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[color=rgb(226,]पूर्वांचल और माफिया[/color]
डी बी का कोई दूसरा फोन आ गया था
शायद हेडक्वार्टर से या किसी नेता वेता का, क्योंकि उनकी खाली यस जी सर की आवाज आ रही थी और मेरा फोन उन्होंने होल्ड पर रखा था।
और फोन काटने की मेरी हिम्मत भी नहीं थी, हॉस्टल के मेरे सीनियर थे और यहाँ भी,
लेकिन मैं शुक्ला के बारे में सोच रहा था, और ड्रग्स और सेठ जी की लड़की के बारे में।
ये कोई फ्रिंज आपरेशन रहा होगा, शुक्ला की पहल पर, क्योंकि ज्यादातर माफिया रंगदारी से शुरू हुए फिर ठेकेदारी की ओर मुड़ गए। और शुक्ला ने सिंह के प्रभुत्व का इस्तेमाल किया होगा।
लेकिन डी बी की ये बात एकदम सही थी की दूकान से भेजे जाने वाले सामने के साथ हथियारों की आवाजाही आसान रही होगी। इनकी दूकान का सामान नेपाल तक जाता हैं और उधर से भी ड्राई फ्रूट्स और बाकी सब, फिर नेपाल का बार्डर खुला हैं और पक्की सड़कों के अलावा तराई के जंगल के बीच भी कच्ची सड़कों का जाल हैं, और वहां से पिट्ठू पे भी सामान आता हैं, और पहली बार बाटा मर्डर में जो एके ४७ इस्तेमाल हुयी, कुछ तो कहते हैं की सिंह ने हॉस्पिटल शूटआउट के इनाम के तौर पर डी गैंग से पायी और कुछ कहते हैं की नेपाल से आयी।
लेकिन असली खेल तो होता हैं गोली का।
और नेपाल से हर जगह तो जा नहीं सकती तो इसका मतलब एक सेन्ट्रल प्रोक्योरमेंट डिपो टाइप होगा और वहां से जहाँ जरूरत हो, तो एक बार कहीं पहुँच भी गयीं तो वहां से आजमगढ़, गाजीपुर, बलिया, छपरा, आरा, सिवान सब जगह मिर्च मसलों के साथ। और ४० किलो सूखी लाल मिर्च के बोरे में एक दो किलो कारतूस तो कहाँ पता चलता हैं।
डी बी की ये बात भी सही थी की माफिया वालों को खास तौर से पूर्वांचल में लड़कियों का ज्यादा शौक नहीं था, कई तो एकदम परिवार वाले, हाँ तीसरे चौथे पायदान वालों की, शूटर्स की बात अलग थी और ये शुक्ल जी उन्होंने उसी पायदान से शुरू किया होगा और दूसरी बात ये हैं की चाहे अखबार हो ट्रक और बस में बजने वाले कैसेट के गाने हों या चाय की दूकान की बातचीत इन छुटभैयों का महिमा मंडन भी अच्छी तरीके से किया जाता था ( बड़े माफिया की नाम लेने की हिम्मत किसी में नहीं थी) तो कैशोर्य की पायदान पर पैर रखती लड़कियों के मन में भी,
तो कभी शुक्ला ने तांक झाँक के बाद सोचा होगा चांस ले सकते हैं। और फिर सेठजी पर प्रेशर भी बनाना आसान होगा, इसलिए उनकी लड़की उठायी गयी होगी, वो आपरेशन सिंह के लेवल का नहीं लगता लेकिन उसने आब्जेक्ट भी नहीं किया होगा।
और फिर कुछ ले देकर जो छोटा चेतन का मोहरा बोल रहा था, यानी महीने वार रकम, और सेठ जी का भी फायदा,
तबतक डी बी की आवाज सुनायी दी,
" अरे यार ये फोन, यस सर यस सर, करते,,,,, अच्छा मुद्दे पे आओ " और उनकी आवाज धीमी होगयी
" ये वही हैं न चिट्ठी वाली, किस्मत वाले हो "
