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भाग 202
कुछ ही पलों के तीव्र संघर्ष के बाद, दोनों एक साथ चरम सुख के सागर में डूब गए। दोनों के मुंह से एक लंबी और तृप्त कराह निकली और वे एक-दूसरे के बदन पर ढह गए। सोनी की मुनिया के भीतर विकास का वीर्य पूरी गहराई तक समाहित हो रहा था, जो उनके बरसों पुराने सपने को पूरा करने का प्रयास था। दोनों इस ठंडी रात में एक-दूसरे की बाहों में बंधे, ज़ोर-ज़ोर से हाँफते हुए कल होने वाले उस महा-मिलन की कल्पना में खो गए, जहाँ मर्यादा की आखिरी दीवार भी ढहने वाली थी।
अब आगे..
उधर सूरज खुश था उसके मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।
सूरज के तनबदन में लगी आग सोनी तात्कालिक तौर पर शांत कर चुकी थी। सोनी के कमरे से आने के बाद सूरज अपने बिस्तर पर लेट किया। सूरज के दिमाग में एक गहरा शक पैदा होने लगा था। उसे रह-रहकर यह विचार आ रहा था कि क्या यह सब कुछ वाकई विकास मौसा जी की मर्जी या सहमति से हो रहा है? इस बात की संभावना उसे इसलिए भी लग रही थी, क्योंकि सोनी मौसी अभी तक गर्भवती नहीं हो पाई थीं और शादी के इतने साल बाद भी वे संतान सुख से वंचित थे। यह बात खुद मौसी ने भी उसके सामने खुलकर स्वीकार की थी कि वे एक बच्चे के लिए कितनी तड़प रही हैं।
तो क्या इस गुप्त सिलसिले के पीछे विकास मौसा जी की भी मूक सहमति है? क्या वे खुद चाहते हैं कि संतान सप्तमी के इस अनुष्ठान के जरिए उनके घर में खुशियां आएं? या फिर सोनी मौसी उनसे छिपकर, बेहद शातिर तरीके से इस वर्जित अनुष्ठान को अंजाम दे रही हैं ताकि अपने जीवन के उस सूनेपन को भर सकें? सूरज का युवा दिमाग इन दोनों संभावनाओं के बीच झूल रहा था।
पर जो भी हो, इन उलझनों के बीच सूरज के मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।
अगली सुबह का इंतजार करते हुए सूरज भी सुखद नींद में सो गया।
संतान सप्तमी का अंतिम दिन बेहद महत्वपूर्ण था सुबह-सुबह जब सूरज विकास और सोनी अपनी सुबह की चाय कंप्लीट कर अपने-अपने कमरों में जाने वाले थे तभी सुगना का फोन आ गया सुगना सोनी से बातें करती है और संतान सप्तमी के पिछले अच्छे दिनों का हाल-चाल पूछती थी सोनी भी इशारों सालों में उसे सारी बात बताती है पर्वत सूरज के साथ अपने संभोग को छुपा ले जाती है दूर बैठे विकास और सूरज एक दूसरे से बातें करते रहते हैं पर उनका ध्यान सोने के उत्तरों पर लगा रहता है और वह हम दोनों की बातचीत को समझने का प्रयास करते हैं
संतान सप्तमी के इस अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन की सुबह पहाड़ों की तेज़ ठंड और हल्की धुंध के साथ हुई। कमरे के भीतर गरमा-गरम चाय का दौर चल रहा था। विकास, सोनी और सूरज एक साथ बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे, लेकिन माहौल में एक अजीब सी खामोशी और आने वाले पल का रोमांच साफ़ महसूस हो रहा था। तभी अचानक सोनी के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर सूरज की माँ यानी सुगना का नाम चमक रहा था।
सोनी ने बिना एक पल गंवाए लपककर फोन उठाया और वहीं बिस्तर पर पेट के बल लेटकर सुगना से बात करने लगती है। इस तरह लेटने की वजह से उसकी पीठ और नितंबों का उभार मद्धम रोशनी में और भी आकर्षक लग रहा था। बात करते-करते उसने मस्ती में अपने पैरों को थोड़ा ऊपर उठाया, जिससे उसकी रेशमी नाइटी सरककर घुटनों तक आ गई और उसकी गोरी जाँघों का कुछ हिस्सा साफ़ दिखाई देने लगा।
सोनी अपनी बहन सुगना की बातों में इतनी खोई हुई थी और उससे बात करने के अहसास में इतनी उन्मुक्त और मदहोश थी कि उसे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि पीछे बैठे विकास और सूरज एक साथ उसकी इस मादक स्थिति को निहार रहे हैं। पहाड़ों की उस सुबह, सोनी का यह बेबाक और मदहोश अंदाज़ उन दोनों मर्दों की धड़कनों को एक साथ तेज़ कर रहा था।
सूरज विकास के ठीक बगल में बैठा हुआ था और चाहकर भी अपनी नज़रों को काबू में नहीं रख पा रहा था। वह मौसा जी के सामने अपनी मौसी के इस मादक बदन और उभरे हुए नितंबों को देखने से बार-बार कतरा रहा था, उसे लग रहा था कि कहीं उसका यह गुप्त आकर्षण पकड़ा न जाए। लेकिन बिस्तर पर लेटी सोनी की वह मुद्रा इतनी उन्मुक्त और कामुक थी कि उसका युवा मन और उसकी आँखें खुद-ब-खुद उस तरफ खिंची चली जा रही थीं। वह चाय की चुस्की लेने के बहाने बार-बार अपनी पलकें उठाता और नाइटी से बाहर झलकती सोनी की गोरी, चिकनी जाँघों और नंगे घुटनों को एकटक निहारने लगता।
विकास वहीं बैठा सूरज की इस छटपटाहट और उसकी बदलती मनोदशा को बहुत गहराई से समझ रहा था। सूरज की आँखों में अपनी पत्नी के लिए बढ़ती उस बेकाबू वासना और तड़प को भाँपकर विकास के भीतर घृणा के बजाय एक तीव्र उत्तेजना का करंट दौड़ गया। उसे इस बात से गहरा मानसिक और शारीरिक सुख मिल रहा था कि उसका भांजा उसकी पत्नी के अंगों को देखकर अंदर ही अंदर सुलग रहा है। विकास ने जानबूझकर कोई दखल नहीं दिया, बल्कि वह शांत बैठकर इस वर्जित नज़ारे का लुत्फ उठाने लगा।
उधर इन दोनों मर्दों की आंतरिक हलचल से पूरी तरह बेखबर, सोनी एकदम बिंदास और मदहोश होकर फोन पर सुगना से बातें करने में मग्न थी। वह हंसती, मुस्कुराती और बातों-बातों में अपने पैरों को हवा में हिलाती, जिससे उसकी नाइटी का रेशमी कपड़ा बार-बार सरककर उसकी जाँघों को और उजागर कर देता।
सुगना और सोनी के बीच फोन पर बातचीत जारी थी। दोनों बहनें कम और सहेलियाँ ज़्यादा थीं, इसलिए उनके बीच की टोन बेहद अनौपचारिक और खुली हुई थी। हालांकि, सुगना को रत्ती भर भी यह अहसास नहीं था कि सूरज और सोनी के बीच कोई गुप्त संबंध बन चुका है; वह तो बस यही जानती थी कि विकास और सोनी मिलकर संतान सप्तमी का यह पवित्र और कठिन अनुष्ठान पूर्ण कर रहे हैं।
सुगना (फोन पर, धीमी और रसभरी आवाज़ में): "सोनी... छह दिन बीत गए। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान अपनी चरम ऊर्जा पर पहुँच चुका होगा। सच-सच बता, पहाड़ों की इस कड़कड़ाती ठंड में क्या तेरे बदन की तड़प को थोड़ी शांति मिली? अनुष्ठान की वो गुप्त अग्नि क्या तेरे रोम-रोम को जगा पा रही है? विकास जी इस अनुष्ठान को पूरे मन से निभा रहे हैं ना?"
