस्ट कान्ट।” अमितेश बोलता रहा था और शांभवी सुनती रही थी। सुन्न बनी हुई। उसका दिमाग़ नहीं चल रहा था। फिर भी आदतन ज़िरह की एक कोशिश की थी उसने।
“तैयार क्यों नहीं हैं? तुम 32 साल के हो, मैं 27 की। सही उम्र भी है, फिर क्यों?” शांभवी ने पूछा तो, लेकिन उसकी आवाज़ में हार मान लेने जैसी उदासी थी।
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10-05-2020, 12:44 PM,
#17
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
“शादी को तीन महीने भी नहीं हुए। मैं तैयार नहीं और इसके आगे हम कोई बहस नहीं कर सकते।” अमितेश ने अपनी बात कहकर बहस ख़त्म होने का ऐलान करने का सिग्नल देकर कमरे से बाहर निकल जाना उचित समझा। उसके बाद दोनों में कोई बात नहीं हुई, ऐसे कि जैसे ये शांभवी का अकेले का किया-धरा था, ऐसे कि जैसे वही एक ज़िम्मेदार थी और फ़ैसला उसी को लेना था।
फिर दो हफ़्ते के लिए अमितेश बाहर चला गया, शांभवी को दुविधा की हालत में अकेले छोड़कर। अपनी इस हालत का सोचकर ख़ुश हो या रोए, बच्चे के इंतज़ार की तैयारी करे या उसके विदा हो जाने की दुआ माँगे, ये भी नहीं तय कर पाई थी अकेले शांभवी। वे दो हफ़्ते जाने कैसे गुज़रे थे…
शांभवी ने अपनी सास को फ़ोन पर ख़ुशख़बरी दे दी थी, ये सोचकर कि वो अमितेश को समझा पाने में कामयाब होंगी शायद। अपने चार हफ़्ते के गर्भ की घोषणा उसने हर मुमिकन जगह पर दे दी। शायद सबको पता चल जाए तो अमितेश कुछ न कर सके। बेवक़ूफ़ थी शांभवी। फ़ैसले दुनिया भर में घोषणाएँ करके नहीं, ख़ामोशी से, अकेले लिए जाते हैं।
वैसे भी अमितेश के वापस लौट आने के बाद कोई तरीक़ा काम नहीं आया। वो अपनी ज़िद पर क़ायम था। दो हफ़्ते तक जो उसे बधाई दे रहे थे, उसे ख़्याल रखने की सलाह दे रहे थे, अमितेश के आते ही उन सब लोगों ने अपना पाला बदल लिया था।
माँ ने फ़ोन पर शांभवी को समझाया, “जब प्लानिंग नहीं थी तो तुम्हें ख़्याल रखना चाहिए था। तुम्हें उसके साथ ज़िंदगी गुज़ारनी है। जिस बच्चे की ज़रूरत वो समझता नहीं, उसे लाकर क्या करोगी? मैं तुम्हें तसल्ली ही दे सकती हूँ बस।”
किसी की दी हुई तसल्ली की ज़रूरत नहीं थी उसे। जो सास उसकी प्रेगनेंसी पर उछल रही थीं और मन्नतें माँग रहीं थीं, उन्होंने भी बात करना बंद कर दिया। शांभवी और किसी से क्या बात करती! तीन महीने में ही शादी में पड़ने वाली दरारों को किसके सामने ज़ाहिर करती! उसकी बात भला सुनता कौन!
दो चेक-अप और एक अल्ट्रासाउंड के लिए अकेली गई थी वो। अल्ट्रासाउंड की टेबल पर उसकी आँखों के कोनों से बरसते आँसू से सोनोलॉजिस्ट ने जाने क्या मतलब निकाला होगा? वो उठी तो सोनोलॉजिस्ट ने पूछ ही लिया, “आप शादीशुदा तो हैं?”
“काश नहीं होती!” ये कहकर शांभवी कमरे से निकल गई थी।
अमितेश शांभवी को लेकर डॉक्टर के पास तो गया लेकिन अबॉर्शन की जानकारी लेने के लिए। डॉ. सचदेवा उसके दोस्त की बुआ थीं इसलिए कोई ख़तरा नहीं होगा, ऐसा कहा था उसने। डॉ. सचदेवा ने दोनों को समझाने की बहुत कोशिश की। लेकिन चेक-अप के दौरान शांभवी की तरल आँखों ने सबकुछ ज़ाहिर कर दिया। अमितेश ने अबॉर्शन के लिए अगली सुबह की डेट ले ली थी।
उस रात शांभवी की आँखों ने विद्रोह कर दिया था। आँसू का एक कतरा भी बाहर न निकला और मन था कि ज़ार-ज़ार रो रहा था। इतनी बेबस क्यों थी वो? इस बच्चे को उसके पति ने ही लावारिस करार दिया था और ख़ुद उसकी बग़ल में पीठ फेरे चैन की नींद ले रहा था। शादी जैसे एक तजुर्बे में जाने कैसे-कैसे तजुर्बे होते हैं!
शांभवी अगली सुबह भी शांत ही रही। अमितेश गाड़ी में इधर-उधर की बातें करता रहा। अपने घर के नए फ़र्नीचर और दीवारों के रंग की योजनाएँ बनाता रहा। अपने नए प्रोजेक्ट की बातें करता रहा। उसके नॉर्मल हो जाने का यही तरीक़ा था शायद। मुमकिन है कि अमितेश भी उतनी ही मुश्किल में हो और इस तरह की बातें उसके भीतर के अव्यक्त दुख को छुपाए रखने की एक नाकाम कोशिश हों। लेकिन दुख भी तो साझा होना चाहिए। जब हम दुख बाँटना बंद कर देते हैं एक-दूसरे से, तो ख़ुद को बाँटना बंद कर देते हैं अचानक।
इसलिए शांभवी वो एकालाप चुपचाप सुनती रही। वैसे भी ये अमितेश की योजनाएँ थीं। इसमें साझा कुछ भी नहीं था। जो साझा था, आज खो जाना था। साझी रात। साझा प्यार। साझा जीवन। साझा दुख।
शांभवी सुबह सात बजे डॉक्टर से मिली, अबॉर्शन के लिए।
“तुम सात हफ़्ते की प्रेगनेंट हो शांभवी।”
“जानती हूँ। और ये भी जानती हूँ कि इस वक़्त तक बच्चे का दिल भी बनने लगा होगा, दिमाग़ भी। जानती हूँ कि उसकी पलकें बनने लगी होंगी, दोनों कुहनियों में अबतक मोड़ भी आ गया होगा शायद।” जो शांभवी पूरे रास्ते कुछ नहीं बोली थी, उसने अचानक डॉक्टर के सामने जाने कैसे इतना कुछ कह दिया था!
