Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 27 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

धन्यवाद

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Dhnyabaad

हां

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सुगना और राजेश के बो रात भी समय पर कहानी में दिखाई देगी।

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आप सुगना को गलत समझ रहे है पर नियति के खेल निराले होंगे जुड़े रहें
 
हतोत्साहित न हों न्याय होगा।
 
सुगाना चोदाइल बिया की ना ई त बादे में।मालूम चली। तब ले अपडेट के राह देखत रहे के बा। बाकि सरयूसिह का करीहें ई आले मिली...
 
यदि आपने अपडेट को दो तीन बार पढ़ा है तो निश्चित ही मेरी मेहनत सफल हुई मैं भी अपडेट देने से पहले उसे कई बार पढ़ता हूं और हर बार भाषा और भाव पर ध्यान देता हूं जुड़े रहिए और आनंद लेते रहिए
 
लगता है मुझे कोमल रानी जी जैसा एक और समीक्षक मिल गया है कहानी लिखने का आनंद शायर जारी रहेगा जुड़ने और जुड़े रहने दोनों के लिए धन्यवाद
 
राकी जी इतना ध्यान रखिएगा अभी तक सुगना का चरित्र एक छिनार की भांति नहीं दिखाया गया है सिर्फ एक ही प्रसंग में जब वह अपनी सास कजरी और सरयू सिंह के साथ एक साथ संभोग करती है एकमात्र वही वासना का अतिरेक है जो मैंने सुगना को लेकर दिखाया है अन्यथा सुगना ने जो कुछ भी किया है वह बेहद सामान्य और एक हद तक उचित भी है. राजेश् व सुगना का प्रसंग उचित समय पर आएगा और आनंददायक तरीके से आएगा। जुड़े रहें अगला अपडेट इस कहानी में एक नया मोड़ होगा मैं कोमल जी और अपने कुछ और पाठकों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा हूं उसके अगले दिन ही अपडेट आ जाएगा.
 
भाग 59

अब तक आपने पढ़ा...

सरयू सिंह अपनी किस्मत पर नाज कर रहे थे अपनी बहू और प्रेमिका की खूबसूरती का अवलोकन करते हुए उनकी निगाह सुगना के खूबसूरत बदन पर दौड़ रही थी। सुगना उनकी दृष्टि को अपने बदन पर महसूस कर रही थी उसकी धड़कनें तेज हो रही थी। जांघों के बीच निगाह पड़ते ही अचानक सरयू सिंह चेहरे के भाव बदल उठे।

सुगना ने उनके चेहरे पर आए बदलाव को महसूस किया इस बदलाव का कारण जानने के लिए अपनी जांघों के बीच देखा उसके होश फाख्ता हो गए जांघों के बीच बालों के झुरमुट और जांघों पर लगा राजेश का वीर्य सूख चुका था…...और सरयू सिंह को मुह चिढा रहा था…

अब आगे….

सुगना को अपनी गलती का एहसास हो चुका था उसने कोई सफाई देने की कोशिश न की। प्रेम सवालों पर विराम लगा देता है... उसने कदम बढ़ाए और अपने बाबूजी के आलिंगन में आ गई।


कई दिनों की तड़प के बाद सुगना के नंगे कोमल बदन का स्पर्श अपने शरीर से होते ही एक पल में सरयू सिह का गुस्सा काफूर हो गया।

सुगना का कोमल बदन उन्हें गर्म गुलाब जामुन की तरह प्रतीत हुआ जिसने उनके मन की कड़वाहट को एक पल में गायब कर दिया।

उनकी मजबूत भुजाओं ने उस कोमल शरीर को खुद से एकाकार करने की कोशिश की। परंतु उनका तना हुआ लण्ड सुगना के पेट में चुभ रहा था।

अपने बाबूजी के आलिंगन में जाकर सुगना की कामवासना जवान हो उठी. उसकी बुर पनिया गई और अपने होंठ खोल कर अपने लॉलीपॉप का इंतजार करने लगी। सरयू सिंह ने अपनी मजबूत भुजाओं में सुगना को एक किशोरी की तरह उठा लिया और बिस्तर पर ले आए जहां उसका पुत्र सूरज रतन द्वारा भेजे गए इधर उधर व्यस्त था।


अंततः सुगना ने स्वयं को डॉगी स्टाइल में अपने बाबूजी के सामने परोस दिया और सरयू सिंह का लण्ड उस सूखे हुए वीर्य को भूल उसकी पनियाई बूर में प्रवेश कर गया।

सुगना की बुर आज भी सरयू सिह के लिए उसी तरह का कसाव पैदा करती थी। जाने सुगना ने किस तरह अपनी बुर् में अद्भुत कसाव बनाए रखा था। सरयू सिंह के मुंह से आह निकल गयी…. और जैसे ही सरयू सिंह ने अपने कमर की ताकत लण्ड पर लगाई कराह ने अपनी आवाज बदल ली। कराहने की आवाज इस बार सुगना से आयी ..