सुगना के इस तीखे और बेबाक सवाल को सुनकर सोनी की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। उसने तिरछी नज़रों से बगल के सोफे पर बैठे विकास और सूरज की तरफ देखा। सोनी ने खुद को संभाला और मर्यादा का ध्यान रखते हुए अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, मर्यादित लेकिन दोहरा अर्थ रखने वाला बनाया, ताकि सुगना को उसके और विकास के बीच की बात लगे, जबकि पास बैठे सूरज और विकास को उसका असली इशारा समझ आए।
सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी... आप तो जानती हैं कि यहाँ की हवाओं में कितनी ठंड है, लेकिन इस अनुष्ठान का प्रभाव ऐसा है कि भीतर एक अजब सी गर्माहट बनी हुई है। जो अग्नि आप कह रही हैं, उसकी तपिश इतनी तेज़ है कि यह बदन अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। कल रात की आहुति तो इतनी... इतनी गहरी थी कि मैं आपको क्या बताऊँ। जैसे सब कुछ पिघलने ही वाला था।"
सुगना फोन के उस पार खिलखिला कर हँस पड़ी। फिर अचानक उसे अपने बेटे की याद आई।
सुगना (एक माँ वाली ममता के साथ): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। और सुन, मेरा सूरज कैसा है? पहाड़ों की ठंड उसे लग तो नहीं गई? वो तो पहली बार इतने ठंडे इलाके में गया है। थोड़ा उसका ध्यान रखना, खाने-पीने में बहुत लापरवाही करता है वो।"
सोनी ने फोन को थोड़ा और कसकर पकड़ा और अपनी आँखें सीधे सूरज की नज़रों में डाल दीं, जो उसे ही ताक रहा था।
सोनी (सूरज की आँखों में देखते हुए, शरारत भरी आवाज़ में): "दीदी, आप सूरज की चिंता बिल्कुल मत कीजिए। वो अब बच्चा नहीं रहा, बहुत समझदार और... बहुत 'बड़ा' हो गया है। कल रात भी मैंने उसका पूरा ध्यान रखा था। उसकी हर बेचैनी को शांत करना मुझे अच्छे से आता है। यहाँ तक कि सोने से पहले मैंने खुद पक्का किया कि वो पूरी तरह राहत में सोए।"
सोनी की इस बात का दोहरा मतलब विकास और सूरज को अच्छी तरह समझ आ रहा था। विकास की धड़कनें तेज़ हो गईं, और सूरज ने शरम और उत्तेजना के मारे अपनी नज़रें झुका लीं। सुगना इस गूढ़ इशारे को समझ नहीं पाई और उसने बात का रुख वापस विकास की तरफ मोड़ दिया।
सुगना (फुसफुसाते हुए, सोनी को उकसाते हुए): "अच्छा, यह तो ठीक है। पर ये बता, जीजा जी का क्या हाल है? इस बार के व्रत-त्योहार में उनमें वो पुराना जोश दिख रहा है या नहीं?"
सोनी ने एक गहरी सांस ली, अपने नितंबों को थोड़ा और सहज किया और विकास की तरफ देखते हुए फुसफुसाए अंदाज़ में कहा:
सोनी (इशारों ही इशारों में, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी, सच कहूँ तो जब से आपने उन्हें वो 'गुरु मंत्र' दिया है ना, तब से तो वो और भी ज़्यादा मादक और बेचैन हो गए हैं। उनके भीतर की तड़प इस कदर बढ़ गई है कि अब वो हर वक्त बस अनुष्ठान को पूर्ण होते देखना चाहते हैं। कल रात भी उनकी वो बेचैनी साफ़ दिख रही थी, और वो इस खेल को और आगे बढ़ाने के लिए बहुत उतावले हैं।"
सोनी की यह बात सुनकर विकास के सीने में गर्व और वासना का एक साथ संचार हुआ। उसे साफ़ समझ आ गया कि सोनी सुगना के सामने ही आज रात होने वाली अंतिम और पूर्ण आहुति की बिसात बिछा रही है, जबकि सुगना इस पूरे सच से पूरी तरह अनजान थी। सूरज का दिल यह सुनकर सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था।
सुगना (एक गहरी सांस लेते हुए): "चलो, आज आखिरी दिन है। अपनी देह के उस पाश को पूरी तरह खोल देना और उस ऊर्जा को खुद में समाहित कर लेना ताकि गोद हरी हो जाए।"
सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए): "जी दीदी, आप निश्चिंत रहिए। आज का अनुष्ठान और आज की पूर्णाहूति ऐसी होगी कि सब कुछ हमेशा के लिए बदल जाएगा और इसे कोई कभी नहीं भूल पाएगा।"
फोन पर सुगना की बातें खत्म होने ही वाली थीं कि अचानक उसे कुछ याद आया और उसने सोनी से कहा, "सोनी, जरा सूरज को फोन देना, मुझे उससे भी थोड़ी बात करनी है।"
सोनी ने तुरंत बिस्तर पर अपनी स्थिति बदली और कमरे के दूसरी तरफ बैठे सूरज को आवाज़ लगाई, "सूरज... इधर आ, तेरी माँ का फोन है, तुझसे बात करना चाहती हैं।"
सूरज ने अपने मौसा जी की तरफ देखा और फिर धड़कते दिल के साथ बिस्तर के करीब आया। सोनी ने मुस्कुराते हुए फोन सूरज के हाथ में थमा दिया, लेकिन वह बिस्तर से उठी नहीं, बल्कि वहीं लेटी रही। सूरज फोन कान से लगाकर सुगना से बात करने लगा।
सुगना (लाड़ भरे अंदाज़ में): "हाँ सूरज, कैसा है रे तू? वहाँ पहाड़ों पर कोई परेशानी तो नहीं हो रही है ना? और सुन... बनारस से निकलते वक्त मैंने जो तुझे एक विशेष पैकेट देकर भेजा था और कहा था कि इसे संतान सप्तमी के अंतिम दिन ही निकालना है, वो याद है ना? आज वो विशेष पैकेट अपनी सोनी मौसी को समर्पित कर देना, उसमें बिल्कुल देरी मत करना।"
सुगना का सीधा मतलब उस धार्मिक पैकेट से था, लेकिन इस माहौल में 'विशेष पैकेट समर्पित करने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग ने मन ही मन सुगना की बातों का एक दूसरा और गुप्त अर्थ निकाल लिया। उसने चुपके से कल रात लिहाफ़ के भीतर के उस नज़ारे को याद किया और इस 'विशेष पैकेट' को अपने युवा अंग और वीर्य के अंश से जोड़ लिया, जिसे आज रात उसे पूरी तरह मौसी को सौंपना था। हालांकि, उसने अपने चेहरे पर इस विचार की एक शिकन भी नहीं आने दी और बेहद सामान्य आवाज़ में जवाब दिया।
सुगना: "और सच-सच बता, तू ठीक है ना वहाँ? तेरी मौसी तेरा ध्यान रख रही है?"
