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- Dec 5, 2013
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Update 099 -
इससे पहले मैं पूजा और मनीष को ऐसे घूरने से रोक पाती, पूजा बुरी तरह से शॉक्ड होते हुए बोली
पूजा- व्हॉट अपनी खुद की आई.टी. कम्पनी…. आर यू सीरियस… तुम्हें पता भी है कि एक आई.टी. कम्पनी शुरू करने में कितना खर्चा आता है और फिर उसके सक्सेस होने के चांस कितने कम हैं।
अमृता- यस आई एम… मैंने पहले से ही सब कुछ प्लान कर लिया है…. रही बात फंड की तो उसकी कोई प्राब्लम नहीं है। अगर तुम लोग अपना खुद का बिजिनेश शुरू करना चाहो तो मैं पार्टनशिप एग्रीमेंट करके तुम लोगों को भी फंड कर सकती हूँ।
मनीष- ना बाबा ना…. हमारे अंदर अपना बिजिनेश शुरू करने का कांफिडेंस नहीं है।
अमृता- तो फिर तुम लोग चाहो तो मेरी आई.टी. कम्पनी में जॉब कर सकते हो। इस तरह से हम लोग एक साथ भी रह सकते हैं।
पूजा- हुम्म आईडिया तो अच्छा है…. ठीक है हम इस बारे में जरूर सोचेंगे… लेकिन बेचारी श्रेया हमारे साथ नहीं रह पाऐगी।
अमृता- उसका भी मेरे पास एक सॉलूशन है।
श्रेया- क्या
अमृता- देखो यार तुम्हें तो पता ही है कि मैंने रवि और रघू के साथ मिलकर अलग अलग शहरों में अपने शॉपिंग मॉल का बिजिनेश शुरू किया था। तो मैं सोच रही हूँ कि अपने इंदौर और भोपाल के शॉपिंग मॉल को छोडकर बाकी सारे शॉपिंग मॉल बेचकर दिल्ली में अपने कुछ नए शॉपिंग मॉल शुरू करूँ।
श्रेया- यार मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि तुम आखिर कहना क्या चाहती हो
अमृता- अरे डफर मैं सोच रही हूँ कि एम.पी. के अपने सभी शॉपिंग मॉल का इंचार्ज में रघू को बना दूँगी और दिल्ली के अपने सभी शॉपिंग मॉल का इंचार्ज रवि को बना दूँगी। इस तरह से रवि भी दिल्ली में ही सेटल हो जाऐगा और उसके साथ तुम भी दिल्ली आ जाओगी।
मेरी बात सुनकर श्रेया की आँखों में कुछ पलों के लिए चमक आ गई थी। लेकिन फिर वो उदास होते हुए बोली
श्रेया- नहीं यार अमृता तुम मेरी बजह से अपने शॉपिंग मॉल क्यों बेच रही हो।
अमृता- बेबकूफ लडकी अलग अलग शहरों में शॉपिंग मॉल होने के कारण उन्हें मैनेज करने में प्राब्लम होती है। अपनी आई.टी. कम्पनी शुरू करने के बाद मैं रवि और रघू को बिल्कुल भी सपोर्ट नहीं कर पाऊँगी। इसलिए उन दोनों को ही अलग अलग शहरों में जाकर सारा बिजिनेश हैंडिल करना होगा। जिससे तुम लोगों की पर्सनल लाईफ में भी तो प्राब्लम हो सकती है ना। इंदौर और भोपाल के बीच ज्यादा दूरी नहीं है, इसलिए रघू और रश्मि उन्हें आसानी से मैनेज कर लेंगे, और दिल्ली इतना बडा शहर है कि उसमें एक दो शॉपिंग माल से काम तो चलेगा नहीं। यहाँ भी हमें कम से कम 5-6 शॉपिंग मॉल खोलने ही होंगे। जिन्हें दिल्ली में रहकर रवि आसानी से मैनेज कर लेगा। बैसे भी मैं जिन शॉपिंग मॉल को बेचने के बारे में सोच रही हूँ, उनकी मुझे अच्छी खासी प्राईस ऑफर हो रही है। जिससे हम दिल्ली में आसानी से अपने नए शॉपिंग मॉल खोल सकते हैं।
