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कहानी 1 : ट्रेन यात्रा
साल 1976
यह कहनी है एक खूबसूरत औरत की जिसका नाम कीर्ति है। कीर्ति की उम्र उस वक्त 24 साल को थी और वो इतनी खूबसूरत कि जो देखे बस उसका होना चाहे।
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यह कहानी है कीर्ति की। कीर्ति वैसे बैंक में काम करती है। तनख्वा बहुत अच्छी और जीवन शैली भी बहुत ऊंची। वैसे कीर्ति की शादी एक रहीस घराने से हुई। लेकिन उसका पति एक घटिया और लफ़ड़ेबाज़ था। अपनी ऑफिस को लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाता। उसने कीर्ति के साथ जिस्मानी संबंध बहुत कम बनाया। कीर्ति जैसे खूबसूरत बीवी को देखता तक नहीं और लड़ाई बहुत करता । कीर्ति इन साब से तंग आ गई और घर छोड़कर अपने घर पुणे चली गई। वहां बैंक में नौकरी पा गई और तनख्वाह अच्छी होने से वो आजाद रहती लेकिन उसके घर में भी समस्या है। उसके मां बाप अच्छे पद पर सरकारी नौकरी करते है लेकिन विचार बहुत पिछड़ा। वो कीर्ति को बार बार ससुराल वापिस जाने को कहते लेकिन एक दिन गुस्से से कीर्ति ने तलाक दे दिया अपने पति को और अलग से घर में रहने लगी। वो अपने शर्तों पर जीने लगी। कीर्ति के मां बाप ने उससे बात करना बंद कर दिया।
एक दिन जुलाई 1976, कीर्ति को बैंक के का से दिल्ली जाना था। दिल्ली के लिए पुणे से ट्रेन direct नहीं था तो उसने मुंबई से दिल्ली की ट्रेन का टिकट लिया। बारिश का मौसम था और ट्रेन 13 घंटे लेट था। कीर्ति स्लीवलेस ब्लाउज और सुंदर साड़ी में अप्सरा लग रही थी।
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पूरा स्टेशन रात के समय खाली था। कीर्ति घबरा गई क्योंकि इतनी रात वो अकेली थी और आस पास आवारा लड़के उसे छेड़ रहे थे।
एक आदमी उसके पास आया और बोला " आए चलती है क्या ?"
कीर्ति ने जवाब न दिया। वो आदमी ने उसका हाथ पकड़ा और बोला "चल मेरे साथ।"
कीर्ति ने कहा "ये मत करो मुझे परेशान मत करो।
आदमी : अबे रांडी इतनी रात अकेली ग्राहक के इंतजार में होगी। चल मेरे आदमी भी तेरी गांड़ मरेंगे।
कीर्ति रोने लगी लेकिन कोई भी आस पास नहीं था। वो आदमी कीर्ति का अपहरण कर रहा था। उसे स्टेशन के किनारे तक लेने में सफल हुआ। कीर्ति को अपनी इज्जत लुटते हुए दिख रही थी कि अचानक से उस आदमी से सिर पर किसी ने जोर से पत्थर मारा। वो आदमी बेहोश हो गया। जिस आदमी ने पत्थर मारा वो एक दुबला पतला और काला बुड्ढा था। उसकी उम्र 65 साल की थी। उसका नाम गंगू था।
बेहोश पड़े आदमी को बूढ़े ने घसीटते हुए एक कूड़े कचरे में डाल दिया। कीर्ति ने उस बूढ़े आदमी को शुक्रिया अदा किया।
कीर्ति : आपने मेरी मदद की इसकेंलिए बहुत बहुत शुक्रिया।
उस बूढ़े गंगू ने जैसे ही कीर्ति को देखा तो बस देखता रह गया। एक बला की खूबसूरत और दिलकश चेहरा। बूढ़ा तो पहली नजर में कीर्ति को दिल दे बैठा।
गंगू : इसमें कोई शुक्रिया कहने की जरूरत नहीं लेकिन एक बात बताओ इतनी रात अकेली यहां क्या कर रही हो बेटी ?
कीर्ति : वो दरअसल मुझे दिल्ली जाना है। वहां बैंक के काम से। मैं पुणे के सरकारी बैंक में काम करती हूं।
गंगू : सुनो। अगर इस आदमी को होश आया तो वो अपने आदमियों को लेकर तुम्हे उठाने के लिए आएगा। उसे पता है कि तुम दिल्ली जा रही हो और ट्रेन लेट है।
कीर्ति : अभी रात के 9 बजे है और ट्रेन 5 बजे सुबह आयेगा। क्या करूं ?
