Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे
01-17-2019, 01:45 PM,
#11
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
गोपालजी – मंगल , बाँहें एक अंगुल ढीली हैं. अब मैं पीठ पर चेक करता हूँ. मैडम आप पीछे घूम जाओ और मुँह मंगल की तरफ कर लो.

मंगल एक कॉपी में नोट कर रहा था. अब मैं पीछे को मुड़ी और मंगल की तरफ मुँह कर लिया. मंगल खुलेआम मेरी तनी हुई चूचियों को घूरने लगा. मुझे बहुत इरिटेशन हुई लेकिन क्या करती. उस छोटे से कमरे में गर्मी से मुझे पसीना आने लगा था. मैंने देखा ब्लाउज में कांख पर पसीने से गीले धब्बे लग गये हैं. फिर मैंने सोचा पीछे मुड़ने के बावजूद गोपालजी मेरी पीठ पर ब्लाउज क्यूँ नही चेक कर रहा है ?

गोपालजी – मैडम , बुरा मत मानो , लेकिन आपकी पैंटी इस ब्लाउज से भी ज़्यादा अनफिट है.

“क्या….... ?????”

गोपालजी – मैडम , प्लीज़ मेरी बात पर नाराज़ मत होइए. जब आप पीछे मुड़ी तो रोशनी आप पर ऐसे पड़ी की मुझे पेटीकोट के अंदर दिख गया. अगर आपको मेरी बात का विश्वास ना हो तो , मंगल से कहिए की वो इस तरफ आकर चेक कर ले.

“नही नही , कुछ चेक करने की ज़रूरत नही. मुझे आपकी बात पर विश्वास है.”

मुझे यकीन था की टेलर ने मेरे पेटीकोट के अंदर पैंटी देख ली होगी. तभी मैंने जल्दी से मंगल को चेक करने को मना कर दिया. वरना वो गँवार भी मेरे पीछे जाकर उस नज़ारे का मज़ा लेता. शरम से मेरे हाथ अपने आप ही पीछे चले गये और मैंने अपनी हथेलियों से नितंबों को ढकने की कोशिश की.

“लेकिन आप को कैसे पता चला की …….….”

अच्छा ही हुआ की गोपालजी ने मेरी बात काट दी क्यूंकी मुझे समझ नही आ रहा था की कैसे बोलूँ . मेरी बात पूरी होने से पहले ही वो बीच में बोल पड़ा.

गोपालजी – मैडम , आप ऐसी पैंटी कहाँ से ख़रीदती हो , ये तो पीछे से एक डोरी के जैसे सिकुड गयी है.

मैं थोड़ी देर चुप रही . फिर मैंने सोचा की इस बुड्ढे आदमी को अपनी पैंटी की समस्या बताने में कोई बुराई नही है. क्या पता ये मेरी इस समस्या का हल निकाल दे. तब मैंने सारी शरम छोड़कर गोपालजी को बताया की चलते समय पैंटी सिकुड़कर बीच में आ जाती है और मैंने कई अलग अलग ब्रांड की पैंटीज को ट्राइ किया पर सब में मुझे यही प्राब्लम है.

गोपालजी – मैडम , आपकी समस्या दूर हो गयी समझो. उस कपड़ों के ढेर को देखो. कम से कम 50 – 60 पैंटीज होंगी उस ढेर में. मेरी बनाई हुई कोई भी पैंटी ऐसे सिकुड़कर बीच में नही आती. मंगल , एक पैंटी लाओ , मैं मैडम को दिखाकर समझाता हूँ.

उन दोनो मर्दों के सामने अपनी पैंटी के बारे में बात करने से मुझे शरम आ रही थी तो मैंने बात बदल दी.

“गोपालजी , पहले ब्लाउज ठीक कर दीजिए ना. मैं ऐसे ही कब तक खड़ी रहूंगी ?”

गोपालजी – ठीक है मैडम . पहले आपका ब्लाउज ठीक कर देता हूँ.

गोपालजी ने पीछे से गर्दन के नीचे मेरे ब्लाउज को अंगुली डालकर खींचा , कितना ढीला हो रहा है ये देखने के लिए. गोपालजी की अंगुलियों का स्पर्श मेरी पीठ पर हुआ , उसकी गरम साँसें मुझे अपनी गर्दन पर महसूस हुई , मेरे निप्पल ब्रा के अंदर तनकर कड़क हो गये.

मुझे थोड़ा अजीब लगा तो मैंने अपनी पोज़िशन थोड़ी शिफ्ट की. ऐसा करके मैं बुरा फँसी क्यूंकी इससे मेरे नितंब गोपालजी की लुंगी में तने हुए लंड से टकरा गये. गोपालजी ने भी मेरे सुडौल नितंबों की गोलाई को ज़रूर महसूस किया होगा. उसका सख़्त लंड अपने नितंबों पर महसूस होते ही शरमाकर मैं जल्दी से थोड़ा आगे को हो गयी. मुझे आश्चर्य हुआ , हे भगवान ! इस उमर में भी गोपालजी का लंड इतना सख़्त महसूस हो रहा है. ये सोचकर मुझे मन ही मन हँसी आ गयी.

गोपालजी – मैडम , ब्लाउज पीठ पर भी बहुत ढीला है. मंगल पीठ में दो अंगुल ढीला है.

फिर गोपालजी मेरे सामने आ गया और ब्लाउज को देखने लगा. उसके इतना नज़दीक़ होने से मेरी साँसें कुछ तेज हो गयी. सांसो के साथ ऊपर नीचे होती चूचियाँ गोपालजी को दिख रही होंगी. ब्लाउज की फिटिंग देखने के लिए वो मेरे ब्लाउज के बहुत नज़दीक़ अपना चेहरा लाया. मुझे अपनी चूचियों पर उसकी गरम साँसें महसूस हुई. लेकिन मैंने बुरा नही माना क्यूंकी उसकी नज़र बहुत कमज़ोर थी. 

गोपालजी – मैडम, ब्लाउज आगे से भी बहुत ढीला है. 

मेरे ब्लाउज को अंगुली डालकर खींचते हुए गोपालजी बोला .

गोपालजी ने मेरे ब्लाउज को खींचा तो मंगल की आँखे फैल गयी , वो कमीना कल्पना कर रहा होगा की काश गोपालजी की जगह मैं होता तो ऐसे ब्लाउज खींचकर अंदर का नज़ारा देख लेता.

गोपालजी – मैडम , अब आप अपने हाथ ऊपर कर लो. मैं नाप लेता हूँ.

मैंने अपने हाथ ऊपर को उठाए तो मेरी चूचियाँ आगे को तन गयी. ब्लाउज में मेरी पसीने से भीगी हुई कांखें भी एक्सपोज़ हो गयी. उन दो मर्दों के लिए तो वो नज़ारा काफ़ी सेक्सी रहा होगा , जो की मंगल का चेहरा बता ही रहा था.

अब गोपालजी ने अपनी बड़ी अंगुली मेरी बायीं चूची की साइड में लगाई और अंगूठा मेरे निप्पल के ऊपर. उनके ऐसे नाप लेने से मेरे बदन में कंपकपी दौड़ गयी. ये आदमी नाप लेने के नाम पर मेरी चूची को दबा रहा है और मैं कुछ नही कर सकती. उसके बाद गोपालजी ने निप्पल की जगह अंगुली रखी और हुक की जगह अंगूठा रखा. 

गोपालजी – मंगल , कप वन फुल एच.

मंगल ने नोट किया और गोपालजी की फैली हुई अंगुलियों को एक डोरी से नापा.

गोपालजी – मैडम, अब मैं ये जानना चाहता हूँ की आपका ब्लाउज कितना टाइट रखना है, ठीक है ?

मैंने हाँ में सर हिला दिया , पर मुझे मालूम नही था की ये बात वो कैसे पता करेगा.

गोपालजी – मैडम , आपको थोड़ा अजीब लगेगा , लेकिन मेरा तरीका यही है. आप ये समझ लो की मेरी हथेली आपका ब्लाउज कवर है. मैं आपकी छाती अपनी हथेली से धीरे से अंदर को दबाऊँगा और जहाँ पर आपको सबसे ठीक लगे वहाँ पर रोक देना, वहीं पर ब्लाउज के कप सबसे अच्छी तरह फिट आएँगे.

हे भगवान ! ये हरामी बुड्ढा क्या बोला. एक 28 साल की शादीशुदा औरत की चूचियों को खुलेआम दबाना चाहता है , और कहता है आपको थोड़ा अजीब लगेगा. थोड़ा अजीब ? कोई मर्द मेरे साथ ऐसा करे तो मैं तो एक थप्पड़ मार दूँगी .

“लेकिन गोपालजी ऐसा कैसे ……..कोई और तरीका भी तो होगा.”

गोपालजी – मैडम, आश्रम से जो 34 साइज़ का ब्लाउज आपको मिला है, उसको मैंने जिस औरत की नाप लेकर बनाया था वो आपसे कुछ पतली थी. अगर आप एग्ज़ॅक्ट साइज़ नापने नही दोगी तो ब्लाउज आपको कप में कुछ ढीला या टाइट रहेगा.

“गोपालजी , अगर टेप से नाप लेते तो मुझे कंफर्टेबल रहता. प्लीज़….”

मैं विनती करने के अंदाज़ में बोली. गोपालजी ने ना जाने क्या सोचा पर वो मान गया. 

गोपालजी – ठीक है मैडम, अगर आपको अच्छा नही लग रहा तो मैं ऐसे नाप नही लूँगा. मैं ब्लाउज को आपके कप साइज़ के हिसाब से सिल दूँगा. लेकिन ये आपको थोड़ा ढीला या टाइट रहेगा , आप एडजस्ट कर लेना.

उसकी बात सुनकर मैंने राहत की सांस ली. चलो अब ये ऐसे खुलेआम मेरी चूचियों को तो नही दबाएगा. ऐसे नाप लेने के बहाने ना जाने कितनी औरतों की चूचियाँ इसने दबाई होंगी.

तभी मंगल ज़ोर से चीखा और मेरी तरफ कूद गया , मुझसे टकराते टकराते बचा. गोपालजी दो तीन कदम पीछे हो गया और मेरा हाथ खींचकर मुझे भी दो तीन कदम खींच लिया. मैंने पीछे मुड़कर देखा की क्या हुआ . दरवाजे पर दो साँप खड़े थे.

मंगल – ये तो साँपों का जोड़ा है.

गोपालजी – हाँ, मैंने देख लिया है. कोई भी अपनी जगह से मत हिलना.
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01-17-2019, 01:45 PM,
#12
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साँप दरवाज़े पर थे और अगर वो हमारी तरफ बढ़ते तो बचने के लिए कोई जगह नही थी क्यूंकी कमरा छोटा था. साँप हमारी तरफ देख रहे थे पर कमरे के अंदर को नही आ रहे थे. अपने इतने नज़दीक़ साँप देखकर मैं बहुत डर गयी थी. मंगल भी डरा हुआ लग रहा था लेकिन गोपालजी शांत था. गोपालजी ने बताया की साँप तो पहले भी आस पास खेतों में दिखते रहते थे पर ऐसे दरवाज़े पर कभी नही आए. 

कुछ देर तक गोपालजी ने साँपों को भगाने की कोशिश की. उनकी तरफ कोई चीज़ फेंकी , फिर कपड़ा हिलाकर उन्हें भगाने की कोशिश की, पर वो साँप दरवाज़े से नही हिले.

साँपों को दरवाज़े से ना हिलते देख डर से मेरा पसीना बहने लगा.

गोपालजी – अब तो एक ही रास्ता बचा है. साँपों को दूध देना पड़ेगा. क्या पता दूध पीकर चले जाएँ , नही तो किसी भी समय अंदर की तरफ आकर हमें काट सकते हैं.

मुझे भी ये उपाय सही लगा .

मंगल – लेकिन दूध लेने के लिए मैं बाहर कैसे जाऊँ ? दरवाज़े पर तो साँप हैं.

“हाँ गोपालजी, बाहर तो कोई नही जा सकता. अब क्या करें ? “

गोपालजी ने कुछ देर सोचा , फिर बोला,”मैडम, अब तो सिर्फ़ आप ही इस मुसीबत से बचा सकती हो.”

“मैं ??....मैं क्या कर सकती हूँ ??

गोपालजी – मैडम , आपके पास तो नेचुरल दूध है. प्लीज़ थोड़ा सा दूध निकालकर साँपों को दे दो , क्या पता साँप चले जाएँ.

मैं तो अवाक रह गयी. इस हरामी बुड्ढे की बात का क्या मतलब है ? मैं अपनी चूचियों से दूध निकालकर साँपों को पिलाऊँ ? 

गोपालजी – मैडम , ज़रा ठंडे दिमाग़ से सोचो. दूध पीकर ही ये साँप जाएँगे. आपको चूचियों से दूध निकालने में 2 मिनट ही तो लगेंगे.

मंगल – मैडम , ये छोटा सा कटोरा है. इसमें दूध निकाल दो.

मैं तो निसंतान थी इसलिए मेरी चूचियों में दूध ही नही था. ये बात उन दोनों मर्दों को मालूम नही थी. मेरे पास और कोई चारा नही था, मुझे बताना ही पड़ा.

“गोपालजी, मैं तो ……मेरा मतलब ……अभी तक मेरा कोई बच्चा नही हुआ है. इसलिए वो….... शायद आप समझ जाओगे…....”

गोपालजी समझ गया की मेरी चूचियों में दूध नही है. 

गोपालजी – ओह, मैं समझ गया मैडम. अब तो आख़िरी उम्मीद भी गयी.

गोपालजी मेरी बात समझ गया , पर कमीना मंगल मेरे पीछे पड़ा रहा.

मंगल – मैडम , मैंने सुना है की अगर अच्छे से चूचियों को चूसा जाए तो कुँवारी लड़कियों का भी दूध निकल जाता है.

“बकवास बंद करो. गोपालजी प्लीज़…..”

गोपालजी – मंगल , बकवास मत करो. क्या मतलब है तुम्हारा ? तुम मैडम की चूचियों को चूसोगे और दूध निकल आएगा ? मैडम की चूचियों में दूध तभी बनेगा जब मैडम गर्भवती होगी. तुमने सुना नही मैडम अभी तक गर्भवती नही हुई है.

मैं बहुत एंबरेस्ड फील कर रही थी. मंगल ने एक जनरल सेंस में बात कही थी पर गोपालजी ने सीधे मेरे बारे में ऐसे बोल दिया. शरम से मैं गोपालजी से आँखें नही मिला पा रही थी. लेकिन उनके शब्दों से मेरी चूचियाँ कड़क हो गयी.

घबराहट और गर्मी से मुझे इतना पसीना आ रहा था की ब्लाउज गीला हो गया था. और अंदर से सफेद ब्रा दिखने लगी थी. कमर से नीचे भी मैं अश्लील दिखने लगी थी क्यूंकी मेरी जांघों पर पसीने से पेटीकोट चिपक गया था. जिससे मेरी जांघों का शेप दिखने लगा था. मैंने हाथ से पेटीकोट को खींचा और जांघों से अलग कर दिया.

एक बात मुझे हैरान कर रही थी की साँप कमरे के अंदर को नही आ रहे थे , वहीं दरवाज़े पर ही कुंडली मारे बैठे थे.

मंगल – अब क्या करें ?

कुछ देर तक चुप्पी रही. फिर गोपालजी को एक उपाय सूझा , जिससे अजीब और बेतुकी बात मैंने पहले कभी नही सुनी थी.

गोपालजी – हाँ , मिल गया . एक उपाय मिल गया.

गोपालजी ज़ोर से ताली बजाते हुए बोला. मंगल और मैं हैरान होकर गोपालजी को देखने लगे.

गोपालजी – ध्यान से सुनो मंगल. तुम हमें बचा सकते हो.

मेरी ही तरह मंगल की भी कुछ समझ में नही आया.

गोपालजी – मेरी बात ध्यान से सुनो. एक ही उपाय है जिससे इन साँपों से छुटकारा मिल सकता है. मैडम की चूचियों में दूध नही है इसलिए मैंने ये तरीका सोचा है.

गोपालजी कुछ पल चुप रहा. मैं सोचने लगी अब कौन सा उपाय बोलेगा ये.

गोपालजी – मैडम, हमारे पास दूध नही है लेकिन हम दूध जैसे ही किसी सफेद पानी से साँपों को बेवक़ूफ़ बना सकते हैं. साँप उसमे अंतर नही कर पाएँगे. मंगल तुम मुठ मारकर अपना वीर्य इस कटोरे में निकालो और फिर हम इस कटोरे को साँपों के आगे रख देंगे.

कमरे में एकदम चुप्पी छा गयी. गोपालजी का उपाय था तो ठीक , लेकिन उस छोटे से कमरे में एक अनजान आदमी मेरे सामने मुठ मारेगा , ये तो बड़ी शरम वाली बात थी.

मुझे बहुत अनकंफर्टेबल फील हो रहा था लेकिन मेरे पास कोई और उपाय भी नही था. कैसे भी साँपों से छुटकारा पाना था . गोपालजी की बात का मैं विरोध भी नही कर सकती थी.

मंगल – ये उपाय काम करेगा क्या ?

गोपालजी – काम कर भी सकता है और नही भी. मैडम, मैं जानता हूँ की आपको थोड़ा अजीब लगेगा पर आपकी चूचियों में दूध नही है तो हमारे पास कोई और चारा भी नही है.

“मैं समझ सकती हूँ गोपालजी.”

मैं और क्या बोलती. एक तो वैसे ही मैं बहुत देर से सिर्फ़ ब्लाउज पेटीकोट में थी , अब ये ऐसा बेतुका उपाय. मुझे तो इसके बारे में सोचकर ही बदन में झुरजुरी होने लगी थी.

गोपालजी – मंगल. जल्दी करो. साँप किसी भी समय हमारी तरफ आ सकते हैं.

मंगल – कैसे जल्दी करूँ. मुझे समय तो लगेगा. कुछ सोचना तो पड़ेगा ना.

