सर्दियों में दिल्ली की सैर ! - SexBaba
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सर्दियों में दिल्ली की सैर !

hotaks444

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Nov 15, 2016
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मेरा नाम गोबिंदन रखा गया था पर घरेलू नाम गुड्डू रहा, और इसी नाम से मैं स्कूल में पढ्ने लगा था। मेरी उम्र इस समय 16 वर्ष की है लेकिन यह वाकया उस वक्त का है जब मैं 13 साल का था। उस समय मैं 7 वीं क्लास में पढ़ रहा था। बता दूँ की मैं बचपन से ही काफी खूबसूरत था। इतना की यदि लड़की की ड्रेस मुझे पहना दी जाय तो मेकअप के बिना भी मैं सेक्सी छोरी जैसा लगूं।<br/><br/>एक बार हमारी स्कूल की टीम हर साल दिल्ली में नवंबर में होने वाले अंतरराष्ट्रीय उद्योग मेले की सैर करने निकली। हम राजस्थान के एक छोटे से गाँव के थे जहां बिजली भी न थी। दिल्ली की चकाचौंध देख मैं ललचा गया। हालांकि 20 नवंबर को हम यह मेला देख वापस अपनी गाँव की स्कूल में पढ़ने आ गए थे पर मेरा मन दिल्ली की जगमग चकाचौंध में रम रहा था। मैं वहाँ अकेला जाना चाहता था। दिसंबर में हुई छुट्टियों मुझे ये मौका मिल गया। मैं अपनी नानी के यहाँ जाने के बहाने से घर से निकला और सीधे पहुँच गया - दिल्ली। मेरे पास वहाँ रहने, घूमने और खाने के पूरे पैसे भी नहीं थे पर जोश था।<br/><br/>मैं लगभग 4 बजे दिन के वक्त वहाँ पहुंचा था। शाम होने ही वाली थी। मैं दिल्ली जंक्शन उतरा था, जहां से मैं चाँदनी चौक पहुंचा। वहाँ एक रिक्सेवाले की नजर मेरे पर पड़ गई। उसने मुझे ताड़ लिया और पूछा, " मुन्नू, दिल्ली घूमने आए हो?"। मैंने मुस्करा कर कहा- ' हाँ '। वह बोला ' पैदल तो तुम सही घूम नहीं पाओगे, चलो मैं घुमा देता हूँ तुझे!' मैं उसके रिक्शे पर बैठ गया। उसे दरयागंज और जामा मस्जिद की ओर घुमाया व जमुना का पुराना पुल भी दिखाया। चावड़ी बाज़ार में एक जगह उसने मुझे समोसे खिलाए। इतने में ही रात हो गई। उसने मुजसे कहा - रात को ठहरोगे कहाँ? चलो मैं तुम्हारे ठहरने का इंतजाम कर देता हूँ। वह मुझे ले फ़तहपुरी के एक होटल पहुंचा। मैंने दूर से सुना, वो होटल मेनेजर से कह रहा था, ' लौंडा चिकना और काम का है, कोई एक छोटा रूम इसे दे दो; बाद में मैं सम्हाल लूँगा। ' होटल मेनेजर ने मुझे खाना भी खिलाया। हालांकि कमरा कुछ छोटा था पर इसमे भी डबल बेड था और एक आदमक़द शीशा भी। टॉइलेट भी भीतर था। सुहाने पर्दे थे जो मुझे अच्छे लगे। मेनेजर ने खाने के बाद मुझे पान भी खिलाया।<br/><br/>रिक्सावाला दुबारा आ गया था। उसने मुझे दिल्ली की रात की सैर कराई। वो मुझे कनाट प्लेस ले गया जहां जबर्दस्त चहलपहल थी। फिर वह मुझे अजमेरी गेट ले गया। वहाँ से पहाड़गंज। होटल पहाड़गंज में था। रात के दस बज गए थे। सर्दी भी बढ़ गई थी। इसलिए वो मुझे होटल छोड़ गया। होटल मेनेजर ने मुझसे पूछा, 'घूम लिए, मुन्ना?' मैंने हौले से कहा- 'हाँ'। फिर उसने मुझे गरम दूध पिलाया और होटल के उसी कमरे में पहुंचा दिया। मैं डबल बेड पर लेट गया और खुश था। मैंने देखा की कमरे को भीतर से बंद करने के लिए कोई कुंडा नहीं था पर मैंने इस पर ध्यान नहीं दिया।