Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 135 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 202

कुछ ही पलों के तीव्र संघर्ष के बाद, दोनों एक साथ चरम सुख के सागर में डूब गए। दोनों के मुंह से एक लंबी और तृप्त कराह निकली और वे एक-दूसरे के बदन पर ढह गए। सोनी की मुनिया के भीतर विकास का वीर्य पूरी गहराई तक समाहित हो रहा था, जो उनके बरसों पुराने सपने को पूरा करने का प्रयास था। दोनों इस ठंडी रात में एक-दूसरे की बाहों में बंधे, ज़ोर-ज़ोर से हाँफते हुए कल होने वाले उस महा-मिलन की कल्पना में खो गए, जहाँ मर्यादा की आखिरी दीवार भी ढहने वाली थी।

अब आगे..

उधर सूरज खुश था उसके मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।

सूरज के तनबदन में लगी आग सोनी तात्कालिक तौर पर शांत कर चुकी थी। सोनी के कमरे से आने के बाद सूरज अपने बिस्तर पर लेट किया। सूरज के दिमाग में एक गहरा शक पैदा होने लगा था। उसे रह-रहकर यह विचार आ रहा था कि क्या यह सब कुछ वाकई विकास मौसा जी की मर्जी या सहमति से हो रहा है? इस बात की संभावना उसे इसलिए भी लग रही थी, क्योंकि सोनी मौसी अभी तक गर्भवती नहीं हो पाई थीं और शादी के इतने साल बाद भी वे संतान सुख से वंचित थे। यह बात खुद मौसी ने भी उसके सामने खुलकर स्वीकार की थी कि वे एक बच्चे के लिए कितनी तड़प रही हैं।

तो क्या इस गुप्त सिलसिले के पीछे विकास मौसा जी की भी मूक सहमति है? क्या वे खुद चाहते हैं कि संतान सप्तमी के इस अनुष्ठान के जरिए उनके घर में खुशियां आएं? या फिर सोनी मौसी उनसे छिपकर, बेहद शातिर तरीके से इस वर्जित अनुष्ठान को अंजाम दे रही हैं ताकि अपने जीवन के उस सूनेपन को भर सकें? सूरज का युवा दिमाग इन दोनों संभावनाओं के बीच झूल रहा था।

पर जो भी हो, इन उलझनों के बीच सूरज के मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।

अगली सुबह का इंतजार करते हुए सूरज भी सुखद नींद में सो गया।

संतान सप्तमी का अंतिम दिन बेहद महत्वपूर्ण था सुबह-सुबह जब सूरज विकास और सोनी अपनी सुबह की चाय कंप्लीट कर अपने-अपने कमरों में जाने वाले थे तभी सुगना का फोन आ गया सुगना सोनी से बातें करती है और संतान सप्तमी के पिछले अच्छे दिनों का हाल-चाल पूछती थी सोनी भी इशारों सालों में उसे सारी बात बताती है पर्वत सूरज के साथ अपने संभोग को छुपा ले जाती है दूर बैठे विकास और सूरज एक दूसरे से बातें करते रहते हैं पर उनका ध्यान सोने के उत्तरों पर लगा रहता है और वह हम दोनों की बातचीत को समझने का प्रयास करते हैं

संतान सप्तमी के इस अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन की सुबह पहाड़ों की तेज़ ठंड और हल्की धुंध के साथ हुई। कमरे के भीतर गरमा-गरम चाय का दौर चल रहा था। विकास, सोनी और सूरज एक साथ बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे, लेकिन माहौल में एक अजीब सी खामोशी और आने वाले पल का रोमांच साफ़ महसूस हो रहा था। तभी अचानक सोनी के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर सूरज की माँ यानी सुगना का नाम चमक रहा था।

सोनी ने बिना एक पल गंवाए लपककर फोन उठाया और वहीं बिस्तर पर पेट के बल लेटकर सुगना से बात करने लगती है। इस तरह लेटने की वजह से उसकी पीठ और नितंबों का उभार मद्धम रोशनी में और भी आकर्षक लग रहा था। बात करते-करते उसने मस्ती में अपने पैरों को थोड़ा ऊपर उठाया, जिससे उसकी रेशमी नाइटी सरककर घुटनों तक आ गई और उसकी गोरी जाँघों का कुछ हिस्सा साफ़ दिखाई देने लगा।

सोनी अपनी बहन सुगना की बातों में इतनी खोई हुई थी और उससे बात करने के अहसास में इतनी उन्मुक्त और मदहोश थी कि उसे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि पीछे बैठे विकास और सूरज एक साथ उसकी इस मादक स्थिति को निहार रहे हैं। पहाड़ों की उस सुबह, सोनी का यह बेबाक और मदहोश अंदाज़ उन दोनों मर्दों की धड़कनों को एक साथ तेज़ कर रहा था।

सूरज विकास के ठीक बगल में बैठा हुआ था और चाहकर भी अपनी नज़रों को काबू में नहीं रख पा रहा था। वह मौसा जी के सामने अपनी मौसी के इस मादक बदन और उभरे हुए नितंबों को देखने से बार-बार कतरा रहा था, उसे लग रहा था कि कहीं उसका यह गुप्त आकर्षण पकड़ा न जाए। लेकिन बिस्तर पर लेटी सोनी की वह मुद्रा इतनी उन्मुक्त और कामुक थी कि उसका युवा मन और उसकी आँखें खुद-ब-खुद उस तरफ खिंची चली जा रही थीं। वह चाय की चुस्की लेने के बहाने बार-बार अपनी पलकें उठाता और नाइटी से बाहर झलकती सोनी की गोरी, चिकनी जाँघों और नंगे घुटनों को एकटक निहारने लगता।

विकास वहीं बैठा सूरज की इस छटपटाहट और उसकी बदलती मनोदशा को बहुत गहराई से समझ रहा था। सूरज की आँखों में अपनी पत्नी के लिए बढ़ती उस बेकाबू वासना और तड़प को भाँपकर विकास के भीतर घृणा के बजाय एक तीव्र उत्तेजना का करंट दौड़ गया। उसे इस बात से गहरा मानसिक और शारीरिक सुख मिल रहा था कि उसका भांजा उसकी पत्नी के अंगों को देखकर अंदर ही अंदर सुलग रहा है। विकास ने जानबूझकर कोई दखल नहीं दिया, बल्कि वह शांत बैठकर इस वर्जित नज़ारे का लुत्फ उठाने लगा।

उधर इन दोनों मर्दों की आंतरिक हलचल से पूरी तरह बेखबर, सोनी एकदम बिंदास और मदहोश होकर फोन पर सुगना से बातें करने में मग्न थी। वह हंसती, मुस्कुराती और बातों-बातों में अपने पैरों को हवा में हिलाती, जिससे उसकी नाइटी का रेशमी कपड़ा बार-बार सरककर उसकी जाँघों को और उजागर कर देता।

सुगना और सोनी के बीच फोन पर बातचीत जारी थी। दोनों बहनें कम और सहेलियाँ ज़्यादा थीं, इसलिए उनके बीच की टोन बेहद अनौपचारिक और खुली हुई थी। हालांकि, सुगना को रत्ती भर भी यह अहसास नहीं था कि सूरज और सोनी के बीच कोई गुप्त संबंध बन चुका है; वह तो बस यही जानती थी कि विकास और सोनी मिलकर संतान सप्तमी का यह पवित्र और कठिन अनुष्ठान पूर्ण कर रहे हैं।

सुगना (फोन पर, धीमी और रसभरी आवाज़ में): "सोनी... छह दिन बीत गए। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान अपनी चरम ऊर्जा पर पहुँच चुका होगा। सच-सच बता, पहाड़ों की इस कड़कड़ाती ठंड में क्या तेरे बदन की तड़प को थोड़ी शांति मिली? अनुष्ठान की वो गुप्त अग्नि क्या तेरे रोम-रोम को जगा पा रही है? विकास जी इस अनुष्ठान को पूरे मन से निभा रहे हैं ना?"

