Ek Duje ke Vaaste.. - Page 7 - SexBaba
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Ek Duje ke Vaaste..

तू जो पास हो

तेरी आँखों में जो देखूँ, तो दिल बहक जाता है,

जैसे चाँदनी में कोई, सागर मचल जाता है।

तेरी हँसी की वो खुशबू, जो दिल में बसती है,

हर सांस में तेरा नाम, जैसे धड़कन कहती है।

तेरी बाहों की गर्मी में, ये सर्द रातें भी पिघलती हैं,

तेरी धड़कनों की धुन पे, मेरी धड़कनें भी मचलती हैं।

तू जो पास हो, तो हर शाम गुलाबी लगती है,

वरना ये दुनिया भी मुझे वीरान सी लगती है।

#AdirshiWrites :writing:
 
अपडेट 51

एकांश के मुह से अपने लिए I love you सुन अक्षिता का मन भर आया था, वो बहुत समय से यही शब्द एकांश मुह से सुनना चाहती थी और आज एकांश ने वो कह दिए थे और अब वो एकांश को क्या कहर उसे सूझ नहीं रहा था वो बस अपलक उसे देखे जा रही थी और एकांश के समझ नहीं आ रहा था के अब क्या हुआ अक्षिता कुछ बोल क्यू नहीं रही

"अक्षिता, क्या हुआ?" एकांश ने चिंतित होकर पूछा

"तुमने अभी अभी क्या कहा?" अक्षिता ने आँखों मे पनि लिए मुसकुराते हुए उससे पूछा

एकांश अक्षिता की बात का मतलब समझ गया था और यही ऐसी ही कुछ फीलिंग उसके मन मे भी थी

"मैंने कहा मैं तुमसे प्यार करता हूँ" एकांश ने अक्षिता के गालों को सहलाते हुए मुस्कुराते हुए कहा

"I love you too अंश.... मैं भी तुमसे बहुत प्यार करती हूँ" उसने रोते हुए कहा

अक्षिता ने भी वो कह दिया था जिसे सुनने के लिए एकांश के कान तरस रहे थे

"आई लव यू... आई लव यू... आई लव यू... आई लव यू... आई लव यू...." अक्षिता बस शब्द दोहरा रही थी और एकांश ने उसे गले लगा लिया था

"शशशश...... सब ठीक है अक्षिता, रोना बंद करो चलो" एकांश ने कहा

"नहीं! तुम नहीं जानते कि मेरे लिए उन शब्दों का क्या मोल है, मैं तो उसी दिन मर गई थी जब मैंने तुमसे कहा था कि मैं तुमसे प्यार नहीं करती, तुम्हारे चेहरे पर दिख रही उस चोट ने मुझे मार डाला था अंश..... उसने मुझे तोड़ के रख दिया है" अक्षिता रो पड़ी थी उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे

"मैंने तुम्हारे साथ जो किया था, वो मुझे आज भी हर रात जब आँखें बंद करती हु तो तकलीफ देता है, मैंने तुम्हें जो दर्द दिया वो मेरे लिए भी किसी मौत से ज़्यादा दर्दनाक था अंश, मुझे उस दिन तुम्हारा दिल इतनी बेरहमी से तोड़ने के लिए आज भी बहुत अफसोस है, लेकिन मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि तुम मेरे साथ रहकर अपनी ज़िंदगी बर्बाद करो" अक्षिता ने अपनी लाल नम आँखों से एकांश को देखते हुए कहा और अक्षिता को वैसे देख एकांश के दिल मे भी टीस उठ रही थी

"मैंने हमेशा तुमसे प्यार किया है अंश, हमेशा और मेरा प्यार तुम्हारे लिए काभी कम नहीं होगा” अक्षिता ने मुसकुराते हुए कहा और एकांश ने भी मुसकुराते हुए उसके माथे को चूम लिया

"अक्षिता, तुम्हें दुखी होने की इस बारे मे परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है, मैं समझता हूँ कि तुमने जो कुछ भी किया, वो मेरे लिए था, लेकिन मैं तुम्हें एक बात साफ साफ कहना चाहता हु और वो ये की मेरी खुशी बस तुम्हारे साथ है, मेरी जिंदगी, मेरी खुशी, मेरी भलाई, मेरा सब कुछ तुम हो..... सिर्फ तुम इसलिए प्लीज खुद को दोष देना बंद करो, मैं तुम्हें इस दुनिया की किसी भी चीज़ से ज़्यादा प्यार करता हूँ और मैं तभी खुश रहूँगा जब तुम खुश रहोगी" एकांश ने पूरी बात सीधे अक्षिता की आँखों में देखते हुए कही

"मैंने जरूर जिंदगी मे कुछ अच्छा काम किया होगा जो तुम मेरी जिंदगी मे आए" अक्षिता ने एकांश को देखते हुए धीमे से कहा और एकांश बस उसे देख मुस्कुराया

"मैं एक और बात कहना चाहता हूँ, उस दिन जो कुछ हुआ उसके बाद, मैं पूरी तरह बदल गया था लेकिन तुम्हारे लिए मेरा प्यार कभी कम नहीं हो पाया, हालाँकि मुझे लगता था कि मैं तुमसे नफरत करता हूँ लेकिन अंदर से मैं जानता था कि मैं तुमसे कभी नफरत कर ही नहीं सकता था और मैंने भी तुमसे प्यार करना कभी नहीं छोड़ा" कुछ देर तक दोनों एकदूजे को गले लगाये वैसे ही खड़े रहे और कुछ समय बाद

"मेरे खयाल से अब हामे चलना चाहिए" अक्षिता ने टाइम देखते हुए कहा जिसके बाद दोनों एकांश के पेरेंट्स से विदा लेकर वहा से निकल गए

******

अगले दिन सुबह, सभी लोग अस्पताल जाने के लिए तैयार हो गए थे अक्षिता के पेरेंट्स परेशान थे, जबकि एकांश अपनी भावनाएँ जाहिर नहीं होने दे रहा था और अक्षिता हर समय बस मुस्कुरा रही थी

उन्होंने सभी जरूरी चीजें पैक कर लीं थी और बस जाने के लिए रेडी थे

"कोई तुमसे मिलने आया है" एकांश अक्षिता के कमरे में आते हुए बोला

"कौन?"

"तुम खुद जाकर देख लो" एकांश ने कहा और कंधे उचकाते हुए कमरे से बाहर चला गया अब अक्षिता को भी जनन था के कौन आया था और ये देखने वो बाहर आई तो खुश होकर चिल्लाई

" रोहन! स्वरा!"

अक्षिता लिविंग रूम में अपने सबसे अच्छे दोस्तों को देखकर खुशी से बोली, उन्होंने भी अक्षिता को कस कर गले लगाया और उससे उसका हाल चाल जाना

"तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो?" अक्षिता ने उन दोनों से पूछा

"हम बस तुमसे मिलने आये हैं" रोहन ने कहा

"तो क्या तुम्हारा बॉस तुम लोगों पर छुट्टी लेने पर नाराज नहीं होगा, वो bhi tab जब वो खुद ऑफिस मे ना हो?" अक्षिता ने एकांश की ओर देखते हुए उसे चिढ़ाते हुए पूछा, जो उसकी बातों पर हंस पड़ा

"हमारे बॉस को कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि हमारे बॉस ने ही इस सप्राइज़ का प्लान बनाया था" स्वरा ने मुस्कुराते हुए कहा जिससे अक्षिता एकांश की ओर देखने लगी

"ये अपना मुंह बंद नहीं रख सकती ना?" एकांश ने स्वरा की ओर घूरते हुए कहा रोहन से पूछा

"ये तो दिक्कत है" रोहन ने भी अपना सिर हिलाते हुए जवाब दिया और अब स्वरा रोहन को घूर रही थी

"अब क्या तुम दोनों रुककर बताओगे कि तुम यहाँ किस लिए आये हो?" एकांश ने झुंझलाकर कहा

"हाँ" रोहन और स्वरा ने एक दूसरे की ओर देखा

वो दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़कर अक्षिता की ओर मुड़े जो उन्हें उत्सुकता से देख रही थी

"we are together" उन्होंने मुस्कुराते हुए एकसाथ कहा

अक्षिता बस हैरान होकर उन्हे देख रही थी, उसने पहले उन दोनों की तरफ देखा, फिर उनके हाथों की ओर और फिर वापिस उनकी तरफ

"oh my god! Oh my god! Oh my god!" अक्षिता ने उन दोनों को गले लगाते हुए कहा खुशी से चिल्लाते हुए कहा

"मैं तुम दोनों के लिए बहुत खुश हूँ" अक्षिता उन दोनों को देखकर मुस्कुराई

"तुम्हें पता है मैं हमेशा से चाहती थी कि तुम दोनों एक साथ रहो, कपल वाली वाइब तो थी तुममे" अक्षिता ने खुश होकर कहा बदले मे रोहन बस मुस्कुराया और स्वरा वापिस अक्षिता को गले लगा लिया

"एक सप्राइज़ अभी और बाकी है" एकांश ने अक्षिता से कहा

"क्या?"

"जानती हो अमर अभी कहाँ है?" एकांश ने पूछा

"नहीं." अक्षिता ने सोचते हुए कहा

"सो रहा होगा अपने घर पर" स्वरा ने धीमे से कहा जिसे सबने सुना जिसपर अक्षिता हँस पड़ी

"वो अभी पेरिस में है" एकांश ने कहा

"क्या? वो वहा कब गया?" अक्षिता ने पूछा

"कल ही...... वो वहाँ गया था क्योंकि श्रेया भी वही है" एकांश ने कहा

और जैसे ही अक्षिता ने ये सुना उसका चेहरा 1000 वाट के बल्ब की तरह चमक उठा

"उसने मुझे तुम्हें थैंक्स कहने के लिए कहा है , तुम्हारी वजह से ही उसे उम्मीद थी और तुम्हारी वजह से ही उसे अपनी फीलिंगस को व्यक्त करने का हौसला मिला था, वो न सिर्फ श्रेया के इम्पॉर्टन्ट दिन पर उसके साथ रहने के लिए गया है, बल्कि अपनी फीलिंगस को इसे बताने गया है" एकांश ने कहा जिसे सुन अक्षिता एकदम खुश हो गई थी

"टाइम ज़ोन की वजह से वो तुम्हें कॉल नहीं कर सका, लेकिन उसने कहा है कि वो जल्द से जल्द तुम्हें कॉल करेगा और उसने तुम्हें अपना ख्याल रखने के लिए कहा है" एकांश ने अपनी बात पूरी की

अक्षिता ये जानकर बहुत खुश हुई कि अमर ने अपने प्यार की ओर पहला कदम बढ़ा दिया था और उसे उम्मीद थी कि उसे उसका प्यार मिल जाएगा

"आज मैं बहुत खुश हूँ" अक्षिता ने वहा मौजूद सब की तरफ देखते हुए कहा

उसके माता-पिता खुश थे क्योंकि उनकी बेटी खुश थी और उसे ऐसे अच्छे दोस्त मिले थे, उन्होंने एकांश को देखा और सोचा कि वो भले मुस्कुरा रहा है लेकिन अंदर ही अंदर वो डर भी रहा था, अक्षिता के मा पापा को दुनिया के इस अंधेरे मे एकांश रोशनी की किरण नजर आ रहा था

जब उन्हें लगा था कि कुछ नहीं हो सकता, तब उन्हें एक उम्मीद मिली और वो था एकांश

जब उन्हें कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा था तो एकांश की वजह से उन्हें रास्ता मिला था

जब उनके पास आंसू और दर्द के अलावा कुछ नहीं बचा था तो एकांश की वजह से उन्हें खुशी और मुस्कान मिली थी

जब उन्होंने अपनी बेटी को बचाने के लिए भगवान से प्रार्थना की, तो उनके पास एक देवदूत भेजा गया और वो था एकांश

अपने देवदूत को देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने भगवान से उसकी रक्षा करने की प्रार्थना की

******

अक्षिता को जब हॉस्पिटल मे ऐड्मिट किया तब वो सभी लोग साथ मे थे

अक्षिता ने उस कमरे को देखा जिसमें उसे ऐड्मिट कराया गया था जो बहुत बड़ा और आराम दायक था और कीसी भी तरीके से अस्पताल या पैशन्ट के रूम जैसा नहीं लग रहा था, वहाँ एक बड़ा एलईडी टीवी, शानदार पर्दे, ए/सी, बुक शेल्फ और अक्षिता की सभी ज़रूरतों के सामान के साथ एक रैक थी और उसके लिए फल और नाश्ते के लिए एक साइड टेबल भी थी

अक्षिता ने उस कमरे को देख अपने मा पापा को देखा जिन्होंने कुछ नहीं कहा और बस कंधे उचकाकर वहा से चले गए और कुछ ही देर मे रोहन और स्वरा भी ऑफिस के लिए निकल गए थे

अक्षिता झल्लाकर बेड पर बैठ गई जो कीसी भी तरह से हॉस्पिटल के बेड जैसा नहीं था और तभी एकांश अंदर आया और उसने अक्षिता की तरफ देखा तक नहीं, वो कमरे में मौजूद हर चीज़ का निरीक्षण कर रहा था उसने पूरे कमरे को बहुत ध्यान से देखा कि सब कुछ सही से मौजूद है या नहीं

"अंश?" अक्षिता ने उसे पुकारा

"हा अक्षिता, ये रूम ठीक है ना? या मैं कोई दूसरा रूम बुक करूँ? मुझे लगता है कि यहाँ कुछ कमी है" एकांश ने इधर-उधर देखते हुए पूछा

"अंश?" इसबार अक्षिता ने और सख्ती से उसे आवाज दी

"हा." और आबकी बार एकांश ने उसकी ओर देखा

"ये हॉस्पिटल है अंश, तुम्हें हॉस्पिटल के रूम को होटल सुइट रूम में नहीं बदलना चाहिए था" अक्षिता ने सीरीअस टोन मे कहा

"सुइट रूम? ये कमरा किसी भी तरह से सुइट रूम जैसा नहीं है, मैं बस ये देख रहा हूँ कि जब तक तुम यहा ऐड्मिट हो तुम्हें कोई परेशानी न हो, मैं नहीं चाहता कि यहाँ धूल का एक कतरा भी घुस आए और मैं नहीं चाहता कि तुम्हें ऐसा लगे कि तुम एक पैशन्ट हो और हॉस्पिटल के कमरे में फसी हुई हो" एकांश ने कहा और अक्षिता बस उसे घूरती रही

"मुझे लगता है कि यहा कुछ और कुशन की जरूरत है और थोड़े खाने की भी" एकांश टेबल और बेड को देखने हुए कहा और तभी

"हेलो अक्षिता!" डॉक्टर ने अंदर आते हुए कहा, जिससे एकांश और अक्षिता दोनों डॉक्टर को देखने लगे, डॉक्टर ने चारों ओर कमरे मे नजर घुमा कर देखा और फ़र एकांश को घूरने लगे वही एकांश उनसे नजरे नहीं मिला रहा था

"डॉक्टर, आपने इसे कमरे मे ये सब चेंजेस करने की पर्मिशन कैसे दे दी? ये तो हॉस्पिटल के रुल्स के खिलाफ होगा न?" अक्षिता ने डॉक्टर से सवाल किया

"हाँ रूल के खिलाफ तो है, लेकिन कोई नियम तोड़ने पर ही तुला हुआ है तो क्या करे" डॉक्टर ने अब भी एकांश को देखते हुए कहा और अब अक्षिता भी सू घूरने लगी थी और एकांश बस अक्षिता को देख मुस्कुरा रहा था

"खैर अक्षिता तुम्हारे टेस्टस का टाइम हो गया है, चलो" डॉक्टर ने कमरे से बाहर जाते हुए कहा और अक्षिता भी बगैर एकांश की ओर देखा डॉक्टर के पीछे चलीगई और एकांश जो अकसजित से बात करना चाहता था वही रुक गया

कई टेस्टस के बाद, डॉक्टर ने अक्षिता को कुछ निर्देश और दवा देकर वो रूम से चले गए, अब वहा एकांश और अक्षिता ही थे

"अक्षिता यार! बात तो करो प्लीज" एकांश ने अक्षिता से कहा

"अंश, तुम्हें ये सब नहीं करना चाहिए था" अक्षिता ने एकांश की आँखों मे देखते हुए कहा

" क्यों?"

