Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
10-18-2020, 12:52 PM,
#21
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
एक कोने में कैप्सूल के खोल पडे थे । वो तीन खोल थे जिनमें से दो सफेद थे और एक लाल था । वैसे लाल सफेद कैप्सूल उस नींद की दवा के थे जिसे कि वो देवसरे के कभीकभार के इस्तेमाल के लिये अपने कब्जे में रखता था, लेकिन फिर उसनें महसूस किया कि वो साइज में कदरन छोटे थे ।
उसने एक लाल और एक सफेद खोल उठा कर उन्हें एक दूसरे से जोड़ा तो तसदीक हो गयी कि वो देवसरे वाले कैप्सूलों से छोटा था ।
एक सफेद खोल अभी और बाकी था जिसका लाल वाला हिस्सा उसे कहीं न मिला । जरूर वो किसी के जूते के तले के साथ चिपक कर वहां से चला गया था ।
बहरहाल ये अब सुनिश्चित था कि दो कैप्सूल वहां खोले गये थे, उनके भीतर की दवा निकाली गयी थी और खाली खोलों को चुपचाप मेज के नीचे फेंक दिया गया था ।
वो उठ कर सीधा हुआ, उसने जेब से निकाल कर एक बीस का नोट टेबल पर रखा, उसके ऊपर टार्च रखी, बूथ से बाहर निकाला और कैसीनो में पहुंचा ।
कैसीनो में तब पहले जैसी भीड़ नहीं थी लेकिन वो खाली भी नहीं था । ताश के रसिया वहां से रुख्सत हो चुके थे लेकिन रॉलेट टेबल के गिर्द अभी भी चन्द लोग मौजूद थे जिनमें से कुछ दांव लगाने वाले थे तो कुछ दर्शक थे । वहां क्रूपियर के पहलू में आरलोटो भी मौजूद था जो कि उसे देख कर मुस्कराया ।
उस मुस्कराहट से ही मुकेश को अहसास हो गया कि रिजॉर्ट में हुए वाकये की उसे खबर नहीं थी, बाहर बैठे उसके बॉस ने भी उसे कत्ल की बाबत कुछ नहीं बताया था ।
“कैसा चल रहा है ?” - मुकेश ने निरर्थक सा प्रश्न किया ।
“बढिया ।” - उसने, प्रत्याशित, जवाब दिया ।
“तुम्हारा बॉस यहां नहीं आता ?”
“आता है । क्यों नहीं आता ? आखिर बॉस है । मालिक है ।”
“आज आया था ?”
“हां ।”
“कब ?”
“कोई पौने ग्यारह बजे ।”
“तब मिस्टर देवसरे अभी यहीं थे या जा चुके थे ?”
“जा चुके थे । बॉस इधर पौने ग्यारह बजे आया था । मेरे को पक्की तब मिस्टर देवसरे इधर नहीं थे ।”
“टाइम कैसे याद रहा ? पिछली बार तो तुम अपने आपको इतना बिजी बता रहे थे कि टाइम को वाच करके नहीं रख सके थे ?”
“मिस्टर देवसरे के इधर से जाने के टेम को वाच करके नहीं रख सका था । बॉस के इधर आने का टेम मेरे को और वजह से याद है । वो क्या है कि साढे दस बजे इधर एक भीड़ू आया था । मैं बोले तो ही वाज लोडिड विद मनी । साथ में एक फिल्म स्टार का माफिक पटाखा बाई था जिसको इम्प्रैस करने का वास्ते बहुत रोकड़ा चमका रहा था । इधर पहुंचते ही पूरा ट्रे भर के लार्ज वैल्यूज का टोकन लिया और रॉलेट पर बड़े बड़े दांव लगाने लगा । पहले तो वो काफी रोकड़ा लूज किया पण एकाएक वो जीतने लगा, उसका चूज किया हर नम्बर लगने लगा ।”
“जजमेंट की बात है ।”
“व्हील की तरफ तो ठीक से देखता नहीं था, ऐसीच कोई सा नम्बर लगा देता था ।”
“फिर तो इत्तफाक की बात है ।”
“इधर लिमिट का गेम होता है । जब वो जितने लगा तो लिमिट से ऊपर दांव लगाने की जिद करने लगा । मैं बोला लिमिट का गेम था, नहीं होना सकता । वो नशे में गलाटा करने लगा । तभी बॉस इधर आया । बॉस उस भीड़ के इधर पहुंचने के पन्द्रह मिनट बाद आया था इस वास्ते मैं सेफली बोला कि वो पौने ग्यारह बजे इधर आया था ।”
“आई सी ।”
“तब तक वो नब्बे हजार रुपये जीत चुका था । बॉस को जब ये पता चला था तो उसके होश उड़ गये थे ।”
“मुझे तुम्हारे कैसीनो के दस्तूर मालूम नहीं । किसी का नब्बे हजार रुपया जीत जाना होश उड़ाने वाली बात होती है ?”
“ऐसा पन्द्रह मिनट में हो जाये तो होती है । ऊपर से उसका विनिंग फेज अभी चल रहा था । और ऊपर से वो लिमिट से ऊंचे दांव लगाना चहता था ।”
“आखिरकार क्या हुआ ?”
“नो लिमिट गेम को बॉस भी नक्की बोला । न बोलता तो क्या पता वो अकेला आदमी ही आज कैसीनो लूट के ले जाता ।”
“आखिरकार क्या हुआ था ?”
“वो नाराज हो गया था, उसने अपने टोकन कैश कराये थे और कैसीनो को कोसता इधर से नक्की कर गया था ।”
“महाडिक को नब्बे हजार की चोट देकर ।”
“ये तो मामूली चोट थी । पिछले हफ्ते दिनेश पारेख आया था तो वो बैंकरप्ट ही कर गया था ।”
“अच्छा ! वो कितना जीता था ?”
“ग्यारह लाख ।”
“क्या ! लिमिट के गेम में इतनी बड़ी जीत की गुंजायश होती है ?”
“नहीं होती लेकिन वो स्पेशल गैस्ट थे । उसने जब नो लिमिट गेम की मांग की थी तो उसको रिस्पैक्ट देने के लिये बॉस को उसकी मांग कबूल करनी पड़ी थी ।”
“तुम कहते हो गैस्ट की नब्बे हजार की जीत ने बॉस के होश उड़ा दिये थे, ग्यारह लाख गये तो कुछ न हुआ ?”
“बॉस से ही पूछ लो ।”
“क्या मतलब ?”
“ही जस्ट गाट इन ।”
मुकेश ने घूम कर देखा तो महाडिक को अपनी तरफ बढते पाया ।
महाडिक करीब पहुंचा, उसने नेत्र सिकोड़ कर मुकेश को देखा और फिर बोला - “क्या बात है ? नींद नहीं आयी ?”
“कार लेने आया था ।” - मुकेश लापरवाही से बोला - “थोड़ी देर को भीतर चला आया ।”
“कार ?”
“मिस्टर देवसरे की ।”
“वो यहां थी ?”
“हां । वो क्या है कि मीनू उन्हें उनकी कार पर रिजॉर्ट में छोड़ कर आयी थी और कार यहां वापिस ले आयी थी ताकि वो मेरे काम आ पाती लेकिन पार्किंग की भीड़ में मुझे पता नहीं लगा था कि कार जा के वापिस लौट आयी थी । अब पता लगा तो मुझे कार का लावारिस यहां खड़ा रहना मुनासिब न लगा इसलिये लेने आ गया ?”
“बस, यही वजह है तुम्हारे वापिस लौटने की ?”
“और क्या वजह होगी ?”
“तुम बताओ । सवाल मैंने पूछा है ।”
“और कोई वजह नहीं ।”
“हूं ।”
“अब एक सवाल मैं पूछूं ?”
“पूछो ।”
“दिनेश पारेख कौन है ?”
“कौन है क्या मतलब ?”
“क्या करता है ? तुम उसे कैसे जानते हो ?”
“वही करता है जो मैं करता हूं । मेरा हमपेशा है इसलिये जानता हूं ।”
“हमपेशा ? वो भी ऐसी ही क्लब चलाता है ?”
“हां । लेकिन बड़े स्केल पर । बड़ी जगह पर । उसका कैसीनो यहां से चार गुणा बड़ा है अलबत्ता बार यहां जितना ही बड़ा है । उसके गोवा में भी दो कैसीनो हैं । ही इज ए बिग आपरेटर ।”
“हू नाओ वांट्स टु बिकम बिगर आपरेटर ।”
“क्या बोला ?”
“वो ये जगह खरीदने का तमन्नाई था जो जाहिर है कि जितने कैसीनो उसके पास हैं उनमें एक का इजाफा हो जायेगा । नहीं ?”
महाडिक तिलमिलाया ।
“पारेख से पूछना ।” - वो उखड़े स्वर में बोला ।
फिर उसने जानबूझ कर मुकेश की तरफ से पीठ फेर ली ।
***
मुकेश की नींद खुली ।
उसकी घड़ी पर निगाह पड़ी तो उसके छक्के छूट गये ।
साढे दस बज चुके थे ।
वो झपट कर बिस्तर में से निकला और कॉटेज के दूसरे हिस्से में पहुंचा जहां कि टेलीफोन था । उसने टेलीफोन पर नकुल बिहारी आनन्द के लिये अर्जेन्ट पी.पी. कॉल बुक कराई और लौट कर बाथरूम में दाखिल हुआ ।
बीस मिनट में वो शिट शेव शावर से निवृत हुआ । फिर उसने ‘सत्कार’ में फोन करके ब्रेकफास्ट मंगाया ।
वो चाय का आखिरी घूंट पी रहा था जब ट्रककॉल लगी ।
“मैं माथुर बोल रहा हूं ।” - अपने बॉस की सैक्रेट्री को लाइन पर पाकर वो बोला - “प्लीज पुट मी टु बिग बॉस ।”
“मिस्टर माथुर, आपकी तो ग्यारह बजे कॉल आनी थी । इस वक्त तो सवा ग्यराह बजने को हैं ।”
“मैं जिस फोन से बोल रहा हूं, उसमें एस.टी.डी. की सुविधा नहीं है । कॉल बुक करानी पड़ी जो कि अभी लगी ।”
“आपको किसी एस.टी.डी. वाले फोन पर जा के खुद कॉल लगानी चाहिये थी ।”
“हनी, ये वो बातें हैं जो तुम्हारे बॉस को कहनी शोभा देती हैं, तुम अपना काम करो ।”
“डोंट यू हनी मी ।”
“अरी चुड़ैल, बात करा ।”
“क... क्या ! क्या कहा ?”
“मैंने कुछ नहीं कहा । कोई बीच में बोला ।”
“ऐसा कैसे हो सकता है ?”
“हो रहा है । गौर से सुनो, मुझे भी कोई शैतान कहता लग रहा है ।”
“क्रॉस टॉक हो रही है ?”
“हां । नाओ डोंट गैट क्रॉस विद मी एण्ड लेट मी टाक टु दि बॉस ।”
“होल्ड आन ।”
“थैंक्यू ।”
फिर उसके कान में नकुल बिहारी आनन्द की आवाज पड़ी ।
“माथुर ?”
“गुड मार्निंग, सर ।”
“मैं ग्यारह बजे से तुम्हारी कॉल का इन्तजार कर रहा हूं ।”
“सर, कॉल शोलापुर से होकर आ रही है न इसलिये लेट हो गयी ।”
“क्या ?”
“सर, ट्रंक आपरेटर कहती थी कि इस रूट की तमाम ट्रंक लाइन्स डाउन हैं इसलिये आल्टरनेट रूट वाया शोलापुर बनाना पड़ा था और इसलिये आवाज आप तक पहुंचने में देर हो गयी ।”
“आई डोंट अन्डरस्टैण्ड...”
“इस उम्र में ऐसा हो जाता है, सर ।”
“किस उम्र में ? कैसा हो जाता है ?”
“समझदानी सिकुड़ जाती है इसलिये कोई बात समझ में न आना आम हो जाता है ।”
“माथुर ! ये तुम्हीं बोल रहे हो न ?”
“मैं तो सर गुड मार्निंग कहने के बाद से चुप हूं और इन्तजार कर रहा हूं गुड मार्निंग कुबूल होने का ।”
“तुम्हारा मतलब है फिर क्रॉस टाक हो रही है ?”
“ऐसा ही जान पड़ता है, सर । लाइन वाया शोलापुर लगी है इसलिये इस बात की और भी ज्यादा गुंजायश है ।”
“यू नैवर माइन्ड दैट एण्ड लैट्स कम टु दि प्वायान्ट ।”
“यस, सर ।”
“मैंने एक्सप्रैस के लेट सिटी एडीशन में पढा है कि मिस्टर देवसरे का मर्डर हो गया है ।”
“ठीक पढा है, सर ।”
“लेकिन मर्डर ! सुसाइड नहीं, मर्डर !”
“उनका दांव नहीं लगा, सर, पहले ही कोई अपना काम कर गया ।”
“मैंने पढा है कि उन्हें शूट किया गया है ?”
“जी हां ।”
“किसने किया ?”
“अभी पता नहीं चल सका ।”
“यानी कि मडर्रर पकड़ा नहीं गया ?”
“अभी नहीं, सर ।”
“ऐसा क्योंकर हो पाया ? जब तुम मिस्टर देवसरे के साथ थे तो...”
“कत्ल के वक्त मैं उनके साथ नहीं था ।”
“क्यों ? क्यों साथ नहीं थे ? उधर काम क्या था तुम्हारा ?”
“गोली और मकतूल के बीच खड़ा होना ।”
“क्या ?”
“सर, अगर मैं उनके साथ नहीं था तो उसमें वजह मैं नहीं, वो खुद थे । वो मुझे धोखा देकर खिसक गये, जैसा कि उन्हें नहीं करना चाहिये था ।”
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#22
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“क्यों किया उन्होंने ऐसा ?”
“शरारतन किया । मसखरी मारी । बचपना दिखाया । बेवजह मेरी पोजीशन खराब की । मेरे शर्मिन्दा होने का सामान किया ।”
“माथुर, अपना रोना रोना बन्द करो ।”
“यस, सर ।”
“और कुबूल करो कि एक निहायत मामूली काम को तुम ठीक से अंजाम न दे सके । तुम हमारे क्लायन्ट के साथ होते...”
“तो मैं भी मरा पड़ा होता । तो पुलिस ने एक ही जगह दो लाशें बरामद की होतीं ।”
“यू आर एब्सोल्यूटली रांग । तो मडर्रर की गोली चलाने की मजाल न हुई होती ।”
“क्यों न हुई होती ? मेरे पास तोप थी अपनी और क्लायान्ट की हिफाजत के लिये ?”
“तोप ? तोप की क्या स्टोरी है ? वहां गन के साथ साथ तोप भी चली थी ?”
“नो, सर ।”
“तो तोप का जिक्र क्यों किया ?”
“मैंने कहा था कि होती तो चलती ।”
“एण्ड अनदर थिंग । अखबार में फर्म का नाम फिर गलत छपा है । पिछली बार गोवा वाले केस में भी ऐसा ही हुआ था । आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स में से एक आनन्द ड्रॉप कर दिया गया था ।”
“जरूर इस बार दो आनन्द ड्राप कर दिये होंगे ।”
“नहीं । इस बार एक आनन्द ऐड कर दिया गया है, फालतू लगा दिया गया है, फर्म के नाम को आनन्द आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स बना दिया गया है ।”
“सर, ये तो खुशी की बात है कि आनन्द ही आनन्द हो गया है ।”
“नो । दैट इज ए ग्रेव मिस्टेक । अखबार में फर्म का नाम छपे तो करैक्ट छपना चाहिये ।”
“अरे कमीने ! एक आदमी जान से चला गया और तेरे को फर्म के नाम की पड़ी है ।”
“माथुर, ये मुझे क्या सुनायी दे रहा है ?”