मेरी बात सुनकर श्रेया खुश होते हुए बोली
श्रेया- अगर ऐसा है तो फिर मुझे कोई प्राब्लम नहीं है। फिर तो मैं भी तुम्हारी आई.टी. कम्पनी में तुम्हारे साथ काम करने के लिए पूरे दिल से तैयार हूँ।
श्रेया की बात सुनकर मैं खुश होते हुए बोली
अमृता- तो फिर ठीक है… सभी लोग अपने अपने सारे पर्सनल और दूसरे पेंडिंग काम निपटा लो। तब तक मैं शॉपिंग माल बाला काम पूरा करके कबीर के साथ अपनी आई.टी. कम्पनी शरू करने की तैयारी पूरी करती हूँ।
मनीष- लो भई हो गई कैरियर प्लानिंग.. तो फिर आज की प्लानिंग और सेट कर लेते हैं
कबीर- भाई तू ही बता दे… क्या करना है आज
मनीष- देखो अभी तो दोपहर के बस 3 ही बजे हैं। इसलिए मैं सोच रहा था कि क्यों ना हम कहीं पर घूमने चलते हैं, उसके बाद रात में किसी पव में जाकर इंजॉय करेंगे… बैसे भी कल हमें अपने अपने घर के लिए भी निकलना है। इसलिए जितना समय बचा है, क्यों ना एक साथ बिताया जाऐ।
कबीर- हाँ ठीक है… आईडिया अच्छा है… लेकिन लडकियोें से तो पूछ लो… वो रेडी हैं या नहीं…..
अमृता- मुझे कोई प्राब्लम नहीं है
पूजा- मुझे भी नहीं
श्रेया- तो फिर मैं घर पर अकेली क्या करूँगी…. मैं भी चलती हूँ… लेकिन फिर रात में तुम लोग अपने हॉस्टल बापिस कैसे जाओगे
कबीर- अरे यार हॉस्टल का पीछे बाला रास्ता है ना… हॉस्टल बालों ने अभी तक उसे बंद नहीं करवाया है।
श्रेया- तो फिर ठीक है… आधे घंटे बाद हम लोग यहीं पर मिलते हैं। उसके बाद चलते हैं घूमने
सारी प्लानिंग करने के बाद मैं श्रेया और पूजा तैयार होने के लिए अपने घर बापिस आ गए, जबकि कबीर और मनीष हॉस्टल बापिस चले गए। उस पूरे दिन दोस्तों के साथ इंजॉय करने के बाद अगले दिन मैं और कबीर कानपुर से आगरा के लिए निकल गए। चूंकि कानपुर से आगरा की दूरी करीब 300 किलोमीटर है, इसलिए हमें आगरा पहुँचने में करीब 5 घंटे का समय लगा। आगरा पहुँचते ही हम सीधे हमारे यानि कबीर के घर पहुंचे। शाम के करीब 4 बज चुके थे और कबीर ने कानपुर से निकलने से पहले ही पापा को कॉल कर दिया था, इसलिए पापा पूरे दिन से हम लोगों के आने का ही इंतजार कर रहे थे।
मैं इस वक्त बहुत ज्यादा नर्वस थी और पापा से आमना सामना करने में मुझे डर भी लग रहा था, हाँलाकि मेरे चेहरे में अब तक काफी ज्यादा चेंजिस आ गए थे, इसलिए मुझे पूरा यकीन था कि कबीर की तरह पापा भी मुझे पहचान नहीं पाऐंगे, लेकिन अपने अंदर के डर को मैं चाह कर भी कंट्रोल नहीं कर पा रही थी। क्योंकि मेरा चेहरा अब भी निशा यानि मेरे पुराने चेहरे से काफी हद तक मिलता जुलता था। हुआ भी बिल्कुल वही, जिसका मुझे डर था। जैसे ही मैं पापा के सामने पहुँची तो वो बुरी तरह से हैरान होकर मुझे देखने लगे और अचानक से उनके मूँह से निकला
पापा- निशा…. बेटा त त तुम जिंदा हो…..
