Ek Duje ke Vaaste.. - Page 6 - SexBaba
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Ek Duje ke Vaaste..

अपडेट 42

अक्षिता अपने आस-पास के माहौल को देख रही थी, हर कोई बातें कर रहा था, हंस रहा था, नाच रहा था,मौज-मस्ती कर रहा था,

उसने एकांश की तरफ देखा जो उससे थोड़ी दूर खड़ा किसी से बात कर रहा था, वो एकांश को देख रही थी और खुश थी, आज वो काफी टाइम बाद कुछ अच्छा कुछ नया महसूस कर रही थी, उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो इतने दिनों से मानो पिंजरे में बंद थी, लेकिन अब बाहर आकर लोगों से मिलकर उसे अच्छा लग रहा था, और सबके खास बात ये की जिससे वो पीर करती थी वो उसके साथ था…

एकांश ने अक्षिता की ओर देखा तो पाया कि वो अपने चारों ओर देखकर मुस्कुरा रही थी, वो कीसी मेले मे घूम रहे बच्चे की तरह एक्सईटेड लग रही थी, खुश थी मुस्कुरा रही थी

एकांश ने जिससे वो बात कर रहा था उनसे विद ली और अक्षिता के पास चला आया और उसने उसका हाथ पकड़ा अपने हाथ पर कीसी का हाथ महसूस कर अक्षिता थोड़ा चौकी लेकिन फिर जब उसने देखा के वो एकांश है तो वो थोड़ी शांत हो गई, एकांश उसे ही देख रहा था वही अक्षिता एकांश से नजरे बचाने की कोशिश करते हुते इधर उधर देख रही थी

और तभी अक्षिता ने कुछ ऐसा देखा जिससे वो थोड़ा घबराई और वो डर के मारे थोड़ा पीछे हटने लगी, एकांश ने भी अक्षिता मे आए इस बदलाव को नोटिस किया और उसकी मुस्कान के गायब होने का कारण जानने के लिए उसने अक्षिता की नजरों का पीछा किया तो वो समझ गया के क्या हुआ है और तभी अक्षिता वहा से जाने के लिए मुड़ी लेकिन जा न सकी, एकांश ने उसका हाथ मजबूती से पकड़ रखा था

"कहा जा रही हो?" एकांश ने पूछा

"मेरा हाथ छोड़ो एकांश?" अक्षिता ने धीमी आवाज मे कहा

"क्या? क्यों?"

"मैं.... " अक्षिता ने कुछ बोलते नहीं बन रहा था और अब वो उन लोगों की ओर देख रही थी जो उन दोनों के पास आ रहे थे

"तुम उन्हें देखकर इतने डरी हुए क्यों हो?" एकांश ने पूछा

"क्योंकि मैं उनकी आँखों में अपने लिए नफ़रत नहीं देखना चाहती" अक्षिता ने वापिस धीमी आवाज मे नीचे देखते हुए कहा

"तुम पागल हो गई जो क्या, और वो भला तुमसे नफरत क्यों करने लगे?" एकांश ने कहा

"क्योंकि मैं उन्हें बिना कुछ बताए सब कुछ छोड़ कर आई थी और अब शायद वो...." बोलते बोलते अक्षिता चुप हो गई और वापिस नीचे देखने लगी वही एकांश उसकी इस बात पर हसने के अलावा कुछ ना कर सका

"मैंने कोई जोक मारा क्या जो यू हस रहे हो?" अक्षिता ने एकांश को घूरते हुए पूछा

"नहीं तुम्हारी बेवकूफी पर हास रहा हु"

"छोड़ो यार जाने डू मुझे" अक्षिता ने चिढ़कर कहा और एकांश के हाथ से अपने हाथ छुड़ाने लगी

"तुम्हें पागलपन के दौरे पड़ते है क्या जो सोच रही हो के वो लोग तुमसे नफरत करेंगे, तुम्हें पता भी है कि जब तुम अचानक चली गई थी तो उनलोगों की क्या हालत थी, ऐसी कोई जगह नहीं छोड़ी उन्होंने जहा तुम्हें खोजा ना हो और स्वरा का तो रो रो के बुरा हाल था और तुम सोचती हो कि वो तुमसे नफरत करेंगे?" एकांश ने कहा

"लेकिन.... मुझे नहीं पता कि मैं उनका सामना कैसे करूंगी....." अक्षिता ने वापिस धीमी आवाज मे कहा जीसे सुन कोई भी समझ सकता था के वो काभी भी रो पड़ेगी

"अक्षिता, वो दोस्त है तुम्हारे, बल्कि सबसे अच्छे दोस्त है, देखो तुम्हारे जाने का जो भी कारण हो, वो समझ जाएंगे और ट्रस्ट मी तुमसे मिलकर खुश होंगे ना की तुमसे नफरत करेंगे वैसे कोई तुमसे कभी नफरत कर ही नहीं सकता, अब जाओ और जाकर मिलों उनसे" एकांश ने अक्षिता के आँखों मे देखते हुए उसे समझाते हुए कहा और उसने भी हा मे सिर हिलाया मानो एकांश की बात समझ गई जो जीसे देख एकांश के चेहरे पर भी स्माइल आ गई और अक्षिता उन लोगों की ओर मुड़ी जो अब वहा पहुच चुके थे और उसे ही देख रहे थे लेकिन कुछ बोल नहीं रहे थे

रोहन और स्वरा उन दोनो के सामने खड़े अक्षिता को देख रही थे वही अक्षिता को समझ नही आ रहा था के क्या बोले, कैसे अपने दोस्तो का सामना करे और आखिर स्वरा ने ही वो चुप्पी तोडी

"फिर से हमसे दूर भाग रही थी?" स्वरा ने पूछा, उसके चेहरे पर हल्का सा गुस्सा था और उसकी नजरो से अपने लिए वो गुस्सा देख अक्षिता से आगे कुछ बोलते ही नही बना, वो नीचे देखने लगी, उसकी आंखों में पानी था

"मैं... वो... मैं..." वो हकला रही थी, समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे कैसे कहे और फिर स्वरा ने वो किया जो अक्षिता ने सोचा नही था, अगले ही मिनट स्वरा ने उसे गले लगा लिया

"पागल हो क्या यार अक्षु, ऐसे कोई गायब होता है क्या पता है।हम कितना टेंशन में आ गए थे?" स्वरा अक्षिता को कसकर गले लगाते हुए रो पड़ी यही हाल अक्षिता का भी था, उसने भी स्वरा को कस कर गले लगा लिया

"I missed you" स्वरा ने कहा

"I missed you too"

कुछ देर बाद दोनो अलग हुए और अक्षिता ने स्वरा के आंसू पोछे

"होगया... लॉस्ट लवर्स का मिलाप हो गया?" रोहन ने उनका रोना धोना देख ताना मारते हुए कहा जिसे सुन स्वरा ने उसे घूरकर देखा वही अक्षिता हस पड़ी

"How are you?" रोहन ने अक्षिता को गले लगाते हुए कहा

"एकदम बढ़िया"

"Good..... and you look better too..... that's nice" रोहन ने अक्षिता को देखते हुए कहा जिसपर वो बस मुस्कुरा दी

"हटो यार रोहन बोर कर रहे हो तुम, मुझे मेरी बेस्ट फ्रेंड से बहुत सारी बाते करने है" स्वरा ने रोहन को दूर धकेलते हुए कहा

"अरे! वो मेरी भी तो दोस्त है यार" रोहन ने कहा लेकिन तब तक स्वरा अक्षिता को अपने साथ ले गई थी और इस दौरान एकांश वहीं खड़े होकर बस उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा था..

"तुम ठीक हो? तुम्हारी तबीयत कैसी है अब? दवाइयां ठीक से ले रही हो ना? आंटी और अंकल कैसे हैं?" स्वरा ने अक्षिता पे एक के बाद एक सवाल दाग दिए वही अक्षिता बस उसे देख हस रही थी और सोच रही थी के उसने स्वरा इस इस बकबक को कितना मिस किया था

"ठीक है ठीक है..... बस ये बताओ तुम कैसी हो?" स्वरा ने इस बार उसे हसता देख कर सीरियस होकर पूछा

अक्षिता ने एक नजर एकांश की ओर देखा जो रोहन से बात कर रहा था

"मैं ठीक हूं... सच में..." अक्षिता ने मुस्कुराते हुए कहा लेकिन वो अब भी एकांश को देखे जा रही थी

उसे यू देख स्वरा के भी चेहरे पर स्माइल आ गई क्योंकि वो भी जानती थी कि उसकी दोस्त का क्या मतलब था, जब तक एकांश उसके साथ है, अक्षिता खुश है..

और फिर उन सभी बातो का सिलसिला शुरू हुआ जो इन दोनो ने मिस की थी

"अब इससे पहले कि एकांश आकर तुम्हें खींचकर ले जाए, चलो" स्वरा ने कहा और अक्षिता ने एकांश की ओर देखा जो बीच-बीच में उसकी ओर ही देख रहा था, पूरा ध्यान रख रहा था कि वो ठीक है या नहीं स्वरा और अक्षिता भी जाकर रोहन एकांश के पास खड़े हों गए..

"कुछ खाए क्या अब भूख लग रही है?" स्वरा ने कहा जिसपर बाकी सब ने भी सहमति जताई और एकांश ने उन्हें खाने के सेक्शन की ओर चलने का इशारा किया और सब उसके पीछे हो लिया

एकांश अक्षिता के खाने के लिए एक प्लेट में सारी हेल्थी चीजे ले आया था जो के बस सलाद और फ्रूट्स थे जिसे देख अक्षिता ने मुंह बना लिया लेकिन जब उसके मुंह बनाने का एकांश पर कोई असर नहीं हुआ तो उसने चुप चाप वही खा लिया

"आइसक्रीम!" खाना होने के बाद अक्षिता ने अचानक चीखकर कहा जिससे बाकी तीनों चौके

"क्या?" एकांश पूछा

"वो देखो उधर आइस क्रीम है, चलो ना आइस क्रीम खाते है" अक्षिता ने एक और इशारा करते हुए कहा और एकांश का चेहरा थोड़ा टेंशन में आ गया वही रोहन और स्वरा ने भी एकदूसरे को देखा

"अक्षिता बाहर बहुत ठंड है और ऐसे मौसम में तुम्हें आइसक्रीम नहीं खानी चाहिए..... तुम्हें सर्दी लग सकती है" एकांश ने अक्षिता को समझाते हुए कहा

"Whatever मुझे आइस क्रीम खानी है बस" अक्षिता ने ज़िद करते हुए कहा

एकांश ने स्वरा और रोहन की ओर मदद की नजरो से देखा, वो अक्षिता को सेहत के साथ कोई रिस्क नही लेना चाहता था खासकर तब जब उसकी हालत में सुधार हो रहा था

"अक्षिता, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है.... अकेले में" रोहन ने कहा

" लेकिन....."

"प्लीज....." रोहन ने जोर देते हुए कहा

"ठीक है" बोलके अक्षिता रोहन के साथ चली गई

एकांश और स्वरा ने अक्षिता और रोहन की ओर देखा जो कुछ सीरियस होकर बातचीत कर रहे थे एकांश ने देखा कि जब रोहन ने अपनी बात खत्म की तो अक्षिता थोड़ी निराश दिख रही थी और उसका दिल ये सोचकर दुख रहा था कि वो जो चाहती थी वो खा भी नहीं पाई..

"Let's have some desert.." स्वरा ने अक्षिता का मूड ठीक करने के लिए कहा

"नहीं रहने दो" अक्षिता ने कहा

"क्यों?" स्वरा ने पूछा

"मेरा अब कुछ खाने का मन नही है" अक्षिता ने नीचे देखते हुए कहा और कोने में रखे एक सोफे पर जाकर बैठ गई, एकांश को उसे यू मायूस देखना बिलकुल अच्छा नही लग रहा था

रोहन और स्वरा ने एकांश की ओर देखा जो कुछ लोगो से बात कर रहा था और बीच बीच में अक्षिता को भी देख रहा था अक्षिता भी जब वो उसकी ओर देखता तो मुस्कुरा देती, लेकिन एकांश समझ गया था कि वो किसी बात गहन चिंतन में डूबी हुई थी, रोहन किसी ऐसे बंदे से बात कर रहा था जिसे वो कंपनी की मीटिंग के कारण जानता था और स्वरा को एक फोन आया था जिसे वो अटेंड कर रही थी

अक्षिता सोफे पर अकेली बैठी थी और बीच-बीच में वो भी एकांश को देख रही थी साथ ही उन लड़कियों को घूर रही थी जो बेशर्मी से एकांश पर लाइन मार रही थीं,

अक्षिता अभी सोफ़े पर बैठी अपने खयालों मे खोई थी के उसने महसूस किया के कोई उसके बाजू मे आके बैठा है उसने अपने पास बैठे बंदे को देखा जो उसे ही देख रहा था जिसके बाद अक्षिता ने अपने कपड़े ठीक कीये

"what a hot and young woman like you doing here sitting alone?" उस बंदे ने अक्षिता की ओर देख पूछा, उसके इंटेन्शन अक्षिता को सही नहीं लग रहे थे

"it’s none of your business" अक्षिता ने तीखे स्वर मे कहा

"जब बात खूबसूरत लड़कियों की आती है then it’s my business" उसने अक्षिता के शरीर को ऊपर से नीचे देखते हुए कहा

"इक्स्क्यूज़ मी" अक्षिता ने कहा और वहा से जाने के लिए उठ खड़ी हुई और वो वहा से जाने ही वाली थी के उस बंदे से अक्षिता का हाथ पकड़ कर उसे जाने से रोका और अक्षिता अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी

"stop struggling, let’s have some fun... वैसे भी इस साड़ी मे बहुत सेक्सी लग रही हो तुम" उस बंदे के अक्षिता के पास आते हुए कहा

“हाथ छोड़ो मेरा" अक्षिता ने गुस्से मे कहा और इससे पहले कि वो बंद आगे कुछ कह पाता वो अपना जबड़ा पकड़े फर्श पर गिरा पड़ा था और एकांश उसे जानलेवा नजरों से घूर रहा था

"how dare you touch her?" एकांश ने चिल्ला कर कहा और उस बंदे को मारने के लिए उसकी ओर बढ़ा अक्षिता ने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन अब एकांश कहा रुकने वाला था वही वो बंदा भी शांत नहीं था उसने ऐसी बात बोली की एकांश को और गुस्सा चढ़ने लगा

"एकांश रघुवंशी, तो तुम्हारी भी नजर है उसपर.... बढ़िया तो क्यों न हम दोनों मिलकर उसके साथ मजे करें... क्या बोलते हो" एकांश ने मुक्का इतनी जोर से मारा था के उस बंदे का होंठ फट गया था जिसमे से थोड़ा खून आ रहा था फिर भी वो मुसकुराते हुए एकांश को देख बोला और अगले ही पल वो अपना पेट पकड़े वापिस जमीन पर पड़ा था

"तूने दोबारा उसकी ओर देखने की हिम्मत भी की ओर जान से मार दूंगा...... " एकांश ने उसका कॉलर पकड़ कर उसे ऊपर उठाते हुए कहा

"अंश... रुको..." अक्षिता ने एकांश का हाथ पकड़ लिया

मामला बढ़ता देख कई लोग अब बीच मे आ गए थे एकांश को रोकने लगे थे, एकांश को यू गुस्से मे एक लड़की के लिए झगड़ते देख कई लोग हैरान था, कीसी ने भी उसे पहले कभी कीसी लड़की के साथ नहीं देखा था और अब एकांश का वहा रुकने का जरा भी मन नहीं था वो अक्षिता का हाथ थामे होटल से बाहर चला आया वही अक्षिता उसे देखती हुई उसके पीछे पीछे चल रही

उनके साथ ही रोहन और स्वरा भी निकल आए थे और पार्किंग मे अक्षिता ने उन दोनों से बाय कहा, रोहन ने एकांश को देखा जो अभी भी काफी गुस्से मे था और ऐसा लग रहा था के कभी भी फट पड़ेगा, अक्षिता और एकांश कार मे बैठे और कार घर की ओर चल पड़ी

अक्षिता को समझ नहीं आ रहा था कि वो एकांश को कैसे शांत करे, जो अभी भी गुस्से में अपनी मुट्ठियाँ भींचे हुए था, उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा जो स्टीयरिंग व्हील को कसकर पकड़े हुए था

अक्षिता की छुअन से एकांश का मन थोड़ा शांत होने लगा था, उसने उसकी ओर देखा जो चिंतित नजरों से उसे देख रही थी, उसने सोचा था के पार्टी के बाद अक्षिता को बढ़िया डिनर पर ले जाएगा, उसे सप्राइज़ करेगा लेकिन कुछ और ही हो गया था

एकांश ने अचानक कार की डिरेक्शिन चेंज की, पहले तो अक्षिता को कुछ समझ नहीं आया लेकिन उसने कोई सवाल नहीं किया और वो कहा जा रहे है ये सोच ही रही थी के तभी अचानक कार रुकी और एकांश नीचे उतार कर उसकी साइड आया और उसने उसके लिए दरवाजा खोला

"आइ एम सॉरी.... मुझे नहीं पता था कि तुम्हारे साथ ये सब होगा... मुझे केयरफूल रहना चाहिए था और किसी को भी तुम्हारे पास नहीं आने देना चाहिए था.... सॉरी अक्षिता....." एकांश ने कहा और तभी अक्षिता ने उसे कसकर गले लगा लिया, एकांश पहले तो हैरान हुआ लेकिन फिर उसने भी अपने आप को उस मोमेंट के हवाले कर दिया, उसका मन शांत होने लगा था,

"तो हम यहाँ क्या कर रहे हैं?" कुछ समय बाद उससे अलग होते हुए अक्षिता ने पूछा

"मुझे पता है कि तुमने वहाँ ज्यादा कुछ नहीं खाया इसीलिए कुछ खाने आए है" एकांश ने मुस्कुराते हुए कहा

एकांश को मुसकुराता देख की अक्षिता को राहत महसूस हुई

"यहाँ? लेकिन मुझे यहाँ कोई होटल नहीं दिख रहा है.." अक्षिता ने अपने चारों ओर देखते हुए कहा

"चलो मेरी साथ" एकांश ने अपनी कार लॉक करते हुए कहा और अक्षिता का हाथ पकड़ा और उसे लेकर थोड़ा आगे आया और अक्षिता का रिएक्शन देखने रुका

उस जगह को देख अक्षिता के चेहरे पर एक बड़ी सी स्माइल थी और उसने मुस्कुराते हुए पूछा

"मजाक तो नहीं कर रहे न?"

"नहीं..." एकांश ने भी वैसे ही मुसकुराते हुए कहा....

क्रमश:
 
अपडेट 43

एकांश अक्षिता को लेकर एक स्ट्रीट फूड मार्केट के पास आया था ताकि कुछ खा सके और वहा पहुच कर उसने अक्षिता को देखा तो उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, अपने सामने अलग अलग चाट की गाड़िया देख अक्षिता के मुह मे पानी आने लगा था, अपनी तबीयत के चलते उसे बाहर का कुछ भी यू खाने की इजाजत नहीं थी, इसीलिए एकांश का उसे वहा लाना उसके लिए फिलहाल तो एक बेहतरीन ट्रीट था

वही एकांश को भी अब ये एहसास हो गया था के उसे यहा नहीं आना चाहिए था, फ़्लो फ़्लो मे अक्षिता और अपना मूड ठीक करने कुछ थोड़ा खाने वो यहा आया था लेकिन यहा की गर्दी और खाने पीने का महोल अक्षिता और उसकी सेहत के लिए ठीक नहीं है इसका एहसास उसे हो गया था और वैसे ही उसने अक्षिता को वहा से चलने के लिए कह दिया था....

