Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
10-18-2020, 01:24 PM,
#11
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“कल । सुबह-सवेरे । बाइस सैक्टर में मेरे घर के करीब से ही सुबह छ: बजे एक डीलक्स टूरिस्ट बस चलती है । उसमें मेरी सीट बुक है ।”
“तू गोवा तक बस पर जायेगी ?”
“ईडियट ! दिल्ली तक बस पर जाऊंगी । आगे आई.जी. एयरपोर्ट से पणजी की फ्लाइट पकडूंगी ।”
“वहां पार्टी में तेरी कैब्रे परफारनेंस है ?” - तीसरा बोला ।
“नैवर ।” - फौजिया आंखें तरेरकर उसको घूरती हुई बोली - “वो एक इज्जतदार आदमी की इज्जतदार पार्टी है और मैं वहां की इज्जतदार मेहमान हूं । समझे !”
“अपनी प्रिंसेस शीबा ! लीडो की कैब्रे डांसर ! इज्जतदार मेहमान !”
“नो शीबा । लीडो । नो कैब्रे । नो नथिंग । सिर्फ फौजिया खान ।” - वो गर्व से बोली - “फौजिया खान । सतीश की खास मेहमान । जिसे उसने स्पेशल अर्जेन्ट टेलीग्राम देकर इनवाइट किया । मेरा दर्जा उधर गोवा में वी.वी.आई.पी. का है । समझे तुम उछलने-कूदने वाले बंदर लोग !”
तत्काल सबको सांप सूंघ गया । फौजिया के मिजाज में आया वो बदलाव उनके लिए अप्रत्याशित था ।
फिर सिर झुकाये, एक-एक करके वो वहां से खिसकने लगे ।
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10-18-2020, 01:24 PM,
#12
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
फर्स्ट क्लास के कम्पार्टमैंड में संयोगवश वो वृद्धा अकेली बैठी थी जब कि फिल्म अभिनेत्रियों जैसी चकाचौंध वाली एक युवती पूना स्टेशन से उस कम्पार्टमैंट में सवार हुई थी । स्टेशन पर जो शख्स उसे छोड़ने आया था, वो ट्रेन की रवानगी से पहले उससे गले लगकर मिली थी और गाड़ी की रफ्तार पकड़ लेने के बाद काफी देर तक भावविह्रल नेत्रों से पीछे स्टेशन की ओर देखती रही थी ।
युवती तनिक सैटल हुई तो वृद्धा मीठे स्वर में बोली - “मैं सांगली तक जा रही हूं ।”
“मैं आखिर तक ।” - युवती धीमे किन्तु मीठे स्वर में बोली - “वास्को-डि-गामा ।”
“सैर करने जा रही हो ?”
“नहीं । वहां एक पार्टी है ।”
“वास्को-डि-गामा में ?”
“नहीं । आगे फिगारो आइलैंड पर ।”
“पार्टी रिश्तेदारी में होगी ?”
“नहीं । वो एक री-यूनियन पार्टी है ।”
“ओह ! कालेज के पुराने सहपाठियों की ?”
“नहीं । वो क्या है कि कालेज तक तो मैं पहुंची ही नहीं थी ।”
“पहले ही शादी हो गयी होगी ?”
“नहीं । शादी तो अभी सिर्फ चार साल पहले हुई है ।”
“वो सजीला-सा नौजवान जो तुम्हें गाड़ी पर चढाने आया था, जरूर तुम्हारा पति होगा ?”
“हां ।”
“अभी कोई” - वृद्धा उसके एकदम पीठ से लगे सुडौल पेट को निहारती हुई बोली - “बच्चा हुआ नहीं मालूम होता ।”
“ठीक पहचाना ।” - युवती तनिक हंसती हुई बोली ।
“फिगर खराब हो जाती है, इसलिये ?”
“नहीं, नहीं । वो बात नहीं ।”
“तुम कोई फिल्म स्टार हो ?”
“नहीं ।”
“तो जरूर को फैशन माडल हो ।”
“कभी थी । सात-आठ साल पहले तक । अब तो सब छोड़-छाड़ दिया ।”
“पति ने छुड़वा दिया होगा !”
“नहीं, वो बात नहीं । माडलिंग का एक दौर था जो एकाएक शुरु हुआ था और फिर कोई सात-आठ साल पहले एकाएक ही खत्म हो गया था ।”
“अच्छा !”
“हां । वो क्या है कि तब फैशन गारमैंट्स के क्रिश्च‍ियन डायोर, पियरे कार्दिन, जियानी वरसाचे जैसे प्रसिद्ध विदेशी व्यापारियों का और उनके संसार प्रसिद्ध ब्रांड नेम्स का ताजा-ताजा ही भारत में आगमन हुआ था । उन विदेशी कम्पनियों के बनाये गारमैंट्स की तब दो साल तक भारत के तमाम बड़े शहरों में फैशन परेड हुई थीं । तब हम आठ लड़कियां थीं जो उन फैशन परेडों में हिस्सा लिया करती थीं । बहुत मशहूरी हुई थी हमारी । हम ब्रांडो की बुलबुलें कहलाती थीं और तब भारत का बच्चा-बच्चा हमें जान गया था ।”
“सतीश की बुलबुलें ! - वृद्धा ने मन्त्रमुग्ध भाव से दोहराया - “अजीब नाम है ।”
“सतीश की जिद थी कि हम इसी नाम से जानी जायें ।”
“सतीश कौन ?”
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10-18-2020, 01:24 PM,
#13
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“बुलबुल सतीश । बहुत रईस आदमी है । पार्टियां देना उसका खास शौक है । फैशन शोज का वो सिलसिला तो कब का खत्म हो चुका है लेकिन वो आज भी हर साल आजकल के सुहाने मौसम में हम सबको यूं फिगारो आइलैंड पर स्थ‍ित अपने मैंशन में इनवाइट करता है जैसे वो अपने परिवार के नजदीकी रिेश्तेदारों का पुनर्मिलन आयोजित कर रहा हो । आठ साल से मुतवातर चल रहा है ये सालाना सिलसिला । कभी ब्रेक नहीं आया ।”
“ओह ! तो पुरानी तमाम सहेलियां अपने वाली हैं !”