डॉ. सचदेवा एक ठहरे हुए पल में बहुत ठहरी हुई निगाहों से शांभवी को देखती रहीं। “अब भी वक़्त है, सोच लो।” डॉक्टर ने भी कुछ सोचकर कहा था।
शांभवी ने कुछ कहा नहीं, बस कुर्सी के पीछे की दीवार पर सिर टिकाकर आँखें मूँद ली थीं।
डॉक्टर सचदेवा ने नर्स को बुलाकर एमटीपी के पहले की कार्रवाई पूरी करने की हिदायत दे दी। कपड़े बदलने के बाद शांभवी को स्ट्रेचर पर लिटाकर ऑपरेशन थिएटर पहुँचा दिया गया। उसने आख़िरी बार अपने पेट पर हाथ रखकर अपने अजन्मे बच्चे से माफ़ी माँग ली। उसे विदा करते हुए कहा कि वो हर उस सज़ा के लिए तैयार है जो उसके लिए मुक़र्रर की जाए। उसने आख़िरी बार आँखें बंद करते हुए आँसुओं को पीछे धकेल दिया। तब तक जनरल अनीस्थिसिया असर करने लगा था और शांभवी किसी गहरी अँधेरी खाई में गिरने लगी थी।
अबॉर्शन के बाद जब होश आया तो वो रिकवरी रूम में थी। अमितेश के हाथ में दो पैकेट थे। एक में सैनिटरी नैपकिन और दूसरे में जूस और बिस्किट। शांभवी चाहते हुए भी मुँह न फेर सकी।
उसके बाद की घटनाएँ फ़ास्ट-फ़ॉरवर्ड मोड में चलती रहीं। उसे याद नहीं कि कितने दिन कमज़ोरी रही, ये भी याद नहीं कि कितने दिनों तक ब्लीडिंग हुई थी उसे। ये याद है कि उसी हालत में उसे अमितेश ने घर भेज दिया था, माँ के पास।
“इस हालत में कौन ख़्याल रखेगा तुम्हारा? घर छोटा है। किसी और को नहीं बुला सकते। मैं ट्रैवेल कर रहा हूँ, कैसे रहोगी अकेले? इसीलिए तो कहता था, बच्चे के लिए सही वक़्त नहीं है ये।”
शांभवी अकेले सबके सवालों के जबाव देती रही। अकेले दर्द बर्दाश्त करती रही। अकेले अपने ज़ख़्मों को भरने की कोशिश करती रही। ये दर्द वक़्त के साथ कम हो जाता शायद, अगर अमितेश ने साथ मिलकर बाँटा होता। लेकिन उसने भी शांभवी को उसके गिल्ट, उसकी तकलीफ़ के साथ अकेला छोड़ दिया था। शायद इसलिए भी शांभवी अमितेश को माफ़ न कर सकी। लेकिन अपने फ़ैसले ख़ुद न ले पाने के लिए वो ख़ुद को भी नहीं माफ़ कर सकी थी। दूसरों को माफ़ करना आसान होता है। अपनों को और ख़ुद को माफ़ करना सबसे मुश्किल।
और फिर जाने कब और कैसे रोज़-रोज़ के झगड़े आम हो गए। जिस शख़्स पर भरोसा करके उसके साथ ज़िंदगी गुज़ारने की क़समें खाईं थीं, उसी शख़्स के साथ घर और कभी-कभार बिस्तर बाँटने के काम ने एक औपचारिक रूप अख़्तियार कर लिया।
ज़िंदगी यूँ ही चलती रही। जो दर्द किसी सूरत में कम न हो सका, उस दर्द को काम और ढेर सारे काम के समंदर में डुबो दिया शांभवी ने। शादी से बाहर जाने का न कोई रास्ता था, न ऐसी कोई प्रेरणा थी जिसकी वजह से वो कोई फ़ैसला लेती। जो वक़्त कट रहा था, उस वक़्त को बस कटते रहने दिया था उसने।
उधर रिश्तों में आ रही दरारों से बेपरवाह अमितेश एक के बाद एक ज़िंदगी की सीढ़ियाँ चढ़ता रहा। ‘वक़्त के साथ सब ठीक हो जाएगा’ के दुनिया के सबसे बेकार फ़लसफ़े पर यक़ीन करो तो सब ठीक, और बिना यक़ीन किए इसी उम्मीद में ज़िंदगी गुज़ार दो तो सब बर्बाद।
लेकिन अमितेश को यक़ीन था कि सब ठीक हो ही जाएगा एक दिन। इसलिए अपनी तरफ़ से सबकुछ नॉर्मल मानकर उसने भी ख़ुद को पूरी तरह काम में झोंक दिया। बिज़नेस में इतनी जल्दी इस मुक़ाम तक पहुँचने की उम्मीद उसने ख़ुद भी न की थी। तीन सालों में ही ई-कॉमर्स की उसकी हर कोशिश, हर वेंचर कामयाब रहा। लोन चुकता हो गया, ज़िंदगी सँवर गई। कम से कम बैंक बैलेंस और गाड़ी के बढ़ते आकार से तो इसी बात का गुमान होता था।
एक दिन गुरूर में अमितेश ने शांभवी को वो कह दिया जिससे दूरी घटी नहीं, इतनी चौड़ी हो गई कि पाटना मुश्किल।
“अब हम बच्चा प्लान कर सकते हैं शांभवी। बल्कि मैं तो कहूँगा कि तुम नौकरी छोड़ दो और आने वाले बच्चे की तैयारी में लग जाओ।” अमितेश ने बाई के हाथ की बनाई थाई करी में ब्राउन राइस मिलाते हुए कहा था।
शांभवी ने कुछ कहा नहीं था, अपनी प्लेट लेकर बेडरूम में चली गई थी।
जब हम एक-दूसरे से कम बोल रहे होते हैं तो अक्सर ग़लत वक़्त पर ग़लत बातें ही बोला करते हैं। शांभवी के ब्राउन राइस में आँखों का नमकीन पानी मिलता रहा। वो चुपचाप खाना खाती रही। उस रात की सुपुर्दगी एक उम्मीद ही थी बस कि सब ठीक ही हो जाएगा एक दिन। किसी भी तरह के यक़ीन से ख़ाली हो चुकी एक उम्मीद।
उम्मीद का रंग अगले महीने की प्रेगनेंसी किट पर एक लकीर के रूप में नज़र आया था। लेकिन इस बार शांभवी ने न जाने क्यों न अमितेश से कुछ कहा न किसी और से। उसी तरह दफ़्तर जाती रही। कभी सोलह घंटे, कभी अठारह घंटे काम करती रही। यूँ कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं और यूँ कि जैसे एक अंदेशा भी हो कुछ होने का।
फिर एक दिन रात को वो हुआ जिसका शांभवी को उसी दिन अंदेशा हो गया था जब वो ऑपरेशन थिएटर की टेबल पर अकेली जूझ रही थी, चार साल पहले। नींद में ही उसे ब्लीडिंग शुरू हो गई। अमितेश परेशान हो गया। अगली सुबह दोनों डॉ. सचदेवा के घर पहुँचे तो उन्होंने उन्हें तुरंत अस्पताल जाने की सलाह दी।
एक के बाद एक दो अल्ट्रासाउंड के बाद जाकर परेशानी का सबब समझ में आया। सोनोलॉजिस्ट ने अमितेश को बुलाकर मॉनिटर पर शांभवी के गर्भ की स्थिति दिखाई।
“एम्ब्रायो फैलोपियन ट्यूब में रह गया था। सात हफ़्ते का गर्भ था इसे। आप लोगों ने गायनोकॉलोजिस्ट को नहीं दिखाया था? आपको मालूम है, ट्यूब में रप्चर आ गया है? कुछ घंटों की भी देरी हुई होती तो मैं नहीं कह सकती कि क्या हो जाता। हाउ कुड यू बी सो रेकलेस?”