अक्षिता अभी चाट की एक रेडी की ओर बढ़ ही रही थी के एकांश ने उसका हाथ पकड़ा

"अक्षिता, चलो..." एकांश ने कहा

"हा हा चलो वहा से शुरुवात करते है" अक्षिता ने एक और इशारा करते हुए कहा, उसे एकांश के चलो का मतलब ही नहीं समझ आया था, वो तो कुछ बढ़िया खाने के लिए उत्सुक थी

"अक्षिता, यहा से चलो, किसी बढ़िया रेस्टोरेंट में खायेंगे" एकांश ने अपनी बात रखते हुए कहा ये जानते हुए के अक्षिता को अब यहा से ले जाना उसके लिए मुश्किल होने वाला था

"पर क्यों??? अभी अभी तो आए है यही से कुछ खा कर चलते है ना" अक्षिता ने कहा

"कही और बढ़िया जगह खा लेंगे पर यहा नही" एकांश ने कहा, उसे अब अक्षिता को यहा लाने का अफसोस हो रहा था साथ ही डर भी लग रहा था के यहा का खाना खा कर उसकी तबियत बिगड़ जाएगी वही अक्षिता जो तो उसकी मन पसंद चीज दिख रही थी तो वो तो अब वहा से हटने वाली नही थी

"अब चलो भी अक्षिता" एकांश ने वापिस नही

"यही कुछ खा लेते है ना, प्लीज" अक्षिता ने कहा

"नही"

"प्लीज प्लीज प्लीज"

"No!"

"तो फिर मुझे यहा लेकर ही क्यों आए थे" अब अक्षिता ने थोड़ा गुस्से में कहा

"गलती हो गई मुझसे, मैं भूल गया था के स्ट्रीट फूड ठीक नहीं है तुम्हारे लिए" एकांश ने कहा

"बकवास मत करो ठीक है, थोड़ा बहुत स्ट्रीट फूड खाने से कुछ नही होने वाला"

"अक्षिता, प्लीज, तुम्हे खुद की सेहत का ध्यान रखना चाहिए और वैसे भी ये सब खाना तुम्हारी सेहत के लिए ठीक नहीं है" एकांश ने अक्षिता को समझाते हुए कहा

"थोड़ा खाने से कुछ नही होने वाला, और अब तुम चाहे मानो या ना मानो मैं यहा से अपनी पसंद की चीजे खाए बगैर नही जा रही" अक्षिता ने कहा और अब एकांश के पास भी उसकी बात मानने के अलावा कोई रास्ता ही नही था

"ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी" एकांश ने कहा

"ओह हेलो मुझे वैसे भी मेरी पसंद का खाने के लिए तुम्हारी परमिशन नही चाहिए समझे ना"

"तो फिर ये प्लीज प्लीज किस बात का कह रही थी"

"वो तो मुझे लगा तुम सडा सा मुंह बना के कुछ नही खाओगे तो तुम्हे मेरे साथ खाने के लिए कह रही थी" अक्षिता ने कहा, उसे एकांश की आदत पता थी, वो अपनी डायट का ध्यान रखने वाला था और उनके रिलेशनशिप के दौरान भी उसने उसे कभी स्ट्रीट फूड खाते नही देखा था और आज भी वो नही खायेगा उसका अक्षिता को अंदाजा था

"अब चलो भी मुझे भूख लगी है" अक्षिता ने एकांश का हाथ पकड़ कर उसे अपने साथ ले जाते हुए कहा, एकांश भी कुछ नही बोला वो बस अक्षिता के साथ मिले इस पल को एंजॉय करना चाहता था...

अक्षिता अलग अलग चीजे खा रही थी और एकांश बस उसे खाते हुए देख रहा था, वो बस उस पल को इन्जॉय कर रहा था और इस पल मे अक्षिता को खुश करने के लिए उसे बचाने के लिए वो अपना सब कुछ कुर्बान करने को तयार था, अक्षिता को खो देने के खयाल से ही उसकी आँखों मे पानी आने लगा था और वो अक्षिता न देख ले इसीलिए उसने झट से अपने ईमोशनस् पर कंट्रोल करते हुए अपनी आंखे साफ की

अक्षिता ने वहा अपनी पसंद की सभी चीजे खाई थी और एकांश को भी खिलाई थी और पानी पूरी वाले के पास से हट कर वो एकांश के पास आई तो एकांश ने पूछा

"अब कहाँ?" एकांश ने पूछा

"I just want to sleep now" अक्षिता ने थोड़े थके हुए अंदाज मे कहा और एकांश भी उसे देख कर समझ गया के वो काफी थक गई थी और उसे दवाईया भी लेनी थी

"ठीक है तो फिर घर चलते है" एकांश ने कहा और वो दोनों उसकी कार की ओर बढ़ गए

"एकांश..."

"हम्म...."

"थैंक यू" अक्षिता ने मुस्कुराते हुए कहा

"अब ये क्यू?" एकांश ने चौक कर पूछा

"मुझे अपने साथ पार्टी में ले जाने के लिए, मेरे साथ स्ट्रीट फूड खाने के लिए और मेरे दिन को इतना खास बनाने के लिए" अक्षिता ने एकांश की आँखों मे देखते हुए कहा वही एकांश को समझ नहीं आ रहा था के इसपर क्या बोले

"अरे ठीक है यार, तुम्हें अच्छा लगा न बात खतम" एकांश ने मुस्कुराते हुए कहा

"इस दिन को यादगार बनाने के लिए थैंक्स, क्योंकि मैं अपनी आखिरी सांस तक इन यादों को अपने साथ रखूंगी" अक्षिता ने स्माइल के साथ कहा, जबकि एकांश की मुस्कान ये सुनकर गायब हो गई

"चलो चलते है" एकांश ने नीचे देखते हुए कहा और वो दोनों कार मे जाकर बैठे

अक्षिता सीट पर सिर टिकाकर बैठी थी और एकांश ने कार चला रहा था, उसके दिमाग में इस वक्त कई विचार चल रहे थे, उसे नहीं पता कि अक्षिता को कुछ हो गया तो वो क्या करेगा

अक्षिता खिड़की पर झुककर सो गई थी और एकांश चुपचाप गाड़ी चलाता रहा और बीच-बीच में उसे देखता रहा, वे घर पहुचने पर एकांश ने गाड़ी रोकी और जल्दी से नीचे उतरा और अक्षिता की साइड जाकर हल्के से दरवाजा खोला उसने बिना अक्षिता की नींद में खलल डाले उसे धीरे से अपनी बाहों में उठाया और उसे घर के अंदर ले आया

"ये सो गई?" सरिता जी ने दरवाज़ा खोलते हुए पूछा

"हाँ." एकांश ने धीमे से कहा और अक्षिता के कमरे की ओर बढ़ गया वही सरिता जी ने उसके लिए बेडरूम का दरवाजा खोला और एकांश ने आराम से अक्षिता को बेड पर सुला दिया और उसके माथे को चूमा

"उसनेन खाना खाया?" सरिता जी ने एकांश को देख पूछा

"हाँ" उसने अक्षिता की ओर देखते हुए कहा

"और तुमने?" सरिता जी ने एकांश के सर पर हाथ रखते हुए पूछा जो अक्षिता के पास बेड पर बैठा हुआ था, एकांश ने बस हा मे अपना सर हिला दिया

"क्या हुआ एकांश?" सरिता जी ने पूछा, जबकि एकांश अभी भी बस अक्षिता को ही देख रहा था

एकांश से कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था और आखिर मे वो बोला

"मुझे डर लग रहा है आंटी" एकांश ने एकदम धीमी आवाज मे कहा और सरिता जी बस उसे देखती रही

"मुझे डर है कि अगर मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, तो वो गायब हो जाएगी, मुझे डर है कि अगर मैं एक मिनट के लिए भी उसके साथ नहीं रहा, तो मैं उसे फिर कभी नहीं देख पाऊँगा, मुझे डर है कि अगर उसे कुछ हो गया तो...." एकांश का गला रुँध गया था उससे कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था, वो आगे कुछ बोलता तो शायद वही रो पड़ता

सरिता जी भी एकांश की इस उधेड़बुन को समझ रही थी, उसके मन मे मची उथल पुछल को भांप रही थी, एकांश भले ही ऊपर से अपने आप को मजबूत दिखने की कोशिश कर रहा था लेकिन अंदर ही अंदर अक्षिता को खोने के खयाल से हजार बार मर रहा था

सरिता जी को समझ नहीं आ रहा था के एकांश से क्या कहे, कैसे उसे सांत्वना दे क्योंकि वो खुद भी अपनी बेटी की जान के लिए डरी हुई थी इसलिए उन्होंने वही किया जो वो कर सकती थी

उन्होंने एकांश की पीठ सहलाते हुए उसे गले लगा लिया और जैसे ही एकांश ने सरिता जी के स्पर्श मे मा की ममता को महसूस किया उससे और नहीं रहा गया और वो उन्हे गले लगाये रो पड़ा

"तुम्हें अपने आप को संभालना होगा एकांश, चाहे जो हो जाए ऐसे टूटना नहीं है, वो भी यही चाहती है" सरिता जी ने एकांश को समझाते हुए कहा और एकांश ने भी हा मे गर्दन हिला दी

"आंटी, उसे जगाकर दवाई दे देना प्लीज" एकांश ने कहा और वहा जाने के लिए मुड़ा लेकिन फिर एक पल रुक कर उसने सऑटु हुई अक्षिता को देखा और मन ही कहा

"I will be strong for you and let nothing happen to you"

क्रमश:
 
अपडेट 44

"अंश..."

"अंश..."

"अंश...!"

अक्षिता बार बार एकांश को पुकार रही थी लेकिन वो कही नहीं था

एकांश को वहा ना पाकर अक्षिता घबरा गई और उसे ढूँढ़ते हुए ऊपर की ओर भागी, उसने उसके कमरे में जाकर उसे देखा लेकिन कमरा खाली था...

कमरा खाली था जैसे वहाँ कोई रहता ही न हो, अक्षिता ने अलमारी खोल कर देखि लेकिन वो भी खाली थी..

वो हांफ रही थी और उसका चेहरा पसीने से पूरी तरह भीगा हुआ था, ऐसा लग रहा था जैसे उसे पैनिक अटैक आ गया हो, उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके आस-पास की दीवारें उसे निगल रही हों...

अक्षिता को अब सास लेने मे भी मुश्किल हो रही थी, वो सास नहीं ले पा रही थी और धीरे-धीरे वो उसके कमरे से बाहर चली आई, वो अपनी छाती पर हाथ रखे बैल्कनी से देख रही थी

आँखों मे भरे आँसुओं की वजह से उसे साफ दिखाई नहीं दे रहा था और जब उसे साफ साफ दिखने लगा तब उसने एकांश को देखा

उसने देखा कि उसका एकांश उससे दूर जा रहा है, उसके घर से दूर, उसकी जिंदगी से दूर, अपना सामान हाथ में लिए हुए...

वो अब जोर जोर से उसका नाम पुकारने लगी थी..

एकांश रुका और उसने मूड कर अक्षिता की ओर देखा, वो उसे साफ साफ नहीं देख पा रही थी, आँसुओ की वजह से उसकी दृष्टि धुंधली हो गई थी

उसने एकांश अपनी ओर हाथ हिलाते हुए देखा और वो अगले ही पल उसकी नज़रों से ओझल हो गया...


"अंश...!"

अक्षिता चिल्ला उठी

"अक्षिता!" अक्षिता की चीख सुन सरिता जी उसके कमरे मे आ गई थी और वहा आकार उन्होंने देखा के अक्षिता रो रही है...

"अक्षिता, अक्षिता...... क्या हुआ बेटा?" सरिताजी ने चिंतित होकर पूछा

सरिता जी ने अक्षिता का चेहरा अपने हाथों मे थामा हुआ था और उसे शांत करा रही थी

"क्या हुआ अक्षु? तुम क्यों रो रही हो?" सरिताजी ने धीरे से पूछा

"माँ... माँ... एकांश ..." बोलते हुए अक्षिता वापिस रो पड़ी

"एकांश.... क्या?"

"एकांश मुझे छोड़कर चला गया" ये कहते हुए अक्षिता ने अपनी माँ को कसकर गले लगाया और वापिस रोने लगी...

"तुम क्या कह रही हो?"

"एकांश मुझे छोड़ कर चला गया... वो मुझसे नफरत करता है माँ.... वो मुझसे नफरत करता है..." अक्षिता पागलों की तरह बस रोए जा रही थी...

सरिताजी ने अक्षिता को कसकर गले लगाया और उसकी पीठ सहलाने लगी और जब उसका रोना बंद हो गया तो वो उसकी पीठ थपथपाने लगी और उन्होंने उसे अपनी गोद में सुला लिया और उसके बालों को धीरे से सहलाना शुरू किया

सरिताजी भी अपनी बेटी की हालत देखकर चुपचाप रो रही थी, वो भी अक्षिता के लिए काफी चिंतित थी..... अक्षिता को बुरे सपने वापिस आने लगे थे और आज ऐसा बहुत समय बाद हुआ था, उसे वापिस एक बुरा सपना आया था और काफी समय बाद सरिताजी ने अक्षिता को उस तरह रोते हुए देखा था

उन्होंने समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे, उन्होंने सोचा के एकांश को इस सब के बारे मे बताना ही बेहतर होगा, शायद वो डॉक्टर से इस बारे में बात करेगा...

उन्होंने अक्षिता को बेड पर सुला दिया और उसका माथा चूमते हुए बाहर चली गई और सीधा एकांश के कमरे की को गई जिसका दरवाजा खुला था, वो अंदर आयो तो उन्होंने देखा के वो कमरा खाली था

उन्होंने सोचा के शायद एकांश अभी टक काम से लौटा नहीं था और यही सोचते हुए वो वापिस नीचे चली आई...

अक्षिता के शब्द उनके कानों में गूंज रहे थे

एकांश मुझे छोड़ कर चला गया... वो मुझसे नफरत करता है...

उन्होंने एकांश के मोबाइल पर फोन करने की कोशिश की लेकिन उसका फोन भी बंद था और अब सरिताजी ये सोचकर घबरा रही थी के काही अक्षिता की बात, जो उसने कहा वो सच तो नहीं था

"क्या वो सचमुच चला गया?"

और यही सब सोचते हुए उनकी आँखों मे भी आँसू आ गए थे और तभी गेट खुलने की आवाज आई और उन्होंने गेट की चरमराहट की आवाज की ओर देखा...

एकांश थका हुआ था और थका हुआ सा ही घर में दाखिल हुआ... सरिताजी ने उसे देखकर राहत की साँस ली और अब वो खुश थी कि एकांश वही था

वही एकांश ने चिंतित सरिताजी को देखा तो पूछा

"आंटी, क्या हुआ?" एकांश ने सरिताजी को कंधे से हिलाते हुए पूछा

सरिताजी ने एकांश का हाथ पकड़ लिया और अपना माथा उसके हाथ पर रख कर रोने लगी.. एकांश को समझ नहीं आ रहा था के सरिताजी यू रो क्यू रही है और तबही उसका ध्यान तुरंत अक्षिता पर चला गया और वो इस डर से काँप उठा कि कहीं अक्षिता को कुछ हो न गया हो

"आंटी, क्या हुआ? आप रो क्यू रही है? अक्षिता ठीक है न?" एकांश ने हकलाते हुए पूछा...

सरिताजी ने एकांश की ओर देखा और उनका आँसुओ से भीगा चेहरा देख एकांश का दिल डूब रहा था, उसने सरिताजी को हमेशा एक स्ट्रॉंग महिला के तौर पर देखा था, वही थी जिन्होंने उसे उस वक्त सपोर्ट किया था जब वो अपनी उम्मीद खोए जा रहा था, वो इस घर मे हर पल उसके साथ थी और अब उन्हे यू टूटते देख एकांश को यकीन हो गया था के हो ना हो अक्षिता को कुछ हुआ है वो ठीक नहीं है और बस इसी खयाल से उसका दिल बैठा जा रहा

"उसे वापिस बुरे सपने आ रहे हैं और उसे लगभग एक पैनिक अटैक आया था" सरिताजी ने खुदको शांत करने के बाद कहा

"क्या? क्यों?" एकांश ने पूछा

"मुझे नहीं पता... वो अचानक नींद से उठकर तुम्हारा नाम चिल्लाने लगी और जब मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ, तो वह पागलों की तरह ये कहने लगी कि तुमने उसे छोड़ दिया है और तुम उससे नफरत करते हो...." सरिताजी ने एकांश को देखते हुए वहा वही वो बस चुपचाप उनकी बात सुन रहा था

"मैं उसे क्यों छोड़ कर जाऊंगा? और मैं उससे नफरत क्यों करूँगा?" एकांश ने थोड़ा चौक कर पूछा

"शायद उसे यही बुरा सपना आया था कि तुम उसे छोड़कर चले गए हो..." सरिताजी ने कहा

एकांश कुछ नहीं बोला

"आंटी, आप प्लीज रोइए मत... प्लीज बी स्ट्रॉंग, मैं कही नहीं जाने वाला और उसे कुछ नहीं होगा..." एकांश ने सरिताजी को सांत्वना देते हुए कहा लेकिन अंदर ही अंदर वो भी डरा हुआ ही था

"एकांश, तुम समझ नहीं रहे हो... आज बहुत समय बाद ऐसा हुआ आई के उसे बुरे सपने आए है और मैंने उसे इस तरह रोते हुए देखा है और अब मुझे डर है के ये शायद उसकी बिगड़ती सेहत का ही असर" सरिताजी ने सोफ़े कर धम्म से बैठते हुए कहा वही एकांश अपने मन में अनेक विचार लिए चुपचाप खड़ा रहा...

"क्या हुआ?" उन दोनों ने एक आवाज़ सुनी और मुड़कर देखा तो वहा अक्षिता के पिता खड़े थे जिनके चेहरे पर डर का भाव था

सरिताजी उन्हे बताने लगी के क्या हुआ था, जबकि एकांश धीरे-धीरे अक्षिता के कमरे की ओर गया... उसने दरवाज़ा खोला और अक्षिता को सोते हुए देखा...

वो अंदर गया और उसके बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठ गया.. उसने उसके चेहरे को देखा जिससे साफ पता चल रहा था कि वह बहुत रोई थी, एकांश ने अपने आंसू पोंछे और उसके माथे को चूमकर वो वापस लिविंग रूम में आया और उसने अक्षिता के पिता का चिंतित चेहरा देखा

"मैं डॉक्टर से बात करता हु" एकांश ने कहा और इससे पहले कि वो लोग उसकी आंखों में आंसू देख पाते, वो वहां से चला गया

******

अक्षिता अपनी नींद से उठी और दीवार पर टंगी एकांश की तस्वीरे देखने लगी, वो उसके मुस्कुराते चेहरे को देखकर मुस्कुराई और फिर अचानक पिछली रात का सपना उसकी आँखों के सामने घूम गया...

वो अपने कमरे से निकलकर भागकर ऊपर गई और उसने एकांश के कमरे का दरवाजा खोला

"एकांश..." उसने उसे पुकारा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला

कोई जवाब न सुन अक्षिता थोड़ा डर गई और घबराकर चारों ओर देखने लगी...

"अक्षिता?" अक्षिता ने एकांश की आवाज़ सुनी और अपना सिर बाथरूम की ओर घुमाया

वो वहीं खड़ा कन्फ़्युशन मे उसे देखता रहा

"अंश!"