“उम्मीद तो है ।”
“ये बुलबुल सतीश गोवा में ही रहता है ?”
“सिर्फ दो महीने । बाकी अरसा इटली, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी वगैरह में गुजारता है ।”
“बहुत रईस आदमी होगा !”
“हां । बहुत रईस । फिल्दी रिच ।”
“कारोबार क्या है उसका ?”
“ऐश करना । देश-विदेश की सैर करना । पार्टियां आयोजित करना ।”
“ये तो शौक हुए न ! मेरा सवाल कारोबार की बाबत था ।”
“कारोबार भी यही है । खानदानी रईस है । करोड़ों, अरबों की दौलत का इकलौता वारिस है ।”
“तभी तो ।”
“वो दौलत को ऐसी निकम्मी चीज मानता है जिसको अगर और दौलत कमाने के लिये इस्तेमाल न किया जाये तो जिसका कोई इस्तेमाल नहीं । और और दौलत कमाने की उसकी कोई मर्जी नहीं क्योंकि जितनी दौलत उसके पास है, वो कहता है कि उससे वो ही नहीं सम्भलती ।”
“ऐसे रंगीले राजा के यहां तुम्हारे पति ने तुम्हें अकेले भेज दिया ?”
“सतीश बहुत भला आदमी है । उसने अपनी किसी बुलबुल से कभी कोई गलत व्यवहार नहीं किया । तब नहीं किया जब कि फैशन शोज के दौरान हम तमाम लड़कियां पूरी तरह से उसके हवाले थीं और उसके एक इशारे पर उसके लिये कुछ भी करने के लिये बेताब रहती थीं ।”
“यानी कि” - वृद्धा हंसी - “बुलबुलों से बहेलिये को कोई खतरा हो तो ही, बहेलिये से बुलबुलों को कोई खतरा नहीं था । न था, न है ।”
“यही समझ लीजिये ।”
“तभी तुम्हारे पति ने तुम्हें अकेले भेजा वर्ना तुम्हारे साथ आता ।”
युवती हंसी ।
“नाम क्या है तुम्हारा ?”
“आलोका । आलोका बालपाण्डे ।”
“नौ-दस साल पहले के उन फैशन शोज की कुछ-कुछ याद अब मुझे आ रही है जिनमें विदेशी डिजाइनरों के परिधान प्रदर्शित किये जाते थे । मुझे याद पड़ता है कि तब पोशाकों की उतनी वाहवाही नहीं हुई थी जितनी पोशाकें पहनने वाली लड़कियों की ।”
“ठीक याद पड़ता है आपको । तब छा गयी थीं सारे भारत के फैशन सीन पर हम सतीश की बुलबुलें ।”
“अब तो ये नाम भी मुझे परिचित-सा जान पड़ता है ।” - वृद्धा के माथे पर यूं बल पड़े जैसे वो अपनी याददाश्त पर जोर दे रही हो - “कहीं आज की मशहूर फिल्म स्टार शशिबाला भी तो पहले कभी तुम लोगों में से एक नहीं थी ?”
“थी । वो भी सतीश की बुलबुल थी ।”
“तो आज की मशूहर फिल्म स्टार कभी तुम्हारी सहेली थी । फैलो बुलबुल थी ।”
“थी । लेकिन तब मेरी उससे ज्यादा नहीं बनती थी । मेरी ज्यादा बनती थी मारिया से । या फिर आयशा से । आयशा से सब की बढिया बनती थी ।”
“यह अब कहां हैं ?”
“आयशा तो अहमदाबाद में है । मेरे से पहले शादी कर ली थी उसने लेकिन घर बसा नहीं बेचारी का । ट्रेजेडी हो गयी ।”
“अरे ! क्या हुआ ?”
“अभी कुछ साल पहले उसके पति की डैथ हो गयी । हार्टफेल हो गया बेचारे का ।”
“ओह !” - वृद्धा विषादपूर्ण स्वर में बोली - “औरत के साथ इस से बड़ा जुल्म और क्या हो सकता है कि उसके सिर पर उसे उसके मर्द का साया उठ जाये !”
आलोका ने सहमति में सिर हिलाया ।
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10-18-2020, 01:25 PM,
#14
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“और वो दूसरी लड़की !” - वृद्धा उत्सुक भाव से बोली - “मारिया !”
“उसने एक अनिवासी भारतीय से शादी कर ली थी जो उसे अपने साथ कैनेडा ले गया था । शादी के बाद से वो एक बार भी इन्डिया वापिस नहीं लौटी ।”
“खुशकिस्मत निकली । आजकल दौलतमंद पति कहां मिलते हैं ।”
“हमें मिलते थे । सतीश की बुलबुलों के तो पीछे भागते थे दौलतमंद लोग ।”
“फिर तो तुम्हारा पति भी दौलतमंद होगा ?”
“है तो सही ।”
“बिजनेस में है ?”
“हां । कपड़े का बिजनेस है ।”
“नाम क्या है उसका ?”
“रोशन बालपाण्डे । मैं रोशी बुलाती हूं ।”
“सुन्दर नाम है । वो खुद भी बहुत सुन्दर था । मैंने देखा था पूना स्टेशन पर ।”
आलोका मुदित मन में मुस्कराई ।
“एक और भी लड़की थी जो कि, बकौल तुम्हारे, सतीश की बुलबुल कहलाती थी और जिसका जिक्र मैंने काफी बार अखबारों में पढा था । जहां तक मुझे याद पड़ता है, किसी बड़े मशहूर घराने में उसकी शादी हुई थी । उसके पति के पूर्वजों को, कहते थे कि, प्रीवी पर्स मिलता था ।”
“आप शायद पायल पाटिल की बात कर रही है ।”
“हां, वही । यही नाम था । पायल । पायल पाटिल ।”
“पायल हम सबमें सबसे ज्यादा खूबसूरत थी ।”
“अब भी मिलती है ?”
“नहीं । अब तो सालों से उसकी सूरत नहीं देखी मैंने ।”
“ओह !”
