Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )





SYNOPSIS

अहंकार के संरक्षण में अत्याचार, अनाचार, दुराचार, व्याभिचार पलता है.....

अहंकार के परछाई में अच्छाई छुप जाती है l अहंकार जो अपने वर्चस्व के लिए न्याय, सत्य धर्म को कुचल के रखने की कोशिश करता रहता है,

उसी अहंकार को अगर रूप व स्वरुप दें तो वह भैरव सिंह क्षेत्रपाल कहलाएगा जिसे पुरा राज्य राजा साहब के नाम से संबोधन करता है l भैरव सिंह क्षेत्रपाल का रौब रुतबा व दखल राज्य के शासन व प्रशासन तंत्र में भीतर तक है l

वह इतनी हैसियत रखता है कि जब चाहे राज्य की सरकार की स्थिति को डांवाडोल कर सकता है l

ऐसे ही व्यक्तित्व से भीड़ जाता है एक आम आदमी विश्व प्रताप महापात्र जिसे लोग विश्वा कहते हैं l उसी धर्म युद्ध में विश्वा भारी कीमत भी चुकाता है l

युद्ध में हथियार ही स्थिर व स्थाई रहता है जब कि हथियार चलाने वाले व हथियार से मरने वाले यानी कि हथियार के पीछे वाला व हथियार के सामने वालों की स्थान व पात्र काल के अनुसार बदलते रहते हैं, जिसके कारण युद्ध के परिणाम प्रभावित होता है l

जो कल हथियार को ले कर शिकार कर रहा था आज उसी हथियार से वह खुद शिकार हो रहा है l

इसी धर्म युद्ध के यही दो मुख्य किरदार हैं l बाकी सभी इनके सह किरदार हैं l इन्हीं के युद्ध का प्रतिफल ही "विश्वरूप" है l

यह कहानी सम्पूर्ण रूप से काल्पनिक है l इसके स्थान, पात्र व घटनायें सभी मेरी कल्पना ही है जो किसी जिवित या मृत व्यक्ति अथवा स्थान से किसी भी प्रकार से संबंधित नहीं है l

चूंकि मैं ओड़िशा से हूँ इसलिए इस कहानी का भौगोलिक विवरण एवं चरित्र चित्रण व संचालन ओड़िशा के पहचान से करूंगा l

मित्रों साथ जुड़े रहें

मैं अगले रवि वार को पहला अंक प्रस्तुत करूंगा l


🙏 🙏 🙏 धन्यवाद🙏🙏🙏
 
👉पहला अपडेट

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मित्रों चूंकि रवि वार को मैं बहुत व्यस्त रहने वाला हूँ इसलिए मैं आज ही पहला अपडेट प्रस्तुत कर रहा हूं l

सेंट्रल जेल भुवनेश्वर

आधी रात का समय है l बैरक नंबर 3 कोठरी नंबर 11 में फर्श पर पड़े बिस्तर पर एक कैदी छटपटा रहा है बदहवास सा हो रहा है जैसे कोई बुरा सपना देख रहा है....


सपने में......

एक नौजवान को दस हट्टे कट्टे पहलवान जैसे लोग एक महल के अंदर दबोच रखे हुए हैं

इतने में एक आदमी महल के सीढियों से नीचे उतर कर आता है l शायद वह उस महल का मालिक है, जिसके पहनावे, चाल व चेहरे से कठोरता व रौब झलक रहा है l

वह आदमी उस नौजवान को देख कर कहता है

आदमी - तेरी इतनी खातिरदारी हुई फिर भी तेरी हैकड़ी नहीं गई तेरी गर्मी भी नहीं उतरी l अबे हराम के जने पुरे यशपुर में लोग जिस चौखट के बाहर ही अपना घुटने व नाक रगड़ कर बिना पीठ दिखाए वापस लौट जाते हैं l तुने हिम्मत कैसे की इसे लांघ कर भीतर आने की l

वह नौजवान उन आदमियों के चंगुल से छूटने की फ़िर कोशिश करता है l इतने में एक आदमी जो शायद उन पहलवानों का लीडर था एक घूंसा मारता है जिसके वजह से वह नौजवान का शरीर कुछ देर के लिए शांत हो जाता है l

जिसे देखकर उस घर का मालिक के चेहरे का भाव और कठोर हो जाता है, फिर उस नौ जवान को कहता है - बहुत छटपटा रहा है मुझ तक पहुंचने के लिए l बे हरामी सुवर की औलाद तू मेरा क्या कर लेगा या कर पाएगा l

इतना कह कर वह पास पड़ी एक कुर्सी पर बैठता है और उन आदमियों से इशारे से उस नौजवान को छोड़ने के लिए कहता है l

वह नौजवान छूटते ही नीचे गिर जाता है बड़ी मुश्किल से अपना सर उठा कर उस घर के मालिक की तरफ देखता है l

जैसे तैसे खड़ा होता है और पूरी ताकत से कुर्सी पर बैठे आदमी पर छलांग लगा देता है l पर यह क्या उसका शरीर हवा में ही अटक जाता है l वह देखता है कि उसे हवा में ही वह दस लोग फिरसे दबोच लिया है l वह नौजवान हवा में हाथ मारने लगता है पर उसके हाथ उस कुर्सी पर बैठे आदमी तक नहीं पहुंच पाते l यह देखकर कुर्सी पर बैठा उस आदमी के चेहरे पर एक हल्की सी सर्द मुस्कराहट नाच उठता है l जिससे वह नौजवान भड़क कर चिल्लाता है - भैरव सिंह......


भैरव सिंह उन पहलवानों के लीडर को पूछता है - भीमा,

भीमा-ज - जी मालिक l

भैरव सिंह - हम कौन हैं l


भीमा- मालिक, मालिक आप हमारे माईबाप हैं, अन्न दाता हैं हमारे, आप तो हमारे पालन हार हैं l

भैरव सिंह - देख हराम के जने देख यह है हमारी शख्सियत, हम पूरे यशपुर के भगवान हैं और हमारा नाम लेकर हमे सिर्फ वही बुला सकता है जिसकी हमसे या तो दोस्ती हो या दुश्मनी l वरना पूरे स्टेट में हमे राजा साहब कह कर बुलाया जाता है l तू यह कैसे भूल गया बे कुत्ते, गंदी नाली के कीड़े l

वह नौजवान चिल्लाता है - आ - आ हा......... हा.. आ

भैरव सिंह - चर्बी उतर गई मगर अभी भी तेरी गर्मी उतरी नहीं है l जब चीटियों के पर निकल आने से उन्हें बचने के लिए उड़ना चाहिए ना कि बाज से पंजे लड़ाने चाहिए l

छिपकली अगर पानी में गिर जाए तो पानी से निकलने की कोशिश करनी चाहिए ना कि मगरमच्छ को ललकारे l तेरी औकात क्या है बे....

ना हमसे दोस्ती की हैसियत है और ना ही दुश्मनी के लिए औकात है तेरी

तु किस बिनाह पर हम से दुश्मनी करने की सोच लिया l हाँ आज अगर हमे छू भी लेता तो हमारे बराबर हो जाता कम-से-कम दुश्मनी के लिए l

इतना कह कर भैरव सिंह खड़ा होता है और सीढियों के तरफ मुड़ कर जाने लगता है l सीढ़ियां चढ़ते हुए कहता है


भैरव सिंह - अब तू जिन के चंगुल में फंसा हुआ है वह हमारे पालतू हैं जो हमारी सुरक्षा के पहली पंक्ति हैं l हमारे वंश का वैभव, हमरे नाम का गौरव पूरे राज्य में हमे वह रौब वह रुतबा व सम्मान प्रदान करते हैं कि समूचा राज्य का शासन व प्रशासन का सम्पूर्ण तंत्र न केवल हमे राजा साहब कहता है बल्कि हमारी सुरक्षा के लिए जी जान लगा देते हैं l तू जानता है हमारा वंश के परिचय ही हमे पूरे राज्य के समूचा तंत्र वह ऊचाई दे रखा है.....

इतना कह कर भैरव सिंह सीढ़ियों पर रुक जाता है और मुड़ कर फिर से नौजवान के तरफ देख कर बोलता है

भैरव सिंह - जिस ऊचाई में हमे तू तो क्या तेरे आने वाली सात पुश्तें भी मिलकर सर उठा कर देखने की कोशिश करेंगे तो तुम सब के रीढ़ की हड्डीयां टुट जाएंगी l

देख हम कहाँ खड़ा हैं देख, सर उठा कर देख सकता है तो देख l

नौजवान सर उठाकर देखने की कोशिश करता है ठीक उसी समय उसके जबड़े पर भीमा घूंसा जड़ देता है l

वह नौजवान के मुहँ से खून की धार निकलने लगता है l


भैरव सिंह - हम तक पहुंचते पहुंचते हमारी पहली ही पंक्ति पर तेरी यह दशा है l तो सोच हम तक पहुंचने के लिए तुझे कितने सारे पंक्तियाँ भेदने होंगे और उन्हें तोड़ कर हम तक कैसे पहुँचेगा l चल आज हम तुझे हमारी सारी पंक्तियों के बारे जानकारी मिलेगी l तुझे मालूम था तू किससे टकराने की ज़ुर्रत कर रहा है पर मालूम नहीं था कि वह हस्ती वह शख्सियत क्या है l आज तु भैरव सिंह क्षेत्रपाल का विश्वरूप देखेगा l तुझे मालूम होगा जिससे टकराने की तूने ग़लती से सोच लीआ था उसके विश्वरूप के सैलाब के सामने तेरी हस्ती तेरा वज़ूद तिनके की तरह कैसे बह जाएगा l

नहीं...


कह कर वह कैदी चिल्ला कर उठ जाता है l उसके उठते ही हाथ लग कर बिस्तर के पास कुछ किताबें छिटक कर दूर पड़ती है और इतने में एक संत्री भाग कर आता है और कोठरी के दरवाजे पर खड़े हो कर नौजवान से पूछता है - क्या हुआ विश्वा l

विश्वा उस संत्री को बदहवास हो कर देखता है फ़िर चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान ले कर कहता है - क.. कुछ नहीं काका एक डरावना सपना आया था इसलिए थोड़ा नर्वस फिल हुआ तो चिल्ला बैठा l

संत्री - हा हा हा, सपना देख कर डर गए l चलो कोई नहीं यह सुबह थोड़े ही है जो सच हो जाएगा l हा हा हा हा

विश्वा धीरे से बुदबुदाया - वह सच ही था काका जो सपने में आया था l एक नासूर सच l

संत्री - कुछ कहा तुमने

विश्वा - नहीं काका कुछ नहीं l

इतने में दरवाजे के पास पड़ी एक किताब को वह संत्री उठा लेता है और एक दो पन्ने पलटता है फिर कहता है


संत्री - वाह विश्वा यह चौपाया तुमने लिखा है l बहुत बढ़िया है..

काल के द्वार पर इतिहास खड़ा है

प्राण निरास जीवन कर रहा हाहाकार है

अंधकार चहुंओर घनघोर है

प्रातः की प्रतीक्षा है चंद घड़ी दूर भोर है

वाह क्या बात है बहुत अच्छे पर विश्वा यह कानून की किताब है इसे ऐसे तो ना फेंको l


विश्वा - सॉरी काका अगली बार ध्यान रखूँगा क्यूंकि वह सिर्फ कानून की किताब नहीं है मेरे लिए भगवत गीता है l

संत्री - अच्छा अच्छा अब सो जाओ l कल रात ड्यूटी पर भेंट होगी l शुभरात्रि l

विश्वा - शुभरात्रि

इतना कहकर विश्वा संत्री से किताब लेकर अपने बिस्तर पर आके लेट जाता है l

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सुबह सुबह का समय एक सरकारी क्वार्टर में प्रातः काल का जगन्नाथ भजन बज रहा है l एक पचास वर्षीय व्यक्ति दीवार पर लगे एक नौजवान के तस्वीर के आगे खड़ा है l इतने में एक अड़तालीस वर्षीय औरत आरती की थाली लिए उस कमरे में प्रवेश करती है और उस आदमी को कहती है - लीजिए आरती ले लीजिए l

आदमी का ध्यान टूटता है और वह आरती ले लेता है l फ़िर वह औरत थाली लेकर भीतर चली जाती है l

वह आदमी जा कर सीधे डायनिंग टेबल पर बैठ जाता है l थोड़ी देर बाद वह औरत भी आकर उसके पास बैठ जाती है और कहती है - क्या हुआ सुपरिटेंडेंट साब अभी से भूक लग गई क्या आपको l अभी तो हमे पूरी जाना है फ़िर जगन्नाथ दर्शन के बाद आपको खाना मिलेगा l

आदमी - जानता हूँ भाग्यवान तुम तो जनती हो l आज का दिन मुझे मेरे नाकामयाबी याद दिलाता रहता है l

औरत - देखिए वक्त ने हमसे एक बेटा छीना तो एक को बेटा बना कर लौटाया भी तो है l और आज का दिन हम कैसे भूल सकते हैं l उसीके याद में ही तो हम आज बच्चों के, बूढ़ों के आश्रम को जा रहे हैं l

आदमी - हाँ ठीक कह रहे हो भाग्यवान l अच्छा तुम तो तैयार लग रही हो l थोड़ा चाय बना दो मैं जा कर ढंग के कपड़े पहन कर आता हूँ l फिर पीकर निकालते हैं l

इतना कह कर वह आदमी वहाँ से अपने कमरे को निकाल जाता है l

इतने में वह औरत उठ कर किचन की जा रही थी कि कॉलिंग बेल बजती है l तो अब वह औरत बाहर के दरवाजे के तरफ मुड़ जाती है l दरवाजा खोलती है तो कोई नहीं था नीचे देखा तो आज का न्यूज पेपर मिला उसे उठा कर मुड़ती है तो उसे दरवाजे के पास लगे लेटते बॉक्स पर कुछ दिखता है l वह लेटर बॉक्स खोलते ही उसे एक खाकी रंग की सरकारी लिफाफा मिलता है l जिस पर पता तापस सेनापति जेल सुपरिटेंडेंट लिखा था, और वह पत्र डायरेक्टर जनरल पुलिस के ऑफिस से आया था l


वह औरत चिट्ठी खोल कर देखती है l चिट्ठी को देखते ही उसकी आँखे आश्चर्य से बड़ी हो जाती है l वह गुस्से से घर में घुसती है और अपने पति चिठ्ठी दिखा कर पूछती है यह क्या है...?
 
👉एक सौ पच्चीसवां अपडेट

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वैदेही अपनी पूजा ख़तम करने के बाद चूल्हे की आरती उतारती है l आँखे मूँद कर प्रार्थना करने के बाद जब आँख खोल कर जब पीछे मुड़ती है तो सामने बच्चों की झुंड उसे खड़े ताकते हुए दिखते हैं l

वैदेही - क्या हुआ बच्चों... स्कुल नहीं गए आज...

बच्चे - (एक साथ) नहीं... छुट्टी है...

वैदेही - तो फिर...

एक बच्चा - मासी... मामा घर से क्यूँ नहीं निकल रहे...

वैदेही - अच्छा... तो तुम लोग अपने मामा के लिए पूछने आए हो यहाँ...

एक बच्चा - हाँ... वह हमें बहुत बढ़िया बढ़िया चॉकलेट देते हैं...

दुसरा बच्चा - (मुहँ बना कर) अरे कहाँ... सिर्फ एक बार ही तो दिया था...

तीसरा बच्चा - उसके बाद दिखे ही नहीं...

चौथा बच्चा - लगता है... चॉकलेट देने पड़ेंगे इसलिए छुपे हुए हैं... बाहर ही नहीं निकल रहे...

वैदेही - ऐ... खबरदार... मेरा भाई तुम छछूंदरों से क्यूँ डरेगा... बात अगर चॉकलेट की है... वह तो मैं भी तुम सबको दिला सकती हूँ...

एक बच्चा - नहीं मासी... वह तो हम जानते हैं... पर मामा ने कहा था... जब जी करे आ जाना.. पर उस घर के बाहर एक चमगादड़ पहरा देता है... जो हमें मामा से मिलने नहीं देता...

वैदेही - ओ तो बात ऐसी है... पर वह भी तो तुम लोगों का मामा लगता है...

बच्चा - ठीक है चमगादड़ मामा... हमें मामा से मिलने नहीं दे रहा है...

वैदेही - (उस बच्चे की कान पकड़ कर) ऐ... तु बहुत सयाना बन रहा है...

बच्चा - आह... आह... मासी... दुख रहा है...

वैदेही - (कान छोड़ कर) तुम्हारा मामा... तुम लोगों के लिए... लाइब्रेरी बना रहा है... इसलिए घर से नहीं निकल रहा है... जाओ परसों सुबह तुम्हारा मामा तुम लोगों को... ढेर सारे चॉकलेट देगा... पर एक शर्त पर...

बच्चे - वह क्या है मासी...

वैदेही - जब तुम सब उस घर में जाओगे... वहाँ पर अच्छे अच्छे किताबे होंगी... पढ़ना पड़ेगा... तब जा कर वह तुम्हें चॉकलेट देगा...

बच्चा - क्या... हमें स्कुल के साथ साथ वहाँ भी पढ़ना पड़ेगा...

वैदेही - हाँ... पर... चॉकलेट भी तो मिलेगा... और हो सकता है... खिलौने भी मिले तुम सब को...

बच्चे - (खुशी से उछल कर) इये... ये.. ये...

वैदेही - ठीक है... अब तुम लोग जाओ... वर्ना... घर पर सब नाराज होंगे...

बच्चे तुरंत मुड़ कर वैदेही की दुकान से भाग जाते हैं l उन्हें खुशी से उछलते हुए जाते देख वैदेही के आँखे नम हो जाती हैं l पर होठों पर एक मुस्कान उभर जाती है l

गौरी - तु रो रही है... या हँस रही है...

वैदेही - (बच्चों को जाते हुए देखते हुए) खुश हो रही हूँ काकी... यह आँसू खुशी की भी है... और उम्मीद की भी...

गौरी - खुशी और उम्मीद... क्या मतलब हुआ इसका...

वैदेही - (गौरी की तरफ़ घूम कर) काकी... विशु... जिन गाँव वालों के लिए लड़ाई की तैयारी कर बैठा है... वही गाँव वाले उससे दूरी बनाए हुए हैं... पर उनके बच्चे...

गौरी - हाँ हाँ बच्चे हैं... पसंद तो करेंगे ही... पर... उसमें खुशी और उम्मीद वाली बात कहाँ है...

वैदेही - क्या काकी... इतनी सी बात भी नहीं समझ रही... जो आज हैं... उन्हें आने वाले कल की परवाह नहीं... पर जो कल हैं... वह अपने आज को दरकिनार कर... अपने कल से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं...

कह कर वैदेही गौरी की तरफ देखती है, गौरी की समझ में कुछ नहीं आया था, वह हैरान परेशान सा चेहरा बना कर समझने की कोशिश कर रही थी l वैदेही हँसते हुए अपना मोबाइल निकाल कर विश्व को कॉल लगाती है l कॉल लगते ही

वैदेही - विशु...

विश्व - हाँ दीदी...

वैदेही - यह क्या हो रहा है...

विश्व - (चौंक कर) क्या हो रहा है मतलब... (सीरियस हो कर) गाँव में कुछ हो गया क्या...

वैदेही - हाँ... हो तो रहा है...

विश्व - क्या.. क्या हो रहा है दीदी...

वैदेही - तेरे भांजे और भांजी.... रोज उमाकांत सर के यहाँ जा रहे थे... पर आज तुझे ढूंढते हुए मेरे पास आ गए...

विश्व - (इत्मीनान भरी साँस छोड़ते हुए) ओ...

वैदेही - क्या ओ... अब उनके लिए तो तुझे आ ही जाना चाहिए...

विश्व - ठीक है दीदी... काम लगभग पुरा हो गया है... कल शाम को निकल रहा हूँ... परसों सुबह उनके साथ बहुत मस्ती मजा करूँगा...

वैदेही - ठीक है.. ठीक है... कर लेना मस्ती मज़ाक... उस दिन तु... तेरे दो बंदर और यह नन्हें छछूंदर... सबको लेकर आना... सबके लिए ढेर सारा खाना और पकवान बनाऊँगी...