"क्या क्यों? इन सब चीजों की क्या जरूरत है बताओ मुझे?" अक्षिता ने कहा

"अरे बिल्कुल जरूरत है, इस कमरे में जो बेड पहले था वो बहुत गंदा था और मैं ये सोचना भी नहीं चाहता कि कितने लोगों ने उसका इस्तमाल किया होगा, इसलिए मैंने उसे बदल दिया, ये बुक्शेल्फ तुम्हारे लिए है ताकि जब तुम बोर हो जाओ और तुम्हारे दिमाग मे उलटे सीधे खयाल आए तो कितबे पढ़ के उस खयालों को दूर कर सकरों, इस टेबल पर सभी फ्रूइट्स हैं जो तुम्हारी सहब के लिए अच्छे है और मैंने नर्स से तुम्हें टाइम टाइम पर जूस देने भी कह दिया है" एकांश ने कहा और अक्षिता बस उसकी बात सुनती रही

"मैं चाहता हूँ कि तुम आराम से रहो, किसी थाके हुए डिप्रेस पैशन्ट की तरह नहीं, जानती हो पहले ये कमरा कैसा था? कमरे को देखकर ही लोग बीमार हो जाते.... किसी और बीमारी की ज़रूरत ही नहीं थी, मैं नहीं चाहता कि तुम इतने डिप्रेस महसूस करो, मैं नहीं चाहता कि तुम ज़बरदस्ती यह रहो, मैं तुम्हें घर जैसा महसूस कराना चाहता था, इसीलिए मैंने ये सारे बदलाव किए हैं" एकांश ने सीरीअस टोन मे कहा

अक्षिता धीरे-धीरे एकांश के पास आई और उसने अपने हाथों मे एकांश के चेहरे को थामा, वो उसकी ओर झुकी हुई, प्यार भरी निगाहों से उसे देख रही थी, उसका दिल जोरों से धडक रहा था और उसने हल्के से एकांश होठों को चूम लिया और उसे देख मुस्कुराई वही एकांश उस हल्की सी किस से ही थोड़ा शॉक मे था

और इधर अक्षिता अपने बेड पर जाकर बुक पढ़ने लगी जैसे कुछ हुआ ही न हो, एकांश का फोन बजने पर वो अपनी तंद्री से बाहर आया और फोन उठाने के लिए बाहर चला गया वही अक्षिता उसके इक्स्प्रेशन देख मुस्कुरा रही थी

एकांश ने जर्मनी में डॉक्टर से बात की, जिन्होंने उसे बताया कि वो कुछ ज़रूरी सर्जरी निपटाने के बाद दो दिन में भारत आ जाएगा, एकांश ये सुन काफी खुश था क्योंकि अब उसे कुछ उम्मीद दिख रही थी

रात को एकांश ने अक्षिता के माता-पिता को आराम करने के लिए घर भेज दिया ये कहकर वो रात को वो अक्षिता के पास रुक जाएगा

एकांश जब वापिस रूम मे आया तो उसने देखा के अक्षिता बेड पर बैठी सामने की दीवार को घूर रही थी, अक्षिता को यू देख एकांश का गला भर आया था लेकिन उसने अपने आप को संभाला और बेड की ओर चल पड़ा

उसने अपना गला साफ़ किया ताकि आवाज हो लेकिन अक्षिता ने उसे नोटिस नहीं किया फिर एकांश ने झुककर अक्षिता के गाल पर चूमा जिससे अक्षिता एकदम से चौकी और झटके से अपनी जगह से उठ खडी हुई

"एकांश! तुमने तो डरा ही दिया" अक्षिता ने चिल्लाते हुए कहा वही एकांश उसे यू देख हस रहा था

"तुम तो तब हल्का स किस देकर चली गई थी लेकिन मैं ये मौका कैसे छोड़ता.... I want more" एकांश ने कहा

"क्या!"

"I want more" एकांश ने अक्षिता के होंठों की ओर झुकते हुए कहा

"तुम बेशर्म हो, ये हॉस्पिटल है और कोई भी कभी भी यहाँ आ सकता है" अक्षिता ने एकांश को अपने से दूर हटाते हुए कहा और ठीक उसी वाक्य एक नर्स वहा आ गई और टेबल पर खाना रख चली गई

“ये क्या है? ये आधा उबला हुआ खाना मैं नहीं खाने वाली" अक्षिता ने खाने की तरफ मुंह बनाते हुए कहा

"लेकिन यही तुम्हारे लिए अभी सबसे बेस्ट है अक्षिता" एकांश ने कहना अक्षिता के पास लाते हुए कहा

"नहीं! मैं इसे नहीं खाऊँगी।" अक्षिता ने प्लेट दूर धकेलते हुए कहा

"अक्षिता प्लीज...."

"ठीक है." आखिर मे अक्षिता ने एकांश के आगे हार मानते हुए कहा और एकांश ने भी दूसरी प्लेट ली और उसके साथ ही खाना शुरू कर दिया

"तुम क्या कर रहे हो? तुम ये खाना क्यू खा रहे हो?" अक्षिता ने एकांश के हाथ से प्लेट लेते हुए कहा

"बस खाना खा रहा हु यार और मैं क्या खा रहा हूँ इससे कोई फर्क नहीं पड़ता जब तक वो तुम्हारे साथ है" एकांश ने मुस्कुराते हुए कहा

"नहीं, पैशन्ट मैं हु और मैं अपनी वजह से तुम्हें ऐसा खाना नहीं खाने दूँगी"

"मुझे बहुत भूख लगी है और रात भी हो चुकी है, और मैं अभी बाहर नहीं जाने वाला साथ मे कहा लेते है ना अक्षु" और इस बार अक्षिता ने एकांश की बात मान ली

उन्होंने बातें करते हुए और हंसते हुए खाना खत्म किया और फिर अक्षिता ने अपनी दवा ले ली और अब उसके सोने का समय हो गया था, एकांश ने अपना फोन कॉल खत्म करके टेबल पर रख दिया और देखा कि अक्षिता बुक पढ़ रही थी

"तुम्हें अब सो जाना चाहिए" एकांश ने अक्षिता के हाथ से बुक लेटे हुए कहा

"मैंने कोशिश की लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही है" अक्षिता ने कहा

"पहले तुम बेड पर पीठ टिका लो, नींद अपने आप आ जाएगी" ये कहकर एकांश ने अक्षिता को बेड पर लेटाया

"तुम कहाँ जा रहे हो?" एकांश जब जाने के लिए मुड़ा तो अक्षिता ने उसका हाथ पकड़ कर पूछा

"मैं सोफे पर सोऊँगा" एकांश ने कहा

“तुम यह बेड पर ही सो सकते हो" अक्षिता ने कहा

"नहीं, तुम्हें आराम से सोना चाहिए और मैं सोफे पर सो सकता हूँ कोई प्रॉब्लेम नहीं है" एकांश ने अक्षिता को समझाते हुए कहा

"अंश, मैं चाहती हूँ कि तुम यहा मुझे गले लगा कर मेरे बगल में सोओ" अक्षिता ने कहा और उसके इतना कहने के बाद एकांश उसे मना नहीं कर पाया

" ठीक है" ये कहकर एकांश वही अक्षिता के बगल मे बेड पर लेट गया और अक्षिता उससे चिपककर उसके सिने पर सर रखे सो गई

"गुड नाइट" एकांश ने अक्षिता के माथे को चूमते हुए कहा

"गुड नाइट"

सोने की कोशिश दोनों कर रहे थे लेकिन नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी

"अंश?"

" हम्म?"

"चाहे कुछ भी हो जाए, हमेशा याद रखना कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ, और हमेशा अकरती रहूँगी, चाहे मैं रहु ना रहु" इतना कहकर अक्षिता सो गई

"मैं भी तुमसे प्यार बहुत करता हूँ अक्षिता.... and I promise you तुम्हें कुछ नहीं होगा" एकांश ने बंद आँको के साथ कहा और उसकी बंद बालकों से आँसू की एक बंद झलक पड़ी....

क्रमश:
 
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जो चेक थी आउट
 
अपडेट 52

एकांश इस वक्त अक्षिता के कमरे के बाहर खड़ा था और उसके दिमाग़ में बस एक ही चीज़ चल रही थी… जल्दी से जल्दी डॉक्टर जर्मनी से इंडिया आ जाए... उसने पहले ही डॉक्टर के लिए गाड़ी अरेंज कर दी थी, ताकि डॉक्टर एयरपोर्ट से बिना किसी देरी के सीधा हॉस्पिटल आ सकें,

एकांश अक्षिता के कमरे के बाहर खड़ा था और उसने कांच के दरवाज़े से अंदर झांका तो देखा, अक्षिता गहरी नींद में थी, उसका चेहरा और भी ज़्यादा कमजोर लग रहा था, जैसे पिछले कुछ दिनों में उसकी हालत और बिगड़ गई हो.. एकांश का दिल कसक उठा... उसे अक्षिता को बचाना था… किसी भी हाल में... इससे पहले कि बहुत देर हो जाए..

उन्हे हॉस्पिटल मे आए दो दिन हो चुके थे, हर ज़रूरी टेस्ट करवाया जा चुका था, हर रिपोर्ट चेक की जा रही थी, लेकिन ये कहना कि एकांश टेंशन में था, बहुत हल्का होगा वो अंदर से बिल्कुल टूटा हुआ था... उसे लग रहा था जैसे सबकुछ उसके हाथ से निकलता जा रहा हो और वो चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा…

पर अक्षिता... उसे अपने लिए कोई डर नहीं था, उसे बस अपने मम्मी-पापा और एकांश की फिक्र थी अगर उसे कुछ हो गया, तो ये सब अपने आप को कैसे संभालेंगे?

उसे अच्छी तरह पता था कि एकांश कितना परेशान है, कितना डरा हुआ है... वो उसे बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार था.. पर वो ये भी जानती थी कि कुछ चीज़ें हमारे कंट्रोल में नहीं होतीं.. जो किस्मत मे लिखा होगा वो होकर ही रहेगा...

अक्षिता बस इतना चाहती थी के उसके जाने के बाद उसके मम्मी-पापा और एकांश ज़िंदगी में आगे बढ़ जाएं… वो जानती थी कि ये उनके लिए सबसे मुश्किल काम होगा, लेकिन उन्हें ये करना ही होगा...

अचानक अक्षिता की आंखें खुलीं तो उसने देखा कि एकांश फोन पर किसी से बात कर रहा था.. उसकी आवाज़ तेज़ नहीं थी, लेकिन चेहरे पर टेंशन साफ़-साफ़ दिख रही थी...

अक्षिता ने गहरी सांस ली… वो समझ सकती थी कि ये टेंशन सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी की वजह से थी…

थोड़ी देर बाद, एकांश ने फोन रखा और अंदर आया… उसने देखा कि अक्षिता उसे ही देख रही थी, हल्की सी मुस्कान लिए...

"तुम जाग गई?" एकांश ने थोड़ा रिलैक्स होते हुए पूछा और अक्षिता ने बस हल्के से सिर हिलाया

एकांश उसके पास आया और उसने बेड के किनारे बैठकर उसका हाथ पकड़ लिया...

"डॉक्टर जर्मनी से आ चुके हैं, बस हॉस्पिटल पहुंचने वाले हैं... अब सब ठीक हो जाएगा, वो तुम्हें बिल्कुल ठीक कर देंगे!" उसकी आवाज़ में एक अलग ही भरोसा था...

अक्षिता उसकी आंखों में देखती रही... वो जानती थी कि हालात उतने अच्छे नहीं थे, जितना एकांश सोच रहा था पर उसने हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया, वो उसकी उम्मीद को तोड़ना नहीं चाहती थी..

थोड़ी देर तक वो दोनों बातें करते रहे, कुछ भी… ज़िंदगी की बातें, पुरानी यादें, बेवजह की बातें… जो भी उस पल में उन्हें सुकून दे सके

तभी नर्स ने आकर बताया, "डॉक्टर आ चुके हैं, आपको बुला रहे हैं"

एकांश ने एक गहरी सांस ली और अक्षिता की तरफ़ देखा

"चलो," उसने हल्के से कहा और अक्षिता का हाथ पकड़ा और उसे खड़ा किया, उसके चेहरे पर कुछ बाल आ गए थे, जिन्हें उसने बड़े प्यार से उसके कान के पीछे कर दिया

"अक्षिता, बी स्ट्रॉंग… और उम्मीद मत छोड़ना… कम से कम मेरे लिए तो," एकांश ने अक्षिता के माथे पर हल्का सा किस करते हुए कहा...

अक्षिता ने एकांश को चौंककर देखा, ये कैसे जान गया कि उसके मन में क्या चल रहा था?

उसने उसकी आंखों में झांका और हल्की आवाज़ में बोली, "तुम्हें भी स्ट्रॉन्ग रहना पड़ेगा, अंश… चाहे जो भी हो… कम से कम मेरे और हमारे मम्मी-पापा के लिए"

उसने एकांश का हाथ पकड़कर हल्के से चूमा...

एकांश कुछ नहीं बोल पाया... बस उसकी आंखों में देखता रहा.. अक्षिता की आंख से एक आंसू टपक पड़ा,

"चलो," उसने धीरे से कहा और दोनों डॉक्टर के केबिन की तरफ़ चल पड़े...

जब वे अंदर पहुंचे, तो देखा कि डॉक्टर टेस्ट रिपोर्ट्स देख रहे थे... उन्होंने नज़र उठाकर उन्हें देखा और बैठने का इशारा किया...

"हैलो मिस्टर रघुवंशी! गुड टु सी यू अगैन एण्ड यू मस्ट बी मिस अक्षिता, राइट?" डॉक्टर ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा...

अक्षिता ने धीरे से सिर हिला दिया..

"ओह, nice to meet you! I am Dr. Heinrich Fischer," उन्होंने मुस्कुराते हुए अपना हाथ बढ़ाया और अक्षिता ने भी हल्की मुस्कान के साथ हाथ मिलाया...

