Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 14 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

आत्मनिर्भर





पर मेरी हालत कम खराब थी, पिछवाड़े तो आज खूब मजा आया, पहले नन्दोई जी ने हचक के मारी, और फिर उस नन्दोई के साले ने,...

लेकिन मेरी रामपियारी अभी भी आठ आठ आंसू रो रही थी, आज किसी ने उसे हाथ भी नहीं लगाया था, और तो उसे बस वो मोटा मूसल चाहिए था, ...





इसलिए मैंने सोचा बहुत हो गया चोर सिपाही का खेल , और मैं सीधे उनके ऊपर चढ़ गयी,...

वो कहते हैं न आज कल आत्मनिर्भर,... तो बस वही,... लेकिन इस लड़के को तड़पाने का मजा अलग है, थोड़ी देर तक तो मेरी गुलाबो उसके तड़पते बौराए पगलाए मोटे सुपाडे पर रगड़ती रही,... फिर जैसे कोई दया कर के जरा सा दरवाजा खोल दे दोनों फांके खुलीं , थोड़ा सा सुपाड़ा घुसा और दरवाजा फिर बंद,...

बरसो बाद मिले पाहुन से जैसे कोई बस गलबहियां भर भर मिले, बात करने का होश ही न रहे, वही हालत मेरी रामपियारी की हो रही थी, जोर से से वो अपने को सिकोड़ रही थीं , निचोड़ रही थीं,





बेचारे ये इन्होने नीचे से धक्का मारने की कोशिश की पर मैंने जोर से आँख तरेर कर बरज दिया,... आज मेरी बारी थी,... हाँ इतना जरूर किया , फांको को थोड़ा सा ढीला किया , हलका सा धक्का दिया और वो भूखा, नदीदा सुपाड़ा गप्प,

जैसे सुहागरात के दिन उन्होंने मेरी कलाई पकड़ के जोर जोर से धक्के मारे थे , मेरी कुंवारेपन की झिल्ली टूटी थी, वो तो ठीक, मेरी माँ ने भेजा ही इसलिए था, लेकिन मेरी मनपसंद लाल हरी दो दर्जन चूड़ियां , वो भी चुरूरमुरुर कर आधे से ज्यादा टूट गयीं,...

बस एकदम उसी तरह मैंने उनकी दोनों कलाइयां पकड़ रखी थी पर धक्के उनकी तरह तूफानी नहीं मार रही थी , बस हलके हलके सावन के झूले की तरह , खूब स्वाद ले ले के,





मेरी सहेली का मनपंसद भोजन इनका मोटा तगड़ा लंड,... अब पूरी तरह अंदर था, और मैं रुक गयी थी,

झुक के बस हलके हलके अपने दोनों जोबन उनकी छाती पर रगड़ रही थी, आँखों से उन्हें चिढ़ा रही थी, ...

मेरा साजन मैं चाहे जो करूँ, उनके साथ भी उनकी माँ बहन के साथ भी,...

कुछ देर में मैं मेले में जैसे नटिनी की लड़की बांस पर चढ़ जाती है न, बस उसी तरह इनके बांस पर मैं चढ़ी, इतरा रही थी, फिर धीरे धीरे अपनी छप्पन कला दिखाते, कभी ऊपर कभी नीचे, कभी हलके से अपनी योनि को दबा के उसे निचोड़ देती तो कभी ढीला कर के आजाद कर देती,... लेकिन वो रहता मेरे ही अंदर, कुछ देर ऊपर नीचे ऊपर नीचे करने के बाद, बस मैं रुक गयी, पूरा उसे अपने अंदर लेकर, झुक के मैंने उन्हें चूम लिया, ...

और

फिर जैसे कोई रॉकिंग चेयर पर बैठ के आगे पीछे , आगे पीछे करे,...





बेचारे, उनको तो आदत तूफानी चुदाई की थी , पर मैं क्या करूँ मेरी रामपियारी इत्ती देर से अपने पिया का इन्तजार कर रही थी, लेकिन पिया का मन पियारी नहीं समझेगी तो कौन समझेगा,

तो बस वो तूफानी धक्के पर धक्के वाली भी मैंने शुरू कर दी , पर मैंने उन्हें समझा दिया था , वो आज चुपचाप आराम करें, मेरी बहिनिया के पिछवाड़े बहुत ताकत खर्च की थी उन्होंने इत्ती कसी गांड मार मार् के चौड़ी कर दी थी उन्होंने,...

कोई जरूरी नहीं की मरद को ही सचित्र कोकशास्त्र बड़ी साइज के सारे आसन मालूम हों, कुंवारेपन में ही माँ की अलमारी से निकाल के छुप छुप के कोर्स की किताबों से ज्यादा बार मैंने उसका परायण किया था, और सहेलियों के साथ भी,...





तो वीमेन ऑन टॉप वाली पोजीशन में भी , और अभी दो रात पहले ही तो इनकी सास ने इनके ऊपर चढ़ कर न सिर्फ इनके कील पुर्जे ढीले किये थे बल्कि एक खूंख्वार दरोगा की तरह इनके सब राज, इनकी माँ, बुआ , बहन , सब के साथ कैसे कबड्डी खेली इन्होने वो सब भी,...

हाँ अब वो भी साथ दे रहे थे कभी नीचे से कस कस के धक्के मारते तो कभी, मेरी कमर पकड़ के ऊपर नीचे उछालते और जब मैं नीचे होती तो उनकी मनपसन्द दोनों गेंदे , कभी हाथ से खेलते तो कभी मुंह उठा के उन लड्डुओं का स्वाद भी ले लेते,...





दस बारह मिनट तो हो ही गया होगा , पर ऐसे समय, समय कौन देखता है.

हम दोनों एक दूसरे में मगन,... पर तभी दरवाजा खुला,... और उनकी छोटी साली, ...





मेरी छुटकी बहिनिया, ... पर स्साली छिनार, उसकी चूत में अपनी ससुराल के सारे मर्दों का लंड घुसवाऊँ,... चूतमरानो,...

मेरी ओर देखा भी नहीं, सीधे अपने जीजा की ओर,... और खाली उसे क्यों गरियॉंउ, मेरी छिनार माँ, बहन, सब की सब असली रंडी की जनी, मेरी शादी के बाद एकदम मुझे भूल गयीं, माँ को सिर्फ दामाद नजर आता है और बहनों को जीजू, जैसे बेटी बहन थी ही नहीं कभी,...
 
मेरी छुटकी बहिनिया, ...





हम दोनों एक दूसरे में मगन,... पर तभी दरवाजा खुला,... और उनकी छोटी साली, ...

मेरी छुटकी बहिनिया, ... पर स्साली छिनार, उसकी चूत में अपनी ससुराल के सारे मर्दों का लंड घुसवाऊँ,... चूतमरानो,... मेरी ओर देखा भी नहीं, सीधे अपने जीजा की ओर,... और खाली उसे क्यों गरियॉंउ, मेरी छिनार माँ, बहन, सब की सब असली रंडी की जनी, मेरी शादी के बाद एकदम मुझे भूल गयीं, माँ को सिर्फ दामाद नजर आता है और बहनों को जीजू, जैसे बेटी बहन थी ही नहीं कभी,...

और मैं कुछ बोलती तो उलटे हंस के मुझसे कहते अरे मैं बेटी और माँ, बहन -बहन के बीच में कैसे फर्क करूँ,... और उस हंसी पर तो मेरी जान न्यौछावर थी।

और वो भी कस के उसे अपनी बाहों में बाँध के,

लेकिन ऐसी खटमिठ्वा कच्ची अमिया हो और कुतरी न जाए, ... तो बस उनके होंठ मेरी छुटकी के बस मटर के जो कच्चे दाने होते हैं, बस अभी आना शुरू किये हों, ऐसे निप्स को लेकर चुसूर चुसूर,...





