मम्मी का शौहर - Page 2 - SexBaba
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मम्मी का शौहर

सुनीता अपने कमरे में पैकिंग कर रही होती हैं, अपनी बेटी सन्ध्या के कमरे में शिफ्ट होने के लिए, तभी अचानक से राघव कमरे में आता हैं,

राघव- सुनीता सॉरी यार और थैंक यू अपने इस त्याग के लिए मैंने तुम को बहुत दुख दिया,
ये जुदाई बस 3 साल की है फिर हम साथ-साथ रहेंगे।

सुनीता रोते हुए राघव के गले लग जाती हैं,


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वो मैं कैसे रहूंगी अपनों से दूर इस घर से, एक नये रिश्ते में, एक नये धर्म में जाकर कैसे,


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राघव- बस ये समझ लो हम दोनों की परीक्षा है सुनीता

सुनीता- हम्म ठीक है, मैं मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाले लोगों के साथ रही हूं जब लोगों को पता चलेगा, तब क्या होंगे सब इज्जत चली जाएगी,
बच्चों का भी सब खराब होगा संध्या तो अभी लंदन में है, जब वो आएगी तो उससे भी कैसा लगेगा।

राघव- सब ठीक होगा 3 साल बाद हम दोनों आपने परिवार सहित इस शहर से शिफ्ट हो जाएंगे।

सुनीता- ठीक है इस कमरे को आखिर बार देख लूं बहुत यादें हैं इसमें मेरी अब 3 साल बाद वापसी कर सकती हूं।

राघव; सुनीता एक बात और है कल निकाह में प्लीज अपना ये दुख छुपा लेना, क्योंकि निकाह में तुम यही चेहरा ले कर जाओगी तो लोग क्या कहेंगे समझ रही हो ना।

सुनीता; जी वो तो है हम अपनी कुर्बानी को यू ही बेकार तो नहीं देंगे,
(फिर सुनीता शिफ्ट हो जाती है अपनी बेटी संध्या के कमरे में)
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यहां सुमित्रा देवी सबको शादी का काम लगा देती है, शादी की तैयारी जोर-शोर चल रही थी,

अब्दुल के घर में भी तैयारी हो रही थे, अभि भी दुखी था वही असलम थोड़ा परेशान था, पर असलम खुश भी था अन्दर ही अन्दर क्योंकि इतनी खूबसूरत औरत मेरी बेगम होगी चाहे शादी का कोई भी कारण ही क्यों ना हो ।

फिर शादी का दिन आ जाता है।
 
उधर असलम अपने घर पर एक कोने में लेटा था, उसकी आंखों के सामने बार - बार अभि की मम्मी (यानि उसकी बेगम) का चेहरा सामने आ रहा था, हंसते हुए


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मुस्कुराता चेहरा सामने आ रहा था, जब असलम से रहा नहीं गया तो असलम ने अपने मोबाइल से अपनी होने वाली बेगम (अभि की मम्मी ) की तस्वीर निकाल कर उसे देखने लगा। असलम को मानो ऐसा लग रहा था जैसे अभि की मम्मी साक्षात उसके सामने ही बैठी हो।


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आँखों से ही बात कर रही हो,


अभि की मम्मी; हाय दैया ऐसे क्या देख रहे हैं, जैसे पहले कभी देखे ही नहीं हो अब ऐसे देखोगे मुझे शर्म आती है अब बस बी करो ना।




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और असलम को देखते हुए मम्मी शर्माने लगी।


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ये सोचते ही असलम का लंड उसके कच्चे में खड़ा हो गया उसने जल्दी से अपनी लुंगी खोल दीं और अपनी होने वाली बेगम (अभि की मम्मी ) की पिक्चर को देखकर कच्चे के ऊपर से आपने लन्ड को सहलाने लगा,


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असलम लंड को सहलाने लगा उस समय असलम का लंबा लन्ड कहा माने वाला था वो तो बगावत के लिए तैयार था, फिर असलम ने अपने कच्छे को उतार अपने मुस्लिम लन्ड बाहर निकाल दिया।