विश्व - जरूर दीदी...

वैदेही - अच्छा... अब क्या कर रहा है...

विश्व - काम में हूँ... किसी का इंतज़ार कर रहा हूँ...

वैदेही - ठीक है... रखती हूँ फोन...

विश्व - जी दीदी...

फोन कट जाता है l xxxx कैफे में एक टेबल पर बैठा विश्व मोबाइल को जेब में वापस रखता है l उसे लगता है जैसे कोई उसके पीछे खड़ा है, वह मुड़ कर देखता है l

विश्व - (खड़े हो कर) अरे... वीर.. तुम कब आए...

वीर - (मुस्करा कर) बस कुछ ही देर हुए हैं... तुम मोबाइल पर अपनी दीदी से बात कर रहे थे... (दोनों हाथ मिलाते हैं और फिर गले से लग जाते हैं)

विश्व - आओ यार बैठ जाओ...

वीर - (विश्व के सामने बैठते हुए) मिलना चाहते थे...

विश्व - हाँ यार... तुमने जिस तरह से फोन पर बात की थी... मुझे बहुत बुरा लगा था... ऐसा लगा... जैसे.. तुम टुट से गए हो... पर अब लग रहा है... तुम उससे उभर कर आ गए हो...

वीर - हाँ यार... उस दिन वाक़ई मैं टुट गया था... पर आज... थोड़ा संभला हुआ हूँ...

विश्व - ह्म्म्म्म.. दिख रहा है... तुम्हारे चेहरे पर यह ताजगी... यह रौनक... जरूर अनु के वज़ह से होगी... अनु ने तुम्हारे अंदर से एक नए वीर को बाहर ले आई है...

वीर - हाँ कह तो तुम सौ फीसदी सही रहे हो... ऐसा लग रहा था... जैसे मैं अंधेरे में खो गया हूँ... अनु ने हाथ बढ़ाया... और अब मैं उजाले में हूँ.... पर...

विश्व - हाँ... क्या पर...

वीर - तुम्हें कैसे मालुम हुआ... यह सब अनु ने किया.... जब कि हादसे के बाद... मैं अपने दोस्त से दुखड़ा रो रहा था...

विश्व - (थोड़े देर के लिए चुप हो जाता है, फिर) दोस्त ग़म बांट सकता है... पर ग़म से उबार नहीं सकता... दिलबर ग़म मिटा भी सकती है और ग़म के भंवर से निकाल भी सकती है... अभी तुम अपने में जिस ताजगी को लिए हुए दिख रहे हो... वह मुझसे नहीं हो पाता... इसलिए मैंने तुमसे अनु का जिक्र किया...

वीर - (मुस्कराते हुए) मान गया दोस्त... वाकई... जिंदगी और हालात... दोनों को तुम बहुत ही अच्छी तरह से समझ सकते हो...

कुछ देर के लिए दोनों के बीच खामोशी छा जाती है l विश्व दो कॉफी की ऑर्डर करता है l दोनों समझ ही नहीं पाते एक दुसरे से क्या बात करें और बात चित का सिलसिला कहाँ से शुरु करें l वेटर दो कॉफी ग्लास टेबल पर रख कर चला जाता है l दोनों अपने अपने ग्लास उठा लेते हैं और कॉफी की चुस्की भरने लगते हैं l कुछ देर बाद

वीर - वैसे... तुम्हारी प्रेम कहानी की गाड़ी... कौनसी स्टेशन पहुँची...

विश्व - उनकी जिद थी... मेरे इजहार की... सो मैंने कर दी...

वीर - वाव... कैसे किया... कब और कहाँ...

विश्व - उनके घर में... (वगैर रुप और राजगड़ का नाम लिए जो हुआ था उसकी एक कहानी बना कर वीर को सुना देता है)

वीर - ओह माय गॉड... क्या बात है यार... व्हाट अ बिउटीफुल वे टु प्रपोज...

विश्व - थैंक्स...

वीर - तो... कब मिला रहे हो...

विश्व - (गले में कॉफी अटक जाता है और खांसने लगता है)

वीर - अरे... क्या हुआ...

विश्व - (खांसते हुए) लगता है... या तो कोई याद कर रहा है... या फिर... कोई अपने मन में जी भर के गालीयाँ दे रहा है...

वीर - याद तो समझ में आता है... पर.. गाली...

विश्व - (हँसते हुए) अरे यार ऐसा कहते हैं... सो मैंने भी कह दिया...

वीर - ओ अच्छा... तुम्हारी वाली... वाकई शेरनी है... तुम उससे डर कर प्यार इजहार किया लगता है...

विश्व - नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है यार... हमारा प्यार कहो या चाहत... बचपन से है... इजहार का रस्म तो अभी किया है...

वीर - (हैरान हो कर) क्या... बचपन से...

विश्व - हाँ... मुझे तभी से... उनके रूठना... उनका बात बात पर गुस्सा करना... बस.. तभी से उनके नखरे उठाना... मुझे अच्छा लगता है...

वीर - कमाल की बात है... मैं अपनी अनु को... हिरनी या मोरनी की तरह देखता हूँ... और तुम हो कि..

विश्व - शेरनी... नकचढ़ी...

वीर - इस प्यार के मामले में... हमारी पसंद इतने अलग कैसे...

विश्व - पता नहीं... पर... हम इसे ऐसे समझ सकते हैं... मर्द या औरत चाहे कितना भी काबिल क्यूँ ना हो... कुछ कमियाँ.. कुछ खामियाँ तो होती ही हैं... उन कमी और खामियों को पुरा... हमारे हम सफर का प्यार और साथ करते हैं... एक अकेला हमेशा अधुरा ही रहता है... दोनों का मिलन उन्हें मुकम्मल कर देता है...

वीर - वाह... क्या बात कही... सीधे दिल में उतर गई... यानी अनु जितनी मासूम है... मैं उतना ही कन्नींग हूँ...

विश्व - यार मैं इस पर क्या कह सकता हूँ...

वीर - फिर भी एक सवाल तो मन में उठ रही है...

विश्व - कैसा सवाल...

वीर - (पिछले दिन अनु और उसके बीच हुए सारी बातें बताता है) अनु जैसी लड़की... किसीकी मौत की कामना कैसे कर सकती है...

विश्व - (थोड़ी देर के लिए चुप हो जाता है, फिर) अनु ने कोई मौत की कामना नहीं करी है.... वह तुममे पुराने वीर को बाहर निकाला है... जो ना ही भटकता था... ना ही टूटता था... अनु ने इसलिए कहा... के टुटे हुए... बिखरे हुए वीर को समेट ने के लिए... उसके पास... अपने वही वीर को पाने के लिए... जिस वह फिदा हुई थी... यही एक रास्ता था... वीर... उसके पास... अनु ने तुम्हें एक लक्ष दिया है... एक टार्गेट दिया है... जिसे तुम्हें साधना है... हिट करना है...

वीर - (जबड़े भींच जाती है) ठीक कह रहे हो प्रताप... तुम ठीक कह रहे हो... कोई चांद मांगता है... कोई सितारे मांगते हैं.. आखिर अनु ने वह माँगा है... जो वीर दे सकता है... और वीर उसे जरूर देगा....

इस पर विश्व कुछ नहीं कहता l दोनों के दरमियान फिर से चुप्पी छा जाती है l बात को बदलने के लिए

वीर - वैसे तुम... कल शाम को निकल रहे हो... मैंने सुना... तुम अपनी दीदी से कह रहे थे...

विश्व - हाँ...

वीर - आज क्या क्या काम रह गया है तुम्हारा....

विश्व - आज... (एक पॉज लेकर) मुझे दो जन से मिलना है... एक से वादा करना है... और दुसरे से हिसाब करना है...

वीर - कमाल है... क्या बात है... इश्क के मामले में... हमारी पसंद भले ही अलग है... पर कुछ मामलों में हमारी सोच काफी मिलती है... मुझे भी आज दो जन से मिलना है... एक से वादा करना है... और दुसरे से हिसाब करना है....

विश्व - ओ... वाकई...

वीर - हाँ.. वैसे आज तुम्हारा काम पुरा हो जाएगा... तो तुम आज भी जा सकते थे...

विश्व - हाँ... जा तो सकता था... पर... मैंने डिसाइड किया है... जाने से पहले अपना पुरा दिन... अपनी नकचढ़ी के नाम कर देने के लिए...

वीर - हा हा हा... यार यह कमाल की रही... एक्जाक्टली मैं भी यही करने वाला हूँ... अनु और मैं... पुरा दिन कहीं आउटींग कर टाइम बिताएंगे....

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xxxxx कॉलेज

कैंटीन में बनानी, भाश्वती इतिश्री और दीप्ति बैठे हुए हैं l सब के चेहरे पर एक मायूसी सी दिख रही है l क्यूंकि पहले उनके छटी गैंग से तब्बसुम दुर हुई और उसके बाद अब रुप भी कुछ दिनों से आ नहीं रही है l सेमीस्टर एक्जाम के लिए कुछ ही दिन शेष है l उसके बाद होली और गर्मी की छुट्टियाँ चालू हो जाएगी l चारों आपस में ऐसे ही दुख भरी बातेँ कर रहे हैं l तभी अचानक दीप्ति की आँखे कैंटीन की एंट्रेंस पर ठहर जाती है l रुप और तब्बसुम दोनों अंदर आ रहे थे l उन्हें देखते ही अपनी जगह से खुशी के मारे उछल पड़ती है l

दीप्ति - वाव... क्या बात है... लो पुरी हो गई हमारी छटी गैंग... ईयेयेये...

बाकी तीनों की नजर उनके तरफ घुम जाती है l रुप और तब्बसुम उसी टेबल के तरफ आकर अपनी जगह पर बैठ जाते हैं l सब एक साथ सवालों की झड़ी लगा देते हैं कि रुप और तब्बसुम अपने अपने कान ढक लेते हैं l

भाश्वती - ऐ कान से ढक्कन हटाओ... वर्ना हम इतना चिल्लाएंगे की तुम दोनों के कान फट जाएंगे... (रुप से) यह बता... कल मेरी गाड़ी इसे (तब्बसुम) लाने के लिए ले गई थी....

रुप - हाँ यार... मेरी गाड़ी है कहाँ... वह तो भाभी की है... हमारी गैंग की सदस्य... हमारे किसी दोस्त की गाड़ी से आनी चाहिए कि नहीं...

सब - आह हा हा... वेरी फनी... (तब्बसुम से चिल्लाते हुए) अब तु अपने कान से हाथ हटा कर... तेरी कहानी बताएगी...

तब्ब्सुम - (अपने कान से हाथ निकालते हुए) ओके ओके... (अब रुप भी अपनी कान से हाथ निकालती है) मैं बताती हूँ... (सब तब्ब्सुम की ओर देखते हैं) हमारे परिवार पर एक मुसीबत आई... अबु ने घर पर इस बारे में कोई जिक्र नहीं किया... पहले घर मेरा कॉलेज आना बंद करवा दिया... और दो दिन बाद... अचानक घर आकर हमें हमारा सामान बांधने को कहा... हमने भी वही किया... फिर हम पुरे परिवार समेत अपना घर छोड़ कर ख़ुर्दा चले गए... एक दो बार मैंने कोशिश की... अपने दोस्तों को बताने की... पर अबु ने इजाजत नहीं दी... फिर फोन ही रख लिया... इतना तो साफ है कि... हम शायद किसी से छुप रहे थे... पर मुझे अभी तक पता नहीं... हमें जान का खतरा था... या किसी और चीज़ का... पर हम छुपे हुए थे... असल में हमने खुद को कैद कर लिया था... और खुद को छुपा रखा था दुनिया से.... ऐसे में कल शाम दरवाजे पर दस्तक हुई... मैजिक आई से कुछ नहीं दिखा... दरवाजा खोलने से भी डर लग रहा था... पर सच कहती हूँ... मेरे अंदर की गट फिलिंग कह रही थी... हो ना हो... मेरे दोस्तों में से कोई... मुझे ढूंढते हुए आया हो... अबु मना करते रहे... पर मैंने हिम्मत करके दरवाजा खोल दिया... सामने...

सब - (मुहँ खोले तब्बसुम की बात सुन रहे थे) हाँ हाँ... सामने...


तब्बसुम - सामने... (शरारती मुस्कान लेकर रुप की ओर देखते हुए) जीजाजी खड़े थे...

सब - (हैरानी से) हैं... जीजाजी.... (रुप तब्बसुम से अनुरोध करते हुए इशारा करती है, पर सबकी नजरों में आ जाती है) ओ... मतलब जिज्जी भी गई थी साथ में...

बनानी - (रुप से) ऐ तु चुप रह...

(तब्बसुम से) चल अब बता भी दे... कौन है हमारे जीजाजी...

तब्बसुम - सॉरी दोस्तों... मैंने वादा किया है...

सब - किससे...

तब्बसुम - जिज्जी से...

सब - (तब्बसुम की गर्दन पकड़ लेते हैं) चल चल बोल...

तब्बसुम - देखो... मैंने उनका नाम ना बताने के लिए वादा किया है....

दीप्ति - ओ... तो यह बात है... इश्क और मुश्क छुपाया जा रहा है... वह भी छटी गैंग से... सालियों से... जीजाजी की खबर छुपाया जा रहा है... ताकि व्याह के मंडप में... जुते ना चोरी हो जाए....

तब्बसुम - देखो... वह हम सबके जीजाजी हैं... पर भाश्वती के भाई हैं.. मतलब हमारी जिज्जी... भाश्वती की भाभी लगती हैं...

सब - क्या...

रुप झपट कर तब्बसुम को पकड़ कर उसके सिर पर टफली मारती है l

भाश्वती - (रुप से) क्यूँ ड्रामा कर रही है... हमें तो पहले से ही अंदेशा था... तुझे किसी लड़के के साथ इतना बेखौफ घुलते मिलते देखा नहीं था... प्रताप भैया से तुम जिस तरह से मिलती थी... हम सब उस बारे में... हमेशा गॉसिप किया करते थे... अब मान भी ले...

रुप का चेहरा शर्म से लाल हो जाता है लु मुस्कराते हुए अपनी आँखे जोर से बंद कर चेहरा झुका लेती है l सब सहेलियाँ ताली मारने लगते हैं l रुप अपना चेहरा अपनी हाथों से छुपा लेती है l

सब - (तब्बसुम से) छोड़ो यह भरत मिलाप... अब बोलो... तुम्हें इतना डर क्यूँ था... जबकि हमारी दोस्त नंदिनी है... और... आज तुम कैसे यहाँ आ पाई...

तब्बसुम - पता नहीं... घर पर हम सब जनानीयाँ नंदिनी के साथ बातचीत करने में लग गए... पर प्रताप जी और मेरे अबु... अलग से... हमसे दुर लगभग घंटे भर तक बातचीत की... उसके बात अबु... तैयार हुए... वापस अपनी जॉब पर जाने के लिए... और मैं आज अपनी कॉलेज पर आ गई.... (रुप की हाथ पकड़ कर) मैं जानती हूँ... दोस्तों को... थैंक्स या सॉरी कहा नहीं जाता... पर फिर भी... थैंक्स... तुमने मुझे ढूंढ़ा... और हमें फिर से जिन्दगी में वापस ले आई...

रुप - यह क्या कह रही है... तुम सब मेरे लिए बहुत खास हो... सच कहूँ तो... सबसे पहले तुम... उसके बाद मेरा परिवार...

दीप्ति - वाकई यार... हम लोग इतने सीरियस नहीं हुए... जितना तुम हुई...

बनानी - हाँ यार... (तब्बसुम से) वैसे हैरानी की बात है कि तुझे मालुम नहीं है... क्यूँ तुम लोग छुपे हुए थे...

रुप - हाँ... यह बात तो है... अंकल जी से मैंने पुछा भी... पर अंकल बात टाल गए...

भाश्वती - पर तब्बसुम की बातों से लगता है... अंकल ने शायद प्रताप भैय्या से कहा होगा... भैया ने तुझे कुछ नहीं बताया...

रुप - बताया ना...

इतिश्री - देखो तो... तब से ड्रामा कर रही है...

रुप - ओ हो... पुरी बात सुनो पहले... मैंने जब प्रताप से पुछा... तो उन्होंने कहा कि... भाश्वती और सेक्शन शंकर का मैटर जैसा ही है... अंकल जी का... इसलिए प्रताप ने.. उन्हें दिलासा दिया तो अंकल खुद को बाहर लेकर आ गए....

दीप्ति - बस इतनी सी बात... वह कौन है... क्या है... अंकल अब तक किससे छुप रहे थे... कुछ भी नहीं बटाया...

रुप - नहीं... मुझे बस इतना कहा... आधा प्रॉब्लम सॉल्व हो गया है... बाकी आधा हो जाएगा... जब हो जाएगा... सबको मालूम हो जाएगा...

बनानी - (छेड़ते हुए) यानी बात तुझसे भी छुपा रहे हैं....

रुप - देखो... तुम जैसा समझना चाहो समझ सकते हो... मैं... तब्बसुम को ढूंढना चाहती थी... प्रताप ने मेरे लिए ढूंढ लिया... वज़ह जानना चाहा.. तो प्रताप ने प्रोफेशनल रिलेटेड बताया...

सब - व्हाट तब्बसुम की पापा जी का प्रॉब्लम... प्रताप के प्रोफेशनल रिलेटेड है...

रुप - हाँ... उसमें चौंकने वाली बात क्या है... प्रताप भी... मांजी की तरह... वकील हैं... लीगल एडवाइस और कंसल्टेंसी करते हैं... तो लगा अंकल को कोई लीगल प्रॉब्लम रहा होगा... किसी गुंडे टाइप आदमी से.... और उसे प्रताप लीगली हैंडल करेंगे... वैसे भी... हमें क्या करना है... जब अंकल जी के मन में अब डर ही नहीं रहा... हमारा छटी गैंग अब मुकम्मल हो गया है... यही बहुत है... अब फिर सेमीस्टर एक्जाम ख़तम होते ही... वेकेशन तक दुर रहेंगे...

बनानी - मतलब तु इसबार... होली... हमारे साथ नहीं खेलेगी...

रुप - (मुहँ बना कर) नहीं यार... इस बार की होली... मेरी भुवनेश्वर नहीं मनेगी... गाँव में मनेगी...

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xxxx हस्पताल के स्पेशल केबिन में एक बेड पर मृत्युंजय अधलेटा हुआ था l एक नर्स उसे खिला रही थी l तभी केबिन का दरवाजा खुलता है l नर्स और मृत्युंजय दोनों दरवाजे की तरफ देखते हैं l वीर हाथ में एक फाइल लिए अंदर आता है l वीर नर्स को इशारा करता है तो नर्स बाहर जाने लगती है l

मृत्युंजय - (नर्स से) आप रुकिए...

वीर - मुझे तुमसे बात करनी है... (नर्स से) इनके साथ कोई रिश्ता हो... तो रुकिए...

नर्स एस्क्यूज लेकर बाहर चली जाती है l उसके जाने के बाद वीर मृत्युंजय की ओर देखता है तो मृत्युंजय अपना चेहरा घुमा लेता है l वीर उसके सामने बैठ जाता है l

वीर - मैं जानता हूँ... तुम मुझसे नाराज हो... होना भी चाहिए... क्यूँकी... पर मैं तुमसे सुनना चाहता हूँ... क्यूँ....

मृत्युंजय - (चुप रहता है)

वीर - मट्टू... तुम अभी मेरे साथ जिस तरह से पेश आ रहे हो... इसमें नाराजगी कम... नफरत ज्यादा दिख रहा है...

मृत्युंजय - (थोड़ी देर की चुप्पी के बाद) मैंने आपसे वादा नहीं माँगा था... आपने ही मुझसे वादा किया था... पुष्पा और विनय को ढूँढ निकालेंगे... उनकी शादी करा देंगे... जो दुख दर्द से भरा बदनामी हो रही थी... उस दाग को मिटा देंगे.... मैंने तो आपसे कहा भी नहीं था... मैं अपने दम पर... अपनी बहन को ढूँढ रहा था... पर...

