Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे
01-17-2019, 02:16 PM,
#81
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
मैं अपने कमरे से बाहर आकर अपना पल्लू ठीक करते हुए फोन रिसीव करने आश्रम के ऑफिस की तरफ जाने लगी. ऑफिस गेस्ट रूम के पास था. और मैं जैसे ही अंदर गयी , फोन के पास परिमल खड़ा था. उस बौने आदमी और उसके मजाकिया चेहरे को देखते ही मेरे होठों पे मुस्कुराहट आ जाती थी.

“किसका फोन है?”

परिमल – आपके पति का, मैडम.

“ओह....”

मैं बहुत खुश हो गयी और मुझे आश्चर्य भी हुआ की राजेश ने फोन किया है. 

“हेलो..”

राजेश – हेलो रश्मि, मैं राजेश बोल रहा हूँ.

“कैसे हो आप ? आज इतने बाद मेरी याद आई.”

अपने पल्लू को अंगुलियों में घुमाते हुए मैंने बनावटी गुस्सा दिखाया.

राजेश – तुम्हें तो मालूम ही है रश्मि की मैं गांव गया था और कल ही वापस लौटा हूँ. तुम्हें फोन कैसे करता ?

मुझे याद आया की राजेश को किसी काम से हमारे गांव जाना पड़ गया था इसीलिए वो मुझे आश्रम तक छोड़ने नही आ पाए थे.

“हम्म्म …मालूम है. अब बहाने मत बनाओ.”

राजेश – जान, वहाँ कैसा चल रहा है ?

इस सवाल से मेरे दिल की धड़कनें रुक गयी और मैंने थूक निगलते हुए जवाब दिया.

“सब ठीक है . मेरा उपचार चल रहा है.”

राजेश – जान, तुम्हें बहुत सी जड़ी बूटियाँ लेनी पड़ रही होंगी.

क्या क्या लेना पड़ रहा है, तुम क्या जानो, मैंने सोचा.

“हाँ …बहुत सी जड़ी बूटियाँ, पूजा, यज्ञ, वगैरह. तुम्हारा तो इनमें विश्वास नही है.

राजेश – अगर अच्छा परिणाम मिलेगा तो मैं विश्वास करने लग जाऊँगा. पर ये तो बताओ तुम कैसी हो ? दवाइयों का कोई साइड एफेक्ट तो नही है ?

“ना…ना ..मैं बिल्कुल ठीक हूँ.”

पता नही कितने मर्दों ने मेरी जवानी से छेड़छाड़ की है यहाँ, मैं सोच रही थी.

राजेश – अच्छी बात है. यहाँ घर पे भी सब ठीक है, तुम फिकर मत करना.

“तुम्हें मालूम है मामाजी मुझसे मिलने आए थे.”

राजेश – हाँ ….मम्मी ने बताया था. क्या कहा उन्होंने ?

“कुछ ख़ास नही. बस मेरा हाल चाल पूछ रहे थे.”

राजेश – बहुत अच्छे आदमी हैं.

हाँ बहुत अच्छे हैं. जिस तरह से उन्होने मेरे माथे को चूमा था, मेरे कंधों पर ब्रा के स्ट्रैप को छुआ था , मेरी चूचियों को अपनी छाती पे दबाया था और मेरे नितंबों पर थप्पड़ मारा था….मुझे सब याद आया. बहुत अच्छे या बहुत बदमाश ?

“ह्म्म्म्म …”

राजेश – रश्मि, कोई आस पास है तुम्हारे ?

मुझे हैरानी हुई की ऐसा क्यों पूछ रहे हैं. मैंने इधर उधर देखा तो ऑफिस के कमरे में कोई नही था. परिमल मुझे फोन पकड़ाकर चला गया था.

“ना , मैं अकेली हूँ. पर क्यों पूछ रहे हो ?”

राजेश – उम्म्म…जान , तुम्हें मिस कर रहा हूँ……बेड में.

अंतिम दो शब्द राजेश ने फुसफुसाते हुए कहे थे. मेरी नंगी जांघों पर दीपू के छूने से मुझे गर्मी चढ़ी थी और अब मेरे पति का फोन पे प्यार, मैं पिघलने लगी.

“उम्म्म…मैं भी आपको मिस कर रही हूँ.”

राजेश – एक बार मुझे किस करो ना.

“ये आश्रम है , आपको ऐसा नही…..”

राजेश – उफ …एक बार किस करो ना. तुम्हें मेरी याद नही आती ?

“हम्म्म …मैं तुम्हें बहुत मिस करती हूँ.”

राजेश – अच्छा, ये बताओ अभी तुम साड़ी पहनी हो ?

“क्यूँ पूछ रहे हो ?”

राजेश – असल में फिर मुझे तुम्हारा ब्लाउज खोलना होगा.

“बदमाश…”

राजेश – रश्मि सुनो ना.

“क्या ?”

राजेश की प्यार भरी आवाज़ सुनकर मैं कमज़ोर पड़ने लगी थी और मेरा मन कर रहा था की अभी दौड़कर उसकी बाँहों में समा जाऊँ.

राजेश – जान, अपने होंठ खोलो.

मैंने फोन के आगे अपने होंठ खोल दिए.

राजेश – क्या हुआ ? खोलो ना.

“ओहो…मैंने खोल रखे हैं….सिर्फ़ तुम्हारे लिए.”

राजेश – ऐसा है तो तुमने फोन कैसे पकड़ा हुआ है ?

“ओफफो…..मैंने तुम्हारे लिए अपने होंठ खोले हैं. फोन से उसका क्या लेना देना ?”

राजेश – रश्मि डार्लिंग , मैंने तुमसे साड़ी के अंदर वाले होंठ खोलने को कहा था ताकि मैं अपना डाल सकूँ.

“तुम बहुत बदमाश हो. मैं फोन रख रही हूँ.”

मुझे राजेश की बातों में मज़ा आ रहा था लेकिन मैंने गुस्से का दिखावा किया.

राजेश – ना ना….जान. प्लीज़ फोन मत रखना. अच्छा चलो तुम्हारे होठों को चूमने तो दो.

राजेश ने फोन पे मुझे कई बार चूमा.

राजेश – रश्मि, तुम्हारे बिना बेड सूना सा लगता है.

मेरे पति की ऐसी बातों से मैं उत्तेजित होने लगी थी. मैं दाएं हाथ में फोन को पकड़े हुई थी और मेरा बायां हाथ अपनेआप साड़ी के पल्लू के अंदर चला गया और ब्लाउज के ऊपर से मैं अपनी रसीली चूचियों को दबाने लगी.

राजेश – अब अपनी आँखें बंद कर लो. एक बार मुझे अपने सेबों को दबाने दो….. आह ……..

मेरी आँखें बंद थी और मैं कल्पना कर रही थी की राजेश मेरे सेबों को पकड़े हुए है और दबा रहा है.

राजेश – उम्म्म….बहुत मिस कर रहा हूँ जान तुम्हें.

“मुझे अपनी बाँहों में ले लो…”

राजेश – उम्म्म….रश्मि, एक बार मुझे किस करो ना.

“नही. मैं यहाँ से नही कर सकती.”

राजेश – क्यूँ ? शरमाती क्यूँ हो ? तुमने कहा था की वहाँ कोई नही है . फिर ?

क्या मुझमें कुछ शरम बची भी है, मैं सोचने लगी. लेकिन मेरे पति के लिए तो मैं वही पुरानी शर्मीली रश्मि थी.

राजेश – क्या हुआ जान ?

“हम्म्म ….ठीक है बाबा.”

मेरी साँसे तेज हो गयी थी और मेरी चूचियाँ ब्लाउज के अंदर टाइट हो गयी थी. मैंने इधर उधर देखा और फोन पे ज़ोर से राजेश को किस किया.

राजेश – तुम बहुत प्यारी हो रश्मि.

“उम्म….”

राजेश – आशा करता हूँ की तुम्हारे आश्रम के उपचार से हमें फल ज़रूर मिलेगा.

“उम्म…”

राजेश – रश्मि ?

मैं अभी भी राजेश के प्यार में खोई थी.

राजेश – तुम वापस कब आओगी ?

मैंने अपने पर काबू पाने की कोशिश की.

“हाँ , शायद परसों को .”

राजेश – ठीक है . तब तक मैं तुम्हें रोज़ फोन करूँगा.

मैं घबरा गयी , क्यूंकी आज रात से महायज्ञ होना था और गुरुजी ने बताया था की दो दिन तक चलेगा.

“अरे सुनो ना. अब यहाँ फोन मत करना . मैं जल्दी ही वापस आ तो रही हूँ. गुरुजी आश्रम में ज़्यादा फोन कॉल पसंद नही करते……”

राजेश – हम्म्म …मैं समझता हूँ. वो तो पवित्र जगह है. ठीक है जान, कुछ चाहिए होगा तो बता देना. 

“तुम अपना ख्याल रखना और भगवान से प्रार्थना करना की ….”

राजेश – हाँ ज़रूर, ताकि तुम्हारा उपचार सफल हो जाए. बाय.

“बाय ..”

राजेश ने फोन काट दिया और मैंने रिसीवर रख दिया. बेचारा राजेश. वो कल्पना भी नही कर सकता की यहाँ मेरे साथ क्या क्या हुआ है भले ही वो मेरे उपचार का ही एक हिस्सा था. मेरा अभी भी गुरुजी पर पूर्ण विश्वास था और मुझे उम्मीद थी की महायज्ञ से वो मुझे माँ बनने में मदद करेंगे. ये सही है की मैंने भी अपने साथ घटी कुछ घटनाओ का मज़ा लिया था ख़ासकर की विकास और गोपाल टेलर के साथ. लेकिन मैं भी तो एक इंसान हूँ, 28 बरस की जवान औरत , मर्दों के मेरे बदन से छेड़छाड़ करने पर मैं कामोत्तेजित हुए बिना कैसे रह सकती थी.

यही सब सोचते हुए मैं अपने कमरे की तरफ वापस जा रही थी.

गोपाल टेलर – मैडम, किसका फोन था ?

“राजेश का. मेरा मतलब मेरे पति का….”

कमरे में आते समय मैं ख्यालों में खोई हुई थी और मुझे ध्यान ही नही रहा की मेरा पल्लू ब्लाउज के ऊपर से खिसक गया है. जैसे ही मेरी नज़रें दीपू से मिली तो मैंने उसे अपनी चूचियों को ताकते पाया. तुरंत मैंने अपने पल्लू को ठीक किया और अपने ख़ज़ाने को ढक लिया. मेरी साँसे अभी भी तेज चल रही थी और इससे चूचियाँ तेज़ी से ऊपर नीचे गिर रही थी.

दीपू – मैडम, वो तो आपको बहुत मिस कर रहे होंगे.

दीपू शरारत से मुस्कुराया. मैं उसका इशारा समझ रही थी.

गोपाल टेलर – तब तो उनसे बात करके आपको ताज़गी महसूस हो रही होगी.

“बिल्कुल. ऐसा लग रहा था की ना जाने कितने लंबे समय से मैंने राजेश से बात नही की है.”

गोपाल टेलर – मैडम, काम शुरू करें फिर ?

“हाँ ज़रूर. अब क्या बचा है ?”

मैं अभी भी राजेश के ख्यालों में खोई हुई थी और टेलर की बातों में ध्यान नही दे रही थी. मेरे पति की प्यार भरी अंतरंग बातों से मुझमें मस्ती छाई हुई थी. गोपालजी अनुभवी आदमी था और शायद उसने मेरी भावनाओ को समझ लिया.

गोपाल टेलर – मैडम, मुझे आपके अंतर्वस्त्र भी तो सिलने हैं क्यूंकी महायज्ञ में आप अपने अंतर्वस्त्र नही पहन सकती.

“ओहो…. हाँ .”

तभी मुझे कुछ याद आया.
“गोपालजी आपको मैंने अपनी एक पुरानी समस्या बताई थी, उसे भी जरूर ठीक कर देना. आपको याद है ?”
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01-17-2019, 02:16 PM,
#82
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
तभी मुझे कुछ याद आया.
“गोपालजी आपको मैंने अपनी एक पुरानी समस्या बताई थी, उसे भी जरूर ठीक कर देना. आपको याद है ?”

गोपालजी – हाँ मैडम, आपकी पैंटी की समस्या. मैं उसको भी ज़रूर ठीक कर दूँगा. मैं आपके लिए कुछ और पैंटीज भी सिल दूँगा जिनको आप अपने घर वापस जाकर यूज कर सकती हो.

मैं मुस्कुरायी और हाँ में सर हिला दिया.

“गोपालजी आपका शुक्रिया. मैं काफ़ी समय से इस समस्या से परेशान हूँ.”

गोपालजी – मैडम, अपने कस्टमर्स की परेशानियों को हल करना ही मेरा काम है, है की नही ?

हम दोनो एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए. अपने पति से बात करके मैं बहुत हल्का महसूस कर रही थी.

गोपालजी – मैडम, आपकी समस्या ये है की कुछ समय बाद आपकी पैंटी बीच की तरफ सिकुड़ने लगती है. यही है ना ?

“हाँ, यही है.”

उस समय मेरा मन ऐसा हल्का हो रखा था की अपने टेलर से पैंटी की बात करते हुए मुझे बिल्कुल भी शरम नही आ रही थी.

गोपालजी – मैडम, जैसा की मैंने आपको बताया था की आपको नॉर्मल की बजाय मेगा साइज़ की पैंटी पहननी है. इसलिए अब जब भी आप शॉपिंग करने जाओगी तो डेसी मेगा ही लेना.

मैंने बेशर्मी से उसके इस सुझाव पर सर हिलाया.

“हाँ, अब मैं वही लूँगी.”

गोपालजी – मैडम, अगर एक मुझे मिल जाती तो……

मुझे समझ नही आया की गोपालजी क्या मांग रहा है और मैं एक बेवकूफी भरा सवाल कर बैठी.

“क्या मिल जाती?” 

गोपालजी – मैडम, कोई एक्सट्रा पैंटी हो तो …

“अरे …अच्छा…..एक मिनट…”

मैं जल्दी से अलमारी की तरफ गयी और एक पैंटी निकालकर टेलर को दे दी.

गोपालजी – शुक्रिया मैडम.

दीपू अब नज़दीक़ आ गया शायद मेरी पैंटी देखने के लिए.

गोपालजी – मैडम देखो, आपकी समस्या का मुख्य कारण.

ऐसा कहते हुए गोपालजी ने पैंटी के एलास्टिक को खींचा और पैंटी के पीछे का हिस्सा मुझे दिखाया. अब मुझे असहज महसूस होने लगा.

गोपालजी – देखो मैडम, यहाँ पर कपड़ा इतना छोटा है की ये आपके नितंबों को ठीक से नही ढक रहा है और एलास्टिक भी बेकार है. ग्रिप ढीली होने से ये आपके नितंबों पर फिसलकर सिकुड जा रही है.

