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वर्दी वाला गुण्डा / वेदप्रकाश शर्मा
लाश ने आंखें खोल दीं।
ऐसा लगा जैसे लाल बल्ब जल उठे हों।
एक हफ्ता पुरानी लाश थी वह।
कब्र के अन्दर, ताबूत में दफन!
सारे जिस्म पर रेंग रहे गन्दे कीड़े उसके जिस्म को नोच-नोचकर खा रहे थे।
कहीं नरकंकाल वाली हड्डियां नजर आ रही थीं तो कहीं कीड़ों द्वारा अधखाया गोश्त लटक रहा था—कुछ देर तक लाश उसी ‘पोजीशन’ में लेटी लाल बल्ब जैसे नेत्रों से ताबूत के ढक्कन को घूरती रही।
फिर!
सड़ा हुआ हाथ ताबूत में रेंगा—मानो कुछ तलाश कर रहा हो—अचानक हाथ में एक खुखरी नजर आई और फिर लेटे-ही-लेटे उसने खुखरी से ढक्कन के पृष्ठ भाग पर जोर-जोर से प्रहार करने शुरू कर दिए।
कब्रिस्तान में ठक् … ठक् … की भयावह आवाज गूंजने लगी।
अंधकार और सन्नाटे का कलेजा दहल उठा।
मुश्किल से पांच मिनट बाद!
एक कच्ची कब्र की मिट्टी कुछ इस तरह हवा में उछली जैसे किसी ने जमीन के अन्दर से जोर लगाकर मुकम्मल कब्र को उखाड़ दिया हो।
कब्र फट पड़ी।
लाश बाहर आ गयी—शरीर पर कफन तक न था।
चेहरा चारों तरफ घूमा, लेकिन केवल चेहरा ही—गर्दन से नीचे के हिस्से यानी धड़ में जरा भी हरकत नहीं हुई—धड़ से ऊपर का हिस्सा इस तरह घूमा था जैसे शेष जिस्म से उसका कोई सम्बन्ध ही न हो, चारों तरफ निरीक्षण करने के बाद चेहरा ‘फिक्स’ हो गया।
कब्रिस्तान में दूर-दूर तक कोई न था—हवा तक मानो सांस रोके सड़ी-गली लाश को देख रही थी—लाश कब्र से निकली, कब्रिस्तान पार करके सड़क पर पहुंची।
एकाएक हवा जोर-जोर से चलने लगी—मानो खौफ के कारण सिर पर पैर रखकर भाग रही हो और उसके वेग से लाश की हड्डियां आपस में टकराकर खड़खड़ाहट की आवाजें करने लगीं।
बड़ी ही खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाजें थीं वे मगर उन्हें सुनने या कब्र फाड़कर सड़क पर चली जा रही लाश को देखने वाला दूर-दूर तक कोई न था—विधवा की मांग जैसी सूनी सड़क पर लाश खटर-पटर करती बढ़ती चली गयी।
कुछ देर बाद वह दयाचन्द की आलीशान कोठी के बाहर खड़ी आग्नेय नेत्रों से उसकी बुलन्दियों को घूर रही थी—उसने दांत किटकिटाये, नरकंकाल जैसी टांग की ठोकर लोहे वाले गेट पर मारी।
जोरदार आवाज के साथ गेट केवल खुला नहीं बल्कि टूटकर दूर जा गिरा—खटर-पटर करती लाश लॉन के बीच से गुजरकर इमारत के मुख्य द्वार पर पहुंची—पुनः दांत किटकिटाकर जोरदार ठोकर मारी, दरवाजा टूटकर अन्दर जा गिरा।
लाश हॉल में पहुंची!
चारों तरफ अंधेरा था।
“क-कौन है?” एक भयाक्रांत आवाज गूंजी—“कौन है वहां?”
“लाइट ऑन करके देख दयाचन्द!” नरकंकाल के जबड़े हिले—“मैं आया हूं!”