" बाबू जी तनी धीरे से….." यह मादक कराह के दिनों बाद सरयू सिह के कानों को सुनाई दी थी।

सरयू सिंह एक बार फिर सुगना की पीठ पर झुक गए और उसके कानों को चूम लिया। सुगना की कराह पर उनका यह प्यार हमेशा मरहम का काम करता था पर यह प्यार पाकर लण्ड उछलने लगता।

कुछ देर सुगना के कानों और गालों को चूमने के बाद अचानक उन्हें सुगना की जांघों पर लगे वीर्य का ध्यान आया और उन्होंने अपना लण्ड सुगना की बुर के जड़ तक ठान्स दिया और गर्भाशय के मुख पर चोट कर उसे अपना मुंह खोलने पर विवश कर दिया।

शिलाजीत का असर दोगुना हो चला था। कल रात खाए शिलाजीत का असर अभी कम होता उससे पहले ही आज सुबह-सुबह शरीर सिंह ने दूसरी गोली ले ली थी। सरयू सिंह के तने हुए लण्ड के मजबूत धक्कों ने न सिर्फ सुगना के गर्भाशय का मुख खोल दिया अपितु राजेश के वीर्य के वह शुक्राणु जो अभी तक सुगना की योनि की सुरंग में लक्ष्य की तलाश में दिग्भ्रमित होकर टहल रहे थे उन्हें भी अनजाने में ही सुगना के गर्भ तक पहुंचा दिया।

अपने पिता तुल्य प्रेमी सरयू सिंह के लण्ड द्वारा किसी पर पुरुष के वीर्य से गर्भधारण की यह विधि इतनी ही निराली थी जितनी सुगना और उसका उसके बाबूजी के साथ संबंध।

सरयू सिंह प्यार, उत्तेजना और क्रोध के बीच की कई अवस्थाओं से गुजर रहे थे। जब जब वह सुगना के मासूम चेहरे और कोमल शरीर का ध्यान करते वह उसके प्यार में डूब जाते उनका लण्ड सुगना की बुर को बेहद ही तन्मयता से चोदने लगता।

जिस प्रकार एक मां अपने छोटे बच्चे की मालिश करती है सरयू सिंह का लण्ड सुगना की बुर की भीतरी दीवारों की मालिश करता। जब उत्तेजना हावी होती चुदाई की रफ्तार बढ़ जाती और सुगना की अपने बाबू जी की अद्भुत चुदाई से आह….आ...ईई। ह ह। ममममममम। आ….तरह-तरह की आवाजें निकालने लगती.. परंतु जब सरयू सिंह को सुगना की जांघों पर लगे वीर्य की याद आती उनके दिमाग में राजेश का चेहरा घूम जाता और वह अपने लण्ड को पूरी ताकत से सुगना की बुर की जड़ तक ठान्स देते।

गर्भाशय के मुख पर पड़ रही चोट अब भारी हो रही थी। उत्तेजना से लण्ड भी विकराल रूप में आ चुका था। सुगना कराह उठती और अपनी आंखों में हल्की आंसू लिए कहती …

"बाबूजी तनी धीरे से ….दुखाता"

इस वाक्य का अंतिम शब्द आज चरितार्थ हो रहा था। सुगना आज पहली बार इस संभोग में मीठे दर्द का एहसास कर रही थी यह दर्द सुगना की वो दीपावली वाली रात के दर्द जैसा ही था।


सरयू सिंह अपनी बहू सुगना से बेहद प्यार करते थे उसकी मादक और कामुक कराह सुनकर वह उत्तेजित अवश्य होते परंतु अपने लण्ड का आक्रमण कम कर देते और एक बार फिर चुदाई जारी हो जाती।

होटल के गद्देदार बिस्तर पर एक अजब सी हलचल थी। आज तक सरयू सिह को ऐसे डनलप के गद्दे पर चुदाई का सुख न मिला था। यह सुख अद्भुत और निराला था। इस हलचल में एक रिदम था।