सुगना के इस तीखे और बेबाक सवाल को सुनकर सोनी की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। उसने तिरछी नज़रों से बगल के सोफे पर बैठे विकास और सूरज की तरफ देखा। सोनी ने खुद को संभाला और मर्यादा का ध्यान रखते हुए अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, मर्यादित लेकिन दोहरा अर्थ रखने वाला बनाया, ताकि सुगना को उसके और विकास के बीच की बात लगे, जबकि पास बैठे सूरज और विकास को उसका असली इशारा समझ आए।

सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी... आप तो जानती हैं कि यहाँ की हवाओं में कितनी ठंड है, लेकिन इस अनुष्ठान का प्रभाव ऐसा है कि भीतर एक अजब सी गर्माहट बनी हुई है। जो अग्नि आप कह रही हैं, उसकी तपिश इतनी तेज़ है कि यह बदन अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। कल रात की आहुति तो इतनी... इतनी गहरी थी कि मैं आपको क्या बताऊँ। जैसे सब कुछ पिघलने ही वाला था।"

सुगना फोन के उस पार खिलखिला कर हँस पड़ी। फिर अचानक उसे अपने बेटे की याद आई।

सुगना (एक माँ वाली ममता के साथ): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। और सुन, मेरा सूरज कैसा है? पहाड़ों की ठंड उसे लग तो नहीं गई? वो तो पहली बार इतने ठंडे इलाके में गया है। थोड़ा उसका ध्यान रखना, खाने-पीने में बहुत लापरवाही करता है वो।"

सोनी ने फोन को थोड़ा और कसकर पकड़ा और अपनी आँखें सीधे सूरज की नज़रों में डाल दीं, जो उसे ही ताक रहा था।

सोनी (सूरज की आँखों में देखते हुए, शरारत भरी आवाज़ में): "दीदी, आप सूरज की चिंता बिल्कुल मत कीजिए। वो अब बच्चा नहीं रहा, बहुत समझदार और... बहुत 'बड़ा' हो गया है। कल रात भी मैंने उसका पूरा ध्यान रखा था। उसकी हर बेचैनी को शांत करना मुझे अच्छे से आता है। यहाँ तक कि सोने से पहले मैंने खुद पक्का किया कि वो पूरी तरह राहत में सोए।"

सोनी की इस बात का दोहरा मतलब विकास और सूरज को अच्छी तरह समझ आ रहा था। विकास की धड़कनें तेज़ हो गईं, और सूरज ने शरम और उत्तेजना के मारे अपनी नज़रें झुका लीं। सुगना इस गूढ़ इशारे को समझ नहीं पाई और उसने बात का रुख वापस विकास की तरफ मोड़ दिया।

सुगना (फुसफुसाते हुए, सोनी को उकसाते हुए): "अच्छा, यह तो ठीक है। पर ये बता, जीजा जी का क्या हाल है? इस बार के व्रत-त्योहार में उनमें वो पुराना जोश दिख रहा है या नहीं?"

सोनी ने एक गहरी सांस ली, अपने नितंबों को थोड़ा और सहज किया और विकास की तरफ देखते हुए फुसफुसाए अंदाज़ में कहा:

सोनी (इशारों ही इशारों में, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी, सच कहूँ तो जब से आपने उन्हें वो 'गुरु मंत्र' दिया है ना, तब से तो वो और भी ज़्यादा मादक और बेचैन हो गए हैं। उनके भीतर की तड़प इस कदर बढ़ गई है कि अब वो हर वक्त बस अनुष्ठान को पूर्ण होते देखना चाहते हैं। कल रात भी उनकी वो बेचैनी साफ़ दिख रही थी, और वो इस खेल को और आगे बढ़ाने के लिए बहुत उतावले हैं।"

सोनी की यह बात सुनकर विकास के सीने में गर्व और वासना का एक साथ संचार हुआ। उसे साफ़ समझ आ गया कि सोनी सुगना के सामने ही आज रात होने वाली अंतिम और पूर्ण आहुति की बिसात बिछा रही है, जबकि सुगना इस पूरे सच से पूरी तरह अनजान थी। सूरज का दिल यह सुनकर सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था।

सुगना (एक गहरी सांस लेते हुए): "चलो, आज आखिरी दिन है। अपनी देह के उस पाश को पूरी तरह खोल देना और उस ऊर्जा को खुद में समाहित कर लेना ताकि गोद हरी हो जाए।"

सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए): "जी दीदी, आप निश्चिंत रहिए। आज का अनुष्ठान और आज की पूर्णाहूति ऐसी होगी कि सब कुछ हमेशा के लिए बदल जाएगा और इसे कोई कभी नहीं भूल पाएगा।"

फोन पर सुगना की बातें खत्म होने ही वाली थीं कि अचानक उसे कुछ याद आया और उसने सोनी से कहा, "सोनी, जरा सूरज को फोन देना, मुझे उससे भी थोड़ी बात करनी है।"

सोनी ने तुरंत बिस्तर पर अपनी स्थिति बदली और कमरे के दूसरी तरफ बैठे सूरज को आवाज़ लगाई, "सूरज... इधर आ, तेरी माँ का फोन है, तुझसे बात करना चाहती हैं।"

सूरज ने अपने मौसा जी की तरफ देखा और फिर धड़कते दिल के साथ बिस्तर के करीब आया। सोनी ने मुस्कुराते हुए फोन सूरज के हाथ में थमा दिया, लेकिन वह बिस्तर से उठी नहीं, बल्कि वहीं लेटी रही। सूरज फोन कान से लगाकर सुगना से बात करने लगा।

सुगना (लाड़ भरे अंदाज़ में): "हाँ सूरज, कैसा है रे तू? वहाँ पहाड़ों पर कोई परेशानी तो नहीं हो रही है ना? और सुन... बनारस से निकलते वक्त मैंने जो तुझे एक विशेष पैकेट देकर भेजा था और कहा था कि इसे संतान सप्तमी के अंतिम दिन ही निकालना है, वो याद है ना? आज वो विशेष पैकेट अपनी सोनी मौसी को समर्पित कर देना, उसमें बिल्कुल देरी मत करना।"

सुगना का सीधा मतलब उस धार्मिक पैकेट से था, लेकिन इस माहौल में 'विशेष पैकेट समर्पित करने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग ने मन ही मन सुगना की बातों का एक दूसरा और गुप्त अर्थ निकाल लिया। उसने चुपके से कल रात लिहाफ़ के भीतर के उस नज़ारे को याद किया और इस 'विशेष पैकेट' को अपने युवा अंग और वीर्य के अंश से जोड़ लिया, जिसे आज रात उसे पूरी तरह मौसी को सौंपना था। हालांकि, उसने अपने चेहरे पर इस विचार की एक शिकन भी नहीं आने दी और बेहद सामान्य आवाज़ में जवाब दिया।

सुगना: "और सच-सच बता, तू ठीक है ना वहाँ? तेरी मौसी तेरा ध्यान रख रही है?"