“क-कौन?” इस एकमात्र शब्द के साथ ‘कट’ की आवाज हुई।
हॉल रोशनी से भर गया।
और!
एक चीख गूंजी।
दयाचन्द की चीख थी वह!
लाश ने अपना डरावना चेहरा उठाकर ऊपर देखा।
दयाचन्द बॉल्कनी में खड़ा था—खड़ा क्या था, अगर यह लिखा जाये तो ज्यादा मुनासिब होगा कि थर-थर कांप रहा था वह—लाश को देखकर घिग्घी बंधी हुई थी—आंखें इस तरह फटी पड़ी थीं मानो पलकों से निकलकर जमीन पर कूद पड़ने वाली हों जबकि लाश ने उसे घूरते हुए पूछा—“पहचाना मुझे?”
“अ-असलम!” दयाचन्द घिघिया उठा—“न-नहीं—तुम जिन्दा नहीं हो सकते।”
“मैंने कब कहा कि मैं जिन्दा हूं?”
“फ-फिर?”
“कब्र में अकेला पड़ा-पड़ा बोर हो रहा था—सोचा, अपने यार को ले आऊं!”
“तुम कोई बहरूपिये हो।” दयाचन्द चीखता चला गया—“खुद को असलम की लाश के रूप में पेश करके मेरे मुंह से यह कुबूलवाना चाहते हो कि असलम की हत्या मैंने की थी।”
“वाह! मेरी हत्या और तूने?” लाश व्यंग्य कर उठी—“भला तू मेरी हत्या क्यों करता दयाचन्द—दोस्त भी कहीं दोस्त को मारता है और फिर हमारी दोस्ती की तो लोग मिसाल दिया करते थे—कोई स्वप्न में भी नहीं सोच सकता कि दयाचन्द असलम की हत्या कर सकता है।”
“तो फिर तुम यहां क्यों आये हो?” दयाचन्द चीख पड़ा—“कौन हो तुम?”
“कमाल कर रहा है यार—बताया तो था, कब्र में अकेला पड़ा-पड़ा बोर …।”
“तू इस तरह नहीं मानेगा हरामजादे!” खौफ की ज्यादती के कारण चीखते हुए दयाचन्द ने जेब से रिवॉल्वर निकाल लिया, गुर्राया—“बोल … कौन है तू?”
जवाब में चेहरा ऊपर उठाये लाश खिलखिलाकर हंस पड़ी—कोठी में ऐसी आवाज गूंजी जैसे खूनी भेड़िया थूथनी उठाये जोर-जोर से रो रहा हो।
भयाक्रांत होकर दयाचन्द ने पागलों की मानिन्द ट्रेगर दबाना शुरू कर दिया।
धांय … धांय … धांय!
गोलियों की आवाज दूर-दूर तक गूंज गयी।
मगर आश्चर्य!
उसके रिवॉल्वर से निकली कोई गोली लाश का कुछ न बिगाड़ सकी।
सभी गोलियां उसके जिस्म के आर-पार होकर हॉल की दीवारों में जा धंसीं—नरकंकाल थूथनी ऊपर उठाये भयानक अंदाज में ठहाके लगा रहा था।
रिवॉल्वर खाली हो गया। हंसना बन्द करके लाश ने दांत किटकिटाये—खौफनाक किटकिटाहट सारे हॉल में गूंज गई, जबड़े हिले—“मुझे दुबारा मारना चाहता है दयाचन्द—तू भूल गया, दो बार कोई नहीं मरा करता।”
दयाचन्द के होश फाख्ता हो गए।
जुबान तालू से जा चिपकी।
जड़ होकर रह गया वह, हिल तक नहीं पा रहा था।
“मैं आ रहा हूं दयाचन्द!” इन शब्दों के साथ लाश उस जीने की तरफ बढ़ी जो हवा में इंग्लिश के अक्षर ‘जैड’ का आकार बनाता हुआ बॉल्कनी तक चला गया था।
लाश ने आंखें खोल दीं।
ऐसा लगा जैसे लाल बल्ब जल उठे हों।
एक हफ्ता पुरानी लाश थी वह।
कब्र के अन्दर, ताबूत में दफन!