सूरज (बेहद सहज और शांत आवाज़ में): "जी माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। आप चिंता मत करो... सोनी मौसी मेरा बहुत ख्याल रख रही हैं। यहाँ मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होने देतीं।"
सूरज की आवाज़ में कहीं भी वासना या उत्तेजना नहीं टपक रही थी, वह अपनी माँ से एक संस्कारी बेटे की तरह ही बात कर रहा था। सुगना उसकी इस सादगी से संतुष्ट होकर आगे बोली।
सुगना (नसीहत देते हुए): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन सुन, सिर्फ मौसी ही तेरा ख्याल रखे, ऐसा नहीं होना चाहिए। तू भी अब बड़ा हो गया है, आज अनुष्ठान का आखिरी और सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात गाँठ बांध ले... तुझे भी अपनी सोनी मौसी का बहुत ख्याल रखना है, उन्हें हर हाल में खुश रखना है और इस पावन दिन पर उन्हें बिल्कुल भी परेशान मत करना। जैसा वो कहें, वैसा ही करना।"
माँ की इस नसीहत को सुनकर भी सूरज ने मन ही मन उसका दूसरा, गहरा और कामुक अर्थ निकाला कि आज रात उसे मौसी को शारीरिक रूप से पूरी तरह तृप्त और खुश करना है। लेकिन प्रकट में उसने अपनी आवाज़ को बेहद मर्यादित और गंभीर बनाए रखा।
सूरज (गंभीरता से): "जी माँ, आप बिल्कुल फिक्र मत करो। मौसी कितनी खुश हैं... यह जब आप बनारस वापस आने पर उनसे मिलेंगी, तो खुद उनके चेहरे से ही पूछ लेना। मैं आपकी कही हर बात का पूरा ध्यान रखूँगा।"
सूरज का उत्तर ऊपर से जितना सीधा और मर्यादित था, उसके भीतर छिपा अर्थ उतना ही गहरा था। सूरज ने भले ही अपनी बातों से कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने दिया, लेकिन पास ही बिस्तर पर लेटी सोनी उसकी आँखों के ठहराव और इस सयानेपन को देखकर तुरंत सब कुछ समझ गई। सोनी को साफ़ अंदाज़ा हो गया कि सूरज बाहर से जितना शांत दिख रहा है, भीतर से वह आज रात की पूर्णाहूति के लिए उतना ही दृढ़ और तैयार हो चुका है।
यह कहकर सूरज ने फोन रख दिया, और कमरे में फैली खामोशी अब आज के महा-मिलन का इशारा कर रही थी।
विकास जैसे ही फ्रेश होने के लिए बाथरूम में जाता है, कमरे का माहौल एक बार फिर पूरी तरह से बदल जाता है। सूरज बिना कोई देरी किए तुरंत अपनी अटैची के पास पहुँचता है और चैन खोलकर उसमें से अपनी माँ का दिया हुआ वह विशेष पैकेट निकाल लाता है। वह उस पैकेट को लेकर सीधे बिस्तर के पास आता है और मुस्कुराते हुए सोनी मौसी के हाथों में सौंप देता है।
सोनी उस पैकेट को अपने हाथों में लेती है और पलटकर देखते हुए बेहद भावुक और लाड़ भरे लहज़े में कहती है, "तेरी माँ भी ना सूरज... सचमुच सबका कितना ख्याल रखती हैं। बनारस में बैठकर भी उन्हें यहाँ के अनुष्ठान की एक-एक चीज़ की चिंता है।"
सूरज अपनी माँ के इस स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था। वह गर्व से मुस्कुराते हुए कहता है, "हाँ मौसी, माँ सचमुच अनोखी हैं और हमारे पूरे घर की जान हैं। पर मौसी... आप भी तो कितनी अच्छी हैं, आप भी तो यहाँ हम सबका कितना ध्यान रखती हैं।"
सूरज की आवाज़ में एक गहरा ठहराव और सम्मान था, लेकिन उसकी आँखें सीधे सोनी के बदन और उसके चेहरे की लाली पर टिकी हुई थीं। सोनी भी कोई अनजान नहीं थी, वह सूरज की आँखों में सीधे झाँकती है और उसके दिल में छिपे उस असली आशय को, उस कशिश को बहुत अच्छी तरह समझ रही होती है जो कल रात से उनके बीच पनप रही थी। सोनी के इस सयानेपन और अपनी तारीफ को सुनकर सोनी के भीतर भी एक अजीब सी कामुक उत्तेजना जाग उठती है। वह बेहद रसीले और मादक लहज़े में, आँखें मटकाते हुए कहती है, "और मेरा सूरज भी तो... बिल्कुल अपनी माँ पर ही गया है। दूसरों को खुश रखना और उनका ख्याल रखना इसे भी बहुत अच्छे से आता है।"
सोनी के इस दोहरे और गहरे अर्थ वाले जवाब को सुनकर सूरज के चेहरे पर एक चुलबुली मुस्कान तैर जाती है। दोनों एक-दूसरे की आँखों में छिपे उस मूक आमंत्रण को पढ़ लेते हैं और मद्धम रोशनी में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगते हैं।
सोनी ने उत्सुकता से उस पैकेट की गाँठ को खोला और उसके भीतर रखी एक-एक चीज़ को निकालकर बेहद सलीके और करीने से बिस्तर पर सजाने लगी। जैसे-जैसे सामान बाहर आ रहा था, कमरे के भीतर का माहौल और भी सम्मोहक होता जा रहा था। पैकेट से सबसे पहले एक बेहद सुंदर, गाढ़े लाल रंग का जोड़ा निकला—एक बेहद खूबसूरत, बारीक कढ़ाई वाला लहंगा और चोली। लेकिन जैसे ही सोनी ने लहंगे के नीचे दबे बाकी कपड़ों को उठाया, उसके गालों पर गहरी लाली छा गई। उस जोड़े के साथ ही उसी से मेल खाते हुए बेहद झीने, पारदर्शी और कामुक अंतर्वस्त्र (अंडरगारमेंट्स) भी रखे थे। सुगना का यह चुनाव इस बात का साफ़ संकेत था कि इस अंतिम दिन की आहुति में देह का समर्पण किस हद तक होना था।
इसके बाद सोनी के हाथ में दो सुपारियाँ आईं। ये आम सुपारियाँ नहीं थीं, बल्कि उन दोनों के बीच में विशेष रूप से छेद करके एक मोटा, मज़बूत धागा पिरोया गया था। इस अजीब सी वस्तु को देखकर सोनी के मन में गहरा कौतूहल और अचरज हुआ। उसने अपने पूरे जीवन में पूजा की ऐसी कोई सामग्री या वस्तु आज तक नहीं देखी थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि संतान सप्तमी के इस गुप्त अनुष्ठान में इन आपस में बंधी सुपारियों का क्या उपयोग होने वाला है।
इनके अलावा, पैकेट में कुछ पारंपरिक पूजन सामग्री थी और सबसे नीचे रखी थी एक छोटी, नक्काशीदार इत्र की शीशी। सोनी ने जैसे ही उस शीशी को अपने हाथों में लिया और उसका ढक्कन थोड़ा ढीला किया, उसकी एक तीखी, maahak खुशबू सीधे सोनी के मर्म (अंतरात्मा) तक पहुँच गई। इस महक के नाक में घुसते ही सोनी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई और अतीत का एक गहरा साया उसकी आँखों के सामने घूम गया। यह वही चिर-परिचित, मदहोश कर देने वाली खुशबू थी जिसे उसने सालों पहले बनारस में सुगना के कमरे में महसूस किया था। यह वही इत्र था जो सुगना ने अपने जीवन के उस वर्जित मोड़ पर, सर्वेश जी (सूरज के पिता) के साथ पहली बार पूर्ण संभोग के समय लगाया था। एक पल के लिए सोनी का पूरा वजूद कांप उठा, पुरानी यादें और उस रात का रहस्य उसके सामने सजीव हो उठा। पर सोनी एक पढ़ी-लिखी, समझदार डॉक्टर थी; उसने तुरंत खुद को संभाला। वह जानती थी कि अतीत में जो कुछ भी हुआ, उसमें इस इत्र की कोई गलती नहीं थी, वह तो महज़ एक संयोग था।
तभी उसका ध्यान पैकेट के बिल्कुल खाली हो चुके निचले हिस्से पर गया। वहाँ सब सामान हट जाने के बाद अंत में एक मुड़ा हुआ पत्र निकला। सोनी ने उत्सुकता और थोड़ी सी घबराहट के साथ उस पत्र को अपने हाथों में ले लिया और बिस्तर पर पेट के बल लेटे हुए ही, उसे खोलकर बेहद ध्यान से पढ़ने लगी।
सोनी ने उस पत्र को खोला और उसकी एक-एक पंक्ति को बेहद ध्यान से और डूबकर पढ़ने लगी। सुगना ने उस पत्र में संतान सप्तमी की इस अंतिम और महा-पूर्णाहुति की पूरी गुप्त विधि को विस्तार से समझाया था।
