Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
10-18-2020, 06:47 PM,
#91
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
राज अपने कमरे की बाल्कनी में बहुत गम्भीर मुद्रा बनाये बैठा पिछले तीन दिनों में घटित घटनाओं पर विचार कर रहा था जब कि एकाएक उसके कमरे के अधखुले दरवाजें पर दस्तक पड़ी और हाथ में एक कार्डलैस फोन थामे सतीश ने भीतर कदम रखा ।
“तुम्हारी काल है ।” - वो बोला - “बम्बई से । मेरी लाइन पर आ गयी थी । तुम्हें बुलाने की जगह मैं कार्डलैस यहां ले आया ।”
“शुक्रिया ।” - राज उठकर कमरे में कदम रखता कृतज्ञ भाव से बोला - “मेहमाननवाजी तो कोई आपसे सीखे ।”
सतीश मुस्कराया, उसने फोन राज के हाथ में थमा दिया और वहां से विदा हो गया ।
“हल्लो” - राज फोन में बोला - “राज माथुर स्पीकिंग ।”
“मिस्टर माथुर” - उसे अपने बॉस की सैक्रेट्री की आवाज सुनायी दी - “बड़े आनन्द साहब बात करेंगे । होल्ड रखियेगा ।”
“यस । होल्डिंग !”
कुछ क्षण बाद उसके कान में सुराख-सी करती नकुल बिहारी आनन्द की आवाज पड़ी - “माथुर ।”
“यस, सर ।”
“मैं तुम्हारी फरदर रिपोर्ट का इतजार कर रहा था ! फोन क्यों नहीं किया ?”
“सर, वो क्या है कि सुबह से लेकर अब तक यहां बहुत हंगामा हो गया है । इतनी गड़बड़ें हो गयी हैं, इतनी घटनायें इकट्ठी घटित हो गयी हैं कि...”
“माथुर, क्योंकि रात को ट्रंककाल के रेट आधे लगते हैं इसलिये ये न समझो कि तुम फोन पर मुझे कहानियां सुना सकते हो, लम्बी-लम्बी हांक सकते हो ।”
“मैं ऐसा कुछ नहीं समझ रहा, सर ।”
“तो मतलब की बात पर आओ । और जो कहना है संक्षेप में, थोड़े में कहो ।”
“सर, यहां बुरा हाल है ।”
“क्या !”
“यहां हालत काबू से बाहर निकले जा रहे हैं ।”
“फिर भूमिका बांधनी शुरु कर दी ! अरे पहले ये बताओ कि तुम पायल की लाश का पता लगा पाये या नहीं ?”
“नहीं लगा पाया, सर ।”
“क्यों ? क्यों नहीं लगा पाये ?”
“मरे उस्ताद ने मुझे लाशें तलाशने का हुनर नहीं सिखाया था ।”
“क्या ! क्या कहा तुमने ?”
“सर, मैं कह रहा था कि जो कम पुलिस जैसी संगठित फोर्स नहीं कर पा रही थी, उसे मैं अकेली जान भला कैसे कर पाता !”
“हूं । लगता है मुझे खुद वहां आना पड़ेगा ।”
“ये तो बहुत ही अच्छा होगा, सर । फिर तो तमाम की तमाम खोई हुई लाशें बरामद हो जायेंगी ।”
“तमाम की तमाम लाशें ?”
“सर, पता लगा है कि गोवा की आजादी से पहले पुर्तगालियों के राज में भी यहां ऐसे कई कत्ल हुए थे जिनसे सम्बन्धित लाशें आज तक बरामद नहीं हुईं । आप जब पायल की लाश की तलाश के लिये यहां आ ही रहे हैं तो जाहिर है कि यहां एक पंथ सौ काज जैसा मेला लग जायेगा ।”
“मेला ! मैंने तुम्हें वहां मेला देखने के लिये भेजा है ?”
“सर, ये काम मैं आफ्टर आफिस आवर्स में कर रहा हूं ।”
“माथुर, आई डोंट अन्डरस्टैण्ड यू ।”
“आई एम सारी, सर ।”
“एण्ड आई एम नाट हैपी विद यू ।”
“मैं आपको एक चुटकुला सुनाता हूं, सर । आप हैपी हो जायेंगे । वो क्या है कि एक भिखारी था...”
“माथुर ! माथुर ! ये लाइन पर तुम ही हो न ?”
“मैं हूं, सर । लेकिन लगता है कोई और भी है ।”
“यूं मीन क्रॉस टॉक ?”
“यस, सर ।”
“अगेन ?”
“यस, सर ।”
“गोवा की लाइन पर क्रॉस टॉक कुछ ज्यादा ही होती है ।”
“सर, कभी-कभी तो टॉक होती ही नहीं, सिर्फ क्रॉस ही होता है । कभी रैड क्रॉस, कभी ब्लू क्रॉस, कभी विक्टोरिया क्रॉस...”
“पुलिस ने केस में कोई तरक्की की या नहीं की ?”
“की है, सर । अपनी निगाह में उन्होंने कातिल की शिनाख्त कर ली है ।”
उसी क्षण बाल्कनी के बाहर दूर सड़क पर उसे तूफानी रफ्तार से दौड़ती एक कार करीब आती दिखाई दी - जिप्सी !
कार सड़क के मोड़ पर पहुंची तो रेत के एक टीले की ओट आ जाने की वजह से वो उसकी निगाहों से ओझल हो गयी ।
तभी अन्धेरे वातावरण में दूर कहीं से पुलिस के सायरन की आवाज गूंजी । आवाज करीब होती जा रही थी ।
टीले के पीछे से कार फिर सड़क पर प्रकट हुई ।
सतीश की जिप्सी ।
वो लपककर बाल्कनी में पहुंचा ।
जिप्सी का रुख साफ पता लग रहा था कि सतीश के मैंशन की तरफ था लेकिन पोर्टिको के करीब पहुंचने से पहले ही वो एकाएक ड्राइवर के कन्ट्रोल से निकल गयी । उसका अगला पहिया एक खड्ड में उतरा गया, जीप डगमगाई, उसका ड्राइविंग सीट की ओर का दरवाजा खुला और किसी ने उसमें से बाहर छलांग लगायी ।
हे भगवान ! डॉली !
डॉली अभी पोर्टिको से दूर ही थी कि ओट में से एक हवलदार निकला और चिल्लाकर डॉली को रुक जाने का आदेश देने लगा । रुकने की जगह डॉली ने केवल अपना रास्ता बदला, पहले से तेज रफ्तार से वो गार्डन की तरफ भागी और वहां की भूल-भुलैया में गायब हो गयी ।
चेतावनी में चिल्लाता हुआ हवलदार पोर्टिको का पहलू छोड़कर उसके पीछे भागा ।
“माथुर !” - फोन पर उसका बॉस चिल्ला रहा था - “माथुर ! अरे, लाइन पर हो या...”
राज ने उत्तर न दिया ।
नीचे सड़क पर एक पुलिस की जीप पहुंची जिसके ठीक से गतिशून्य हो पाने से भी पहले सब-इंस्पेक्टर फिगुएरा और इंस्पेक्टर सोलंकी उसमें से बाहर कूद पड़े ।
“माथुर !”
“सर” - राज फोन मे बोला - “मैं आपको अभी थोड़ी देर में फोन करता हूं ।”
“लेकिन क्यों ? क्यों ?”
“सर, यहां पाकिस्तान का हमला हो गया है । आई विल रिपोर्ट लेटर, सर ।”
उसने फोन आफ किया, उसे वहीं पलंग पर फेंका और वहां से बाहर को लपका ।
तब तक वहां की तमाम फ्लड लाइट्स आन की जा चुकी थीं और अब सारी एस्टेट रौशनी में नहाई मालूम होती थी ।
गार्डन दौड़ते कदमों की आवाजों से गूंज रहा था ।
गार्डन के दहाने पर उसे फिगुएरा, सोलंकी और दो हवलदार दिखाई दिये । सतीश और उसके मेहमान उन्हें घेरे खड़े थे । उनके करीब ही कोठी के सारे नौकर-चाकर जमघट लगाये खड़े थे ।
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10-18-2020, 06:48 PM,
#92
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
फिर राज को देखते-देखते सोलंकी और उसके दोनों हवलदार गार्डन में दाखिल हो गये ।
वो करीब पहुंचा ।
“गार्डन में आवाजाही का” - सतीश फिगुएरा को बता रहा था - “ये एक ही रास्ता है ।”
“पक्की बात ?” - फिगुएरा बोला ।
“आफकोर्स ?”
“ऐसा कैसे हो सकता है ?” - शशिबाला बोली - “इतना बड़ा गार्डन है । कोई तो दूसरा रास्ता होगा !”