सारे जिस्म पर रेंग रहे गन्दे कीड़े उसके जिस्म को नोच-नोचकर खा रहे थे।
कहीं नरकंकाल वाली हड्डियां नजर आ रही थीं तो कहीं कीड़ों द्वारा अधखाया गोश्त लटक रहा था—कुछ देर तक लाश उसी ‘पोजीशन’ में लेटी लाल बल्ब जैसे नेत्रों से ताबूत के ढक्कन को घूरती रही।
फिर!
सड़ा हुआ हाथ ताबूत में रेंगा—मानो कुछ तलाश कर रहा हो—अचानक हाथ में एक खुखरी नजर आई और फिर लेटे-ही-लेटे उसने खुखरी से ढक्कन के पृष्ठ भाग पर जोर-जोर से प्रहार करने शुरू कर दिए।
कब्रिस्तान में ठक् … ठक् … की भयावह आवाज गूंजने लगी।
अंधकार और सन्नाटे का कलेजा दहल उठा।
मुश्किल से पांच मिनट बाद!
एक कच्ची कब्र की मिट्टी कुछ इस तरह हवा में उछली जैसे किसी ने जमीन के अन्दर से जोर लगाकर मुकम्मल कब्र को उखाड़ दिया हो।
कब्र फट पड़ी।
लाश बाहर आ गयी—शरीर पर कफन तक न था।
चेहरा चारों तरफ घूमा, लेकिन केवल चेहरा ही—गर्दन से नीचे के हिस्से यानी धड़ में जरा भी हरकत नहीं हुई—धड़ से ऊपर का हिस्सा इस तरह घूमा था जैसे शेष जिस्म से उसका कोई सम्बन्ध ही न हो, चारों तरफ निरीक्षण करने के बाद चेहरा ‘फिक्स’ हो गया।
कब्रिस्तान में दूर-दूर तक कोई न था—हवा तक मानो सांस रोके सड़ी-गली लाश को देख रही थी—लाश कब्र से निकली, कब्रिस्तान पार करके सड़क पर पहुंची।
एकाएक हवा जोर-जोर से चलने लगी—मानो खौफ के कारण सिर पर पैर रखकर भाग रही हो और उसके वेग से लाश की हड्डियां आपस में टकराकर खड़खड़ाहट की आवाजें करने लगीं।
बड़ी ही खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाजें थीं वे मगर उन्हें सुनने या कब्र फाड़कर सड़क पर चली जा रही लाश को देखने वाला दूर-दूर तक कोई न था—विधवा की मांग जैसी सूनी सड़क पर लाश खटर-पटर करती बढ़ती चली गयी।
कुछ देर बाद वह दयाचन्द की आलीशान कोठी के बाहर खड़ी आग्नेय नेत्रों से उसकी बुलन्दियों को घूर रही थी—उसने दांत किटकिटाये, नरकंकाल जैसी टांग की ठोकर लोहे वाले गेट पर मारी।
जोरदार आवाज के साथ गेट केवल खुला नहीं बल्कि टूटकर दूर जा गिरा—खटर-पटर करती लाश लॉन के बीच से गुजरकर इमारत के मुख्य द्वार पर पहुंची—पुनः दांत किटकिटाकर जोरदार ठोकर मारी, दरवाजा टूटकर अन्दर जा गिरा।
लाश हॉल में पहुंची!
चारों तरफ अंधेरा था।
“क-कौन है?” एक भयाक्रांत आवाज गूंजी—“कौन है वहां?”
“लाइट ऑन करके देख दयाचन्द!” नरकंकाल के जबड़े हिले—“मैं आया हूं!”