वीर - ह्म्म्म्म... (पीड़ा भरी आवाज में) सच कहा तुमने... तुम पर जब जब कोई मुसीबत आई... तुमने अपने हिसाब से काम लिया... कभी भी मुझसे मदत नहीं माँगा...

मृत्युंजय - इसे विडंबना कहूँ या किस्मत... आप जब भी मेरे जीवन में आए... माफ कीजिएगा... मेरा परिवार और किस्मत तितर-बितर हो गया...

वीर - (उठ जाता है और मृत्युंजय की तरफ पीठ करके खड़ा हो जाता है) ठीक कहा तुमने... मैं भी हम दोनों के बारे में हो सोच रहा था... पता नहीं... मैं तुम्हारे किस्मत में आया... या तुम मेरी किस्मत में... पर सच्चाई यही है कि... तुम जब जब मेरे सामने आए... या मुझसे टकराए... मेरे जीवन में... कुछ अलग या यूँ कहूँ... बहुत अच्छा हुआ है... पर शायद मैं यह दावा... तुम्हारे लिए नहीं कर सकता... मेरी जिंदगी में जो हसीन बदलाव आए... शायद तुमसे मिलने के बाद ही आए... जो मेरे वज़ूद को पुरी तरह से बदल कर रख दिया...

मृत्युंजय - और शायद मेरी किस्मत को... अगर आप मेरी जिंदगी में ना आते... मैं अपनी बहन को ढूंढ कर वापस ला चुका होता... जिसे दुल्हन की तरह विदा करना चाहता था... अपने टूटे पैर के वज़ह से... उसकी अर्थी को कंधा दे ना पाया... इससे संतोष कर लिया... उसके चिता में आग दे पाया... (जबड़े सख्त हो जाते हैं) कितनी बेरहमी से मारा गया है... बेचारी ने क्या बिगाड़ा था किसीका... सीधे माथे पर... बीचों-बीच गोली मारकर हत्या कर दी गई...

वीर - हो सकता है... महानायक परिवार से दुश्मनी के चलते...

मृत्युंजय - मुझे बस इतना मालुम था... महानायक परिवार से दुश्मनी... आपकी थी...

वीर - (स्तब्ध हो जाता है) और इस लिए तुमने नतीजे पर पहुँच गए... की हत्या में मैं शामिल था...

मृत्युंजय - (चुप रहता है)

वीर - मेरे साथ... अनु और दादी भी थीं...

मृत्युंजय - इसलिए तो... मैं निश्चिंत नहीं हो पा रहा हूँ... मुझे... मुझे आप की जुबान... आपकी रुतबा पर भरोसा था... पर...

वीर - (मृत्युंजय की ओर मुड़ कर देखता है) ठीक कहा तुमने... मुझे भी अपनी जुबान और खानदानी रुतबा पर... भरोसा नहीं घमंड था... मैं अपने इस पहचान के दम पर... आत्म अभिमान से चूर था... पर... सब कुछ चकनाचूर हो गया... वह हादसा मेरी वज़ूद की धज्जिया उड़ा कर रख दिया...

मृत्युंजय - बस एक बात के लिए धन्यवाद है आपका... मेरी बहन की चिता में आग देने के लिए मेरी मदत करी...

वीर - (चुप रहता है)

मृत्युंजय - पर राजकुमार जी... मुझे माफ कर दीजियेगा... मैं... मैं अब और ESS में अपनी सेवा नहीं दे पाऊँगा...

वीर - (चुप रहता है और मृत्युंजय की बात पर सहमति से अपना सिर हिलाता है)

मृत्युंजय - क्या आप अपनी इसी ग्लानि को हल्का करने आए थे....

वीर - हाँ... पर और भी बहुत कुछ है... जो मैं यहाँ तुमसे कहने आया हूँ...

मृत्युंजय - (वीर को सवालिया नजर से देखता है)

वीर - देखो... मैं जानता था... तुम ऐसा ही कुछ करोगे... इसलिये... मैंने जाजपुर स्पंज फैक्ट्री में... एक अच्छी नौकरी की बंदोबस्त कर दिया है... (कह कर एक लिफ़ाफ़ा मृत्युंजय के बेड के पास वाले टेबल पर रख देता है) तुम जब चाहो जॉइन कर सकते हो... ESS से भी अच्छी पोस्ट है और सैलरी भी...

मृत्युंजय - (कुछ नहीं कहता चुप रहता है और अपना मुहँ फ़ेर लेता है)

वीर - ESS के एडमिस्ट्रेशन ने हॉस्पिटल मैनेजमेंट से बात कर ली है.... तुम्हारे ट्रीटमेंट के सारे खर्च ESS बियर करेगी...

मृत्युंजय - (इसबार भी कोई जवाब नहीं देता)

वीर - देखो मट्टू... तुम चाहे मानों या ना मानों... पुष्पा की मौत मेरे उपर कर्ज है... एक बात बताओ... अगर उसके कातिल को मैं तुम्हारे सामने लाकर खड़ा कर दूँ... तो तुम क्या करोगे...

मृत्युंजय - (जबड़े और लहजा सख्त हो जाते हैं) मैं.. उसे अपने हाथों से... मौत की घाट उतार दूँगा....

वीर - जानते हो जीवन में पहली बार अनु ने मुझसे यही माँगा है... और यकीन मानों... मैं उसे दूँगा भी...

मृत्युंजय - (हैरानी से अपनी भवें सिकुड़ कर वीर की ओर देखता है)

वीर - अब मेरा एक लक्ष है... पुष्पा के कातिल को ढूंढना... (लहजा सख्त हो जाता है) जैसे ही वह मेरे सामने आयेगा... ना कानून ना अदालत... (अपने दोनों हाथों को देखते हुए, आँखों में खुन उतर आता है ) अपनी ईन दोनों हाथों से... ऐसी मौत दूँगा... के किसीने सोचा भी ना होगा...

मृत्युंजय - यह आप क्या कह रहे हैं... अनु ने ऐसा कहा है आपसे...

वीर - हाँ... मेरी अनु ने ऐसा कहा है... ख्वाहिश किया है... एक पल के लिए... मैं भी हैरान हो गया था... पर मुझे किसीने समझाया... के अनु ने ऐसा क्यूँ कहा... (मृत्युंजय की ओर देख कर) तुम अपनी नौकरी में लग जाओ... मैं आज तुमसे एक वादा करने आया हूँ... आज के बाद तुमसे मिलना नहीं होगा... पर जिस दिन मेरा और तुम्हारा दोबारा आमना सामना होगा... उस दिन मेरे पास पुष्पा के कातिल की जानकारी जरूर होगी... पुष्पा के क़ातिल को मैं ढूँढ के निकालूँगा... और उसे जैसी ख्वाहिश तुमने की है... बिल्कुल वैसी ही मौत उसे दूँगा... मट्टू... यह तुमसे वीर सिंह क्षेत्रपाल का वादा है...

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ओह ओ विश्व... आओ... बैठो... बोलो कैसे आना हुआ... (जोडार ने विश्व से कहा)

विश्व - (बैठते हुए) मैं कल जा रहा हूँ... फिर शायद... हफ्ते दस दिन बाद आऊँ... इसलिए एक औपचारिक मुलाकात के लिए आया था...

जोडार - ओह... रब्बीश... यह ऑफिस तुम्हारा भी है... बोलो सब ठीक हो गया...

विश्व - हाँ उसके लिए... आपका बहुत बहुत शुक्रिया... अपनी मशीनरी से तब्बसुम को ढूंढने के लिए...

जोडार - आह... यह तो बहुत ही छोटी बात है... तुम मेरे लीगल एडवाइजर हो यार... इतना तो कर ही सकते हैं हम तुम्हारे लिए...

विश्व - फिर भी... सीसीटीवी कैमरा के फुटेज कहाँ पर एक्सेस हो रही है... उसकी लोकेशन ढूंढना...

जोडार - ओह... कम ऑन... तुम इन सबके बारे में जानते हो... जो ऑनलाइन हो जाता है... वह एक्सेसेबल और हैकेबल होता है... हमने बस वही किया...

विश्व - और एक बार थैंक्यू... मेरे घर के बाहर... सीसीटीवी और सिक्युरिटी अरेंजमेंट करवाने के लिए...

जोडार - अरे भाई... तुम तो थैंक्यू पर थैंक्यू दिए जा रहे हो... बड़ा एंबारसमेंट फिल हो रहा है... कोई शिकायत हो तो करो...

विश्व - ठीक है वह भी कर लेते हैं... जोडार साहब... क्या हमारी पहली मुलाकात में कोई कसर रह गया था...

जोडार - (थोड़ा सीरियस हो जाता है) मतलब...

विश्व - मुझे जब आपने लीगल एडवायजर की जॉब ऑफर की... तो मैंने स्वीकार भी किया...

जोडार - हाँ... तुमने अपना टैलेंट भी दिखाया था...

विश्व - फिर भी लगता है... मैं आपको इम्प्रेस करने में ना कामयाब रहा...

जोडार - ऐसा क्यूँ कह रहे हो...

विश्व - जानते हैं... कहावत है... डॉक्टर और वकील से कुछ भी नहीं छुपाया जाता...

जोडार - (चेहरा और सीरियस हो जाता है) तुम्हें ऐसा क्यूँ लगता है... की मैंने तुमसे कुछ छुपाया है...

विश्व - अगर छुपाया नहीं था... तो क्या... अभी भी मेरा इम्तिहान ले रहे हैं...

जोडार - देखो विश्व... बात को घुमाओ मत... क्या शिकायत है वह कहो...

विश्व - आप उस दिन अपना प्रोजेक्ट दिखाते दिखाते... कुछ कहना चाहते थे... पर चुप हो गए... मुझे भी एक फोन आया... मेरे दोस्त का.. पर इतना तो मैं समझ गया... हो ना हो... प्लॉट और प्रोजेक्ट को लेकर कोई समस्या है....

जोडार - ओ... ह्म्म्म्म... लगता है... तुम्हारे हाथ कुछ तगड़ी इन्फॉर्मेशन लगा है...

विश्व - हाँ...

जोडार चुप हो जाता है, विश्व बड़ी शांत दृष्टि से जोडार को देखे जा रहा था l जोडार अपनी सीट से उठ खड़ा होता है और खिड़की के पास जाकर खड़ा होता है l एक गहरी साँस छोड़ कर

जोडार - इस प्रोजेक्ट की अप्रूवल लेते वक़्त... छोटी मोटी परेशानियाँ आईं... पर यह सब पार्ट ऑफ बिजनेस... पर एक महीने के अंदर... कुछ हलचल दिखाई दी... मैंने अपने सोर्स से इनपुट लिया... तो एक नाम सामने आया... निर्मल सामल... पता किया... तो वह पहले कंस्ट्रक्शन लाइन में नहीं था... दुसरी बात... जिस प्लॉट पर वह अपनी किस्मत आजमा रहा है... वह कंट्रोवर्सीयल है.... उस पर कुछ लिटिगेशन है... रजिस्ट्रेशन करवाना मुश्किल है... पर बाद में खबर मिली के... इस मामले में... मेयर के ऑफिस की इंवॉल्वमेंट है... मैं सबसे पहले कंफर्म होना चाहता था... इसलिये बात को टाल गया था उस दिन...

विश्व - ह्म्म्म्म... पर बात आपको मुझसे कर लेनी चाहिए थी... क्यूँकी मेयर ऑफिस की इनवॉल्वमेंट यूँही नहीं हुआ है...

जोडार - (विश्व की तरफ हैरानी भरे नजर से देखते हुए) इसका मतलब तुम कहना चाहते हो...

विश्व - हाँ जोडार साहब... हाँ... कभी कभी हम अपनी नजर के दायरे में ही दुनिया को देखते हैं... जब कि नजरों से परे और नजरों के पीछे भी दुनिया बसती है... पलती है... जहां बहुत कुछ होता रहता है...

जोडार - (अपनी भवें सिकुड़ कर विश्व की ओर देखता है, विश्व अपनी सीट छोड़ खड़ा होता है)

विश्व - आप पर जो बेमौसमी मुसीबत आई है... उसकी वज़ह मैं हूँ...

जोडार - व्हाट....

विश्व - हाँ जोडार साहब हाँ... अब मुझे एक आदमी की व्यक्तित्व का सही पहचान हुआ है... एक वह जो सामने दिखता है... एक बेखौफ.. बेरहम... बेअदब... भैरव सिंह... पर असल में.. एक डरपोक... और सैडीस्ट... (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) वह बाजी जब भी खेलता है... पत्ते जितने हाथ में रखता है... उतने ही.. अपनी आस्तीन में रखता है... वह सिर्फ बाजी जितने के लिए खेलता है....

जोडार - राजा साहब....

विश्व - हाँ...

जोडार - क्या... इसी एक महीने में... उन्हें कैसे... आई मिन...

विश्व - बहुत सोचने के बाद... कुछ हादसों से खुद को जोड़ कर देखने के बाद मुझे यह मालुम हुआ है.... के वह मेरी.. काबिलियत को परखना चाहता है... मापना चाहता है....

जोडार - तुम फिर से बात घुमा रहे हो...

विश्व - गाँव में... भैरव सिंह को मालूम पड़ता है... के मैं जैल से छूट चुका हूँ... और मेरी खोज खबर लेने के लिए... उसके दो कुत्ते कटक और भुवनेश्वर छानने लगे... तब भैरव सिंह का लॉ मिनिस्टर के बेटी की शादी रिसेप्शन पार्टी के दौरान... मेरे बारे में कुछ कुछ मालुम हुआ... उसे यह भी मालुम हुआ... के मैंने लॉ किया हुआ है... तब उसके कान खड़े हो गए... सिर्फ उन दोनों के दिए इंफॉर्मेशन पर उसे भरोसा नहीं हुआ.... तब उसने अपने कनेक्शन से.. अपने तरीके से इंफॉर्मेशन निकाला... डैड जैल सुपरिटेंडेंट थे... माँ का आना... मुझसे मिलना... कभी भी जैल में ऑफिसीयल नहीं था... बस आपका मुझसे मिलना... जैल रिकार्ड में रिकार्डुड था...

जोडार - ओ... मतलब राजा साहब... बहुत शातिर भी है और सतर्क भी....

विश्व - हाँ... उस दौरान आपका थायसन टावर का लिटिगेशन सॉल्व हुआ था...

जोडार - पर केस तो... मिसेज सेनापति जी के नाम पर थी...

विश्व - उसी पर आ रहा हूँ.... लॉ मिनिस्टर की रिसेप्शन पार्टी में... मेरा और भैरव सिंह का आमना सामना हुआ... प्रतिभा सेनापति जी के बेटे की तौर पर... उसे यह मालुम था... की सेनापति दंपति का बेटा इस दुनिया में नहीं है... उसने कड़ियां जोड़ने लगा... और बिल्कुल सही नतीजे पर पहुँच गया....

जोडार - ह्म्म्म्म... बहुत ही श्रुट आदमी है...

विश्व - है तो...

जोडार - क्या अब भी... उसकी नजर तुम पर है....

विश्व - नहीं... वह अब थायसन टावर का जो प्रॉब्लम सॉल्व हुआ है... या वह एक तुक्का है... यही जानना चाहता है... इसलिए आपके लिए प्रॉब्लम खड़ा कर... मुझे आजमा रहा है...

जोडार - पर एक लिटिगेशन वाली प्लॉट पर क्यूँ जुआ खेल रहा है...

विश्व - कौनसा उसका पैसा लग रहा है....

जोडार - एक मिनट एक मिनट... अंदर इतना बड़ा कांड हो रहा है... इतना सब कुछ तुम्हें कैसे मालुम हुआ..... और कब मालुम हुआ...

विश्व - जो लड़की गायब हुई थी... हम ने जिस लड़की को ढूँढ निकाला... उसीके वालिद से...

जोडार - व्हाट...

विश्व - हाँ... जोडार साहब... इत्तेफ़ाक हुआ भी बड़ी काम की... तब्बसुम नाज़ काजमी के पिता... आबिद ऊल रहमान काजमी... BDA (भुवनेश्वर डेवलपमेंट अथॉरिटी) में लैंड सर्वे डिपार्टमेंट में हेड हैं...

जोडार - ओ... अब कुछ कुछ समझा... पर वह छुपा क्यूँ था...

विश्व - फॉलस रिपोर्ट दे नहीं सकते थे... ऊपर से राजा भैरव सिंह की डायरेक्ट इनवॉल्वमेंट थी... इसलिए डर के मारे कुछ दिन की छुट्टी ले कर खुद को गायब करवा दिया था...

जोडार - और अब...

विश्व - अब.. (हँस कर) मैंने उन्हें एक ड्राफ़्ट बना कर दिया है... उसे अपनी सर्वे रिपोर्ट में एटेच कर पेश करने को कहा है...

जोडार - इसका मतलब...

विश्व - उन पर कोई आंच नहीं आएगा... और निर्मल सामल को प्लॉट मिल जाएगा...

जोडार - क्या... (ऐसे उछलता है जैसे कोई सांप काटा हो) तुम मेरा लीगल प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए हो या... भैरव सिंह के...

विश्व - आप ने मुझे बात पुरी बताया नहीं... इस लिए... एक टेंपोररी सजा तो बनता ही है...

जोडार - अरे यार जानते हो... उनके प्रोजेक्ट के पीछे मंशा क्या है...

विश्व - जानता हूँ... अभी तो कहा... एक टेंपोररी झटका है... आपके लिए...

जोडार - (विश्व को हैरान हो कर देख रहा था, विश्व बड़ी शांत दिख रहा था) टेंपोररी झटका भी बड़ी जोर की लगी है.... तो... तो अब... उस प्लॉट का परमानेंट सोल्यूशन क्या...

विश्व - घबराइये मत... उन्होंने अभी अपना दाव चलना है... मैंने ऑलरेडी अपनी चल दी है...

जोडार - अगर वह प्लॉट रजिस्ट्रेशन हो गया... और उनका प्रोजेक्ट अप्रूव हो गया... तो...

विश्व - मेरा वादा है जोडार साहब... जिस दिन उनकी प्रोजेक्ट नींव खोदी जाएगी... उसी दिन... उनका सारा खेल पलट जाएगा....

जोडार - (मुस्कराते हुए) लगता है... पूरा का पूरा चाल चल कर ही आए हो... उनका सारा खेल पलट जाएगा... ऐसा कुछ हींट तो दो...

विश्व - इस हफ्ते दस दिन में... एक मुशायरा होगा... नज्म ए शाम... जिस में... तब्बसुम नाज़ काजमी... अवार्ड जीतेंगी... तो आप श्योर हो जाना... खेल हो गया है...

जोडार - तो अब... तुम्हें थैंक्यू कहना मेरा बनता है...

जोडार हल्के से हँसते हुए अपनी कुर्सी पर जा बैठता है और विश्व को बैठने के लिए कहता है l विश्व बैठ जाता है l जोडार टेबल पर पड़े एक न्यूज पेपर को उठा कर विश्व को देते हुए l

जोडार - कल... xxxx जंक्शन पर यह जो कांड हुआ... तुमने ही करवाया है ना...

विश्व पेपर देखता है, हेड लाइन छपा हुआ था, "किन्नरों की टोली ने एक अनजान और बतमीज आदमी की जुलूस निकाली" हेड लाइन पढ़ते ही विश्व मुस्करा देता है, तभी जोडार टीवी पर नभ वाणी चैनल लगा देता है जहाँ पर सुप्रिया रथ किन्नरों की मुखिया कस्तुरी की इंटरव्यू ले रही थी

सुप्रिया - जी कस्तुरी जी... आपका इस विषय पर क्या राय है...

कस्तुरी - देखिए बहन जी... हम किन्नर हैं... तो इसमें हमारा क्या दोष... आखिर ईश्वर अपना ही रुप और स्वरुप देकर... हमें इस संसार में... आप ही की तरह भेजा है... ईश्वर ने हम पर विशेष अनुग्रह प्रदान किया है... के हमारी मौजूदगी से... खुशियों को किसीकी नजर नहीं लग सकती... इसी लिए... हर खुशी के अवसर पर हमें शामिल हो कर नाचने गाने के लिए बुलाया जाता है.... हम सबके बलाएँ हर लेते हैं और दुआओं से उस जीवन के क्षण को भर देते हैं... हमारे भगवान अर्द्धनारीश्वर हैं... उन्हीं की अराधना के लिए हम जितने भी किन्नर गण हैं.. सभी मिलकर उत्सव मनाने हेतु... सबका मनोरंजन करते हुए... चंदा इकट्ठा कर रहे थे... जब उस आदमी से हमारी एक साथी ने चंदा माँगा.. तो उस ने ना सिर्फ हमारी उस बहन को थप्पड़ मार दिया... ब्लकि कपड़े फाड़ कर जलील भी कर दिया... हम सबने उसे पकड़ कर अपने तरीके से... उसकी जुलूस निकाली और माफी मंगवा कर सजा दी....