उसकी बात पर मुझे हँसी आ गयी. मेरी हँसी देखकर मंगल की हिम्मत बढ़ गयी.

मंगल – मैडम, इस बुड्ढे आदमी को ये भी याद नही होगा की कितने साल मुठ मारे हो गये और मुझसे जल्दी करो कह रहा है.

मुझे फिर से उसकी बात पर हँसी आ गयी . माहौल ही कुछ ऐसा था. एक तरफ साँपों का डर और दूसरी तरफ ऐसी बेहूदा बातें हो रही थी. पर इन सब बातों से मुझे कुछ उत्तेजना भी आ रही थी. उस समय मुझे पता नही था की आश्रम से आते वक़्त जो मैंने दवाई ली है , ये उसका असर हो रहा है.

गोपालजी – ऐसी बात नही है. अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं तुम्हें दिखाऊँगा की इस उमर में भी मैं क्या कर सकता हूँ.

मंगल – अगर तुम ये करोगे तो तुम्हें हार्ट अटैक आ जाएगा . ग़लत बोल रहा हूँ मैडम ?

इस बेहूदे वार्तालाप को सुनकर मुझे मुस्कुराकर सर हिलाना पड़ रहा था. 

मंगल अब मुठ मारना शुरू करने वाला था. मेरा दिल जोरो से धड़कने लगा और मेरे निप्पल तनकर कड़क हो गये. मंगल ने दीवार की तरफ मुँह कर लिया और अपनी लुंगी उतार दी. अब वो सिर्फ़ अंडरवियर और बनियान (वेस्ट) में था. मैंने देखा उसने अपने दोनों हाथ आगे किए और मुठ मारना शुरू किया. बीच बीच में पीछे मुड़कर वो दरवाज़े पर साँपों को भी देख रहा था. 

कुछ देर बाद मंगल की आवाज़ आई.

मंगल – मैं कुछ सोच ही नही पा रहा हूँ. मेरे मन में साँपों का डर हो रहा है. मेरा लंड खड़ा ही नही हो पा रहा है.

कमरे में चुप्पी छा गयी. अब मंगल ने हमारी तरफ मुँह कर लिया. अंडरवियर के अंदर हाथ डालकर उसने अपने लंड को पकड़ा हुआ था. अंडरवियर पतले कपड़े का था जिससे उसके लटके हुए बड़े लंड की शेप दिख रही थी.

गोपालजी – हम्म्म ……...अब क्या करें ? मैडम ?

मेरे पास बोलने को कुछ नही था.

गोपालजी – देखो मंगल , एक काम करो. तुम मैडम की तरफ देखो और मुठ मारने की कोशिश करो. औरत को देखने से तुम्हारा काम बनेगा.

“क्या ??? ” ….मैं ज़ोर से चिल्ला पड़ी.

गोपालजी – मैडम, आपको देखने से उसका काम बनता है तो देखने दो ना. हमको सफेद पानी चाहिए बस और कुछ थोड़ी करना है.

“लेकिन गोपालजी , ये तो बिल्कुल ग़लत…..”

मुझे इतनी शरम आ रही थी की मेरी आवाज़ ही बंद हो गयी. मेरे विरोध से वो दोनों आदमी रुकने वाले नही थे.

गोपालजी – मैडम , प्लीज़ आप सहयोग करो. अगर आपको बहुत शरम आ रही है तो दीवार की तरफ मुँह कर लो. मंगल आपको पीछे से देखकर मुठ मारने की कोशिश करेगा.

मंगल – हाँ मैडम , मैं ऐसे कोशिश करूँगा.

मंगल कमीना बेशर्मी से मुस्कुरा रहा था. और कोई चारा ना देख मैं राज़ी हो गयी और दीवार की तरफ मुँह कर लिया.

मेरी कुछ समझ में नही आ रहा था क्यूंकी पहले कभी ऐसे परिस्थिति में नही फँसी थी. रास्ते में चलते हुए मर्दों की निगाहें मेरी चूचियों और हिलते हुए नितंबों पर मैंने महसूस की थी पर ऐसे जानबूझकर कोई मर्द मेरे बदन को देखे ऐसा तो कभी नही हुआ था. 

मंगल पेटीकोट में मेरे उभरे हुए नितंबों को देख रहा होगा. मुझे याद है एक बार मैं अपने बेडरूम में बालों में कंघी कर रही थी तो मेरे पति ने पेटीकोट में मेरे नितंबों को देख कर कहा था , ‘डार्लिंग तुम्हारे नितंब तो बड़े कद्दू की तरह लग रहे हैं’. शायद मंगल भी वही सोच रहा होगा. मेरे उभरे हुए सुडौल नितंब उन दोनों मर्दों को बड़े मनोहारी लग रहे होंगे. और कम्बख्त पैंटी भी सिकुड़कर नितंबों के बीच की दरार में आ गयी थी. मेरे लिए वो बड़ी शर्मनाक स्थिति थी की एक अनजान गँवार आदमी मेरे बदन को देखकर मुठ मार रहा था और वो भी मेरी सहमति से. 

मंगल – मैडम, आप पीछे से बहुत सुंदर लग रही हो. भगवान का शुक्र है , आपने साड़ी नही पहनी है , वरना ये सब ढक जाता.

गोपालजी – मैडम , मंगल सही बोल रहा है. पीछे से आप बहुत आकर्षक लग रही हो.

अब गोपालजी भी मंगल के साथ मेरे बदन की तारीफ कर रहा था. 

मैं क्या बोलती . ‘ प्लीज़ जल्दी करो’ इतना ही बोल पाई.
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01-17-2019, 01:45 PM,
#13
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
मंगल – मैडम, आप पीछे से बहुत सुंदर लग रही हो. भगवान का शुक्र है , आपने साड़ी नही पहनी है , वरना ये सब ढक जाता.

गोपालजी – मैडम , मंगल सही बोल रहा है. पीछे से आप बहुत आकर्षक लग रही हो.

अब गोपालजी भी मंगल के साथ मेरे बदन की तारीफ कर रहा था. 

मैं क्या बोलती . ‘ प्लीज़ जल्दी करो’ इतना ही बोल पाई.


कुछ देर बाद फिर से उस लफंगे मंगल की आवाज़ आई.

मंगल – मैडम , मैं अभी भी नही कर पा रहा हूँ. ये साँप अपनी मुंडी हिला रहे हैं , मेरी नज़र बार बार उन पर चली जा रही है.

“अब उसके लिए मैं क्या कर सकती हूँ ?”
मुझे इरिटेशन होने लगी थी. 

गोपालजी – मंगल , तुम मैडम के नज़दीक़ आ जाओ. मैं साँपों पर नज़र रखूँगा , डरो मत. मैडम , आप भी इसको जल्दी मुठ मारने में मदद करो.

“अब और क्या करू मैं ?”

गोपालजी – मैडम, आप बहुत कुछ कर सकती हो. अभी आप एक मूर्ति के जैसे चुपचाप खड़ी हो. अगर आप थोड़ा सहयोग करो……... मेरा मतलब अगर आप अपनी कमर थोड़ा हिलाओ तो मंगल को आसानी होगी. 

“क्या मतलब है आपका , गोपालजी ?”

गोपालजी – मैडम, आप दीवार पर हाथ रखो और एक डांसर के जैसे अपनी कमर हिलाओ. मैडम थोड़ा मंगल के बारे में भी सोचो. दरवाज़े पर साँप मुंडी हिला रहे हैं और हम मंगल से मुठ मारने को कह रहे हैं.

“ठीक है. मैं समझ गयी.”

क्या समझी मैं ? यही की मुझे पेटीकोट में अपने नितंब गोल गोल घुमाने पड़ेंगे जिससे ये कमीना मंगल एक्साइटेड हो जाए और इसका लंड खड़ा हो जाए. हे ईश्वर ! कहाँ फँस गयी थी मैं . पर कोई चारा भी तो नही था. मैंने समय बर्बाद नही किया और जैसा गोपालजी ने बताया वैसा ही करने लगी.

मैंने अपने दोनों हाथ आँखों के लेवल पर दीवार पर रख दिए. ऐसा करने से मेरे बड़े सुडौल नितंब पेटीकोट में पीछे को उभर गये. अब मैं अपनी कमर मटकाते हुए नितंबों को गोल गोल घुमाने लगी. मुझे अपने स्कूल के दिनों में डांस क्लास की याद आई जब हमारी टीचर एक लय में नितंबों को घुमाने को कहती थी.

गोपालजी और मंगल दोनों मेरे इस भद्दे और अश्लील नृत्य की तारीफ करने लगे. मैंने उन्हें बताया की स्कूल के दिनों में मैंने डांस सीखा था. मैंने एक नज़र पीछे घुमा कर देखा मंगल मेरे नज़दीक़ आ गया था और उसकी आँखें मेरे हिलते हुए नितंबों पर गड़ी हुई थीं. इस अश्लील नृत्य को करते हुए मैं अब गरम होने लगी थी. मैंने अपने नितंबों को घुमाना जारी रखा , पीछे से मंगल की गहरी साँसें लेने की आवाज़ सुनाई दे रही थी. एक जाहिल गँवार को मुठ मारने में मदद करने के लिए अश्लील नृत्य करते हुए अब मैं खुद भी उत्तेजना महसूस कर रही थी. मेरी चूचियाँ तन गयी थी और चूत से रस बहने लगा था. ये बड़ी अजीब लेकिन कामुक सिचुएशन थी. 

फिर कुछ देर तक पीछे से कोई आवाज़ नही आई तो मुझे बेचैनी होने लगी. मैंने पीछे मुड़कर गोपालजी और मंगल को देखा. मंगल के अंडरवियर में उसका लंड एक रॉड के जैसे तना हुआ था और वो अपने अंडरवियर में हाथ डालकर तेज तेज मुठ मार रहा था. मैं शरमा गयी , लेकिन उस उत्तेजना की हालत में मेरा मन उस तने हुए लंड को देखकर ललचा गया. 

मेरे पीछे मुड़कर देखने से मंगल का ध्यान भंग हुआ.

मंगल – अभी नही हुआ मैडम.

अब उस सिचुयेशन में मैं रोमांचित होने लगी थी और मैं खुद को नटखट लड़की जैसा महसूस कर रही थी. मुझे हैरानी हुई की मैं ऐसा क्यूँ महसूस कर रही हूँ ? मैं तो बहुत ही शर्मीली हाउसवाइफ थी, हमेशा बदन ढकने वाले कपड़े पहनती थी. मर्दों के साथ चुहलबाज़ी , अपने बदन की नुमाइश, ये सब तो मेरे स्वभाव में ही नही था. फिर मैं इन दो अनजाने मर्दों के सामने ऐसे अश्लील नृत्य करते हुए रोमांच क्यूँ महसूस कर रही थी ? ये सब गुरुजी की दी हुई उस दवाई का असर था जो उन्होने मुझसे आश्रम से बाहर जाते हुए खाने को कहा था. मेरे शर्मीलेपन पर वो जड़ी बूटी हावी हो रही थी.

मंगल की आँखों में देखते हुए शायद मैं पहली बार मुस्करायी.

“कितना समय और लगेगा मंगल ?”

गोपालजी – मैडम , मेरे ख्याल से मंगल को आपकी थोड़ी और मदद की ज़रूरत है.

“क्या बात है ? मुझे बताओ गोपालजी . मैं कोई ज्योतिषी नही हूँ. मैं उसके मन की बात थोड़ी पढ़ सकती हूँ.”

मंगल के खड़े लंड से मैं आँखें नही हटा पा रही थी. अंडरवियर के अंदर तने हुए उस रॉड को देखकर मेरा बदन कसमसाने लगा था और मेरी साँसें भारी हो चली थीं.

गोपालजी – मैडम , आप अपना डांस जारी रखो और प्लीज़ मंगल को छूने दो अपने…....

गोपालजी ने जानबूझकर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया. वो देखना चाहता था मैं उसकी बात पर कैसे रियेक्ट करती हूँ. गोपालजी अनुभवी आदमी था , उसने देख लिया था की अब मैं पूरी गरम हो चुकी हूँ और शायद उसकी बात का विरोध नही करूँगी.

गोपालजी – मैडम , मैं वादा करता हूँ , मंगल आपको कहीं और नही छुएगा. मेरे ख्याल से , आपको छूने से मंगल का पानी जल्दी निकल जाएगा.

आश्रम में आने से पहले , अगर किसी आदमी ने मुझसे ये बात कही होती की वो मेरे नितंबों को छूना चाहता है तो मैं उसे एक थप्पड़ मार देती. वैसे ऐसा नही था की किसी अनजाने आदमी ने मुझे वहाँ पर छुआ ना हो. भीड़भाड़ वाली जगहों में, ट्रेन , बस में कई बार साड़ी या सलवार के ऊपर से , मेरे नितंबों और चूचियों पर , मर्दों को हाथ फेरते हुए मैंने महसूस किया था. पर वैसा तो सभी औरतों के साथ होता है. भीड़ भरी जगहों पर औरतों के नितंबों और चूचियों को दबाने का मौका मर्द छोड़ते कहाँ हैं , वो तो इसी ताक में रहते हैं. लेकिन जो अभी मेरे साथ हो रहा था वैसा तो किसी औरत के साथ नही हुआ होगा.

लेकिन सच्चाई ये थी की मैं बहुत उत्तेजित हो चुकी थी. उस छोटे कमरे की गर्मी और खुद मेरे बदन की गर्मी से मेरा मन कर रहा था की मैं ब्लाउज और ब्रा भी उतार दूं. वो अश्लील नृत्य करते हुए पसीने से मेरी ब्रा गीली हो चुकी थी और मेरी आगे पीछे हिलती हुई बड़ी चूचियाँ ब्रा को फाड़कर बाहर आने को आतुर थीं.

उत्तेजना के उन पलों में मैं गोपालजी की बात पर राज़ी हो गयी , लेकिन मैंने ऐसा दिखाया की मुझे संकोच हो रहा है.

“ठीक है गोपालजी , जैसा आप कहो.”

मैं फिर से दीवार पर हाथ टिकाकर अपने नितंबों को गोल गोल घुमाने लगी. इस बार मैं कुछ ज़्यादा ही कमर लचका रही थी. मैं वास्तव में ऐसा करते हुए बहुत ही अश्लील लग रही हूँगी , एक 28 साल की औरत सिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट में अपने नितंबों को ऐसे गोल गोल घुमा रही है. ये दृश्य देखकर मंगल की लार टपक रही होगी क्यूंकी मेरे राज़ी होते ही वो तुरंत मेरे पीछे आ गया और मेरे हिलते हुए नितंबों पर उसने अपना बायां हाथ रख दिया.

मंगल – मैडम , क्या मस्त गांड है आपकी. बहुत ही चिकनी और मुलायम है.

गोपालजी – जब दिखने में इतनी अच्छी है तो सोचो टेस्ट करने में कितनी बढ़िया होगी.

मंगल और गोपालजी की दबी हुई हँसी मैंने सुनी. रास्ते में चलते हुए मैंने कई बार अपने लिए ये कमेंट सुना था ‘ क्या मस्त गांड है ‘ , पर ये तो मेरे सामने ऐसा बोल रहा था.

मंगल एक हाथ से मेरे नितंब को ज़ोर से दबा रहा था और दूसरे हाथ से मुठ मार रहा था. मेरी पैंटी पीछे से सिकुड गयी थी इसलिए मंगल की अंगुलियों और मेरे नितंब के बीच सिर्फ़ पेटीकोट का पतला कपड़ा था. 

गोपालजी – मैडम , आप पीछे से बहुत सेक्सी लग रही हो. मंगल तू बड़ी किस्मत वाला है.

मंगल – गोपालजी , अब इस उमर में इन चीज़ों को मत देखो . बेहतर होगा साँपों पर नज़र रखो.

उसकी बात पर हम सब हंस पड़े. मैं बेशर्मी से हंसते हुए अपने नितंबों को हिला रही थी. और वो कमीना मंगल मेरे नितंबों पर हाथ फेरते हुए चिकोटी काट रहा था. अगर कोई मेरा पेटीकोट कमर तक उठाकर देखता तो उसे मेरे नितंब चिकोटी काटने से लाल हो गये दिखते. अब तक मेरी चूत रस बहने से पूरी गीली हो चुकी थी. 

फिर मुझे अपने दोनों नितंबों पर मंगल के हाथ महसूस हुए. अब वो अपना लंड हिलाना छोड़कर मेरे दोनों नितंबों को अपने हाथों से हॉर्न के जैसे दबा रहा था. अपने नितंबों के ऐसे मसले जाने से मैं और भी उत्तेजित होकर नितंबों को ज़ोर से हिलाने लगी.

गोपालजी – मंगल जल्दी करो. साँप अंदर को आ रहे हैं.

गोपालजी ने मंगल को सावधान किया पर मंगल ने उसकी बात सुनी भी की नही. क्यूंकी वो तो दोनों हाथों से मेरी गांड को मसलने में लगा हुआ था. एक अनजान आदमी के अपने संवेदनशील अंग को ऐसे मसलने से मैं कामोन्माद में अपने बदन को हिला रही थी. मेरे मुँह से सिसकारियाँ निकल रही थी. 

तभी मंगल ने मेरी गांड से अपने हाथ हटा लिए. मैंने सोचा उसने गोपालजी की बात सुन ली होगी , इसलिए डर गया होगा.

लेकिन नही, ऐसा कुछ नही था. उस कमीने को मुझसे और ज़्यादा मज़ा चाहिए था. अभी तक तो वो पेटीकोट के बाहर से मेरी गांड को मसल रहा था और फिर बिना मेरी इजाजत लिए ही मंगल मेरा पेटीकोट ऊपर को उठाने लगा.

“ ये तुम क्या कर रहे हो ? रूको . रूको. …….गोपालजी !! “

पेटीकोट के बाहर से अपने नितंबों पर मंगल के हाथों के स्पर्श से मुझे बहुत मज़ा मिल रहा था , इसमे कोई दो राय नही थी. लेकिन अब वो मेरा पेटीकोट ऊपर उठाने की कोशिश कर रहा था. अब मुझे डर होने लगा था की ये बदमाश कहीं मेरी इस हालत का फायदा ना उठा ले. 

