Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 116 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 162

सोनी ने हिम्मत जुटा और बोली ला उसे दिन जो काम छूट गया था उसे पूरा कर देती हूं। सूरज ने कुछ बोला नहीं वह इस सुनहरे मौके को कतई नहीं खोना चाहता था। उसने अपने हाथ से अपनी चड्डी को झट से नीचे कर दिया सूरज का तना हुआ लंड उछाल कर बाहर आ गया और सोनी उसकी खूबसूरती में एक बार फिर से खो गई.. उसका दिल तेजी से धड़क रहा था जिसका असर उसकी चुचियों पर स्पष्ट दिखाई दे रहा था।



कांपते हाथों से सोनी ने एक बार फिर उस दिव्य पर प्रतिबंधित लंड को अपनी हथेलियों से छूने की कोशिश की और जब एक बार वह बना हुआ लंड सोनी की झाग से सनी हथेलियां के बीच आ गया मर्यादा की दीवार पिघल कर पानी पानी हो गई।



सूरज ने बिना कहे अपनी आंखें बंद कर ली पर वह सोनी की हथेली को अपने लंड पर आगे पीछे घूमते महसूस करने लगा।

अब आगे..

सोनी ने अपने हाथों से लंड की चमड़ी को नीचे किया और उसके फूले हुए सुपाड़े को अनावृत्त कर दिया लंड का सुपड़ा पहले ही फुल कर मशरूम की तरह लाल हो चुका था सोनी के हाथ लगाने से सूरज की उत्तेजना चरम पर पहुंचने लगी….वह बार-बार एक ही बात मन ही मन बोल रहा था

मौसी …आह….तनी धीरे से…

सोनी लंड में आ रहे उछाल को महसूस कर रही थी और उसकी हरकतों पर बारीकी से नजर रखे हुए थी..

तभी सूरज ने प्रश्न किया..

मौसी ऐसा क्यों होता है कि जब तुम अंगूठे को छूती हो तो यह तन जाता है पर जब मां ने अंगूठे को छुआ तो कुछ भी नहीं हुआ, कुछ तो बात है …

दरअसल सूरज बातचीत से इस असहज स्थिति को सहज करना चाह रहा था।

सोनी ने सहजता से मुस्कुराते हुए जवाब दिया

अब तू तो इससे ही पूछ …मुझे क्या पता तेरे मन में मुझे लेकर क्या चल रहा है ?

सूरज ने सोनी को अपने आलिंगन में भरने की कोशिश की और बोला

मौसी तुम तो मेरे लिए ईश्वर का वरदान हो। तुम्हारे कारण ही मुझे यह सुख देखने को मिला है वरना आज तक मैंने कभी इस सुख का अनुभव नहीं किया था।

सोनी ने सूरज के लंड को एक बार फिर अपने हाथों से मसलते हुए कहा

किस सुख की बात कर रहा है?

सूरज ने अपने हाथ से सोनी की हथेली पकड़ ली और स्वयं सोनी की हथेली को अपने लंड पर आगे पीछे करते हुए कहा ..

इसी सुख का मौसी..

सोनी मुस्कुराने लगी …वह स्वयं उसके आलिंगन में आ गई पर उसने सूरज के लंड को नहीं छोड़ा अपितु उसे धीरे-धीरे आगे पीछे करती रही।

मौसी एक बात बताओ इसका तनाव कम कैसे हो जाता है तुम क्या ऐसा करती हो…?

सोनी अब सूरज के साथ सहज हो चली थी उसने सूरज को छेड़ते हुए पूछा

अभी कर दूं ?

मौसी यह जादू तो तुम्हारे पास है जब चाहे कम कर दो जब चाहो इसमें ताकत भर दो तुम्हारी मर्जी .मैं तो तुम्हारा गुलाम हूं

सोनी हंसने लगी सूरज पूरी तरह सोनी पर समर्पित हो चुका था.

अच्छा ठीक है एक बार करके देखती हूं..फिर वापस ताकत भर दूंगी..

सोनी झुककर अपने घुटनों के बल आ गई और उसने अपनी नज़रें ऊपर उठा कर देखी.

सूरज ने अपनी पलके बंद की हुई थी आज सोनी को सूरज को दिशा निर्देश देने की जरूरत नहीं हुई और उसने एक बार फिर अपनी हथेली से लंड को आगे पीछे कर दिया ऐसा लगा जैसे सोनू की तड़प मुकाम तक पहुंच चुकी है।

सोनी ने अपने होठों को गोल किया और एक बार फिर अपने गोल होठों से सूरज के लंड को छू लिया। हमेशा की तरह गुब्बारे से हवा निकल गई और सूरज का तना हुआ लंड सामान्य स्थिति में आ गया।

सूरज ने अपनी पलके खोली उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा सोनी के होठों और अपने लंड पर लगे समान झाग को देखकर सूरज को अंदाज हो गया कि उसकी मौसी ने क्या किया था…

सूरज ने कुछ भी ना कहा और एक बार फिर अपना अंगूठा सोनी के समक्ष ला दिया। आग्रह स्पष्ट था सोनी ने उसी स्थिति में सूरज के अंगूठे को वापस सहलाकर लंड को पूर्व की तनी हुई अवस्था में ला दिया…और एक बार फिर अपने होठों को गोलकर उसे छूने की कोशिश की। इससे पूर्व उसने सूरज की तरफ देखा और सूरज ने बिना कुछ कहे अपनी आंखें बंद कर ली।

सोनी ने एक बार फिर अपने होंठ से सूरज के लंड को छुआ पर इस बार सोनू का लंड तना ही रहा …सोनी के लिए यह घटनाक्रमअनोखा था।

वह मन ही मन घबरा गई कि आखिर ऐसा क्या हुआ? उसने अपने होठों से लंड को और भी ज्यादा छूने की कोशिश की यहां तक कि उसने अपने होठों से उसके लंड को लगभग पकड़ भी लिया फिर भी तनाव जस का तस था।

सोनी को पसीना छूटने लगा उसे इस बात का इल्म न था कि उसने सूरज का अंगूठा पकड़ रखा है सोनी लंड के सुपारे को अपने होठों के बीच लेकर दबाती रही कभी इधर से कभी उधर से पर लंड का तनाव न सिर्फ कायम रहा अपितु सूरज की उत्तेजना की वजह से लंड और तेजी से उछलने लगा।

सोनी को इस बात का आभास था कि यदि सूरज के लंड का तनाव कम नहीं हुआ तो यह किसी और तरीके से भी कम नहीं होगा और यदि ऐसा हुआ तो निश्चित ही यह बात सुग़ना तक पहुंच जाएगी। हे भगवान .. वह सुगना को क्या मुंह दिखाएगी ? जितना ही वह इस बारे में सोचती उतनी तेजी से ही सूरज के लंड को छोटा करने के लिए अपने होठों को अनेकों अनेक प्रकार से उसके लंड के सुपाड़े के ऊपर घूमाती उसने अपनी जीभ का भी प्रयोग करने से परहेज न किया और सूरज के लंड के सुपाड़े को अपने होठों के बीच दबाए हुए अपनी जीभ से उसे छूती रही।

सूरज ने भी अपनी आंखें खोल ली और नीचे की तरफ देखा उसके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा उसकी मौसी उसके लंड के सुपाड़े को अपने होठों से दबाते हुए तरह-तरह के प्रयास कर रही थी।

हे भगवान क्या सोनी मौसी उसका लंड चूस रही है.. यह सूरज की कल्पना से परे था परंतु उसकी आंखें हकीकत देख रही थी।

सूरज आनंद के सागर में डूबा हुआ था उसने सोनी को उसी स्थिति में छोड़ दिया और अपनी पलके बंद कर ली…और इस अद्भुत सुख का आनंद लेने लगा। इसे मुखमैथुन की संज्ञा तो नहीं दी जा सकती परंतु यह एक अनाड़ी महिला द्वारा दिए जा रहे मुख मैथुन से कम भी नहीं था।

परंतु सोनी की स्थिति बुरी थी। यदि सूरज का लंड का तनाव कम नहीं हुआ तो वह क्या करेगी। यह बात जग जाहिर हो जाएगी और उसे शर्मिंदगी का सामना करना पड़ेगा।

उसने सूरज को कुछ पलों के लिए छोड़ दिया…होठों के बीच फसा लंड भी और उंगली के पकड़ा सूरज का अंगूठा भी। सोनी अपनी सांसों पर काबू पाने का प्रयास करने लगी। अब भी वह अपने घुटनों के बल ही बैठी थी। चेहरे पर तनाव स्पष्ट था.. जिसे वह अपनी दोनों हथेलियां से छुपाए हुए थी।

क्या हुआ मौसी सूरज ने सोनी के चेहरे पर तनाव महसूस कर लिया..

सूरज स्वयं डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था सोनी ने उसे कुछ भी छुपाना उचित नहीं समझा आखिर सोनी ने सूरज को लंड का तनाव कम करने की अपनी तरकीब बता दी जो आज उसके अनुसार काम नहीं कर रही थी एक पल के लिए सूरज भी घबरा गया और बोला

मौसी एक बार फिर ट्राई करते हैं..

सोनी ने हिम्मत जुटाई उसने सूरज की तरफ देखा पर इस बार सूरज ने अपनी पलके बंद नहीं की बल्कि मुस्कुरा कर सोनी को देखा जैसे उसे प्रोत्साहित कर रहा हो

सोनी ने एक बार फिर अपने होंठ गोल किए और सूरज के तने हुए लंड के सुपाड़े को होठों के बीच भरने की कोशिश की..