अक्षिता ने जैसे ही एकांश को देखा जो भाग कर उसके पास गई और उसे उसे कस कर गले लगा लिया, वो डर से थोड़ा कांप रही थी और एकांश उसकी पीठ सहलाने लगा

"मैं यहीं हूँ अक्षिता.... शांत हो जाओ" एकांश यही शब्द तब तक दोहराता रहा जब तक वो शांत नहीं हो गई

"अब बताओ क्या हुआ?" एकांश ने पूछा और अक्षिता ने कुछ ना कहते हुए अपना सर ना मे हिला दिया

"यू वॉन्ट टू से सम्थिंग?" एकांश ने वापिस से पूछा

"कुछ नहीं" अक्षिता ने कहा और जाने के लिए मुड़ गई

"अक्षिता, अगर कोई बात है तो प्लीज बताओ मुझे" एकांश ने हताश स्वर मे कहा और अक्षिता जाते जाते रुक गई

"मैं अब ये लुका-छिपी का खेल और नहीं खेल सकता" एकांश ने गंभीरता से कहा और अक्षिता उसकी ओर देखने के लिए मुड़ी

“मैं चाहता हु तुम अपने खयाल अपनी फीलिंग सब मुझे बताओ, तुम मुझे बताओ के तुम क्यू परेशान हो मैं जानना चाहता हु के तुम क्यूँ घबरा रही हो क्या वजह है के रो रही हो” एकांश ने कहा

अक्षिता कुछ नहीं बोली बस चुपचाप खडी रही

वो उसे बताना चाहती थी कि वह उससे प्यार करती है

वो उसे बताना चाहती थी कि वही उसकी पूरी दुनिया है

वो उसे बताना चाहती थी कि वो मर रही है

वो उसे बताना चाहती थी कि वो अपनी जान से ज्यादा उसकी जान के लिए डरी हुई है

वो उसे बताना चाहती थी कि वो चाहती है कि वो आखिरी सांस तक उसके साथ रहे

वो उसे बताना चाहती थी कि उसके अंदर एक बड़ा डर पैदा हो गया है, उसके उसे छोड़ कर चले जाने का डर

वो उसे बताना चाहती थी कि उसे महसूस हो रहा है कि उसका जाने का टाइम नजदीक आ रहा है

वो अपने मन में चल रहे सभी खयालों के साथ उसे गौर से देख रही थी और उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे

लेकिन वो एक शब्द भी नहीं बोल पाई

वो दोनों एक दूसरे को देख रहे थे, उनके चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था और वे एक दूसरे के दिल की धड़कनें साफ साफ सुन सकते थे

एकांश का फ़ोन बजने से उसकी तंद्रा टूटी और एकांश ने फ़ोन उठाया वही अक्षिता मुड़ी और भारी मन से उसके कमरे से बाहर चली गई

"काश मैं कह पाती कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ"

अक्षिता ने अपने आप से कहा और अपने आँसू पोंछते हुए घर में चली गई

******

"डॉ. अवस्थी, मुझे नहीं पता कि आप क्या करेंगे और कैसे करेंगे, लेकिन वो डॉक्टरस् जल्द से जल्द यहा आ जाने चाहिए उनसे कहिए कि वो जितना पैसा चाहें, हम देने को तैयार हैं"

"यदि उनके लिए जर्मनी से यहां आना पॉसिबल नहीं है तो इन्फॉर्म देम के हम जर्मनी आ रहे है"

"मुझे पता है कि ये आसान नहीं है लेकिन हमारे पास ज़्यादा समय नहीं बचा है, वो बहुत अलग बिहैव कर रही है और मैं उसे खोना नहीं चाहता"

"ठीक है, प्लीज ट्राइ टु अरेंज सम्थिंग, मैं कुछ भी बड़ा हादसा होने से पहले उसे बचाना चाहता हूँ"

और एकांश ने फोन काट दिया और नीचे चला गया

"आंटी, मुझे कुछ जरूरी काम है, मैं कुछ देर के लिए बाहर जा रहा हूँ इसलिए आप मेरा इंतजार मत करना" एकांश ने सरिताजी को बताया और अक्षिता की तरफ देखा जो उसे ऐसे देख रही थी जैसे वो हमेशा के लिए कही जा रहा हो

एकांश ने सरिताजी से कुछ कहा और उन्होंने सिर हिलाकर एकांश की बात पर अपनी सहमति जताई और वो बाहर आया और अपनी कार में बैठकर चला गया...

"अक्षिता आओ, चलें" सरिताजी ने कहा

"कहाँ?"

"डॉक्टर साहब से मिलने, मैंने तुम्हारे लिए अपॉइंटमेंट ले लिया है" सरिताजी ने अपना पर्स लेते हुए कहा

" लेकिन......"

"कोई लेकिन नहीं... मैं तुम्हारी हेल्थ के बारे में डॉक्टर से बात करना चाहती हूँ" सरिताजी ने कहा और अक्षिता ने भी उनकी बात मान ली

अस्पताल जाने के बाद अक्षिता पर कई तरह के टेस्ट किए गए और उन्हें रिपोर्ट आने तक का इंतज़ार करना पड़ा, जिसमे कई घंटों का समझ लग गया

जब टेस्टस् चल रहे थे एकांश भी अस्पताल में ही था

टेस्टस् हो जाने के बाद अक्षिता और सरिताजी घर वापस आ गईं थी जबकि एकांश अस्पताल में रुक कर डॉक्टर से बात कर रहा था

वो कुछ विदेशी डॉक्टरों को भारत लाने की कोशिश कर रहे थे जो ऐसे मामलों के स्पेशलिस्ट थे, एकांश ने अपने और अपने पिता के कोंटकट्स का भी इस्टमाल किया लेकिन उन डॉक्टरस् के लिए पैशन्टस् और सर्जरी की लाइन लगी हुई थी और उनके पास बस एक पैशन्ट के लिए भारत आना पॉसिबल नहीं था

एकांश को समझ नहीं आ रहा था के क्या करे, वो काफी ज्यादा टेंशन मे था, वो कीसी भी कीमत पर अक्षिता को बचाना चाहता था और अब उसे समझ नहीं आ रहा था के उसे बचाने के लिए क्या करे....

क्रमश:
 
अपडेट 45

"व्हाट द हेल? हमे उनका अपॉइन्ट्मन्ट नहीं मिला से क्या मतलब है तुम्हारा?" एकांश फोन पर बात करते हुए चिल्लाया

“सॉरी सर, लेकिन हमने हमारी ओर से पूरी कोशिश की थी" दूसरी ओर से बात करते व्यक्ति ने डरते हुए कहा

"मुझे नहीं पता तुम क्या करोगे और कैसे करोगे.... मुझे जल्द से जल्द उनका अपॉइन्ट्मन्ट चाहिए..... मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है....." एकांश ने फोन पर चिल्लाते हुए कहा और फोन काट दिया

अभी एकांश ने फोन काटा ही था के उसका फोन वापिस बज उठा और उसने देखा कि उसके पिता का फोन था और एकांश अभी उनसे बात नहीं करना चाहता था, असल में वो अभी किसी से भी बात नहीं करना चाहता

******

अक्षिता ने अपने सामने बैठे बंदे को देखा जो अपने सिर को हाथों में पकड़े हुए बिस्तर पर बैठा था और लगातार बज रहे अपने फोन को देख रहा था

उसने कल भी डाइनिंग टेबल पर देखा था जब एकांश ने किसी की कॉल को इग्नोर कर दिया था

अक्षिता ने एकांश को इतना चिंतित कभी नहीं देखा था

वो धीरे से उसके कमरे में गई और उसके फोन की तरफ देखा जो फिर से बज रहा था, एकांश की मा उसे बार बार कॉल कर रही थी और वो फोन नहीं उठा रहा था

"क्या हुआ?" अक्षिता ने धीरे से पूछा

एकांश अक्षिता की आवाज़ सुनकर चौका और उसने ऊपर देखा जहा अक्षिता खडी थी

"कुछ नहीं"

"एकांश, तुम बहुत परेशान लग रहे हो.... क्या हुआ है बताओगे?"

"कुछ नहीं हुआ है" एकांश ने अपना फोन बंद करते हुए कहा

"तुम अपनी माँ का फोन क्यों नहीं उठाते?"

एकांश ने अक्षिता की ओर देखा जो उसके जवाब की राह देख रही थी लेकिन वो कुछ नहीं बोला

"मैंने तुमसे कुछ पूछा है एकांश" अक्षिता ने सीरीअस टोन मे कहा

"तुम्हारा इससे कुछ लेना देना नहीं है" एकांश ने कहा और वहा से जाने लगा लेकिन अक्षिता के शब्दों ने उसे रोक दिया

"अपनी मॉम को यू इग्नोर मत करो.... माना तुम उनसे नाराज हो या उनसे बात नहीं करना चाहते लेकिन उन्हे यू इग्नोर मत... हम नहीं जानते के हमारी जिंदगी मे आगे क्या होने वाला है... लाइफ इस अनप्रीडिक्टबल... ऐसा ना हो के आगे इस नाराजी पर पछताना पड़े और फिर माफी मांगने मे बहुत देर हो जाएगी, मुझे नहीं पता के क्या बात है लेकिन प्लीज उनसे बात करो और इसे सॉर्ट करो" अक्षिता ने कहा और अपने आँसू रोकते हुए वहाँ से चली गई

एकांश भी अक्षिता की कही बातों के बारे मे सोचने लगा था, उसकी बात एकदम सच थी, बाद मे पछताने से क्या ही होगा था और ये उसने अक्षिता के मामले मे पहले ही इक्स्पीरीअन्स किया था और अब वो ऐसा कोई रिस्क नहीं चाहता था, हालांकि वो अपनी मा की बात को भुला नहीं था वो आज भी अक्षिता की बीमारी उससे छिपाने को लेकर उनसे नाराज था लेकिन फिर अब एकांश ने उनसे बात करने इस मामले को सुलझाने का सोचा

वो तुरंत रेडी होकर अपने पेरेंट्स के घर की ओर निकल गया, एकांश को घर मे देख वो दोनों काफी खुश हुए और उसके पिता ने उसे गले लगा लिया वही उसकी मा उसके सामने आने से थोड़ा झिझक रही थी लेकिन फिर भी उन्होंने उसे गले लगा लिया

एकांश ने बहुत दिनों बाद अपनी मा के उस ममतामई स्पर्श को महसूस किया था उसने भी अपनी मा को गले लगाया जिससे वो भी थोड़ी खुश हो गई

"एकांश, बेटा कैसे हो तुम?" एकांश की मा ने एकांश के गाल को सहलाते हुए पूछा

"ठीक हूं" एकांश ने धीरे से कहा

"तुम हमारी कॉल का जवाब क्यों नहीं दे रहे थे?" सीनियर रघुवंशी ने पूछा

"मैं बिजी था" एकांश ने अपने पिता से नजरे चुराते हुए कहा

"और तुम यहाँ क्यों आये हो?" एकांश के पिता ने आगे का सवाल किया

"यह घर है उसका... वह यहा कभी भी आ सकता है" एकांश की मा ने उसके पिता के सवाल का जवाब देते हुए कहा

"अरे सॉरी.... मुझे तो ये पूछना चाहिए था कि तुम्हें यहाँ किसने भेजा है?" एकांश के पिता ने मुस्कुराते हुए उससे पूछा

अब इसपर क्या बोले एकांश को समझ नहीं आ रहा था वो इधर उधर देखने लगा वही उसकी मा भी अपने पति के बोलने का मतलब समझ गई थी वो जान गई थी के एकांश को वापिस घर आने के लिए एक ही इंसान मना सकता था

"अब आप चुप रहो और मुझे मेरे बेटे से बात करने दो?" साधनाजी (एकांश की मा) ने मुकेशजी (एकांश के पिता) को चुप कराते हुए कहा जिसपर एकांश मुस्कुरा उठा

"अक्षिता कैसी है?" साधना जी ने चिंतित होकर पूछा और इस सवाल पर एकांश थोड़ा चौका

हालांकि वो जानता था कि उनलोगों को पहले से ही उसके ठिकाने के बारे में अंदाजा था, लेकिन उसने यह उम्मीद नहीं की थी कि उन्हें पता चल जाएगा कि वो अक्षिता के साथ था

"ठीक है......" एकांश ने हताश स्वर मे कहा

"सब ठीक है बेटे?" मुकेश जी ने भी चिंतित स्वर मे पूछा

"अभी तो ठीक ही है डैड.... लेकिन कभी भी कुछ भी हो सकता है" एकांश ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा

"हम उसके इलाज के लिए सबसे बढ़िया डॉक्टरों से कन्सल्ट करेंगे बेटा.... तुम चिंता मत करो" मुकेश जी ने मुस्कुराते हुए एकांश को आश्वासन दिया

"दरअसल, जर्मनी में एक डॉक्टर है जो ऐसे मामलों का स्पेशलिस्ट है, मैंने उसे अक्षिता के मामले की जांच करने के लिए भारत आने के लिए राजी करने की कोशिश की, लेकिन वो बस एक पैशन्ट के लिए आने के लिए राजी नहीं हो रहा, कह रहा है जर्मनी मे कई पैशन्टस् को छोड़ना पड़ेगा" एकांश ने उदास होकर कहा

"तो फिर अब क्या करने का सोचा है?"

"मैं जर्मनी जाकर अपनी रिपोर्ट्स उसे दिखाने, उसकी सलाह लेने और उसे मनाने की सोच रहा हूँ" एकांश ने कहा

"ये ठीक रहेगा” साधना जी ने कहा

"हमें उसे ठीक करने के लिए हर कोशिश करके देखनी चाहिए" साधना जी ने एकांश को देखते हुए कहा और फ़र मुकेश जी की ओर मुड़ी

"आपका एक कोई दोस्त जर्मनी में है ना जिसकी फेमस होटल चैन है?" साधनाजी ने पूछा

"हाँ...."

"तो फिर उससे कहो कि वो एकांश की डॉक्टर से मिलने में मदद करे और डॉक्टर को भारत आने के लिए राजी भी करे" साधना जी ने सलाह दी और उनकी बात सुन एकांश और मुकेश जी ने भी इसमे हामी भारी क्युकी ये उपाय सही मे कारगर साबित हो सकता था और वो डॉक्टर भारत आने के लिए राजी हो सकता था

"मैं उसे अभी कान्टैक्ट करता हु" और मुकेश जी अपने जर्मनी वाले दोस्त को फोन करने चले गए वही साधना जी एकांश की ओर मुड़ी हो नाम आँखों से उन्हे देख रहा था

"एकांश?"

एकांश से और नहीं रुका जा रहा था और उसने कस कर अपनी मा को गले लगा लिया

एकांश के इस रिएक्शन से साधनाजी थोड़ा चौकी, लेकिन वो खुश थी, उनका बेटा उनके पास था और जब उन्होंने उसे रोते सुना तो वो उसे चुप कराने लगी, उन्होंने एकांश को रोने देना ही बेहतर समझा, वो एकांश की पीठ सहला रही थी वो जानती थी के एकांश अपने अंदर बहुत कुछ दबाए था जिसका बाहर निकालना जरूरी था

"मॉम, मुझे बहुत डर लग रहा है" एकांश ने धीमे से कहा वही साधना जी चुप चाप उसकी बात सुनती रही

"मुझे डर लग रहा है कि उसे कुछ हो न जाए, अगर मैं उसे नहीं बचा पाया तो मैं जी नहीं पाऊंगा मॉम...... मैं जी नहीं पाऊंगा......" एकांश ने रोते हुए कहा, साधना जी की भी आंखे नम थी

इतने दिनों से एकांश के अंदर दबे सभी ईमोशनस् बाहर आ रहे थे

"शशश...... उसे कुछ नहीं होगा बेटे, वो बहुत अच्छी लड़की है..... उसके लिए तुम्हारा प्यार और उसे बचाने की तुम्हारी इच्छाशक्ति जरूर उसकी जान बचाएगी, जब तक तुम उसके साथ हो उसे कुछ नहीं होगा और मुझे अपने बेटे पर भरोसा है कि वो अपने प्यार को कुछ नहीं होने देगा" उन्होंने एकांश के चेहरे से आँसू साफ करते हुए कहा

"यू नीड़ टु बी स्ट्रॉंग बच्चा, तुम्हें अक्षिता के लिए स्ट्रॉंग रहना होन" साधना जी ने एकांश का मठ चूमते हुए कहा

"आइ मिसड् यू मॉम" एकांश ने अपना सर अपनी मा की गोद मे टिकाते हुए कहा और साधना जी की आँखों से भी आँसू बह निकले, उन्हे नहीं पता के वो क्यू रो रही थी, ये आँसू खुशी के थे या गम के, उन्हे समझ नहीं आ रहा था के बेटा वापिस मिल गया इसपर खुश हो या आने वाले भविष्य मे बेटे को मिलने वाले दर्द के लिए दुखी

"आइ मिसड् यू टू बेटा" उन्होंने एकांश की पीठ थपथपाते हुए कहा और वो उनकी गोद में एक बच्चे की तरह सो गया

मुकेश जी अपनी पत्नी और बेटे के बीच के इस पूरे सीन को देख रहे थे, उनकी आँखों में भी आँसू थे, उन्हें खुशी थी कि आखिरकार उन्हें उनका बेटा वापस मिल गया था , लेकिन आने वाले समय मे क्या होगा ये सोचकर उनका मन भी डर रहा था... वो जानते थे के उनका बीटा उस राह पर था जहा उसका दिल टूटने के चांस बहुत ज्यादा थे और यही सोच उनका दिल बैठा जा रहा था...

******

एकांश जब घर में आया और उसने चारो ओर देखा तो घर में एकदम शांति थी, चारो ओर सन्नाटा था और घर एकदम खाली था

"एकांश ?"

आवाज सुनकर एकांश मुडा तो उसने देखा के अक्षिता के पिता वहा खड़े थे

"तुम्हें कुछ चाहिए?" उन्होंने पूछा

"आंटी कहाँ हैं?"

"वो पड़ोस में गई है वहा कुछ प्रोग्राम है तो, अभी आजाएगी" अक्षिता के पिता ने जूते पहनते हुए कहा

"आप कहाँ जा रहे हो?" एकांश ने उनसे पूछा

"मैं अपने दोस्त से मिलने जा रहा हूँ, अपनी आंटी से कहना कि मेरा इंतज़ार न करें..... मुझे देर हो जाएगी" अंकल में कहा

"ओके अंकल"

"अपना और अक्षिता का ख्याल रखना" अंकल ने कहा और वहा से चले गए

अब एकांश वहा अक्षिता को ढूंढने लगा लेकिन वो घर में थी थी नही

" अक्षिता ? " एकांश ने उसे पुकारा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला

वो अक्षिता के कमरे की ओर गया और और दरवाजे पर नॉक किया लेकिन हालत वही रही कोई जवाब नही जिसके बाद एकांश ने दरवाज़ा खोला और अंदर कमरे में देखा तो कमरा खाली था, वो रूम वापिस बंद करके ऊपर अपने अपने की ओर बढ़ गया

एकांश अक्षिता के बारे में सोचते हुए अपने कमरे की और बढ़ गया और जैसे ही उसने दरवाजा खोला और अपने कमरे में आया तो वो थोड़ा चौका और जहा था वही खड़ा रह जहा

अक्षिता उसके बेड पर उसकी शर्ट को सीने से चिपकाए सो रही थी, अक्षिता को वहा यू देख एकांश के मन में क्या इमोशंस आ रहे थे वो बताना मुश्किल था, वो धीरे-धीरे उसके पास गया और बेड के पास घुटनों के बल बैठ गया

उसने अक्षिता के चेहरे पर आए बाल हटाए और उसके शांत चेहरे को देखा, फिर अपनी शर्ट को देखा जो उसके शरीर से चिपकी हुई थी, उसे अपनी उस शर्ट से जलन हो रही थी क्योंकि उसे लग रहा था के काश उस शर्ट की जगह वो खुद होता

उसे उस चीज से जलन हो रही थी जो बेजान थी और उसकी अपनी थी

अपने ही ख्यालों पर एकांश को हसी आ गई और वो फ्रेश हो e बाथरूम की ओर चला गया, फिर बाहर आकर टेबल पर बैठ कुछ फाइल्स देखने लगा, वैसे तो एकांश अपना काम कर रहा था लेकिन दिमाग में ये बात भी चल रही थी के अक्षिता को बचाने के लिए क्या किया जा सकता है, क्यों अक्षिता को इतने दर्द का सामना करना पड़ रहा है

उसने तो कभी किसी के साथ कुछ गलत नहीं किया था

वो तो सपने में भी किसी को नुकसान पहुंचाने के बारे में नहीं सोच सकती थी

तो फिर इतना सब क्यूं

एकांश ने अपने कमरे में रखी भगवान की मूर्ति की ओर देखा जो सरिताजी ने वहा एक एक शेल्फ में रखी थी

एकांश अभी अपने ख्यालों में ही खोया था के तभी उसके डैड का फोन आया और उसने फोन उठाया

उसके डैड ने बताया कि उन्हें जर्मनी में डॉक्टर से अपॉइंटमेंट मिल गया है और एकांश को एक हफ्ते में जर्मनी के लिए रवाना होना था

एकांश अपने डैड की बात सुन काफी खुश हुआ, अक्षिता को बचाने को वो ये पहला कदम था जी सफल हुआ था, उसने अपने डैड को थैंक्स कहा और फोन रखा

एकांश ने एक नजर बेड पर सोती अक्षिता को देखा और सोचा के अब सबसे मुश्किल काम अक्षिता को मनाना है, उसके नही पता था के उसके जाने की बात पर अक्षिता किस तरह रिएक्ट करेगी क्युकी आजकल वो ये सोचकर भी घबरा जाती थी के एकांश उसे छोड़कर चला जायेगा

एकांश अपने कमरे से बाहर आया और अपने दोस्तों को फोन करके ये खबर सुनाई और अक्षिता के बारे में अपनी चिंता भी जाहिर की, डॉक्टर के अपॉइंटमेंट की बात सुन सभी खुश हुए और उससे वादा किया कि वो उसके वहा ना रहने पर अक्षिता के साथ रहेंगे उसका खयाल रखेंगे

एकांश ने अब एक राहत की सास की और वापिस अंदर जाकर।देखा तो अक्षिता नींद में करवाते बदल रही थी, वो चुपचाप जाकर खुर्ची पर बैठ गया और लैपटॉप पर काम करने लगा क्योंकि अब उसे एक हफ़्ते में अपना सारा काम पूरा करना था

"एकांश ?"