“हमें इस प्रेगनेंसी के बारे में नहीं मालूम था डॉक्टर।” अमितेश ने क़रीब-क़रीब शर्मिंदा होते हुए कहा। सोनोलॉजिस्ट ने एक गहरी नज़र से अमितेश को देखा, कहा कुछ नहीं।
ब्लड टेस्ट और बाक़ी जाँच के बाद आधे घंटे के भीतर ही शांभवी को वापस ऑपरेशन थिएटर में पहुँचा दिया गया। ऑपरेशन करके ज़हर फैलाते भ्रूण और शांभवी के फैलोपियन ट्यूब, दोनों को काटकर निकाल दिया गया।
शांभवी एक बार फिर रिकवरी रूम में थी, एक बार फिर अमितेश हाथ में जूस और सैनिटरी नैपकिन्स लिए सामने खड़ा था।
“मैंने डॉक्टर से बात की है शांभू। कोई परेशानी नहीं होगी। तुम माँ बन सकती हो। ट्यूब के निकाल दिए जाने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। तुम चिंता तो नहीं कर रही?”
इस बार शांभवी ने मुँह फेर लिया था। उसकी आँखों से बरसते आँसू प्रायश्चित के थे। उसे पहली बार ही लड़ना चाहिए था, ज़िद करनी चाहिए थी, बच्चे को बचाए रखना चाहिए था। उसे पहली बार ही फ़ैसला लेना चाहिए था।
घर आकर दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ती चली गईं। शांभवी किसी से मिलने के लिए तैयार नहीं थी, न गायनोकॉलोजिस्ट से, न किसी साइकॉलोजिस्ट से। बल्कि जितनी बार अमितेश डॉक्टर से मिलने को कहता, शांभवी धीरे से कहती, “हमें डॉक्टर की नहीं, मैरिज काउंसिलर की ज़रूरत है या फिर वकील की।”
अमितेश ने अब कुछ भी कहना छोड़ दिया। जाने ग़लती किसकी थी, और सज़ा की मियाद कितनी लंबी होनी थी। अमितेश ने भी तो बेहतरी का ख़्बाब ही देखा होगा… लेकिन जब दो लोग एक ही फ़ैसले के दो धुरों पर होते हैं तो उन्हें जोड़ने का कोई रास्ता नहीं होता। वे किसी तरह समानांतर ही चल सकते हैं बस।
वक़्त कटता रहा, वैसे ही जैसे पहले भी कट रहा था। दोनों ने एक ही घर में अलग-अलग कमरों में अपनी दुनिया बसा ली। जो साझा था, वो ईएमआई के रूप में चुकता रहा।
फिर एक दिन शांभवी ने तीन महीने के लिए फ़ेलोशिप की अर्ज़ी दे दी और विदेश जाने को तैयार हो गई। फ़ासले कम करने की बेमतलब की कोशिश से अच्छा था दूर चले जाना। कुछ ही दिनों के लिए सही। दूर रहकर शायद बेहतर तरीक़े से सोचा जा सकता था, फ़ैसले लिए जा सकते थे।
शांभवी का सेल फ़ोन बजा तो होश आया उसको। बोर्डिंग का वक़्त हो चला था। उसने कुछ घंटियों के बाद फ़ोन उठा लिया।
“चेक-इन कर गई हो?”
“हूँ।”
“नाराज़ होकर जा रही हो?”
शांभवी ने बिना जवाब दिए फ़ोन रख दिया।
यहाँ के बाद डाटा कार्ड की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, इसलिए आख़िरी बार पता नहीं क्यों उसने ई-मेल खोल लिया।
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10-05-2020, 12:44 PM,
#18
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
इन्बॉक्स में अमितेश का नाम देखकर अजीब-सी सिहरन हुई थी उसको। शादी से पहले अमितेश के मेल का वो कैसे घड़ी-घड़ी इंतज़ार करती थी! किसी असाइनमेंट के लिए छह महीने के लिए बैंगलोर में था अमितेश। ऑफ़िस से चैट नहीं हो सकती थी, इसलिए दोनों एक-दूसरे को ई-मेल भेजते। हर पाँच मिनट में एक मेल आता था तब। शांभवी किसी मीटिंग में होती तो भी उसका ध्यान लैपटॉप पर ही होता। दोनों की दीवानगी का ये आलम आठ मार्च से सोलह अगस्त तक चला था। शांभवी वो तारीख़ें भी नहीं भूली थी। सोलह अगस्त को सगाई के बाद खाना खाते हुए उसने हँसकर अमितेश से कहा भी, “शादी के लिए ‘हाँ’ तो मैंने तुम्हारे मेल पढ़-पढ़कर कर दिया। जितने दिलचस्प इंसान तुम हो नहीं, उतने दिलचस्प तुम्हारे मेल हुआ करते हैं।”
फ़्लर्ट करने के लिए भी अमितेश ई-मेल लिखता था। प्रोपोज़ भी ई-मेल पर किया था। शादी की प्लानिंग भी ई-मेल पर हुई थी और इस बार सफ़ाई देने के लिए, अपनी बात कहने के लिए अमितेश ने ई-मेल का ही सहारा लिया था। बहुत देर तक शांभवी स्क्रीन को घूरती रही। जी में आया कि बिना पढ़े मेल डिलीट कर दे। आख़िर इस सफ़ाई का क्या फ़ायदा था?