आखिरकार वही हुआ जो हमेशा से होता आया है सूरज के लंड का तनाव एक बार फिर कम हो गया। सोनी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने सूरज की तरफ देखा सूरज ने भी अपनी प्यारी मौसी की तरफ देखा और उनके चेहरे पर सुकून देखकर सूरज ने अपनी बाहें खोल दी.. सोनी उठी और बिना कुछ कहे सूरज और सोनी एक दूसरे के आलिंगन में आ गए…

पहली बार सोनी सूरज के के आलिंगन में पूरी आत्मीयता से आई थी। सूरज ने भी आज सोनी को अपने आलिंगन में कस लिया सोनी का सर सूरज के कंधे पर था और दोनों के गाल सटे हुए थे तभी सूरज ने सोनीकी पीठ को अपने हाथों से सहलाते हुए उसके कान में धीरे से कहा

मौसी सब कुछ तो पहले जैसा ही है क्यों घबरा गई थी।

सूरज की आवाज सोनी के कानों में बड़ी दूर से आतीहुई सुनाई पड़ रही थी…वह अब भी उसी बारे में सोच रही थी।

सोनी का दिल अभी तेजी से धड़क रहा था और यह धड़कन सूरज भी महसूस कर पा रहा था।

अचानक सोनी को ध्यान आया कि उसने पिछली बार सूरज का अंगूठा उस समय अपने उंगलियों से पकड़ रखा था…सोनीकी आंखों में चमक आ गई वह अचानक ही सूरज के आलिंगन से बाहर आ गई और एक बार फिर घुटने के बाल नीचे बैठ गई…

क्या हुआ मौसी.. सूरज ने आश्चर्य से पूछा..

सोनी ने कुछ कहा नहीं बल्कि सूरज का वह जादूई अंगूठा अपनी उंगलियों के बीच लेकर एक बार फिर सहलाने लगी।

लंड एक बार फिर पूरी तरह तन कर तैयार था। सोनी ने अपने होंठ गोल करके अंगूठे को अपनी उंगलियों से आजाद किया और अपने होठों से एक बार फिर सूरज के लंड सुपाड़े को छुआ परिणाम आशा अनुरूप ही रहा।

सोनी के चेहरे पर आत्मविश्वास जाग उठा यह विश्वास कुछ वैसा ही था जैसे किसी वैज्ञानिक का प्रयोग सफल रहा हो।

दोबारा सोनी ने वही काम किया फिर सूरज के जादूई अंगूठे को रगड़ा और एक बार फिर लंड वापस तन गया इस बार सोनी ने उसे अंगूठे को अपनी उंगलियों में दाबे ही रखा और होंठो को गोलकर सुपाड़े को छूने की कोशिश की लंड का तनाव कम नहीं हुआ। सोनी ने उत्साह में सूरज के लगभग एक चौथाई लंड को अपने मुंह में भर लिया और लगभग चूसने की कोशिश की परंतु तनाव जस का तस कायम रहा।

सोनी को यह विश्वास हो गया कि जब तक वह अंगूठे को अपने उंगलियों में दाबे रखेगी तब तक वह चाहे लंड को जितना चूमे चाटे उसका तनाव कम नहीं होगा।

सोनी मन ही मन सहज हो गई। जब दिमाग का तनाव खत्म हुआ सोनीकी वासना सर उठाने लगी । सूरज का खूबसूरत लंड उसके होठों के बीच था लंड से आ रही मर्दाना खुशबू उसके नथुनों में भर रही थी लंड से निकल रही वीर्य की पतली लार उसके होठों के लार से मिल रही थी जिसका एहसास सोनी को बखूबी हो रहा था। जैसे-जैसे वासना जवान होती गई सूरज का लंड सोनीके मुख में और गहरे तक प्रवेश करता गया एक पल के लिए सोनी भूल गई कि वह अपने पुत्र समान सूरज का लंड चूस रही है।

उधर सूरज की उत्तेजना चरम पर थी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी मौसी इस समय लगभग उसका लंड चूस रही है उसने सोनी को नहीं रोका अपितु अपनी उत्तेजना को रोकने की कोशिश की ताकि वह अपने स्खलन को कुछ देर और खींच सके और इस अद्भुत सुख का आनंद ले सके…

कुछ पल के लिए शांति कायम थी सिर्फ सोनी के होठों की चप- चाप की आवाजआ रही थी सोनी सब कुछ भूल कर अपनी वासना के अधीन सूरज के लंड को बेतहाशा चूम रही थी चाट रही थी।

आज सोनी को पहली बार सूरज की बड़े लंड को करीब से देखने चूमने और महसूस करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था इस लंड की कल्पना सोनी न जाने कब से करती आई थी। वह इस आज अवसर पर अपनी सारी मर्यादाएं भूल कर अपनी वासना में डूबी इस सुख काआनंद ले रही थी।

सोनी इस कला में माहिर थी और सूरज का यह पहला अनुभव था। जैसे कोई बालक किसी पहलवान के साथ दंगल में उतर आया हो। आखिरकार सूरज के अंडकोश लगातार रिसते हुए वीर्य को और संभाल पाने में नाकाम रहे और उन्होंने अपना मुख खोल दिया।

वीर्य की पहली धार सोनी के हलक में उतर गई । सोनी ने अपना मुंह पीछे हटने की कोशिश की परंतु सूरज को न जाने क्या सूझा उसने सोनी के सर को अपने अपने एक हाथ से पकड़ लिया और अपने लंड की तरफ खींचे रखा।

सोनी को यह थोड़ा नागवार गुजरा उसने अपनी आंखें ऊपर करके सूरज को देखा एक पल के लिए सूरज और सोनी की नजरे मिली भी। सूरज थोड़ा शर्मसार भी हुआ परंतु उसने अपनी आंखें बंद कर ली पर सोनी के सर को अपने लंड की तरफ खींचे ही रखा।

सूरज इस हवेली की मालकिन और इस घर की दूसरी सम्मानित महिला जो उम्र में उसे 15 17 साल बड़ी थी के साथ जिस तरह बर्ताव कर रहा था इसकी उम्मीद सोनी को कतई नहीं थी।

बहरहाल सोनी के पास इस वक्त कोई और चारा नहीं था। सूरज का लंड लावा उगलता रहा और सोनी के हलक और मुंह में भरता रहा। सोनी ने यह अनुभव पहले भी किया था पर इतना सारा वीर्य….. उसने पहली बार महसूस किया था। सोनी के होठों से अब वीर्य छलक छलक कर बाहर आ रहा था। शायद वह उसे मुंह में रख पाने की स्थिति में नहीं थी और अब वह तृप्त हो चुकी थी।

सूरज जब पूरी तरह बरस चुका था उसने सोनीके सर पर पकड़ ढीली की और तभी सोनी ने अपना सर पीछे कर लिया और सूरज से अलग हो गई। अलग होने के पश्चात सोनी ने सूरज का वह जादूई अंगूठा भी छोड़ दिया जो अब तक उसने पकड़ा हुआ था।

परंतु सूरज का लंड अब भी तना हुआ था शायद सोनी ने उसके अंगूठे को अपना सर हटाने के बाद ही छोड़ा था।

सोनी हाफ रही थी उसके मुंह में सूरज का वीर्य अब भी रिस रहा था होठों पर वीर्य की लकीरें अब भी चमक रही थी।

सूरज को अपनी गलती का एहसास हो चुका था वह घुटनों के बल सोनी के समक्ष नीचे बैठ गया…

और सोनी के दोनों गालों को अपने हाथों से पकड़ कर अपना चेहरा सोनी के समक्ष ले आया और बेहद भावुकता और प्यार से बोला

मौसी मुझे माफ कर दीजिए मैं खुद पर कंट्रोल नहीं रख पाया…

सोनी अभी अपनी पलकें बंद की हुई थी शायद वह सूरज से नजरे मिला पाने में शर्मिंदगी महसूस कर रही थी।

सोनी से कोई उत्तर न पाकर सूरज अधीर हो गया.. मौसी मुझे माफ कर दीजिए बार-बार यही बात कहते हुए उसने सोनी के माथे को चूम लिया।

सोनी धीरे धीरे अब सहज हो चली थी। आखिरकार सूरज ने उसे कोई जबरदस्ती तो नहीं की थी लंड चूसने का फैसला उसका खुद का था। उसने सूरज को वासना के अभिभूत होकर की गई उसे गलती के लिए माफ कर दिया।

उसने एक पल के लिए अपनी पलके खोली और चुंबन की मुद्रा में अपने होठों को गोल किया …सूरज ने यह समझा जैसे उसकी मौसी उसे चुंबन लेना चाह रही हो।

अगले ही पल सूरज ने अपने होंठ सोनी के होठों से सटा दिए । सोनी के होठों पर अब भी सूरज का वीर्य लिपटा हुआ था। परंतु सूरज पूरी तरह से भावुक था उसने सोनी के होठों को अपने होठों के बीच लेकर चुंबन शुरू कर दिया। चुंबन में सूरज पहले भी एक्सपर्ट था उसने अपनी कॉलेज की दोस्त रोजी के साथ यह कला सीख ली थी परंतु अपनी मौसी के खुद की वीर्य से सने होठों चूमने का अनुभव अलग था।

सूरज सोनी को बेतहाशा चूमने लगा सोनी आश्चर्यचकित थी। उसने तो अपने होठों को उसके माथे को चूमने के लिए गोल किया था परंतु यहां चुंबन का प्रारूप बदल चुका था। सोनी को सूरज का बचपन याद आ रहा था जब वह अक्सर उसके होठों पर चुंबन ले लिया करता था। अब जब एक बार सोनी ने सूरज के चुंबन में एक अलग आकर्षण महसूस किया वह स्वयं भी न जाने कब इस चुंबन में अपना योगदान देने लगी।

नियति मुस्कुरा रही थी सूरज और सोनी दोनों अन्य प्रेमी की भांति एक दूसरे को चुंबन ले रहे थे..