सूरज (बेहद सहज और शांत आवाज़ में): "जी माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। आप चिंता मत करो... सोनी मौसी मेरा बहुत ख्याल रख रही हैं। यहाँ मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होने देतीं।"

सूरज की आवाज़ में कहीं भी वासना या उत्तेजना नहीं टपक रही थी, वह अपनी माँ से एक संस्कारी बेटे की तरह ही बात कर रहा था। सुगना उसकी इस सादगी से संतुष्ट होकर आगे बोली।

सुगना (नसीहत देते हुए): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन सुन, सिर्फ मौसी ही तेरा ख्याल रखे, ऐसा नहीं होना चाहिए। तू भी अब बड़ा हो गया है, आज अनुष्ठान का आखिरी और सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात गाँठ बांध ले... तुझे भी अपनी सोनी मौसी का बहुत ख्याल रखना है, उन्हें हर हाल में खुश रखना है और इस पावन दिन पर उन्हें बिल्कुल भी परेशान मत करना। जैसा वो कहें, वैसा ही करना।"

माँ की इस नसीहत को सुनकर भी सूरज ने मन ही मन उसका दूसरा, गहरा और कामुक अर्थ निकाला कि आज रात उसे मौसी को शारीरिक रूप से पूरी तरह तृप्त और खुश करना है। लेकिन प्रकट में उसने अपनी आवाज़ को बेहद मर्यादित और गंभीर बनाए रखा।

सूरज (गंभीरता से): "जी माँ, आप बिल्कुल फिक्र मत करो। मौसी कितनी खुश हैं... यह जब आप बनारस वापस आने पर उनसे मिलेंगी, तो खुद उनके चेहरे से ही पूछ लेना। मैं आपकी कही हर बात का पूरा ध्यान रखूँगा।"

सूरज का उत्तर ऊपर से जितना सीधा और मर्यादित था, उसके भीतर छिपा अर्थ उतना ही गहरा था। सूरज ने भले ही अपनी बातों से कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने दिया, लेकिन पास ही बिस्तर पर लेटी सोनी उसकी आँखों के ठहराव और इस सयानेपन को देखकर तुरंत सब कुछ समझ गई। सोनी को साफ़ अंदाज़ा हो गया कि सूरज बाहर से जितना शांत दिख रहा है, भीतर से वह आज रात की पूर्णाहूति के लिए उतना ही दृढ़ और तैयार हो चुका है।

यह कहकर सूरज ने फोन रख दिया, और कमरे में फैली खामोशी अब आज के महा-मिलन का इशारा कर रही थी।

विकास जैसे ही फ्रेश होने के लिए बाथरूम में जाता है, कमरे का माहौल एक बार फिर पूरी तरह से बदल जाता है। सूरज बिना कोई देरी किए तुरंत अपनी अटैची के पास पहुँचता है और चैन खोलकर उसमें से अपनी माँ का दिया हुआ वह विशेष पैकेट निकाल लाता है। वह उस पैकेट को लेकर सीधे बिस्तर के पास आता है और मुस्कुराते हुए सोनी मौसी के हाथों में सौंप देता है।

सोनी उस पैकेट को अपने हाथों में लेती है और पलटकर देखते हुए बेहद भावुक और लाड़ भरे लहज़े में कहती है, "तेरी माँ भी ना सूरज... सचमुच सबका कितना ख्याल रखती हैं। बनारस में बैठकर भी उन्हें यहाँ के अनुष्ठान की एक-एक चीज़ की चिंता है।"

सूरज अपनी माँ के इस स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था। वह गर्व से मुस्कुराते हुए कहता है, "हाँ मौसी, माँ सचमुच अनोखी हैं और हमारे पूरे घर की जान हैं। पर मौसी... आप भी तो कितनी अच्छी हैं, आप भी तो यहाँ हम सबका कितना ध्यान रखती हैं।"

सूरज की आवाज़ में एक गहरा ठहराव और सम्मान था, लेकिन उसकी आँखें सीधे सोनी के बदन और उसके चेहरे की लाली पर टिकी हुई थीं। सोनी भी कोई अनजान नहीं थी, वह सूरज की आँखों में सीधे झाँकती है और उसके दिल में छिपे उस असली आशय को, उस कशिश को बहुत अच्छी तरह समझ रही होती है जो कल रात से उनके बीच पनप रही थी। सोनी के इस सयानेपन और अपनी तारीफ को सुनकर सोनी के भीतर भी एक अजीब सी कामुक उत्तेजना जाग उठती है। वह बेहद रसीले और मादक लहज़े में, आँखें मटकाते हुए कहती है, "और मेरा सूरज भी तो... बिल्कुल अपनी माँ पर ही गया है। दूसरों को खुश रखना और उनका ख्याल रखना इसे भी बहुत अच्छे से आता है।"

सोनी के इस दोहरे और गहरे अर्थ वाले जवाब को सुनकर सूरज के चेहरे पर एक चुलबुली मुस्कान तैर जाती है। दोनों एक-दूसरे की आँखों में छिपे उस मूक आमंत्रण को पढ़ लेते हैं और मद्धम रोशनी में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगते हैं।

सोनी ने उत्सुकता से उस पैकेट की गाँठ को खोला और उसके भीतर रखी एक-एक चीज़ को निकालकर बेहद सलीके और करीने से बिस्तर पर सजाने लगी। जैसे-जैसे सामान बाहर आ रहा था, कमरे के भीतर का माहौल और भी सम्मोहक होता जा रहा था। पैकेट से सबसे पहले एक बेहद सुंदर, गाढ़े लाल रंग का जोड़ा निकला—एक बेहद खूबसूरत, बारीक कढ़ाई वाला लहंगा और चोली। लेकिन जैसे ही सोनी ने लहंगे के नीचे दबे बाकी कपड़ों को उठाया, उसके गालों पर गहरी लाली छा गई। उस जोड़े के साथ ही उसी से मेल खाते हुए बेहद झीने, पारदर्शी और कामुक अंतर्वस्त्र (अंडरगारमेंट्स) भी रखे थे। सुगना का यह चुनाव इस बात का साफ़ संकेत था कि इस अंतिम दिन की आहुति में देह का समर्पण किस हद तक होना था।

इसके बाद सोनी के हाथ में दो सुपारियाँ आईं। ये आम सुपारियाँ नहीं थीं, बल्कि उन दोनों के बीच में विशेष रूप से छेद करके एक मोटा, मज़बूत धागा पिरोया गया था। इस अजीब सी वस्तु को देखकर सोनी के मन में गहरा कौतूहल और अचरज हुआ। उसने अपने पूरे जीवन में पूजा की ऐसी कोई सामग्री या वस्तु आज तक नहीं देखी थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि संतान सप्तमी के इस गुप्त अनुष्ठान में इन आपस में बंधी सुपारियों का क्या उपयोग होने वाला है।

इनके अलावा, पैकेट में कुछ पारंपरिक पूजन सामग्री थी और सबसे नीचे रखी थी एक छोटी, नक्काशीदार इत्र की शीशी। सोनी ने जैसे ही उस शीशी को अपने हाथों में लिया और उसका ढक्कन थोड़ा ढीला किया, उसकी एक तीखी, maahak खुशबू सीधे सोनी के मर्म (अंतरात्मा) तक पहुँच गई। इस महक के नाक में घुसते ही सोनी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई और अतीत का एक गहरा साया उसकी आँखों के सामने घूम गया। यह वही चिर-परिचित, मदहोश कर देने वाली खुशबू थी जिसे उसने सालों पहले बनारस में सुगना के कमरे में महसूस किया था। यह वही इत्र था जो सुगना ने अपने जीवन के उस वर्जित मोड़ पर, सर्वेश जी (सूरज के पिता) के साथ पहली बार पूर्ण संभोग के समय लगाया था। एक पल के लिए सोनी का पूरा वजूद कांप उठा, पुरानी यादें और उस रात का रहस्य उसके सामने सजीव हो उठा। पर सोनी एक पढ़ी-लिखी, समझदार डॉक्टर थी; उसने तुरंत खुद को संभाला। वह जानती थी कि अतीत में जो कुछ भी हुआ, उसमें इस इत्र की कोई गलती नहीं थी, वह तो महज़ एक संयोग था।

तभी उसका ध्यान पैकेट के बिल्कुल खाली हो चुके निचले हिस्से पर गया। वहाँ सब सामान हट जाने के बाद अंत में एक मुड़ा हुआ पत्र निकला। सोनी ने उत्सुकता और थोड़ी सी घबराहट के साथ उस पत्र को अपने हाथों में ले लिया और बिस्तर पर पेट के बल लेटे हुए ही, उसे खोलकर बेहद ध्यान से पढ़ने लगी।