पत्र में सुगना ने लिखा था:
"सोनी, आज का दिन तेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात ध्यान से सुन, सुबह की चाय के बाद तू सबसे पहले स्नान करके तैयार होना और सीधे मंदिर जाकर देवी माँ का आशीर्वाद लेना। लेकिन तैयार होते समय तुझे एक विशेष काम करना है। मैंने जो इत्र की शीशी भेजी है, उस जादुई सुगंध को तुझे अपने बदन के उन सभी कामुक अंगों पर लगाना है जो किसी भी पुरुष को सबसे प्यारे होते हैं। यहाँ तक कि उस इत्र की कुछ बूंदें तुझे अपनी मुनिया (योनि) के चारों ओर भी लगानी हैं, ताकि उसकी मादकता पुरुष के भीतर की बची-खुची मर्यादा को भी पूरी तरह पिघला दे।
अब बात करती हूँ इन दो सुपारियों की, जिन्हें देखकर तू ज़रूर हैरान हुई होगी। मैंने ये दो अलग-अलग आकार की सुपारियाँ इसलिए भेजी हैं ताकि तू अपनी सुविधा और पसंद के हिसाब से चुन सके। स्नान करने के बाद, इनमें से जो भी सुपारी तेरी मुनिया आसानी से स्वीकार कर पाए, उसे अपनी गहराई के भीतर रख लेना। जब तक तू मंदिर में पूजा करके वापस आएगी, तब तक कई घंटों में तेरी योनि से निकलने वाला वो प्राकृतिक, कामुक अर्क (रस) इस सुपारी के भीतर पूरी तरह समाहित हो चुका होगा।
पूजा से लौटने के बाद, जब महा-मिलन का समय आएगा, तब तुझे यह सिद्ध सुपारी उस पुरुष को खिलानी है जो आज इस अनुष्ठान की पूर्णाहुति करेगा। उससे कहना कि वह इसे चबा-चबाकर इसके भीतर समाए तेरे बदन के उस अमृत रस को पूरी तरह आत्मसात कर ले। छोटा या बड़ा आकार तू खुद तय कर लेना। और हाँ, धागा मैंने इसीलिए पिरोया है ताकि सुपारी अंदर ही न छूट जाए, धागे का एक सिरा बाहर रहेगा जिससे तू उसे बाद में आसानी से निकाल सके।"
पत्र का आखिरी शब्द पढ़ते ही सोनी का पूरा वजूद उत्तेजना और विस्मय से सिहर उठा। वह सुगना की इस अकल्पनीय बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता पर मन ही मन बेहद गर्व कर रही थी। उसे इस बात का अहसास हो गया कि सुगना ने इस अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए काम-शास्त्र के कितने गहरे और गुप्त नियमों का सहारा लिया था। अब सोनी के सामने आगे की पूरी तस्वीर बिल्कुल साफ और स्पष्ट हो चुकी थी कि उसे आज के इस विशेष दिन पर क्या और कैसे करना है। उसने बिना किसी देरी के बिस्तर पर सजे उन झीने, कामुक अंतर्वस्त्रों को उठाया और उनके भीतर ही उन सुपारियों को बड़ी चतुराई से लपेटकर अपने पास सुरक्षित रख लिया। अब उसकी धड़कनें तेज़ थीं, और वह बिस्तर पर बैठी हुई बेहद उत्सुकता से विकास के बाथरूम से बाहर आने का इंतज़ार करने लगी, ताकि वह खुद स्नान करने जा सके और सुगना के बताए इस कामुक विधान की शुरुआत कर सके।
बाथरूम के भीतर पहाड़ों की ठंडी हवाओं के बीच गरम पानी की भाप तैर रही थी, जिसने पूरे माहौल को एक रहस्यमयी और मादक कोहरे से भर दिया था। सोनी आज एक अद्भुत मानसिक और शारीरिक ऊर्जा से भरी हुई थी। आज का यह स्नान केवल देह को साफ़ करने के लिए नहीं, बल्कि उस महा-मिलन के लिए खुद को एक पवित्र वेदी की तरह तैयार करने के लिए था, जहाँ सामाजिक वर्जनाएँ और कामुकता दोनों एक दिव्य पवित्रता के साथ एकाकार होने वाले थे। सोनी को साफ़ दिख रहा था कि आज का यह अनुष्ठान इतिहास रचने जा रहा था—एक तरफ वह अपने पति विकास की उस अनोखी, दबी हुई इच्छा को उनके ही सामने पूर्ण करने जा रही थी, और दूसरी तरफ उसी वेदी पर सूरज के साथ उस दिव्य संभोग को अंजाम देने वाली थी, जो संतान सप्तमी की वास्तविक पूर्णाहुति करने वाला था।
सोनी ने दर्पण के सामने खड़े होकर पास पड़े रेज़र को उठाया। पिछले छह-सात दिनों की आपाधापी और पहाड़ों के इस प्रवास में उसकी मुनिया (योनि) के आस-पास हल्के-फुल्के बाल बाहर झांकने लगे थे। उसने बेहद सलीके और बारीकी से उन बालों को साफ़ किया। जब उसकी मुनिया पूरी तरह चिकनी, मखमली और गोरी आभा के साथ चमकने लगी, तो उसने अपने बदन को तौलिये से सुखाया।
अब बारी थी सुगना दीदी के दिए उस गुप्त और कामुक विधान को अमली जामा पहनाने की। सोनी के सामने बिस्तर पर वे दो धागे से बंधी सुपारियाँ रखी थीं। तभी अचानक सोनी के डॉक्टर दिमाग में एक गहरा द्वंद्व और कौतूहल पैदा हुआ। उसने सोचा कि सुगना ने तो एक सुपारी रखने को कहा था जिसे पूर्णाहुति करने वाले पुरुष को खिलाना था। आज का असली योद्धा और उस ऊर्जा का स्रोत निश्चित रूप से सूरज था, इसलिए यह रस सूरज को मिलना अनिवार्य था। लेकिन यदि वह केवल सूरज को ही यह सिद्ध रस पिलाएगी, तो विकास कहीं मन ही मन दुखी या उपेक्षित महसूस न करने लगे, क्योंकि वे भी तो इस अनुष्ठान के साक्षी और उसके पति थे। और यदि बाद में कभी सुगना ने उससे इस बारे में बारीक सवाल पूछ लिया, तो वह क्या जवाब देगी?
इस धर्मसंकट का सोनी ने अपनी बुद्धिमत्ता से एक बेहद कामुक और चमत्कारी हल निकाला। उसने तय किया कि वह किसी को दुखी नहीं करेगी। उसने उन दोनों ही सुपारियों को—छोटी और बड़ी—एक साथ अपने भीतर समाहित करने का फैसला किया। सोनी ने गहरी सांस ली और सुगना की दूरदर्शिता को प्रणाम करते हुए उन दोनों सुपारियों को एक-एक करके अपनी मुनिया की गुलाबी, नम गहराइयों के भीतर धकेल दिया। उसकी रसीली योनि ने उन दोनों सुपारियों को सहर्ष अपनी तड़पती गहराई में स्थान दे दिया।
उन दोनों सुपारियों के बीच पिरोया हुआ वह मोटा, मज़बूत धागा अब उसकी मुनिया के मखमली होठों से बाहर निकलकर नीचे लटक रहा था, जो उसकी योनि की बनावट को और भी ज़्यादा खूबसूरत, उत्तेजक और आमंत्रित बनाने लगा था। धागे के आखिरी छोर पर सुगना ने जो छोटी-छोटी, कलात्मक गांठे बनाई थीं, वे सोनी की गोरी जाँघों के बीच बेहद आकर्षक और किसी गुप्त आभूषण की तरह लग रही थीं। आदमकद आईने में अपनी मुनिया की यह अद्भुत और पूर्ण कामुक तैयारी देखकर सोनी खुद के ही रूप पर मुग्ध हो गई और उसके भीतर रोमांस का एक तीव्र ज्वार उठ गया। उसने तुरंत सुगना के भेजे झीने और कामुक अंतर्वस्त्रों को पहना और बदन पर तौलिया लपेटकर बाथरूम से बाहर आ गई।
बाहर आकर उसने देखा कि विकास इस समय सूरज के कमरे में बैठकर उससे आज की अंतिम पूजा और व्यवस्था के बारे में बातें कर रहा था। कमरे में खुद को अकेला पाकर सोनी ने बिना समय गंवाए सुगना की भेजी इत्र की शीशी उठाई। उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।
इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।
कुछ ही पलों के तीव्र संघर्ष के बाद, दोनों एक साथ चरम सुख के सागर में डूब गए। दोनों के मुंह से एक लंबी और तृप्त कराह निकली और वे एक-दूसरे के बदन पर ढह गए। सोनी की मुनिया के भीतर विकास का वीर्य पूरी गहराई तक समाहित हो रहा था, जो उनके बरसों पुराने सपने को पूरा करने का प्रयास था। दोनों इस ठंडी रात में एक-दूसरे की बाहों में बंधे, ज़ोर-ज़ोर से हाँफते हुए कल होने वाले उस महा-मिलन की कल्पना में खो गए, जहाँ मर्यादा की आखिरी दीवार भी ढहने वाली थी।
अब आगे..