“अच्छा…”

गोपालजी मेरी पैंटी पकड़कर दिखा रहा था और दीपू गौर से उसे देख रहा था. अब मैं अनकंफर्टेबल फील करने लगी थी.

गोपालजी – देखो मैडम, एलास्टिक इतना ढीला है.

“लेकिन गोपालजी जब मैंने ये खरीदी थी तब ठीक था , कई बार धुलने के बाद एलास्टिक ढीला हो ही जाता है.”

गोपालजी – लेकिन अगर कमर पे ठीक से ग्रिप नही बनेगी तो पैंटी अपनी जगह से खिसक जाएगी और आपको समस्या होगी.

“वो तो ठीक है पर धुलने के बाद तो कोई भी पैंटी ढीली हो ही जाएगी.”

गोपालजी – लेकिन मैडम, तब उस पैंटी को फेंक दो और नयी पैंटी यूज करो.

“अगर बार बार मुझे ऐसे ख़रीदनी पड़ेंगी तब तो मुझे किसी अंडरगार्मेंट वाले से शादी करनी पड़ेगी.”

मेरी बात पर सभी हंस पड़े. कमरे का माहौल हल्का हो जाने से मेरी असहजता भी थोड़ी कम हुई.

दीपू – गोपालजी जो पैंटी आप सिलते हो उसको भी तो कस्टमर्स मैडम के जैसे धोते होंगे. वो कितना चलती हैं ?

गोपालजी – दीपू , मैं अच्छी क्वालिटी का एलास्टिक लगाता हूँ और अगर गुनगुने पानी में धोया जाए तो 6 महीने चल जाएँगी.

दीपू – मैं शर्त लगा सकता हूँ की मैडम ठंडे पानी से पैंटी धोती होगी.

मैंने हाँ में सर हिला दिया.

गोपालजी – मैडम, ये भी आपकी समस्या का एक कारण है. आपको अपनी ब्रा भी ठंडे पानी से नही धोनी चाहिए.

“ठीक है मैं कोशिश करूँगी पर हर बार गुनगुने पानी से धोना मुश्किल है.”

गोपालजी – मैडम, आप फिकर मत करो. मैं आपकी समस्या ठीक कर दूँगा.

“ठीक है.”

गोपालजी – दीपू क्या तुम बता सकते हो की किसी औरत के लिए पैंटी में बैक कवरेज कितनी होनी चाहिए ?

दीपू – मेरे ख्याल से 50%.

गोपालजी – बिल्कुल सही. और मैडम के जैसी बड़े साइज़ वाली के लिए और भी ज़्यादा होना चाहिए. इसके बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है ?

गोपालजी ने अपने हाथ में पकड़ी हुई पैंटी की तरफ इशारा किया.

दीपू – ये तो पूरी खींचकर भी 25% से ज़्यादा नही कवर करेगी. मैडम के तो इतने बड़े हैं…..

गोपालजी – सिर्फ़ 25% ?

दीपू – जी मुझे तो यही लगता है.

गोपालजी – दीपू ऐसा कैसे हो सकता है ? 

दीपू – कपड़ा तो देखिए, ये ज़्यादा खिंचेगा नही.

गोपालजी – हाँ बहुत अच्छी क्वालिटी का नही है. फिर भी सिर्फ़ 25% ? ये कोई थोंग थोड़े ही है.

थोंग ? ये क्या होता है. जो भी हो लेकिन कोई कम कपड़े वाली चीज़ है, मैं सोच रही थी.

दीपू – गोपालजी, मैडम कोई इतनी मॉडर्न थोड़े ही है जो थोंग पहनेगी. ये तो पहली बार इसका नाम सुन रही होगी….हा हा हा……

दीपू की हँसी इतनी इरिटेटिंग थी की मैंने अपने दाँत निचले होंठ में गड़ा दिए. लेकिन उसकी बात सही थी की मैं पहली बार थोंग का नाम सुन रही थी.

गोपालजी – हाँ ये तो है. मैडम मेट्रो सिटी में तो रहती नही ,तो वो कैसे जानेगी.

वो दोनो मुस्कुरा रहे थे.

गोपालजी –मैडम, दीपू ने कहा की आपकी पैंटी नितंबों को सिर्फ़ 25% ढकेगी , इसलिए मैंने थोंग का नाम लिया. मेरा अंदाज़ा है की आपको नही मालूम की थोंग क्या होता है ?

मैंने ना में सर हिला दिया.

गोपालजी – मैडम, थोंग पैंटी के जैसा ही होता है पर छोटा होता है. इसमें आगे V शेप में कपड़ा होता है और पीछे से डोरी या थोड़ा सा कपड़ा होता है. आजकल बड़े शहरों में मॉडर्न लड़कियाँ इसे पहनती हैं.

वो थोड़ा रुका और सीधे मेरी आँखों में देखा.

गोपालजी – मैडम अगर आप साड़ी या सलवार कमीज़ के अंदर थोंग पहनोगी तो कपड़ों के अंदर आपकी पूरी गांड खुली रहेगी. मुझे लगता है पैंटी सिकुड़ने से आपको सेम वही फीलिंग आती होगी.

उस टेलर की विस्तार से कही बातों से मेरा चेहरा लाल होने लगा था और अब मैं इस बात को समाप्त करना चाहती थी.

“हम्म्म …”

गोपालजी – मैडम, सही कहा ना मैंने ?

“हाँ …”

मेरे पास उसकी बात सुनने के अलावा और कोई चारा नही था.

दीपू – गोपालजी अगर मैडम थोंग पहने तो क्या नज़ारा होगा.

गोपालजी – क्यूँ ?

दीपू – मैडम की गांड देखो. कितनी बड़ी है, बिल्कुल गोल और बहुत मांसल है.

गोपालजी – हे..हे….ये तो सही है. मैडम, दीपू ग़लत नही कह रहा है.

“गोपालजी , काम पर लौटें ?”

गोपालजी – जी जी मैडम. फालतू की बातें हो गयी.

दीपू – गोपालजी एक काम करो.

गोपालजी – क्या ?

दीपू – मैडम की पैंटी ऐसे पकड़ो फिर मेरी बात समझ में आ जाएगी.

गोपालजी – देखते हैं.

गोपालजी ने मेरी पैंटी को एलास्टिक से पकड़कर अपने चेहरे के आगे पकड़ा और दीपू ने उसके कपड़े को दोनो हाथों से खींचा और दिखाया की मेरी बड़ी गांड को ये कितना ढकेगी. 

मैं हैरान थी की ये दोनो कर क्या रहे हैं. इतने आराम से मेरी पैंटी के बारे में बातें कर रहे हैं और वो भी मेरे सामने. चीज़ें मेरे काबू से बाहर होते जा रही थी पर मैं कुछ नही कर सकती थी.

दीपू – देखो गोपालजी. सिर्फ़ इतना खिंच रहा है और मैडम की गांड देखो .

दोनो मर्द मेरी साड़ी से ढकी हुई गांड की तरफ देखने लगे. लेकिन मेरा मुँह उनकी तरफ था इसलिए उन्हे ठीक से नही दिखा.

गोपालजी – मैडम, थोड़ा पीछे को घूम सकती हो ? हमें देखना है की आपकी पैंटी में कितना कपड़ा और लगाने की ज़रूरत है ताकि ये ठीक से ढके और बीच में ना सिकुड़े.

“लेकिन …मेरा मतलब…”

गोपालजी – मैडम , आप हिचकिचा क्यों रही हो ? आपको कुछ नही करना है, बस पीछे मुड़ जाओ.

मैं कुछ कर पाती इसे पहले ही उस टेलर ने अपने सवाल से मुझे चित्त कर दिया.

गोपालजी – मैडम, अभी आपने पैंटी पहनी है ?

“क्या ???”

गोपालजी – मेरा मतलब, अभी आप टॉयलेट गयी थी तो हो सकता है की आपने उतार दी हो….इसलिए मैं पूछ रहा हूँ.

जाहिर था की ऐसे सवाल से मैं इरिटेट हो गयी थी. मैंने फर्श की तरफ देखा और हाँ में सर हिला दिया. मुझे एक मर्द के सामने ऐसे सवाल का जवाब देते हुए इतनी शरम आई की मन हुआ दौड़कर कमरे से बाहर चली जाऊँ.

“नही , लेकिन…”

गोपालजी – नही ? आपने नीचे कुछ नही पहना है ?

“ओह..नही नही. मैंने पहनी है.”

गोपालजी – आपने कहा नही. …चलो बढ़िया.

वो बातें करते हुए मेरी जवानी को देख रहा था. मैंने आश्चर्य से गोपालजी को देखा. मैंने पैंटी पहनी है तो इसमें बढ़िया क्या है , मुझे समझ नही आया.

गोपालजी – मैडम मैं अभी चेक करता हूँ. आपको फिर कभी पैंटी की समस्या नही होगी. प्लीज़ एक बार पीछे को मुड़ो.

मैं उलझन में थी. अब ये क्या करनेवाला है ? ये कैसे चेक करेगा ? मेरी पैंटी मेरी बड़ी गांड को कितना ढकती है ये चर्चा का विषय था पर क्या गोपालजी मेरी साड़ी को कमर तक उठाकर ये चेक करेगा ?

हे भगवान…. ऐसा नही हो सकता…

क्या वो मेरी साड़ी के अंदर हाथ डालकर ये चेक करेगा ? मेरे होंठ सूखने लगे थे और मुझे बहुत फिकर होने लगी थी.
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01-17-2019, 02:16 PM,
#83
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
गोपालजी – मैडम मैं अभी चेक करता हूँ. आपको फिर कभी पैंटी की समस्या नही होगी. प्लीज़ एक बार पीछे को मुड़ो.

मैं उलझन में थी. अब ये क्या करनेवाला है ? ये कैसे चेक करेगा ? मेरी पैंटी मेरी बड़ी गांड को कितना ढकती है ये चर्चा का विषय था पर क्या गोपालजी मेरी साड़ी को कमर तक उठाकर ये चेक करेगा ?

हे भगवान…. ऐसा नही हो सकता…

क्या वो मेरी साड़ी के अंदर हाथ डालकर ये चेक करेगा ? मेरे होंठ सूखने लगे थे और मुझे बहुत फिकर होने लगी थी.

खुशकिस्मती से ऐसा कुछ नही हुआ पर मेरे पति से फोन पे बात करने से जो खुशी मुझे मिली थी वो अब गायब होने लगी थी क्यूंकी मुझे डर सताने लगा था की टेलर फिर से मेरे साथ छेड़छाड़ करेगा.

गोपालजी – मैडम, जो समस्या आप बता रही हो, वो अभी इस समय भी हो रही है ?

“नही नही, अभी तो बिल्कुल ठीक है.”

मैंने कमज़ोर सी आवाज़ में जवाब दिया.

गोपालजी – हुह ….आपके कहने का मतलब है की आपकी पैंटी पूरी ढकी हुई है …..आपकी गांड को ?

मैं उन दोनो टेलर्स के मुँह से बार बार गांड शब्द सुनकर अजीब महसूस कर रही थी लेकिन मुझे अंदाज़ा था की ये लोवर क्लास के आदमी हैं और ऐसे शब्दों का प्रयोग बोलचाल में करते हैं.


“हाँ, मुझे ठीक लग रहा है…”

गोपालजी – लेकिन मैडम, अभी तो आपने बताया था की पहनने के कुछ समय बाद पैंटी नितंबों से खिसकने लगती है , है ना ?


“हाँ लेकिन …”


मेरे अंतर्वस्त्र के बारे में ऐसे डाइरेक्ट सवालों से मैं हकलाने लगी थी .


दीपू – गोपालजी, मेरे ख्याल से मैडम के कहने का मतलब है की पैंटी पहनने के कुछ समय बाद, अगर वो चलती है या कोई काम करती है तो उसे समस्या होने लगती है. सही कह रहा हूँ मैडम ?

“हाँ, हाँ. बिल्कुल यही मेरे कहने का मतलब था.”


गोपालजी – अच्छा. चूँकि आप इस कमरे में ज़्यादा हिली डुली नही हो तो आपको अभी पैंटी की समस्या नही है. मैडम ये बताओ की क्या पैंटी आपकी दरार में पूरी घुस जाती है ….मेरा मतलब गांड की दरार में ?

अब तो मुझे टोकना ही था. अब मैं और ज़्यादा बर्दाश्त नही कर पा रही थी.


“क्या मतलब है आपका ? ये कैसा सवाल है ?”

गोपालजी – मैडम, मैडम, प्लीज़ बुरा ना मानो. मुझे मालूम है की ये अंतरंग किस्म के सवाल हैं और आपको जवाब देने में शरम महसूस हो रही है. लेकिन अगर आप पूरी डिटेल नही बताओगी तो मैं समस्या को हल कैसे करूँगा ?

दीपू – मैडम, गोपालजी आपके डॉक्टर की तरह हैं. आपके ड्रेस डॉक्टर.

कमरे में कुछ देर चुप्पी छाई रही. दीपू और गोपालजी मुझे देख रहे थे और मैं अपने सूखे हुए होठों को गीला करके उन दोनो मर्दों के सामने अपने कॉन्फिडेंस को वापस लाने की कोशिश कर रही थी.


गोपालजी – हाँ, हाँ. मैडम, आप अपने डॉक्टर को अंतरंग बातें बताती हो की नही ?

मुझे जवाब में सर हिलाना पड़ा.

गोपालजी – ये भी उसी तरह है. मैडम हिचकिचाओ नही. मुझे बताओ की पैंटी पूरी तरह से नितंबों से फिसलकर आपकी गांड की दरार में घुस जाती है ? मेरा मतलब दोनो तरफ से ? क्या आप इसको चेक करती हो ?

मेरा चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया था. मेरे कान गरम होने लगे थे और मेरी साँसे तेज हो गयी थी. मेरा वर्बल ह्युमिलिएशन हो रहा था और मुझे लग रहा था की मैं फँस चुकी हूँ. मैं उनसे बहस कर सकती थी लेकिन इससे आश्रम के और लोग भी वहाँ आ सकते थे. सभी के सामने तमाशा होने से मैं बचना चाहती थी. इसलिए मैंने चुप रहना ही ठीक समझा और अपने ह्युमिलिएशन को सहन कर लिया क्यूंकी जो भी हो रहा था वो इस बंद कमरे से बाहर नही जाएगा.

“नही…मेरा मतलब ज़्यादातर हिस्सा अंदर चला जाता है…”

गोपालजी - मुझे ठीक से समझ नही आया. देखो मैडम, अगर आप साफ साफ नही बताओगी तो मैं पैंटी के लिए सही कपड़े का चुनाव नही कर पाऊँगा.