एकांश ने अक्षिता को अपना नाम पुकारते सुना तो उसने उसकी तरफ देखा जो बेड पर बैठी थी और आधी बंद आंखो से उसे देख रही थी और काफी प्यारी लग रही थी

"अंश?" अक्षिता ने उसे थोड़ा जोर से पुकारा और एकांश अपने ख्यालों से बाहर आया

" हाँ"

"तुम कब आये?" अक्षिता ने अपनी आँखें मलते हुए पूछा

"मुझे घर आये एक घंटा हो गया है"

"तो तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं?"

"अब तुम मेरी शर्ट को पकड़ कर शांति से सो रही थी तो मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था" एकांश ने कहा जिसपर अक्षिता थोड़ा शर्मासी गई, उसे पता ही नही चला था के कब वो उसकी शर्ट को पकड़ कर से गई थी

"तुम कहाँ थे?" अक्षिता ने बेड से उठते हुए बात बदलते हुए पूछा

"मैं घर चला गया था" एकांश ने लैपटॉप की ओर मुड़ते हुए कहा

"तुमने अपने मॉम डैड से बात की?" अक्षिता ने पूछा

"हाँ" एकांश ने कहा और अक्षिता ने मुस्कुराते हुए उसे देखा

और एकांश उसे इस तरह मुस्कुराते हुए देखने के लिए कुछ भी कर सकता था

"गुड बॉय" अक्षिता ने एकांश के बालों को सहलाते हुए कहा

"ओय! आई एम नॉट ए बॉय, आई एम ए मैन..... एक्चुअली a हॉट एंड हैंडसम मैन" एकांश ने कहा

अक्षिता एकांश की बात सुन दबी आवाज में उसे सेल्फ ऑबसेड लेकिन एकांश ने सुन लिया

"तुमने कुछ कहा?" एकांश ने उसके पास जाकर पूछा

"नही... कुछ नहीं" अक्षिता ने पीछे हटते हुए कहा

"सेल्फ ऑबसेस्ड, और क्या?" एकांश ने पूछा और अक्षिता हंसते हुए वहा से भाग ली और एकांश उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ा

वो दोनों हँसते हुए कमरे में इधर उधर भाग रहे थे और आखिर में एकांश ने उसे पकड़ लिया और वो उसे गुदगुदी करने लगा और वो जोर-जोर से हंसने लगी।l

"अंश रुको!" अक्षिता ने हंसते हुए कहा

एकांश ने उसकी कमर को पीछे से पकड़ कर उसे हवा में उठा लिया और जब उसने उसे वैसे ही घूमने लगा और वो जोर से हंसने लगी

कुछ देर बाद एकांश ने अक्षिता को नीचे उतारा, दोनो ही हाफ रहे थे और एकदूसरे को देख हस रहे थे

सरिताजी भी अब तक घर आ चुकी थी और उन्हें ढूँढते हुए ऊपर आई थी और उनकी हरकतें देखकर वहीं खड़ी रह गई थी

एकांश और अक्षिता को वैसे एकदूसरे के साथ देख उनकी आंखे भर आई थी

बहुत दिनों बाद उन दोनों को ऐसे देखकर सरिताजी को खुशी और उम्मीद की किरण दिख रही थी, उन्होंने आसमान की तरफ देखा और हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना की कि वे दोनों हमेशा ऐसे ही खुश रहें और साथ रहें...

क्रमश:
 
मैं आपके इस रिव्यु में कही गयी बात से एग्री करता हु, मैंने कहानी का फोकस hi ज्यादातर दो मुख्या किरदारों पर रखा है लेकिन अक्षिता और एकांश के पेरेंट्स का भी रोले इसमें उतना hi एहम है, यस जितना एकांश अक्षिता को लेके चिंतित है उससे कई ज्यादा शायद अक्षिता के माँ पापा को फील हो रहा होगा और ये बियॉन्ड इमेजिनेशन है, एकांश के इसमें इन्वॉल्व होने से उसके भी पेरेंट्स इसमें उलझे हुए hi है

करेक्ट कहा है आपने, अक्षिता की जिंदगी के साथ 5 जिन्दगिया जुडी है

थैंक यू फॉर थिस अवेसमे एंड अमेज़िंग रिव्यु भाई, आईटी रियली मीन्स ा लोट :दोस्त:
 
अपडेट 46

एकांश अब अक्षिता के आसपास हमेशा थोड़ा सतर्क रहने लगा था वो तीन दिन से ऑफिस भी नहीं गया था क्योंकि वो अक्षिता को एक मिनट के लिए भी अपनी नजरों से दूर नहीं करना चाहता था

वो जानता है कि उसे अक्षिता को एक हफ्ते के लिए यहां छोड़कर जर्मनी जाना था, लेकिन अब वो अक्षिता बिहेवियर देखकर थोड़ा हिचकिचा रहा था...

उसने ये महसूस किया था के अक्षिता आजकल बहुत जाएगा चिंतित रहती थी, खास तौर पर उसे जुड़े मामलो को लेकर, एकांश ने पहली बार अक्षिता की आंखो में डर देखा था, हालांकि उसकी तबियत के बारे में वो अच्छी तरह जानती थी लेकिन उसने उस सिचुएशन में अपनी हिम्मत नही खोई थी लेकिन हालात बदल रहे थे

अक्षिता हर पल परेशान सी डरी हुई रहती थी और एकांश जब भी उसकी आंखो में डर देखता उसके दिल में चुभन सी होती थी और एकांश इसे दूर करने के लिए कुछ भी कर सकता था, बल्कि कर रहा था, वो जर्मनी जा रहा था ताकि अक्षिता को इस दर्द से तकलीफ से राहत दिला सके अब भले उसके लिए उसे उससे दूर ही क्यों न रहना पड़े और बस इसमें एक ही समस्या थी, उसे अक्षिता को बताना था के वो कुछ दिनों के लिए उसे दूर जा रहा है, उसे नही पता था के उसके जाने की बता पर अक्षिता कैसे रिएक्ट करेगी लेकिन उसे अक्षिता को समझाना था ही

एकांश ने अक्षिता को देखा जो मुस्कुरा रही थी, उसके चेहरे से मुस्कान हट नही रही थी, एकांश का ऑफिस ना जाना उसके साथ समय बिताना उसे खुश कर रहा था, और वो भी यही चाहता था की वो खुश रहे

एकांश अक्षितांके दिमाग में किसी तरह का तनाव नही लाना चाहता था और उसे डर था के जब उसे जर्मनी जाना पड़ेगा तब वो वापिस टेंशन लेना शुरू कर देगी

"एकांश?"

अक्षिता की आवाज़ ने एकांश को उसके ख्यालों से बाहर निकाला

"तुम क्या सोच रहे हो?"

"कुछ नहीं... बस कुछ ऑफिस के काम के बारे में सोच रहा था" उसने कहा

"तुम्हे ऑफिस जाना है क्या?" पूछते हुए अक्षिता का चेहरा उतर गया

"नहीं तो, मैंने कहा था न कि मैं आज भी ऑफिस नहीं जा रहा" एकांश ने मुस्कुराते हुए कहा और अक्षिता भी उसकी ओर देखकर मुस्कुराई

"आओ चलो लंच तैयार है"

"वैसे तुम इतनी खुश क्यों हो?" एकांश ने अक्षिता से पूछा

"मुझे नहीं पता, मैं बस खुश हूं" अक्षिता ने अपने कंधे उचकाते हुए कहा

"हाँ, बस खुश हो, इसीलिए तो तुमने इतनी सब डिशेज बनाई हैं" सरिताजी ने डाइनिंग टेबल पर आते हुए कहा जिसपर अक्षिता चुप रही

"ये सब तुमने बनाया है?" एकांश ने आश्चर्य से पूछा और अक्षिता ने हाँ में अपना सिर हिला दिया

"वाह! खाना दिख तो बढ़िया रहा है बस उम्मीद है के इसका स्वाद भी बढ़िया हो" एकांश ने हर एक डिश को देखते हुए कहा जिसपर अक्षिता ने उसे घूरकर देखा, जबकि सरिताजी उनकी बात पर हंस रही थी

"अरे यार! मैं खाना बना सकती हूँ, तुम जानते हो और मैंने इतनी सब मेहनत की है, तुम्हारे लिए ये सब बनाया हैं और तुम यहा मेरा मज़ाक उड़ा रहे हो" अक्षिता ने मुंह बनाते हुए कहा

"तुमने ये सब मेरे लिए बनाया है?" एकांश ने पूछा और अक्षिता बस उसे देखती रही

"हा मतलब मैंने ये सभी के लिए बनाया है" अक्षिता ने नीचे देखते हुए कहा

"अरे वाह! आज कुछ खास है क्या जो इतना सब बना है?" अक्षिता के पिता जी ने एकांश के बाजू की सीट पर बैठते हुए कहा

"ख़ास बात ये है कि आज आपकी बेटी ने ये सब बनाया हैं" सरिता जी ने कहा जिसपर अक्षिता वापिस से मुस्कुरा दी

"सच? एकांश बेटा, तुम जानते हो, अक्षिता बहुत अच्छा खाना बनाती है" अक्षिता के पापा ने कहा और खाना खाने लगे

एकांश ने अक्षिता को देखा, जो शरमा कर नीचे देख रही थी

"म्म्म्म्म.... ये काफी टैस्टी है" एकांश ने अपनी उंगलियाँ चाटते हुए हुए कहा और अक्षिता ने मुस्कुराते हुए उसे और खाना परोसा वो सभी हँसते-बोलते हुए खुशी-खुशी अपने खाने का आनंद ले रहे थे

एकांश की इच्छा थी कि समय यहीं रुक जाए और ये खुशहाल परिवार हमेशा यू ही हसता रहे उसने अक्षिता को देखा जो काफी खुश लग रही थी और वो बस यही तो चाहता था

******

"तुम्हें उसे बता देना चाहिए"

एकांश ने सुना और मुड़कर सरिताजी को देखा

"जानता हु.... बस समझ नहीं आ रहा के कैसे बताऊ"

"मैं सिर्फ़ जर्मनी की बात नहीं कर रही एकांश, मैं ये भी कह रही हूँ कि तुम्हें उसे सच बताना चाहिए कि तुम यहाँ क्यों हो" सरिताजी ने एकांश को देखते हुए कहा

"नहीं! मैं... मैं ये नहीं कर पाऊँगा, वो मुझे वापिस अपने से दूर कर देगी" एकांश ने जल्दी से कहा

"नहीं, वो तुम्हें काही जाने नहीं देगी, वो खुद तुम्हारे बगैर नहीं रह सकती" सरिताजी ने कहा

" लेकिन...."

"बेहतर होगा कि तुम उसे सच बता दो, अगर उसे खुद ही पता चल गया तो शायद टूट जाएगी"

एकांश ने एक लंबी सास ली

उसे नहीं पता था कि ज़िंदगी उससे और कितने इम्तिहान लेगी, उसके लिए ये सब सहना पहले से ही बहुत मुश्किल था और अब अगर वो उससे सच बोल देगा..... तो उसे ये भी नहीं पता कि वो कैसे रीऐक्ट करेगी

वो सच बताकर उसे और चिंता मे नहीं लाना चाहता था , क्योंकि इससे उसकी हालत और खराब हो सकती थी

अभी के लिए उसे उसे कुछ भी न बताने का फैसला किया और जर्मनी से आने के बाद वो इस बारे में देखेगा ऐसा सोचा

******

अगले दिन सुबह एकांश तैयार होकर नीचे चला आया तो उसने देखा कि अक्षिता बाहर पौधों को पानी दे रही थी

" अक्षिता?" एकांश की आवाज सुन अक्षिता उसकी ओर मुड़ी

"तुम कहीं जा रहे हो क्या?" अक्षिता ने एकांश से पूछा

"हाँ और तुम भी मेरे साथ चल रही हो" एकांश ने कहा

"कहाँ?"

"सवाल मत करो बस चलो.... जाओ और तैयार हो जाओ" एकांश ने कहा और अन्दर चला गया और अक्षिता भी उसे पीछे पीछे अंदर चली गई

अक्षिता तैयार होकर अपने कमरे से बाहर आई तो उसने देखा कि एकांश कीसी से फोन पर बात कर रहा था और उसकी माँ उत्सुकता से उसकी ओर देख रही थी

"माँ?"

सरिता जी ने अक्षिता की ओए देखा और कहा

"जाओ, वो तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था"

अब एकांश ने मुड़कर उसकी ओर देखा

“चलो" एकांश ने कहा और बाहर चला गया और अक्षिता भी उसके पीछे बाहर आई और वो दोनों कार में बैठ गये और एकांश कार चलाने लगा

एकांश बिना किसी उद्देश्य के गाड़ी चला रहा था और सोच रहा था कि उसे कैसे बताए, जबकि अक्षिता इस बात से अब चिढ़ रही थी

"एकांश, हम कहाँ जा रहे हैं?" अक्षिता ने झुंझलाकर पूछा

"मुझे नहीं पता, मैं तो बस तुम्हें बाहर ले जाना चाहता था" एकांश ने आगे देखते हुए कहा और अक्षिता बस उसे देखने लगी

"और वो क्यों?" अक्षिता ने पूछा

"मैं बस तुमसे कुछ बात करना चाहता था, तुम्हारे दिमाग मे कोई जगह हो तो बताओ" एकांश ने कहा और वापिस गाड़ी चलाने पे ध्यान देने लगा वही अक्षिता ने खिड़की से बाहर देखने लगी

"एकांश रुको!" अक्षिता ने अचानक से जोर से कहा और एकांश को एकदम गाड़ी रोकने पे मजबूर कर दिया

"क्या हुआ?" एकांश ने पूछा

"चलो वहा चलते है" अक्षिता ने एक जगह की ओर इशारा करते हुए कहा

"मंदिर में?"

"हाँ" अक्षिता ने कहा और उसे मना करने का मौका दिए बिना कार से नीचे उतर गई

"तुम यहीं रुको, मैं जाकर कार पार्क करके आता हूँ" एकांश ने कहा और अक्षिता उसकी ओर देखकर मुस्कुराई और एकांश अपनी कार पार्क करने चला गया

दोनों मंदिर मे आए और हाथ जोड़े भगवान के दर्शन करने लगे, अक्षिता अपनी आंखे बंद कर भगवान से प्रार्थना कर रही थी वही एकांश वही उसके बगल मे खड़ा बस उसे देख रहा था, उसे भगवान की मूर्ति की ओर देखा और हाथ जोड़ कर उनसे अक्षिता को बचाने की बिनती करने लगा और भगवान से अक्षिता की सलामती मांगते हुए उसकी आंखे भाग आई थी लेकिन ये अक्षिता देखे उससे पहले उसने अपने आँसू पोंछ लिए

पंडित जी उन दोनों को प्रसाद दिया और उन दोनों को कपल समझते हुए हमेशा स्वस्थ और खुश रहने का आशीर्वाद दिया

एकांश भी यही कामना करते हुए मुस्कुराया जबकि अक्षिता चुप थी

वो उसे मंदिर के दूसरी ओर ले गई जहा का वातावरण एकदम शान्त था

"अब कहो क्या बात करनी है" अक्षिता ने कहा और एकांश ने उसकी ओर देखा और एक लंबी सास ली

"मुझे जर्मनी जाना है" उसने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा और ये बात सुन एकदम से अक्षिता के चेहरे का रंग उड गया और एकांश ने उसकी आँखों मे डर की झलक देखि

"क्यों?" उसने धीमे से पूछा

"ऑफिस का काम है.... मुझे वहाँ एक डील फाइनल करनी है" एकांश ने आगे कहा

"कितने दिनों के लिए?"