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महानायक विला

केके का घर, एक बड़े से बैठक रुम में केके चहल रहा है, चेट्टी और रॉय दोनों बैठे हुए हैं l केके का चेहरा बहुत ही सख्त दिख रहा था l चहलते हुए अपनी मुट्ठी को हल्के हल्के हाथ पर मार रहा था l

चेट्टी - बैठ भी जाओ... कब तक ऐसे टहलते रहोगे...

केके - वह बदजात वीर... बाहर घुम रहा है... और तुम मुझे बैठने के लिए कह रहे हो...

रॉय - यह क्या केके साहब... नेताजी से तुम कह रहे हो...

केके - तु चुप भोषड़ी के... साले हरामी.... सिक्युरिटी ग्रुप चलाता है... पर तुझे मालुम नहीं पड़ा... मेरा बेटा... आर्कु में था...

चेट्टी - बस... केके.. जो दर्द तुम्हें अभी महसूस हो रहा है... उस दौर से अभी तक गुजर रहा हूँ... रही तुम्हारे बेटे की बात... तो सुनो... बेटा तुम्हारा छुपा हुआ था... ढूँढना आसान नहीं था...

केके - तो उस हराम खोर वीर को कैसे मालुम हुआ... जो वहाँ पहुँच गया था...

रॉय - इसलिए... के विनय जिस लड़की के साथ छुपा हुआ था... उसका भाई... ESS में सिक्युरिटी गार्ड है... हो सकता है... उसकी बहन ने उसे कॉन्टैक्ट किया हो... वर्ना... हमने रंगा को भेजा था... इतने दिन खाक छानने के बाद भी... उसे पता नहीं लगा था...

तभी बाहर से शोर शराबा सुनाई देता है l इनके बीच हो रही बात चित में बाधा पड़ती है l केके उस कमरे में खड़े एक आदमी से पूछता है l तो वह आदमी कमरे से बाहर चला जाता है l कुछ ही सेकेंड के बाद वह आदमी उड़ते हुए इन तीनों के बीच जो टी पोए था उस पर पीठ के बल गिरता है l तीनों दरवाजे की ओर देखते हैं l दरवाजे से वीर अपनी जेब में हाथ रखे अंदर आ रहा था l उसे सामने देखते ही केके का पारा बढ़ जाता है l वह गालियाँ बकते हुए अपने आदमियों को बुलाने लगता है l तब तक वीर इन तीनों के सामने खड़ा हो जाता है l तब तक घर में जितने भी गार्ड्स थे सभी वहाँ पर पहुँच जाते हैं l

केके - ख़तम कर दो इसे...

सभी गार्ड्स अपने अपने हाथ में रीवॉल्वर निकाल कर वीर पर तान देते हैं l वीर अपनी जेब से हाथ निकालता है l उसके दोनों हाथ में ग्रेनेड थे जिनके ट्रिगर पिन निकले हुए थे l उस कमरे में मौजूद सभी लोगों का मुहँ और आँख खुला रह जाता है l हैरानी और डर के मारे सब के पैर कांपने लगते हैं

वीर - (सभी गार्ड्स से) हम चारों को छोड़ कर सब के सब अभी के अभी बाहर निकल जाओ.... ( सारे गार्ड्स धीरे धीरे पीछे हटने लगते हैं, कमरे में अब सिर्फ चार लोग ही रह जाते हैं, वीर केके से) क्यूँ फट गई... (केके अपनी दांत पिसते हुए वीर को घूरने लगता है) जब तुझे... मैं प्लेट में मिलूँ... कच्चा चबा जाना... अब तुम सब से कुछ पूछने आया हूँ और कुछ बताने आया हूँ... बैठो सब...

वीर के इतने कहने के बाद तीनों बैठ जाते हैं l वीर भी हाथ में ग्रेनेड लिए हुए उन सबके सामने बैठ जाता है l डर और हैरानी चेट्टी और रॉय के चेहरे पर दिख रहा था पर केके अपने डर पर अब तक काबु पा चुका था l

वीर - (केके से) हाँ तो केके... पहले सवाल तुम्हारी तरफ से...

केके - तुम यहाँ क्यूँ आए हो...

वीर - बहुत ही बेकार सवाल... फिर भी जवाब तो देना बनता है... हिसाब करने... हिसाब लेने... मैं यह जानने आया हूँ... जिस बेटे के घर से चले जाने से... तुमने बिस्तर पकड़ लिए थे... जैसे ही मरने की खबर मिला... स्प्रिंग की तरह उछल कर... बेड से उठ कर... बिना देरी किए... पुलिस को मेरे खिलाफ शिकायत कर दी... कैसे... कैसे केके कैसे...

केके - (अपनी दांत पिसते हुए) मेरा बेटा जब मरा... तब तुम वायजाग में थे...

वीर - और तुम इस नतीजे पर पहुँच गए... के मैंने तुम्हारे बेटे का कत्ल कर दिया...

केके - हाँ...

वीर - कत्ल की वज़ह होनी चाहिए...

केके - (पहले चुप रहता है, फिर) वज़ह... तुमने उसका पीछा किया था... पुरी से... xxx होटल तक...

वीर - कत्ल कर देने तक... वज़ह पुछा है मैंने...

केके - वह तुम जानों...

वीर - क्यूँ चेट्टी... तुझे लगता है... मुझे अगर विनय मिल जाता... तो मैं उसका कत्ल कर देता...

ओंकार - (चुप रहता है)

वीर - हाँ... तुम सबको मारने की वज़ह तो है... पर जान से मारने तक कि नहीं... केके... चेट्टी तुम लोग बहुत दिनों तक... क्षेत्रपालों से जुड़े रहे... काम भी किया है... तुम लोगों को मालुम होना चाहिए कि क्षेत्रपाल जिसे जान से मारना चाहते हैं... उनके नाम ओ निसान दुनिया से मिटा देते हैं... उनकी हस्ती... उनकी वज़ूद तक... भारत के जन गणना के लिस्ट में भी नहीं मिलता... क्यूँ केके जानते हो ना... (केके चुप रहता है) तुम्हारे बनाए गए एन एच में नजाने कितने लाशें गड़ी हुई हैं... जानते हो ना... फिर भी... तुमने मुझ पर इल्जाम लगा दिया...

केके - मुझे बस इतना मालुम था... तुम विनय को ढूँढ रहे थे... तुम ही उसके पीछे लगे हुए थे...

वीर - हाँ... तुम्हारी बद किस्मत... एन एच के हर टोल नाके पर और वायजाग के रास्ते पर जो भी सीसीटीवी थे... उनमें मेरा चेहरा दिख गया था... इसलिए मैं बच गया...

चेट्टी - तो राजकुमार... तुम आए किसलिए हो...

वीर - यही बताने... के मुझे जिसे मारना होता है... मैं उसके घर में घुस कर मारता हूँ...

चेट्टी - तो हमें यहाँ मारने आए हो...

वीर - नहीं... वायजाग में जो हुआ... मैं थोड़ा कंफ्यूज हूँ... विनय किसकी दुश्मनी के चलते मारा गया... मेरी या तुम लोगों की...

चेट्टी - हमारी दुश्मनी तो तुमसे है...

वीर - यही तो मैं समझना चाहता हूँ... विनय के मरने से... मेरा कोई फायदा या नुकसान नहीं होता... तो उसके मरने से नुकसान किसको है... और फायदा किसे है...

केके - क्षेत्रपाल के दुश्मन का नुकसान हुआ है...

वीर - हाँ... पर... क्षेत्रपाल की दी जाने वाली मौत... बहुत ही खौफनाक होता है... और जिसने विनय और पुष्पा को मारा है... पॉइंट बैंक रेंज में... सिर पर मारा है... ऐसी मौत... क्षेत्रपाल नहीं देते.... (थोड़ी देर के लिए कमरे में चुप्पी छा जाती है, वीर अब चेट्टी से पूछता है) चेट्टी साहब... मैंने वायजाग में एक आदमी को देखा है... जहां तक मुझे खबर है... उसके सिर पर... आपका हाथ है...

चेट्टी - क्या बकते हो... किसके बारे में बात कर रहे हो...

वीर - रंगा... मैं उसी रंगा के बारे में कह रहा हूँ... जिसे आप ही लोगों ने.. मेरी भाभी पर छोड़ा था... क्यूँ रॉय... सही कह रहा हूँ ना... (केके और चेट्टी के साथ साथ रॉय को भी सांप सूँघ जाता है, किसी के मुहँ से कोई बोल नहीं फूटता है, वीर अपनी जगह से उठता है) केके... विनय को मैं कभी भी... मारना नहीं चाहता था.... पर हाँ... मैं उस तक पहुँचना चाहता था... क्यूंकि वह ऐसा कुछ जानता था... जिसे जानना मेरे लिए बहुत जरूरी था... अब वह बात रंगा जानता है या नहीं मैं नहीं जानता.... पर मैं उस तक पहुँचुंगा जरूर... जिन लोगों ने मुझे चक्कर में फंसाया है... उन सब को अब ढूंढ निकालूँगा और एक एक को... क्षेत्रपाल वाली सजा दूँगा...

यह कहते हुए वीर दरवाज़े तक आता है और दोनों ग्रेनेड इन तीनों के पास फेंक कर चल देता है लु यह तीनों अपनी अपनी कुर्सी को खिंच कर दीवार से सट जाते हैं l पर ग्रेनेड फटता नहीं है l तभी कुछ गार्ड्स अंदर आकर देखते हैं वह दो ग्रेनेड नकली थे l

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एक बेड पर रोणा नींद में छटपटा रहा था l शायद कोई बुरा सपना देख रहा था l उसका सारा शरीर पसीना पसीना हो गया था l छटपटाते छटपटाते अचानक रोणा बेड पर उठ बैठ जाता है l पास पड़े टावल से चेहरे पर पसीना पोंछता है l फिर पास के टेबल के पास जाकर जग से पानी पीता है l उसके बाद वह बाथरुम में जाता है l चेहरे पर थोड़ा पानी मारने लगता है l थोड़ी देर बाद अपना चेहरा टावल से पोछते हुए बाथरूम से बाहर निकालता है l तब उसे उसके बेड पर उसका मोबाइल की स्क्रीन में उजाला दिखता है l वह मोबाइल उठा कर देखता है व्हाट्साप पर एक अन्नोन नंबर से एक वीडियो शेयर हुआ है l वह वीडियो चलाता है

सुप्रिया - वह तो ठीक है... कस्तुरी जी... पर वह कौन था... जिसे आपने अपने तरीके से सजा भी दी... और जुलूस भी निकाला...

कस्तुरी - वह तो हम नहीं जानते बहन... पर था वह जो भी... ईश्वर की सृष्टि का अपमान था... इसलिये हमने वहाँ पर मौजूद सारे किन्नर मिलकर सजा दी... हमारे हिसाब से आपके पास कुछ नहीं तो... सीसीटीवी की फुटेज होना चाहिए...

सुप्रिया - अफसोस की बात है.. कस्तुरी जी... सख्त अफसोस की बात है... जो भी फुटेज हम मीडिया वालों को मिला है... उससे कुछ भी मालुम करना सम्भव नहीं हो पा रहा... क्या आपके किसी साथी ने कोई वीडियो शूट नहीं किया है...

कस्तुरी - नहीं बहन जी... हम तो एक विषय में व्यस्त थे... किसी तरह से उस शख्स से माफी मंगवाये और उसे सजा देकर बा इज़्ज़त छोड़ भी दिए... हाँ अगर उस शख्स को हमसे कोई शिकायत हो... तो हमारे विरुद्ध पुलिस में कंप्लेंट कर सकता है... अगर कानूनन हमसे कोई अपराध हुआ है... तो हम सजा भोगने के लिए तैयार हैं...

कस्तुरी - तो दर्शकों यह था सारा माजरा... कटक भुवनेश्वर के किन्नर समाज ने... किसी दोषी को पकड़ा और उसकी जुलूस निकाल कर सजा भी दी... यह वाक्या सड़कों पर मौजूद सभी ने देखा... पर किसीने उस शख्स को ना देखा ना पहचाना... तो रहीए ना बे खबर... फिर मिलेंगे ताजा खबर पर....

फिर स्क्रीन पर एक पाँच सेकेंड का टाइमर चलता है l पाँच, चार, तीन, दो, एक अब स्क्रीन पर कस्तुरी दिखती है l

कस्तुरी - कैसा है मेरा राजा... ले जो तेरे साथ हुआ... वह देख ले... ऊँम्म्म आँ... (चुम्मा फेंकती है)

अचानक वीडियो में दिखता है रोणा अपनी बुलेट पर बैठा सामने वाली कार पर नजर डाल रखा है l उसका बुलेट स्टार्ट में था, तभी कुछ किन्नर आते हैं और उसके बुलेट को घेर कर ताल मेल बना कर "बड़ी देर भी नंद लाला तेरी राह तके बृज वाला" गीत पर नाचने लगते हैं l कुछ सेकेंड बाद एक किन्नर रोणा के बुलेट की चाबी घुमा कर स्टार्ट बंद कर देती है l

आए हाय... देख क्या रहा है चिकने... हमारे भगवान की पूजा है... कितना खूब सूरत डांस किया हमने... तेरा मनोरंजन हुआ... चल पाँच सौ रुपया निकाल...

रोणा - ऐ चल हट...

कह कर चाबी घुमा कर सेल्फ स्टार्ट करता है, पर तभी वही किन्नर बुलेट की चाबी निकाल कर अपने ब्लाउज में रख लेती है l किन्नर की इस हरकत पर रोणा गुस्सा हो जाता है l

रोणा - ऐ... चाबी निकाल...

किन्नर - देख राजा... हम किन्नर हैं... बलाएँ ले लेती हैं... और दुआओं से बदनियत और बदनजर से बचाते हैं... तु पाँच सौ निकाल और हमारी दुआएँ लेता जा...

रोणा - (बुलेट की स्टैंड लगा कर) कमिनी कुत्तीआ... निकाल मेरी गाड़ी की चाबी...

दुसरी किन्नर - आए हाय... यह तो बदजुबान निकला... अब तो हम हजार लेंगे.. फिर चाबी देंगे...

अभी सिग्नल हरा हो जाता है और सभी गाडियाँ चलने लगती हैं l यह सब देख कर रोणा का पारा और ज्यादा चढ़ जाता है l वह उस किन्नर के ब्लाउज हाथ डाल देता है तो किन्नर उसका हाथ पकड़ लेती है तो रोणा उसके हाथ को पकड़ कर झटके से ब्लाउज फाड़ देता है पर उसे चाबी नहीं मिलता l लेकिन तब कुछ किन्नरों ने जोर जोर से एक ताल से ताली बजाने लगते हैं और कुछ किन्नर अपनी जुबान हल्के से निकाल कर मुहँ में उंगली डाल कर हुल हुल की आवाज निकाल कर चिल्लाने लगते हैं l यह देख कर रोणा अब डरने लगता है l धीरे धीरे किन्नरों का जमावड़ा बढ़ने लगता है l ताली के साथ साथ हुल हुल की आवाज बढ़ने लगता है l रोणा अब उन किन्नरों के घेरे में फंसा हुआ था, वह बाहर जाने की कोशिश करने लगा पर किन्नरों के गुस्से से तमतमाते चेहरे को देख उसकी हिम्मत अब जवाब देने लगा l तभी गुस्से से अपनी आँख नचाते हुए कस्तुरी पहुँचती है l अपना हाथ जब उठाती है तो सब एक साथ शांत हो जाते हैं l

कस्तुरी - हम जो भी हैं... जैसे भी हैं... इज़्ज़त तो रखते हैं... तुने ब्लाउज फाड़ने की हिम्मत कैसे किया...

रोणा - (गिड़गिड़ाते हुए) म्म्म्म्म.. म्म्म्म्म.. मुझे माफ़ कर दो... प्लीज जाने दो... मेरा बहुत जरूरी काम है...

कस्तुरी - गुनाह किया है तुने... सजा तो मिलेगी... (उस किन्नर से) क्या सजा देंगे इसे दुलारी...

दुलारी - जैसे को तैसा... इज़्ज़त के बदले इज़्ज़त.... मेरा चिर हरण हुआ है... इसका भी यही होगा... तमाशा मेरा बना है.. इसका जुलूस निकलेगा...

रोणा - (थोड़ा अकड़ दिखाते हुए) ऐ... बहुत हुआ... मैं.. मैं पुलिस वाला हूँ...

कस्तुरी - ओ तो पुलिस वाला है... तो बुला अपने साथियों को...

सभी किन्नर ताली बजाने लगते हैं और कुछ हुल हुल की आवाज निकालने लगते हैं l परिस्थिति को गंभीर होता देख रोणा हाथ जोड़ लेता है l कस्तुरी फिर से अपना हाथ उठाती है तो सारे किन्नर चुप हो जाते हैं l

रोणा - देखो... मुझसे बड़ी गलती हो गई... समाज में... मेरी बहुत इज़्ज़त है... अपमान हुआ तो... मैं किसी को मुहँ दिखाने के लायक नहीं रहूँगा... जितना भी चाहो तुम मुझसे पैसा लेलो... पर मुझे अभी यहाँ से जाने दो प्लीज...

कस्तुरी - अरी दुलारी... क्या कहती है तु...

दुलारी - कस्तुरी दीदी... हम बलाएँ लेती हैं... तो इसकी बेइज्जती क्यूँ करें...

रोणा - (खुश हो कर) शुक्रिया.. शुक्रिया...

दुलारी - चुप रह रे चिकने... बात तो पुरी हो जाने दे... (कस्तुरी से) दीदी इसका चिर हरण होगा... पर हमारे बीच... दुनिया वाले कोई ना देख पाएगा... जुलूस भी निकलेगा... सबको पता भी चलेगा... पर किसका जुलूस है... कोई नहीं जान पायेगा...

रोणा - (अकड़ दिखाते हुए ) ऐ... है... हेई.... यह.. यह क्या कह रही हो...

रोणा भागने की कोशिश करता है,पर वह हैरान हो जाता है, वह पाँच सौ के करीब किन्नरों से घिरा हुआ था l यह देख कर रोणा बुरी तरह से डर जाता है l अब रोनी सी सुरत बना कर हाथ जोड़ कर घुटनों पर बैठ जाता है l

दुलारी - देखा दीदी... भाग रहा था...

कस्तुरी - ऐ चिकने... अभी हम यहाँ पाँच सौ किन्नर हैं... जितना देर करेगा... हमारी गिनती बढ़ती जाएगी... इसलिए अब अपना चिर हरण तु खुद कर... और सम्भाल कर कपड़े अपने हाथ में ले... क्यूंकि अगर हम फाड़ने पर आ गए... तेरे बदन पर चमड़ी भी उतर जाएगी...

किन्नर अब एक ताल में ताली बजाने लगते हैं l रोणा की आँखे बहने लगती हैं पर इस वक़्त उस पर रहम खाने वाला या करने वाला कोई नहीं था l मजबूरन बड़ी मुश्किल से अपने कपड़े उतारता है l अब बदन पर सिर्फ लंगोट था l वह नहीं उतार पाता है l एक किन्नर वह कपड़े उसके हाथ से ले लेती है l और एक किन्नर उसीके बुलेट के चेन से ग्रीस निकाल कर अपनी सैंडल से रोणा के मुहँ पर मल देती है l

कस्तुरी - चल अब हमारे घेरे में... सुरक्षित आगे की जंक्शन तक चल.. वहीँ पर एक सुलभ शौचालय है.. उसके भीतर तक हम सबकी नजरों से बचा कर पहुँचा देंगे... तु अंदर जाकर अपने कपड़े पहन कर... गाड़ी लेकर फुट जाना... चल...

