Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 8 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

लगता है पाठको का इस कहानी से दिल भर गया है...



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कजरी और सुगना
 
दोपहर के वक्त लाली और सुगना आंगन में बैठकर बातें कर रही थी सोनू बाहर दालान में चारपाई पर लेटा हुआ ऊंघ रहा था। सुगना अपनी बुर की संवेदनशीलता के बारे में लाली से बातें करना चाह रही उसने लाली से पूछा



"ए लाली पहला रात के तोहरो उ ( बुर की तरफ इशारा करते हुए) लाल भई रहे का.."

"हां तनी मनि ( हां थोड़ा सा)"

"हमार तो ढेर लाल भईल बा"

सुगना ने अनजाने में ही सच कह दिया था। लाली को यह बात बिल्कुल भी ना समझ आई सुगना का पति घर में न था और सुगना की सुहागरात को हुए काफी समय बीत चुका था फिर सुगना ने अकस्मात वह बात क्यों कही। उसने उस बात को नजरअंदाज करते हुए कहा

"त तहरा सुहागरात में ढेर छीला गई रहे का रतन भैया चुमले चटले ना रहन का"

लाली हंस रही थी और सुगना भी उसका साथ दे रही थी उधर सोनू उनकी बात से उत्तेजित हो रहा था वह सुगना के प्रति तो आकर्षित न था पर लाली उसके सपनों में कई बार आती थी।

लाली की कसी हुई कमसिन जवानी सोनू को लुभाती थी परंतु अभी वह यह सुख लेने लायक न था उसकी उम्र अभी सपने देखने की ही थी जिस पर लाली की चुचियों ने अधिकार जमाया हुआ था।

सरयू सिंह आज भी सुगना के आगे पीछे घूम रहे थे यह बात भूल कर कि उसका भाई घर में ही है और आज सुगना के साथ संभोग करने पर पकड़े जाने का खतरा था पर वह अपनी उत्तेजना के अधीन होकर सुगना से मिलन का मौका तलाश रहे थे।

शाम का वक्त था सुगना की बछिया जो अब गाय बन चुकी थी उसे दुहने का वक्त हो रहा था। सामान्यतः यह काम सरयू सिह स्वयं किया करते थे परंतु उन्हें यह बात पता थी कि सोनू भी इस कला में दक्ष है। उनके मन में योजना बन गई उन्होंने कजरी से कहा

" आज सोनू से दूध निकलवा ल हमरा अंगूठा में दर्द बा"

थोड़ी ही देर में सोनू और कजरी दोनों सुगना की बछिया का दूध निकालने मैं लग गए। बछिया नयी थी वह अपनी चुचियों पर आसानी से हाथ नहीं लगाने दे रही थी। सोनू के हाथ तो उसके लिए बिल्कुल नए थे। सोनू ने उसके दोनों पैर बांध दिए और कजरी बछिया के पुट्ठों पर हाथ फिराने लगी।

यह एक संयोग ही था की सुगना अपने कमरे की कोठरी से एक बार फिर वही दृश्य देख रही थी जिसे देखकर उसके मन मे उत्तेजना ने जन्म लिया था।

उसने स्वयं को बछिया की जगह रख कर सोचना शुरू कर दिया। एक पल के लिए उसे लगा कि जैसे उसकी जांघें बांध दी गई हों और उसकी सास कजरी उसके नितंबों को सहला रही हो तथा उसकी चूचियों से दूध निकालने का प्रयास किया जा रहा हो। वह अपनी चुचियों पर सोनू के हाथ की कल्पना न कर पायी वह उसका छोटा भाई था उसके ख्यालों में अभी उसके बाबूजी सरयू सिंह ही छाए हुए थे।

वह अपनी सोच पर शरमा गई। उसके मन में आई इच्छा नियति ने पढ़ ली। सुगना ने अभी-अभी संभोग सुख लेना शुरू किया था उसके मन में तरह-तरह की कल्पनाएं आना वाजिब था आखिर वह बछिया ही थी जिसने सुगना की मन में उसके बाबूजी के प्रति प्यार को वासना में बदल दिया था।

दालान में बैठे सरयू सिंह कभी सुगना को देखते कभी कजरी और सोनू को।

सुगना अपने छोटे भाई के हाथ अपनी बछिया की चुचियों पर महसूस कर गनगना रही थी। वह हमेशा अपनी चुचियों की तुलना बछिया की चुचियों से करती रही थी। जैसे-जैसे सोनू के हाथ बछिया की चुचियों को मीस रहे थे सुगना के निप्पल खड़े हो रहे थे वह अपने मन में चल रहे अंतर्द्वंद में जूझ रही थी एक पल के लिए उसने सोनू के हाथों को अपनी चुचियों पर भी महसूस कर लिया।

क्या बछिया की चुचियों पर एक नवकिशोर के हाथ भी सरयू सिंह की तरह महसूस होते होंगे? क्या उम्र का अंतर चुचियों के स्पर्श पर कोई असर डालता होगा? वह अपने ख्यालों में खोई हुई थी तभी सरयू सिंह ने सुगना को पीछे से आकर पकड़ लिया. इससे पहले कि सुगना चौक पाती सरयू सिंह की हथेलियों ने उसके होठों को ढक लिया सरयू सिंह सुगना के गालों से गाल सटाये हुए उसे चूम रहे थे और लंड सुगना के नितंबो से सट कर सुगना को उसका एहसास दिला था सुगना दोहरी उत्तेजना की शिकार हो रही थी...

