Raj sharma stories चूतो का मेला
12-29-2018, 02:55 PM,
RE: Raj sharma stories चूतो का मेला
जब कुछ नहीं सूझा तो फिर हार कर नींद की गोद में शरण ली आँख जब खुली तो मैं ही था बस माधुरी पास में घूम रही थी पता चला नीनू थाने निकल गयी थी पिस्ता दुकान तक गयी थी मैंने हाथ मुह धोये आज उठने में थोड़ी देर हो गयी थी कुछ ही देर बाद काम वाले आ गए मैं तैयार हुआ नाश्ते के बाद मैंने माधुरी से कहा की तुम पिस्ता के साथ जाके अपने खेत-खलिहान देख आना गाँव में घूम फिर लेना शाम तक टीवी लगवा दूंगा बल्कि बाज़ार जाके अपनी पसंद से ले आना वो मन करने आगी पर बहन की हर सुविधा का ख्याल रखना था 


तभी पिस्ता आ गयी हाथो में सब्जी का थैला था मैंने उसे सब बताया और फिर मैं घर से बाहर आ गया घूमते घूमते मैं रतिया काका के घर चला गया घर पे बस मंजू और राहुल की पत्नी ही थे मंजू से बाते होने लगी 


मैं- और बता 


वो- बस कट रही है 


मैं- आजा घुमने चले 


वो- ना, 


मैं- सुन तो सही ,


वो- चल फिर पर जल्दी ही आएंगे 


मैं- आजा 


दरअसल मैं उस जमीन को देखना चाहता था जिसका जिक्र पटवारी ने किया था मैं जाना तो अवंतिका के साथ था वहा पर वो व्यस्त थी पर अब मंजू के साथ जाना चाहता था थोड़ी बाते भी हो जाती अब मंजू मुहफट थी तो शायद कुछ बक दे 
आधे घंटे में हम वहा पहुच गए पथरीली सी जमीन थी आस पास खैर थ, बड्बेरी थी एक तरफ कई सारे नीम के पेड़ लगे हुए थे अब जमीन भी दूर तक फैली हुई थी हम घूमने लगे चारो तरफ सन्नाटा पसरा पड़ा था 


मंजू- ये कहा ले आया मुझे कही मारके गाड़ने का तो इरादा नहीं है 


मैं- ये मेरी जमीन है बस देखने आ गया


वो- और कही क्या कमी थी जो इस उजाड़ में आ या 


मैं- पहले तो बस जमीन ही देखनी थी पर तू है तो थोड़ी मस्ती भी कर लेंगे 
ये कहकर मैंने उसके चुतर को मसल दिया 


मंजू- देख देव, शादी के बाद मैंने अब ये काम छोड़ दिए है 


मैं- राहुल तो कह रहा था तू अब भी उस से चुदती है 


वो- देव, ये बात मत बोला कर मुझे शर्म आती है 


मैं- भाई का लंड ले सकती अहि पर हमारे से नाराजगी जा मंजू देख ली तेरी यारी तू भी बादल गयी औरो की तरह 


वो- ऐसी बात नहीं है देव, पर मैंने सोचा की तू मुझे यहाँ किसी और मकसद से लाया है 


मैं- तो सुन ये जमीन जहा दूर दूर तक करीब 125 बीघा तक कभी मेरे परिवार ने खरीदी थी और मुझे समझ नहीं आ रहा की क्यों ली और इतना पैसा कैसे आया उनके पास जहाँ तक मैं समझता हु इतनी जमीन और ऐसी ही और जमीनों के लिए उस समय भी बहुत मोती रकम चाहिए थी कुछ दिन पहले ही मुझे ये सब पता चला है तो दिमाग उल्झा है तुजे यहाँ इसलिए लाया की तेरी मदद की जरुरत है 


मैं जानता हु अब जो कहूँगा तुझे अजीब लगेगा पर मंजू अब तू ही इस जन्झाल से निकाल सकती है जब जब मदद के लिए मैं तेरे पास आया तूने कभी निराश नहीं किया उम्मीद है अब भी नहीं करेगी मंजू मैं बहुत थक गया हु भागते भागते इस जिन्दगी से बस अब कुछ पल अपनों क साथ जीना चाहता हु तू मदद कर मेरी 

वो- पर देव, मैं क्या कर सकती हु 
मैं- सुन 
उसके बाद मैंने मंजू को पूरी बात बता दी की मुझे उसके बापू और भाई पर शक है और इन इन कारण से 


मंजू कुछ देर चुप रही और फिर बोली- देव, तुम जानते हो बापू और ताउजी में सगे भाइयो से भी ज्यादा गहरा नाता रहा है दोनों परिवार एक जिस्म एक जान है जब बापू का एक्सीडेंट हुआ तो ताउजी ने हमारी कितनी मदद की थी और जब तुम चले गए थे रात रात भर बापू सोते नहीं थे आज तक बस तुम्हारा ही ख्याल है उनको और तुम ऐसा सोच रहे हो देव, क्या तुमने सबको पराया कर दिया 