"शायद एक हफ्ते के लिए" एकांश ने कहा और अक्षिता चुप हो गई और कुछ सोचते हुए नीचे देखने लगी वही एकांश भी थोड़ा डर था था,

अक्षिता एकदम उदास हो गई थी, उसे नहीं पता था कि उसके पास कितना समय बचा था और वो एकांश के साथ अपनी ज़िंदगी का हर पल जीना चाहती थी अब उसे स्वार्थी कहो या कुछ और लेकिन वो नहीं चाहती थी कि एकांश उसे छोड़कर कही भी जाए

"जाना ज़रूरी है अक्षिता, वरना मैं नहीं जाता... देखो मैं वादा करता हूँ कि मैं तुम्हें रोज़ाना फ़ोन करूँगा और तुमसे बात करूँगा... ठीक है" एकांश ने सीरीअस टोन से कहा और अक्षिता बस उसकी आँखों मे देख रही थी

"कब जा रहे हो?" अक्षिता ने पूछा

"दो दिन बाद" एकांश ने कहा

"ठीक है" अक्षिता ने उदास होकर नीचे देखते हुए कहा अब एकांश कुछ कहने की वाला था के अक्षिता ने उसे बीच मे ही रोक दिया

"लेकिन मेरी कुछ शर्तें हैं" अक्षिता ने कहा

"शर्तें?" एकांश ने अक्षिता को गौर से देखते पूछा

"हाँ" अक्षिता ने भी एकांश की आंखो में देखते हुए कहा

"और क्या शर्ते है तुम्हारी?" एकांश ने अक्षिता के प्यार से देखते हुए पूछा

"एक ये की तुम दो दिनों बाद जाने वाले वो इसीलिए ये पूरे दो दिन तुम मेरे साथ बिताओगे और कोई काम नहीं होगा"

"मंजूर... और कुछ?" एकांश ने अपनी मुस्कान छुपाते हुए कहा

"और वहां जाने के बाद तुम मुझे फोन नही करोगे...." अक्षिता अभी आगे बोलने की वाली थी के एकांश बोल पड़ा

"क्या? लेकिन अक्षिता...." लेकिन अक्षिता ने हाथ दिखा कर उसे रोका

"एकांश, पहले पूरी बात सुन तो लो" अक्षिता ने थोड़ा झल्लाकर कहा

"तुम्हें मुझे सिर्फ फोन ही नही करोगे बल्कि वीडियो कॉल भी करोगे ताकि मुझे पता चल जाए कि तुम ठीक हो" अक्षिता ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा

"अक्षिता मैडम आपकी यू शर्त भी मंजूर, मुझे भी पता चल जाएगा कि तुम ठीक हो" एकांश ने मुस्कुराते हुए कहा

"तुम्हें अपना खयाल रखोगे, खाना टाइम पर खाओगे और टाइम पर नींद लोगे, मुझे पता है कि तुम काम करते वक्त सब कुछ भूल जाते हो" अक्षिता ने कहा

"ये भी मंजूर...... और कुछ?" एकांश ने अक्षिता को सैल्यूट मारते हुए कहा जिसपर वो हस दी

"अगर मुझे कुछ और याद आया तो मैं तुम्हारे जाने से पहले तुम्हे बता दूंगी" अक्षिता ने मुस्कुराते हुए कहा

"डन, लेकिन मुझे भी तुमसे वादा चाहिए तुम अपना भी ख्याल रखोगी" एकांश ने कहा और अक्षिता ने हा में सिर हिलाते हुए उसकी तरफ देखा और अक्षिता प्यार से एकांश को निहार रही थी, वो उसकी कितनी केयर करता है वो जानती थी और वो सच रही थी के वो कितनी लकी है के एकांश उसकी जिंदगी में है

वो चाहती थी कि वो हमेशा उसके साथ रहे, उसका बस चलता तो वो एकांश को एक पल अपनी नजरो से ओझल नहीं होने देती, लेकिन वो तो ये भी नहीं जानती थी कि वो उसके वापस आने तक जिंदा रहेगी भी या नहीं.. वो बस एकांश को अपनी नजरो में भर लेना चाहती थी

एकांश भी एकटक अक्षिता को निहार रहा था उसकी आंखो में देख रहा था जिसमे डर और उदासी थी लेकिन एक और भाव भी था, उसने अक्षिता की आंखो में अपने लिए प्यार देखा था और वो पूरी जिंदगी उसे यू ही देख सकता था

******

अगले दो दिन एकांश और अक्षिता साथ ही थे, अक्षिता एकांश को अपने से दूर नही जाने देना चाहती थी लेकिन वो ये भी जानती थी के वो हमेशा के लिए एकांश को बांध कर नही रख सकती थी, उसे भी काम थे उसे भी एक कंपनी चलानी थी और वो अब कमसे कम से इस बार से तो खुश थी के उसे एकांश के साथ वक्त बिताने मिला था और वो उसे छोड़ इन दो दिनों में कही नही गया था

अक्षिता ने की तरफ देखा जो अपना बैग पैक कर रहा था, वो आज सुबह ही अपने घर हो आया था था ताकि वहा से कुछ कपड़े, बैग और बाकी ज़रूरी सामान ला सके जो उसे जर्मनी जाने के लिए चाहिए था, वो कल जा रहा था अक्षिता बस उसे देख रही थी अपनी आंखों में भर रही थी वो इस डर में थी के शायद वो एकांश को अब दोबारा फिर कभी देख न पाए

अक्षिता की आंखे भर आ रही थी लेकिन वो अपने आंसुओं को रोक रही थी क्युकी वो एकांश को परेशान नही करना चाहती थी और बस इसीलिए उसके सामने मुस्कुरा रही थी

एकांश भी अक्षिता के मन मस्तिष्क में चल रही इस उथल पुथल को अच्छी तरह समझ रहा था, वो जान रहा था के अक्षिता के दिमाग में क्या चल रहा होगा लेकिन इस मामले में वो कुछ नही कर सकता था, उसने बस ऊपरवाले से प्रार्थना की के अक्षिता को कुछ ना हो,

एकांश को उसके दिमाग में चल रही उथल-पुथल समझ आ गई। वह समझ गया कि वह क्या सोच रही है और उसने भगवान से प्रार्थना की कि उसकी अक्षिता पस्थिति में उसे कुछ न हो

"अक्षिता , मैं काम खत्म होते ही मैं वापस आ जाऊंगा" एकांश ने अक्षिता का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा और अक्षिता ने भी हा में सर हिला दिया

"अब मुस्कुरा भी दो" एकांश ने स्माइल के साथ कहा और अक्षिता भी नाम आंखो के साथ मुस्कुरा दी

एकांश अपने कपड़े लेकर नहाने चला गया और अक्षिता बालकनी की ओर चली गई और वहीं खड़ी होकर रात के आसमान को देखती रही तभी उसने कुछ शोर सुना और अंदर जाकर देखा तो एकांश टूटे हुए कांच के टुकड़े उठा रहा था

"क्या हुआ?" उसने एकांश के पास घुटनों के बल बैठते हुए पूछा

"मैंने गलती से शीशा तोड़ दिया" एकांश ने कहा, उसके मन में इस वक्त कई तरह से विचार घूम रहे थे

"मैं उन्हें साफ कर दूंगी.... तुम जाओ और कपड़े पहन लो"

अक्षिता ने कांच के टुकड़े उठाए और उन्हें डस्टबिन में फेंक दिया और वो जैसे ही मुड़ी एकांश से टकरा गई और उसका बैलेंस बिगड़ा और वो गिरने ही वाली थी के एकांश ने उसे थाम लिया

अक्षिता के गिरने से बचाने के लिए एकांश उसे थामे हुए था, उसे अभी भी पूरे कपड़े नही पहने थे और ऊपर से वो।बगैर शर्ट के ही था और एकांश उसे उसे यू पकड़ने से अक्षिता के साथ उसने नंगे सीने और कंधे पर टिके हुए थे और दोनो की नजरे आपस में मिली हुई थी

एक बहुत की रोमांटिक सा मोमेंट बनने लगा था और एकांश का अब अपने आप पर से कंट्रोल छूट रहा था, अक्षिता के कोमल होठ उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे

अक्षिता ने भी अपनी आंखे बंद कर ली थी और तभी एकांश को ध्यान आया के वो भावनाओ के आवेग में सीमा लांघने वाला है और इसके साथ ही वो अक्षिता से थोड़ा दूर पीछे हट गया और अपनी शर्ट पहनने लगा

अक्षिता के सामने एकांश की पीठ थी, वो अच्छी तरह समझ रही थी के एकांश क्या चाहता था साथ ही वो क्या चाहती थी ये भी उसे पता था

"अंश.." अक्षिता ने धीमे से उसे पुकारा

"हम्म्म.." एकांश ने कहा लेकिन वो उसकी ओर मुड़ा नही

"मैने कहा था ना अगर मुझे और कुछ याद आया तो तुम्हारे जाने से पहले तुम्हे बता दूंगी?" अक्षिता ने कहा

"हम्म.. बताओ क्या चाहिए" एकांश ने कहा

"मैं जो मांगूंगी मुझे दोगे?" अक्षिता ने सवाल किया

"हा, जो तुम कहो" एकांश ने अक्षिता को देखते हुए कहा

"I.. I want you to kiss me" अक्षिता ने नीचे देखते हुए धीमे से कहा

जब कुछ पलों तक एकांश कुछ नही बोला तो उसने एकांश को देखा जो अपनी जगह जमा हुआ सा खड़ा होकर उसे देख रहा था

"भूल जाओ मैंने कुछ कहा था" अक्षिता ने अचानक उदास चेहरे के साथ कहा और जाने के लिए मुड़ी और इससे पहले के वो कोई कदम आगे बढ़ती एकांश के उसका हाथ पकड़ कर उसे रोका और वो कुछ कह पाती इससे पहले ही उन दोनो के होठ आपस में मिल चुके थे.....

क्रमश:
 
अपडेट 47

हेवन.... स्वर्ग... जन्नत....

बस यही वो शब्द था जो एकांश के दिमाग में।उसके मस्तिष्क में चल रहा था

बहुत दिनों बाद या सालो बाद अक्षिता के मुलायम होठों को अपने होठों पर महसूस कर एकांश को स्वर्ग से अनुभूति हो रही थी और इस एहसास को वो शब्दो में बयान नही कर सकता था

अक्षित के होंठो का मीठा स्वाद सीधा उसकी रगो में घुल रहा था, वो अक्षिता को ऐसे चूम रहा था जैसे वो कई दिनों का भूखा हो, उसके हार्मोंस मचल रहे थे, उसके अक्षिता को अपने और करीब खींचा और उसके बालो में हाथ घूमने लगा, उसका दिल इस वक्त जोरो से धड़क रहा था और एकांश का हाथ अपने बालो में पाते ही अक्षिता भी मचल उठी थी

अपने रिलेशनशिप के दौरान दोनो ने कई बार एकदूसरे को किस किया था लेकिन आज का ये किस कुछ अलग था, आज जैसे एकांश रुकना ही नही चाहता था

इस किस में प्यार था, एक जुनून था और अक्षिता भी उसी जुनून के साथ एकांश का साथ दे रही थी, यही तो को चाहती थी, इसी पल को तो वो जीना चाहती थी, इस प्यार के पल के अलावा इसे कुछ नही चाहिए था

काफी लंबे समय से वो दोनो को इसके लिए तरस रहे थे, इस पल में इस मोमेंट में अक्षिता भी समझ गई थी के एकांश उसे उतना ही चाहता है जितना वो उसे चाहती थी

वो दोनो की इस किस में इस पल में खो गए थे जैसे अब कभी रुकेंगे ही नही

कुछ देर बार दोनो सास लेते हुए हांफते हुए अलग हुए, एकांश अक्षिता के चेहरे को उसके सुर्ख लाल होठों को देख रहा था वही अक्षिता शर्मा कर नीचे देख रहीं थी और एकांश की नजरो से नजरे नही मिला पा रही थी

एकांश ने अक्षिता के चेहरे को उसके गालों को अपने हाथो में थाम रखा और और वो दोबारा उसे किस करने लगा, अक्षिता के साथ उसके सीने पर घूम रहे थे वही अब एकांश के हाथ अक्षिता की कमर पर थे जो उसके साडी पहने होने की वजह से खुली थी, और कुछ समय बाद वो दोनो वापसी सास लेने के लिए अलग हुए

एकांश ने अपना माथा अक्षिता के माथे से टिकाए रखा था और मुस्कुरा रहा था वही अक्षिता भी खुश थी और उसके उसे कसकर गले लगा लिया और तभी उन्होंने सरिताजी को उन्हें पुकारते सुना और वो दोनो एकदूसरे से अलग हुए और एक दूसरे को देखने लगा, अक्षिता के चेहरे पर आई शर्म को देख एकांश के चेहरे पर मुस्कान थी, दोनो ने अपने कपड़े और बाल ठीक किए और खाना खाने नीचे चले गए

दोनों के चेहरों पर इस समय एक सुकून भरी मुस्कान थी..

अक्षिता की माँ ने एकांश को वहा जाकर अपना ख्याल ठीक से रखने के निर्देश दिए और उसने एक बच्चे की तरह अपना सिर हिलाया, जिससे अक्षिता और उसके पिता मुस्कुरा उठे

अगले दिन सुबह एकांश अपने पेरेंट्स से मिलने गया, एकांश ने उनका आशीर्वाद लिया और जर्मनी की यात्रा शुरू करने के लिए वापिस अक्षिता के घर लौट आया, एकांश के पिता ने उसके लिए जर्मनी ने सब कुछ अरेंज कर दिया था..

एकांश ने अपने कपड़े, अक्षिता की रिपोर्टें पैक कीं और हर चीज़ की दोबारा देखी के कही कुछ छूट ना जाए

एकांश ने फिर अक्षिता के माता-पिता रोहन और स्वरा को अलविदा कहा, उसने उनसे अक्षिता का ख्याल रखने और कुछ भी अगर हो तो तुरंत उसे फोन करने कहा और वो अक्षिता के कमरे कमरे के दरवाज़े की ओर देखने लगा जो बंद था, उसने अक्षिता के माता-पिता की ओर देखा तो सरिताजी ने उसे जाकर अक्षिता से बात करने के लिए कहा

एकांश कमरे के अंदर गया तो उसने देखा कि उसका कमरा खाली था और जब वो बाहर आया तो उसने देखा कि अक्षिता बाहर से आ रही थी

"तुम कहाँ गयी थी?" एकांश ने उससे पूछा

"मंदिर में" अक्षिता ने मुस्कुराते हुए कहा

वो उसकी ओर बढ़ी और उसने उसके माथे पर तिलक किया

"हैप्पी जर्नी" अक्षिता ने मुस्कुराते हुए कहा वही सब लोग उसे देख थोड़े चकित थे क्युकी सबको लग रहा था के वो रो पड़ेगी

"अपना ख्याल रखना" एकांश ने मुस्कुराते हुए कहा, लेकिन उसके अंदर एक अनजाना डर था और वो उसे छोड़कर नहीं जाना चाहता था

"तुम भी"

"अपना ख्याल रखना बेटा और ठीक से खाना खाना" सरिताजी ने एक बार फिर कहा

"चिंता मत करो आंटी, अमर भी मेरे साथ जर्मनी जा रहा है" एकांश ने मुस्कुराते हुए कहा

"वो बेवकूफ अपना ख्याल नहीं रख सकता तुम्हारा क्या रहेगा" स्वरा ने कहा जिसपर सब हंसने लगे

तब तक एकांश का ड्राइवर भी आ चुका था और एकांश अमर को पिक करते हुए एयरपोर्ट जाने वाला था, उसने एक नजर अक्षिता को देखा और अपने सफर पर निकल गया और अक्षिता वही खडी होकर उसकी कार को अपने से दूर जागे देखती रही

"अक्षिता, ठीक हो?" स्वरा ने पूछा

"हाँ." अक्षिता ने मुस्कुराते हुए कहा और उसके साथ घर के अंदर चली आई

पहले तो जब एकांश ने उसे बताया था के वो जा रहा है तो वो डर गई थी लेकिन फिर कल वाले किस के बाद मानो उसकी सारी परेशानियां खतम हो गई थी, वो किस अभी भी उसके जेहन में उतना ही ताजा था

******

एकांश ने जर्मनी पहुंचते ही अक्षिता को वीडियो कॉल किया और वो भी उसे देखकर खुश हुई क्योंकि उसे वो एक दिन एक साल जैसा लग रहा था

देखते ही देखते तीन दिन बीत गए थे और दोनों अब एक दूसरे से मिलने का इंतजार कर रहे थे

अक्षिता अभी पौधों को पानी दे रही थी की अचानक उसे चक्कर आने लगा जिसने अक्षिता को अब और चिंता मे डाल दिया था क्योंकि ये अब दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था और उसने इस बारे मे अभी अपने पेरेंट्स को भी कुछ नहीं बताया था पता नहीं क्यू लेकिन वो उन्हे और टेंशन मे नहीं डालना चाहती थी, अक्षिता को अब हर पल ऐसा लगता जैसे उसे कुछ होने वाला है

वो आजकल ज्यादा आराम करती थी क्योंकि वो जल्दी थक जाती थी और उसका बायां हाथ भी कभी-कभी सुन्न हो जाता था जिससे उसका डर और भी बढ़ रहा था

वो जीना चाहती थी

कम से कम तब तक जब तक एकांश वापस नहीं आ जाता

इससे पहले कि उसे कुछ हो जाए, वो उसे आखिरी बार देखना चाहती थी

दूसरी तरफ, एकांश वीडियो कॉल में उसके पीले पड़े चेहरे को देखकर परेशान था, वो जानता था कि कुछ गड़बड़ है, लेकिन उसने उसपर परेशानी बताने के लिए दबाव भी नहीं डाला

उसने सोचा कि वो जल्द से जल्द अपना काम निपटाकर उसके पास पहुच जाएगा वो भी बस भगवान से प्रार्थना कर रहा था के अक्षिता को कुछ हो ना जाए कम से कम तब तक नहीं जब तक वो वहा न पहुच जाए

******

अक्षिता बिस्तर पर करवटें बदल रही थी उसे नींद नहीं आ रही थी वो बिस्तर पर बैठ गई और एकांश को फ़ोन करने के बारे में सोचने लगी लेकिन टाइम ज़ोन जानने के कारण उसने फिर फ़ोन नहीं किया

उसका सिर बहुत ज्यादा दर्द कर रहा था, उसने सिर दर्द की दवा ली, लेकिन फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे उसके सिर में कुछ धड़क रहा हो, उसने अपने डॉक्टर से भी बात की और उसे अपनी हालत के बारे में भी बताया

उन्होंने तुरंत उसे अस्पताल में भर्ती होने को कहा, जिससे वो थोड़ा डर गई

अक्षिता ने डॉक्टर को बताया कि वो ठीक है, बस थोड़ा सा सिरदर्द है और इसे वो संभाल लेगी

एकांश दो दिन में आ जाएगा और वह अभी अस्पताल में ऐड्मिट नहीं होना चाहती थी उसे समझ नहीं आ रहा था कि अचानक डॉक्टर उसे ऐड्मिट होने के लिए क्यों कह रहे हैं

सुबह वो अपने डेली के काम निपटाकर टीवी देख रही थी, उसे नींद भी आ रही थी, उसे रातों को नींद नहीं आती थी और नतिजन दिनभर वो फिर सोती रहती थी और अभी भी अनजाने मे वो सोफ़े पर ही सो गई थी

सरिताजी अपनी बेटी को देखकर चिंतित थी, आजकल वो बहुत ज्यादा सो रही थी या बैठी रहती थी जो की उसके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत था और इसी बात मे सरिताजी को चिंता मे डाल हुआ था

उन्होंने इस बारे मे एकांश को फ़ोन करके बताना चाहा लेकिन उसका फ़ोन बंद था इसलिए उन्होंने सोचा कि उसके वापस आने के बाद ही इस बारे मे बात करेंगी

******

अक्षिता बेचैन महसूस कर रही थी इसीलिए उसने सोच के क्यूना मंदिर जाकर वहा के क्षांत वातावरण मे कुछ समय बिताया जाए इसीलिए वो मंदिर चली आई और वहा जाकर उसने प्रार्थना की, अपने जीवन के लिए नहीं बल्कि एकांश के लिए, उसने ऊपरवाले से बस इतना मांग के जब वो इस दुनिया मे ना हो तब एकांश को अपने आप को संभालने की शक्ति दे

अक्षिता की आँखों मे आँसू आ गए थे, उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछे, वो रोना नहीं चाहती थी, उसे अपने इस जीवन मे अब तक जो कुछ भी मिला था उससे वो खुश थी, प्यार लूटने वाले मतअ पिता, खयाल रखने वाले दोस्त और वो जिसके बारे मे उसने काभी सोच भी नहीं था, उसका प्यार....

एकांश का उसकी जिंदगी मे आने उसके जीवन मे घाटी सबसे अच्छी घटना थी क्युकी हर कीसी को कहा अपना प्यार मिलता है

प्यार करना और प्यार पाना एक वरदान है जिसे अक्षिता ने पा लिया था

एकांश ने उसे इतना प्यार दिया था कि उसे फिर कीसी चीज की कमी नहीं लगी थी, उसे उसका प्यार मिल गया था और अक्षिता ने उस अद्भुत एहसास का अनुभव किया था, उसके प्यार और उसके त्याग की वैल्यू पता थी और इसीलिए उसने जो भी अपने जीवन मे पाया था वो उससे खुश थी बस ये बात और थी के वो एकांश को लेकर चिंतित थी की उसके बाद उसका क्या होगा

वो जानती थी कि वो उस सदमे को नहीं सह पाएगा और बस इसीलिए वो चिंतित थी वो उसे बहुत अच्छी तरह से जानती थी के वो इसे नहीं संभाल पाएगा वो परेशान हो जाएगा और सब कुछ तबाह करने निकल जाएगा जो की वो बिल्कुल नहीं चाहती थी, अक्षिता ने एकांश के बारे मे सोचते हुए अपनी आंखे बंद कर ली थी , वो बस एकांश के भले की कामना करने के अलावा कुछ और नहीं कर सकती थी

******

रात के 12 बज चुके थे और अक्षिता सोने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी और इसलिए उसने एक कीतब उठाई और पढ़ने लगी और तभी दरवाजे की घंटी बजी, उसने किताब एक तरफ रखी और दरवाजा खोलने के लिए चली गई और सोचने लगी कि इस समय कौन होगा..