मैं इनकी चुदाई रोक के, कुछ देर तक मस्ती में जीजा साली की मस्ती देखती रही, फिर मैंने भी सोचा, चल यार, आज इन्हे भी,... हम दोनों बहने मिल कर इनकी ऐसी की तैसी करते हैं, और किस मरद की फैंटेसी नहीं होगी,... एक साथ दो दो ,

एक कच्ची कली बस अभी खिलती हुयी, किशोरी , और दूसरी तरुणी एक छोटी साली और दूसरी उसकी बहन, पत्नी , एक दूसरे से चोरी छुपे नहीं बल्कि साथ साथ,...

और मैं माँ से कह के, छुटकी को साथ लायी भी इसलिए थी,.. इनके लिए अपने मस्त नन्दोई के लिए और गाँव के सारे देवरों, नन्दोईयों के लिये।

तो बस,... मैं उस मीनार से उतर गयी और अपनी छुटकी बहिनिया को मीठी शूली पे चढाने के लिए,... वो टुकुर टुकुर देख रही थी की कैसे मैं कुतबमीनार पर चढ़ी मजे ले रही थी, ऊपर नीचे ऊपर नीचे हो के.... मैं समझ गयी उसका मन ललचा रहा था, बस अपने साजन के मीनार से उतर कर उनकी गोद में दुबकी उनकी साली को पकड़ के खींच लिया ,

वो लगी लाख बहाने बनाने, लेकिन मैं उसकी बड़ी बहिन थी, मैंने हड़काया, लगाउंगी दस हाथ कस कस के गिनूँगी एक, पिछवाड़े मान सकती हूँ मैं, लेकिन आगे क्या हुआ है, ... चल चढ़ जा,...

बड़ी मुश्किल से वो चढ़ी, लेकिन दो दिन भी नहीं हुए थे उसकी सील टूटे, वैसे भी एकदम कच्ची कली,... लेकिन लग रही थी मस्त,... उसके छोटे छोटे लौंडा छाप चूतड़ों को मैंने फैलाया, इनकी गाढ़ी मलाई अभी भी बजबजा रही थी उसके पिछवाड़े, बस थोड़ी सी उसके आगे लगा के पूरी ताकत से चूत की दोनों फांको को मैंने फैलाया, और इनका सुपाड़ा सटाया, बस थोड़ा सा फंसा था।





" हे पुश कर पूरी ताकत लगा के , छिनरपन मत देखा, लगाउंगी एक हाथ, अपने जीजू की कमर पकड़ के पुश कर,... "





मैंने जोर से हड़काया, और वो समझ रही थी की मैं सच के दो चार चांटे लगा दूंगी, ...

कुछ उसने पुश किया , कुछ मैंने उसके कंधे पर पूरी ताकत से जोर लगाया,... मुझे मम्मी की बात याद आ रही थी की जो लड़की लंड घोंटने में नखड़ा करे न, अरे लंड कितना भी मोटा हो, कितना भी लम्बा हो, आखिर उसी चूत से बियाह के नौ महीने बाद इत्ते लम्बे मोटे बच्चे निकलते हैं,...

बस मैंने पूरी ताकत से दोनों हाथ से उसके कंधे पर रख के जोर लगाया सुपाड़ा अच्छी तरह से फंसा था,... बस चीरते फाड़ते, उसकी कसी कच्ची चूत में उनका पहाड़ी आलू ऐसा मोटा सुपाड़ा धंस गया, ...





वो चीखती बिसूरती रही,... पर मान गयी मैं अपनी छुटकी बहिनिया को इत्ते दर्द के बावजूद के वो अपनी ओर से भी घोंटने के लिए पुश कर रही थी,

उन्होंने भी उसे पकड़ने के लिए इशारा किया पर मैंने सख्ती से बरज दिया ,

अरे अगर स्साली उनकी साली चुदवासी है तो लंड पर चढ़ के चोदने का भी दम होना चाहिए,

रोते चीखते भी पूरी ताकत से उसने धकेलते हुए आधा बांस तो घोंट ही लिया पर अब उसके जीजू से नहीं रहा गया, ... वो उसकी कच्ची अमिया देख के ललचा रहे थे, बस ज़रा सा अपनी ओर खींच के, उसकी ललछौंहा बस आ रहे जस्ट छोटे छोटे निपल मुंह में भर लिए और लगे चुभलाने,
 
एक से भले दो





अरे अगर स्साली उनकी साली चुदवासी है तो लंड पर चढ़ के चोदने का भी दम होना चाहिए,

रोते चीखते भी पूरी ताकत से उसने धकेलते हुए आधा बांस तो घोंट ही लिया पर अब उसके जीजू से नहीं रहा गया, ... वो उसकी कच्ची अमिया देख के ललचा रहे थे, बस ज़रा सा अपनी ओर खींच के, उसकी ललछौंहा बस आ रहे जस्ट छोटे छोटे निपल मुंह में भर लिए और लगे चुभलाने,

थोड़ी देर में जीजू साली मिल के, वो अपनी साली की पतली कमर पकड़ के खींच रहे थे और वो भी अपने जीजू का साथ दे रही थी, पुश कर रही थी मैं बगल में बैठी जीजा साली के खेल तमाशे का मजा ले रही थी।





"अगर तू असली स्साली है न अपने जीजू की, तो पूरी ताकत से १०० धक्के मार, "मैंने उसे उकसाया।

सौ तो नहीं लेकिन ६०-७० धक्के तो उसने मारे ही और दो तिहाई से ज्यादा सात साढ़े सात इंच लंड तो अपने जीजा का ऊपर चढ़ के घोंट ही लिया , ... लेकिन अब एकदम वो थक गयी तो मैंने उसे मीठी शूली के ऊपर से उतार लिया ,...

और गोद में लेकर मीठी मीठी चुम्मी उसके गालों पर, होंठों पर लेने लगी.

खूंटा उनका भी वैसे तना, कड़ा खड़ा था, और कौन लड़की होगी जो इत्ता मस्त मलखम्भ देख के न ललचाये, तो मुंह में पानी तो मेरे भी आ रहा था और इनकी साली के भी,तो बस पहल मैंने ही की,

इनका खुला सुपाड़ा, लीची की तरह रसीला, टमाटर की तरह मोटा,... नहीं मुँह में गप्प नहीं किया मैंने,... बस जीभ से चाटती रही थोड़ी देर तक,





फिर छुटकी का मुंह मैंने लगा दिया, ... अब हम दोनों बहने बारी बारी से उस खुले सुपाड़े को कभी साथ साथ कभी बारी बारी से चाट रही थीं ,





फिर सुपाड़ा उसके हिस्से में, और बाकी का लंड,... मेरे हिस्से में , वो सुपाड़ा चूस रही थी मुंह में ले कर कस कस के और मैं बाकी लंड का खम्भा चाट रही थी जीभ निकाल के,

सोचिये, अगर एक जस्ट जवान हो रही किशोरी साली और एक युवती साथ साथ किसी के चर्म दंड को चूसें चाटें, तो कैसा लगेगा, बस वही हालत इनकी हो रही थी,





लेकिन हम दोनों बहनें मिल के इनकी हालत और खराब करने वाली थीं, गन्ना मैंने पूरा का पूरा छुटकी के हवाले किया और मैं नीचे वाले दोनों रसगुल्लों को चूसने में लग गयी,... खूब मस्त , आखिर हम सब को गाभिन करने वाली मलाई तो उसी में से निकलती है,... थोड़ी देर बाद काम बदल गया, रसगुल्ले उनकी साली के हिस्से में और लंड मेरे हिस्से में,