सोनी ने उस पत्र को खोला और उसकी एक-एक पंक्ति को बेहद ध्यान से और डूबकर पढ़ने लगी। सुगना ने उस पत्र में संतान सप्तमी की इस अंतिम और महा-पूर्णाहुति की पूरी गुप्त विधि को विस्तार से समझाया था।

पत्र में सुगना ने लिखा था:

"सोनी, आज का दिन तेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात ध्यान से सुन, सुबह की चाय के बाद तू सबसे पहले स्नान करके तैयार होना और सीधे मंदिर जाकर देवी माँ का आशीर्वाद लेना। लेकिन तैयार होते समय तुझे एक विशेष काम करना है। मैंने जो इत्र की शीशी भेजी है, उस जादुई सुगंध को तुझे अपने बदन के उन सभी कामुक अंगों पर लगाना है जो किसी भी पुरुष को सबसे प्यारे होते हैं। यहाँ तक कि उस इत्र की कुछ बूंदें तुझे अपनी मुनिया (योनि) के चारों ओर भी लगानी हैं, ताकि उसकी मादकता पुरुष के भीतर की बची-खुची मर्यादा को भी पूरी तरह पिघला दे।

अब बात करती हूँ इन दो सुपारियों की, जिन्हें देखकर तू ज़रूर हैरान हुई होगी। मैंने ये दो अलग-अलग आकार की सुपारियाँ इसलिए भेजी हैं ताकि तू अपनी सुविधा और पसंद के हिसाब से चुन सके। स्नान करने के बाद, इनमें से जो भी सुपारी तेरी मुनिया आसानी से स्वीकार कर पाए, उसे अपनी गहराई के भीतर रख लेना। जब तक तू मंदिर में पूजा करके वापस आएगी, तब तक कई घंटों में तेरी योनि से निकलने वाला वो प्राकृतिक, कामुक अर्क (रस) इस सुपारी के भीतर पूरी तरह समाहित हो चुका होगा।

पूजा से लौटने के बाद, जब महा-मिलन का समय आएगा, तब तुझे यह सिद्ध सुपारी उस पुरुष को खिलानी है जो आज इस अनुष्ठान की पूर्णाहुति करेगा। उससे कहना कि वह इसे चबा-चबाकर इसके भीतर समाए तेरे बदन के उस अमृत रस को पूरी तरह आत्मसात कर ले। छोटा या बड़ा आकार तू खुद तय कर लेना। और हाँ, धागा मैंने इसीलिए पिरोया है ताकि सुपारी अंदर ही न छूट जाए, धागे का एक सिरा बाहर रहेगा जिससे तू उसे बाद में आसानी से निकाल सके।"

पत्र का आखिरी शब्द पढ़ते ही सोनी का पूरा वजूद उत्तेजना और विस्मय से सिहर उठा। वह सुगना की इस अकल्पनीय बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता पर मन ही मन बेहद गर्व कर रही थी। उसे इस बात का अहसास हो गया कि सुगना ने इस अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए काम-शास्त्र के कितने गहरे और गुप्त नियमों का सहारा लिया था। अब सोनी के सामने आगे की पूरी तस्वीर बिल्कुल साफ और स्पष्ट हो चुकी थी कि उसे आज के इस विशेष दिन पर क्या और कैसे करना है। उसने बिना किसी देरी के बिस्तर पर सजे उन झीने, कामुक अंतर्वस्त्रों को उठाया और उनके भीतर ही उन सुपारियों को बड़ी चतुराई से लपेटकर अपने पास सुरक्षित रख लिया। अब उसकी धड़कनें तेज़ थीं, और वह बिस्तर पर बैठी हुई बेहद उत्सुकता से विकास के बाथरूम से बाहर आने का इंतज़ार करने लगी, ताकि वह खुद स्नान करने जा सके और सुगना के बताए इस कामुक विधान की शुरुआत कर सके।

बाथरूम के भीतर पहाड़ों की ठंडी हवाओं के बीच गरम पानी की भाप तैर रही थी, जिसने पूरे माहौल को एक रहस्यमयी और मादक कोहरे से भर दिया था। सोनी आज एक अद्भुत मानसिक और शारीरिक ऊर्जा से भरी हुई थी। आज का यह स्नान केवल देह को साफ़ करने के लिए नहीं, बल्कि उस महा-मिलन के लिए खुद को एक पवित्र वेदी की तरह तैयार करने के लिए था, जहाँ सामाजिक वर्जनाएँ और कामुकता दोनों एक दिव्य पवित्रता के साथ एकाकार होने वाले थे। सोनी को साफ़ दिख रहा था कि आज का यह अनुष्ठान इतिहास रचने जा रहा था—एक तरफ वह अपने पति विकास की उस अनोखी, दबी हुई इच्छा को उनके ही सामने पूर्ण करने जा रही थी, और दूसरी तरफ उसी वेदी पर सूरज के साथ उस दिव्य संभोग को अंजाम देने वाली थी, जो संतान सप्तमी की वास्तविक पूर्णाहुति करने वाला था।

सोनी ने दर्पण के सामने खड़े होकर पास पड़े रेज़र को उठाया। पिछले छह-सात दिनों की आपाधापी और पहाड़ों के इस प्रवास में उसकी मुनिया (योनि) के आस-पास हल्के-फुल्के बाल बाहर झांकने लगे थे। उसने बेहद सलीके और बारीकी से उन बालों को साफ़ किया। जब उसकी मुनिया पूरी तरह चिकनी, मखमली और गोरी आभा के साथ चमकने लगी, तो उसने अपने बदन को तौलिये से सुखाया।

अब बारी थी सुगना दीदी के दिए उस गुप्त और कामुक विधान को अमली जामा पहनाने की। सोनी के सामने बिस्तर पर वे दो धागे से बंधी सुपारियाँ रखी थीं। तभी अचानक सोनी के डॉक्टर दिमाग में एक गहरा द्वंद्व और कौतूहल पैदा हुआ। उसने सोचा कि सुगना ने तो एक सुपारी रखने को कहा था जिसे पूर्णाहुति करने वाले पुरुष को खिलाना था। आज का असली योद्धा और उस ऊर्जा का स्रोत निश्चित रूप से सूरज था, इसलिए यह रस सूरज को मिलना अनिवार्य था। लेकिन यदि वह केवल सूरज को ही यह सिद्ध रस पिलाएगी, तो विकास कहीं मन ही मन दुखी या उपेक्षित महसूस न करने लगे, क्योंकि वे भी तो इस अनुष्ठान के साक्षी और उसके पति थे। और यदि बाद में कभी सुगना ने उससे इस बारे में बारीक सवाल पूछ लिया, तो वह क्या जवाब देगी?