उसने अपने पेरेंट्स को जगाने के बारे में सोचा, लेकिन फिर सोचा कि उसे डरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उसका जीवन वैसे भी खत्म होने वाला है, बस यही खयाल आजकल उसके दिमाग मे घूमते थे जिससे उसे अब अपने आप से ही चिढ़ होने लगी थी

जब दरवाजे की घंटी फिर बजी तो अक्षिता अपने खयालों से बाहर आई और उसे एहसास हुआ कि वो बंद दरवाजे के सामने खड़ी होकर खुद से बात कर रही थी

उसने मन ही मन ये बात नोट कर ली कि उसे अपनी ये आदत छोड़ देनी चाहिए...... खुद से बात करने की आदत

अक्षिता ने दरवाजा खोला तो देखा के बेल बजाने वाला इंसान चेहरे पर मुस्कान लिया वहा खड़ा था, अक्षिता को पहले तो उसे देख यकीन ही ना हुआ उसने अपने पलके झपकाई ये जाचने के लिए के वो सचमुच वहा है या वो कोई सपना देख रही है

"मिस्ड मी?" उसने पूछा वही अक्षिता अभी भी शॉक मे उसे देख रही थी

क्रमश.....
 
अपडेट 48

"मिस्ड मि?"

"तुम!!"

अक्षिता ने जैसे ही दरवाजा खोला वो अपने सामने खड़े शक्स को देख चौकी

"आई थिंक तुमने मुझे बहुत ज्यादा मिस किया" दरवाजे पर खड़े बंदे ने अक्षिता की ओर मुस्कुराकर देखते हुए कहा

"नहीं" अक्षिता अचानक सीधे सीधे बोली और ये सुन उस बंदे की मुस्कुराहट गायब हो गई और वो एकटक अक्षिता को देखने लगा

"तुम इस वक्त यहाँ क्या कर रहे हो?" अक्षिता ने उस बंदे से पूछा जो अब भी दरवाजे पर ही खड़ा था वही उस बंदे की नजर उसके पीले चेहरे और थकी हुई आंखो पे पड़ी

"मैं बस तुमसे मिलने आया था।" उस बंदे ने कहा और अक्षिता गौर से देखा

"इस वक्त?" अक्षिता ने वापिस उस बंदे को घूरते हुए पूछा

"हाँ, उसमे क्या है" उसने कहा और घर में चला आया वही अक्षिता बस उसे देखती रही

वो बंदा सीधा घर में आया और डाइनिंग टेबल के पास गया और उसने वहा रखी सेब उठाई और खाने लगा और खाते खाते ही आकर सोफे पर बैठ गया वही अक्षिता बस उसे देखती रही और फिर वो भी उसके सामने सोफे पर बैठ गई

"तुम यहा क्या कर रहे ही तुम्हें तो उसके साथ होना चाहिए था" अक्षिता ने उस बंदे की ओर देखते हुए कहा

"हाँ पता है और मैं उसके साथ ही था, लेकिन मुझे कुछ ज़रूरी काम आगया था इसलिए मुझे जल्दी वापस आना पड़ा" उस बंदे ने कहा जैसी अक्षिता चुप रही

"तुम मुझसे एक वादा करोगी?" उसने अचानक से अक्षिता से पूछा जिसपर अक्षिता चौकी

"क्या?" अक्षिता ने पूछा

"प्लीज दोबारा एकांश का साथ मत छोड़ना तुम नही जानती तुम्हारे बगैर उसका क्या हाल था" अमर ने अक्षिता की ओर देखते हुए कहा

"अमर मैं...." अक्षिता से आगे कुछ बोला ही नही गया वो ये वादा कैसे।कर सकती थी जबकि को तो अपने जीवन की सच्चाई जानती थी, वो ये भी नही जानती थी के अगले ही पल उसके साथ क्या होगा, यही सोचते हुए अक्षिता की आंखे वापिस भर आई थी और उसने आँसू भरी आँखों से उसकी ओर देखा

"मुझे पता है कुछ तो है जो तुम्हें वादा करने से रोक रहा है और मैं तुमसे नहीं पूछूंगा कि वो क्या बात है, लेकिन अब उससे फिर से दूर मत भागना, वो इस बार बर्दाश्त नहीं कर पाएगा अक्षिता" अमर ने अपनी आँखों में आँसू भरकर कहा और अक्षिता ने नीचे देखते हुए बस अपना सिर हिला दिया

अक्षिता ने अमर की ओर देखा, उसके चेहरे को देखा जिसपर थोड़ी हताशा थी और आंखो में सुनापन लिए वो सामने की कर देख रहा था

"तुम किसी से प्यार करते हो ना" अक्षिता ने पूछा और अमर ने चौंककर उसे देखा

"क्या? नहीं!" अमर ने एकदम से कहा जिसपर अक्षिता हस दी

"तुम्हारे चेहरे पर जो ये एक्सप्रेशंस है ना मिस्टर मैं उसे अच्छे से समझती हु, समझे" अक्षिता ने कहा और अमर से एक लंबी सास छोड़ी और फिर बोला

"मैं उससे प्यार तो करता हूँ, लेकिन वो अपने करियर से प्यार करती है, मैं चाहता हूँ कि वो मेरे साथ रहे, लेकिन वो पूरी दुनिया घूमना चाहती है, मैं उसके साथ घूमने के लिए भी तैयार हूँ, लेकिन वो किसी के साथ रहने के लिए तैयार नहीं है...... और बस यही कहानी है जो यहीं खत्म होती है" अमर ने कहा

पहली बार अक्षिता को अमर की आवाज़ में उदासी और शब्दों में दर्द महसूस हुआ था

"तुमने अपनी फीलिंग्स उसे बताई?" अक्षिता ने पूछा

"नहीं" अमर ने धीमे से कहा

"और ये क्यों?"

"मैं उसे और उसकी प्रायोरिटीज को जानता हु अक्षिता और अगर मैंने उसे अपनी फीलिंग्स बता दी तो वो इसे कभी एक्सेप्ट नही करेगी और शायद फिर मैं उसकी दोस्ती भी खो बैठु" अमर ने दुखी होकर कहा

"लेकिन वो लड़की है कौन?" अक्षिता ने आखिर में मेन सवाल किया

"तुम जानती हो उसे" अमर ने अक्षिता की ओर देखते हुए कहा जिससे अब अक्षिता की भी उत्सुकता बढ़ने लगी थी

"क्या! वो कौन है?"

"श्रेया" उसने कहा.

फिर अक्षिता ने उन सभी श्रेया के बारे मे सोच जिन्हे वो जानती थी और उसकी आँखों के सामने बस एक ही चेहरा घूमने लगा और जब उसे ध्यान आया के अमर किस श्रेय की बात कर रहा था तो उसने चौक कर अमर को देखा

"तुम्हारा मतलब है.... श्रेया मेहता?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा जिसपर अमर ने बस हा मे गर्दन हिला दी

"गजब! पर तुम्हें उससे अपने दिल की बात कहनी तो चाहिए मुझे नहीं लगता वो तुम्हें ना करेगी?" अक्षिता ने कहा

"उसके पास इन सबके लिए समय नहीं है, वो सिर्फ अपने काम पर फोकस करना चाहती है" अमर ने उदास होकर कहा जिसपर अक्षिता बस चुप रही

"खैर मैनचलता हु बस तुमसे मिलने का मन किया था तो आ गया था" अमर ने कहा और उठ खड़ा हुआ

"इतना लेट हो गया है कहा जाओगे एकांश के कमरे में जाकर सो जाओ" अक्षिता ने कहा

"नहीं, ठीक है। चिंता मत करो...." अमर ने कहा लेकिन जब उसने देखा के अक्षिता उसे घूर के देख रही थी वो वो बोलते बोलते चुप हो गया

"उसका कमरा कहाँ है?" आखिर मे अक्षिता के आगे हार मानते हुए अमर बोला

"ऊपर" अक्षिता ने कहा और अमर एकांश के कमरे की ओर बढ़ गया वही अक्षिता भी एकांश के बारे मे सोचते हुए सो गई

******

सुबह भी जब अमर जाना चाहता था तो अक्षिता की मा ने उसे नाश्ते के लिए रोक लिया जिसके बाद अमर ने उन सभी के साथ नाश्ता किया और जब वो जा रहा था तब

"तुम्हें उसे अपनी फीलिंग बतानी चाहिए" अक्षिता ने अपनी कार की ओर जाते अमर से कहा जिससे अमर थोड़ा रुक और अक्षिता ने आगे बोलना शुरू किया

"तुम्हें पता है कि हर लड़की बचपन से ही अपने राजकुमार का सपना देखती है, हर लड़की एक ऐसा लड़का ऐसा इंसान चाहती है जो उससे प्यार करे और उसका ख्याल रखे, हर लड़की एक ऐसे आदमी के साथ खुश रहने का सपना देखती है जिससे वो प्यार करती है" अक्षिता बोल रही थी और अमर सुन रहा था

"शायद वो भी अपने राजकुमार का इंतज़ार कर रही हो, शायद वो अपने मिस्टर राइट का इंतज़ार कर रही हो, शायद वो इस सब दिलचस्पी इसीलिए नहीं रखती क्योंकि वो अभी तब उस सही इंसान से मिली ही नहीं है" अक्षिता ने कहा

"और हो सकता है तुम उसे अपनी फीलिंगस बताओ तो वो तुम्हारे बारे मे सोचना शुरू करे, शायद वो तुममे अपना राजकुमार देख सके और हो सकता है उसे तुममे अपना मिस्टर राइट दिखे" अक्षिता ने हर शब्द को ध्यान से कहा एक पाज़िटिव अप्रोच के साथ जिसने अमर के दिल मे भी एक खुशी की उम्मीद की किरण जगाई

"मेरे अंदर होप जगाने के लिए थैंक्स" अमर ने अक्षिता को गले लगाते हुए कहा जिसके बाद वो उससे विदा लेकर वहा से निकल गया जब अक्षिता उसकी नजरों से दूर अपने घर मे चली गई अमर ने अपना फोन निकाला और एक नंबर डाइल किया और जब सामने से कॉल रीसीव हुआ तब वो भारी मन से बोला

"you need to come back soon, हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है"

******

अक्षिता ने अपने हाथ मे रखी बुक को मुस्कुरा कर देखा

वो उस बुक में कुछ लिख रही थी और लिखते समय वो लगातार मुस्कुरा रही थी

और अचानक, उसकी वो मुस्कान जैसे गायब हो गई और वो कुछ सोचते हुए शून्य में देखने लगी और उसकी आँख से एक आँसू बह निकला

अक्षिता ने अपने सभी विचारों दिमाग से हटाते हुए अपना सिर हिलाया और फिर से लिखना शुरू कीया, लेकिन उसके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, वो अपने आंसू पोंछने की परवाह नहीं कर रही थी और लिखती जा रही थी

और आखिर मे उसने जोर से आह भरते हुए किताब बंद की और एकांश के बारे में सोचने लगी, उसे दो दिन पहले ही भारत वापस आ जाना चाहिए था, लेकिन वो नहीं आया था और उसने उससे बस इतना कहा था कि कोई महत्वपूर्ण काम उसके हाथ लग गया है

एकांश ने उससे कहा कि वो 3-4 दिन में आ जाएगा जिसपर अक्षिता ने भी उससे कुछ नहीं कहा था, लेकिन उसके अंदर का डर बहुत बढ़ गया था वो किताब को साइन से लागए ही सो गयी

दूसरी तरफ़, अक्षिता के माता-पिता बहुत चिंतित थे क्योंकि अक्षिता डॉक्टर के पास जाने के लिए राज़ी ही नहीं थी जब उन्होंने उसे डॉक्टर के पास ले जाने के लिए मजबूर किया, तो वो उन पर चिल्लाने लगी और उसने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया

उसके पेरेंट्स उसके व्यवहार से हैरान थे क्योंकि अक्षिता ने काभी ऐसे बर्ताव नहीं किया था उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है और जब उन्होंने एकांश से इस बारे में बात की, तो उसने उन्हें बताया कि वो जल्द ही वापस आ रहा है और फिर सब ठीक हो जाएगा

******

डोरबेल की आवाज से अक्षिता की गहरी नींद मे खलल पड़ा था और उसने समय देखा तो अपनी भौंहें सिकोड़ लीं, क्योंकि रात के दस बज रहे थे और उसे आश्चर्य हुआ कि लोग उसके घर पर घंटी बजाते क्यों आते हैं, वो भी रात में ही

वो आह भरकर लिविंग रूम में आई उसे फिर इस बात पर आश्चर्य हुआ कि उसके माता-पिता कभी भी दरवाज़े की घंटी बजने पर क्यों नहीं उठते लेकिन फिर उसने जैसे ही दरवाजा खोला तो सामने खड़े व्यक्ति को देख खुशी से उछल पड़ी

"अंश” उसने एकांश को ऊपर से नीचे तक देखते हुए धीमे से कहा, उसे अब भी यकीन नहीं हो रहा था के एकांश सही मे वहा था

"अक्षिता.." एकांश भी अक्षिता को देख उतना ही खुश था और उसकी आँखों में भी आँसू थे

और तभी अक्षिता को ये एहसास हुआ कि वो सपना नहीं देख रही थी और एक कदम उसकी ओर बढ़ाते हुए उसने उसे कसकर गले लगा लिया

वो उसकी बाहों में रो रही थी और उसे छोड़ने को तैयार नहीं थी, एकांश खुद भी रो रहा था क्योंकि उसे भी अक्षिता की बहुत याद आई थी

"I missed you so much" एकांश ने धीमे से उसके काम मे कहा वही अक्षिता ने उसे और भी कस कर पकड़ लिया

और कुछ पल वैसे ही रहने के बाद अक्षिता ने खुद को उससे दूर किया और उसके पूरे चेहरे को चूमने लगी वही एकांश ने भी झुककर हल्के से अक्षिता के होठों को चूमा जिससे वो आँसूओ के साथ साथ मुस्कुराई फिर से उसने एकांश को कसकर गले लगाया और रो पड़ी क्योंकि उसे लगा था कि वो उसे देखे बिना ही मर जाएगी।

"शशश..... मैं यही हु तुम्हारे साथ..... अब रोना बंद करो" एकांश ने धीरे से अक्षिता की पीठ सहलाते हुए कहा

"मुझे डर लग रहा है अंश..... मैं..... मैं...." वो बोल नहीं पा रही थी

"कोई बात नहीं..... मैं हूँ ना..... अब सब ठीक हो जाएगा" एकांश ने अक्षिता को आश्वस्त करते हुए कहा

वो दोनों कुछ देर तक एक दूसरे को गले लगाए ऐसे ही बैठे रहे

"अब तुम जाकर सो जाओ, हम कल सुबह बात करेंगे" एकांश ने अक्षिता के आँसू पोंछते हुए कहा

लेकिन अक्षिता ने उसे जाने देने से मना कर दिया

"just stay with me..... please" अक्षिता ने एकांश के शर्ट को पकड़ते हुए कहा

" लेकिन....."

" प्लीज....."

और फी एकांश ने बगैर एक पल की देरी कीये अक्षिता को बाहर की ओर खिचा और दरवाजा बंद कर एक झटके मे उसे अपनी बाहों मे उठा लिया और अपने कमरे मे ले गया वही अक्षिता पूरे समय बगाऊर पलके झपकाए उसे देखती रही मानो उसने आंखे बंद की तो कही एकांश गायब ना हो जाए, अपने कमरे मे आकार एकांश ने अक्षिता को बेड पर सुलाया और खुद फ्रेश होने चला गया और जबतक वो बाहर आया अक्षिता सो चुकी थी, एकांश ने उसके पीले पड़े चेहरे और कमजोर शरीर की ओर देखा, अक्षिता की हालत एकांश का भी दिल दुख रहा था, उसने उसके माथे को चूमा और फिर उसे एक कंबल से धक दिया

एकांश फिर अपने कमरे से निकला और नीचे आया जहा अक्षिता के पेरेंट्स उसका इंतजार कर रहे थे

"उस डॉक्टर ने क्या कहा बेटा?" सरिताजी ने चिंतित होकर पूछा

"मैं उनसे मिला और अक्षिता की हालत के बारे में बताया, उन्होंने कहा है कि उन्होंने पहले भी इस तरह का ऑपरेशन किया था और वो सफल रहा था" एकांश ने रुककर उनकी तरफ देखा और उनके चेहरों पर उम्मीद की एक किरण देखी

"डैड के दोस्त उन्हें पहले से ही जानते थे, इसलिए उन्हें यहा इंडिया आने के लिए मनाना थोड़ा आसान था, उन्होंने मुझे कुछ और सिम्प्टम भी बताए है और कहा है कि जब हम उन्हें अक्षिता मे देखे तो हमें उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराना होगा और डॉक्टर यहाँ बुला लेना होगा" एकांश मे बात खतम की वही अक्षिता के पेरेंट्स ये काम कर खुश थे के वो डॉक्टर अक्षिता के लिए भारत आने को राजी हो गया था

"वीडियो कॉल पर जब मैंने उसकी हालत देखी तो मैं समझ गया था के मामला और खराब हो रहा है, इसलिए मैंने अमर को यहाँ भेजा था ताकि वो उसके सिम्प्टम देख सके और मुझे बता सके, आप लोगों ने जो सिम्प्टम मुझे बताए थे और अमर ने जो सिम्प्टम पहचाने, वे बिल्कुल वही थे जो डॉक्टर ने हमें बताए थे, अमर ने तुरंत मुझे फ़ोन किया और कहा कि वापस आ जाओ ताकि हम उसका इलाज शुरू कर सकें" एकांश ने कहा

"मैं 2 दिन पहले ही वापस आ जाता, लेकिन मुझे डॉक्टर से एक बार और बात करनी थी और अक्षिता की हालत के बारे में बताने के लिए रुकना पड़ा, उन्होंने ही मुझे जल्द से जल्द इंडिया वापस जाने और उसे जल्द से जल्द अस्पताल में भर्ती कराने के लिए कहा" एकांश ने भीगी पलको के साथ कहा और सारी बात सुन सरिता जी अपने पति के गले लगकर रो पड़ी

"क्या ऑपरेशन के बाद वो ठीक हो जाएगी?" अक्षिता के पिता ने डरते हुए पूछा जिसपर एकांश चुप रहा और इससे अक्षीता के पेरेंट्स और भी चिंतित हो गए

"हम अभी इस बारे में कुछ नहीं कह सकते लेकिन हमें उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराना होगा क्योंकि आंटी आपने कहा था कि आजकल उसे चक्कर बहुत ज्यादा आ रहे है जो की ठीक नहीं है, और सबसे बड़ी बात ये है कि उसका सर कुछ यू धडक रहा होगा जैसे कोई हथोड़ा मार रहा हो और काफी दर्द भी हो रहा होता क्या उसने इस बारे में आपसे कुछ कहा?" एकांश ने चिंतित होकर पूछा

"नहीं, उसने ऐसा कुछ नहीं बताया और वैसे भी अगर उसे दर्द भी होगा तो वो बताएगी नहीं और खुद ही सहेगी" अक्षिता की माँ ने रोते हुए कहा

"आप चिंता मत करो आंटी, मैं उसे कुछ नहीं होने दूंगा लेकिन पहले हमें उसे हॉस्पिटल में ऐड्मिट कराना होगा" एकांश ने कहा

"लेकिन इसके लिए तुम्हें उससे सच बोलना होगा कि तुम यहाँ क्यों हो" अक्षिता के पिता ने कहा

एकांश ने भी इस बारे में काफी सोचा कि उसे उसे सच बताना ही होगा क्योंकि शायद तब तक अक्षिता हॉस्पिटल में ऐड्मिट होने के लिए नहीं मानेगी जब तक वो उसके साथ नहीं है क्योंकि एकांश सच्चाई जानने के डर से तो वो सहमत नहीं होगी

"मैं कल उसे सब सच बता दूंगा" एकांश ने कहा जिसपर अक्षिता के पेरेंट्स भी थोड़े डरे हुए थे के क्या पता अक्षिता कैसे रीऐक्ट करेगी

******

एकांश को सारी रात नींद नहीं आई वो बस अक्षिता के सोते हुए चेहरे को देखता रहा उसे नहीं पता था कि वो कैसे कहेगा और क्या कहेगा, लेकिन उसने अक्षिता सब कुछ बताने का फैसला कर लिया था

अगले दिन जब अक्षिता अपनी नींद से जागी औ उसने अपने आसपास एकांश को देखा तो वो कही नहीं था, अक्षिता जल्दी जल्दी नीचे आई तो उसने देखा के एकांश मस्त डाईनिंग टेबल पर बैठा नाश्ता कर रहा था

जब अक्षिता ने उसकी तरफ देखा तो वो मुस्कुराया और वो भी मुस्कुराई, अक्षिता के अपने मा पापा को घर मे देखा तो वो कही नहीं थे तब एकांश ने उसे बताया के वो दोनों मंदिर गए थे और अब अक्षिता को भी भूख लगी थी इसीलिए वो भी फ्रेश होकर नाश्ता करने आ गई और जब अक्षिता नाश्ता कर रही थी एकांश फोन पर कुछ बाते कर रहा था

" अक्षिता."