नियति बड़ी आत्मीयता और अनोखे प्रेम में डूबे दो युवा दिलों को करीब आते देख रही थी और आने वाले समय की पटकथा लिख रही थी।

 
सच कह रहे हैं अभी कई सारे राज खुलने बाकी हैं
 
लगता है कई सारे पुराने पाठक कहानी के पटल से गायब हो चुके हैं लिखने का उत्साह तभी रहता है जब सबका साथ मिलता रहे। देखते हैं कबतक उत्साह कायमरहता है
 
अधेड़ सुंदरी सोनी की योनि के बारे चार शब्द..

अधेड़ उम्र की दहलीज पर खड़ी स्त्री की देह किसी पुरानी शराब की तरह होती है, जिसमें समय का ठहराव और अनुभवों की एक मादक गंध बसी होती है। उसकी योनि, जिसे प्रकृति ने सृजन और सुख का द्वार बनाया है, इस अवस्था में एक परिपक्व गरिमा धारण कर लेती है। वह अब केवल मांस का एक हिस्सा भर नहीं, बल्कि एक 'रहस्यमयी गुफा' के समान प्रतीत होती है, जिसकी कोमलता में समय की सघनता घुली होती है।

उसका रंग समय के साथ थोड़ा गहरा और सांवला होकर और भी कामुक हो जाता है, जैसे किसी कीमती महोगनी की लकड़ी पर पॉलिश निखर आई हो। उसके 'लेबिया' (होंठ) अब और भी अधिक मांसल और रसीले जान पड़ते हैं, जो अपनी मखमली परतों के भीतर एक शाश्वत ऊष्मता को समेटे रहते हैं। जब कामोत्तेजना का ज्वार उठता है, तो उन परतों के बीच से रिसता हुआ पारदर्शी 'काम-रस' किसी ओस की बूंद की तरह चमकने लगता है, जो उस स्थान की मखमली चिकनाहट को और भी फिसलन भरा और आमंत्रित बना देता है।

वहाँ की त्वचा का वह रेशमी अहसास और भीतर की वह गहरी, गीली गर्माहट किसी भी पुरुष को अपनी ओर खींचने का जादुई सामर्थ्य रखती है। वह स्थान एक ऐसे 'अतृप्त कुंड' की भाँति होता है, जहाँ पहुँचकर समय रुक जाता है और केवल आदिम संवेदनाएँ शेष रह जाती हैं। उसकी हर एक सिलवट और हर एक उभार एक अनुभवी तृप्ति की कहानी कहता है, जो किसी भी युवा आकर्षण से कहीं अधिक प्रगाढ़, गहरी और सम्मोहक होती
 
भाग 163

सूरज, सोनी को बेतहाशा चूमने लगा। सोनी आश्चर्यचकित थी। उसने तो अपने होठों को उसके माथे को चूमने के लिए गोल किया था, परंतु यहाँ चुंबन का प्रारूप बदल चुका था। सोनी को सूरज का बचपन याद आ रहा था, जब वह अक्सर उसके होठों पर चुंबन ले लिया करता था। अब जब एक बार सोनी ने सूरज के चुंबन में एक अलग आकर्षण महसूस किया, वह स्वयं भी न जाने कब इस चुंबन में अपना योगदान देने लगी।



नियति मुस्कुरा रही थी। सूरज और सोनी दोनों अन्य प्रेमियों की भाँति एक-दूसरे को चूम रहे थे। नियति बड़ी आत्मीयता और अनोखे प्रेम में डूबे दो युवा दिलों को करीब आते देख रही थी और आने वाले समय की पटकथा लिख रही थी।

अब आगे

इधर सोनी और सूरज एक-दूसरे के चुंबन में लगभग खो गए। चुंबन की प्रगाढ़ता बढ़ती जा रही थी। सूरज अपनी जीभ से सोनी के मुख की गहराई नापने का प्रयास कर रहा था और सोनी इसका आनंद ले रही थी। धीरे-धीरे दोनों अपने घुटनों के बल लगभग खड़े हो गए। सोनी, सूरज के आलिंगन में आती चली गई। सूरज अपनी मजबूत मर्दाना बाँहों से सोनी को अपने और करीब लाता गया और सोनी 'अमरबेल' की तरह सूरज से लिपटती चली गई। सूरज को सोनी के भारी और मुलायम चूचियों का एहसास अपने सीने पर हो रहा था। वह इस उत्तेजना को महसूस कर रहा था। उसका लंड अब भी उसी तरह तना हुआ था, इसका एहसास सोनी को तब हुआ जब सूरज ने उसे सोनी के पेडू (पेट के निचले हिस्से) से सटाने की कोशिश की। सटाना ही क्या, उसने दबाव बनाकर अपनी मंशा जाहिर कर दी थी।

सोनी का ध्यान अपनी जांघों के बीच प्यासी बुर पर गया जो पूरी तरह भीग चुकी थी। जब सोनी को अपनी नग्नता का एहसास हुआ, वह शर्म से पानी-पानी हो गई। वह क्या कर रही थी? अपने पुत्र समान सूरज से इस तरह की नजदीकी! उसने शायद इसकी कल्पना नहीं की थी कि सब कुछ इतनी तेजी से घटित होगा। उसकी चेतना ने उसका मार्ग रोक लिया और उसे और आगे बढ़ने से टोक दिया। वह सूरज के आलिंगन से बाहर आने की कोशिश करने लगी।

सूरज ने धीमी आवाज में पूछा, "मौसी, क्या हुआ?"

सोनी ने बात टालते हुए कहा, "अरे, तुझे डॉक्टर के पास भी जाना है, अब तू नहा ले। मैं जाती हूँ, तेरे बाद मुझे भी नहाना होगा।"

सूरज चाहता तो था कि यह पल कभी खत्म न हो। उसकी अंतरात्मा ने मन ही मन पुकारा— 'मौसी रुक जाओ ना, साथ में ही नहा लेते हैं'—पर सूरज के मन की बात मन में ही रह गई। सोनी बाथरूम से बाहर आ चुकी थी और अपने कमरे में अब से कुछ देर पहले आए भूचाल और उसकी आंच को महसूस कर रही थी। आज जो हुआ था, उसे नहीं होना चाहिए था, पर उसका तन-बदन इस बात का पुरजोर विरोध कर रहा था।

जैसे-जैसे दिमाग अपना कार्य करता जाता है, मनुष्य की इंद्रियाँ उसके वश में आने लगती हैं। सोनी भी कुछ ही देर में अपनी चेतना में वापस आ चुकी थी और सूरज बाथरूम से बाहर निकल रहा था। सूरज ने सोनी की तरफ देखा, परंतु सोनी ने अपनी नजरें नहीं उठाईं। वह नजरें मिलाने में कतरा रही थी। सूरज ने अपने कपड़े उठाए और दरवाजा खोलकर अपने कमरे में जाने के लिए सोनी के कक्ष से निकल गया।

सोनी ने बाथरूम में प्रवेश किया, अपनी नाइटी उतारी और आदमकद आईने में खुद को देखकर मुस्कुराने लगी। आज भी वह अपने खूबसूरत बदन से कयामत ढाने को तैयार थी। खूबसूरत सा तराशा हुआ बदन अधेड़ अवस्था में पहुँचने को तैयार था, परंतु उसकी कसी हुई जवानी उम्र को धता बताते हुए उसे एक युवा महिला जैसा अहसास करा रही थी। सोनी की निगाह अपनी जांघों के बीच गई। उसने अपने पेडू को हाथ से थोड़ा दबाया और अपनी बुर की झलक पाने की कोशिश की। उंगलियों से उसने उस स्थान को छुआ जो पूरी तरह काम-रस में डूबा हुआ था। उंगलियों पर चिपचिपा सा गाढ़ा रस लग चुका था।

सोनी ने अपनी उंगलियों से उस रस को महसूस किया और हमेशा की तरह उसे अपनी नासिका के समीप ले आई। उसे अपने शरीर की वह गंध बहुत मदहोश करती थी। एक बार फिर सोनी की वासना ने उसके जेहन में सूरज की नग्न तस्वीर ला दी। सोनी ने एक मीठी आह भरी और शावर खोल दिया। शावर से गिरती बूंदें सोनी के अतृप्त बदन को भिगोने लगीं। सोनी के हाथ उसके बदन पर घूमने लगे और कुछ ही देर बाद शरीर पर लगे सारे वीर्य के निशान मिटते चले गए।

सोनी स्नान कर बाथरूम से बाहर आ गई, पर उसके मन और अंतरात्मा में एक दाग लग चुका था। सोनी ने आज जो किया था, क्या वह सही था? यह उसके जेहन में एक द्वंद्व के रूप में पलने लगा था। आज का यह दिन सोनी और सूरज के बीच एक नया अध्याय लिख चुका था।

सोनी, सूरज को लेकर डॉक्टर के पास गई। वहाँ उसका प्लास्टर खुलवाया और कई सावधानियाँ नोट कीं। डॉक्टर ने अगले एक हफ्ते तक सूरज के उस हाथ की मालिश करने के लिए कहा जिसका प्लास्टर उतरा था। विडंबना यह थी कि वह जादुई अंगूठा भी उसी हाथ में था। सोनी ने इस बात पर ज्यादा गौर नहीं किया, पर सूरज की तो 'बल्ले-बल्ले' हो गई थी।

उसने जानबूझकर डॉक्टर से दोबारा पूछा, "मालिश कब करनी है? सुबह या शाम?"