उधर सूरज खुश था उसके मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।
सूरज के तनबदन में लगी आग सोनी तात्कालिक तौर पर शांत कर चुकी थी। सोनी के कमरे से आने के बाद सूरज अपने बिस्तर पर लेट किया। सूरज के दिमाग में एक गहरा शक पैदा होने लगा था। उसे रह-रहकर यह विचार आ रहा था कि क्या यह सब कुछ वाकई विकास मौसा जी की मर्जी या सहमति से हो रहा है? इस बात की संभावना उसे इसलिए भी लग रही थी, क्योंकि सोनी मौसी अभी तक गर्भवती नहीं हो पाई थीं और शादी के इतने साल बाद भी वे संतान सुख से वंचित थे। यह बात खुद मौसी ने भी उसके सामने खुलकर स्वीकार की थी कि वे एक बच्चे के लिए कितनी तड़प रही हैं।
तो क्या इस गुप्त सिलसिले के पीछे विकास मौसा जी की भी मूक सहमति है? क्या वे खुद चाहते हैं कि संतान सप्तमी के इस अनुष्ठान के जरिए उनके घर में खुशियां आएं? या फिर सोनी मौसी उनसे छिपकर, बेहद शातिर तरीके से इस वर्जित अनुष्ठान को अंजाम दे रही हैं ताकि अपने जीवन के उस सूनेपन को भर सकें? सूरज का युवा दिमाग इन दोनों संभावनाओं के बीच झूल रहा था।
पर जो भी हो, इन उलझनों के बीच सूरज के मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।
अगली सुबह का इंतजार करते हुए सूरज भी सुखद नींद में सो गया।
संतान सप्तमी का अंतिम दिन बेहद महत्वपूर्ण था सुबह-सुबह जब सूरज विकास और सोनी अपनी सुबह की चाय कंप्लीट कर अपने-अपने कमरों में जाने वाले थे तभी सुगना का फोन आ गया सुगना सोनी से बातें करती है और संतान सप्तमी के पिछले अच्छे दिनों का हाल-चाल पूछती थी सोनी भी इशारों सालों में उसे सारी बात बताती है पर्वत सूरज के साथ अपने संभोग को छुपा ले जाती है दूर बैठे विकास और सूरज एक दूसरे से बातें करते रहते हैं पर उनका ध्यान सोने के उत्तरों पर लगा रहता है और वह हम दोनों की बातचीत को समझने का प्रयास करते हैं
संतान सप्तमी के इस अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन की सुबह पहाड़ों की तेज़ ठंड और हल्की धुंध के साथ हुई। कमरे के भीतर गरमा-गरम चाय का दौर चल रहा था। विकास, सोनी और सूरज एक साथ बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे, लेकिन माहौल में एक अजीब सी खामोशी और आने वाले पल का रोमांच साफ़ महसूस हो रहा था। तभी अचानक सोनी के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर सूरज की माँ यानी सुगना का नाम चमक रहा था।
सोनी ने बिना एक पल गंवाए लपककर फोन उठाया और वहीं बिस्तर पर पेट के बल लेटकर सुगना से बात करने लगती है। इस तरह लेटने की वजह से उसकी पीठ और नितंबों का उभार मद्धम रोशनी में और भी आकर्षक लग रहा था। बात करते-करते उसने मस्ती में अपने पैरों को थोड़ा ऊपर उठाया, जिससे उसकी रेशमी नाइटी सरककर घुटनों तक आ गई और उसकी गोरी जाँघों का कुछ हिस्सा साफ़ दिखाई देने लगा।
सोनी अपनी बहन सुगना की बातों में इतनी खोई हुई थी और उससे बात करने के अहसास में इतनी उन्मुक्त और मदहोश थी कि उसे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि पीछे बैठे विकास और सूरज एक साथ उसकी इस मादक स्थिति को निहार रहे हैं। पहाड़ों की उस सुबह, सोनी का यह बेबाक और मदहोश अंदाज़ उन दोनों मर्दों की धड़कनों को एक साथ तेज़ कर रहा था।
सूरज विकास के ठीक बगल में बैठा हुआ था और चाहकर भी अपनी नज़रों को काबू में नहीं रख पा रहा था। वह मौसा जी के सामने अपनी मौसी के इस मादक बदन और उभरे हुए नितंबों को देखने से बार-बार कतरा रहा था, उसे लग रहा था कि कहीं उसका यह गुप्त आकर्षण पकड़ा न जाए। लेकिन बिस्तर पर लेटी सोनी की वह मुद्रा इतनी उन्मुक्त और कामुक थी कि उसका युवा मन और उसकी आँखें खुद-ब-खुद उस तरफ खिंची चली जा रही थीं। वह चाय की चुस्की लेने के बहाने बार-बार अपनी पलकें उठाता और नाइटी से बाहर झलकती सोनी की गोरी, चिकनी जाँघों और नंगे घुटनों को एकटक निहारने लगता।
विकास वहीं बैठा सूरज की इस छटपटाहट और उसकी बदलती मनोदशा को बहुत गहराई से समझ रहा था। सूरज की आँखों में अपनी पत्नी के लिए बढ़ती उस बेकाबू वासना और तड़प को भाँपकर विकास के भीतर घृणा के बजाय एक तीव्र उत्तेजना का करंट दौड़ गया। उसे इस बात से गहरा मानसिक और शारीरिक सुख मिल रहा था कि उसका भांजा उसकी पत्नी के अंगों को देखकर अंदर ही अंदर सुलग रहा है। विकास ने जानबूझकर कोई दखल नहीं दिया, बल्कि वह शांत बैठकर इस वर्जित नज़ारे का लुत्फ उठाने लगा।
उधर इन दोनों मर्दों की आंतरिक हलचल से पूरी तरह बेखबर, सोनी एकदम बिंदास और मदहोश होकर फोन पर सुगना से बातें करने में मग्न थी। वह हंसती, मुस्कुराती और बातों-बातों में अपने पैरों को हवा में हिलाती, जिससे उसकी नाइटी का रेशमी कपड़ा बार-बार सरककर उसकी जाँघों को और उजागर कर देता।
सुगना और सोनी के बीच फोन पर बातचीत जारी थी। दोनों बहनें कम और सहेलियाँ ज़्यादा थीं, इसलिए उनके बीच की टोन बेहद अनौपचारिक और खुली हुई थी। हालांकि, सुगना को रत्ती भर भी यह अहसास नहीं था कि सूरज और सोनी के बीच कोई गुप्त संबंध बन चुका है; वह तो बस यही जानती थी कि विकास और सोनी मिलकर संतान सप्तमी का यह पवित्र और कठिन अनुष्ठान पूर्ण कर रहे हैं।
सुगना (फोन पर, धीमी और रसभरी आवाज़ में): "सोनी... छह दिन बीत गए। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान अपनी चरम ऊर्जा पर पहुँच चुका होगा। सच-सच बता, पहाड़ों की इस कड़कड़ाती ठंड में क्या तेरे बदन की तड़प को थोड़ी शांति मिली? अनुष्ठान की वो गुप्त अग्नि क्या तेरे रोम-रोम को जगा पा रही है? विकास जी इस अनुष्ठान को पूरे मन से निभा रहे हैं ना?"
