seema.singh2003
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अध्याय 1 नया शहर, नई शुरुआत
खण्ड 1
पल्लवी एक बाईस साल की शादीशुदा लड़की थी। उसकी शादी को महज़ चार महीने ही हुए थे। वह और उसका पति एक ही शहर में रहते थे और उनकी शादी अरेंज मैरिज थी। दोनों बहुत छोटे शहर से थे, जहाँ ज़िंदगी धीमी और परिचित थी।
पहले उसके पति दिल्ली में सॉफ्टवेयर कंपनी में फील्ड वर्क किया करते थे। लेकिन कंपनी ने उसके पति राहुल को बेंगलुरु में ट्रांसफर कर दिया था। साथ में रहने के लिए एक 2BHK का फ्लैट भी दे दिया था। सैलरी अच्छी होने के कारण राहुल ने इससे इनकार नहीं किया और अपनी पत्नी को लेकर बेंगलुरु आ गया।
राहुल दिखने में काफ़ी हैंडसम था। और पल्लवी दिखने में किसी अप्सरा से कम नहीं थी। उसके काले लंबे बाल थे जो उसके नितंबों तक आते थे। उसकी आँखें काफ़ी काली थीं, और वही उसका चेहरा गोल था, और रंग तो दूध के अंडे जैसा सफ़ेद था। लेकिन सबसे ज़्यादा आकर्षक चीज़ थी उसका फिगर। पल्लवी का फिगर बेहद कमाल का था। उसके बूब्स 32 साइज़ के थे, उसकी कमर 28 की थी, और उसके चूतड़ 34 साइज़ के थे।
पल्लवी बेंगलुरु पहुँची, तो कंपनी की तरफ़ से उन्हें जो फ्लैट मिला था, वह दसवीं फ्लोर पर फ्लैट था। पहले दिन पल्लवी और राहुल को पूरा घर सजाने में पूरा दिन लग गया। अगले दिन से उनका जीवन चालू हो गया।
राहुल सुबह ही ऑफ़िस के लिए निकल गया, और पल्लवी घर पर अकेली टीवी देख रही थी। पल्लवी और राहुल अपनी ससुराल से कुछ बुनियादी चीज़ें अपने साथ ले आए थे जिससे उन्हें यहाँ रहने में कोई तकलीफ़ न आए।
रात में खाना खाते समय पल्लवी ने राहुल से पूछा। उसने चम्मच को धीरे से प्लेट पर रखा, थोड़ा आगे झुककर और आँखें ऊपर उठाकर राहुल के चेहरे की ओर देखा।
“राहुल… कैसा रहा तुम्हारा आज का ऑफ़िस का दिन?”
राहुल ने मुँह में भरा कौर चबाते-चबाते सिर हिलाया। उसने गिलास उठाकर एक घूँट पानी लिया, फिर पल्लवी की तरफ़ मुस्कुराते हुए कहा,
“आज का मेरा दिन, फील्ड वर्क से तो बेहतर ही है यह नौकरी। मुझे ऑफ़िस में रहकर ही पूरा काम करना है, कहीं बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है।”
वह थोड़ा और सीधा होकर बैठा, कंधे पीछे किए और गर्व से बोला,
“मैं तो यहाँ और भी बेहतर तरीके से काम कर सकता हूँ।”
पल्लवी ने भौंहें थोड़ी सिकोड़ लीं। उसने अपनी प्लेट को हल्के हाथों से घुमाया और धीरे से पूछा,
“क्या मतलब है आपका? ज़रा खुलकर बताइए।”
राहुल ने चम्मच नीचे रखा, दोनों हाथ टेबल पर रखकर थोड़ा आगे झुका। उसकी आवाज़ में उत्साह साफ़ था,
“कंपनी में तीन शिफ्ट में काम किया जाता है। मेरा जिस तरह का काम है, मैं हफ़्ते में करीब दो शिफ्ट एक्स्ट्रा लगा सकता हूँ।”