“नहीं है ।” - सतीश तनिक नाराजगी से बोला - “जब मैं कहता हूं नहीं है तो नहीं है । आखिर ये मेरी प्रापर्टी है । आई नो बैटर ।”
“ही इज राइट ।” - अधिकारी बोला ।
“डॉली अभी इस रास्ते से गार्डेन में दाखिल हुई है । वो जब कभी भी बाहर निकलेगी इसी रास्ते से निकलेगी । दस फुट ऊंची दीवार से घिरा ये गार्डन ऐसे ही बना हुआ है कि सामने रास्ते के अलावा और कहीं से कोई खरगोश बाहर कदम नहीं रख सकता । भीतर कई रास्ते हैं जो भूल-भुलैया की तरह एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड हुए हुए हैं लेकिन उनसे निकासी का अन्त-पन्त एक ही रास्ता है जिसके सामने कि हम खड़े हैं ।”
“सतीश” - शशिबाला जिदभरे स्वर में बोली - “तुम भूल रहे हो कि उस रात को जब कोई हाउसकीपर वसुन्धरा को धक्का देकर भागा था, जिसे कि पुलिस वाले कोई ताक-झांक करने वाला बताकर गये थे, तो वो, बकौल वसुन्धरा, भागकर गार्डन में ही घुसा था । और जब मिस्टर माथुर उसकी तलाश में गार्डन में घुसे थे तो वो इन्हें कहीं नहीं मिला था । इसका साफ मतलब है कि गार्डन से निकासी का कोई दूसरा रास्ता तलाश करने में वो शख्स कामयाब हो गया था ।”
“नामुमकिन ।” - सतीश जिदभरे स्वर में बोला - “वो जब भी निकला होगा, इधर से ही वापिस निकला होगा । मिस्टर माथुर गार्डन में गहरे धंसे हुए होंगे जबकि वो यहां से निकल गया होगा । या वो मिस्टर माथुर की मौजूदगी में भीतर कहीं छुपा रहा होगा और फिर इनके तलाश से हारकर लौट आने के बाद यहां से खिसका होगा । इसी रास्ते । आई रिपीट, इसी रास्ते ।”
“इस रास्ते नहीं खिसका था ।”
तत्काल सब खामोश हो गये ।
“कौन बोला ?” - फिर फिगुएरा तीखे स्वर में बोला ।
कोई जवाब न मिला ।
“अभी कौन बोला था ?” - फिगुएरा क्रोध से बोला ।
नौकरों के झुण्ड में से एक युवक झिझकता हुआ एक कदम आगे बढा ।
राज ने देखा वो केयरटेकर का नौजवान लड़का रोमियो था । उसकी सूरत से यूं लग रहा था जैसे वो जोश में मुंह फाड़ बैठा था और अब पछता रहा था ।
“मैं ।” - वो दबे स्वर में बोला - “मैं बोला था ।”
“तुम कौन हो ?”
“ये” - जवाब सतीश ने दिया - “रोमियो है । मेरे केयरटेकर का लड़का है ।”
“तुम” - फिगुएरा सख्ती से उससे सम्बोधित हुआ - “कैसे दावे के साथ कह सकते हो कि हाउसकीपर का हमलावर इस रास्ते से वापिस बाहर नहीं निकला था ।”
“मेरी इस रास्ते पर निगाह थी । मिस्टर माथुर के मिस डॉली टर्नर के साथ वापिस लौट जाने के बाद तक मेरी इस रास्ते पर निगाह थी । इनके लौटने के दो घण्टे बाद तक की मैं गारन्टी करता हूं कि कोई शख्स गार्डन से बाहर नहीं निकला था ।”
“तुम्हारी इस रास्ते पर निगाह क्यों थी ?”
“ये मैं नहीं बता सकता ।”
“क्या !”
“वो मेरा एक राज है जिसे मैं फाश नहीं करना चाहता लेकिन जिसका आपकी तफ्तीश से कोई रिश्ता नहीं ।”
“मैं तुमसे अकेले में बात करूंगा ।”
“अकेले में बात करेंगे तो मैं आपसे कुछ नहीं छुपाऊंगा लेकिन ये मैं फिर दोहराता हूं कि उस रात हाउसकीपर पर हमला होने के बाद, मिस्टर माथुर के उसकी तलाश में निकलने और नाकाम होकर लौटने के दो घण्टे बाद तक कोई जाना या अनजाना शख्स इस रास्ते से बाहर नहीं निकला था ।”
उस नये रहस्योदघाटन ने राज की सोच को जैसे पंख लगा दिये । बहुत तेजी से उस रात की घटनायें न्यूजरील की तरह उसके मानस पटल पर उभरने लगीं ।
मसलन हाउसकीपर ने यकीनी तौर से कहा था कि उसका हमलावर उसे धक्का देकर गार्डन में घुसा था ।
गार्डन में कोई नहीं था, होता तो या राज को कहीं दिखाई देता या रोमियो को गार्डन से बाहर निकलता दिखाई देता ।
इमारत की दीवारें हिलाती बादलों की गर्ज, बिजली की कड़क !
हाउसकीपर की दिल दहला देने वाल चीख जो उन आवाजों से भी ऊंची सुनाई दी थी !
बिजली कड़कने से पहले उन लोगों के बीच क्या वार्तालाप चल रहा था ?
पायल बादलों की गर्ज, बिजली की कड़क का खौफ खाती थी !
और ! और क्या विषय था तब चर्चा का ?
“इसका साफ मतलब है” - फिगुएरा कह रहा था - “कि मिस्टर सतीश का दावा सच नहीं । गार्डन से निकासी का यकीनन कोई और भी रास्ता है ।”
“लेकिन...” - सतीश ने कहना चाहा ।
“एक मतलब और भी है ।” - तब राज तमककर बोला ।
“क्या !” - फिगुएरा उसे घूरता हुआ बोला - “और क्या मतलब है ?”
“पायल पाटिल बिजली की कड़क से खौफ खाती थी...”
तभी गार्डन के रास्ते पर हलचल हुई जिसकी वजह से सबकी निगाहें उधर उठ गयीं ।
रास्ते में पहले सोलंकी और फिर बद्हवास डॉली को दायें-बायें से थामे दो हवलदार प्रकट हुए । डॉली का चेहरा कागज की तरह सफेद था और उसपर गहन पराजय की भाव अंकित थे ।
“मैडम !” - फिगुएरा कर्कश स्वर में बोला - “आप अपने आपको गिरफ्तार समझें ।”
“खामखाह !” - राज तीखे स्वर में बोला ।
“खामखाह, क्या मतलब ?”
“अभी समझाता हूं । मुझे दो मिनट का, सिर्फ दो मिनट का वक्त दो ।”
“क्या करने के लिये ?”
“ये साबित करके दिखाने के लिये कि डॉली को गिरफ्तार करके आप कितनी बड़ी गलती कर रहे हैं ।”
“ओह, नानसेंस । हमें पता है हम क्या कर रहे हैं ।”
“फिगुएरा !” - सोलंकी बोला - “दो मिनट ही तो कह रहा है । दो मिनट से हमें क्या फर्क पड़ जायेगा ?”
“ठीक है ।” - फिगुएरा बोला - “बोलो, क्या कहना चाहते हो ?”
“आपसे नहीं” - राज ज्योति की तरफ घूमता हुआ बोला - “मैडम से कुछ कहना चाहता हूं ।”
ज्योति सकपकाई ।
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10-18-2020, 06:48 PM,
#93
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“मैडम, आपका कहना है कि आपने पायल को उस रोज सुबह-सवेरे तब देखा था जबकि वो चुपचाप यहां से खिसक जाने की कोशिश कर रही थी ?”
“हां ।” - ज्योति बोली - “कितनी बार तो बता चुकी मैं ।”
“और आपने ये कहा था कि वो पहले से भी ज्यादा हसीन, पहले से भी ज्यादा दिलकश लगती थी, उसमें कोई तब्दीली नहीं आयी थी, उसके लिये जैसे वक्त ठहर गया था, वगैरह ?”
“हां ।”
“मिस्टर फिगुएरा, याद है आपको भी ?”
“हां” - फिगुएरा बोला - “याद है । ऐसा ही कहा था मैडम ने । लेकिन...”
“उनकी क्या गवाही दिलवा रहे हो ?” - ज्योति अप्रसन्न भाव से बोली - “मैं क्या मुकर रही हूं अपनी बात से ? मैं फिर कहती हूं, मैंने पायल को वैसा ही देखा था जैसा मैंने...”
“आपने वैसा नहीं देखा था ।” - राज एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला - “आपने कैसा भी नहीं देखा था । देखा ही नहीं था आपने पायल को । न ये घर छोड़कर जाने की कोशिश करते और न किसी और तरीके से । उस रोज पायल से हुई अपनी मुलाकात का जो मंजर आपने बयान किया था, वो फर्जी था । मनघड़न्त था । आपकी कल्पना की उपज था । पायल तब कैसी दिखती थी, वो क्या पहने थी, क्या बातें की थीं उसने आप से, ये सब आपका झूठ है, फरेब है, उस पर हाउसकीपर के कत्ल का इल्जाम थोपने की भूमिका है । आप वैसी पायल से इस मैंशन में कभी नहीं मिलीं ।”
“तुम पागल हो । तुम ये कहना चाहते हो कि पायल यहां आयी ही नहीं थी ? सतीश, तुम बताओ, क्या पायल ने अपने आगमन की खबर करने के लिये पायर से तुम्हें फोन नहीं किया था ?”
“किया था ।” - सतीश पुरजोर लहजे में बोला - “और इस बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती कि मैंने फोन पर पायल से ही बात की थी ।”
“जरूर की थी ।” - राज बोला - “लेकिन फोन पर । रूबरू नहीं । मिस्टर सतीश ने पायल से बात ही की थी, उसे देखा नहीं था ।”
“शशिबाला ने” - ज्योति बोली - “उसके कमरे पर जाकर उससे बात की थी ।”
“कमरे के बन्द दरवाजे के आरपार से ।” - राज बोला - “रूबरू नहीं । मिस्टर सतीश की तरह शशिबाला ने भी उसकी आवाज ही सुनी थी, उसकी सूरत नहीं देखी थी ।”
“आवाज उसकी थी ।” - शशिवाला बोली - “मैं उसकी आवाज लाखों में पहचान सकती हूं ।”
“आप करोड़ो में पहचान सकती होंगी लेकिन ये हकीकत अपनी जगह कायम है कि आपने पायल की सूरत नहीं देखी थी । ऐन इसी तरह फौजिया ने पायल को वसुन्धरा से झगड़ते, उसे डांटते, उस पर बरसते सुना था लेकिन उसकी सूरत नहीं देखी थी ।”
“वो हाउसकीपर से झगड़ रही थी” - फौजिया बोली - “तो हाउसकीपर ने तो देखी होगी उसकी सूरत ।”
“हाउसकीपर ने क्या देखा, इसकी तसदीक हाउसकीपर ही कर सकती थी जो कि परलोक सिधार चुकी है ।”
“लेकिन” - सतीश बोला - “जब तुम वे मानते हो कि जो आवाज इतने जनों ने सुनी थी, वो पायल की थी तो वे क्यों नहीं मानते कि पायल यहां थी !”