रोणा उनके घेरे में चलते हुए अगले जंक्शन तक काले मुहँ और अध नंगा जाता है l वादे के अनुसार उसे लेकर सुलभ शौचालय के अंदर सबके नजरों से छिपा कर पहुँचा देते हैं l वह अंदर अपना हुलिया दुरुस्त कर कपड़े पहन कर जब बाहर आता है l उसे कोई किन्नर नहीं दिखते हैं l

वीडियो ख़तम हो जाता है l रोणा गुस्से में मोबाइल दीवार की ओर फेंक देता है l मोबाइल टुकडों में टुट कर बिखर जाता है l वह फिर वार्डरोब के पास जाता है और होलस्टर में से रीवॉल्वर निकाल कर अपने मुहँ में डालता है, पर ट्रिगर दबा नहीं पाता l चिढ़ कर वह रीवॉल्वर भी बेड पर फेंक देता है l तभी उसके कान में एक आवाज सुनाई देती है l

चु चु चु चु चु... खुद को मारने के लिए भी गुर्दा चाहिए... तुझमें वह भी नहीं है... जो भी हुआ बहुत बुरा हुआ...

यह सुनते ही वह झट से कमरे के लाइट का स्विच ऑन करता है l कमरे के एक कोने पर पड़े सोफ़े पर विश्व बैठा हुआ था l

रोणा - तुम...

विश्व - हाँ मैं...

रोणा - मतलब... यह सब...

विश्व - ह्म्म्म्म... मैंने ही करवाया...

रोणा - साले हरामी कुत्ते... बड़वे...

चिल्लाते हुए विश्व पर झपट्टा मारते हुए आता है, विश्व भी उतनी ही तेजी से सोफ़े से उठ कर घुमाकर एक स्पिन किक मारता है l रोणा छिटक कर अपने बेड पर पड़ता है l विश्व के किक से संभलने की कोशिश करने लगता है l विश्व एक चेयर को खिंच कर बेड के पास बैठ जाता है l

विश्व - तु अब जवान नहीं रहा... हराम जादे... कोई अंग टुटेगा तो जुड़ने में वक़्त लगेगा...

रोणा - (कराहते हुए) तुमने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया...

विश्व - हा हा हा हा... बचकाना सवाल... तेरे साथ तो मैं बहुत कुछ कर सकता था.... सच कहूँ... जिस दिन तुने श्रीनु को मार दिया था... उसी दिन मैंने सोच लिया था... तुझे जान से मारने के लिए... पर... (चुप हो कर एक गहरी साँस लेता है) पर... किसी ने मुझसे वादा लिया... मैं अपने दुश्मनों को... कानूनन सजा दूँगा... इसलिए तुम हराम खोरों की टोली अब तक जिंदा है... वर्ना... अब तक तुम लोगों को... उपर पहुँचा चुका होता...

रोणा - गलत किया तुने मेरे साथ विश्वा... बहुत गलत किया... शेर चाहे कितना भी ताकतवर क्यूँ ना हो... जहरीले सांपों से दुर ही रहता है...

विश्व - बात तो तुने बहुत जंगली वाली कही... पर वह क्या है कि... सांपों के दाँतों को तोड़ना और फन को कुचलना मुझे अच्छी तरह से आती है... देख ना... मैंने तेरी कैसी गत बना दी है... तु सिर्फ फुंस फुंस कर सकता है... डंस नहीं सकता...

रोणा - मेरा अंदाजा बिल्कुल सही था... तु साला सजायाफ्ता... और वह लड़की...

विश्व - हाँ सजायाफ्ता हूँ... पर इस शहर में मैं जितना कुछ कर सकता हूँ... तु या तेरा नाजायज बाप भैरव सिंह कुछ नहीं कर सकते.... तुने मेरी दीदी से बदजुबानी की... तुझे हस्पताल का बेड दिखाया... मेरी माँ से बदजुबानी की... तुझे गरम पानी से नहलाया... फिर तु कुत्ते का दुम... मेरी हमराही... मेरी हमदर्द... मेरी हमसाया... मेरी हमराज़... मेरी जान पर बदनीयती की... इसके लिए तुझे जान से मारना बनता था... पर चूँकि तुझे श्रीनु के हत्या के लिए सजा देनी है... इसलिए बस तुझे बेइज्जत कर छोड़ रहा हूँ...

रोणा - याद रखूँगा... इसका ऐसा बदला लूँगा... उस लड़की को...

विश्व - ना... इसके आगे कुछ मत बोल... वर्ना... अपनी जुबान से हाथ धो बैठेगा... उसके बारे में... बस इतना जानकारी रख... वह मेरी दिल की धड़कन है... इतनी जानकारी तेरी जिंदगी की जीवन रेखा है.... इससे आगे जिस दिन जानेगा.... उस दिन तेरा दिल अपने आप धड़कना छोड़ देगी... अब एक सलाह दे रहा हूँ... कल सुबह उठ कर जितनी जल्दी हो सके... राजगड़ वापस चला जा.... और मरते दम तक... कटक या भुवनेश्वर आना भी मत... क्यूंकि जिस दिन तु मुझे मालुम होगा के तु यहाँ आया है... उसी दिन... तेरा चिर हरण वायरल हो जाएगा... मीडिया के भेड़िए... तुझ पर टुट पड़ेंगे...

रोणा - भुल गया है तु... मैं क्या था... हल्के में लिया है तुने मुझे... बहुत भारी कीमत चुकाएगा... तु और तेरे चाहने वाले...

विश्व - फिर बकौती पेलने लग गया... चल बोल क्या कर लेगा तु...

रोणा - (रोणा की आँखे और आँखों की पेशियां थर्राने लगते हैं)

विश्व - चल मैं तुझे खुल्ला चैलेंज देता हूँ... जो तु बोल रहा है... या सोच रहा है... करके दिखा... पर मैं बोल रहा हूँ... तुझसे ना हो पायेगा... जानता है क्यूँ... क्यूंकि जुबान पर और इरादों पर अडिग रहने के लिए मर्द होना जरूरी है... (एक पॉज लेकर रोणा के आँखों में आँखे डाल कर) क्या तु मर्द है... (अपना सिर ना में हिलाते हुए) ना... नहीं है...

रोणा - (गुर्राते हुए) विश्वा...

विश्व - सुन बे... भैरव सिंह के सपोले... तु औरत है नहीं... मर्द अब रहा नहीं... और किन्नरों ने तेरी ऐसी ली है... ना तो तेरी हिजड़ों में भर्ती होगी... ना ही... नामर्दों में तेरी गिनती होगी... वह जो सरकारी कागजों में होता है ना... जेंडर वाले तीन कॉलम... तु अपने लिए सर्कार से चौथा कॉलम की सिफारिश कर... हो सकता है... तुझसे वही उखड़ जाए....

इतना कह कर विश्व कुर्सी से उठता है और बाहर जाने लगता है l विश्व के जाते ही रोणा बेड से उतर कर अपनी सर्विस रीवॉल्वर निकाल कर विश्व पर तान देता है l पर उससे ट्रिगर दबती नहीं है l वह आँखे मूँद लेता है तभी उसके कानों में विश्व की आवाज सुनाई देती है

विश्व - यह भी तुझसे नहीं होगा.... (रोणा अपनी आँखे खोलता है)मुझे मारने के लिए जो जिगर चाहिए... वह तुझ में नहीं है... इसलिए फ़ालतू के कोशिश मत कर... मिलते हैं... राजगड़ में...
 
हाँ अब बच्चों की शैतानी सामने आयेंगी ही

हाँ भाई यह एक परिस्थिति है

अपराध बोध तो नहीं कह सकते पर फिर भी मित्रता में यह एक स्वाभाविक परिस्थिति होती है

हाँ यह घटना बहुत ही प्रमुख थी

क्यूंकि आने वाले एक घटना से जुड़ने वाला है

,😜🤣😂

हाँ वीर अपने पुराने अंदाज़ में लौटा तो है पर इम्तिहान आगे और भी है

रोणा के जीवन की यह बहुत ही अपमान जनक घटना है

इसका परिणाम भी उसी तरह होगा

बस SHADOW KING भाई जुड़े रहें हौसला इसी तरह बढ़ाते रहें
 
जी SANJU ( V. R. ) भाई थोड़ा लंबा अंतराल हो गया इसलिए थोड़ा लंबा अपडेट रखा

इस मंतव्य के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

फिर से शुक्रिया

सांप की अपनी विवशता होती है पर रोणा जैसे चरित्र बिच्छु जैसे होते हैं हमेशा चोट पहुँचाने के फ़िराक़ में होते हैं

यह अभी नहीं खुलेगा पर खुलेगा जरूर

यह प्रसंग आने दीजिए

षड़यंत्र कैसे कैसे हुए आप जान पाएंगे

धन्यवाद फिर से आभार तह दिल से
 
avsji भाई आज ही प्लास्टर खुला है

क्या बताऊँ कैसा लग रहा है

ऐसा लग रहा है जैसे हाथ इतना हलका हो गया है कि उड़ा दूँ पर ज्यादा देर तक सीधा नहीं कर पा रहा हूँ जब उँगलियों को मोड़ता हूँ थोड़ा खिंचाव और हल्का सा दर्द महसुस हो रहा है

फिर भी बड़ा अच्छा लग रहा है

नहीं डॉक्टर ने एक तेल का रिकामेंड किया है महामाश तेल, उस तेल से हल्की मालिश के साथ साथ स्ट्रेच एक्सरसाइज करने के लिए कहा है

हा हा हा

मेरा भी यही हाल है क्या करूँ मार्च खत्म होने को है लोड भी है

वैसे सारे दोस्त हैं यहाँ अपने इस लिए काम निकल पड़ा है

भाई आपके शुभ चिंतन का ही परिणाम है कि आज मेरा प्लास्टर खुला है

अब कोशिश यह रहेगी कि निरंतर अंतरालों में अपडेट लाता रहूँ और इस कहानी को अंजाम दूँ
 
दोस्तों एक काम खत्म हुआ कि नहीं दुसरा थमा दिया गया

भाई एक सरकारी संस्थान का एक अदना सा कर्मचारी हूँ

वादा करता तो हूँ पर निभाते निभाते दादा परदादा याद आने लग जाते हैं

वह एक गाना है जो मेरे ऊपर बिल्कुल फिट बैठती है

मेरे जागने से पहले

हाय रे मेरी किस्मत सो जाती है

मैं देर करता नहीं

देर हो जाती है

खैर आज रात दस बजे तक नया अपडेट आ जाएगा
 
👉एक सौ छब्बीसवां अपडेट

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सुबह हो रही थी, सूरज अपने नियमित समय पर पूर्व आकाश से निकल रहा था l धीरे धीरे अंधेरा छट रहा था l एक बस्ती के एक कोने में एक बड़ा सा घर है l जिसके एक कमरे में टोनी उर्फ लेनिन लुंगी में अपने बिस्तर पर दिन दुनिया से बेख़बर पेट के बल सोया हुआ था l तभी उसके कमरे का दरवाजे पर लगातार दस्तक होने लगती है l वह चिढ़ कर अपने बिस्तर से उठता है और गुस्से में तमतमाते हुए दरवाजा खोलता है l सामने उसका ही आदमी था l

टोनी - (उबासी लेकर अपनी आँख मलते हुए) क्या हुआ बे... सुबह सुबह कौन तेरी माँ चोद दिया... भोषड़ी के... जो मेरा नींद खराब करने आ गया...

आदमी - भाई... वह दारोगा रोणा आया है... तुमको पुछ रहा है...

उसके इतने बोलने भर से ही टोनी के आँख से नींद छु मन्तर हो जाता है l

टोनी - क्या... क.. कब... कब आया...

आदमी - अभी अभी... अपनी जीप से आया है... मैंने उसे नीचे बिठा दिया है...

टोनी - (अपना लुंगी सही करता है और शर्ट के बटन ठीक करते हुए) यह सला मरदुत.. यहाँ मरने आया है... या मेरी जान लेने... (अपने आदमी से) चल चलते हैं...

दोनों तेजी से सीढियों से उतर कर नीचे आते हैं l टोनी देखता है बड़े गम्भीर मुद्रा में रोणा बैठा हुआ है l टोनी उसके सामने खड़ा हो कर सलाम ठोकता है l

टोनी - अरे साब आप... यहाँ... मुझे खबर भिजवा देते... सेवा में हाजिर हो जाता...

रोणा - (अपने में खोया हुआ था, टोनी को कोई जवाब नहीं देता)

टोनी - साब... रोणा साब...

रोणा - (चौंक कर) हाँ..

टोनी - मैं कह रहा था... आप यहाँ... अचानक... सब ठीक तो है...

रोणा - (जबड़े सख्त हो जाते हैं, दांत पीसने लगता है कि कड़ कड़ की आवाज सुनाई देने लगती है) हूँ...

टोनी समझ जाता है कुछ तो हुआ है वह अपने आदमी को इशारा कर बाहर भेज देता है l उस आदमी के जाते ही टोनी एक कुर्सी खिंच कर रोणा के बगल में बैठ जाता है l

टोनी - साब... अब इस कमरे में.. सिर्फ हम दोनों ही हैं... आसपास कोई भी नहीं है... कोई हुकुम हो तो बोलिए... अभी बजा देता हूँ...

रोणा - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) हुकुम... अब तु क्या हुकुम बज़ाएगा... जब अपनी ही ऐसी बजी हुई है... के (चुप हो जाता है)

रोणा अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता है और कमरे में लगी एक बड़े से आईने के सामने खड़ा होता है l अपने चेहरे को घूरने लगता है l घूरते घूरते उसके चेहरे का भाव बदलने लगता है l आँखे बड़ी मगर गुस्से से लाल होने लगता है पास रखे मेज पर से फ्लावर वॉश उठा कर आईने पर फेंक मारता है l आईना टुकड़ों में बिखर जाता है l उसका यह रुप देख कर टोनी डर जाता है और अपनी जगह पर खड़ा हो जाता है l रोना उसी मेज पर सिर झुकाए हांफ रहा था l

रोणा - जानता है कुछ ऐसा हुआ है... के अपना चेहरा आईने में देखते हुए घिन आ रही है... (टोनी की ओर मुड़ता है, टोनी को खड़ा हुआ देख कर ) बैठ जाओ... (टोनी बैठ जाता है) क्या आज रात तक... मैं रुक सकता हूँ...

टोनी - (लड़खड़ाती हुई आवाज में) आ... आपका ही घर है... साब...

रोणा - (टोनी के पास बैठ कर, एक गहरी साँस छोड़ कर) मुझे... विश्वा के बारे में... फिर से पुरी जानकरी दे...

टोनी - (हैरानी के साथ) क्या... मेरा मतलब है... बताया तो था आपको मैंने...

रोणा - हाँ... पर ठीक से सुना नहीं था... अपनी जेहन में उतारा नहीं था... अपने बड़े मर्द होने का घमंड का चश्मा नाक पर बिठा कर... कान को पकड़ रखा था... उसी से दुनिया को देख रहा था... तोल रहा था... इसलिये अपने दुश्मन को कम कर आंक बैठा था... उसने मुझे एहसास दिलाया है... के मैं उसके सोच और नजर आगे कहीं ठहरता ही नहीं हूँ... इसलिए मुझे अब अच्छे से बता... एक एक बात... उसके बारे में...

टोनी पहले मुहँ खोले रोणा को देखे जा रहा था, फिर जैसे ही रोणा उसके तरफ टेढ़ी नजर से देखा वह बिना देरी किए अपने और विश्व के बारे में जैल में जो भी गुजरा था सब कुछ बताने लगता है l रोणा भी उसके एक एक बात को आँख मूँद कर बड़े ध्यान से सुन रहा था l टोनी अपनी बात ख़तम कर चुप हो जाता है, पर रोणा की आँखे अभी भी बंद ही थी l

टोनी - साब... (रोणा अपनी आँखे खोलता है)

रोणा - तेरी सारी कहानी में... पहले उससे दुश्मनी रंगा ने की थी... पर उसने रंगा को बहुत जबरदस्त जवाब दिया... एक नहीं दो बार... उसके बाद... उसकी दोस्ती और शागिर्दी डैनी से हुई... फिर... उसकी पढ़ाई... फिर किसी ना किसी कैदी से झगड़ा और मांडवली...

टोनी - जी...

रोणा - एक आदमी... जैल में रह कर... जिसका ना आगे कोई है... ना कोई पीछे... क्या वह अपना कोई नेट वर्क खड़ा कर सकता है... वह भी बहुत जबरदस्त...

टोनी - साब... बात क्या है बताइए...

रोणा एक न्यूज पेपर निकाल कर पटकता है, जिसमें एक अनजान शख्स को किन्नरों के द्वारा जुलूस निकाले जाने की खबर छपी थी l

रोणा - एक परफेक्ट प्लान... अपने शिकार के लिए... शिकार को ललचाना... उसके लिए जगह तय करना... उसे तीन सौ चार सौ किन्नरों द्वारा अपमानित करना... गाँव के गँवार विश्व से कैसे सम्भव हो सकता है..

टोनी - सम्भव हो सकता है... अगर वह... डैनी का शागिर्द हो... रोणा साब... मैं बस इतना कहूँगा... विश्व जितना दिखता है... उससे कहीं ज्यादा छुपा हुआ है... उसे पुरी तरह एक्सप्लोर करना मुश्किल है... (रोणा उसे भवें सिकुड़ कर देखने लगता है) हाँ रोणा साहब... वह डैनी का पक्का चेला है... डैनी ने उसे एक बार कहा था...

देखो कुछ दिखाओ कुछ...

कहो कुछ... करो कुछ...

सोचो कुछ... समझाओ कुछ

इसी बात को विश्वा ने गाँठ बाँध ली...

रोणा - ह्म्म्म्म... वाकई... जितना मैंने उसे देखा है... समझा है... वह उससे कहीं ज्यादा गहराई में है...

कुछ देर के लिए रोणा खामोश हो जाता है l टोनी भी उससे कोई सवाल नहीं करता है l फ़िर रोणा बोलना शुरु करता है l

रोणा - उसे मैंने लड़ते हुए देखा नहीं है... पर इतना तो जान गया हूँ... कि वह अकेला बीस पच्चीस पर भारी पड़ता है... सात साल कैदियों और मुजरिमों के बीच रहा है... उस पर अब वकील भी है... दिमाग बहुत चलता है उसका... ऐसा नहीं कि मुझे... खतरे का एहसास नहीं था... पर मैं सीरियस नहीं था... उसने मुझे एक बहुत बड़ी सीख दि है... जिससे मेरा पुरा वज़ूद को ही बदल कर रख दिया है... उसने मेरी मर्दानगी पर ऐसा चोट मारा है कि... अब मैं मर्द हो कर भी.. मर्द नहीं रहा... (अपनी जगह से उठ खड़ा होता है) जब अपने बिस्तर पर किसी लड़की को सोचता हूँ...(लहजा सख्त हो जाता है) तो मेरी मर्दानगी... मेरा मज़ाक उड़ाने लगता है.... इसलिए अब उसे एक सिख देना है मुझे...

टोनी - (हैरान हो कर सुन रहा था) क्या आ. आआप उसे सीख देंगे...

रोणा - हाँ... उसे सीख में यह बताना जरूरी है... के डर और शर्म की भी अपनी एक पैमाना होता है... जब जरुरत ज्यादा उड़ेल दिया जाता है... तो पैमाना छलक जाता है... और वह ऐसा छलकता है... के ख़तम ही हो जाता है... फिर वह शख्स निडर और बेशर्म हो जाता... (टोनी चुप रह कर सुन रहा था, टोनी से ) कुछ कहेगा नहीं...

टोनी - साब... अगर विश्वा से... अपनी दुश्मनी बरकरार रखना चाहते हैं... तो रखिए... पर मुझे इन सब में... मत घसीटें.. मैंने पहले भी कहा था आपको...

रोणा - हाँ हाँ... याद है मुझे... विश्वा किसी एक को मारने की कसम खाई है... तु वह दुसरा नहीं बनना चाहते...

टोनी - हाँ नहीं बनना चाहता... लगता है... मेरी पुरी बात को... आप ठीक से समझ नहीं पाए... पुलिस वाले हो... सोचा था समझ गए होगे...