<br/><br/>कोई साढ़े दस बजे होटल मेनेजर एक आदमी के साथ मेरे कमरे में आया। वह आदमी कोई 58 साल का था और मोटा ताज़ा था। मेनेजर बोला: ' ये सेठ भी तेरे साथ सोएगा, तुझे कोई एतराज़ तो नहीं?' मैंने सिर हिला कर कहा- 'नहीं!'। उस मोटे आदमी ( सेठ ) ने मुझे गुटखा खिलाया जो मैंने मुंह में ले लिया। रात के 11 बज गए थे। हम दोनों ने एक ही कंबल ओढ़ रखा था। मैं उसकी ओर पीठ करके सोया हुआ था। मुझे कुछ नींद आ रही थी और कुछ नहीं भी आ रही थी। शायद गुटखे में कुछ नशा था। कोई साढ़े ग्यारह बजे मैंने महसूस किया कि वो मोटा तगड़ा मर्द मेरे नितंबों से सटा जा रहा है। मैंने कोई हरकत नहीं की। बल्कि मुझे अच्छा लगा। इस पर उसकी हिम्मत और बढ़ गई। मैं भी कुछ पीछे सरका जिससे उसे यह पता चल जाय कि उसकी हरकत मुझे अच्छी लगी है। वह मुझसे और जोश से चिपक गया, और इस समय मैंने उसके करारे लंड को महसूस किया। मैं एक झीना-सा पाजामा पहने हुए था। सेठ धोती में था। सहसा उसने अपनी धोती की लाँग खोली और उसका नंगा लं ड मेरे पाजामे से टकराने लगा। सेठ ने अपनी एक टांग मेरी टांग पर रख दी, और रुख देखने लगा। चूंकि मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, और सेठ का लौड़ा गरम-गरम भी था इस लिए मैंने अब खुद ही अपना पाजामा खोल दिया। पाजामे के भीतर अंडरवियर भी नहीं था। मेरी गांड बिलकुल नंगी थी। इस पर सेठ ने मेरे गाल मरोड़े और बोला, " अरे, तू तो बहुत समझदार है!!" मैंने चसकी ली और सेठ मेरे गाल चूँसने लगा। गाल चूँसते हुए ही वो अपना नंगा लंड मेरी गांड में फँसाने लगा। मुझे भी मज़ा आ रहा था। मगर सेठ का लंड बहुत मोटा होने की वजह से मेरी गांड में घुस नहीं रहा था, इस पर सेठ ने मेरी गांड में अंगुली की, पहले एक, फिर दो, फिर तीन। इससे उसके लंड का सोपारा किसी तरह मेरी गांड में घुस ठहर गया। अब वह कस कर धक्कामुक्की करने लगा। भक, उसका लौड़ा तीन इंच आगे घुस्स गया। लेकिन सेठ का लंड 8 इंच का था। उसका पेट भी भारी था। सहसा उसने मेरी गांड के गोलकों को अपने दोनों हाथों से कस कर चौड़ा किया और घप्प से अपना लंड 5 इंच भीतर पेल दिया। रात के 12 बज गए थे और सेठ तबीयत से मेरी गांड मार रहा था। हम दोनों 1 बजे तक यह खेल खेलते रहे।<br/><br/>फिर उसने रोशनी की और मेरी कदकाठी ध्यान से देकी। मैं सिर्फ 13 वर्ष का था और सेठ 58 का। उसने मेरी ठुड्डी उठा प्यार किया और अपना भुजंग जैसा लंड मुझे दिखाया, 8 इंच लंबा लंड। उसने इशारा किया तो मैंने उसका लंड पकड़ लिया और सहलाने लगा। सेठ ने कहा, मुन्ना, मेरा लंड चूँस!' इससे पहले कि मैं कुछ हरकत करता उसने मेरा मुंह खोला और घुसा दिया। मैंने आधा घंटा उसका लौड़ा चूँसा। फिर सेठ ने मुझे बेड पर पटक दिया और दुबारा से मेरी गांड मारी। इसके बाद उसने मुझे शराब की एक बोतल पिलाई। वह रात के दो बजे फारिग हो चला गया।<br/><br/>मैं बेड पर लेट तो गया पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। इस वक्त मेनेजर फिर आ गया। इस बार उसके साथ दो मोटे हटेकट्टे मर्द थे। दोनों 58-59 साल के। इनमें एक सिख था दूसरा मुसलमान। दोनों की अच्छी गुंथी दाढ़ियाँ थीं। दोनों के पेट व जांघें भारी-भारी थे। मेनेजर मुझसे मुस्करा कर बोला- ' अब ये भी तेरे साथ वो ही काम करेंगे जो सेठ ने किया!'