उसी तरह धीमी आवाज में मैंने कबूल किया, हाँ वही है।
चिट्ठी वाला किस्सा तो पूरा हॉस्टल जनता था, करीब तीन साल से, अंतर्देशीय पत्रों का चक्कर, और डर ये लगता था कोई खोल के झाँक न ले। मैंने लाख गुड्डी से कहा था लिफ़ाफ़े में भेजो लेकिन वो मेरी सुनती तो गुड्डी क्यों होती।
चिट्ठियां सारी हॉस्टल के आफिस की टेबल पे रखी रहती, जिसका होता उठा लेता या कोई उस विंग वाला होता तो वो भी ला के दे देता। लेकिन गुड्डी की चिट्ठी के चक्कर में, मैं भी बेवकूफों की तरह जिस दिन गुड्डी की चिट्ठी आती, उसी दिन जवाब लिखा जाता, भेजा जाता और अगले दिन से हॉस्टल के आफिस का चक्कर चालू दिन में तीन बार और कुछ दिन में उड़ती चिड़िया के पर भांपने वालों ने भांप लिया कोई खास चिट्ठी है। बस एकाध बार चिट्ठी जब्त भी हो गयी और सबको चाय पिलाने के बाद ही मिली, और फिर गुड्डी की मोती ऐसी राइटिंग, पता देख के ही लोग समझ जाते थे की, कोई खास है।
हाँ समझदार तो वो है तो बस ये गनीमत थी की नाम नहीं लिखती थी बस बनारस, और इतना तो सब को पता चल गया की आनंद बाबू का चक्कर किसी बनारस की चिट्ठी वाली से है।
डी बी ऐसे दो चार क्लोज लोग ही थे जिन्हे नाम मालूम था लेकिन उसके आगे कुछ नहीं।
डी बी ने एक हॉस्टल के सीनियर फिर जॉब में सीनियर होने के नाते एक काम की बात बोली, " तुम घर जा रहे हों न "
" हाँ मैं हलके से बोला। गुड्डी मेरे कंधे पे सर रखे शायद ऊंघा रही थी, रतजगे की तैयारी में, थोड़ी सी नींद कही भी कभी भी।
" स्साले, अभी घर पे शादी की बात पक्की कर ले, किस्मत है तेरी इतनी अच्छी लड़की मिल रही है। और तेरी ट्रेनिंग तो अभी पांच छह महीने बची है न "
" हाँ, बस मई से फिल्ड ट्रेनिंग तो यहीं यूपी में ही और फिर सितंबर तक पोस्टिंग " मैंने बताया।
" बेस्ट है, सबसे अच्छा फील्ड ट्रेनिंग के टाइम में शादी कर ले , अगर एक बार पोस्टिंग हो गयी न तो गिन के तीन दिन की शादी की छुट्टी मिलेगी और सुहागरात के दिन फोन आ जायेगा, कही बंदोबस्त में ड्यूटी लगी है, फिर पता नहीं कहाँ कोने अंतरे पोस्टिंग हो, और हाँ वो तेरा पेपर पढ़ा था मैंने मेरे पास भी असेसमनेट के लिए आया था, जबरदस्त था, डाटा भी काफी था और अनैलेसिस भी।"
ट्रेनिंग में दो साल में दो पेपर लिखने होते हैं तो मैंने पूर्वांचल का माफिया लिखा था नाम तो पेपर टाइप ही था, सोशियो -इकोनॉमिक पर्स्पेक्टिव और ईस्टर्न यू पी माफिया। लेकिन असली खेल था फील्ड विजिट के नाम पे एक हफ्ते का टाइम मिलता था, ईस्टर्न यूपी मतलब हफ्ते भर के लिए में घर आ गया और गुड्डी भी उस समय आयी थी।
डीबी ने मेरा पेपर ध्यान से पढ़ा था, और इन्होने एक टेढ़ा सवाल पूछ लिया,
" ये तो ठीक है की पूर्वांचल में माफिया का चक्कर जो ७० और ८० के दशक में शुरू हुआ और ९० के दशक में अमरबेल की तरह फ़ैल गया, उसका आधार जाति था लेकिन उसका फायदा क्या मिला और उससे लिमिट्स क्या सेट हुईं ?