सुगना की चुदाई जारी थी। सुगना की बुर झड़ने को तैयार हो रही थी। एक पल के लिए सुगना अपने गर्भधारण को भूल अपनी उत्तेजना का आनंद लेने लगी उसकी गोरी और गुदांज गाँड़ फूलने पिचकने लगी और यही वह पल था जब सरयू सिह ने सुगना की गांड के उस अद्भुत आकर्षण को देख लिया।

केलाइडिस्कोप की तरह सुगना की सुंदर गांड तरह तरह के रूप दिखा रही थी और सरयू सिह को अनजाने में ही आमंत्रित कर रही थी।

आखिरकार उन्होंने सुगना के नितंबों से उन्होंने अपना हाथ हटाया और झोले की तरफ बढ़ कर आने झोले में रखा मक्खन का डिब्बा निकालने की कोशिश करने लगे। उनका लण्ड सुगना की बुर से छटक कर बाहर आ गया।

लण्ड की थिरकन देखने लायक थी। सुगना के प्रेम रस से सना लण्ड चमक रहा था। मदन रस की बूंदें एक धागे की तरह लटक रही थी और मोतियों की तरह चमक रही थीं ।


सुगना ने मुड़कर उस लण्ड को देखा और अपने बाबूजी से पूछा

"का भइल?"

सरयू सिंह के हाथ में डिब्बे को देखकर सुगना ने दोबारा प्रश्न किया।

"ई का ह?"


सरयू सिंह ने कुछ कहा नहीं और वापस उसकी बुर में अपना लण्ड डाल दिया सुगना की उत्तेजना ने उसके प्रश्न को वही दबा दिया।

सुगना एक बार फिर आनंद में झूला झूलने लगी।सरयू सिंह ने अपनी उंगलियों को मक्खन से सराबोर कर लिया और सुगना की फूलती पिचकती गाँड़ को सहलाने लगे।


उंगलियों का स्पर्श पाकर सुगना को अपने वादे का ध्यान आ गया वह जान चुकी थी कि अब बचना मुश्किल है। वह अपना वादा कतई नहीं तोड़ना चाहती थी परंतु उसके मन में यही इच्छा थी के पहले बाबूजी उसकी बुर में ही स्खलित कर उसे गर्भवती करें।

सुगना ने अपनी डॉगी स्टाइल को और उत्तेजक बना दिया कमर के लचीलापन को पराकाष्ठा तक ले जाकर उसने अपनी दोनों चुचियों को उभार दिया और सरयू सिह की हथेली को जानबूझकर अपनी चुचियों पर ले आयी। सरयू सिह को सुगना का यह आमंत्रण बेहद पसंद आया उन्होंने उसकी चूँची थाम ली परंतु उन्होंने अपने एक हाथ को सुगना की गांड पर ही कायम रखा। सुगना सरयू सिंह को उत्तेजित करती हुयी बोली..

"बाबू जी आज जैसन सुख त कभी ना मिलल रहे"

सरयू सिंह उसे और तेजी चोदने लगे…


"हां बाबू जी असहीं ...धीरे से हां हां हां हां …..आह आआआआआआआईईई आई मा……" सुगना की आवाज कामूक थी। कुछ शब्द तो नियति सुन पा रही थी कुछ दांतो के बीच फंसे होंठो में अटक जा रहे थे परंतु जिस नियति ने सुगना में उत्तेजना भरी थी वह उसका मर्म बखूबी समझ रही थी।

सुगना सरयू सिंह को बेहद उत्तेजित कर उनको स्खलित कराना चाहती थी। उसने सारे जतन किये परंतु वह उन्हें स्खलित न कर पायी। सरयू सिह की उंगलियां उसकी गांड में अब अंदर तक जाने लगी।

उत्तेजना में अपनी गांड के अंदर अपने बाबूजी की उंगलियों को महसूस करना उसे भी अच्छा लग रहा था। वह और भी बेहद उत्तेजित हो गई। वह थरथर कांप रही थी। ऐसी उत्तेजना उसने जीवन में पहले कभी महसूस नहीं की थी।