इस धर्मसंकट का सोनी ने अपनी बुद्धिमत्ता से एक बेहद कामुक और चमत्कारी हल निकाला। उसने तय किया कि वह किसी को दुखी नहीं करेगी। उसने उन दोनों ही सुपारियों को—छोटी और बड़ी—एक साथ अपने भीतर समाहित करने का फैसला किया। सोनी ने गहरी सांस ली और सुगना की दूरदर्शिता को प्रणाम करते हुए उन दोनों सुपारियों को एक-एक करके अपनी मुनिया की गुलाबी, नम गहराइयों के भीतर धकेल दिया। उसकी रसीली योनि ने उन दोनों सुपारियों को सहर्ष अपनी तड़पती गहराई में स्थान दे दिया।

उन दोनों सुपारियों के बीच पिरोया हुआ वह मोटा, मज़बूत धागा अब उसकी मुनिया के मखमली होठों से बाहर निकलकर नीचे लटक रहा था, जो उसकी योनि की बनावट को और भी ज़्यादा खूबसूरत, उत्तेजक और आमंत्रित बनाने लगा था। धागे के आखिरी छोर पर सुगना ने जो छोटी-छोटी, कलात्मक गांठे बनाई थीं, वे सोनी की गोरी जाँघों के बीच बेहद आकर्षक और किसी गुप्त आभूषण की तरह लग रही थीं। आदमकद आईने में अपनी मुनिया की यह अद्भुत और पूर्ण कामुक तैयारी देखकर सोनी खुद के ही रूप पर मुग्ध हो गई और उसके भीतर रोमांस का एक तीव्र ज्वार उठ गया। उसने तुरंत सुगना के भेजे झीने और कामुक अंतर्वस्त्रों को पहना और बदन पर तौलिया लपेटकर बाथरूम से बाहर आ गई।

बाहर आकर उसने देखा कि विकास इस समय सूरज के कमरे में बैठकर उससे आज की अंतिम पूजा और व्यवस्था के बारे में बातें कर रहा था। कमरे में खुद को अकेला पाकर सोनी ने बिना समय गंवाए सुगना की भेजी इत्र की शीशी उठाई। उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।

इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।

 
भाग 203

उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।

इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।

अब आगे..

सोनी और विकास जब मंदिर जाने के लिए कमरे से बाहर निकलने लगे, तभी विकास ने पीछे मुड़कर सूरज से कहा, "सूरज, तू भी हमारे साथ चल। संतान सप्तमी का यह आखिरी दिन है, तेरा साथ होना शुभ होगा।"

सूरज को पहले तो यह थोड़ा असहज और अजीब लगा। उसे लगा कि पति-पत्नी के इस अनुष्ठानिक दर्शन के बीच उसका जाना शायद ठीक नहीं होगा। लेकिन तभी सोनी ने उसकी तरफ देखा और अपनी खनकती आवाज़ में कहा, "चल ना सूरज, सुगना दीदी ने भी तो कहा था कि आज के दिन मेरा पूरा ख्याल रखना है।" मौसी के इस अपनेपन और अधिकार भरे आग्रह को सूरज टाल नहीं सका और वह भी साथ चलने के लिए तैयार हो गया।

जब तीनों होटल की लॉबी में पहुँचे, तो वहाँ का नज़ारा देखने लायक था। लाल चटक लहंगे और कसी हुई चोली में सजी-धजी सोनी जब अपनी मादक चाल से आगे बढ़ रही थी, तो लॉबी और रिसेप्शन पर मौजूद कर्मचारी और अन्य पर्यटक ठगे से रह गए। पहाड़ों के इस दूरदराज टूरिस्ट स्पॉट पर एक पारंपरिक, दुल्हन की तरह सजी इतनी रूपवान और आकर्षक महिला को देखना सबके लिए एक अनोखा और विस्मयकारी अनुभव था। हर कोई अपनी नज़रें हटाए बिना बस सोनी को ही एकटक निहार रहा था। लेकिन सोनी इन सब नज़रों से बेपरवाह और पूरी तरह बिंदास होकर अपने उस गुप्त 'मिशन' की तरफ आगे बढ़ रही थी, जिसकी बिसात सुगना ने बिछाई थी।

कुछ ही देर बाद तीनों पहाड़ों के बीच स्थित एक प्राचीन और शांत मंदिर में पहुँचे। मंदिर का वातावरण शंख, घंटियों की गूंज और कपूर की खुशबू से पूरी तरह दिव्य हो चुका था। सोनी ने गर्भगृह के सामने खड़े होकर अपनी आँखें बंद कीं और पूरी श्रद्धा से ईश्वर से अपनी सूनी गोद को भरने और गर्भवती होने का वरदान मांगा। जैसे ही उसने अपनी पलकें मूँदीं, उसके अंतर्मन में एक सुंदर, सलोने बालक की धुंधली सी छवि तैर गई। उस कल्पना में जो बालक उसे दिखाई दिया, उसकी नैन-नक्श और मासूमियत बिल्कुल सूरज जैसी थी। इस अलौकिक अहसास से सोनी का मन भर आया और वह ईश्वर के सामने नतमस्तक हो गई।

उसी समय, सोनी के दोनों तरफ खड़े विकास और सूरज ने भी हाथ जोड़कर अपनी आँखें बंद कर लीं। दोनों ने ईश्वर से केवल और केवल सोनी की झोली भरने, उसे दुनिया की हर खुशी देने और उसकी गोद हरी करने की सच्चे दिल से प्रार्थना की। उस पावन घड़ी में मंदिर का पूरा माहौल एक पवित्र पारिवारिक भावना में बदल गया। कुछ पलों के लिए देह की भूख, वासना और सारे गुप्त विचार कहीं गहरे गायब हो गए, और उनकी जगह सिर्फ एक निश्छल समर्पण और श्रद्धा ने ले ली।

पर जैसे ही पूजा-अर्चना समाप्त हुई और वे तीनों मंदिर की सीढ़ियाँ उतरकर वापस बाहर आए, पहाड़ों की उस ठंडी हवा ने एक बार फिर उनके बदन को छुआ। मंदिर परिसर से बाहर कदम रखते ही विकास के दिमाग में आज होने वाले उस अंतिम, वर्जित और चरम अनुष्ठान की कल्पनाएँ दोबारा कौंधने लगीं। अपनी पत्नी के इस देवदासी जैसे रूप और सुगना के उस गुप्त विधान के बारे में सोच-सोचकर विकास के भीतर कामुकता का ज्वार इस कदर बढ़ा कि उसकी मर्यादा एक बार फिर ढहने लगी और उसका अंग कपड़ों के भीतर पूरी तरह से तनकर खड़ा हो गया।

मंदिर से निकलकर होटल वापस आने के रास्ते में गाड़ियों के टायरों की आवाज़ और पहाड़ों के सन्नाटे के बीच सोनी का मन विचारों के एक गहरे भंवर में डूबा हुआ था। वह खिड़की के बाहर खिली हुई धूप को देख रही थी, लेकिन उसका दिमाग आने वाले समय के घटनाक्रमों को बहुत बारीकी से बुनने और समझने की कोशिश कर रहा था।

उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आखिर वह विकास की उस अनोखी और वर्जित इच्छा को कैसे पूरी करेगी, जिसमें उसका पति स्वयं अपनी ही पत्नी को अपने भांजे की बाहों में सौंपकर उस मिलन का साक्षी बनना चाहता था।

इस योजना के बीच सोनी के मन में एक गहरा डर और चिंता बार-बार सिर उठा रही थी। वह जानती थी कि सूरज एक युवा और गरम खून का लड़का है। इस अंतिम अनुष्ठान की वेदी पर, सुगना के दिए इत्र की मादक महक और संतान सप्तमी के उस माहौल में जब सूरज अपनी वासना के अधीन होकर पूरी तरह से उन्मुक्त (बेकाबू) हो जाएगा, तब उसे संभालना बहुत मुश्किल होगा।

सोनी को सबसे बड़ा डर इस बात का था कि यदि संभोग की उस चरम और मदहोश कर देने वाली घड़ी में सूरज अपनी सुध-बुध खो बैठा, और उसने अपने मुँह से बनारस के उन पुराने मिलनों की चर्चा छोड़ दी, या उनके बीच पहले से बने शारीरिक संबंधों की कोई बात अनजाने में कह दी, तो अनर्थ हो जाएगा। सूरज इस समय खेल के इस नए नियम से बिल्कुल अनजान था कि मौसा जी कमरे में ही कहीं छिपकर सब देखने वाले हैं। सोनी सोच रही थी कि यदि सूरज अपनी बेताबी में ज़्यादा बिंदास या बेपरवाह हो गया, तो विकास के सामने यह बात कैसे छुपी रहेगी कि वे दोनों पहली बार एक नहीं हो रहे हैं, बल्कि उनके बीच पहले ही सब कुछ घटित हो चुका है।