मुझे समझ आ रहा था की अगर मुझे ये किस्सा बंद करना है तो बेशरम बनना पड़ेगा.

“मेरा मतलब है की पैंटी का कपड़ा सिकुड़कर इकट्ठा हो जाता है और अंदर चला जाता है …मेरा मतलब..वहाँ…”

गोपालजी – हम्म्म …..आपका मतलब है की कपड़ा एक रस्सी की तरह लिपट जाता है और आपकी दरार में घुस जाता है , ठीक ?

मैंने सर हिला दिया.

गोपालजी – हम्म्म …मैडम, इसका मतलब आपके पेटीकोट के अंदर आपकी गांड पूरी नंगी रहती है.

मैं गूंगी की तरह चुप रही. ये तो साफ जाहिर था की अगर मेरी पैंटी सिकुड़कर दरार में घुस जाती है तो मेरे नितंब नंगे रहेंगे. वो मुझसे इसका क्या जवाब चाहता था ?
वैसे उसकी बात सही थी क्यूंकी असल में होता तो यही था.

गोपालजी – दीपू तुम्हे समस्या समझ में आई ?

दीपू – जी. ये पदमा मैडम की समस्या की तरह ही है.

गोपालजी – पदमा मैडम ? कौन पदमा ?

दीपू – जी आप उनको नही जानते. पिछले साल मैं शहर की एक दुकान में काम कर रहा था ये तब की बात है.

गोपालजी – अच्छा. मेरी एक कस्टमर भी पदमा है पर वो मुझसे सिर्फ ब्लाउज सिलवाती है.

मैं उन दोनो मर्दों की बातचीत सुन रही थी.

गोपालजी – मैडम, सुना आपने. ये सिर्फ आपकी समस्या नही है. दीपू उसकी क्या समस्या थी ?

दीपू – जी, पदमा मैडम की समस्या ये थी की चलते समय उसकी पैंटी दाहिनी साइड से सिकुड़कर बीच में आ जाती थी.

“और इस समस्या का हल कैसे निकला ?”

पहली बार मैं जवाब सुनने के लिए उत्सुक थी.


दीपू – उसकी टाँगों की लंबाई में थोड़ा सा अंतर था और ये जानने के बाद हमने उसी हिसाब से उसकी पैंटी सिल दी और उसकी समस्या दूर हो गयी.

गोपालजी – मैडम, मैंने पहले भी बताया है की सबसे पहले आपकी पैंटी में पीछे से ज़्यादा कपड़ा चाहिए. उसके अलावा थोड़ा सा मोटा कपड़ा और एक अच्छा एलास्टिक लगा देने से आपकी समस्या हल हो जाएगी.

“ठीक है गोपालजी.”

गोपालजी – दीपू नोट करो की जब मैं मैडम की पैंटीज सिलू तो ट्विल कॉटन 150 यूज करना है.

दीपू ने अपनी कॉपी में नोट कर लिया.

गोपालजी – ठीक है मैडम, अब प्लीज़ पीछे मुड़ो और मैं साबित करता हूँ की दीपू की बात ग़लत है.

मैं तो बिल्कुल भूल ही गयी थी की गोपालजी और दीपू के बीच मेरी पैंटी के बैक कवरेज को लेकर बहस हुई थी. और अब जबकि मैं इस वर्बल ह्युमिलिएशन को सहन कर रही थी तो अब फिज़िकल ह्युमिलिएशन की बारी आने वाली थी.

गोपालजी – मैडम, प्लीज़ टाइम वेस्ट मत करो.

मैंने दांतों में होंठ दबाए और धीरे से पीछे को मुड़ने लगी. मेरी पीठ और बाहर को उभरे हुए नितंब दीपू और गोपालजी को ललचा रहे थे. मैं ऐसे खड़े होकर शरम से मरी जा रही थी क्यूंकी मुझे मालूम था की उन दोनो मर्दों की निगाहें मेरी कद्दू जैसी गांड पर ही गड़ी होंगी.

गोपालजी – शुक्रिया मैडम. दीपू अब मुझे ये बताओ की मैडम की पैंटी लाइन कहाँ पर है.

दीपू – जी अभी देखकर बताता हूँ.

पैंटी लाइन ? मेरे दिल की धड़कने रुक गयी. पर इससे पहले की मैं और कुछ सोच पाती मुझे साड़ी से ढके हुए अपने नितंबों पर हाथ महसूस हुए जो की मेरे नितंबों को कसके पकड़े हुए थे. दीपू ने अपने हाथों से दो तीन बार मेरे नितंबों को दबाया और मेरे होंठ अपनेआप खुल गये. मेरा सांस लेना मुश्किल हो गया और मैंने अपनी भावनाओ पर काबू पाने की भरसक कोशिश की.

गोपालजी – मैडम के कपड़ों के बाहर से तुम्हे पैंटी महसूस हो रही है क्या ?

दीपू – जी गोपालजी.

ऐसा कहते हुए उसने मेरे मांसल नितंबों पर अपनी अँगुलियाँ फिरानी शुरू की और जल्दी ही उसको मेरी साड़ी और पेटीकोट के बाहर से पैंटी लाइन मिल गयी. मुझे महसूस हुआ की दीपू मेरी भारी गांड के सामने झुक गया है और अपने घुटनो पर बैठकर दोनो हाथों से मेरी पैंटी के कपड़े के ऊपर हाथ फिरा रहा है. इस हरकत से कोई भी औरत कामोत्तेजित हो जाती और मैं भी अपवाद नही थी.

दीपू के हाथों को मैं अपनी बड़ी गांड के ऊपर घूमते हुए महसूस कर रही थी और अब पैंटी को छोड़कर उसकी अँगुलियाँ बीच की दरार की तरफ बढ़ गयी. लगता था की दीपू को मेरे नितंबों का शेप बहुत पसंद आ रहा था और जैसे जैसे उसकी अँगुलियाँ मेरी साड़ी को बीच की दरार में धकेल रही थी वैसे वैसे मेरे नितंबों का उभार सामने आ रहा था. 

गोपालजी – क्या हुआ ? लगता है तुम्हे मैडम की बड़ी गांड बहुत भा गयी है ….हा हा हा…..

टेलर की हँसी कमरे में गूँज रही थी और उन दोनो मर्दों के सामने मेरी हालत को बयान कर रही थी.

दीपू – गोपालजी चाहे आप कुछ भी कहो पर मैडम की गांड बहुत ही शानदार है. सुडौल भी है और मक्खन की तरह चिकनी और मुलायम भी है . क्या माल है.

मैं अपने दांतों से होंठ काट रही थी और उनके अश्लील कमेंट्स को नज़रअंदाज करने की कोशिश कर रही थी. लेकिन मेरा बदन इन कामुक हरकतों को नज़रअंदाज़ नही कर पा रहा था.

मुझे साफ समझ आ रहा था की पैंटी लाइन ढूंढने के बहाने दीपू मेरे नितंबों से मज़े ले रहा है. उसने मेरे बाएं नितंब पर अपना अंगूठा ज़ोर से दबा दिया और बाकी अंगुलियों से मेरी पैंटी लाइन के एलास्टिक को पकड़ लिया. मेरा बदन इतना गरम होने लगा था की मुझे हल्के से हिलना डुलना पड़ा. मुझे खीझ भी हो रही थी और कामोत्तेजना भी. दीपू मेरी बड़ी गोल गांड को दोनो हाथों से दबाने में मगन था. सच कहूँ तो उसकी इस कामुक हरकत से मैं कामोत्तेजित होने लगी थी. वो पैंटी लाइन ढूँढने के बहाने बिना किसी रोक टोक के मेरे नितंबों को मसल रहा था.

दीपू - गोपालजी, मिल गयी पैंटी लाइन , ये रही.

ऐसा कहते हुए उसने मेरी साड़ी के बाहर से मेरी पैंटी के किनारों पर अपनी अंगुली फेरी. उत्तेजना से मेरे बदन में इतनी गर्माहट हो गयी थी की मेरा मन हो रहा था की साड़ी उतार दूं और सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी रहूं.

गोपालजी – कहाँ ? मुझे देखने दो.

मुझे एहसास हुआ की अब गोपालजी भी मेरे पीछे दीपू के पास आ गया. वो भी झुक गया और मेरी उभरी हुई गांड के पास अपना चेहरा ले आया. क्यूंकी दीपू लगातार मेरे नितंबों पर हाथ फेर रहा था इसलिए मैं स्वाभाविक रूप से हल्के से अपनी गांड को हिला रही थी. मैं जानती थी की दो मर्दों के सामने इस तरह साड़ी के अंदर मेरी भारी गांड को हिलाना बड़ा भद्दा लग रहा होगा लेकिन ऐसा करने से मैं अपनेआप को रोक नही पा रही थी.

अब मुझे एहसास हुआ की गोपालजी का हाथ भी मेरी गांड को छू रहा है.

गोपालजी – हम्म्म …मैडम, मुझे पैंटी लाइन को महसूस करने दो तभी मुझे मालूम पड़ेगा की ये आपके नितंबों को कितना ढक रही है.
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04-11-2021, 08:36 PM,
#84
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे
Update - 01





पांचवा दिन



महायज्ञ की तैयारी-



‘महायज्ञ परिधान'

आप ने अब तक की कहानी पढ़ी जिसमे कैसे एक महिला जिसको बच्चा नहीं है एक आश्रम में जाती है और वहां उसे क्या क्या अनुभव होते हैं,



पिछली कहानी में आपने पढ़ा कैसे एक महिला बच्चे की आस लिए एक गुरूजी के आश्रम पहुंची और वहां पहले चार पांच दिन उसे क्या अनुभव हुए पर कहानी अधूरी है ..



वैसे तो हर धर्म हर मज़हब मे इस तरह के स्वयंभू देवता बहुत मिल जाएँगे. हर गुरु जी स्वामी या महात्मा एक जैसा नही होता. मैं तो कहता हूँ कि 90% स्वामी या गुरु या प्रीस्ट अच्छे होते हैं मगर 10% खराब भी होते हैं. इन 10% खराब आदमियों के लिए हम पूरे 100% के बारे मे वैसी ही धारणा बना लेते हैं. और अच्छे लोगो के बारे में हम ज्यादा नहीं सुनते हैं पर बुरे लोगो की बारे में बहुत कुछ सुनने को मिलता है तो लगता है सब बुरे ही होंगे .. पर ऐसा वास्तव में बिलकुल नहीं है.



यहाँ तक की कहानी ही मुझे मिली आगे क्या हुआ ये उस्तुकता आपको भी होगी


मेरा प्रयास होगा इसी कहानी को थोड़ा आगे बढ़ाने का जिसमे परिकरमा, योनि पूजा , लिंग पूजा और मह यज्ञ में उस महिला के साथ क्या क्या हुआ लिखने का प्रयास करूँगा .. अभी कुछ थोड़ा सा प्लाट दिमाग में है और आपके सुझाव आमनत्रित है और मैं तो चाहता हूँ के बाकी लेखक भी यदि कुछ लिख सके तो उनका भी स्वागत है


Update - 01

पैंटी की समस्या - परिक्षण निरक्षण



मुझे कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि मैंने पहले ही मास्टर जी के आगे व्यवाहरिक रूप से घुटने टेक दिए थे। मास्टर जी ने दीपु के हाथ को मेरे बाएं नितम्ब के गाल से हटा दिया और सीधे मेरे नितम्ब को अपने हाथ से वहाँ दबाया. मैंने महसूस किया कि मास्टर-जी का हाथ उनके प्रशिक्षु की तुलना में बोल्ड था। उसने तुरंत मेरी गांड पर चकोटि काट कर मुझे संकेत दिया कि यह उसका हाथ है। दीपु की उँगलियाँ अभी भी मेरे दाहिने नितम्ब पर मेरी पैंटी की लाइन पर टिकी हुई थीं।

मेरी साड़ी और पेटीकोट इन मर्दो के हाथों से मुझे सुरक्षा देने के लिए प्राप्त रूप से मोटी नहीं थी। इस प्रकार दीपक की तरह मास्टर-जी भी अपने हाथ की दो से तीन अंगुलियों से मेरी पैंटी को आसानी से पकड़ लिया । मास्टर-जी ने मेरी पैंटी लाइन के पीछे से अपनी उंगलियाँ मेरे बाएँ नितंब पर घुमाना शुरू कर दिया। इस बिंदु पर मैं यौन उत्तेजना में कांप रही थी क्योंकि और नीचे ... और नीचे ... और नीचे हाथ ले जाते हुए उसने मेरी पैंटी लाइन का पता लगाना रब ताज जारी रखा जब तक वह मेरी गांड की दरार तक नहीं पहुँच गया! मैं उस सेक्सी हॉट लहर को सहन नहीं कर सकी और मेरे शरीर को झकझोर कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

मैं: आह! आउच! आप मास्टर जी क्या ... क्या कर रहे हैं?

मास्टर-जी: मैडम, मैडम बस एक पल के लिए धीरज रखिए। मेरी जाँच लगभग समाप्त हो गई है।

मैंने उसी स्थिति में खड़ी रही और मेरे पैरों और मेरी टांगों के बीच थोड़ी सी दूरी की ( ईमानदारी से कहू तो मास्टर जी का हाथ को मेरी गाण्ड तक आसानी से पहुँचने देने के लिए ) हालाँकि इससे मुझे सेक्सी बेचैनी से क्षणिक राहत तो मिली, लेकिन मास्टर-जी ने अगले ही क्षण एक नया 'निरीक्षण' शुरू किया! I

मास्टर जी ने मेरी पूरी गांड की दरार तक मेरी पैंटी लाइन को ट्रेस करते हुए मेरी गाण्ड से अपना हाथ हटा दिया। मैंने खुले मुंह के साथ राहत की सांस ली, तभी मैंने महसूस किया कि मास्टर-जी ने अपनी पूरी हथेली से मेरे बाएं नितंब पर बहुत कस कर निचोड़ दिया।

मेरे निपल्स ने तुरंत उस पर प्रतिक्रिया दी और मेरी ब्रा के भीतर पूरी तरह कठोर हो सीधे हो गए थे। स्वचालित रूप से जो कुछ भी थोड़ी बहुत शर्म मेरे अंदर रह गई थी, वह भाप बन कर उड़ गई, और मैंने अपनी साड़ी और ब्लाउज के ऊपर अपने स्तनो की मालिश करना शुरू कर दिया और साथ ही साथ अपने भारी कूल्हों को धीरे-धीरे लहराने लगी । मुझे नहीं पता था कि मास्टर-जी और दीपू ने मुझे बहुत सेक्सी कर्म करते देखा था या नहीं , लेकिन उन्होंने अपने हाथों से मेरे पूरे विकसित नितम्बो को ऐसे दबाया जैसे मधुमखियो के छत्ते से शहद निकाला जाता है ।

मास्टर-जी: ठीक है हो गया मैंने चेक कर लिया ।

दीपू : तो, मास्टर-जी, मैं सही था या गलत?