"See, I’ve already met your concerned doctor here and Dr. Awasthi explained me about your case and reports too, Now the thing is I want to discuss this case with you… only you” उन्होंने रिपोर्ट्स पर नज़र डालते हुए कहा

अक्षिता ने हल्के से हा मे सिर हिला दिया और एकांश की तरफ देखा

एकांश ने एक हल्की मुस्कान के साथ उसे देखा, लेकिन अक्षिता जानती थी कि वो सिर्फ़ अपनी टेंशन छुपा रहा था... फिर बिना कुछ कहे एकांश उठकर कमरे से बाहर चला गया और बाहर आकर उसने देखा कि अक्षिता के मम्मी-पापा वहीं बाहर वेटिंग एरिया में बैठे थे, टेंशन में एक-दूसरे को देख रहे थे...

अंदर, डॉक्टर ने अक्षिता से उसकी तबीयत और लक्षणों के बारे में कई सवाल पूछे और अक्षिता ने हर सवाल का जवाब दिया, और डॉक्टर ने सारी डिटेल्स नोट कर लीं.. कुछ देर बाद, अक्षिता बाहर आ गई और डॉक्टर ने एकांश और उसके मम्मी-पापा को अंदर बुला लिया...

डॉ.फिशर ने गहरी सांस ली और बोले, "मुझे पता है कि आप सब बहुत टेंशन में हैं और सच कहूं तो, अक्षिता जैसी स्ट्रॉन्ग पैशन्ट मैंने बहुत कम देखी है.. उसने अब तक हर मुश्किल को मुस्कुराकर फेस किया है, और ये कोई छोटी बात नहीं है"

वो कुछ सेकंड के लिए रुके और अक्षिता के मम्मी-पापा की तरफ देखा, जिन्होंने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया, लेकिन उनकी आंखों में गहरी चिंता साफ़ झलक रही थी..

फिर डॉक्टर ने हल्के से गर्दन झुकाई और बोले, "लेकिन... मुझे आपको ये बताना पड़ेगा कि अभी मैं सर्जरी नहीं कर सकता....”

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया

"क्यों?" एकांश का दिल एकदम तेज़ धड़कने लगा

"क्योंकि ट्यूमर अब उस स्टेज पर पहुंच चुका है, जहां उसे हटाना बहुत ज्यादा रिस्की हो गया है.... अगर अभी सर्जरी की, तो..." डॉक्टर ने गहरी सांस ली, "...उसके बचने के चांसेज बहुत कम होंगे..."

एकांश को लगा जैसे किसी ने उसका दिल मुट्ठी में जकड़ लिया हो…

"क्या?" वो लगभग चिल्ला पड़ा

डॉक्टर ने गंभीर लहजे में कहा, "मिस्टर रघुवंशी, अभी सर्जरी करना बहुत खतरे से भरा होगा और हम ये रिस्क नहीं ले सकते"

"तो फिर हमें क्या करना चाहिए?" एकांश की आवाज़ अब गुस्से और बेबसी से भरी थी, "बस बैठकर देखते रहें? इंतज़ार करें कि वो..." वो बोलते-बोलते रुक गया, लेकिन उसकी आंखों में आंसू छलक आए

"एकांश बेटा..." अक्षिता की माँ ने धीरे से उसे शांत करने की कोशिश की

लेकिन एकांश ने उनकी बात सुनी ही नहीं... उसका दिमाग़ एक ही बात पर अटक गया था..."सर्जरी नहीं हो सकती"

"आप जर्मनी से सिर्फ़ ये बताने आए हैं कि कुछ नहीं हो सकता?" उसने रोते हुए डॉक्टर को घूरा

डॉ.फिशर ने उसकी आंखों में देखा और कहा, "मुझे पता है कि ये सुनना कितना मुश्किल है, लेकिन प्लीज़, सिचुएशन को समझने की कोशिश कीजिए"

"नहीं! आप समझ ही नहीं सकते!" एकांश का धैर्य अब जवाब दे चुका था

उसकी आवाज़ कांप रही थी, सांसें तेज़ हो गई थीं, और गुस्से से उसकी आंखें लाल पड़ गई थीं

"आपको पता है कैसा लगता है, जब पता चले कि जिसे तुम सबसे ज्यादा प्यार करते हो, वो तुम्हारी आंखों के सामने... धीरे-धीरे मौत के करीब जा रहा है, और तुम कुछ नहीं कर सकते?"

"क्या तुम समझ सकते हो कि हर दिन उसे और ज़्यादा कमजोर होते देखना कैसा लगता है?"

"क्या तुम जान सकते हो कि रात को सोते हुए हर पल ये डर लगा रहता है कि सुबह उठूंगा, तो वो शायद मेरे साथ न हो?"

"क्या तुम्हें अंदाज़ा भी है कि जब तुम्हारे पास दुनिया की हर चीज़ हो, लेकिन तुम उस इंसान को बचा न सको जिससे तुम सबसे ज्यादा प्यार करते हो तो वो दर्द कैसा होता है?"

एकांश की आवाज़ पूरी तरह टूट चुकी थी

आखिर में उसकी टांगों ने जवाब दे दिया और वो वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा

उसके आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे

अक्षिता के मम्मी-पापा ने जब एकांश को इस हालत में देखा तो दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रो पड़े… उनका अकेला सहारा पहले ही तकलीफ़ में था और अब एकांश की ये हालत देखना उनके लिए और भी दर्दनाक था..

डॉ. अवस्थी की आंखें भी भर आई थीं, और डॉ. फिशर के लिए भी ये सब देखना आसान नहीं था

अक्षिता की माँ घुटनों के बल बैठ गई और रोते हुए एकांश को गले से लगा लिया.. उन्होंने धीरे-धीरे उसकी पीठ सहलाई, जैसे कह रही हो.. "सब ठीक हो जाएगा, बेटा..."

लेकिन एकांश की आवाज़ कांप रही थी, "मुझे नहीं पता... अगर उसे कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगा... मैं उसके बिना नहीं रह सकता माँ"

एकांश अक्षिता की माँ से लिपटकर रो रहा था "मैं उसे बचाना चाहता हूँ... हमारी बस एक ही उम्मीद थी... और अब वो भी नहीं रही..."

अक्षिता की माँ सुन्न हो गई थी उन्हे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो इस बात पर खुश हो कि पहली बार एकांश ने उन्हे 'माँ' कहा... या इस बात पर रोए कि उसने ऐसा दर्द में कहा...

डॉ. फिशर उसके पास आए और हल्के से उसके कंधे पर हाथ रखा

"एकांश... I am sorry..." उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा… "I know की मेरी वजह से तुमने उम्मीद बंद रखी थी but the fact is अभी सर्जरी नहीं हो सकती अगर हमने अभी ऑपरेशन किया, तो उसके बचने के चांसेज़ ना के बराबर होंगे"

एकांश ने धीरे से सिर उठाया, उसकी आंखें अब भी आंसुओं से भरी थीं...

"मैं जर्मनी सिर्फ़ ये कहने नहीं आया था कि कुछ नहीं हो सकता..." डॉक्टर ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, "मैं यहाँ इसलिए आया क्योंकि तुमने मुझे मजबूर कर दिया था... अगर मैं यही बात वहां से कहता, तो तुम मुझ पर यकीन ही नहीं करते, मैंने तुम्हारी आंखों में जो देखा, वो पहले कभी नहीं देखा था... तुम्हारा प्यार, तुम्हारी बेबसी, तुम्हारी उम्मीद... मैं ये सब देखना चाहता था... इसलिए मैं खुद यहां आया, ताकि मैं तुम्हें ठीक से समझा सकूं"

डॉक्टर की बातें सुनकर एकांश का गुस्सा जैसे ठंडा पड़ गया, उसकी आंखों में अब भी आंसू थे, लेकिन इस बार वो दर्द की जगह गहरी सोच में था

उसने धीरे से कहा, "सॉरी डॉक्टर... मुझे आप पर इस तरह चिल्लाना नहीं चाहिए था..." उसकी आवाज़ धीमी थी, जैसे खुद को दोष दे रहा हो

डॉ. फिशर हल्के से मुस्कुराए "कोई बात नहीं, और तुम मुझे हेनरी कह सकते हो"

उन्होंने हाथ बढ़ाया, और इस बार एकांश ने बिना झिझके उसे थाम लिया, उसने गहरी सांस ली और खुद को संभालते हुए उठ खड़ा हुआ

तभी दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई... सभी ने एक साथ उस ओर देखा अक्षिता कमरे मे आ रही थी और उसने कमरे में फैला अजीब सा सन्नाटा और एकांश के लाल पड़े चेहरे को देखा

"अंश?" उसने हल्की आवाज़ में कहा

एकांश ने तुरंत अपनी आंखें पोंछी और थोड़ी दूरी पर खड़ा हो गया, जैसे कुछ हुआ ही ना हो

"माँ, मैंने किसी को चिल्लाते सुना..." उसने हल्की टेंशन के साथ कहा, उसकी नज़र अब भी एकांश पर थी

उससे पहले कि कोई कुछ कहता, उसके पापा ने उसके सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराने की कोशिश की, "कुछ नहीं बेटा हम बस ऐसे ही बात कर रहे थे"

लेकिन अक्षिता को एहसास हो गया था कि कुछ ना कुछ तो ज़रूर हुआ है

अक्षिता ने महसूस किया की कमरे का माहौल अजीब सा था, उसने पहले अपनी माँ-पापा की ओर देखा, फिर एकांश की ओर, जो अब भी उसकी तरफ़ पीठ करके खड़ा था

उसने हल्की आवाज़ में उसे पुकारा, "अंश?"

कोई जवाब नहीं आया

वो दो कदम उसकी तरफ़ बढ़ी और फिर पूछा, "क्या तुम ही चिल्ला रहे थे?"

"नहीं," एकांश ने बस इतना कहा, लेकिन अक्षिता की ओर नहीं देखा

अक्षिता का दिल बैठ गया, उसने उसे फिर धीरे से पुकारा, "अंश?"

इस बार उसने एकांश का कंधा पकड़ा और उसे हल्के से अपनी ओर घुमा दिया और जैसे ही अक्षिता ने उसका चेहरा देखा, वो वहीं सन्न खड़ी रह गई..

एकांश की आंखें लाल थीं... आंसू अब भी उसके गालों पर बहे चले जा रहे थे

"तुम रो रहे थे?" उसने कांपती आवाज़ में पूछा

एकांश ने बिना कुछ कहे बस हल्के से ना सिर हिला दिया पर अक्षिता जानती थी कि वो झूठ बोल रहा है

उसने बाकी सबकी तरफ़ देखा, लेकिन सबके चेहरे पर वही उदासी थी

"क्या हुआ?" उसकी आवाज़ मे डर था

"कुछ नहीं हुआ है अक्षु" उसके पापा ने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उनकी आवाज़ में मजबूरी साफ़ झलक रही थी

अक्षिता ने पलभर के लिए सबकी आंखों में देखा, फिर सीधा डॉ. फिशर की ओर मुड़ी

"डॉक्टर, क्या मैं आपसे अकेले में बात कर सकती हूँ?"

डॉ. फिशर ने तुरंत हा मे सिर हिला दिया, "बिल्कुल"

बाकी लोग समझ गए थे कि अब अक्षिता को सब बताया जाएगा… वो धीरे-धीरे कमरे से बाहर चले गए... एकांश भी चुपचाप निकल गया

कमरे में अब सिर्फ़ अक्षिता और डॉ. फिशर थे

डॉक्टर ने गहरी सांस ली और धीरे-धीरे उसे उसकी हेल्थ कंडीशन के बारे में बताया पर ये सब सुनके अक्षिता के चेहरे पर कोई खास रिएक्शन नहीं आया था

ना डर, ना दुख, ना गुस्सा... कुछ भी नहीं

वो बस खिड़की से बाहर देखती रही, जैसे अब इस बात से उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता हो

फिर उसने एक लंबी सांस ली और बहुत हल्की आवाज़ में बोली, "कोई बात नहीं डॉक्टर... आपको माफ़ी मांगने की ज़रूरत नहीं है... मुझे अपनी हालत पहले से पता था... मैं इसे महसूस कर सकती थी"

उसकी आंखें अब भी बाहर कहीं दूर टिकी थीं,

"मुझे अपनी नहीं… उसकी चिंता है"

डॉक्टर ने उसके चेहरे की ओर देखा, फिर उसकी नजरों का पीछा किया... वो एकांश को देख रही थी... जो बाहर सामने की कुर्सी पर बैठा था, सिर झुकाए, डॉक्टर को समझते देर नहीं लगी... अक्षिता की आंखों में आंसू आ चुके थे, लेकिन उसने उन्हें गिरने नहीं दिया उसकी आवाज़ धीमी थी, पर हर शब्द में दर्द था...

"वो इसे सहन नहीं कर पाएगा... और कोई भी ऐसा नहीं होगा जो उसे संभाल सके..."

अब अक्षिता की आवाज़ कांपने लगी थी, "मुझे डर है कि मेरी मौत के बाद वो अपनी पूरी ज़िंदगी बर्बाद कर देगा..."

वो अब भी एकांश को ही देख रही थी

डॉ. फिशर ने एक बार फिर उसकी आंखों में झांका और उन्हें देख कर वो वही चीज़ महसूस कर सकते थे, जो उन्होंने थोड़ी देर पहले एकांश की आंखों में देखी थी...

प्यार...!

बेइंतेहा, हद से ज़्यादा, हर हद पार कर जाने वाला...

उन्होंने ज़िंदगी में बहुत से पेशेंट देखे थे... बहुत से रिश्ते देखे थे.. लेकिन ऐसा प्यार? जहां दोनों की पूरी दुनिया ही बस एक-दूसरे की सलामती पर टिकी हो? बहुत कम देखने को मिलता है..

अक्षिता ने धीरे से अपनी पलकें झपकाईं और उसकी आंखों से आंसू बह निकले... उसने डॉक्टर की ओर देखा और हल्के से मुस्कुराई

"थैंक यू डॉक्टर... जर्मनी से यहां तक आने के लिए... मेरी जाँच करने के लिए"

डॉक्टर को समझ नहीं आया कि वो इस मुस्कान का जवाब कैसे दें, एक लड़की... जो खुद अपनी मौत से सिर्फ़ कुछ दिन दूर थी, उसके चेहरे पर ये सुकून कहां से आया था? उसे अपनी मौत का कोई डर नहीं था… उसे अपनी ज़िंदगी के खत्म होने की चिंता नहीं थी… जो चीज़ उसे परेशान कर रही थी, वो थी उसके अपनों का दर्द… एकांश का, उसके मम्मी-पापा का…

वो अंदर से कितनी भी तकलीफ़ में हो, लेकिन उसने अपने चेहरे पर वही मुस्कान बनाए रखी थी क्योंकि वो नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से कोई और कमजोर पड़े...