“सर, क्रॉस टाक हो रही है ।”
“फिर ?”
“फिर ।”
“ऐज बिफोर ?”
“ऐज बिफोर ।”
“ओह माई गॉड, इस क्रॉस टाक से कैसे पीछा छूटेगा ?”
“सर, जो बात पीछा न छोड़े उसे नजअन्दाज करना चाहिये । कोई बीच में बोलता है तो बोलने दीजिये । आप उसकी तरफ ध्यान मत दीजिये । वो भी तो ध्यान नहीं दे रहा ।”
“क्या मतलब ?”
“उसे भी तो क्रॉस टाक सता रही होगी, वो तो शिकायत नहीं कर रहा ।”
“मे बी यू आर राइट । लेकिन माथुर, वाट इज दिस, तीन मिनट की ट्रंककॉल में इतना वक्त तो फिजूल की बातों में जाया हो गया ।”
“सर, मुझे मालूम था कि ऐसा होगा इसलिये मैंने पहले ही कॉल छ: मिनट की बुक कराई है ।”
“माथुर, यू आर वेस्टिंग मनी ।”
साले, तेरे बाप ने पैसा देना है ? कॉल मैंने बुक कराई है और फोन देवसरे का है ।
“माथुर ?”
“यस, सर ।”
“ऐसा क्यों होता है कि जहां भी मैं तुम्हें भेजता हूं वहां मर्डर हो जाता है ।”
“इत्तफाक से होता है, सर । मर्डर वहां भी तो होते हैं जहां आप मुझे नहीं भेजते ।”
“और मर्डर भी किस का ? खुद हमारे क्लायन्ट का । पहले फिगारो आइलैंड पर मिसेज नाडकर्णी का हुआ, अब मिस्टर देवसरे का हो गया । ऐसे तो आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स का ऊंचा नाम....”
“इतना ऊंचा उठ जाये कि सातवें आसमान पर पहुंच जाये, सारे के सारे आनन्द जा के भगवान की गोद में बैठ जायें ।”
“क्या बोला ? जरा ऊंचा बोलो, भई, मुझे सुनाई नहीं दे रहा है ।”
“सर, कान में सुरमा डालने से ये शिकायत दूर हो जाती है ।”
“सुरमा ! कान में ! सुरमा तो आंख में डाला जाता है ।”
“आजकल कौन डालता है आंख में सुरमा ! आपने देखा कभी किसी को आंख में सुरमा डालते ?”
“नहीं ।”
“सो देयर यू आर ।”
“वेयर आई एम ?”
“इन दि एग्जीक्यूटिव ऑफिस ऑफ आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स, सर ।”
“माथुर, यू आर वेस्टिंग टाइम ।”
“आई कैन नाट डेयर, सर । टाइम इज मनी । पर्टिकुलरली आन ए ट्रंककॉल ।”
“दैन लिसन टु मी ।”
“यस, सर । शूट ।”
“शूट ! शूट हूम ?”
“सर, दैट्स ए फिगर आफ स्पीच । आई मीन, प्लीज स्पीक, आई एम लिसनिंग विद फुल अटेंशन ।”
“बीईंग जूनियर मोस्ट पार्टनर, दैट्स एक्सपैक्टिड आफ यू ।”
“यस, सर ।”
“अभी सुबह मुझे पसारी ने बताया है कि कुछ दिन पहले हमारे क्लायन्ट ने उससे अपनी वसीयत तैयार करवई थी जिसमें उसने अपनी आधी सम्पति का वारिस तुम्हें बनाया है । माथुर, ऐसा क्योंकर हुआ ? क्योंकर तुम उसे इसके लिये तैयार कर पाये ?”
“सर, मैंने कुछ नहीं किया ।”
“फर्म के किसी क्लायन्ट को उसकी वसीयत मे अपना नाम जोड़ने के लिये - वो भी इतना प्रामीनेंटली - उकसाना ग्रेव प्रोफेशनल मिसकंडकट है...”
अबे सुन तो सही, मेरे बाप ।
“....विच इज अनपार्डनेबल इन दि फर्म आफ आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स ।”
“सर, मुझे तो उस वसीयत की खबर तक नहीं थी । कल रात को इधर के इनवैस्टिगेटिंग आफिसर ने मिस्टर पसारी के घर पर फोन लगाया था तो वसीयत की और उसके प्रोविजंस की बात उजागर हुई थी ।”
“दैट इज वाट यू से ।”
“आफकोर्स दैट इज वाट आई से । आपको अपने सबार्डीनेट की बात पर एतबार लाना चाहिये ।”
आगे से आवाज न आयी ।
“मिस्टर देवसरे मेरे से बेजार थे, उन्होंने तो मुझे वापिस बुला लिये जाने तक की बात की थी । ऐसा आदमी क्यों भला मुझे अपनी वसीयत में बैनीफिशियरी बनायेगा ? और वो भी थोड़ी बहुत नहीं, आधी जायदाद का !”
“तुम बताओ, क्यों बनायेगा ?”
“कोई वजह नहीं ।”
“फिर भी उसने ऐसा किया ।”
“हैरानी है । पता नहीं मेरे में उसे क्या भा गया जो...”
“कुछ नहीं भा गया । भा जाने लायक क्या है तुम्हारे में ?”
“सर...”
“कौन मानेगा कि उसने अपनी मर्जी से ऐसा किया । इस बात को जो भी सुनेगा, यही नतीजा निकालेगा कि किसी फ्रॉड के तहत उससे ऐसा कराया गया था ।”
“लेकिन सर...”
“अभी और सुनो । कल उसने पसारी को फोन करके बोला था कि वो अपनी वसीयत तब्दील करना चाहता था । तुम हर वक्त उसके साथ रहते थे इसलिये जरूर तुम्हें उसकी उस कॉल की खबर होगी ।”
“मुझे नहीं थी ।”
“नहीं थी तो ये भी तुम्हारे लिये डिस्क्रेडिट है ।”
“इस मामले में मैं फांसी पर टांग दिये जाने के काबिल शख्स हूं, आप आगे बढिये ।”
“कहां अगे बढूं ? मैं क्या मार्निंग वाक पर निकला हुआ हूं ?”
“ओफ्फोह ! अपनी बात कहिये ।”
“बात थ्योरिटिकल है ।”
गोली लगे कम्बख्त को । कुर्सी पर बैठा बैठा मर जाये । अगली सांस न आये ।
“आप कहिये तो सही ।”
“थ्योरी ये है कि जब तुम्हे्ं पता चला कि हमारा क्लायन्ट अपनी वसीयत तब्दील करने जा रहा था तो उसके ऐसा कर पाने से पहले ही तुम्हीं ने उसका काम तमाम कर दिया ताकि उसकी जायदाद का आधा हिस्सा तुम्हारे हाथों से न निकल जाता ।”
हे भगवान ! ये मेरा एम्पलायर है या शैतान ! मेरा वैलविशर है या दुश्मन !
“आपको मेरे से ये उम्मीद है ?”
“माथुर, मैंने पहले ही बोला है कि बात थ्योरिटिकल है । मैंने अपनी सोच बयान नहीं की है, मैंने तुम्हें ये बताया है कि लोग क्या सोचेंगे ।”
“भाड़ में जायें लोग और आप भी उनके साथ ही चले जाइये ।”
“क्या ? क्या कहा ?”
“मैंने कुछ नहीं कहा, सर । शायद फिर कोई बीच में कुछ बोला ।”
“फिर क्रास टाक ? “
“यस, सर ।”
“कुछ साफ भी तो नहीं सुनाई देता कभी कभी ।”
“मेरे इधर भी ऐसा ही है, सर । जो कमीना बीच में बोल रहा है, वो लगता है कि जानबूझ कर साफ नहीं बोलता ।”
“मुझे तो कुछ और ही शक हो रहा है ।”
“मुझे भी हो रहा है लकिन उस बाबत ट्रंककॉल पर बात करना मुनासिब नहीं होगा ।”
“मे बी यू आर राइट ।”
“मिस्टर देवसरे ने बताया था कि वो वसीयत में क्या तब्दीली करना चाहते थे ?”
“नहीं ।”
“तो फिर आपको कैसे मालूम है कि उनका मुझे वसीयत से बेदख्ल करने का इरादा था ।”
“और क्या इरादा होगा ?”
“और इरादा मेरा हिस्सा बढाने का हो सकता था, हिस्सा अभी आधा है, उसे पौना या पूरा ही करने का हो सकता था ।”
“माथुर, यू आर टाकिंग नानसेंस ।”
“सर, मैं....”
“एण्ड यू आर अज्यूमिंग फैक्ट्स नाट इन एवीडेंस ।”
“मेरी ऐसी हिम्मत कहां ? मेरे मे ऐसी काबलियत कहां ?”
“काबलियत वाली तुम्हारी बात से मैं सहमत हूं । मुझे खुशी है कि तुमने अपने आपको इतना करैक्टली असैस किया है ।”
“मुझे आपकी खुशी से खुशी है । अब बताइये मेरे लिये क्या हुक्म है ?”
“तुम्हारे लिये हुक्म ? “
“जिस शख्स की निगाहबीनी के लिये मुझे तैनात किया था वो दुनिया छोड़ गया । लिहाजा आप इजाजत दें तो मैं वापिस लौट आऊं ?”
“यू विल डु नो सच थिंग ।”
“सर, अब यहां मेरी मौजूदगी बेमानी है । ऊपर से मेरी बीवी प्रेग्नेंट है....”
“तुम्हें बाप बनने की इतनी जल्दी नहीं होनी चाहिये थी ।”
सत्यानाश हो तेरा । आज ही पाकिस्तान से वार छिड़ जाये और पहला बम तेरे ऑफिस में फूटे ।
“तुम अभी वहीं रहोगे और मालूम करने की कोशिश करोगे कि हमारे क्लायन्ट का कत्ल अगर तुमने नहीं किया तो किसने किया ?”
“मैं ! मैं करूंगा ?”
“वहां मीडिया के लोग भी जरूर पहुंचेगा । ताकीद रहे कि तुम प्रेस को कोई बयान दोगे तो ये बात तुम सुनिश्चित करोगे कि अखबारों में फर्म का नाम ठीक छपे । नो आनन्द शुड बी डिलीटिड । नो आनन्द शुड भी ऐडिड ।”
“सर, आप फिक्र न करें, मैं प्रेस को बहुत ठीक से समझा दूंगा कि निरोध की तरह आनन्द भी तीन तीन की पैकिंग में आते हैं ।”
“क्या, माथुर, तुम ये क्या....”
“युअर सिक्स मिनट्स आर अप, सर ।” - बीच में आपरेटर की आवाज आयी ।
“ओके । माथुर, फालो इंस्ट्रक्शंस एण्ड रिपोर्ट रेगुलरली । दैट्स एन आर्डर ।”
“यस, सर ।”
“नाओ गैट ऑफ दि लाइन । आनन्द आनन्द आनन्द एण्ड एसोसियेट्स की कोई लाइन सुबह सवेरे ही इतनी देर बिजी....”
लाइन कट गयी ।
मुकेश ने टेलीफोन क्रेडल पर पटका और कॉटेज से बाहर निकला । उसने कम्पाउन्ड में कदम डाला और उधर बढा जिधर देवसरे की एस्टीम खड़ी थी ।
“मिस्टर माथुर ?”
वो ठिठका, उसने घूमकर आवाज की दिशा में देखा तो पाया उसे मिसेज वाडिया पुकार रही थी ।
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10-18-2020, 12:58 PM,
#23
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
मिसेज वाडिया कोई साठ साल की पारसी महिला थी जो कि पिछले दो हफ्ते से उस रिजॉर्ट में थी । उसका तकरीबन टाइम बीच पर आराम फरमाते, नावल पढते या आसपास तांकझांक करते गुजरता था । ऐसा कभी नहीं हुआ था कि कोई खिड़की खुली हो तो वो भीतर न झांके, कोई गुफ्तगू हो रही हो तो वो सुनने की कोशिश न करे, किसी से कोई मिलने आया हो तो उसकी बाबत जानने की कोशिश न करे ।
“यस, मैडम ।” - वो बोला ।
“फार वन मिनट इधर आना सकता ?”
“आता है, मैडम ।”
वो उसके कॉटेज की तरफ बढा । वो करीब पहुंचा तो मिसेज वाडिया घूम कर भीतर कॉटेज में दाखिल हो गयी । मजबूरन उसे भी कॉटेज के भीतर जाना पड़ा ।
“प्लीज सिट डाउन ।” - वो बोली ।
“थैंक्यू, मैडम ।”
मिसेज वाडिया ने बाईफोकल्स में से उसका मुआयना किया और फिर बोली - “ढीकरा, तुम मरने वाले के बहुत क्लोज था इसलिये मेरे को फीलिंग आया कि मेरे को तुमसे बात करना मांगता था ।”
“किस बारे में ?”
“पहले मेरे को मालूम नहीं था कि मिस्टर देवसरे मालिक था इस रिजॉर्ट का - मालूम होता तो मैं उससे डिस्काउन्ट के लिये बात करता - ये तो बिल्कुल ही नहीं मालूम था कि वो ब्लैक पर्ल क्लब का भी मालिक था ।”
“अब कैसे मालूम हुआ ?”
“सुनने को मिला । बहुत लोग बात करता था इधर । जब से मर्डर हुआ है, हर कोई उसी का बात ही तो करता है ।”
“आई सी ।”
“वैरी रोमांटिक, वैरी कलरफुल पर्सन, दिस मिस्टर देवसरे । नो ?”
“आई डोंट अन्डरस्टैंड, मैडम ।”
“कल रात को एक ढीकरी के साथ आया । स्मार्ट लिटल गर्ल । हाफ हिज एज । कोई बोला उधर ब्लैक पर्ल में सिंगर होना सकता । कैसे आजकल को छोकरी लोग अपना फादर का एज का पर्सन का साथ....”
“मैडम” - मुकेश तीखे स्वर में बोला - “आप बिल्कुल गलत समझ रही हैं । मिस्टर देवसरे ऐसे आदमी नहीं थे । अब जबकि वो इस दुनिया में नहीं हैं, उनके बारे में ऐसी बातें करना जुल्म है ।”
“मैं जो देखा वो बोला ।”
“नहीं, वो नहीं बोला । आपने देखे का जो मतलब निकाला वो बोला । इसलिये जो बोला वो गलत बोला, नाजायत बोला । वो लड़की - मीनू सावन्त - उन्हें सिर्फ क्लब से यहां पहुंचाने आयी थी । मिस्टर देवसरे बहुत कैरेक्टर वाले आदमी थे और आजकल भारी फिजीकल और मेंटल टेंशन के दौर से गुजर रहे थे । आप उनकी पर्सनल ट्रेजेडी से वाकिफ होती तो ऐसा हरगिज न कहतीं ।”
“हिज ओनली डाटर । एक्सीडेंट में गया । मेरे को मालूम ।”
“आपने यही बताने के लिये मुझे बुलाया ?”
“नहीं, ढीकरा । वो डिफ्रेंट बात है ।”
“वो क्या बात है ?”
“दिस मिस्टर घिमिरे । इधर का मैनेजर । नाइस मैन । मेरे को पसन्द । वैरी पोलाइट, वैरी हैल्पफुल, वैरी डीसेंट पर्सन । मैं इमेजिन नहीं कर सकता कि वो मर्डरर होगा पण क्या पता चलता है आज का सिनफुल वर्ल्ड में ?”
“मिस्टर घिमिरे की क्या खास बात है ?”