एकांश ने अक्षिता को पुकारा और उसने भी उसकी ओर देखा

"मुझे तुमसे कुछ बात करनी है" एकांश ने उदास चेहरे से कहा, लेकिन अंदर ही अंदर उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था

वो दोनों जाकर सोफे पर बैठ गये

अक्षिता एकांश की घबराहट को उसकी झिझक को महसूस कर रही थी और उसने एकांश को पहले काभी ऐसे नहीं देखा था

"अंश, क्या हुआ? तुम क्या बात करना चाहते थे?" अक्षिता ने चिंतित होकर उससे पूछा

"यही की मैं यहाँ क्यों हूँ?" एकांश ने आराम से कहा और अब अक्षिता भी गौर से उसकी बात सुनने लगी

"अक्षिता...... मैं......"

" मुझे पता है, सब पता है" अक्षिता ने कहा

"क्या?"

"मैं जानती हूँ की तुम यहाँ क्यों हो एकांश" अक्षिता ने कहा

एकांश ने अक्षिता की ओर देखा और उसे याद आया कि उसने तो पहले ही अक्षिता को था कि वो ऑफिस के काम से यहां आया था

"नहीं अक्षिता.... मैं ऑफिस के काम से यहाँ नहीं आया हूँ...... मैं तो यहाँ......"

"एकांश, मैं ऑफिस के काम की बात नहीं कर रही हूँ" अक्षिता ने नीचे देखते हुए कहा

"फिर?"

"मुझे पता है कि तुम मेरे बारे में सब सच जानते हो एकांश"

क्रमश:
 
अपडेट 49

अक्षिता ने एकांश को देखा जो अपनी जगह जमा हुआ स बैठा था, उसके चेहरे पर स्पष्ट आश्चर्य था

"तुम क्या सोचते हो कि मैं नहीं जानती कि तुम यहाँ क्यों हो?" अक्षिता ने एकांश से पूछा, जिसने उसकी ओर बड़ी-बड़ी आँखों से देखा

"हम एक दूसरे से प्यार करते थे अंश और तुम्हें मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता" अक्षिता ने नीचे देखते हुए कहा

"अब तुम सोच रहे होगे कि मुझे कैसे पता, लेकिन अगर तुम गहराई से सोचोगे तो तुम्हें खुद ही इसका जवाब मिल जाएगा।" अक्षिता ने मुस्कुराते हुए कहा

एकांश कुछ नहीं बोला..... वो कुछ कह ही नहीं सका

"मुझे पता है कि तुम मुझे ये बात बताने से बचने के लिए बहुत सतर्क थे, लेकिन फिर भी मैंने कुछ चीजें नोटिस कीं जो शायद तुमने नहीं कीं" अक्षिता ने कहा वही एकांश अब भी उसकी ओर ही देख रहा था

"जब तुमने ऊपर का कमरा किराए पर लिया, तो मुझे शक हुआ क्योंकि हमने तो तुम्हें कभी नहीं देखा था और किसी तरह मुझे लगा कि ये तुम ही हो क्योंकि मुझे पता है कि जब तुम मेरे करीब होते हो तो कैसा महसूस होता है लेकिन मैंने ये सोचकर उस फीलिंग को नजरअंदाज कर दिया कि मैं शायद तुम्हें बहुत याद कर रही हूं, और फिर उस दिन जब मैं अपने घर के बाहर बेहोश हो गई थी और जब मैं उठी तो मैं अपने कमरे में थी, मैं उलझन में थी कि मुझे मेरे कमरे में कौन लाया क्योंकि मेरे पापा भी उस समय वहां नहीं थे और जब मैंने अपनी मां से इस बारे में पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने ऊपर रहने वाले किरायेदार की मदद ली थी, और पता है सबसे कमाल की बात क्या थी, मुझे ना उस वक्त सपना आया था के तुमने मुझे अपनी बाहों मे उठा रखा था और फिर जब मैंने उस दिन तुम्हें अपने घर में देखा तो मुझे एहसास हुआ कि वो एक सपना नहीं था, जब मुझे पता चला की वो किरायेदार तुम थे, तो मैं चौंक गई थी लेकिन मैं खुश थी”

"और फिर मुझे तब थोड़ा शक हुआ जब मेरे मा पापा तुम्हें यहाँ देखकर चौके नहीं और इसके अलावा वो तुम्हारे साथ इतनी आसानी से घुलमिल गए जैसे कि वो तुम्हें लंबे समय से जानते हों"

"और फिर उस दिन की वो हमारी पानी की लड़ाई जिसके बाद तुम टेंशन मे मेरे कमरे में आए थे ये जानने के लिए कि मैं ठीक हूं या नहीं यही बस यही वो टाइम था जब मैं सब समझने लग थी"

"उसके बाद तुम मुझे कई बार मेरे रूम मे भी आए और मेरे बेडरूम की दीवारों पर लगी अपनी तस्वीरों को देखते हुए भी मुझसे कुछ भी नहीं पूछा या कुछ नहीं कहा" अक्षिता ने एकांश से कहा जो अब भी चुप चाप उसकी बात सुन रहा था

"तुम्हें वो दिन याद है जब तुमने मुझे मॉल छोड़ा था?" अक्षिताने पूछा और एकांश ने अपना सिर हा मे हिला दिया

"उस दिन जब मैं वापस आई तो तुमने मुझसे कोई सवाल नहीं पूछा कि मैं कहाँ से आ रही हूँ, मैंने क्या खरीदा क्योंकि मेरे हाथ में मेरे हैंडबैग के अलावा कुछ भी नहीं था, और उस दिन मुझे समझ में आया कि तुम्हें पता होगा कि मैं अस्पताल गई थी मॉल नहीं"

"फिर एक दिन तुमने मुझे अपने ऑफिस में एक फ़ाइल लाने के लिए कहा था और जब मैं तुम्हारे केबिन में गई, तो मैंने तुम्हारे डेस्क पर अपनी तस्वीर देखी और तब मुझे एहसास हुआ कि तुम अभी भी मुझसे प्यार करते हो और मुझे ढूँढने यहाँ आए हो, जब हम तुम्हारे ऑफिस की पार्टी में गए, तो मैंने देखा कि कैसे मेरे दोस्त तुम्हारे भी दोस्त भी बन गए थे और मैं इससे काफी खुश हु, फिर तुम लोगों का मेरा ध्यान रखना, जब मैं कुछ पीना चाहती थी या आइसक्रीम खाना चाहती थी, तो जिस तरह से तुम रीऐक्ट करते थे, उससे मेरा शक और बढ़ गया" अक्षिता ने आगे कहा लेकिन एकांश की ओर नहीं देखा

"ये सब सिर्फ़ मेरा शक था या ऐसा मैं तब तक सोचती रही जब तक कि मैंने तुम्हारे कमरे में अपनी डायरी नहीं देखी जब तुम जर्मनी गए थे, तब सारी बातें साफ हो गईं और सब कुछ मेरे लिए क्लियर हो गया" अक्षिता ने कहा और एकांश की ओर देखा जो अब अपनी आँखें बंद कर रहा था

अक्षिता ने एकांश के दोनों हाथ पकड़ लिए जिससे वो उसकी ओर देखने लगा और अक्षिता ने पहली बार एकांश की आँखों में डर देखा जिससे वो और ज्यादा चिंतित हो गई

"तुमने मेरी वजह से अपनी माँ से झगड़ा किया था, है न?" अक्षिता ने अपनी आँखों मे आँसू भरकर पूछा और एकांश ने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमाया लिया

"क्यों एकांश? क्यों?" अक्षिता चिल्लाई

"तुम्हें पता है मैं अचानक क्यों चली गयी थी?" अक्षिता ने पूछा

"मेरे लिए तुम्हारे बिहैव्यर में आए बदलाव के कारण मुझे वो जगह छोड़नी पड़ी" अक्षिता ने कहा और एकांश बस उसे देखता रहा

"तुम मेरे साथ अच्छा बर्ताव कर रहे थे, मेरा ख्याल रख रहे थे और मुझसे नॉर्मल तरीके से बात कर रहे थे...... इन सब बातों से मैं इतना डर गई कि मुझे तुम्हें छोड़ना पड़ा क्योंकि मुझे डर था की तुम मुझसे फिर से जुड़ जाओगे और जब मैं चली जाऊंगी तो ये तुम्हें तोड़ के रख देगा" अक्षिता ने कहा और उसकी आंखों से आंसू बह निकले

एकांश चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा, लेकिन उसकी ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाया

"तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे साथ कितनी सारी बातें शेयर करना चाहती थी, लेकिन मुझे डर था कि मेरे चले जाने के बाद तुम्हारा क्या होगा"

"लेकिन अब, मैं ये बताने के लिए और इंतजार नहीं कर सकती कि मैं किस दौर से गुजर रही हूँ, जो की तुम पहले से ही जानते हो" अक्षिता ने आँसुओ के साथ कहा

"प्लीज मुझे बताओ अक्षु...... तुम्हें पता नहीं है कि मैं चाहता था कि तुम मुझे बताओ कि तुम पर क्या बीत रही है" एकांश ने अक्षिता के आँसू पोंछते हुए कहा

"हमारे रिलेशनशिप के दौरान ही मुझे बहुत ज़्यादा सिरदर्द और चक्कर आते थे, मुझे लगता था कि शायद ये तनाव या किसी कमज़ोरी की वजह से हो रहा होगा, जब मेरे मा पापा ने मेरी शादी के लिए लड़के देखने के बारे में सोचा, तो मैं तुम्हारी जगह किसी और के बारे मे सोच भी नहीं सकती थी इसलिए मैंने उन्हें तुम्हारे बारे में बताया, मैंने उन्हें तुम्हारी फोटो दिखाईं और वो तुमसे मिलने के लिए राज़ी हो गए, मैं बहुत खुश थी और सोचा कि अगले दिन तुम्हें बताऊँगी लेकिन मैं उस दिन अचानक बेहोश हो गई" अक्षिता बोलते बोलते चुप हो गई

"मेरे मा पापा मुझे अस्पताल ले गए लेकिन डॉक्टर मेरे अचानक बेहोश होने का कारण नहीं जान पाए, होश में आने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे कोई सिम्प्टमस् है और मैंने उन्हें लगातार सिरदर्द और चक्कर आने के बारे में बताया तो उन्होंने मेरे कुछ टेस्ट किए और मुझे अगले दिन आने को कहा, और फिर जब हम अगले दिन अस्पताल गए, तो उन्होंने हमें मेरे ब्रैन में ट्यूमर के बारे में बताया" अक्षिता अपना चेहरा ढँककर फूट-फूट कर रोने लगी थी

औरों से अक्षिता के बारे मे सुनना अलग बात थी लेकिन अक्षिता के मुह से ही उसकी तकलीफ के बारे मे सुनना एकांश को तोड़ रहा था, वो उस दर्द को महसूस कर रहा था जिससे अक्षिता गुजरी थी, उसने आज पहली बात अक्षिता को अपने सामने टूटते देखा था जो उसका दिल छलनी कर रहा था

उसने अक्षिता को कस कर गले लगा लिया था

"मैं मर रही हूँ अंश...... मैं मर रही हूँ......" अक्षिता उसकी आगोश में जोर-जोर से रोने लगी थी और एकांश भी उसके साथ रो रहा था

दोनों ही एकदूसरे को गले लगा कर कुछ देर तक रोते रहे

अक्षिता तो एकांश के पहलू मे शांत हो गई थी लेकिन एकांश अभी भी उसे पकड़कर रो रहा था और अक्षिता उसे यू रोता देखना बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी एकांश के आँसू उसके दिल पर वार कर रहे थे

"शशश... एकांश... मैं हूँ अभी" अक्षिता ने एकांश की पीठ सहलाते हुए उसे गले लगा लिया और कुछ ही देर मे एकांश भी शांत हो गया था लेकिन उसका दिल अभी भी जोरों से धडक रहा था

"मुझे डर लग रहा है अंश...."

अक्षिता ने एकांश की आँखों मे देखते हुए कहा

"मुझे तुम्हारे लिए डर लग रहा है...... मुझे पता है कि मेरे चले जाने के बाद तुम अपनी जिंदगी सीधी तरह नहीं जी पाओगे और मैं नहीं चाहती कि तुम मेरे कारण अपनी जिंदगी बर्बाद करो और मैं नहीं चाहती कि तुम मेरु वजह से जिंदगी जीना ही बंद कर दो" अक्षिता ने एकांश के गालों को सहलाते हुए कहा

"मुझे पता है कि तुम मेरे लिए हिम्मत बांधे हो अंश.... और मुझसे वादा करो के हमेशा ऐसे ही रहोगे और मेरे मा पापा के भी सपोर्ट मे रहोगे, ठीक है?" अक्षिता ने नाम आँखों से पूछा और एकांश ने भी हा मे सर हिला दिया

"तुम मुझे छोड़ कर कही नहीं जाओगी...... कही नहीं" एकांश ने रोते हुए कहा

"ये मेरे हाथ में नहीं है अंश.... मैं इसमें कुछ नहीं कर सकती" अक्षिता एकांश के माथे को अपने माथे से छूते हुए रो पड़ी

"नहीं! ऐसा मत कहो, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर बचाऊंगा अक्षु" एकांश ने अक्षिता के हाथों को अपने हाथों में कसकर पकड़ते हुए कहा और वो बस उसे देखकर मुस्कुराई

"अंश, क्या तुम मुझसे एक वादा करोगे?" अक्षिता ने पूछा

"जो तुम कहो" उसने कहा.

"अगर मुझे कुछ हो गया तो......" लेकिन एकांश ने उसे बीच मे ही रोक दिया

"नहीं, तुम्हें कुछ नहीं होगा! और ऐसा दोबारा कभी मत कहना!"

"प्लीज मेरी बात सुनो अंश" अक्षिता ने वापिस आराम से कहा

"अगर मुझे कुछ हो जाता है तो मुझसे वादा करो कि तुम अपनी ज़िंदगी यहीं नहीं रोकोगे, तुम अपनी ज़िंदगी बर्बाद नहीं करोगे, तुम अपने आस-पास के लोगों को चुप नहीं कराओगे, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे जिससे तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद हो जाए, मैं चाहती हूँ कि तुम अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ो, मैं चाहती हूँ कि तुम लोगों को अपनी ज़िंदगी में आने दो, मैं चाहती हूँ कि तुम अपनी ज़िंदगी का एक नया चैप्टर शुरू करो जहाँ कोई दुख और आँसू न हों, सिर्फ़ मुस्कुराहट और खुशी हो, करोगे वादा" अक्षिता ने एकांश की आँखों मे देखते हुए पूछा और एकांश बस उसे देखता ही रहा

एकांश सोच रहा था की अक्षिता उससे ये बाते कैसे मांग सकती है जिनकी वो उसके बगैर कल्पना भी नहीं कर सकता

" मुझसे वादा करो अंश...." अक्षिता ने एकांश की ओर अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा

एकांश ने अक्षिता की ओर देखा, जिसकी आँखें पूरी आशा और विश्वास से भरी थीं

"अंश" जब एकांश ने कोई जवाब नहीं दिया तो अक्षिता ने उसे दोबारा पुकारा

"ठीक है, वादा रहा" एकांश ने कहा

अक्षिता भी एकांश का हाथ पकड़े हुए मुस्कुराई

"थैंक यू अंश"

वो खुश थी क्योंकि वो जानती थी कि एकांश अपना वादा निभाएगा

वो जानती थी कि एकांश उसका वादा उसका भरोसा कभी नहीं तोड़ेगा

वो जानती थी कि वो उसके लिए कुछ भी करेगा और ये तो उसकी आखिरी इच्छा थी और एकांश इसे पूरा जरूर करेगा

"और प्लीज फिर से प्यार करने की कोशिश करो, मैं चाहती हूँ कि तुम्हारे पास कोई हो जो तुम्हारा ख्याल रख सके और तुमसे प्यार कर सके, मैं चाहती हूँ कि तुम्हारा एक परिवार हो, मैं चाहती हूँ कि तुम अपने परिवार के साथ एक नॉर्मल जिंदगी जियो अंश" अक्षिता ने एकांश के कंधे पर अपना सर टिकाते हुए कहा

"तुम्हें नहीं लगता कि ये तुम मुझसे बहुत ज्यादा मांग रही हो?" एकांश ने शांत स्वर मे उससे पूछा, लेकिन अक्षिता की बात सुनकर उसका दिल अंदर से टूट गया था

वो उसकी जगह किसी और को कैसे दे सकता था?

वो अपनी जिंदगी किसी और के साथ कैसे जी सकता था?

"अंश?" अक्षिता ने उसे पुकारा

"तुम थकी हुई लग रही हो, तुम्हें दवाइयां लेकर सो जाना चाहिए" एकांश ने बात बदलते हुए कहा जो अक्षिता समझ गई थी

एकांश ने अक्षिता को अपनी बाहों में उठाया और उसके कमरे में ले गया, उसने उसे बिस्तर पर सुला दिया और उसे राजाई उढ़ा दी

अक्षिता भी उसकी ओर देखकर मुस्कुराई और सो गई, क्योंकि वह बहुत थकी हुई थी

एकांश ने उसके माथे को चूमा और उसके कान में फुसफुसाया......