अक्षिता डॉक्टर के केबिन से बाहर निकली और उसने देखा कि उसके मम्मी-पापा कुर्सी पर चुपचाप बैठे थे

"माँ, पापा… आपलोग प्लीज़ मेरी टेंशन मत लो," उसने उनके पास जाते हुए कहा

उन्होंने उसकी ओर देखा, उनकी आँखों में वही चिंता थी, जो हर माँ-बाप की होती है जब उनके बच्चे तकलीफ में होते हैं

"एकांश कहाँ है?" उसने इधर-उधर देखते हुए पूछा।

उसके पापा ने सिर झुकाकर कहा, "वो बाहर गार्डन की ओर गया है"

अक्षिता ने सिर हिलाया और वहां जाने के लिए मुड़ी, वो हॉस्पिटल के बाहर आई और उसने इधर-उधर नज़र दौड़ाई… कुछ ही दूर एकांश खड़ा था, बिलकुल चुप… बस कहीं दूर टकटकी लगाए देख रहा था...

अक्षिता को समझते देर नहीं लगी कि वो क्या सोच रहा है… वो जानती थी।

वो अपने डर से लड़ने की कोशिश कर रहा था… अपने मन में उठ रहे हर नेगेटिव ख़्याल को रोकने की कोशिश कर रहा था

उसने कुछ पल के लिए एकांश को देखा और फिर वापस अंदर चली गई

"शायद उसे अभी अकेले रहने देना बेहतर होगा," अक्षिता ने खुद से कहा

वो अपने कमरे में गई और एक किताब खोल ली, पर पढ़ने का सवाल ही नहीं था उसके दिमाग़ में बस एक ही चीज़ चल रही थी, "अगर मैं चली गई तो अंश कैसे रहेगा?"

थोड़ी देर बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई...

अक्षिता ने सिर उठाया तो देखा, नर्स खाने की ट्रे लेकर आई थी, उसने ट्रे की तरफ़ देखा और फिर हल्की झुंझलाहट के साथ कहा, "अभी नहीं… थोड़ी देर में खा लूंगी"

नर्स कुछ कहने ही वाली थी, लेकिन फिर बिना कुछ बोले वापस चली गई और अक्षिता उठकर खिड़की के पास चली गई, बाहर अंधेरा हो रहा था… हल्की ठंडी हवा चल रही थी, पर वो इन सब चीज़ों को नोटिस ही नहीं कर रही थी, वो सिर्फ़ खोई हुई थी... अपने ही ख़्यालों में...

तभी दरवाज़ा खुला और एकांश अंदर आया... अक्षिता अब भी खिड़की के बाहर देख रही थी, लेकिन उसने उसकी आहट पहचान ली थी

एकांश ने कमरे में आते ही सबसे पहले टेबल पर रखी खाने की ट्रे की तरफ़ देखा....

"तुमने खाना नहीं खाया?" उसने हल्की सख्ती से पूछा

अक्षिता ने कोई जवाब नहीं दिया, वो अब भी बाहर देख रही थी

एकांश ने दोबारा कहा, "अक्षिता, तुमने खाना नहीं खाया"

इस बार उसने जवाब दिया, "तुमने भी तो नहीं खाया"

एकांश थोड़ा चौंका, फिर झुंझलाकर बोला, "आओ, तुम खाना खा लो" उसने ट्रे का ढक्कन हटाते हुए कहा

अक्षिता ने उसकी तरफ़ देखा और ठंडी आवाज़ में कहा, "और तुम?"

"मुझे भूख नहीं है।" उसने जवाब दिया और पानी का गिलास भरने लगा

अक्षिता ने एक गहरी सांस ली और धीरे से बोली, "अंश, तुम मेरी कोई हेल्प नहीं कर रहे हो"

एकांश ने उसकी तरफ़ देखा और अपनी भौंहें सिकोड़ीं, "मतलब?"

अक्षिता ने अब कुछ ऐसा कहा जो सीधे उसके दिल में उतर गया, अक्षिता ने एक गहरी सांस ली और हल्की, थकी हुई आवाज़ में बोली,

"अंश, तुम जो कर रहे हो, उससे मुझे कोई राहत नहीं मिल रही है, अगर तुम खुद को ऐसे ही इग्नोर करते रहे, तो मैं कभी सुकून से नहीं रह पाऊँगी"

वो बिस्तर पर बैठ गई और मायूसी से आगे बोली,

"मैं तभी चैन से रह सकती हूँ, जब तुम खुश रहोगे"

कमरे में एकदम साइलेंस छा गया

एकांश के पास कोई जवाब नहीं था वो बस चुप बैठा रहा..

कुछ मिनटों तक दोनों के बीच शांति बनी रही और फिर अचानक, अक्षिता ने उस ख़ामोशी को तोड़ते हुए कहा,

"तुम किस्मत को एक्सेप्ट क्यों नहीं कर लेते, अंश?"

एकांश ने उसकी तरफ़ देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा

"अगर तुम इसे अपना लोगे, तो तुम्हारे लिए आगे बढ़ना आसान हो जाएगा"

बस, इतना सुनना था कि एकांश का सब्र जवाब दे गया

"Shut Up!" एकांश ने अचानक गुस्से मे चिल्लाते हुए कहा

अक्षिता चौंक गई, उसने पहले कभी उसे इतना गुस्से में नहीं देखा था

उसकी आँखों में कुछ था... दर्द, गुस्सा, बेबसी... सब एक साथ

"तुम कह रही हो कि मैं इसे अपना लूं? मैं इसे एक्सेप्ट कर लूं?"

उसकी सांसें तेज़ हो गई थीं उसकी आवाज़ दर्द से भरी हुई थी

"अगर तुम सिर्फ़ एक बार मेरी जगह खड़े होकर देखो… सिर्फ़ एक बार मेरी फीलिंग्स समझने की कोशिश करो, तो तुम्हें खुद ही जवाब मिल जाएगा!"

अक्षिता उसे बस देखती रह गई

"क्या कभी तुम्हें ये ख्याल आया कि शायद… शायद मैं भूलना ही नहीं चाहता?"

अब उसकी आवाज़ हल्की पड़ने लगी थी, लेकिन उसका दर्द और गहरा हो चुका था...

"शायद मैं आगे बढ़ना ही नहीं चाहता?" उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे

"क्योंकि मैं तुमसे इतना प्यार करता हूँ कि मैं कभी भी आगे बढ़ ही नहीं सकता!" वो अपने हाथों से चेहरा छुपा कर रोने लगा था

अक्षिता की भी आँखें भीग गईं थी

"अंश... मैं..." पर उसके पास कोई शब्द नहीं थे, उसने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन वो उस पर इस तरह चिल्लाएगा

"आज डॉक्टर ने जो कहा वो सोच सोच कर मेरी हालत खराब हुए जा रही है, लेकिन यहाँ तुम सिर्फ़ यही सोच रही हो कि मैं आगे बढ़ जाऊं? तुम्हें भूल जाऊं? तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो, अक्षिता? क्या ये इतना आसान है? क्या तुम्हें सच में लगता है कि मेरा प्यार इतना कमजोर है? मैं हार चुका हु अक्षिता! I Failed! I crushed your and your parents hope on me… I failed!! I failed again…"

और इससे आगे एकांश कुछ कहता उससे पहले ही... अगले ही पल, अक्षिता ने एकांश के होंठों पर अपने होंठ रख दिए... एकांश एकदम स्तब्ध रह गया

अक्षिता ने एकांश के चेहरे को अपने हाथों में थाम लिया और उसेने उस एक किस में अपनी सारी भावनाएँ डाल दीं... सारा प्यार, सारा डर, सारी बेचैनी

लेकिन इससे पहले कि एकांश उस किस का रीस्पान्स कर पाता और अक्षिता धीरे से पीछे हट गई

उसने एकांश की आँखों में देखा, "तुमने किसी को निराश नहीं किया, अंश..."

उसकी आवाज़ भले धीमी थी लेकिन उसमें भरोसा था

"तुम ही वो एकमात्र वजह हो, जो मैं अब तक ज़िंदा हूँ… और खुश हूँ"

उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे, लेकिन इस बार... उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान भी थी...

"I Love you, अंश।"

"I love you too, अक्षिता"

उन्होंने एक-दूसरे को कसकर गले लगा लिया.. जैसे दोनों इस पल को हमेशा के लिए रोक लेना चाहते थे… जैसे यह एक आखिरी बार हो सकता था, जब वो एक-दूसरे की गर्माहट को महसूस कर रहे थे…

काफी देर तक वे बस यूँ ही बैठे रहे, बातें करते हुए… पुरानी यादों में खोए हुए… उस ज़िंदगी के बारे में सोचते हुए, जिसे उन्होंने एक-दूसरे के साथ जीने का सपना देखा था…

तभी अचानक, एकांश का फोन बज उठा

उसने देखा, रोहन का कॉल था।

एकांश ने कॉल उठाया, और दूसरी तरफ से रोहन की हड़बड़ाई हुई आवाज़ आई, "भाई, एक अर्जेंट साइन चाहिए एक डील पर, तुम्हें अभी आना होगा"

एकांश ने सीधा मना कर दिया, "मैं अभी नहीं आ सकता रोहन"

रोहन कुछ कहता, इससे पहले ही फोन कट गया

पर तभी, स्वरा का फोन आ गया।

"एकांश प्लीज़! बस 10 मिनट लगेंगे तुम्हें बस एक साइन करना है और वापस चला जाना"

एकांश झुंझलाया... वो अक्षिता को इस हालत में छोड़कर जाना नहीं चाहता था.. पर अक्षिता ने उसका चेहरा पढ़ लिया था.. उसने हल्की मुस्कान के साथ उसका हाथ पकड़ा और कहा, "अंश, जाओ... सिर्फ़ 10 मिनट की तो बात है”

"नहीं, मुझे अच्छा नहीं लग रहा..."

"प्लीज़?" उसने उसकी हथेलियों को हल्के से दबाते हुए कहा

एकांश उसकी आंखों में देखने लगा, वो उसे मना नहीं कर सकता था

उसने गहरी सांस ली, "ठीक है, लेकिन मैं जल्दी वापस आऊंगा"

वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, लेकिन अचानक रुका, उसने पीछे मुड़कर देखा, अक्षिता मुस्कुरा रही थी… वो वापस लौटा, उसके पास बैठा और उसे ज़ोर से गले लगा लिया....

"अभी थोड़ी देर मे वापिस आता हु" उसने अक्षिता का माथा चूमते हुए कहा

अक्षिता ने हल्के से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “बिल्कुल मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी"

उसकी मुस्कान एकांश के दिल में बस गई थी

"बस एक बेमतलब की मीटिंग ख़त्म करनी है और फिर मैं वापस तुम्हारे पास आ जाऊंगा," एकांश ने खुद से कहा और हॉस्पिटल से निकल गया

इधर ऑफिस में, एकांश ने जाली जल्दी मे डील साइन की, किसी ने कुछ कहा भी नहीं था कि वो सीधा वापिस हॉस्पिटल के लिए निकल गया.. बिना किसी से बात किए, बिना एक मिनट रुके

उसे बस हॉस्पिटल वापस जाना था

जब वो हॉस्पिटल पहुंचा, तो उसने कार पार्क की और सीधा अक्षिता के रूम की तरफ़ बढ़ा..

लेकिन जैसे ही वो अंदर पहुंचा, रूम खाली था...

अक्षिता वहां नहीं थी....

उसका दिल अचानक ज़ोर से धड़कने लगा

"शायद नर्स उसे कहीं लेकर गई होगी," उसने खुद को समझाने की कोशिश की, उसने तुरंत उसका फोन उठाया और कॉल किया

ट्रिन... ट्रिन...

घंटी कमरे के अंदर ही बज रही थी, उसने पलटकर देखा तो अक्षिता का फोन बिस्तर पर पड़ा था, अब उसकी बेचैनी और बढ़ गई थी...

वो बाहर निकला और सीधा नर्स स्टेशन पर गया.... वहाँ उसने उस नर्स को ढूंढा, जो रोज़ अक्षिता को खाना देने आती थी...

"अक्षिता कहाँ है?" उसकी आवाज़ में एक अलग ही घबराहट थी

नर्स ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा, "वो ऊपर वाले फ्लोर पर है, सर..."

"ऊपर? क्यों?"

लेकिन जवाब सुनने का भी उसके पास वक्त नहीं था, उसने बस नर्स से रूम की डीटेल पूछी और लिफ्ट की ओर लपका, उसका दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि वो अपनी ही धड़कनों को सुन सकता था, लिफ्ट का दरवाज़ा खुला, और उसने बाहर निकलते ही सामने देखा... अक्षिता के पापा, एक कोने में खड़े थे... उनकी आँखें लाल थीं... वो रो रहे थे...

एकांश को लगा जैसे किसी ने उसके पैरों तले ज़मीन खींच ली हो

वो उनके पास भागा, "अंकल... अक्षिता कहाँ है?"

पर उन्होंने कुछ नहीं कहा बस एक नज़र उठाकर उसे देखा... और उनकी आँखों में जो दर्द था, उसने एकांश की रूह को अंदर तक हिला दिया

"अ... अक्षिता ठीक तो है ना?" उसकी आवाज़ अब लड़खड़ा रही थी

उसने पलटकर देखा... अक्षिता की माँ कुर्सी पर बैठी थीं... उनका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था.. वो एकदम सुन्न बैठी थीं, जैसे कुछ महसूस ही नहीं कर पा रही हों एकांश की सांसें तेज़ हो गईं...

"यह सब क्या हो रहा है?"

"मैं जो सोच रहा हूँ, वो सच तो नहीं है?"

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे, कहाँ भागे

उसका गला सूखने लगा था

उसने हिम्मत जुटाई और एक कदम आगे बढ़ाया

"अंकल... प्लीज़ बताइए... अक्षिता कहाँ है?"

"उसका ट्यूमर..."

उसके पिता के लफ्ज़ रुके...

"फट गया..."

और उस एक पल में, एकांश को लगा कि पूरी दुनिया थम गई है... उसका दिमाग़ इसे एक्सेप्ट करने के लिए तैयार ही नहीं था...

"आप मज़ाक कर रहे हो, ना?" उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "जब मैं गया था, तब तो वो ठीक थी... उसने खुद मुझे भेजा था... वो तो हंस रही थी!"

"डॉ. फिशर उसका ऑपरेशन कर रहे हैं," अक्षिता के पिता ने दूसरे कोने में ऑपरेशन थियेटर की ओर इशारा करते हुए कहा...

एकांश ने थियेटर के दरवाज़े की तरफ़ देखा, जहां रेड लाइट जल रही थी

"ये कैसे हुआ?" उसने खुद से ही पूछा, जैसे उसे अब भी भरोसा नहीं हो रहा था

उसके पिता ने गहरी सांस ली और कांपती आवाज़ में बोले,

"डॉ. फिशर उससे बात करने आए थे, वो हमें बता रहे थे कि कल वापस जर्मनी जा रहे हैं... तभी जैसे ही वो कमरे से बाहर जाने लगे, अचानक अक्षिता ने अपना सिर पकड़ लिया और ज़ोर से चीख पड़ी..."