गंगू : मै तुम्हारे साथ हूं। तुम्हारी रक्षा के लिए।
कीर्ति : माफ करना चाचा लेकिन आप बूढ़े और उसके पास पूरी फौज होगी।
गंगू : तो क्या हुआ ? अकेले लडूंगा। तुम्हे बचाऊंगा। कायर की तरह जीने से अच्छा एक शेर की मौत मारूंगा।
गंगू की ये बात कीर्ति के दिल को छू गया। वो जैसे भावुक हो गई और बोलो "हम एक दूसरे को जानते नहीं फिर भी मेरे लिए जान को दाव पर लगाएंगे आप ?"
गंगू : अब हमारा रिश्ता बन गया। एक दोस्ती का। मेरे लिए अब तुम एक खास बन गई हो।
कीर्ति को गंगू की बातें अच्छी लगी। दोनों में फिर पहचान हो गई। कीर्ति को अब गंगू के भिखारी होने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा। बातों बातों में उसे पता चला कि गंगू मुंबई की झोपडी में रहता और भीख मांगता। उसका परिवार इलाहाबाद के जमुरा गांव में रहता। उसके घर में एक विधवा बहु, 3 छोटे छोटे पोते और एक बड़ा भाई रहते। गंगू उनका पेट पलता भीख मांगकर या मजदूरी करके। वो भी इलाहाबाद जा रहा था। उसका भी यहीं था। वो एक सामान्य कक्षा में रिजर्वेशन लिया था। सुबह 5 बजे लेकिन बारिश न रुकी। बदल घना और अंधेरा भी था। गंगू ने देखा कि कुछ गुंडे स्टेशन में आ गए। उसने कीर्ति को छुपाकर भागने लगा। दोनों चुप छुपाते हुए भागने लगें। आखिर सुबह 9 बजे ट्रेन आई। दोनों ट्रेन पर चढ़ गए।
ज्यादा लेट होने को वजह से ज्यादातर लोगों ने टिकट कैंसिल करवा दीं। बारिश लगातार चल रही थी। सुबह 9 बजे ट्रेन आई और कीर्ति तुरंत ट्रेन पर चढ़ गई लेकिन मुश्किल यह थी कि पूरे डब्बे में कोई नहीं था। मुश्किल और बढ़ी। गुंडों ने तीन पर चढ़ना शुरू किया अलग अलग डब्बे पर चढ़े। गंगू को पता था कि कोई नहीं आनेवाले बचाने जो करना है खुद ही को करना होगा। उसने डब्बे का दरवाजा बंद कर दिया। लेखी। डब्बे एक दूसरे से जुड़े हुए थे ये बात दोनों को पता थी।
गंगू : तुम तैयार रहो। वो आते हो होंगे। तुम उनके सामने खड़ी रहो।
कीर्ति : ये क्या कह रहे है आप ? मुझे छुपना चाहिए और आप...
गंगू : कितना कहीं उतना करो।
कीर्ति सामने खड़ी थी और एक आदमी ने उसे देखा। वो मुस्कुराते हुए उसके पास आया और बोला " आज तू हम 10 लोगो के साथ रात गुजरेगी। मानजा नहीं तो बलात्कार करेंगे मैं अब्दुल, सलीम, करीम और पूरे गैंग के लोग और तुझसे निकाह करके अपने साथ अरब देश के जायेंगे। पहले तेरा बलात्कार होगा और फिर सलीम तुझसे निकाह करके अपने साथ ले जाएगा।"
इतना सुनकर कीर्ति डर से कांप गईं। गंगू डब्बे में फैले अंधेरे का फायदा उठकर पीछे आया और चाकू से रफीक 0आर वार किया। उनके रफीक के पैर पर वार किया। दर्द से चिल्लाया रफीक और फिर बड़े डंडे से उसके सिर पर वार किया गंगू ने और रफीक को बेहोश किया। उसके शरीर को छुपाकर गंगू ने ऐसे ही तीन और लोगों को ठिकाने लगाया। आखिर में ट्रेन चल दी और बाकी के आदमी समझ गए कि लड़की भाग गई। ट्रेन को चलता देख और लोगों को जाता देख गंगू और कीर्ति ने राहत की सासें ली।
चार गुंडे अभी भी बेहोश पड़े थे। गंगू ने सबसे पहले उन्हें नंगा किया, उनके कपड़े जलाकर बाहर फेंका और सारे पैसे अपने पास रख लिया। 2 घंटे बाद उन चार नंगे गुंडों को अगले स्टेशन में फेक दिया। स्टेशन सुनसान था। अब कोई खतरा नहीं। ट्रेन चल पड़ी।