लेकिन आख़िरकार उसने ई-मेल खोल ही लिया। मेल के साथ अटैचमेंट्स भी थे जिन्हें डाउनलोड होने के लिए लगाकर शांभवी मेल पढ़ने लगी।
“शांभू,
जानता हूँ बहुत नाराज़ होकर जा रही हो। ये भी जानता हूँ कि इतनी नाराज़ क्यों हो। इसे कोई सफ़ाई मत समझना, लेकिन तुम्हारे लिए कुछ पेपर्स भेज रहा हूँ अटैच करके, देख लेना। मेरे बैंक स्टेटमेंट हैं और एक एग्रीमेंट की कॉपी है जो मैंने कल ही साइन की है।
तुमसे मिलने के बाद लगा कि तुम्हारे लिए बेहतर ज़िंदगी का इंतज़ाम कर सकूँ, इसके लिए कुछ ख़तरे उठाने होंगे। इसलिए नौकरी छोड़ी और कंपनी शुरू कर दी। तुम्हें किराए के घर में नहीं रखना चाहता था, इसलिए लोन लेकर और सारी बचत तोड़कर घर ले लिया। जानता हूँ कि शादी के बाद तुम्हें वो कुछ भी नहीं दे सका जिसके सपने हमने बुने थे। लेकिन मैं इन सबके लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहा था शांभवी। तुमसे ये सब तब नहीं बाँटना चाहता था, तुम परेशान हो जाती। तुम यूँ भी बहुत परेशान थी। भले मुझे बच्चे के न आने के लिए ज़िम्मेदार ठहरा दो, लेकिन अपनी ख़स्ताहाली में एक बच्चा लाकर मैं बोझ और नहीं बढ़ा सकता था। तुमपर तो बिल्कुल नहीं।
कुछ चीज़ों पर हमारा बस नहीं होता, कई बार अपनी भावनाओं, अपनी प्रतिक्रियाओं पर भी नहीं। कुछ मैं विवेकहीन हुआ, कुछ तुम्हारा व्यवहार दिल दुखाने वाला रहा। लेकिन प्यार तो हम अब भी एक-दूसरे से करते हैं। वर्ना तुम मेरी सुविधा की सोचकर मेरे लिए फ्रिज पर नंबर न छोड़ जाती।
फ़ेलोशिप पूरी कर आओ, दुनिया घूम लो। तबतक मैं अपने घर में बच्चे के लिए हर तैयारी कर लूँगा। लौट आना। जल्दी।”
मेल के साथ तीन अटैचमेंट थे- एक बैंक स्टेटमेंट। किसी प्रोजेक्ट का एग्रीमेंट और एक गाना, जिसे शांभवी सुन पाती, उससे पहले उसे फ्लाइट डिपार्चर का अनाउसमेंट सुनाई दे गया।
शांभवी ने अपना लैपटॉप बंद कर दिया। सिर्फ़ एक ही ख़्याल आया था उसको, बच्चे को दोनों ने मिलकर बचाया होता और हर हाल में पाल-पोसकर बड़ा किया होता तो आज की तारीख़ को वो छः साल का होता। अब शांभवी किसी को दोषी नहीं ठहराएगी, सिवाय ख़ुद के।
अपनी क़िस्मत भी अपनी, अपने फ़ैसले भी अपने।
शांभवी अपना हैंडबैग लेकर बोर्डिंग के लिए बढ़ गई। पीछे कुर्सी पर छूट गए नीले स्कार्फ़ ने भी अपनी क़िस्मत और शांभवी के फ़ैसले से समझौता कर लिया।
कुछ यूँ होना उसका
आज भी सुश्रुता होमवर्क करके नहीं आई है।
क्लास में किसी-न-किसी बहाने टीचर का अपमान करना, बाक़ी लड़कियों से बदतमीज़ी करना, सवालों के उल्टे-पुल्टे जवाब देना- सब उसकी आदतों में शुमार हो गया है। कितनी ही बार डायरी में लिखकर शिकायत की है मैंने। लेकिन माँ-बाप की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं। अपने बच्चों पर इस क़दर ढील दी जाती है क्या?
“सुश्रुता पांडे, सुश्रुता… मैं आपसे बात कर रही हूँ।”
“यस टीचर।” चेहरे पर अन्यमनस्कता का भाव लिए सुश्रुता बैठी है क्लास में, उठने की ज़हमत भी नहीं उठाती।
“आपने आज भी होमवर्क नहीं किया?” मैं अपनी आवाज़ पर कोमलता क़रीब-क़रीब थोपती हूँ, कुछ इस तरह कि मुझे अपनी ही आवाज़ बनावटी सुनाई देती है।
“नो टीचर, नहीं किया।”
“जान सकती हूँ क्यों?” अब मेरी आवाज़ रूखी हो गई है।
“सारे बहाने दे चुकी हूँ टीचर, अब कोई नया बहाना नहीं।” उदंडता के साथ दिया गया जवाब मुझे हैरान कर देता है और बाक़ी लड़कियों की हँसी छूट जाती है।
मैं अब कुछ नहीं कहती। नहीं, आज डायरी में शिकायत नहीं लिखूँगी। प्रिंसिपल से भी कुछ नहीं कहूँगी। स्टॉफ रूम में भी कोई बात नहीं करूँगी इस बारे में। इन सबका कोई फ़ायदा नहीं है। डायरी पेरेन्ट्स तक पहुँचती नहीं। प्रिंसिपल मैम भी मीठी-मीठी आवाज़ में कहेंगी, “यू हैव टू हैंडल इट सुचित्रा। यू आर द टीचर। यू हैव टू हैंडल इट वेरी केयरफुली।”
मुझे पाँच साल की नौकरी में आज तक समझ नहीं आया कि प्रिंसिपल मैम जिस ‘वेरी’ पर इतना ज़ोर डालती हैं, उस ‘वेरी’ का दरअसल तात्पर्य क्या है।
क्लास ख़त्म कर मैं किसी तरह स्टॉफ रूम में चली आई हूँ। यहाँ भी सुश्रुता की नज़रें मेरे पीछे-पीछे चली आई हैं। किसी की आँखें कैसे आपके पीछे आपका मखौल उड़ा सकती हैं, ये मुझे स्कूल में टीचर बनने के बाद समझ में आया है।
लंच ब्रेक में मैंने सुश्रुता को लाइब्रेरी के पास मिलने के लिए बुलाया है। लाइब्रेरी के बाहर खिड़की पर बैठकर मैं उसके आने का इंतज़ार करती हुई बाहर का शोर सुन रही हूँ। जिस खिड़की पर मैं बैठी हूँ, वहाँ से स्कूल का लॉन नज़र आता है और यहाँ से नज़र आती हैं लॉन में कुलाँचें भरतीं, छोटे-छोटे दलों में बैठी, खेलती-हँसती, बोलती-बतियाती लड़कियाँ। देखते-देखते ये भी बड़ी हो जाएँगी।
जिस साल मैंने इस स्कूल में नौकरी शुरू की उस साल सुश्रुता तीसरी में थी। अब आठवीं में आ गई है। जब मैंने नौकरी शुरू की तब सिया एक साल की थी। धीरज की ज़िद पर एम.एससी. किया। बी.एड. किया। पीएचडी के लिए एनरोल कराया ख़ुद को। धीरज की ज़िद पर ही इस स्कूल में पढ़ाने के लिए तैयार हुई। “मैं छह-छह महीने जहाज़ पर रहूँगा। मेरी गैरहाज़िरी में तुम अपने ख़ाली दिन कैसे भरोगी सुचित्रा? तुम्हें लोगों से मिलने की, बाहर निकलने की, अपनी ज़िंदगी जीने की ज़रूरत है। सिया के साथ तुम ख़ुद को बाँधकर ख़ुद को पूर्ण मत समझो।”
धीरज ने सही कहा था। लेकिन स्कूल में बड़ी होती लड़कियों को पढ़ाना कोई हँसी-ठट्ठा नहीं। ख़ासकर तब जब आप बेवक़ूफ़ होने की हद तक संवेदनशील हों, जब आपने ख़ुद को अनुशासित रखकर पढ़ाई पूरी की हो, और जब दूसरों से भी आपकी अपेक्षाएँ कुछ ऐसी ही हों।
रोज़ शाम को धीरज के पास न लौटना और सिया को अकेले पालने की ज़िम्मेदारी निभाना मेरी ज़िंदगी की उलझनों को न चाहते हुए भी कई गुना ज़्यादा उलझा देता है। मेरे सामने धीरज या अपने परिवार के साथ रहने का विकल्प है। लेकिन एक उम्र के बाद किसी तरह की दख़लअंदाज़ी आपको रास नहीं आती। आप अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं। अपने तरीक़े से जीना चाहते हैं। तमाम चुनौतियों, अकेले होने के तमाम अहसासों के बावजूद।
“टीचर, यहीं बैठकर मुझे भाषण देंगी या स्टॉफ रूम में सबके सामने?” सुश्रुता के व्यंग्य से मेरी तंद्रा टूटती है।
“भाषण देने के लिए नहीं बुलाया सुश्रुता। लंच किया है तुमने?”