"please don’t leave me…"

क्रमश:
 
अपडेट 50

अगली सुबह उठते ही अक्षिता के चेहरे पर एक सुंदर मुस्कान थी, कल एकांश से बात करने के बाद वो काफी हल्का महसूस कर रही थी

उसने दीवारों पर देखा जिस पर एकांश की सारी तस्वीरें लगी हुई थीं, वो मुस्कुराई और उससे मिलने के लिए तैयार होने लगी और बढ़िया नहा कर साड़ी पहने बाहर आई

अक्षिता लिविंग रूम में आई तो उसकी माँ ने उसे नाश्ता दिया, उसने एकांश के बारे में पूछा तो सरिताजी ने उसे बताया कि एकांश बाहर गया हुआ है जिससे अक्षिता मुँह फुलाए हुए थी क्योंकि वो इस वक्त बस एकांश को देखना उससे मिलना चाहती थी

वो उसके कमरे में गई तो देखा कि फर्श पर उसकी फाइलें और कपड़ों सहित कई सारी चीजें बिखरी पड़ी थीं, ऐसा लग रहा था कि एकांश ने हताशा और गुस्से में ये चीजें फेंकी थीं

उसने पूरा कमरा साफ किया और एकांश की स्टडी टेबल पर

बैठ गई और अनजाने में ही वो नींद के आगोश में चली गई

थोड़ी देर बाद जब एकांश कमरे में आया तो उसने देखा कि अक्षिता उसकी टेबल पर सर टिकाए सो रही थी, उसने उसके खूबसूरत चेहरे को देखा और उसकी खूबसूरती की मन ही मन तारीफ़ की, उसकी आँखों से आँसू निकल आए जिसे उसने जल्दी से पोंछ दिया

एकांश ने आज सोच लिया था कि वो आज किसी भी कीमत पर अक्षिता को हॉस्पिटल में भर्ती करवा देगा

उसने कमरे में चारों ओर नज़र घुमाई तो पाया कि कमरा साफ़-सुथरा था, उसे अच्छी तरह याद था कि कल रात गुस्से और हताशा में उसने अक्षिता की सेहत के बारे में सोचते हुए सारी चीज़ें फेंक दी थीं

वो वाशरूम गया और बाहर आकर देखा कि अक्षिता अभी भी सो रही थी उसने उसे धीरे से उसे अपनी बाहों में उठाया और अपने बिस्तर पर सुला दिया

एकांश अक्षिता को अपने बेड पर सोता छोड़ अपने कमरे से बाहर आया और कुछ फ़ोन कॉल किए, उसने डॉक्टर से भी उसके हॉस्पिटल में ऐड्मिट होने के बारे में बात की और डॉक्टर ने उसे बताया कि सब कुछ तैयार था और एकांश उसे कभी भी ऐड्मिट करा सकता था

एकांश ने नीचे जाकर अक्षिता के मा पापा से भी इस बारे मे बात उन्होंने भी उससे कहा कि जो भी उसे सही लगे, वो करें क्योंकि वे बस इतना चाहते थे की उनकी बेटी ठीक रहे, उन्होंने जर्मनी में डॉक्टर से भी बात की और कहा कि जैसे ही उन्हें आने के लिए कहा जाएगा, वे भारत आ जाएंगे..

एकांश ऊपर जाकर अक्षिता के पास सो गया, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी, उसके मन में कई विचार घूम रहे थे कि कहीं अक्षिता के साथ कुछ हो न जाए

अब तक अक्षिता भी जाग गई थी और उसने देखा कि एकांश उसके बगल में सो रहा था और छत को घूर रहा था, वह उसके करीब खिसकी और उसने एकांश के कंधे सर टिकाया और अपने हाथों से उससे पकड़े वापिस सो गई

एकांश ने भी अपना हाथ उसकी कमर के चारों ओर लपेटकर उसे अपने पास खींच लिया और जब वो उससे चिपक गई तो एकांश के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई

"अंश, तुम कहाँ थे?" अक्षिता ने पूछा

"मुझे कुछ काम था बस वही कर रहा था" एकांश ने कहा और अभी अक्षिता से बात करने का फैसला किया

" अक्षिता?"

" हम्म।"

"हमें हॉस्पिटल चलना चाहिए" एकांश ने अक्षिता की ओर देखते हुए कहा

"डॉक्टर ने जो सिम्प्टम बताए थे, वो अब साफ तौर पर दिख रहे हैं और अब हमे और देर न करते हुए जल्द से जल्द हॉस्पिटल में ऐड्मिट होने की जरूरत है"

"सिम्प्टम?" अक्षिता ने पूछा

"हाँ.... मैं जर्मनी किसी बिजनस की वजह से नहीं गया था, बल्कि एक डॉक्टर से मिलने गया था जो ऐसे मामलों का स्पेशलिस्ट है और वो तुम्हारा इलाज करने के लिए इंडिया आने को तैयार है" एकांश ने कहा और अक्षिता के रिएक्शन का इंतजार करने लगा

एकांश की उसे ठीक करने की कोशिश को देखते हुए अक्षिता की आंखे वापिपस भरने लगी थी

"कब?" अक्षिता ने पूछा और एकांश आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगा

"आज" एकांश के कहा जिसे सुन अक्षिता थोड़ा चौकी

"हाँ, डॉक्टर ने कहा है कि तुम्हें जल्द से जल्द हॉस्पिटल मे ऐड्मिट करा दिया जाए" एकांश ने अक्षिता को समझाते हुए कहा और अक्षिता थोड़ा उधर होकर नीचे देखने लगी

"अक्षिता...." एकांश ने उसे पुकारा

"क्या हम कल जा सकते हैं? क्योंकि जाने से पहले मैं अपना ज़्यादातर समय तुम्हारे साथ बिताना चाहती हूँ" अक्षिता ने उम्मीद से एकांश की आँखों मे देखते हुए पूछा

एकांश ने एक मिनट सोचा और अपना सिर हा मे हिला दिया जिसपर अक्षिता मुस्कुराई और उसके एकांश के गाल को चूम लिया

"बस सिर्फ एक किस, वो भी गाल पे" एकांश ने कहा और उसके इक्स्प्रेशन देख अक्षिता हसने लगी और एकांश ने अपने होंठ उसके होंठों पर रखकर उसकी हंसी को बंद करा दिया, दोनों एकदूसरे को चूम रहे थे और एकांश के हाथ अक्षिता की कमर पर घूम रहे थे

"तुमने साड़ी क्यों पहनी है?" एकांश ने अक्षिता से दूर हटते हुए कहा और अक्षिता ने उसे एक कन्फ्यूज़ लुक दिया

"जब तुम साड़ी पहनती हो तो मेरे लिए खुद को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है।" एकांश ने अक्षिता की आँखों में देखते हुए कहा

"तो फिर तुम्हें किसने कहा है कि तुम खुद पर कंट्रोल रखो।" अक्षिता ने कहा और शरमा कर दूसरी ओर देखने लगी वही एकांश बस अपलक उसे देख रहा था

एकांश ने फिर से अक्षिता को अपने करीब खिचा और दोनों के होंठ वापिस एकदूसरे से जुड़ गए थे, दोनों वापिस एकदूसरे के आगोश मे समा गए थे

"I think we should stop here" कुछ पल अक्षिता को किस करके के बाद एकांश ने पीछे हटते हुए बेड से उठते हुए कहा जिससे अक्षिता को थोड़ी निराश हुई

"ऐसा नहीं है कि मैं ये नहीं चाहता, मैं अभी तुम्हारे साथ कुछ करना चाहता हूँ, लेकिन हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि तुम्हारे मा पापा हम पर भरोसा करते हैं और हम इसका फायदा नहीं उठा सकते" एकांश ने कहा और अक्षिता भी जैसे उसकी बात समझ गई थी

वो बिस्तर से उठी और उसके गालों को अपने होंठों से चूमने लगी जिससे एकांश भी मुस्कुराया, उसने कभी ऐसा लड़का नहीं देखा था जो अपने आस-पास के लोगों से इतना प्यार करता हो, वो ना सिर्फ अपना काम और ऐशोआराम छोड़कर उसके पास आया था बल्कि उसके परिवार को उसके मा पापा को अपना माँ कर उनका सहारा भी बना था और एक आम आदमी की तरह रहने लगा था, दोनों ने एकदूसरे को गले लगा लिया था

"मैं सब ठीक कर दूंगा अक्षिता" एकांश ने अक्षिता के माथे को चूमते हुए कहा

"जानती हु"

******

अक्षिता एकांश का इंतजार कर रही थी, उसने उसे यायर होने के लिए कहा था और वो दोनों कही जा रहे थे, अक्षिता भी बढ़िया साड़ी पहन कर तयार हुई थी क्युकी वो भी जानती थी के एकांश को उसे साड़ी मे देखना पसंद था

जब अक्षिता ने एकांश की कार का हॉर्न सुना तो वो बाहर आई, एकांश भी मस्त रेडी हुआ था और अक्षिता की नजरे अब भी उसपर से हट नहीं रही थी

“चलें..." एकांश ने अक्षिता के लिए कार का दरवाज़ा खोलते हुए कहा

"कहाँ?" अक्षिता ने पूछा

"तुम्हें जल्द ही पता चल जाएगा" एकांश के अक्षिता के बैठने के बाद कार का दरवाजा बंद करते हुए कहा

एकांश भी कार मे आकार बैठा और वो दोनों निकल गए, दोनों ही कुछ नहीं बोल रहे थे, गाड़ी मे एकदम शांति थी लेकिन दोनों के होंठों पर मुस्कान खेल रही थी

अक्षिता समझ गई थी के एकांश उसे कही खास जगह लेकर जा रहा था लेकिन कहा ये वो नहीं जानती थी और उसने पूछा भी नहीं क्युकी एकांश चाहे उसे जहा ले जाए उसके लिए बस उसके साथ रहना जरूरी था वो बस उसके साथ रहना चाहती थी

एकांश उसे उस शॉपिंग मॉल मे ले गया जहाँ वो दोनों पहली बार मिले थे और उसने उस जगह को देखा जहाँ वो दोनों एक दूसरे से टकराए थे, दोनों की यादों के झरोखे मे खोए थे.... उनकी पहली लड़ाई, उनकी बातचीत और कैसे वो मुलाकात दोस्ती में बदल गई थी

दोनों ने एक दूसरे को देखा और नम आँखों से एक दूसरे को देखकर मुस्कुराये, एकांश ने अक्षिता को कुछ शॉपिंग करवाई और उसने उसके और उसके मा पापा के लिए कुछ चीजें खरीदीं

वो उसे उस पार्क में ले गया जहाँ वो हमेशा मिलते थे, दोनों एक बेंच पर बैठे और मुस्कुराते हुए उन यादों को फिर से ताज़ा कर रहे थे

फिर वो उसे एक रेस्तराँ में ले गया और एक दूसरे से बातें करते हुए और एक दूसरे को चिढ़ाते हुए दोनों ने खाना खाया, भविष्य के गर्भ मे क्या छिपा है इसकी चिंता छोड़ दोनों आज का दिन भरपूर जी रहे थे और हमेशा की ऐसे ही रहना चाहते थे

अक्षिता एकांश को हंसता और मुस्कुराता देखकर खुश थी, क्योंकि कल जब उसने एकांश अपने लिए रोते देखा था तो वह डर गई थी, उसे चिंता थी कि उसके बाद एकांश का क्या होगा और वो रात को उसके बारे में सोचकर सो भी नहीं पाती थी

वो बस यही चाहती थी कि वो खुश रहे और अपनी जिंदगी जिए, चाहे अक्षिता वहा हो या ना हो

अक्षिता उस इंसान की ओर देखकर मुस्कुराई जो उससे कुछ कहते हुए हंस रहा था और वो उससे अपनी नजरें नहीं हटा पा रही थी...

"अक्षिता, आओ हमें कहीं चलना है" एकांश ने अक्षिता को उसके खयालों से बाहर लाते हुए कहा

"कहाँ?" अक्षिता ने पूछा

"सप्राइज़ है” एकांश ने मुसकुराते हुए कहा और अक्षिता को कार मे बिठाया, उसके आगे एकांश से कुछ ना पूछने का फैसला किया और वो जहा ले जाए जाने के लिए माँ गई और जब कार रुकी तो वो जहा आए थे वो जगह देख अक्षिता थोड़ा चौकी और स जगह को देखने लगी

"अंश, हम यहाँ क्यों आए हैं?" अक्षिता ने धीमे से फुसफुसाते हुए पूछा

"यही वो सप्राइज़ है जिसके बारे में मैं बात कर रहा था" एकांश ने मुस्कुराते हुए कहा

"ये कोई सप्राइज़ की बात नहीं है, शॉक है" अक्षिता ने कहा

और एकांश अक्षिता के शॉक भरे इक्स्प्रेशन देखकर हंस पड़ा

"अब चलो" एकांश ने कार से उतरते हुए कहा लेकिन अक्षिता अपनी जगह से नहीं हिली

"अक्षिता?"

"प्लीज अंश, मुझसे ये नहीं होगा" अक्षिता ने कहा

"तुम्हें इतनी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है यार"

" लेकिन........"

"बाहर आ रही हो या उठाकर ले आऊ" एकांश ने अक्षिता को देखते हुए कहा और जैसे ही एकांश ये बोला

"नहीं!" अक्षिता चिल्लाई और जल्दी से कार से नीचे उतर गई क्योंकि उसे यकीन था कि वो उसे जरूर उठाकर ले जाएगा

"अच्छा अब चलो वो हमारा ही इंतज़ार कर रहे हैं" एकांश ने अक्षिता का हाथ पकड़ते हुए कहा वही अक्षिता अब भी इस बारे मे शुवर नहीं थी

"चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा" एकांश ने कहा और उसे अपने साथ लेकर मेन गेट की ओर चल दिया

"नहीं, अंश, प्लीज" अक्षिता ने डरते हुए कहा

"do you trust me?" एकांश ने अक्षिता से पूछा

"हाँ." उसने कहा.

"तो फिर चलो"

"एकांश रुको!" अंदर से आवाज़ आई

दोनों ने अंदर देखा तो एकांश की मां तेजी से उनकी ओर आ

रही थी

"वहीं रुको।" एकांश की मा ने हाफते हुए कहा

"अब क्या हुआ माँ?" एकांश ने पूछा

"वो पहली बार हमारे घर आई है तुम रुको मुझे उसे अच्छे से अंदर बुलाने दो" एकांश की मां ने कहा और दोनो की आरती उतारी और अक्षिता का घर में स्वागत किया और अक्षिता को।कसकर गले लगाया और इससे अक्षिता को घबराहट थोड़ी कम हुई

"डैड कहाँ हैं?" एकांश ने पूछा।

"अरे मैं यहीं हूँ" एकांश के पिता आकार उसकी माँ के पास खड़े हो गए और उन्हें देखकर मुस्कुराने लगे

दोनों ने झुककर एकांश के पेरेंट्स के पैर छुए और उनका आशीर्वाद लिया

"आओ पहले खाना खा लें" एकांश की मां ने कहा

उन्होंने बातें करते हुए और हंसते हुए खाना खाया, एकांश की माँ ने अक्षिता को उसके बचपन की सारी कहानियाँ सुनाईं जिससे अक्षिता को भी एकांश के मजे लेने का पूरा मौका मिला

अक्षिता वो वहा पूरी घरवाली फीलिंग आ रही थी और वो घबराहट तो मानो कब की गायब हो चुकी थी, एकांश भी उसे यू हसता मुस्कुराता देख खुश था

उन्होंने कुछ देर और बातें की और उसके बाद एकांश अक्षिता के अपना घर दिखाने ले गया, अक्षिता सब कुछ गौर से देख रही थी क्योंकि वो उसके बारे में सब कुछ जानना चाहती थी

और आखिर में वो उसे अपने कमरे में ले गया और अक्षिता एकांश के कमरे को देखकर दंग रह गई,

अक्षिता उस कमरे में घूम-घूम कर हर चीज़ को उत्सुकता से देख रही थी उसे एकांश के कमरे में होने का एहसास अच्छा लग रहा था और वो दीवार पर लगी तस्वीरों को देखकर मुस्कुरा रही थी

एकांश बाथरूम चला गया था जबकि अक्षिता फोटो देखने में मग्न थी और एकांश के बचपन के फोटो देख मुस्कुरा रही थी

अक्षिता हर चीज को देख रही थी और फिर देखते हुए अक्षिता की नजर एकांश की अलमारी में रखी अपनी फोटो पर पड़ी जिसमे वो मुस्कुरा रही थी, उसके देखा तो वहा उसकी और भी कई तस्वीरें थी, और ये देख कर की एकांश ने उसकी सभी यादों को संभाल कर रखा है अक्षिता की आंखो में पानी आ गया था, वो अब कमरे की खिड़की के पास खड़ी होकर इसी बारे में सोच रही थी और तभी उसने अपने चारो ओर हाथ महसूस किए और उसने पाया के एकांश उसे पीछे से लगे लगा रहा था

"अंश, I like your room..... क्या मस्त कमरा है तुम्हारा और यहा से व्यू कितना शानदार है" अक्षिता ने बाहर की ओर देखते हुए कहा

"हाँ, बहुत सुंदर है" एकांश ने अक्षिता की ओर देखते हुए कहा

"अंश, मुझे माफ़ कर दो" अक्षिता ने अचानक कहा जिससे एकांश थोड़ा चौका

"क्यों?" एकांश ने अक्षिता का चेहरा अपनी ओर घूमते हुए पूछा

"तुम इतना बड़ा घर, सुख-सुविधाएं, ऐशोआराम और सबसे इंपोर्टेंट अपना परिवार छोड़कर हमारे साथ इतने छोटे से घर और छोटे से कमरे में रह रहे हो.... मेरी वजह से" अक्षिता ने धीरे से नीचे देखते हुए कहा

एकांश ने अक्षिता की ठोड़ी को ऊपर उठाया लेकिन फिर भी वो उसकी ओर नहीं देख रही थी

"मेरे लिए अभी तुमसे ज़्यादा इंपोर्टेंट कुछ भी नहीं है" एकांश ने धीमे से फुसफुसा कर कहा और अक्षिता आँसू भरी आँखों से उसे देखने लगी

वो थोड़ा मुस्कुराई और सोचने लगी कि उसने ऐसा क्या अच्छा काम किया होगा कि एकांश उसकी जिंदगी में आया

"I am still sorry" अक्षिता ने कहा

"अक्षिता, ऐसा मत सोचो...... और मैं तुम्हारे साथ रहकर खुश हूँ" एकांश ने अक्षिता को आंखो में देखते हुए कहा

"मैं इसके लिए सॉरी नही कह रही हूँ, मैं तो इसलिए माफ़ी मांग रही हूँ क्योंकि मैंने तुम्हें अभी अभी बिना कपड़ो के देख लिया" उसने कहा और उसकी आँखें आश्चर्य से बाहर आ गईं

"क्या.....?" एकांश ने एकदम चौक कर पूछा

"हाँ" अक्षिता ने मासूमियत से कहा

"कब और कहाँ?" एकांश ने हैरानी भरे स्वर में पूछा

"अभी, यहीं पर"

और फिर अक्षिता ने एकांश को उसके बचपन की एक फोटो दिखाई जिसमे वो बगैर कपड़ो के था

एकांश एक पल के लिए शॉक होकर उसे देखता रहा और फिर फोटो की तरफ, उसे समझने में थोड़ा समय लगा और जब उसे समझ आया, तो उसने अक्षिता की ओर देखा जो अपनी हंसी को रोकने की कोशिश कर रही थी और एकांश के एक्सप्रेशन देखकर वह अपनी हंसी पर कंट्रोल नहीं रख सकी और जोर से हंसने लगी, और एकांश से दूर हटी जो अब उसे घूर रहा था और उसके हाथ से अपनी फोटो छीनने की कोशिश कर रहा था

वही अक्षिता भाग भाग कर उसे चिढ़ा रही थी

अक्षिता बिस्तर के चारो ओर भाग रही थी और एकांश उसके पीछे था और आखिर में उसने अक्षिता का हाथ पकड़ लिया और वो दोनो बेड पर गिरे, नजदीकिया बढ़ रही थी, दोनो हाफ रहे थे और एकदूसरे को देख रहे थे और फिर दोनो जोर जोर से हंसने लगे

दोनो को अब अपनी नजदीकियों का एहसास बीके रहा था, आसपास के माहोल में गर्मी बढ़ रही थी, अनजाने में ही कब उनके चेहरे एकदूसरे को ओर बढ़े और होठ आपस में मिले उन्हें पता ही नही चला और उस प्यार भरे किस के टूटने के बाद एकांश ने अक्षिता को देखा और कहा

"I Love You!"

क्रमश:
 
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