सुगना के इस तीखे और बेबाक सवाल को सुनकर सोनी की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। उसने तिरछी नज़रों से बगल के सोफे पर बैठे विकास और सूरज की तरफ देखा। सोनी ने खुद को संभाला और मर्यादा का ध्यान रखते हुए अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, मर्यादित लेकिन दोहरा अर्थ रखने वाला बनाया, ताकि सुगना को उसके और विकास के बीच की बात लगे, जबकि पास बैठे सूरज और विकास को उसका असली इशारा समझ आए।
सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी... आप तो जानती हैं कि यहाँ की हवाओं में कितनी ठंड है, लेकिन इस अनुष्ठान का प्रभाव ऐसा है कि भीतर एक अजब सी गर्माहट बनी हुई है। जो अग्नि आप कह रही हैं, उसकी तपिश इतनी तेज़ है कि यह बदन अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। कल रात की आहुति तो इतनी... इतनी गहरी थी कि मैं आपको क्या बताऊँ। जैसे सब कुछ पिघलने ही वाला था।"
सुगना फोन के उस पार खिलखिला कर हँस पड़ी। फिर अचानक उसे अपने बेटे की याद आई।
सुगना (एक माँ वाली ममता के साथ): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। और सुन, मेरा सूरज कैसा है? पहाड़ों की ठंड उसे लग तो नहीं गई? वो तो पहली बार इतने ठंडे इलाके में गया है। थोड़ा उसका ध्यान रखना, खाने-पीने में बहुत लापरवाही करता है वो।"
सोनी ने फोन को थोड़ा और कसकर पकड़ा और अपनी आँखें सीधे सूरज की नज़रों में डाल दीं, जो उसे ही ताक रहा था।
सोनी (सूरज की आँखों में देखते हुए, शरारत भरी आवाज़ में): "दीदी, आप सूरज की चिंता बिल्कुल मत कीजिए। वो अब बच्चा नहीं रहा, बहुत समझदार और... बहुत 'बड़ा' हो गया है। कल रात भी मैंने उसका पूरा ध्यान रखा था। उसकी हर बेचैनी को शांत करना मुझे अच्छे से आता है। यहाँ तक कि सोने से पहले मैंने खुद पक्का किया कि वो पूरी तरह राहत में सोए।"
सोनी की इस बात का दोहरा मतलब विकास और सूरज को अच्छी तरह समझ आ रहा था। विकास की धड़कनें तेज़ हो गईं, और सूरज ने शरम और उत्तेजना के मारे अपनी नज़रें झुका लीं। सुगना इस गूढ़ इशारे को समझ नहीं पाई और उसने बात का रुख वापस विकास की तरफ मोड़ दिया।
सुगना (फुसफुसाते हुए, सोनी को उकसाते हुए): "अच्छा, यह तो ठीक है। पर ये बता, जीजा जी का क्या हाल है? इस बार के व्रत-त्योहार में उनमें वो पुराना जोश दिख रहा है या नहीं?"
सोनी ने एक गहरी सांस ली, अपने नितंबों को थोड़ा और सहज किया और विकास की तरफ देखते हुए फुसफुसाए अंदाज़ में कहा:
सोनी (इशारों ही इशारों में, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी, सच कहूँ तो जब से आपने उन्हें वो 'गुरु मंत्र' दिया है ना, तब से तो वो और भी ज़्यादा मादक और बेचैन हो गए हैं। उनके भीतर की तड़प इस कदर बढ़ गई है कि अब वो हर वक्त बस अनुष्ठान को पूर्ण होते देखना चाहते हैं। कल रात भी उनकी वो बेचैनी साफ़ दिख रही थी, और वो इस खेल को और आगे बढ़ाने के लिए बहुत उतावले हैं।"
सोनी की यह बात सुनकर विकास के सीने में गर्व और वासना का एक साथ संचार हुआ। उसे साफ़ समझ आ गया कि सोनी सुगना के सामने ही आज रात होने वाली अंतिम और पूर्ण आहुति की बिसात बिछा रही है, जबकि सुगना इस पूरे सच से पूरी तरह अनजान थी। सूरज का दिल यह सुनकर सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था।
सुगना (एक गहरी सांस लेते हुए): "चलो, आज आखिरी दिन है। अपनी देह के उस पाश को पूरी तरह खोल देना और उस ऊर्जा को खुद में समाहित कर लेना ताकि गोद हरी हो जाए।"
सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए): "जी दीदी, आप निश्चिंत रहिए। आज का अनुष्ठान और आज की पूर्णाहूति ऐसी होगी कि सब कुछ हमेशा के लिए बदल जाएगा और इसे कोई कभी नहीं भूल पाएगा।"
फोन पर सुगना की बातें खत्म होने ही वाली थीं कि अचानक उसे कुछ याद आया और उसने सोनी से कहा, "सोनी, जरा सूरज को फोन देना, मुझे उससे भी थोड़ी बात करनी है।"
सोनी ने तुरंत बिस्तर पर अपनी स्थिति बदली और कमरे के दूसरी तरफ बैठे सूरज को आवाज़ लगाई, "सूरज... इधर आ, तेरी माँ का फोन है, तुझसे बात करना चाहती हैं।"
सूरज ने अपने मौसा जी की तरफ देखा और फिर धड़कते दिल के साथ बिस्तर के करीब आया। सोनी ने मुस्कुराते हुए फोन सूरज के हाथ में थमा दिया, लेकिन वह बिस्तर से उठी नहीं, बल्कि वहीं लेटी रही। सूरज फोन कान से लगाकर सुगना से बात करने लगा।
सुगना (लाड़ भरे अंदाज़ में): "हाँ सूरज, कैसा है रे तू? वहाँ पहाड़ों पर कोई परेशानी तो नहीं हो रही है ना? और सुन... बनारस से निकलते वक्त मैंने जो तुझे एक विशेष पैकेट देकर भेजा था और कहा था कि इसे संतान सप्तमी के अंतिम दिन ही निकालना है, वो याद है ना? आज वो विशेष पैकेट अपनी सोनी मौसी को समर्पित कर देना, उसमें बिल्कुल देरी मत करना।"
सुगना का सीधा मतलब उस धार्मिक पैकेट से था, लेकिन इस माहौल में 'विशेष पैकेट समर्पित करने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग ने मन ही मन सुगना की बातों का एक दूसरा और गुप्त अर्थ निकाल लिया। उसने चुपके से कल रात लिहाफ़ के भीतर के उस नज़ारे को याद किया और इस 'विशेष पैकेट' को अपने युवा अंग और वीर्य के अंश से जोड़ लिया, जिसे आज रात उसे पूरी तरह मौसी को सौंपना था। हालांकि, उसने अपने चेहरे पर इस विचार की एक शिकन भी नहीं आने दी और बेहद सामान्य आवाज़ में जवाब दिया।
सुगना: "और सच-सच बता, तू ठीक है ना वहाँ? तेरी मौसी तेरा ध्यान रख रही है?"