“हाँ। कैंटीन में एगरोल खाया।” न जाने क्यों सुश्रुता की आवाज़ अचानक नर्म पड़ गई है।
“तुमसे मदद चाहिए थी, इसलिए बुलाया। तुम गाँधीनगर में रहती हो ना, ए ब्लॉक में?”
“हाँ, घर का नंबर भी दूँ? घर आकर मेरी शिकायत करेंगी क्या?” सुश्रुता फिर कड़वा बोलने लगी है।
“ओ हो सुश्रुता, तुम भी न! मैंने कहा न तुम्हारी मदद चाहिए मुझे। वैसे अपने नाम का मतलब जानती हो?”
“हाँ, जानती हूँ। और ये भी कि मेरा बिहेवियर मेरे नाम से बिल्कुल अपोज़िट है।”
“मेरे साथ भी ऐसा ही है। नाम तो है सुचित्रा, लेकिन मैं किसी ऐंगल से फ़ोटोजेनिक नहीं हूँ।” अपनी भौंडी नाक और साधारण से नैन-नक्श को लेकर मैंने कभी ऐसा कहा नहीं, आज जाने क्यों कह गई हूँ। वो भी इस लड़की के सामने, जो मेरा मज़ाक उड़ाने का कोई बहाना नहीं छोड़ती।
“दरअसल सुश्रुता, हमलोग दो दिन पहले लालपुर से गाँधीनगर शिफ़्ट हुए हैं। आज सुबह स्कूल आते हुए मैंने तुम्हें बस स्टैंड पर खड़ा देखा, तभी समझ गई कि तुम मेरी पड़ोसी हो। मैं उस इलाक़े को ठीक-ठीक जानती नहीं। न आस-पास किसी को पहचानती हूँ। तुम्हारी मम्मी से मैं कुछ ज़रूरी फ़ोन नंबर और जानकारियाँ ले सकती हूँ?”
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10-05-2020, 12:44 PM,
#19
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
मैं इस लड़की से ये सब क्यों कह रही हूँ? नहीं, इसके लिए तो मैंने इसे बुलाया नहीं। मुझे तो और बात करनी थी इससे! इसकी मम्मी से मिलने का कोई और बहाना भी तो हो सकता है। सुश्रुता भी अविश्वास के साथ ऐसे देख रही है जैसे मेरे चेहरे पर झूठ की कोई लकीर ढूँढ़ना चाहती हो। मैं उसके बिफर पड़ने का इंतज़ार कर रही हूँ, “मम्मी से मिलना था तो यूँ ही मिल लेतीं, झूठ क्यों बोलती हैं टीचर?” लेकिन सुश्रुता कुछ कहती नहीं, मुझे देखती रहती है बस।
“पेन और पेपर है आपके पास?”
सुश्रुता के अप्रत्याशित सवाल से मैं चौंक जाती हूँ। “पेपर पर अपने घर का नंबर लिख दीजिए टीचर। जितना हो सकेगा, मैं आपकी मदद कर दूँगी।” मैं सुश्रुता को अपने घर का नंबर लिखकर दे देती हूँ। जाने क्यों मुझे यक़ीन है कि सुश्रुता स्कूल के बाद मुझसे मिलने ज़रूर आएगी।
छुट्‌टी के बाद अपनी स्कूटी लेकर मैं सिया को क्रेश से उठाने चली जाती हूँ। नर्सरी की छुट्‌टी के बाद सिया को बस स्टॉप से क्रेश के स्टाफ़ ही लेकर चले जाते हैं। स्कूल से लौटते हुए मैं उसे ले लिया करती हूँ। काम करते हुए बच्चे को बड़ा करना आसान नहीं, ख़ासकर तब जब आपके पति साल में छह महीने ज़मीन पर होते हों और बाक़ी छह महीने समंदर की लहरों के साथ जूझते हों। यही वजह है कि मैं अनुशासन में यक़ीन करती हूँ, वक़्त की पाबंद हूँ। घड़ी की सुइयाँ मुझे व्यस्त रखने का काम करती हैं। हर घंटे, हर घड़ी मैंने अपने लिए कुछ-न-कुछ मुक़र्रर कर रखा है। सनक ही है एक तरह की, लेकिन मुझे सही मायने में सनकी बन जाने से इसी पाबंदी ने बचाए रखा है।
शाम को घर की घंटी बजते ही मैं समझ जाती हूँ, ये सुश्रुता है। बालकनी से नीचे झाँककर देखती हूँ तो सुश्रुता ही है, किसी लड़के के साथ मोटरसाइकिल से आई है। मैं दोनों को ऊपर बुला लेती हूँ। ड्राईंग रूम अस्त-व्यस्त है। एक खिड़की पर हैंडलूम का गहरा लाल-नारंगी पर्दा लटक रहा है। दूसरी ख़ाली है। कमरे में बेतरतीब सोफ़ों पर फैले कार्टन के डिब्बों को परे धकेलते हुए मैं दोनों के लिए जगह बनाने की कोशिश करती हूँ। सिया वहीं कार्पेट पर किताबों को ट्रेन के डिब्बे बनाए खेल रही है। इंजन की जगह ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी रखी है। मैं तीस सेकेंड के भीतर कमरा जितना ठीक कर सकती हूँ, कर देती हूँ।
“आप परेशान न हों टीचर। हम बस निकलेंगे अब। ये आपके लिए कुछ नंबर लाई हूँ। मेड को बोल दिया है, छह बजे आकर आपसे बात कर लेगी।” ये कहते हुए वो मेरी ओर काग़ज़ का एक टुकड़ा बढ़ा देती है। काग़ज़ पर उतरी हैंडराइटिंग सुश्रुता की कॉपियों में किसी तरह फेंकी हुई राइटिंग से बहुत अलग है। एक-एक अक्षर संभालकर लिखा गया है जैसे। इसमें किराने की दुकान, दूधवाले, प्लंबर, बिजली मिस्त्री और बढ़ई के नंबर हैं।
“मैं नहीं जानती थी कि आपकी बेटी है, इतनी छोटी। आपको डॉक्टर और अस्पताल के नंबर कल दे दूँगी, स्कूल में।”
मैं हैरान हूँ। ये वही सुश्रुता है जिसकी क्लास में ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हरकतें मुझे क़रीब-क़रीब इस्तीफ़ा देने के कगार पर धकेल दिया करती हैं! ये वही सुश्रुता है जिसकी वजह से मैं दिन में कम-से-कम दस बार अपनी नौकरी को कोसती हूँ! ये वही सुश्रुता है जिसने पिछले आठ महीनों में कम-से-कम अस्सी बार टीचर के रूप में अपनी अक्षमता का अहसास कराया है!