कीर्ति ने अचानक से गंगू को गले लगा लिया और रोते हुए कहा " आप न होते तो ये लोग मेरी जिंदगी बर्बाद कर देतें।"
गंगू ने कीर्ति को बाहों में कस लिया और कहा "अब मैं हूं न। कोई तुम्हे हाथ नहीं लगा सकता।"
रोते हुए कीर्ति ने गंगू को कहा "आप मेरे साथ रहना। मुझे आपकी जरूरत है "
गंगू अभी भी कीर्ति को बाहों में कसा हुआ था और कहा "तुम आराम करो। अभी सफर बहुत लंबा है। 40 घंटे का सफर है।"
वहां उन दोनों को पता चला कि ट्रेन खाली हो रहेगी। और स्टेशन पर ज्यादा नहीं रुकेगी। दोनों अब आराम से ट्रेन में घूमने लगे और बातें करने लगे। गंगू बातों बातों में कीर्ति का हाथ पकड़ लेता तो कभी खिड़की से नज़ारे देख रही कीर्ति की गोदी पर सिर रख लेता। कीर्ति की मुकुराहट के साथ उस गंदे भिखारी के बालों को सहलातीं।
गंगू मीठी नींद को अघोष में था। सामने कुदरत का करिश्मा। मूसलधार बारिश को देखते देखते कीर्ति मौसम को देखती रह गई। उसने साड़ी के पल्लू को गिराया और ट्रेन के दरवाजे पर खड़ी उस सुंदरता को देख रही थी। जब गंगू को आँखें खुली तो घबरा गया। वो कीर्ति को ढूंढने के लिए आगे बढ़ा तो कीर्ति की आँखें उसको आंखों से मिली। गंगू को प्यार हो गया कीर्ति के इस मनमोहक अदा से। सिर्फ ब्लाउज पेटीकोट में खड़ी कीर्ति उसके अंदर प्यार को ज्वाला भड़का रही थी।
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To be continued.....
साल 1976
यह कहनी है एक खूबसूरत औरत की जिसका नाम कीर्ति है। कीर्ति की उम्र उस वक्त 24 साल को थी और वो इतनी खूबसूरत कि जो देखे बस उसका होना चाहे।
यह कहानी है कीर्ति की। कीर्ति वैसे बैंक में काम करती है। तनख्वा बहुत अच्छी और जीवन शैली भी बहुत ऊंची। वैसे कीर्ति की शादी एक रहीस घराने से हुई। लेकिन उसका पति एक घटिया और लफ़ड़ेबाज़ था। अपनी ऑफिस को लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाता। उसने कीर्ति के साथ जिस्मानी संबंध बहुत कम बनाया। कीर्ति जैसे खूबसूरत बीवी को देखता तक नहीं और लड़ाई बहुत करता । कीर्ति इन साब से तंग आ गई और घर छोड़कर अपने घर पुणे चली गई। वहां बैंक में नौकरी पा गई और तनख्वाह अच्छी होने से वो आजाद रहती लेकिन उसके घर में भी समस्या है। उसके मां बाप अच्छे पद पर सरकारी नौकरी करते है लेकिन विचार बहुत पिछड़ा। वो कीर्ति को बार बार ससुराल वापिस जाने को कहते लेकिन एक दिन गुस्से से कीर्ति ने तलाक दे दिया अपने पति को और अलग से घर में रहने लगी। वो अपने शर्तों पर जीने लगी। कीर्ति के मां बाप ने उससे बात करना बंद कर दिया।
एक दिन जुलाई 1976, कीर्ति को बैंक के का से दिल्ली जाना था। दिल्ली के लिए पुणे से ट्रेन direct नहीं था तो उसने मुंबई से दिल्ली की ट्रेन का टिकट लिया। बारिश का मौसम था और ट्रेन 13 घंटे लेट था। कीर्ति स्लीवलेस ब्लाउज और सुंदर साड़ी में अप्सरा लग रही थी।
पूरा स्टेशन रात के समय खाली था। कीर्ति घबरा गई क्योंकि इतनी रात वो अकेली थी और आस पास आवारा लड़के उसे छेड़ रहे थे।
एक आदमी उसके पास आया और बोला " आए चलती है क्या ?"