“लेकिन जितनी वो खूबसूरत थी, उतनी ही अभागी निकली ।”
“क्यों, क्या हुआ ?”
“विधवा हो गयी । शादी के थोड़े ही अरसे बाद ।”
“हे भगवान ? क्या हुआ ?”
“एक्सीडेंट । समुद्र में डूब मरा उसका पति । लाश तक बरामद न हुई ।”
“तौबा !”
“आंटी, अब आप अपने बारे में भी तो कुछ बताइये ।”
“हां । जरूर ।”
वृद्धा ने अपने परिचय का एल.पी. शुरु किया तो वो उसकी मंजिल आ जाने पर ही बन्द हुआ ।
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10-18-2020, 01:25 PM,
#15
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
वो फिगारो आइलैंड के फैरी पायर पर खड़ी उस स्टीमर को देख रही थी जो कि पणजी के कलगूंट बीच और फिगारो आइलैंड के बीच चलता था और अब सवारियां उतारकर वापिस लौटा जा रहा था । स्टीमर काफी दूर निकल गया तो उसके उधर से अपनी तवज्जो हटाई और घूमकर पायर पर रही मौजूद एक टेलीफोन बूथ में दाखिल हो गयी । उसने हुक पर से रिसीवर उतारकर कान से लगाया तो उसे आपरेटर की आवाज सुनायी दी - “नम्बर प्लीज ।”
“बुलबुल सतीश के बंगले में लगा दो ।” - नम्बर बताने के स्थान पर वो बोली ।
तत्कान नम्बर मिला ।
सतीश का ऐसा ही प्रताप था उस आइलैंड पर ।
उसे सतीश के आवाज सुनायी दी तो उसने तत्काल कायन बाक्स में सिक्का डाला और फिर घण्टी जैसी खनकती आवाज में बोली - “हल्लो !”
“बोलिये ।” - उसे सतीश की आवाज सुनाई दी ।
“डार्लिंग, मैंने कहीं तुम्हें सोते से तो नहीं जगा दिया ! अभी सिर्फ बारह ही बजे हैं न ।”
“हू इज स्पीकिंग, प्लीज ।”
“हनी” - उसने शिकवा किया - “घर आये मेहमान को कहीं ‘हू इज स्पीकिंग’ बोलते हैं ।”
“पायल !” - एकाएक सतीश के मुंह से आश्चर्चभरी सिसकरी निकली - “पायल ! क्या सच मैं तुम बोल रही हो ?”
“मैं तो हूं, पायल । तुम अपनी बोलो, सतीश ही हो न ?”
“एट युअर सर्विस, माई हनीपॉट । हमेशा की तरह ।”
“थैक्यू ।”
“पायल ! इतने सालों बाद ! एकाएक ! तुम्हारी आवाज सुनी तो सन्नाटे में आ गया मैं । मैं बयान नहीं कर सकता मुझे कितनी खुशी हुई है तुम्हारी आमद की । लेकिन देख लो, इतने सालों बाद भी मैंने तुम्हारी आवाज फौरन पहचानी है ।”
“फौरन तो नहीं पहचानी, डार्लिंग ।”
“एक-दो सैकंड की देरी हुई जिसकी कि मैं माफी चाहता हूं । वो क्या है कि सच में ही तुम्हारी फोन काल ने ही मुझे जगाया है ।”
“फिर तो मैं माफी चाहती हूं ।”
“ओह, नो । नैवर । यू आर मोस्ट वैलकम । इतने सालों बाद तुमने मेरा न्योता कबूल किया, मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा हूं । बोल कहां से रही हो ?”
“फैरी पायर से ।”
“पायर से ! यानी कि स्टीमर पर पहुंची हो ?”
“हां ।”
“कैसी हो ? कहां थी इतना अरसा ? इतने साल मेरे न्योते पर आना तो दूर, जवाब तक न दिया । इतने साल... नैवर माइन्ड । तुम फौरन यहां पहुंचो, फिर दिल से दिल की बातें होंगी ।”
“डार्लिंग, वो क्या है कि...”
“मुझे मालूम है वो क्या है । अब तुम मेरे आइलैंड पर हो और मेरे कब्जे में हो । तुम पायर से एक टैक्सी पकड़ो और फौरन यहां पहुंचो । मैं तुम्हें दरवाजे पर आरती लिये खड़ा मिलूंगा ।”
“आई, सतीश !”
“मैं सच कह रहा हूं । तुम मेरी स्पेशल बुलबुल हो । इतने सालों बाद तुमने मुझे अपनी आमद से नवाजा है । पता नहीं मैं तुम्हें पहचान भी पाउंगा या नहीं ।”
“अच्छा ! आवाज पहचान सकते हो ! सूरत नहीं पहचान सकते ?”
“ये भी ठीक है । पायल तुम बदली तो नहीं ?”
“जरा भी नहीं बदली ।”
“वैसी ही हो न जैसी सात साल पहले तब थीं जब आखिरी बार मिली थीं ?”
“ऐन वैसी ही हूं ।”
“दैट्स, गुड न्यूज । मुझे तुम्हारे में एक छटांक की घट-बढ भी बर्दाश्त नहीं होगी ।”
“रैस्ट अश्योर्ड, डार्लिंग । तुम्हे यूं लगेगा जैसे अभी कब ही तुम मेरे से मिले थे ।”
“आई एम रिलीव्ड । चैन पड़ गया मेरे मन को ।”
“तुम्हारी बाकी बुलबुलें पहुंच गयीं !”
“जिनकी आमद की उम्मीद थी वो आ गयी हैं । मेरा मतलब है सिवाय तुम्हारे और आयशा के ।”
“मारिया ?”
“वो तो कब ही कैनेडा माइग्रेट कर गयी । अब तो वो इन्डिया ही नहीं आती, गोवा क्या आयेगी ।”
“ओह !”