पल्लवी का चेहरा थोड़ा बदल गया। उसने होंठ भींच लिए, आँखें नीची करके प्लेट की तरफ़ देखा, फिर हल्का-सा गुस्सा करते हुए सिर उठाया। उसकी आवाज़ में नाराज़गी और चिन्ता दोनों थीं,
“यदि तुम इतने समय तक ऑफ़िस में रहोगे तो मैं यहाँ घर में बोर होती हूँ। प्लीज़ ऐसा मत करो यार…”
उसने एक हाथ से अपने लंबे बालों को कान के पीछे सरकाया, जैसे अपनी बेचैनी छुपाने की कोशिश कर रही हो।
राहुल ने हल्की मुस्कान के साथ टेबल के आर-पार हाथ बढ़ाया और पल्लवी की उँगलियों को धीरे से छू लिया। उसकी आवाज़ नरम और समझाने वाली थी,
“अरे मेरी जान, बेंगलुरु बहुत बड़ी सिटी है। यहाँ बहुत कुछ है घूमने के लिए। तुम मूवी देखने जा सकती हो, पार्कों में घूम सकती हो, मॉल घूमने जा सकती हो। अगर तुम प्रतिदिन भी यहाँ घूमोगी फिर भी कभी बोर नहीं होगी।”
पल्लवी ने उँगलियाँ धीरे से खींच लीं। उसने सिर थोड़ा झुकाया, बाल उसके गाल पर गिर पड़े। उसकी आवाज़ में शिकायत और थोड़ी-सी बेबसी थी,
“पर यार… मुझे तो यहाँ की भाषा आती ही नहीं है।”
राहुल ने सिर हिलाया, जैसे वह पहले से ही जानता हो। उसने कुर्सी पर थोड़ा पीछे हटकर और नरम स्वर में समझाया,
“मैं जानता हूँ कि यहाँ हिंदी बहुत ही कम लोगों को आती है, ना के बराबर। परंतु तुम्हें ठीक-ठाक इंग्लिश आती है। तुम सब कुछ हैंडल कर लोगी।”
पल्लवी चुपचाप बैठी रही। उसने प्लेट में बचे चावल को चम्मच से धीरे-धीरे घुमाया, फिर बिना आँख मिलाए बोली,
“पर यार… मैं रोज़-रोज़ आए दिन ऐसे घूमूँगी और फिर ख़र्चा भी करूँगी तो तुम पर कुछ ज़्यादा लोड नहीं पड़ जाएगा?”
राहुल ने हँसकर सिर हिलाया। उसने पल्लवी के चेहरे की तरफ़ देखा, आँखों में स्नेह लिए और धीरे से कहा,
“अरे मेरी जान, तुम खुश रहो। मैं इसी बात पर खुश रहता हूँ।”
खाना ख़त्म करने के बाद राहुल बेडरूम में चला गया। उसने कुर्सी धकेली, खड़े होते समय कमर सीधी की और बिना कुछ बोले कमरे की तरफ़ चला गया।
पल्लवी खाने की टेबल से सारे बर्तन उठाकर किचन में ले गई। उसने बर्तनों को साफ़ किया, नल का पानी चलाते हुए हर प्लेट और गिलास को ध्यान से धोया। फिर उसने टेबल को भी साफ़ किया, गीले कपड़े से बार-बार पोंछते हुए जैसे कोई अधूरा काम न छोड़ना चाहती हो।
जब उसका बाहर का पूरा काम हो चुका था तो उसने घड़ी में देखा कि अभी साढ़े दस बज रहे थे। किचन की लाइट बंद करके वह मुख्य दरवाज़े पर गई। वहाँ उसने देखा कि दरवाज़ा सही से लॉक है। हॉल की लाइट भी बंद कर दी और अपने कमरे की तरफ़ चल दी। उसके लंबे बाल पीठ पर लहरों की तरह हिल रहे थे, और घर की ख़ामोशी में उसके हल्के क़दमों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।