रोणा - क्या मतलब है तेरा...

टोनी - यही की... विश्वा.... एक खुन पहले ही कर चुका है... और तब तक दुसरा खुन नहीं करेगा... जब तक... उसका सब्र जबाव ना दे दे...

रोणा - (चौंक कर उछल जाता है) क्या... विश्वा पहले से ही खुन कर चुका है...

टोनी - जी हाँ रोणा साब... सबको लगता है... यश वर्धन चेट्टी की मौत एक हादसा था... ड्रग्स का ओवर डॉस और हार्ट पल्स हाइपर हो कर रुकने की वज़ह से वह मरा.... पर रोणा साहब... उस हादसे के वक़्त मैं वहीँ पर था... और मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता.. वह हादसा नहीं... हत्या थी...

रोणा - (आँखे फैल जाती हैं, मुहँ खुला रह जाता है)

टोनी - हाँ रोणा साहब... वह एक परफेक्ट प्लान्ड मर्डर था... इतना परफेक्ट... के चारों तरफ पुलिस वाले थे... वहाँ पर मौजूद हर कोई उस हादसे का चश्मदीद गवाह थे... उस हादसे की वीडियो रिकॉर्डिंग भी बनी थी... सीसीटीवी और मेडिकल रिपोर्ट तक... विश्वा के बेगुनाही के लिए गावही दिए... जरा सोचिए... जैल के अंदर.. एक सजायाफ्ता कैदी... कितनी आसानी से खुन कर दिया...

रोणा - यह बात तूने नई बताई... अगर वह मर्डर था... तो तूने उसके खिलाफ गवाही क्यूँ नहीं दी... तेरी तो दुश्मनी थी उससे...

टोनी - विश्वा जब किसी को टार्गेट करता है... कई दिनों से प्लानिंग के तहत उसके लिए ट्रैप बनाता है... फिर उसे अपनी ट्रैप में ले लेता है.... बाहर यश का बाप... इतना ताकतवर शख्सियत... जिसने कई एक्सपर्ट खड़े किए थे... पर इंटरनल इंक्वायरी में... सब विश्व को बेगुनाह मानने को मजबूर हो गए... के ओंकार का बेटा यश हादसे के चलते मारा गया... यहाँ तक ओंकार भी...

रोणा - (अविश्वास भरे लहजे में) विश्वा ने यश को मारा... पर कैसे... क्यूँ...

टोनी - जब यश विश्व के गर्दन पर चोक बना कर पीठ के बल लेट गया... हम सब बाहर थे... हमें यकीन हो गया कि विश्व मरने वाला है... तभी यश हमें बुलाया... विश्व को पकड़ने के लिए... सबसे पहले मैंने छलांग लगाई थी... तभी विश्व पलट गया... और मैं... यश पर गिरा था... तब विश्व ने यश से कहा... "यह जयंत सर के नाम पर तुझे कुत्ते की मौत मुबारक" .... बाद में जब वह मुझे धमकाया था... तभी बोला था... के वह जानता था... की यश... विश्व से दोस्ती के आड़ में... डबल क्रॉस कर रहा था...

रोणा - ओ... तो यश उसका पहला और आखिरी खुन है... ह्म्म्म्म... बड़ा यकीन है उसे खुद पर.... पर उसे जयंत राउत की मौत का पता कैसे चला...

टोनी - वह तो मैं नहीं जानता... पर विश्वा को खुद पर यकीन करने की वज़ह है रोणा साहब... पहली बात... वह डैनी भाई का शागिर्द है.... और दुसरी बात डैनी भाई पर विश्वा का एहसान बाकी है... और विश्वा जानता है... डैनी भाई विश्वा पर कोई आंच नहीं आने देंगे... आप के पास खबर भी तो होगी... विश्वा अपना ग्रैजुएशन... डैनी की वकील जयंत चौधरी के वज़ह से ही पुरा कर पाया था... इसलिए डैनी भाई की तरह कोई नेट वर्क खड़ा करना... विश्वा के लिए कोई बड़ी बात नहीं है... (रोणा चुप रहता है) रोणा साब... मैं यह सब आपको डराने के लिए नहीं कह रहा हूँ... पर सच यह है कि... मैं सच में दुसरा नहीं बनना चाहता हूँ...

रोणा - ह्म्म्म्म... ठीक है समझ गया... मैं यहाँ किसी और काम से आया था... एक आखिरी काम... जो तुम्हें मेरे लिए करना होगा...

टोनी - जी बोलिए साब...

रोणा - शाम को जाने से पहले बता दूँगा....

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बड़बिल

कैजुअल माइनिंग वर्कर की बस्ती में तीन गाडियों का काफिला आकर रुकती है l आगे वाली और पीछे वाली गाड़ी में रॉय ग्रुप सिक्युरिटी के गार्ड्स थे और बीच वाले गाड़ी में से तीन ज़न उतरते हैं रॉय, चेट्टी और हाथ में छड़ी लेकर केके l उन तीनों का रास्ता बना कर कुछ गार्ड्स आगे आगे चलते हैं और वह तीनों उन गार्ड्स को फॉलो करते हुए एक छोटे से घर के सामने पहुँचते हैं l कुछ गार्ड्स अंदर जाते हैं और रंगा को पकड़ कर खिंचते हुए बाहर लाते हैं l रंगा केके के सामने घुटने पर बैठ जाता है l

रंगा - मैंने... (गिड़गिड़ाते हुए) कुछ नहीं किया केके साहब... मैंने कुछ भी नहीं किया...

केके - मुझे कुछ सवालों के जवाब चाहिए...

रंगा - जी... जी मालिक...

केके - तुझे कैसे मालुम पड़ा... मेरा बेटा आर्कु में था...

रंगा - मुझे... रॉय साहब ने कहा था...

केके रॉय की ओर देखता है l रॉय अपना सिर हिला कर हाँ कहता है l केके हैरान जितना होता है उतना ही गुस्सा हो जाता है l अपनी छड़ी से गुप्ती निकालता है तो सामने चेट्टी आ जाता है l

चेट्टी - कुछ भी गलत करने से पहले... बात को पुरी तरह जान लो... बात अगर तुम्हारे बेटे की इन्फॉर्मेशन छुपाने की है... इसका जवाब मेरे पास है...

केके - क्या जवाब है...

चेट्टी - अंदर चलें.... या तमाशा यहाँ बाहर ही बनाए रखें...

केके अपनी छड़ी में गुप्ती को रख देता है l रंगा को लेकर सब घर के अंदर आते हैं l बाहर जो गार्ड्स थे इन लोगों को देख रहे भीड़ को हटाने लगते हैं l अंदर पहुँचने के बाद एक गार्ड दरवाजे को बंद कर देता है

रंगा - केके साहब... जरा सोचिए... मैंने जाने अनजाने में सही क्षेत्रपालों से दुश्मनी ले ली है... तो ऐसे में... मैं जिसके छत्रछाया में हिफाजत में हूँ... उनसे गद्दारी... नमक हरामी कैसे कर सकता हूँ....

चेट्टी - हाँ केके... जिस वक़्त हमें तुम्हारे बेटे की खबर लगी... तब तुम इस हालत में नहीं थे कि हम यह बात तुमसे शेयर कर सकें...

रॉय - हाँ... केके साहब... आर्कु में विनय का मोबाइल कुछ देर के लिए ऑन हो गया था... हमारे लोग विनय की मोबाइल को ट्रेस करने में लगे हुए थे.... इसलिए लोकेशन की जानकारी हाथ लग गई... पर हमें डर था... कहीं दुबारा हाथ लगने से पहले विनय qभाग ना जाए... इसलिए हमने रंगा को वायजाग भेजा... विनय का लोकेशन कंफर्म करने और उस पर नजर रखने के लिए... ताकि जब आपकी हालत में थोड़ा सुधार आए... तब हम सब मिलकर विनय को वापस ला पाएं....

रंगा - केके साहब... आर्कु में... सब मिला कर... डेढ़ सौ के करीब लॉज, होटल और रिसॉर्ट हैं... हर एक में मैं ढूंढ रहा था... पर यकीन मानिये केके साहब... मैं उन्हें ढूंढ नहीं पाया... और जिस दिन मुझे खबर लगी... उस दिन... (रुक जाता है, आगे कुछ नहीं कहता)

केके - उस दिन क्या हुआ... मुझे विस्तार से बताओ...

रंगा - सारे होटल और लॉज छान मारने के बाद... बोराकेव के तरफ़ जाने का फैसला किया... एक गाड़ी कर जब बोराकेव में हिल व्यू लॉज में पहुँचा... तब देखा बहुत सारे लोग वहाँ पर जमा हुए थे... मैं वहाँ जा कर जब इंक्वायरी कर ही रहा था कि... तब पुलिस वालों के साथ वीर... और उसके साथ एक लड़की और एक बुढ़िया आ पहुँचे थे... मैं कुछ देर तक वहाँ पर अपना चेहरा छुपाए खड़ा रहा... वहीँ मुझे मालुम हुआ कि... विनय बाबु और.... (चुप हो जाता है)

केके टूटे मन से सब सुन रहा था l जब रंगा रुक जाता है तब केके रंगा की चेहरे की ओर देखता है l डरा सहमा सा दिख रहा था l

केके - मतलब... वीर सही कह रहा था... (चलते हुए दीवार तक पहुँचता है और एक मुक्का मारता है) किसने मुझसे अपनी दुश्मनी उतारी है...

चेट्टी - यही तो हमें पता लगानी है... देखो केके... परिस्थिति ने हमें अब एक ही नाव पर सवार कर दिया है... जवान बेटे को खो देना....

केके - आपका बेटा हादसे के चलते मरा था चेट्टी बाबु.... पर मेरे बेटे को किसीने पॉइंट ब्लैंक पर सिर के बीचोबीच शूट कर मारा है... ऐसा कोई दग़ाबाज़... या फिर बदला लेने की ख्वाहिश पालने वाला कर सकता है...

रॉय - आप बिल्कुल सही कह रहे हैं... पॉइंट ब्लैंक पर सिर को निशाना बनाने वाला... या तो पक्का दुश्मन हो सकता है... या फिर कोई जान पहचान वाला आस्तीन का सांप हो सकता है...

चेट्टी - तो फिर पता लगाओ... वह कौन सांप है... जो हमारे ही घर में... हमारी ही दुध पी रहा है और हमें डस रहा है...

केके - मैं और मेरा पुरा नेट वर्क इसी काम में जुटे हुए हैं...

चेट्टी - रिजल्ट चाहिए रॉय... रिजल्ट... वर्ना... हम इधर क्षेत्रपाल से दुश्मनी उठाए हुए हैं... और अंदर कोई हमें खोखला कर रहा है...

कुछ देर के लिए सब चुप हो जाते हैं l पर केके किसी गहरी सोच में खोया हुआ था l उसे देख कर चेट्टी पूछता है l

चेट्टी - क्या बात है केके... फिर किस सोच में पड़ गए...

केके - आज की दौर में... हमारा एक ही दुश्मन है... जो हमें मिटाने की मंसूबा पाल सकता है... क्षेत्रपाल... पर मैंने उनके साथ सात सालों तक काम किया है... जैसा कि वीर ने कहा... यह उनका तरीका नहीं है... (इन सबके तरफ देख कर) फिर... फिर यह कौन हो सकता है... उसका मकसद क्या है... उसने मुझसे अपनी दुश्मनी उतारा है... या किसी और की दुश्मनी....

चेट्टी - सवाल वाजिब है... पर इस वक़्त इन सारे सवालों का कोई जवाब नहीं है... (रॉय से) एक काम करो... यह जो लड़की पुष्पा... और उसके भाई के बारे में पता करो... कहीं उनकी... किसी से दुश्मनी तो नहीं.... और हो सके तो... विनय के सारे दोस्त और दुश्मनों के बारे में पता करो...

रॉय - यस सर...

चेट्टी - केके... माना के मेरे बेटे के मरने की वज़ह... और तुम्हारे बेटे के मरने की वज़ह अलग है... पर... (केके के कंधे पर हाथ रखकर) इस उम्र में... जवान बेटे का खोना... उसका दर्द मैं समझ सकता हूँ... इसलिए यह दर्द और ज़ख्म का जो भी जिम्मेदार है... हम उसे नहीं छोड़ेंगे...

केके एक कृतज्ञता भरी नजर से चेट्टी को देखते हुए उसके हाथ पर अपना हाथ रख देता है l

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दीवार पर लगे स्क्रीन पर हस्पताल का सीसीटीवी की फुटेज चल रहा था l विक्रम अपने केबिन में बैठा उसे गौर से देख रहा था l ऐसे में विक्रम के केबिन का दरवाजा खुलता है l वीर बाहर रुक कर विक्रम से पूछता है l

वीर - तुमने मुझे बुलाया....

विक्रम - अंदर आ जाओ... (वीर अंदर आता है) मेरे कमरे में आने के लिए.... तुम कब से परमिशन लेने लग गए... बैठो....

वीर - (बैठते हुए) अपना एटिट्यूड सुधार रहा हूँ... जेंटलमेन बनने की कोशिश कर रहा हूँ....

विक्रम - हाँ तुम जब से जेंटलमेन बन रहे हो... तब से दुनिया तुम्हारी दुश्मन बनती जा रही है.... क्या तुम कल हस्पताल गए थे...

वीर - हाँ... क्यूँ क्या हुआ...

विक्रम - मृत्युंजय से मिलने...

वीर - हाँ...

विक्रम चुप रहता है और वीर की ओर एक टक देखता रहता है l वीर अपनी ओर ऐसे घूरे जाने पर थोड़ा असहज महसूस करता है l

वीर - क्या हुआ भैया... मुझसे कोई गलती हो गया क्या...

विक्रम - पता नहीं...

वीर - तो फिर तुम मुझे ऐसे क्यूँ घूर रहे हो....

विक्रम - तुम्हारे... मृत्युंजय से मिलने के कुछ घंटे बाद... मृत्युंजय अपना डिस्चार्ज करवा कर चला गया है....

वीर - (चौंक कर) व्हाट...

विक्रम - हाँ...

वीर - पर वह गया कहाँ...

विक्रम - यही तो कारण है... के मैं हैरान भी हूँ और परेशान भी हूँ...

वीर - मतलब....

विक्रम - टुटे हुए पैर से उसने अपना डिस्चार्ज ही नहीं करवाया... बल्कि उसने खुद को गायब भी करवा लिया है... ना वह अपनी पुरानी बस्ती में गया है... ना ही... नए पते पर...

वीर - क्या... वह.. (बोलते बोलते रुक जाता है)

विक्रम - ह्म्म्म्म हूँ... अपनी बात पूरी करो...

वीर - क्या वह अभी भी आपके शक़ के दायरे में है...

विक्रम - (अपनी चेयर छोड़ कर केबिन के बीच टहलते हुए) देखो वीर... महांती के मौत से... मैं पागल हो गया हूँ... इसलिए यह सवाल मुझसे ना ही करो तो बेहतर होगा....

वीर - ठीक है... नहीं करता कोई सवाल... अब पूछो मुझसे क्या जानना चाहते हो...

विक्रम - तुम अचानक से मृत्युंजय से मिलने क्यूँ गए...

वीर - तुम ही तो चाहते थे... जो लोग मेरे वज़ह से ESS में जॉइन हुए थे... उन्हें कोई दुसरा ऑप्शन दूँ... मैंने उसे जाजपुर स्पंज फैक्ट्री में सुपरवाइजर की पोस्ट की नौकरी का लेटर थमा कर आया था...

विक्रम - ह्म्म्म्म... और...

वीर - और... और क्या... बस इतना की... मैं उसकी बहन पुष्पा के कातिलों को ढूँढ कर अपनी तरीके से सजा दूँगा....यह वादा कर आया था....

विक्रम उसे चुपचाप देखे जा रहा था l वीर को विक्रम का ऐसे देखना अस्वाभाविक लग रहा था l

वीर - अब क्या हुआ भैया... तुम मुझे ऐसे क्यूँ देख रहे हो...

विक्रम - देख रहा हूँ... हमारे फटे क्या कम हैं... जो तुम दूसरों के फटे में घुस रहे हो...

वीर - जो कहना है... सीधे सीधे कहो ना...

विक्रम - (एक चिट्ठी वीर को देकर) यह लो... मृत्युंजय ने तुम्हारे लिए... मेडिकल रिसेप्शन में छोड़ा था...

वीर वह चिट्ठी खोलता है, देखता है मृत्युंजय ने उसके नाम चिट्ठी लिखा है, वह पढ़ने लगता है l

"आदरणीय राजकुमार जी, मुझ जैसा बदकिस्मत और मनहूस आदमी दुनिया में कहीं नहीं होगा l पार्टी के प्रति वफादार रहते हुए मेरे पिता छोटी मोटी व्यापार करते हुए घर चला रहे थे l एक दिन पता नहीं किससे रूठ कर वह आत्महत्या कर बैठे l आपकी कृपा दृष्टी रही के आपने मुझे रोजगार दिया, ताकि हमारे घर की चूल्हा कभी बंद ना हो l उसके बाद मेरी माँ ने किसी तरह खुद को सम्भाला पर कुछ ही दिनों के अन्तराल में वह भी चल बसी l उस समय आप पास खड़े हो कर बहुत सहायता की l पर बदकिस्मती पीछा नहीं छोड़ा ऐसे दुख के समय में मेरी बहन मुझे अकेला छोड़ अपनी जीवन की तलाश में किसी को साथ लेकर चली गई l पुष्पा ऐसी गई के जब मिली चिता में लेटी हुई मिली l उसकी हत्या कर दी गई l आपने कसम खाई है कि उसके हत्यारों को छोड़ेंगे नहीं पर राजकुमार जी बहन वह मेरी थी, उसकी हत्या का वारिस भी मैं ही हूँ l इसलिए मैं अपने तरीके से उसके हत्यारों को ढूँढुंगा और अपने हाथों से उसे सजा दूँगा l आखिर पुष्पा की राखी का कर्ज है मुझ पर l

आपने हमेशा एक सच्चे मालिक की तरह मेरे बगल में खड़े रहे, खयाल रखा पर मेरा एक आग्रह है, अनुरोध है, प्रार्थना है कि इस मामले से दुर रहें l

प्रतिशोध मेरा है l दोषी भी मेरा है l उसे तलाश करना और अपने हाथों से सजा देना मेरा अधिकार है l कृपया मुझे मेरे अधिकार से वंचित ना करें l मैं आपसे वादा करता हूँ उस हत्यारे को मैं आपके सामने लाऊँगा l तब आप निर्णय करें उसे कैसी सजा दी जाए l

बस आपके शुभकामनाओं के साथ मैं आपसे विदा ले रहा हूँ l

मृत्युंजय

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मेयर ऑफिस के परिसर में बल्लभ अपनी गाड़ी पार्क करता है औऱ जल्दी से अपना ब्रीफकेस उठा कर जल्दी जल्दी पिनाक के चेंबर की ओर जाने लगता है l रिसेप्शन से अपने आने की खबर पहुँचाने के लिए कहता है l थोड़ी देर बाद रिसेप्शन उसे अंदर जाने के लिए कहती है l वह जब चेंबर के अंदर पहुँचता है तो देखता है पिनाक के सामने एक शख्स बैठा हुआ है l जिसका पहनावा उसके दौलत मंद और प्रतिष्ठित होने की बात को दर्शा रही थी l

पिनाक - आओ प्रधान आओ.. बड़े सही समय पर आए हो... इनसे मिलो.... आप हैं... श्री निर्मल सामल... हमारे होने वाले समधी... (परिचय पाते ही बल्लभ हाथ जोड़ कर नमस्कार करता है) और सामल बाबु... यह है... एडवोकेट बल्लभ प्रधान... हमारे सारे लीगल ईलीगल काम देखता है...

निर्मल - ओ... तो इस वक़्त यहाँ लीगल काम से आए हैं... या...

बल्लभ - मैं आया तो आप ही के काम से हूँ... मेरे पास ईलीगल कुछ नहीं होता है... क्यूँ के सारे कामों को लीगल बनाना ही मेरा काम है...

निर्मल - ओ हो... बहुत अच्छे...