“पायल डार्लिंग, तुम ऐसा करो, तुम टैक्सी न पकड़ो । तुम थोड़ी देर वहीं ठहरो । मेरी हाउसकीपर वसुन्धरा अभी गाड़ी लेकर पायर की तरफ ही रवाना हुई है । आयशा ही रिसीव करने के लिये । वो साढे बारह बजे वाले स्टीमर पर पहुंच रही है । तुम मेरी हाउसकीपर को तो नहीं पहचानती होगी लेकिन आयशा को तो पहचना ही लोगी । तुम आयशा के साथ ही यहां चली आना । तुम्हें थोड़ी देर इन्तजार तो करना पड़ेगा लेकिन टैक्सी के पचड़े से बच जाओगी ।”
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10-18-2020, 01:25 PM,
#16
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“सतीश, वो क्या है कि...”
“वैसे तो तुम वसुन्धरा को भी पहचान लोगी । वो कोई एक क्विंटल की ड्रम जैसी औरत है जो...”
“...मैं फौरन वहां नहीं आ रही हूं ।”
“फौरन नहीं आ रही हो । क्या मतलब ?”
“मुझे यहां एक काम है ।”
“काम है ? यहां काम है ?”
“हां ।”
“यहां कहां ? पायर पर ?”
“पायर पर नहीं, ईस्टएण्ड पर ।”
“लेकिन...”
“निहायत जरूरी काम है डार्लिंग । मैं उससे निपटकर ही तुम्हारे पास आ पाउंगी । मैं मरी जा रही हूं सतीश से और सतीश की बुलबुलों सें मिलने को । लेकिन क्या करूं ! मजबूरी है । काम बहुत जरूरी है । काम से फारिग हो जाने के बाद में चाहे बड़े थोड़े अरसे के लिए सबसे मिलने जाऊं, लेकिन आऊंगी जरूर ।”
“थोड़े अरसे के लिये ! वाट डू यू मीन थोड़े अरसे के लिये ! माई हनी चाइल्ड तुम भूल रही हो कि अब तुम सतीश की टैरीटेरी में हो । तुम अपने आपको यहां गिरफ्तार समझो । इतने सालों के बाद मुलाकात और वो भी थोड़े अरसे के लिये ! नो...।”
“मेरी बात तो सुनो ।”
“...नैवर ।”
“मेरा कल दोपहर तक वापिस चले जाना जरूरी है ।”
“सवाल ही नहीं पैदा होता । तब तक तो अभी पार्टी ठीक से शुरु भी नहीं हुई होगी ।”
“मैं शर्मिंदा हूं लेकिन मेरी मजबूरी है । यकीन जानो मेरी मजबूरी है । इतना टाइट शिड्यूल है मेरा कि मेरे पास दूसरा रास्ता ये ही था कि मैं तुम्हारी पार्टी में आने की सोचती ही न ।”
“ओ, नो । ये तो तुमने बहुत अच्छा किया कि दूसरा रास्ता अख्तियार न किया ।”
“तभी तो मैं कहती हूं कि...”
“आल राइट । तुमने जल्दी जाना है तो अभी का अभी यहां पहुंचो ।”
“ये नहीं हो सकता । मेरा काम बहुत देर रात में जाकर मुकम्मल होगा ।”
“यूं तो तुम आधी रात को यहां पहुंचोगी ।”
“उसके भी बाद ।”
“फिर क्या मजा आया ? ये तो सजावार काम कर रही हो तुम । यानी कि तुम्हारी सूरत तक देखने के लिये मुझे सारा दिन तरसना पड़ेगा । सतीश की कोई बुलबुल सतीश पर ऐसा जुल्म क्यों कर ढा सकती है !”
“मुझे आने तो दो, डार्लिंग । रूबरू हो होने दो । फिर मैं तुम्हारे तमाम गिले-शिकवे दूर कर दूंगी ।”
“पक्की बात ?”
“हां ।”
“अब बोलो क्या कहती हो ?”
“जैसे तुमने अपनी हाउसकीपर को... क्या नाम है उसका ?”
“वसुन्धरा । वसुन्धरा पटवर्धन ।”
“जैसे तुमने उसे आयशा को लिवा लाने के लिये गाड़ी लेकर पायर पर भेजा है, वैसे ही क्या वो मेरे लिये भी आ सकती है ?”
“बिल्कुल आ सकती है । क्यों नहीं आ सकती ?”
“गुड । उसे बोल देना कि रात को दो बजे वो मुझे पायर पर बुकिंग ऑफिस के सामने मिले ।”
“रा... रात के दो बजे ?”
“हां ।”
“इतनी देर बाद । ये तो कल ही हो गयी ।”
“आई एम सारी आलरेडी, डार्लिंग ।”
“तुम वाकेई अभी नहीं आ सकती हो ?”
“डार्लिंग, तुम मेरे सब्र का इम्तहान ले रहे हो ।”
“ऐसी कोई बात नहीं लेकिन अगर तुम अभी...”
“ओके ! नाओ हैल विद यू एण्ड विद युअर इनवीटेशन एण्ड विद युअर रीयूनियन पार्टी । मेरी गुडबाई अभी कबूल करो । मैंने भूल की तुम्हें फोन करके ।”
“माई हनी चाइल्ड । तुम तो जरा नहीं बदलीं । गुस्सा पहले की तरह आज भी तुम्हारी नाक की फुंगी पर रखा रहता है ।”
“कैन इट, मैन । सीधा जवाब दो ।”
“वसुन्धरा पहुंच जायेगी । जब कहोगी, जहां कहोगी, पहुंच जायेगी ।”
“रात दो बजे । पायर के बुकिंग आफिस के सामने । तब तक के लिए नमस्ते ।”
“अरे, सुनो-सुनो । पायल, माई डार्लिंग, अभी लाइन न काटना अभी...”