असलम का लंबा लन्ड ऐसे खड़ा देख
मम्मी तो ऐसे मुंह झुकायें खड़ी मुस्करा रही थी।
जैसा आंखों ही आंखों में पुछ रहीं हों हाय दैया रे इतना बड़ा और






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मानो मम्मी ने अभी तक सच में असलम का लंड देख रही हो।

असलम भी मम्मी की तस्वीर से बात करता हुआ, बेगम देखो ना इसकी तरफ
तो मम्मी मुंह झुकाये

बस मुस्करा रही थी

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असलम; अभी शरमा लो अब तीन साल तो बेगम तुम्हें इसी ही देखना है इसी खोली में,

इसी बिस्तर में मेरे साथ तब देखोगी की नहीं और अपने लंड को अपने हाथ में दबाये ऊपर नीचे करने लगा।






तो मम्मी मानो ऐसे बोल रही है।


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तब काहे नहीं देखेंगे अपने मर्द का हम तो देखेंगे भी खेलेंगे-कूदेंगे इस डन्डे से,



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फिर खुद ही शर्मा कर है दैया हमारे मर्द का कितना लंबा ओर मोटा है हमरी तो रसभरी फाड़ देगा ।
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अपना काला मुस्टंडा लंड हिलाते - हिलाते असलम बेंड पर उल्टा लेट गया और मम्मी की तस्वीर को सामने रख कर अपनी कमर को धीरे-धीरे गोल घुमाने लगा ओर धक्के लगाने लगा मानो की असल का लंड मम्मी की चुत में फंसा हुआ है।

असलम को ऐसे अपनी कमर चलते देख मम्मी मनो बोली,

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दैया तुम तो हमें पेलने के लिए प्रैक्टिस शुरू कर दी है,


असलम तो तकिये के ऊपर चढ़ अपनी कमर को तेज़ तेज़ चलने लगा




तकिये ऐसी हालत देख मम्मी बोली,


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हाय दैया रे बाप रे बाप, तकिये की क्या हालत कर रहे हैं ,जब मैं इसके नीचे पड़ी हूंगी तब मेरी क्या हालत करेगा।



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असलम बहुत ही तूफानी गति से अपनी कमर चला रहा था।




जैसे उसका माल निकलने वाला हो कुछ ही मिनट में असलम के लंड का सब्र का बांध टूट गया जो माल उसे मम्मी के अंदर डालना था वो असलम ने उड़ेल दिया।



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असलम जब शांत हुआ मम्मी की तस्वीर को देखते हुए तो मम्मी से बोला,

बेगम देखना निकाह के बाद आपको ऐसे ही पेलूंगा बोलिये ना पिलवाओगी ना मुझसे ऐसे।



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मम्मी ; हाय दईया ये कैसी बात कर रहे हैं
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और मुस्कुरा कर , हम तो कहते हैं निकाह के बाद हमें



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इस से भी बुरी तरह पेलना, और मम्मी ने असलम को देख मुस्कुराने लगी।

आँखो के इशारों-इशारों से कह रहीं हों हाय रे, समझें कि नहीं,
बीवी को उसका मर्द नहीं पेलेगा तो कौन पेलेगा,


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ऐसे ही सोचते - सोचते रात गुज़र गई।

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३ दिन बाद शादी का दिन आ जाता है सारे मेहमान, रिश्तेदार आ गए, नाना-नानी, मामा-मामी सब मेहमान आ चुके थे।

सुनीता की मां को ये अच्छा नहीं लग रहा था, ना ही भाई को पर मजबूरी थी,
सुनीता भी बहुत दुखी थी क्या कर सकती थी उन्हें पता है कि आज वो 3 साल के लिए एक नए रिश्ते बंध रही ये घर छोड़ के जाना होगा,

समाज रिश्तेदार भी बोल रहे हैं कि क्या हो रहा है ये पर अब तो होना ही था, राघव भी मजबूरी में सब कर रहा था।