मेरे मना करने पर भी मंगल ने मेरे घुटनों तक पेटीकोट उठा दिया और दोनों हाथों से मेरी मांसल जांघें दबोच ली. उसके खुरदुरे हाथ मेरी मुलायम जांघों को दबा रहे थे और फिर उसने अपने चेहरे को पेटीकोट के बाहर से मेरी गांड में दबा दिया. ये मेरे लिए बड़ी कामुक सिचुयेशन थी. एक अनजाने गँवार मर्द ने मुझे पीछे से पकड़ रखा है. मेरी पेटीकोट को घुटनों तक उठा दिया , मेरी मांसल जांघों को दबोच रहा है और साथ ही साथ मेरी गांड में अपने चेहरे को भी रगड़ रहा है. 

गोपालजी ने मंगल को नही रोका , जबकि उसने वादा किया था की मंगल मुझे कहीं और नही छुएगा. मुझे हल्का विरोध करते हुए कुछ देर तक ऐसी कम्प्रोमाइज़िंग पोजीशन में रहना पड़ा.

फिर उस कमीने ने पेटीकोट के बाहर से मेरे नितंब पर दाँत गड़ा दिए और मेरी गांड की दरार में अपनी नाक घुसा दी. मेरे मुँह से ज़ोर से चीख निकल गयी…………..ऊईईईईईईईईई……………..

एक तो मेरी पैंटी सिकुड़कर बीच की दरार में आ गयी थी और अब ये गँवार उस दरार में अपनी नाक घुसा रहा था. वैसे सच कहूँ तो मुझे भी इससे बहुत मज़ा आ रहा था. दिमाग़ कह रहा था की ये ग़लत हो रहा है पर जड़ी बूटी का असर था की मैं बहुत ही उत्तेजित महसूस कर रही थी.

मंगल के हाथ पेटीकोट के अंदर मेरी जांघों को मसल रहे थे. अब मैं और बर्दाश्त नही कर पाई और चूत से रस बहाते हुए मुझे बहुत तेज ओर्गास्म आ गया.
…………..आआहह………………. ओह्ह ………………..ऊईईईईईईईईई……………….आआहह………….

मेरा पूरा बदन कामोन्माद से कंपकपाने लगा और मेरी पैंटी के अंदर पैड चूत रस से पूरा भीग गया. अब मेरा विरोध बिल्कुल कमजोर पड़ गया था. 

मंगल ने मेरी हालत का फायदा उठाने में बिल्कुल देर नही लगाई. मेरी जांघों पर उसके हाथ ऊपर को बढ़ते गये और उसने अपनी अंगुलियों से मेरे उस अंग को छू लिया जिसे मेरे पति के सिवा किसी ने नही छुआ था. हालाँकि मेरा पेटीकोट घुटनों तक था पर मंगल ने अंदर हाथ डालकर पैंटी के बाहर से ही मेरी चूत को मसल दिया.

बहुत ही अजीब परिस्थिति थी, एक तरफ साँपों का डर और दूसरी तरफ एक अनजाने मर्द से काम सुख का आनंद. मुझे याद नही इतना तेज ओर्गास्म मुझे इससे पहले कब आया था. एक नयी तरह की सेक्सुअल फीलिंग आ रही थी. 

मंगल भी मेरे साथ ही झड़ गया और इस बार मुझे उसका ‘लंड दर्शन ‘ भी हुआ , जब उसने कटोरे में अपना वीर्य निकाला. ये पहली बार था की मैं अपने पति के सिवा किसी पराए मर्द का लंड देख रही थी. उसका काला तना हुआ लंड कटोरे में वीर्य की धार छोड़ रहा था. मेरे दिल की धड़कने बढ़ गयी . क्या नज़ारा था . सभी औरतें लंड को ऐसे वीर्य छोड़ते हुए पसंद करती हैं पर ऐसे बर्बाद होते नही बल्कि अपनी चूत में. 

अब मैं अपने दिमाग़ पर काबू पाने की कोशिश करने लगी, जैसा की सुबह गुरुजी ने बताया था की 'माइंड कंट्रोल’ करना है. गुरुजी ने कहा था, कहाँ हो , किसके साथ हो, इसकी चिंता नही करनी है, जो हो रहा है उसे होने देना. गुरुजी के बताए अनुसार मुझे दो दिन में चार ओर्गास्म लाने थे जिसमे पहला अभी अभी आ चुका था.

ओर्गास्म आने से बदन की गर्मी निकल चुकी थी और अब मैं पूरे होशो हवास में थी. मैंने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए. 

मंगल अधनंगा खड़ा था , झड़ जाने के बाद उसका काला लंड केले के जैसे लटक गया था. मेरी हालत भी उसके लंड जैसी ही थी , बिल्कुल थकी हुई, शक्तिहीन.

गोपालजी ने मंगल से कटोरा लिया और साँपों से कुछ दूरी पर रख दिया. मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ , साँप उस कटोरे में सर डालकर पीने लगे. कुछ ही समय बाद वो दोनों साँप दरवाज़े से बाहर चले गये. 

साँपों के जाने से हम सबने राहत की साँस ली.

उसके बाद कुछ खास नही हुआ. गोपालजी ने मेरी नाप का ब्लाउज मुझे दिया. मैंने दीवार की तरफ मुँह करके पुराना ब्लाउज उतारा. गोपालजी और मंगल को मेरी गोरी नंगी पीठ के दर्शन हुए जिसमे सिर्फ़ ब्रा का स्ट्रैप था. फिर मैंने नया ब्लाउज पहन लिया , जिसके सभी हुक लग रहे थे , और फिटिंग सही थी. उसके बाद मैंने साड़ी पहन ली. अब जाकर मुझे चैन आया , साड़ी उतारते समय मैंने ये थोड़ी सोचा था की इतनी देर तक मुझे इन दो मर्दों के सामने सिर्फ़ ब्लाउज पेटीकोट में रहना पड़ेगा.

गोपालजी – ठीक है मैडम. हम साँपों से बच गये. सहयोग करने के लिए आपका शुक्रिया. चलो अंत भला तो सब भला. मैडम , अगर आपको इस ब्लाउज में कोई परेशानी हुई तो मुझे बता देना.

“शुक्रिया गोपालजी.”

गोपालजी – और हाँ मैडम , अगर शाम को आपको समय मिले तो यहाँ आ जाना. मैं आपकी पैंटी की समस्या भी दूर कर दूँगा.

मैंने सर हिला दिया और उस कमरे से बाहर आ गयी. मैं बहुत थक गयी थी और जो कुछ उस कमरे में हुआ उससे बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रही थी . मैं जल्दी से जल्दी वहाँ से जाना चाहती थी पर मुझे विकास का इंतज़ार करना पड़ा. करीब 10 मिनट बाद विकास गांव से वापस लौटा तब तक मुझे अपने बदन पर मंगल की घूरती नजरों को सहन करना पड़ा.

आश्रम में आने के बाद सबसे पहले मैंने जड़ी बूटी वाले पानी से नहाया. उससे मुझे फिर से तरो ताज़गी महसूस हुई. नहाने से पहले परिमल आकर मेरा पैड ले गया था, जो मैंने पैंटी में पहना हुआ था.. उसने बताया की आश्रम से हर ‘आउटडोर विज़िट’ के बाद गुरुजी मेरा पैड बदलकर नया पैड देंगे.

दोपहर बाद लंच लेकर मैंने थोड़ी देर बेड में लेटकर आराम किया. लेटे हुए मेरे मन में वही दृश्य घूम रहे थे जो टेलर की दुकान में घटित हुए थे. गोपालजी का मेरे ब्लाउज की नाप लेना,मंगल के मुठ मारने के लिए मेरा वो अश्लील नृत्य करना और फिर मंगल के खुरदुरे हाथों द्वारा मेरे नितंबों और जांघों को मसला जाना. ये सब सोचते हुए मेरा चेहरा शरम से लाल हो गया. इन सब कामुक दृश्यों को सोचते हुए मुझे ठीक से नींद नही आई.

शाम करीब 5 बजे मंजू ने मेरा दरवाज़ा खटखटाया.
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01-17-2019, 01:45 PM,
#14
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
शाम करीब 5 बजे मंजू ने मेरा दरवाज़ा खटखटाया.

मंजू – मैडम , बहुत थक गयी हो क्या ?

“नही नही. बल्कि मैं तो…...”

क्या मंजू जानती है की टेलर की दुकान में क्या हुआ ? विकास ने तो लौटते वक़्त मुझसे कुछ नही पूछा. मंजू से ये बात सीधे सीधे पूछने में मुझे शरम आ रही थी की उसे मालूम है या नही .

मंजू – ठीक है मैडम. तब तो आप मेला देखने जा सकती हो. थोड़ी दूरी पर है , लेकिन अगर आप अभी चली जाओ तो टाइम पर वापस आ जाओगी.

“कौन सा मेला ?”

मंजू – मैडम, ये मेला पास के गांव में लगा है. मेले में आस पास के गांववाले खरीदारी करने जाते हैं. बहुत फेमस है यहाँ. हम लोग तो अपने काम में बिज़ी रहेंगे आप बोर हो जाओगी. इसलिए मेला देख आओ.

मैंने सोचा मंजू ठीक ही तो कह रही है , आश्रम में अभी मेरा कोई काम नही है. अभी ये लोग भी यहाँ बिज़ी रहेंगे , क्यूंकी अभी गुरुजी का ‘दर्शन’ का समय है तो आश्रम में थोड़ी बहुत भीड़ भाड़ होगी . मैं मेला जाने को राज़ी हो गयी.

मंजू – ठीक है मैडम , ये लो नया पैड. और हाँ जाते समय दवाई खाना मत भूलना. जब भी आश्रम से बाहर जाओगी तो वो दवाई खानी है. आप तैयार हो जाओ , मैं 5 मिनट बाद विकास को भेज दूँगी.

मंजू अपने बड़े नितंबों को मटकाते हुए चली गयी. उसको जाते हुए देखती हुई मैं सोचने लगी , वास्तव में इसके नितंब आकर्षित करते हैं. 

फिर मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया और बाथरूम में चली गयी. ये हर बार पैड बदलना भी बबाल था. पैंटी नीचे करो फिर चूत के छेद पर पैड फिट करो. खैर , ऐसा करना तो था ही. मैंने पैंटी में ठीक से पैड लगाया और हाथ मुँह धोकर कमरे में आ गयी. फिर नाइटगाउन उतारकर साड़ी ब्लाउज पहन लिया. 

तब तक विकास आ गया था.

विकास – मैडम , मेला तो थोड़ा दूर है , पैदल नही जा सकते.

“फिर कैसे जाएँगे ?”

विकास – मैडम, हम बैलगाड़ी से जाएँगे. मैंने बैलगाड़ीवाले को बुलाया है वो आता ही होगा.

“ठीक है. कितना समय लगेगा जाने में ?”

मैं कभी बैलगाड़ी में नही बैठी थी , इसलिए उसमें बैठने को उत्सुक थी. 

विकास – मैडम, बैलगाड़ी से जाने में थोड़ा समय तो लगेगा पर आप गांव के दृश्य, हरे भरे खेत इन सब को देखने का मज़ा ले सकती हो.

कुछ ही देर में बैलगाड़ी आ गयी और हम उसमें बैठ गये. 
गांव के खेतों के बीच बने रास्ते से बैलगाड़ी बहुत धीरे धीरे चल रही रही थी. बहुत सुंदर हरियाली थी हर तरफ, ठंडी हवा भी चल रही थी. विकास मुझे मेले के बारे में बताने लगा.

करीब आधा घंटा ऐसे ही गुजर गया , पर हम अभी तक नही पहुचे थे. मुझे बेचैनी होने लगी.

“विकास, कितना समय और लगेगा ?”

विकास – मैडम, अभी तो हमने आधा रास्ता तय किया है, इतना ही और जाना है. बैलगाड़ी धीरे चल रही है इसलिए टाइम लग रहा है.

शुरू शुरू में तो बैलगाड़ी में बैठना अच्छा लग रहा था पर अब मेरे घुटने दुखने लगे थे. गांव की सड़क भी कच्ची थी तो बैलगाड़ी में बहुत हिचकोले लग रहे थे. मेरी कमर भी दर्द करने लगी थी. बैलगाड़ी में ज़्यादा जगह भी नही थी इसलिए विकास भी सट के बैठा था और मेरे हिलने डुलने को जगह भी नही थी. हिचकोलो से मेरी चूचियाँ भी ब्रा में बहुत उछल रही थीं , शरम से मैंने साड़ी का पल्लू अच्छे से अपने ब्लाउज के ऊपर लपेट लिया.

आख़िर एक घंटे बाद हम मेले में पहुँच ही गये. बैलगाड़ी से उतरने के बाद मेरी कमर, नितंब और घुटने दर्द कर रहे थे. विकास का भी यही हाल हो रहा होगा क्यूंकी उतरने के बाद वो अपने हाथ पैरों की एक्सरसाइज करने लगा. लेकिन मैं तो औरत थी ऐसे सबके सामने हाथ पैर कैसे फैलाती. मैंने सोचा पहले टॉयलेट हो आती हूँ , वहीं हाथ पैर की एक्सरसाइज कर लूँगी.

“विकास, मुझे टॉयलेट जाना है.”

विकास – ठीक है मैडम, लेकिन ये तो गांव का मेला है. यहाँ टॉयलेट शायद ही होगा. अभी पता करता हूँ.

विकास पूछताछ करने चला गया. 

विकास – मैडम ,यहाँ कोई टॉयलेट नही है. मर्द तो कहीं पर भी किनारे में कर लेते हैं. औरतें दुकानो के पीछे जाती हैं.

मैं दुविधा में थी क्यूंकी विकास से कैसे कहती की मुझे पेशाब नही करनी है. मुझे तो हाथ पैर की थोड़ी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज करनी थी. 

विकास – मैडम , मैं यहीं खड़ा रहता हूँ , आप उस दुकान के पीछे जाकर कर लो.

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. ये आदमी मुझसे खुली जगह में पेशाब करने को कह रहा है, जहाँ पर सबकी नज़र पड़ रही है.

“यहाँ कैसे कर लूँ ?”

मैं कोई छोटी बच्ची तो हूँ नही जो सबके सामने फ्रॉक ऊपर करके कर लूँ. उस दुकान के पीछे एक छोटी सी झाड़ी थी जिससे कुछ भी नही ढक रहा था. वैसे तो शाम हो गयी थी लेकिन अभी अंधेरा ना होने से साफ दिखाई दे रहा था. आस पास गांववाले भी खड़े थे , उन सबके सामने मैं कैसे करती.

विकास – मैडम ये शहर नही गांव है. यहाँ सभी औरतें ऐसे ही कर लेती हैं. शरमाओ मत.

“क्या मतलब ? गांव है तो मैं शरमाऊं नही ? इन सब गांववालों के सामने अपनी साड़ी उठा दूं ?”

विकास – मैडम , मैडम , नाराज़ क्यूँ होती हो. मेरे कहने का मतलब है गांव में शहर के जैसे बंद टॉयलेट नही होते. ज़्यादा से ज़्यादा टाट लगाकर पर्दे बना देते हैं टॉयलेट के लिए, यहाँ वो भी नही है.

“विकास, यहाँ इतने लोग खड़े हैं. मैं बेशरम होकर इनके सामने तो नही बैठ सकती. गांववाली औरतें करती होंगी , मैं ऐसे नही कर सकती. चलो मेले में चलते हैं.”

विकास ने ज़्यादा ज़ोर नही दिया और हम दुकानों की तरफ बढ़ गये. मेले में बहुत सारी दुकानें थी और गांववालों की बहुत भीड़भाड़ थी. मेले में घूमने में हमें करीब एक घंटा लग गया. भीड़ की वजह से मुझे विकास से सट के चलना पड़ रहा था. चलते हुए मेरी चूचियों पर विकास की कोहनी कई बार छू गयी. पहले तो मैंने इससे बचने की कोशिश की लेकिन भीड़ की वजह से उसकी बाँह मुझसे छू जा रही थी , मैंने सोचा कोई बात नही भीड़ की वजह से ऐसा हो जा रहा है.

कुछ देर बाद मुझे लगा की विकास जानबूझकर अपनी बाँह मेरी चूचियों पर रगड़ रहा है. क्यूंकी जहाँ पर कम भीड़ थी वहाँ भी उसकी कोहनी मेरी चूचियों से रगड़ खा रही थी. उसके ऐसे छूने से मुझे भी थोड़ा मज़ा आ रहा था , पर मुझे लगा इतने लोगों के सामने विकास कुछ ज़्यादा ही कर रहा है.

मैं विकास के दायीं तरफ चल रही थी और मेरी बायीं चूची पर विकास अपनी दायीं कोहनी चुभा रहा था. सामने से हमारी तरफ आते लोगों को सब दिख रहा होगा. मैं शरम से विकास से कुछ नही कह पाई , वैसे भी वो कहता भीड़ की वजह से छू जा रहा है , तो कहने से फायदा भी क्या था. लेकिन उसके ऐसे कोहनी रगड़ने से मेरी चूचियाँ कड़क होकर तन गयीं , मैं भी गरम होने लगी थी. मुझे कुछ ना कहते देख उसकी हिम्मत और बढ़ गयी और उसने अपनी कोहनी को मेरी चूचियों पर दबा दिया. शायद उसे बहुत मज़ा आ रहा था , किसी औरत की चूचियाँ ऐसे दबाने का मौका रोज़ रोज़ थोड़े ही मिलता है.

फिर मैं एक दुकान के आगे रुक गयी और कान के झुमके देखने लगी. विकास भी मेरे से सट के खड़ा था. उसकी गरम साँसें मुझे अपने कंधों पर महसूस हो रही थी.

विकास – मैडम , ये आप पर अच्छे लगेंगे.