बस मुझे मौका मिल गया ज्ञान बघारने का और मैं नॉन स्टॉप बोलता रहा। गुड्डी और रीत के सामने तो बोलने का सवाल ही नहीं था,
" दोनों गुट दो डॉमिनेंट कास्ट के थे और सबसे बड़ी बात मुझे ये लगी की एक फ्यूडल कल्चर के बचे हुए अंश साफ़ साफ़ दिख रहे थे, प्रभुत्व स्थापित करने की लड़ाई और उस प्रभुत्व का एक्सटर्नल मैनिफेस्टेशन। और सबसे बड़ा अडवांटेज था उन्हें बिना बोले अपनी जाति के लोगों का अलीजियेंस मिला, फिजिकल, फायनेंसियल और इमोशनल सपोर्ट। और क्योंकि सैकड़ों सालों से ये ढांचा वहां था, इनबिल्ट था तो इस तरह की ग्रुप लॉयल्टी का, "
लेकिन डी बी ने मुझे काट दिया, लेकिन तुमने उनके ढांचे के बारे में भी अच्छा लिखा था।
" हां," मैं बोला और स्वीकार किया की मैं भी चकित था। ऊपर की पहली दो तीन पक्तियों में तो जाति का असर था जिसमे उनके फंक्शनल हेड , एरिया हेड इत्यादि थे लेकिन जो फुट सोल्जर्स थे उनमे भी बहुत वैरायटी थी। शूटर्स तो टोटेम पोल में सबसे ऊपर थे लेकिन ज्यादातर का लाइफ स्पान शार्ट था, पर उसके अलावा वाचर्स, फ़ॉलोअर्स, स्पलायर्स , रुकने और रहने का ठिकाना देने वाले इन सबकी पूरी फ़ौज थी और कई तो बस ' बॉस खुश होगा ' के अंदाज में इन्फर्मेशन मुहैया कराते थे । "
" एकदम सही कह रहे हो, जब छह महीने बाद तेरी पोस्टिंग होगी तो पहली पोस्टिंग में ही पता चल जाएगा की असली ताकत किस के पास है "
थोड़ा दुखी , थोड़ा गंभीर हो के वो बोले, फिर जोड़ा,
मेरे अपने आफिस में मुझे पता नहीं है की में जो बोलता हूँ वो कहाँ कहाँ तक पहुंचता है। लेकिन ये चेंज भी तुमने एकदम सही मैप किया था और पूरे डिटेल्स के साथ, ये फंक्शनल कमाडंर वाली बात मेरी समझ में नहीं आयी लेकिन
और मुझे फिर बोलने का मौका मिला गया,
" जब एक बार जातिगत माफिया का सिक्का बैठ गया तो बस असली चीज थी कमाई और ठेकदारी वो समझ गए की रंगदारी से भी बढ़िया है, तो उन्होंने डिपार्टमेंट वाइज बाँट दिया, किसी को पी डब्लू डी , किसी को सिंचाई, किसी को रेलवे, किसी को बिजली, तो बस जितने ठेके वाले काम थे सब। रेलवे में तो मैं चौंक गया, एक पांडेय जी फंक्शनल हेड थे, स्टेशन पर बिकने वाली रेवड़ी के ठेके से लेकर कंस्ट्रक्शन के बड़े से बड़े ठेके तक, और छोटे ठेके में पैसा कमाने से ज्यादा प्रभुत्व और उनकी छत्रछाया, और वो सब बिन पैसे के इन्फॉर्मर के तौर पर काम करते थे। असली पैसा बड़े ठेके में था। और मैंने तो यहाँ तक सुना कि अक्सर रेलवे मिनिस्टर बिहार के होते थे, वहां कि रेलवे लाइन के काम भी होते थे लेकिन ठेका चूँकि रेलवे का मुख्यालय गोरखपुर में था इसलिए उत्तर बिहार के माफिया को दिक्क्त होती थी। इसलिए भी रेलवे का विभाजन हुआ और हाजीपुर बिहार के जितने रेलवे मंडल थे,