“बात तो है, ढीकरा, अब पता नहीं खास है या नहीं ।”
“कैसी भी क्या बात है ? कुछ कहिये तो सही ।”
“मैं कल रात उसको मिस्टर देवसरे के कॉटेज में जाता देखा । दैट इज विद माई ओन आइज ।”
मुकेश ने अवाक वृद्धा की तरफ देखा ।
“कब - देखा ?” - फिर उसने सस्पेंसभरे स्वर में पूछा - “क्या टाइम था उस वक्त ?”
“इलैवन ओ क्लाक से कोई फिफ्टीन मिनट्स पहले का टेम था ।”
“आपने मिस्टर घिमिरे को कॉटेज के दायें, मिस्टर देवसरे वाले विंग में दाखिल होते देखा था ?”
“नो । मैं इतना टांग झांग नहीं करना मांगता ।”
“तांक झांक ।”
“स्नूपिंग नहीं करना मांगता । स्नूपिंग इज ए बैड हैबिट, यू नो !”
मुझे तो मालूम है, अम्मा, लेकिन तुझे नहीं मालूम ।
“तो क्या देखा था ?”
“डोर की ओर बढते देखा था ।”
“लेकिन भीतर दाखिल होते नहीं देखा था ?”
“नो ।”
“आखिरकार दरवाजे के कितने करीब देखा था ।”
“ही वाज क्लोजर बाई थ्री स्टैप्स । आर फोर । मे बी फाईव । इससे ज्यास्ती नक्को ।”
“लेकिन भीतर जाते नहीं देखा था ?” - मुकेश ने फिर जिद की ।
“ढीकरा, इतनी नाइट में जब वो इधर जा रहा था तो और किस वास्ते जा रहा था ? और क्या था उधर ?”
“कहां से किया था आपने ये नजारा ?”
मिसेज वाडिया ने एक खिड़की की तरफ इशारा किया ।
मुकेश उस खिड़की पर पहुंचा । उसने नोट किया कि वो खिड़की ऐसी पोजीशन में थी कि उसमें से देवसरे के कॉटेज की राहदारी तो दिखाई देती थी लेकिन कॉटेज का प्रवेशद्वार नहीं दिखाई देता था । इसका मतलब था कि उस औरत ने तांक झांक में अपने तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी, घिमिरे को ऐन दरवाजे पर पहुंचते उसने नहीं देखा था तो इसलिये कि वो देख सकती ही नहीं थी ।
लेकिन एक बात उसकी सच थी ।
अगर घिमिरे कॉटेज में जाने का तमन्नाई नहीं था तो कॉटेज की राहदारी में भी क्यों था ?
“कोई मेरे को बोला” - मिसेज वाडिया कह रही थी - “कि तुम मिस्टर देवसरे का फ्रेंड ही नहीं एडवोकेट भी है । अब मैं तुमसे ये एडवाइस मांगता है कि मेरे को ये बात पुलिस को बोलना सकता या नहीं बोलना सकता ?”
“मैडम, इस बाबत मैं आपको कोई सलाह देने की पोजीशन में नहीं हूं क्योंकि मैं खुद मर्डर सस्पैक्ट हूं ।”
“इज दैट सो ?” - वो नेत्र फैलाती बोली ।
“सो यू लैट युअर कांशस बी युअर गाइड ।”
“इज दैट युअर कनसिडर्ड, एडवोकेट लाइक, ओपीनियन ?”
“यस, मैडम । मेरी राय में आप बिना कोई जल्दबाजी किये शान्ति से इस बात पर विचार कीजिये और फिर अपने विवेक से काम लीजिये ।”
“हूं ।”
“जब आप मिस्टर घिमिरे को नाइस मैन बोलती हैं तो....”
“ही श्योर इज ए नाइस मैन । उच्च दराज का....”
“जी !”
“आफ हाई इन्टैग्रिटी ।”
“ओह ! ऊंचे दर्जे का । जब ये मानती हैं तो, मैडम क्यों सोचती हैं कि मिस्टर घिमिरे कातिल होंगे ?”
“पण ढीकरा...”
“सोचिये । विचारिये । और फिर कोई फैसला कीजिये । ताकि बाद में आपको कोई गिला न हो कि आपने जो किया जल्दबाजी में किया । और अब मुझे इजाजत दीजिये ।”
मिसेज वाडिया का सिर मशीन की तरह सहमति में हिला ।
***
मुकेश थाने पहुंचा ।
इन्स्पेक्टर सदा अठवले वहां अपने ऑफिस में मौजूद था ।
“आओ, भई ।” - वो बोला - “सब लोग थाने में हाजिरी भर गये, एक तुम्हारी ही कसर रह गयी थी ।”
“मुझे ऐसा कोई हुक्म नहीं हुआ था ।” - मुकेश बोला ।
“हुक्म तो उन्हें भी नहीं हुआ था लेकिन पढे लिखें लोग हैं न, इसलिये हर कोई खुद ही अपने आपको पाक साफ साबित करना चाहता था ।”
“लिहाजा मैं इत्तफाक से यहां न आ गया होता तो ये मरे पर इलजाम होता कि एक मैंने ही ऐसी कोई कोशिश नहीं की थी ?”
“बैठो ।”
“शुक्रिया ।”
“चाय पियोगे ?”
“नहीं, शुक्रिया । मैं अभी हैवी ब्रेकफास्ट करके आया हूं ।”
“एक्सपेंस एकाउन्ट में ?”
मुकेश हंसा
“सारी रात मैं तुम्हारी बाबत सोचता रहा कि क्यों मकतूल ने तुम्हें अपना बैनीफिशियेरी बनाया ?”
“कुछ सूझा ?”
“नहीं सूझा । सिवाय उस बात के जिसे कि वो लड़का विनोद पाटिल भी हवा दे रहा था ।”
“कि मैंने मकतूल को ठग लिया ?”
“मैंने तुम्हारी फर्म की बाबत दरयाफ्त किया है । बहुत रुतबे और इखलाक वाली फर्म बतायी जाती है वो । इसलिये यकीन नहीं आता कि उसका कोई पार्टनर ऐसी हरकत कर सकता है ।”
“नहीं कर सकता । नहीं की ।”
“भई, शक करना मेरा काम है, मैं शक किये बिना नहीं रह सकता ।”
“शक से काम चलता है पुलिस का ?”
“मुकम्मल काम तो नहीं चलता लेकिन पहला कदम रखने की जगह तो मिलती है ।”
“ये भी ठीक है । तो अब आप मेरे पीछे पड़ेंगे ।”
“वो तो पहले ही पड़ा हुआ हूं लेकिन सिर्फ तुम्हारे नहीं । सबके ।”
“अभी तक कुछ हाथ लगा ?”
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10-18-2020, 12:58 PM,
#24
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
“हासिल जानकारी में इजाफा तो हुआ है । मसलन विनोद पाटिल की बाबत पता लगा है कि वो एक नाकाम थियेटर एक्टर है फिल्म और टी.वी. के फील्ड में भी उसकी कोई दाल नहीं गली है इसलिये, दो टूक कहा जाये तो, कड़का है । पैसे का जरूरतमन्द वो किसी और वजह से भी हो सकता है जिसकी कि हमें अभी खबर नहीं है । बहरहाल मकतूल से चार पैसे झटकने की कोशिश ही उसे यहां लायी थी लेकिन कोशिश कामयाब नहीं हुई थी ।”
“हुई तो सही । अब वो रिजॉर्ट के एक चौथाई हिस्से का मालिक है ।”
“रोकड़ा हासिल करने की कोशिश की बात कर रहा था मैं ।”
“एक ही बात है । पट्ठा फल खाने आया था, पेड़ ही मिल गया ।”
“तुम्हें इस बात से हैरानी नहीं हुई कि वो सिन्धी भाई, मेहर करनानी एक प्राइवेट डिटेक्टिव निकला ?”
“बहुत हैरानी हुई, जनाब । मैंने तो हमेशा उसे मौज मारने आया सैलानी समझा था । उसने कभी भनक नहीं लगने दी थी किसी को कि वो यहां अपने धन्धे में लगा हुआ था ।”
“मुझे मालूम हुआ है कि रिजॉर्ट में मकतूल की करनानी से काफी गहरी छनती थी ।”
“था तो सही ऐसा ।”
“दोनों पहले से वाकिफ थे ?”
“नहीं । रिजॉर्ट की ही वाकफियत थी वो । मुझे नहीं लगता कि मिस्टर देवसरे ने यहां से पहले कभी उसकी सूरत भी देखी थी ।”
“हूं ।”
“अपनी गुमशुदा वारिस की कहानी पर उसने कोई और रोशनी डाली ?”
“कुछ उसने डाली है कुछ हमने भी बाजरिया मुम्बई पुलिस जानकारी निकाली है और बात कुछ कुछ पल्ले पड़ी है ।”
“क्या ?”
“मूलरूप से उसका क्लायन्ट आनन्द बोध पंडित नाम का एक रुतबे और रसूख वाला आदमी था । लेकिन अभी कोई तीन महीने पहले उसकी मौत हो गयी थी तो उसके वकीलों ने करनानी को निर्देश दिया था कि क्लायन्ट की मौत की रू में वो अपने काम से हाथ न खींचे और उसे बदस्तूर जारी रखे ।”
“काम क्या ? वारिस की तलाश ?”
“हां । जो कि आनन्द बोध पंडित की तनुप्रिया नाम की इकलौती बेटी है ।”
“जो कि गायब है ?”
“एक अरसे से । आनन्द बोध पंडित बीमार रहता था, उसका और कोई वारिस नहीं इसलिये उसे बड़ी शिद्दत से अपनी गुमशुदा बेटी की तलाश थी । इसलिये उसने करनानी के सामने दस लाख के बोनस का चारा लहराया था ताकि वो दिलोजान से इस काम को अंजाम देता और अपनी कोई कोशिश न उठा रखता ।”
“आई सी । और क्या तफ्तीश की अभी तक आपने ?”
“किसलिये जानना चाहते हो ?”
“मकतूल हमारा क्लायन्ट था, हमारी दिली ख्वाहिश है कि उसका कातिल जल्द-अज-जल्द पकड़ा जाये और अपने किये की सजा पाये इसलिये ।”
“तुम क्लब में दोबारा क्यों गये थे ? वो भी रात के दो बजे ।”
“पता चल गया ?”
“वाचमैन ने बताया । उसी ने बताया कि कल क्लब की पॉप सिंगर मीनू सावन्त ने मकतूल को क्लब से रिजॉर्ट में वापिस पहुंचाया था और फिर कार लाकर क्लब की पार्किंग में खड़ी कर दी थी ।”
“वाचमैन ने जब ये बताया तो ये नहीं बताया कि मैं कार ही वापिस लाने के लिये वहां पहुंचा था ।”
“बताया था । लेकिन इतनी रात गये ? कार का क्या क्लब की पिर्किंग में डाकू पड़ रहे थे ? जमा ऐसा भी तो नहीं कि तुम वहां गये और कार लेकर लौट आये । तुम तो भीतर भी गये थे और काफी देर भीतर ठहरे थे ।”
“काफी देर नहीं, थोड़ी सी देर । एक ड्रिंक की तलाश में मैं भीतर गया था लेकिन भीतर जा के मालूम हुआ था कि बार बन्द हो गया था ।”
“हूं ।”
“और कुछ बताइये ।”
“कत्ल के वक्त के आसपास विनोद पाटिल, रिंकी शर्मा और मेहर करनानी रिजॉर्ट के परिसर में थे । पाटिल के पास कत्ल का उद्देश्य है और तब उसे कत्ल करने का मौका भी हासिल था क्योंकि मकतूल अकेला था, क्योंकि तुम उसके साथ नहीं थे । करनानी के पास कत्ल का उद्देश्य नहीं दिखाई देता लेकिन मौका उसे बराबर हासिल था ।”
“कैसे भला ? रिंकी शर्मा उसके साथ थी ।”
“हर वक्त नहीं । जब वो अपने कॉटेज में स्विमिंग कास्ट्यूम पहनने गयी थी तब पांच छ: मिनट तक वो करनानी के साथ नहीं थी ।”
“कास्ट्यूम उसने भी तो पहना था ।”
“मर्द ऐसे कामों में औरतों जितना वक्त नहीं लगाते, करनानी के लिये वो बड़ी हद दो मिनट का काम था । बाकी बचे टाइम में वो मकतूल के कॉटेज में जाकर अपनी कारगुजारी को अंजाम दे सकता था ।”
“माधव घिमिरे के बारे में क्या कहते हो, बतौर मैनेजर वो तो तकरीबन हर वक्त ही रिजॉर्ट में होता है ?”
“घिमिरे के बारे में पहले एक बात तुम बताओ । कहते हैं वो मकतूल का बहुत वफादार था ?”
“था तो सही । तभी तो मकतूल ने उसे रिजॉर्ट का मैनेजर बनाया और मुनाफे में पच्चीस फीसदी के हिस्से से नवाजा ।”
“मकतूल रिजॉर्ट का गिरवी रख देता तो वो हिस्सा तो चला गया होता ।”
“मिस्टर देवसरे ने उसे आश्वासन दिया था कि वो किसी और तसल्लीबख्श तरीके से यूं होने वाले उसके नुकसान की भरपाई कर देंगे ।”
“घिमिरे ही तो कहता है ऐसा । फर्ज करो कि ये बात गढी हुई है, उसे असल में मकतूल का ऐसा कोई आश्वासन नहीं था, और फिर बोलो की उसके पास कत्ल का उद्देश्य हुआ या नहीं हुआ ?”
“फिर तो हुआ ।”
“अभी वो कहता है कि एकाउन्ट चौकस करने में लगा हुआ था । क्या पता वो एकाउन्ट चौकस कर रहा था या मैनीपुलेट कर रहा था ।”
“आपका इशारा गबन की तरफ है ?”
“भई, आर्थिक गड़बड़झालों को ही लीपापोती की जरूरत होती है ।”
“घिमिरे ऐसा आदमी नहीं ।”
“माथे पर किसी के नहीं लिखा होता कि वो कैसा आदमी है । बाज लोग वैसे होते नहीं तो बावक्तेजरूरत बन जाते हैं ।”
“आप ठीक कह रहे हैं ।”
उस घड़ी उसका दिल चाहा कि वो घिमिरे की बाबत मिसेज वाडिया से हासिल जानकारी इन्स्पेक्टर को कराये लेकिन फिर उसने फिलहाल खामोश रहना ही जरूरी समझा । उसके उस फैसले की बड़ी वजह यही थी कि उसका दिल गवाही नहीं दे रहा था कि घिमिरे कातिल था । इसी वजह से उसने मिसेज वाडिया को भी गोलमोल तरीके से ये राय दी थी कि वो फिलहाल उस बात का जिक्र पुलिस से करने से गुरेज करे ।
“अब इसी मूड में” - वो फिर बोला - “अनन्त महाडिक के बारे में भी कुछ कह डालिये ।”
“क्या कह डालूं ?”
“कल उसने इस बात से पुरजोर इन्कार किया था कि साढे ग्यारह बजे वो रिजॉर्ट के परिसर में था । मैं अपनी जाती हैसियत में गवाह हूं कि उसकी कार क्लब की पार्किंग में मौजूद नहीं थी । अब कहीं तो वो था । कहां था के जवाब में उसने बोल दिया था कि वो बात अहम नहीं थी । मेरी निगाह में आपका इमेज एक सख्त हाकिम का है । हैरानी है कि आपको उसका वो टालू जवाब कुबूल हो गया ।”
“नहीं कुबूल हो गया ? इस बाबत उससे दोबारा - सख्ती से - दरयाफ्त किया गया था ।”
“दैट्स गुड । तो क्या जवाब मिला था ?”