ऐसा कहते हुए उसने मुझे कान का झुमका और एक हार दिया. मैंने उससे सुझाव नही माँगा था पर देख लेती हूँ. मैंने वो झुमका पहन कर देखा , ठीक लग रहा था.

विकास - मैडम, हार भी ट्राइ कर लो , अच्छा लगे तो खरीद लेना, मेरे पास पैसे हैं.

दुकानदार ने भी कहा, मैचिंग हार है , झुमके के साथ पहन कर देखो. मैं गले में हार पहनने लगी तभी विकास जबरदस्ती मेरी मदद करने लगा.

विकास – मैडम , आप छोड़ दो , मैं आपके गले में हार पहना देता हूँ.

मैंने देखा विकास की बात पर वो दुकानदार मुस्कुरा रहा है. दुकान में 2-3 और ग्राहक भी थे , वो भी हमें देखने लगे. मैंने सोचा विकास से बहस करूँगी तो और लोगों का भी ध्यान हम पर चला जाएगा , इसलिए चुप रही. लेकिन विकास ने जो किया वो शालीनता की सीमा को लाँघने वाला काम था , वो भी सबके सामने.

विकास मेरे पीछे आया और हार को मेरे गले में डाला और गर्दन के पीछे हुक लगाने लगा. फिर मुझे पीछे से आलिंगन करते हुए हार को आगे से ठीक करने के बहाने से ब्लाउज के ऊपर से मेरी चूचियों पर हाथ फेर दिया. दुकानदार और उसके ग्राहकों की नज़र भी हम पर थी और उन्होने भी विकास को मेरी चूचियों पर हाथ फेरते हुए देखा. सबके सामने मुझसे ऐसे भद्दे तरह से बिहेव करने से मुझे बुरा लगा. वो लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे ?

अब वो दुकानदार भी मुझमें कुछ ज़्यादा ही इंटरेस्ट लेने लगा और मेरे आगे शीशा पकड़कर कुछ और झुमके , हार दिखाने लगा. 

विकास – मैडम , इसको ट्राइ करो. ये भी अच्छा लग रहा है.

“नही विकास, यही ठीक है.”

मैं उसकी मंशा समझ रही थी लेकिन दुकानदार भी पीछे पड़ गया की ये वाला ट्राइ करो. मैंने दूसरा झुमका पहन लिया और विकास मुझे उसका मैचिंग हार पहनाने लगा. इस बार वो और भी ज़्यादा बोल्ड हो गया. हार पहनाने के बहाने विकास, दुकानदार के सामने ही मेरी चूचियाँ छूने लगा. ये वाला हार थोड़ा लंबा था तो मेरी चूचियों से थोड़ा नीचे तक लटक रहा था. इससे विकास को मेरी चूचियाँ दबाने का बहाना मिल गया. उसने मेरी गर्दन के पीछे हार का हुक लगाया और आगे से हार को एडजस्ट करने के बहाने मेरी तनी हुई चूचियों के ऊपर अपनी बाँह रख दी. एक आदमी मेरे पीछे खड़ा होकर अपनी बाँह मेरी छाती से चिपका रहा है और मैं सबके सामने बेशरम बनकर चुपचाप खड़ी हूँ.

फिर विकास ने दुकानदार से शीशा ले लिया और बड़ी चालाकी से अपने बाएं हाथ में शीशा पकड़कर मेरी छाती के आगे लगा दिया , जैसे मुझे शीशे में हार दिखा रहा हो. उसके ऐसा करने से दुकानदार की आँखों के आगे शीशा लग गया और वो मेरी छाती नही देख सकता था. इस बात का फायदा उठाते हुए विकास ने अपने दाहिने हाथ से मेरी दायीं चूची को पकड़ा और ज़ोर से मसल दिया.

विकास – ये वाला हार ज़्यादा अच्छा है. आपको क्या लगता है मैडम ?

मैं कुछ बोलने की हालत में नही थी क्यूंकी उसके हाथ ने मेरी चूची को दबा रखा था. मैंने अपनी नज़रें दूसरी तरफ घुमाई तो देखा दो लड़के हमें ही देख रहे थे. विकास की नज़र उन पर नही पड़ी थी वो तो कुछ और ही काम करने में व्यस्त था. इस बार उसने मेरी दायीं चूची को अपनी पूरी हथेली में पकड़ा और तीन चार बार ज़ोर से दबा दिया, हॉर्न के जैसे. ये सब कुछ ही सेकेंड्स की बात थी और खुलेआम सब लोगों के सामने विकास ने मुझसे ऐसे छेड़छाड़ की और मैं कुछ ना कह पायी.

फिर मैंने ये दूसरा वाला झुमके और हार का सेट ले लिया और हम उस दुकान से आगे बढ़ गये.
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01-17-2019, 01:46 PM,
#15
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
फिर मैंने ये दूसरा वाला झुमके और हार का सेट ले लिया और हम उस दुकान से आगे बढ़ गये.

शाम होने के साथ ही मेले में लोगों की भीड़ बढ़ गयी थी. दुकानों के बीच पतले रास्ते में धक्कामुक्की हो रही थी. मैंने विकास का हाथ पकड़ लिया , और कोई चारा भी नही था वरना मैं पीछे छूट जाती. दूसरा हाथ मैंने अपनी छाती के आगे लगा रखा था नही तो सामने से आने वाले लोगों की बाँहें मेरी चूचियों से छू जा रही थीं.

मैंने विकास से नार्मल बिहेव किया और जो उसने दुकान में मेरे साथ किया , उसको भूल जाना ही ठीक समझा. शायद विकास भी मेरे रिएक्शन की थाह लेने की कोशिश कर रहा था और मुझे कोई विरोध ना करते देख उसकी हिम्मत बढ़ गयी.

विकास – मैडम , ये गांववाले सभ्य नही हैं. थोड़ा बच के रहना.

“हाँ , वो तो मुझे दिख ही रहा है. धक्कामुक्की कर रहे हैं.”

विकास – मैडम , ऐसा करो. मेरा हाथ पकड़कर पीछे चलने की बजाय आप मेरी साइड में आ जाओ. उससे मैं आपको प्रोटेक्ट कर सकूँगा.

मैंने सोचा , ठीक ही कह रहा है , एक तरफ से तो सेफ हो जाऊँगी. फिर मैं उसकी दायीं तरफ आ गयी. लेकिन विकास का कुछ और ही प्लान था. मेरे आगे आते ही उसने लोगो से बचाने के बहाने मेरे दाएं कंधे में अपनी बाँह डाल दी और मुझे अपने से सटा लिया. चलते समय मेरा पूरा बदन उसके बदन से छू रहा था. उसके दाएं हाथ की अंगुलियां मेरी दायीं चूची से कुछ ही इंच ऊपर थीं. 

धीरे धीरे उसका हाथ नीचे सरकने लगा और फिर उसकी अंगुलियां मेरी चूची को छूने लगीं. कुछ ही देर बाद उसने हथेली से मेरी दायीं चूची को पकड़ लिया , जैसे दुकान में किया था. अबकी बार वो बहुत कॉन्फिडेंट लग रहा था और चलते हुए आराम से अपनी अंगुलियां मेरी चूची के ऊपर रखे हुए था. उसकी अंगुलियां मेरी चूची की मसाज करने लगीं. अपनी चूची पर विकास की अंगुलियों के मसाज करने से मैं उत्तेजित होने लगी. थोड़ी देर तक ऐसा ही चलता रहा. कुछ समय बाद विकास मेरी चूची को ज़ोर से दबाने लगा. फिर उसकी अंगुलियां ब्रा और ब्लाउज के बाहर से मेरे निप्पल को ढूंढने लगीं. मैंने देखा सामने की तरफ से आने वाले लोगों की निगाहें विकास के हाथ और मेरी चूची पर ही थी.

अब मेरी बर्दाश्त के बाहर हो गया, सब लोगों के सामने विकास मुझसे ऐसे बिहेव कर रहा था , मुझे बहुत शरम महसूस हो रही थी. उसके ऐसे छूने से मुझे मज़ा आ रहा था और मेरी चूत गीली हो चुकी थी लेकिन सबके सामने खुलेआम ऐसा करना ठीक नही था. सुबह जब टेलर की दुकान पर मैं बेशरम बन गयी थी तब भी कम से कम एक कमरे में तो थी , ये तो खुली जगह थी. मुझे विकास को रोकना ही था.

“विकास, प्लीज़ ठीक से रहो.”

विकास – सॉरी मैडम , लेकिन भीड़ से बचाने के लिए करना पड़ रहा है , वरना लोग आपके बदन से टकरा जाएँगे.

विकास ने अपना बहाना बना दिया. मैं बहस करने के मूड में नही थी. लेकिन उत्तेजित होने के बाद अब मुझे पेशाब लग गयी थी.

“विकास मुझे टॉयलेट जाना है. उस समय मैं नही जा पाई थी……...”

विकास ने मेरी चूची पर से हाथ हटा लिया और मुझे एक गली से होते हुए दुकानों के पीछे ले गया. मेले में बल्ब जले हुए थे लेकिन दुकानों के पीछे थोड़ा अंधेरा था . दूर खड़े लोगों के लिए साफ देख पाना मुश्किल था. पर मैं अभी भी हिचक रही थी क्यूंकी वहाँ कोई झाड़ी नही थी जिसके पीछे मैं बैठ सकूँ.

विकास – मैडम , अब क्या दिक्कत है ?

“देख नही रहे , यहाँ कोई झाड़ी नही है. कैसे करूँ ?”

विकास – लेकिन मैडम, यहाँ अंधेरे में कौन देख रहा है. उस कोने में जाओ और कर लो.

“इतना अंधेरा भी नही है. मैं तो तुम्हें साफ देख सकती हूँ.”

विकास – मैडम , आप भी ….. ठीक है , मैं आपकी तरफ नही देखूँगा.

वो शरारत से मुस्कुराया लेकिन मैंने उसकी तरफ ध्यान नही दिया. मुझे तो यही फिकर थी की कैसे करूँ.

“कोई आ गया तो ….?”

विकास – मैडम , इसमें टाइम ही कितना लगना है. कुछ ही सेकेंड्स में तो हो जाएगा.

मुझे तो ज़्यादा समय लगना था , क्यूंकी ऐसा तो था नहीं की साड़ी कमर तक उठाओ ,फिर बैठ जाओ और कर लो. मुझे तो पैंटी भी नीचे करनी थी और उसमे लगे पैड को भी सम्हालना था.

विकास – मैडम , अगर आप ऐसे ही देर करोगी तो कोई ना कोई आ जाएगा. इसलिए उस कोने में जाओ और कर लो , मैं यहाँ खड़े होकर ख्याल रखूँगा , कोई आएगा तो बता दूँगा.

विकास ऐसे बोल रहा था जैसे उसकी मौजूदगी से मुझे कोई फरक नही पड़ता. अरे कोई आए ना आए वो खुद भी तो एक मर्द ही है ना.

मैंने फिर से एक नज़र हर तरफ दौड़ाई. वहाँ थोड़ा अंधेरा ज़रूर था पर वो जगह तीन तरफ से खुली थी क्यूंकी एक तरफ दुकानों का पिछला हिस्सा था. और अगर कोई वहाँ आ जाता तो मुझे साफ देख सकता था. लेकिन मेरे पास कोई चारा नही था . मुझे बहुत शरम आ रही थी पर मुझे उस खुली जगह में ही करना पड़ रहा था.

“ विकास, प्लीज़ इस तरफ पीठ कर लो और कोई आए तो मुझे बता देना.”

विकास – मैडम , अगर मैं इस तरफ पीठ करूँगा तो मुझे कैसे पता चलेगा , कोई उस तरफ से आ रहा है या नही ?

मैं सब समझ रही थी की विकास मुझे देखने का मौका हाथ से जाने नही देगा. मगर मजबूरी थी की उसका यहाँ खड़ा रहना भी ज़रूरी था क्यूंकी कोई आएगा तो कम से कम बता तो देगा.

कोई और चारा ना देख मैं राज़ी हो गयी. मैंने देखा मुझे कोने में जाते देख विकास की आँखों में चमक आ गयी है. मैं विकास से 10 – 12 फीट की दूरी पर दुकानों के पीछे चली गयी. उससे आगे जाने जैसा नही था क्यूंकी वहाँ पर दुकानों से लाइट पड़ रही थी. 

मैंने विकास की तरफ पीठ कर ली पर मुझे वहाँ बैठने में शरम आ रही थी. पता नही विकास को कितना दिख रहा होगा. मैं थोड़ा सा झुकी और दोनों हाथों से साड़ी और पेटीकोट को अपने नितंबों तक ऊपर उठाया. मेरी नंगी जांघों पर ठंडी हवा का झोंका लगते ही बदन में कंपकपी दौड़ गयी. मुझसे रहा नही गया और मैंने एक नज़र पीछे मुड़कर विकास को देखा.

विकास – मैडम , पीछे मत देखो. जल्दी करो.

विकास मेरी नंगी जांघों को देख रहा था और मुझसे ही कह रहा था की पीछे मत देखो. एक झलक मुझे दिखी की उसका हाथ अपने पैंट पर है. शायद एक औरत को ऐसी हालत में देखकर वो अपने लंड को सहला रहा होगा. मैंने और समय बर्बाद नही किया. जल्दी से पैंटी घुटनों तक नीचे की और पैड एक हाथ में पकड़ लिया. पैंटी उतरने से विकास को मेरी नंगी गांड का नज़ारा दिख रहा होगा , वैसे मैंने जितना हो सके , साड़ी से उसे ढकने की कोशिश की थी. फिर जब मैं बैठ गयी तो विकास को मेरी बड़ी गांड पूरी तरह से नंगी दिख रही होगी.

मेरे पेशाब करते वक़्त निकलती …….श्ईईई……….की आवाज़ मेरी शरम को और बढ़ा रही थी. मैंने एक बार और पीछे मुड़कर देखा की कहीं कोई आ तो नही रहा है और विकास क्या कर रहा है. लेकिन मुझे हैरानी हुई विकास तो वहाँ था ही नही. उस बैठी हुई पोजीशन में मैं अपने सर को ज़्यादा नही मोड़ पा रही थी. मेरी पेशाब पूरी होने ही वाली थी और मुझे राहत हुई क्यूंकी वो …… श्ईईई ………..की निकलती आवाज़ से मुझे ज़्यादा शरम आ रही थी. मैं सोच रही थी की विकास कहाँ गया होगा तभी……. 

विकास – मैडम, बच के…..

मैं शॉक्ड रह गयी , विकास की आवाज़ बिल्कुल मेरे नजदीक से आई थी. अभी अभी पीछे मुड़कर वो मुझे नही दिखा था क्यूंकी वो तो मेरे आगे आ गया था. मैं उसको अपने सामने खड़ा देखकर सन्न रह गयी क्यूंकी आगे से मेरी चूत , मेरी टाँगें और जांघें नंगी थी और अभी भी थोड़ी पेशाब निकल रही थी. विकास मेरी चूत और उसके ऊपर के काले बाल साफ देख सकता था. 

हे भगवान ! ऐसा ह्युमिलिएशन , ऐसी बेइज़्ज़ती तो मेरी कभी नही हुई थी. विकास खुलेआम मेरी नंगी चूत को देख रहा था , मेरा चेहरा बता रहा था की मुझे किस कदर शॉक लगा है और मुझे कितनी शरम आ रही है.

विकास – मैडम , मैडम घबराओ नही. असल में आप चींटियों की बांबी पर बैठ गयी हो इसलिए मैं आपको सावधान करने आ गया. 

“ तुम जाओ यहाँ से.”

विकास – मैडम, आपने उनकी बांबी गीली कर दी है, अब चींटियां बाहर आ जाएँगी. संभाल कर…..

विकास एक कदम भी नही हिला और उसकी नज़र एक औरत को पेशाब करते हुए सामने से देखने के नज़ारे का मज़ा ले रही थी, शायद जिंदगी में पहली बार उसे ये मौका मिला होगा. 

मैं अब उसके सामने ऐसे नही बैठ सकती थी और उठ खड़ी हुई जबकि मेरे छेद से पेशाब की बूंदे अभी भी निकल रही थीं. अपने बाएं हाथ से मैंने जल्दी से साड़ी और पेटीकोट नीचे कर ली क्यूंकी दाएं हाथ में तो पैड पकड़ा हुआ था.

विकास ने मुझे उस चींटियों की बांबी से धक्का देते हुए हटा दिया. मैंने देखा वो सही कह रहा था क्यूंकी बहुत सारी लाल चींटियां बांबी से निकल आई थीं. मेरी पेशाब से उनमें खलबली मच गयी थी. 

मैं ठीक से नही चल पा रही थी क्यूंकी पैंटी अभी भी घुटने में फंसी थी. मुझे पैंटी ऊपर करने से पहले पैड भी लगाना था.

मैं शरम से विकास से आँखें नही मिला पा रही थी. मुझे अभी भी यकीन नही हो रहा था की विकास ने मुझे ऐसे पेशाब करते हुए देख लिया था. मुझे नही पता की उसके दिमाग़ में क्या चल रहा था पर वो नार्मल लग रहा था.

विकास – मैडम , अब हम लेट हो रहे हैं. हमें वापस जाना चाहिए.

“हाँ , मैं भी यहाँ अब और नही रहना चाहती हूँ.”

मैं सोच रही थी की विकास से कैसे कहूं की मुझे अपने कपड़े ठीक करने हैं ,पैड लगाना है.

विकास – ठीक है मैडम, आप यही इंतज़ार करो या दुकानों के आगे. मैं बैलगाड़ीवाले को लेकर आता हूँ.

“नही नही विकास. बैलगाड़ी में नही. मेरे घुटनों और कमर में और दर्द नही चाहिए.”

विकास – लेकिन मैडम…...

मैंने उसकी बात काट दी.

“कुछ और आने जाने का साधन भी तो होगा.”

विकास – मैडम, मैंने बताया ना इस रास्ते में ज़्यादा चोइस नही है.