गुड्डी कि तरह डी बी को भी बात काटने कि आदत थी, वो बोले
"लेकिन ये काम करने की तो इन सब माफिया की ताकत तो थी नहीं
" काम तो काम करने वाली ही कम्पनिया ही करती थी हाँ उनके रेट में २० से २५ परसेंट बढ़ा के ये कोट करती थी, और ये एक्स्ट्रा पैसा सीधे फंक्शनल हेड के जरिये और दुसरे छोटे मोटे कम टेक्निकल लेबर इंटेसिव काम, सप्लाई के काम भी माफिया के आदमियों को तो वो अलग से पैसा बनाते थे। "
हम लोगो की पुलिस वाली गाडी रुक गयी थी , सामने कोई वृषभ विश्राम कर रहे थे। तो ड्राइवर बगल की दूकान से चाय लेने चला गया।
मैं और गुड्डी चाय सुड़क रहा थे और मैं डी बी से पॉलिटिक्ल, आफीसीएल, माफिया और बिजनेस नेक्सस के बारे में बात कर रहा था लेकिन डी बी ने कहा
" तुम्हारे पेपर में एक पार्ट नहीं है लेकिन वो सब्जेक्ट का पार्ट था भी नहीं और वो एकदम हाल का मुद्दा और अब मुझे सबसे ज्यादा डर उसी से लगता है, "
क्या, मेरी समझ में नहीं आया। और अब डी बी ने बोलना शुरू किया तो रुके नहीं। गाडी चल पड़ी थी।
डी बी का कोई दूसरा फोन आ गया था
शायद हेडक्वार्टर से या किसी नेता वेता का, क्योंकि उनकी खाली यस जी सर की आवाज आ रही थी और मेरा फोन उन्होंने होल्ड पर रखा था।
और फोन काटने की मेरी हिम्मत भी नहीं थी, हॉस्टल के मेरे सीनियर थे और यहाँ भी,
लेकिन मैं शुक्ला के बारे में सोच रहा था, और ड्रग्स और सेठ जी की लड़की के बारे में।
ये कोई फ्रिंज आपरेशन रहा होगा, शुक्ला की पहल पर, क्योंकि ज्यादातर माफिया रंगदारी से शुरू हुए फिर ठेकेदारी की ओर मुड़ गए। और शुक्ला ने सिंह के प्रभुत्व का इस्तेमाल किया होगा।
लेकिन डी बी की ये बात एकदम सही थी की दूकान से भेजे जाने वाले सामने के साथ हथियारों की आवाजाही आसान रही होगी। इनकी दूकान का सामान नेपाल तक जाता हैं और उधर से भी ड्राई फ्रूट्स और बाकी सब, फिर नेपाल का बार्डर खुला हैं और पक्की सड़कों के अलावा तराई के जंगल के बीच भी कच्ची सड़कों का जाल हैं, और वहां से पिट्ठू पे भी सामान आता हैं, और पहली बार बाटा मर्डर में जो एके ४७ इस्तेमाल हुयी, कुछ तो कहते हैं की सिंह ने हॉस्पिटल शूटआउट के इनाम के तौर पर डी गैंग से पायी और कुछ कहते हैं की नेपाल से आयी।
लेकिन असली खेल तो होता हैं गोली का।
और नेपाल से हर जगह तो जा नहीं सकती तो इसका मतलब एक सेन्ट्रल प्रोक्योरमेंट डिपो टाइप होगा और वहां से जहाँ जरूरत हो, तो एक बार कहीं पहुँच भी गयीं तो वहां से आजमगढ़, गाजीपुर, बलिया, छपरा, आरा, सिवान सब जगह मिर्च मसलों के साथ। और ४० किलो सूखी लाल मिर्च के बोरे में एक दो किलो कारतूस तो कहाँ पता चलता हैं।