गाँड़ के अंदर घूम रही सरयू सिंह की तर्जनी और मध्यमा उनके अपने ही लण्ड को पकड़ने की कोशिश करती। बीच का पतली दीवार पर हो रहा यह दोहरा घर्षण सुगना को एक अलग एहसास दिला रहा था। जब सरयू सिंह अपना लण्ड अंदर ठेलते वह अपनी दोनों उंगलियों से उसे महसूस करते और सुगना सिहर उठती। मक्खन लगे होने की वजह से सुगना को सुखद एहसास हो रहा था।

"बाबूजी राउर उंगली में भी सुख बा" सुगना के मुंह से बरबस ही निकल गया।


सरयू सिंह बेहद प्रसन्न थे। वह सुनना को लगातार चोद रहे थे। चूचियो को मीस रही हथेली को उन्होंने उठाकर सुगना के चेहरे पर ले आया और अपने अंगूठे को उसके मुंह में दे दिया। सुगना उनके अंगूठे को चूसने और चाटने लगी। अपने लण्ड तथा दोनों हांथो से वह सुगना के सारे छेद का आनंद ले भी रहे थे और यथासंभव सुगना को दे भी रहे थे।

पांच सितारा होटल का एयर कंडीशनर भी सुगना और सरयू सिह के पसीने को न रोक पाया। इस अद्भुत चुदाई से सरयू सिंह पसीने पसीने हो चले थे और सुगना भी।

माथे का दाग एक बार फिर अपने विकराल रूप में आ चुका था ऐसा लग रहा था जैसे उस दाग पर मौजूद आवरण फटने वाला था। परंतु जैसे-जैसे स्खलन का समय नजदीक आ रहा था सुगना और सरयू सिंह की आत्मा और भावनाएं एकाकार हो रही थीं।

नियति स्वयं इस मधुर मिलन में सुगना को विजयी और अपने गर्भ में सरयू सिह का वीर्य निचोड़ते देखना चाह राहु थी पर सुगना हार गयी। सरयू सिंह के त्रिकोणीय हमले ने सुगना को स्खलित होने पर मजबूर कर दिया। सरयू सिह के वीर्य की प्रतीक्षा में उसकी बुर और गर्भाशय ने अपना मुंह खोल दिया। उसकी बुर प्रेम रस की वर्षा करती रही पर सरयू सिंह का लण्ड न पसीजा वह स्खलन को तैयार न था।


अंततः सुगना निढाल हो गयी। कमर का जो कसाव उसने सरयू सिंह को उत्तेजित करने के लिए बनाया था वो ढीला पड़ गया।

सरयू सिंह ने सुगना को चुमते हुए कहा

"सुनना बाबू ठीक लागल हा नु"

"राउरो हो जाइत तो बहुत बढ़िया लागीत"

"अरे तोहार वादा भी तो पूरा करे के बा…"

सरयू सिंह का लण्ड अभी भी थिरक रहा था। सुगना जान चुकी थी की सरयू सिह बिना उसके दूसरे छेद का उद्घाटन किए उसे छोड़ने वाले नहीं थे। सुगना स्खलित हो चुकी थी। उसे पता अब सिर्फ और सिर्फ उसे सरयू सिंह को ही सुख देना था। अपनी छोटी सी गाँड़ में इतने बड़े मुसल को लेकर निश्चय ही उसे कुछ सुख नहीं मिलने वाला था।

सुगना ने मन ही मन सोचा वो उठी और सरयू सिंह के लण्ड को अपने हाथों में लेकर और उत्तेजित करने लगी। सरयू सिंह को तो जैसे शिलाजीत नहीं संजीवनी बूटी मिल चुकी थी। सुगना अपने हाथों से उस लण्ड को सहलाती और मसलती रही परंतु सरयू सिंह और उत्तेजित होते रहे..

उनका ध्यान सुगना की जांघों के बीच गया सूखे हुए वीर्य को देखकर एक बार वह फिर भड़क उठे। उन्होंने सुनना के बालों को पकड़ा और उसके चेहरे को अपने लण्ड की तरफ ले आए। निश्चय ही उन्होंने यह कार्य क्रोध में किया था परंतु सुगना ने इस आपदा को अवसर में बदल लिया।। उसने अपने बापू जी के लण्ड के सुपाड़े को मुंह में भर कर और उत्तेजित करने की कोशिश करने लगी।