लेकिन वो पहले ही रिसीवर वापिस हुक पर टांग चुकी थी । उसने टेलीफोन बूथ का दरवाजा खोला और फंसकर उसमें से बाहर निकली । उसकी खनकती आवाज से मैच करते चुलबुलाहट के जो भाव उसकी सूरत पर प्रकट हुए थे, वो एकाएक गायब हो गये थे और अब वो एक निहायत संजीदा-सूरत महिला लग रही थी । फिर वो लम्बे डग भरती पायर पर उस स्थान की ओर बढी जहां कि स्टीमर आकर लगता था ।
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10-18-2020, 01:25 PM,
#17
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
लंच से लौटे राज माथुर ने मैरीन ड्राइव की एक बहुमंजिला इमारत में स्थित आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स के आफिस में कदम रखा । वो वकीलों की एक बड़ी पुरानी फर्म थी जिसके ‘एण्ड एसोसियेट्स’ वाले हिस्से का प्रतिनिधित्व युवा राज माथुर करता था जो कि अपनी बद्किस्मती और अपने दिवंगत पिता की जिद की वजह से वकील था ।
“आपको बड़े आनन्द साहब याद कर रहे हैं ।” - उसके भीतर कदम रखते ही चपरासी बोला ।
राज ने सहमति में सिर हिलाया और फिर अपने कबूतर के दड़बे जैसे केबिन में जा बैठने की जगह उसने बड़े आनन्द, नकुल बिहारी, के विशाल सुसज्जित आफिस में कदम रखा ।
“आपने याद किया, सर ! - राज बड़े अदब से बोला ।
बड़े आनन्द साहब ने आदतन उसे अपने बाइफोकल्स में से घूरा और फिर बोले - “आजकल क्या कर रहो हो ?”
“खास कुछ नहीं, सर ।”
“खास कुछ कब करोगे ?”
राज से उस नाजायज सवाल को जवाब देते न बना ।
“तुम्हारे पिता तो अब रहे नहीं लेकिन तुम्हारी मां फर्म में तुम्हारी प्रॉग्रेस के बारे में अक्सर सवाल पूछती है । वो चाहती है कि हम उसे ये गुड न्यूज दें कि अब तुम यहां अपने काम को पिकअप कर रहे हो । जिस दिन हम उसे ये खबर देंगे कि तुम अपने पिता के मुकाबले में एक चौथाई काबिल वकील भी बन गये हो तो वो तुम्हारी शादी कर देगी ।”
“मुझे शादी की जल्दी नहीं, सर ।”
“यानी कि तुम्हें तरक्की की जल्दी नहीं । अपने पिता से एक चौथाई ही सही लेकिन काबिल बनने की जल्दी नहीं ।”
“सर, मेरा वो मतलब नहीं था । मेरा तो सिर्फ ये मतलब था कि मैं अभी शादी...”
“तुम्हारी शादी की जल्दी तुम्हारी मां को है । मां को । समझे ।”
“ज... जी... जी हां ।”
“तीन साल से तुम अपने पिता की जगह यहां हो । अभी तक का तुम्हारा ट्रैक रिकार्ड ये समझ लो कि ‘जस्ट एवरेज’ है ।”
“सर, वो क्या है कि...”
“सुनते रहो । बीच में मत टोको ।”
“यस, सर ।”
“मैं तुम्हें एक जिम्मेदारी का काम सौंपने जा रहा हूं । मैं तुम्हें अपनी काबलियत दिखाने का, अपनी उम्दा काबलियत दिखाने का, एक सुनहरा मौका देने जा रहा हूं ।”
राज का दिल डूबने लगा । क्या कराना चाहता था बूढा उससे ?
“यंग मैन, आई हैव ए स्पेशल असाइनमैंट फार यू ।” - वृद्ध बोले - “आर यू रेडी फार इट ?”
“यस, सर । आफकोर्स, सर ।”
“तुम्हें गोवा जाना है ।”
“क... कब ?”
“आज ही । शाम ही फ्लाइट से । तुम्हारी टिकट मैंने मंगवा ली है ।”
“ग... गोवा कहां, सर ?”
“फिगारो आइलैंड पर । ये कोई ढाई सौ किलोमीटर के क्षेत्रफल वाला छोटा सा आइलैंड है । पणजी से सोलह किलोमीटर दूर कलंगूट बीच है, उससे वाकिफ हो ?”
“यस, सर ।”
“फिगारो आइलैंड वहां से पचास किलोमीटर दूर है जहां के लिये कलंगूट बीच से स्टीमर मिलता है । वहा तुम्हें मिस्टर सतीश नाम के एक साहब के यहां पहुंचना है । मिस्टर सतीश वहां की मशहूर हस्ती है । आइलैंड पहुंचने पर कोई भी टैक्सी वाला तुम्हें वहां पहुंचा देगा । ओके ?”
“यस, सर ।”
“मिस्टर सतीश को तुम्हारी आमद की खबर कर दी जायेगी । वहां तुम्हारा पूरा स्वागत होगा इसलिये बेखौफ जाना ।”
“थैक्यू, सर । लेकिन काम क्या है ?”
“यंग मैन, ऐसा सवाल नहीं करना चाहिये जिसका जवाब वैसे ही सामने आने वाला हो । मैं तुम्हें यही बताने जा रहा था कि तुमने बीच में टोक दिया ।”
“आई एम सॉरी, सर ।”
“बुरी आदत होती है अपने सीनियर को बीच में टोकना ।”
“आई विल रिमेम्बर, सर ।”
“तुम शायद नाडकर्णी के नाम से वाकिफ हो ?”
“जी हां । वो एक रईस आदमी था और अपनी जिन्दगी में हमारी फर्म का क्लायन्ट था ।”
“करैक्ट । मुझे खुशी है कि तुम कभी-कभार कोई अहम बात याद भी रख पाते हो ।”
कमीना ! खामखाह मिर्ची लगाता है !