असल में होली के पहले वाली रात यही किया था इन्होने मेरे साथ सारी रात चोदा,खूब हचक हचक के चोदा लेकिन मुझे झड़ने नहीं दिया, खुद भी सिर्फ दो बार झड़े, एक बारे आगे और दूसरी बार एकदम सुबह, पूरी ताकत से ये मेरी गाँड़ मार रहे थे, और उधर ननद खट खट कर रही थीं, दरवाजा खुलवाने के लिए होली खेलने के लिए, और जैसे ही उन्होंने कटोरी भर मलाई मेरी गाँड़ में छोड़ी,... मैंने किसी तरह बस साड़ी लपेट कर दरवाजा खोला, होली की सुबह थी। लेकिन असर मुझे बाद में पता चला, जो उन्होंने मुझे गरमा के, लेकिन बिना झड़े छोड़ दिया,

असर ये हुआ की दिन भर बस ये लगे की कोई चोद दे, कोई झाड़ दे , और मैं इतना गरमा गयी थी की रंग से पुते अपने ममेरे भाई को ही चढ़ के चोद दिया, वो बेचारा चिल्लाता रहा , लेकिन गरमाई औरत को तो सिर्फ लंड दिखता हैतो बस यही आज मैं इनके साथ करना चाहती थी, खूब गरमाऊँगी , झड़ने नहीं दूंगी, वैसे भी एक बारे मेरे और दूसरी बार मेरी छुटकी बहिनिया के पिछवाड़े तो ये झड़ ही चुके थे.

और मैं और छुटकी मिल के इन्हे तंग कर रहे थे।

जैसे कोई शेरनी अपनी शाविका को शिकार सिखाती है बस उसी तरह मैं भी छुटकी को सिखा रही थी, और बहुत ही नेचुरल थी,... बहुत जल्द मेरा कान काटने वाली थी,... एक बार वो फिर साइड में बैठ के अपने जीजू का लंड आधे से ज्यादा मुंह में लेकर सड़प सड़प चूस रही थी और मैं इनकी एक बॉल्स मुंह में लेकर , तभी मुझे एक बदमाशी सूझी,...

बस मैंने जितनी भी तकिया थी बिस्तर पे , सब इनके चूतड़ों के नीचे लगा दी, इनके नितम्बो को सहलाने लगी , और बॉल्स चूसते चूसते, मेरी जीभ नीचे उतरी, ... और फिर इनके गोलकुंडा के किले का गोल गोल चक्कर काटने लगी, कभी कभी गोल दरवाजे की सांकल भी अपनी जीभ की टिप से खटखटा देती,...





ये बेचारे कसमसा रहे थे, मस्ती से पागल हो रहे थे, ...

फिर दोनों हाथों से मैंने इनके नितम्बों को पूरी ताकत से फैलाया, उस गोल छेद पर अपने होंठों को लगाया और लगी कस कस के चूसने, कभी जीभ अंदर भी पेल देती,... धीरे धीरे छेद पिछवाड़े का थोड़ा थोड़ा इनका खुलने लग गया था, ...

छुटकी चूस तो इनका लंड रही थी , साथ साथ हलके हलके अपने टीनेज हाथों से मुठिया भी रही थी,... पर निगाहें उसकी मेरी हरकतों पर टिकी,... मैंने इशारे से उसे बुला लिया, फिर उससे मैं जोर से हड़का के बोली,

"अपनी आँखे बंद कर,... और जीभ निकाल पूरी लम्बी "





उसने जोर से आँखे बंद कर ली, बस मैंने एक बार फिर एक हाथ से उनके नितम्बो को फैला के, उनके गुदा छिद्र पे अपनी छुटकी बहिनिया का मुंह सटा दिया , उसकी किशोर जीभ इनके पिछवाड़े,,

" हे पेल दे जीभ पूरी अंदर, अरे जीजू ने तेरी गाँड़ मारी थी न कस कस के , बस बदला ले ले कस के , मार ले गाँड़ पाने जिज्जा की जीभ से "

और दोनों हाथों से उसका सर मैंने कस के पकड़ रखा था, हड़का रही थी मैं,...

" स्साली, ठेल कस के , जीभ अंदर घुसेड़ के, वरना लगाउंगी दो हाथ कस के,... "

उसकी थोड़ी सी जीभ पिछवाड़े घुसी और इनकी हालत खराब, खूंटा मेरे कब्जे में था , मैं हलके हलके सहला रही थी , कभी उसके बेस पे कस के दबा देती जिससे वो झड न पाएं,

उनकी देह तड़प रही थी, मचल रही थी,... जैसे मैं तड़पती थी जैसे मेरे क्लिट पर जीभ के टिप से छू छू कर , सहला कर,... तड़पाते थे. बस उसी तरह,

पर आज तड़पाने का दिन हम दोनों बहनों का था,... और मैंने एक नयी शैतानी शुरू कर दी,...
 
तड़पोगे, तड़पा लो





" हे पेल दे जीभ पूरी अंदर, अरे जीजू ने तेरी गाँड़ मारी थी न कस कस के , बस बदला ले ले कस के , मार ले गाँड़ पाने जिज्जा की जीभ से "

और दोनों हाथों से उसका सर मैंने कस के पकड़ रखा था, हड़का रही थी मैं,...

" स्साली, ठेल कस के , जीभ अंदर घुसेड़ के, वरना लगाउंगी दो हाथ कस के,... "

उसकी थोड़ी सी जीभ पिछवाड़े घुसी और इनकी हालत खराब, खूंटा मेरे कब्जे में था , मैं हलके हलके सहला रही थी , कभी उसके बेस पे कस के दबा देती जिससे वो झड न पाएं,उनकी देह तड़प रही थी, मचल रही थी,... जैसे मैं तड़पती थी जैसे मेरे क्लिट पर जीभ के टिप से छू छू कर , सहला कर,... तड़पाते थे. बस उसी तरह,

पर आज तड़पाने का दिन हम दोनों बहनों का था,... और मैंने एक नयी शैतानी शुरू कर दी,...

टिट फक, अपने दोनों बड़े बड़े गदराये जोबन के बीच में लेकर और साथ में खुले सुपाड़े को चूस लेती , चाट लेती ,...





और मेरे बाद छुटकी अपनी कच्चे टिकोरों को, ... नहीं नहीं वो टिट फक नहीं कर रही थी, बस झुक के अपनी कच्ची जस्ट आती हुयी अमिया को उनके खड़े लंड पे रगड़ देती , सहला देती,...

हे करो न , मेरे ऊपर आ जाओ,...वो बोल रहे थे , चूतड़ पटक रहे थे ,

मैं तो उनको और तड़पाती, पर उनकी छुटकी साली, बेचारी रहम खा गयी. और मैं भी देखना चाहती थी, की कैसे वो खड़े लंड पर अपने से चढ़ती है. चढ़ तो गयी मेरी बहिनिया, पर उस मोटे मूसल को घोंटने में तो मेरी रंडी सास और छिनार ननद को पसीना आ जाता होगा, ये तो नयी बछेड़ी,... कुछ उसने कोशिश की, कुछ उसके जिज्जू ने उसकी पतली कमरिया पकड़ के अपनी ओर खींचा और कुछ उसकी जिज्जी यानी मैंने उसके दोनों कंधे पकड़ के धकेला,

धीरे धीरे कर के वो कच्ची कली भी मोटे बांस को आधे से ज्यादा घोंट ले गयी, .... वो भी खुश उसकी गुलाबो भी खुश, उसके जीजू का मूसल भी खुश,...





पर मेरी रामपियारी ने कौन खता की थी, वही काहें पियासी रहतीं,... तो बस छोटी बहन लंड पर चढ़ कर मज़ा ले रही थी तो बड़ी बहन छुटकी के जीजू के मुंह पर,... सच्च में मस्त चूत चटोरे,... थे वो , बस तो हम दोनों बहनों ने मिल के,...