“वो कहता है कि ग्यारह बजे के बाद से वो मीनू सावन्त के साथ था । दोनों लांग ड्राइव का आनन्द लेने निकले हुए थे । मीनू सावन्त इस बात की तसदीक करती है ।”
“वो लड़की महाडिक से फुल फिट है, महाडिक उसे जो कहने को कहेगा वो कहेगी ।”
“मुझे पूरा पूरा अहसास है इस बात का । जमा वो एलीबाई दोतरफा काम करने वाली है । जब वो कहती है कि कत्ल के वक्त के आसपास महाडिक उसके साथ था तो ये कहने की जरूरत नहीं रहती कि तब वो कहां थी । उसकी एलीबाई की बिना पर अगर मैं महाडिक को बेगुनाह मानूंगा तो उसे तो बेगुनाह मुझे मानना ही पड़ेगा ।”
“ठीक ।”
“पिछली रात की महाडिक की आवाजाही सबसे ज्यादा है । अपनी क्लब में ही वो कभी था, कभी नहीं था, कभी था, कभी फिर नहीं था । अपने इतने बिजी शिड्यूल में वो माशूक के साथ ड्राइव के लिये भी निकला हुआ था । मेरा साबसे ज्यादा एफर्ट इसी आदमी को चैक करने में सर्फ हो रहा है ।”
“आई सी । इन्स्पेक्टर साहब, आपने अभी ‘कत्ल के वक्त’ का हवाला दिया । कत्ल के वक्त से क्या मुराद है आपकी ?”
“क्या मतलब ?”
“कल आपने सोच जाहिर की थी कि कत्ल ग्यारह और साढे ग्यारह के बीच में हुआ था । जबकि आपके मैडीकल एग्जामिनर ने वक्त का कहीं बड़ा वक्फा - सवा दस से पौने बारह के बीच का - मुकरर्र किया था । क्या मैं पूछ सकता हूं कि आपने कत्ल के वक्त को इतना क्लोज कैसे पिनप्वायन्ट किया है ?”
“मामूली बात है । मकातूल के टी.वी. पर खबरें देखने के शिड्यूल की बाबत रिजॉर्ट में हर कोई जानता है । कत्ल से पहले मकतूल टी.वी. पर खबरें देख रहा था और जिस वक्त वो ऐसा कर रहा था, वो वक्त ग्यारह बजे की खबरों का था । मकतूल ग्यारह बजे की खबरें देख रहा था तो इसका मतलब है कि टी.वी. पर खबरें लगाने के लिये ग्यारह बजे वो जिन्दा था । खबरें साढे ग्यारह तक आती हैं अगर वो तब तक भी जिन्दा होता तो खबरें खत्म हो जाने के बाद उसने टी.वी. बन्द कर दिया होता । टी.वी. बन्द नहीं था, इसका मतलब है कि वो उन खबरों प्रसारण के दौरान मरा यानी कि ग्यारह और साढे ग्यारह बजे के बीच मरा ।”
“वैरी गुड । ग्रेट डिडक्टिव रीजनिंग । सर, यू आर नो लैस दैन शरलाक होम्ज ।”
वो हंसा ।
“अब मेरे लिये क्या हुक्म है ?”
“कोई हुक्म नहीं । सिवाय इसके कि कहीं खिसक न जाना । और किसी खास बात की भनक लगे तो खबर करना ।”
“जरूर ।”
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10-18-2020, 12:58 PM,
#25
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
ब्लैक पर्ल क्लब के पिछवाड़े में एक प्रीफैब्रिकेटिड, दोमंजिली इमारत थी जिसकी निचली मंजिल पर एक गोदाम, एक गैरज और जनरेटर हाउस और ऊपरली मंजिल पर छ: रिहायशी कमरे थे । इमारत के एक पहलू से पहली मंजिल तक पहुंचती खुली सीढियां थीं जो कि रिहायशी कमरों के सामने के लम्बे गलियारे में जाकर खत्म होती थीं ।
उस गलियारे के सिरे पर क्लब की पॉप सिंगर मीनू सावन्त का कमरा था ।
मुकेश ने कमरे के दरवाजे पर दस्तक दी तो कोई जवाब न मिला । उसने उसका हैंडल घुमा कर भीतर को धक्का दिया तो पाया कि दरवाजा खुला था ।
“मीनू !” - उसने आवाज लगायी ।
कोई जवाब न मिला ।
हिचकिचाता हुआ वो भीतर दाखिल हुआ । उसने अपने पीछे दरवाजा भिड़काया और एक सरसरी निगाह कमरे में दौड़ाई ।
कमरे में बेतरतीबी का बोलबाला था जो कि पता नहीं वहां रहने वाली की लापरवाही जताता था या उसकी हद से ज्यादा मसरूफियत की तरफ इशारा था । दरवाजा खुला होने का मतलब था कि वो आसपास ही कहीं थी । कमरे की पिछली दीवार में दो बन्द दरवाजे थे । उसने आगे बढ कर एक को खोला तो पाया कि वो बाथरूम था । दूसरा दरवाजा एक छोटी सी किचन का था लेकिन वहां किचन में इस्तेमाल होने वाला कतई कोई साजोसमान नहीं था । वहां गोदरेज की एक अलमारी की मौजूदगी खासतौर से ये जाहिर कर रही थी कि किचन उन दिनों स्टोर की तरह इस्तेमाल होती थी । उसने अलमारी का हैंडल घुमाया तो उसमें ताला लगा पाया । किचन के ग्रेनाइट के प्लेटफार्म के नीचे दराजों वाली कैबिनेट लगी हुई थी जो कि तकरीबन खाली थीं । केवल एक दराज में कुछ दवाईयां और कुछ श्रृंगार प्रसाधन पड़े थे । उसने दवाईयों का मुआयना किया और फिर दोरंगे कैप्सूलों से आधी भरी एक शीशी वहां से उठाई । शीशी पर लगे लेबल पर लिखा था: स्लीपिंग कैप्सूल्स, टु बी यूज्ड अंडर मेडिकल एडवाइस ।
उसने शीशी खोल कर कुछ कैप्सूल अपनी हथेली पर पलटे । कैप्सूल लाल और सफेद रंग के थे औ ऐन उसी साइज के थे जैसे के खोल उस क्लब के बूथ में पड़े मिले थे ।
“ये क्या हो रहा है ?”
उसने चौंक कर गर्दन उठाई ।
चौखट पर मीनू खड़ी थी ।
उसके चेहरे पर गहन अप्रसन्नता के भाव थे और वो अपलक मुकेश को देख रही थी ।
मुकेश हैरान था कि कैसे वो प्रेत की तरह उसके सिर पर आन खड़ी हुई थी, पता नहीं कब उसने बाहर का दरवाजा खोला था और कब वहां पहुंची थी । उसे तो न दरवाजा खुलने की आवाज आयी थी और न उसके कदमों की आहट मिली थी ।
मुकेश उस शाक से उबरा और फिर बोला - “ये नींद के कैप्सूल तुम खाती हो ?”
“ये मेरे सवाल का जवाब नहीं ।”
उसने कैप्सूल वापिस शीशी में डाले, उसका ढक्कन बन्द किया ।
“रास्ते से हटो ।” - वो बोला - “जवाब भी मिलता है ।”
“यूं चोरों की तरह यहां...”
“चोरी की इतना अन्देशा हो तो दरवाजा लाक्ड रखना चाहिये ।”
“मैं थोड़ी देर के लिये नीचे गयी थी...”
“थोड़ी देर में भी कुछ का कुछ हो जाता है ।”
“मिस्टर माथुर, दायें बायें की बातें करके तुम मेरे सवाल को टाल नहीं सकते ।”
“कौन टालना चाहता है ! जवाब देने के लिये ही दरख्वास्त की है कि मुझे इस चूहेदान के दमघोटू माहौल से बाहर निकलने दो ।”
वो एक तरफ हटी ।
मुकेश ने बाहर में कदम रखा । बहार बैड के सामने एक कुर्सी पड़ी थी जिस पर जाकर वो बैठ गया ।
“बैठो ।” - वो बोला ।
“लेकिन...”
“बैठो, तुम्हें कुछ दिखाना है....”
“क्या ?”
“....उसी में तुम्हारे सवाल का भी जवाब है इसलिये बैठो ।”
बड़े अनिश्चित भाव से वो आगे बढी और उसके सामने पलंग पर बैठ गयी ।
मुकेश ने बड़े नाटकीय अन्दाज से बैड को गुलाबी चादर पर उसके करीब कैप्सूलों के तीन खोल रखे और उनकी बगल में कैप्सूलों की शीशी रखी ।
“जवाब मिला ?” - वो बोला ।
मीनू खामोश रही, एकाएक वो बेचैन दिखाई देने लगी ।
“ये खोल मुझे क्लब के उस बूथ में टेबल के नीचे पड़े मिले थे जिसमें कल रात मैं, मिस्टर देवसरे और तुम बैठे थे ऐसे ही कैप्सूल इस शीशी में मौजूद हैं जो कि तुम इस्तेमाल करती हो । जो जवाब तुम्हें चाहिये वो यही है जो कि दो में दो जोड़ने जैसा आसान है ।”
वो फिर भी खामोश रही ।
मुकेश अपलक उसे घूरता रहा ।
“ये कोई दुर्लभ कैप्सूल नहीं हैं ।” - आखिरकार वो हिम्मत करके बोली ।
“कुबूल । लेकिन इनके भीतर की दवा मेरे ड्रिंक में मिलाने का मौका हर किसी को हासिल नहीं था । वेटर ने ये काम किया होता तो वो पहले ही मेरे ड्रिंक में ये दवा मिला कर लाया होता । उस सूरत में कैप्सूलों के खोल बूथ की मेज के नीचे न पड़े होते । मिस्टर देवसरे नींद के ऐसे जो कैप्सूल इस्तेमाल करते हैं वो साइज में इनसे बड़े हैं । जमा उन्हें ऐसी कोई हरकत करने की कोई जरूरत नहीं थी । बाकी या तुम बचती हो या तुम्हारा बॉस महाडिक ।”
“महाडिक !”
“जो ड्रिंक मेरे बूथ में लौटने से पहले मौजूद था उसकी बाबत तुमने कहा था कि वो कर्टसी महाडिक आन दि हाउस था । इसलिये महाडिक । लेकिन मेरा एतबार तुम्हीं पर है ।”
“खामाखाह !”
“ये शीशी तुम्हारी है ।”
“कौन कहता है ?”
“ये तुम्हारे कमरे में से बरामद हुई है ।”
“इसलिये मेरी हो गयी !”
“क्यों नहीं ?”
“तुम्हारी जानकारी के लिये क्लब की मेरे से पहले वाली पॉप सिंगर भी यहीं रहती थी और यहां कई चीजें ऐसी हैं जो कि वो पीछे छोड़ गयी है । मैंने कभी तवज्जो नहीं दी कि वो क्या क्या पीछे छोड़ गयी हुई है ।”
“तुम कहना चाहती हो कि ये शीशी उसकी है ।”
“जब मेरी नहीं है तो उसकी होगी ।”
“बात अच्छी गढ ली तुमने हाथ के हाथ ।”
“तुम पागल हो । मुझे ऐसी कोई बात गढने की क्या जरूरत है ?”
“जरूरत तो बराबर है । जिस किसी ने भी मेरे ड्रिंक में बेहोशी की दवा मिलाई वो या खुद कातिल था या कातिल का सहयोगी था । मैं हर वक्त साये की तरह मिस्टर देवसरे के साथ रहता था इसलिये कातिल जानता था कि मुझे मिस्टर देवसरे से जुदा किये बिना वो मिस्टर देवसरे के कत्ल के अपने नापाक इरादे में कामयाब नहीं हो सकता था । मौजूदा हालात में पुलिस या तुम्हें कातिल समझेगी या तुम्हें मजबूर करेगी बताने के लिये कि तुमने किसके कहने पर मेरे ड्रिंक में बेहोशी की दवा मिलाई ।”
“मिस्टर, ये कहानी तुमने इसलिये गढी है क्योंकि तुम अपराधबोध से ग्रस्त हो ।”
“क्या ?”
“यू आर सफरिंग फ्रॉम गिल्टी कांशस । तुम इस बात से शर्मिन्दा हो कि कल रात तुम्हें बूथ में नींद आ गयी जिसकी वजह से मिस्टर देवसरे का कत्ल हो गया । अब तुम अपने आपको पाक साफ साबित करने के लिये ये कहानी गढ रहे हो कि तुम्हें नींद नहीं आयी थी, तुम्हें इरादतन बेहोश किया गया था ।”
मुकेश भौचक्का सा उसका मुंह देखने लगा ।
“तुम साबित कर सकते हो कि कैप्सूलों के खोल तुमने बूथ में से उठाये थे ।”
“और कहां से आये थे मेरे पास ?” - मुकेश के मुंह से निकला ।
“अभी दो मिनट पहले जब यह शीशी तुम्हारे कब्जे में थी तो कितने ही कैप्सूल तुम्हारी हथेली पर थे । तुमने दो को खोला, उनकी दवा हवा में उड़ाई और खाली खोल मुझे दिखाने के लिये, मुझ पर तोहमत लगाने के लिये, पास रख लिये ।”
“खाली खोल तीन हैं, मैंने ऐसा किया होता तो ये चार होते ।”
“एक गिर गया होगा कहीं इधर उधर, शीशी में वापिस चला गया होगा बन्द कैप्सूलों के साथ ।”
“खाली खोल मैंने बूथ में से उठाये थे ।” - मुकेश जिदभरे स्वर में बोला ।
“क्यों उठाये थे ? जब तुम्हें उनका रिश्ता कत्ल से जुड़ता लग रहा था तो क्यों उठाये थे ?”
“यही तो गलती हुई ।”
“मुझे तो लगता है कि न तुम्हें नींद आयी थी और न तुम्हारे ड्रिंक में नींद की दवा थी । तुमने जानबूझ कर सोया होने का बहाना किया था ताकि तुम्हारे किसी जोड़ीदार को मिस्टर देवसरे का कत्ल करने का मौका हासिल हो पाता ।”
मुकेश का निचला जबड़ा लटक गया, वो अवाक उसे देखने लगा ।
“भई वाह !” - फिर वो बड़ी कठिनाई से बोल पाया - “इसे कहते हैं उलटा चोर कोतवाल को डांटे ।”
उसने लापरवाही से कन्धे उचकाये ।
“यही इकलौता सबूत नहीं है, मैडम जी, जो कातिल को पकड़वा सकता है । देर सबेर कानून के लम्बे हाथ कातिल की और कातिल के जोड़ीदार की गर्दन तक पहुंच के रहेंगे ।”
“कानून की जिस्मानी बनावट ही गलत है । हाथ लम्बे होने से क्या होता है ! बांहें लम्बी होती तो कोई बात भी थी ।”
“तुम मजाक कर रही हो ।”
वो जबरन हंसी ।
“ये खोल बूथ में से उठाना मेरी गलती थी लेकिन ये गलती मैंने इसलिये करना कुबूल किया था क्योंकि उस वक्त भी मेरे जेहन में तुम्हारा ही अक्स था । अब अगर तुमने साबित करके दिखाया होता कि मेरे होश खोने में तुम्हारा कोई हाथ नहीं था तो मुझे अपनी गलती का कोई अफसोस न होता लेकिन तुम तो उल्टे मुझे गुनहगार ठहरा रही हो । अब मुझे अपनी गलती दुरुस्त करनी होगी ।”
“क्या करोगे ?”