“आप स्कूल जाती हैं तो आपकी बेटी किसके पास रहती है टीचर?” मैं तेरह साल की एक लड़की से ऐसे किसी प्रश्न की उम्मीद तो बिल्कुल नहीं कर रही।
“क्रेश में रहती है स्कूल से आने के बाद।” मेरा अपराध-बोध शायद मेरी ज़ुबान पर उतर आया है। इसलिए मैं तुरंत सफ़ाई देती हूँ, “सिया के पापा होते हैं तो यहीं होते हैं, उसके साथ दिन भर। जब जहाज़ पर होते हैं तब मुझे क्रेश में छोड़ना पड़ता है।”
लेकिन मैं इस लड़की को सफ़ाई क्यों दे रही हूँ? इस तरह के सवाल पूछनेवाली ये होती कौन है? मैं अपने आवाज़ की मृदुता को फिर घोंट जाती हूँ और सख़्त टीचर का लबादा ओढ़ लेती हूँ।
“पानी लोगी? तुम्हारा भाई भी बहुत देर से खड़ा है। तुम दोनों बैठ क्यों नहीं जाते?”
सुश्रुता हँस देती है। “भाई नहीं है टीचर, बॉयफ़्रेंड है मेरा।”
सुश्रुता मेरी नज़रों में उतर आई परेशानी और शॉक को पहचान लेती है और उसके होंठों के कोनों पर खिल्ली उड़ाने जैसी मुस्कान लौट आई है- वैसी मुस्कान जिसे ‘स्मर्क’ कहते हैं। इस ‘स्मर्क’ को नज़रअंदाज़ करते हुए मैं सुश्रुता से बैठने को कहती हूँ। आभार व्यक्त करने के लिए दोनों को शर्बत पिलाने के अलावा मुझे फ़िलहाल कुछ नहीं सूझ रहा।
मैं शर्बत बनाने के लिए भीतर चली गई हूँ। सुश्रुता और उसका ‘बॉयफ़्रेंड’ फ़र्श पर बैठकर सिया के साथ खेलने लगे हैं। क्रेश जाने का एक फ़ायदा सिया में नज़र आया है मुझे, वो अजनबियों से घुलने-मिलने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगाती। जितनी देर में मैं टैंग बनाकर लाती हूँ, उतनी देर में उस लड़के ने सिया के लिए किताबों की इमारत खड़ी कर दी है और तीनों ‘क़ुतुब मीनार-क़ुतुब मीनार’ कहते हुए तालियाँ बजा-बजाकर हँस रहे हैं।
मैं अपने चेहरे पर जबरन मुस्कुराहट चिपकाए दोनों की ओर एक-एक कर शर्बत का ग्लास बढ़ाती हूँ। सोचती हूँ, कैसी माँ है इसकी जिसे मालूम तक नहीं कि उसकी बेटी अपने ‘बॉयफ़्रेंड’ के साथ गली-गली चक्कर लगाया करती है। लड़की की बेशर्मी तो देखो, अपनी टीचर से मिलाने तक ले आई है इसको।
थोड़ी देर बैठने के बाद सुश्रुता चली जाती है। मुझसे ज़्यादा दोनों सिया से ही बातें करते रहते हैं। ये लड़का मुझे किसी कोने से बदतमीज़ या लफंगा नहीं लगता। लेकिन ‘बॉयफ़्रेंड’ वाली बात मैं अपने हलक़ से नीचे धकेल नहीं पाती। जाने इस पीढ़ी के लिए ‘बॉयफ़्रेंड-गर्लफ़्रेंड’ के रिश्ते का मतलब क्या होता होगा?
मैं बहुत देर तक परेशान हूँ। सिया मुझसे बात करने आती है तो मैं उसे दो-एक बार झिड़क भी देती हूँ। इस परेशानी को मैं नाम नहीं दे पा रही। लेकिन मैं एक साँस में सुश्रुता और सिया दोनों के बारे में क्यों सोच रही हूँ। धीरज फ़ोन करेंगे तब उठ जाऊँगी खाने के लिए, ये सोचकर मैं सिया को किसी तरह दूध का ग्लास थमाकर अपने बढ़े हुए थायरॉड पर अपनी झल्लाहट के सारे दोष डालती हूँ और शाम को जल्द ही सोने चली जाती हूँ।
सुश्रुता फिर आ गई है सुबह-सुबह, कामवाली को लेकर। इस बार वो लड़का नहीं है साथ में। मैं जितनी देर कामवाली से काम और पैसे को लेकर मोल-तोल कर रही होती हूँ, उतनी देर सुश्रुता सिया के साथ खेलने में लगी है। सिया उसे श्रुति दीदी बुलाती है। सुश्रुता ने ही कहा होगा उससे। कामवाली को काम पर लगाकर मैं सुश्रुता और सिया दोनों से नाश्ते के लिए पूछती हूँ। दोनों ‘ना’ में सिर हिलाते हैं और सुश्रुता सिया को अपने साथ पार्क लेकर जाने की इजाज़त माँगती है। इस बार ‘ना’ में सिर हिलाने की बारी मेरी है, ये जानते हुए भी कि इस समय अगर सिया को थोड़ी देर के लिए भी सुश्रुता देख लेती है तो मैं कई काम निपटा सकूँगी। पर्दे लग जाएँगे, अलमारियाँ सहेजी जा सकेंगी। किताबों को शेल्फ़ से सजाने का काम पूरा हो जाएगा। सब्ज़ी और दूध भी आ जाए शायद।
लेकिन मैं सुश्रुता को सिया की हमजोली बनाने के लिए क़तई तैयार नहीं। यदि सिया भी उसी की तरह…नहीं नहीं…ऐसी संस्कारहीन लड़कियों से दूर ही रखना होगा सिया को…। मैं इस बार स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ कहती हूँ। सुश्रुता मुझे अपने घर का और अपना मोबाइल नंबर देकर चली जाती है, “कोई ज़रूरत पड़े तो फोन कर लीजिएगा टीचर।”
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10-05-2020, 12:44 PM,
#20
RE: Antervasna नीला स्कार्फ़
मैं फिर सुश्रुता की माँ के बारे में सोचने लगती हूँ। शायद माँ के पास इसके लिए समय न हो। शायद घर की किसी परेशानी की वजह से ऐसी हो गई हो। वर्ना वो कौन-सी माँ होगी जिसे ये भी होश न हो कि बेटी सुबह-शाम जब चाहे, जैसे चाहे, घर से बाहर चली जाती है। और इसके पापा? हो सकता है उन्हें सुश्रुता से कोई लेना-देना ही न हो। या फिर ये भी तो हो सकता है कि धीरज की तरह उनकी नौकरी भी शहर से बाहर दूर कहीं हो। अकेली माँ के लिए बच्चा पालना कितना मुश्किल होता है। घूम-फिरकर सुश्रुता से जुड़े हर विचार, हर सोच जाने क्यों मेरी ओर ही मुड़ जाया करते हैं…
हर रोज़ स्कूल जाते हुए बस स्टैंड पर मैं सुश्रुता को अकेली खड़ी देखती हूँ। जी में आता है, स्कूटी रोककर उसे अपने साथ ही ले लूँ। लेकिन मेरा अहं हर बार आड़े आ जाता है। इस तरह का लव-हेट रिलेशनशिप मेरा किसी के साथ नहीं रहा आजतक। किसी दोस्त के साथ नहीं। किसी संबंधी के साथ नहीं। किसी टीचर, किसी स्टूडेंट के साथ नहीं। फिर सुश्रुता ही क्यों? मैं क्लास में उससे क़रीब-क़रीब नज़रें चुराने लगती हूँ। शायद इसलिए भी कि मुझे डर है। सुश्रुता के साथ दोस्ती बढ़ाने का मतलब उसे अपने घर बिन बुलाए आ जाने जैसा कुछ निमंत्रण दे देना। फिर सिया से उसकी क़रीबी मुझे रास नहीं आएगी। और मैं जान-बूझकर कोई तनाव नहीं चाहती अपनी ज़िंदगी में।