और मेरी निगाह घडी पे पड़ गयी, मुश्किल से आधा घंटा बचा था,
 
रीत रिवाज





बताया तो था आपको, ... रीत रिवाज के बारे में , कल के दिन गाँव में सिर्फ औरतें लड़कियां रहती थी और उन्ही की होली होती थी, तो जितने मर्द थे उन्हें घंटा भर रात रहते ही, गाँव छोड़ के जाना होता था, और पास में ही १२-१४ किलोमीटर पर एक हम लोगों की छावनी थी, वहां भी ट्यूबवेल, बाग़, खेत थे हमी लोगों के तो तय ये हुआ था की बस ये और नन्दोई जी वहीँ चले जाएंगे, एक घंटा रात रहते, और अगले दिन रात में आ जाएंगे, ...

तो बस उसी में आधा घंटा बचा था,....

छुटकी बांस पे उतरने चढ़ने में अब थक रही थी, चेहरे पर उसके पसीना साफ़ साफ़ छलकता दिख रहा था, जाँघे उसकी फटी पड़ रही थी, अभी कल ही तो उसकी नथ उतरी थी, झिल्ली फटी थी,

आज इतनी ह्च्चक ह्च्चक के उसके जीजू और डबल जीजू ने उसकी कच्ची गाँड़ मार के पूरा खोल दिया था , उसके बाद भी अपने जीजा के लिए कुछ भी कर सकती थी वो इसलिए पूरी ताकत से,...

और सच पूछूं तो उस मोटे लंड को देख के मेरी चूत मचल रही थी और कुछ लंड पे दया भी आ रही थी, बस हम दोनों बहनों ने जगह बदल ली,... और के फायदा ये भी था की छुटकी सीख भी रही थी, ...

और अब मैं कुछ देर में उनके लंड पर चढ़ी उन्हें हचक के चोद रही थी,





और वो अपनी छोटी साली की कसी कसी मीठी मीठी चूत चाट रहे थे, एकदम चाशनी में रसी बसी थी,...

चोदने के साथ मैं उनकी माँ बहिन का नाम ले ले कर जोर जोर रही थी , कभी एक हाथ से उनके निप्स स्क्रैच कर लेती तो दूसरे हाथ से कभी उनके बॉल्स सहला देती तो कभी मेरी बहिन की गाँड़ मारने की सजा देते, उनकी गाँड़ में ऊँगली कर देती, और एक नहीं दो दो,... अंदर तक करोच लेती,... और वो भी चूतड़ उचका के मेरा साथ देते,...

बस पांच मिनट, बगल के कमरे से नन्दोई जी के तैयार होने की आवाजें आनी शुरू हो गयी थीं,... उसी समय

छुटकी ने जीजू के ऊपर से उठने की कोशिश की तो मैंने पहले तो हड़काया,... पर उस बेचारी ने पहले तो बार बार एक ऊँगली दिखाकर सिग्नल दिया की उसे ,.. ' आ रही है ",...

मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी मुस्कान रोकी, इस घर में ये सब इशारे बाजी नहीं चलती, ... यहाँ तो सब के सामने सब बातें सब लोग खुल्ल्म खुल्ला बोलते हैं.

" बोल न " मैंने हड़काया।

झुंझला के वो बोली, दी आ रही है बड़ी जोर से ,... हो जाएगी अभी , जीजू को बोलिये जाने दे न। "

जीजू महा दुष्ट , उन्होंने उस छोटी साली को और कस के पकड़ लिया,... और अपना मुंह उस पनाली के पास,... और उन की पकड़ से तो मैं नहीं छूट पाती थी ये तो कल की ,...





' तो कर ले न ,... जीजू के,... " हँसते हुए मैं बोली,...

वो छटपटा रही थी , ये कस के पकडे थे,... मैं समझ गयी इनका भी मन कर रहा है साली की सुनहरी शराब पीने का , फिर छुटकी बेचारी को, कल दिन भर तो यही सब होगा , मेरी ननद ने बोल रखा था ,

सीधे कुप्पी से पिलाऊंगी,... मेरी जेठानी ने मरे सामने छुटकी से भी छोटी उम्र वाली को, मैंने भी अपनी छोटी ननद को,..

बस मैंने अपनी ऊँगली के टिप को उसके मूत्र छिद्र पर , योनि छिद्र के ऊपर, पहले तो कस कस के रगड़ा फिर अपने नाख़ून से सुरसुरी कर दी,...

बस पहले तो सुनहली पिघलती एक बूँद,... फिर,...

और उसके बाद तो छुटकी भी कुछ नहीं कर सकती थी,...

उसी समय ननदोई जी ने दरवाजा खटखटाया,... नहीं नहीं बिना बिना झड़े नहीं गए , मैं तो बिदा कर भी देती उनको खड़े लंड के साथ पर उनकी छोटी स्साली , उससे नहीं रहा गया,...

और बाहर नन्दोई जी खटखट कर रहे थे और वो मेरी बहन पर चढ़े हुए थे,... जब मैंने दरवाजा खोला उस समय भी उनका खूंटा अंदर धंसा अपनी साली के निचले मुंह को रबड़ी मलाई खिला रहा था,





थोड़ी देर में वो और नन्दोई जी निकल गए , मैं छुटकी को दुबका के सो गयी , घंटे आध घंटे की जो नींद मिल जाए,...

आधी नींद में मैं सोच रही थी पहले दिन मेरी सास, जेठानी और नंदों ने मिल के,... क्या क्या नहीं ,... और इन्ही ननद ने साफ़ साफ़ बोला था की भौजी ये तो ट्रेलर है, असली तो उस दिन होगा जब आप मायके से लौट आइयेगा, जिस दिन गाँव में सिर्फ औरतें होती है, पर उस दिन भी,...

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भाग २३

नई सुबह





उसी समय ननदोई जी ने दरवाजा खटखटाया,... नहीं नहीं बिना बिना झड़े नहीं गए , मैं तो बिदा कर भी देती उनको खड़े लंड के साथ पर उनकी छोटी स्साली , उससे नहीं रहा गया,...

और बाहर नन्दोई जी खटखट कर रहे थे और वो मेरी बहन पर चढ़े हुए थे,... जब मैंने दरवाजा खोला उस समय भी उनका खूंटा अंदर धंसा अपनी साली के निचले मुंह को रबड़ी मलाई खिला रहा था,

थोड़ी देर में वो और नन्दोई जी निकल गए , मैं छुटकी को दुबका के सो गयी , घंटे आध घंटे की जो नींद मिल जाए,...

आधी नींद में मैं सोच रही थी पहले दिन मेरी सास, जेठानी और नंदों ने मिल के,... क्या क्या नहीं ,...

और इन्ही ननद ने साफ़ साफ़ बोला था की भौजी ये तो ट्रेलर है, असली तो उस दिन होगा जब आप मायके से लौट आइयेगा, जिस दिन गाँव में सिर्फ औरतें होती है, पर उस दिन भी,...





खटखट ननद जी ने की और बाहर सिर्फ मेरी सास नहीं , चचिया सास बुआ सास , और गाँव की और सास लगने वाली ,

कुछ जेठानिया भी ( मेरी सगी जेठानी तो जेठ जी के पास चली गयीं थी मेरी छोटी ननद के साथ, वहीँ उसका एडमिशन कराना था,... ) और होली की मस्ती चालू हो गयी ,

(और होली वाले दिन तो कुछ नहीं था आज के आगे,)

होली वाले दिन की तरह,

रस्म है की नयी बहू सबसे पहले सास को रंग लगाती है,





फिर सास





और वो, गाँव की रिश्ते की सब सास. और जेठानियाँ नयी बहू की हेल्प करती हैं तो ननदें तो कभी किसी जनम में भौजी का साथ नहीं देतीं , दुनिया के किसी कोने में नहीं तो वो हाथ धोकर, भौजाई के पीछे, और सास भी बहू की माँ को ( आखिर उनकी समधन लगती हैं तो गरियाने का रिश्ता है ही ) न सिर्फ एक से एक गन्दी गालियां देती हैं, बल्कि बहू से भी दिलवाती हैं उसकी माँ को, ( या सिद्ध करने के लिए की वह अब अपने ससुराल की हो गयी है, मायके की नहीं ),

सासू जी के पैरों में गुलाल लगाने के साथ मैंने इनकी मातृभूमि का दर्शन करने के लिए सासू की साड़ी कमर तक उठा दी, और सासू जी ने भी कोई रेजिस्ट नहीं किया,...