अपनी देह पर लगे इत्र की महक और लहंगे की सरसराहट के बीच सोनी ने मन ही मन यह तय कर लिया कि उसे सूरज पर पूरी तरह नियंत्रण रखना होगा। उसे कुछ ऐसी तरकीब निकालनी होगी जिससे सूरज कमरे में आकर भी एक कड़े अनुशासन और मर्यादा के दायरे में बंधा रहे, ताकि विकास के सामने अतीत का वह गुप्त पन्ना कभी न खुल सके।

होटल के करीब पहुँचते-पूँछते सोनी का दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो चुका था। उसने अपनी घबराहट पर काबू पाया और एक गहरी सांस लेकर इस उलझन का तोड़ निकाल लिया। वह समझ गई कि सूरज के गरम खून और उसकी उन्मुक्तता को नियंत्रित करने का केवल एक ही तरीका था—अनुष्ठान के नियमों को और अधिक रहस्यमयी और सख्त बना देना। ऐसा करने से सूरज मर्यादा के डर से खुद ही शांत रहेगा और कुछ भी अतिरिक्त बोलने की हिम्मत नहीं करेगा।

जैसे ही गाड़ी होटल के अहाते में रुकी और वे तीनों उतरकर अपने फ्लोर की तरफ बढ़े, सोनी ने विकास की तरफ देखकर हौले से मुस्कुराया। वह विकास को यह मूक संदेश दे रही थी कि अब खेल का समय आ चुका है।

कमरे में पहुँचते ही, विकास ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार सूरज की उपस्थिति में सोनी से कहा

मेरा लखनऊ का एक दोस्त नैनीताल आया है मुझे कुछ देर के लिए जाना पड़ेगा।"

सोनी ने आंखें तरेरते हुए कहा …आज के दिन भी आपको जाना है?

सोनी जाना तो नहीं चाहता पर जरूरी है मैं एक-दो घंटे में आ जाऊंगा प्लीज…

विकास का यह कहना असल में एक संकेत था कि वह बाहर जाने का ढोंग कर रहा है, ताकि सूरज को लगे कि वे कमरे में नहीं हैं, जबकि असल में विकास को थोड़ी ही देर में बालकनी के रास्ते वापस आकर छुपना था।

विकास के कमरे से बाहर निकलते ही, सोनी ने बिना समय गंवाए कमरे का भारी दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया पर लॉक नहीं किया। कमरे में सुगना के इत्र की मादक खुशबू पहले से ही तैर रही थी, जिसने सूरज के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी थी। वह लाल लहंगे में सजी अपनी मौसी के इस साक्षात कामदेवी जैसे रूप को देखकर सम्मोहित खड़ा था।

सोनी ने अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, गंभीर और रहस्यमयी कर लिया। वह सूरज के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई, जिससे उसकी चोली के भीतर से आती इत्र की तेज महक सीधे सूरज के नथुनों में समाने लगी।

सोनी (बेहद गंभीर और दबी आवाज़ में): "सूरज, ध्यान से सुन। संतान सप्तमी की यह महा-पूर्णाहुति कोई साधारण मिलन नहीं है। सुगना दीदी ने इस अंतिम रात के लिए दो बहुत कड़े और अटूट नियम बताए हैं, जिनका पालन तुझे हर हाल में करना होगा। यदि तूने इसमें ज़रा भी चूक की, तो यह अनुष्ठान खंडित हो जाएगा और ईश्वर का कोप हम पर बरसेगा।"

सूरज ने अपनी थूक निगलते हुए मौसी की आँखों में देखा। उसकी वासना इस कड़े लहज़े को सुनकर थोड़ी नियंत्रित हुई।

सूरज (धीमे से): "हाँ मौसी, बताइए। क्या नियम हैं? मैं हर नियम मानने को तैयार हूँ।"

सोनी (उसकी आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाते हुए): "पहला नियम—आज संभोग के पहले क्षण से लेकर अंतिम आहुति तक, तुझे पूरी तरह 'मौन व्रत' धारण करना होगा। तेरे मुँह से एक भी शब्द, कोई पुरानी चर्चा, या कोई भी बात नहीं निकलनी चाहिए। यहाँ तक कि आहें भी नहीं। जो कुछ भी होगा, वह पूरी तरह खामोशी के साथ संपन्न होगा।"

सोनी ने यह नियम इसलिए बनाया ताकि सूरज भूलकर भी बनारस के पुराने मिलनों का ज़िक्र न कर बैठे और विकास तक कोई बात न पहुँचे।

सोनी ने आगे कहा: "और दूसरा नियम... आज रात मैं ठीक उसी प्रकार से इस अनुष्ठान को सिद्ध करूँगी, जैसा मैंने बनारस में तेरे भीतर के पुरुषत्व को पहली बार जगाने के लिए किया था। याद है न तुझे?"

'पुरुषत्व को जगाने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग में बिजली की तरह वह पूरा दृश्य कौंध गया। उसे तुरंत याद आया कि कैसे उसकी मौसी ने उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे पूरी तरह से अंधकार में रखकर उसके भीतर की मर्दानगी को चरम पर पहुँचाया था।

सूरज (हड़बड़ाई हुई, भारी आवाज़ में): "मौसी... तो क्या आप मेरी आँखों पर आज फिर से वही पट्टी बाँधने जा रही हैं?"

सोनी ने धीरे से मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर सूरज के माथे को चूमा। उसके होंठ जब सूरज की त्वचा से अलग हुए, तो उसकी आवाज़ में एक अकाट्य गहराई थी।

सोनी: "हाँ मेरे वीर, यही इस विधान का अंतिम सत्य है। शास्त्र कहते हैं कि संतान प्राप्ति की यह महा-पूर्णाहुति यदि पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के अंश से हो रही हो, तो स्त्री की मर्यादा को बचाए रखने के लिए पुरुष की आँखों पर पट्टी बाँधना अनिवार्य होता है। जब तुम्हारी आँखों के सामने अंधेरा होगा, तभी प्रकृति इस पूर्णाहूति को केवल एक अनुष्ठानिक आहुति मानेगी, कोई पाप नहीं।"

इसी बीच क्लिक की आवाज हुई और सूरज ने पूछा मौसी लगता है कोई आया है..

सोनी को पता था यह कोई और नहीं बल्कि विकास ही है उसने सूरज की बात को इग्नोर किया और शांति से बोली

अरे यहां कौन आएगा विकास जी तो बाहर गए और मैंने दरवाजा खुद लॉक किया है।

सोनी के इस तार्किक और रहस्यमयी बातों ने सूरज के मन के सारे संशयों को शांत कर दिया। अब वह पूरी तरह से नियंत्रित भी था और डरा हुआ भी कि उसे एक शब्द भी नहीं बोलना है। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि आँखों पर पट्टी बाँधने का यह विधान असल में सोनी ने इसलिए रचा था ताकि वह अपने मौसा जी को कभी देख न सके।

सोनी ने आगे बढ़कर पलंग के पास रखी अपना लाल दुप्पटा उठाया और बेहद कोमलता से सूरज की आँखों पर बाँध दिया। जैसे ही सूरज की आँखों के सामने पूरी तरह अंधेरा छाया, दृष्टि छिन जाने से उसकी बाकी की इंद्रियाँ दस गुना अधिक संवेदनशील हो चुकी थीं।

इसी बीच बालकनी का झीना परदा धीरे से हटा और विकास बेहद खामोशी से कमरे के भीतर दाखिल हो गया। अपनी पत्नी और भांजे के बीच की उस छुपी हुई, अनोखी केमिस्ट्री और बेताबी को अपनी आँखों से साफ़ देखना उनके भीतर के पौरुष को एक चरम उत्तेजना से भर रहा था। विकास को पूरा आभास हो चुका था कि ये दोनों पहले भी एक हो चुके हैं, लेकिन इस सच को भाँपकर उनके भीतर कोई क्रोध नहीं, बल्कि एक असीम कामुक रोमांच जाग उठा था।