सुगना अब यह जान चुकी थी कि उसके बाबूजी का स्खलन उसकी बुर में कतई नहीं हो पाएगा पर उसे अब भी उम्मीद थी कि वह सरयू सिह को पहले ही स्खलित करा लेगी और वीर्य को लण्ड से न सही अपनी उंगलियों से ही अपनी बूर् में पहुंचा देगी। यदि वह सफल न भी हुई तो उसका यह प्रयास व्यर्थ न जाएगा और वह उसे अपने गाड़ में उसे शीघ्र स्खलित करा पाएगी ताकि उसे कम से कम कष्ट से गुजरना पड़े।

सुगना अपने बाबूजी का लण्ड चूसने लगी वह अपनी हथेलियों से उनके अंडकोष को भी सहलाती और उसमें उबल रहे वीर्य को बाहर निकालने का प्रयास करती।


सरयू सिंह की उत्तेजना धीरे-धीरे बलवान होने लगी उन्होंने सुनना के सर को हटाया और अपनी मासूम बहू को होठों को एक बार चुमकर उसे वापस डॉगी स्टाइल में ला दिया। गांड पर लगा हुआ मक्खन अब भी कायम थी। सरयू सिंह ने सुगना की पीठ को चूमना शुरू किया और धीरे-धीरे दो उसके कानों तक पहुंच गए । लण्ड नितंबो के बीच अपनी जगह तलाशने लगा। सुगना ने अपने नितम्ब ऊंचे किये और लण्ड को फिर अपनी चुदी हुई बूर् में लेने की कोशिश की। पर आज लंड कुछ ज्यादा ही तना था। सरयू सिह ने एक हाथ से सुगना के होठों पर उंगलीया फिराते हुए उन्होंने दूसरे हाथ से अपने लण्ड को सुगना की गांड के छेद पर रखा और धीरे धीरे अपना दबाव बनाने लगे।

"सुगना तू बहुत सुंदर बाड़ू और ई तहर दूसर द्वार भी…"


जैसे ही लण्ड के सुपारे ने गांड के छेद को फैलाया सरयू सिंह ने सुगना के होठों को अपनी मजबूत हथेलियों से दबा लिया और एक ही झटके में अपने लण्ड को पेल दिया।

सुगना दर्द से बिलबिला उठी।। मुंह बंद होने की वजह से उसकी चीख बाहर ना आ पायी पर आखों से आंसू छलक उठे।


आज उसके मुंह से आह की जगह कराह निकली थी ..

"बाबूजी साँचो ...दुखाता…." सुगना की यह दर्द भरी कराह सिर्फ नियति ने ही सुनी। सरयू सिह की हथेलियों ने सुगना का मुंह बंद कर रखा था।

सुगना ने अपने बाबूजी की खुशी के लिए उस दर्द को सह लिया। लण्ड एक झटके में पूरी तरह अंदर ना जा पाया। सुगना को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसकी गांड में कोई गर्म सलाख घुसा दी गई हो। सुगना एकदम शांत हो गयी। सरयू सिंह ने सुगना को शांत देखकर अपने हाथ हटाये और उसके कानों को एक बार फिर चूमते हुए बोले

"सुगना बाबू हो गइल अब ना दुखायी"

सरयू सिंह सुगना को बेहद प्यार करते थे और उसके शरीर की हर हरकत को महसूस कर लेते थे।


सुगना मजबूर थी वह चुपचाप सरयू सिह के अगले कदम का इंतजार करने लगी। सरयू सिंह ने अपने लण्ड को बाहर निकाला और धीरे-धीरे उसकी गांड में आगे पीछे करने लगे। सुगना को इस क्रीड़ा में कतई आनंद नहीं आ रहा था वह सिर्फ अपने बाबू जी को खुश करने के लिए उनका उत्साहवर्धन कर रही थी। उसे अब यह ज्ञात हो चुका था कि इस अपवित्र द्वार में घुसे हुए लण्ड से निकले हुए वीर्य को वह वापस अपनी बुर में कतई नहीं ले आएगी। वह अपने मन में यही योजना बनाने लगी कि अपने बाबू जी को कुछ देर आराम करने देकर वह एक बार उनके साथ पुनः संभोग करेगी और उनके वीर्य को अपने गर्भ में लेकर अपनी पुत्री का सृजन करेगी।