“मैंने ये नहीं कहां कि पायल यहां नहीं थी । मैंने सिर्फ ये कहा है कि जिस पायल का अलंकारिक जिक्र ज्योति ने किया है, उसका कोई अस्तित्व नहीं था । हसीन, दिलकश, दिलफरेब, फर के कीमती सफेद कोट में लिपटी, जगमग-जगमग करती पायल सिर्फ और सिर्फ ज्योति निगम की कल्पना की उपज है ।”
“लेकिन” - फिगुएम बोला - “ये तुम मानते हो कि पायल यहां थी ?”
“हां, मानता हूं । उसके यहां न हुए बिना इतने लोगों को उसकी घंटी-सी बजती आवाज से, उसकी खनकती हंसी से धोखा नहीं हो सकता था । जिस किसी का दावा है कि उसने पायल की आवाज सुनी थी, सच है । सच है कि मिस्टर सतीश ने फोन पर पायल से ही बात की थी । सच है कि शशिबाला ने उसके कमरे के बन्द दरवाजे के आर-पार से पायल से ही बात की थी । ये भी कबूल कि फोजिया ने पायल को ही हाउसकीपर पर गर्जते-बरसते सुना था । लेकिन ये सच नहीं कि ज्योति का जगमग-जगमग पायल से आमना-सामना हुआ था और वो इस मैंशन से चुपचाप खिसकी जा रही थी । इसलिये सब नहीं क्योंकि आज की पायल सात साल पहले की पायल की परछाई भी नहीं लगती थी । उसमें इतनी तब्दीलियां आ गयी थीं, वो इतना ज्यादा बदल गयी थी कि कोई उसका सगेवाला भी उसे नहीं पहचान सकता था ।”
“कमाल है !” - सतीश बोला ।
“लेकिन फिर भी किसी ने उसे पहचाना ।”
“किसने ?” - सोलंकी, जोकि अब तक भूल चुका था कि राज को अपनी बात कहने के लिये सिर्फ दो मिनट का वक्त दिया गया था, सस्पेंसभरे स्वर में बोला - “किसने पहचाना ?”
“इसने ।” - राज खंजर की तरह एक उंगली ज्योति की तरफ भौंकता हुआ बोला - “इसने पहचाना ।”
“हां, मैंने पहचाना ।” - ज्योति चिल्लाकर बोली - “इसमें झूठ क्या है ? वो ऐन वैसी ही थी जैसी...”
“वो ऐन क्या जरा भी वैसी नहीं थी जैसी कि वो सात साल पहले थी ।” - राज भी चिल्लाया - “और उसने अपने आप में जो इंकलाबी तब्दीलियां पैदा की थीं, वो जानबूझकर पैदा की थीं । इसलिये पैदा की थीं ताकि कोई उसे पहचान न पाये । अपनी सूरत, अपने बाल, अपना हेयर स्टाइल, अपनी फिगर, अपनी पोशाक, खूबसूरत सुनहरे बाल रूखे और डाई किये हुए । खूब कसके जूड़े की सूरत में बड़ी अम्माओं की तरह सिर के पीछे बांधे हुए । गाल फूले हुए, आंखें सिकुड़ी हुई, ऊपर से चेहरे को आधा कवर कर लेने वाला काले रंग का, मोटे फ्रेम और मोटी कमानियों जैसा चश्मा, बोरे जैसी पोशाक । फटे बांस जैसी ऐसी आवाज जैसे नाक में से निकल रही हो । वजन में कम से कम नहीं तो पैंतीस-छत्तीस किलो का इजाफा । अपनी शख्सियत की हर बात तब्दील कर ली उसने । न तब्दील कर सको तो सिर्फ एक बात । बादलों की गर्ज और बिजली की कड़क से वो आज भी पहले की ही तरह खौफ खाती थी । इसलिये उस शाम को जब एकाएक बिजली कड़की, बादल गर्जे तो न चाहते हुए भी वो हौलनाक चीख उसके मुह से निकल गयी जो कि सारे मैंशन में बिजली की कड़क से भी ऊंची सुनी गयी ।”
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10-18-2020, 06:48 PM,
#94
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“तुम” - सतीश चौंककर बोला - “किसकी बात कर रहे हो ?”
“ये भी कोई पूछने की बात है ! ऐसे हुलिये वाली एक ही तो शख्सियत थी आपकी एस्टेट में ।”
“ओह, नो । नो ।”
“यस ! आपकी हाउसकीपर कथित वसुन्धरा पटवर्धन ही माहिनी पाटिल उर्फ मिसेज श्याम नाडकर्णी थी जिसका कि इसने कत्ल किेया ।”
फ्लड लाइट्स में सबने ज्योति के चेहरे का रंग उड़ता साफ देखा ।
“और इसको आयशा चावरिया का कत्ल इसलिये करना पड़ा क्योंकि वो भी मेरी ही तरह, लेकिन मेरे से पहले, इस हकीकत से वाकिफ हो चुकी थी कि हाउसकीपर ही उनकी एक्स, परीचेहरा बुलबुल पायल थी ।”
“ये झूठ है ।” - ज्योति चिल्लाई - “झूठ है ।”
किसी के चेहरे पर विश्वास के भाव न आये ।
उसके पति के चेहरे पर भी नहीं, जिसकी खातिर कि उसने वो सब कुछ किया था ।
***
सोमवार दोपहर साढे बारह बजे राज अपने बॉस नकुल बिहारी माथुर के आफिस में उसके सामने बैठा अपनी रिपोर्ट पेश रहा था ।
रविवार को तकरीबन सारा दिन सब लोगों का फिगारो आइलैड पर गुजरा था, जहां सब बयान रिकार्ड हुए थे और जहां लम्बी हील-हुज्जत के बाद ज्योति निगम ने अपना अपराध कबूल किया था ।
रविवार रात को ही सोलंकी उसे गिरफ्तार करके अपने साथ पणजी ले गया था ! पुलिस वालों की उनकी मूवमैंट्स से पाबन्दी हटने के बाद कौशल निगम पहला आदमी था जिसने सतीश की एस्टेट से रुख्सत पायी थी । अपनी सफेद टयोटा पर सवार होकर अकेला वो वहां से कूच कर गया था और साफ मालूम होता था कि अपनी बीवी की संकट की घड़ी में पणजी में उसके करीब रहने का उसका कोई इरादा नहीं था ।
उसने फौजिया को अपने साथ ले जाने की पेशकश की थी जिसको फौजिया ने बाकायदा उसे झिड़ककर ठुकरा दिया था और घोषणा की थी कि भविष्य में मर्द जात पर वो मुश्किल से ही विश्वास कर पायेगी ।
सोमवार सुबह वो शशिबाला और धर्मेन्द्र अधिकारी के साथ एस्टेट से रुख्सत हुई थी । सतीश खुद उन्हें पायर पर सी आफ करने गया था ।
रवानगी के वक्त शशिबाला और अधिकारी फाख्ताओं के जोड़े की तरह चहचहा रहे थे । जाहिर था कि उनमें तमाम गिले शिकवे दूर हो गये थे और अब अधिकारी पहले की तरह ही फिर अपनी सेलीब्रेटिड स्टार का सैक्रेट्री था और उसकी अधूरी शूटि़ग पूरी कराने के लिये उसे बैंगलौर ले जा रहा था ।
सतीश की गैरहाजिरी में आलोका और रोशन बालपाण्डे ने एक टैक्सी गंगाई थी और बिना सतीश से विदा लेने की औपचारिकता की परवाह किये वो वहां से रूख्सत हो गये थे ।
सतीश के दो नौकरों को एन.सी.बी. के अधिकारी पकड़कर ले गये थे । उन्होंने कबूल किया था कि बॉस के आदेश पर उन्होंने ही रात के दो बजे दो किलो हेरोइन की थैली कुएं में इस उम्मीद के साथ फेंकी थी कि वहां का मामला ठण्डा पड़ जाने के बाद उसे निकाल लिया जायेगा ।
बॉस कौन था ?
जवाब में पणजी के एक होटल संचालक का नाम लिया गया जिसे कि तुरन्त गिरफ्तार कर लिया गया । उस सन्दर्भ में और भी कई गिरफ्तारियां हुई जिनका मीडिया में इंस्पेक्टर आरलेंडो और डिप्टी डायरेक्टर अचरेकर ने खूब यश लूटा ।
राज को इस बात की खूशी थी कि सतीश नारकाटिक्स स्मगलर नहीं निकला था । उसकी दौलत, उसका ऐश्वर्य हेरोइन स्मगलिंग का नतीजा नहीं था । यानी कि पुलिस का ध्यान कुएं की तरफ आकर्षित करने के पीछे उसका कोई निहित स्वार्थ नहीं था, उसकी जुबानी कुएं का जिक्र मात्र एक संयोग था और पुलिस के लिये उसकी निष्ठा का परिचायक था ।
जाने से पहले अचरेकर सतीश को बहुत कड़ी चेतावनी देकर गया था जिससे उसका मन इतना खिन्न हुआ था कि उसने एस्टेट को स्थायी रूप से बन्द कर देने की घोषणा कर दी थी । नौकरों को इनाम-इकराम से नवाज कर उसने उनकी छुट्टी कर दी थी और फिर कभी गोवा आकर रीयूनियन पार्टी आर्गेनाइज करने से तौबा कर ली थी ।
सन 1995 में सतीश की एस्टेट पर हुई वो आखिरी रीयूनियन पार्टी थी जिसमें कि उसकी दो बुलबुलों का कत्ल हो गया था और एक कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार कर ली गयी थी ।
कुएं से बरामद एयरबैग में मौजूद फर का सफेद कोट, ज्योति ने कबूल किेया था, कि खुद उसका था ।
इतना कीमती कोट उसने कुएं में क्यों फेंका था ?