सुनीता दुल्हन की तरह सजी हुई थी, हाथों में असलम के नाम की मेहंदी पूरे बदन को एक दम चिकना बना दिया था।

सुमित्रा देवी और राघव के कहने पर सुनीता अपने चेहरे पर एक मुस्कान लिए हुई थी।

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आज सुनीता भी अपने सारे दुख भुला पर लोगों को दिखाने के लिए अपने होठों पर मुस्कान ले आई थी।

दुल्हन के जैसे ही मम्मी के चेहरे पर शर्म की लाली थी,

असलम की बारात आ जाती है, बारात बहुत अच्छे से आई होती है क्योंकि इतने सारे पैसा खर्च किया थे,
सलमा और अब्दुल भी जनता है सब खुश भी थे, कि इतने अच्छे से बारातियों का स्वागत करते हुआ, शादी हो रही समाज में रोब बन रहा है।

बारात में सारे मोहल्ले के लोग आए उसके मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाले लोग, ये लोग पहली बार इतनी बड़ी शादी में आए थे सब नाच गा रहे थे असलम भी खुश ही था, कि इतने अच्छे से शादी हो रही थी फिर बारात दरवाजे पर आ गई

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सुमित्रा देवी; (सुनीता के मां बाप से) अरे बारात आ गई समधी-समधन जी बारात का स्वागत किजिए , आप बहूं के मां बाप है, सब आपको ही करना है।

सुनीता की मां; हम्म समधन जी, बहू थाली लाओ, असलम बेटे को घोड़ी से उतर जाओ।

सुनीता का भाई; जी मां
असलम घोड़ी से उतर दरवाजे पर आ जाता है

सुनीता की मां;- आइये असलम, अब्दुल सलमा जी आइये

सलमा- जी समधन जी

असलम की बुआ- अरे भाई भाभी अब आपनी समधन से अच्छे से मिलो क्यों भाईजान,

अब्दुल- हम्म ठीक है जो भी ही चलो आगे का करते हैं मांजी अंदर चले


सुमित्रा देवी;- हम्म आओ अंदर आओ सब का स्वागत है

(असलम और सारे बाराती अंदर आते हैं सब चोक जाते हैं कि इतनी शान असलम तो बड़े घर में गया है उनको थोड़ा सब पता था)

अभि भी साइड में खड़ा था क्या बोलता मेरे स्कूल के कुछ दोस्त भी बारात में आए थे कुछ असलम के मोहल्ले के लड़के मैं छूप रहा था उन से।


असलम- अभि कहीं नहीं दिखायी नहीं दे रहा कहां है कहीं आया ही ना हो,

समझ सकता हूं उसकी भी बुरा लग रहा होगा, मेरा दोस्त जो है,

फिर असलम अभि को कॉल करता है अभि कहां है तू दिख नहीं रहा

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अभि - यही हूं बस काम कर रहा हूं।


असलम- तू ठीक है ना

अभि - हम्म ठीक हूं।

असलम- सॉरी भाई समझ सकता हूं क्या सोच रहा होगा,

ये तू भी जानता है कि ये निकाह सिर्फ किस लिए हो रहा है 3 साल की बात है कुछ नहीं बदलने वाला उस सब से,

अभि - हम्म लेकिन समझ सकता हूं थोड़ा तो टाइम लगेगा,

असलम- हम्म समझता हूं कहां है तू ,

तू मेरा बेस्ट फ्रेंड है मेरे साथ बैठ मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा ये लोग बकवास कर रहे हैं, तू रहेगा तो ये नहीं आएंगे मेरे पास

अभि - ठीक है आता हूं फिर अभि असलम के पास आ जाता है, सब खाना खा रहे होते हैं
असलम- सॉरी भाई
अभि- हम्म ठीक है कोई बात नहीं वसीयत के लिए 3 साल की बात है।

असलम- हम्म सही अच्छा हुआ तू आ गया, बड़ा ही अजीब लग रहा था ये मोहल्ले के दोस्त लोग बकवास और फालतू में बोल रहे थे।