पर मेरी ननद ने और एक चचिया सास ने मिल के मेरा मुंह सीधे ' वहीं' इनकी 'मातृभूमि',... पर और एक जेठानी ने चिढ़ाया भी,

" यहीं से देवर जी निकले थे जो रोज कबड्डी खेलते हैं तोहरे साथ, तनी आज इसको चख लो, "

सासू जी ने भी अपनी जाँघे खुद फैला दी और आज उन्होंने अपनी झांटे अच्छी तरह साफ़ कर ली थीं ( बाद में मुझे पता चला की ये साफ़ सफाई मेरी छुटकी बहिनिया के लिए की गयी थी ), चूत चटोरी तो मैं मायके से थी, और सास की चूत चाटने में , जिस चूत ने मोटे मोटे लंड घोंट के, इनका बीज रोपा गाभिन हुयी और नौ महीने बाद बियाइं,...





आज होली के दिन,... थोड़ी देर में ही सास जी के पैर डगमगाने लगे, लेकिन पकड़ उनकी जाँघों की एकदम सँड़सी की तरह, ताकत में अपने बेटे से उन्नीस नहीं थीं वो , मैं लाख कोशिश कर के भी उनकी जाँघों के बीच से अपना सर नहीं छुड़ा पा रही थी, पता नहीं मायके से ससुराल तक कितने मर्दों को अपनी जाँघों के बीच दबोचा होगा,...

और मौके का फायदा उनकी बेटी, मेरी ननद ने उठाया, पहले तो मेरी साड़ी आराम से धीमे धीमे खोली, फिर पेटीकोट का नाड़ा न सिर्फ खोला बल्कि मेरे पेटीकोट से निकाल के दूर फेंक दिया और अब मैं कोशिश कर के भी पेटीकोट नहीं पहन सकती थी, ... एक पड़ोस की ननद ने ब्लाउज के दो टुकड़े कर दिए ,...

पर मैं पूरी ताकत से इन सबसे बेखबर अपनी सासू माता का भोंसड़ा चूस रही थी,





और अपने से वादा कर रही थी, हफ्ते भर के अंदर इस छिनार के इसी भोसड़े के अंदर अपने सामने इसके बेटे का लंड न घुसवाया, फिर इनके समधियाने के, अपने मायके के सब मरदों का हरवाह, घोसी, धोबी, मोची, कोई नहीं बचेगा जो इस पोखर में डुबकी न लगाएगा,...
 
छुटकी की होली





और भौजी चली देवर को





ननद ने सही कहा था, भाभी लौट के आइयेगा सीधे कुप्पी से पीने को मिलेगी,

यहाँ तक की मेरी सास की समधन, मेरी माँ ने अपनी समधन को दस मोटी मोटी गारियाँ सुनाई थीं, बड़ी सीधी हैं सास तेरी नयी बहू को तो सीधे कुप्पी से ,





और वही हो रहा था,... वो भी खड़े खड़े, वो खड़ी थी, मैं बैठी,...





और मैंने कनखियों से देखा तो छुटकी को एक गोयतिन सास, अरे वहीँ नैना की माँ,... मेरी तरह उसको भी , सीधे कुप्पी से,.. और मेरी सास ने मेरा सर भी अपने दो हाथों से जकड़ रखा था,.. तब तक पिछवाड़े मेरी एक नहीं दो उँगलियाँ घुसीं, और कौन मेरी भाइचॉद ननद,... और जब सास ने छोड़ा तो ननद ने पिछवाड़े से निकली ऊँगली मेरे मुंह में,... ज़रा भाभी को मंजन तो करा दूँ,...

लेकिन मुझसे ज्यादा दुर्गत छुटकी की हो रही थी, सब सासें उसी पर ज्यादा मेहरबान, ... कच्चे टिकोरों को देख के सब का मन ललचाता है चाहे मरद हों या औरतें , खास तौर से बड़ी उम्र की औरतें,...





और छुटकी के ऊपर सबसे पहले चढ़ीं मेरी चचिया सास, ऐसी लिबरा रही थीं , मेरी सास की देवरानी भी सहेली भी, और सास ने पहले ही उन्ही से कच्ची अमिया वाली का भोग लगवाया,

छुटकी ने तो होली में अपने यहाँ भी मिसराइन भौजी, ( जो स्कूल में उसकी वाइस प्रिंसिपल भी थीं और इन्ही चचिया सास की उमर की रही होंगी तो होली में अपनी सबसे छोटी ननदिया को क्यों छोड़तीं, और रीतू भौजी, होली में ननदें गिन पाती हैं क्या ? और चूत चूसना तो वो अच्छी तरह सीख गयी थी,...





तो पांच छह मिनट में वो जब मेरी चचिया सास को झाड़ने के करीब ले गयी, तभी खड़े खड़े सास ने बहुओं को और बेटियों को इशारा किया बस क्या जाल में गौरैया जकड़ती है , ..और उस का सर मेरी सगी ननद ने पकड़ के मेरी चचिया सास की बिल में जबरदस्त चिपका रखा था, और हड़का भी रही थीं,...

उधर मेरी सास मेरे ,

और चचिया सास मेरी छुटकी बहिनिया के ,

मुझे सिर्फ ननद की आवाज सुनाई दे रही थी हड़काते , पुचकारते,... मुंह बंद करने की कोशिश भी मत करना,... अरे भौजी की बहिनिया,... हाँ शाबास , दो चार बूँद ,... अब तो देख बस तू खाली मुंह खोल के रख, ... एक बूँद भी बाहर नहीं जाना चाहिए, ... वरना मार मार के तेरे चूतड़,... शाबास,... अरे तेरी बड़की बहिनिया ने तो खाली दो चार गिलास पिया था , तुझे तो आज आधी बाल्टी पिलाऊंगी , सीधे कुप्पी से ,

आधी दर्जन से तो ऊपर सास थीं , फिर ननदें

मुझे याद आ रहा था मेरी जेठानी ने कैसे कजरी को , नउनिया की बिटिया छुटकी के उम्र की ही होगी , पटक के यहीं , घल घल ,... और मैंने भी तो अपनी सगी छोटी ननद के ऊपर चढ़ के, मेरी सब जेठानियाँ ललकार रही थी और मैंने सुनहला शरबत,... वही इनकी छोटी बहन जिसकी मेरे ममेरे भाई ने हचक के फाड़ी थी,...

और जब मुंह में,...

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तो एक दो सासें कच्चे टिकोरों का मजा ले रही थींतो कोई सास अगवाड़े ऊँगली कर रही थी दूसरी गाँड़ की गहराई नाप रही थी ,





ननदें भी छुटकी के साथ ही,

और उसे गरिया भी रही थीं

" अरे ऊँगली से उचक रही हो , कल से गाँव भर के हमारे भाई सब एही तोहरी गाँड़ि में गोता लगाएंगे, एक निकालेगा दूसरा डालेगा, दीदी के गाँव आयी हो न सही मौसम में लंड का कोई कमी न होगी , न अगवाड़े , न पिछवाड़े,...