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10-18-2020, 06:30 PM,
#18
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“खुद मेरा वजह तिरासी किलो है ।” - वो एकाएक यूं बोली जैसे वसुन्धरा को तसल्ली दे रही हो - “लेकिन मुझे तो शादी और शादी की आराम तलबी ने बरबाद कर दिया । पांचवी बीवी थी मैं अपने उम्रदाज पति की । मैंने तो कोई देखी नहीं लेकिन वो कहता था कि उसकी पहली चारों बीवियां सूखी टहनी जैसी थीं जो कि उसके जिस्म को तो क्या, निगाह को भी चुभती थीं । वो अपने पहलू में गोल-मटोल गुलगुली औरत पसन्द करता था इसलिये जब मेरा वजन बढना शुरु हुआ तो वो खुश होने लगा । इसी वजह से मैंने भी परवाह नहीं की, नतीजतन मेरी छत्तीस चौबीस छत्तीस फिगर आखिरकार चालीस छत्तीस ब्यालीस हो गयी । - वो हंसी - “मेरा वजन बढता था तो वो खुश होता था और बिस्तर में ज्यादा जोशोखरोश से कलाबिजयां खाता था । फिर एक रोज उसी जोश ने बेचारे की जान ले ली । बासठ साल की उम्र में । और यूं मेरे मन की मुराद पूरी हुई ।” - वो फिर हंसी - “धनवान विधवा बनने की । पहली चार मिसेज चावरियाओं के नसीब न जागे, मेरे जाग गये । मालदार सेठ मानकलाल का सारा माल मेरे हवाले । भगवान ऐसी विधवा सबको बनाये । नहीं ?”
वसुन्धरा ने सहमति में सिर हिलाया ।
“आजकल मैं अहमदाबाद के फाइव स्टार होटल में हैल्थ क्लब और ब्यूटी पार्लर चलाती हूं । मेरे पास आना, मैं तुम्हारा कायापलट कर दूंगी ।”
वसुन्धरा ने जवाब न दिया ।
“अब ये न कहना कि पहले मैं खुद अपना कायापलट क्यों नहीं करती ? असल बात ये है कि मुझे ऐसी मोटी सेठानी बनके रहना रास आ गया है जिसकी सूरत से ही लगता हो कि उसकी थैली में दम था ।” - वो जोर से हंसी - “अलबत्ता मैं अपने हैल्थ क्लब के मेम्बरों के सामने नहीं पड़ती ।”
वसुन्धरा के मुंह से ऐसी घरघराती-सी आवाज निकली जैसै उसने हंसी में आयशा का साथ देने की कोशिश की हो ।
कुछ क्षण खामोशी रही ।
उस दौरान आयशा कभी रियर व्यू मिरर से झांकती उसकी सूरत का तो कभी उसकी गरदन के पृष्ठ भाग का मुआयना करती रही ।
चश्मा उसे जंचता था - उसने सोचा - लेकिन स्टाइलिश नहीं था, फैशनेबल नहीं था । आजकल काले रंग के मोटे फ्रेम और मोटी कमानियों का कहां रिवाज था । कान्टैक्ट लैंस लगवा ले तो पीछ ही छूट जाये चश्मे का । बाल ऐसे रूखे थे जैसे कभी शैम्पू का नाम ही नहीं सुना था । ऊपर से उन्हें रंगती भी थी । खुद ही । किसी एक्सपर्ट से या काम करवाती तो काले बालों की जड़ें भूरी न दिखाई दे रही होतीं, एक लट पूरी-की-पूरी ही भूरी न दिखाई दे रही होती । जाने से पहले इसका फ्री फेशियल तो कर ही जाऊंगी, थ्रेडिंग भी कर दूंगी और आई ब्रो भी बना दूंगी । तब अक्ल होगी तो चश्मे और बालों की जून खुद संवार लेगी । कभी अहमदाबाद आयेगी तो फ्री स्लिमिंग कोर्स भी करा दूंगी । याद रखेगी पट्टी कि किसी मारवाड़ी सेठानी से पाला पड़ा था । तब इसकी वही साड़ी जो इस वक्त किसी खम्बे के गिर्द लिपटा रंगीन कपड़ा लग रही है, सच में साड़ी लगेगी । तब शायद ये भी किसी मारवाड़ी सेठ की निगाहों में चढ जाये और इसकी तकदीर जाग जाये ।
“तुम गूंगी तो नहीं हो ?” - एकाएक वो बोली ।
“नहीं तो ।” - तत्काल जवाब मिला - “ऐसा कैसे सोच लिया आपने ?”
तौबा ! आवाज भी फटे बांस जैसी । और ऐसी जैसी नाक से निकल रही हो ।
“तो जरूर बोलने में तकलीफ होती होगी ।”
“आप जरूर ये बात मजाक में कह रही हैं लेकिन दरअसल है यही बात । मुझे थॉयरायड की गम्भीर शिकायत है । जब ये शिकायत बढ जाती है तो मुझे बोलने में तकलीफ होती है ।”
“फिर तो तुम्हारे बढते वजन की वजह भी थॉयरायड ही होगी ।”
“वो भी है । पैदायशी भी है । थॉयरायड ठीक हो जाने पर काफी सारा वजन अपने आप घट जाता है लेकिन वो जल्दी ही फिर बढ जाता है ।”
“इसका कोई स्थायी इलाज नहीं ?”
“नहीं ।”
“सतीश से पूछना था । वो सारी दुनिया घूमता है । भारत में नहीं तो शायद किसी और मुल्क में कोई ऐसी दवा हो जो...”
“मैं बॉस से अब बात करूंगी इस बाबत । पहले कभी मुझे सूझी नहीं थी ये बात ।”
“कब से हो सतीश की मुलाजमत में ?”
“तीन महीने से ।”
“काम क्या करती हो ?”
“सभी काम करती हूं । हाउसकीपर का, ड्राइवर का, सैक्रेटी का, जनरल असिस्टेंट का ।”
“पगार अच्छी मिलती होगी ?”
“बहुत अच्छी । उम्मीद से ज्यादा ।”
“अपना सतीश ऐसा ही जनरस आदमी है । रहने वाली कहां की हो ?”
“शोलापुर की ।”
“तुम मुझे पसन्द आयी हो ।”
“थैंक्यू, मैडम ।”
“मैडम नहीं, आयशा । आज से हम फ्रेंड हुए । ओके ?”