। दोनों मेरे आगे-पीछे लग गए। शराब का नशा मुझ पर चढ़ चुका था। मुसलमान मेरी गांड से चिपक गया था और सिख सामने से मेरे गाल मरोड़ रहा था। मुझे अच्छा लग रहा था। मुसलमान का नाम कमरुद्दीन था और सिख का नाम करतारसिंह। दोनों ने मुझे जमीन पर लिटा दिया। कमरुद्दीन ने पीछे से मेरी गांड मारी और सरदार करतारसिंह ने आगे से अपना लौड़ा मेरे मुंह में धंसा दिया। फिर दोनों ने अदलाबदली की। एक साथ दो मर्दों से गांड मरने का ये मेरा पहला अनुभव था। दोनों फारिग हो चले गए। रात के तीन बज गए थे।<br/><br/>तभी रिक्सावाला भी आ गया, उसके साथ रेलवे का एक कुली भी था। वे अपने साथ एक 49 वर्ष की औरत भी लाये थे। वह औरत बहुत मोटी थी, कोई मराठा; उसने लांगवाली साड़ी पहन रखी थी, उसके चूचे बहुत भारी थे। वह भारी बदन की औरत मुझ पर झपटी, और उसने मेरा पाजामा का नाड़ा खींच मुझे नंगा कर डाला। उसने मुझे आगे घसीटा और तभी रिक्सावाले ने पीछे से मेरी दोनों टांगें पकड़-जकड़ ली। मराठा औरत ने अपनी मोटीताजी गणद नंगी की और मुझे कहा कि " मेरी गांड चाट, नहीं तो बहुत मारूँगी"। मेरे सामने कोई चारा ना था इसलिए मैं उसकी गांड चाटने लगा। पीछे से रिक्सावाला व कुली भी एकसाथ मेरी गांड चाटने लगे। वे तो उसे दांतों से काट भी रहे थे। मैंने उस मोटी व भद्दी औरत की गांड चाटी व फिर चूत भी। फिर उसने मेरा गला फाड़ एक केपसूल मेरे मुंह मे गटकाया जो पेट में गया। कुच्छ देर बाद ही उससे मेरा लंड भभक कर खड़ा हो गया, और न केवल खड़ा बल्कि कुछ मोटा व लंबा भी। फिर मराठा औरत ने कहा, " मुन्ना, अब तू मुझे " माँ-माँ " कह कर मेरी गांड मार। पीछे से कुली ने भी यही कहा, वो बोला ' हाँ, अपनी माँ की गांड मार नहीं तो तेरी टांगें तोड़ दूंगा, साले!1' यह कह उसने मेरी जांघ पर अपना जूता ज़ोर से रगड़ा और जूते से मेरी चूतड़ पर चोट की। मेरे सामने कोई चारा नहीं था इसलिए मैंने अपना उठा हुआ लंड मराठा औरत की गांड के छेड़ पर टिकाया, और " माँ-माँ" कहते हुए उसकी गांड मारने लगा। पीछे से कुली व रिक्सावाला बारी-बारी मेरी गांड बजाने को अड़े हुए थे। एक लंड निकालता तो दूसरा धंसा देता था। जब रिक्सावाला अपने हाथों से मेरी गांड चौड़ी करता तब कुली मेरी गांड मारता। फिर इसी तरीके से रिक्सावाला भी। धीमे-धीमे मुझे इस काम में मज़ा आने लगा। इन दोनों मर्दों ने सुबह के 5 बजे तक मेरी गांड मारी। जब ये दोनों मर्द फारिग हो गए तो मराठा औरत ने भी मेरे पीछे लग मेरी गांड मारी। उसकी भारी जांघों व चूतड़ में गजब का दम था। वो मुझसे ऐसे टकरा रही थी जैसे मूसल की चोट। जब सब चले गए तब भी मुझे राहत नहीं।<br/><br/>जब सुबह के 7 बज गए तब, ठीक आरती के वक्त मोटे मंदिर के एक रिटायर्ड पुजारी आ गए और ऐन आरती के साथ-साथ मेरी गांड मारने लगे। वे प्रातः 7:33 पर फारिग हो गए तो सबसे आखिर में होटल के मेनेजर ने मेरी गांड मारी। वह आधा घंटा मेरी गांड मारता, आधा घंटा आराम होता, फिर वो मुझे मिठाई खिलाता और मेरे मिठाई खाते हुए ही वो मेरी गांड मारता।<br/><br/>यह मेरा दिल्ली का सैर सपाटा था अर्थात बुड्ढे मर्दों से गां ड चुदवाने का अनुभव।
 
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