मेरे ज़िद करने पर विकास बैलगाड़ी के सिवा कुछ और साधन ढूँढने चला गया और मुझसे उस झुमके वाली दुकान के आगे इंतज़ार करने को कहा. मैं सोचने लगी अगर कुछ और नही मिला तो उस बैलगाड़ी में ही जाना पड़ेगा, बड़ी मुश्किल हो जाएगी. एक तो बहुत धीरे धीरे चलती है और कमर दर्द अलग से.

अब विकास चला गया तो मैं पैंटी में पैड लगाकर ऊपर करने की सोचने लगी. तभी मैंने देखा वहाँ पर कुछ लोग आ गये हैं तो मुझे उस जगह से जाना पड़ा.

मैं छोटे छोटे कदम से चल रही थी क्यूंकी पैंटी घुटनों में फंसी होने से ठीक से नही चल पा रही थी. मैंने सोचा कोई और जगह देखती हूँ. जल्दी ही मुझे एक दुकान के पीछे कुछ जगह मिल गयी , वहाँ थोड़ा अंधेरा भी था और कोई आदमी भी नही था. मुझे वो जगह सेफ लगी. मैं एक कोने में गयी और जल्दी से साड़ी और पेटीकोट को कमर तक ऊपर उठा लिया. उसके बाद्र पैंटी को भी घुटनों से थोड़ा ऊपर खींच लिया. फिर से मैंने अपनी नंगी जांघों पर ठंडी हवा का झोंका महसूस किया. जैसे ही पैड को पैंटी में चूत के छेद के ऊपर फिट करने लगी , तभी मुझे किसी की आवाज़ सुनाई दी. मैं एकदम से घबरा गयी क्यूंकी मेरी जवानी बिल्कुल नंगी थी. मैंने इधर उधर देखा पर मुझे कोई नही दिखा. कोई आवाज़ तो मैंने पक्का सुनी थी पर थोड़ा अंधेरा था तो कुछ पता नही चल रहा था. कुछ पल ऐसे ही ठिठकने के बाद मैंने पैड लगाकर पैंटी ऊपर कर ली और साड़ी पेटीकोट नीचे कर ली. फिर मैं अपनी चूचियों के ऊपर पल्लू ठीक से कर रही थी तो मुझे फिर से किसी की आवाज़ सुनाई दी.
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01-17-2019, 01:46 PM,
#16
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फिर मैं अपनी चूचियों के ऊपर पल्लू ठीक से कर रही थी तो मुझे फिर से किसी की आवाज़ सुनाई दी.

“अरे , कोई आ जाएगा.”

“यहाँ कोई नही है. फिकर मत करो.”

वहाँ थोड़ा अंधेरा था इसलिए मेरी आँखों को एडजस्ट होने में कुछ समय लगा . पर अब मुझे सब साफ दिख रहा था. मुझसे कुछ ही दूरी पर एक पेड़ के पीछे एक लड़की और एक आदमी खड़े थे. वो आपस में ही मस्त थे इसलिए उन्होने मुझे नही देखा था. आदमी करीब 30-35 का होगा लेकिन लड़की 18–19 की थी. लड़की ने घाघरा चोली पहना हुआ था. आदमी ने लड़की को अपनी बाँहों के घेरे में पकड़ा हुआ था और उसके होठों का चुंबन लेने की कोशिश कर रहा था. लड़की अपना चेहरा इधर उधर घुमाकर उसको चुंबन लेने नही दे रही थी. 

फिर उस आदमी ने चोली के बाहर से लड़की की चूची को पकड़ लिया और उसे दबाने लगा. अब लड़की का विरोध धीमा पड़ने लगा. कुछ ही देर में लड़की की अंगुलियां आदमी के बालों को सहलाने लगीं और उस आदमी ने अपने होंठ लड़की के होठों से चिपका दिए. फिर चुंबन लेते हुए ही आदमी ने एक हाथ लड़की के घाघरे के बाहर से ही उसकी गांड पर रख दिया और उसे मसलने लगा. उनकी कामुक हरकतों से मेरे निप्पल तन गये. उन्हें छुपकर देखने में मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. लड़की की छोटी चूचियों को वो आदमी अपने हाथ से मसल रहा था , मेरा दायां हाथ अपने आप ही मेरी चूची पर चला गया. 

फिर उस आदमी ने चुंबन लेना बंद कर दिया और लड़की की चूचियों को चोली के बाहर से ही दांतो से काटने लगा. उसने लड़की के घाघरे के अंदर हाथ डालकर घाघरे को उसकी जांघों तक ऊपर उठा दिया और लड़की की चिकनी जांघों पर हाथ फिराने लगा. इस लाइव शो को देखकर मैं अपने हाथ से अपनी चूची दबाने लगी और मेरी चूत गीली हो गयी. 

“पारो , पारो , तुम कहाँ हो ?”

अचानक उस आवाज़ को सुनकर वो दोनों और मैं चौंक पड़े. एक बुड्ढा आदमी जो शायद उस लड़की का पिता या कोई रिश्तेदार था, आवाज़ देकर उसे ढूंढने की कोशिश कर रहा था. वो दोनों एकदम बुत बनकर चुपचाप रहे. आवाज़ देते हुए वो बुड्ढा आगे बढ़ गया. उसके कुछ दूर जाने के बाद लड़की ने अपने कपड़े ठीक किए और बुड्ढे के पीछे दौड़ गयी और वो आदमी भी वहाँ से चला गया. मैं उस बुड्ढे को कोसने लगी, इतना मज़ा आ रहा था , ना जाने आगे वो दोनों और क्या क्या करने वाले थे , पर अब तो लाइव शो खत्म हो गया था. मैं भी वहाँ से निकल आई और झुमके की दुकान के सामने खड़ी होकर विकास का इंतज़ार करने लगी.

कुछ मिनट बाद विकास मुस्कुराते हुए आया.

विकास – मैडम, आपकी किस्मत अच्छी है , बैलगाड़ी में नही जाना पड़ेगा.

मैं बड़ी खुश हुई लेकिन मुझे मालूम नही था की आगे मेरे साथ क्या होनेवाला है.

“शुक्रिया विकास. क्या जुगाड़ किया तुमने ?”

विकास – मैडम , ऑटो मिल गया.

“भगवान का शुक्र है.”

विकास – लेकिन मैडम यहाँ लोग ऑटो से सफ़र नही करते हैं. यहाँ ऑटो सामान ले जाने के काम आता है. उसमें सामान भरा होने से आपको थोड़ी दिक्कत हो सकती है.

“फिर भी उस बैलगाड़ी से तो दस गुना अच्छा ही होगा और जल्दी भी पहुँचा देगा.”

विकास – हाँ मैडम , ये तो है. बैलगाड़ी में एक घंटा लग गया था , ऑटो में 15 मिनट लगेंगे.

फिर हम मेले से बाहर आ गये . ऑटो कुछ दूरी पर खड़ा था. मैंने देखा ऑटो की छत और साइड्स पर रस्सियों से सामान बँधा हुआ था. 

ऑटो के पास एक मोटा , गंजा आदमी खड़ा था जो 50 से तो ऊपर का होगा. वो धोती और हाफ कमीज़ पहने हुआ था.

विकास – मैडम ,ये शर्माजी हैं. ये ऑटो इन्ही का है. हमारी किस्मत अच्छी है की ये भी आश्रम की तरफ ही जा रहे हैं.

शर्माजी – बेटी , तुम्हें थोड़ी दिक्कत होगी क्यूंकी सामान भरा होने से ऑटो में जगह कम है. लेकिन 15 मिनट की परेशानी है फिर तो आश्रम पहुँच ही जाओगी.

मैं उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दी. वो मुझसे बेटी कहकर बात कर रहा था तो मुझे राहत हुई की अच्छा आदमी है , और बुजुर्ग भी है.

ऑटो में आगे की सीट पर भी सामान भरा हुआ था. इसलिए मैं , विकास और शर्माजी पीछे की सीट पर बैठा गये.

ऑटो में बैठने के बाद मुझे एक छोटा कुत्ता दिखा जो शर्माजी के पैरों में बैठा हुआ था. 

शर्माजी – ये मोती है , मेरे साथ ही रहता है. बहुत शांत कुत्ता है , कुछ नही करेगा.

मैं शर्माजी के बगल में बैठी थी और मोती मुझे ही देख रहा था . अंजान लोगों को देख कर भी नही भौंका , शांत स्वभाव का ही लग रहा था.

शर्माजी – बेटी , मेरे शरीर को तो देख ही रही हो. इस छोटी सी जगह में आधी जगह तो मैंने ही घेर ली है, तुम्हें परेशानी तो होगी इसलिए मुझे खूब कोसना. क्या पता तुम्हारे कोसने से मैं थोड़ा पतला हो जाऊँ.

उसकी बात पर हम सब हंस पड़े. वास्तव में उस ऑटो में बहुत कम जगह थी. शर्माजी के बगल में मैं बैठी थी और विकास के लिए जगह ही नही थी. मैं थोड़ा शर्माजी की तरफ खिसकी और जैसे तैसे विकास भी बैठ गया. थोड़ी जगह बनाने के लिए शर्माजी ने अपनी बाई बाँह मेरे पीछे सीट के ऊपर रख दी. मेरा चेहरा उसकी कांख के इतना पास था की उसके पसीने की बदबू मेरी नाक में आ रही थी.

शर्माजी – बेटी , अब जगह हो रही है ?

मैंने हाँ बोल दिया. विकास के लिए सबसे कम जगह थी. उसकी दायीं कोहनी मेरी बायीं चूची को छू रही थी. शर्माजी के सामने मैं विकास की कोई ग़लत हरकत नही चाहती थी इसलिए मैंने अपने हाथ से उसकी कोहनी को धकेल दिया.

शर्माजी – हम तीनो को कार पार्क करने के लिए बड़े गेराज की ज़रूरत है.

उसकी बात पर विकास हंस पड़ा पर मुझे समझ नही आया.

“शर्माजी , मैं समझी नही.”

शर्माजी – बेटी , मेरा मतलब था की हम तीनो के पिछवाड़े बड़े बड़े हैं तो इनको पार्क करने के लिए जगह भी बड़ी चाहिए ना.”

अबकी बार हम सब हंस पड़े. मैंने सोचा शर्माजी तो बड़े मजाकिया मालूम होते हैं. तभी मैंने देखा, ऑटो में अंधेरे का फायदा उठाकर विकास अपनी कोहनी मुझसे छुआ रहा है. इस बार मैंने उसकी कोहनी नही हटाई. मुझे विरोध ना करते देखकर विकास अपनी कोहनी से मेरी मुलायम चूची को दबाने लगा.

शर्माजी – अरे..अरे ….मेरा सर…...

ऑटो ने किसी गड्ढे में तेज झटका खाया और शर्माजी का सर टकरा गया. ड्राइवर ने तुरंत स्पीड कम कर दी. मैंने शिष्टाचार के नाते शर्माजी से पूछा ज़्यादा तो नही लगी.

शर्माजी – ये रॉड से लग गयी बेटी.

शर्माजी ने अपने माथे की तरफ इशारा किया. मैं उसकी तरफ मुड़ी और उसके माथे को देखने लगी.

“आप अपना हाथ हटाइए , मैं देखती हूँ कोई कट तो नही लगा है.”

उसने अपना हाथ हटा लिया और मैं दाएं हाथ से उसके माथे को देखने लगी. उसकी कोहनी से मेरी दायीं चूची दबने लगी लेकिन मैंने ज़्यादा ध्यान नही दिया क्यूंकी वो बुजुर्ग आदमी था और मुझे बेटी भी कह रहा था. वो मुझसे लंबे कद का था इसलिए उसके माथे पर देखने के लिए मुझे अपनी बाँह उठानी पड़ रही थी. मेरी खड़ी बाँह के नीचे दायीं चूची पर शर्माजी की कोहनी का बढ़ता दबाव मैंने महसूस किया. मैंने सोचा जगह की कमी से ऐसा हो रहा होगा. 

शर्माजी – कटा तो नही है ना ?

“साफ तो नही देख पा रही हूँ , लेकिन कटा तो नही दिख रहा है.”

शर्माजी – प्लीज़ थोड़ा ठीक से देख लो बेटी.

मैं अपनी अंगुलियों से उसके माथे पर देखने लगी की कहीं सूजन तो नही आ गयी है , उसकी कोहनी मेरी चूची को दबा रही थी. विकास भी मौके का फायदा उठाने में पीछे नही रहा. वो भी अपनी कोहनी से मेरी बायीं चूची को ज़ोर से दबाने लगा. अपनी कोहनी को वो मेरी चूची पर गोल गोल घुमाकर दबा रहा था. हालत ऐसी थी की ऑटो चल रहा था और दो आदमी मेरी दोनों चूचियों को अपनी कोहनी से दबा रहे थे. विकास का तो मुझे पता था की वो जानबूझकर ऐसा कर रहा है पर शर्माजी के बारे में मैं पक्का नहीं कह सकती ।

शर्माजी का माथा देख लेने के बाद मैं अपना हाथ नीचे लाने को हुई तभी उसका कुत्ता पैरों से उठकर उसकी गोद में आ गया. कुत्ते को जगह देने के चक्कर में उसकी कोहनी से मेरी चूची ज़ोर से दब गयी. अब मुझे अपनी दायीं बाँह शर्माजी के पीछे सीट पर रखनी पड़ी क्यूंकी शर्माजी ने मेरे पीछे से अपनी बाँह हटा ली थी तो जगह कम हो रही थी. पर ऐसा करने से मेरी दायीं चूची को मेरी बाँह का प्रोटेक्शन मिलना बंद हो गया.

विकास – मैडम , हाँ ये सही तरीका है. इससे थोड़ी जगह हो जाएगी. जैसे आपने शर्माजी के पीछे अपनी बाँह रखी हुई है वैसे ही मैं भी अपनी बाँह आपके पीछे रख देता हूँ, इससे आपके लिए भी थोड़ी और जगह बन जाएगी.

शर्माजी – विकास भी समझदार होते जा रहा है. है ना बेटी ?

फिर से सब हंस पड़े. तभी आगे से एक साइकिल वाला आया और हाथ हिलाकर रुकने का इशारा करने लगा. ड्राइवर ने ऑटो रोका तो उस आदमी ने बताया की आगे एक्सीडेंट हुआ है इसलिए रोड बंद है. यहाँ से बायीं रोड से जाना होगा.

विकास – मैडम , ये तो गड़बड़ हो गयी. वो तो बहुत लंबा रास्ता है.

“उस रास्ते से कितना समय लगेगा ?”

विकास – कम से कम 45 मिनट तो लगेंगे.

शर्माजी – और क्या कर सकते हैं. आगे रोड बंद है तो लंबे रास्ते से ही जाना होगा. आधा घंटा ही तो एक्सट्रा लगेगा.

ड्राइवर ने ऑटो मोड़ा और हम दूसरे रास्ते पर आ गये.
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01-17-2019, 01:46 PM,
#17
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शर्माजी – और क्या कर सकते हैं. आगे रोड बंद है तो लंबे रास्ते से ही जाना होगा. आधा घंटा ही तो एक्सट्रा लगेगा.

ड्राइवर ने ऑटो मोड़ा और हम दूसरे रास्ते पर आ गये.

इस दूसरी वाली रोड की हालत खराब थी , बार बार ऑटो में झटके लग रहे थे. इन झटकों से मेरी बड़ी बड़ी चूचियाँ ब्रा में ऊपर नीचे उछलने लगी. विकास ने ये बात नोटिस की. मेरा दायां हाथ शर्माजी के पीछे सीट पर था और विकास का दायां हाथ मेरे पीछे सीट पर था. धीरे धीरे वो अपना हाथ नीचे को सरकाने लगा और मेरी उठी हुई बाँह के नीचे ले आया. मैंने तिरछी नज़रों से शर्माजी को देखा , शुक्र था की उसका ध्यान अपनी गोद में बैठे हुए कुत्ते मोती पर था. अब विकास मेरी साड़ी के पल्लू के अंदर दायीं चूची को दबाने लगा. मेरी बाँह ऊपर होने से विकास को पूरी आज़ादी मिल गयी थी. ऑटो को लगते हर झटके के साथ विकास ज़ोर से मेरी चूची दबा देता. मुझे भी मज़ा आ रहा था , मैंने पल्लू को थोड़ा दाहिनी तरफ कर दिया ताकि विकास का हाथ ढक जाए और शर्माजी देख ना सके.

तभी ड्राइवर ने ऑटो में अचानक से ब्रेक लगाया , शायद आगे कोई गड्ढा था. लेकिन उससे मुझे शर्मिंदगी हो गयी. विकास का हाथ मेरी चूची पर था. शर्माजी ने अपना दायां हाथ मोती के सर पर रखा हुआ था , उसकी अंगुलियां मेरी दायीं चूची से कुछ ही इंच दूर थी. जब अचानक से ब्रेक लगा तो उसका हाथ मेरी चूची से टकरा गया . इससे मेरी चूची विकास और शर्माजी दोनों के हाथों से एक साथ दब गयी , एक की हथेली के ऊपर दूसरे की हथेली.

शर्माजी – ये क्या तरीका है ? ठीक से चलाओ और आगे रास्ते पर नज़र रखो. जल्दबाज़ी करने की ज़रूरत नही है.

शर्माजी ने ड्राइवर को डाँट दिया और उसने माफी माँग ली. लेकिन उस झटके में मेरी चूची दबाने के लिए किसी आदमी ने मुझसे माफी नही माँगी. शर्माजी के हाथ से टकराने के बाद विकास ने अपना हाथ मेरी चूची से हटाकर मेरे पीछे कंधे पर रख दिया था. उस झटके से मोती भी अपनी जगह से हिल गया था और उसका सर मेरी तरफ खिसक गया था. अब उसके सर के ऊपर रखी हुई शर्माजी की अंगुलियां कभी कभी मेरी चूची से छू जा रही थी.

शर्माजी – बेटी , तुम ठीक हो ? कहीं लगी तो नही ?

मैं थोड़ी कन्फ्यूज़ हुई. ये बुड्ढा मेरा हाल चाल पूछ रहा है और इसकी अंगुलियां मेरी चूची को छू रही हैं . फिर मैंने सोचा मैं इस बुजुर्ग आदमी के बारे में ग़लत सोच रही हूँ , इसे तो मेरी फिकर हो रही है.