“इन्स्पेक्टर अठवले को सब कुछ सच कह सुनाऊंगा ।”
“वो जरूर ही तुम्हारी बात पर यकीन करेगा ।”
“देखेंगे ।”
उसने मेज पर से खोल उठा लिये लेकिन जब कैप्सूलों की शीशी उठाने लगा तो मीनू ने उसे पहले अपने काबू में कर लिया ।
“ये तुम्हारी नहीं है ।” - वो बोली ।
“तुम्हारी भी तो नहीं है । तुमने अभी खुद कहा था ।”
“मेरी नहीं तो तुम्हारी हो गयी ?”
“अजीब लड़की हो ।”
“तुम क्या कम अजीब हो जो बेवजह बात का बतंगड़ बना रहे हो ।”
“बेवजह ?”
“और क्या ! एक बात पर टिक के नहीं रह सकते ! जब कहते हो ये खोल बूथ में से उठा कर तुमने मेरे पर मेहरबानी की तो अब मेहरबानी जारी नहीं रख सकते हो ?”
“अब तुम नया ही पैंतरा बदल रही हो ।”
“जिस पर मेहरबान होते हैं उस पर एतबार लाते हैं या शक करते हैं ? गिरफ्तार करा देने की धमकी देते हैं ?”
“मैंने कब दी धमकी ?”
“अभी बोला नहीं इंस्पेक्टर अठवले के पास जाने की ? फिर वो क्या मुझे यूं ही छोड़ देगा ?”
“तुम मुझे यकीन दिलाओ कि मेरे ड्रिंक में बेहोशी की दवा तुमने नहीं मिलाई थी तो मैं इस बाबत इन्स्पेक्टर से कोई जिक्र नहीं करूंगा ।”
“कैसे यकीन दिलाऊं ? मैं कसमिया कह सकती हूं कि मैंने ऐसा कुछ नहीं किया । आगे यकीन करना या न करना तुम्हारी मर्जी पर मुनहसर है ।”
मुकेश खामोश रहा । अब उसके चेहरे पर अनिश्चय के भाव थे ।
“तुमने इतनी बातें कहीं” - इस बार वो नम्र स्वर में बोली - “एक मेरी भी सुनो ।”
“क्या ?”
“बूथ से इन कैप्सूलों के खोलों की बरामदी ही ये साबित नहीं करती कि किसी ने तुम्हें इरादतन बेहोश किया था ।”
“क्यों नहीं करती ? ऐसा था तो खोल क्यों थे वहां ?”
“उन पर कोई तारीख दर्ज है ? टाइम दर्ज है ?”
“क्या मतलब ?”
“क्या पता वो कब से वहां पड़े थे !”
“कब से कैसे पड़े होंगे ? वहां रोज सफाई नहीं होती ?”
“होती है लेकिन सफाई कर्मचारियों का अलगर्ज और लापरवाह होना क्या बहुत बड़ी बात है ?”
“हूं ।”
“तुम्हारी जानकारी के लिये कल रात तुम्हें जिसने भी देखा था तुम उसे नींद में लगे थे - खुद मिस्टर देवसरे को भी - बेहोश किसी को नहीं लगे थे ।”
“मिस्टर देवसरे ने मेरी तब की हालत खुद देखी थी या उस बाबत किसी से सुना था ।”
“सुना ही होगा क्योंकि वो तो कैसीनों में थे ।”
“किससे ?”
“शायद करनानी से या शायद महाडिक से । मैं अपना सांग नम्बर खत्म करके जब एक मिनट के लिये कैसीनो में गयी थी तो तब वो दोनों वहां थे और मिस्टर देवसरे के करीब थे । लेकिन जब वो मेरे साथ लौट रहे थे तब तो उन्होंने देखा ही था तुम्हें । तभी तो उन्होंने हुक्म दिया था कि तुम्हें जगाया न जाये ।”
“आई सी ।”
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10-18-2020, 01:05 PM,
#26
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
“ये भी उन्होंने ही कहा था कि मैं उन्हें रिजॉर्ट में ड्राप करके कार वापिस ले आऊं ताकि वो तुम्हारे काम आ सके ।”
“हूं । करनानी से तुम्हारी अच्छी दुआ सलाम है ?”
“हां, ठीक है । क्लब का रेगुलर जो ठहरा ।”
“क्या बातें करता है ?”
“वहीं जो मर्द लोग करते हैं । कहां से हो ? पॉप सिंगर कैसे बन गयीं ? पहले क्या करती थीं ? आगे क्या इरादे हैं ? स्टेडी कौन है ? है भी या नहीं वगैरह ।”
“बाई दि वे, कहां से हो तुम ?”
“मुम्बई से ।”
“मुम्बई की अच्छी रिप्रेजेंटेशन है आजकल इस इलाके में ।”
“क्या मतलब ?”
“मैं मुम्बई से, मकतूल मुम्बई से, करनानी मुम्बई से, पाटिल मुम्बई से, शायद महाडिक भी मुम्बई से ही है ।”
“मुझे खबर नहीं ।”
“करनानी की तो खबर है कि वो मुम्बई से है ?”
“हां, उसकी तो है ।”
“उसे पहले से जानती हो ?”
“नहीं । यहां मुलाकात हुई । उसने खुद बताया जो जाना कि वो मुम्बई से था ।”
“पाटिल के बारे में क्या कहती हो ?”
“मैं उसके बारे में कुछ नहीं जानती । कल रात वो क्लब में आया था तो जिन्दगी में पहली बार मैंने उसकी सूरत देखी थी ।”
“आई सी । तुम मुम्बई में कहां रहती थीं ?”
“जोगेश्वरी में ।”
“फैमिली अभी भी वहीं है ?”
“कहां रखी है फैमिली ! बस मां है जो जोगेश्वरी में किराये के एक कमरे में रहती है । बाप कई साल हुए हमें छोड़ के भाग गया था । आज तो ये भी नहीं पता कि वो जिन्दा है या मर गया ।”
“पॉप सिंगर कैसे बन गयीं ?”
“बस, बन गयी किसी तरह से । कुछ तो करना ही था अपना और मां का पेट पालने के लिये । पाप कर लिया । सिंग कर लिया ।”
“महाडिक से कैसे टकरा गयीं ?”
“मैं मुम्बई के एक बियर बार में नाचती गाती थी जहां वो एक बार आया था । मेरा नाच तो उसे यूं ही लगा लेकिन गाने ने उसे मुतासिर किया । बोला, मैं सिर्फ गाने पर तवज्जो दूं तो तरक्की कर सकती थी । जो तरक्की मैंने की वो ये ही की कि उसकी छत्रछाया में यहां आ गयी ।”
“तुम्हारे कहने से लगता है कि छत्रछाया में क्लब में गाने के अलावा भी कुछ शामिल है ।”
“सब कुछ शामिल है । कोई एतराज ?”
“ऐसे शख्स की तो हर बात माननी पड़ती होगी !”
“किसी बात का पीछा नहीं छोड़ते हो । फिर इस बात की तरफ इशारा कर रहे हो कि वो कातिल है और मैं उसकी मददगार हूं ।”
“महाडिक के साथ आइन्दा क्या इरादे हैं ?”
“क्या मतलब ?”
“वो शादीशुदा है ?”
“डाइवोर्सी है ।”
“बच्चे ?”
“एक लड़का था, तलाक के बाद बीवी ले गयी ।”
“शादी करेगा ?”
“कर सकता है ।”
“तुम करोगी ?”
“कर सकती हूं ।”
“कभी कोई बात नहीं उठी ?”
“उठी ।”
“तो किसी अंजाम तक क्यों नहीं पहुंची ?”
“पहुंच जायेगी । जल्दी क्या है ?”
“तुम्हारे बायें हाथ की दूसरी उंगली में मैं एक अंगूठी देख रहा हूं । बड़ी खूबसूरत है ।”
“है तो सही ।”
“कीमती जान पड़ती है ।”
“हीरे की है लेकिन कीमत की खबर नहीं ।”
“वजह ?”
“मिस्टर महाडिक ने दी ।”
“ओहो ! तो यूं कहो न कि मंगनी की अंगूठी है ।”
“यही समझ लो ।”
“फिर भी शादी की बाबत गोल मोल जवाब दे रही थीं । ‘शादी करेगा, कर सकता है; तुम करोगी, कर सकती हूं’ जैसे ।”
वो हंसी ।
“बहरहाल महाडिक के साथ तुम्हारा फ्यूचर है !”
“दिखाई तो देता है ।”
“इसीलिये उसे एलीबाई दी !”
“क्या ?”
“बोला कि कल रात कत्ल के वक्त के आसपास वो तुम्हारे साथ ड्राइव पर था ।”
“फिर पहुंच गये एक आने वाली जगह पर ! फिर इलजाम लगा रहे हो कि मैं उसकी अकम्पलिस हूं और उसकी खातिर झूठ बोल रही हूं !”
“बोल रही हो ?”
“नहीं ।”
“फिर क्या बात है !” - एकाएक वो उठ खड़ा हुआ - “मैं चलता हूं ।”
“कैप्सूल के खोलों की बाबत तुम्हारा क्या इरादा है ? पुलिस को बताओगे ?”
“सोचूंगा मैं इस बाबत । नमस्ते ।”
हकीकतन वो पहले ही सोच चुका था ।
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10-18-2020, 01:05 PM,
#27
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
रिजॉर्ट में लौट कर उसने थाने फोन लगाया ।
“इन्स्पेक्टर साहब” - वो संजीदगी से बोला - “मैं एक गुनाह कुबूल करना चाहता हूं ।”
“दैट्स वैरी गुड । कनफैशन इज गुड फार सोल । थाने पहुंचो और अपना इकबालिया बयान दर्ज करवाओ । गुनाह कुबूल कर लेने से सजा कम हो जाती है । फांसी की जगह उम्र कैद...”
“खातिर जमा रखिये, जनाब, मैंने वो गुनाह नहीं किया जो आपके जेहन में है ।”
“तुम तो मुझे नाउम्मीद कर रहे हो । मैंने तो खुश होना शुरु भी कर दिया था कि कत्ल हुए अभी चौबीस घन्टे भी नहीं हुए थे कि केस हल हो गया था । खैर, कहो क्या कहना चाहते हो ।”
मुकेश ने कहा ।
वो चुप हुआ तो इन्स्पेक्टर के फट पड़ने के प्रतीक्षा करने लगा ।
लेकिन वैसा न हुआ । इन्स्पेक्टर जब बोला तो उसके स्वर में सिर्फ शिकायत का भाव था ।
“ये तुमने पढे लिखे आदमी वाला काम किया ?”
“मैं शर्मिन्दा हूं । मेरी शर्मिन्दगी ने ही मुझे आपको फोन लगाने को उकसाया है ।”
“चलो, देर आयद दुरुस्त आयद । तो कल रात क्लब में तुम्हारा दूसरा फेरा कार लौटाने के लिये नहीं लगा था इसलिये लगा था क्योंकि तुम्हें शक था कि तुम्हें जानबूझ कर बेहोश किया गया था ।”
“जी हां ।”
“तुमने दोहरी गड़बड़ की जो अब भी अपना बयान दर्ज कराने के लिये पुलिस के पास पहुंचने से पहले उस लड़की से बतियाने बैठ गये । कैप्सूलों के खोल कर रात हम बरामद करते तो हाथ के हाथ साबित कर दिखाते कि वो मीनू सावन्त की मिल्कियत थे । खोलों पर से उसका कोई छोटा मोटा फिंगरप्रिंट भी बरामद हो सकता था । अब फिंगरप्रिंट तुमने बिगाड़ दिये और शीशी वो लड़की गायब कर देगी ।”
“सॉरी ।”
“हम कल उस पर हल्ला बोल पाये होते तो शायद ये भी कुबुलवा लेते कि महाडिक की जो एलीबाई उसने दी थी, वो झूठी थी ।”
“सर, आई एम सॉरी आलरेडी ।”
“और फिर ये तमाम कहानी झूठी हो सकती है...”
“जी !”
“तुमने अपने आप से फोक्स हटाने के लिये गढी हो सकती है ।”
“क्या जुल्म ढा रहे हो इन्स्पेक्टर साहब !”
“ये न भूलो कि मर्डर सस्पैक्ट्स की लिस्ट में तुम्हारा नाम अभी भी दर्ज है ।”
“वो मेरी बदकिस्मती है ।”
“बहरहाल फिर भी मैं उस लड़की से मिलूंगा हालांकि ये सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने वाली बात होगी ।”
लाइन कट गयी ।
मुकेश ने रिसीवर वापिस क्रेडल पर रख दिया ।
तभी दरवाजा पर दस्तक पड़ी ।
“खुला है ।” - वो उच्च स्वर में बोला ।
दरवाजा खुला और तनिक झिझकते हुए माधव घिमिरे ने भीतर कदम रखा ।
“मैं ये जानने आया था” - वो करीब आकर बोला - “कि तुम्हारे आगे क्या इरादे हैं ?”
“किस बारे में ?”
“इस रिजॉर्ट के बारे में ।”
“मेरे से क्यों पूछते हैं ?”
“तुम भूल रहे हो कि अब तुम भी इसके शेयर होल्डर हो ।”
“मैं न हूं न होना चाहता हूं ।”
“होना न चाहना जुदा मसला है लेकिन मकतूल की वसीयत की रू में हो तो तुम बराबर ।”
“वसीयत को पाटिल कोर्ट में चैलेंज करने वाला है ।”
“कहना आसान है ।”
“तो मेरा जवाब ये है कि अभी इस बाबत कुछ सोचने की मुझे कोई जल्दी नहीं ।”
“ठीक है । एक बात बताओ । मिस्टर देवसरे ने कभी तुम से कहा था कि वो रिजॉर्ट को बेचना चाहते थे ?”
“नहीं । कभी नहीं ।”
“लेकिन मेरे से कहा था । यहां पहुंचने के बाद पहले ही दिन कहा था ।”
“तब आपने कैसा महसूस किया था ।”
“सच बोलूं तो बहुत बुरा । जिन्दगी में पहली बार मैं अपने आपको तरीके से सैटल हुआ महसूस कर रहा था जबकि मिस्टर देवसरे ने ये बम मेरे सिर पर फोड़ा था । बतौर मैनेजर मुझे यहां पन्द्रह हजार रुपये महीना तनख्वाह मिलती है । साथ में रिहायश के लिये फ्री का कॉटेज है । मेरी मेहनत से रिजॉर्ट ने पहले ही साल ऐसा तगड़ा प्राफिट दिखाया जिसकी कि मिस्टर देवसरे को सपने में उम्मीद नहीं थी । अगले साल और भी बढिया बिजनेस हुआ । तब ईनाम के तौर पर उन्होंने मेरे लिये प्राफिट में एक चौथाई हिस्से का और उनकी मौत की सूरत में प्रापर्टी में एक चौथाई हिस्से का प्रावधान किया । इससे ज्यादा फेयर डील की और कोई क्या उम्मीद कर सकता था ! अपने एम्पलायर की दरियादिली ने मुझे बाग बाग कर दिया था लेकिन फिर ये कह कर उन्होंने मेरे पैरों के नीचे से जमीन सरका दी कि वो रिजॉर्ट को बेचना चाहते थे ।”
“खरीदार आप भी तो हो सकते थे !”
“ऐसी मेरी दिली ख्वाहिश है लेकिन इतना पैसा कहां रखा है मेरे पास !”