तो कोई मेरी गाँव की सासों को ललकार रही थीं , " हाँ चाची तनी ठीक से नाप जोख कर लीजिये,... कल से आपके बेटवा लोग, अरे इनकी बहिनिया को हमरे गाँव का मोट मस्त लंड पसंद आ गया तो अपनी छुटकी बहिनिया को भी ले आयीं। "

और बस थोड़ी देर बाद उस मौके का फायदा उठा के बस अपनी साड़ी मैंने लपेटी और निकल ली,... किसी से मैंने वायदा किया था,...

……..





चंदू से मैंने वायदा किया था,मेरा रिश्ते से देवर,... गाँव की सब औरतें, ननदें, जेठानियाँ, कामवालियां,... सब उसे सांड़ कहती थीं और ब्रम्हचारी भी,

एक दिन मिश्राइन भाभी ने उसका पूरा किस्सा बताया, गाँव में लौंडो को,.. रेख आयी, टनटनाना शुरू हुआ, दूध मलाई बहनी शुरू हुयी,

सबसे पहले तो कोई कामवाली, घर में खेत में, नेवान कर लेती





उसके बाद भौजाइयां, कितनों के तो मरद परदेस कमाने जाते थे तो आधे समय छूंछियाई रहती थीं, तो कच्ची उमर का देवर,... और एक बार मूसल राज को भोग मिल गया, प्रेम गली में आना जाना शुरू होगया तो, मेरे ससुराल की लड़कियां, ननदें , सब की सब मायके की छटी छिनार,...

मैं तो कहती थी ननद और छिनार पर्यायवाची हैं,... झांटे आने के पहले ही लंड ढूँढ़ना शुरू कर देती थी,...





लेकिन चंदू मेरा देवर सच में सांड़ था, मिश्राइन भौजी बोलीं की जो चार चार बच्चो की माँ, गाँव जवार में जिससे कोई मर्द बचा न हो, ... जब रेख आ रही थी, उस उमर में भी, वो सब भोंसड़ी वाली भी, जितना गौने की रात में न चीखी होंगी उससे ज्यादा,..

कुछ दिन में सब उससे कतराने लगीं, सिर्फ वही कामवालियां , .. उसमें से भी कोई एक नयी लड़की थी, ... कुँवारी तो नहीं,.. लेकिन शादी हो गयी थी, गौना नहीं हुआ था गाँव के दो चार बाबू साहेब चढ़ चुके थे और थी भी शौक़ीन,... बहुत चिल्लाई वो और क्या नहीं कहा, ... चंदू को,...

बस उसी के बाद,...

सिर्फ रमजानिया जो उसके यहाँ काम करती थी उसी से उसकी पटती थी,... उसने बहुत समझाया भी की भैया , चुदवाने से आज तक कोई लौंडियाँ नहीं मरी, स्साली छिनरपना कर रही थी,...





डेढ़ साल से ऊपर हो गए, तब से चंदू लंगोट का पक्का, एकदम ब्रम्हचारी,... लड़कियों औरतों के देख के आँखे नीची कर लेता, कोई भौजाई कुछ बोलती भी , तो बस रास्ता काट के निकल जाता,...

हाँ मेरी बात अलग थी, मुझे देख के खुद साइकिल से उतर के नमस्ते करता, लेकिन मैं भी क्या करती, रिश्ते से भौजाई थी, बिना मज़ाक किये देवर से छोड़ दूँ,... और मज़ाक भी एकदम खुल्ल्म खुल्ला,... वो जवाब तो नहीं देता था,... लेकिन उसके गाल इतने शरम से लाल हो जाते थे की बस यही मन करता था की कचकचा के काट लूँ , सच्ची इतनी तो इस गाँव की कोई लड़की भी नहीं शरमाती,...

मेरी ननदें मुझे चिढ़ाती भीं, चढाती भी ,

एक बोलती की कउनो उर्वशी मेनका आएगी तभी चंदू भैया का ब्रम्हचर्य भंग होगा,... तो दूसरी बोलती, हमार नयकी भौजी कउन उर्वशी मेनका से कम है, भउजी अबकी फागुन में देवर क,...



 
चंदू





मुझे देख के खुद साइकिल से उतर के नमस्ते करता, लेकिन मैं भी क्या करती, रिश्ते से भौजाई थी, बिना मज़ाक किये देवर से छोड़ दूँ,... और मज़ाक भी एकदम खुल्ल्म खुल्ला,... वो जवाब तो नहीं देता था,... लेकिन उसके गाल इतने शरम से लाल हो जाते थे की बस यही मन करता था की कचकचा के काट लूँ , सच्ची इतनी तो इस गाँव की कोई लड़की भी नहीं शरमाती,...

मेरी ननदें मुझे चिढ़ाती भीं, चढाती भी , एक बोलती की कउनो उर्वशी मेनका आएगी तभी चंदू भैया का ब्रम्हचर्य भंग होगा,... तो दूसरी बोलती, हमार नयकी भौजी कउन उर्वशी मेनका से कम है, भउजी अबकी फागुन में देवर क,...

पहले मैंने गुलबिया से फिर रमजनिया से, और चंदू के अड्डे का पता कर के,... बता तो चुकी हूँ सब पहले,...

फागुन के पहले दिन ही मैंने उससे साफ साफ दिया था की,...

असो होली में पटक के चोदूंगी, तोहें,....और तुमसे पूछूँगी भी नहीं, ...

और कहीं छिपो, अपनी माँ के भोंसडे में भी तो वहां से भी हाथ डाल के खींच के निकाल लूंगीं, समझते क्या हो,जब तक मेरी देवरानी नहीं आ जाती, इस पर मेरा पूरा हक है, और देवरानी लाऊंगी मैं अपनी पसंद से, भाभी हूँ तेरी,...

तो बस वहीँ,





वही अपने देवर जो है सांड़ लेकिन डेढ़ दो साल से पूरा ब्रम्हचारी बना है, मैंने अपनी जेठानियों और ननदों का चैलेन्ज कबूल कर लिया था और उन्हें बता दिया था की इस चंदू को इसी होली में पक्का चोदू न बना दिया तो कहना, और कुँवारी ननदों से तो और,.. अभी से तेल लगाना शुरू कर दो, ... सिर्फ अपने देवर चंदू को चोदू ही नहीं बनाउंगी , तुम सबको चुदवाउंगी भी उससे,...

सिर्फ साड़ी लपटे और अपने फटे ब्लाउज को बस किसी तरह बांधे,





मैं चली जा रही थी, खेतों के बीच, पगडंडी से, और आज वैसे भी गाँव में कोई मरद तो था नहीं तो रस्ते में किसी के देखने, रोकने, रुकने का मतलब नहीं,

औरतें, लड़कियां भी अपने घरों में होली खेल रही होंगी या होली की तैयारी कर रही होंगी,

एक पल मैंने झुक के देखा और खुद,... नहीं नहीं मैं की साज सिंगार कर के नहीं, पर जब जोबन एक बार गदरा जाते हैं, चोली फाड़ के यारों को ललचाने लगते है तो फिर किसी साज सिंगार की जरूरत नहीं और मेरी बस उभारों को किसी तरह ढंके आधे ब्लाउज से बाहर छलकते उभारों पर जो साजन के दांतों की निशान थे वो किसी नौलखे हार से कम नहीं थे,...

चंदू के अड़ड़े पर मैं कई बार जा चुकी थी, जिस दिन फागुन शुरू हुआ था उस दिन भी, गाँव के बाहर उस का खेत है, एक ट्यूबवेल, छोटी सी बगिया, एक बँसवाड़ी, उसी के पीछे एक कोठरी, वहीँ छोटा सा अखाडा बना रखा है, ... सिर्फ वही जाता है वहां पे, बगल से गुजर जाओ तो भी पता नहीं चलेगा, इतनी गझिन बाग़ और बँसवाड़ी है, वो तो रमजनिया ने मुझे बता दिया था,...