डी बी की ये बात भी सही थी की माफिया वालों को खास तौर से पूर्वांचल में लड़कियों का ज्यादा शौक नहीं था, कई तो एकदम परिवार वाले, हाँ तीसरे चौथे पायदान वालों की, शूटर्स की बात अलग थी और ये शुक्ल जी उन्होंने उसी पायदान से शुरू किया होगा और दूसरी बात ये हैं की चाहे अखबार हो ट्रक और बस में बजने वाले कैसेट के गाने हों या चाय की दूकान की बातचीत इन छुटभैयों का महिमा मंडन भी अच्छी तरीके से किया जाता था ( बड़े माफिया की नाम लेने की हिम्मत किसी में नहीं थी) तो कैशोर्य की पायदान पर पैर रखती लड़कियों के मन में भी,
तो कभी शुक्ला ने तांक झाँक के बाद सोचा होगा चांस ले सकते हैं। और फिर सेठजी पर प्रेशर भी बनाना आसान होगा, इसलिए उनकी लड़की उठायी गयी होगी, वो आपरेशन सिंह के लेवल का नहीं लगता लेकिन उसने आब्जेक्ट भी नहीं किया होगा।
और फिर कुछ ले देकर जो छोटा चेतन का मोहरा बोल रहा था, यानी महीने वार रकम, और सेठ जी का भी फायदा,
तबतक डी बी की आवाज सुनायी दी,
" अरे यार ये फोन, यस सर यस सर, करते,,,,, अच्छा मुद्दे पे आओ " और उनकी आवाज धीमी होगयी
" ये वही हैं न चिट्ठी वाली, किस्मत वाले हो "
उसी तरह धीमी आवाज में मैंने कबूल किया, हाँ वही है।
चिट्ठी वाला किस्सा तो पूरा हॉस्टल जनता था, करीब तीन साल से, अंतर्देशीय पत्रों का चक्कर, और डर ये लगता था कोई खोल के झाँक न ले। मैंने लाख गुड्डी से कहा था लिफ़ाफ़े में भेजो लेकिन वो मेरी सुनती तो गुड्डी क्यों होती।
चिट्ठियां सारी हॉस्टल के आफिस की टेबल पे रखी रहती, जिसका होता उठा लेता या कोई उस विंग वाला होता तो वो भी ला के दे देता। लेकिन गुड्डी की चिट्ठी के चक्कर में, मैं भी बेवकूफों की तरह जिस दिन गुड्डी की चिट्ठी आती, उसी दिन जवाब लिखा जाता, भेजा जाता और अगले दिन से हॉस्टल के आफिस का चक्कर चालू दिन में तीन बार और कुछ दिन में उड़ती चिड़िया के पर भांपने वालों ने भांप लिया कोई खास चिट्ठी है। बस एकाध बार चिट्ठी जब्त भी हो गयी और सबको चाय पिलाने के बाद ही मिली, और फिर गुड्डी की मोती ऐसी राइटिंग, पता देख के ही लोग समझ जाते थे की, कोई खास है।
हाँ समझदार तो वो है तो बस ये गनीमत थी की नाम नहीं लिखती थी बस बनारस, और इतना तो सब को पता चल गया की आनंद बाबू का चक्कर किसी बनारस की चिट्ठी वाली से है।
डी बी ऐसे दो चार क्लोज लोग ही थे जिन्हे नाम मालूम था लेकिन उसके आगे कुछ नहीं।
डी बी ने एक हॉस्टल के सीनियर फिर जॉब में सीनियर होने के नाते एक काम की बात बोली, " तुम घर जा रहे हों न "