पिनाक - बैठ जाओ प्रधान... (बल्लभ बैठ जाता है) तुम जिस तरह से बात रख रहे हो... लगता है निर्मल बाबु का... काम करके ही आए हो... या हो जाने वाला है...

बल्लभ - जी छोटे राजा जी... सारे प्रॉब्लम सॉल्व...

निर्मल - क्या... आई कांट विलीव...

बल्लभ - आप विश्वास कर लीजिए निर्मल बाबु.... मैंने कहा ना... मैं जो भी काम उठाता हूँ... उसे लीगल बना देता हूँ... अब उस छह एकड़ जमीन का रजिस्ट्रेशन कब कराना है... मुहूर्त निकालिए...

निर्मल - इतनी आसानी से... बुरा ना मानना प्रधान बाबु... जहां तक मुझे याद है... BDA का लैंड सर्वेयर... गायब था... अपनी ऑफिस में बिना कोई इन्फॉर्मेशन के... फिर...

बल्लभ - आपने सौ फीसद सही कहा सामल बाबु पर आज सुबह ही... सर्वेयर काजमी जॉइन हुआ है... और जॉइन होते ही उसने अपना रिपोर्ट अटैच कर दे दिया है...

निर्मल - (कुछ सोच में पड़ जाता है) इतनी आसानी से...

पिनाक - आपको तो खुश होना चाहिए सामल बाबु... क्या कामयाबी पर यकीन नहीं हो रहा है... या.. पच नहीं रहा..

निर्मल - छोटे राजा जी... मैं खानदानी व्यापारी हूँ... व्यापार में कुछ बातेँ हमें पर्सनल एक्सपेरीयंस है... उसके आधार पर कह सकता हूँ... जो आसानी से हासिल हो जाए... वह ज्यादा देर तक टिकता नहीं है... ज़रूर उसमें कोई छुपा हुआ गडबड़ होगी....

पिनाक - सामल बाबु... आप यह भुल रहे हो... इस काम में... क्षेत्रपाल इंवॉल्व हैं... हासिल होना ही था... और यह लंबा टिकेगा भी... (बल्लभ की ओर दिखाते हुए) और यह आदमी इन्हीं चीजों में माहिर है...

बल्लभ - सामल बाबु... आप अब क्षेत्रपाल खानदान से जुड़ने वाले हैं... तो मैं कैसे आपका मान गिरने दे सकता हूँ... BDA ऑफिस में प्रमुख अधिकारी हमारा ही आदमी है... उसके जरिए... उस काजमी पर दबाव डाल कर सर्वे रिपोर्ट पास करवाया है... आप यकीन रखिए... अब कोई परेशानी नहीं है....

निर्मल - थैंक्यू प्रधान बाबु थैंक्यू... (पिनाक की ओर देख कर) आपने तो हमारी बड़ी परेशानी हल कर दी...

पिनाक - आप हमारे होने वाले समधी हैं... इतना तो कर्तव्य बनता है और हक भी...

निर्मल सामल के चेहरे पर खुशी कुछ देर दिखती है फिर धीरे धीरे चेहरा गम्भीर हो जाता है l यह देख कर पिनाक उससे सवाल करता है l

पिनाक - क्या हुआ सामल बाबु... हमने कुछ गलत बोल गए क्या...

निर्मल - नहीं छोटे राजा जी... बल्कि यह तो हमारा सौभाग्य है कि राजा साहब ने हमें अपने बराबर खड़ा किया और... हमारी बेटी का हाथ आपके बेटे के लिए माँगा...

पिनाक - फिर... फिर आपके चेहरे पर वह रौनक नहीं दिखाई दे रही है जो होनी चाहिए....

निर्मल - छोटे राजा जी... हम अपने इलाके से बाहर व्यापार फैलाना चाहते थे.... राजा साहब के कहने पर हम भुवनेश्वर आए... जो जगह हमें दिखाई गई... और जो प्रोजेक्ट हमें दी गई है.... वह लिटिगेटेड थी... चूंकि सस्ते में हो सकती थी... इसलिए पसंद भी आई... राजा साहब ने पुरा बीड़ा उठाया... हमें यह जगह दिलवाने के लिए... रिश्ता भी जोड़ा... इसलिए मना नहीं कर पाए... पर...

पिनाक - जब आप हमसे जुड़ ही गए हैं... फिर पर कैसा...

निर्मल - हम जानते हैं... आप राजाओं के परिवार से ताल्लुक रखते हैं... कुछ रस्में रिवाज, कुछ शौक... रजवाड़ों के जैसे होते हैं... (पॉज)

पिनाक - हाँ तो...

निर्मल - (झिझकते हुए) हम सुने हैं... आपके रंग महल के बारे में... (पॉज)

पिनाक - खुलकर कहिये सामल बाबु....

निर्मल - देखिए... हम इन सबके आदि नहीं हैं... और हमें कोई ऐतराज भी नहीं है... हम अपनी बिटिया को समझा सकते हैं... पर...

पिनाक - आपका यह पर ख़तम ही नहीं हो रहा है सामल बाबु...

निर्मल - जब राजा साहब ने विवाह का प्रस्ताव रखा... तो माफ कीजिएगा... हमने राजकुमार जी की... खबर ली थी...

पिनाक - कैसी खबर...

निर्मल - देखिए छोटे राजा जी... अब मैं सीधे मुद्दे पर आता हूँ... राजकुमार जी अपने संग एक लड़की को लिये घूमते हैं... मुझे लगता है.. आप भी शायद जानते हैं... हम राजवंशी नहीं हैं... हमें ऐसी बातों का आदत नहीं है... मैं नहीं चाहता कि कल को मेरी बेटी को कोई पछतावा हो... हमने अपनी बच्ची को बड़े नाज़ों संस्कारों के साथ पाला है... (पॉज)

पिनाक - आगे बढ़ीये...

फिर यकायक निर्मल का लहजा बदल जाता है l आवाज में कड़क पन और भारी पन उतर आता है l

निर्मल - हम चाहते हैं... विवाह एक महीने के अंदर हो जाए... और उससे पहले... वह नीचि और ओछी जात की लड़की... हमारे होने वाले जमाई बाबु के जीवन से निकल जाए....

पिनाक - आपने ठीक कहा सामल बाबु... पर जैसा कि आपने कहा... के हम राजवंशी हैं... मान लीजिए... विवाह के बाद भी... राजकुमार किसी के साथ एंगेज मिले... तो...

निर्मल - वह विवाह की बाद की बात होगी... और मेरी बेटी बिल्कुल वैसे ही अपना धर्म निभाएगी जैसे... क्षेत्रपाल परिवार में... दुसरी औरतें...

पिनाक - ठीक है... हम समझ गए... आप निश्चिंत हो कर जाएं... और विवाह की तैयारियाँ करें... आपका काम हो जाएगा...

निर्मल - शुक्रिया छोटे राजा साहब...

पिनाक - इसमें शुक्रिया कैसी समधी ही... अब बेहतर होगा आप भी हमें समधी जी ही कहें...

निर्मल - जी छोटे रा..... सॉरी आई मीन... समधी जी...

पिनाक - (बल्लभ से) प्रधान...

बल्लभ - जी छोटे राजा जी...

पिनाक - तुम हमारे समधी जी को अपने साथ ले जाओ... उन्हें क्या करना है... अच्छी तरह से समझा दो...

बल्लभ - जी छोटे राजा जी...

फिर निर्मल सामल और बल्लभ अपनी अपनी जगह से उठते हैं और पिनाक से औपचारिकता वाली विदाई लेकर चेंबर से बाहर निकल जाते हैं l उनके जाते ही पिनाक अपना मोबाइल निकालता है और एक कॉल करता है l

पिनाक - कहाँ हो तुम...

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पिनाक - हाँ हाँ ठीक है... याद है तुमने एक बार कहा था...


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अब टाइम आ गया है वह करने का..

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पिनाक - देखो तुम कैसे करोगे... क्या करोगे मुझे कोई मतलब नहीं है... यह काम हफ्ते दस दिन के भीतर हो जाना चाहिए...

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पिनाक - अगर तुम यह काम कर देते हो... तो जितना पैसा मांगोगे मिलेगा...

- @#@#===#&@

पिनाक - ठीक है...

कह कर अपना फोन काट देता है l फोन कटते ही उसके चेहरे पर खौफनाक गुस्सा उभरने लगता है l

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ठंडी हवाएं बह रही है l अनु की लटें चेहरे पर उड़ रही है और अनु बार बार अपनी लटों को अपनी कानो के पीछे ले जा रही थी l वीर की नजरें बिना पलकें झुकाए एक टक उसे देखे जा रहा है l चंद्रभागा की रेतीली पठार पर कुछ प्रेम के जोड़े अपने में मगन थे l शाम का वक़्त, सुरज ढलने में अभी भी वक़्त है l पर आज की समा जितनी रूमानी लग रही थी उतना ही मासूम भी लग रहा था l वीर का अपनी ओर ऐसे देखने से अनु के गालों पर शर्म की लाली छा रही थी l

अनु - आप कब से मुझे ऐसे देखे जा रहे हैं...

वीर - क्या करूँ... तुम हो ही ऐसी...

अनु - रोज ही तो आप मुझे देखते हैं...

वीर - तुम रोज मुझे नई सी लगती हो...

अनु - प्लीज... आप... मुझे ऐसे... यूँ ना देखिए...

वीर - (शरारती लहजे में) फिर कैसे देखूँ...

अनु - (कुछ नहीं कह पाती, मन ही मन मुस्कराते हुए अपना सिर झुका लेती है)

वीर - हाय... एक और कुदरत... एक और तुम... दोनों को उपर वाले ने कितनी सिद्दत से तराशा है... पर फिर भी कुदरत से मन भर जाता है और तुम पर नजर ठहर जाता है...

अनु - (अपनी अंदर की खुसी को ज़ब्त करते हुए) एक बात पूछूं...

वीर - ह्म्म्म्म...

अनु - आप... मुझे यहाँ क्यूँ ले कर आए... हम किसी मॉल में भी तो जा सकते थे...

वीर - क्यूँ तुम्हें यहाँ अच्छा नहीं लग रहा...

अनु - बहुत... पर अगर हम मॉल में होते... तो शायद हम बातेँ कर रहे होते...

वीर - ना... आज तो तुम्हें जी भर कर देखने का मन कर रहा है...

अनु - अच्छा... तो बातेँ कब करेंगे...

वीर - कर ही तो रहे हैं...

अनु - कहाँ... बातेँ मैं कर रही हूँ...

वीर - वही तो... एक अप्सरा मेरे सामने बैठी है... जिसके मुहँ से शहद ही शहद टपक रही है... कुदरत का करिश्मा है... देख रहा हूँ... उसके गाल बिल्कुल सेव के जैसे लाल हैं... जी कर रहा है.. चबा जाऊँ... (अनु अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लेती है) अनु...

अनु - ह्म्म्म्म...

वीर - थैंक्यू...

अनु - (हैरानी के साथ अपने चेहरे से हाथ हटाते हुए) वह क्यूँ...

वीर - मैं खो गया था... तुमने ही मुझे ढूंढ लिया... मैं बिखर गया था... तुमने ही मुझे समेट लिया...

अनु - इसके लिए आप मुझे थैंक्स तो कहिये... मुझे खुशी है कि... मेरे राजकुमार फिर से वापस मिल गए...

वीर - अनु...

अनु - जी...

वीर - यह तुम्हारा मट्टू भाई से जान पहचान कब से है...

अनु - बताया तो था... जब हम एक साथ नौकरी करने लगे... उसके बाद... कुछ दिनों बाद मट्टू भैया और उनके माता जी और पुष्पा हमारे मुहल्ले में रहने आए थे...

वीर - ओ...

अनु - क्यूँ क्या हुआ...

वीर - क्या पुष्पा तुम्हारे बहुत करीब थी...

अनु - सच कहूँ तो हाँ... मेरी कोई सहेली नहीं थी... हमारे बस्ती में... वह एक छोटी बहन... एक सहेली बन कर आई थी...

वीर - क्या इसी लिए तुमने मुझसे... उसके क़ातिल को सजा देने के लिए कहा...

अनु - हाँ भी और नहीं भी...

वीर - मतलब...

अनु - पुष्पा के साथ जो हुआ... उसके लिए आप खुद को ही जिम्मेदार मान रहे थे... आपकी हालत मुझसे देखी नहीं जा रही थी... इसलिए.. मैंने... आपको... उस ग़म से उबारने के लिए... ऐसा कहा...

वीर - (मुस्करा देता है)

अनु - (झिझकते हुए) क्या आपको... बुरा लगा...

वीर - (अनु के दोनों हाथ अपने हाथ में लेकर) ओ अनु... मेरी प्यारी अनु... जानती हो... तुम्हारा मुहँ बोला भाई भी यही कह रहा था...

अनु - (हैरानी से) मेरा मुहँ बोला भाई... मतलब मट्टू भैया...

वीर - अरे नहीं... ह्म्म्म्म याद है.... ओरायन मॉल के पार्किंग में... मैं गिर रहा था... तब एक बंदे ने मुझे सम्भाला था... तब तुमने उसे भाई कहा था...

अनु - (याद करते हुए) हाँ हाँ...

वीर - वह अब मेरा दोस्त है... बहुत ही अच्छा दोस्त... उसने जो कहा था... तुमने भी बिल्कुल वही कहा....

अनु - (अपना सिर शर्मा कर झुका लेती है)

वीर - अनु...

अनु - हूं...

वीर - तुम अगर बात बात पर इस तरह से शर्मा कर लाल होती रहोगी... तो...

अनु - तो..

वीर - तो... जी चाहता है कि मैं तुम्हें अभी के अभी चूम लूँ... (अनु शर्मा कर अपनी हाथ छुड़ाने की कोशिश करता है, पर वीर नहीं छोड़ता)

अनु - राजकुमार जी... प्लीज...

वीर - अरे... इसमें प्लीज कहने की क्या जरूरत है... लो अभी चूम लेता हूँ...

अनु - आह... नहीं.. (अपना चेहरा शर्म के मारे फ़ेर लेती है)

वीर - अनु...

अनु - ह्म्म्म्म...

वीर - चल शादी कर लेते हैं...

अनु - (शर्मा कर अपना सिर झुका लेती है और अपनी आँखे बंद कर लेती है)

वीर - अब रहा नहीं जाता... अब तो एक ही ख्वाहिश जोर मार रही है...

अनु - (गाल और होंठ फड़फड़ा रहे थे पर बोल ना फुट पाई)

वीर - पुछ ना... क्या है ख्वाहिश...

अनु - (शर्मा कर मुस्कराते हुए) कैसी ख्वाहिश...

वीर - मैं हर सुबह जब अपनी आँखे खोलुँ तो तु मेरी बाहों में हो... और जब नींद से पहले अपनी अपनी आँखे मूँद लूँ... तो तेरा चेहरा देखते हुए सो जाऊँ... (अपना चेहरा अनु के पास लाता है, अनु की सांसे तेजी से चलने लगती हैं और उसकी धड़कनें बढ़ जाती है) अनु...

अनु - ह्म्म्म्म...

वीर - चल... शादी कर लेते हैं यार... इसी हफ्ते दस दिन में...

अनु - ह्म्म्म्म....

वीर - (खुशी के मारे) सच में...

अनु - (शर्मा कर अपना सिर हाँ में हिलाती है)

वीर - वाव... इस खुशी में तुझे चूम लूँ...

अनु - नहीं...

वीर - क्या... क्यूँ नहीं...

अनु - नहीं मेरा मतलब है... शायद मैंने अभी अभी नंदिनी जी को देखा...

वीर - क्या... (मुड़ कर देखने लगता है) कहाँ...

अनु - सच कह रही हूँ... मैंने देखा... नंदिनी जी किसी के साथ दिखीं... मेरा मतलब है... (अटक अटक कर) किसी.. लड़के के साथ...

वीर - (एक ठंडी रिस्पॉन्स के साथ) अच्छा...

अनु - (थोड़ी चहक कर) चलिए ना...

वीर - कहाँ...

अनु - नंदिनी जी को रंगे हाथ पकड़ने...

वीर - नहीं...

अनु - क्यूँ...

वीर - मेरी बहन कोई अपराध नहीं कर रही है... उसने माँ से आशीर्वाद भी ले लिया है... हाँ यह बात और है कि उसने अभी तक उस लड़के के बारे में कहा नहीं है... पर वह किसी के प्यार में है... मैं यह जानता हूँ... उसने खुद मुझसे कहा था... और यह भी बताया था कि... वक़्त आने पर मुझसे मिलवायेगी...

अनु - पर भाई होने के नाते कुछ कर्तव्य होता है आपका... आपने कहा कि उसे जानते नहीं हैं... कहीं... मेरा मतलब है... (अटक जाती है)

वीर - अनु... मैं शायद तुम्हारे लायक भी नहीं... पर क्या तुम मुझसे प्यार करके शर्म सार हो...

अनु - नहीं...

वीर - वह नंदिनी है अनु... नंदिनी... हमारे घर में... रिश्तों की अहमियत और पहचान उसे सबसे ज्यादा है... और उसने माँ से आशीर्वाद ले लिया है... तो वह कभी गलत नहीं हो सकती... (अनु का मुहँ लटक जाता है) अनु... मैं जानता हूँ... तुम उसे रंगे हाथ पकड़ना क्यूँ चाहती हो... तुम उसकी भाभी हो... उसे चौंकाना चाहती हो... पर अभी नहीं फिर कभी... अभी नंदिनी को उसके प्यार का थ्रिल महसुस करने दो...

अनु - आपको नंदिनी जी पर इतना भरोसा है...

वीर - हाँ... है...

अनु - मेरा भविष्य क्या होगा मैं नहीं जानती... पर जो भी होगा मुझे स्वीकार होगा... पर नंदिनी जी.... जहां तक मुझे पता है... उनकी शादी तय हो चुकी है... और आपकी बातों से लग रहा है... यह वह नहीं हैं... जिनसे उनकी शादी तय हुई है...

वीर - ओ... अब समझा... तुम खुल कर पूछो अनु...

अनु - आप शायद मेरे लिए अपने परिवार से लड़ जाएंगे... आप मर्द हैं... पर नंदिनी...

वीर - (मुस्कराते हुए) वह नंदिनी है अनु... नंदिनी... उसने जिसको चुना है... इतना यकीन के साथ कह सकता हूँ... वह नंदिनी के लिए ना सिर्फ क्षेत्रपाल से... बल्कि दुनिया से भी टकराने की कुव्वत रखता होगा... नंदिनी पर कोई आंच भी आने नहीं देगा....

उधर रुप विश्व के हाथ को खींचते हुए भाग रही थी l विश्व भी हैरानी के साथ उसके पीछे भाग रहा था l कुछ दुर जाने के बाद रुप अब हांफने लगी थी l तब विश्व उसे रोकता है

विश्व - क्या हुआ राजकुमारी जी... आपने किसे देख लिया...

रुप - कुछ नहीं... वह जगह ठीक नहीं था... इसलिये...

विश्व - झूठ... आपने जरूर वहाँ पर किसी को देख लिया है...

रुप - ओ हो... अब चलो भी...

विश्व - अरे कहाँ... इतना दूर तो भाग कर आ गए... और देखिए... हम जहां पर थे कुछ कुछ जोड़े थे वहाँ पर... पर यहां.. कोई नहीं है... और शायद किसीके आने की संभावना भी नहीं है...

रुप - ऐ... क्या मतलब किसी की आने की संभावना नहीं है...

विश्व - (हकलाते हुए) मैं... मैं क्या सोच सकता हूँ... मैं तो बस यह कह रहा था... के हमें भी उस तरफ जाना चाहिए...

रुप - ओए... बस बस बहुत हुआ.. हाँ... हम यहीं कहीं बैठेंगे... और बातेँ करेंगे... समझे...

विश्व - जी ज़रूर... जैसी आपकी मर्जी...

रुप - हाँ हाँ सब तो मेरी मर्जी है... तुम यहाँ क्या घास चरने आए हो...

विश्व - क्या मतलब...

रुप - अरे... अकेले हैं...

विश्व - हाँ तभी तो... साथ कुछ पल बिताने आए हैं...

रुप - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) ह्म्म्म्म.... ठीक कहा... हूंह्ह्ह...