“बैंक से फाइनांस मिलता है ।”
“इतना बड़ा फाइनांस मेरे जैसी मामूली हैसियत वाले आदमी को कहां मिलता है ! मिलता है तो या रिश्वत से मिलता है या बड़ी सिफारिश से मिलता है और मेरे पास इन दोनों ही बातों का कोई इन्तजाम नहीं ।”
“आई सी । लेकिन मिस्टर देवसरे को भी इस बात का अहसास होगा कि उनके रिजॉर्ट बेच देने से आपको भारी नुकसान होता । ये तो ईनाम देकर वापिस छीन लेने वाली बात होती ।”
“मेरी तो उनसे इस बाबत कुछ कहने की मजाल नहीं हुई थी लेकिन उन्होंने खुद ही ये बात उठाई थी और कहा था कि वो मुझे ज्यादा नुकसान नहीं होने देंगे ।”
“अच्छा ! वो कैसे ?”
“वो रिजॉर्ट की डेढ करोड़ कीमत लगाते थे और एक चालीस कुबूल करने के लिये तैयार थे । उन्होंने मुझे कहा था कि एक चालीस से ऊपर जितनी भी रकम का ये रिजॉर्ट बिकेगा वो तमाम की तमाम रकम वो मुझे दे देंगे ।”
“यानी कि दो करोड़ में बिकता तो साठ लाख रुपये आपके । पौने दो करोड़ में बिकता तो पैंतीस लाख रुपये आपके ।”
“हां । जयगढ में ऐसी एक छोटी सी जगह मेरी निगाह में है जो मुझे तीस लाख में मिल सकती थी । ये रिजॉर्ट कम से कम एक सत्तर में बिकता तो मेरा काम बन सकता था लेकिन एक चालीस या उससे कम में बिकता तो मैं बर्बाद था ।”
“अब तो आप ऐसे नहीं होंगे । अब तो तीस लाख से कहीं बड़ी रकम समझिये कि आपकी जेब में है जिससे कि आप जयगढ वाली जगह खरीद सकते हैं और एक रिजॉर्ट के सोल प्रोप्राइटर बन सकते हैं ।”
उसने जवाब न दिया, न ही उसके चेहरे पर उस बात से कोई रौनक आयी ।
“बाई दि वे” - मुकेश बोला - “ये सब आप मुझे क्यों बता रहे हैं ?”
“पुलिस को मुझ पर शक है कि अपने भविष्य को बर्बाद होने से बचाने के लिये मैंने बॉस का कत्ल कर दिया । अब बॉस की जगह तुम हो इसलिये मेरा जी चाहा कि मैं अपनी सफाई पेश करूं और तुम्हें विश्वास दिलाने की कोशिश करूं कि मैं कातिल नहीं हूं ।”
आखिरी शब्द कहते कहते उसका गला रुंध गया ।
मुकेश भी जज्बाती हुए बिना न रह सका ।
“मिस्टर घिमिरे” - वो बोला - “मुझे पूरा यकीन है कि आप कातिल नहीं हैं । आप जैसा शरीफ और स्वामीभक्त आदमी कातिल हो ही नहीं सकता । आप इतमीनान रखिये जल्दी ही कातिल पकड़ा जायेगा और आप अपने आप ही कत्ल के शक से बरी हो जायेंगे ।”
“यू थिंक सो ?”
“यस ।”
“थैंक्यू । थैंक्यू वैरी मच । बहुत चैन पहुंचाया तुमने मेरे दिल को । थैंक्यू ।”
घिमिरे के जाने के लगभग फौरन बाद विनोद पाटिल पहुंच गया और आते ही उसने भी ऐन वही जुबान बोली जो घिमिरे ने बोली थी ।
“तुम्हारे आगे क्या इरादे हैं ?”
“किस बारे में ?”
“इस जगह के बारे में और किस बारे में ?”
“तुम मकतूल की वसीयत को कोर्ट में चैलेंज करने वाले हो तो मेरे इरादे तो चैलेंज को चैलेंज करने के ही होंगे ।”
“वसीयत जुदा मसला है, ये रिजॉर्ट जुदा मसला है ।”
“तुम्हारे लिये होगा, मेरे लिये सब एक ही मसला है ।”
“इस बाबत मेरे पास बुरी खबर भी है और अच्छी खबर भी है ।”
“अच्छा !”
“हां । बुरी खबर ये है कि मेरी माली हालत बहुत पतली है जिसका जल्दी कोई इलाज न हुआ तो मेरा अंजाम बहुत बुरा होगा ।”
“मुझे तुमसे हमदर्दी है । अच्छी खबर क्या है ?”
“मैंने मकतूल की वसीयत को कोर्ट में चैलेंज करने का इरादा छोड़ दिया है ।”
“बड़ी जल्दी जोश ठण्डा हुआ । कल तो यूं भड़क रहे थे जैसे कि...”
“कल की बात कल के साथ गयी, भाई मेरे । अब तुम रिजॉर्ट की इमीजियेट सेल का या इसे गिरवी रख के बैंक से पैसा हासिल करने का इन्तजाम करो और मेरा हिस्सा मेरे मत्थे मारो ताकि मैं अपनी राह लगूं ।”
“अभी कैसे राह लग सकते हो ? क्या भूल गये कि इन्स्पेक्टर अठवले ने इस बाबत हर किसी को क्या वार्निंग दी थी ?”
“तुम पहला काम करो, दूसरे से मैं खुद निपट लूंगा ।”
“मिस्टर देवसरे की जिन्दगी तुम्हारी वजह से अजीर्ण थी । लगता है तुम नहीं चाहते कि वो मर के भी चैन पायें ।”
“मेरे चाहने से क्या होता है ? मेरे चाहने से कुछ होना होता तो कल मुझे उनकी दुत्कार न सहनी पड़ती । ऐसे तो कोई ड्योढी पर आये कुत्ते से पेश नहीं आता, मैं तो उनका दामाद था ।”
“जबरदस्ती का ।”
“जैसा भी था, था ।”
“बकौल, मिस्टर देवसरे, उन्होंने कभी तुम्हें दामाद नहीं माना ।”
“बेटी को तो बेटी माना या वो भी नहीं माना ?”
“जिसकी औलाद को तुमने बर्बाद कर दिया - एक राजकुमारी को महलों से निकाल कर चाल में पहुंचा दिया - जिसकी मौत की तुम वजह बने, उसका बदनसीब बाप क्या तुम्हारी आरती उतारता !”
“कौन किसको मार सकता है ! जिन्दगी और मौत ऊपर वाले के हाथ होती है ।”
“ये थियेट्रिक्ल डायलाग है ।”
“हर कोई मुझे सुनन्दा की मौत के लिये जिम्मेदार ठहराता है और विलेन के रंग में रंगता है । कोई इस बात की तरफ ध्यान नहीं देता कि एक बाप की बेटी ही नहीं मरी थी, एक पति की पत्नी भी मरी थी । मकतूल ने बेटी खोई, तुमने उसे बदनसीब कहा, मैंने बीवी खोई, मुझे क्या कहोगे ? खुशकिस्मत ! मुकन्दर का सिकन्दर ! ए मैन आन टॉप आफ दि वर्ल्ड ?”
मुकेश से जवाब देते न बना ।
“बेटी की मौत का सदमा बुजुर्गवार पर इतना भारी गुजरा कि, मुझे अब मालूम हुआ है कि, उन्होंने दो बार आत्महत्या कर लेने की कोशिश की । मैंने ऐसा कुछ न किया, क्या इसीलिये उनका गम गम है, मेरा गम कहानी है ! उनका खून खून है, मेरा खून पानी है !”
आखिरी शब्द कहते कहते उसकी आंखें डबडबा आयीं । मुकेश फैसला न कर सका कि वो ड्रामा कर रहा था या सच में भावुक हो उठा था ।
“मैंने सुनन्दा को बरगला कर, बहला फुसला कर अपना नहीं बनाया था, उसने अपने मर्जी से, तमाम ऊंच नीच विचार के मेरे से शादी की थी । वो जानती थी शादी की खबर से उसका पिता आगबगूला हो उठेगा लेकिन उसे यकीन था कि धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा । और क्या गलत यकीन था, आखिर वो मकतूल की इकलौती औलाद थी । उसने तो जैसे मुझे सजा देने के लिए अपनी औलाद से नाता तोड़ दिया । क्या वो कभी जान पाया कि उसके उस व्यवहार का उसकी बेटी के दिल पर क्या असर हुआ था ?” - उसने अवसादपूर्ण भाव से गर्दन हिलायी और फिर बोला - “हर किसी को अपनी मुसीबत बड़ी लगती है, दूसरे की गौरतलब भी नहीं लगती । सयाने लोग कहते हैं कि क्षमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात । कहां क्षमा करते हैं बड़न ! कहां क्षमा किया हमारे बड़न ने ! कल मेरे से यूं पेश आया जैसे कोई मंगता उसके घर आटा मांगने आया था । माली दुश्वारी का मारा मैं एक जायज और हक की बात कहने आया था, उसके हाथ जैसे मौका लग गया मुझे जलील करने का, मुझे मेरी औकात दिखाने का ।”
“एक्सीडेंट कैसे हुआ था ?”
“मुझे एक फिल्म में काम मिला था जिसकी फिल्म सिटी में शूटिंग थी । एक दोस्त की कार पर मैं सुनन्दा के साथ फिल्म सिटी के लिये रवाना हुआ था । रास्ते में रांग साइड पर चलता एक वाटर टैंकर सामने आ गया । मैंने तभी मोड़ काटा था और उस सड़क पर विपरीत दिशा से आते किसी वाहन का सवाल ही नहीं था इसलिये धोखा खा गया । कार टैंकर से जा टकराई, इत्तफाक से टक्कर से ड्राइविंग सीट का दरवाजा खुल गया और मैं बाहर जा गिरा । सुनन्दा के साथ ऐसा कुछ न हुआ, टैंकर कार पर चढ गया और वो मारी गयी । विलेन तो मैं पहले से ही था मकतूल की निगाह में, उस वारदात ने मेरे किरदार पर स्याह काला रंग पोत दिया । टैंकर वाले की कोई गलती नहीं थी, सब मेरी गलती थी । न मैं शादी करता, न सुनन्दा मेरे साथ होती, और न एक्सीडेंट में जान से जाती । मैं कह पाता तो कहता कि बुजुर्गवार बात को जरा और पीछे ले जाइये; न आप सुनन्दा की मां से शादी करते, न सुनन्दा पैदा होती और फिर न वो सब कुछ होता जो हुआ । बल्कि बिल्कुल ही पीछे ले जाइये । न खुदा ने आदम बनाया होता, न उसकी पसली से हव्वा बनाई होती, न ह्यूमन रेस की शुरुआत होती, न बुजुर्गवार होते, न उनकी बेटी होती, न मैं होता । मैं बड़ा विलेन नहीं हूं, बड़ा, सबसे बड़ा, विलेन खुदा है जिसने ये सृष्टि बनायी ।”
“वैरी वैल सैड ।”
“अब छोड़ो वो किस्सा और रिजॉर्ट की बात करो ।”
“क्या बात करूं ?”
“कल बुजुर्गवार ने इसे डेढ करोड़ की प्रापर्टी बताया था । उस लिहाज से मेरा हिस्सा साढे सैंत्तीस लाख बनता है । मैं पच्चीस में सैटल करने को तैयार हूं बशर्ते कि रकम मुझे अभी मिले ।”
“अभी कैसे मिल सकती है ?”
“तुम बताओ । आखिर मकतूल के वारिस हो । ऊपर से वकील हो ।”
“नहीं मिल सकती । पहले मरने वाले का अन्तिम संस्कार होना होगा फिर वसीयत को प्रोबेट के लिये कोर्ट में पेश किया जाना होगा, वहां कोई अड़ंगा न हुआ तो खरीदार तलाश करना होगा... लम्बी प्रक्रिया है ।”
“अन्तिम संस्कार कौन करेगा ?”
“तुम्हारा अपने बारे में क्या ख्याल है ?”
“मैं !” - वो हंसा - “मैं चिता के पास भी फटका तो बुजुर्गवार उठ के खड़े हो जायेंगे मुझे लताड़ लगाने के लिये और मुझे याद दिलाने के लिये कि उन्होंने कभी मुझे अपना दामाद नहीं माना था ।”
“ऐसा कहीं होता है !”
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10-18-2020, 01:05 PM,
#28
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
“चलो हिस्सा नहीं, हिस्से के खाते में कोई एडवांस ही दिला दो । ये सोच के दिला दो कि पुलिस के नादिरशाही हुक्म की वजह से यहां से वापिस मैं जा नहीं सकता और यहां टिके रहने की सूरत में मुझे यहां का किराया भरने में प्राब्लम हो सकती है ।”
“मैं कहां से एडवांस दिला सकता हूं ? तुम्हें एडवांस दिलाने का मेरे पास कोई जरिया नहीं । अलबत्ता मैं घिमिरे को बोल कर ऐसा इन्तजाम कर दूंगा कि तुम्हारे यहां रुकने का बिल तुम्हारे प्रापर्टी में हिस्से के खिलाफ उधार मान लिया जाये ।”
“इतने से मेरा काम नहीं चलने वाला । कम से कम दस लाख की तो मुझे इमीजियेट जरूरत है ।”
“क्यों ?”
“एक टेली-सीरियल की प्रोडक्शन में मैंने पार्टनरशिप की है, चार पायलेट एपीसोड बनाने में बीस लाख रुपये लगने हैं जिनमें से दस मुझे लगाने होंगे ।”
“ये बात कल मिस्टर देवसरे को बोली होती ।”
“उन्होंने ऐसी नौबत ही नहीं आने दी थी । वो तो मेरे हिस्सा मांगने के जिक्र से ही भड़क उठे थे और मुझे मेरी जात दिखाने लग गये थे । फिर डांट के भगा दिया । गनीमत समझो कि पीट के न भगाया । तुम तो खुद गवाह हो बुजुर्गवार के हाथों मेरी दुरगत के ।”
मुकेश ने सहमति में सिर हिलाया ।
“तो फिर फाइनल जवाब क्या है तुम्हारा ?”
“फाइनल जवाब यही है कि रुपये पैसे के मामले में फौरन कुछ नहीं हो सकता ।”
“ठीक है ।”
सूरत पर गहरी नाउम्मीदी के भाव लिये वो रुखसत हुआ ।
***
मुकेश पार्किंग में पहुंचा ।
रिंकी की लाल रंग की मारुति-800 कार पार्किंग में मौजूद नहीं थी ।
वो ‘सत्कार’ में रश का टाइम शुरू होने की घड़ी थी, उस घड़ी रिंकी अमूमन वहां से कभी गैरहाजिर नहीं होती थी; आखिर वो वहां की मैनेजर थी, मैनेज करना होता था उसने रेस्टोरेंट को ।
वो रेस्टोरेंट में दाखिल हुआ ।
उसने हॉल में और पिछवाड़े शीशे की खिड़की वाले ऑफिस तक निगाह दौड़ाई और फिर कैशियर के पास पहुंचा ।
“रिंकी नहीं दिखाई दे रही ।” - उसने पूछा ।
“आज मैडम ने छुट्टी मारी है ।” - जवाब मिला ।
“अच्छा !”
“हां । जयगढ में मैडम की एक सहेली है, उसी के पास गयी हैं । पिक्चर का प्रोग्राम बताती थी । रात को ही लौटेंगी ।”
“आई सी ।”
वो बाहर निकला, उसने पार्किंग से देवसरे की एस्टीम उठाई और शहर पहुंचा ।
मामूली पूछताछ से उसे मालूम हो गया था कि उस इलाके का बड़ा और पुराना प्रापर्टी डीलर कौन था । उसका नाम दशरथ गोरे था और कम्यूनिटी सेंसर के परिसर में उसका फैंसी ऑफिस था जिस पर फेयरडील प्रापर्टीज का फैंसी बोर्ड लगा हुआ था ।
गोरे स्याह काली रंगत से जरा ही कम काली सूरत वाला, जैली की तरह हिलती तोंद वाला, मोटा थुलथुल आदमी निकला जो कि कमाल था कि अपने ऑफिस की एक ही कुर्सी में समाया हुआ था ।
उसने प्रेमभाव से उसे कुर्सी पेश की और पैप्सी से नवाजा । यानी कि वैसी आवभगत की जैसी मुर्गी की की जाती है ।
मुकेश ने उसे अपना नाम बताया ।
“वैलकम, मिस्टर माथुर ।” - वो बत्तीसी चमकाता बोला - “कहिये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ?”