क्योंकि उसका जिक्र वो खुद अपनी जुबानी पायल के कोट के तौर पर कर चुकी थी । सब-इंस्पेक्टर फिगुएरा ने कत्ल के बाद उसका बयान लेते समय जब उससे एस्टेट से खिसकने की कोशिश करती पायल की पोशाक की बाबत सवाल किया था तो वो गड़बड़ा गयी थी । तब उसने प्रोशाक की जगह उस फर के लम्बे कोट का ही जिक्र कर दिया था जोकि सब कुछ ढंके हुए था । यानी कि पायल की पोशाक के नाम पर गले से लेकर घुटनों से नीचे तक पहुंचने वाले कोट के अलावा उसने कुछ नहीं देखा था । बाद में जब उसे अहसास हुआ था कि मर्डर वैपन रिवॉल्वर की तलाश में हर कमरे की तलाशी हो सकती थी तो उसे कोट की फिक्र पड़ गयी थी । उस कोट की उसके पास से बरामदी रिवॉल्रवर की बरामदी से भी ज्यादा डैमेजिंग हो सकती थी । लिहाजा उसने रिवॉल्वर और कोट को एक एयरबैग में बन्द किया था और वो उसे आधी रात के बाद कुएं में फेंक आयी थी जिसकी तलाशी वो जानती थी किे, पहले ही हो चुकी थी । लोकल टेलीफोन एक्सचेंज से इस बात की भी तसदीक हो चुकी थी कि हाउसकीपर की हत्या वाली सुबह सतीश के मैशन से टैक्सी के लिये कोई फोन नहीं किया गया था । इससे भी इस बात की तसदीक होती थी कि पायल से पोर्टिको में हुई अपनी मुलाकात से सम्बन्धित ज्योति का बयान फर्जी था ।
वस्तुत: अपने उस बयान में ज्योति का सारा जोर इस बात पर था कि पायल वहां से मुंह अन्धेरे चुपचाप खिसक गयी थी ताकि हाउसकीपर के कत्ल के लिये उसे सहज ही जिम्मेदार मान लिया जाता ।
ये भी स्थापित हो चुका था कि गुरूवार रात को हाउसकीपर - जो कि वस्तुत: पायल थी - वो धक्का देकर भाग खड़ा होने वाला शख्स न कोई था और न कोई हो सकता था । हाउसकीपर के बहुरूप में पायल को अपनी हर बात पर काबू था, किसी बात पर काबू नहीं था तो अपनी इस पूर्वस्थापित आदत पर कि वो बिजली की कड़क से, बादलों की गर्ज से डरती थी । उस रात को वो सच में ही पोर्टिको में खड़ी स्टेशन वैगन के खिड़कियां दरवाजे चैक करने आयी थी जबकि एकाएक बिजली कड़की थी और अनायास ही उसके कंठ से वो दिल हिला देने वाली चीख निकल गयी थी । पलक झपकते सब मेहमान दौड़े-दौड़े बाहर निकल आये थे और आनन फानन उसके करीब पहुंच गये थे । तब अपनी चीख की कोई वजह तो उसने बतानी थी इसलिये उसने कह दिया था कि किसी ने उस पर हमला किया था । हमलावर का गार्डन की तरफ भागा होना बताना भी उसके लिये जरूरी था क्योंकि गार्डन का दहाना उसके करीब था जहां घुसकर कि हमलावर आनन-फानन गायब हो सकता था, वो उसे किसी और तरफ भागा बताती तो आनन-फानन वहां पहुंचे मेहमानों को वो भागता दिखाई देना चाहिये था ।
वस्तुत: ऐसे किसी शख्स का अस्तित्व नहीं था, ये बात केयरटेकर के लड़के रोमियो के बयान से भी साबित होती थी । रोमियो का माली की नौजवान लड़की से अफेयर था जिससे कि वो रात को कई बार चुपके-चुपके ग्रीन हाउस में मिला करता था । उस रोज रात को भी वो अपनी प्रमिका के इन्तजार में पलक पावड़े बिछाये ग्रीन हाउस में मौजूद था जबकि वातावरण में हाउसकीपर की दिल हिला देने वाली चीख गूंजी थी । सब हल्ला-हुल्ला ठण्डा होने के बाद भी वो कम-से-कम दो घण्टे अपनी प्रेमिका का इन्तजार करता रहा था और टकटकी बांधे गार्डन में दाखिल होने के रास्ते को देखता रहा था जहां कि उसकी प्रेमिका के किसी भी क्षण कदम पड़ सकते थे लेकिन पड़े नहीं थे ।
उस रात हाउसकीपर स्टेशन वैगन लेकर एस्टेट से निकली ही नहीं थी, ये बात भी भिन्न-भिन्न तरीकों से स्थापित हुई । मसलन:
फौजिया को, जोकि उस रात तीन बजे तक जागती रही थी, स्टेशन वैगन के रवाना होने की और लौटने की कोई भनक नहीं मिली थी जो कि ऐसा कुछ हुआ होता तो जरूर मिली होती । पहले इस बात की तरफ उसकी कतई तवज्जो नहीं गयी थी लेकिन जब ये स्थापित हो चुका था कि हाउसकीपर वसुन्धरा ही पायल थी जो कि मैंशन में पहले ही मौजूद थी जिसे कि किसी के कहीं लेने जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता था तो खुद ही उसने इस बात का जिक्र किया था कि उस रात को हाउसकीपर स्टेशन वैगन लेकर मैंशन से निकली होती तो उसे उसकी जरूर खबर लगी होती ।
निकलने की भी और लौटने की भी ।
जाहिर था कि हाउसकीपर उर्फ पायल ने खुद अपने-आपको पायर से लेने जाने का नाटक करना जरूरी नहीं समझा था । रास्ते में पहिया पंचर हो जाने की वजह से आधा घन्टा लेट पायर पर पहुंचने की कहानी उसने जरूर इसलिये गढी थी क्योंकि सतीश की जुबानी पायल के रात दो बजे पायर के बुकिंग आफिस के सामने मौजूद होने का बहुत प्रचार हो गया था । उसे अन्देशा था कि पायर पर कोई पायल की ताक में हो सकता था जो कि पायल को वहां न पाकर यही समझता कि वो नहीं आयी थी और टल जाता । वस्तुत: ऐसा हुआ भी था, ये अधिकारी खुद अपनी जुबानी बयान कर चुका था । बाद में जब उसे राज की जुबानी हाउसकीपर के लेट हो जाने की और पायल के और भी लेट पायर पर पहुंचने की कहानी सुनने को मिली थी तो वो उसे तुरन्त हज्म हो गयी थी ।
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10-18-2020, 06:48 PM,
#95
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
बड़े आनन्द साहब ने आदतन अपने बाई फोकल्स में से उसे घूरा और फिर शुष्क स्वर में बोले - “आई एम ग्लैड दैट यू आर बैक । अब जो कहना है संक्षेप में कहो ।”
“मैंने तो कुछ भी नहीं कहना है, सर ।” - माथुर अदब से बोला ।
“क्या ?”
“मेरे ख्याल से आपने सुनना है ।”
“क्या फर्क हुआ ? तुम्हारा मतलब है तुम्हारी रिपोर्ट की जरूरत मुझे है, तुम्हें नहीं ।”
“अब मैं अपनी जुबानी कैसे कहूं, सर ? बेअदबी होगी ।”
“माथुर, मुझे तुम्हारे में एक खटकने वाली तब्दीली दिखाई दे रही है । जरूर ये गोवा की आबोहवा का असर है ।”
“आबोहवा बहुत बढिया है सर, वहां की ।” - माथुर उत्साह से बोला - “खासतौर से आजकल के दिनों में । आपको वहां जरूर जाना चाहिये और लौट के ही नहीं आना चाहिये ।”
“क्या !”
“मेरा मतलब है कि आपका वहां ऐसा मन रमेगा कि आप ही नहीं चाहेंगे लौट के आना ।”
“एनफ । ऐनफ आफ दैट । नाओ गैट आन विद युअर रिपोर्ट ।”
“यस, सर । सर वो क्या है कि सात साल पहले पायल पाटिल ने, जबकि उसकी शादी को अभी तीन ही महीने हुए थे, अपने पति श्याम नाडकर्णी का कत्ल कर दिया था ।”
आनन्द साहब के नेत्र फैले ।
“ये बात अब स्थापित हो चुकी है, सर ।”
“कत्ल का उद्देश्य ?”
“नाडकर्णी की दौलत हथियाना ।”
“कैसे किया कत्ल ?”
“पहाड़ी की ऊंची चोटी से समुद्र में धक्का दे दिया । ज्योति ने न सिर्फ उस हरकत को वाकया होते देख लिया, उसने उसकी तस्वीर भी खींच ली ।”
“तस्वीर खींच ली ? वो हर वक्त कैमरा साथ रखती थी ?”
“नो, सर । वो क्या है कि फोटोग्राफी, आई मीन एमेच्योर फोटोग्राफी, सतीश की पार्टियों का एक पार्टी गेम था । सतीश द्वारा तमाम मेहमानों को कैमरे, फिल्में वगैरह मुहैया कराई जाती थीं और एक कान्टैस्ट के तौर पर उन्हें तस्वीरें खींचने के लिये प्रेरित किया जाता था जिसमें से बैस्ट एक्शन शॉट, वर्स्ट क्लोजअप वगैरह के लिये सतीश की तरफ से इनाम मुकर्रर होते थे ।”
“यानी कि संयोग से ज्योति निगम के पास तस्वीर खींचने का साधन था इसलिये उसने तस्वीर खींच ली ?”