उनकी आँखें भर आईं।

"वो बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी... दर्द इतना तेज़ था कि वो रोने लगी... हम कुछ समझ पाते, इससे पहले ही वो बेहोश हो गई"

एकांश की साँसें तेज़ हो गई थीं

"डॉक्टर ने चेक किया और कहा कि ट्यूमर फट गया है… और अगर तुरंत कुछ नहीं किया गया, तो..."

वो आगे कुछ नहीं कह पाए

"तो..."

"तो वो उसे खो सकते हैं"

एकांश सुन्न पड़ गया

उसकी आँखें अब भी ऑपरेशन थियेटर के दरवाज़े की तरफ़ थीं, लेकिन उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था… उसके कानों में बस एक ही आवाज़ गूंज रही थी—

"ट्यूमर फट गया है।"

उसका पूरा शरीर ठंडा पड़ने लगा था...

उसने धीमे कदमों से ऑपरेशन थियेटर की तरफ़ बढ़ना शुरू किया, जैसे खुद को यकीन दिलाने के लिए कि सब ठीक है...

उसने झांककर अंदर देखने की कोशिश की, लेकिन उसे कुछ भी नहीं दिखा

सिर्फ़ एक लाल लाइट... ऑपरेशन जारी है...

तभी...

उसके दिमाग़ में एक आखिरी बात घूम गई...

वो लम्हा, जब वो उसे छोड़कर गया था...

"मैं जल्दी वापिस आऊँगा"

"और मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी..."

एकांश की आँखों से आँसू बह निकले, पर इस बार ये सिर्फ़ आँसू नहीं थे... ये उसके अंदर का डर था... ये उस अधूरी मोहब्बत का दर्द था, जो अब हमेशा के लिए खोने वाली थी...

क्रमश:
 
अपडेट 53

एकांश एकदम से हड़बड़ा कर उठ बैठा... वो पूरा पसीने से भीगा हुआ था..

उसे आसपास का सब कुछ धुंधला दिख रहा था... शायद उसकी आंखों में आंसू थे इसलिए...

उसने हाथ से अपनी आंखें पोंछीं... और महसूस किया कि ये बस एक सपना था... डरावना, पर सपना ही था...

एकांश ने नीचे देखा तो उसकी गोद मे अक्षिता की तस्वीर रखी थी, मुसकुराते हुए... और वो देखकर उसकी आंखों से फिर से आंसू बह निकले...

लेकिन उसे पता था कि वो हमेशा ऐसे नहीं रह सकता था... उसे आगे बढ़ना होगा... पर कैसे? ये वो खुद नहीं जानता था

वो थोड़ा झुका, और उसने उसकी डायरी उठाई... वही डायरी जिसमें आख़िरी कुछ पन्ने उसने उसके लिए लिखे थे...

"अगर तुम ये पढ़ रहे हो... तो शायद मैं अब तुम्हारे पास नहीं हूं"

"मुझे पता है तुम्हारे लिए ये यकीन करना मुश्किल होगा, लेकिन यही सच है, और शायद तुम सोच रहे हो कि मैंने ये सब क्यों लिखा... तो सिर्फ़ इसलिए, क्योंकि मुझे पता था कि तुम टूट जाओगे"

"मुझे पूरा यकीन है कि तुमने खुद को कमरे में बंद कर लिया होगा... किसी से बात नहीं कर रहे होगे... खाना भी ठीक से नहीं खा रहे होगे... और खुद का ध्यान रखना भी छोड़ दिया होगा"

"इसलिए लिख रही हूं, ताकि तुम्हें लगे कि मैं अब भी तुम्हारे आसपास हूं... तुम्हें देख रही हूं"

"काश मेरे बस में होता तो मैं कभी भी तुम्हें छोड़कर ना जाती... लेकिन किस्मत और टाइम से तो कोई नहीं जीतता ना.. जो होना था, हो गया... लेकिन प्लीज़, खुद को इसके लिए ज़िम्मेदार मत मानो"

"मुझे पता है तुम खुद को कोस रहे हो, लेकिन ये सब तुम्हारी गलती नहीं थी.. मुझे हमेशा से पता था कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, और एक दिन मैं चली जाऊंगी.. प्लीज़, उस चीज़ का बोझ मत उठाओ जो तुम्हारे हाथ में ही नहीं थी"

"सबसे ज़्यादा दुख मुझे इस बात का है कि मैं अब तुम्हारे पास नहीं हूं तुम्हें गले लगाने, तुम्हारे आंसू पोंछने और ये कहने के लिए कि 'सब ठीक हो जाएगा'"

"एकांश, प्लीज़... अपने आप को तकलीफ़ मत दो.. अगर तुम ऐसे दुखी रहोगे तो मेरी रूह कभी चैन नहीं पाएगी"

"मैं समझ सकती हूं कि तुम्हें नहीं पता कि अब कैसे आगे बढ़ना है... लेकिन जो लोग तुम्हें प्यार करते हैं उन्हें और तकलीफ़ मत दो मेरे लिए ऐसे मत रोओ कि उन्हें और दर्द हो... मैं चाहती हूं कि तुम सबके साथ खुश रहो अपने पेरेंट्स, मेरे मम्मी पापा, और हमारे दोस्त, सबके साथ"

"मुमकिन है तुम मुझसे नाराज़ हो जाओ ये सब सुनकर... पर मैं सच कह रही हूं प्लीज़ इसे अपना लो.."

"मैं ये अपने लिए नहीं कह रही... मैं तुम्हारे लिए कह रही हूं, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुम अपने प्यार करने वालों को यूं तकलीफ़ में देखो"

"कभी कभी... किसी को जाने देना ही सही होता है और मुझे तुम्हें छोड़ना पड़ा एकांश, ये आसान नहीं था मेरे लिए, लेकिन मुझे करना पड़ा क्योंकि मेरे पास कोई चॉइस नहीं थी अब तुम्हें भी मुझे जाने देना होगा... यही हमारी किस्मत है"

"ज़िंदगी रुकती नहीं है... और किसी के चले जाने से रुकनी भी नही चाहिए"

"मुझे पता है ये एक्सेप्ट करना आसान नहीं है कि अब मैं तुम्हारे पास नहीं हूं... लेकिन तुमको जीना पड़ेगा मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हारी ज़िंदगी रुक जाए.."

"दुनिया को लग सकता है कि मैं मर चुकी हूं... लेकिन तुम्हारे लिए? मैं हमेशा जिंदा रहूंगी.. तुम्हारे दिल में... तुम्हारे साथ"

"जब भी तुम अपनी आंखें बंद करोगे, मुझे अपने पास पाओगे, जब भी तुम मुझे याद करोगे, मैं तुम्हारे पास आ जाऊंगी, जब भी तुम्हें मेरी ज़रूरत होगी, मैं तुम्हारा हाथ थाम लूंगी, बस... अब मेरी शक्ल नहीं दिखेगी, लेकिन मेरा एहसास तुम्हारे साथ हमेशा रहेगा"

"पता है, कहना आसान है... पर निभाना मुश्किल लेकिन अंश, कभी ये मत सोचना कि तुम अकेले हो.. मैं हूं तुम्हारे साथ, तुम्हारी हर सांस में, हर धड़कन में, हर सोच में... और तुम्हारी मुस्कान में भी.."

"अब क्योंकि मैं तुम्हारी स्माइल में जिंदा हूं... तो प्लीज़, हमेशा मुस्कुराते रहना.."

"I love you."

"I love you."

"I love you..."


वो लगातार वही शब्द दोहराता रहा… डायरी को उसने सीने से यू चिपका रखा था मानो वो ही उसकी आख़िरी उम्मीद हो… और उसकी आंखों से बहते आंसू थम ही नहीं रहे थे..

कमरे के बाहर खड़े हर किसी ने उसकी सिसकियों को साफ़ साफ़ सुना था… हर आवाज़ जैसे सीधा दिल चीर रही हो..

लेकिन वो लोग कुछ कर भी नहीं पा रहे थे बस खामोशी से रोना ही उनका एकमात्र सहारा बन गया था.. उन सबकी आँखों में भी वही दर्द था… लेकिन जो उस कमरे के अंदर था, वो सबसे ज़्यादा टूटा हुआ था...

***

रात के बारा बज रहे थे वो धीरेधीरे चुपचाप से घर के अंदर दाखिल हुआ ताकि आवाज ना हो और किसी को उसके आने का पता ना चले लेकिन अंदर घुस के जैसे ही उसकी नज़र सामने गई… वहाँ उसके मम्मी पापा और अक्षिता के मम्मीपापा खड़े थे, जिनकी आंखों में बेचैनी साफ़ झलक रही थी..

उन्हें देख एकांश वहीं थम गया

अचानक अक्षिता की मम्मी तेज़ क़दमों से उसके पास आईं… और उन्होंने गुस्से में उसके गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया..

उसने चुपचाप उनकी तरफ देखा… उनकी आंखों से बहते आंसुओं में ग़ुस्से से ज़्यादा डर था... डर उसे खो देने का

फिर उसने अपने मम्मीपापा की ओर देखा, जो हैरानी में बस उसे देखे जा रहे थे… कुछ कहने की हालत में नहीं थे

"तुम कहां थे?" अक्षिता की मम्मी का गला भर आया था, लेकिन आवाज़ में अब भी गुस्सा था

एकांश ने कोई जवाब नहीं दिया

"हम पूरे दिन परेशान थे! फोन तुम उठा नही रहे… मैसेज का।कोई जवाब नही… हमें कुछ पता ही नहीं था कि तुम कहां हो!"

वो चिल्लाईं और फिर उनकी आंखें फिर से भीग गईं।

"तुम्हारे मम्मीपापा भी इसी चिंता में यहां आ गए, सोचो हम सब पर क्या गुज़री है!"

एकांश अब भी बस नीचे देख रहा था… एकदम चुप मानो उसके पास कहने को शब्द ही न हो

"एकांश?" उसके पापा ने धीमे से आवाज़ दी

उसने धीरे से ऊपर देखा… अपने पापा की तरफ, जिनकी आंखों में हार झलक रही थी.. फिर मां की तरफ देखा जिनकी आंखें में आंसू थे, फिर उसने अक्षिता की मम्मी की तरफ देखा… और उनके गाल से बहता एक आंसू अपने हाथ से पोंछ दिया..

"मैं ठीक हूं… आपलोग प्लीज़ टेंशन मत लीजिए" एकांश ने धीरे से कहा, और फिर सीधा अक्षिता के कमरे की तरफ बढ़ गया जो अब उसी का कमरा बन चुका था

पीछे से अक्षिता की मां की कांपती हुई आवाज़ आई

"हमने अपनी बेटी खो दी है एकांश… हम तुम्हें भी नहीं खोना चाहते…"

एकांश के कदम जैसे वहीं थम गए.. वो एक पल को जड़ सा हो गया… फिर उसने अपनी आंखें ज़ोर से भींच लीं, जैसे खुद से लड़ रहा हो, अपने आप कर कंट्रोल बना रहा हो फिर वो धीरे से दांत भींचते हुए बोला, "हमने उसे नहीं खोया…"

"एकांश… एक महीना हो गया है… तुम्हें अब आगे बढ़ना होगा… तुमने उससे वादा किया था ना?" अक्षिता की मां ने कहा

एकांश के अंदर एक द्वंद चल रहा था लेकिन ऊपर से उसने अपने आप को शांत खड़ा रख रखा था

"आगे बढ़ जाऊं?" एकांश की आवाज़ में कड़वाहट और तकलीफ़ एक साथ थी, "उसे ऐसे ही छोड़ दूं? जैसे कुछ हुआ ही नहीं?" वो चीखा, उसकी आंखों में गुस्से से ज़्यादा बेबसी थी... और अब अक्षिता के पापा अब चुप नहीं रह सके

"तो फिर बताओ, करोगे क्या?" उन्होंने ऊंची आवाज में कहा, "क्या यूं ही अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर लोगे? एक बार खुद से पूछो आख़िरी बार कब तुमने ढंग से खाना खाया था? कब चैन से सोए थे? कब मुस्कुराए थे? कब किसी से ठीक से बात की थी? कब… आख़िरी बार तुम्हारा चेहरा नॉर्मल दिखा था?"

एकांश कुछ नहीं बोला, वो बोलना बहुत कुछ चाहता था लेकिन उसके पास शब्द नहीं थे..

"मैं अभी इस बारे में बात नहीं करना चाहता," वो बुदबुदाया और वहाँ से मुड़कर चला गया

"नहीं तुम अभी कही नही जाओगे" अक्षिता की मां ने कहा,

"तुम हमसे इन बातो से भाग नही सकते एकांश, तुम अपनी ज़िंदगी यूं ही खत्म कर रहे हो, और हम इसे बस देखते नहीं रह सकते! हम उसे वापस नहीं ला सकते एकांश… हमें ये मानना होगा… और एक नई शुरुआत करनी होगी…" और ये कहते हुए सरिताजी फूट फूट रोने लगी..

एकांश के मां पापा चुपचाप ये सब देख रहे थे

अक्षिता के मम्मीपापा इस तरह एकांश की फिक्र कर रहे थे जैसे वो उनका अपना बेटा हो… और ही देखकर वो भी भावुक हो उठे

और तभी एकांश बोला

"प्लीज़ ऐसा मत कहो आंटी प्लीज for god's sake वो मरी नहीं है! और मुझे पूरा यकीन है… वो वापस आएगी... मैं जानता हूं… वो वापस ज़रूर आएगी!" एकांश ने चिल्ला कर कहा और सभी एक पल को चुप हो गए.. पूरे कमरे में जैसे ठहराव सा आ गया..

फिर एकांश ने सबकी तरफ देखा और फिर बोला

"आप लोग ऐसा क्यों बोल रहे हो जैसे वो अब कभी लौटेगी ही नहीं? जैसे वो सच में मर गई है?"

एकांश ने उन सब से सवाल किया और अबकी बार जवाब उसकी मां ने दिया

"तुम्हे लगता है के हममें से कोई ऐसा सोच सकता है" एकांश की मां ने कहा, उनकी आंखे भले नम थी पर शब्दो मे सख्ती थी,"असल में तो वो तुम ही हो जो ऐसा बर्ताव कर रहे हो… जैसे वो मर गई हो, तुम ही हो जो यूं रो रहे हो… जैसे अब कोई उम्मीद ही नहीं बची, तुम ही हो जो दुनिया को दिखा रहे हो कि वो अब कभी नहीं लौटेगी… तुम ही हो जो ये साबित कर रहे हो कि तुम्हारा प्यार कमज़ोर था… और वो अब इस दुनिया में नहीं है…" उनकी आवाज़ में दर्द भी था, और गुस्सा भी

हर शब्द जैसे सीधा एकांश के दिल में उतर रहा था… और वो बस खड़ा सुनता रहा, चुपचाप...