लेकिन सुश्रुता भी कम ढीठ नहीं। एक दिन सुबह वो मुझे अपने-आप बस स्टॉप पर रोक देती है और बिना पूछे स्कूटी पर पीछे बैठ जाती है। खीझती-चिढ़ती-कुढ़ती मैं स्कूल ले आती हूँ उसे। और फिर तो ये रोज़ का सिलसिला हो जाता है। स्कूटी मैं न रोकती, यदि आस-पास के इतने सारे लोग मुझे न देख रहे होते। ख़ुद को दी जानेवाली ये सफ़ाई बस इतनी-सी ही है। एक गैरज़रूरी सफ़ाई। शायद मैं अपनी सुविधा के लिए ही सुश्रुता को अपने नज़दीक आने दे रही हूँ। पड़ोसी है मेरी। अकेली रहती हूँ मैं। क्या पता कब मुझे इसकी ज़रूरत पड़ जाए। वैसे लव-हेट रिलेशनशिप की बात तो मैंने ख़ुद से स्वीकार कर ली है।
लेकिन मेरे सिर्फ़ इतना कर देने भर से सुश्रुता पर वो असर पड़ा है जिसकी मैंने पिछले दो सालों में उम्मीद न की होगी। सुश्रुता होमवर्क बनाकर लाती है। क्लास टेस्ट देती है और जैसे-तैसे सही, टेस्ट में पास भी होती है। स्कूटी पर चढ़ने का किराया पूरी मेहनत के साथ चुकाया है उसने।
इस बार पेरेन्ट-टीचर मीटिंग में मैंने इतने सालों में पहली बार सुश्रुता के पापा को देखा है। अधेड़ क़िस्म का एक शख़्स, जिसके दाहिने हाथ में एक लैपटॉप केस है और बाएँ हाथ में गाड़ी की चाभी। कपड़ों से, चाल-ढाल से वे कॉरपोरेट सेक्टर में काम करनेवाले कोई अफ़सर लगते हैं और पिता कम, दादा ज़्यादा दिखाई देते हैं। “या तो वक़्त ने हमें वक़्त से पहले बुज़ुर्ग कर दिया है, या वक़्त से पहले हम उम्रदराज़ दिखाई देने लगे हैं,” मेरी सहयोगी ताहिरा ने आज सुबह ही किसी बात पर तो कहा था स्टॉफ़ रूम में।
सुश्रुता के आगे-आगे चलते हुए वे मेरी मेज़ तक पहुँचते हैं। हल्के-हल्के चलकर आते उनके क़दमों की आहट मुझे हल्का कर देती है और मैं मुस्कुराकर उनसे कुर्सी पर बैठने का आग्रह करती हूँ।
“आप सुचित्रा मैम हैं न? सुश्रुता की माँ ने मुझसे कहा था आपसे मिलने के लिए।”
मैं चौंक जाती हूँ। सुश्रुता की माँ से तो मैं कभी नहीं मिली। वे बोलना जारी रखते हैं, “ये भी सुना है कि आप पड़ोसी हैं हमारी। ये जगह तो उचित नहीं आपको घर बुलाने के लिए, लेकिन सुश्रुता की टीचर की हैसियत से नहीं, हमारी पड़ोसी होने के नाते आइए न कभी हमारे घर।”
मैं मुस्कुराती हुई सिर हिलाती रहती हूँ और बार-बार बातचीत का रूख सुश्रुता के सेकेंड टर्म के क्लास रिज़ल्ट और उसके रवैए की ओर मोड़ना चाहती हूँ। लेकिन पिताजी तो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं। मौसम, सड़क, मोहल्ला, त्यौहार इन सबके बारे में ग़ैर-ज़रूरी बातें होती हैं। सिर्फ़ सुश्रुता की पढ़ाई से जुड़ी कोई ज़रूरी बात नहीं होती। ऐसा बिंदास और बेपरवाह पेरेन्ट मैंने अपने इतने सालों के करियर में नहीं देखा। मैं थककर उनकी ओर रिपोर्ट कार्ड बढ़ा देती हूँ और रजिस्टर में साइन करने का अनुरोध कर इंतज़ार कर रहे दूसरे अभिभावकों की ओर मुड़ जाती हूँ।
कम-से-कम इन्हें अपनी बेटियों की पढ़ाई में तो दिलचस्पी है। कम-से-कम इनसे बात करते हुए मेरा वक़्त तो ज़ाया नहीं होगा।
क्रिसमस की छुट्टियाँ शुरू हो गई हैं। राँची में मौसम बहुत ख़ुशगवार है इस साल। अच्छी-सी धूप पसरी रहती है सुबह से शाम तक छत पर। मुझे गाँधीनगर का ये घर अचानक बहुत अच्छा लगने लगा है। घरों के आगे चौड़ी-चौड़ी सड़कें हैं। सड़कों के किनारे-किनारे गुलमोहर, अमलतास, नीम, सेमल के पेड़। खिड़की से पर्दे हटाने पर दिसंबर की धूप पूरे कमरे में पसर जाती है। धीरज भी आनेवाले हैं एक-दो दिनों में। मैं सुबह बालकनी में बैठकर अख़बार पढ़ रही हूँ और सिया वहीं नल के नीचे रखी बाल्टी से भर-भरकर मग से पास में रखे गमलों में पानी डाल रही है। तभी दरवाज़े की घंटी बजी है। मैंने झाँककर नीचे देखा, ये सुश्रुता है जो किसी महिला के साथ आई है।
गेट खोलने की कोशिश में सुश्रुता की एक उँगली कुंडी के नीचे आ गई है शायद। काली शॉल में लिपटी महिला उसकी चोट खाई उँगली को ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रही हैं। मैं फ्रिज से बर्फ़ की ट्रे लिए नीचे चली जाती हूँ। बर्फ़ का टुकड़ा हाथ पर रगड़ते हुए सुश्रुता उस महिला के साथ ऊपर आ गई है। सिया के लिए उनके हाथ में चॉकलेट का डिब्बा है। मेरे ‘ना-ना’ करते रहने के बावजूद वो डिब्बा सिया के हवाले कर दिया जाता है। थोड़ी देर के लिए दोनों सिया से ही बातें करते रहते हैं। जैसे मुझसे नहीं, सिया से मिलने आए हों। मैं उठकर चाय बनाने के लिए चली जाती हूँ तो सुश्रुता मेरे पीछे-पीछे किचन तक चली आती है।
“आप मम्मी के साथ बैठिए टीचर, मैं आप दोनों के लिए चाय बना देती हूँ।”
मैं न चाहते हुए भी होंठों पर जबरन एक मुस्कान चिपकाए ड्राईंग रूम में वापस लौट जाती हूँ। काली शॉल में लिपटी महिला मुझे देखकर मुस्कुराती हैं। कनपटियों के पास से झाँकते चाँदी के गुच्छों से कई तार निकलकर माँग के बीचों-बीच चले आए हैं। बालों को रंगने की भी कोई कोशिश नहीं। इनके चेहरे को ध्यान से देखते हुए जाने क्यों मुझे वहीदा रहमान की याद आई है। कल ही तो किसी फिल्म में देख रही थी। हाँ, ‘दिल्ली 6’ में।
ये सुश्रुता की माँ हैं? मैंने तो एक दूसरे तरह की महिला की कल्पना की थी। क्यों सोच लिया था मैंने कि सुश्रुता की मॉम सुपरमॉम जैसी कुछ होंगी? फॉर्मल कपड़ों में लैपटॉप हाथ में लटकाए दफ़्तर में पूरा-पूरा दिन गुज़ारनेवाली कोई बिज़नेस वूमैन। ये घरेलू-सी दिखनी वाली अधेड़ लेकिन अभिजात महिला सुश्रुता जैसी अल्हड़ लड़की को क्या संभाल पाती होंगी?