“आप रीयल एस्टेट के बारे में मुझे गाइड कर सकते हैं ।”
“क्या खरीदना चाहते हैं ? फ्लैट ? कोठी ? बंगला ?”
“जो मैं खरीदना चाहता हूं, उसमें कोई फेयरडील आप सुझा सकें तो फ्लैट, कोठी, बंगले की मुझे जरूरत नहीं पड़ेगी ।”
“क्या मतलब ?”
“मैं औरंगाबाद से हूं । उधर हमारा होटल का फैमिली बिजनेस है । मैं मुम्बई में वकालत करता हूं लेकिन वकालत से भी उकताया हुआ हूं और उतने बड़े शहर की हाहाकारी जिन्दगी से भी उकताया हुआ हूं । मैं कदरन खामोश जगह में सैटल होना चाहता हूं और छोटा मोटा होटल या रिजॉर्ट बिना अपनी फैमिली की दख्लअन्दाजी से चलाना चाहता हूं ।”
“मिस्टर माथुर, जो कुछ आप चाहते हैं, इधर सब आपको हासिल हो सकता है । आप इधर हैं तो नोट किया ही होगा कि कितनी शान्ति है यहां । यहां के खूबसूरत बीचों और प्राचीन किलों और धर्म स्थानों की वजह से टूरिस्ट बिजनेस की भी इधर कोई कमी नहीं । लिहाजा मैं यही कह सकता हूं कि अपने मिशन के तहत आप एकदम सही जगह पर पहुंचे हैं ।”
“हौसलाअफजाई का शुक्रिया । अब ये बताइये कि आपकी निगाह में इधर या आसपास कोई छोटा सा, मॉडेस्ट सा, होटल या टूरिस्ट रिजॉर्ट है जो बिकाऊ हो ?”
“थी तो सही ऐन ऐसी एक प्रापर्टी....”
“थी ! अब नहीं है ?”
“मालिक के मिजाज की बात है । चार महीने से मधुकर बहार ने मेरे को बोल के रखा हुआ था कि वो अपनी प्रापर्टी बेचना चाहता था और चार महीने से मेरे को उसके लिये कोई ग्राहक नहीं लग रहा था । अब आज ही उसने मेरे को बोला कि मैं ग्राहक तलाशना बन्द कर दूं तो आप आ गये ।”
“ऐसा बोलने की वजह ?”
“मैंने पूछी नहीं । मेरा इतना बिजनेस है । एक प्रापर्टी मेरे जरिये बिकी या न बिकी, मुझे क्या फर्क पड़ता है !”
“वैसे वजह क्या रही होगी ?”
“कोई खरीदार खुद ही पहुंच गया होगा, उससे बयाना पकड़ लिया होगा । और क्या वजह हो सकती है !”
“यानी कि बेचने का उसका इरादा नहीं बदला होगा ?”
“कहां बदला होगा ! चार महीने से रोज ऐसे ही तो नहीं पूछता था कि ग्राहक लगा कि नहीं लगा । कहां बदला होगा !”
“आप मुझे वो प्रापर्टी दिखा सकते हैं ?”
“अगर मधुकर ने बयाना पकड़ लिया हुआ होगा तो अब प्रापर्टी देखने से क्या फायदा ?”
“फिर...”
“आप ऐसा कीजिये, आप खुद वहां चले जाइये । आपको प्रापर्टी पसन्द आ जाये और बयाने की बाबत मेरी बात गलत निकले तो यहां आ जाइयेगा मैं सौदा करा दूंगा ।”
“ठीक है ।”
“वहां बात न बने तो भी यहां आइयेगा, मैं आपको आपकी पसन्द की कोई और प्रापर्टी दिखाने की कोशिश करूंगा ।”
“ठीक है । अब बताइये मुझे कहां जाना है और कैसे जाना है ?”
“आप जयगढ वाली सड़क पकड़िये । उस पर सी साइड करके एक टूरिस्ट रिजॉर्ट है जो कि काफी मशहूर है, और जिस तक आप बिना किसी से रास्ता पूछे भी पहुंच जायेंगे । उससे थोड़ा ही आगे मधुकर बहार की प्रापर्टी है जो कि बहार विला कहलाती है ।”
“बहार विला ।”
***
बहार विला उजड़ा चमन निकला । वो एक बहुत बड़े कम्पाउन्ड में बनी अंग्रेजों के वक्त की दोमंजिला इमारत थी । बल्कि एक ढंकी राहदारी के दायें बायें बनी दो इमारतें थीं जो सामने एक बहुत बड़ा बड़ का पेड़ उगा होने की वजह से फासले से एक जान पड़ती थीं । इमारत तक जो लम्बा ड्राइव वे पहुंचता था उसके दोनों तरफ झाड़झंखाड़ और जंगली घास को बोलबाला था । ड्राइव वे के सिरे पर दोनों इमारतों से अलग एक लकड़ी का केबिन था जिसके शीशे के दरवाजे पर ऑफिस लिखा हुआ था । क्या दीवारें, क्या दरवाजे सब रंगरोगन के मोहताज जान पड़ते थे ।
दरवाजा ठेल कर वो ऑफिस में दाखिल हुआ तो उसकी अपेक्षा के विपरीत भीतर से वो अच्छी हालत में निकला । काउन्टर के पीछे एक आदमी बैठा कोई फिल्मी पत्रिका पढ रहा था । वो उम्र में साठ के पेटे में जान पड़ता था । और उसके चेहरे पर दो तीन दिन की दाढी थी । उसे देख कर उसने पत्रिका एक ओर डाली और कुर्सी पर सीधा हुआ ।
“कमरा चाहिये ?” - वो आशापूर्ण स्वर में बोला ।
“नहीं ।” - मुकेश बोला ।
इनकार सुनते ही उसका चेहरा लटक गया ।
“मेरा नाम माथुर है । मुझे मालूम हुआ है कि ये जगह बिकाऊ है । इसी बाबत मैं मधुकर बहार से मिलने आया था ।”
“अब तो नहीं है बिकाऊ लेकिन...”
“क्या लेकिन ?”
“है भी ।”
“क्या मतलब ?”
“कहीं सेल की बातचीत चली रही है इसलिये बिकाऊ नहीं है, बातचीत अभी फाइनल नहीं हुई इसलिये है भी ।”
“आई सी ।”
“खरीदार कौन है ? क्या तुम खुद हो ?”
“यही समझ लीजिये ।”
“होटल, बिजनेस का कोई तजुर्बा है ?”
“नहीं ।”
“फिर कैसे बीतेगी ?”
“बीत जाइयेगी । अब जरा मालिक से मुलाकात हो जाये तो...”
“हो रही है । मैं हूं मालिक । मेरा ही नाम मधुकर बहार है ।”
“ओह ।”
“तुम नौजवान हो, नातजुर्बेकार हो ऐसा अपनी जुबानी कुबूल करते हो इसलिये मेरी सलाह है कि इस धन्धे से दूर ही रहो । बहुत टेढा काम है ये ।”
“ये मैं उस शख्स की जुबानी सुन रहा हूं जो कि इसे बेचना चाहता है ?”
“है न हैरानी की बात ! लेकिन सीधे सादे भीड़ को गुमराह करने को मेरा मन नहीं मानता । तुम्हारी जगह कोई उम्रदराज, दुनियादार, श्याना यहां पहुंचा होता तो इसे बेहतरीन सौदा साबित करने की कोशिश में मैं एक की आठ लगाता ।”
“मैं आपकी साफगोई की कद्र करता हूं लेकिन जनाब, मैं नादान हूं, मेरा पार्टनर नादान नहीं है ।”
“अच्छा ! तो ये पार्टनरशिप डील है ?”
“जी हां ।”
“पार्टनर सच में काबिल और होशियार है या ऐसा जाहिर करके तुम्हें मुर्गी बना रहा है ?”
“अब क्या बोलूं !... बाई दि वे, आप बेच क्यों रहे हैं ?”
“मैं पैंसठ साल का हूं । पिछले साल बीवी मर गयी । दो लड़के हैं, दोनों कैनेडा में सैटल्ड हैं और लौट के आने का कोई इरादा नहीं रखते । मेरे से अब और जानमारी नहीं होती । यहां का हाल बेहाल इसलिये है क्योंकि रेनोवेशन दो लाख का खर्चा मांगती है जो मैं करना नहीं चाहता । पंचमढी में मैंने एक छोटा सा बंगला देखा है जो कि इस जगह की आधी कीमत में मुझे मिल जायेगा । अपनी बाकी की जिन्दगी मैं वहां गुजारना चाहता हूं इसलिये इसी हालत में इसे जैसे तैसे बेच देना चाहता हूं ।”
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10-18-2020, 01:05 PM,
#29
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
“क्या कीमत चाहते हैं ?”
“पैंतीस चाहता था लेकिन जिससे बात फाइनल होने की उम्मीद है उसे अट्ठाइस में मान गया हूं । वो तजुर्बेकार आदमी है और रिजॉर्ट चलाने का हर गुण, हर पैंतरा पहले से समझता है । अट्ठाइस मुझे देगा, दो ऊपर से लगायेगा तो ये जगह जगमग जगमग हो जायेगी ।”
“तीस लाख में ?”
“हां । ठीक से चला ले गया तो तीन साल से भी कम में कास्ट कवर कर लेगा ।”
“घिमिरे ?”
“क्या ?”
“घिमिरे ? माधव घिमिरे है वो खरीदार जिससे आपकी बातचीत चल रही है ?”
“हां ।”
“जो कि इस वक्त कोकोनट ग्रोव का मैनेजर है ?”
“हां । कैसे जानते हो ?”
“सुना किसी से । शायद फेयरडील प्रापर्टीज वाले दशरथ गोरे से । ठीक से ध्यान नहीं ।”
“हूं ।”
“कब से बातचीत चल रही है घिमिरे से ?”
“काफी अरसे से चल रही है । दो महीने तो हो ही गये समझो । पिछले हफ्ते आया था तो फाइनल भावताव भी कर गया था । लेकिन कोई बयाना नहीं दे गया था । इसीलिये मैंने कहा था कि जगह बिकाऊ थी भी और नहीं भी थी लेकिन फिर उसका फोन आया और उसने पचास हजार के बयाने के बदले में तीन महीने का टाइम लेने की बात पक्की कर ली ।”
“कब फोन आया ?”
“कल रात । सोते से जगाया उसकी टेलीफोन कॉल ने मुझे । बहुत खफा हुआ मैं । खास पूछा - क्यों भई, सुबह होने का इन्तजार नहीं कर सकता था ! माफी मांगने लगा लेकिन साथ ही बोला कि कई बार थोड़ी सी भी देर करने पर ऐसे डील बिगड़ जाते थे । बहरहाल रात को तीन महीने का टाइम और पचार हजार के बयाने पर बात फाइनल हो गयी ।”
“आई सी ।”
“आज सुबह फिर फोन आया कि वो कूरियर के जरिये पचास हजार का चैक भेज रहा था जो कि शाम तक मुझे मिल जायेगा । बाकी लिखत पढत वो एक दो दिन बाद आ के कर लेगा । अब शाम तक मुझे चैक मिल गया तो ठीक वरना कल आकर तुम बात कर लेना ।”
“कोई फायदा होगा मेरे लौट के आने का ?”
“लगता तो नहीं । क्योंकि घिमिरे बहुत संजीदा था डील के और बयाने का अदायगी के बारे में ।”
“फिर क्या फायदा ?”
“मेरा मतलब था चाहो तो एक फेरा लगा देखना ।”
“ठीक है ।”
***
उसका अगला पड़ाव हर्णेई था जहां कि दिनेश पारेख पाया जाता था ।
काफी पूछताछ के बाद वो उसके ठिकाने पर पहुंचा जो कि एक मैन मेड आइलैंड पर बसा जान पड़ता था । उस आइलैंड पर वैसी ही एक विशाल इमारत और थी और दोनों के बीच में पत्थर की एक ऊंची दीवार का पर्दा था । पारेख के ड्राइव वे के दहाने पर एक लोहे का फाटक था । फाटक खुला था लेकिन जो भी वाहन फाटक से भीतर दाखिल होता था उसे जमीन में फिक्स एक लोहे की चादर पर से गुजरना पड़ता था जिसका मकसद वो बाखूबी समझता था । इमारत वहां से बहुत दूर थी और राहदारी यूं पेड़ों सं ढंकी हुई थी कि फाटक से इमारत दिखाई नहीं देती थी । उस चादर पर वजन पड़ते ही इमारत के भीतर घन्टी बजती थी जो इस बात का ऐलान होती थी कि कोई आ रहा था ।
कोई एक फरलांग कार चला चुकने के बाद उसे इमारत दिखाई दी । इमारत का रुख समुद्र की तरफ था और उसके सामने उसका प्राइवेट पायर था जिस पर एक विशाल मोटरबोट लगी खड़ी दिखाई दे रही थी । इमारत के पहलू में एक विशाल गैराज था जिसमें आजू बाजू चार कारें खड़ी हो सकती थीं, दो तब भी खड़ी थीं जिनमें से एक सलेटी रंग की फोर्ड आइकान थी ।
फोर्ड आइकान ! सलेटी रंग की !
जैसी उसने पिछली रात रिजॉर्ट के परिसर से रुखसत होती देखी थी ।
क्या वो वही कार थी - उसके मन में सवाल उठा - या उस जैसी कोई कार थी !
कहना मुहाल था ।
फाटक से वहां तक सिग्नल पहुंचता था, उस बात का सबूत फौरन सामने आ गया ।
इमारत की सीढियों पर एक सूटधारी व्यक्ति, जो कि सूरत से कोई मवाली जान पड़ता था, साफ लगता था कि उसी के इन्तजार में वहां खड़ा था ।
कार रुकते ही वो ड्राइविंग साइड की खिड़की के करीब पहुंचा और बड़े असहिष्णुतापूर्ण भाव से उसे घूरने लगा ।
“मिस्टर पारेख से मिलना है ।” - उसके पूछने से पहले ही मुकेश बोला ।
“आप कौन हैं ?”
“मुकेश माथुर नाम है मेरा ।”
“पारेख साहब आपको जानते हैं ?”
“अब जान जायेंगे ।”
“साहब अनजान लोगों से नहीं मिलते ।”
“पहली बार हर कोई अनजान होता है । तुम्हारा साहब हमेशा इस रूल पर अमल करता होता तो आज तक किसी से भी न मिला होता । तनहा जिन्दगी तनहा गुजार रहा होता ।”
“मेरी समझ में नहीं आ रही आपकी बात ।”
“मुझे दिखाई दे रहा है । जितनी समझ है उतना ही तो काम करेगी । जा के अपने साहब को बोलो कि ब्लैक पर्ल क्लब का नया मालिक मिलने आया है ।”
ब्लैक पर्ल के जिक्र का उस पर कुछ असर होता लगा । वो कुछ क्षण अनिश्चित सा उसे घूरता रहा फिर घूमा और वापिस सीढियां चढ गया ।
मुकेश कार से निकला और दायें बायें चहलकदमी करने लगा ।
दो मिनट बाद वो शख्स वापिस लौटा ।
“आइये ।” - वो बोला ।
मुकेश सीढियां चढकर उसके करीब पहुंचा और फिर उसके पीछे हो लिया ।
इमारत के भीतर जहां उसके कदम पड़े वो एक छोटे मोटे हॉल जितना बड़ा ड्राईगरूम था जहां कि तीन निहायत सजावटी युवतियां और तीन मर्द बैठे हुए थे । सब के सामने या हाथों में ड्रिंक्स के गिलास थे ।
उसे देख कर सिल्क के कुर्ते पाजामे से सुसज्जित एक व्यक्ति अपने स्थान से उठा । बाकी लोगों के मुकाबले में उसकी पोशाक ही बता रही थी कि वो ही मेजबान था । उन्हें देखकर उसने अपना गिलास मेज पर रख दिया और उठकर उनकी ओर बढा ।
सूरत से वो मुकेश को बड़ा सुन्दर सजीला और तहजीब वाला आदमी लगा ।
लेकिन सूरत से क्या पता लगता था !