पापा के मूँह से अपना असली नाम सुनकर मेरा पूरा शरीर एकदम से ठंडा पड गया था, जिस कारण मैं दरवाजे पर ही किसी बुत की तरह खडी रह गई। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें क्या जबाब दूँ, लेकिन तभी कबीर बात को संभालते हुए बोला
कबीर- अरे पापा यह निशा दीदी नहीं बल्कि अमृता है… मैंने बताया तो था आपको अमृता के बारे में
कबीर की बात सुनकर पापा एक बार फिर हैरान होकर मुझे देखते हुए बोले
पापा- मुझे यकीन ही नहीं हो रहा कि यह निशा नहीं बल्कि कोई दूसरी लडकी है। इसका चेहरा निशा से इतना ज्यादा मिलता जुलता है कि मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरी बेटी मेरे सामने ही खडी है।
पापा की बात सुनकर आखिरकार मैंने अपने अंदर हिम्मत जुटाई और आगे बडकर पापा के पैर छूते हुऐ बोली
अमृता- तो फिर आप मुझे अपनी बेटी ही समझ लीजिए… क्या फर्क पडता है कि मैं कौन हूँ। फर्क बस इस बात से पडता है कि आप मुझे किस रूप में देखना चाहते हैं।
मेरे यूँ अचानक पैर छूने और मेरी बात सुनकर पापा होश में आते हुए बोले
पापा- जुगजुग जिओ मेरी बच्ची….. सॉरी बेटा मैंने तुम्हें किसी दूसरे नाम से बुलाया….
पापा की बात सुनकर मैं खडी हुई और मुस्कुराते हुए बोली
अमृता- कोई बात नहीं अंकल… मैं आपकी फीलिंग समझ सकती हूँ…. इसलिए आप जिस नाम से चाहें मुझे बुला सकते हैं…. बैसे कबीर ने मुझे निशा दीदी के बारे में बताया था, उनके बारे में जानकर मुझे बहुत दुख हुआ और सच कहूँ अंकल तो जैसा आज आपका रिऐक्शन है, मुझे पहली बार देखने पर कबीर का भी कुछ ऐसा ही रिऐक्शन था। कबीर ने जब मुझे निशा दीदी की फोटो दिखाई थी तो मैं खुद भी बहुत हैरान थी, आखिर मेरा चेहरा उनसे इतना मिलता जुलता कैसे हो सकता है। पर फिर मुझे याद आया कि एक बार मेरी दादी माँ ने मुझे बताया था कि इस दुनिया में एक ही शक्ल के सात लोग होते हैं। हाँलाकि इस बात पर मुझे तब तक यकीन नहीं था, जब तक कि मैंने कबीर के मोबाईल में निशा दीदी की फोटो नहीं देखी, और अब जब मैं जान गई हूँ कि निशा दीदी और मेरा चेहरा इतना ज्यादा मिलता जुलता है, तो मुझे इस बात का बुरा लग रहा है कि मैं आप लोगों से पहले क्यों नहीं मिली। अगर हमारी मुलाकात कुछ सालों पहले होती तो मैं भी निशा दीदी से मिल सकती थी।
मेरी बात सुनकर पापा मुस्कुराते हुए बोले
पापा- सही कहा था तुम्हारी दादी ने, इस बारे में मैंने भी सुन रखा है लेकिन आज तुम्हें देखकर मैं भी इस बात पर यकीन करने लगा हूँ और रही बात निशा की तो शायद भगवान ने उसे इतनी ही जिंदगी दी थी, अब किस्मत में जो पहले लिख चुका है उसे हम तुम तो बदल नहीं सकते। बैसे बेटा तुम कहाँ से हो…..
अमृता- वो अंकल मैं असल में उत्तराखण्ड़ के एक छोटे से गाँव की हूँ, लेकिन पिछले कुछ सालों से दिल्ली में ही रह रही हूँ।
तभी कबीर बीच में टोकता हुआ बोला
कबीर- अरे पापा अमृता को अंदर आने के लिए भी कहोगे या दरवाजे पर यूँ ही खडे खडे उसका पूरा इंटरव्यू ले लोगे।
कबीर की बात सुनकर पापा को अपनी गलती का एहसास हुआ और वो तुरंत बोले
पापा- ओह सॉरी सॉरी बेटा… मैं तुम्हें देखकर इतना एक्साईटेड हो गया कि तुमसे अंदर आकर बैठने के बारे में बोला ही नहीं।
पापा की बात सुनकर मैं मुस्कुराते हुए बोली
अमृता- कोई बात नहीं अंकल
पापा- आओ बेटा अंदर आओ… हम आराम से बैठकर बातें करते हैं….