" हाँ मैं हलके से बोला। गुड्डी मेरे कंधे पे सर रखे शायद ऊंघा रही थी, रतजगे की तैयारी में, थोड़ी सी नींद कही भी कभी भी।
" स्साले, अभी घर पे शादी की बात पक्की कर ले, किस्मत है तेरी इतनी अच्छी लड़की मिल रही है। और तेरी ट्रेनिंग तो अभी पांच छह महीने बची है न "
" हाँ, बस मई से फिल्ड ट्रेनिंग तो यहीं यूपी में ही और फिर सितंबर तक पोस्टिंग " मैंने बताया।
" बेस्ट है, सबसे अच्छा फील्ड ट्रेनिंग के टाइम में शादी कर ले , अगर एक बार पोस्टिंग हो गयी न तो गिन के तीन दिन की शादी की छुट्टी मिलेगी और सुहागरात के दिन फोन आ जायेगा, कही बंदोबस्त में ड्यूटी लगी है, फिर पता नहीं कहाँ कोने अंतरे पोस्टिंग हो, और हाँ वो तेरा पेपर पढ़ा था मैंने मेरे पास भी असेसमनेट के लिए आया था, जबरदस्त था, डाटा भी काफी था और अनैलेसिस भी।"
ट्रेनिंग में दो साल में दो पेपर लिखने होते हैं तो मैंने पूर्वांचल का माफिया लिखा था नाम तो पेपर टाइप ही था, सोशियो -इकोनॉमिक पर्स्पेक्टिव और ईस्टर्न यू पी माफिया। लेकिन असली खेल था फील्ड विजिट के नाम पे एक हफ्ते का टाइम मिलता था, ईस्टर्न यूपी मतलब हफ्ते भर के लिए में घर आ गया और गुड्डी भी उस समय आयी थी।
डीबी ने मेरा पेपर ध्यान से पढ़ा था, और इन्होने एक टेढ़ा सवाल पूछ लिया,
" ये तो ठीक है की पूर्वांचल में माफिया का चक्कर जो ७० और ८० के दशक में शुरू हुआ और ९० के दशक में अमरबेल की तरह फ़ैल गया, उसका आधार जाति था लेकिन उसका फायदा क्या मिला और उससे लिमिट्स क्या सेट हुईं ?
बस मुझे मौका मिल गया ज्ञान बघारने का और मैं नॉन स्टॉप बोलता रहा। गुड्डी और रीत के सामने तो बोलने का सवाल ही नहीं था,
" दोनों गुट दो डॉमिनेंट कास्ट के थे और सबसे बड़ी बात मुझे ये लगी की एक फ्यूडल कल्चर के बचे हुए अंश साफ़ साफ़ दिख रहे थे, प्रभुत्व स्थापित करने की लड़ाई और उस प्रभुत्व का एक्सटर्नल मैनिफेस्टेशन। और सबसे बड़ा अडवांटेज था उन्हें बिना बोले अपनी जाति के लोगों का अलीजियेंस मिला, फिजिकल, फायनेंसियल और इमोशनल सपोर्ट। और क्योंकि सैकड़ों सालों से ये ढांचा वहां था, इनबिल्ट था तो इस तरह की ग्रुप लॉयल्टी का, "
लेकिन डी बी ने मुझे काट दिया, लेकिन तुमने उनके ढांचे के बारे में भी अच्छा लिखा था।
" हां," मैं बोला और स्वीकार किया की मैं भी चकित था। ऊपर की पहली दो तीन पक्तियों में तो जाति का असर था जिसमे उनके फंक्शनल हेड , एरिया हेड इत्यादि थे लेकिन जो फुट सोल्जर्स थे उनमे भी बहुत वैरायटी थी। शूटर्स तो टोटेम पोल में सबसे ऊपर थे लेकिन ज्यादातर का लाइफ स्पान शार्ट था, पर उसके अलावा वाचर्स, फ़ॉलोअर्स, स्पलायर्स , रुकने और रहने का ठिकाना देने वाले इन सबकी पूरी फ़ौज थी और कई तो बस ' बॉस खुश होगा ' के अंदाज में इन्फर्मेशन मुहैया कराते थे । "