“नही , नही. मैं बिल्कुल ठीक हूँ.”

शर्माजी के डाँटने के बाद अब ड्राइवर ऑटो धीमा चला रहा था. 

विकास के अपना हाथ मेरी चूची से हटा लेने के बाद मैंने राहत की सांस ली, चलो अब ठीक से बैठेगा. लेकिन उसको चैन कहाँ. वो अपना हाथ मेरे कंधे पर ब्लाउज के ऊपर फिराने लगा. उसकी अंगुलियां मेरे कंधे पर ब्रा के स्ट्रैप को छूती हुई नीचे को जाने लगी और पीछे ब्लाउज के हुक पर आ गयी, मेरे बदन में कंपकपी सी दौड़ गयी. विकास की शरारती हरकतों पर शर्माजी का ध्यान ना जाए , इसलिए मैं मोती से बात करने लगी.

“मोती मोती , यू ….उ…… यू ……”

शर्माजी – मोती , सर हिलाओ.

मैं मोती से ये फालतू बातें कर रही थी . उधर विकास अपनी अंगुलियों से पकड़कर मेरी ब्रा के स्ट्रैप को पीछे खींच रहा था. स्ट्रैप को पीछे की ओर खींचता फिर झटके से छोड़ देता. उसका यही खेल हो रहा था. अगर किसी औरत की ब्रा से कोई ऐसे करे तो वो आराम से कैसे बैठ सकती है ? फिर भी मैं चुपचाप से बैठने की पूरी कोशिश कर रही थी. विकास की इस छेड़छाड़ से मैं उत्तेजित होने लगी थी. 

कुछ समय बाद विकास बोर हो गया और उसने मेरी ब्रा के स्ट्रैप से खेलना बंद कर दिया. अब उसका हाथ मेरी पीठ पर ब्लाउज से नीचे को जाने लगा. मेरी स्पाइन को छूते हुए उसका हाथ ब्लाउज और साड़ी के बीच मेरी कमर पर आ गया.

शर्माजी का ध्यान बँटाने के लिए मैं मोती से खेल रही थी. ऑटो को लगते झटको से शर्माजी की अंगुलियां मेरी चूची से छू जा रही थी. बुजुर्ग होने की वजह से मैं ध्यान नही दे रही थी पर एक बार उसका अंगूठा मैंने अपने निप्पल के ऊपर महसूस किया. मुझे लगा ऐसा अंजाने में हो गया होगा लेकिन ऐसे छूने से मेरे निप्पल तन गये. 

शर्माजी – बेटी , मोती तुम्हें अच्छा लग रहा है तो अपनी गोद में बैठा लो.

“नही नही , काट लिया तो ?”

शर्माजी – बेटी , उस पर भरोसा करो. तुम्हें दाँत नही गड़ाएगा. ये तुम्हारा पति थोड़े ही है.

उसकी बात से मैं शरमा गयी. मुझे शरमाते देख शर्माजी हंस पड़ा , शायद मुझे हंसाने के लिए.

शर्माजी – बेटी , मेरे मज़ाक से तुम बुरा तो नहीं मान रही हो ना ?

“ना ना. ऐसी कोई बात नही.”

लेकिन मैं अभी भी उसकी बात पर शरमा रही थी. मैंने शर्माजी के पीछे से अपना हाथ हटाया और दोनों हाथों से मोती को अपनी गोद में बिठाने लगी पर मोती अंजाने की गोद में जाने में घबरा रहा था.

शर्माजी – बेटी डरो मत. मोती कुछ नही करेगा. मोती उछल कूद मत करो.

शर्माजी ने मेरी तरफ मुड़कर मोती को मेरी गोद में रख दिया पर मोती उछल कूद कर रहा था इसलिए अभी भी उसने दोनों हाथों से मोती को पकड़ा हुआ था. विकास का हाथ मेरी कमर में था और वो मेरी पेटीकोट के अंदर अपनी अंगुली घुसाने की कोशिश कर रहा था. लेकिन शर्माजी को मेरी तरफ मुड़ा हुआ देखकर विकास ने अपनी हरकत रोक दी. पर अब दूसरी मुसीबत सामने से थी. मोती को कंट्रोल करने के चक्कर में शर्माजी के हाथों से मेरी चूचियाँ दब जा रही थी. हालाँकि वो बुजुर्ग आदमी था और मुझे लगा की ये अंजाने में हो रहा है पर ऐसे छूने से मुझे उत्तेजना आ रही थी.

कुछ देर बाद मोती शांत हो गया और मेरी गोद में बैठ गया , तब तक शर्माजी की अंगुलियों से कई बार मेरी चूचियाँ दब चुकी थी. विकास ने देखा अब मोती शांत बैठ गया है. उसने फिर से अपनी अंगुली मेरी पेटीकोट में घुसानी शुरू कर दी और मेरी पैंटी छूने की कोशिश करने लगा. वो तो अच्छा था की मैंने पेटीकोट कस के बांधा हुआ था तो विकास ज़्यादा अंदर तक अंगुली नही डाल पा रहा था. 

शर्माजी – बेटी , मैं एक हाथ मोती के ऊपर रखता हूँ ताकि ये अगर फिर से उछल कूद करे तो मैं सम्हाल लूँगा.

मैं क्या कहती ? वो मेरी हेल्प के लिए ऐसा बोल रहा था लेकिन मोती के ऊपर हाथ रखने से उसकी अंगुलियां मेरी तनी हुई चूचियों को छूने लगती. मैंने हाँ में सर हिला दिया.

शर्माजी मुझसे और भी सट गया और मोती के सर पर अपना हाथ रख दिया. मोती अपना सर इधर उधर हिला रहा था और शर्माजी की अंगुलियां मेरी चूची पर रगड़ रही थी.

शर्माजी – बेटी , मोती के ऊपर मेरा हाथ है , अब तुम्हें डरने की ज़रूरत नही.

उसके बेटी कहने से मुझे अपने ऊपर ग्लानि हो रही थी की मैं इसके बारे में ग़लत ख्याल कर रही हूँ. मैंने उसकी अंगुलियों के छूने को नज़रअंदाज़ कर दिया. विकास ने मेरी पेटीकोट में अंगुली घुसाने का खेल भी बंद कर दिया था. अब वो हाथ और नीचे ले जाकर साड़ी के बाहर से मेरे नितंबों को छू रहा था. मेरे मक्खन जैसे मुलायम बड़े नितम्बों में बहुत रस था , उन्हें दबाने में उसे बहुत मज़ा आ रहा होगा. उसका पूरा हाथ नही जा पा रहा था इसलिए मैं थोड़ा आगे खिसक गयी. मेरे आगे खिसकने से उसके हाथ के लिए जगह हो गयी और मज़े लेते हुए मेरे नितंबों पर हाथ फिराने लगा. उसके ऐसे हाथ फिराने से मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था. एक ही दिन में आज ये दूसरा मर्द था जो मेरी गांड दबा रहा था. 

अब अंधेरा बढ़ने लगा था. शर्माजी की हथेली भी मोती के सर से खिसक गयी थी. मोती के सर पर उसकी बाँह थी और हथेली ब्लाउज और पल्लू के बाहर से मेरी चूची के ऊपर. एक आदमी पीछे से मेरे बड़े नितंबों से मज़े ले रहा था और दूसरा आगे से चूची पर हाथ फिरा रहा था. मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी. गुरुजी की जड़ी बूटी के असर से उन दोनों के बीच मेरी हालत एक रंडी की जैसी हो गयी थी. 

मोती कुछ देर शांत बैठने के बाद फिर से उछल कूद करने लगा. उसको सम्हालने के चक्कर में शर्माजी मेरी चूचियों की मालिश कर दे रहा था.

शर्माजी – बेटी , मोती को तुम्हारी गोद में चैन नही आ रहा. इसको नीचे रख दो.

“हाँ , एक पल के लिए भी ठीक से नही बैठ रहा.”

शर्माजी – शायद मोती से भी ( तुम्हारी ) गर्मी सहन नही हो रही.

उसकी बात पर विकास ज़ोर से हंस पड़ा और शर्माजी के कमेंट की दाद देने के लिए मेरे नितंबों पर ज़ोर से चिकोटी काट ली. मैं भी बेशर्मी से हंस दी.

फिर मैंने मोती को नीचे रख दिया. पर वो नीचे भी शांत नही बैठा और मेरी टांगों को सूंघने लगा. कुछ ही देर में सूंघते सूंघते उसने अपना सर मेरी साड़ी के अंदर घुसा दिया. अब ये मेरे लिए बड़ी अजीब स्थिति हो गयी थी. विकास को भी आश्चर्य हुआ और उसने मेरे नितंबों को दबाना बंद कर दिया.
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01-17-2019, 01:46 PM,
#18
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फिर मैंने मोती को नीचे रख दिया. पर वो नीचे भी शांत नही बैठा और मेरी टांगों को सूंघने लगा. कुछ ही देर में सूंघते सूंघते उसने अपना सर मेरी साड़ी के अंदर घुसा दिया. अब ये मेरे लिए बड़ी अजीब स्थिति हो गयी थी. विकास को भी आश्चर्य हुआ और उसने मेरे नितंबों को दबाना बंद कर दिया.

शर्माजी – मोती , क्या कर रहा है ?

लेकिन मोती अपने मालिक की बात नही सुन रहा था. साड़ी के अंदर मेरी टाँगों पर उसकी गीली नाक मैंने महसूस की.

“आउच….”

शर्माजी – क्या हुआ बेटी ?

मुझे कुछ जवाब देने की ज़रूरत नही थी , मोती ने अपना सर मेरी दोनों टाँगों के बीच साड़ी के अंदर घुसा दिया था ये सबको पता था. मोती अब मेरी जांघों पर जीभ लगाकर पसीने की बूंदे चाट रहा था. उसकी खुरदूरी गीली जीभ से मुझे गुदगुदी और अजीब सी सनसनी हो रही थी. 

“ऊऊहह…...आआहह…..प्लीज़ इसे बाहर निकालो. “

शर्माजी – बेटी , घबराओ नही. मैं इसे बाहर निकलता हूँ.

विकास – मैडम , हिलो नही, मोती वहाँ काट भी सकता है.

शर्माजी – मोती , मोती चल बाहर आजा …..आजा…..

लेकिन मोती शर्माजी की नही सुन रहा था. वो पेटीकोट के अंदर मेरी नंगी जांघों के निचले हिस्से पर अपनी गीली नाक और जीभ लगाने में व्यस्त था. अपनी त्वचा पर उसकी नाक और जीभ लगने से मेरे बदन में कंपकपी हो रही थी और उत्तेजना आ रही थी. मेरी चूत से रस बहने लगा था.

शर्माजी – बेटी , मोती मेरी नही सुन रहा. तुम अपनी साड़ी थोड़ी ऊपर करो तो मैं इसका सर बाहर निकालूँ.

“प्लीज़ कुछ भी करो पर इसे जल्दी बाहर निकालो…..ऊऊओह…....”

मोती अपनी नाक ऊपर को खिसकाते जा रहा था. उसकी जीभ लगने से मेरी जांघें गीली हो गयी थीं. और ठंडी नाक लगने से अजीब गुदगुदी हो रही थी. 

शर्माजी – ठीक है. तुम शांत रहो बेटी. मैं तुम्हारी साड़ी उठाकर मोती को बाहर निकाल देता हूँ.

वो ऐसे कह रहा था जैसे मैंने उसे अपनी साड़ी उठाने की अनुमति दे दी हो.

अब उन दोनों मर्दों के सामने मेरी हालत खराब हो गयी थी. मेरा सीट पर बैठना मुश्किल हो गया था. बदमाश मोती की हरकतों से मेरे बदन में कंपकपी दौड़ जा रही थी. ऊऊहह…..आअहह……करते हुए मैं अपना बदन इधर से उधर हिला रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे कोई मर्द मेरी जांघों को चाट रहा हो और मैं सिसकारियाँ ले रही हूँ. बिल्कुल वैसी ही हालत थी मेरी. 

फिर शर्माजी थोड़ा झुका और साड़ी के साथ पेटीकोट को ऊपर उठाने लगा. मेरी हालत देखकर विकास ने अपने बाएं हाथ से मेरा बायां हाथ पकड़ लिया और दाएं हाथ को पीछे से ले जाकर मेरा दायां कंधा पकड़ लिया. उसकी बाँहों का सहारा मिलने से मैं पीछे को उसके बदन पर ढल गयी . इस बात का उसने पूरा फायदा उठाया और मेरी दायीं चूची पर हथेली रख दी. शर्माजी ना देख पाए इसलिए उसने साड़ी के पल्लू के अंदर हाथ डाला और ब्लाउज के बाहर से मेरी चूची सहलाने लगा.

शर्माजी ने मेरी गोरी टाँगों को नंगा करने में ज़रा भी देर नही की और साड़ी को पेटीकोट के साथ घुटनों तक उठा दिया. शर्माजी के साड़ी ऊपर उठाने से मोती और भी ऊपर नाक घुसाने को कोशिश करने लगा. शर्माजी भी अब अपनी उमर का लिहाज भूलकर मौके का फायदा उठाने में लगा था. मेरी साड़ी उठाने के बहाने वो मेरी टाँगों पर हाथ फिराने लगा. मोती को बाहर निकालने में उसकी कोई दिलचस्पी नही थी. अब वो मेरी नंगी जांघों को देखने के लिए जबरदस्ती मेरी साड़ी को घुटनों से ऊपर उठाने लगा. 

चूँकि मोती मेरी टाँगों के बीच था इसलिए मेरी टाँगें फैली हुई थीं. अब साड़ी को और ऊपर करना शर्माजी के लिए मुश्किल हो रहा था. लेकिन बुड्ढे को जोश चढ़ा हुआ था. उसने मेरे नितंबों के नीचे हाथ डाला और दायीं जाँघ को थोड़ा ऊपर उठाकर साड़ी ऊपर करने के लिए पूरी जान लगा दी. 

“आउच…..प्लीज़ मत करो….”

अब उस हरामी बुड्ढे की वजह से मेरी दायीं जाँघ बिल्कुल नंगी हो गयी थी. मोती अब साड़ी उठने से ढका हुआ नही था पर शर्माजी ने मुझे कोई मौका नही दिया और विकास की तरफ से भी साड़ी ऊपर उठा दी. अब मेरी साड़ी और पेटीकोट पूरी ऊपर हो चुकी थी. वो तो मैंने पैंटी पहनी हुई थी वरना उस चलते हुए ऑटो में मेरी नंगी चूत दिख गयी होती. 

मैं मत करो कहती रही , लेकिन ना विकास रुका , ना शर्माजी और ना ही मोती.

साड़ी पूरी ऊपर हो जाने से मोती मेरी पैंटी को सूंघ रहा था. मेरी जांघें उसकी लार से गीली हो गयी थीं. मैं अपने दाएं हाथ से अपनी जांघों को पोंछने लगी क्यूंकी बायां हाथ विकास ने पकड़ा हुआ था. शर्माजी ने मुझे एक बेशरम औरत की तरह कमर तक नंगा कर दिया था. मैं औरत होने की वजह से स्वाभाविक रूप से मत करो कह रही थी पर उन तीनो की हरकतों से मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी. मेरी चूत से रस बह रहा था. मोती मेरे घुटनों पर पैर रखकर पैंटी में नाक लगाकर रस सूंघ रहा था.

विकास पहले साड़ी के पल्लू के अंदर हाथ डालकर धीरे से मेरी चूची सहला रहा था. पर अब मुझे उस हालत में देखकर वो भी पूरा फायदा उठाने लगा. उसने अपने दाएं हाथ से मेरी दायीं चूची को अंगुलियों में पकड़ लिया और ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा. मैं उसके बदन पर सहारे के लिए ढली हुई थी. उसके ज़ोर ज़ोर से चूची दबाने से मेरे लिए सांस लेना मुश्किल हो गया. मेरा बायां हाथ उसने अपने हाथ में पकड़ा हुआ था , मैं उस हालत में उत्तेजना से तड़प रही थी.

शर्माजी उस चलते हुए ऑटो में मुझे नंगा करने पर तुला हुआ था. सब शरम लिहाज छोड़कर वो बुड्ढा अब मेरी नंगी मांसल जांघों को अपने हाथों से मसल रहा था. मैं अपने दाएं हाथ से मोती की लार अपनी जांघों से पोंछने की कोशिश कर रही थी. शर्माजी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपने दूसरे हाथ से मेरी जांघों को पोंछने लगा. उसके खुरदुरे हाथों का मेरी मुलायम और चिकनी जांघों पर स्पर्श मुझे पागल कर दे रहा था. वो अपने हाथ को मेरे घुटनों से पैंटी तक लार पोंछने के बहाने से फिरा रहा था. उसकी अंगुलियां मेरी पैंटी को छू रही थीं. मोती की ठंडी नाक भी मुझे अपनी पैंटी के ऊपर महसूस हो रही थी. वो तो गुरुजी का पैड चूत के ऊपर लगा हुआ था वरना शर्माजी की अंगुलियां और मोती की नाक मेरी चूत को छू देती.

ऑटो धीमे चल रहा था और अंदर तीनो ने मेरा बुरा हाल कर रखा था. अब मैं कोई विरोध भी नही कर सकती थी क्यूंकी एक एक हाथ दोनों ने पकड़ रखा था. मोती अब मेरी नंगी जांघों पर बैठकर पैंटी सूंघ रहा था और कभी नाक ऊपर उठाकर मेरी चूचियों पर लगा देता. 

शर्माजी मेरी जांघों पर हाथ फिराने के बाद फिर से मेरी साड़ी के पीछे पड़ गया. उसने मेरे नितंबों को सीट से थोड़ा ऊपर उठाकर साड़ी और पेटीकोट को मेरे नीचे से ऊपर खींच लिया. अब कमर से नीचे मैं पूरी नंगी थी सिवाय एक छोटी सी पैंटी के. पैंटी भी पीछे से सिकुड़कर नितंबो की दरार में आ गयी थी. जब साड़ी और पेटीकोट मेरे नीचे से निकल गये तो मुझे अपने नितंबों पर ऑटो की ठंडी सीट महसूस हुई. मेरे बदन में कंपकपी की लहर सी दौड़ गयी. और चूत से रस बहाते हुए मैं झड़ गयी.