इतना बोलकर पापा कबीर को देखते हुए बोले
पापा- अरे बेटा कबीर तुम अमृता बिटिया से बातें करो, तब तक मैं तुम लोगों के लिए चाय नाश्ता का इंतजाम करता हूँ
कबीर- अरे नहीं पापा आप बैठकर अमृता से बातें करो… मैं बस 5 मिनट में चेंज करके आया, उसके बाद चाय नाश्ते का इंतजाम भी कर दूँगा।
इतना बोलकर कबीर अपना सामान लेकर अपने रू की तरफ चला गया, जबकी मैं और पापा हॉल में ही सोफे पर जाकर बैठ गए। कुछ देर की खामोशी के बाद पापा ने एक बार फिर से सबाल किया
पापा- बेटा तुम्हारे पापा क्या करते हैं
मैं पहले से ही इन सबालों के लिए तैयार होकर आई थी, इसलिए पापा का सबाल सुनकर मैंने थोडा उदास होते हुए कहा
अमृता- वो असल में अंकल जब मैं छोटी थी, तभी एक कार एक्सीडेंट में मेरे माता पिता की डेथ हो गई थी, मेरी दादी ने ही मुझे पाल पोसकर बडा किया है। लेकिन कुछ सालों हमारा गाँव लैंडस्लाईट के कारण पूरी तरह से तबाह हो गया था, जिसमें मेरी दादी की भी डेथ हो गई थी, इसलिए अब मेरी फैमली में बस मेरे अंकल हैं जो आर्मी में मेजर हैं।
पापा- ओह आई एम सॉरी बेटा… मैंने अनजाने में ही तुम्हारे जख्मों को कुरेद दिया है
अमृता- नहीं कोई बात नहीं अंकल… मेरी दादी ने कभी मुझे माता पिता की कमी महसूस नहीं होने दी थी और सच कहूँ तो मुझे तो उनके चेहरे भी याद नहीं है, रही बात दादी की, तो उस घटना को भी अब काफी समय हो गया है। इसलिए मैं उस दुख से भी उबर चुकी हूँ। बैसे भी भगवान ने मुझसे दादी को छीना तो मुझे इतने प्यारे और अच्छे अंकल दे दिए, जो मुझे अपनी सगी बेटी से ज्यादा प्यार करते हैं।
पापा- मैं कुछ समझा नहीं बेटा… क्या तुम्हारे अंकल तुम्हारे साथ नहीं रहते थे
अमृता- वो असल में मेरे जन्म से पहले ही मेरे अंकंल एक मिशन के दौरान गलती से बार्डर पार करके दुशमन देश पहुँच गए थे, जहाँ उन्हें कैद कर लिया गया था, अंकल कई सालों तक दुशमनों की कैद में रहे। उस दौरान आर्मी बालों ने हमारे घर पर बताया था कि मेरे अंकल दुशमनों से लडते वक्त शहीद हो गए हैं। इसलिए हम लोगों को उनके जिंदा होने के बारे में कुछ भी पता नहीं था, कुछ सालों तक दुशमनों की कैद में रहने के बाद मेरे अंकल अपने कुछ साथियों के साथ दुशमनोें की कैद से भाग कर बापिस आ गए, लेकिन जब वो घर बापिस आऐ तो उन्हें पता चला कि एक कार एक्सीडेंट में उनका पूरा परिवार मारा जा चुका है, जबकि उस एक्सीडेंट में मैं और मेरी दादी जिंदा बच गए थे। अपने दोनों बेटों को खोने के बाद दादी हमारे पुराने घर में रहना नहीं चाहती थीं, इसलिए वो मुझे लेकर एक छोटे से गाँव में चली गईं, जहाँ उन्होंने मेरी परवरिस की थी। वहीं दूसरी तरफ मेरे अंकल को भी यही लगता था कि उनका पूरा परिवार मारा जा चुका है। इसलिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश के नाम कर दी और कभी भी शादी नहीं की। लेकिन कुछ सालों पहले किश्मत ने हम दोनों को मिला दिया। तब से अंकल मुझे ही अपनी बेटी समझकर मुझे प्यार करते हैं।
पापा को अपने बारे में सब कुछ बताने के बाद मैं मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देखने लगी।
कहानी जारी है......