“ओके ।”
“सतीश मौसम बदलने तक ही गोवा में रहता है । वो अपने फॉरेन ट्रिप पर निकल जाये तो मेरे पास अहमदाबाद आना । एक महीने में मैं न तुम्हें माधुरी दीक्षित बना दूं तो कहना ।”
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10-18-2020, 06:31 PM,
#19
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“आप मजाक कर रही हैं ।”
“तुम आना तो सही । फिर देखना क्या होता है ।”
“ओके ।”
एकाएक वसुन्धरा ने स्टेशन वैगन को इतना तीखा लैफ्ट टर्न दिया कि आयशा का बैलेंस बिगड़ गया और उसके मुंह से चीख निकल गयी । उसे ऐसा लगा जैसे गाड़ी सड़क के किनारे उगे पेड़ों से जा टकराने लगी हो लेकिन गाड़ी पेड़ों में घुस गयी तो उसे अहसास हुआ कि वहां पेडों के बीच से गुजरती एक पगडण्डी से जरा बड़ी राहदारी थी जिस पर कि स्टेशन वैगन हिचकोले लेती दौड़ रही थी ।
“इस रास्ते की” - आयशा तनिक उखड़े स्वर में बोली - “मुझे तो खबर नहीं थी ।”
“शार्टकट है । मैंने ढूंढा है । आगे झड़ियां थीं जिसकी वजह से दिखाई नहीं देता था । मैंने झाड़ियां कटवा दीं । हम सीधे सड़क पर जाते तो बॉस की एस्टेट अभी एक मील दूर थी । इस शार्टकट से तो देखिये हम पहुंच भी गये ।”
गाड़ी जैसे घने जंगल से निकलकर खुले में पहुंची ।
आयशा ने नोट किया कि वो जगह इतनी उंची थी कि वहां से आगे सतीश के किले जैसे मैंशन का और उससे आगे समुद्र का निर्विघ्न नजारा किया जा सकता था । अब गाड़ी के ढलुवां रास्ते पर एक फूलों से लदे खूबसूरत उद्यान के बीच से गुजर रही थी और अब सतीश का दौलतखाना करीब तर-करीब होता जा रहा था ।
कई एकड़ हरियाली में फैली उस एस्टेट में जो विशाल इमारत खड़ी थी, वो गोवा की आजादी के बाद सतीश के स्वर्गीय पिता ने बनवाई थी और भव्यता और ऐश्वर्य में अपनी मिसाल खुद थी । उसमें जो विशाल स्विमिंग पूल था, वो अनोखे तरीके से बना हुआ था । वो आधा खुले आसमान के नीचे था और आधा इमारत के रेलवे प्लेटफार्म जैसे विशाल लाउन्ज की छत के नीचे तक यूं फैला हुआ था कि वहां सोफे पर बैठा कोई शख्स इच्छा होने पर सोफे पर से ही स्विमिंग पूल में छलांग लगा सकता था ।
सतीश उसे बुलबुल का बंगला कहता था लेकिन राजप्रासाद नाम भी उसके लिए छोटा पड़ता था । जैसी कमाल की वो इमारत थी, वैसी ही कमाल की वहां फरनिशिंग और बाकी सुख-सुविधाएं थी । ऐसा था सतीश का वैभवशाली रहन-सहन जिसमें वो पिछले आठ सालों से अपनी बुलबुलों के साथ सालाना पुनर्मिलन समारोह करता आ रहा था ।
टेनिस कोर्ट और मिनी गोल्फ कोर्स के समीप से गुजरती स्टेशन वैगन मैंशन की पोर्टिको में पहुंची ।
“आए चलिये” - वसुन्धरा बोली - “मैं आपके सूटकेस लेकर आती हूं ।”
सहमति में सिर हिलाती हूई आयशा गाड़ी से निकली और लम्बे डग भरते हुए उसने चिर-परिचित इमारत के भीतर कदम रखा । आगे लाउन्ज था जहां से अट्टहासों की आवाजें आ रही थीं । कई जनाना आवाजों के बीच गुंजती सतीश की आवाज सबसे ऊंची थी । तत्काल प्रत्याशा में उसका चेहरा खिल उठा, उसका मन उत्साह से झूमने लगा ।
सतीश की पुनर्मिलन पार्टी का जादुई असर उस पर होने भी लगा था । उसने आगे बढकर लाउन्ज का दरवाजा खोला और भीतर कदम रखा । तत्काल अट्टहास के स्वर नयी हर्ष ध्वनि करने लगे ।
“आयशा । आयशा । आयशा आ गयी । आयशा आ गयी ।”
***
राज माथुर बुलबुल सतीश के आलीशान लाउन्ज में मौजूद था और ऐसी निगाहों से सतीश के साथ वहां मौजूद परीचेहरा हसीनाओं को देख रहा था जैसे जो वो देख रहा हो, उसे उस पर यकीन न आ रहा हो । एक नहीं, दो नहीं, पूरी छः परियां । सबका शाही कद काठ, सब हसीन, सब जवान, सबके बाल सुनहरापन लिये हुए भूरे, सब हंसती-खिलखिलातीं मौज मनातीं उसके इर्द-गिर्द । थोड़ी कमीबेशी के साथ सबकी एक ही उम्र ।
उसकी जिन्दगी का वो पहला मौका था जबकि वो जबरदस्ती गले पड़े अपने वकालत के पेशे के लिये अपनी तकदीर को कोस नहीं रहा था ।
छः । छः स्वर्ग की अप्सरायें वहां मौजूद थीं और अभी एक और - पायल पाटिल - वहां पहुंचने वाली थी ।
क्या पता उसका हुस्न इन छः से भी ज्यादा तौबाशिकन हो ?