कह कर रुप अपना मुहँ मोड़ कर आगे निकल जाती है l विश्व कुछ समझ नहीं पाता और उसके पीछे चलने लगता है l एक जगह पर नदी के किनारे छोटे छोटे मछली पकड़ने वाले कुछ नावें बंधी हुई थीं l वहीँ नाव के पास एक चार या पांच साल की एक लड़की रेत से एक घर बना रही थी l उसके बगल में दो लड़के खिलौने वाले बंदूक से एक दुसरे के पीछे भाग रहे थे l उन्हें देखते हुए रुप एक पत्थर पर बैठ जाती है l विश्व उसके बगल में बैठ जाता है l

विश्व - राजकुमारी जी... आप नाराज क्यूँ हैं..

रुप - हमें प्यार में पड़े कितने साल हुए...

विश्व - साल... या दिन...

रुप - क्या दिन... हूंह्ह्ह... बचपन का प्यार है...

विश्व - हाँ वह तो है... पर इजहार तो अभी अभी हुआ है ना...

रुप - तो...

विश्व - ओ हो.. मैं समझ नहीं पा रहा..

रुप - बेवक़ूफ़... फट्टु...

विश्व - फट्टु... कैसे...

रुप - अरे शाम सुहानी है... समा मस्तानी है... सुरज ढ़लने को है... ऐसे में...

विश्व - हाँ ऐसे में...

रुप - आ... ह्ह्ह्ह्...

विश्व - (मुस्करा देता है) गुस्सा आपके नाक पर बहुत अच्छा लगता है... मेरी नकचढ़ी...

तभी अचानक रेत पर खेल रही उस छोटी सी बच्ची की रोने की आवाज़ आती है l दोनों उस तरफ देखते हैं l वह लड़के खेल खेल में उस लड़की की रेत के घर पर चढ़ गए थे l जिसके वज़ह से वह घर टुट गई थी l तभी उस लड़की के रोने से वह दोनों लड़के अपने खिलौने बंदूक को लेकर भाग जाते हैं l यह देख कर विश्व और रुप दोनों कुछ देर के लिए हतप्रभ हो जाते हैं l

रुप - ओह... बेचारी लड़की.. कितनी मेहनत से वह घर बनाई थी... लड़के तोड़ कर भाग गए देखोना...

विश्व - हाँ भाग गए... हम समझदार इंसानों को आईना दिखा कर भाग गए...

रुप - क्या मतलब...

विश्व - वह लड़की कुदरत से अपना बसेरा बना रही थी... और वह लड़के आज के समाज के अक्स थे... जो हर चीज़ से असंतुष्ट थे... कहने को बंदूक हमारी सुरक्षा के लिए बनाई गई है... पर हमें असुरक्षा किससे है... इंसानों से ही ना... हम इंसान ही इंसान के दुश्मन हैं... और ऐसे समाज में... बंदूक जैसे हथियार समाज के मापदंड बन गए हैं... जिसके हाथ में बंदूक रहा वह शोषक बन गया... जो बंदूक के आगे रहा वह शोषित बन गया... आंदोलन हमेशा बंदूक के आगे वाला करता है... वह साम्यवाद के लिए शोषक से बंदूक छीनता है... पर फिर उसी बंदूक के प्रभाव में.. खुद शोषक बन जाता है... इसी खेल में... ऐसे कई कुदरती घरौंदे रौंद दिए जाते हैं...

रुप - (एक टक विश्व को सुने जा रही थी) वाव... क्या बात है...

विश्व - संगत का असर है...

रुप - संगत... किसकी संगत...

विश्व - मुझ पर मेरी नकचढ़ी की संगत...

रुप - अच्छा जी... वैसे मैंने क्या कर दिया जो आप इतना प्रभावित हो गए...

विश्व - भुल गईं... उस रेडियो एफएम पर आपने किस तरह से... समाज का एक हिस्सा बताया था...

रुप - ओ..

विश्व - जी

रुप - ठीक है... मैं इस बात की क्रेडिट ले लेती हूँ... पर फिर भी... मैं तुमसे नाराज हूँ...

विश्व - आपकी नाराजगी सिर आँखों पर... पर यह तो बताइए... आप किससे डर कर इस तरफ आ गईं...

रुप - डर... कैसा डर... मैं तो इसलिए तुम्हें यहाँ लेकर आई... ताकि...

विश्व - हाँ ताकि...

रुप - वह कहते हैं ना.....

दुनिया की नजरों से छुपके मिलें...

लगता है डर कोई देख ना लें...

विश्व - ओ... अच्छा.. (अचानक कुछ सोच कर) एक मिनट एक मिनट... कहीं आप वीर और अनु को देख कर तो नहीं भाग आईं...

रुप - क्या.... मतलब तुमने उन्हें देख लिया...

विश्व - नहीं... पर इसका मतलब वह लोग यहीँ कहीं हैं...

रुप - अब मेरा सारा मुड़ फुर्र हो गया है... चलो यहाँ से चलते हैं...

विश्व - क्यूँ...

रुप - कहीं वीर भैया यहाँ आ गए तो...

विश्व - अगर वह अभी तक नहीं आया... तो वह अब भी नहीं आएगा...

रुप - फिर भी... चलोना यहाँ से...

रुप फिर से विश्व की हाथ खिंच कर उठाती है और दोनों अपनी गाड़ी को जहां पर पार्क किए थे वहाँ पहुँच कर जल्दी से गाड़ी में बैठ कर गाड़ी घुमा लेते हैं l गाड़ी के भीतर दोनों खामोश थे l कुछ देर बाद रुप गाड़ी को मुख्य सड़क से निकाल कर एक गली नुमा सड़क पर चलाने लगती है फिर एक जगह गाड़ी रोकती है l

रुप - तुम्हें कैसे मालुम पड़ा...

विश्व - क्या...

रुप - यही की... वीर भैया और अनु भाभी यहाँ पर आए हैं...

विश्व - नहीं बस अंदाजा लगाया...

रुप - कैसे...

विश्व - क्यूंकि हम कल मिले थे... और वीर कह रहा था... की आज का पुरा दिन वह अनु के साथ बिताना चाहता है...

रुप - ओह...

विश्व - क्यूँ आप नहीं चाहतीं... के वीर को हमारे बारे में पता चले...

रुप - नहीं ऐसी बात नहीं है... वीर भैया को मालुम तो है कि मुझे किसीसे प्यार है... मैंने माँ को अनाम बताया है... बस बड़ी भाभी को पुरी बात मालुम है... मैं मौका ढूंढ रही हूँ... जब वीर भैया से तुम्हारे बारे में कहूँ... पर उससे पहले नहीं...

विश्व - ह्म्म्म्म... तो बात यह है... अगर मैं यह कहूँ के... (रुक जाता है)

रुप - हाँ.. के...

विश्व - वीर को हमारे बारे में... पता चल गया है... तो...

रुप - (हैरानी से) क्या... कैसे...

विश्व - वह मेरे बारे में बहुत कुछ जानता है... के मैं एक ऊँचे घराने की लड़की से प्यार करता हूँ... मैं राजगड़ से हूँ... और कल ही उसने... मेरे गर्दन के पीछे गुदा हुआ आपका नाम देख पढ़ लिया था...

रुप - व्हाट....

विश्व - हाँ... आपकी मेहरबानी जो थी... याद है... (अपनी बालों पर हाथ फेरते हुए) आपने मेरे बाल कुतर दिए थे... ताकि आपको आपका नाम मेरे गर्दन पर दिखे... कल ही मुझे वीर के बातों से अंदाजा हो गया था... की उसने मेरे गर्दन के पीछे गुदा हुआ नाम पढ़ लिया था... और वह हमारे बारे में जान गया है...

रुप - ओह...

फिर कुछ देर के लिए दोनों के बीच चुप्पी छा जाती है l रुप की मुट्ठी स्टीयरिंग पर कसने और रगड़ने लगती है l

विश्व - क्या हुआ... डर लग रहा है...

रुप - नहीं... पर... सोच रही हूँ... अगर वीर भैया को मालुम हो गया है... तो उनका विहैव आगे कैसा होगा.... मैं कैसे उनके सामने जाऊँगी...

विश्व - अपने भाई के आप बहुत करीब हो.. और मुझे लगता है... उसे हमारा रिश्ता स्वीकार है...

रुप - ठीक है... देखते हैं... क्या होता है आगे...

कह कर गाड़ी को घुमा कर मुख्य रास्ते पर ले आती है और शहर की और चलने लगती है l

रुप - अच्छा एक और बात पूछूं...

विश्व - जी जरूर...

रुप - उस आदमी का क्या हुआ.. जिसे xxxx जंक्शन पर किन्नरों ने घेरा था...

विश्व - न्यूज नहीं देखा आपने..

रुप - देखा था... पर... मैं तुमसे जानना चाहती हूँ... कहीं इस हरकत से खफा हो कर... वह फिर से स्टॉक करने लगा तो...

विश्व - आप डर रही हो क्या...

रुप - डरे मेरी जुती... पर अगर मान लो वह कुछ करने की कोशिश की तो...

विश्व - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) राजकुमारी जी... मैंने उसके लिए एक मर्यादा का जीवन रेखा खिंच दिया है.... अगर वह बाज नहीं आया... वह मर्यादा रेखा लांघने की कोशिश की.... तो इसकी जीवन रेखा मीट जाएगा... पर आप पर जरा सा भी आंच नहीं आएगा...

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शाम को टोनी अचानक उस कमरे में घुस जाता है जहाँ अनिकेत रोणा ठहरा हुआ था l पर अंदर का दृश्य देख कर उसकी आँखे फटी की फटी रह जाती है l आईने के सामने पुलिस के लिबास में रोणा था पर उसके कान में बालि और नाक में नथ लगा हुआ था l उस वक़्त रोणा अपने होंठ पर लिपस्टिक लगा रहा था l

रोणा - आओ... टोनी आओ... (टोनी की ओर मुड़ कर) ऐसे फटे आँख से क्या देख रहे हो...

टोनी - यह क्या... मेरा मतलब है... ठीक है... आपके जेहन पर चोट गम्भीर लगा है... पर...

रोणा - तु जानता है... मैं यहाँ क्यूँ आया हूँ...

टोनी - (अपना सिर ना में हिलाता है)

रोणा - तुझसे एक काम है... और उस काम को तुझे करना है......

टोनी - साब... आपका मुझ पर बड़ा उपकार रहा है... पर अगर यह काम विश्व के ताल्लुक है... तो माफ़ी चाहूँगा... मैं... मैं नहीं कर सकता...

टोनी के इंकार से रोणा का बांई आँख का भवां तन जाता है l वह अपना पुलिसिया बेल्ट निकाल कर बेल्ट की मेटल वाले लॉक से आईने पर मारता है l आईना कई टुकड़ों में बिखर जाता है l एक बड़ा सा टुकड़ा रोणा नीचे से उठाता है और टोनी खिंच कर उसके गले में लगा देता l यह सब इतना अचानक होता है कि टोनी अगर समझ भी जाता तो वहाँ से भाग चुका होता l पर अब वह रोणा के रहमोकरम पर था l

रोणा - सुन बे भोषड़ी के... साले बांग्लादेशी... मैंने अगर तेरी आइडेंटिटी बदली है... तो उसके सारे सबूतों का एक फाइल भी बना कर रखी है... अगर मैंने उसे थोड़ी देर में फोन नहीं किया... तो वह फाइल सीबीआई के दफ्तर में पहुँच जाएगी...

कह कर रोणा टोनी को छोड़ देता है और एक धक्का देता है l टोनी एक चेयर पर पीठ के बल गिर कर बैठ जाता है l रोणा उसके सामने एक चेयर खिंच कर बैठ जाता है l

रोणा - देख विश्वा ने मुझे क्या बना दिया है... मैं नहीं जानता... मैं औरत तो हूँ नहीं... उसने मर्द छोड़ा नहीं... हिजड़ों में भी मेरी भर्ती होने से रही... इसलिए मैं अकेले में ऐसा बना फिर रहा हूँ... (लहजा अचानक भयंकर हो जाता है) अब बोल... तु करेगा या...

टोनी - साब... करूँगा... पर यह करने के बाद... आपको मुझे एक नई आइडेंटिटी देनी होगी... क्यूँ की... मैं विश्वा को जितना जानता हूँ... वह मुझे कहीं से भी ढूंढ निकालेगा...

रोणा - (गुस्से में चिल्लाते हुए) आ.. ह्ह्ह्ह्... विश्वा.. विश्वा विश्वा... जैसे वह कोई हौव्वा बन गया है...

टोनी - आपके साथ क्या किया... आपने देख तो लिया है...

रोणा - वह इसलिए... के मुझ अकेले के खिलाफ... उसने टीम वर्क से काम लिया... अब बारी मेरी है... मैं उसके खिलाफ अपनी टीम को उतारूंगा... भले ही अंत में मेरा नाम उछले... पर मुझे अब इंतकाम लेना है...

टोनी - ठीक है... पर आपने मुझे अभी तक दुसरे आइडेंटिटी के बारे कुछ कहा नहीं है...

रोणा - (जबड़े सख्त हो जाते हैं) ठीक है... जैसे ही तुम अपना काम पुरा कर दोगे... तुम्हें तुम्हारा नया आइडेंटिटी मिल जाएगा...

टोनी - ठीक है रोणा साब... काम क्या है... कहिये...

रोणा अपने जेब से मोबाइल निकालता है और कई फोटोस दिखाता है, जिसमें रुप प्रतिभा के साथ बात कर रही थी l यह सारे फोटो उसने बार काउंसिल के बार एसोसिएशन चेंबर के बाहर कैंटीन से खिंचा था l रुप की फोटो देख कर टोनी की भवें सिकुड़ जाती हैं l वह सवालिया नजर से रोणा की ओर देखता है l

रोणा - मुझे इस लड़की के बारे में... सब कुछ जानना है... इसकी पुरी कुंडली मुझे लाकर देना है तुझे...

टोनी - बुरा ना माने तो एक सवाल पूछूं...

रोणा - हाँ पुछ ले...

टोनी - विश्वा का इस लड़की से क्या नाता है...

रोणा - यह लड़की विश्वा की माशुका है...

टोनी - क्या... (झटके के साथ अपनी जगह से उठ खड़ा होता है) क.. क.. क्या कहा आपने...

रोणा - बे मादरचोद... यह लड़की विश्वा की माशुका है... इसे अपने नीचे लाकर... मुझे विश्वा से बदला लेना है...

यह सुन कर टोनी की आँखे और मुहँ दोनों खुले के खुले रह जाते हैं l वह जेब से आपना रुमाल निकाल कर अपना चेहरा पोछने लगता है l यह सब रोणा भी देख रहा था, वह चिढ़ कर पूछता है l

रोणा - तुझे भी तो विश्वा से बदला लेना था... अब जब मौका मिला है... तो सोच क्या रहा है...

टोनी - मैं सोच नहीं रहा हूँ... बल्कि अपना अंजाम के बारे में.. इंट्युशन कर रहा हूँ... रोणा साब... मुझसे वादा कीजिए... जैसे ही मैं इस लड़की की डिटेल्स ला कर दूँगा... आप उसी वक़्त मुझे मेरा नया आइडेंटिटी दे देंगे... और यह मेरा आपके लिए आखिरी काम होगा.... उसके बाद ना मैं आपसे मिलूंगा ना ही मुझसे आप...

रोणा - देख लड़कियाँ... औरतें मेरी कमजोरी हैं... उन्हें देख कर मेरी लार टपकती रहती है... पर मैंने विश्वा से भी ज्यादा दुनिया देखी है... कोई भी इंविंसीवल नहीं होता... अगर हम चाल सही चलें... तो विश्वा हमारे सामने कहीं नहीं ठहर पाएगा...

टोनी - मुझे दिलासा मत दीजिए... बस वादा कीजिए... वर्ना मुझसे नहीं होगा...

रोणा - ठीक है... तु भी क्या याद रखेगा... चल वादा किया... यह तेरा आखिरी काम होगा... उसके बाद तु अपना नए आइडेंटिटी को लेकर हिन्दुस्तान में कहीं भी चला जा... ना तु मुझसे मिलेगा... ना मैं तुझसे मिलूंगा...

टोनी - ठीक है साब... आप लड़की के बारे में जितना भी जानते हैं... मुझे कहिये... मैं आगे की जानकारी निकाल लूँगा...

रोणा - गुड... अब आए ना लाइन पे... लड़की का नाम नंदिनी है... उसकी या उसके फॅमिली की एक गाड़ी है... पुरानी फिएट पद्मिनी... गाड़ी का नंबर xxxxxx... शायद उसकी वकालत से कोई नाता है... नहीं भी हो सकता है... उसकी एक्स जैल सुपरिटेंडेंट तापस सेनापति और उसकी पत्नी प्रतिभा सेनापति से अच्छे तालुकात हैं... बस इससे आगे की जानकारी तुझे निकलनी है...

टोनी - जी समझ गया... आपको सारी जानकारी मिल जाएंगी...

रोणा - कितने दिन लगेंगे तुझे...

टोनी - यह आप पर निर्भर है... आप मुझे जितनी जल्दी नई आईडेंटिटी देंगे... उतनी ही जल्दी आपको इस नंदिनी की सारी जानकारी मिल जाएंगी...

रोणा - ओह... ओ... गेम... मुझसे गेम...

टोनी - गेम नहीं रोणा साब... बचाव... मुझे इस मामले में... किसी भी सूरत में... विश्वा के हाथ नहीं लगनी...

रोणा - इतनी फट रही है तेरी...

टोनी - फटी तो आपकी भी थी... भुल रहे हैं आप... उसीकी जानकारी लेने तो महीने भर पहले... मुझे भुवनेश्वर बुलाया था...

रोणा - फटी नहीं थी मेरी... तैयारी करना चाहता था...

टोनी - पर आपकी तैयारी कोई काम नहीं आई होगी... (इस पर रोणा कुछ नहीं कहता) आप मुझे व्हाटस्आप पर फोटो भेज दीजिए...

रोणा बिना देरी किए फोटो को टोनी के मोबाइल पर भेज देता है l फोटो मिल जाने के बाद टोनी बाहर की ओर जाने लगता है, अचानक दरवाजे पर रुक जाता है और रोणा की ओर मुड़ कर

टोनी - रोणा साब... विश्वा के बारे में एक आखिरी बात आपसे कहना चाहता हूँ... वह आपकी नजर में... कंविक्टेड क्रिमिनल है... जिसने लॉ पढ़ा है... पर मैं जितना भी जान सका हूँ... वह लॉ पढ़ा हुआ एक क्रिमिनल है... परफेक्शन के साथ कानून के दायरे में रह कर क्राइम ऐसे करता है... की कानून उसके आगे बेबस हो जाता है...
 
थैंक्स भाई

हाँ अब बहुत जल्द रोणा अपने अंजाम तक पहुँचने वाला है

हाँ पर विश्वा क्या चीज़ है टोनी अच्छी तरह से जानता है

पर जब तक रोणा को समझ में आएगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी

जो विश्वा से जुड़ा हुआ है

उसे छेड़ना कितना खौफनाक हो सकता है

इसकी समझ आते आते

रोणा की जीवन लीला समाप्त हो चुका होगा

मट्टू अकेला नहीं है

उसके पीछे एक जबरदस्त टीम है

जिसके बारे में आगे चलकर पता चलेगा

अब रोणा ने जितना सोच लिया है वही अंतिम है

जैसा कि विश्व ने कहा है

अगला कदम उसकी जीवन रेखा समाप्त कर देगा

यह आगे चलकर पता चलेगा

ना अनु रुप को चौंकाना चाहती थी

बस वीर ने ऐसा होने नहीं दिया

अनु और रुप का रिश्ता नोक झोंक वाला है और एक दुसरे पर हावी होने वाला है

हा हा हा

कोई नहीं बहुत जल्द अनु रुप की क्लास लेते दिखेगी

हाँ यहीं से वीर और अनु के जीवन में भूचाल आने वाला है

भाई थ्रिलर है

थोड़ा सस्पेंश तो रहेगा ही

बस यार आप जुड़े रहो

आगे धीरे-धीरे बहुत धागे खुलने वाले हैं
 
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