मास्टर जी का परिक्षण निरक्षण कुछ और क्षणों के लिए चला और आखिरकार जब उन्होंने अपने हाथो को रोका तो मेरी साडी स्वाभाविक रूप से उसकी उंगली के साथ-साथ मेरी जांघों के बीच मेरी गहरी गांड की दरार में समा गयी थी ।

मास्टर-जी: हां दीपू , मुझसे गलती हो गई थी। तुम ठीक कह रहे थे।

यह कहते हुए कि उसने फिर से मेरे नितम्बो पर एक लम्बी सी चुटकी इस तरह काटी मानो वह छोटी लड़की के गालों को दो उंगलियों से निचोड़ रहे हो ! मैं परमानंद में जोर-जोर से सांस ले रही थी , लेकिन फिर भी मैंने अपने आप की नार्मल दिखाने की को वापस पाने की कोशिश की।

मास्टर-जी: मैडम, मुझे कहना होगा कि आप मेरे अन्य ग्राहकों से काफी अलग हैं! हालाँकि अभी भी मेरी साड़ी से ढँकी गाण्ड पर उनके दो हाथ थे, सौभाग्य से अब उनके हाथ ज्यादातर स्थिर थे।

मैं: क्या… मेरा मतलब है कैसे? मैंने कर्कश आवाज में पूछा। मास्टर-जी: मैडम, क्या आपने कभी पैंटी पहनने के बाद शीशे में अपनी पीठ चेक की है?

ये कैसा प्रश्न है! मैंने खुद को हो रही असुविधा को नजरअंदाज करते हुए मैंने अपने होंठों को गीला कर दिया और जवाब देने की शुरुआत की!

मैं: हम्म। बेशक, लेकिन ... लेकिन आप क्यों पूछ रहे हैं ?

जैसा ही मैंने उत्तर दिया मैं तुरंत महसूस किया कि मास्टर-जी और दीपू के दोनों हाथों में हलचल हुई , हालाँकि मैंने 'निश्चित रूप से' कहा था, लेकिन असलियत में मुझे शायद ही टॉयलेट में आईने में खुद को इस तरह से जाँचने का मौका मिलता है कि मैं जब अपनी पोशाकें पहनूँ तो उसमे अपना पूरा जिस्म और पोशाक देख सकू । हमारा बाथरूम मिरर में केवल ऊपरी हिंसा दिखाई देता है और इसलिए मुझे अपना फुल फिगर चेक करने के लिए बैडरूम में आना पड़ता है, और बाथरूम से केवल अपने अंदर के कपड़े पहनना और फिर ऐसे ही बाहर आना बहुत मुश्किल है और यहां तक कि अगर मैं ऐसा करती हूं, और अगर अनिल आसपास होता है , तो वह निश्चित रूप से मुझे इस हाल में खुद को दर्पण में जांचने नहीं देगा, बल्कि मुझे अपनी बाहों में ले लेगा और निश्चित रूप से एक ही पल में में मेरे अंडरगारमेंट भी उतर जाएंगे ।

मास्टर-जी: अगर ऐसा है, तो आप अपवाद हैं, मैडम, क्योंकि मेरा कोई भी ग्राहक अपनी साड़ियों के नीचे अपने गोल नितम्बो का इतना एक्सपोज़र नहीं होने देती ।

मैं फिर से बोल्ड हो गयी ! यह बूढ़ा व्यक्ति क्या ये संकेत देने की कोशिश कर रहा है की मैं एक साहसी महिला हूँ? मैंने तुरंत अपने दर्जी के सामने अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश की कि 'मैं ऐसी नहीं हूं'।

मैं : नहीं, नहीं मास्टर-जी, वास्तव में जब मैं इसे पहनती हूं, मैं इसे अपनी पीठ पर ठीक से फैलाना सुनिश्चित करती हूं ताकि मैं सभ्य दिखूं ... मेरा मतलब है ... ताकि मैं अपनी साड़ी के नीचे सभ्य महसूस करूं।

मास्टर-जी: लेकिन मैडम, जरा देखिए। आपकी पैंटी लाइन यहाँ है ...

यह कहते हुए कि उसने मेरी पैंटी लाइन को फिर से बाईं गांड पर खींच दिया और इस बार उसने अपनी उंगली मेरी गांड के मांस पर ज़ोर से दबाकर मुझे पैंटी की पोज़िशन देखने के लिए कहा। मास्टर-जी: मैडम, आपकी दरार से सिर्फ चार-पाँच उंगलियाँ ढक रही है और आपका पूरा का पूरा बायाँ नितम्ब इसके बाद नंगे है। मेरा मतलब है कि आपकी नितम्ब पैंटी से ढँकी नहीं हुई है ।

मैं : यह ... जरूर अपनी जगह से हिल गयी होगी

मास्टर-जी: ठीक है। लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि मैडम आप अपने नितम्बो का का अधिकतर हिस्सा अपनी पैंटी के बाहर रखते हैं।

दीपू: मास्टर-जी, मैडम के पास इतना अच्छा खज़ाना है, इसे पूरी तरह से कवर करके क्यों रखना चाहिए?

मास्टर-जी: नहीं, नहीं। वह ठीक है। लेकिन मैं केवल यह कह रहा था कि मेरे अन्य ग्राहक ...

मैंने दीपू की टिप्पणी पर आपत्ति की ।

कहानी जारी रहेगी
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04-15-2021, 02:00 PM,
#85
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे
औलाद की चाह

CHAPTER 6 - पांचवा दिन

महायज्ञ की तैयारी-

‘महायज्ञ परिधान'

Update -25

आपत्तिजनक निरक्षण


मैंने आपत्तिजनक लहजे में दीपू से कहाः

मैं: दीपू आपका क्या मतलब है? मैं ऐसा जानबूझकर करती हूं?

दीपू: नहीं नहीं मैडम। मैंने तो ऐसे ही कहा । आपने कहा था ... इसे पहनने के बाद आप इसे अपनी गाँड पर फैला देती हो ...अब आप इससे ज्यादा और क्या कर सकते हैं?

दीपू ने समझौतावादी लहजे में कहा जो मुझे अच्छा लगा ।

मास्टर-जी: ठीक है! यदि पैंटी में ही दोष है, तो पहनने वाली क्या कर सकती है।

दीपू: तो मास्टर जी तो यह मैडम की समस्या का मुख्य कारण है?

मास्टर-जी: जाहिर है। जरा तुम खुले भाग को देखो … यह कहते हुए कि मास्टर जी ने अपने अंगूठे और मध्यमा उंगली के बीच एक गैप बनाया और दीपू को मेरी गांड के मांस के ऊपर की दूरी दिखाने की कोशिश की, जो मेरे पैंटी कवर के बाहर थी।

दीपू: मास्टर जी आप इसे अपनी अंगुलियों से भी नहीं ढक पा रहे !

मेरा चेहरा फिर से लाल हो गया था और शायद यह सुनकर मास्टर-जी ने भी पूरी तरह से अपनी उँगलियों से मेरी गांड को सहलाने की कोशिश की।

मैं: आआह!

मैंने आह सुन कर मास्टर जी ने अपनी पूरी हथेली को अपनी उंगलियों से पूरी तरह से बढ़ा दिया जिससे उनके हाथ ने मेरे दाए नितम्ब की पूरा अपनी गिरफ्त में ले लिया । मुझे भी अपनी चूत में गीलापन महसूस हो रहा था और मेरे चूतरस को बूँदें अब मेरी पैंटी में से बाहर निकालने लगीं थी । और जैसा कि उम्मीद थी, उसने अपनी पूरी हथेली के साथ मेरी बहुत गांड का मांस पकड़ कर उसे एक जोरदार तरीके से निचोड़ दिया।

मुझे अभूतपूर्व आनंद का अनुभव हुआ और दूसरी तरफ दीपू भी मेरी साड़ी के नीचे मेरे बाये गोल नितम्बो की चिकनाई महसूस कर रहा था

मैंने इसके बाद इस 'कभी न खत्म होने वाली' कपड़ो के माप की प्रक्रिया को पूर्ण विराम लगाने का प्रयास किया।

मैं : जो भी मास्टर-जी, आप बस मुझे उचित आकार की पैंटी सी कर दे दीजिये ।

मास्टर-जी: मैडम! केवल यही कारण है कि मैं जाँच कर रहा हूँ। दीपू, बस मैडम के लिए दो इंच का अतिरिक्त बैक कवर लगाना है याद रखना ।

दीपू ने अपनी उँगलियों को मेरी दाईं गांड पर थोड़ा सा घुमाया जैसे कि यह जांचने के लिए कि मेरी गांड कितनी ढकी होगी अगर वह अतिरिक्त कपडा मेरी पैंटी से जुड़ा हुआ हो।

दीपू: क्या वो काफी होगा मास्टर-जी? क्या आपने इस हिस्से की जाँच की है, यह बहुत चिकनी तंग और उछालभरी है! मुझे डर है कि पैंटी फिर से फिसल सकती है।

मास्टर-जी: कौन सा हिस्सा? मध्य? हम्म।

तंग और उछालभरी? दीपू मेरी गांड के बीच के हिस्से का जिक्र कर रहा था और मेरी गांड के मांस की लोच की जाँच करने के लिए अपनी उंगली से सहला रहा था ! मुझे ऐसा लगा मुझे शर्म से पानी में डूब जाना चाहिए ये दोनों मेरी सारी शर्म और स्वाभिमान की परीक्षा ले रहे थे।

वह रुक गया और मैंने महसूस किया की मास्टर-जी का अंगूठा मेरी बायीं नितम्ब के गाल के ऊपर था और उस बूढ़े बदमाश ने जाहिर तौर पर मेरे बड़े-बड़े गोल मांसल नितम्बो को फिर से निचोड़ने का मौका नहीं छोड़ा और वो मेरे गदराये हुए चिकने नितम्बो और गांड की चिकनाई का आनंद ले रहा था । मैं भी तेजी से गर्म हो रही थी और मेरे नितंब भी अब पर्याप्त गर्मी का उत्सर्जन कर रहे थे।

मुझे यकीन था कि मास्टर-जी और दीपक दोनों ही स्पष्ट रूप से मेरी इस हालत से वाकिफ थे । क्योंकि मैं तेजी से असहज और यौन उत्तेजित हो रही थी इसलिए थास्वाभाविक रूप से मैं अपनी गांड को और अधिक तेजी से हिला रही थी।

मास्टर-जी: मैडम, मुझे आपकी तारीफ करनी चाहिए। आपकी उम्र में और शादी के बाद भी आपके पास ऐसी चुस्त गांड और मस्त नितम्ब है।

दीपू : मास्टर-जी, अपने पति के बारे में भी सोचिए, वह कितना भाग्यशाली है।

मास्टर-जी: हा हा। बेशक दीपू ।

दीपक: इनका पति इस मस्त गांड को पूरे दिन, पूरी रात में छू सकता है ...

मास्टर-जी: एक बेवकूफ दीपू की तरह बात नहीं करते। दिन में वो ऑफिस में होता होगा या व्यवसाय करता होगा । वह इन्हे पूरे दिन कैसे छू सकता है? हा हा हा।

दीपू भी इस नीच श्रेणी के चुटकुले में हँसी की गड़गड़ाहट में शामिल हो गया और लगभग एक साथ दोनों ने मेरी गाण्ड पर कस के निचोड़ दिया और मेरी साड़ी के ऊपर से मेरे नितम्ब के मांस को सहलाने लगे तो मैं रेगिस्तान में पानी के लिए प्यासे यात्री की तरह हाफने लगी ।दर्जी के द्वारा - इस तरह की टिप्पणी! और इसके अलावा, स्वतंत्र रूप से मेरे नितम्बो के साथ छेड़ छाड़. मैं इन दोनों के साहस को देखकर चकित थी ।

मेरे कूल्हों इस समय उनकी गिरफ्त में इसलिए थे क्योंकि मैं इस समय कोई हंगामा नहीं करना चाहती थी, मैने औलाद की चाह में इसे इलाज का हिंसा मानते हुए इन हालात से समझौता कर लिया था । अगर यह आश्रम नहीं होता, तो एक तेज तंग थप्पड़ इस दीपू और मास्टर को ऐसा सबक सिखाता की सब होशियारी और बदमाशी भूल जाते और में इन्हे जेल की हवा खिलवाती । उसने यह कहने की हिम्मत कैसे की कि "वह मेरी गांड को पूरे दिन, पूरी रात छू सकता है ..." : आह! आउच!