“यस, सर ।”
“एक्शन शॉट ! जबकि पायल श्याम नाडकर्णी को पहाड़ी पर से धक्का दे रही थी ?”
“यस, सर ।”
“यानी कि पायल ने अपने पति की दौलत हासिल करने के लिये उसका कत्ल किया ?”
“यही तो मैं कह रहा हूं सर । यहीं से तो अभी मैंने अपनी स्टोरी शुरु की थी जो कि ज्योति के पुलिस को दिये इकबालिया बयान पर आधारित है ।”
“आई सी ।”
“यू शुड पे गुड अटेंशन टु वाट युअर जूनियर इज सेइंग ।”
“आगे बढो ।”
“उस कत्ल में पायल के साथ ट्रेजेडी ये हुई कि उसके धक्के से नीचे समुद्र में जाकर गिरे नाडकर्णी की लाश बरामद न हुई जिसकी वजह से नाडकर्णी को कानूनी तौर पर मृत घोषित न किया जा सका । यानी कि अपने पति की दौलत का वारिस बनने के लिये अब पायल का सात साल तक इन्तजार करना जरूरी हो गया ।”
“आई नो ।”
“लेकिन ज्योति निगम, जिसके पास कि तस्वीर की सूरत में कत्ल का सुबूत था, अपनी जानकारी को कैश करने के लिये सात साल इन्तजार करने को तैयार नहीं थी ।”
“क्यों तैयार नहीं थी ?”
“अपने रंगीले राजा, प्लेब्वाय, कामदेव के अवतार पति कौशल निगम की वजह से जो कि उसका निहायत कीमती खिलौना था, जिसकी मेनटेनेंस पर - डॉली का कहना है कि - ज्योति का इतना खर्चा होता था कि वो जितना कमा लेती, थोड़ा था ।”
“इस वजह से वो पायल को ब्लैकमेल करने पर आमादा थी ?”
“जी हां ।”
“माथुर, गोवा की विजिट से तुम्हारी डिस्क्रिप्शन काफी इम्प्रूव हो गयी है ।”
“थैंक्यू, सर ।”
“ये डॉली कौन है ?”
“बुलबुल है, सर ।”
“बुलबुल ?”
“सतीश की रीयूनियन पार्टी की मेहमान लड़कियां इसी नाम से जानी जाती है, सर ।”
“ओह ! ओह ! यानी कि ये कौशल निगम कोई जिगोलो (GIGOLO) था, मेल प्रस्टीच्यूट था ?”
“आपने एकदम सही बयान किया उसे सर । ज्योति उसकी दीवानी थी, उसे पति बनाकर उस पर काबिज थी लेकिन कब्जा बनाये रखने के लिए उसके खर्चे बहुत गम्भीर थे जिसकी वजह से ज्योति ने हाथ आये मौके का फायदा उठाने का, यानी कि पायल को ब्लैकमेल करने का, फैसला किया । लेकिन वो खुल खेलने का हौसला नहीं कर सकती थी ।”
“खुल खेलने का क्या मतलब ?”
“वो सीधे पायल के पास जाकर उसे नहीं कह सकती थी कि उसके पास सुबूत था कि उसने अपने पति की हत्या की थी ।”
“क्यों ? क्यों नहीं कह सकती थी ?”
“सर, डू आई हैव टू ड्रा यू ए डायग्राम ?”
“माथुर !”
“सारी, सर । सर, वो क्या है कि पायल वो लड़की थी जो कि एक कत्ल पहले ही कर चुकी थी - दौलत की खातिर । वो एक कत्ल और कर सकती थी - दौलत को अपने पास बरकरार रखने की खातिर । बतौर ब्लैकमेलर पायल खुलकर उसके सामने आती तो कोई बड़ी बात नहीं थी कि वो उसका भी कत्ल कर देती और वो डैमिजिंग तस्वीर उससे जबरन हथिया लेती ।”
“काम इतना आसान तो न होता ?”
“मुमकिन है लेकिन फिर भी ज्योति को इस बात का अन्देशा बराबर था । आप ये न भूलिये कि ज्योति कोई प्रोफेशनल ब्लैकमेलर या आदी मुजरिम नहीं थी । ब्लैकमेल की हिम्मत उसने मजबूरन अपने आप में पैदा की थी । इसलिये उसने ब्लैकमेल का ऐसा तरीका अख्तियार किया जिसमें उसका खुलकर सामने आना जरूरी नहीं था ।”
“क्या किया उसने ?”
“आपको मालूम होगा कि एयरपोर्ट पर जो क्लाक रूम है, उसमें सैल्फ सर्विस लाकर्स उपलब्ध हैं जोकि चौबीस घण्टे में एक बार पांच रूपये का सिक्का डालने से संचालित होते हैं । सिक्का डालने से लाकर खुल जाता है और आप उसके भीतर पड़ी उसकी चाबी अपने अधिकार में कर सकते हैं । फिर लाकर में सामान रखकर उसके ताले को यूं हासिल हुई चाबी से आप बन्द कर सकते हैं और चाबी अपने पास रख सकते हैं । समझ गये ?”
“हां ।” - बड़े आनन्द साहब हड़बड़ाकर बोले - “हां ।” - फिर उन्हें ख्याल आया कि ऐसा उन्हें राज कह रहा था तो वो बड़ी सख्ती से बोले - “यंगमैन, माइंड युअर लैग्वेज ।”
“यस, सर । ज्योति कहती है कि वो एयरपोर्ट का वैसा एक लाकर काबू में कर लेती थी और उसकी डुप्लीकेट चाबी बनवा लेती थी । डुप्लीकेट चाबी वो उचित निर्देशों के साथ डाक से पायल को भिजवा देती थी । निर्देश ये होते थे कि पायल ने रकम को लाकर में बन्द करके पूना, खण्डाला, नासिक, शोलापुर जैसे किसी दूसरे शहर को कूच कर जाना होता था और वहां ज्योति के बताये किसी होटल में ठहरना होता था । ज्योति पहले फोन करके उसकी वहां मौजूदगी की तसदीक करती थी और फिर एयरपोर्ट जाकर, लाकर खोलकर, उसमें पायल द्वार छोड़ी रकम अपने काबू में कर लेती थी । यूं दो-ढाई महीने में उसने पायल से पन्दरह-बीस लाख रूपये हथिया लिया था । यूं पायल का पल्ले का पैसा तो उड़ ही गया था, उसने वाकिफकारों से दोस्तों से उधार मांग-मांगकर भी ज्योति की ब्लैकमेल की डिमांड पूरी की थी । यहां ये बात भी दिलचस्पी से खाली नहीं कि पायल, जोकि जानती तो थी नहीं कि उसे कौन ब्लैकमेल कर रहा था, आर्थिक सहायता के लिये ज्योति के पास भी पहुंची थी जिसने - जरूर पायल की निगाहों में ये स्थापित करने के लिये कि वो तो ब्लैकमेलर हो नहीं सकती थी - उसे पच्चीस हजार रूपये दिये थे ।”
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10-18-2020, 06:48 PM,
#96
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“क्या फर्क पड़ता था ? वो पैसा उसी के पास तो लौट आना था ।”
“ऐग्जै़क्टली सर ।”
“आगे ?”
“आगे बहुत जल्द ऐसी स्थिति आ गयी कि पायल के लिये ब्लैकमेलर की मांग पूरी करना नामुमकिन हो गया । तब पायल के पास बम्बई छोड़कर कहीं जा छुपने के अलावा कोई चारा न रहा । उसने अपना कफ परेड वाला फ्लैट छोड़ दिया और चुपचाप कहीं खिसक गयी ।”
“यानी कि वो ब्लैकमेलर से डरके भाग गयी !”
“और क्या करती ? जो पैसा उसके पास था, वो चुक गया था, उधार भी जहां-तहां से मिल सकता था, वो ले चुकी थी, ऊपर से ये उसे तब भी नहीं पता था कि ब्लैकमेलर कौन था ।”
“लेकिन उस तस्वीर की वजह से उसे इतना तो अन्दाजा होगा कि ब्लैकमेलर जरूर सतीश की पार्टी में शामिल कोई शख्स था ?”
“अन्दाजा तो उसे यहां तक होगा, सर, कि वो कोई उसकी फैलो बुलबुल ही थी क्योंकि तस्वीरें खींचने के जिस खेल में बाकी बुलबुलें शामिल थीं, जाहिर है कि उसमें पायल भी शामिल रही होगी । लेकिन बुलबुलें कई थीं । उनमें से अपनी बुलबुल छांटने का उसके पास कोई जरिया नहीं था ।”
“माथुर, ये भी तो हो सकता है कि तस्वीर जिस बुलबुल ने खींची हो, उसने उसे आगे किसी को सौंप दिया हो !”