“ऊऊओ…. आह…....प्लीज़……ये क्या कर रहे हो ?”

अब बहुत हो गया था. सिचुयेशन आउट ऑफ कंट्रोल होती जा रही थी. मुझे विरोध करना ही था. पर मुझे सुनने वाला कौन था.

“कम से कम मोती को तो हटा दो.”

शर्माजी और उसके मोती की वजह से मुझे ओर्गास्म आ गया. विकास ने मुझे सहारा देते हुए पकड़े रखा था लेकिन मेरी दायीं चूची पूरी निचोड़ डाली थी. मेरी साड़ी का पल्लू ब्लाउज के ऊपर दायीं तरफ को खिसक गया था. विकास ने अपना हाथ छिपाने के लिए पल्लू को दायीं चूची के ऊपर रखा था. अब मोती अपनी नाक ऊपर करके मेरी चूचियों पर लगा रहा था.

शर्माजी ने अब मेरा हाथ छोड़ दिया और अपना बायां हाथ मेरे पीछे ले गया. मैंने सोचा पीछे सीट पर हाथ रख रहा है पर वो तो नीचे मेरी पैंटी की तरफ हाथ ले गया. फिर अपने दाएं हाथ से उसने मुझे थोड़ा खिसकाया और अपनी बायीं हथेली मेरे नितंबों के नीचे डाल दी.

“आउच….”

अब मैं शर्माजी की हथेली के ऊपर बैठी थी और ऑटो को लगते हर झटके के साथ मेरे नितंबों और सीट के बीच में उसकी हथेली दब जा रही थी. ऐसा अनुभव तो मुझे कभी नही हुआ था. पर सच बताऊँ तो मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. मेरी पैंटी बीच में सिकुड़ी हुई थी , एक तरह से पूरे नंगे नितंबों के नीचे उसकी हथेली का स्पर्श मुझे पागल कर दे रहा था. मेरी चूत से रस निकल कर पैंटी पूरी गीली हो गयी थी. मोती भी अपने मालिक की तरह मेरे पीछे पड़ा था. अब वो मेरी बायीं चूची को , जिसके ऊपर से साड़ी का पल्लू हट गया था, ब्लाउज के ऊपर से चाट रहा था. 

“विकास मोती को हटाओ. मुझे वहाँ पर काट लेगा तो….”

मुझे बहुत मस्ती चढ़ी हुई थी. इन तीनो की हरकतों से मैं कामोन्माद में थी. शर्माजी की हथेली का मेरे नंगे नितंबों पर स्पर्श मुझे रोमांचित कर दे रहा था.

शर्माजी – बेटी , फिकर मत करो. मैं तुम्हें बचा लूँगा.

शर्माजी ने मोती के मुँह के आगे अपनी दूसरी हथेली लगाकर मेरी बायीं चूची ढक दी. उसके लिए तो बहाना हो गया. अब मोती की जीभ और मेरे ब्लाउज के बीच उसकी हथेली थी. उसने अपनी हाथ से मेरी चूची को पकड़ा और ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया. अब दोनों चूचियों को दो मर्द दबा रहे थे और मोती चुपचाप देख रहा था. 

“ऊऊऊहह………आआआहह……....मत करो प्लीज़ईईई…..”

मुझे एक और ओर्गास्म आ गया.

शर्माजी और विकास दोनों ने मेरी एक एक चूची पकड़ी हुई थी और शर्माजी दूसरे हाथ से मेरे नितंबों को मसल रहा था. विकास ने अब मेरा हाथ छोड़ दिया और अपना बायां हाथ आगे ले जाकर मेरी पैंटी को छूने लगा. दोनों मर्द मेरी हालत का फायदा उठाने में कोई कसर नही छोड़ रहे थे. शर्माजी की भारी साँसें मुझे अपने कंधे के पास महसूस हो रही थी , अपनी उमर के लिहाज से उसके लिए भी शायद ये बहुत ज़्यादा हो गया था. 

गुरुजी के दिए पैड को मैंने चूतरस से पूरी तरह भिगो दिया था. और अब मैं निढाल पड़ गयी थी. विकास ने अपना हाथ मेरी दायीं चूची से हटा लिया. पर शर्माजी का मन अभी नही भरा था. वो अभी भी मेरी बायीं चूची को दबा रहा था. मेरे नितंबों की गोलाई नापता हुआ हाथ भी उसने नही हटाया था. आज तक किसी ने भी ऐसे मेरे नंगे नितंबों को नही मसला था.

तभी ड्राइवर ने बताया की अब हम मेन रोड पर आ गये हैं. खुशकिस्मती से वो हमें नही देख सकता था क्यूंकी उसकी सीट के पीछे भी समान भरा हुआ था.

शर्माजी – बेटी , अपनी साड़ी ठीक कर लो , नही तो सामने से आते ऑटोवालों का एक्सीडेंट हो जाएगा.

उसकी बात पर विकास हंस पड़ा. मैं भी मुस्कुरा दी , पूरी बेशरम जो बन गयी थी. मैंने अपने कपड़ों की हालत को देखकर एक लंबी सांस ली. मुझे हैरानी हो रही थी की इतनी उत्तेजना आने के बाद भी मुझे चुदाई की बहुत इच्छा नही हुई. मैंने सोचा शायद गुरुजी की जड़ी बूटी का असर हो . क्यूंकी नॉर्मल सिचुयेशन में कोई भी औरत अगर इतनी ज़्यादा एक्साइटेड होती तो बिना चुदाई किए नही रह पाती. 

उत्तेजना खत्म होने के बाद मैं अब होश में आई और कपड़े ठीक करने लगी, पर साड़ी अटकी हुई थी क्यूंकी बुड्ढे का हाथ अभी भी मेरे नितंबों के नीचे था. मैं एक जवान शादीशुदा औरत , एक अंजाने आदमी की हथेली में बैठी हूँ , क्या किया मैंने ये, अब मुझे बहुत शरम आई. मैंने अपने नितंबों को थोड़ा सा ऊपर उठाया और बुड्ढे ने अपना हाथ बाहर निकाल लिया. फिर उसने मोती को मेरी गोद से नीचे उतार दिया. 

मैंने जल्दी से साड़ी नीचे की और अपनी नंगी जांघों और टाँगों को ढक दिया , जो इतनी देर से खुली पड़ी थीं. फिर मैंने ब्लाउज के ऊपर साड़ी के पल्लू को ठीक किया और इन दोनों मर्दों के हाथों से बुरी तरह निचोड़ी गयी चूचियों को ढक दिया. उसी समय मैंने देखा शर्माजी अपनी धोती में लंड को एडजस्ट कर रहा है. शायद मुझे चोद ना पाने के लिए उसे सांत्वना दे रहा होगा.

शर्माजी – बेटी , तुम्हारा ब्लाउज गीला हो गया है, शायद दूध निकल आया है. रुमाल दूं पोंछने के लिए ?

“नही नही. ये दूध नही है. मोती ने जीभ से गीला कर दिया.”

विकास – मैडम को अभी बच्चा नही हुआ है. उसी के इलाज़ के लिए तो गुरुजी की शरण में आई है.

शर्माजी – ओह सॉरी बेटी. लेकिन गुरुजी की कृपा से तुम ज़रूर माँ बन जाओगी.

मैंने मन ही मन सोचा, माँ तो पता नही लेकिन अगर अंजाने मर्दों को ऐसे ही मैंने अपने बदन से छेड़छाड़ करने दी तो मैं जल्दी ही रंडी ज़रूर बन जाऊँगी.

फिर हम आश्रम पहुँच गये. शर्माजी और उसके मोती से मेरा पीछा छूटा. लेकिन ऑटो से उतरते समय मुझे उतरने में मदद के बहाने उसने एक आखिरी बार अपने हाथ से , साड़ी के बाहर से मेरे नितंबों को दबा दिया. 

ऑटो के जाने के बाद मैं और विकास अकेले रह गये. ऑटो में जो हुआ उसकी शरम से मैं विकास से आँखें नही मिला पा रही थी और तुरंत अपने कमरे में चली गयी. मुझे नहाने की सख्त ज़रूरत थी , पूरा बदन चिपचिपा हो रखा था. मैं सीधे बाथरूम में घुसी और फटाफट अपने कपड़े उतार दिए. मेरी पैंटी हमेशा की तरह नितंबों की दरार में फंसी हुई थी उसे भी निकाल फेंका. 

तभी मैंने देखा मेरे ब्लाउज का तीसरा हुक टूट कर लटक गया है. वहाँ पर थोड़ा कपड़ा भी फट गया था. ऑटो में मुझे दिखा नही था. ज़रूर विकास के लगातार चूची दबाने से ब्लाउज फटा होगा. इतना मेरी चूचियों को तो किसी ने नही निचोड़ा जितना उस ऑटो में विकास ने निचोड़ा था. ब्लाउज तो फटना ही था. गोपालजी से ठीक करवाना पड़ेगा. मेरी ब्रा भी पसीने से भीग गयी थी. ब्रा का स्ट्रैप सही सलामत है यही गनीमत रही वरना इसको भी बहुत निचोड़ा था उन दोनों ने. 

सब कपडे फटाफट उतारकर मैं नंगी हो गयी. पैंटी से गीला पैड निकालकर मैंने एक कोने में रख दिया और नहाने लगी. दिन भर जो मेरे साथ हुआ था , पहले टेलर की दुकान में , फिर मेले में और फिर ऑटो में , उससे मेरे मन में एक अपराधबोध हो रहा था. मैंने देर तक नहाया जैसे उस गिल्ट फीलिंग को बहा देना चाहती हूँ. 

उसके बाद कुछ खास नही हुआ. परिमल मेरे कमरे में आया और पैड ले गया. बाद में डिनर भी लाया. मंजू भी आई और मेले के बारे में पूछने लगी. उसके चेहरे की मुस्कुराहट बता रही थी की जो कुछ मेरे साथ हुआ उसे सब पता है. समीर गोपालजी के भेजे हुए दो एक्सट्रा ब्लाउज लेकर आया और ये भी बता गया की सुबह 6:30 पर गुरुजी के पास जाना होगा. 

एक ही दिन में इतना सब कुछ होने के बाद मैं बुरी तरह थक गयी थी. दो दो बार मैंने पैड पूरे गीले कर दिए थे. तीन मर्दों ने मेरे बदन को हर जगह पर निचोड़ा था. 

डिनर के बाद मैं सीधे बेड पर लेट गयी. मुझे अपने बदन में इतनी गर्मी महसूस हो रही थी की मैंने अपनी नाइटी पेट तक उठा रखी थी , अंदर से ब्रा पैंटी कुछ नही पहना था. ऐसे ही आधी नंगी लेटी हुई जल्दी ही मुझे गहरी नींद आ गयी. रात में मुझे अजीब से सपने आए , साँप दिखे , शर्माजी और उसका मोती भी सपने में दिखे.
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01-17-2019, 01:46 PM,
#19
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
सुबह किसी के दरवाज़ा खटखटाने से मेरी नींद खुली. मैंने अपनी नाइटी नीचे को खींची और बेड से उठ गयी. दरवाज़ा खोला तो बाहर मंजू खड़ी थी. उसने कहा, तैयार होकर आधे घंटे में गुरुजी के कमरे में आ जाओ. 

मैं बाथरूम चली गयी और नहा लिया. आश्रम से मिली हुई नयी साड़ी पहन ली और गोपालजी का भेजा हुआ ब्लाउज पहन लिया. ये वाला ब्लाउज फिट आ रहा था. मैंने पेटीकोट के अंदर पैंटी नही पहनी . पैड लगाने के लिए फिर से नीचे करनी पड़ती है, बाद में पहनूँगी. नहा धो के मैं तरोताजा महसूस कर रही थी. फिर मैं गुरुजी के कमरे में चली गयी.

गुरुजी पूजा कर रहे थे. उस कमरे में अगरबत्तियों के जलने से थोड़ा धुआँ हो रखा था. गुरुजी अभी अकेले ही थे. मुझे उनकी पूजा खत्म होने तक 5 मिनट इंतज़ार करना पड़ा.

गुरुजी – जय लिंगा महाराज. रश्मि , मुझे बताओ तुम्हारा कल का दिन कैसा रहा ?

“जय लिंगा महाराज. जी वो ….मेरा मतलब…...”

मैं क्या बोलती ? यही की अंजाने मर्दों ने मेरे बदन को मसला , मेरी चूचियों को जी भरके दबाया , मेरी नंगी जांघों और नितंबों पर खूब हाथ फिराए और मैंने एक बेशरम औरत की तरह से इन सब का मज़ा लिया ? 

गुरुजी शायद मेरी झिझक समझ गये.

गुरुजी – ठीक है रश्मि. मैं समझता हूँ की तुम एक हाउसवाइफ हो और नैतिक रूप से तुम्हारे लिए इन हरकतों को स्वीकार करना बहुत कष्टदायी रहा होगा. तुम्हें ये सब ग़लत लगा होगा और अपराधबोध भी हुआ होगा. लेकिन तुम्हारे गीले पैड देखकर मुझे अंदाज़ा हो गया की तुमने इसका कितना लुत्फ़ उठाया.

“जी , मुझे दोनों बार ज़्यादा स्खलन हुआ था.”

गुरुजी – ये तो अच्छी बात है रश्मि. देखो , मैं चाहता हूँ की तुम इस बारे में कुछ मत सोचो. अभी नैतिक अनैतिक सब भूल जाओ और जो मैंने तुम्हें लक्ष्य दिया है , दिन में दो बार स्खलन का , सिर्फ़ उस पर ध्यान दो. आज भी कल के ही जैसे , जो परिस्थिति तुम्हारे सामने आए तुमने उसी के अनुसार अपना रेस्पॉन्स देना है. जो हो रहा है, उसे होने देना, कहाँ हूँ , किसके साथ हूँ , ये मत सोचना. दिमाग़ को भटकने मत देना और खुद को परिस्थिति के हवाले कर देना.

“गुरुजी , मैं कुछ पूछ सकती हूँ ?”

गुरुजी – मुझे मालूम है तुम क्या पूछना चाहती हो. यही की तुम्हें कामस्खलन हुआ लेकिन संभोग की तीव्र इच्छा नही हुई. यही पूछना चाहती थी ना तुम ?

मैंने अपना सर हिला दिया क्यूंकी बिल्कुल यही प्रश्न मेरे दिमाग़ में था.

गुरुजी – ये जड़ी बूटी जो मैंने तुम्हें दवाई के रूप में दी हैं उसी की वजह से तुम्हें बहुत कामोत्तेजित होते हुए भी संभोग की तीव्र इच्छा नही हुई. मुझे बस तुम्हारे स्खलन की मात्रा मापनी है और कुछ नही. उसके लिए तुम्हें थोड़ा कम्प्रोमाइज ज़रूर करना पड़ रहा है , बस इतना ही.

“गुरुजी ‘थोड़ा’मत कहिए. मुझे इसके लिए बहुत ही बेशरम बनना पड़ रहा है.”

गुरुजी – हाँ , मैं समझ रहा हूँ रश्मि. लेकिन तुम्हारे उपचार के लिए मेरा ये जानना भी तो ज़रूरी है ना. स्खलन की मात्रा से तुम्हारे गर्भवती होने की संभावना के बारे में पता लगेगा.

गुरुजी कुछ पल चुप रहे.

गुरुजी – मैं चाहता हूँ की आज तुम शिवनारायण मंदिर में पूजा के लिए जाओ. विकास तुम्हें वहाँ ले जाएगा. शाम को आरती के लिए मुक्तेश्वरी मंदिर चली जाना.

“ ठीक है गुरुजी.”

गुरुजी – जय लिंगा महाराज.

“जय लिंगा महाराज.”

उसके बाद मैं कमरे से बाहर आ गयी. मुझे आज फिर से ऐसा महसूस हुआ की ज़मीन में बैठे हुए गुरुजी की नज़रें पीछे से मेरे लहराते हुए बड़े नितंबों पर हैं. मैंने आज पैंटी नही पहनी थी , शायद इसलिए थोड़ी सतर्क थी. 

फिर मैं अपने कमरे में आ गयी. आज पूजा के लिए जाना था इसलिए मैंने नाश्ता नही किया. कुछ देर बाद मैं कमरे से बाहर आ गयी और आश्रम में टहलने लगी. थोड़ी देर मंजू से गप मारी , फिर मंदिर जाने के लिए तैयार होने कमरे में आ गयी. 

मैंने बाहर जाने से पहले दवाई खा ली और पैंटी के अंदर नया पैड लगा लिया. 

तभी विकास आ गया.

विकास – मैडम , आप तैयार हो ?

“हाँ . मंदिर कितना दूर है ?

कल की घटना के बावज़ूद हम दोनों एक दूसरे के साथ नॉर्मली बिहेव करने की कोशिश कर रहे थे. आज विकास शेव करके आया था. हैंडसम लग रहा था. कल मैं काफ़ी देर तक उसके साथ थी. अब मुझे उसका साथ अच्छा लगने लगा था. आश्रम में एक वही था जिसके साथ मैं इतना घुल मिल गयी थी. 

विकास – ज़्यादा दूर नही है . हम बस से जाएँगे. 10 मिनट लगेंगे.

हम खेतों के बीच पैदल रास्ते से जाने लगे. आज विकास मेरे काफ़ी नज़दीक़ चल रहा था. कभी कभी जब मेरी चाल धीमी हो जाती थी तो मैं उसके साथ चलने के लिए उसका हाथ पकड़ ले रही थी. मुझे पता नही क्या हो रहा था लेकिन उसका साथ मुझे अच्छा लग रहा था. उसके साथ होने से मन में एक खुशी सी होती थी. 