मेरी उत्तेजना बार-बार मेरी शर्म पर हावी हो रही थी। जिस तरह से ये दोनों मर्द मुझे उस बेहद संवेदनशील जगह पर दबा रहे थे, उससे मैं लगभग एक रंडी की तरह बर्ताव कर रहा था, मैं अपने दोनों बूब्स को दबा रही थी और मेरे निगम्बो को निचोड़ रहे थे और मेरे नितम्ब झटके दे रहे थे , और वो मेरी साड़ी के नीचे मेरी भारी गाण्ड को भी सहला रहे थे।

दोनों पुरुष अब बेतरतीब ढंग अपनी उंगलियों से मेरी गांड के बीच में मेरी साड़ी और पेटीकोट के ऊपर से मेरे नितंबों के अंदर अपनी उंगलिया घुसा रहे थे और मेरे नियतमबो और गांड की दृढ़ता की जाँच कर रहे थे। मेरे होंठ अब बार बार सूख रहे थे और उन्हें गीला रखने के लिए मैं बार बार अपनी जीभ अपने होंठो पर फिरा रही थी और मेरे निप्पल बेहद तने हुए थे जो अब बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे की उन्हें भी मसला जाएl

मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, और उस अश्लील दृश्य में मेरे द्वारा की जा रही अश्लीलता का प्रदर्शन को देखने की कल्पना करने लगी - दो पुरुष अकड़ू बैठे हुए कैसे मेरी साड़ी के ऊपर से मेरी गाण्ड को सहला रहे थे और मैं किस सेक्सी तरह से अपनी गांड को मटका रही थी और अपने बूब्स को दबा रही थी और अपनी साड़ी के पल्लू के नीचे से मेरे निप्पलों को मसल रही थी ।

ये अश्लील और असभ्य कृत्य कुछ देर ऐसे ही चला और फिर मास्टर-जी की टिप्पणी की , "ठीक है मैडम, हमारा काम लगभग पूरा हो गया है l "

मैंने सोचा शुक्र है ये खत्म हुआ ।

मास्टर-जी: दीपू , मुझे लगता है कि पैंटी के दोनों किनारों पर लोचदार सिलाई के साथ तीन इंच अतिरिक्त कपड़े मैडम की समस्या को हल करेंगे।

दीपू : जैसा आपको सही लगे मास्टर जी।

दोनों खड़े हो गए और मैंने तुरंतअपने को इस दोनों के हाथो को छुड़ाने के लिए एक कदम आगे हो गयी और तब तक ये दोनों लगातार मेरे नितम्बो को सहलाते रहे ।

मास्टर-जी: ठीक है मैडम, आखिरकार आपका माप पूरा हो गया ! मैं आपकी पोशाक और अंडरगारमेंट्स के साथ रात 09:00 बजे तक यहाँ वापस आ जाऊंगा। चूंकि महा-यज्ञ प्रारंभ समय लगभग 11:00 बजे है, इसलिए हमारे पास पर्याप्त समय होगा यदि आपको कपड़ो में में किसी और सुधार की आवश्यकता होगी तो वो भी कर सकेंगे ।

मैं: उफ्फ! ठीक है मास्टर जी।

मैंने एक गहरी साँस ली और मेरा पूरा शरीर अब दर्द कर रहा थाl

कहानी जारी रहेगी
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04-15-2021, 02:02 PM,
#86
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे
औलाद की चाह

CHAPTER 6 - पांचवा दिन

महायज्ञ की तैयारी-

‘महायज्ञ परिधान'

Update -26

कुछ पल विश्राम 


मैंने एक गहरी सांस ली मेरा पूरा शरीर अब दर्द कर रहा था, क्योंकि मेरे नितम्बो से एक लम्बी अवधि के किये पुरुषो ने छेड़खानी और खिलवाड़ किया था और ये बहुत थकाने वाला था । मैंने अपनी साडी का पल्लू समायोजित किया और साड़ी को अपने नितंबो पर ठीक कर सभ्य दिखने की कोशिश की। दीपू को अपने बैग में सिलाई के नोट्स और टुकड़ों को इकट्ठा करने की जल्दी थी और मास्टर जी ने रात में 9 बजे तक वापस आने का वादा करते हुए मुझसे जाने की इजाजत ली ।

मेरे कमरे से दर्जी-युगल केजाने होने के बाद भी, मैं कुछ समय के लिए एक मूर्ति की तरह खड़ी हुई यह महसूस करने की कोशिश कर रही थी कि मैं पिछले एक घंटे में क्या कर रहे थी और इसके आगे मेरे साथ और क्या क्या होने वाला है । मैं शौचालय गयी और ठंडे पानी से अपना चेहरा, गर्दन और हाथ धोये और अपनी जगी हुई कामुक भावनाओंको शांत करने की असफल कोशिश की। मैंने अपना चेहरा भी नहीं पोंछा और कमरे में वापस आयी और बिस्तर में कूद कर लेट गयी ।

मेरे साथ जो हुआ था उसे याद करके मैंने अपनी चूत में ऊँगली करके अपनी वासना को शांत करने को कोशिश की जिससे मैंने अपनी योनि से अपनी पैंटी में कुछ तरल पदार्थों का निर्वहन किया और फिर खुद को इन 'गर्म' भावनाओं से बाहर निकालने का प्रयास किया।

इस हस्त मैथुन करके मैं कुछ समय बाद सफल हुई और फिर मैंने महा-यज्ञ के लिए मानसिक रूप से तैयार होने का प्रयास किया। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस पर ध्यान केंद्रित किया,लेकिन ये मुझे बहुत कठिन लगा। ध्यान करते ही नींद बहुत जल्दी आती है और मेरे साथ भी यही हुआ .

एक बिंदु पर मुझे बहुत नींद आने लगी और मैंने थोड़ी देर के लिए सोने का फैसला किया। मैंने बस अपनी लेटी हुई पोज़िशन से अपनी कमर उठाई और अपनी साड़ी और पेटीकोट के अन्दर हाथ डाल कर अपनी गीली पैंटी को बाहर निकाल लिया। मैंने उसे कमरे के कोने में फेंक दिया और ततकाल झपकी ले ली । मुझे नहीं पता था कि मैं कितनी देर सोयी , लेकिन कुछ समय बाद दरवाजे पर दस्तक से मेरी नींद बाधित हुई। मैंने दरवाजा खोला तो परिमल दरवाजे पर था।

परिमल: जय लिंग देव मैडम। आप इस समय सो रही है?

मुझे हमेशा इस छोटे कद वाले परिमल को देखा कर हसी आती थी और मैंने किसी तरह से अपनी हसि को रोका । मुझे नहीं पता था कि हर बार उसे देख कर मुझे मजा क्यों आता था ।

मैं: वास्तव में मास्टर-जी को माप देने में काफी समय लग गया था इसलिए…

परिमल: हूं। वास्तव में गुरु-जी ने आपके लिए यह पुस्तक दी। मैडम, आप फ्रेश हो जाओ तब तक मैं आपके लिए चाय ले लाऊंगा। फिर आप इस पुस्तक को पढ़ लीजियेगा ।

यह एक विचार अच्छा लगा । मुझे अभी भी कुछ नींद आ रही थी और मैंने अपनी चूत के आस-पास हल्की खुजली महसूस की, मुझे तुरंत याद आया कि मैंने पैंटी नहीं पहनी हुई थी। मैंने अपनी आंख के कोने से कमरे के कोने तक देखा, ताकि यह पता लगाया जा सके कि वो कहाँ पड़ी हुई है । भगवान का शुक्र है! परिमल ने एक कोने में पड़ी हुई मेरी पैंटी पर गौर नहीं किया था। लेकिन निश्चित रूप से उसकी आँखें मेरी साड़ी के पल्लू के नीचे मेरी छाती और मेरे स्तनों पर घूम रही थीं, हालाँकि उसकी ऊँचाई इतनी ही थी कि उसकी नज़रसीढ़ी मेरे स्तनों पर ही पड़ती थी ।

निर्मल: मैडम, गुरु-जी ने भी आपको ये भी सूचित करने के लिए कहा था कि आप रात 11 बजे तक महा-यज्ञ के लिए तैयार रहें। हालाँकि अभी उसमे काफी समय है और आप आराम से त्यार हो सकती हैं , फिर भी मैंने आपको गुरु जी के आदेश से अभी ही अवगत करा दिया है ।

मैं: ठीक है, धन्यवाद ।

वह चला गया और मैंने तुरंत अपनी पैंटी लेने के लिए कमरे के कोने में भाग कर गयी और उसे उठा कर अलमारी में रख दिया। मैं पैंटी के बिना बेहतर महसूस कर रही थी और मैंने कुछ देर पेंटी ना पहनने का फैसला किया, क्योंकि अब मैं अब काफी देर तक केवल अपने कमरे तक ही सीमित रहने वाली थी । परिमल कुछ ही मिनटों में ही चाय ले कर वापस आ गया और उस समय तक मैंने शौचालय का इस्तेमाल किया। चाय खत्म होने के बाद, मैंने किताब ली और उसके पन्ने पलटे । यह तांत्रिक पूजा पर एक किताब थी। पुस्तक में लिंग पूजा, योनी पूजा, स्त्री पूजा इत्यादी के विषय और उनका विशद विवरण और व्याख्याएँ थी ।

कहानी जारी रहेगी
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04-19-2021, 12:14 PM,
#87
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे
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CHAPTER 6 - पांचवा दिन

महायज्ञ की तैयारी-

‘महायज्ञ परिधान'

Update -27


तंत्र ज्ञान



मैं काफ़ी लंबे समय तक पुस्तक से चिपकी रही सबसे पहले पुस्तक में तांत्रिक क्रियाओ के बारे में संक्षेप में बताया था की लिंग पुराण में सृष्टि के नैसर्गिक सामंजस्य का तात्विक ज्ञान भगवान् शिव ने दिया है। सभी ग्रन्थ मनुष्य मात्र के लिए ध्यान योग के अभ्यास से ही आत्मज्ञान पाने का सहज मार्ग दिखलाते हैं ।

लिंग पुराण में कहा गया है कि क्रिया की साधना के द्वारा गृहस्थ भी साधू है, धारण करने योग्य कर्म ही धर्म है और धारण न करने योग्य कर्म ही अधर्म है । मैं लिंग में ही ध्यान करने योग्य हूँ ।मुझ से उत्पन्न यह भगवती जगत की योनी है, प्रकृति है । लिंग वेदी महादेवी हैं और लिंग स्वयं भगवान् शिव हैं। पुर अर्थात देह में शयन करने के कारण ब्रह्म को पुरुष कहा जाता है। मैं पुरुष रूप हूँ और अम्बिका प्रकृति है, सब नरों के शरीर में दिव्य रूप से शिव विराजमान हैं, इसमें संदेह नहीं करना चाहिए. सब मनुष्यों का शरीर शिव का दिव्य शरीर है ।शुभ भावना से युक्त योगियों का शरीर तो शिव का साक्षात् शरीर है। जब समरस में स्थित योगी ध्यान यज्ञ में रत होता है तो शिव उसके समीप ही होते हैं" ।

योनी तंत्र के अनुसार (जो माता पारवती और भगवान् शिव का संवाद है) ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों शक्तियों का निवास प्रत्येक नारी की योनी में है क्योंकि हर स्त्री देवी भगवती का ही अंश है । दश महाविद्या अर्थात देवी के दस पूजनीय रूप भी योनी में निहित है। अतः पुरुष को अपना आध्यात्मिक उत्थान करने के लिए मन्त्र उच्चारण के साथ देवी के दस रूपों की अर्चना योनी पूजा द्वारा करनी चाहिए ।

योनी तंत्र में भगवान् शिव ने स्पष्ट कहा है कि श्रीकृष्ण ।श्रीराम और स्वयं शिव भी योनी पूजा से ही शक्तिमान हुए हैं । भगवान् राम, शिव जैसे योगेश्वर भी योनी पूजा कर योनी तत्त्व को सादर मस्तक पर धारण करते थे ऐसा योनी तंत्र में कहा गया है क्योंकि बिना योनी की दिव्य उपासना के पुरुष की आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है । सभी स्त्रियाँ परमेश्वरी भगवती का अंश होने के कारण इस सम्मान की अधिकारिणी हैं" । अतः अपना भविष्य उज्ज्वल चाहने वाले पुरुषों को कभी भी स्त्रियों का तिरस्कार या अपमान नहीं करना चाहिए ।

यह वैज्ञानिक सत्य है कि पुरुष शरीर में निर्मित होने वाले शुक्राणु किसी अज्ञात शक्ति से चालित होकर अंडाणु से संयोग करने के लिए गुरुत्वाकर्षण के नियम का उल्लंघन करके आगे बढ़ते हैं। योग और अध्यात्म विज्ञान के अनुसार शुक्राणु जीव आत्मा होते हैं जो शरीर पाने के लिए अंडाणु से संयोग करने के लिए भागते हैं। इस सत्य से यह सिद्ध होता है कि अरबों खरबों शुक्राणुओं में से किसी दुर्लभ को ही मनुष्य शरीर प्राप्त होता है । इस भयानक संग्राम में विजयी होना निश्चय ही जीव आत्मा की सब से बड़ी उपलब्धि है जो हमारी समरण शक्ति में नहीं टिकती।

योनी तंत्र में भगवान् शिव ने स्पष्ट कहा है कि श्रीकृष्ण ।श्रीराम और स्वयं शिव भी योनी पूजा से ही शक्तिमान हुए हैं । भगवान् राम, शिव जैसे योगेश्वर भी योनी पूजा कर योनी तत्त्व को सादर मस्तक पर धारण करते थे ऐसा योनी तंत्र में कहा गया है क्योंकि बिना योनी की दिव्य उपासना के पुरुष की आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है । सभी स्त्रियाँ परमेश्वरी भगवती का अंश होने के कारण इस सम्मान की अधिकारिणी हैं" । अतः अपना भविष्य उज्ज्वल चाहने वाले पुरुषों को कभी भी स्त्रियों का तिरस्कार या अपमान नहीं करना चाहिए ।

यह वैज्ञानिक सत्य है कि पुरुष शरीर में निर्मित होने वाले शुक्राणु किसी अज्ञात शक्ति से चालित होकर अंडाणु से संयोग करने के लिए गुरुत्वाकर्षण के नियम का उल्लंघन करके आगे बढ़ते हैं। योग और अध्यात्म विज्ञान के अनुसार शुक्राणु जीव आत्मा होते हैं जो शरीर पाने के लिए अंडाणु से संयोग करने केलिए भागते हैं। इस सत्य से यह सिद्ध होता है कि अरबों खरबों शुक्राणुओं में से किसी दुर्लभ को ही मनुष्य शरीर प्राप्त होता है । इस भयानक संग्राम में विजयी होना निश्चय ही जीव आत्मा की सब से बड़ी उपलब्धि है जो हमारी समरण शक्ति में नहीं टिकती।


योग शास्त्र के अनुसार मानव शरीर प्रकृति के चौबीस तत्वों से बना है जो हैं-पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, नाक, कान, जीभ व त्वचा) , पांच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पैर, जननेद्रिय, मलमूत्र द्वार और मूंह) , पञ्च कोष (अन्नमय, प्राण मय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय) , पञ्च प्राण (पान, अपान, सामान, उदान, व्यादान) , मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार । आत्मा इनका आधार और दृष्टा है और ईश्वर का ही प्रतिबिम्ब है जो दिव्य प्रकाश स्वरूप है जिसका दर्शन ध्यान और समाधि में किसी को भी हो सकता है।

जब तक कोई भी व्यक्ति स्वयं आत्मज्ञान पाने के लिए आत्म ध्यान नहीं करता तब तक कोई ग्रन्थ और गुरु उसका कल्याण नहीं कर सकते यह भगवान् शिव ने स्पष्ट रूप से ज्ञान संकलिनी तंत्र में कहा है, -"यह तीर्थ है वह तीर्थ है, ऐसा मान कर पृथ्वी के तीर्थों में केवल तामसी व्यक्ति ही भ्रमण करते हैं। आत्म तीर्थ को जाने बिना मोक्ष कहाँ संभव है?" भीष्म पितामह ने भी महाभारत के युद्ध में शर शैय्या पर युद्धिष्ठिर को यही उपदेश दिया की सब से श्रेष्ठ तीर्थ मनुष्य का अंतःकरण और सब से पवित्र जल आत्मज्ञान ही है ।

इस ज्ञान को धारण कर जब पति पत्नी आध्यात्मिक तादात्म्य स्थापित कर दैहिक सम्बन्ध द्वारा किसी अन्य जीव आत्मा का आव्हान संतान के रूप में करते हैं तो वह सृष्टि के कल्याण के लिए महान यग्य संपन्न करते हैं । इसी ज्ञान को चरितार्थ करने के लिए भगवान् शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश ने जब विश्व की परिक्रमा करने का आदेश अपने पिताश्री से पाया तो चुप चाप अपने मूषक पर बैठ कर माता-पिता की परिक्रमा कर ली क्योंकि आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार माता पृथ्वी से अधिक गौरवशालिनी और पिता आकाश के सामान व्यापक कहा जाता है ।