इससे पहले मैं पूजा और मनीष को ऐसे घूरने से रोक पाती, पूजा बुरी तरह से शॉक्ड होते हुए बोली
पूजा- व्हॉट अपनी खुद की आई.टी. कम्पनी…. आर यू सीरियस… तुम्हें पता भी है कि एक आई.टी. कम्पनी शुरू करने में कितना खर्चा आता है और फिर उसके सक्सेस होने के चांस कितने कम हैं।
अमृता- यस आई एम… मैंने पहले से ही सब कुछ प्लान कर लिया है…. रही बात फंड की तो उसकी कोई प्राब्लम नहीं है। अगर तुम लोग अपना खुद का बिजिनेश शुरू करना चाहो तो मैं पार्टनशिप एग्रीमेंट करके तुम लोगों को भी फंड कर सकती हूँ।
मनीष- ना बाबा ना…. हमारे अंदर अपना बिजिनेश शुरू करने का कांफिडेंस नहीं है।
अमृता- तो फिर तुम लोग चाहो तो मेरी आई.टी. कम्पनी में जॉब कर सकते हो। इस तरह से हम लोग एक साथ भी रह सकते हैं।
पूजा- हुम्म आईडिया तो अच्छा है…. ठीक है हम इस बारे में जरूर सोचेंगे… लेकिन बेचारी श्रेया हमारे साथ नहीं रह पाऐगी।
अमृता- उसका भी मेरे पास एक सॉलूशन है।
श्रेया- क्या
अमृता- देखो यार तुम्हें तो पता ही है कि मैंने रवि और रघू के साथ मिलकर अलग अलग शहरों में अपने शॉपिंग मॉल का बिजिनेश शुरू किया था। तो मैं सोच रही हूँ कि अपने इंदौर और भोपाल के शॉपिंग मॉल को छोडकर बाकी सारे शॉपिंग मॉल बेचकर दिल्ली में अपने कुछ नए शॉपिंग मॉल शुरू करूँ।
श्रेया- यार मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि तुम आखिर कहना क्या चाहती हो
अमृता- अरे डफर मैं सोच रही हूँ कि एम.पी. के अपने सभी शॉपिंग मॉल का इंचार्ज में रघू को बना दूँगी और दिल्ली के अपने सभी शॉपिंग मॉल का इंचार्ज रवि को बना दूँगी। इस तरह से रवि भी दिल्ली में ही सेटल हो जाऐगा और उसके साथ तुम भी दिल्ली आ जाओगी।
मेरी बात सुनकर श्रेया की आँखों में कुछ पलों के लिए चमक आ गई थी। लेकिन फिर वो उदास होते हुए बोली
श्रेया- नहीं यार अमृता तुम मेरी बजह से अपने शॉपिंग मॉल क्यों बेच रही हो।
अमृता- बेबकूफ लडकी अलग अलग शहरों में शॉपिंग मॉल होने के कारण उन्हें मैनेज करने में प्राब्लम होती है। अपनी आई.टी. कम्पनी शुरू करने के बाद मैं रवि और रघू को बिल्कुल भी सपोर्ट नहीं कर पाऊँगी। इसलिए उन दोनों को ही अलग अलग शहरों में जाकर सारा बिजिनेश हैंडिल करना होगा। जिससे तुम लोगों की पर्सनल लाईफ में भी तो प्राब्लम हो सकती है ना। इंदौर और भोपाल के बीच ज्यादा दूरी नहीं है, इसलिए रघू और रश्मि उन्हें आसानी से मैनेज कर लेंगे, और दिल्ली इतना बडा शहर है कि उसमें एक दो शॉपिंग माल से काम तो चलेगा नहीं। यहाँ भी हमें कम से कम 5-6 शॉपिंग मॉल खोलने ही होंगे। जिन्हें दिल्ली में रहकर रवि आसानी से मैनेज कर लेगा। बैसे भी मैं जिन शॉपिंग मॉल को बेचने के बारे में सोच रही हूँ, उनकी मुझे अच्छी खासी प्राईस ऑफर हो रही है। जिससे हम दिल्ली में आसानी से अपने नए शॉपिंग मॉल खोल सकते हैं।