“आपसे एक गुज़ारिश करने आई हूँ।”
“जी कहिए।”
“छुट्टियों में सुश्रुता आपसे मैथ्स और साइंस पढ़ना चाहती है।”
“लेकिन मैं ट्यूशन नहीं पढ़ाती।”
“सुश्रुता ने बताया था।”
अजीब लोग हैं ये। दूसरों के ख़्यालों की कोई क़द्र नहीं। ख़ुद को दूसरों पर थोपने के लिए हमेशा तैयार! इसलिए सुश्रुता ऐसी है।
“मैं सिया को नीचे ले जाऊँ? तबतक आप और मम्मी बात कर लीजिए टीचर।”
अब मैं ग़ुस्से में फट पड़ने को तैयार हूँ। एक तो मुझसे बग़ैर पूछे मेरे घर मिलने चले आते हैं, दूसरे मुझसे मेरे सिद्धांतों के ख़िलाफ़ काम कराने की बात करते हैं। जानते हुए भी कि मैं ट्यूशन नहीं पढ़ाती। ऊपर से तुर्रा ये कि मेरी बेटी पर भी हक़ जमाने लगी है ये लड़की!
“सिया, कहीं नहीं जाना है इस वक़्त।” मेरा क्षोभ हर बार की तरह मेरी बेटी पर निकलता है। सुश्रुता अपनी माँ की ओर देख रही है।
“बाहर ठंड है बेटा। धूप तो है, लेकिन हवा चल रही है। श्रुति, तुम सिया को लेकर यहीं खेलो। मैं और टीचर बाहर बालकनी में बैठ जाते हैं, ठीक है न?”
जाने उनकी आवाज़ में कैसा सम्मोहन है कि मेरा ग़ुस्सा अपने-आप कम हो जाता है और मैं चाय का मग लिए कुर्सी खींचती हुई बालकनी में चली जाती हूँ।
“कब से पढ़ना चाहती है सुश्रुता?” मैंने सुश्रुता नाम की चुनौती को ख़ुद ही गले लगाया है।
“जब से आप चाहें। आप अपनी सुविधा के मुताबिक़ वक़्त दे दीजिएगा। मैं आपको कुछ और बताना चाहती हूँ।”
“हाँ, कहिए न।”
“सुश्रुता मेरी छोटी बेटी है। मेरी शादी के अट्ठारह साल बाद पैदा हुई। मेरा एक बेटा भी था, शांतनु। फाँसी लगा ली उसने एक दिन। उसे डर था कि मैथ्स में फ़ेल हो जाएगा और उसके पापा ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएँगे। उसका जीना मुहाल कर देंगे। उसके हिसाब से उसके जीने से उसका मर जाना आसान था। उसको लगता था उसके मैथ्स में फ़ेल हो जाने से आसान हमारे लिए उसके मर जाने का सदमा बर्दाश्त करना होता। मैं आजतक सोचती हूँ कि एक माँ के तौर पर मैंने कहाँ ग़लती की? जहाँ-जहाँ मुझे ग़लतियाँ नज़र आईं, मैंने सुश्रुता के साथ नहीं दुहराईं। हमने इसे पढ़ाई के लिए कभी नहीं कहा। सुश्रुता की ज़िंदगी से बढ़कर पढ़ाई नहीं है। उसे मैंने बचपन से उसकी मर्ज़ी से जीने दिया है। वो उद्दंड ज़रूर है लेकिन उच्छृंखल नहीं है,” सुश्रुता की माँ लगातार बोलती चली जाती हैं और मैं सुनती चली जाती हूँ।
किसी को सांत्वना देना दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है।
इस छोटी-सी बातचीत में सुश्रुता के व्यवहार की सारी मनोवैज्ञानिक परतें मेरे लिए आसानी से खुल गई हैं। अब उसे लेकर मेरे मन में कोई उलझन नहीं, कोई परेशानी नहीं। हाँ, मैं ये तय नहीं कर पा रही कि उन्हें सुश्रुता के साथ घूमनेवाले ‘बॉयफ़्रेंड’ के बारे में बताऊँ या नहीं। ये मसला मैंने अगली मुलाक़ात के लिए टाल दिया है।
सिया और सुश्रुता की दोस्ती को लेकर अचानक मेर मन हल्का हो गया है। अचानक मुझे लगने लगा है कि टीचर के रूप में सुश्रुता मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। वो उपलब्धि जिसके बारे में फ़ख़्र से अपनी क्लास में आनेवाली कई पीढ़ियों को बता सकूँगी।
सुश्रुता हर सुबह मेरे घर आने लगी है। अल्जेब्रा के समीकरण हल करते-करते हमारे बीच का समीकरण भी आसान लगने लगा है। ट्यूशन के बाद सुश्रुता के पास सिया को छोड़कर मैं रसोई, घर और बाज़ार के छोटे-मोटे काम निपटाने लगी हूँ।
नए साल पर सुश्रुता फिर अपने बॉयफ़्रेंड को लेकर मेरे घर आई है। “टीचर, आप दुष्यंत को भी पढ़ाएँगी?”
उसकी धृष्टता मुझे हैरान कर देती है। मैं मना कर देती हूँ लेकिन गाहे-बगाहे दुष्यंत मेरे घर बिन बुलाए आ टपकता है। लेकिन उसकी कोई हरकत ऐसी नहीं होती जिसकी वजह से मैं उसका आना रोकूँ अपने यहाँ।
मैं एक दिन लॉ ऑफ़ ग्रैविटेशन पढ़ाते-पढ़ाते सुश्रुता को ज़िंदगी में ग्रैविटी के मायने समझाने लगी हूँ। फिर मैंने उससे पूछ ही लिया, “दुष्यंत ने हाथ पकड़ा है कभी?”
सुश्रुता अचकचाकर मेरी ओर देखने लगी है।
“किस? किस किया है तुम दोनों ने?”
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