"माँ! अक्षिता मरी नहीं है… वो कोमा में है!" एकांश अचानक ज़ोर से चिल्ला पड़ा जैसे दिल का बोझ ज़ुबान पर आ गया हो

"हाँ एकांश, हमें पता है… वो मरी नहीं है," उसकी माँ ने धीमे लेकिन गंभीर लहज़े में कहा, "वो कोमा में है.. लेकिन सच ये भी है कि हमें नहीं पता वो कब जागेगी… या कभी जागेगी भी या नहीं"

वो एक पल रुकीं, फिर उसकी आंखों में देखते हुए बोलीं,

"लेकिन तुम्हारा बर्ताव… तुम्हारी ये हार मान लेने वाली हालत… ये हमें महसूस करा रही है कि जैसे सब ख़त्म हो चुका है.. एक महीना हुआ है बस… और तुमने कोशिश करना छोड़ दिया है.. जैसे तुमने अपने ही हाथों से उम्मीद का गला घोट दिया हो.."

एकांश कुछ नहीं बोला, वो बस एकटक अपनी मां को देख रहा था और तभी उसके पिता उसके पास आए और बोले

"तुम्हारी माँ बिलकुल सही कह रही है बेटा, हम हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं… बड़े से बड़े डॉक्टर्स से मिल रहे हैं… बस, अब ज़रूरत है कि तुम भी हमारे साथ खड़े रहो"

अक्षिता की माँ अब थोड़ा आगे आईं, उनकी आवाज़ अब भी कांप रही थी लेकिन उसमें अपनापन और दर्द दोनों थे

"हमें पता है कि तुम उसकी हालत देख नहीं पा रहे हो, उसे यूँ बेबस देखकर तुम्हारा दिल टूट रहा है… लेकिन बताओ हम क्या करें? अब बस तुम और तुम्हारा प्यार ही है जो कोई चमत्कार कर सकता है" उन्होंने उसका हाथ थाम लिया

"क्या तुम ही नहीं थे जो कहते थे कि जब तक वो तुम्हारे सामने है, सांसें ले रही है, तुम उम्मीद नहीं छोड़ोगे? तो अब क्या हो गया? वो अब भी ज़िंदा है, एकांश… और तुम्हारे सामने है, हमें उसके लिए खुश रहना चाहिए, उसे आवाज़ लगाते रहना चाहिए, उसे एहसास दिलाते रहना चाहिए कि हम उसके साथ हैं लेकिन हम बस रो रहे हैं… चुपचाप हार मान रहे हैं…"

इतना सुनते ही एकांश वहीं ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया… और फूटफूट कर रोने लगा

"मुझे नहीं पता मुझे क्या करना चाहिए…" उसकी आवाज़ बिखरी हुई थी, "मैं उसे ऐसे बिना हिलेडुले, बिना कुछ कहे हुए नहीं देख सकता, हर दिन, हर पल डर लगता है कि क्या वो कभी अपनी आंखें खोलेगी भी या नहीं.. आज भी मैं पूरा दिन अस्पताल में उसके पास बैठा रहा… उससे बातें करता रहा… उसे उठने के लिए मनाता रहा… पर अंदर से डर लग रहा है कि क्या वो कभी उठेगी भी?"

उसने दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया और सिसकते हुए नीचे झुक गया

उसे इस हालत में देख सबका कलेजा कांप उठा

कोई कुछ नहीं बोल पाया सब उसके पास आकर झुक गए, उसे गले से लगाया… और बस उसकी पीठ थपथपाते रहे, जैसे अपने हाथों से उसका दर्द थोड़ाथोड़ा कम करने की कोशिश कर रहे हों..

सच तो ये था कि उनके पास अब कुछ करने को बचा ही नहीं था… बस इंतज़ार ही बाकी था

जो भी होना था, अब किस्मत ही तय करने वाली थी

जब डॉक्टर्स ने बताया था कि ऑपरेशन सक्सेसफुल रहा है, और अंदरुनी ब्लीडिंग भी कंट्रोल हो गई है तब एक पल को उम्मीद जागी थी… लेकिन उसी के साथ ये भी कह दिया गया था कि उसकी जान बचने के चांस सिर्फ़ 3-4% हैं..

पर वो बच गई… लेकिन कोमा में चली गई

अब डॉक्टर्स की तरफ से भी बस एक ही बात बारबार सुनने को मिलती थी "हमें इंतज़ार करना होगा।"

उसे रोज़ दवाइयाँ दी जा रही थीं… हर दिन एक नई उम्मीद दी जाती थी… लेकिन हर उम्मीद की डोर आख़िर में जाकर किस्मत से ही बंधी हुई थी...

अब बस किसी चमत्कार का इंतज़ार था…

और वही चमत्कार… वो सब मिलकर मांग रहे थे....

क्रमश:
 
सो सो सो सॉरी आसिफा जी, मैं बिजी हो गया था इसके लिए कोई रीज़न नहीं दूंगा, काम आ जाते है जॉब करता हु मैं साथ hi फोरम पर भी बहुत कुछ हो रहा था, क्रिकेट कांटेस्ट हमने ओर्गनइजे कराया फिर स्टोरी कांटेस्ट, हेलल लोट ऑफ़ थिंग्स वेरे हप्पेनिंग पर आपका गुस्सा जो है वो जायज़ है उसके लिए मेरे पास कोई एक्सक्यूज़ नहीं है, बस माफ़ी मांग सकता हु, अभी भी 53रद अपडेट पोस्ट करने के बाद फॅमिली में मेडिकल इमरजेंसी थी तो अगेन can't हेल्प आईटी. मैं फोरम पर hi नहीं आ रहा था. बूत अब फाइनली सब सॉर्टेड है. अब कोई वडा नहीं करूँगा के आज आएगा कल आएगा बस जितना जल्द से जल्द होगा अपडेट पोस्ट कर दूंगा. मुझे भी अब इसे जल्दी कम्पलीट करता है, काफी लम्बी चल गयी है कहानी. उसुअल्ल्य मैं इतना वक़्त नहीं लेता हु बूत कई बार चीज़े हमारे हाथ में नहीं होती है.

होप आप समझेंगी, बाकि एक अपडेट अभी पोस्ट कर रहा हु कृपया पढ़ कर बताइयेगा.
 
अपडेट 54

एकांश नींद में हल्के से हिला ही था कि उसे अचानक लगा जैसे कोई बहुत ही नरम सा हाथ उसके बालों को सहला रहा है.. उस स्पर्श को महसूस करते ही उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई… उसे पता था, ये किसका हाथ था...

अक्षिता का...

धीरे से उसने अपनी आँखें खोलीं… लेकिन कमरे में कोई नहीं था, सच्चाई से सामना होते ही एकांश का चेहरा उतर गया था, ये पहली बार नहीं था जब उसे ऐसा महसूस हुआ था जैसे अक्षिता उसके पास हो… बिल्कुल पास...

वो तकिए में खुद को और अंदर तक समेटता चला गया, जैसे उसमें छुप जाना चाहता हो.. उसने चादर को अपने पास खींचा… और जैसे ही उसने उसे सूंघा, उसकी आँखें नम हो गईं, अब भी उसकी चादर में वही खुशबू थी… वही महक… जो उसे एकदम अक्षिता के पास ले जाती थी... एक पल को उसे सच में लगा जैसे वो यहीं, उसी बिस्तर पर, उसके साथ है

वो उठकर बैठ गया और उसकी नजर सामने बनी दीवार पर गई, जिस पर अक्षिता का बनाया हुआ फोटो कोलाज था

अब ये उसकी रोज़ की आदत बन गई थी, वो सुबह उठते ही सबसे पहले उसकी मुस्कुराती हुई तस्वीर को देखता, वहा मौजूद हर तस्वीर जैसे कोई किस्सा सुना रही थी.. और फिर उसकी नज़र उस एक फोटो पर अटक गई जो अस्पताल में ऐड्मिट होने से ठीक पहले ली गई थी

वो उसके कंधे पर झुकी हुई थी… और एकांश उसका माथा चूम रहा था.. ये फोटो अक्षिता की मम्मी ने चुपचाप खींच ली थी और तब शायद किसी ने सोचा भी नहीं था, कि ये उनकी आख़िरी तस्वीर बन जाएगी…

उसकी आँख से एक आंसू बह निकला… और तभी उसे फिर से वही एहसास हुआ जैसे किसी ने प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखा हो

उसने पलटकर देखा… और वो वहीं थी... उसकी आंखों में झाँकती हुई

वो कुछ नहीं बोला… बस उसने आंखों से बहते उन आंसुओं को पोंछ दिया, और फिर उसके माथे पर एक हल्का सा किस रख दिया, जैसे वो हमेशा करता था

उसने अक्षिता की अपने पास की मौजूदगी को पूरी तरह महसूस किया… और आंखें बंद कर ली.. लेकिन जब उसने दोबारा आंखें खोलीं तब वो वहाँ नहीं थी... पर एकांश जानता था… वो यहीं कहीं है.. उसे अब भी हर पल उसकी मौजूदगी का एहसास होता था और यही बात उसे सबसे ज़्यादा सुकून देती थी...

क्योंकि अक्षिता ने उससे वादा किया था कि वो कभी उसे अकेला नहीं छोड़ेगी.. और वो अब भी अपने वादे पर कायम थी...

जब एकांश ने ये बात अक्षिता के मम्मी-पापा को बताई वो बस मुस्कुराये लेकिन कोई कुछ बोला नहीं पर एकांश उनकी आँखों मे देख उनके मन की बात को समझ रहा था, उन्हे लग रहा था की वो ये सब बस अपनी कल्पनाओ मे महसूस कर रहा है

लेकिन एकांश को इससे फर्क नहीं पड़ता था.. उसे कोई चिंता नाही थी की लोग क्या सोचते है, उसे पागल कहते है या उसकी बात को वहम बताते है, उसके लिए तो बस एक ही बात मायने रखती थी, अक्षिता उसके साथ थी और यही बात उसे अब भी होश में रखे हुए थी..

उसे पूरा यकीन था कि वो वापस आएगी.. क्योंकि वो जानती है… एकांश उसके बिना नहीं रह सकता.. और कम से कम उसी की ख़ातिर… उसके प्यार की खातिर… वो ज़रूर लौटेगी..

एकांश जल्दी से तैयार हुआ और बाहर आ गया,

डाइनिंग टेबल पर अक्षिता के मम्मी-पापा बैठे हुए थे एकदम चुपचाप, उदास… और शायद भूखे भी, पर खाने का मन ही कहाँ था किसी का?

"Good morning!" एकांश की आवाज़ जैसे कमरे की उदासी को थोड़ी देर के लिए रोक गई, वो मुस्कराते हुए कुर्सी खींचकर बैठ गया और शांति से नाश्ता करने लगा, आज उसके बर्ताव मे कुछ तो अलग था

अक्षिता के मम्मी-पापा उसे यू देख हैरान रह गए...

वो बस उसे देखे जा रहे थे, सोच रहे थे की कल तक जो लड़का टूटा हुआ था, बिखरा हुआ था… आज इतनी शांति से नाश्ता कर रहा है?

ऐसा क्या हुआ है? कौन सी बात है जिसने उसके अंदर का दर्द कुछ हल्का कर दिया?

वो इसी सोच में थे कि उन्होंने उसकी आवाज़ सुनी

"मैं निकल रहा हूँ," एकांश ने कहा और उठने लगा

"एकांश बेटा…" अक्षिता की मम्मी ने उसे आवाज़ दी

"तुम्हें क्या हुआ है?" उन्होंने धीरे से पूछा

"मुझे? कुछ भी तो नहीं, सब ठीक है" एकांश ने हल्का सा मुसकुराते हुए कहा

"पिछले पूरे महीने तुम इतने डिप्रेस थे कि हमें डर लगने लगा था कि हम तुम्हें भी खो देंगे… लेकिन पिछले एक हफ्ते से तुममें कुछ बदला-बदला सा है... खुश लग रहे हो, क्या हुआ है बेटा?" अक्षिता के पापा ने पूछा

एकांश ने बस हल्की सी मुस्कान दी लेकिन कुछ नहीं बोला

"एकांश… प्लीज़ बेटा, हमें तुम्हारी फिक्र है," अक्षिता की मम्मी ने कहा

"मम्मी आप चिंता न कीजिए… मैं खुश दिख रहा हूँ क्योंकि मैं वाकई खुश हूँ" एकांश ने मुस्कुराते हुए कहा और एक पल रुका और फिर धीरे से बोला

"और इसका कारण ये है… कि मैं उसकी presence को महसूस करता हूँ, वो मेरे साथ है… और यही मेरी खुशी की वजह है" ये कहकर वो कमरे से बाहर चला गया और पीछे छोड़ गया वो चिंतित निगाहे जो उसकी मुस्कराहट तो देख पा रही थीं… पर उस मुस्कराहट के पीछे का भरोसा अभी भी पूरी तरह समझ नहीं पा रही थीं..

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एकांश ने धीरे से दरवाज़ा खोला… और चुपचाप कमरे में झाँका.. अंदर वही चेहरा था… जो उसके लिए सुकून का दूसरा नाम बन चुका था... वो मुस्कुराया और धीरे-धीरे उस बिस्तर की तरफ़ बढ़ा जहाँ वो लड़की शांत, गहरी नींद में लेटी हुई थी… जैसे किसी दूसरी दुनिया में हो..

उसने अपने हाथ से उसके गाल को बड़े प्यार से छुआ… और फिर उसके माथे पर हल्का सा किस किया... उसके बालों की तरफ़ देखा, खासकर उस जगह, जहाँ सर्जरी हुई थी... पट्टी अभी भी बंधी थी… और उसे देखकर उसके चेहरे पर एक तकलीफ़-सी आई… सोचकर कि उसे कितना दर्द झेलना पड़ा होगा

लेकिन उसी वक़्त उसकी नज़र उस छोटे से हिस्से पर पड़ी जहाँ बाल दोबारा उगने लगे थे…

एकांश हल्के से मुस्कुराया

ये छोटा सा बदलाव उसके लिए एक बड़ी राहत जैसा था, जैसे कोई चुपचाप कह रहा हो कि “वो ठीक हो रही है…”

वो उसके पास बैठ गया, और उसने उसका हाथ अपने हाथों में लिया, उसके हाथ को अपने होंठों से छूते हुए एकांश ने धीमे से फुसफुसाते हुए कहा

"Please जाग जाओ अक्षु… मैं यहीं हूँ… तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ"

और फिर एक पल ठहरकर उसने धीरे से कहा..

"अक्षु, तुम्हारे मम्मी-पापा परेशान हैं, सब लोग बस तुम्हारे उठने का इंतज़ार कर रहे हैं… प्लीज़, अपनी आंखें खोलो ना…"

बोलते हुए एकांश की आंखें नम हो गईं थी… कुछ आंसू चुपचाप उसके हाथ पर गिर पड़े

उसने साइड टेबल की तरफ़ देखा, वहां उनकी एक प्यारी सी फोटो रखी थी, वही तस्वीर जिसे वो सबसे ज़्यादा पसंद करता था…

वो मुस्कुराया जैसे उस फोटो में भी उसने अपनी अक्षिता की शरारत देख ली हो

"अक्षु, मेरी तरफ देखो ना…"

एकांश की आवाज बहुत धीमी थी मानो बस वो ये सिर्फ अक्षिता से कहना चाहता हो

"मैं रो नहीं रहा हूँ… और न ही उदास हूँ... मैं खुश हूँ… या कम से कम खुश रहने की कोशिश कर रहा हूँ, जैसे तुमसे वादा किया था, मैं अपना वादा निभा रहा हूँ… अब तुम्हारी बारी है अक्षु, तुमने मुझसे वादा किया था कि तुम मेरे पास वापस आओगी… है ना?"