यह प्रश्न बचकाना था, परंतु पूछना जरूरी था। डॉक्टर ने पूरी संजीदगी से कहा, "एक बार सुबह और एक बार शाम को सोने से पहले।"

डॉक्टर की क्लीनिक से बाहर निकलते समय सूरज के कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उसके कानों में डॉक्टर के शब्द किसी मधुर संगीत की तरह गूँज रहे थे— "दिन में दो बार मालिश करनी होगी।" यह केवल एक डॉक्टरी सलाह नहीं थी, बल्कि सूरज के लिए उस स्वर्ग का द्वार था जिसे वह चख चुका था।

सूरज के मन में रह-रहकर बाथरूम का वह दृश्य कौंध रहा था। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी शालीन और मर्यादित 'मौसी' इस कदर अपनी सीमाओं को लांघ देंगी। जब सोनी ने घुटनों के बल बैठकर अपनी कोमल हथेलियों से उसके तने हुए लंड को थामा था और फिर उसे अपने मुख की ऊष्णता में समेटा था, तो सूरज की चेतना जैसे शून्य हो गई थी। वह मुख-मैथुन का सुख उसके जीवन का सबसे प्रगाढ़ और अविश्वसनीय अनुभव था। सोनी की जीभ का वह मखमली स्पर्श और उसके मुख का वह गीलापन सूरज की रगों में अभी भी लावा बनकर दौड़ रहा था।

उधर सोनी के अंतर्मन में इस समय एक भीषण कुरुक्षेत्र सजा हुआ था। एक तरफ बरसों से ओढ़ी गई 'रिश्तों की मर्यादा' की चादर थी, तो दूसरी तरफ 'अदम्य वासना' का वह सैलाब जिसने आज दोपहर सारी बांध तोड़ दी थी।

डॉक्टर के यहाँ से लौटते वक्त वह कार की खिड़की से बाहर देख तो रही थी, पर उसे सड़क नहीं, बल्कि बाथरूम का वह धुंधला और कामुक दृश्य दिखाई दे रहा था।

सोनी का विवेक उसे रह-रहकर धिक्कार रहा था। उसकी अंतरात्मा चीख-चीखकर कह रही थी— "सोनी, यह तूने क्या किया? वह तेरे बेटे जैसा है, उसके सामने घुटने टेककर तूने अपने चरित्र की सारी गरिमा धूल में मिला दी।" उसे डर था कि अगर सूरज की नजरों में उसका सम्मान गिर गया, तो वह फिर कभी सिर उठाकर जी नहीं पाएगी।

वह खुद को 'कुलटा' और 'पापिनी' जैसे शब्दों से तौल रही थी, जिसने एक युवक के भविष्य और पवित्र रिश्ते को कलंकित किया।

लेकिन जैसे ही वह अपनी आँखें मूँदती, उसे सूरज की वह मजबूत मर्दाना बाँहें और उसके शरीर की वह सोंधी गंध याद आ जाती।

कार के शीशे से बाहर देखते हुए सोनी की पलकें कब आपस में मिल गईं, उसे खुद भी पता नहीं चला। बाहरी दुनिया का शोर थम गया और उसके बंद नेत्रों के भीतर एक अंधेरा कमरा और उसमें चमकता सूरज का वह प्रचण्ड पुरुषत्व किसी दिव्य प्रतिमा की तरह उभर आया।

सोनी के जेहन में उस लंड की जो छवि घूम रही थी, वह किसी कोमल स्पर्श से कहीं अधिक एक जादुई सम्मोहन था। वह केवल मांस की कोई संरचना नहीं थी, बल्कि कुदरत द्वारा तराशा गया एक मखमली स्तंभ था। उसकी सुडौल लंबाई किसी राजसी दंड की भाँति गौरवशाली थी, जो अपनी शक्ति और दृढ़ता का मूक उद्घोष कर रही थी। सोनी को याद आया कि उसका रंग शेष देह से थोड़ा गहरा, सांवला और किसी कीमती रेशम की तरह चिकना था। उस पर उभरी हुई बारीक नीली नसें किसी नदी की धाराओं की तरह फैली हुई थीं, जो उसमें दौड़ते हुए गर्म और उफनते रक्त की गवाह थीं।

उसका सिरा (Top) किसी अधखिले लाल गुलाब की पंखुड़ी की तरह मांसल, कोमल और बेहद संवेदनशील था। उस चिकने मुकुट पर काम-रस की एक पारदर्शी और नन्हीं सी बूंद किसी ओस के मोती की तरह चमक रही थी, जो सोनी को अपनी ओर खींच रही थी। वह अंग इतना कठोर, सुगठित और बलिष्ठ था कि उसे देखकर ही सोनी के अंतर्मन में एक सिहरन दौड़ गई। उसे याद आया कि जब उसने उसे अपने हाथ में थामा था, तो उसकी मुट्ठी में वह समा नहीं पा रहा था; उसकी मोटाई और उसका वह भारीपन सोनी के भीतर एक आदिम प्यास जगा गया था।

सोनी उस बंद आँखों के अंधेरे में भी उस खूबसूरत और लम्बे लंड की भव्यता से इस कदर सम्मोहित थी कि उसे लगा जैसे वह कोई देवी हो और वह अंग उसका आराध्य। उसकी कल्पना में वह अंग अब केवल एक शारीरिक अंग नहीं रह गया था, बल्कि एक ऐसी जादुई कुंजी बन चुका था जो उसकी बरसों से बंद पड़ी देह की कोठरी के ताले खोल सकता था। उस छवि की सुंदरता ने सोनी के भीतर एक ऐसी मीठी कसक पैदा कर दी कि उसने अनजाने में ही अपनी जांघों को आपस में कस लिया।

हवेली के पोर्च में कार के रुकते ही टायरों की तीख ने सोनी की तंद्रा को झटके से तोड़ दिया। वह अभी भी अपनी कल्पनाओं के उस मखमली पर अतृप्त संसार में खोई हुई थी, जहाँ सूरज का वह प्रचंड पुरुषत्व उसकी चेतना पर राज कर रहा था। अचानक हकीकत से सामना हुआ, तो वह हड़बड़ा गई। कार का दरवाजा खुला और बिना सूरज की तरफ देखे, बिना एक शब्द बोले, वह लगभग भागते हुए हवेली के भीतर दाखिल हो गई। उसके सैंडलों की आवाज हवेली के हाल में गूंज रही थी। सोनी अपने कमरे में प्रवेश कर गई। उसके कमरे का दरवाजा बंद हो गया।

कमरे की ओट में आते ही सोनी ने पीठ दरवाजे से टिका दी और उसकी सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं। उसके भीतर एक भयानक युद्ध छिड़ गया था—मर्यादा बनाम वासना।

उसका विवेक उसे बुरी तरह धिक्कारने लगा। वह खुद को आईने में देखने से कतरा रही थी।

"सोनी, तू पागल हो गई है? वह तेरा भांजा है! उसे लग रहा था कि उसने अपने खानदान की इज्जत और अपने चरित्र की पवित्रता को बाथरूम की उस दहलीज पर ही नीलाम कर दिया है। वह खुद को एक 'अपराधी' महसूस कर रही थी, जिसने एक मासूम रिश्ते में कामुकता का जहर घोल दिया था।

लेकिन जैसे ही वह शांत होने की कोशिश करती, उसकी बंद आँखों के पीछे फिर वही 'मखमली स्तंभ' लहलहाने लगता। वह चाहकर भी उस अंग की सुडौलता, उसकी लंबाई और उस पर रिसती 'काम-रस' की उस पारदर्शी बूंद को दिमाग से निकाल नहीं पा रही थी।

सोनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब आने वाली शाम थी। डॉक्टर ने मालिश का जो आदेश दिया था, वह उसके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था।

अगर वह मालिश करने गई, तो वह स्पर्श उसे फिर से उसी ढलान पर ले जाएगा जहाँ से लौटना असंभव होगा।

सोनी ने अपने चेहरे को हाथों से ढंक लिया। उसके अपने शरीर की गंध उसे बार-बार याद दिला रही थी कि वह अब केवल एक 'मौसी' नहीं रही, बल्कि एक ऐसी यौवन से भरपूर स्त्री बन चुकी है जिसका संयम सूरज के उस लंबे और खूबसूरत लिंग की कल्पना मात्र से पिघल रहा है।

समय की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह उफनते हुए जज्बातों पर ठंडे पानी की फुहार की तरह काम करता है। बाथरूम की उन मदहोश कर देने वाली यादों का नशा धीरे-धीरे उतरने लगा था। सोनी की उत्तेजित इंद्रियां भी शांत होने लगीं और उसकी 'चेतना' ने फिर से कमान संभाल ली।

जब हवेली के सन्नाटे में केवल पंखे की सरसराहट गूँज रही थी, सोनी अपने कमरे में बिछावन पर लेटी छत को निहार रही थी। अब उसके दिमाग में वह 'खूबसूरत और लंबा लिंग' एक कामुक तस्वीर के बजाय एक 'खतरे की घंटी' की तरह बज रहा था। उसने ठंडे दिमाग से सोचा— "अगर मैं इसी तरह बहती रही, तो यह रिश्ता और यह घर, दोनों खाक हो जाएंगे।"

उसने एक गहरा निर्णय ले लिया था। वह जानती थी कि सूरज की आँखों में अब उसके लिए केवल सम्मान नहीं, बल्कि एक 'मर्दाना भूख' है। उस भूख को शांत करने का जिम्मा उसने खुद पर लिया तो वह खुद भी उसमें भस्म हो जाएगी।

सोनी ने मन ही मन तय किया:

वह सूरज से दूरी बनाएगी, लेकिन इतनी भी नहीं कि उसे शक हो।

डॉक्टर ने जो 'मालिश' की बात कही है, वह उसे टालेगी नहीं, पर खुद उसे अंजाम भी नहीं देगी।

उसने मन ही मन सुगना को इस मालिश के लिए राजी करने का फैसला कर लिया।

दोपहर की उस शांति में सोनी ने खुद को मानसिक रूप से फौलाद बना लिया था। उसे पता था कि शाम को जब सूरज उसे बुलाएगा, तो उसकी आँखों में वही पुरानी 'जादुई' चमक होगी, पर सोनी ने तय कर लिया था कि वह उस चमक को अपने आंचल की ओट में छिपा देगी। वह अब एक 'प्रेयसी' के जाल से निकलकर फिर से 'मौसी' के कवच में खुद को कैद कर चुकी थी।

दोपहर में डाइनिंग टेबल पर बर्तनों की हल्की खनक के बीच सुगना की ममतामयी बातें गूँज रही थीं। सूरज के हाथ से प्लास्टर हटा देख सुगना का चेहरा किसी खिले हुए कमल की तरह दमक रहा था। वह बार-बार सूरज की कलाई को सहलाती और भगवान का शुक्र मनाती।

सुगना (भावुक होकर): "सच में सोनी, पिछले एक महीने से मेरा जी धक-धक करता था। देख तो जरा, भारी प्लास्टर के नीचे दबकर मेरे बच्चे का हाथ कितना बेजान सा हो गया है। हिलाने में दर्द तो नहीं हो रहा बेटा?"

सूरज (मुस्कुराते हुए): "नहीं माँ, अब दर्द नहीं है। बस थोड़ी जकड़न महसूस हो रही है, जैसे हाथ सोया हुआ हो।"

सोनी खामोशी से दाल परोस रही थी। उसकी नजरें थाली से ऊपर नहीं उठ रही थीं। वह उस 'जकड़न' का मतलब बखूबी जानती थी, क्योंकि उसकी अपनी रूह भी पिछले कुछ घंटों से एक अजीब सी जकड़न और बेचैनी में कैद थी।

सोनी (संभलकर): "दीदी, डॉक्टर ने कहा है कि हड्डी तो जुड़ गई है, पर भीतर की नसें अभी भी सुस्त हैं। जब तक ढंग से मालिश नहीं होगी, हाथ में पहले जैसी फुर्ती नहीं आएगी।"

सुगना (चिंता में): "हाँ, मालिश तो बहुत जरूरी है। तेल की मालिश से ही तो पुराने जमाने में लोग फौलाद जैसे हाथ बना लेते थे। डॉक्टर ने कोई खास तरीका और समय बताया है क्या?"

सूरज (सोनी की तरफ एक अर्थपूर्ण नजर डालते हुए): "हाँ माँ, डॉक्टर साहब ने जोर देकर कहा है कि सुबह और खासकर रात को सोने से पहले मालिश बहुत जरूरी है। तेल को थोड़ा गर्म करके नसों पर दबाव देना होगा, तभी खून का दौरा सही होगा। पर हमें चिंता क्या हमारी डॉक्टरनी मौसी है ना ? वह तो मेरे लिए डॉक्टर से भी ज्यादा है"

सूरज के चेहरे पर एक छिपी हुई जीत की मुस्कान थी। उसे पूरा यकीन था कि यह जिम्मेदारी सोनी के कंधों पर ही आएगी और हो भी क्यों ना उसकी मौसी सोनी नर्स थी. सूरज सोनी को लेकर कई प्रकार की कल्पनाएं कर रहा था आज उसकी शाम रंगीन होने वाली थी.

पर सोनी ने मन ही मन एक सख्त फैसला ले लिया था। वह जानती थी कि अगर वह खुद सूरज के कमरे में गई, तो बाथरूम वाली वह 'आंच' उसे फिर से भस्म कर देगी। उसने अपनी मर्यादा को बचाने के लिए एक ढाल तैयार कर ली थी।

सोनी (चेहरे पर एक बनावटी सहजता लाते हुए): "दीदी, मालिश की बात तो सही है। आज से ही शुरू करनी होगी। मैंने गुनगुना तेल तैयार रखने का सोच लिया है। मालिश करने से हाथ की थकान भी मिटेगी और सूरज को नींद भी अच्छी आएगी।"

सूरज को लगा कि सोनी उसकी बात मान रही है, पर सोनी के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। उसने तय कर लिया था कि वह खुद नहीं जाएगी, बल्कि सुगना (सूरज की माँ) को ही मालिश के लिए तैयार करेगी। वह चाहती थी कि माँ और बेटे के उस पवित्र रिश्ते के बीच उसकी वासना की कोई जगह न रहे।

सुगना: "बिल्कुल ठीक कह रही है।सोनी ये जिम्मेदारी तुम उठा लो…

आप मिश्चिंत रहिए मैं भूलूंगी नहीं और याद दिलाती रहूंगी। सूरज को यह बात समझ नहीं आई किस याद दिलाना था? पर वह ना कुछ बोल पाया ना कुछ पूछ पाया।

पूरे लंच के दौरान सोनी ने एक बार भी सूरज से नजरें नहीं मिलाईं। वह अपनी योजना को अंतिम रूप दे रही थी। उसे पता था कि सूरज शाम का इंतजार बड़ी बेसब्री से कर रहा होगा, लेकिन वह उसे वह मौका नहीं देने वाली थी जहाँ रिश्तों की मर्यादा फिर से तार-तार हो।

हवेली के हॉल में माहौल एकदम सामान्य था। शाम की चाय के बाद पूरा परिवार जुटा हुआ था। सुगना, सोनी, सूरज की बड़ी मुंहबोली बहनें मालती और रीमा बेहद प्यार और आत्मीयता से सूरज को देख रही थी, सूरज केंद्र में बैठा था। प्लास्टर कटने के बाद घर के बड़ों और बहनों का इस तरह लाड़ जताना एक आम बात थी।

मालती ने सहज भाव से सूरज का हाथ अपने हाथ में लिया। "देख तो रीमा, प्लास्टर के अंदर रहकर हाथ कितना सफेद और कोमल हो गया है," उसने मुस्कुराते हुए कहा और उसके अंगूठे को हल्के से सहलाया।

सूरज के लिए यह स्पर्श सामान्य नहीं था। जैसे ही मालती की उंगलियों ने उस संवेदनशील हिस्से को छुआ, उसके शरीर में बिजली सी दौड़ गई। उसे उम्मीद नहीं थी कि एक साधारण सा स्पर्श उसके लंड में इतना तीव्र रक्त-प्रवाह पैदा कर देगा। यह अनुभव ठीक वैसा ही था जैसे सोनी के अंगूठा सहलाने पर होता था। उसने असहज होकर अपना हाथ खींचने की कोशिश की, पर मालती ने प्यार से उसे पकड़े रखा और बेहद प्यार से धीरे-धीरे उसे जादुई अंगूठे को सहलाती रही। सूरज के लंड में तनाव बढ़ता रहा।

तभी रीमा ने भी दूसरी तरफ से पास आकर सूरज का हाथ अपने हाथ में ले लिया और वही कार्य करने लगी जो अब से पहले मालती कर रही थी।

सूरज का अंगूठा सहलाते हुए रीमा ने बड़े प्यार से पूछा"अंगूठा हिलाने में अब भी दिक्कत है क्या?" सूरज की स्थिति अब बिगड़ने लगी थी। उसकी पजामी के नीचे पैदा हुआ लंड में तनाव और बढ़ गया वह 'उभार' अब इतना स्पष्ट होने लगा था कि उसे छिपाना मुश्किल हो गया। वह असहज होने लगा।

जब मधु उसकी तरफ बढ़ी, तो सूरज को लगा कि अब बात हाथ से निकल जाएगी। उसने थोड़ा सख्त लहजे में कहा, "बस करो सब... अब झनझनाहट हो रही है। मधु तू रहने दे।"

सोनी, जो थोड़ी दूर बैठी यह सब देख रही थी, तुरंत ताड़ गई कि सूरज के साथ क्या हो रहा है। उसने देखा कि सूरज अपनी तो शर्ट से अपनी गोद को ढंकने की पूरी कोशिश कर रहा है, पर वह उभार उसकी बेचैनी की गवाही दे रहा था।

सोनी ने बड़ी चतुराई से बात को संभाला ताकि किसी का ध्यान उस तरफ न जाए। वह उठी और सूरज के पास आकर खड़ी हो गई, जिससे घर वालों की सीधी नजर सूरज की गोद पर न पड़े।

सोनी (सहज स्वर में): "दीदी, बहुत देर हो गई इसे बैठे हुए। नसों में खिंचाव आ रहा है, इसलिए इसे झुंझलाहट हो रही है। सूरज, तू जा अपने कमरे में लेट गप्पे तो बाद में भी होती रहेगी।"

सूरज को जैसे जीवनदान मिल गया। वह बिना कुछ बोले तेजी से उठा और धीरे धीरे चलते हुए कमरे की तरफ निकल गया।

हॉल में बातें फिर से सामान्य हो गईं। सुगना ने कहा, "बेचारा चिड़चिड़ा हो गया है इतने दिन हाथ बंधा रहने से।" मालती और रीमा भी हँसकर अपनी बातों में लग गईं।

नियति इस घटनाक्रम को न सिर्फ देख रही थी बल्कि अपनी पटकथा में शामिलकर रही थी।

सोनी वहीं बैठ गई उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। उसे पता था कि सूरज के लंड में तनाव आ चुका है जिसे अभी नहीं तो कुछ घंटे बाद शांत करना ही होगा। न सिर्फ एक मौसी और नर्स के नाते, बल्कि उस तनाव को शांत करने के लिए जो उसने अभी सूरज की आंखों और उसके शरीर में देखा था।