मेरी बात सुनकर श्रेया खुश होते हुए बोली
श्रेया- अगर ऐसा है तो फिर मुझे कोई प्राब्लम नहीं है। फिर तो मैं भी तुम्हारी आई.टी. कम्पनी में तुम्हारे साथ काम करने के लिए पूरे दिल से तैयार हूँ।
श्रेया की बात सुनकर मैं खुश होते हुए बोली
अमृता- तो फिर ठीक है… सभी लोग अपने अपने सारे पर्सनल और दूसरे पेंडिंग काम निपटा लो। तब तक मैं शॉपिंग माल बाला काम पूरा करके कबीर के साथ अपनी आई.टी. कम्पनी शरू करने की तैयारी पूरी करती हूँ।
मनीष- लो भई हो गई कैरियर प्लानिंग.. तो फिर आज की प्लानिंग और सेट कर लेते हैं
कबीर- भाई तू ही बता दे… क्या करना है आज
मनीष- देखो अभी तो दोपहर के बस 3 ही बजे हैं। इसलिए मैं सोच रहा था कि क्यों ना हम कहीं पर घूमने चलते हैं, उसके बाद रात में किसी पव में जाकर इंजॉय करेंगे… बैसे भी कल हमें अपने अपने घर के लिए भी निकलना है। इसलिए जितना समय बचा है, क्यों ना एक साथ बिताया जाऐ।
कबीर- हाँ ठीक है… आईडिया अच्छा है… लेकिन लडकियोें से तो पूछ लो… वो रेडी हैं या नहीं…..
अमृता- मुझे कोई प्राब्लम नहीं है
पूजा- मुझे भी नहीं
श्रेया- तो फिर मैं घर पर अकेली क्या करूँगी…. मैं भी चलती हूँ… लेकिन फिर रात में तुम लोग अपने हॉस्टल बापिस कैसे जाओगे
कबीर- अरे यार हॉस्टल का पीछे बाला रास्ता है ना… हॉस्टल बालों ने अभी तक उसे बंद नहीं करवाया है।
श्रेया- तो फिर ठीक है… आधे घंटे बाद हम लोग यहीं पर मिलते हैं। उसके बाद चलते हैं घूमने
सारी प्लानिंग करने के बाद मैं श्रेया और पूजा तैयार होने के लिए अपने घर बापिस आ गए, जबकि कबीर और मनीष हॉस्टल बापिस चले गए। उस पूरे दिन दोस्तों के साथ इंजॉय करने के बाद अगले दिन मैं और कबीर कानपुर से आगरा के लिए निकल गए। चूंकि कानपुर से आगरा की दूरी करीब 300 किलोमीटर है, इसलिए हमें आगरा पहुँचने में करीब 5 घंटे का समय लगा। आगरा पहुँचते ही हम सीधे हमारे यानि कबीर के घर पहुंचे। शाम के करीब 4 बज चुके थे और कबीर ने कानपुर से निकलने से पहले ही पापा को कॉल कर दिया था, इसलिए पापा पूरे दिन से हम लोगों के आने का ही इंतजार कर रहे थे।
मैं इस वक्त बहुत ज्यादा नर्वस थी और पापा से आमना सामना करने में मुझे डर भी लग रहा था, हाँलाकि मेरे चेहरे में अब तक काफी ज्यादा चेंजिस आ गए थे, इसलिए मुझे पूरा यकीन था कि कबीर की तरह पापा भी मुझे पहचान नहीं पाऐंगे, लेकिन अपने अंदर के डर को मैं चाह कर भी कंट्रोल नहीं कर पा रही थी। क्योंकि मेरा चेहरा अब भी निशा यानि मेरे पुराने चेहरे से काफी हद तक मिलता जुलता था। हुआ भी बिल्कुल वही, जिसका मुझे डर था। जैसे ही मैं पापा के सामने पहुँची तो वो बुरी तरह से हैरान होकर मुझे देखने लगे और अचानक से उनके मूँह से निकला
पापा- निशा…. बेटा त त तुम जिंदा हो…..