और आज मैं होली के तैयारी से पूरी थी, मुझे मालूम था गुस्सा होगा जबरदस्त वो, गुस्सा होने की बात ही थी,... मैंने होली की बात की थी,... होली के दिन तो इतना हुड़दंग, ननद जेठानी नन्दोई घर से बाहर निकल ही नहीं पायी , और निकली भी तो दोपहर हो गयी थी,...





उसी शाम इनकी ससुराल,... दो दिन वहां अपने मायके माँ के पास,...

और कल लौटी तो कल इस गाँव में रंग नहीं होता, खैर अभी तीन दिन हैं न होली की मस्ती के,... वैसे तो होली मैं देह की खेलने वाली थी उसके साथ, देवर भाभी की असली होली तो वही,... और गाँव में वैसे भी आज कल की होली में रंग से ज्यादा कीचड़ मट्टी,... पर मैं पूरी तैयारी के साथ, गाढ़े पक्के रंग महीने भर न छूटें छूटें, पेण्ट की ट्यूब, और सबसे बढ़कर कड़ाही के पेंदे की कालिख, हफ्ते भर से इकट्ठा कर रही थी, थोड़ा सा तेल के साथ मिला के रंग का भी बाप हो जाता है ये,... देह को कोई हिस्सा नहीं बचेगा जहाँ पांच छह कोट,...

फिर कीचड़ मट्टी वाली होली भी होगी, मेरे देवर ने कितना मन मसोस के बोला था , कितने साल हो गए उसे होली खेले उसे याद नहीं,...

भौजी के रहते देवर सूखा बच जाए,.... ये ना इंसाफ़ी मेरे रहते,...





और दबे पाँव बँसवाड़ी के बीच से मैं उसे देख रही थी,... अभी अभी दंड पेल कर, ...

पूरी गोरी देह, एकदम पसीने में लथपथ, जैसे तेल से चिकनी हो गयी हो, एक एक मसल्स दिख रही थी, सिवाय उस के जिसे उसने जमाने से लंगोट में कस के बाँध रखा था, और आज उसके आजाद होने का दिन था,ताकत उस की देह से छलक रही थी पर चेहरा थोड़ा उदास था,...

जैसे किसी का इन्तजार कर कर के थक चुका हो, आज उदासी की मुझे ऐसी की तैसी करनी थी,...

मैंने पक्का काही रंग नीले रंग में मिला के अपनी दोनों गोरी हथेलियों में चार पांच कोट,...





और एकदम दबे पांव , क्या अमावस की रात कोई चोर घुसेगा,... पत्ती भी न हिले और पीछे से देवर को दबोच लिया और मेरी हथेली के रंग उसके गालों पे
 
" भौजी"





फागुन के सब रंग मेरे हाथों में उतर आये थे और रस मेरे देवर के गालो में,

आज कली भौंरा बन गयी थी, रस लुटाने वाला रस लूट रहा था, ...

एकदम मीठे पूवे जैसा, वो भी ऐसा वैसा पूआ नहीं, दूध में महुआ डाल के जो पूवा बनता है वो वाला, मुलायम भी रसीला भी नशीला भी, दोनों गाल उसके, मेरे हाथों के नीले काही रंग, और इतना रगड़ रगड़ कर,... मेरे हाथों की सारी लकीरें मेरे देवर के गालों पर जैसे उस कुंवारे लजीले देवर के गालों पर उतर जाएँ,... और उस के बाद आँचल में खोंसी कड़ाही से उतारी कालिख की पुड़िया, रच रच कर उन गोरे गोरे गालों पर, इत्ते चिकने, गोरे मुलायम मक्खन ऐसे गाल तो मेरी किसी ननद के भी नहीं थे,...

" भौजी"

अब उसके बोल फूटे और मुंह खुलते ही, मेरी उँगलियों में लीपी पुती कालिख, देवर के मुंह और और उसके बत्तीसों दूध से चमकते दांत अच्छी तरह काले ,... उसने मुंह बंद करने की कोशिश की पर मेरे देवर की हालत उसकी उन बहनों की तरह जो ख़ुशी ख़ुशी , चूत में सुपाड़ा घुसवा लें और उसके बाद जांघ सिकोड़ने की कोशिश करें चूतड़ पटकें, न बिना चोदे उनकी चूत कोई लंड निकलता है न देवर के दांतों को कई कोट रंग लगाए मेरी उँगलियाँ निकलने वाली थीं.





रंगों कालिख के बाद पेण्ट की ट्यूब की बारी थी, उसने मेरे हाथ रोकने की भी कोशिश की, पर जब मेरे हाथ उसके गाल से चिपक गए थे, और नीला, काही कालिख के बाद वार्निश का पेण्ट, हाथों के पकड़ने से देवर कभी बचता है, जो वो बचे,...

और वो तो सीधा इतना जो कहते हैं न लड़कियों औरतों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए , मानती हूँ। लेकिन टांग उठाने की तो मनाही नहीं हैं न।

चार पांच कोट के बाद मेरे हाथ चिकने गालों से सरक कर चौड़े ५६ इंच वाले सीने पर और वहां भी उसके मेल टिट्स ( आखिर सारे देवर ननदोई भी चोली के अंदर के फूलों के लिए ही ललचाते रहते हैं )





रंग का बाकी खजाना मैंने पास के चबूतरे पर रख दिया था, ... लेकिन मेरा मन उसे रंग से नहलाने का भी हो रहा था, एक बाल्टी दिखी, पानी भी था,... बस चार पुड़िया लाल रंग उसमें घोलने के लिए ,...

मेरे देवर की निगाहें बार बार उन्ही रंगों की ओर पड़ रही थीं,..सच में होली में रंग लगाने से ज्यादा मजा लगवाने में है और अगर लगाने वाला ऐसा लजीला नशीला देवर हो तो , मेरी आँखों ने उसे उन रंगो की ओर इशारा भी कर दिया , उकसा दिया,.. और इजाजत भी दे दी,... बस जब तक मैं रंग घोल रही थी वो दोनों हाथों में मेरे ही लाये गाढ़े लाल रंग को पोत के तैयार,...

मैंने भी देवर को पूरा मौका दिया और जब वो खड़ा हुआ, तो मैंने पूरी बाल्टी का रंग सीधे, एकदम वहीँ , जो लंगोटे के अंदर बंद, पूरी ताकत से,... इरादा मेरा अगर देवर को अब तक नहीं मालूम हुआ होगा तो अब मालूम हो गया होगा, ...

और हाथों में रंग ले के वो मेरे पीछे, मैंने भागने की बचने की कोशिश की लेकिन बस इतनी की, वो थोड़ी देर में ही मुझे पीछे से दबोच ले और उसके दोनों हाथ मेरे रसमलाई ऐसे गालों पर, देवर उसी लिए तो होली का इन्तजार करते हैं , इस बहाने कम से कम छूने का भाभी के गाल मलने का मौका मिल जाता है,... और देवर थोड़ा हिम्मती हो,..

मेरा देवर हिम्मती तो था लेकिन झिझकता भी था, और हाथ अगर छुड़ाने के बहाने मैंने सरका के नीचे न किया होता तो वो वहीँ गालों पे उलझा होता, खैर मेरे चिकने गोरे गोरे गाल इतने रसीले हैं ही, और हाथ उसके वहीँ आके जहाँ वो भी चाहता था , मैं भी चाहती थी,

और मैं अकेली थोड़ी थी,

अगर कोई भौजाई ये कहे की वो नहीं चाहती की उसके देवर चोली में हाथ डाल के उसके जोबन पे रंग लगाएं , जुबना का रस लूटें तो इसका मतलब वो सरासर झुठ बोल रही है और उसे कौवा जरूर काटेगा,...