अपने विचारों में खोई हुई सुगना शांत थी और सरयू सिंह उसकी गांड लगातार मारे जा रहे थे उत्तेजना का यह दौर सरयू सिह के लिए बेहद कठिन था। सुगना की कसी हुई गांड में उनका लण्ड ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने अंगूठे और तर्जनी से किसी ने गोल आकृति बना दी थी जी बेहद कसी हुयी थी। उनके लण्ड को काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी...पर यही उनका चरमसुख था जिसके लिए वह कई वर्षों से इंतजार कर रहे थे। उनकी यह इच्छा को कजरी ने भी पूरा न किया था जिसके साथ उन्हीने न जाने कितने वर्षों तक काम सुख का आंनद लिया था। पर उनके सारे अरमान सुगना ने हो पूरे किए थे।

सरयू सिह अपना लण्ड पूरी तरह बाहर निकालते और फिर उसे थोड़ा आगे पीछे कर पीछे ताकत से पूरा जड़ तक अंदर डाल देते।

सरयू सिह अभी सुगना को छोड़ने को तैयार ना थे। सरयू सिंह का चेहरा लाल हो चुका था।


माथे पर दाग पूरी तरह फूलकर फटने को तैयार था। जैसे-जैसे उनके लण्ड की रफ्तार बढ़ती गई उनकी धड़कनें तेज होती गयीं …..

और एक बार फिर वही हुआ जिसका सुगना को डर था। अपने नितंबों पर सुगना को सरयुसिंह की पकड़ ढीली लगने लगी। लण्ड की रफ्तार अचानक ही कम हो गई। लण्ड फिसल कर उसे बाहर जाता महसूस हुआ। सुबह पीछे पलटी। सरयू सिंह के चेहरे पर वासना की जगह दर्द था। वह असहज थे देखते हो देखते सरयू सिह कटे हुए वृक्ष की तरह धड़ाम से पांच सितारा होटल के कमरे की कारपेट पर गिर पड़े।

बाबूजी... बाबूजी ..चीखती हुयी सुगना उठ खड़ी हुई। वह कर उनके पास गई और उन्हें हिलाकर जगाने की कोशिश की।

नंगी सुगना अपने बाबूजी को जगाने के लिए भरपूर प्रयास कर रही थी। वह भागकर का एक टेबल पर रखे पानी के बोतल से पानी लाकर उनके चेहरे पर छींटे मारकर उन्हें जगाने की कोशिश की पर असफल रही।

सुगना थर थर कांप रही थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। इस अवस्था में वह किसी से कैसे मदद मांगे यह बात उसे समझ ना आ रही थी।

सरयू सिंह के माथे के दाग से रक्त का रिसाव होने लगा था। शायद उनके पाप का घड़ा भर चुका था। सुगना बेहद डर गई उसने एन केन प्रकारेण सरयू सिंह को घसीट कर बाथरूम के अंदर पहुंचाया। उनके लण्ड को साफ किया परंतु जाने यह कैसा विलक्षण संयोग था वह उनके लण्ड का तनाव न कम कर पाई।

एक पल के लिए उसे मन में आया कि सरयू सिंह की यह अवस्था होटल स्टाफ की नजरों में आएगी और वह बेइज्जत महसूस करेंगे परंतु इस अवस्था में उनका स्खलन करा पाना असंभव था।


सुगना ने उन्हें उसी स्थिति में छोड़ दिया उनके सारे कपड़े बाथरूम में लाकर डाल दिए और आनन-फानन में अपनी गांड पोछ कर वापस कमरे में आई और अपने कपड़े पहनकर होटल की लॉबी में जाकर मदद की गुहार लगाने लगी।

थोड़ी ही देर में होटल स्टाफ ने आकर सरयू सिंह की मदद की। सरयू सिह की नग्न अवस्था और खड़े लण्ड को देखकर होटल का स्टाफ आपस मे कानाफूसीं कर रहा था..

"साला बुड्ढा जवान माल देखकर मुठ मार रहा होगा…"

"साले का हथियार तो वाकई कमाल है"

"चल भोसड़ी के उठा, लण्ड मत देख" उनके भारी शरीर को उठाते हुए पहले ने कहा..

सुगना सरयू सिह का झोला कंधे में टांगे और सूरज के साथ सरयू सिंह को कमरे से बाहर जाते देख रही थी। उसकी आंखें नाम थी और मन ही मन वह अपने इष्ट देव से उनकी कुशलता की कामना कर रही थी।


कुछ ही देर बाद सरयू सिंह होटल की एंबुलेंस में लेटे हुए शांत शरीर के साथ सुगना और सूरज के साथ हॉस्पिटल की तरफ रवाना हो गए….