फिर हम मेन रोड में पहुँच गये और वहाँ से हमें बस मिल गयी. बस में थोड़ी भीड़भाड़ थी. हम बस में चढ़ गये और विकास मेरे पीछे खड़ा हो गया. विकास आज सही मायनों में मुझे प्रोटेक्ट कर रहा था. और मैं भी ज़रूरत से ज़्यादा ही उसकी मदद ले रही थी. जैसे की जब हम भीड़ के बीच लोगों को हटाते हुए अपने लिए जगह बना रहे थे तो मैं उसका हाथ पकड़े हुए थी. मैंने सपोर्ट के लिए अपने सर के ऊपर रॉड को एक हाथ से पकड़ा हुआ था. विकास ने भी वहीं पर पकड़ा हुआ था उसका हाथ मेरे हाथ से बार बार छू जा रहा था. बस के झटकों से बचने के लिए मैंने उसके गठीले बदन का सहारा लिया हुआ था. मेरे बड़े नितंब उसके पैंट पर दब रहे थे. लेकिन आज विकास बहुत तमीज़ से पेश आ रहा था. शायद सफ़र छोटा होने की वजह से. क्यूंकी जल्दी ही मंदिर आ गया.

मंदिर में और भी लोग बस से उतरे. अब उतरते समय विकास मेरे आगे था मेरी बड़ी चूचियाँ उसकी पीठ से दब गयीं. मैंने भी कोई संकोच नही किया और उसकी पीठ से अपनी छाती चिपका दी. विकास थोड़ा पीछे को मुड़ा और मुझे देखकर मुस्कुराया. शायद वो समझ गया होगा मैं उसे अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए ऐसा कर रही हूँ. 

बस से उतरने के बाद मेरा मन विकास के साथ समय बिताने को हो रहा था , मंदिर जाने को मैं उत्सुक नही थी. लेकिन विकास सीधे मंदिर की तरफ बढ़ रहा था.

“विकास , मैं कुछ बोलूँ ?”

विकास – ज़रूर मैडम.

“मेरा मंदिर जाना ज़रूरी है क्या ? मेरा मतलब अगर ना जाऊँ तो ?”

विकास – हाँ मैडम. आपको मंदिर जाना होगा. ये गुरुजी का आदेश है. और उनके हर आदेश का कोई उद्देश्य और लक्ष्य होता है. ये बात तो अब आप भी जानती हो.

“हाँ मैं जानती हूँ. लेकिन मेरा मतलब…..अगर हम ….. मैं ये कहना चाह रही हूँ की …..”

विकास – मैडम , आपको कुछ कहने की ज़रूरत नही. आप मंदिर में जाओ और पूजा करके आओ.

“लेकिन विकास . मैं चाहती हूँ की…….मैं कैसे कहूँ ?”

विकास – मैडम, आपको कहने की ज़रूरत नही. मैं समझ रहा हूँ.

“तुम बिल्कुल बुद्धू हो. अगर तुम समझते तो अभी मुझे मंदिर जाने को नही कहते.”

विकास – मैडम, अभी आप पूजा करो. शाम को गुरुजी ने आपको मुक्तेश्वरी मंदिर ले जाने को कहा है, मैं आपको वहाँ नही ले जाऊँगा.

“पक्का ? वादा करो ?”

विकास – हाँ मैडम. वादा रहा.

अब मैं खुश थी की विकास मेरी मर्ज़ी के आगे कुछ तो झुका. आज मुझे गुरुजी के आदेशानुसार दो बार ओर्गास्म लाने थे और सच बताऊँ तो मैं चाहती थी की उनमें से एक तो विकास से आए. 

फिर हम मंदिर पहुँच गये.

“हे भगवान ! इतनी लंबी लाइन !”

विकास – हाँ मैडम. यहाँ लंबी लाइन लगी है. ‘गर्भ गृह’में देवता के दर्शन में काफ़ी समय लगेगा.

विकास और मैं लाइन में नही लगे. विकास मुझे मंदिर के पीछे ले गया. वहाँ एक आदमी हमारा इंतज़ार कर रहा था. विकास ने उससे कुछ बात की और फिर मेरा परिचय कराया.

विकास – ये पांडे जी हैं.

पांडे जी – मैडम आप लाइन की चिंता मत करो. असल में नियम ये है की एक बार में एक ही व्यक्ति गर्भ गृह के अंदर पूजा कर सकता है , इसलिए ज़्यादा समय लग जाता है.

“अच्छा.”

फिर विकास वहाँ से चला गया.

पांडे जी करीब 40 बरस का होगा. मजबूत बदन , बिना शेव किया हुआ चेहरा , हाथों में भी उसके बहुत बाल थे. मुझे लगा ज़रूर इसका बदन ज़्यादा बालों वाला होगा. साफ कहूं तो मुझे बालों वाले मर्द पसंद हैं. खुशकिस्मती से मेरे पति के भी ऐसी ही बाल हैं. 

पांडे जी सफेद धोती और सफेद कमीज़ पहने था. एक लड़का भी वहीं पर खड़े होकर हमारी बात सुन रहा था. 18 बरस का रहा होगा.

पांडे जी – छोटू , तू लाइन को सम्हालना और फिर जल्दी नहा भी लेना. मैडम , आप मेरे साथ आओ. धूप में लाइन में खड़े होने की ज़रूरत नही है. जब लाइन मंदिर के अंदर पहुँच जाएगी फिर लग जाना.

छोटू चला गया और मैं पांडे जी के पीछे चली गयी. वहाँ छोटी झोपड़ीनुमा ढाँचे मंदिर के पंडों के लिए बने हुए थे.

पांडे जी मुझे एक झोपड़ी के आँगन में ले गया. वहाँ एक पेड़ से दो गाय बँधी हुई थीं. धूप से आकर वहाँ छाया में मुझे राहत महसूस हुई. पांडे जी ने मुझसे वहाँ रखी खटिया में बैठने को कहा.
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01-17-2019, 01:47 PM,
#20
RE: Porn Story गुरुजी के आश्रम में रश्मि क...
पांडे जी मुझे एक झोपड़ी के आँगन में ले गया. वहाँ एक पेड़ से दो गाय बँधी हुई थीं. धूप से आकर वहाँ छाया में मुझे राहत महसूस हुई. पांडे जी ने मुझसे वहाँ रखी खटिया में बैठने को कहा. 

खटिया रस्सियों से बनी हुई थी. मैं खटिया में बैठ गयी. बैठने के कुछ ही देर में वो सख़्त रस्सियां मेरे मुलायम नितंबों में चुभने लगीं. मुझे अनकंफर्टेबल फील होने लगा और मैंने साड़ी के अंदर पैंटी को नितंबों पर फैलाने की कोशिश की पर उस बैठी पोज़िशन में पैंटी खिंच नही रही थी. थोड़ी राहत पाने के लिए मैं अपने वजन को कभी एक नितंब कभी दूसरे नितंब में डालने लगी. इससे एक नितंब दबता और दूसरे में आराम हो रहा था. खटिया की रस्सी इतनी सख़्त थी की मेरी साड़ी और पेटीकोट के बाहर से भी चुभ रही थी. मैं शरम की वजह से पांडेज़ी से भी कुछ नही कह पा रही थी.

पांडे जी – मैडम , खटिया में ठीक से नही बैठ पा रही हो क्या ?

मैंने बता दिया की रस्सी चुभ रही है. 

पांडे जी – मैडम , मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ. आपको खटिया में बैठने की आदत नही है ना इसलिए रस्सी आपके मुलायम बदन में चुभ रही है.

पांडेज़ी ने मेरे बदन के ऊपर कमेंट कर दिया , मैं चुप रही.

वो एक चादर ले आया. खटिया नीची थी और मेरे बैठने से रस्सियां और भी नीचे झूल गयी थीं. जब पांडेज़ी चादर ले आया तो मैं खटिया से उठने लगी. नीचे को धँसी रस्सियों से उठते समय मेरा पल्लू कंधे से गिर गया . मैंने जल्दी से अपनी छाती को पल्लू से ढक दिया फिर भी तब तक पांडेज़ी को मेरी बड़ी चूचियों के ऊपरी हिस्से और क्लीवेज का नज़ारा दिख गया. क्यूंकी वो ठीक मेरे सामने खड़ा था और मैं झुकी पोज़िशन से ऊपर को उठ रही थी तो उसे ऊपर से साफ दिख रहा होगा. पल्लू ब्लाउज के ऊपर करते समय मैंने देखा की मेरी बायीं चूची के ऊपर का ब्रा का स्ट्रैप दिख रहा है. मैंने ब्लाउज के अंदर अँगुलियाँ डालकर स्ट्रैप को ब्लाउज से ढक दिया . ये सब मुझे एक अंजाने मर्द के सामने करना पड़ा. और इस दौरान स्वाभाविक रूप से पांडेज़ी की निगाहें मेरी चूचियों पर ही थी.

जब पांडेज़ी खटिया में चादर बिछा रहा था , तब मैंने अपनी पैंटी को नितंबों पर खींच लिया. मेरे नितंब रस्सी चुभने से दर्द कर रहे थे, इसलिए दोनों हाथों से नितंबों को थोड़ा मला और दबा दिया , ताकि उनमें रक्त संचार ठीक से हो जाए. मैंने सोचा मुझे कोई नही देख रहा है क्यूंकी पांडेज़ी तो चादर बिछा रहा था पर मुझे पता नही चला की वो लड़का छोटू वापस आ गया है और ठीक मेरे पीछे खड़ा है. जब मेरी नज़र उस पर पड़ी तो मुझे बड़ी शरम महसूस हुई. मैं अपने नितंबों को दबा रही थी और इसने सब देख लिया वो भी ठीक मेरे पीछे खड़े होकर. मैंने देखा वो मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था और बार बार मेरे उभरे हुए नितंबों को ही देख रहा था. वैसे तो वो 18 बरस का छोटा लड़का था पर शरम से मैं उससे आँखें नही मिला पा रही थी.

अगर कोई मर्द ऐसे देख ले तो कोई भी औरत बहुत शर्मिंदगी महसूस करेगी. मेरे दिमाग़ में वो सीन दोहराने लगा की इस लड़के को क्या नज़ारा दिखा होगा. सबसे पहले मैंने नितंबों पर साड़ी फैलाई थी जो बैठने से दब गयी थी. फिर मैंने अपनी अंगुलियों से पैंटी के कोने ढूंढे जो नितंबों की दरार में सिकुड गये थे , और फिर पैंटी को नितंबों पर फैलाने की कोशिश की. ऐसा करने के लिए मैं थोड़ा आगे को झुक गयी थी और मेरे गोल नितंब पीछे को उभर गये थे, उसके बाद मैंने दोनों नितंबों को हाथों से थोड़ा मल दिया था. ये सब उस लड़के ने मेरे पीछे खड़े होकर देख लिया.

फिर मैं चादर बिछी खटिया में बैठ गयी. पांडेज़ी झोपड़ी के अंदर गया और कुछ देर बाद एक थाली लेकर आया जिसमें पूजा का समान था. 

पांडे जी – छोटू तू जल्दी से नहा ले , तब तक मैं मैडम की थाली के लिए दूध लेकर आता हूँ.

खटिया से कुछ ही फीट दूर एक नल लगा था , छोटू वहाँ नहाने की तैयारी करने लगा. पांडेज़ी भी पेड़ के पास गाय से दूध लाने चला गया , वो पेड़ खटिया से तकरीबन 10 – 12 फीट दूर होगा. छोटू एक शर्ट और निक्कर ( हाफ पैंट ) पहने था. उसने शर्ट उतार दी और कमर में एक तौलिया लपेट कर निक्कर उतार दिया. 

पांडे जी – छोटू तौलिया गीला मत कर.

छोटू – फिर नहाऊँ कैसे ?

पांडे जी –ऐसे ही नहा ले. मैडम से क्यूँ शरमा रहा है ?

छोटू चुप रहा.

पांडे जी – मैडम देखो छोटा ही तो है. आपके सामने नहाने में शरमा रहा है.

मैं धीरे से हँसी और कुछ कहने वाली थी तभी……

पांडे जी – अरे यार मैडम क्या छोटी लड़की है तेरी दोस्त रूपा की जैसी , जो तू शरमा रहा है ? मैडम ने तो तेरे जैसे कितने लड़के अपने सामने नहाते हुए देखे होंगे. है ना मैडम ?

मैंने उसकी बकवास को इग्नोर कर दिया और चुप रही. फिर पांडेज़ी एक बर्तन में गाय से दूध निकालने लगा.

“छोटू तुम नहा लो. मुझे कोई प्राब्लम नही है.”

मैंने छोटू से नहाने को कह दिया पर मैं छोटू और पांडेजी के बीच बातचीत को ठीक से समझी नही थी. ये तो मैं सपने में भी नही सोच सकती थी की पांडेज़ी छोटू से मेरे सामने नंगा नहाने को कह रहा है. मुझे क्या पता था की उसने निक्कर के अंदर अंडरवियर ही नही पहना है.

छोटू – ठीक है मैडम , आपको कोई दिक्कत नही तो मैं नहा लेता हूँ. पर रूपा आई तो मुझे बता देना.

“ये रूपा कौन है ?”

पांडे जी – रूपा पास वाले झोपडे में रहती है मैडम. इसकी दोस्त है.

पांडेज़ी और मैं हल्का सा हंस पड़े. 

अब छोटू ने बेधड़क अपना तौलिया उतार दिया. वो मुझसे कुछ ही फीट दूर था और शायद जानबूझकर अब उसने मेरी तरफ मुँह कर लिया था. उसको नंगा देखकर मैं हैरान रह गयी. उसका लंड तना हुआ था, शायद जब मेरे पीछे खड़ा होकर मेरे नितंबों को देख रहा होगा तभी से तन गया होगा. अब मेरा ध्यान बार बार उसके लंड पर ही जाए. इधर उधर देखूं तो भी नज़र फिर वही चली जा रही थी. वो अपने बदन में पानी डालने लगा. उसका लंड केले के जैसे हवा में खड़ा था. लंड के आस पास बहुत कम बाल थे.

उस लड़के को मेरे इतने नज़दीक़ नंगा नहाते देख , अब मेरी साँसें भारी हो गयी थीं और मेरे निप्पल तन गये थे. वो बेशरम मेरी तरफ मुँह करके अपने खड़े लंड को मल मल कर साबुन लगा रहा था. उसके ज़रा सा भी बदन हिलाने से उसका लंड हवा में नाच जैसा कर रहा था और ये देखकर मेरे दिल की धड़कनें बढ़ जा रही थी. स्वाभाविक कामोत्तेजना से मेरी टाँगें थोड़ी खुलने लगी और मुझे अपने ऊपर कंट्रोल करना पड़ा.

पांडे जी – ऐ छोटू , बदन में ठीक से साबुन लगा.

छोटू – अब इससे ठीक कैसे लगाऊँ ?

पांडे जी – रुक , मैं लगा देता हूँ.

पांडे जी ने दूध का बर्तन मेरे सामने लाकर रख दिया.

पांडे जी – मैडम ,मैं इसको ठीक से साबुन लगाता हूँ. आप अपने दूध पर नज़र रखना.

पांडेज़ी मुस्कुराते हुए बोला. मैं सोचने लगी, ‘अपने दूध’से इसका क्या मतलब है ?

फिर पांडे जी छोटू के पास गया और उसके बदन पर साबुन लगाने लगा. उसने छोटू के ऊपरी बदन पर बस थोड़ी ही देर मला और फिर उसके लंड पर आ गया. एक हाथ में उसने छोटू का लंड पकड़ा और दूसरे हाथ से उसकी गोलियों को सहलाने लगा. लंड पर साबुन क्या लगा रहा था एक तरह से मूठ मार रहा था. ये सीन देखकर मेरे हाथ अपनेआप ही मेरी चूचियों पर चले गये और मेरी जाँघें साड़ी के अंदर अलग अलग हो गयीं. मुझे लगा अगर थोड़ी देर और पांडेज़ी वैसा करता तो छोटू पक्का झड़ जाता. शुक्र है जल्दी ही ये खत्म हो गया और फिर छोटू ने तौलिया से अपना नंगा बदन पोंछ लिया. उसने एक दूसरी शर्ट और निक्कर पहन लिया. 

पांडेज़ी हाथ धोकर मेरे पास आया. उसने पूजा की थाली में रखे एक छोटे से कटोरे में दूध डाला.

पांडे जी – मैडम, देखो कितना गाढ़ा दूध है.

“हाँ, इसमें पानी नही मिला है ना, जैसे हमको शहर में मिलता है.”

पांडे जी – नही मैडम. ये बिल्कुल शुद्ध है , चूची के दूध जैसा शुद्ध .

मेरी तनी हुई चूचियों की तरफ देखते हुए उसने कहा.

मैं उसकी बात के जवाब में कुछ नही बोल पाई. कहाँ की तुलना कहाँ कर रहा था. 

छोटू अब तक तैयार हो गया था. अब हम मंदिर की तरफ चल पड़े. मेरे हाथ में पूजा की थाली थी.

“पांडे जी , लाइन में खड़ी सभी औरतों के माथे पर कुमकुम क्यूँ लगा है ?”

पांडे जी – मैडम , ये मंदिर का रिवाज़ है. आपको भी लगेगा. मैडम, अब इस लंबी लाइन में खड़े होने की तकलीफ़ झेलनी पड़ेगी. यहाँ सबको लाइन में खड़ा रहना पड़ता है, हमको भी. चल छोटू लाइन में लग जा.

लाइन अब मंदिर की छत के नीचे थी. हम उस लंबी लाइन में लग गये. यहाँ पर जगह कम थी. एक पतले गलियारे में औरत और आदमी एक ही लंबी लाइन में खड़े थे. वो लोग बहुत देर से लाइन में खड़े थे इसलिए थके हुए , उनींदे से लग रहे थे. मेरे आगे छोटू लगा हुआ था और पांडेज़ी पीछे खड़ा था. उस छोटी जगह में भीड़भाड़ की वजह से दोनों से मेरा बदन छू जा रहा था.
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