स्कन्द पुराण में भगवान् शिव ने ऋषि नारद को नाद ब्रह्म का ज्ञान दिया है और मनुष्य देह में स्थित चक्रों और आत्मज्योति रूपी परमात्मा के साक्षात्कार का मार्ग बताया है ।स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर प्रत्येक मनुष्य के अस्तित्व में हैं ।सूक्ष्म शारीर में मन और बुद्धि हैं ।मन सदा संकल्प-विकल्प में लगा रहता है; बुद्धि अपने लाभ के लिए मन के सुझावों को तर्क-वितर्क से विश्लेषण करती रहती है ।कारण या लिंग शरीर ह्रदय में स्थित होता है जिसमें अहंकार और चित्त मंडल के रूप में दिखाई देते हैं ।

अहंकार अपने को श्रेष्ठ और दूसरों के नीचा दिखने का प्रयास करता है और चित्त पिछले अनेक जन्मोंके घनीभूत अनुभवों, को संस्कार के रूप में संचित रखता है ।आत्मा जो एक ज्योति है इससे परे है किन्तु आत्मा के निकलते ही स्थूल शरीर से सूक्ष्म और कारण शरीर अलग हो जाते हैं ।कारण शरीर को लिंग शरीर भी कहा गया हैं क्योंकि इसमें निहित संस्कार ही आत्मा के अगले शरीर का निर्धारण करते हैं ।

आत्मा से आकाश; आकाश से वायु; वायु से अग्नि ' अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति शिवजी ने बतायी है ।पिछले कर्म द्वारा प्रेरित जीव आत्मा, वीर्य जो की खाए गए भोजन का सूक्ष्मतम तत्व है, के र्रूप में परिणत हो कर माता के गर्भ में प्रवेश करता है जहाँ मान के स्वभाव के अनुसार उसके नए व्यक्तित्व का निर्माण होता ह। गर्भ में स्थित शिशु अपने हाथों से कानों को बंद करके अपने पूर्व कर्मों को याद करके पीड़ित होता और-और अपने को धिक्कार कर गर्भ से मुक्त होने का प्रयास करता है ।

जन्म लेते ही बाहर की वायु का पान करते ही वह अपने पिछले संस्कार से युक्त होकर पुरानी स्मृतियों को भूल जाता है । शरीर में सात धातु हैं त्वचा, रक्त, मांस, वसा, हड्डी, मज्जा और वीर्य (नर शरीर में) या रज (नारी शरीर में) । देह में नो छिद्र हैं, -दो कान, दो नेत्र, दो नासिका, मुख, गुदा और लिंग ।स्त्री शरीर में दो स्तन और एक भग यानी गर्भ का छिद्र अतिरिक्त छिद्र हैं ।स्त्रियों में बीस पेशियाँ पुरुषों से अधिक होती हैं । उनके वक्ष में दस और भग में दस और पेशियाँ होती हैं ।

योनी में तीन चक्र होते हैं, तीसरे चक्र में गर्भ शैय्या स्थित होती है ।लाल रंग की पेशी वीर्य को जीवन देती है ।शरीर में एक सो सात मर्म स्थान और तीन करोड़ पचास लाख रोम कूप होते हैं ।जो व्यक्ति योग अभ्यास में निरत रहता है वह नाद ब्रह्म और तीनों लोकों को सुखपूर्वक जानता और भोगता है । मूल आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्त्रार नामक साथ ऊर्जा केंद्र शरीर में हैं जिन पर ध्यान का अभ्यास करने से देवीय शक्ति प्राप्त होती है ।

सहस्रार में प्रकाश दीखने पर वहाँ से अमृत वर्षा का-सा आनंद प्राप्त होता है जो मनुष्य शरीर की परम उपलब्धि है । जिसको अपने शरीर में दिव्य आनंद मिलने लगता है वह फिर चाहे भीड़ में रहे या अकेले में; चाहे इन्द्रियों से विषयों को भोगे या आत्म ध्यान का अभ्यास करे उसे सदा परम आनंद और मोह से मुक्ति का अनुभव होता है ।

मनुष्य का शरीर अनु-परमाणुओं के संघटन से बना है । जिस तरह इलेक्ट्रौन, प्रोटोन, सदा गति शील रहते हैं किन्तु प्रकाश एक ऊर्जा मात्र है जो कभी तरंग और कभी कण की तरह व्यवहार करता है उसी तरह आत्म सूर्य के प्रकाश से भी अधिक सूक्ष्म और व्यापक है । यह इस तरह सिद्ध होता है कि सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक आने में कुछ मिनट लगे हैं जब की मनुष्य उसे आँख खोलते ही देख लेता है ।अतः आत्मा प्रकाश से भी सूक्ष्म है जिसका अनुभव और दर्शन केवल ध्यान के माध्यम से होता है ।

जब तक मन उस आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर लेता उसे मोह से मुक्ति नहीं मिल सकती । मोह मनुष्य को भय भीत करता है क्योंकि जो पाया है उसके खोने का भय उसे सताता रहता है जबकि आत्म दर्शन से दिव्य प्रेम की अनुभूति होती है जो व्यक्ति को निर्भय करती है क्योंकि उसे सब के अस्तित्व में उसी दिव्य ज्योति का दर्शन होने लगता है।


कहानी जारी रहेगी
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04-29-2021, 06:09 AM,
#88
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CHAPTER 6 - पांचवा दिन

महायज्ञ की तैयारी-

‘महायज्ञ परिधान'

Update -28

तंत्र मुद्रा

सचाई को जनना ज़रूरी होता हे। तंत्र को योग को भी कहते है। योग भी कई प्रकार के होता हे जैसे शरीर द्वारा व्यायाम, ध्यान और औषधियाँ के मिश्रण को नक्षत्र में लाकर रोगो कि चिकित्सा करना तथा मंत्र सक्ति से सुद्ध करना ही तंत्र हे। तंत्र और योग पूर्णतया वैज्ञानिक है ।

हमारा हिन्दू तंत्र मंत्र सनातन और बडा विज्ञान मय हे। तंत्र मंत्र योग आदि सब का स्थान विशेष हे।

तंत्र में मुद्रा का विशेष महत्त्व हे यह हमारे अंगो के मोड ने से बनती हे जिस के द्वारा देवता को द्रवित और प्रसंन्न करना हे।

देवता को खुस करने को शरीर से द्रवित और प्रसन्न करना आवश्यक है। जिसके लिए उस मुद्रा में योनि मुद्रा दरशायी गयी है, यह मुद्रा भगवान शिव की प्रिय हे। इस के द्वारा मनुष्य को लाभ होता है मनुष्य वासना पर अधिकार कर । शिव को ओर शक्ति की कृपा को-को प्राप्त कर सकता है



[Image: MUDRA.jpg]

[b]योनि मुद्रा[/b]-ये मुद्रा कामवासना पर काबु करती हे।

नीचे लेखक का नोट था: लेखक ने केवल अपना अनुभव लिखा है यह मुद्रा विशैषज्ञ की देख रेख में ही सीखने के बाद करे। तंत्र विद्या में गुरु का बहुत विशेष महत्त्व हे।

आप को सारिरीक क्षति हो शकती हे।

सावधानी रखे ये लेख केवल ज्ञान के लिए है




[Image: SHIV1.jpg]
[b]
माता पारवती और भगवान् शिव का संवाद
[/b]


योनी तंत्र के अनुसार (जो माता पारवती और भगवान् शिव का संवाद है ) ब्रह्मा ,विष्णु और महेश तीनों शक्तियों का निवास प्रत्येक नारी की योनी में है क्योंकि हर स्त्री देवी भगवती का ही अंश है .

जो मनुष्य योनि पूजा को नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं, परमात्मा उन्हें सदवुद्धी दे । कृपा करे यैसे अज्ञानीओं पे । उन्हें पता ही नहीं कि वह जननी शक्ति, श्रृष्टि शक्ति को नकारात्मक दृष्टि से देख रहे हैं । देवो के देव महादेव उनपर कृपा बरसाये रखे जो योनि पूजा का महत्व जानते हीं नही हैं । उन्हें इस सत्यता का पत्ता ही नहीं हैे की योनी पूजा के बिना कोई भी साधना पूर्ण नहीं है । शक्ती और शव की बहूत बडी कृपा है की हमें ये अति महत्वपूर्ण ज्ञान दिया और हमे शक्ति साधक बनाया । योनिपूजा से ही हम भैरवी साधना, शक्ति साधना, कुंडलिनी साधना और भी बहूत साधना मार्ग पर अग्रसर हो सकते है र सफलता प्राप्त कर सकते है ।

लिंग पूजा पूरे विश्व में होती है । सभी बड़ी ख़ुशी के साथ करते हैं, पर योनिपूजा के नाम पर नाक भौं सिकुड़ता है । जबकि सम्पूर्ण विश्व का मूल उत्पत्ति कारक यही [b]योनी[/b] है ।



[Image: YONI.jpg]


योनी तंत्र जैसे सामाजिक रूप से कलंकित और जटिल तंत्र के बारे कहते हैं की-भारत के ऋषियों नें जो भी मनुष्य को दिया वो अत्यंत श्रेष्ठ और उच्चकोटि का ज्ञान ही था. जिसमें तंत्र भी एक है. तंत्र में एक दिव्य शब्द है 'योनी पूजा' जिसका बड़ा ही गूढ़ और तात्विक अर्थ है. किन्तु कालान्तर में अज्ञानी पुरुषों व वासना और भोग की इच्छा रखने वाले कथित धर्म पुरोधाओं ने स्त्री शोषण के लिए तंत्र के महान रहस्यों को निगुरों की भांति स्त्री शरीर तक सीमित कर दिया. हालांकि स्त्री शरीर भी पुरुष की भांति ही सामान रूप से पवित्र है. लेकिन तंत्र की योनी पूजा सृष्टि उत्पत्ति के बिंदु को 'योनी' यानि के सृजन करने वाली कह कर संबोधित करता है. माँ शक्ति को 'महायोनी स्वरूपिणी' कहा जाता है. जिसका अर्थ हुआ सभी को पैदा करने वाली.

कहानी जारी रहेगी
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05-01-2021, 02:17 PM,
#89
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CHAPTER 6 - पांचवा दिन

महायज्ञ की तैयारी-

‘महायज्ञ परिधान'

Update -29 part 1

पुराणों में यज्ञ महात्म्य के कुछ प्रसंग

पुस्तक में योनि पूजा के बारे में और भी बहुत सारा ज्ञान था तो मैंने कुछ पन्ने पलटे तो उसमे यज्ञ के बारे में बहुत सारा ज्ञान था उसमे से कुछ हिस्सा जो मुझे काफी रोचक लगा निम्न है

प्राचीन काल में भारत भूमि में घर घर यज्ञ होते थे। नित्य यज्ञ के अतिरिक्त कुछ उत्सव,पर्व, त्यौहार आदि विभिन्न अवसरों पर बड़े बड़े यज्ञ होते थे। इसके अतिरिक्त किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अथवा किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अनेक विधि विधानों से सुसम्बद्ध यज्ञ किये जाते थे। इस प्रकार के यज्ञों तथा उनके सत्परिमाणों से भारतीय इतिहास पुराणों का पन्ना पन्ना भरा पड़ा है। उनमें से कुछ वृत्तांत हैं—

कूर्म पुराण पूर्वार्ध अ. 17
ततः कालेन बलिवैंरोचनिः सर्वगम् यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विष्णुमर्च्चयामास सर्वगम्।।46।।
ब्राह्मणान्पूजयामास दत्वा बहुतरं धनम् ब्रह्मर्षयः समाजग्मुर्यज्ञवाहं महात्मनः।।47।।
विज्ञायविष्णुर्भगवान् भरद्वाजप्रचेदितः आस्थाय वामनं रूपं यज्ञदेशमथागमत्।।48।।



भावार्थ—स्वयं दैत्यराज बलि ने यज्ञ से यज्ञरूप विष्णु की पूजा की। पुष्कल धनादि से ब्राह्मणपूजन किया व अनेक ब्रह्मर्षि महात्मादि यज्ञ में गये। स्वयं भगवान विष्णु भारद्वाज के कहने सेवामन रूप धारण कर यज्ञ देश गये। इस प्रकार यज्ञ की महिमा अकथनीय है जिसके कारण जगतपिता विष्णु को भी अभ्यागत रूप में दैत्यराज बलि के द्वार पर जाना पड़ा।

[b]शिव महा पुराण, द्वितीय रुद्र संहिता, युद्ध खंड द्वि. अ.[/b]
त्रिपुरासुर तथा उसकी सन्तान, शिवजी की अर्चना करके उनकी कृपा से देवों के लिये अजय हो गये। उन असुरों न यज्ञ की हवि भी देवों से छीन स्वयं भोग करना प्रारम्भ किया। दुःखी,पराजित देवताओं ने शिवजी से कष्ट विनाश के लिए प्रार्थना की। शिव ने कहा−कि त्रिपुरासुरकी सन्तति तो मेरी भक्त है, मैं अपने भक्त जनों का विनाश कैसे कर सकता हूँ? शिवजी नेदेवगणों को विष्णु के पास भेज दिया। विष्णु भगवान ने देवगणों का आर्त विनय सुनकर कहा—

विष्णुरुवाच:—
अनेनैव समादेवा यजध्वं परमेश्वरम्।
पुरत्रय विनाशाय जगत्त्रय विभूतये॥25॥

अर्थ—विष्णु भगवान ने कहा−
ऐसे अवसर पर सदा ही देवों ने यज्ञ द्वारा परमेश्वर की आराधना की है, बिना यज्ञ कियेत्रलोक्य की विभूति स्वरूप त्रिपुरासुर के तीनों पुरों का विनाश नहीं हो सकता।
सनत्कुमार उवाचः−
अच्युतस्य वचः श्रुत्वा देव देवस्य धीमतः। प्रेम्णां ते प्रणतिं कृत्वा यज्ञेशं तेऽस्तु वन्सुराः॥26॥
एवं स्तुत्वा ततो देवा अयजन्यज्ञपूरुषम्॥ यज्ञोक्तेन विधानेन सम्पूर्ण विधयो मुने॥27॥
ततस्तस्माद्यज्ञकुण्डात्समुत्पेतुस्सहस्रशः॥ भूतसंघा महाकायाः शूलशक्ति गदा युधा॥28॥
ददृशुस्ते सुरास्तान वै भूत संघान सहस्रशः॥ शूलशक्ति गदा हस्तान्दण्डचाप शिला युवान्॥29॥
नानाप्रहरणो पेतान् नाना वेष धरांस्तया॥ कालाग्नि रुद्र सदृशान् कालसूर्योपमांस्तदा॥30॥
दृष्ट्वातानब्रवद्विष्णुः प्रणिपत्य पुरः स्थितान्॥ भूतान्यज्ञपतिःश्रीमात्रुद्राक्षाप्रतिपालकः॥31॥
विष्णु उवाच:—
भूता शृणत मद्वाक्य देव कारयार्थमुद्यता॥
गच्छन्तु त्रिपुर सद्यर्स्वे हि बलवत्तराः॥32॥
गत्वा दग्ध्वा च भित्वा च भंत्वा दैत्यपुरत्रयम॥
पुनर्यया गता भूता गंतुमर्हथ भूतये॥

शिवमहापुराण द्वितीय रुद्र संहिता छठा खण्ड दू. अ.