वो करीब पहुंचा, उसने सिर से पांव तक मुकेश का मुआयना किया और फिर बोला - “मैं हूं दिनेश पारेख ।”
मुकेश ने उसका अभिवादन किया ।
“रामदेव को तुमने अपना नाम मुकेश माथुर बताया था ?”
“हां ।”
“और बोला था कि तुम ब्लैक पर्ल के मालिक हो ?”
“हां ।”
“उसका मालिक तो बालाजी देवसरे है !”
“था ।”
“क्या मतलब ?”
मुकेश ने रामदवे की तरफ देखा । उसका मन्तव्य समझ कर पारेख ने रामदेव को इशारा किया । तत्काल रामदेव वहां से टल गया ।
“कल रात मिस्टर देवसरे का कत्ल हो गया है ।” - मुकेश बोला ।
“मालूम पड़ा है मुझे ।” - पारेख बोला ।
“कैसे ? अखबार पढ कर ?”
“मैं अखबार नहीं पड़ता । गणपतिपुले से एक पुलिस वाला यहां आया था । शायद अठवले नाम था ।”
“सदा अठवले ! इन्स्पेक्टर !”
“हां । वही । अभी एक घंटा पहले ही यहां से गया है । उसी ने बताया था तो पता चला था कि कल रात देवसरे के साथ क्या बीती थी ! अच्छा आदमी था देवसरे । मेरा पुराना वाकिफ था । बेटी के साथ हुई ट्रेजेडी ने तोड़ दिया बेचारे को ।” - उसने अवसादपूर्ण भाव से सिर हिलाया - “तुम कैसे बन गये क्लब के मालिक ?”
“मिस्टर देवसरे ही बना गये । वसीयत कर गये मेरे नाम ।”
उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आये ।
“कोई रिश्ता ?” - उसने पूछा ।
“नहीं ।”
“तो पुराने दोस्त हो ?”
“नहीं ।”
“तो फिर क्या उसका दिमाग हिल गया था मौत से पहले ?”
“ऐसी कोई बात नहीं थी । उन्होंने ऐसा क्यों किया ये तफ्तीश का मुद्दा है लेकिन किया, ये हकीकत है जिसको नकारना आसान न होगा ।”
“यहां कौन नकारना चाहता है ! हमारी तरफ से देवसरे अपना माल काले चोर को दे या कुयें में डाले, हमें क्या वान्दा है । अब बोलो, कैसे आये ?”
“आप क्लब खरीदना चाहते थे ।”
“कौन कहता है ?”
“परसों आप अनन्त महाडिक के साथ इस बाबत मिस्टर देवसरे से बात करने गये थे ।”
वो कुछ क्षण हिचकिचाया और फिर बोला - “चाहता तो था मैं वो क्लब खरीदना लेकिन... लड़कियां कैसी हैं ?”
“जी !”
“तीनों । एक से एक बढ के हैं न !”
“जी हां । हैं तो सही । लेकिन आप मेरे से क्यों पूछ रहे हैं ?”
“अभी हम समुद्र की सैर पर बस निकलने ही वाले थे । चाहो तो तुम भी साथ चलो । मजा आ जायेगा ।”
“अकेले को क्या मजा आ जायेगा ?”
“अकेले ! ओह, मैं समझा । तीन जमा तीन की वजह से अकेला कह रहे हो अपने आपको ! लेकिन कोई वान्दा नहीं । मैं दस मिनट में ऐसी ही एक और यहां बुला सकता हूं । बुलाऊं ?”
“नो सर ।”
“मजा आ जायेगा ।”
“मैं इतने मजे का आदी नहीं ।”
“मर्जी तुम्हारी । तुम्हें पीछे झांकता देख कर मैं शायद गलत समझ रहा था कि तुम्हारी लार टपक रही थी ।”
“टपक सकती थी । मुश्किल से काबू में की ।”
“टपक सकती थी । हा हा । फिर तो फिर टपक सकती है इसलिये चलो कहीं और चल के बात करते हैं ।”
“यस, सर दैट विल बी बैस्ट ।”
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10-18-2020, 01:05 PM,
#30
RE: Desi Sex Kahani वारिस (थ्रिलर)
एक लम्बे गलियारे में चलाता वो उसे एक ऑफिसनुमा कमरे में लाया जिसकी सजावट किसी इन्टीरियर डेकोरेटर का कमाल जान पड़ती थी । दीवारों से सटे बुकशैल्फ अनछुई किताबों से भरे हुए थे । एक दीवार के साथ एक शीशों की सजावट वाला बार था जिस पर बेल्जियम क्रॉकरी और स्कॉच विस्की बहुतायत में दिखाई दे रही थी । ऑफिस टेलब नक्काशीदार आबूनस की लकड़ी की थी और एग्जीक्यूटिव चेयर चमड़ा मंढी थी । वैसी ही टेबल के सामने लगी चार विजिटर्स चेयर थीं ।
वो एग्जीक्यूटिव चेयर पर ढेर हुआ और बोला - “बैठो ।”
“थैंक्यू ।”
दिनेश पारेख पढा लिखा था या अनपढ, शरीफ आदमी था या गैंगस्टर, कहना मुहाल था लेकिन एक बात प्रत्यक्ष थी कि वो सम्पन्न था और उसमें स्टाइल और शानबान की कोई कमी नहीं थी ।
उसने एक पेपरवेट थाम लिया और लट्टू की तरह उसे घुमाने लगा ।
“अब बोलो” - फिर वो बोला - “क्या कहना चाहते हो ?”
“तो ये बात सच है कि आप ब्लैक पर्ल क्लब खरीदना चाहते थे ?”
“हां ।”
“अस्सी लाख में सौदा हुआ था ?”
“सौदा नहीं हुआ था, मैंने इतनी कीमत की पेशकश की थी जिसके बारे में देवसरे ने सोच के बताना था ।”
“कब ?”
“आज । आज वो आफर कुबूल करने को जिन्दा होता तो हफ्ते भर में डील मुकम्मल हो जाता ।”
“मुझे हैरानी है कि आप वो क्लब खरीदने के ख्वाहिशमन्द हैं ।”
“क्यों भला ?”
“वो एक छोटी जगह है जो आपकी मौजूदा हैसियत से मेल नहीं खाती ।”
“तुम्हें क्या पता मेरी मौजूदा हैसियत का ?”
“आंखों से दिखाई दे रही है, कानों से भी सुनी ।”
“हूं ।” - उसने इतने जोर लट्टू घुमाया कि वो मेज से नीचे गिरता गिरता बचा - “मेरे भाई, जब ब्लैक पर्ल मेरी मिल्कियत होगी तो वो आज जैसी दिखाई नहीं देगी; वो साइज और सजावट दोनों में अबसे बड़ी और उम्दा होगी । कैसीनो तो मेरे गोवा के कैसीनो जैसा भव्य होगा । फिर देखते ही बनेगी बिजनेस की बहार ।”
“आई सी ।”
“महाडिक काबिल आदमी है लेकिन उसका बार पर जोर है । बार का क्या है, लोगबाग कारों में बैठ के पी लेते हैं, सरे राह पी लेते हैं, स्पैशिलिटी तो, टूरिस्ट अट्रैक्शन तो कैसीनो है जिसकी तरफ उसकी बार से आधी भी तवज्जो नहीं ।”
“आप ठीक कह रहे हैं ।”
“क्लब मेरे हाथ में आ जाये फिर देखना उसकी रौनक । एक चार पीस के बैंड और एक पॉप सिंगर से मेहमानों का कहीं मनोरंजन होता है ! मैं मुम्बई का टॉप का आर्केस्ट्रा वहां खड़ा करूंगा, कलकत्ते से टॉप की डांसर्ज बुलाऊंगा, फिर पहली ही चोट में प्राफिट चोट गुणा से ऊपर न पहुंच जाये तो कहना ।”
“क्लब आप खरीद लेते तो महाडिक का क्या होता ?”
“जाहिर है कि बुरा होता । लेकिन जो होता उसके लिये वो किसी को ब्लेम नहीं कर सकता । उसकी खुद की गलती है कि उसने देवसरे के साथ ऐसा स्टूपिड कान्ट्रैक्ट किया ।”
“उसे उम्मीद नहीं होगी न कि मिस्टर देवसरे कभी क्लब को बेचने की सोचने लगेंगे ।”
“यही बात है जिसका खामियाजा वो भुगतता । उस क्लब में फर्नीचर, किचन का तामझाम और जुए का साजोसामान उसका है, क्लब बिक जाने या देवसरे के उसकी लीज को रीन्यू करने से इनकार की सूरत में उसे वो तमाम साजोसामान वहां से उठा ले जाना पड़ता जो कि उसके लिये और भी बड़ी जहमत होता ।”
“बेच देने में क्या जहमत होती ?”
“कोई जहमत न होती । बिक तो वो क्लब में पड़ा पड़ा ही जाता लेकिन कोई कबाड़ी ही खरीदता जो रुपये के चार आने भी दे देता तो गनीमत होती । न बेचता तो स्टोरेज के लिये जगह तलाश करता फिरता ।”
“लेकिन आप खरीदते तो....”
“मैं कैसे खरीदता ? मेरा मिशन उस क्लब को चमकाना है, उसकी हैसियत बनाना है और मुनाफा बढाना है । ऐसा उसे उसके मौजूदा फटेहाल में चलाये रखने पर क्योंकर मुमकिन होता ?”
“ये भी ठीक है । अगर महाडिक ही क्लब को खरीदने की पेशकश करता तो क्या आप भाव बढा देते ?”
“नहीं । तो मैं सौदे से हाथ खींच लेता । मेरा अस्सी से ऊपर जाने का कोई इरादा नहीं था । वो मेरी टॉप आफर थी ।”
“महाडिक इस रकम का इन्तजाम नहीं कर सकता ?”
“जाहिर है कि नहीं कर सकता । कर सकता होता तो कर चुका होता ।”
“उसकी माली हालत इतनी कमजोर थी ?”
“कमजोर की मैं नहीं जानता लेकिन इतना जानता हूं कि हालिया कुछ दिनों में रॉलेट व्हील ने उसकी अच्छी कमर तोड़ी थी ।”
“सुना है मैंने । खुद आप ही ग्यारह लाख रुपये खींच लाये थे ।”
वो हंसा ।
“लेकिन” - फिर वो बोला - “अब इस गुफ्तगू का क्या मतलब है ? देवसरे की मौत की रू में अब तो तमाम सीनेरियो बदल गया है । अब तो उसके पास चायस है, अब वो पूर्वस्थापित शर्तों पर अपने कान्ट्रैक्ट को जब तक चाहे चलाये रख सकता है या मार्केट वैल्यू पर प्रापर्टी खुद खरीद सकता है ।”
“जब उसकी माली हालत कमजोर है तो....”
“अब कमजोर है । आगे सुधर सकती है । फिर दस जुलाई के बाद कान्ट्रैक्ट रीन्यू करने की पेशकश करके वो क्लब की सेल में अड़ंगा तो लगा ही सकता है ।”
“आप उस कान्ट्रैक्ट से बाखूबी वाकिस मालूम होते हैं ।”
“हूं तो सही । जिस आइटम का सौदा करना हो, उसकी हर टर्म एण्ड कन्डीशन की जानकारी तो रखनी पड़ती है न !”
“और आपकी जानकारी ये कहती है कि मिस्टर देवसरे के वारिस की हैसियत में मैं क्बल को नहीं बेच सकता ।”
“पहले वारिस बन तो लो । क्या पता इस मामले में दिल्ली अभी दूर हो ।”
“फर्ज कीजिये मेरे विरसे में कोई अड़ंगा नहीं, फिर आपका क्या जवाब है ?”
“मेरा जवाब यही है कि महाडिक अड़ंगा लगा सकता है, लगायेगा । नहीं लगायेगा तो सड़क पर होगा ।”
“ओह ।”
“इसलिये अगर क्लब के सौदे की खातिर तुम यहां आये हो तो बेकार आये हो । जिस प्रापर्टी में कोई डिस्प्यूट हो, वो तो मैं भी नहीं खरीदना चाहता ।”
“आपकी जानकारी के लिये मैं पेशे से वकील हूं और मेरा कानूनी ज्ञान ये कहता है कि कोई एग्रीमेंट, कोई कान्ट्रैक्ट इतना परफैक्ट नहीं होता कि उसमें कोई नुक्स न निकाला जा सके, कोई पंगा न डाला जा सके । अब मेरा सवाल यह है कि अगर मैं महाडिक के कान्ट्रैक्ट में कोई पंगा डाल पाऊं और उसे वाहड और अनमेनटेनेबल साबित कर दिखाऊं तो तब क्या आप अभी भी उस प्रापर्टी के खरीदार होंगे ?”
उसके नेत्र सिकुड़े और माथे पर बल पड़े, कुछ क्षण अपलक उसने मुकेश को देखा ।
“ऐसा हो सकता है ?” - वो बोला - “उसे कान्ट्रैक्ट को तोड़ा जा सकता है ?”
“उम्मीद तो बराबर है ।”
“उम्मीद !”
“ऐसे मामलों में गारन्टी करना बहुत मुश्किल होता है । अकेला मैं ही वकील नहीं हूं इस दुनिया में । बड़े बड़े आलादिमाग बैठे हैं इस धन्धे में जो कि तोड़ का भी तोड़ निकाल लेते हैं ।”
“तुमने कान्ट्रैक्ट देखा है ?”
“मिस्टर देवसरे के दिखाये एक बार देखा था ।” - मुकेश ने साफ झूठ बोला ।
“तब तुमने देवसरे पर ये खयाल क्यों नहीं जाहिर किया था कि वो कान्ट्रैक्ट कमजोर था और उसे तोड़ा जा सकता था ?”
मकेश गड़बड़ाया लेकिन जल्दी ही उसने अपने आप पर काबू पा लिया ।
“तब कान्ट्रैक्ट मुझे चौकस लगा था” - वो बोला - “क्योंकि तब मिस्टर देवसरे जिन्दा थे और कान्ट्रैक्ट में खास नुक्स निकालने की कोशिश के तहत उसको स्टडी करने की कोई जरूरत सामने नहीं थी । जमा तब मुझे ये नहीं मालूम था कि मैं मिस्टर देवसरे की वसीयत का बैनीफिशियेरी था । किसी तहरीर में कोई नुक्स निकाल के रहना हो तो उसे हरुफ-ब-हरुफ कई कई बार पढना पड़ता है । ऐसी कोई जरूरत तब सामने नहीं थी ।”
उसी क्षण तेजी से घूमता पेपरवेट पारेख की पकड़ से निकल गया, उसने उसे सम्भालने की कोशिश की तो उसका हाथ मेज के दायें कोने में पड़े कागजात के ढेर से टकराया नतीजतन कुछ कागज हवा में उड़ते नीचे कालीन पर जा गिरे ।
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