अब वो हाथ हटाना चाहता भी तो , उसका हाथ रोकने के बहाने, उसके हाथ के ऊपर से उसका हाथ पकड़ के मैं उसका हाथ अपने उभारों पर दबा रही थी,... और इस धींगामुश्ती में ब्लाउज तो मेरी ननद ने ही फाड़ दिया था, किसी तरह लपेट के बाँध के मैंने अपने जोबन को छिपाया था, बस ब्लाउज सरक के खुल के अखाड़े में गिर गया, और उस के रंग लगे हाथ मेरे उभारों पे,

अब देवर भाभी की देवर भाभी वाली होली शुरू होगयी थी, ताकत तो बहुत थी उसमें और मेरे पहाड़ ऐसे पत्थर से कड़े जोबन तो हरदम वो ललचा के देखता था,आज मौका मिल गया था , मैंने अपने हाथ उसके हाथों से हटा लिया पर अब भी वो रंग लगे हाथों से कस के मेरी दोनों चूँचियों को रगड़ रगड़ के मसल मसल के, और उसी को क्यों दोष दूँ मैं तो चाहती थी उससे मिजवाना, मसलवाना,
 
भाग २४

देवर भाभी की होली





और हाथों में रंग ले के वो मेरे पीछे, मैंने भागने की बचने की कोशिश की लेकिन बस इतनी की, वो थोड़ी देर में ही मुझे पीछे से दबोच ले और उसके दोनों हाथ मेरे रसमलाई ऐसे गालों पर, देवर उसी लिए तो होली का इन्तजार करते हैं , इस बहाने कम से कम छूने का भाभी के गाल मलने का मौका मिल जाता है,... और देवर थोड़ा हिम्मती हो,..

मेरा देवर हिम्मती तो था लेकिन झिझकता भी था, और हाथ अगर छुड़ाने के बहाने मैंने सरका के नीचे न किया होता तो वो वहीँ गालों पे उलझा होता, खैर मेरे चिकने गोरे गोरे गाल इतने रसीले हैं ही, और हाथ उसके वहीँ आके जहाँ वो भी चाहता था , मैं भी चाहती थी,

और मैं अकेली थोड़ी थी,

अगर कोई भौजाई ये कहे की वो नहीं चाहती की उसके देवर चोली में हाथ डाल के उसके जोबन पे रंग लगाएं , जुबना का रस लूटें तो इसका मतलब वो सरासर झुठ बोल रही है और उसे कौवा जरूर काटेगा,...





अब वो हाथ हटाना चाहता भी तो , उसका हाथ रोकने के बहाने, उसके हाथ के ऊपर से उसका हाथ पकड़ के मैं उसका हाथ अपने उभारों पर दबा रही थी,..

. और इस धींगामुश्ती में ब्लाउज तो मेरी ननद ने ही फाड़ दिया था, किसी तरह लपेट के बाँध के मैंने अपने जोबन को छिपाया था, बस ब्लाउज सरक के खुल के अखाड़े में गिर गया, और उस के रंग लगे हाथ मेरे उभारों पे,





अब देवर भाभी की देवर भाभी वाली होली शुरू होगयी थी, ताकत तो बहुत थी उसमें और मेरे पहाड़ ऐसे पत्थर से कड़े जोबन तो हरदम वो ललचा के देखता था,आज मौका मिल गया था ,

मैंने अपने हाथ उसके हाथों से हटा लिया पर अब भी वो रंग लगे हाथों से कस के मेरी दोनों चूँचियों को रगड़ रगड़ के मसल मसल के, और उसी को क्यों दोष दूँ मैं तो चाहती थी उससे मिजवाना, मसलवाना,

पर अखाड़े के बगल में ही एक क्यारी में पानी पड़ा हुआ था एकदम कीचड़, वहीँ नाली भी थी कीच से भरी, कुछ मैं फिसली, कुछ जान बूझ के गिरी





तो साथ में देवर को भी लेके, और वो एक तो इतना सीधा , मुझे बचाने के लिए वो नीचे गिरा मैं उसके ऊपर, .. पूरी तरह लेटी, ...

मैंने अपना पूरा वजन उसके ऊपर डाल के दबा लिया , साडी भी मेरी सरक के सिर्फ पतले छल्ले की तरह कमर पे, मेरी जाँघे पैर पूरी तरह खुले, बस दोनों जाँघे फैला के उसकी कमर के दोनों ओर मैं एकदम चढ़ी, और जो डरते सहमते रंग उसने मेरे उभारो में लगाया था वो सब अपने जोबन को उसकी चौड़ी छाती पर रगड़ रगड़ कर,

लेकिन गाँव की होली खाली रंग की थोड़ी होती है, और बस बगल की नाली से कीच निकाल निकाल के , मैंने ... हम दोनों एकदम एक दूसरे में धंसे, वो कीचड़ में धंसा, मुस्कराता, ... और मै नाली से कीच निकाल के उसकी छाती पर लोंदे का लोंदा, उसके ऊपर बैठी,... वो मेरे रंगे पुते गदराये उभारों को देख के ललचा रहा था , और अबकी खुद मैंने अनावृत्त उरोजों को पकड़ के क्या मस्त रगड़ना मसलना शुरू किया, उसके हाथ मेरे जोबन में उलझे और मैं दोनों हाथों से कीच उसके पहले तो सीने पर, फिर कंधे और गालों पर , बालों पर,...





बदमाश वो,

अब अपनी सारी शराफत अपनी महतारी की गाँड़ में पेल के उसने बस मुझे पकड़ के अपनी ओर खींच लिया और अपने सीने से रगड़ रगड़ कर,... और अब वो ऊपर था , मैं कीचड में और उसकी देह में जो रच रच के मैंने कीच लगाई थी वो सब उसकी देह से मेरी देह पर, मैं भी कस के उसको पकड़ के अपने बड़े बड़े गदराये उभार उसके चौड़े सीने पर रगड़ रही थी, उसने मुझे कस के पकड़ रखा था, मैंने भी उसे कस के भींच रखा था, और उसे पकडे दबोचे मैंने पलटा मारा,.... और एक बार फिर वो नीचे मैं ऊपर,





मैंने अबतक अपनी कितनी ननदों की शलवार और साया का नाड़ा खोला था तो गाँठ खोलने में मैं भी, और जब तक वो सम्हलता, उसकी लंगोट की गाँठ,...

नहीं नहीं पूरी गाँठ नहीं खुली, दुष्ट ने बहुत कस के बांधा था, लेकिन ढीली इतनी हो गयी थी, की कीचड़ से भरा मेरा हाथ,

और भौजाई की होली असली वाली शुरू हो गयी थी,...

लंगोट में हाथ डाल के मैंने उसे पकड़ लिया जिसके बारे में सुना इतना था लेकिन अबतक न देखा था न छुआ था, देख तो अभी भी नहीं पा रही थी ,

लेकिन छूने पकड़ने से ही अहसास हो गया की देवर की माँ भी मेरी सास की तरह , गदहे घोड़े से चुदवाने के बाद बियाई होंगी इसको,... कड़ा तो लोहे का रॉड, पर अभी तो होली होनी थी





तो पहले तो कीचड़, और हाथ फैला के बगल में रखी पेण्ट और रंग की टूयब तो देवर के बाकी देह पर चार पांच कोट रंग पेण्ट वार्निश का चढ़ा था तो यही क्यों बच जाता,

और कीचड़ से निकल एक बार फिर हम दोनों अखाड़े में थे लेकिन मैंने झुक के कान में उसके बोल दिया था ,

मैं बड़ी हूँ , डालूंगी मैं जैसे तेरी बहने चुपचाप डलवाती है वैसे तू भी डलवा आज,

बेचारा देवर,... और देह की होली शुरू हो गयी।

और क्या होली हुयी देवर भाभी के बीच, कुछ देर तक तो देवर हिचका, झिझका,... लेकिन फिर भौजाई की बैंड बजा दी,...
 
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