“सर, अब जबकि हमें पता है कि ब्लैकमेलर ज्योति थी, जबकि वो अपने इकबालिया बयान में ये बात कबूल कर चुकी है तो किसी और भी हो सकता है को खातिर में लाना मूर्खता है ।”
आनन्द साहब हड़बड़ाये, उन्होंने कोई सख्त बात कहने के लिये मुंह खोला लेकिन फिर कुछ सोचकर खामोश हो गये ।
“बहरहाल स्थिति ये थी कि जब तक पायल गायब थी उसका ब्लैकमेलर उस पर कोई दबाव नहीं डाल सकता था और पायल पूरे सात साल गायब रहना अफोर्ड कर सकती थी क्योंकि उससे पहले अपने पति की दौलत उसके हाथ नहीं आने वाली थी । वो वक्त आने से पहले वो अपने ब्लैकमेलर की शिनाख्त की कोशिश कर सकती थी और उससे पीछा छुड़ाने की कोई तरकीब सोच सकती थी । पूरे सात साल का वक्त था उसके पास इस काम के लिये ।”
“आई सी ।”
“उस दौरान पैसे की कमी की वजह से वो बहुत बर्बाद हुई, बहुत दुख झेले उसने, पेट भरने की खातिर बहुत नीचे गिराया उसने अपने आपको । फिल्म कान्ट्रैक्ट कबूल करके सम्पन्नता का दामन थामने से भी उसने परहेज किया क्योंकि एक्ट्रेस बन जाने के बाद वो अपने ब्लैकमेतर से छुप तो सकती ही नहीं थी, यूं उसकी सफलता का भी ढिंढोरा पिटता और फिर उसका ब्लैकमेलर उसका और खून निचोड़ता । ये भी पायल की ट्रेजेडी थी कि पैसा कमाने का जरिया उसके सामने था लेकिन वो उसे अडाप्ट नहीं कर सकती थी क्योंकि यू वो पैसा अपने लिये नहीं, ब्लैकमेलर के लिये कमाती जो कि वो नहीं चाहती थी ।”
“यू आर राइट देअर, माई ब्वाय ।”
“वो ये भी जानती थी कि वो सदा गुमनामी में गर्क नहीं रह सकती थी । अगर उसने अपने पति की दौलत हासिल करनी थी तो सात साल का वक्फा पूरा होने के बाद उस दौलत को क्लेम करने के लिये उसका सामने आना जरूरी था । और ढाई करोड़ की मालकिन बन जाने के बाद वो दोबारा जाकर गुमनामी में गर्क नहीं हो सकती थी ।”
“जाहिर है । वो फिर ऐसा करती तो उसे क्या फायदा होता एक मालदार औरत बनने का ?”
“लेकिन करती तो वो माल उससे उसका ब्लैकमेलर झटक लेता । सर, ऐसी स्थिति से दो चार होने के लिये उसने एक योजना बनाई और उस योजना के तहत वो पायल पाटिल उर्फ मिसेज नाडकर्णी नामक एक्स फैशन माडल से वसुन्धरा पटवर्धन नामक एक सैक्सलैस, अनाकर्षक मोटी मैट्रन बन गयी जिसने कि तीन महीने पहले फिगारो आइलैंड पहुंचकर वहां हाउसकीपर की नौकरी कर ली । कोई बड़ी बात नहीं कि सतीश की गैर-हाजिरी में उसकी पहली हाउसकीपर की नौकरी छुड़वाना भी पायल का ही कोई कमाल हो ।”
“वजन कैसे बढा लिया ?”
“औरतों के लिये वो कोई मुश्किल काम नहीं होता, सर । अलबत्ता वजन घटाना बहुत मुश्किल काम होता है । ऊपर से ये न भूलिये कि इस काम के लिये उसके पास वक्त की कोई कमी नहीं थी । वो बड़े इतमीनान से साल-दो साल लगाकर मोटापा पैदा करने वाला खाना खाकर, ज्यादा-से-ज्यादा खाना खाकर वजन बढा सकती थी । जापानी सूमो पहलवान भी ऐसे ही वजन बढाते हैं, सर । वो तो सौ-सौ किलो वजन बढा लेते हैं जबकि पायल ने तीस-पैंतीस किलो ही बढाया था ।”
“आई सी ।”
“मोटी हो जाने की वजह से वो ठिगनी लगने लगी । बोरा किस्म की पोशाकें पहनने लगी । मोटे फ्रेम का चश्मा लगाने लगी । अपने सुनहरे बाल छुपाने के लिये उन्हें काली डाई से रंगने लगी । मेकअप से किनारा करने लगी और बाल कस कर बांधने लगी । फटे बांस जैसी, नाक से निकलती आवाज का उसे अलबत्ता काफी अभ्यास करना पड़ा होगा ।”
“मस्ट बी ए क्लैवर एक्ट्रेस ।”
“डेफिनिटली, सर । उसका बहुरूप कितना बढिया था, सैक्स गॉडेस पायल से ड्रम जैसी वसुन्धरा तक उसकी ट्रांसफार्मेशन कितनी कम्पलीट थी, इसका यही सुबूत काफी है कि उसे सतीश ने नहीं पहचाना था । जब सतीश पर उसका बहुरूप चल गया था तो बाकी बुलबुलों पर तो चल ही जाता जिनकी निगाहों में वो एस्टेट की मुलाजिम थी, सतीश की मामूली हाउसकीपर थी, मैंशन का फर्नीचर थी जिस पर दूसरी निगाह डालना भी किसी के लिये जरूरी नहीं था । कहने का मतलब ये है, सर, कि वो अपने ब्लैकमेलर पर जवाबी हमला करने के लिये पूरी तरह से तैयार थी । उसने पहले से सोच के रखा हुआ था कि कैसे उसने पायल की वहां आमद को स्थापित करना था । सतीश ने दोपहर के करीब उसे पायर पर से आयशा को लिवा लाने के लिये भेजा था जहां से कि उसने अपनी असली, खनकती हुई आवाज निकालकर सतीश को फोन किया था और उसे अपने आइलैंड पर पहुंच चुकी होने की सूचना दी थी । रात दो बजे तक फारिग न होने और अगले रोज दोपहर तक रूख्सत हो जाने की कहानी उसने इसलिये की थी ताकि ब्लैकमेलर को उससे सम्पर्क बनाने के लिये बहुत सीमित समय उपलब्ध होता, ताकि एक सीमित समय तक ही ब्लैकमेलर द्वारा उठाये जाने वाले किसी अगले कदम की उसे बाट जोहनी पड़ती ।”
“ओह !”
“इतनी रात गये अपनी आमद स्थापित करना उसके लिये इसलिये भी जरूरी था क्योंकि सतीश के मैंशन में ड्रिंक डिनर से लबरेज हर कोई तब तक कब का नींद के हवाले हो चुका होता ।”
“आई अन्डरस्टैण्ड ।”
“आई एम ग्लैड दैट यू डू, सर ।”
“माथुर ! माथुर...”
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10-18-2020, 06:48 PM,
#97
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“यहां कुछ बातें संयोगवश भी हुई जिन्होंने निर्विवाद रूप से थे स्थापित कर दिया कि पायल वहां पहुंच चुकी थी । शशिबाला के साथ बन्द दरवाजे के आर-पार से हाउसकीपर उर्फ पायल ने अपनी असली आवाज में चुहलबाजी की । फौजिया की खातिर खुद ही दो आवाजें निकालकर वे स्थापित किया कि पायल हाउसकीपर पर बरस रही थी, उसे डांट रही थी । यूं पायल के लिये रिजर्व कमरे में पायल की मौजूदगी स्थापित करके वो चुपचाप वहां से बाहर निकल आयी और कहीं छुपकर पायल के कमरे को वाच करने लगी । उस वाच का नतीजा ये निकला कि उसने ज्योति निगम की चुपचाप पायल के कमरे के सामने पहुंचते और दरवाजे के नीचे से ब्लैकमेल सम्बन्धी चिट्ठी भीतर सरकते देखा ।”
“यानी कि वो पायल के जाल में फंस गयी ? ब्लैकमेलर अपने शिकार पर एक्सपोज हो गया ?”
“यस, सर । लेकिन आगे सिलसिला पायल की योजना के मुताबिक न चल पाया । आगे गड़बड़ हो गयी ।”
“क्या ? क्या गड़बड़ हो गयी ?”
“सर, ज्योति का खुद का बयान है कि जब वो पायल के कमरे में दरवाजे के नीचे से ब्लैकमेल नोट भीतर सरकाकर वापिस लौट रही थी तो तब उसका आमना-सामना हाउसकीपर वसुन्धरा से हो गया था । ज्योति तत्काल समझ गयी थी कि उसने उसे पायल के कमरे में ब्लैकमेल वाली चिट्ठी सरकाते देख लिया था । वो कहती है कि उस घड़ी हाउसकीपर के चेहरे पर ऐसे विजेता के से भाव थे और आंखों में ऐसी चमक थी कि उसे तत्काल अहसास हुआ था कि वो किसी जाल में फंस गयी थी । वो अहसास होते ही बिजली की तरह उसके जेहन में ये कौंध गया था कि वो सतीश की हाउसकीपर के नहीं, अपनी ब्लैकमेल की शिकार पायल पाटिल के रूबरू थी ।”
“वो तो उसे तब भी महसूस हो गया होगा जबकि पायल ने उसे मार डालने की कोशिश की होगी ?”
“सर, पायल ने उसे मार डालने की कोशिश नहीं की थी । अपने ब्लैकमेलर का कत्ल कर डालने का इरादा पायल जरूर बनाये हुए होगी लेकिन वो कत्ल सतीश की एस्टेट में करने का उसका कोई इरादा नहीं था । एक बार ब्लैकमेलर की शिनाख्त कर लेने के बाद उसे इस काम की कोई जल्दी भी नहीं थी । वो पार्टी के खत्म होने तक इन्तजार कर सकती थी और बड़े इत्मीनान से ज्योति के पीछे उसके शहर तक पहुंच सकती थी जहां कि वो उसका कत्ल करती और गायब हो जाती । फिर आइन्दा दो-तीन महीनों वो अपना वजन घटाती, फिर पहले जैसी ग्लैमरस पायल बनती और अपनी विरसे की रकम क्लेम करने के लिये यहां आ जाती थी ।”
“वैरी क्लैवर आफ हर ।”
“आफकोर्स, सर ।”
“लेकिन जिसे कि तुम पायल के प्लान में हो गयी गड़बड़ कहते हो, अगर वो न होती, यानी कि रात कि रात को खून-खराबा न होता, तो सुबह पब्लिक के लिये वो पायल कहां से पैदा करती जो कि स्थापित था कि घर में मौजूद थी ?”