उसने फ्रांस से आयातित गिलास में सर्व की गयी विस्की की एक चुस्की ली । वैसे ही गिलास बाकी सबके हाथों में, हाथों की पहुंच के भीतर मौजूद थे ।
आठ बजे वो वहां पहुंचा था तो सतीश उससे - एक नितान्त अजनबी से, एक मामूली हैसियत वाले युवा वकील से - बड़े प्रेम-भाव से यूं बगलगीर होकर मिला था जैसे वो सतीश का पुराना वाकिफ था और अक्सर वहां आता-जाता रहता था और उसने बारी-बारी एक-एक का हाथ पकड़कर सबका उससे परिचय कराया था ।
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10-18-2020, 06:31 PM,
#20
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
राज उस वक्त महसूस कर रहा था कि उसके कदम स्वर्ग में राजा इन्द्र के दरबार में पड़े थे और वो युवतियां उर्वशी, रम्भा, मेनका वगैरह को भी मात करने वाली अप्सरायें थीं । अलबता एक, जिसका नाम, उसे आयशा चावरिया बताया गया था और जो धनकुबेर मानकलाल चावरिया की बेवा थी, जरा लार्ज इकानमी साइज अप्सरा मालूम होती थी । फिर भी जिस्म भारी हो गया हो जाने के अलावा उसके हुस्न में अभी भी कोई खोट नहीं थी । बल्कि वो सबसे ज्यादा खुशमिजाज थी और जब भी हंसती थी तो मुक्त कण्ठ से अट्टहास करती थी ।
शशिबाला को वो बिना परिचय के भी पहचानता था क्योंकि उसने उसकी कई फिल्में देखी थीं । उसने महसूस किया कि फिल्मों से ज्यादा हसीन वो साक्षात दिखाई देती थी जो कि नकली चमक-दमक वाले फिल्मी कारोबार में लगी किस युवती के लिये बहुत बड़ी बात थी ।
शशिबाला मशहूर फाइनांसर, प्रोड्यूसर डायरेक्टर दिलीप देसाई की करोड़ों की लागत वाली फिल्म ‘हारजीत’ की हीरोइन थी जो कि तीन चौथाई बन चुकी बताई जाती थी और जिसकी एडवांस पब्लिसिटी इतनी धांसू थी कि हर सिने दर्शक को बड़ी बेसब्री से उसका इन्तजार था । शशिबाला कितने मनोयोग से ‘हारजीत’ में काम कर रही थी, उसका ये भी पर्याप्त सबूत था कि उन दिनों वो कोई और फिल्म साइन नहीं कर रही थी ।
जिस सुन्दरी का नाम उसे डॉली टर्नर बताया गया था, वो कदरन खामोश मिजाज की थी और एक तरफ बैठ ‘विस्की आन राक्स’ चुसक रही थी । जैसा उसका ड्रिंक करने का स्टाइल था, उसे देखते हुए राज को यकीन था कि वो बहुत जल्द टुन्न हो जाने वाली थी ।
फिर वो कारपोरेट टॉप ब्रास जैसे रोब वाली सुन्दरी थी जिसका नाम ज्योति निगम था और जो ‘एशियन एयरवेज’ की सोल प्रोपराइटर थी ।
और वो सदा मुस्कराती आलोका बालपाण्डे जो कि कपड़े के किसी बड़े व्यापारी की पत्नी बताई जाती थी ।
और छटी और आखिरी वो फौजिया खान जो अपनी शिफॉन की साड़ी के साथ कलाई तक आने वाली आस्तीनों वाला स्किनफिट ब्लाउज पहने थी जिसका जिस्म पर वक्त पारे की तरह थिरकता था, जिसके जिस्म की स्थायी, शाश्वत थिरकन किसी को भी दीवाना बना सकती थी ।
दस साल पहले की फैशन की दुनिया की सुपर माडल्स अब समृद्ध गृहणियां थीं, कामकाजी महिलायें थीं, फिर भी सतीश की बुलबुलें थीं ।
उस घड़ी सतीश लाउन्ज से ऊपर को जाती कालीन बिछी अर्धवृताकार सीढियों से होता हुआ ऊपर बालकनी पर पहुंच गया था और एक विडियो कैमरे को दायें-बायें पैन करता हुआ सब को शूट कर रहा था ।
क्या किस्मत पायी थी पट्ठे ने - राज ने मन-ही-मन सोचा - सच में ही राजा इन्द्र था । उम्रदराज आदमी था, फिर भी तन्दुरुस्ती का बेमिसाल नमूना था और शहनशाहों की तरह सजधज कर रहता था । तमाम सुन्दरियां उसकी बुलबुलें थीं और सबको वो दर्जा कबूल था ।
वाह ।
तभी उसने महसूस किया कि डॉली अपने स्थान से उठकर उसके करीब आ बैठी थी ।
“हल्लो !” - राज जबरन मुस्कराता हुआ बोला ।
“हल्लो ।” - वो भी मुस्कराई, वो एक क्षण ठिठकी और फिर बोली - “कबूतर ।”
“क... क्या ।”
“सतीश को देर से सूझा लेकिन सूझा कि इतनी बुलबुलों के बीच एक कबूतर भी होना चाहिये । वेरायटी की खातिर ।”
“ओह । लेकिन मैं... मैं तो...”
“इस बार की पार्टी के लिये सतीश की सरप्राइज आइटम हो ?”
“नहीं । मैं... मैं आइटम नहीं हूं । मैं तो...”
“आइटम भी नहीं हो !” - डॉली की भवें कमान की तरह तनीं - “फिर कैसे बीतेगी ।”
“वो क्या है कि मैं...”
तभी फौजिया भी अपने स्थान से उठी और आकर उसके दूसरे पहलू में बैठ गयी । वो राज को देखकर मुस्कराई । वो सहज मुस्कराहट भी राज को ऐसा लगा जैसे थिरकन बनकर उसके पूरे जिस्म में दौड़ गयी हो ।
“मक्खियां भिनभिनाने लगीं ।” - डॉली धीरे-से बोली ।
“पहले से ही भिनभिना रही थीं ।” - फौजिया खनकती आवाज में बोली ।
“पहले भिनभिनाहट का सोलो चल रहा था । अब डुएट हो गया है ।”
“बहुत जल्दी कोरस बन जायेगा, हनी । क्योंकि सतीश से तो कोई उम्मीद की नहीं जा सकती । तुम्हें तो मालूम ही होगा, डॉली !”
डॉली ने मुंह बिचकाया ।
“मैंने” - राज फौजिया से बोला - “तुम्हें पहले भी कहीं देखा है ।”
“ऐसे नहीं कहते, बच्चे ।” - डॉली बोली - “अहम बात को तरन्नुम में कहते हैं । खासतौर से जब वो बात किसी लड़की को कहनी हो । ‘मैंने शायद तुम्हें पहले भी कहीं देखा है, अजनबी-सी हो मगर गैर नहीं लगती हो’ वगैरह । लाइक फिल्म्स ।”
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