अर्थ—यज्ञ पुरुष भगवान विष्णु की बात सुनकर बुद्धिमान देव एवं देवेन्द्र ने उनको प्रणाम करकेकहा कि हे यज्ञेश्वर! हम ऐसा ही करेंगे। ऐसी स्तुति करके सभी देवों ने यज्ञ के द्वारा यज्ञपुरुष का यजन किया यज्ञ कि जो−जो विधान हैं सभी को साँगोपाँग सम्पन्न किया ॥26−27॥
इसके उपरान्त यज्ञ कुण्ड से बड़ा भयंकर, विशाल शरीर धारण किये हजारों भूत के संघ उत्पन्नहो गये, जिनके हाथ, युद्ध करने के लिये शूल, शक्ति , गदा आदि अस्त्र शस्त्र धारण किये हुएथे॥28॥

देवताओं ने देखा कि यज्ञ कुण्ड से हजारों भूतों के समूह हाथ में शूल, शक्ति, गदा, चाप, शिलाआदि प्रहार करने वाले विभिन्न अस्त्र धारण कर विभिन्न रंग, रूप वेष धारण किये, कोईकालाग्नि रुद्र के समान, कोई सूर्य के समान यज्ञपति विष्णु भगवान को प्रणिपात (नमस्कार)करते हुए खड़े हैं, उन्हें देखकर विष्णु भगवान बोले—हे देव—कर्य्य करने के लिये उद्यत तैयार)भूतगणों! मेरी बात सुनो—तुम लोग शीघ्र ही त्रिपुर जाओ और वहाँ जाकर दैत्यों के तीनों पुरोंको जला कर, विध्वंस कर, तोड़ फोड़ कर, फिर तुम लोग जहाँ से आये थे, वहीं चले जाओ।

वासुदेवं स्वमात्मानमश्वमेधैरथायजत्॥
सर्वदानानिसददौ पालयामास स प्रजाः॥
पुत्रवद्धर्म कामादीन्दुष्ट निप्रहणे रतः॥
सर्वधर्मपरोलोकः सर्वसस्याचमेदिनी॥
नाकाल मरणश्चासी द्रामे राज्य प्रसासति ॥
आग्नेय, पु. अध्या.10 श्लो. 33, 34

अर्थ—राज्याभिषेक होने के बाद भगवान राजा रामचन्द्र जी ने अपने आत्मा स्वरूप वासुदेवभगवान का अश्वमेध यज्ञों द्वारा यजन किया।

रामचन्द्र जी ने सर्व प्रकार के दान दिये, प्रजा का पुत्र के समान पालन किया, दुष्टों का निग्रहण किया।

इससे भगवान् राम के राज्य में सब लोग धर्म में तत्पर रहते थे।

पृथ्वी सम्पूर्ण शस्यों से युक्त रहती थी। न किसी की अकाल मृत्यु होती थी।

बलि ने संग्राम में इन्द्रादि देवताओं को जीत लिया।

उसके उपरान्त−
श्लोक—
वुभुजे व्याहतैश्वर्य प्रबृद्व श्रीर्महावलः।
इयाज चाश्वमेघैः स प्रीणन तत्परः ॥
नारद पु. अ. 10 श्लोक 31
विश्वजित् यज्ञ करके “बलि ने इन्द्र के राज्य को जीत कर” अव्याहत ऐश्वर्य बढ़ी हुई लक्ष्मीऔर महान बल से सम्पन्न हो त्रिभुवन का राज्य भोगने लगे। फिर उन्होंने भगवान् की प्रीति केलिये तत्पर होकर अनेक अश्वमेध−यज्ञ किये।

महाराज बाहु ने सातों द्वीपों में सात अश्वमेध यज्ञ किये। उन्होंने चोर डाकुओं को यथेष्ट दण्डदेकर शासन में रक्खा और दूसरों का सन्ताप दूर करके अपने को कृतार्थ माना। उसके राज्य कालमें यज्ञों की महिमा से पृथ्वी पर बिना जाते बोये अन्न पैदा होता था और वह फल फूलों सेभरी रहती थी। देवराज इन्द्र उनके राज्य की भूमि पर समयानुसार वर्षा करते थे औरपापाचारियों का अन्त हो जाने के कारण, वहाँ की प्रजा धर्म से सुरक्षित रहती थी।

च्यवन ऋषि ने आश्विनी कुमारों का यज्ञ किया जिसके प्रभाव से उन्होंने देवलोक में सुर दुर्लभऐश्वर्य प्राप्त किया, इसका वर्णन भविष्य पुराण में इस प्रकार मिलता है:—
यज्ञभागे प्रवर्त्तेतु शास्त्रोक्ते तु विघानतः।
आगतावश्विनौतत्र आहूतौ च्यवनेनतु॥
भवि. पु. ब्रा. पं. अ. 19 श्लोक 66
अर्थ:—शास्त्रोक्त विधि विधान से यज्ञ में भाग देने पर, च्यवन ऋषि के द्वारा बुलाये गयेअश्विनी कुमार, अपना यज्ञ भाग लेने के लिये, वहाँ यज्ञ स्थली में आये।
जब च्यवन ऋषि का यज्ञ पूर्ण हो गया; देवता अपना अपना भाग ग्रहण कर स्वर्ग चले गये।तदनन्तर च्यवन ऋषि को स्वर्ग में अनन्त सुख−साधन प्राप्त हुए।
अथपश्यद्विमानाभं भवनं देव निर्मितम्।
शैय्यासनवरैर्जुष्टं सर्व काम समृद्धिमत्॥
उद्यानवापिभिर्जुष्टं देवेन्द्रेण समाहृतम्।
गोखण्ड सान्निभंरेजे गृहं तद्भुवि दुर्लभम्॥
दृष्ट्वा तत्सर्वमखिलं सहपत्न्या महामुनिः।
सुदंपरमिकांलेभे इन्द्रञ्च प्रशशंसह॥
भवि. पु. ब्रा. प. अ. 19 श्लोक 80,81,83
अर्थ:—“यज्ञ के पूर्ण होने पर” च्यवन ऋषि ने शय्यासनों से युक्त, सब समृद्धियों से विराजमान,देवताओं से निर्मित विमान के समान शोभा वाले भवन को देखा। बाग वापी इत्यादि से युक्त,इन्द्र के द्वारा लाये गये, गोखण्ड के समान आभा से रञ्जित भवन को देखा, जो पृथ्वी परदुर्लभ है।
पत्नी के सहित सब दृश्यों को देखकर मुनि च्यवन ने परम आनन्द पाया और इन्द्र की प्रशंसा की।



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05-01-2021, 02:22 PM,
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CHAPTER 6 - पांचवा दिन

महायज्ञ की तैयारी-

‘महायज्ञ परिधान'

Update -29 part 2

पुराणों में यज्ञ महात्म्य के कुछ प्रसंग



महादानी बलि

शुक्राचार्य ने बलि से यज्ञ कराना आरम्भ किया। उस विश्वजित् यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर,सन्तुष्ट हुए अग्नि ने प्रगट होकर ‘बलि को घोड़ों से जुता हुआ रथ’ दिव्य धनुष, त्रोण एवंअमेद्य कवच प्रदान किये। आचार्य की आज्ञा से उनको प्रणाम करके बलि उस रथ पर सवार हुएऔर उन्होंने स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी। इस बार उनका तेज असह्य था। देवगुरु बृहस्पति के आदेश सेदेवता बिना युद्ध किये ही स्वर्ग छोड़ कर भाग गये।

कल्याण चरितांक पृष्ठ 249



सूत जी वानर वंश का वर्णन करते हुए कहते हैं—

बाली यज्ञ सहस्राणां यज्वा परम दुर्जयः।

ब्र. पुराण उपा. पा. 3 अ. 7


अर्थ—बाली ने सहस्रों यज्ञों का यजन किया ,इससे वह परम दुर्जेय बन गया।

सूत जी ऋषियों से कथा कहते हैं :—


नहुषस्य महत्मानः पितरं यं प्रचक्षते।

प तेष्ववभृथेप्वेव धर्मशीलो महीपतिः॥24॥

आयुरायभवायाग्र य मस्मिन् सत्रे नरोत्तमः।

शान्तयित्वा तु राजानं तदा ब्रह्मविदस्तथा॥25॥

सत्रमारेमिरे कर्त्तुपृथ्वीवत्सात्ममूर्त्तयाः॥

वभूव सत्रे तेषां तु ब्रह्मचर्य्य महात्मनाम॥26॥

ब्रह्माण्ड पु. पू. भा. प्र. पा. 1 अ.2


अर्थ:—राजा नहुष ने अपने पूर्वजों का अनुसरण कर अनेकों यज्ञ करके अवभृथ (यज्ञान्त) स्नानकिया यज्ञ करने से राजा में श्रेष्ठ नहुष, शान्त और ब्रह्मविद हो गया। उनकी आयु भी बढ़गयी। ब्रह्मचर्य पालन सहित किये हुए उनके यज्ञों से, पृथ्वी वैसी ही वात्सल्यमयी बन गयीजैसे बच्चों के लिये माता होती हैं।


मारकंडेय पुराण में यज्ञों सम्बन्धी अनेक विवरण और वर्णन प्राप्त होते हैं। राजा इन्द्रद्युम्न केपास इन्द्र नीलमणि द्वारा निर्मित एक बड़ी ही मूल्यवान प्रतिमा थी। इसके खो जाने परराजा को बड़ा दुख हुआ। दुखी होकर वह मृत्यु की गोद में जाने लगा तो विद्वानों ने इस दुख सेनिवृत्ति पाने के लिये एक बड़ा यज्ञ करने की सलाह दी। यज्ञ के फल स्वरूप राजा को वह खोईहुई मणि अनायास ही प्राप्त हो गई।


एक समय असुर प्रबल हो गए। पूर्ण विश्व को जीत कर स्वर्ग पर भी उन्होंने अपना अधिकारजमा लिया। दैत्यराज ने अपना राज्य स्थायी रखने की इच्छा की और इस हेतु वह इन्द्र के पासगया तथा पूछा ‘हमारा राज्य स्थिर कैसे रहे?’ इन्द्र ने सरल भाव से उन्हें यज्ञ करने का आदेशदिया। असुर यज्ञ परायण हो गए। वे यज्ञ करके शक्ति के अधिकारी बन बैठे और अजेय हो गए।विश्व में असुरों का ही राज्य दिखाई देने लगा देवता लोग निर्बल पड़ गए। स्वर्ग का राज्यउनसे छीन लिया गया।


देवों ने भगवान से प्रार्थना की। भगवान ने असुरों के पास ऐसे ऐसे दूत भेजे जो असुरों को यज्ञन करने की सलाह दें। उन छद्म दूतों ने बड़ा प्रभावशाली वेश बनाकर असुरों से कहा ‘हरे हरेतुम यह पाप क्यों करते हो। यज्ञ में हिंसा होती है। दैत्यों को यह मत उचित लगा और उन्होंनेअपना जीवन अयज्ञ मय बना लिया जिससे वे तेजहीन हो गए। देवों ने उन यज्ञहीन दैत्यों कोपराजित करके स्वर्ग का राज्य वापिस ले लिया।

स्वायम्भुव मन्वन्तर कल्प के प्रथम मन्वन्तर में देवता अनाहार से क्षीण हो रहे थे। देवों केदुर्बल होने से जगत भी नष्ट होने लगा। तीनलोक−चौदह भुवन इस अवस्था में व्याकुलता कोप्राप्त हो रहे थे।


देवों ने कृपासिन्धु से पुकार की। भगवान तो सदैव से दीनों की पुकार सुनने वाले हैं। महर्षिरुचि की पत्नी आकूति से वे प्रकट हुए। उन्होंने अग्निहोत्र की स्थापना की। उन्हीं के नाम सेअग्निहोत्र यज्ञ कहा जाने लगा। यज्ञ से देवों को भोजन प्राप्त हुआ। उन्हें शक्ति प्राप्त हुईऔर वे विजय प्राप्त करके संसार का कल्याण करने में समर्थ हो गये।

तृणावर्त्त राक्षस के निधन के उपरान्त उसके शरीर के संग श्रीकृष्ण भी मूर्च्छित पड़े थे। उसेलाकर नन्द यशोदा शिशु के प्राण रक्षार्थ यज्ञ करना आवश्यक मानकर यज्ञकर्ता को बुला लाते हैं—वे आकर आश्वासन देते हैं—

माशोकं कुरु हे नन्द हे यशोदे व्रजेश्वरी।

करिष्यामि शिशो रक्षांचिर जीवी भवेदयम्॥50॥

गर्ग संहिता गो. ख. 1 अ.14 श्लोक 50

अर्थ—हे नन्द! हे व्रजेश्वरी यशोदे! शोक मत करें, मैं शिशु की रक्षा (यज्ञ द्वारा) करूंगा, येचिरंजीवी होंगे।

इत्युक्त्वाद्विजमुख्यास्ते कुशाग्रैर्नपल्लवैः॥

पवित्रकलशैस्तोयैस्ऋग्यजुः सामाजैःस्तवैः॥51॥

परेःस्वस्त्ययनैर्यज्ञं कारयित्वा विधानतः॥

अग्निसंपूज्यविधिवद्रक्षां विदधिरेशिशोः॥52॥

—गर्ग. संहिता गो. ख. 141 श्लोक 51−52

अर्थ− ऐसा कह कर द्विज श्रेष्ठ ने कुश, नव पल्लव, पवित्र जल सहित कलशादि यज्ञ पूजनसामग्री मंगाई और ऋक्, यजुः एवं साम के मन्त्रों से हवन किया, स्वास्ति वाचन किया, इसकेउपरान्त विधिपूर्वक यज्ञ कर्म सम्पन्न करके शिशु का प्राण रक्षण किया। 51−52

बहुलाश्व के पूछने पर नारद जी सूर्यवंश के परि विख्यात राजा मरुत के सुप्रसिद्ध यज्ञ कावर्णन करते हुए कहते हैं—