सूरज (बेहद सहज और शांत आवाज़ में): "जी माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। आप चिंता मत करो... सोनी मौसी मेरा बहुत ख्याल रख रही हैं। यहाँ मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होने देतीं।"
सूरज की आवाज़ में कहीं भी वासना या उत्तेजना नहीं टपक रही थी, वह अपनी माँ से एक संस्कारी बेटे की तरह ही बात कर रहा था। सुगना उसकी इस सादगी से संतुष्ट होकर आगे बोली।
सुगना (नसीहत देते हुए): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन सुन, सिर्फ मौसी ही तेरा ख्याल रखे, ऐसा नहीं होना चाहिए। तू भी अब बड़ा हो गया है, आज अनुष्ठान का आखिरी और सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात गाँठ बांध ले... तुझे भी अपनी सोनी मौसी का बहुत ख्याल रखना है, उन्हें हर हाल में खुश रखना है और इस पावन दिन पर उन्हें बिल्कुल भी परेशान मत करना। जैसा वो कहें, वैसा ही करना।"
माँ की इस नसीहत को सुनकर भी सूरज ने मन ही मन उसका दूसरा, गहरा और कामुक अर्थ निकाला कि आज रात उसे मौसी को शारीरिक रूप से पूरी तरह तृप्त और खुश करना है। लेकिन प्रकट में उसने अपनी आवाज़ को बेहद मर्यादित और गंभीर बनाए रखा।
सूरज (गंभीरता से): "जी माँ, आप बिल्कुल फिक्र मत करो। मौसी कितनी खुश हैं... यह जब आप बनारस वापस आने पर उनसे मिलेंगी, तो खुद उनके चेहरे से ही पूछ लेना। मैं आपकी कही हर बात का पूरा ध्यान रखूँगा।"
सूरज का उत्तर ऊपर से जितना सीधा और मर्यादित था, उसके भीतर छिपा अर्थ उतना ही गहरा था। सूरज ने भले ही अपनी बातों से कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने दिया, लेकिन पास ही बिस्तर पर लेटी सोनी उसकी आँखों के ठहराव और इस सयानेपन को देखकर तुरंत सब कुछ समझ गई। सोनी को साफ़ अंदाज़ा हो गया कि सूरज बाहर से जितना शांत दिख रहा है, भीतर से वह आज रात की पूर्णाहूति के लिए उतना ही दृढ़ और तैयार हो चुका है।
यह कहकर सूरज ने फोन रख दिया, और कमरे में फैली खामोशी अब आज के महा-मिलन का इशारा कर रही थी।
विकास जैसे ही फ्रेश होने के लिए बाथरूम में जाता है, कमरे का माहौल एक बार फिर पूरी तरह से बदल जाता है। सूरज बिना कोई देरी किए तुरंत अपनी अटैची के पास पहुँचता है और चैन खोलकर उसमें से अपनी माँ का दिया हुआ वह विशेष पैकेट निकाल लाता है। वह उस पैकेट को लेकर सीधे बिस्तर के पास आता है और मुस्कुराते हुए सोनी मौसी के हाथों में सौंप देता है।
सोनी उस पैकेट को अपने हाथों में लेती है और पलटकर देखते हुए बेहद भावुक और लाड़ भरे लहज़े में कहती है, "तेरी माँ भी ना सूरज... सचमुच सबका कितना ख्याल रखती हैं। बनारस में बैठकर भी उन्हें यहाँ के अनुष्ठान की एक-एक चीज़ की चिंता है।"
सूरज अपनी माँ के इस स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था। वह गर्व से मुस्कुराते हुए कहता है, "हाँ मौसी, माँ सचमुच अनोखी हैं और हमारे पूरे घर की जान हैं। पर मौसी... आप भी तो कितनी अच्छी हैं, आप भी तो यहाँ हम सबका कितना ध्यान रखती हैं।"
सूरज की आवाज़ में एक गहरा ठहराव और सम्मान था, लेकिन उसकी आँखें सीधे सोनी के बदन और उसके चेहरे की लाली पर टिकी हुई थीं। सोनी भी कोई अनजान नहीं थी, वह सूरज की आँखों में सीधे झाँकती है और उसके दिल में छिपे उस असली आशय को, उस कशिश को बहुत अच्छी तरह समझ रही होती है जो कल रात से उनके बीच पनप रही थी। सोनी के इस सयानेपन और अपनी तारीफ को सुनकर सोनी के भीतर भी एक अजीब सी कामुक उत्तेजना जाग उठती है। वह बेहद रसीले और मादक लहज़े में, आँखें मटकाते हुए कहती है, "और मेरा सूरज भी तो... बिल्कुल अपनी माँ पर ही गया है। दूसरों को खुश रखना और उनका ख्याल रखना इसे भी बहुत अच्छे से आता है।"
सोनी के इस दोहरे और गहरे अर्थ वाले जवाब को सुनकर सूरज के चेहरे पर एक चुलबुली मुस्कान तैर जाती है। दोनों एक-दूसरे की आँखों में छिपे उस मूक आमंत्रण को पढ़ लेते हैं और मद्धम रोशनी में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगते हैं।
सोनी ने उत्सुकता से उस पैकेट की गाँठ को खोला और उसके भीतर रखी एक-एक चीज़ को निकालकर बेहद सलीके और करीने से बिस्तर पर सजाने लगी। जैसे-जैसे सामान बाहर आ रहा था, कमरे के भीतर का माहौल और भी सम्मोहक होता जा रहा था। पैकेट से सबसे पहले एक बेहद सुंदर, गाढ़े लाल रंग का जोड़ा निकला—एक बेहद खूबसूरत, बारीक कढ़ाई वाला लहंगा और चोली। लेकिन जैसे ही सोनी ने लहंगे के नीचे दबे बाकी कपड़ों को उठाया, उसके गालों पर गहरी लाली छा गई। उस जोड़े के साथ ही उसी से मेल खाते हुए बेहद झीने, पारदर्शी और कामुक अंतर्वस्त्र (अंडरगारमेंट्स) भी रखे थे। सुगना का यह चुनाव इस बात का साफ़ संकेत था कि इस अंतिम दिन की आहुति में देह का समर्पण किस हद तक होना था।
इसके बाद सोनी के हाथ में दो सुपारियाँ आईं। ये आम सुपारियाँ नहीं थीं, बल्कि उन दोनों के बीच में विशेष रूप से छेद करके एक मोटा, मज़बूत धागा पिरोया गया था। इस अजीब सी वस्तु को देखकर सोनी के मन में गहरा कौतूहल और अचरज हुआ। उसने अपने पूरे जीवन में पूजा की ऐसी कोई सामग्री या वस्तु आज तक नहीं देखी थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि संतान सप्तमी के इस गुप्त अनुष्ठान में इन आपस में बंधी सुपारियों का क्या उपयोग होने वाला है।
इनके अलावा, पैकेट में कुछ पारंपरिक पूजन सामग्री थी और सबसे नीचे रखी थी एक छोटी, नक्काशीदार इत्र की शीशी। सोनी ने जैसे ही उस शीशी को अपने हाथों में लिया और उसका ढक्कन थोड़ा ढीला किया, उसकी एक तीखी, maahak खुशबू सीधे सोनी के मर्म (अंतरात्मा) तक पहुँच गई। इस महक के नाक में घुसते ही सोनी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई और अतीत का एक गहरा साया उसकी आँखों के सामने घूम गया। यह वही चिर-परिचित, मदहोश कर देने वाली खुशबू थी जिसे उसने सालों पहले बनारस में सुगना के कमरे में महसूस किया था। यह वही इत्र था जो सुगना ने अपने जीवन के उस वर्जित मोड़ पर, सर्वेश जी (सूरज के पिता) के साथ पहली बार पूर्ण संभोग के समय लगाया था। एक पल के लिए सोनी का पूरा वजूद कांप उठा, पुरानी यादें और उस रात का रहस्य उसके सामने सजीव हो उठा। पर सोनी एक पढ़ी-लिखी, समझदार डॉक्टर थी; उसने तुरंत खुद को संभाला। वह जानती थी कि अतीत में जो कुछ भी हुआ, उसमें इस इत्र की कोई गलती नहीं थी, वह तो महज़ एक संयोग था।
तभी उसका ध्यान पैकेट के बिल्कुल खाली हो चुके निचले हिस्से पर गया। वहाँ सब सामान हट जाने के बाद अंत में एक मुड़ा हुआ पत्र निकला। सोनी ने उत्सुकता और थोड़ी सी घबराहट के साथ उस पत्र को अपने हाथों में ले लिया और बिस्तर पर पेट के बल लेटे हुए ही, उसे खोलकर बेहद ध्यान से पढ़ने लगी।