ये कहते हुए उसने अपना माथा उसके हाथ पर रख दिया… उसकी हथेली की गर्माहट को अपने चेहरे पर महसूस करने लगा जैसे वही अब उसकी सबसे बड़ी उम्मीद हो...

उसी वक्त दरवाज़े पर खड़े थे डॉ. अवस्थी, वो चुपचाप उस इंसान को देख रहे थे… जो पूरे दिल से सिर्फ़ अपने प्यार के जागने की दुआ कर रहा था

उन्होंने अपने करियर में ऐसे कई रिश्ते देखे थे, लोगों को अपने अपनों के लिए रोते देखा था… पर ऐसा निस्वार्थ, ऐसा बेपनाह प्यार शायद ही उन्होंने कभी देखा हो

उन्होंने अब तक किसी लड़के को अपनी प्रेमिका से इतना गहराई से प्यार करते नहीं देखा था,

आजकल तो प्यार एक ट्रेंड बन गया है बस एक कैप्शन भर का, एक इंस्टाग्राम स्टोरी भर का, युवाओं के लिए प्यार अक्सर बस आकर्षण होता है… डेटिंग ऐप्स पर शुरू होता है, और अगर 'वर्क नही किया' तो दूसरा ढूंढ लिया जाता है.. रिश्ते की असली गहराई से ज़्यादा उन्हें उस रिश्ते का दिखावा ज़रूरी लगता है

डॉ. अवस्थी एकांश को देख रहे थे और सोच रहे थे कि जब तक वो एकांश ने नहीं मिले थे वो समझ ही नहीं पाए थे कि सच्चा प्यार होता क्या है....

एकांश रघुवंशी, एक अमीर, बिज़ी, घमंडी कहे जाने वाला बिज़नेसमैन… जिसने उन्हें वो सिखाया जो कोई किताब या मेडिकल केस नहीं सिखा सका... कि प्यार वाकई क्या होता है... हाँ, वो खुद भी अपनी पत्नी से प्यार करते थे… लेकिन वो कुछ और था जो उन्होंने एकांश और अक्षिता के बीच देखा था, वो कुछ अलग ही था… कुछ और ही लेवल का

पिछले दो महीने में जो उन्होंने अपनी आंखों के सामने देखा वो सिर्फ़ एक रिश्ते की कहानी नहीं थी… वो प्यार की परिभाषा थी... एक अमर प्यार की कहानी

चाहे वो दोनों ज़िंदा रहें या ना रहें… लेकिन उनका रिश्ता हमेशा जिंदा रहेगा.. क्योंकि प्रेम वक्त से परे होता है... जो ना हालातों में बंधता है, ना सालों में गिनता है... ज़िंदगी में हम बहुत लोगों से प्यार करते हैं… पर responsibilities, बदलते हालात या फिर वक्त का असर… धीरे-धीरे वो रिश्ते फीके पड़ जाते हैं...

लेकिन एकांश और अक्षिता का प्यार…

वो कुछ और ही था कुछ ऐसा जिसे वक़्त भी नहीं हरा सकता... ये सिर्फ एक रिश्ता नहीं, एक एहसास था और वो हमेशा रहेगा

अक्षिता का केस भी बाकियों से बिल्कुल अलग था... आमतौर पर जिस ट्यूमर को वक्त रहते फटना चाहिए था, उसने बहुत समय ले लिया था और जब फटा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी... डॉक्टर्स ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की… डॉ. हेनरी फिशर तक ने अपनी हर expertise झोंक दी थी, और जो सबसे critical चीज़ वो कर सकते थे वो था उसके अंदरूनी रक्तस्राव को कंट्रोल करना, ब्लीडिंग तो संभाल लि गई, लेकिन ब्रेन पर जो असर हुआ था, वो रोका नहीं जा सका...

अक्षिता के दिमाग़ का एक हिस्सा डैमेज हो गया… और इसी वजह से वो कोमा में चली गई

अब डॉक्टर्स के पास कोई जवाब नहीं था… ना इस सवाल का कि वो कब जागेगी, ना ही इस बात का कि वो कभी जागेगी भी या नहीं..

उसी वक्त, डॉ. अवस्थी की नज़र एकांश पर पड़ी जो अब भी उसी सादगी से उसके सामने बैठा बात कर रहा था, जैसे वो सब सुन रही हो

डॉ. अवस्थी हल्के से मुस्कराए.. उन्हें एक बात और पता थी, जो उन्होंने अब तक किसी से शेयर नहीं की थी

उन्हें याद था, पिछले महीने की एक रात जब एकांश उनके हाथों को पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था उस वक़्त उन्होंने मॉनिटर पर अक्षिता की धड़कनों में हलचल देखी थी…

हर बार जब एकांश वहां होता था तो कुछ न कुछ बदलता था... उसके दिल की बीट्स में हरकत होती थी… जैसे उसके अंदर कुछ जाग रहा हो...

डॉक्टर को धीरे-धीरे ये यकीन होने लगा था कि वो सब सुन सकती है, महसूस कर सकती है… बस अभी रिस्पॉन्ड नहीं कर पा रही

उन्होंने अब तक ये बात एकांश से नहीं कही थी… क्योंकि एक तो वो खुद डॉ. फिशर से इसे कन्फर्म करना चाहते थे,

और दूसरा ये कि वो नहीं चाहते थे कि एकांश की उम्मीदें कहीं फिर से टूट जाएं क्योंकि ये अब एक ज़िंदगी का मामला नहीं रह गया था… ये दो ज़िंदगियों की लड़ाई थी, ये साफ था कि अगर अक्षिता को कुछ हो गया, तो एकांश भी ज़िंदा नहीं बचेगा, कम से कम अंदर से तो बिल्कुल नहीं...

डॉक्टर चुपचाप आगे बढ़े और एकांश के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा... एकांश ने ऊपर देखा और हल्की सी मुस्कान दी

"डॉक्टर, देखा आपने? उसके बाल वापस उग रहे हैं!" वो एक बच्चे की तरह खुश होकर बोला

डॉक्टर भी उसकी मुस्कान देखकर मुस्कराए… और बोले,

"मैं तुम्हें एक और चीज़ बताना चाहता हूँ… जिससे तुम्हारी खुशी और बढ़ेगी"

एकांश सीधा खड़ा हो गया उसके चेहरे पर एक चमक आ गई थी

"क्या?" उसने उम्मीद भरी नज़रों से पूछा

डॉक्टर ने मॉनिटर की ओर इशारा किया, "इधर देखो"

"अब उसका हाथ पकड़ो" डॉक्टर ने कहा

एकांश ने उसका हाथ धीरे से थामा… और फिर प्यार से चूम लिया

मॉनिटर पर अचानक कुछ हरकत दिखी और एकांश कुछ पल के लिए एकदम स्तब्ध रह गया

उसने मॉनिटर की तरफ देखा… फिर अक्षिता की तरफ… फिर फिर से मॉनिटर की तरफ

डॉक्टर ने उसके पास आकर मुस्कराते हुए कहा,

"हाँ, वो तुम्हें feel कर सकती है, वो सुन सकती है कि तुम क्या कह रहे हो… और जब तुम उसे छूते हो, तो वो उसे महसूस भी करती है"

एकांश की आंखों से आंसू बहने लगे थे लेकिन उसके होंठों पर एक सच्ची सी मुस्कान थी

"ये एक बहुत पॉज़िटिव साइन है और मैंने इस बारे में डॉ. फिशर से भी बात की है, और उन्होंने कहा कि तुम्हें उससे बात करते रहना चाहिए… उसे महसूस कराते रहो कि तुम वहीं हो...

शायद इससे वो जवाब देने लगे… और धीरे-धीरे… जाग भी जाए"

एकांश ने अपनी आंखें पोंछी और सिर हिलाकर हाँ कहा, अब तो जैसे अब उसके अंदर कोई नई जान आ गई हो... अब उसे सबसे पहले ये बात अपने दोस्तों और पेरेंट्स को बतानी थी

उसने फ़ोन निकाला, जल्दी-जल्दी नंबर डायल किए… और सबको इस नन्हीं सी उम्मीद के बारे में बताया... सुनते ही सबकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा हालाँकि उनकी चिंता एकांश को लेकर अब भी थी… लेकिन पहली बार, वो चिंता एक उम्मीद में बदलती दिख रही थी....

क्रमश:
 
अपडेट 55

"I love you."

अक्षिता ने ये शब्द बिल्कुल साफ़-साफ़ सुने थे और उसका अवचेतन मन ये पहचान गया था कि ये आवाज़ उसी की थी जिससे वो बेइंतहा मोहब्बत करती थी...

वो उसे जवाब देना चाहती थी… कहना चाहती थी, "मुझे भी तुमसे बहुत प्यार है अंश..."

लेकिन चाहकर भी नहीं कह पाई...

वो उसकी हर बात सुन सकती थी... उसकी सिसकियाँ… उसका रोज़-रोज़ उसे उठने के लिए कहना, उसका रोना… उसका टूट कर रिक्वेस्ट करना हर चीज़ उसके अंदर तक जा रही थी.. वो सब सुन रही थी महसूस कर रही थी, एकांश की चीखें, उसकी तकलीफ़… सब कुछ...

कई बार वो जागने की कोशिश करती थी, चीख कर कहने की कोशिश करती थी कि "मैं यहीं हूँ!"

लेकिन कैसे?

एक वक़्त ऐसा आया जब उसने हिम्मत छोड़ दी थी... उसने हार मान ली थी मानो जीने की कोशिशें जैसे थम सी गई थीं... उसका शरीर साथ नहीं दे रहा था… और दिमाग जैसे किसी गहरी धुंध में खो गया था... बस एक ही चीज़ थी जो उसे अब तक ज़िंदा रखे हुए थी.... एकांश की आवाज़...

वरना तो वो कब का अंधेरे में समा चुकी होती… सब कुछ छोड़कर.. उसने सारी उम्मीदें छोड़ मौत से समझौता कर लिया था...

लेकिन तभी…

उसने फिर से वही आवाज सुनी

लगा मानो सालों बाद उसने उसे पुकारा हो… उस आवाज़ को फिर से सुनना ऐसा था जैसे अंधेरे में एकदम से रौशनी चमक गई हो... और उस रौशनी का नाम था एकांश...

उसी की आवाज़ ने उसे अंधेरे से खींचकर वापस ज़िंदगी की तरफ मोड़ा.. उस आवाज़ में इतनी ताक़त थी कि उसे लड़ने की वजह मिल गई थी... अब वो हर दिन उसके कुछ कहने का इंतज़ार करती… हर आवाज़ को पकड़ने की कोशिश करती जब भी वो रोता, उसका दिल जैसे फटने लगता

वो सारे बंधन तोड़कर दौड़ जाना चाहती थी, उसे गले लगाना चाहती थी, उसे ये कहना चाहती थी कि "मैं यहीं हूँ…"

लेकिन हर बार जब वो ऐसा करती उसका दिमाग खिंचने लगता, नसों में तनाव भर जाता… दिल की धड़कनें तेज़ हो जातीं और सर दर्द से भर जाता... उसने बाकी लोगों की भी आवाज़ें सुनी थीं, अपने दोस्तों की, मम्मी-पापा की… पर उसके शरीर ने कभी किसी पर कोई रिएक्शन नहीं दिया था

सिर्फ एकांश ही था… जिसकी हर बात, हर स्पर्श उसे महसूस होता था... उसे नहीं पता वो कितने दिनों से कोमा में है… उसे ये भी नहीं मालूम कि और कितने दिनों तक इसी हाल में रहेगी... लेकिन एक बात वो पूरे दिल से जानती थी कि

"मैं आज भी ज़िंदा हूँ, सिर्फ़ उसकी वजह से"

अब भी वो उसकी बातें सुन सकती थी, उसे पास महसूस कर सकती थी

अभी वो अमर और श्रेया के बारे में कुछ कह रहा था... वो उसके पास जाना चाहती थी, उसका हाथ थामना चाहती थी, उसकी आँखों में देख कर कुछ कहना चाहती थी... पर... उसका सर बुरी तरह दुख रहा था… सीने में दिल जोर-जोर से धड़क रहा था... लेकिन जब एकांश ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया… तो पहली बार उसे अपने शरीर में हल्की सी गर्माहट महसूस हुई

सूरज की हल्की-हल्की किरणें जब उसके चेहरे पर पड़ीं… तो उसने अपनी आँखें खोलीं... उसे धीरे-धीरे होश आया… और उसने खुद को बिस्तर पर बैठे हुए पाया...

वो थोड़ा इधर-उधर देखने लगी, और उसकी नज़र सामने पड़ी कुर्सी पर गई....

वो वही बैठा था… उसका सिर उसके बिस्तर पर झुका हुआ था, और वो नींद में था.... उसने झुककर धीरे से उसके सिर को सहलाया…

नींद में भी एकांश के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभर आई थी... वही मासूम-सी मुस्कान, जो कभी उसे बहुत सुकून देती थी...

फिर उसने ध्यान से उसका चेहरा देखा... जो थोड़ा बदल गया था… बाल कुछ ज़्यादा लंबे लग रहे थे, दाढ़ी-मूंछें गाढ़ी और बिखरी हुई थीं... उसके माथे पर हल्की-सी झुर्रियाँ थीं, और चेहरा… चेहरा किसी गहरे दर्द से भरा हुआ लग रहा था...

उसने झुककर उसके गाल पर हल्का सा किस किया…

और फिर बस उसे यूँ ही देखती रही जैसे डर हो कि अगर पलक झपकी, तो वो गायब हो जाएगा... उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है... वो बिस्तर से उठी और धीरे-धीरे दरवाज़े की तरफ़ चली गई... थोड़ी देर तक बाहर झाँकती रही, लेकिन जब उसने पीछे मुड़कर देखा…

उसके कदम वहीं थम गए...

वो जहाँ की तहाँ जड़ हो गई...

उसकी आंखें हैरानी से फैल गईं…

उसने खुद को देखा... वही बिस्तर पर, एकदम शांत, बेसुध लेटा हुआ शरीर...

और उसके पास वही एकांश जो अभी भी नींद में था...

उसने खुद को छूने की कोशिश की… और घबरा गई... ये क्या हो रहा था? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था... वो धीरे-धीरे बिस्तर की तरफ़ लौटी… और उसने अपने बेसुध शरीर को हिलाने की कोशिश की लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ...

उसने फिर से बिस्तर पर जाकर खुद को उसी जगह 'फिट' करने की कोशिश की… लेकिन उसका शरीर, उसकी आत्मा को स्वीकार ही नहीं कर रहा था..

"क्या मैं… मर गई हूँ?"

मन में ये ख्याल आते ही उसके पैर जैसे जवाब दे गए... वो वहीं ज़मीन पर घुटनों के बल गिर पड़ी… उसे यक़ीन नहीं हो रहा था… क्या वो अब सच में मर चुकी है?