ब्रह्मरुद्रादयोदेवाः सगणास्तत्रागता।

ऋषयो मुनयः सर्वेतस्य यज्ञं समाययु॥13॥

गर्ग. सं. वि. ख. अ. 1

अर्थ—ब्रह्म, रुद्रादि देवता गण समेत उस यज्ञ में पधारे थे, ऋषि मुनि सभी उस यज्ञ में आये थे।

केपिजीवास्त्रिर्क्या तु न बभूवुर्बुभुक्षिताः॥ सर्वे देवास्तु सोमेनह्यजीर्णमुपागता॥18॥

अर्थ—मरुत के उस महायज्ञ में तीनों लोक के कोई भी प्राणी भूखे नहीं रहे। देवगणों को तोसोमरस पीते−पीते अजीर्ण हो गया।

उग्रसेन जी के पूछने पर व्यास मुनि बताते हैं कि किस कर्म के करने से क्या गति मिलती है।

यज्ञ कर्त्ता शक्रलोके वसते शाश्वतीः समाः॥

दानी चान्द्रमसं लोकं व्रती सौरंव्रजत्यलम॥10॥

गर्ग संहिता वि. ख. 9 अ. 1 श्लोक 10

अर्थ—यज्ञ करने वाला इन्द्रलोक में शाश्वत काल तक निवास करता है, दानी चन्द्रलोक औरव्रती सूर्यलोक को जाता है।

अश्वमेध यज्ञ की प्रशंसा सुनकर उग्रसेनजी श्री कृष्ण भगवान के निकट जाकर कहते हैं—

देवदेव जगन्नाथ जगदीश जगन्मय॥

वासुदेव त्रिलोकेश शृणुश्य वचनं मम॥20॥

मत्युत्रेणच कंसेनबालकाश्च सहस्रशः॥

विनापराधेनहरेमारिताश्चमहासुरैः॥21॥

तस्यमुक्तश्च गोबिन्द कथं भवति पापिनः॥

कस्मिंल्लोके गतःकंसो बालघाती बदस्वमाम्॥22॥

तस्यपापेनाहमपि मीतोऽस्मिजगदीश्वर॥

पुत्रस्य पापेनपिता नरके पतति ध्रुवम्॥23॥

कथितंनारदेनाद्यतच्छृणुप्व जगत्पते॥

विप्रहाविश्वहामोध्नो हयमेधेन शुध्यति॥25॥

—गर्ग संहिता अश्व. ख. 10 अ. 7

अर्थ—उग्रसेन ने श्री कृष्णजी से कहा—हे देवों के देव! हे जगन्नाथ! हे जगदीश! हे जगन्मय! हेत्रिलोकेश! हे वासुदेव! मेरी बात सुनिये॥20॥ मेरे पुत्र महासुर कंस ने हजारों बालकों की बिनाअपराध के ही हत्या की है, हे गोविंद! उसकी मुक्ति कैसे होगी, यह मुझे कहिये और अभीबालघाती कंस मर कर किस लोक में गया है॥21-22॥ हे जगदीश्वर! उसके पापों से मैं बड़ाभयभीत हूँ, क्योंकि पुत्र के पाप से पिता को अवश्य नरक की यातना भुगतनी पड़ती है॥23॥ हेजगत्पते! नारद ने जो मुझ से कहा है सो सुनिये—उन्होंने कहा है, कि अश्वमेध यज्ञ करने से विप्रहत्यारा गौहत्यारा तथा विश्व को वध करने वाला भी शुद्ध हो जाता है।

कृष्ण के आदेश से राजा उग्रसेन ने महा यज्ञ किया।

यदा यजति यज्ञैश्च तदा शून्या वसुन्धरा।

सर्वा भवति राजानं तदा गच्छतिवै जनः॥

यश्च याति जन स्तस्य यज्ञे राज्ञो महात्मनः॥

किमिच्छकै स्तदा राज्ञा सर्वःसम्पूज्यते तदा॥


वि. ध. पु. अ. 137 श्लोक 1,2,3,4,14,15

अर्थ—जब गंधर्वों ने उपदेश दिया, तब राजा पुरूरवा, अपने नगर में जाकर, अग्नि उपासना मेंतत्पर हुए। धर्म के द्वारा प्रजा का पालन करते हुए बहुत यज्ञों द्वारा यजन किया।

सैकड़ों अश्वमेध, हजारों वाजपेय अतिरात्रि, द्वादशाह यज्ञों द्वारा बार बार यजन करकेसप्तद्वीप समुद्रों वाली पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा हुआ, आमानुसिक बल से उसने सम्पूर्ण महीतलको जीता।

दुर्भिक्ष, अकाल मरण, व्याधि ये राजा पुरूरवा के राज्य में कहीं भी किसी को नहीं हुआ, उनकेराज्य में सभी अपने धर्म में तत्पर रहते थे सभी मनुष्य सुखी रहते थे।


जब राजा पुरूरवा यज्ञ करते, तभी शून्य वसुन्धरा सब शस्यों से युक्त हो जाती थी। और जोमनुष्य राजा के पास यज्ञ में जाते थे उनकी इच्छा को पूछकर उसे पूर्ण किया जाता था।


गंगा जी के जाह्नवी कहलाने की कथा बड़ी मनोरंजक है। पूर्व काल में कोशिनी के गर्भ में उत्पन्न सुहोत्र पुत्र ‘जह्नु’ ने सर्वमेध नामक महायज्ञ का आयोजन किया। अपना सर्वस्व उन्होंने यज्ञ में होम किया। इस महायज्ञ के पुण्य प्रताप को देखकर सभी देवता बड़े प्रभावित हुए। गंगाजी तो उन्हें पति रूप में वरण करने के लिए अधीर हो गई। ‘जह्नु’ ने गंगाजी का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इस पर जह्नु और गंगा जी में मनोमालिन्य पैदा हो गया।देवताओं ने इस मनो मालिन्य को अशोभनीय समझ कर दोनों में यह समझौता करा दिया कि गंगाजी जह्नु के घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। ऐसा ही हुआ। तभी से जह्नु पुत्री होने के कारण गंगा जी का नाम जाह्नवी पड़ा।


जिस प्रकार सीता जी की प्राप्ति जनक द्वारा यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय हुई थी,उसी प्रकार वृषभानु की भी राधिका पुत्री की प्राप्ति, यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय हुई। यह कथा पद्म पुराण में आती है।

वृषभानोर्यज्ञभूमौजातासाराधिकादिवा॥

यज्ञार्थशोधितायांचदृष्टासादिव्यरूपिणी॥ —पद्मपुराण चतुर्थ खंड 41

यज्ञ के लिए शोध की हुई भूमि से वृषभानु को राधिका की प्राप्ति हुई।

बलि ने जब शुक्राचार्य जी से पूछा कि इन्द्र को किस प्रकार जीता जाय।

तेनोक्तं बलये राजञ्जय स्पनन्दन लब्धये।

महायज्ञं कुरुष्वाद्य तेन ते विजयो भवेत्॥

स्क. पु. माहे. खं. अ. 17 श्लोक 280



अर्थ—तो शुक्राचार्य जी ने बलि से कहा, विजयी रथ की प्राप्ति के लिए आज महायज्ञ करो।उस महायज्ञ के करने से तुम्हारी विजय होगी।

इन्द्रद्युम्न ने सहस्र यज्ञ किये और वह इन यज्ञों के साथ−साथ परम पुनीत दिव्यता को प्राप्तकरता गया।

श्लोक:—ततः साहस्रिके यज्ञे वाजिमेधे महीपतिः॥

दिने दिने दिव्य गतिवभूव नृपतिस्तदा॥

स्क. पु. वै. खं. 2 ,प्र. म. 2 अ. 17 श्लो. 101

जब राजा का अन्तिम सहस्रवाँ यज्ञ पूर्ण हुआ तो राजा इंद्रद्युम्न दिन−दिन दिव्यावस्था कोप्राप्त होने लगे।

पराशर मुनि ध्रुव भक्त की कथा कहते जा रहे हैं, उसी क्रम में पुलह मुनि ध्रुव को उपदेश करते हैं।

यो यज्ञ पुरुषो यज्ञो योगेशः परमः पुमान्। तस्मिन्तुष्टे यदप्राप्यं किं तदस्ति जनार्दने॥48॥


अर्थ− जो परमपुरुष यज्ञपुरुष, यज्ञ और यज्ञेश्वर हैं, उन जनार्दन के सन्तुष्ट होने पर ऐसा कौनवस्तु है, जो प्राप्त न हो सकती हो।

ऋषिगण राजा वेणु को यज्ञ करने के लिए समझा रहे हैं। उसने अहंकारवश अपने को ही यज्ञ पुरुषघोषित कर यज्ञादि कर्म बन्द करा दिया है।


दीर्घ सत्रेण देवेश सर्व यज्ञेश्वरं हरिम्।

पूजयिष्यामभद्रन्ते तस्यांशस्ते भविष्यति॥17॥


वि.पु.प्र.अश अध्याय 13

अर्थ—तुम्हारा कल्याण हो, देखो, हम बड़े बड़े, यज्ञों द्वारा जो सर्वयज्ञेश्वर देवाधिपतिभगवान् हरि का पूजन करेंगे उसके फल में से तुमको भी (छठा) भाग मिलेगा।

यज्ञेन यज्ञग्रुषो विष्णुः संप्रीणितो नृप।

अस्माभिर्भवतः कामान्सर्वानेवप्रदास्यति॥18॥

श्री वि.पु.प्र.अं.13

अर्थ—हे नृप? इस प्रकार यज्ञों के द्वारा यज्ञ पुरुष भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर हम लोगों केसाथ तुम्हारी भी सकल कामनायें पूर्ण करेंगे।

यज्ञैर्यज्ञेश्वरो येषाँ राष्ट्रे सपूज्यते हरिः।

तेषा सर्वोप्सतावाप्तिं ददाति नृप भू भृताम्॥18॥

श्री वि.पु.अ.13

अर्थ—हे राजन जिन राजाओं के राज्य में यज्ञेश्वर भगवान् हरि का यज्ञों द्वारा पूजन कियाजाता है, वे उनकी सभी कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं।

ऋषियों ने राजा वेन से कहा

देह्यनुज्ञां महाराज माधर्मोयातु संक्षयम्।

हविषाँ परिणामोऽयं यदेतदखिलं जगत्॥25॥

श्री वि.पु.प्र.अं.अ. 13

अर्थ—हे महाराज! आप ऐसी आज्ञा दीजिए, जिससे धर्म का क्षय न हो। देखिये, यह सारा जगतहवि (यज्ञो में हवन की हुई सामग्री) का ही परिणाम है।

पराशर जी मैत्रेय से कथा कहते जा रहे हैं।

प्राचीनबर्हिर्भगवान्महानासीत्प्रजापतिः।

हविधानाव्महामान येन खंबर्धिताः प्रजाः॥3॥

श्री वि.पु.प्र.अं.अ. 14

अर्थ—हे महभाग! हविर्धन से उत्पन्न हुए भगवान् प्राचीनवर्हि एक महान प्रजापति थे,जिन्होंने यज्ञ के द्वारा अपनी प्रजा की बहुत वृद्धि की।

राजा सगर ने और्वमुनि से विष्णु भगवान की उपासना का उपाय और−फल पूछा था, उत्तर मेंऔर्व मुनि कहते हैं।

॥और्व उवाच॥

यजन्यज्ञान्यजत्येनं जपत्येन जपन्नृप।

निघ्नन्नन्यान्दिनस्त्येनं सर्वमूतोयतोहरिः॥10॥

श्री वि.पु.तृ.अं. अ. 8॥

अर्थ—हे नृप यज्ञों का यजन करने वाला पुरुष उन (विष्णु) ही का यजन करता है, जप करनेवाला उन्हीं का जप करता है और (दूसरों की हिंसा करने वाला उन्हीं की हिंसा करता हैक्योंकि भगवान हरि सर्वभूतमय हैं।

इन्द्र पूजा की तैयारी होते देख कृष्ण भगवान अपने बड़े बूढ़ों से पूछते हैं, उत्तर में नन्द जी कहते हैं।

भौममेतत्पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः।

पर्जन्यस्सर्व लोकस्योद्भवाय भुवि वर्षति॥23॥

तस्मात्प्रावृष राजानस्सर्वे शक्रं मुदायुताः।

मखैस्सुरेश मचीन्ति वयमन्ये च मानवाः॥24॥

श्री वि.पु.पं. अं. अ.10

अर्थ—यह पर्जन्यदेव (इन्द्र) पृथिवी के जल को सूर्य किरणों द्वारा खींच कर सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धि के लिये उसे मेघों द्वारा पृथिवी पर बरसाते हैं।

इसलिए वर्षा ऋतु में समस्त राजा लोग, हम और अन्य मनुष्यगण देवराज इन्द्र की यज्ञों द्वाराप्रसन्नता पूर्वक पूजा किया करते हैं।

पराशर जी केशिध्वज और खाण्डिक्य की कथा कहते जा रहे हैं उसी क्रम में—

इयाजसोऽपि सुवहून्यज्ञाञ्ज्ञान व्यपाश्रयः।

ब्रह्मविद्या मघिष्ठान तर्तुं मृत्यु मविद्यया॥12॥

श्री वि.पु.षष्ठ अं.षष्ठ अ.

अर्थ—केशिध्वज ज्ञाननिष्ठ था, तो भी अविद्या (कर्म) द्वारा मृत्यु को पार करने के लियेज्ञान दृष्टि रखते हुए उसने अनेकों यज्ञों का अनुष्ठान किया।

स्कन्द पुराण में यज्ञ भगवान के अवतार का वर्णन है। जिस प्रकार भगवान ने राम, नृसिंह,वाराह, कच्छ, मच्छ आदि के अवतार लिये हैं, उसी प्रकार एक अवतार ‘यज्ञ पुरुष’ का भीलिया है। स्वायम्भुव मन्वन्तर में जब देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और संसार में सर्वत्र घोरअव्यवस्था फैल गई उस अव्यवस्था के फलस्वरूप, सब लोग नाना प्रकार के कष्ट पाने लगे। इसविपन्नता को दूर करने के लिए भगवान ने यज्ञ पुरुष के रूप में अवतार लेने का निश्चय कियाक्योंकि देवताओं की शक्ति वृद्धि करने के लिए यज्ञ के अतिरिक्त और कोई उपाय या मार्ग नहीं है।

महर्षि रुचि की पत्नी आकूति के गर्भ से यज्ञ भगवान ने जन्म लिया और उन्होंने संसार भर मेंअग्नि होत्र की लुप्त प्रायः प्रथा को पुनर्जीवित किया। सर्वत्र यज्ञ होने लगे। फलस्वरूपदेवताओं की शक्ति बढ़ी और संसार का समस्त संकट निवारण हो गया।



कहानी जारी रहेगी
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