हॉस्पिटल पहुंचकर सुगना ने एंबुलेंस के ड्राइवर से अनुरोध किया कि वह विद्यानंद जी के पंडाल में जाकर सरयू सिंह के बारे में उसके परिवार को सूचना दे दे।

स्ट्रेचर पर सरयू सिह को आईसीयू में ले जाया जा रहा था। उनके धोती में उभार अब भी कायम था। लण्ड अपना तनाव छोड़ने को तैयार न था परंतु सरयू सिह हॉस्पिटल के स्ट्रेचर पर लेटे निस्तेज दिखाई पड़ रहे थे। उनका दाग विकराल रूप में आ गया था और उससे रक्त का रिसाव जारी था। सुगना बेहद डरी और घबराई हुई थी ।


डॉक्टरों की टीम ने सरयू सिंह का चेकअप प्रारंभ कर दिया कुछ ही देर में डॉक्टर का असिस्टेंट बाहर आया और बोला कुछ रक्त की आवश्यकता है आप अपने संबंधियों को बुलाकर उसका इंतजाम कीजिए सुगना ने कहा आप मेरा रक्त ले सकते हैं। कंपाउंडर ने सुगना को ऊपर से नीचे तक देखा सुगना पूरी तरह स्वस्थ थी उसने सिस्टर को बुलाया और सुगना उसके साथ रक्त देने चल पड़ी।

जब तक कजरी और परिवार के बाकी सदस्य हॉस्पिटल आते तब तक सुगना का रक्त उसके बाबूजी को चढ़ाया जा चुका था। विशेष दवाइयों के प्रयोग तथा सुगना के रक्त से सरयू सिंह होश में आ चुके थे।

होश में आते ही डॉक्टर ने सरयू सिंह से कहा… आपने जिन कामोत्तेजक दवाइयों का सेवन किया था वह आपको नहीं करना चाहिए … मेरी बात आप शायद समझ रहे हैं। डॉक्टर ने सरयू सिंह के जननांगों की तरफ इशारा किया। सरयू सिह शर्म से आंखें झुकाए डॉक्टर की बात पूरी समझ तरह समझ चुके थे पर उनके होंठ सिले हुए थे। डॉक्टर ने फिर कहा..

आज आपकी जान आपकी बेटी ने बचा ली…

मेरी बेटी? सरयू सिंह ने डॉक्टर को प्रश्नवाचक निगाहों से देखा...

"हां जी हां…. हमें आप को बचाने के लिए आपके ही पुत्र या पुत्री के रक्त की आवश्यकता थी। यह ऊपर वाले कि कृपा थी की हमें आपकी बेटी का रक्त मिल गया और हम आपकी जान बचा सके..

सरयू सिह जब तक अपना दूसरा प्रश्न करते तब तक दरवाजा खुला सुगना नर्स के साथ अंदर आ रही थी। ..

सरयू सिंह के दिमाग में विचारों की घुड़दौड़ जारी थी और धड़कने तेज... दिमाग डॉक्टर द्वारा कही गई बात को मानने को तैयार न था….

शेष अगले भाग में….
 
भावनाएं कहानी का आधार होती हैं जो आपको इस कहानी में भी मिलती रहेंगी जुड़े रहे

यह प्रश्न हमेशा शरीर सिंह के दिमाग में घूमता रहेगा?? आखिर उन्होंने सुगना की छोटी सी मांग को वासना में कैसे तब्दील कर दिया

धन्यवाद

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धन्यवाद

धन्यवाद

आप सब से यही कहूंगा चंद लाइने और लिखने का और प्रयास किया करिए कुछ नहीं तो क्या पसंद नहीं आया वही लिखिए मुझे आपके लिखे वाक्य बेहद पसंद है चाहे वह कहानी के पक्ष में हो या विपक्ष में जुड़े रहे
 
कहानी का यह मोड़ निश्चित ही निर्णायक है सरयू सिंह के जीवन में भूचाल आने वाला है आपने लाइनों के बीच छुपे कहानी के भाव को बखूबी समझा है धन्यवाद जुड़े रहें और ऐसे ही प्रतिक्रियाएं देते रहें

मनोरमा ने कहानी में अपना योगदान पूरा कर दिया है इसके अलावा मनोरमा का प्रसंग आपको भविष्य में जरूर मिलेगा हो सकता है जिस रूप में आप चाह रहे हो उस रूप में न सही परंतु मिलेगा अवश्य आखिर उसने कहानी के नायक सरयू सिंह के बीज को धारण किया है।

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