कीर्ति ने जवाब न दिया। वो आदमी ने उसका हाथ पकड़ा और बोला "चल मेरे साथ।"
कीर्ति ने कहा "ये मत करो मुझे परेशान मत करो।
आदमी : अबे रांडी इतनी रात अकेली ग्राहक के इंतजार में होगी। चल मेरे आदमी भी तेरी गांड़ मरेंगे।
कीर्ति रोने लगी लेकिन कोई भी आस पास नहीं था। वो आदमी कीर्ति का अपहरण कर रहा था। उसे स्टेशन के किनारे तक लेने में सफल हुआ। कीर्ति को अपनी इज्जत लुटते हुए दिख रही थी कि अचानक से उस आदमी से सिर पर किसी ने जोर से पत्थर मारा। वो आदमी बेहोश हो गया। जिस आदमी ने पत्थर मारा वो एक दुबला पतला और काला बुड्ढा था। उसकी उम्र 65 साल की थी। उसका नाम गंगू था।
बेहोश पड़े आदमी को बूढ़े ने घसीटते हुए एक कूड़े कचरे में डाल दिया। कीर्ति ने उस बूढ़े आदमी को शुक्रिया अदा किया।
कीर्ति : आपने मेरी मदद की इसकेंलिए बहुत बहुत शुक्रिया।
उस बूढ़े गंगू ने जैसे ही कीर्ति को देखा तो बस देखता रह गया। एक बला की खूबसूरत और दिलकश चेहरा। बूढ़ा तो पहली नजर में कीर्ति को दिल दे बैठा।
गंगू : इसमें कोई शुक्रिया कहने की जरूरत नहीं लेकिन एक बात बताओ इतनी रात अकेली यहां क्या कर रही हो बेटी ?
कीर्ति : वो दरअसल मुझे दिल्ली जाना है। वहां बैंक के काम से। मैं पुणे के सरकारी बैंक में काम करती हूं।
गंगू : सुनो। अगर इस आदमी को होश आया तो वो अपने आदमियों को लेकर तुम्हे उठाने के लिए आएगा। उसे पता है कि तुम दिल्ली जा रही हो और ट्रेन लेट है।
कीर्ति : अभी रात के 9 बजे है और ट्रेन 5 बजे सुबह आयेगा। क्या करूं ?
गंगू : मै तुम्हारे साथ हूं। तुम्हारी रक्षा के लिए।
कीर्ति : माफ करना चाचा लेकिन आप बूढ़े और उसके पास पूरी फौज होगी।
गंगू : तो क्या हुआ ? अकेले लडूंगा। तुम्हे बचाऊंगा। कायर की तरह जीने से अच्छा एक शेर की मौत मारूंगा।
गंगू की ये बात कीर्ति के दिल को छू गया। वो जैसे भावुक हो गई और बोलो "हम एक दूसरे को जानते नहीं फिर भी मेरे लिए जान को दाव पर लगाएंगे आप ?"
गंगू : अब हमारा रिश्ता बन गया। एक दोस्ती का। मेरे लिए अब तुम एक खास बन गई हो।
कीर्ति को गंगू की बातें अच्छी लगी। दोनों में फिर पहचान हो गई। कीर्ति को अब गंगू के भिखारी होने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा। बातों बातों में उसे पता चला कि गंगू मुंबई की झोपडी में रहता और भीख मांगता। उसका परिवार इलाहाबाद के जमुरा गांव में रहता। उसके घर में एक विधवा बहु, 3 छोटे छोटे पोते और एक बड़ा भाई रहते। गंगू उनका पेट पलता भीख मांगकर या मजदूरी करके। वो भी इलाहाबाद जा रहा था। उसका भी यहीं था। वो एक सामान्य कक्षा में रिजर्वेशन लिया था। सुबह 5 बजे लेकिन बारिश न रुकी। बदल घना और अंधेरा भी था। गंगू ने देखा कि कुछ गुंडे स्टेशन में आ गए। उसने कीर्ति को छुपाकर भागने लगा। दोनों चुप छुपाते हुए भागने लगें। आखिर सुबह 9 बजे ट्रेन आई। दोनों ट्रेन पर चढ़ गए।
ज्यादा लेट होने को वजह से ज्यादातर लोगों ने टिकट कैंसिल करवा दीं। बारिश लगातार चल रही थी। सुबह 9 बजे ट्रेन आई और कीर्ति तुरंत ट्रेन पर चढ़ गई लेकिन मुश्किल यह थी कि पूरे डब्बे में कोई नहीं था। मुश्किल और बढ़ी। गुंडों ने तीन पर चढ़ना शुरू किया अलग अलग डब्बे पर चढ़े। गंगू को पता था कि कोई नहीं आनेवाले बचाने जो करना है खुद ही को करना होगा। उसने डब्बे का दरवाजा बंद कर दिया। लेखी। डब्बे एक दूसरे से जुड़े हुए थे ये बात दोनों को पता थी।
गंगू : तुम तैयार रहो। वो आते हो होंगे। तुम उनके सामने खड़ी रहो।
कीर्ति : ये क्या कह रहे है आप ? मुझे छुपना चाहिए और आप...