"क्या मैं अब… भूत बन गई हूँ?"

उसने खुद से ये सवाल किया… और फिर फूट-फूट कर रोने लगी...

उसकी नज़र एकांश पर पड़ी जो अब भी उसकी मासूम नींद में था, बेख़बर… इस सब से अनजान...

"अगर उसे पता चल गया कि मैं मर चुकी हूँ तो… उसका क्या होगा? क्या वो ये सह पाएगा?"

ये ख्याल ही अक्षिता तोड़ने लगा... वो अंदर ही अंदर डरने लगी... वो भी अलग-अलग ख्यालों में डूबी थी… और तभी कमरे में डॉक्टर आ गए... उसने उनकी आवाज़ सुनी… और उनका चेहरा देखा... डॉक्टर के चेहरे पर चिंता साफ़ थी... उन्होंने एकांश की तरफ देखा और लंबी सांस लेते हुए उसकी तरफ बढ़े...

रोज़ की तरह उन्होंने उसका चेकअप शुरू किया… लेकिन इस बार… अक्षिता उनके हर एक्शन को देख रही थी, सुन रही थी... और अंदर ही अंदर डर रही थी

"कहीं डॉक्टर अभी उसकी मौत की खबर तो नहीं देने वाले?" उसने अपना दिल थाम लिया

इसी बीच मशीन की आवाज़ हुई… और एकांश नींद से उठ गया...

"वो कैसी है?" उसने उनींदी आँखों से अक्षिता की ओर देखते हुए डॉक्टर से पूछा..

अक्षिता ने दर्द से आंखें बंद कर लीं… और उसके आंसू बहने लगे.. डॉक्टर ने नज़रें झुका लीं, एक आह भरी और सिर्फ़ एक शब्द कहा

"Same."

अब अक्षिता की आंखे हैरत में फैल गई.. उसने अपने चेहरे को छुआ… हाथों को देखा…

"मैं मरी नहीं हूँ!"

"मैं अब भी ज़िंदा हूँ!"

"मैं अब भी साँस ले रही हूँ!"

उसके अंदर एक नई उम्मीद जगी लेकिन साथ ही एक और सवाल भी…

"तो फिर ये सब क्या है? मेरे साथ हो क्या रहा है?"

वो अभी ये सब समझने की कोशिश कर ही रही थी के एकांश की आवाज वहां एक बार फिर गूंजी

"6 महीने हो गए… कोई improvement क्यों नहीं है?"

अक्षिता वहीं खड़ी रह गई... बिल्कुल सुन्न!

"छह महीने…?"

"मैं इस हालत में पिछले 6 महीनों से पड़ी हूँ…?"

डॉक्टर ने बहुत धीमे और भारी आवाज़ में कहा,

"हाँ… 6 महीने हो गए.. कोई खास सुधार नहीं दिख रहा"

डॉक्टर की बात सुन एकांश का चेहरा सख़्त हो गया था

"डॉक्टर…"

उसकी आवाज़ में गुस्सा भी था और टूटन भी

"अब वक़्त आ गया है, एकांश…"

डॉ. अवस्थी अब पहली बार इन महीनों में अपने दिल की बात एकांश से कर रहे थे

"तुम खुद को इस इंतज़ार में खत्म कर रहे हो... मैं समझ सकता हूँ ये तुम्हारे लिए कितना मुश्किल है… लेकिन ज़रा अपने मम्मी-पापा के बारे में सोचो... तुम्हारी हालत देखकर वो रोज़ टूट रहे हैं... तुम्हें लगता है अक्षिता तुम्हें इस हालत में देखकर खुश होगी?"

"वो कभी नहीं चाहेगी कि तुम अपनी ज़िंदगी यूं रोक दो, सिर्फ़ उसके लिए... प्लीज़… try to move on…"

डॉक्टर की ये बात पहली बार डर की बजाय दिल से निकली हुई लग रही थी... जिसका जवाब अब एकांश ने देना था वही अक्षिता ये सब होता चुप चाप देख रही थी... भीगी आंखों से

एकांश का दर्द उसकी आंखों से साफ़ झलक रहा था… और अब वो उसे सह नहीं पा रही थी

"क्या आप लोग मुझसे आगे बढ़ने के लिए कहना बंद कर सकते हैं?" एकांश की आवाज़ एकदम तेज़ हो गई थी एकदम गुस्से से भरी हुई, लेकिन अंदर से पूरी तरह टूटी हुई...

"हर किसी से यही सुनकर थक गया हूँ मैं!"

"प्लीज़… मुझे मत बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए!"

अक्षिता ने आंसुओं से भरी आंखों से उसकी ओर देखा... एकांश के चेहरे पर गुस्सा कम और दर्द ज़्यादा था...

डॉक्टर खामोश खड़े रहे..

"तो आप क्या चाहते हैं? मैं बस उसे यूँ छोड़ दूं? भूल जाऊं कि वो है ही नहीं? अपनी ज़िंदगी में यूँ ही आगे बढ़ जाऊं?" बोलते हुए एकांश की आवाज़ कांप रही थी...

"For God's sake, वो मरी नहीं है… और ना ही मरेगी... वो ज़रूर जागेगी… मेरे लिए..." डॉक्टर आगे कुछ कहने ही वाले थे कि एकांश ने हाथ उठाकर उन्हें चुप करा दिया...

"क्या कभी आपके मन में ये सवाल आया… कि वो ज़िंदा है… और मैं बस उसका इंतज़ार कर रहा हूँ?"

वो धीरे से नीचे देखने लगा… उसकी आंखें भर आई थीं

"मैं उसके जागने का इंतज़ार कर रहा हूँ… ताकि हम साथ में अपनी ज़िंदगी फिर से शुरू कर सकें... और यकीन मानिए डॉक्टर मैं इस इंतज़ार में खुश हूँ" फिर उसकी आवाज़ और भी टूटने लगी..

"आप सब यही चाहते हो ना कि मैं उसे भूलकर आगे बढ़ जाऊँ? पर क्या आपको लगता है कि ऐसा करके मैं वाकई खुश रहूंगा?"

उसने अक्षिता की ओर देखा और उसकी आँखों में सिर्फ़ एक सवाल था कि क्या तुम भी यही चाहती हो?

"नहीं!"

"वो मेरी ज़िंदगी है… मेरी खुशी है… मेरा सबकुछ है"

"अगर वो वापस नहीं आई… तो मुझे नहीं पता कि मैं क्या करूंगा… लेकिन एक बात पक्की है, मैं उसके बिना कभी भी सच में खुश नहीं रह पाऊँगा"

उसने अक्षिता का हाथ पकड़ लिया और फूट-फूटकर रोने लगा... अक्षिता की आंखों से भी आंसू बह निकले, वो भी एकांश के साथ रो रही थी…

डॉक्टर थोड़ा झुके, और उन्होंने एकांश की पीठ पर हाथ रखा

"मैं समझता हूँ… और मैं ये सब इसलिए कह रहा था क्योंकि मैंने देखा है, तुमसे प्यार करने वाले लोग तुम्हारे लिए रोज कितना तड़पतेहैं…"

डॉक्टर की आवाज़ इस बार नर्म थी वो अब सलाह नहीं दे रहे थे, बस सच बोल रहे थे..

"लेकिन एक बात है… कभी-कभी छोड़ना ज़रूरी होता है एकांश और अगर वो सच में तुम्हारी है… तो वो ज़रूर लौटेगी"

एकांश ने अक्षिता का हाथ और कसकर पकड़ लिया जैसे अगर उसने उसे छोड़ा, तो सब कुछ खो देगा...

डॉक्टर थोड़ा पीछे हटे और धीरे से बोले,

"प्लीज़… अब उसे छोड़ दो"

"नहीं!"

एकांश अचानक उठ खड़ा हुआ

"कभी नहीं!"

उसकी आवाज़ फट पड़ी… और वो गुस्से से कमरे से बाहर चला गया

डॉक्टर ने एक लंबी सांस ली और बस भगवान से यही दुआ की के “कुछ ऐसा कर दो… जो सब ठीक कर दे”

अक्षिता जल्दी से एकांश के पीछे भागी

उसने देखा कि वो सीधा अपनी कार की तरफ़ बढ़ा, और अंदर बैठते ही बुरी तरह रोने लगा... वो वहीं बाहर खड़ी थी… बस उसे देख रही थी... उस हाल में, उस टूटन में… जिसमें वो सिर्फ़ उसकी वजह से था...

पर अफ़सोस…

वो कुछ नहीं कर सकती थी...

उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि ये सब उसके साथ हो क्या रहा है...

'मैं कोमा में हूँ, फिर भी मैं सब देख रही हूँ? मैं ज़िंदा हूँ, फिर भी मेरी आत्मा बाहर कैसे आ गई? और… मैं कुछ देर पहले उसे छू भी तो पाई थी… तो अब क्यों नहीं?'

क्या अब भी वो उसे छू सकती है?

धीरे-धीरे वो कार की तरफ़ बढ़ी… और उसने उसके सिर के पास पहुंचकर स्टेयरिंग व्हील पर रखा उसका सर धीरे से छुआ...

अगले ही पल...

एकांश का सिर एकदम से ऊपर उठा...

उसने इधर-उधर देखा, जैसे किसी एहसास ने उसे छुआ हो...

"अक्षु… मैं तुम्हें महसूस कर सकता हूँ.... कहाँ हो तुम?"

"मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ… प्लीज़ वापस आ जाओ…" वो सिर पकड़कर फिर से फूट पड़ा

अक्षिता वहीं थी... उसी के पास... वो भी रो रही थी… उसके साथ....

उसे लग रहा था जैसे कोई उसे किसी जंजीर से बांधे हुए है...

वो जागना चाहती थी, उसकी बाहों में वापस लौटना चाहती थी… पर कुछ था… जो उसे रोक रहा था

और तभी... उसे एहसास हुआ की वो उससे दूर जा रही है

जैसे कोई उसे खींच रहा हो… उससे अलग कर रहा हो उसने उसे पुकारा… छूने की कोशिश की… पर एकांश अब उससे दूर जा रहा था...

उसने देखा कि वो कार स्टार्ट कर चुका था और बहुत तेज़ रफ्तार में सड़क पर निकल गया... वो धीरे-धीरे उसकी आँखों से ओझल हो रहा था… और अक्षिता… बस उसे पकड़ने की कोशिश करती रही... लेकिन वो लुप्त होती जा रही थी… और अंत में, वो अंधेरे में खो गई... वो धीरे-धीरे धुंध में गुम हो गई… और अगले ही पल, अंधेरे में समा गई जैसे कोई रोशनी बुझ गई हो...

हॉस्पिटल के उस शांत कमरे में अचानक हलचल मच गई... डॉक्टर की नज़र जब मॉनिटर पर गई तो उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं... बीप की आवाज़ लगातार तेज़ होती जा रही थी... अक्षिता की नब्ज गिर रही थी… दिल की धड़कनें बेकाबू थीं मानो जैसे उसका शरीर और आत्मा किसी अलग-अलग दिशा में खींचे जा रहे हों...

डॉक्टर कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे कि हो क्या रहा है... वो बार-बार उसकी हालत संभालने की कोशिश करते… दवाइयाँ चेक करते… मशीन सेटिंग्स देख रहे थे पर कुछ भी काम नहीं कर रहा था

कमरे में Code Blue की घोषणा हुई और अचानक वहां आपात स्थिति बन गई... नर्सें दौड़कर आईं, डिफिब्रिलेटर तैयार किया गया… डॉक्टर की आवाज़ में घबराहट थी और उनकी आँखों में डर...

उसी वक्त अक्षिता के मम्मी-पापा कमरे में दाखिल हुए और जैसे ही उन्होंने अपनी बेटी की हालत देखी… उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई, वो वहीं खड़े रह गए, बेसुध-सी हालत में, एक-दूसरे का हाथ थामे… आँखों में खौफ और दिल में टूटी हुई उम्मीद लिए

डॉक्टर अवस्थी ने डॉ. फिशर को फ़ोन किया और जल्दी-जल्दी सारी रिपोर्ट्स समझाईं… पर जवाब वहीं था: “हमें समझ नहीं आ रहा कि ये क्यों हो रहा है”

लेकिन अंदर से… सब जान रहे थे...

वो जा रही थी...

और कोई कुछ नहीं कर सकता था...

कमरे में मौजूद हर एक शख्स का चेहरा एक ही बात कह रहा था.. सब… ख़त्म हो गया

अक्षिता के पेरेंट्स ने एकांश को कॉल करने की कोशिश की… पर उसका फ़ोन unreachable था...

वो दोनों अब बस अपनी बेटी के सिरहाने खड़े थे, एक-दूसरे के कंधे पर सिर टिकाए.. रोते हुए… और एकांश के लिए दुआ करते हुए...

वहीं दूसरी ओर एकांश अब भी कार चला रहा था… बुरी तरह रोते हुए, उसकी आंखें धुंधली थीं… और दिमाग़ सुन्न... उसने सामने से आ रहे ट्रक को देखा ही नहीं...

और अगले ही पल...

तेज़ रफ्तार में उसकी कार एकदम से जंगल की तरफ मुड़ी… और फिर...

धड़ाम!

कार एक पेड़ से इतनी ज़ोर से टकराई कि उसका पूरा ढांचा मुड़ गया

एकांश हवा में उछलकर ज़मीन पर गिरा.. खून से लथपथ

पास से गुज़र रहे ट्रक ड्राइवर ने ये हादसा देखा और उसने फ़ौरन एम्बुलेंस को कॉल किया और एकांश की ओर भागा...

ज़मीन पर पड़े एकांश ने धीरे-धीरे अपनी आधी खुली आंखों से ऊपर आसमान की तरफ देखा…

और वहाँ उसे दिखा… अक्षिता का मुस्कुराता चेहरा...

उस मुस्कान में जादू था… सुकून था… उम्मीद थी...

एकांश भी हल्का सा मुस्कुराया... जैसे उसकी सारी तकलीफें उसी पल कहीं छूमंतर हो गई हों

उसने धीरे से अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया… और अक्षिता ने उसका हाथ थाम लिया...

उसने आंखें बंद कीं…

और उस मुस्कान के साथ… सब कुछ थम गया....

क्रमश:
 
देखो मैंने ऐसा पहले कभी नहीं लिखा है, ये अपडेट मेरे लिए कुछ अलग है, मैंने कहानिया लिखी है लेकिन सब सिंपल थी नार्मल रोमांस या स्ट्रैट थ्रिलर लेकिन इतने काम्प्लेक्स इमोशंस में मैं कभी नहीं उतरा था इसके पहले इसीलिए आपसे रिक्वेस्ट है के इस अपडेट पे अपने को रिव्यु चाहिए hi चाहिए, आईटी विल मैं ा लोट तो में इन माय राइटिंग जर्नी.

कोई जबरदस्ती नहीं है बूत रिव्यु दे दो यार मैं इतना कभी बोलता नहीं हु :डी

एंड यस don't वोर्री एंडिंग साद नहीं होने दूंगा :डी
 
थिस इस नॉट थे एन्ड!

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