सोनी अब इस त्रिकोणीय खेल के केंद्र में थी। उसने सूरज को पूरी तरह से मौन रहने का निर्देश दे रखा था, इसलिए सूरज बिना कोई शब्द बोले, केवल अपनी भारी होती साँसों के सहारे सोनी के नितंबों को अपनी मजबूत उंगलियों से भींच रहा था।

सूरज की आँखों पर बंधी वह लाल मखमली पट्टी अब उसके लिए केवल एक आवरण नहीं, बल्कि उसकी बाकी सभी इंद्रियों को जगाने का माध्यम बन चुकी थी। दृष्टिहीनता के उस सघन अंधकार में, सूरज की हथेलियाँ बेहद संवेदनशील हो उठी थीं। उसने अपनी उँगलियों और हथेलियों को धीरे-धीरे सोनी के बदन के उतार-चढ़ाव पर फिराना शुरू किया। रेशमी वस्त्रों के ऊपर से भी उसे सोनी के जिस्म की तपिश और उसकी त्वचा की मखमली कोमलता का साफ़ अहसास हो रहा था।

सोनी, जो इस पूरे खेल को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रही थी, सूरज के इस सधे हुए और गहरे स्पर्श के आगे खुद को रोक नहीं पाई। जैसे-जैसे सूरज की हथेलियाँ उसकी कमसिन कमर और पीठ की ढलान को सहला रही थीं, सोनी आत्मसमर्पण के भाव में उसके आलिंगन में खींचती चली गई। उसका सिर सूरज के गठीले कंधे पर टिक गया और उसकी अपनी साँसें भारी होने लगीं।

सूरज ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी मौसी को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भर लिया। वह उसके चेहरे के करीब आया और उसके कानों के पीछे तथा सुगना के इत्र से महकती गोरी गर्दन पर अपने तपते हुए होंठ रख दिए। सूरज जिस दीवानगी और अधिकार के साथ सोनी की गर्दन और कानों को चूम रहा था, वह कोई नौसिखिया प्रयास नहीं था। उसमें एक पुराना ठहराव, एक गहरा अनुभव और एक जानी-पहचानी कशिश साफ़ झलक रही थी।


विकास की साँसें इस दृश्य को देखकर ऊपर-नीचे होने लगीं। उनकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी। एक परिपक्व पुरुष होने के नाते, सूरज के चूमने के अंदाज़ और सोनी के उसके प्रति इस सहज झुकाव को देखकर विकास के मन में यह बात शीशे की तरह साफ़ हो गई कि—निश्चित ही यह इन दोनों का पहली बार का मिलन नहीं था। इस बेताबी और जिस्मानी तालमेल के पीछे निश्चित ही कोई गुप्त इतिहास था, जिसकी गवाही कमरे की हर धड़कन दे रही थी। इस अहसास ने विकास के भीतर ईर्ष्या की जगह एक अजीब, वर्जित उत्तेजना को और बढ़ा दिया।

सोनी और सूरज अभी भी खड़े थे। सूरज की उँगलियाँ अब सोनी के वस्त्रों और चोली (ब्लाउज) की डोरियों से खेलने लगी थीं। मौन व्रत के कड़े अनुशासन में बंधा होने के कारण वह कुछ बोल तो नहीं रहा था, लेकिन उसके हाथों की फुर्ती उसकी बेताबी को बयां कर रही थी। उसने बड़ी ही चतुराई से चोली के बंधनों को ढीला किया।

कुछ ही देर में, सोनी के बदन का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह अनावृत और नग्न हो गया। मखमली रोशनी में उसकी सुगठित छाती और कमसिन कमर का पूरा हिस्सा विकास की आँखों के सामने पूरी तरह चमक उठा। सोनी की चूचियां तन चुकी थी और निप्पल मणि की भांति और भी कठोर हो गए थे। अब सोनी का पेटिकोट और उस पर लिपटी हुई लाल चटक साड़ी सरक कर आधी खुली, आधी बंधी अवस्था में आ चुकी थी, जो बस सूरज की उँगलियों के अगले स्पर्श और आदेश का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।

विकास के लिए पीछे खड़े होकर इस दृश्य को देखना किसी ऐसी कल्पना के सच होने जैसा था, जिसे उन्होंने हमेशा अपने भीतर कहीं छुपा कर रखा था। ठीक उनकी आँखों के सामने, उनकी अपनी सुंदर पत्नी की नंगी पीठ पर सूरज की वे मजबूत और युवा हथेलियाँ रेंग रही थीं, जो सोनी के गोरे बदन को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भींच रही थीं। सूरज की उँगलियों का वह कड़ा कसाब जब सोनी की त्वचा को दबाता, तो विकास के भीतर उत्तेजना का एक ऐसा प्रचंड तूफान उठता कि उन्हें लगता जैसे उनका अंग कपड़ों के भीतर ही फट जाएगा। इतना तीव्र तनाव और ऐसी चरम उत्तेजना विकास ने अपने जीवन में कई दिनों बाद—या शायद पहली बार इस रूप में महसूस की थी। वे अपनी साँसें पूरी तरह रोककर, बिना हिले-डुले, इस अद्भुत और अत्यधिक कामुक दृश्य को अपनी आँखों में समेट रहे थे।

उधर सोनी इस समय एक बिल्कुल अलग ही दुनिया में तैर रही थी। सुगना के इत्र की मादक महक, और सूरज के युवा जिस्म की तपिश ने मिलकर उसके सोचने-समझने की शक्ति पर एक पर्दा डाल दिया था। वह सब कुछ भूल चुकी थी—वे नियम, वे जतन और वह सारी चिंताएँ जो वह होटल आने के रास्ते में सोच रही थी, इस समय सूरज के प्रचंड आलिंगन के आगे हवा हो चुकी थीं। वह पूरी तरह से सूरज की बाहों में समाई हुई थी, और उसकी गर्दन पर सूरज के होठों की जो छुअन हो रही थी, उसने उसके भीतर की स्त्री को पूरी तरह तृप्त कर दिया था। कुछ जादुई और मदहोश कर देने वाले पलों के लिए उसके मन से यह संशय और डर पूरी तरह मिट गया कि ठीक पीछे उसका पति विकास खड़ा है और इस वर्जित महा-संगम के एक-एक पल को अपनी आँखों से साफ़-साफ़ देख रहा है। वह तो बस इस आदिम सुख के सागर में बिना किसी बाधा के बहती चली जा रही थी।

सोनी उस मखमली अंधकार और सूरज के युवा आलिंगन में पूरी तरह खोई हुई थी, लेकिन तभी उसे अपने ठीक पीछे एक अनजानी मगर बेहद सधी हुई आहट का अहसास हुआ। विकास दबे और सधे हुए कदमों से, बिना कोई आवाज़ किए, सोनी के ठीक पीछे आ चुके थे।

सोनी जो इस समय अर्ध-नग्न अवस्था में खड़ी थी—उसकी चोली पहले ही ढीली होकर सरक चुकी थी—उसे अचानक अपनी कमर पर लिपटी साड़ी की सिलवटें और ढीली होती हुई महसूस हुईं। वह अभी इस स्पर्श को समझ ही रही थी कि उसे साफ़ अहसास हुआ कि कोई बहुत खामोशी से उसके पेटिकोट की डोरी (नाड़ा) को उँगलियों से टटोलकर धीरे-धीरे खोल रहा है। पीछे से आने वाली उस जानी-पहचानी छुअन और साँसों की गर्माहट से सोनी का पूरा बदन सिहर उठा और उसने तुरंत पहचान लिया कि यह विकास हैं।