" एकदम सही कह रहे हो, जब छह महीने बाद तेरी पोस्टिंग होगी तो पहली पोस्टिंग में ही पता चल जाएगा की असली ताकत किस के पास है "
थोड़ा दुखी , थोड़ा गंभीर हो के वो बोले, फिर जोड़ा,
मेरे अपने आफिस में मुझे पता नहीं है की में जो बोलता हूँ वो कहाँ कहाँ तक पहुंचता है। लेकिन ये चेंज भी तुमने एकदम सही मैप किया था और पूरे डिटेल्स के साथ, ये फंक्शनल कमाडंर वाली बात मेरी समझ में नहीं आयी लेकिन
और मुझे फिर बोलने का मौका मिला गया,
" जब एक बार जातिगत माफिया का सिक्का बैठ गया तो बस असली चीज थी कमाई और ठेकदारी वो समझ गए की रंगदारी से भी बढ़िया है, तो उन्होंने डिपार्टमेंट वाइज बाँट दिया, किसी को पी डब्लू डी , किसी को सिंचाई, किसी को रेलवे, किसी को बिजली, तो बस जितने ठेके वाले काम थे सब। रेलवे में तो मैं चौंक गया, एक पांडेय जी फंक्शनल हेड थे, स्टेशन पर बिकने वाली रेवड़ी के ठेके से लेकर कंस्ट्रक्शन के बड़े से बड़े ठेके तक, और छोटे ठेके में पैसा कमाने से ज्यादा प्रभुत्व और उनकी छत्रछाया, और वो सब बिन पैसे के इन्फॉर्मर के तौर पर काम करते थे। असली पैसा बड़े ठेके में था। और मैंने तो यहाँ तक सुना कि अक्सर रेलवे मिनिस्टर बिहार के होते थे, वहां कि रेलवे लाइन के काम भी होते थे लेकिन ठेका चूँकि रेलवे का मुख्यालय गोरखपुर में था इसलिए उत्तर बिहार के माफिया को दिक्क्त होती थी। इसलिए भी रेलवे का विभाजन हुआ और हाजीपुर बिहार के जितने रेलवे मंडल थे,
गुड्डी कि तरह डी बी को भी बात काटने कि आदत थी, वो बोले
"लेकिन ये काम करने की तो इन सब माफिया की ताकत तो थी नहीं
" काम तो काम करने वाली ही कम्पनिया ही करती थी हाँ उनके रेट में २० से २५ परसेंट बढ़ा के ये कोट करती थी, और ये एक्स्ट्रा पैसा सीधे फंक्शनल हेड के जरिये और दुसरे छोटे मोटे कम टेक्निकल लेबर इंटेसिव काम, सप्लाई के काम भी माफिया के आदमियों को तो वो अलग से पैसा बनाते थे। "
हम लोगो की पुलिस वाली गाडी रुक गयी थी , सामने कोई वृषभ विश्राम कर रहे थे। तो ड्राइवर बगल की दूकान से चाय लेने चला गया।
मैं और गुड्डी चाय सुड़क रहा थे और मैं डी बी से पॉलिटिक्ल, आफीसीएल, माफिया और बिजनेस नेक्सस के बारे में बात कर रहा था लेकिन डी बी ने कहा
" तुम्हारे पेपर में एक पार्ट नहीं है लेकिन वो सब्जेक्ट का पार्ट था भी नहीं और वो एकदम हाल का मुद्दा और अब मुझे सबसे ज्यादा डर उसी से लगता है, "
क्या, मेरी समझ में नहीं आया। और अब डी बी ने बोलना शुरू किया तो रुके नहीं। गाडी चल पड़ी थी।