“गुड क्वेश्चन, सर । इससे साबित होता है कि अब आप मेरी बात को गौर से सुन रहे थे ।”
आनन्द साहब ने घूरकर उसे देखा लेकिन राज को विचलित होता न पाकर वो खुद ही पहलू बदलने लगे ।
“मेरे ख्याल से तब सुबह सतीश को एक चिट्ठी मिलती जोकि पायल के हैंडराइटिंग में होती और उसी के द्वारा साइन की गयी होती और जिसमें उसके चुपचाप वहां से कूच कर जाने की वही वजह दर्ज होती जोकि पायल से मुलाकात हुई होने का दावा पेश करते समय ज्योति ने बयान की थी । यह कि वहां पहुंचकर उसकी पुरानी यादें तरोताजा होने लगी थी, कि वो अपनी सखियों और मिस्टर सतीश के रूबरू होने की ताब अपने आप में नहीं ला पा रही थी, वगैरह । तब कथित हाउसकीपर भी बड़ी मासूमियत से ये फरमा देती कि वो पायल की फरमायश पर सुबह-सवेरे, मुंह अन्धेरे उसे स्टेशन वैगन पर सवार कराकर पायर पर छोड़ आयीं थी ।”
“कत्ल कैसे हुआ ?”
“ज्योति कहती है कि छीना-झपटी में हुआ । वो कहती है कि रिवॉल्वर असल में हाउसकीपर के पास थी लेकिन पुलिस को उसकी बात पर यकीन नहीं है ।”
“क्यों ?”
“सर, अगर रिवॉल्वर हाउसकीपर के पास होती और वो छीना झपटी में चली होती तो कत्ल के बाद पायल उसे अपने साथ न ले गयी होती । तब रिवॉल्वर वहीं मौकायवारदात पर लाश के करीब पड़ी पायी गयी होती ।”
“यू आर राइट देयर ।”
“असल में जरूर ज्योति ने पहले ही अपने आपको हथियारबन्द किया हुआ था क्योंकि वो पायल की मैंशन में मौजूदगी के सन्दर्भ में किसी भी ऊंच-नीच के लिये तैयार रहना चाहती थी । रिवॉल्वर तब भी उसके पास थी जबकि उसने किसी बहाने से गलियारे में दिखाई दे रही हाउसकीपर को पायल के कमरे में बुलाया था । हाउसकीपर इनकार नहीं कर सकती थी क्योंकि ऐसा करना एक तरह से कबूल करना होता कि वो हाउसकीपर नहीं, पायल थी और वो अपने ब्लैकमेलर के रूप में ज्योति को पहचान चुकी थी ।”
“ओह !”
“लेकिन तब उसने ये भी नहीं सोचा होगा कि पायल के कमरे में बुलाकर ज्योति उसे शूट कर देगी ।”
“उसने ऐसा क्यों किया ?”
“जरूर इसलिये क्योंकि उसे दिखाई दे रहा था कि उसके सामने मरो या मारो वाली स्थिति थी । ये भी हो सकता है कि उसके हाथ में रिवॉल्वर देखकर पायल उस पर झपट पड़ी हो और ज्योति को मजबूरन गोली चलानी पड़ी हो । बहरहाल इतनी गारन्टी है कि ज्योति को तब ये अहसास बड़ी शिद्दत से हो चुका था कि बतौर ब्लैकमेलर वो पहचान ली गयी थी और अब पायल की मौत में ही उसकी जिन्दगी थी ।”
“उसने मर्डर वैपन रिवॉल्वर कोट के साथ कुएं में क्यों फेंकी ? उसे वापिस सतीश के शस्त्रागार में वहीं क्यों न रख दिया जहां से कि उसने उसे हासिल किया था ?”
“क्योंकि वो ये जाहिर करना चाहती थी कि वो कत्ल किसी बाहरी आदमी का काम था जोकि कत्ल के बाद रिवॉल्वर अपने साथ ले गया था ।”
“आई सी ।”
“पुलिस ने एक-एक कमरे की, हर किसी के साजो-सामान की, तलाशी लेने की घोषणा न की होती तो शायद वो रिवॉल्वर अपने पास रखे रहती और फिर जरूर आयशा का कत्ल भी उसी रिवॉल्वर से होता । संयोगवश आयशा के कत्ल वाले हालात तब पैदा हुए थे जबकि वो हथियार उसके हाथ से निकल चुका था, जबकि वो उसे कुएं में फेंक चुकी थी ।”
“उसके कत्ल के हालात कैसे पैदा हुए थे ?”
“हाउसकीपर की चीख ने जैसे मेरे दिमाग की मोम पिघलाई थी, वैसे ही उसने उसके ज्ञानचक्षु खोले थे । अलबत्ता उस चीख की वजह से उसे ये कदरन जल्दी सूझ गया था कि हाउसकीपर ही पायल थी । उसने इस बात की तसदीक करने की कोशिश की तो वो ज्योति की निगाहों में आ गयी ।”
“तसदीक करने की कोशिश की ? कैसे ?”
“वो क्या है कि आलोका ने सालों पहले पटना के फैशन शो के दौरान हुई एक घटना का जिक्र किया था जबकि पायल ने बाथरूम में फिसलकर अपनी एक जांघ इतनी जख्मी कर ली थी कि डाक्टर को आकर जख्म को टांके लगाकर सीना पड़ा था । उस घटना से बाकी बुलबुलों की तरह आयशा भी वाकिफ थी । अपने कत्ल की रात को हाउसकीपर की चीख का ख्याल करके जब उसे ये सूझा था कि हाउसकीपर ही पायल थी तब हाउसकीपर उर्फ पायल की लाश अभी एस्टेट पर ही ग्रीनहाउस के नाम से जाने जाने वाले काटेज में मौजूद थी । लाश की जांघ का मुआयना ये स्थापित कर सकता था कि हाउसकीपर ही पायल थी या नहीं । यानी कि आयशा को अगर हाउसकीपर की जांघ पर सिले हुए जख्म का निशान मिलता तो वो यकीनन पायल थी ।”
“वैरी गुड ।”
“उस रात को जब आयशा चुपचाप मैंशन से निकली और ग्रीनहाउस की तरफ रवाना हुई तो बदकिस्मती से वो ज्योति की निगाहों में आ गयी । ज्योति तत्काल समझ गयी कि वो किस फिराक में हाउस जा रही थी । तब उसे आयशा का भी कत्ल जरूरी दिखाई देने लगा जिसके लिये कि उसे कोई हथियार चाहिये था । लायब्रेरी पर, जिसमें कि शस्त्रागार था, तब तक क्योंकि पुलिस के निर्देश पर मजबूत ताला जड़ा जा चुका था इसलिये वैकल्पिक हथियार के तौर पर ज्योति ने किचन में जाकर वहां से एक लम्बे फल वाली छुरी उठा ली । उधर आयशा तब तक ग्रीन हाउस में लाश का मुआयना कर चुकी थी । तब तक शायद उसे अहसास हो गया था कि उसके सिर पर खतरा मंडरा रहा था इसलिये मैंशन में वापिस लौटने की जगह वो एस्टेट से बाहर निकल गयी और करीब ही स्थित पोस्ट आफिस के पी.सी.ओ. पर पहुंची जहां से कि उसने पुलिस को फोन किया लेकिन फोन पर अभी वो ठीक से अपनी बात कह भी नहीं पायी थी कि ज्योति उसके सिर पर पहुंच गयी और उसका मुंह बन्द करने के लिये उसने उसकी छाती में छुरी भौंक दी ।”
“ओह ! यानी कि अब स्थिति ये है कि श्याम नाडकर्णी की विधवा और उसके विरसे की हकदार मिसेज नाडकर्णी उर्फ पायल पाटिल भी अब मर चुकी है ।”
“जी हां ।”
“ट्रस्टी की जिम्मेदारी से तो फिर हम मुक्त न हो पाये !”
“जाहिर है ।”
“फिर क्या बात बनी ?”
“सर, जरा असल हालात को प्रचारित होने दीजिये, फिर देखियेगा कि पायल का वारिस होने का दावा करने वाला कोई-न-कोई शख्स अपने आप निकल आयेगा ।”
“जिसे कि हमें ठोकना-बजाना पड़ेगा और यूं हमारा काम और बढ जायेगा । वारिस कई निकल आये तो कइयों को ठोकना-बजाना पड़ेगा और हमारा काम और और और बढ जायेगा ।”
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10-18-2020, 06:48 PM,
#98
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“मुझे आप से हमदर्दी है ।”
“क्या !”
“मेरा मतलब है कि मुझे अफसोस है कि फर्म का काम यूं खामखाह बढ रहा है ।”
“ठीक है, ठीक है । अब जाओ जाके स्टेनो को अपनी रिपोर्ट डिक्टेट कराओ ।”
“वो अभी नहीं हो सकता, सर ।”
“क्यों ?” - आनन्द साहब के माथे पर बल पड़े - “क्यों नहीं हो सकता ?”
“सर, मेरी किसी से लंच अप्वायन्टमैंट है । मैं” - राज ने अपनी कलाई घड़ी पर निगाह डाली - “पहले ही लेट हो रहा हूं ।”
“किससे लंच अप्वायन्ट है तुम्हारी ? किसी क्लायन्ट से ?”
“नो, सर ।”
“तो ?”
“अपनी होने वाली बीवी से ।”
***
नजदीकी रेस्टोरेंट में डॉली बड़ी व्यग्रता से उसका इन्तजार कर रही थी । उन्होंने चुपचाप भोजन किया और बाद में काफी मंगाई ।
तब राज बड़ी गम्भीरता से बोला - “तुम कुछ कहना चाहती हो ?”
“किस बाबत ?” - डॉली बोली ।
“तुम्हें नहीं मालूम ?”