विकास का यह रूप देखकर सोनी के भीतर एक तीखी घबराहट दौड़ गई। विकास ने तो सिर्फ दूर से देखने की बात कही थी, फिर वह अचानक इस खेल के बीच में आकर यह सब क्या कर रहे हैं? उसे डर था कि कहीं इस अप्रत्याशित हरकत से सूरज को कुछ शक न हो जाए और पूरा खेल बेकाबू हो जाए।

स्थिति को तुरंत संभालने के लिए, सोनी ने बड़ी ही चतुरता से काम लिया। उसने बिना कोई आवाज़ किए, सूरज को बहुत धीरे से खुद से अलग किया। अचानक आए इस ठहराव से आँखों पर पट्टी बांधे खड़ा सूरज थोड़ा सा सकपकाया, लेकिन सोनी ने उसे अपनी योजनाओं में उलझाए रखने के लिए तुरंत अपने कोमल हाथ आगे बढ़ाए और खड़े-खड़े ही सूरज की शर्ट के बटन एक-एक करके खोलने लगी। सूरज इस नए स्पर्श और मौसी की इस अचानक जागी बेताबी में फिर से मग्न हो गया।

सूरज को शर्ट के बटनों में उलझाकर, सोनी ने चुपके से अपनी कमर पीछे कर दी। उधर विकास ने अपनी उत्तेजना में सोनी के पेटिकोट के नाड़े को पूरी तरह से खोल दिया था, जिससे वह वस्त्र नीचे सरकने लगा था।

सोनी के पूरी तरह नग्न होते ही उसकी मुनिया से निकल रहा वह लाल धागा दिखाई पड़ने लगा जिसके एक सिरे पर लगी हुई सुपाड़ी मुनिया के अंदर उसका काम रस सोख रही थी।

सोनी ने बेहद मादक तरीके से अपना एक हाथ नीचे लाया और पहले एक धागे को पड़कर बाहर खींचा।

सोने की बुर की गहराइयों में डूबी वह बड़ी सुपारी धीरे-धीरे बाहर आने लगी और सोने की मुनिया के रस भरे होठों से टुप…. की आवाज के साथ बाहर आ गई।

सुपारी सोनी के कामरस से फूल चुकी थी उसने सुपारी से धागा हटाया और सुपारी को ऊपर उठाकर विकास की तरफ देखा विकास की मौन सहमति पाकर उसने वह सुपारी सूरज के होठों से सटा दी सूरज को वह मादक गंध याद थी उसने बिना कुछ कहे अपने होंठ खोले और उसे मुंह में ले लिया…

सोनी के काम रस का स्वाद सूरज को बखूबी याद था उसे सुपारी का रहस्य भी पता था।

सोनी ने छोटी सुपारी को भी अपनी मुनिया से बाहर निकाला और उसे विकास के होंठों के बीच रख दिया.. विकास ने भी उसे अपने मुंह में ले लिया।

विकास में सोनी की मुनिया को छूने की कोशिश की…

सोनी ने तुरंत पीछे मुड़कर विकास की आँखों में देखा। उसकी आँखें सवाल भी कर रही थीं और समझा भी रही थीं। सोनी ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी उँगलियों से विकास को इशारा किया कि वे अपनी तय की हुई जगह पर जाकर बैठ जाएं और वहीं से इस दृश्य का आनंद लें।

विकास भी सोनी की उस सख्त और डरी हुई नज़र के पीछे के खतरे को समझ गए। वे अपनी भारी होती साँसों को रोककर, दबे कदमों से वापस अपनी नियत जगह पर बैठने के लिए पीछे हट गए, जबकि सोनी ने एक बार फिर पूरी तरह से अपनी आँखें बंद किए खड़े सूरज की तरफ ध्यान केंद्रित किया।

कमरे के भीतर की उत्तेजना अब अपने चरम बिंदु को छू रही थी। कुछ ही पलों के भीतर, सोनी ने सूरज को भी दो पूरी तरह से नग्न कर दिया। मखमली और मद्धम रोशनी में उन दोनों के सुगठित बदन साक्षात कामदेव और कामदेवी की तरह दमक रहे थे। आँखों पर पट्टी बंधा सूरज पूरी तरह अपनी मौसी के देह-सुख में डूबा हुआ था, और सोनी भी सब कुछ भूलकर उसके स्पर्श का आनंद ले रही थी।

उधर, अपनी तय जगह पर बैठे विकास की हालत बेकाबू हो रही थी। वो उस अद्भुत, कड़े और गठीले पौरुष (लिंग) को प्रत्यक्ष देखने के लिए पूरी तरह आतुर था, जिसके बारे में उन्होंने केवल कल्पनाएँ की थीं।

परंतु, विकास इस समय जिस कोण और जगह पर बैठे थे, वहाँ से उनकी नज़रें सूरज के उस अद्भुत लिंग तक नहीं पहुँच पा रही थीं। खड़े होने की स्थिति में, सूरज ठीक सोनी के सामने था, जिसके कारण उसका वह लंड सोनी के सुगठित नितंबों के पीछे पूरी तरह छिपा हुआ था। विकास अपनी गर्दन उठा-उठाकर, थोड़ा तिरछा होकर देखने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सोनी का कामुक बदन बीच में एक ओट की तरह आ रहा था।

अपनी पत्नी और भांजे के इस महा-मिलन के सबसे मुख्य दृश्य को साफ़ न देख पाने की छटपटाहट में विकास के भीतर की कामुक व्याकुलता और भी तीव्र हो गई। वे बिना कोई आवाज़ किए अपनी जगह पर छटपटा रहे थे, और इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि कब उनकी स्थिति या उन दोनों की दिशा बदले, और वे उस वर्जित दृश्य को अपनी आँखों से साफ़ देख सकें।

कमरे की मखमली रोशनी के बीच, जब सोनी और सूरज ने अपनी स्थिति में थोड़ा सा बदलाव किया, तो विकास की व्याकुल आँखें तुरंत उस ओर टिक गईं। सोनी का बदन जैसे ही थोड़ा सा एक तरफ हटा, सूरज का वह मुख्य अंग (लिंग) पहली बार विकास की नज़रों के ठीक सामने पूरी तरह उजागर हो गया।

"हे भगवान! यह क्या..." विकास के मन में एक गहरा धक्का लगा। उन्होंने जिस प्रचंड, सुगठित और सख़्त तने हुए पौरुष की कल्पना अपने दिमाग में पाल रखी थी, उसके उलट वहाँ का नज़ारा बिल्कुल अलग था। सूरज का लिंग इस समय एक मुरझाए हुए केले की तरह पूरी तरह से ढीला और लटका हुआ था।

विकास को अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। सोनी जैसी साक्षात कामदेवी जैसी रूपवान नग्न स्त्री को अपनी बाहों में भरने और उसकी गर्दन को इतनी दीवानगी से चूमने के बाद भी सूरज के अंग में रत्ती भर का तनाव नहीं था। एक युवा पुरुष का अपनी अत्यंत आकर्षक मौसी के पूर्ण नग्न बदन के स्पर्श के बाद भी इस कदर शांत और शिथिल रहना किसी अजूबे से कम नहीं था।

विकास स्तब्ध रह गया। वो आश्चर्य और कौतूहल से इस अजीबोगरीब मिरेकल (चमत्कार) को एकटक देखने लगा। उनके दिमाग में सवालों का बवंडर उठने लगा कि आखिर इस चरम कामुक माहौल के बाद भी सूरज का पौरुष इस तरह सोया हुआ क्यों है? क्या यह मौन व्रत का असर था, या फिर आँखों पर बंधी उस मखमली पट्टी के अंधेरे का कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव? क्या सोनी के गर्भवती होने का सपना धरा का धरा रह जाएगा…


शेष अगले भाग में
 
Back
Top