अभि- हम्म ठीक है बस अच्छा लग रहा है तेरे मोहल्ले के मेहमान थोड़े लो ग्रेड बिहेव कर रहे हैं।


असलम- पहली बार इतनी बड़ी शानदार शादी देख रहे हैं ना

अभि- हम्म मोहल्ले के यार तो ठीक है पर तुम ने तो यहां स्कूल और ट्यूशन के दोस्तो को भी बुलाया है।

मुझे राज, अली, रवि और किशन दिखाई दिये।


असलम- मैंने नहीं बुलाया साले खुद आ गए

अभि- हम्म फिर भी यार समझ नहीं आ रहा है अच्छा बस ३ पेपर ही बचे हैं स्कूल तो जा ही नहीं सकता।

असलम- हम्म सब जल्दी से खत्म हो बस इसलिए सब नॉर्मल है तेरी फैमिली से खतरा टले।
प्रॉपर्टी तो तेरे नाम होगी ना सुना है अब्बू से मैंने 3 साल बाद आधी अंकल के नाम पर

अभि - मुझे ज्यादा नहीं पता इस बारे में,


असलम- मैंने सब पता किया भाई अंकल की कंपनी पर 500 करोड़ का कर्ज है तेरे नाम 1000 करोड़ होंगे तो तू अमीर हो जाएगा, खुद के पैसे

अभि - हम्म वो पैसे काम के लिए है पापा का कर्ज खत्म हो फैमिली सिक्योर हो,
ये 3 साल का खत्म हो सब फिर से नॉर्मल हो, जल्दी से यार ये सब झलेना है।

असलम- हम्म सही कहां
 
सब कुछ ऐसे ही चल रहा था, अब मौलवी आ जाता है और अब्दुल से कहता है ,

मौलवी- अब्दुल निकाह का वक्त हो गया है बुलाओ दूल्हा-दुल्हन को।

अब्दुल- जी मौलवी साहब

अब्दुल- राघव और सुमित्रा देवी से कहता है कि निकाह का वक्त हो गया है मालकिन को बुलाओ

सुमित्रा देवी- राधा बहू जाओ सुनीता बहू को ले आओ।

राधा- जी मांजी
(चलो अब 3 साल आराम से इस घर में मेरा राज कोई नहीं होगा डांटने वाला भाभी बड़ी बनती थी अब मुसलमान के गरीब घर में मुसलमान की बीवी कहलाएगी, क्योंकि 3 साल बाद तो पहले जैसा नियम का हवाला नहीं दे पाएगी। ३ साल मुस्लिम मर्द के नीचे रहेगी, वो इज्जत थोड़े ही रहेगी बस अभि का बुरा लग रहा है उससे भी उस गरीब घर में रहना होगा )


उधर सुनीता के कमरे में।
(सुनीता अपने कमरे में अपने भाई और भाभी के साथ तैयार बैठी थी)

राधा - भाभी चलिये निकाह का वक्त हो गया बुलाया है आपको

फिर सुनीता धीरे से आंख के आंसू पौछती है फिर सुनीता की भाभी और राधा सुनीता को लेकर आ जाते हैं

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मोलवी- असलम से ये निकाह हो रहा है,
असलम तुम्हारे सुनीता के साथ निकाह कबूल है।
क्या तुम सुनीता को अपनी बेगम कबूल करते हो।


असलम- सोचता है पहले (कि उफ़ आंटी क्या लग रही है बिल्कुल परी वो सब वीडियो की हीरोइन फेल है पर आंटी मेरी शादी हो रही है पर वजह पता है वफादारी भी है पर फिर भी ये हुस्न की परी मेरे कमरे में मेरे बिस्तर पर मेरे साथ होगी, क्या मैं वफ़ा निभा सकूंगा मुझे तो नहीं लगता, वैसे रिस्पेक्ट करता हूं आंटी की अभि की मम्मी है )