खण्ड 1
पल्लवी एक बाईस साल की शादीशुदा लड़की थी। उसकी शादी को महज़ चार महीने ही हुए थे। वह और उसका पति एक ही शहर में रहते थे और उनकी शादी अरेंज मैरिज थी। दोनों बहुत छोटे शहर से थे, जहाँ ज़िंदगी धीमी और परिचित थी।
पहले उसके पति दिल्ली में सॉफ्टवेयर कंपनी में फील्ड वर्क किया करते थे। लेकिन कंपनी ने उसके पति राहुल को बेंगलुरु में ट्रांसफर कर दिया था। साथ में रहने के लिए एक 2BHK का फ्लैट भी दे दिया था। सैलरी अच्छी होने के कारण राहुल ने इससे इनकार नहीं किया और अपनी पत्नी को लेकर बेंगलुरु आ गया।
राहुल दिखने में काफ़ी हैंडसम था। और पल्लवी दिखने में किसी अप्सरा से कम नहीं थी। उसके काले लंबे बाल थे जो उसके नितंबों तक आते थे। उसकी आँखें काफ़ी काली थीं, और वही उसका चेहरा गोल था, और रंग तो दूध के अंडे जैसा सफ़ेद था। लेकिन सबसे ज़्यादा आकर्षक चीज़ थी उसका फिगर। पल्लवी का फिगर बेहद कमाल का था। उसके बूब्स 32 साइज़ के थे, उसकी कमर 28 की थी, और उसके चूतड़ 34 साइज़ के थे।
पल्लवी बेंगलुरु पहुँची, तो कंपनी की तरफ़ से उन्हें जो फ्लैट मिला था, वह दसवीं फ्लोर पर फ्लैट था। पहले दिन पल्लवी और राहुल को पूरा घर सजाने में पूरा दिन लग गया। अगले दिन से उनका जीवन चालू हो गया।
राहुल सुबह ही ऑफ़िस के लिए निकल गया, और पल्लवी घर पर अकेली टीवी देख रही थी। पल्लवी और राहुल अपनी ससुराल से कुछ बुनियादी चीज़ें अपने साथ ले आए थे जिससे उन्हें यहाँ रहने में कोई तकलीफ़ न आए।
रात में खाना खाते समय पल्लवी ने राहुल से पूछा। उसने चम्मच को धीरे से प्लेट पर रखा, थोड़ा आगे झुककर और आँखें ऊपर उठाकर राहुल के चेहरे की ओर देखा।
“राहुल… कैसा रहा तुम्हारा आज का ऑफ़िस का दिन?”
राहुल ने मुँह में भरा कौर चबाते-चबाते सिर हिलाया। उसने गिलास उठाकर एक घूँट पानी लिया, फिर पल्लवी की तरफ़ मुस्कुराते हुए कहा,
“आज का मेरा दिन, फील्ड वर्क से तो बेहतर ही है यह नौकरी। मुझे ऑफ़िस में रहकर ही पूरा काम करना है, कहीं बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है।”
वह थोड़ा और सीधा होकर बैठा, कंधे पीछे किए और गर्व से बोला,
“मैं तो यहाँ और भी बेहतर तरीके से काम कर सकता हूँ।”
पल्लवी ने भौंहें थोड़ी सिकोड़ लीं। उसने अपनी प्लेट को हल्के हाथों से घुमाया और धीरे से पूछा,
“क्या मतलब है आपका? ज़रा खुलकर बताइए।”
राहुल ने चम्मच नीचे रखा, दोनों हाथ टेबल पर रखकर थोड़ा आगे झुका। उसकी आवाज़ में उत्साह साफ़ था,
“कंपनी में तीन शिफ्ट में काम किया जाता है। मेरा जिस तरह का काम है, मैं हफ़्ते में करीब दो शिफ्ट एक्स्ट्रा लगा सकता हूँ।”