कुछ घंटे बीत गए सूरज अपने लंड का तनाव लिए हुए अपनी दिनचर्या में लगा रहा उसे पता था आज की रात उसका तनाव निश्चित ही सोनी के संसर्ग में आने के बाद ही कम होगा। उसने उसे स्वीकार कर लिया था और उस तनाव का गाहे बगाहे आनंद भी ले रहा था।

रात्रि में भोजन के पश्चात सब अपने-अपने कमरों में चले गए।

सूरज भी अपने कमरे में लेटा हुआ था। उसने कमरे की रोशनी को हल्का कर दिया था और खिड़की से आती ठंडी हवा उसके शरीर में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी। उसके दिमाग में बार-बार वही दृश्य घूम रहा था—सोनी का वह भीगा बदन, उसकी उंगलियों का स्पर्श और वह जादुई पल। उसने घड़ी की तरफ देखा, रात के दस बज रहे थे। सूरज बेसब्री से सोनी का इंतजार कर रहा था।

उधर रसोई में सोनी ने पीतल की एक छोटी कटोरी में तेल गुनगुना किया। तेल की सोंधी खुशबू हवा में तैरने लगी। सोनी का हाथ कांप रहा था। उसे पता था कि अगर वह इस वक्त सूरज के कमरे में गई, तो वह 'मखमली स्तंभ' जिसकी छवि उसकी आँखों में अंकित हो चुकी है, उसे फिर से अपना दास बना लेगा।

सोनी ने गहरे सांस ली और सुगना (दीदी) के कमरे की ओर रुख किया।

सोनी: "दीदी, तेल तैयार है। सूरज के हाथ की नसें काफी सख्त हो गई हैं। डॉक्टर ने कहा था कि मालिश में ममता का स्पर्श हो तो रिकवरी जल्दी होती है। आप जाकर आज उसकी मालिश कर दीजिए, मैं जरा रसोई समेट लेती हूँ।"

सुगना ने मुस्कुराकर तेल की कटोरी थाम ली। "तू ठीक कह रही है सोनी, माँ के हाथ की छुअन से तो आधा दर्द वैसे ही मिट जाता है। ला, मैं ही कर देती हूँ।"

सूरज ने दरवाजे पर दस्तक सुनी। उसका दिल जोर से धड़का। उसे लगा सोनी आ गई। उसने अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी सांस ली, जैसे उस आने वाली खुशबू को महसूस करना चाहता हो।

सूरज (धीमी आवाज में): "आ जाओ मौसी... दरवाजा खुला है।"

दरवाजे से आ रही रोशनी में सुगना की परछाई सूरज को दिखाई पड़ी यह परछाई कुछ अलग थी और सूरज की आशा के अनुरूप नहीं थी।

उसने चौंककर आँखें खोलीं। सामने उसकी माँ (सुगना) थी। सूरज हक्का-बक्का रह गया।

सुगना: "बेटा, सोनी काम में फंसी थी, तो मैंने सोचा मैं ही मालिश कर दूँ। दिखा तो, कहाँ ज्यादा दर्द है?"

सूरज के चेहरे पर जैसे हवाइयां उड़ने लगीं। उसका सारा उत्साह, सारी उत्तेजना एक झटके में ठंडी पड़ गई। वह चाहकर भी अपनी निराशा नहीं छिपा पा रहा था। उसका मन चीख-चीखकर सोनी को पुकार रहा था, पर सामने माँ को देखकर वह पत्थर बन गया।

सोनी हाल में खड़ी होकर दूर से यह सब देख रही थी। उसने देखा कि कैसे सूरज का चेहरा उतर गया है। उसे एक तरफ जीत का अहसास हुआ कि उसने मर्यादा बचा ली, लेकिन दूसरी तरफ उसके अपने शरीर के भीतर एक 'अतृप्त वासनाजाग उठी।

बाथरूम में बिताए उन पलों की याद उसे फिर से विचलित करने लगी। उसे याद आया कि कैसे सूरज ने उसे अपनी 'अमरबेल' की तरह लपेट लिया था।

क्या सोनी अपनी इस मर्यादा के आवरण में खुद को लंबे समय तक कैद रख पाएगी या वह और एक उन्मुक्त और बिंदास युवती की तरह उस अद्भुत आनंद को दोबारा लेने की कोशिश करेगी?

शेष अगले भाग में.

 
स्वागत है बड़े दिनों बाद दर्शन हुए....शुक्रिया
 
164th एपिसोड पोस्ट कर दिया गया यह उन्हीं पाठकों को भेजा गया है जिन्होंने पिछले एपिसोड पर प्रतिक्रिया दी है। जो यह बताती है कि पाठक पिछले एपिसोड को पढ़ चुके हैं।

बाकी पाठकों का इंतजार है
 
भाग 164

सोनी हाल में खड़ी होकर दूर से यह सब देख रही थी। उसने देखा कि कैसे सूरज का चेहरा उतर गया है। उसे एक तरफ जीत का अहसास हुआ कि उसने मर्यादा बचा ली, लेकिन दूसरी तरफ उसके अपने शरीर के भीतर एक 'अतृप्त वासनाजाग उठी।



बाथरूम में बिताए उन पलों की याद उसे फिर से विचलित करने लगी। उसे याद आया कि कैसे सूरज ने उसे अपनी 'अमरबेल' की तरह लपेट लिया था।



क्या सोनी अपनी इस मर्यादा के आवरण में खुद को लंबे समय तक कैद रख पाएगी या वह और एक उन्मुक्त और बिंदास युवती की तरह उस अद्भुत आनंद को दोबारा लेने की कोशिश करेगी?

अब आगे.

सोनी मैं रसोईघर की तरफ रुख किया और अपने काम में लग गई। सोनी ने भले ही खुद सुगना दीदी को ढाल बनाकर भेज दिया था, पर उसका मन शांत नहीं था। वह दरवाजे की ओट से देख चुकी थी कि कैसे सूरज का खिला हुआ चेहरा पल भर में मुरझा गया था वह बार-बार हाल की तरफ देख रहा था। सोनी को अपनी जीत पर गर्व तो था, पर उस जीत में एक कसक भी थी।

उधर कमरे में सुगना बड़े चाव से सूरज के हाथ की मालिश कर रही थी। वह अपनी ममता उड़ेल रही थी, पर सूरज के लिए वह स्पर्श केवल एक शारीरिक क्रिया बनकर रह गया था। उसकी आत्मा तो रसोई और गलियारे के उस मोड़ पर अटकी थी, जहाँ से उसे सोनी की पायल की रुनझुन सुनाई देने की उम्मीद थी।

सूरज के लिए आश्चर्य की बात तो यह थी कि सुगना के अंगूठा सहलाए जाने के बावजूद भी उसके लंड में कोई तनाव नहीं हो रहा था अपितु मां के ममता भरे स्पर्श से उसके हाथ में निश्चित ही आराम मिल रहा था परंतु उस कामुकता का क्या जिसके लिए सूरज सोनी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था।

सूरज ने अपनी आँखें मूँद लीं, पर इस बार दृश्य सुखद नहीं थे। उसे गुस्सा आ रहा था—सोनी की उस 'चालाकी' पर जिसने पल भर में उसे जन्नत के दरवाजे से धक्का देकर हकीकत की जमीन पर पटक दिया था।

उसे लग रहा था कि सोनी मौसी ने उसे धोखा दिया है। दोपहर की वह नजदीकी क्या सिर्फ एक इत्तेफाक थी?

माँ का हाथ जब उसकी कलाई पर घूम रहा था, सूरज को रह-रहकर सोनी की वे लंबी, पतली और रेशमी उंगलियां याद आ रही थीं, जो दोपहर में उसके पौरुष को सहला रही थीं।

रात का सन्नाटा गहराता जा रहा था। कमरे में मद्धम रोशनी के बीच सुगना बड़े जतन से सूरज के हाथ की मालिश कर रही थी। सूरज चुपचाप लेटा हुआ था, पर उसका ध्यान सुगना के ममता भरे स्पर्श से कहीं दूर रसोई की उस दिशा में था, जहाँ सोनी मौजूद थी। सन्नाटे को तोड़ते हुए सुगना ने धीरे से कहा, "बेटा, सोनी तुझे बहुत मानती है। देखा नहीं, तेरी एक आह सुनकर कैसे दौड़ी चली आई? उसका मन एकदम साफ है, बिल्कुल गंगाजल जैसा।"

सूरज ने अपनी आँखें मूँद लीं। उसकी नसों में सोनी के स्पर्श की स्मृति अब भी किसी बिजली की तरह दौड़ रही थी। उसने एक गहरी सांस ली और बोला, "हाँ माँ, सोनी मौसी सच में बहुत अलग हैं। वो जितनी बाहर चुलबुली दिखती हैं, मुझे लगता है कि भीतर से कुछ कशिश है उनमें ।

सुगना ने मुस्कुराते हुए सूरज की कलाई को सहलाया, "अरे पगली है वो! पूरे घर की रौनक है। शादी के इतने साल बाद भी उसकी खिलखिलाहट कम नहीं हुई। बस विधाता ने उसकी सारी इच्छाएं पूरी की बस एक कमी रह गई…

क्या मां ? सूरज ने प्यार से पूछा

काश भगवान उसकी सूनी गोद भर देते।"

मालिश खत्म करके जब सुगना उठी, तो उसने सूरज के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कहा, "अब सो जा, तेल का असर होगा तो सुबह तक हाथ बिल्कुल हल्का हो जाएगा।" सुगना जैसे ही कमरे से बाहर निकली, रसोई में खड़ी सोनी ने उसे देख लिया। सोनी के मन में एक अजीब सी अतृप्ति जाग रही थी—एक तरफ उसने सुगना को ढाल बनाकर सूरज के पास भेजा था ताकि वह खुद पर काबू पा सके, पर दूसरी तरफ उसके शरीर की 'अमरबेल' फिर से उस रोमांच के लिए तड़प रही थी जो उसने दोपहर में सूरज की बाहों में महसूस किया था।

सोनी ने देखा कि सुगना के जाने के बाद सूरज ने बुझे मन से करवट ली थी। उसे अपनी जीत पर गर्व तो था, पर उस जीत में एक कसक और खालीपन भी था। क्या वह वाकई मर्यादा के इस आवरण में खुद को लंबे समय तक कैद रख पाएगी, या फिर वह सूरज की इस नई 'कामुकता' के बीच अपने लिए सुख का कोई नया रास्ता चुनेगी?