असलम की बुआ - असलम-असलम क्या सोच रहा है बोलो कबूल है

सलमा - हम्म बेटा बोलो

असलम- अभि को देखता है अभि खड़ा हुआ था चुप-चाप,
असलम सुनीता को देख के धीरे से बोला (कबूल है कबूल है कबूल है)

असलम के बोलते ही उसकी तरफ के लोग मुबारक हो मुबारक हो कहने लगते हैं।

मौलवी ( सुनीता की ओर देख )
मौलवी - सुनीता तुम्हें अब्दुल के बेटे असलम के साथ निकाह कबूल है

( सुनीता चुप थी उनको सब याद आ रहा है इतने साल सब कुछ सोच रही होती है, कि आज ३ साल के लिए नए रिश्ते, नए घर, नयी संस्कृति कैसे)


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मौलवी- ज़ोर से सुनीता तुम्हें असलम के साथ निकाह कबूल है।


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सुमित्रा देवी- सुनीता बहू बेटी बोलो,

सुनीता की आंखें भरी हुई होती है भारी मन से (कबूल है कबूल है कबूल है)

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इतना कहकर सुनीता सर झुका कर चुप हो जाती है उन्हें पता था क्या हुआ है

अभि की आंख में पानी आ गया, राघव भी रोने लगे पर क्या कर सकते थे।

जैसे ही सुनीता ने कबूल है कहा तभी असलम की ओर से बेठी औरतें जो सुनीता के साथ बैठी थी खुशी से दुल्हन को निकाह की मुबारकबाद देने लगतीं हैं।


मौलवी- मुबारक हो निकाह मुक्कमल हुआ, अब आप दोनो मिया बीवी हुए , निकाह हो गया।
 
असलम की तरफ से सब असलम उसकी अम्मी अब्बू को मुबारकबाद देने लगे, फिर सब की फोटो खींचवाने लगें।

सब बाराती दावत उड़ा रहे थे उसमें असलम के मोहल्ले के कुछ दोस्त भी थे, सलीम युसुफ़ रहमान।

( अभि की जबानी )

मैं उन के पीछे खड़ा उनकी बात सुन रहा था, उन मैं एक सलीम था वो असलम के मोहल्ले में रहता था असलम का जिगरी यार था।

सलीम - यार कुछ भी कहो असलम भाई को बेगम जोरदार मिली है एकदम कड़क माल है


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यूसुफ; भाई सही कह रहा हो असलम तो आज रात अपनी बेगम की १० बार लेगा।

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सलीम; यार लेगा क्यों नहीं माल ही इतना जोरदार ही चुची देखी है बिलकुल नागपुरी संतरे है

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रहमान; वो ही भाई असलम तो एक ही रात में निचोड़ डालेगा साला
यूसुफ; सही कह रहा ही भाई सारी रात चढ़ा रहेगा घोड़ी बना कर,

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सलीम; यार अगर घोड़ी बनाई ना चूत में डालने से पहले पीछे डाल देगा देखा नहीं, तो कितनी जबरदस्त है।


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असलम के तो मज़े ही मज़े है

रहमान; असलम इस छमिया के मजे लेगा हम साले इस छमिया के बारे में मैं सोच सोच कर हिलायेंगे सब मम्मी को देख हंसने लगे।
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मैं अपनी मम्मी के बारे में मैं इतनी गंदी बातें सुन के लिए मजबूर था, कुछ कर नहीं सकता था, वो सब तो मम्मी के बारे में सोच कर हिलायेंगे,

असलम मम्मी के नाम पर तो उसकी मुहर लग चुकी था, मैं जानता था भले ही वो बोल रहा है कि वह मम्मी की इज्जत करता है ।

पर उसके लौड़े पर, वह नहीं करता उसके लिए तो मम्मी सिर्फ एक औरत है, वह मम्मी पर अपनी पक्की मुहर लगा कर मानेगा।

यह बात इतनी सौ फीसदी सही थी।

बस अब ये देखना था कि असलम अपने लौड़े से मम्मी पर मुहर कब लगता है,

सुहागरात में या फिर कुछ दिनों के बाद।
 
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