“क-कौन?” इस एकमात्र शब्द के साथ ‘कट’ की आवाज हुई।
हॉल रोशनी से भर गया।
और!
एक चीख गूंजी।
दयाचन्द की चीख थी वह!
लाश ने अपना डरावना चेहरा उठाकर ऊपर देखा।
दयाचन्द बॉल्कनी में खड़ा था—खड़ा क्या था, अगर यह लिखा जाये तो ज्यादा मुनासिब होगा कि थर-थर कांप रहा था वह—लाश को देखकर घिग्घी बंधी हुई थी—आंखें इस तरह फटी पड़ी थीं मानो पलकों से निकलकर जमीन पर कूद पड़ने वाली हों जबकि लाश ने उसे घूरते हुए पूछा—“पहचाना मुझे?”
“अ-असलम!” दयाचन्द घिघिया उठा—“न-नहीं—तुम जिन्दा नहीं हो सकते।”
“मैंने कब कहा कि मैं जिन्दा हूं?”
“फ-फिर?”
“कब्र में अकेला पड़ा-पड़ा बोर हो रहा था—सोचा, अपने यार को ले आऊं!”
“तुम कोई बहरूपिये हो।” दयाचन्द चीखता चला गया—“खुद को असलम की लाश के रूप में पेश करके मेरे मुंह से यह कुबूलवाना चाहते हो कि असलम की हत्या मैंने की थी।”
“वाह! मेरी हत्या और तूने?” लाश व्यंग्य कर उठी—“भला तू मेरी हत्या क्यों करता दयाचन्द—दोस्त भी कहीं दोस्त को मारता है और फिर हमारी दोस्ती की तो लोग मिसाल दिया करते थे—कोई स्वप्न में भी नहीं सोच सकता कि दयाचन्द असलम की हत्या कर सकता है।”
“तो फिर तुम यहां क्यों आये हो?” दयाचन्द चीख पड़ा—“कौन हो तुम?”
“कमाल कर रहा है यार—बताया तो था, कब्र में अकेला पड़ा-पड़ा बोर …।”
“तू इस तरह नहीं मानेगा हरामजादे!” खौफ की ज्यादती के कारण चीखते हुए दयाचन्द ने जेब से रिवॉल्वर निकाल लिया, गुर्राया—“बोल … कौन है तू?”
जवाब में चेहरा ऊपर उठाये लाश खिलखिलाकर हंस पड़ी—कोठी में ऐसी आवाज गूंजी जैसे खूनी भेड़िया थूथनी उठाये जोर-जोर से रो रहा हो।
भयाक्रांत होकर दयाचन्द ने पागलों की मानिन्द ट्रेगर दबाना शुरू कर दिया।
धांय … धांय … धांय!
गोलियों की आवाज दूर-दूर तक गूंज गयी।
मगर आश्चर्य!
उसके रिवॉल्वर से निकली कोई गोली लाश का कुछ न बिगाड़ सकी।
सभी गोलियां उसके जिस्म के आर-पार होकर हॉल की दीवारों में जा धंसीं—नरकंकाल थूथनी ऊपर उठाये भयानक अंदाज में ठहाके लगा रहा था।
रिवॉल्वर खाली हो गया। हंसना बन्द करके लाश ने दांत किटकिटाये—खौफनाक किटकिटाहट सारे हॉल में गूंज गई, जबड़े हिले—“मुझे दुबारा मारना चाहता है दयाचन्द—तू भूल गया, दो बार कोई नहीं मरा करता।”
दयाचन्द के होश फाख्ता हो गए।
जुबान तालू से जा चिपकी।
जड़ होकर रह गया वह, हिल तक नहीं पा रहा था।
“मैं आ रहा हूं दयाचन्द!” इन शब्दों के साथ लाश उस जीने की तरफ बढ़ी जो हवा में इंग्लिश के अक्षर ‘जैड’ का आकार बनाता हुआ बॉल्कनी तक चला गया था।