रात का सन्नाटा गहरा रहा था, लेकिन सोनी की आँखों में नींद की एक बूंद भी नहीं थी। छत पर घूमते पंखे की आवाज़ के साथ उसके मन में यादों और इच्छाओं का एक ज्वार उमड़ रहा था। आज सुगना और सूरज को एक साथ देखकर सोनी को अपना अकेलापन याद आने लगा उसे मां न बनने का दुख अब भी था।

उसे पुराने दिन याद आने लगे जब वह अमेरिका से लौटी थी, तो उसके पास सब कुछ था, सिवाय उस एक सुख के जिसे समाज एक स्त्री की पूर्णता मानता है—संतान सुख। विकास की शारीरिक अक्षमता ने सोनी के जीवन में जो शून्य पैदा किया था, उसे भरने के लिए उसे एक ऐसे पौरुष की तलाश थी जो न केवल शक्तिशाली हो, बल्कि जिसके अंश में एक तेज हो।

जब भी सोनी 'पर-पुरुष' से संतान प्राप्ति के विकल्प पर विचार करती, उसका मन भटककर किसी अनजान चेहरे पर नहीं जाता था। उसकी कल्पनाओं के केंद्र में केवल एक ही पुरुष का अक्स उभरता था—सरयू सिंह। सरयू सिंह, जिनका नाम सलेमपुर और सीतापुर के इलाकों में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता था। वे केवल सुगना के ससुर नहीं थे, वे सोनी के लिए मर्दानगी' का एक जीवंत पैमाना थे। बचपन से ही उसने उनके गठीले बदन, उनके रौबदार व्यक्तित्व और उनकी ताकत के कई किस्से सुने थे। सोनी के लिए सरयू सिंह उस बरगद की तरह थे, जिसकी छाया में वह अपनी मर्यादा को गिरवी रखने के लिए भी तैयार थी।

सोनी के इस आकर्षण की जड़ें पिछले प्रवास की कुछ बेहद निजी और उत्तेजक स्मृतियों में गहरी जमी थीं। उसे अच्छी तरह याद था जब उसने सरयू सिंह के बक्से से अपनी एक पुरानी 'लाल पेटी' बरामद की थी। उस पेटी की हालत और उस पर पड़े निशान चीख-चीख कर गवाही दे रहे थे कि सरयू सिंह ने उसे अपनी कामवासना का केंद्र बनाया था और उस पर कई बार वीर्यपात किया था। अपनी उस पेटी पर सरयू सिंह के पौरुष के उन निशानों को देख कर सोनी को घृणा नहीं, बल्कि एक अजीब सी मादक सिहरन महसूस हुई थी। वह जानती थी कि उनकी निगाहें अक्सर उसके बदन के उतार-चढ़ाव और उभरे हुए अंगों का जायजा लेती रहती हैं। सोनी को उनकी इस भूखी नजरों का बखूबी पता था और वह भी जान-बूझकर अपनी मादक चाल और कसी हुई साड़ियों से उन्हें उकसाती और चिढ़ाती रहती थी।

उसकी उत्तेजना का सबसे बड़ा कारण वह दृश्य था जिसे उसने एक बार भूलवश देख लिया था। सोनी ने सरयू सिंह के उस विशाल और वज्र जैसे लंड को नग्न अवस्था में देख लिया था, जिसकी कल्पना मात्र से ही उसके बदन में आग लग जाती थी। वह पौरुष की वह पराकाष्ठा थी जिसने सोनी के मन में यह विश्वास पक्का कर दिया था कि यदि कोई उसे संतान सुख दे सकता है, तो वह केवल सरयू सिंह ही हैं।

सोनी को यह आभास तक नहीं था कि उस समय का छोटा सूरज का जन्म सुगना और सरयू सिंह के उसी गुप्त मिलन का परिणाम था, जिसे वह अब खुद दोहराने की दहलीज पर खड़ी थी।

बनारस की गलियों में बसंती बयार के बीच जब सोनी ने अमेरिका से आने के बाद सुगना के घर की चौखट पर कदम रखा, तो पूरे परिवार ने खुशियों के साथ उसका भव्य स्वागत किया; माँ पदमा, सास कजरी और सहेली लाली के अपनत्व और आरती की थाली के बीच सोनी की नज़रें केवल उस एक शख्स को तलाश रही थीं जिसकी स्मृतियों ने उसकी रातों की नींद उड़ा रखी थी। जैसे ही सरयू सिंह कमरे में दाखिल हुए, पूरे माहौल में एक भारी और रौबदार सन्नाटा छा गया और मर्यादा के वशीभूत जब सोनी उनके पैर छूने के लिए नीचे झुकी, तो उसकी कसी हुई साड़ी के बीच से झलकती कमर और नितंबों के उभार पर सरयू सिंह की निगाहें किसी शिकारी की तरह अटक गईं। वर्षों पुरानी वह दबी हुई कामुक कसक एक बार फिर जाग उठी और सोनी की मादक देह की निकटता ने सरयू सिंह के पौरुष में एक तीखी हरकत पैदा कर दी। जब सरयू सिंह के मजबूत और खुरदरे हाथ आशीर्वाद देने के लिए सोनी की नग्न पीठ पर टिके, तो वह स्पर्श महज एक बुजुर्ग का आशीर्वाद नहीं बल्कि एक अधिकारपूर्ण संकेत था, जिससे सोनी का पूरा बदन बिजली की लहर की तरह गनगना उठा। उस विशेष संवेदना ने सोनी के भीतर उस विश्वास को और गहरा कर दिया कि उसकी सूनी कोख को भरने वाला तेज और पौरुष केवल इसी देह में समाया है, जबकि सरयू सिंह की आँखों की भूखी चमक यह गवाही दे रही थी कि पुरानी यादों की आग अब भी उतनी ही प्रज्वलित है।

एक दिन सुबह की सुनहरी धूप आंगन में मखमली चादर की तरह बिछी थी। पदमा, कजरी, सुगना और सोनी चारों महिलाएं पीढ़े पर बैठी मटर छील रही थीं। हंसी-ठिठोली के बीच अचानक बात सोनी की सूनी गोद पर आकर ठहर गई।

सोनी की मां पदमा ने लंबी सांस खींचते हुए कहा, "अरे सोनी, अमेरिका के डॉक्टर लोग का कहलें? का कवनो उम्मीद नईखे?"

सोनी समझ गई बात एक बार फिर उसकी सूनी गोद की हो रही है..

कजरी ने भी सुर मिलाते हुए ढांढस बंधाया, "बहिन, ई सब करम के लेख बा, जब ऊपर वाला चाही तभी अंगना में किलकारी गूँजी।"

सोनी ने बुझे मन से बस इतना कहा, "चाची, जवन जतन हो सकेला ऊ सब क चुकल बानी, अब त सब ओकरे भरोसे बा।"

कुछ देर बाद काम निपटाकर कजरी और पदमा अंदर चले गए, अब आंगन में सिर्फ सुगना और सोनी बची थीं। सोनी की आँखों में तैरती नमी देख सुगना ने मटर की टोकरी एक तरफ रखी और अपनी प्यारी सोनी का हाथ थाम लिया।

सुगना: "सोनी, मन छोटा न करऽ। ई बतावऽ, का विकास भईया के इलाज से अब कवनो आस नईखे? का सब रस्ता बंद हो गईल बा?"

सोनी: (सिसकते हुए) "का बताईं सुगना, ओइजा के बड़-बड़ डाक्टर जवाब दे देले बाड़न। विकास के शरीर में ऊ सामर्थ्य ही नईखे। हमार त जिनगी ई बांझपन के कलंक ढोवत-ढोवत बीति जाई।"

सोनी फफक फफक कर रोने लगी।

सुगना: "सोनी , अगर बुरा न मानऽ त एक बात कहीं? आज के जुग में अइसन बहुत रास्ता बा।

सोनी - कौन रास्ता?