पल्लवी का चेहरा थोड़ा बदल गया। उसने होंठ भींच लिए, आँखें नीची करके प्लेट की तरफ़ देखा, फिर हल्का-सा गुस्सा करते हुए सिर उठाया। उसकी आवाज़ में नाराज़गी और चिन्ता दोनों थीं,
“यदि तुम इतने समय तक ऑफ़िस में रहोगे तो मैं यहाँ घर में बोर होती हूँ। प्लीज़ ऐसा मत करो यार…”
उसने एक हाथ से अपने लंबे बालों को कान के पीछे सरकाया, जैसे अपनी बेचैनी छुपाने की कोशिश कर रही हो।
राहुल ने हल्की मुस्कान के साथ टेबल के आर-पार हाथ बढ़ाया और पल्लवी की उँगलियों को धीरे से छू लिया। उसकी आवाज़ नरम और समझाने वाली थी,
“अरे मेरी जान, बेंगलुरु बहुत बड़ी सिटी है। यहाँ बहुत कुछ है घूमने के लिए। तुम मूवी देखने जा सकती हो, पार्कों में घूम सकती हो, मॉल घूमने जा सकती हो। अगर तुम प्रतिदिन भी यहाँ घूमोगी फिर भी कभी बोर नहीं होगी।”
पल्लवी ने उँगलियाँ धीरे से खींच लीं। उसने सिर थोड़ा झुकाया, बाल उसके गाल पर गिर पड़े। उसकी आवाज़ में शिकायत और थोड़ी-सी बेबसी थी,
“पर यार… मुझे तो यहाँ की भाषा आती ही नहीं है।”
राहुल ने सिर हिलाया, जैसे वह पहले से ही जानता हो। उसने कुर्सी पर थोड़ा पीछे हटकर और नरम स्वर में समझाया,
“मैं जानता हूँ कि यहाँ हिंदी बहुत ही कम लोगों को आती है, ना के बराबर। परंतु तुम्हें ठीक-ठाक इंग्लिश आती है। तुम सब कुछ हैंडल कर लोगी।”
पल्लवी चुपचाप बैठी रही। उसने प्लेट में बचे चावल को चम्मच से धीरे-धीरे घुमाया, फिर बिना आँख मिलाए बोली,
“पर यार… मैं रोज़-रोज़ आए दिन ऐसे घूमूँगी और फिर ख़र्चा भी करूँगी तो तुम पर कुछ ज़्यादा लोड नहीं पड़ जाएगा?”
राहुल ने हँसकर सिर हिलाया। उसने पल्लवी के चेहरे की तरफ़ देखा, आँखों में स्नेह लिए और धीरे से कहा,
“अरे मेरी जान, तुम खुश रहो। मैं इसी बात पर खुश रहता हूँ।”
खाना ख़त्म करने के बाद राहुल बेडरूम में चला गया। उसने कुर्सी धकेली, खड़े होते समय कमर सीधी की और बिना कुछ बोले कमरे की तरफ़ चला गया।
पल्लवी खाने की टेबल से सारे बर्तन उठाकर किचन में ले गई। उसने बर्तनों को साफ़ किया, नल का पानी चलाते हुए हर प्लेट और गिलास को ध्यान से धोया। फिर उसने टेबल को भी साफ़ किया, गीले कपड़े से बार-बार पोंछते हुए जैसे कोई अधूरा काम न छोड़ना चाहती हो।
जब उसका बाहर का पूरा काम हो चुका था तो उसने घड़ी में देखा कि अभी साढ़े दस बज रहे थे। किचन की लाइट बंद करके वह मुख्य दरवाज़े पर गई। वहाँ उसने देखा कि दरवाज़ा सही से लॉक है। हॉल की लाइट भी बंद कर दी और अपने कमरे की तरफ़ चल दी। उसके लंबे बाल पीठ पर लहरों की तरह हिल रहे थे, और घर की ख़ामोशी में उसके हल्के क़दमों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।