पापा के मूँह से अपना असली नाम सुनकर मेरा पूरा शरीर एकदम से ठंडा पड गया था, जिस कारण मैं दरवाजे पर ही किसी बुत की तरह खडी रह गई। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें क्या जबाब दूँ, लेकिन तभी कबीर बात को संभालते हुए बोला
कबीर- अरे पापा यह निशा दीदी नहीं बल्कि अमृता है… मैंने बताया तो था आपको अमृता के बारे में
कबीर की बात सुनकर पापा एक बार फिर हैरान होकर मुझे देखते हुए बोले
पापा- मुझे यकीन ही नहीं हो रहा कि यह निशा नहीं बल्कि कोई दूसरी लडकी है। इसका चेहरा निशा से इतना ज्यादा मिलता जुलता है कि मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरी बेटी मेरे सामने ही खडी है।
पापा की बात सुनकर आखिरकार मैंने अपने अंदर हिम्मत जुटाई और आगे बडकर पापा के पैर छूते हुऐ बोली
अमृता- तो फिर आप मुझे अपनी बेटी ही समझ लीजिए… क्या फर्क पडता है कि मैं कौन हूँ। फर्क बस इस बात से पडता है कि आप मुझे किस रूप में देखना चाहते हैं।
मेरे यूँ अचानक पैर छूने और मेरी बात सुनकर पापा होश में आते हुए बोले
पापा- जुगजुग जिओ मेरी बच्ची….. सॉरी बेटा मैंने तुम्हें किसी दूसरे नाम से बुलाया….
पापा की बात सुनकर मैं खडी हुई और मुस्कुराते हुए बोली
अमृता- कोई बात नहीं अंकल… मैं आपकी फीलिंग समझ सकती हूँ…. इसलिए आप जिस नाम से चाहें मुझे बुला सकते हैं…. बैसे कबीर ने मुझे निशा दीदी के बारे में बताया था, उनके बारे में जानकर मुझे बहुत दुख हुआ और सच कहूँ अंकल तो जैसा आज आपका रिऐक्शन है, मुझे पहली बार देखने पर कबीर का भी कुछ ऐसा ही रिऐक्शन था। कबीर ने जब मुझे निशा दीदी की फोटो दिखाई थी तो मैं खुद भी बहुत हैरान थी, आखिर मेरा चेहरा उनसे इतना मिलता जुलता कैसे हो सकता है। पर फिर मुझे याद आया कि एक बार मेरी दादी माँ ने मुझे बताया था कि इस दुनिया में एक ही शक्ल के सात लोग होते हैं। हाँलाकि इस बात पर मुझे तब तक यकीन नहीं था, जब तक कि मैंने कबीर के मोबाईल में निशा दीदी की फोटो नहीं देखी, और अब जब मैं जान गई हूँ कि निशा दीदी और मेरा चेहरा इतना ज्यादा मिलता जुलता है, तो मुझे इस बात का बुरा लग रहा है कि मैं आप लोगों से पहले क्यों नहीं मिली। अगर हमारी मुलाकात कुछ सालों पहले होती तो मैं भी निशा दीदी से मिल सकती थी।
मेरी बात सुनकर पापा मुस्कुराते हुए बोले
पापा- सही कहा था तुम्हारी दादी ने, इस बारे में मैंने भी सुन रखा है लेकिन आज तुम्हें देखकर मैं भी इस बात पर यकीन करने लगा हूँ और रही बात निशा की तो शायद भगवान ने उसे इतनी ही जिंदगी दी थी, अब किस्मत में जो पहले लिख चुका है उसे हम तुम तो बदल नहीं सकते। बैसे बेटा तुम कहाँ से हो…..
अमृता- वो अंकल मैं असल में उत्तराखण्ड़ के एक छोटे से गाँव की हूँ, लेकिन पिछले कुछ सालों से दिल्ली में ही रह रही हूँ।
तभी कबीर बीच में टोकता हुआ बोला
कबीर- अरे पापा अमृता को अंदर आने के लिए भी कहोगे या दरवाजे पर यूँ ही खडे खडे उसका पूरा इंटरव्यू ले लोगे।
कबीर की बात सुनकर पापा को अपनी गलती का एहसास हुआ और वो तुरंत बोले
पापा- ओह सॉरी सॉरी बेटा… मैं तुम्हें देखकर इतना एक्साईटेड हो गया कि तुमसे अंदर आकर बैठने के बारे में बोला ही नहीं।
पापा की बात सुनकर मैं मुस्कुराते हुए बोली
अमृता- कोई बात नहीं अंकल
पापा- आओ बेटा अंदर आओ… हम आराम से बैठकर बातें करते हैं….