गंगू : कितना कहीं उतना करो।
कीर्ति सामने खड़ी थी और एक आदमी ने उसे देखा। वो मुस्कुराते हुए उसके पास आया और बोला " आज तू हम 10 लोगो के साथ रात गुजरेगी। मानजा नहीं तो बलात्कार करेंगे मैं अब्दुल, सलीम, करीम और पूरे गैंग के लोग और तुझसे निकाह करके अपने साथ अरब देश के जायेंगे। पहले तेरा बलात्कार होगा और फिर सलीम तुझसे निकाह करके अपने साथ ले जाएगा।"
इतना सुनकर कीर्ति डर से कांप गईं। गंगू डब्बे में फैले अंधेरे का फायदा उठकर पीछे आया और चाकू से रफीक 0आर वार किया। उनके रफीक के पैर पर वार किया। दर्द से चिल्लाया रफीक और फिर बड़े डंडे से उसके सिर पर वार किया गंगू ने और रफीक को बेहोश किया। उसके शरीर को छुपाकर गंगू ने ऐसे ही तीन और लोगों को ठिकाने लगाया। आखिर में ट्रेन चल दी और बाकी के आदमी समझ गए कि लड़की भाग गई। ट्रेन को चलता देख और लोगों को जाता देख गंगू और कीर्ति ने राहत की सासें ली।
चार गुंडे अभी भी बेहोश पड़े थे। गंगू ने सबसे पहले उन्हें नंगा किया, उनके कपड़े जलाकर बाहर फेंका और सारे पैसे अपने पास रख लिया। 2 घंटे बाद उन चार नंगे गुंडों को अगले स्टेशन में फेक दिया। स्टेशन सुनसान था। अब कोई खतरा नहीं। ट्रेन चल पड़ी।
कीर्ति ने अचानक से गंगू को गले लगा लिया और रोते हुए कहा " आप न होते तो ये लोग मेरी जिंदगी बर्बाद कर देतें।"
गंगू ने कीर्ति को बाहों में कस लिया और कहा "अब मैं हूं न। कोई तुम्हे हाथ नहीं लगा सकता।"
रोते हुए कीर्ति ने गंगू को कहा "आप मेरे साथ रहना। मुझे आपकी जरूरत है "
गंगू अभी भी कीर्ति को बाहों में कसा हुआ था और कहा "तुम आराम करो। अभी सफर बहुत लंबा है। 40 घंटे का सफर है।"
वहां उन दोनों को पता चला कि ट्रेन खाली हो रहेगी। और स्टेशन पर ज्यादा नहीं रुकेगी। दोनों अब आराम से ट्रेन में घूमने लगे और बातें करने लगे। गंगू बातों बातों में कीर्ति का हाथ पकड़ लेता तो कभी खिड़की से नज़ारे देख रही कीर्ति की गोदी पर सिर रख लेता। कीर्ति की मुकुराहट के साथ उस गंदे भिखारी के बालों को सहलातीं।
गंगू मीठी नींद को अघोष में था। सामने कुदरत का करिश्मा। मूसलधार बारिश को देखते देखते कीर्ति मौसम को देखती रह गई। उसने साड़ी के पल्लू को गिराया और ट्रेन के दरवाजे पर खड़ी उस सुंदरता को देख रही थी। जब गंगू को आँखें खुली तो घबरा गया। वो कीर्ति को ढूंढने के लिए आगे बढ़ा तो कीर्ति की आँखें उसको आंखों से मिली। गंगू को प्यार हो गया कीर्ति के इस मनमोहक अदा से। सिर्फ ब्लाउज पेटीकोट में खड़ी कीर्ति उसके अंदर प्यार को ज्वाला भड़का रही थी।
To be continued.....