सुगना - का तू कवनो 'पर-पुरुख' के सहारा लेवे के बारे में सोचले बाड़ू? आखिर कोख त तोहार बा, अउर संतान सुख भी तोहरे मिली।"

सुगना की बात सुनकर सोनी एक पल के लिए ठिठकी, फिर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई।

सोनी: "सुगना, ई खयाल त हमरा विकास के मन में भी आईल रहे। ऊ त तैयार बाड़े पर केहू अइसन मर्द मिलिहें जेकर बीया (वीर्य) हमार कोख हरियर कर सके? हमके कवनो ऐरा-गैरा ना चाहीं। हमके त 'सूरज' नियर तेजस्वी लइका चाहीं। काश... काश आज सूरज के पापा (रतन) हियाँ होते, त हम ओही अंश के अपना कोख में सहेज लेतीं।

सोनी को यह रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि सूरज असल में रतन की नहीं, बल्कि सरयू सिंह की संतान है। सुगना के चेहरे पर एक रहस्यमयी शांति छ गई। उसे सरयू सिंह की वह बलशाली देह और उनके साथ बिताई वे तूफानी रातें याद आ गई।

सुगना: "सोनी दीदी, जेकर तू नाम लेत बाड़ू, ऊ त संन्यासी बन गईले। पर ई बतावऽ, अगर हम कवनो अइसन मर्द के इंतजाम करीं जेकर 'अंश' में सूरज नियर दम होखे, त का तोके परहेज होई? चाहे ऊ जवान होखे या अधेड़, बस तोहार गोद भर देवे?"

सोनी: दीदी आखिर के?

सुगना…. ऊ हमारा प छोड़ हमारा पर बिस्वास बा नू? तोरा पेट में भी सूरज जैसन ही संतान आई..

सोनी सुगना के गले लग गयी।

दोनों बहनें एक-दूसरे की आँखों में गहराई से देख रही थीं। सोनी के मन में सरयू सिंह का वह 'वज्र' जैसा रूप घूम रहा था, जिसे उसने चोरी-छिपे देखा था, पर वह अपने ससुर का नाम लेने से हिचक रही थी। उधर सुगना की तलाश भी उसी 'बरगद' पर जा रुकी थी जिसने उसके जीवन का सूनापन दूर किया था। आंगन के सन्नाटे में दोनों के भीतर एक ही नाम गूँज रहा था— सरयू सिंह।

आंगन में हुई उस बातचीत के बाद सुगना के मन में एक अजीब सा द्वंद्व चल रहा था। वह जानती थी कि सोनी जिस 'तेज' और 'पौरुष' की बात कर रही है, वह रतन (उसके पति) में कभी था ही नहीं। सूरज, जिसे दुनिया रतन की संतान समझती थी, असल में सरयू सिंह के उसी 'अजेय अंश' का परिणाम था। सुगना ने तय कर लिया था कि वह सोनी की कोख को भी उसी तेजस्वी वीर्य से सिंचित करवाने का प्यासा करेगी जिसने उसके जीवन में रंग भरे थे।

सुगना यह बात भलीभांति जानती थी की सरयू सिंह पिछले कई वर्षों से कामुक गतिविधियों से पूरी तरह विमुख थे। यद्यपि यह पूरी तरह सत्य नहीं था। सरयू सिंह ने यह जानने के बाद की सुगना उनकी अपनी पुत्री है उन्होंने सुगना से दूरी बना ली थी परंतु सरयू सिंह और वासना एक दूसरे के पूरक थे ऐसा हो ही नहीं सकता कि सरयू सिंह अपनी वासना के बिना जीवित रह पाते उन्होंने अपनी वासना के लिए सुगना की छोटी बहन सोनी को अपनी ख्वाबों की परी बना लिया था और गई भाग है हस्तमैथुन कर सोनी को याद करते हुए हस्तमैथुन कर अपनी वासना को चरम सुख तक ले जाते हैं और यही अब उनकी दिनचर्या बन चुकी थी सुगना इस बात से अनजान थी।

अब अब सोने के गर्भ धारण के लिए उसने सरयू सिंह को चुन लिया था तो सबसे पहले वह यह जानना चाहती थी कि क्या शरीर सिंह की सोनी में कोई भी दिलचस्प है या नहीं ।

सुगना इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि सरयू सिंह की कामुकता मरी नहीं है, बल्कि वह सोनी की यादों के सहारे हस्तमैथुन की शक्ल में जीवित है। उसे लगा कि उम्र के इस पड़ाव पर बाबूजी शायद सुप्त हो चुके हों। यह जानने के लिए कि क्या सरयू सिंह के भीतर की वह पुरानी आग सोनी को देखकर फिर से भड़क सकती है, सुगना ने एक मनोवैज्ञानिक चाल चलने का निर्णय लिया।

उसे याद था कि सरयू सिंह को स्त्रियों के बदन पर कुछ खास रंग और कपड़े बेहद उत्तेजित करते थे। जब सुगना उनकी प्रेयसी थी, तब वे अक्सर उसके लिए महीन शिफॉन और पारदर्शी साड़ियाँ लाया करते थे। सुगना के पास आज भी उस दौर की कुछ निशानियाँ सुरक्षित थीं, जो उसने बनारस के इस घर में सहेज कर रखी थीं।

अगले दिन, जब दोपहर की सुनहरी धूप घर के कमरों में झाँक रही थी, सुगना ने सोनी को अपने पास बुलाया। उसने अपने पुराने संदूक की तहों से एक बेहद खूबसूरत, हल्के गुलाबी रंग की शिफॉन की साड़ी निकाली। यह वही साड़ी थी जिसे पहनकर कभी सुगना ने सरयू सिंह की रातों को रंगीन किया था।

साड़ी को हवा में लहराते हुए सुगना ने बड़ी मासूमियत से पूछा, "सोनी, ज़रा देख तो ई साड़ी कैसन बा? हमरा पर त अब ई खिलिहे ना, पर तोरे रंगत पर एकदम निखर जाई।"

सोनी ने जैसे ही उस मुलायम कपड़े को छुआ, उसे एक अजीब सी सिहरन महसूस हुई। साड़ी इतनी महीन थी कि हाथ लगाते ही मुट्ठी में समा जाए। सोनी की आँखों में चमक आ गई, "दीदी, ई त बहुत सुंदर बा! एकदम मखमल नियर। तू ई अबहीं तक सहेज के रखले बाड़ू?"

सुगना ने उसके चेहरे की रौनक ताड़ ली और मुस्कुराते हुए अपना जाल बुना, "ई हमार बहुत शुभ साड़ी बा। आज हमार मन बा कि हमनी सब मंदिर चलीं और तोहरे सूनी गोद खातिर मन्नत माँगी। हम चाहतीं कि आज तू ई साड़ी पहिन के चलु। जब तू मंदिर में मत्था टेकबू, त ई 'शुभ' रंग तोहार किस्मत फेर देई।"

सोनी पहले तो थोड़ा हिचकिचाई, क्योंकि साड़ी काफी पारदर्शी थी और शरीर के उभारों को पूरी तरह ढँकने में असमर्थ थी। लेकिन सुगना के ज़ोर देने और 'संतान सुख' की उम्मीद में वह उसे शुभ साड़ी को पहनने के लिए तैयार हो गई।

जब शाम को सोनी ने वह गुलाबी शिफॉन की साड़ी पहनी, तो वह साक्षात 'कामदेव की अर्द्धांगिनी' लग रही थी। साड़ी के महीन कपड़े के नीचे से उसकी गोरी कमर और पेट की नाभि साफ़ झलक रही थी। उसने बालों को खुला छोड़ दिया था और आँखों में हल्का काजल लगाया था। सुगना ने उसे देखते ही मन में सोचा, "आज अगर बाबूजी के भीतर का मर्द नहीं जागा, तो समझूँगी कि गंगा उल्टी बहने लगी है।"

जैसे ही सोनी तैयार होकर बाहर बरामदे में आई, जहाँ सरयू सिंह अपनी आरामकुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे, पूरा माहौल अचानक बोझिल हो गया। सरयू सिंह की नज़रें जैसे ही अपनी 'ख्वाबों की परी' पर पड़ीं, जो साक्षात उनके सामने उस रंग में खड़ी थी जिसे वे सबसे ज़्यादा पसंद करते थे, उनके हाथ से अखबार छूटते-छूटते बचा।

उनकी आँखों की वह 'भूखी चमक' सुगना से छिपी नहीं रही। सरयू सिंह की साँसें तेज़ हो गई थीं और वे अपनी मूँछों को बार-बार सहलाने लगे—यह उनके उत्तेजित होने का पुराना संकेत था।

तभी सुगना उनके समीप आ गई और उन्हें चाय देते हुए बोली ..

बाबूजी, आज हमरे मन में एक बात आईल बा। सोनी के अमेरिका से अइला त बहुत दिन हो गईल, पर एको दिन नीक से मंदिर में मत्था टेके ना गईली। हम पंडित जी से बात कइले रहीं, ऊ कहत रहलन कि आज के दिन विशेष पूजा भइल त सोनी के जवन भी मनोकामना बा, ऊ ई स्वर ज़रूर पूरी करिहें।"

सरयू सिंह ने अपनी भारी आँखों से सुगना को देखा। सुगना ने आगे झुककर फुसफुसाते हुए कहा, "रउआ त पंडित जी के खास हईं, रउवे पहचान से ऊ जतन से पूजा संपन्न करवा दीहें। हम चाहत रहीं कि रउआ साथे चलीं, त हमनी के काम आसान होजाई।"

सरयू सिंह के मन में लड्डू फूट रहे थे, पर चेहरे पर उन्होंने एक बुजुर्गियत भरा अनुशासन बनाए रखा। उन्होंने अपनी चाय खत्म की और बोले, "ठीक कहत बाड़ू । हमरो मंदिर गईला बहुत दिन हो गइल बा। तू तैयारी करऽ, हम साथे चलब।"

सरयू सिंह के मन में लड्डू फूट रहे थे वह सोनी को अपनी नजरों ओझल नहीं होने देना चाहते थे। अपनी वासना में वही अभी भूल चुके थे कि निमंत्रण मंदिर जाने का था ना की सोनी की जवानी का रसास्वादन का।

यह तो सिर्फ सुगना जानती थी और शायद इसीलिए उसने सोनी को वह विशेष साड़ी पहनाई थी।

शेष अगले भाग में
 
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