इतना बोलकर पापा कबीर को देखते हुए बोले
पापा- अरे बेटा कबीर तुम अमृता बिटिया से बातें करो, तब तक मैं तुम लोगों के लिए चाय नाश्ता का इंतजाम करता हूँ
कबीर- अरे नहीं पापा आप बैठकर अमृता से बातें करो… मैं बस 5 मिनट में चेंज करके आया, उसके बाद चाय नाश्ते का इंतजाम भी कर दूँगा।
इतना बोलकर कबीर अपना सामान लेकर अपने रू की तरफ चला गया, जबकी मैं और पापा हॉल में ही सोफे पर जाकर बैठ गए। कुछ देर की खामोशी के बाद पापा ने एक बार फिर से सबाल किया
पापा- बेटा तुम्हारे पापा क्या करते हैं
मैं पहले से ही इन सबालों के लिए तैयार होकर आई थी, इसलिए पापा का सबाल सुनकर मैंने थोडा उदास होते हुए कहा
अमृता- वो असल में अंकल जब मैं छोटी थी, तभी एक कार एक्सीडेंट में मेरे माता पिता की डेथ हो गई थी, मेरी दादी ने ही मुझे पाल पोसकर बडा किया है। लेकिन कुछ सालों हमारा गाँव लैंडस्लाईट के कारण पूरी तरह से तबाह हो गया था, जिसमें मेरी दादी की भी डेथ हो गई थी, इसलिए अब मेरी फैमली में बस मेरे अंकल हैं जो आर्मी में मेजर हैं।
पापा- ओह आई एम सॉरी बेटा… मैंने अनजाने में ही तुम्हारे जख्मों को कुरेद दिया है
अमृता- नहीं कोई बात नहीं अंकल… मेरी दादी ने कभी मुझे माता पिता की कमी महसूस नहीं होने दी थी और सच कहूँ तो मुझे तो उनके चेहरे भी याद नहीं है, रही बात दादी की, तो उस घटना को भी अब काफी समय हो गया है। इसलिए मैं उस दुख से भी उबर चुकी हूँ। बैसे भी भगवान ने मुझसे दादी को छीना तो मुझे इतने प्यारे और अच्छे अंकल दे दिए, जो मुझे अपनी सगी बेटी से ज्यादा प्यार करते हैं।
पापा- मैं कुछ समझा नहीं बेटा… क्या तुम्हारे अंकल तुम्हारे साथ नहीं रहते थे
अमृता- वो असल में मेरे जन्म से पहले ही मेरे अंकंल एक मिशन के दौरान गलती से बार्डर पार करके दुशमन देश पहुँच गए थे, जहाँ उन्हें कैद कर लिया गया था, अंकल कई सालों तक दुशमनों की कैद में रहे। उस दौरान आर्मी बालों ने हमारे घर पर बताया था कि मेरे अंकल दुशमनों से लडते वक्त शहीद हो गए हैं। इसलिए हम लोगों को उनके जिंदा होने के बारे में कुछ भी पता नहीं था, कुछ सालों तक दुशमनों की कैद में रहने के बाद मेरे अंकल अपने कुछ साथियों के साथ दुशमनोें की कैद से भाग कर बापिस आ गए, लेकिन जब वो घर बापिस आऐ तो उन्हें पता चला कि एक कार एक्सीडेंट में उनका पूरा परिवार मारा जा चुका है, जबकि उस एक्सीडेंट में मैं और मेरी दादी जिंदा बच गए थे। अपने दोनों बेटों को खोने के बाद दादी हमारे पुराने घर में रहना नहीं चाहती थीं, इसलिए वो मुझे लेकर एक छोटे से गाँव में चली गईं, जहाँ उन्होंने मेरी परवरिस की थी। वहीं दूसरी तरफ मेरे अंकल को भी यही लगता था कि उनका पूरा परिवार मारा जा चुका है। इसलिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश के नाम कर दी और कभी भी शादी नहीं की। लेकिन कुछ सालों पहले किश्मत ने हम दोनों को मिला दिया। तब से अंकल मुझे ही अपनी बेटी समझकर मुझे प्यार करते हैं।
पापा को अपने बारे में सब कुछ बताने के बाद मैं मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देखने लगी।
कहानी जारी है......