मैं- मंजू, मुझे गलत मत समझ यही तो मेरी उलझन है जो सुलझ नहीं रही अब तू ही बता मैं क्या करू हर अपने ने मुह मोड़ लिया सब जान के दुश्मन बने पड़े है आस करू तो भी किससे 


मंजू- देव, तुमसे नाता रहा है मेरा, तो मैं जितना बन सकेगा उतना करुँगी मैं 10-15 दिन हु यहाँ तो देखो मैं क्या कर सकती हु 
मैं- अहसान है तेरा 


उसके बाद हम लोग घुमने लगे और आगे बढ़ गए इस तरफ काफी गहरे पेड़ थे हल्का हल्का सा अँधेरा था ठंडक थी यहाँ पर बरगद के पेड़ ही पेड़ थे 


मंजू- डर सा लग रहा है 


मैं- डर किस बात का 


वो- वैसे, घरवालो ने ये ही जमीन क्यों खरीदी देखो बंजर पड़ी है खेती वाली मिट्ठी तो है नहीं पहाड़ के पास होने से पथरीली जमीन है अब इसका क्या उपयोग होगा 


मैं- यही बात तो हमे पता करनी है की आखिर क्यों खरीदी 


वो- शायद इसिलिय की कभी भविष्य में बेच दे तो कुछ मुनाफा हो जाये 


मैं- मंजू पर देख जमीन की चारदीवारी भी नहीं करवाई गयी न ही कोई बाड वगैरह 


वो- शायद हो पर अब काफी दूर तक फैली है तो हमे बाड़ मिली ना हो 


अपने अपने विचार व्यक्त करते हुए हम और आगे बढ़ने लगे हवा में एक गंध सी आने लगी थी जैसे की कोई सीलन हो और थोड़ी दूरी पर एक नाला सा बह रहा था मैंने देखा पानी तो तजा था शायद कोई स्त्रोत रहा हो आस पास मैंने पानी पिया गला तर किया और इधर उधर घूमने लगे एक तरफ एक साथ तीन बरगद के पेड़ थे खूब विशाल और बीच वाले पेड़ के निचे एक चबूतरा बना हुआ था देखने में अजीब बात थी मान लो तीनो पेड़ एक साथ लगे थे मेरा मतलब एक जड़ से उत्पन्न जैसे की कोई त्रिवेणी हो 
अपने आप में सुंदर सा द्रश्य था वो मैं और मंजू उसी चबूतरे पर जाके बैठ गए कभी तो सुंदर रहा होगा वो वक़्त की मार से हालत ठीक नहीं थी पर फिर भी काफी मजबूट था वो , 


मैं-मंजू एक बात समझ नहीं आई की यहाँ ये चबूतरा किसीने क्यों बनवाया होगा 


वो- पुराने समय में शायद लोगो के आने जाने का रास्ता हो ये तो शायद घडी दो घडी आराम के लिए बनवाया हो पहले के टाइम में लोग अक्सर पानी की टंकी ऐसे चबूतरे या तिबारे बनवाते थे 


मैं- हो सकता है पर देख तीनो पेड़ साथ है तो फिर बीच वाले पर ही को सारो पे क्यों नहीं बनवाया
मंजू- शायद इसलिए की बीच में बनाने से इसकी सुन्दरता बढ गयी है अब एक अलग सा इम्पैक्ट है इसमें मुझे लगता है की बनाने वाले को भी ऐसा ही लगा होगा 

मैं- हो सकता है छोड़ अपने को क्या ये बता चूत देगी

वो- हाय राम कुछ तो शर्म करो अब भी ऐसे ही बोलते हो 

मैं- गलत क्या कहा चूत को चूत ही तो कहते है 

वो- तुम कभी नहीं सुधरोगे 

मैं- देगी क्या 

वो- यहाँ कैसे 

मैं- उजाड़ ही तो है और इधर अँधेरा सा भी है और फिर देर भी तो कितनी लगनी है 

वो- ठीक है पर कपडे ना उतरूंगी 

मैं- कितनी समय बाद अपन दोनों मिले है अब नंगी न हुई तो क्या मजा 

वो- कोई आ गया तो 

मैं- मैं हु ना तू टेंशन मत ले 

वो- तू एक दिन जान लेगा मेरी 

मैं- अभी तो चूत से ही काम चल जायेगा जान फिर कभी लूँगा 

मंजू ने अपनी सलवार उतारी धीरे धीरे करके अपने सारे कपडे उतार दिए और पूरी नंगी हो गयी 
मैं अपने कपडे उतारते हुए- मंजू तू तो पहले से भी गंडास हो गयी है निखर आई है 

वो- कहा दो औलाद पैदा कर दी मेरा पति तो कहता रहता है की ढीली हो गयी 
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