“बताओगे तो जान जाऊंगी ।”
राज ने एक आह-सी भरी फिर बोला - “इस केस से ताल्लुक रखती हर बात की व्याख्या हो चुकी है, समीक्षा हो चुकी है । किसी बात पर अभी रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है तो वो तुम्हारा व्यवहार है । मुझे बहुत उम्मीद थी कि तुम खुद ही कुछ उचरोगी इसलिये मैंने वो जिक्र छेड़ने से परहेज रखा लेकिन लगता है कि उस मामले में तुम रहस्यमयी रमणी ही बनी रहना चाहती हो ।”
“मैं तुम्हें ओल्ड रॉक पर अकेला छोड़कर जीप समेत भाग खड़ी हुई थी, इसका मुझे अफसोस है ।”
“शुक्र है वो बात तुम भूली नहीं हो ।”
“मैं माफी मांगती हूं ।”
“माफी तो हुई लेकिन वो हरकत की क्यों थी तुमने ? यूं क्यों भाग खड़ी हुई एकाएक ? भागीं भी तो लौट के सतीश की एस्टेट में क्यों पहुंच गयी ?”
“वहां से अपना सामान वगैरह उठाने के लिये । मेरा तमाम रुपया-पैसा भी मेरे सूटकेस में था, इसलिये लौटना जरूरी था । मुझे क्या मालूम था कि वहां पुलिस मेरी ताक में थी !”
“तुम किसी विक्रम पठारे को जानती हो जोकि स्थायी रूपा से लिस्बन में बसा हुआ है लेकिन सतीश की तरह आजकल के मौसम गोवा आता है ?”
“नहीं ।”
“अब जान लो । विक्रम पठारे वो क्रीम कलर की फियेट वाला था जिसके पीछे कि तुमने मुझे खामखाह दौड़ा दिया था । इतना तो अब मैं भी समझ सकता हूं कि असल में चर्च रोड पर तुम्हें कोई और ही शख्स दिखाई दिया था जिसकी निगाहों में कि तुम नहीं आना चाहती थीं और उसी से बचने के लिये जो गाड़ी तुम्हें तब हमारे सामने दिखाई दी थी, तुमने मुझे उसके पीछे लगा दिया था । अब कहो कि मेरा ख्याल गलत है ?”
“ठीक है तुम्हारा ख्याल ।” - वो संजीदगी से बोली ।
“असल में वहां कौन था वो आदमी जिससे कि तुम बचना चाहती थी ?”
“आदमी नहीं था । एक लड़की थी जो कि मेरे साथ स्कूल में पढती थी । सालों साल गुजर गये थे कि मेरी उससे कभी मुलाकात नहीं हुई थी । पता नहीं कहां से परसों फिगारो आइलैंड पर टपक पड़ी थी ! मुझे देखकर वो चर्च रोड पर ही टिकी रहती, तो भी गनीमत थी । वो तो हमारे पीछे पायर पर भी पहुंच गयी थी । जब हम बजड़े पर सवार हुए थे तो पायर पर खड़ी एक लड़की जोर-जोर से हमारी तरफ हाथ हिला रही थी, जिसकी तरफ कि तुमने भी हाथ हिलाया था । याद आया ?”
“हां ।”
“वो असल में तेरी जवज्जो हासिल करने के लिये, मेरी तरफ हाथ हिला रही थी । उसी से पीछा छुड़ाने के लिये मैंने तुम्हें बजड़े पर चढने के लिये मजबूर किया था ।”
“लेकिन उससे मिलने में तुम्हें दहशत क्या थी ?”
“बताती हूं । वो क्या है कि डॉली टर्नर मेरा असली नाम नहीं है । ये मेरा स्टेज नेम है जोकि मैंने असलियत छुपाने के लिये रखा हुआ है । वो लड़की इस बात को जानती नहीं हो सकती थी । जानती होती तो भी उसने मुझे मेरे असली नाम से ही बुलाया होता ।”
“असली नाम ! हे भगवान ! कहीं तुम्हारा असली नाम पायल ही तो नहीं ?”
“पायल ही है । वो ब्रेसलेट जो पुलिस ने मेरे सामान से बरामद किया था, मेरा ही था जो कभी श्याम नाडकर्णी ने उपहारस्वरूप मुझे दिया था ।”
“ओह ! तो वो पायल नाडकर्णी की जिन्दगी में आयी दूसरी पायल थी । पहली पायल तुम थीं ?”
“हां ।”
“यानी कि तुम भी मिसेज नाडकर्णी रह चुकी हो ?”
“नहीं । मेरा अफेयर उस मंजिल तक नहीं पहुंचा था ।”
“ओह !”
“श्याम नाडकर्णी को मैं ‘सतीश की बुलबुल’ बनने से पहले से जानती थी । तब से जबकि उसके बाप का उसपर पूरा-पूरा अंकुश था । तब उसे ये कभी बर्दाश्त न होता कि उसका खानदानी बेटा एक मेरे जैसी मामूली हैसियत की लड़की पर फिदा था इसलिये हमने इस बात को हमेशा राज रखा था । बाद में जब मैं सतीश की बुलबुलों में शुमार हो गयी तो बाकी बुलबुलों से श्याम नाडकर्णी को मैंने ही मिलवाया था । तब वो कमीना पायल पर ऐसा लट्टू हुआ कि तौबा भली । पायल ने पहले तो उसको कोई खास भाव नहीं दिया था लेकिन जब एकाएक उसका बाप मर गया और वो ओवरनाइट उसकी सारी दौलत का मालिक बन बैठा तो पायल पंजे झाड़कर उसके पीछे पड़ गयी थी । तब से पायल से हुई नफरत मेरे दिल से आज तक न निकली । ये बात अगर पुलिस को पता लग जाती तो वो ये ही समझते कि इतने सालों बाद पायल को अपने करीब पाकर मैं आपे से बाहर हो गयी थी और मैने ही उसका कत्ल किया था क्योंकि कभी उसने श्याम नाडकर्णी को मेरे से छीन लिया था ।”
“आई सी ।”
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10-18-2020, 06:48 PM,
#99
RE: Mastaram Kahani कत्ल की पहेली
“उस शाम को जब सतीश ने पायल के आगमन की घोषणा की थी तो मैं घबरा गयी थी । मैं उससे आमना-सामना नहीं चाहती थी । मुझे पहले से उसके आगमन की बाबत मालूम होता तो मैं ही न आयी होती । श्याम नाडकर्णी की जिन्दगी में पहले भी कोई पायल आयी थी, ये बात सिर्फ वो पायल जानती थी । उसने प्यार की खातिर शादी नहीं की थी लेकिन फिर भी वो मुझ पर ये जाहिर करने से नहीं चूकती थी कि उसमें कोई खास ही खूबी थी जो कि श्याम नाडकर्णी ने उसे तरजीह दी थी, मेरे मुकाबले में उसे चुना था । मैंने ड्रिंक्स से हाथ इसलिये खींचा था क्योंकि मुझे अन्देशा था कि उसकी आमद तक बहुत पी चुकी होने की वजह से मैं उससे लड़ाई न मोल ले बैठूं ।”
“यहां तक तो बात समझ में आती है । लेकिन तुम उससे रात को चुपचाप मिलना क्यों चाहती थी ?”
“उसे ये कहने के लिये कि वो वहां किसी के सामने मेरा जिक्र पायल क नाम से न करे, वो मेरे अतीत के बखिये न उधेड़े और कोई ऐसी बात जुबान से न निकाले जिससे ये लगे कि एक तरफ से मैं उसके स्वर्गवासी पति की परित्यक्ता थी ।”
“यानी कि उस रात को तुम उससे मिलने जाने के लिये ही गलियारे में निकली थी लेकिन फिर मेरी आहट सुनकर नीचे लाउन्ज में पहुंच गयी थीं जहां कि विस्की की और तलब लगी होने का नाटक करने लगी थी ?”
“हां ।”
“मेरे को तो तब तुमने डांटकर भगा दिया था, उसके बाद क्या तुमने पायल से मिलने की कोशिश की थी ?”
“नहीं ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि मुझे अन्देशा था कि जैसे मैं तब तुम्हारी निगाहों में आ गयी थी, वैसे ही मैं अगली कोशिश में किसी और की निगाहों में या फिर तुम्हरी निगाहों में आ सकती थी ।”
“जब तुम ईस्टएण्ड के सिनेमा के सामने धर्मेन्द्र अधिकारी को घेरे खड़ी थी और मैं ऊपर से पहुंच गया था तो तुमने उसे खिसक क्यों जाने दिया था ?”
“मैंने ऐसा कुछ नहीं किया था ।”
“बिल्कुल झूठ ।”
“बिल्कुल सच । तब अगर मुझे मालूम होता कि वो ही वो शख्स था जिसकी तलाश में कि हम निकले थे तो उसे जमीन पर गिराकर उसके ऊपर बैठ गयी होती । फिर देखती वो कैसे भागकर कहीं जाता था ।”
“हूं । तो तुम्हारा असली नाम पायल है जिसे तुमने डॉली टर्नर में तब्दील कर लिया था ?”
“हां ।”
“अगर मैं कहूं कि एक बार नाम मेरी दरख्वास्त पर भी तब्दील कर लो तो करोगी ?”
“हां, हां । क्यों नहीं ? तुम जो कहोगे मैं करूंगी ।”
“फिलहाल तो नाम तब्दील करने की हामी भरो ।”
“भरी । क्या नाम रखूं ?”
“माथुर ।”
“ये नहीं हो सकता ।”
राज का चेहरा उतर गया ।
“अरे लल्लू” - उसने राज की पसलियों में कोहनी चुभोई और हंसती हुई बोली - “मेरी नाम है ही माथुर । मेरा असली नाम पायल माथुर है ।”
“ओह !” - फिर राज भी जोर से हंसा - “आई एम ग्लैड टू मीट यू, मिसेज माथुर ।”
“सो एम आई, माई लॉर्ड एण्ड मास्टर ।”


*************समाप्त*******************
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