सोनी ने उस पत्र को खोला और उसकी एक-एक पंक्ति को बेहद ध्यान से और डूबकर पढ़ने लगी। सुगना ने उस पत्र में संतान सप्तमी की इस अंतिम और महा-पूर्णाहुति की पूरी गुप्त विधि को विस्तार से समझाया था।
पत्र में सुगना ने लिखा था:
"सोनी, आज का दिन तेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात ध्यान से सुन, सुबह की चाय के बाद तू सबसे पहले स्नान करके तैयार होना और सीधे मंदिर जाकर देवी माँ का आशीर्वाद लेना। लेकिन तैयार होते समय तुझे एक विशेष काम करना है। मैंने जो इत्र की शीशी भेजी है, उस जादुई सुगंध को तुझे अपने बदन के उन सभी कामुक अंगों पर लगाना है जो किसी भी पुरुष को सबसे प्यारे होते हैं। यहाँ तक कि उस इत्र की कुछ बूंदें तुझे अपनी मुनिया (योनि) के चारों ओर भी लगानी हैं, ताकि उसकी मादकता पुरुष के भीतर की बची-खुची मर्यादा को भी पूरी तरह पिघला दे।
अब बात करती हूँ इन दो सुपारियों की, जिन्हें देखकर तू ज़रूर हैरान हुई होगी। मैंने ये दो अलग-अलग आकार की सुपारियाँ इसलिए भेजी हैं ताकि तू अपनी सुविधा और पसंद के हिसाब से चुन सके। स्नान करने के बाद, इनमें से जो भी सुपारी तेरी मुनिया आसानी से स्वीकार कर पाए, उसे अपनी गहराई के भीतर रख लेना। जब तक तू मंदिर में पूजा करके वापस आएगी, तब तक कई घंटों में तेरी योनि से निकलने वाला वो प्राकृतिक, कामुक अर्क (रस) इस सुपारी के भीतर पूरी तरह समाहित हो चुका होगा।
पूजा से लौटने के बाद, जब महा-मिलन का समय आएगा, तब तुझे यह सिद्ध सुपारी उस पुरुष को खिलानी है जो आज इस अनुष्ठान की पूर्णाहुति करेगा। उससे कहना कि वह इसे चबा-चबाकर इसके भीतर समाए तेरे बदन के उस अमृत रस को पूरी तरह आत्मसात कर ले। छोटा या बड़ा आकार तू खुद तय कर लेना। और हाँ, धागा मैंने इसीलिए पिरोया है ताकि सुपारी अंदर ही न छूट जाए, धागे का एक सिरा बाहर रहेगा जिससे तू उसे बाद में आसानी से निकाल सके।"
पत्र का आखिरी शब्द पढ़ते ही सोनी का पूरा वजूद उत्तेजना और विस्मय से सिहर उठा। वह सुगना की इस अकल्पनीय बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता पर मन ही मन बेहद गर्व कर रही थी। उसे इस बात का अहसास हो गया कि सुगना ने इस अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए काम-शास्त्र के कितने गहरे और गुप्त नियमों का सहारा लिया था। अब सोनी के सामने आगे की पूरी तस्वीर बिल्कुल साफ और स्पष्ट हो चुकी थी कि उसे आज के इस विशेष दिन पर क्या और कैसे करना है। उसने बिना किसी देरी के बिस्तर पर सजे उन झीने, कामुक अंतर्वस्त्रों को उठाया और उनके भीतर ही उन सुपारियों को बड़ी चतुराई से लपेटकर अपने पास सुरक्षित रख लिया। अब उसकी धड़कनें तेज़ थीं, और वह बिस्तर पर बैठी हुई बेहद उत्सुकता से विकास के बाथरूम से बाहर आने का इंतज़ार करने लगी, ताकि वह खुद स्नान करने जा सके और सुगना के बताए इस कामुक विधान की शुरुआत कर सके।
बाथरूम के भीतर पहाड़ों की ठंडी हवाओं के बीच गरम पानी की भाप तैर रही थी, जिसने पूरे माहौल को एक रहस्यमयी और मादक कोहरे से भर दिया था। सोनी आज एक अद्भुत मानसिक और शारीरिक ऊर्जा से भरी हुई थी। आज का यह स्नान केवल देह को साफ़ करने के लिए नहीं, बल्कि उस महा-मिलन के लिए खुद को एक पवित्र वेदी की तरह तैयार करने के लिए था, जहाँ सामाजिक वर्जनाएँ और कामुकता दोनों एक दिव्य पवित्रता के साथ एकाकार होने वाले थे। सोनी को साफ़ दिख रहा था कि आज का यह अनुष्ठान इतिहास रचने जा रहा था—एक तरफ वह अपने पति विकास की उस अनोखी, दबी हुई इच्छा को उनके ही सामने पूर्ण करने जा रही थी, और दूसरी तरफ उसी वेदी पर सूरज के साथ उस दिव्य संभोग को अंजाम देने वाली थी, जो संतान सप्तमी की वास्तविक पूर्णाहुति करने वाला था।
सोनी ने दर्पण के सामने खड़े होकर पास पड़े रेज़र को उठाया। पिछले छह-सात दिनों की आपाधापी और पहाड़ों के इस प्रवास में उसकी मुनिया (योनि) के आस-पास हल्के-फुल्के बाल बाहर झांकने लगे थे। उसने बेहद सलीके और बारीकी से उन बालों को साफ़ किया। जब उसकी मुनिया पूरी तरह चिकनी, मखमली और गोरी आभा के साथ चमकने लगी, तो उसने अपने बदन को तौलिये से सुखाया।
अब बारी थी सुगना दीदी के दिए उस गुप्त और कामुक विधान को अमली जामा पहनाने की। सोनी के सामने बिस्तर पर वे दो धागे से बंधी सुपारियाँ रखी थीं। तभी अचानक सोनी के डॉक्टर दिमाग में एक गहरा द्वंद्व और कौतूहल पैदा हुआ। उसने सोचा कि सुगना ने तो एक सुपारी रखने को कहा था जिसे पूर्णाहुति करने वाले पुरुष को खिलाना था। आज का असली योद्धा और उस ऊर्जा का स्रोत निश्चित रूप से सूरज था, इसलिए यह रस सूरज को मिलना अनिवार्य था। लेकिन यदि वह केवल सूरज को ही यह सिद्ध रस पिलाएगी, तो विकास कहीं मन ही मन दुखी या उपेक्षित महसूस न करने लगे, क्योंकि वे भी तो इस अनुष्ठान के साक्षी और उसके पति थे। और यदि बाद में कभी सुगना ने उससे इस बारे में बारीक सवाल पूछ लिया, तो वह क्या जवाब देगी?
इस धर्मसंकट का सोनी ने अपनी बुद्धिमत्ता से एक बेहद कामुक और चमत्कारी हल निकाला। उसने तय किया कि वह किसी को दुखी नहीं करेगी। उसने उन दोनों ही सुपारियों को—छोटी और बड़ी—एक साथ अपने भीतर समाहित करने का फैसला किया। सोनी ने गहरी सांस ली और सुगना की दूरदर्शिता को प्रणाम करते हुए उन दोनों सुपारियों को एक-एक करके अपनी मुनिया की गुलाबी, नम गहराइयों के भीतर धकेल दिया। उसकी रसीली योनि ने उन दोनों सुपारियों को सहर्ष अपनी तड़पती गहराई में स्थान दे दिया।
उन दोनों सुपारियों के बीच पिरोया हुआ वह मोटा, मज़बूत धागा अब उसकी मुनिया के मखमली होठों से बाहर निकलकर नीचे लटक रहा था, जो उसकी योनि की बनावट को और भी ज़्यादा खूबसूरत, उत्तेजक और आमंत्रित बनाने लगा था। धागे के आखिरी छोर पर सुगना ने जो छोटी-छोटी, कलात्मक गांठे बनाई थीं, वे सोनी की गोरी जाँघों के बीच बेहद आकर्षक और किसी गुप्त आभूषण की तरह लग रही थीं। आदमकद आईने में अपनी मुनिया की यह अद्भुत और पूर्ण कामुक तैयारी देखकर सोनी खुद के ही रूप पर मुग्ध हो गई और उसके भीतर रोमांस का एक तीव्र ज्वार उठ गया। उसने तुरंत सुगना के भेजे झीने और कामुक अंतर्वस्त्रों को पहना और बदन पर तौलिया लपेटकर बाथरूम से बाहर आ गई।
बाहर आकर उसने देखा कि विकास इस समय सूरज के कमरे में बैठकर उससे आज की अंतिम पूजा और व्यवस्था के बारे में बातें कर रहा था। कमरे में खुद को अकेला पाकर सोनी ने बिना समय गंवाए सुगना की भेजी इत्र की शीशी उठाई। उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।
इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।