सुगना स्वयं को अपने बाबूजी के आगोश में महसूस कर रही थी उसकी निगाहें अपने छोटे भाई सोनू पर थी जो उसकी बछिया की चूचियां दबा दबा कर दूध निकाल रहा था तभी सरयू सिंह की हथेलियों ने सुगना की चुचियों को धर लिया सुगना का ब्लाउज सरयू सिंह की हथेलियों को न रोक पाया वो ब्लाउज के नीचे से प्रवेश कर सुगना की नंगी चूचियां को छूने लगी.

सुगना उत्तेजित हो चली थी. सरयू सिंह का लंड उसके नितंबों के बीच चुभ रहा था। अचानक सुगना ने अपनी साड़ी को ऊपर उठता महसूस किया उसे सरयू सिंह से यह उम्मीद न थी क्या उसके बाबु जी अभी इसी अवस्था में उसे नंगा करेंगे। वह कांप उठी उसकी निगाहें अभी भी अपनी सास कजरी और सोनू पर थी। परंतु सुगना अब उत्तेजना के आधीन थी सरयू सिंह उसकी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर करते हुए कमर तक ले आए और सुगना ने इसे रोकने की कोई कोशिश न की। सरयू सिंह का लंड सुगना की गांड से छू रहा था। वह अपने लंड को बुर की तरफ ले जाना चाह रहे थे।

सुगना खड़ी थी इस अवस्था में यह संभव न था वह कामकला के आसनों से परिचित न थी। सरयू सिंह ने सुगना के पेट पर अपना हाथ लगाया और उससे आगे झुकने का इशारा किया। सुगना एक खूबसूरत गुड़िया की तरह खिड़की को पकड़कर अपने शरीर को आगे झुका लिया तथा अपनी कमर को पीछे कर दिया। उसके बाबूजी के लंड को बुर् का स्पर्श मिल चुका था। स्पर्श ही क्या बुर से छलक रही लार ने सरजू सिंह के लंड के सुपारे को गीला कर दिया।

शरीर सिंह से और बर्दाश्त न हुआ उन्होंने अपने लंड को अपनी प्यारी सुगना बहू की बुर में उतार दिया वह गर्म सलाख की भांति सुगना की मक्खन जैसी बुर में प्रवेश करता गया। सुगना की आंखें बड़ी होती चली गई। वह इस उत्तेजक माहौल मैं अपना दर्द भूल कर कर लंड लीलने को कोशिश कर रही थी।

नियति तमाशा देख रही थी सरयू सिंह अपनी बेटी समान बहू सुगना को उसके छोटे भाई की उपस्थिति में धीरे-धीरे चोद रहे थे। उधर सोनू सुगना की बछिया की सूचियां मिस रहा था और इधर सरयू सिंह उसकी बहन सुगना के।

सरयू सिंह ने कहा

"सोनू बढ़िया से दूध दूहता लागा ता जल्दी एकरो बियाह करे के परी"

सुगना शर्मा गई और अपनी बुर को सिकोड़ कर सरयू सिंह के लंड पर दबाव बढ़ा दिया।

सरयू सिंह ने सुगना की चुचियों को तेजी से दबाया और सुगना कराह उठी...

"बाबू जी तनी धीरे से …...दुखाता, इकरा में से दूध ना निकली" उसने मुस्कुराते हुए कहा।

सरयू सिंह भी मुस्कुरा रहे थे उन्होंने सुगना को छेड़ा "जायेदा आज फिर से तहरा …. ( लंड से गर्भाशय पर प्रहार करते हुए) ए में मलाई भर दे तानी कुछ दिन बाद तोहरो चूची से दूध निकली"

सुगना ने अपने हाथ पीछे किये और उनके पेट पर मुक्का मारा

"छी कइसे बोला तानी"

समय कम था। अब सरयू सिंह सुगना को पूरे आवेश और उन्माद से चोदे जा रहे थे उधर दूध की बाल्टी भर रही थी उधर सरयू सिंह के अंडकोष में वीर्य।

बाल्टी भरने के बाद कजरी बछिया के पैर में बंधी रस्सी खोल रही थी और सोनू बाल्टी लिए उठ रहा था। इससे पहले कि वह दोनों दालान तक पहुंचते सरयू सिंह और सुगना अपना काम तमाम कर चुके थे। सरयू सिंह का वीर्य सुगना की बुर में भर चुका था और लंड निकलने के बाद उसकी जांघों से रिसता हुआ नीचे आ रहा था।

सरयू सिंह ने अपनी धोती में लपेटा हुआ लड्डू निकाला और सुगना को पकड़ा दिया वह खुशी-खुशी लड्डू खाने लगी।

कजरी और सोनू दलान में आ चुके थे।

सोनू ने सुगना को लड्डू खाते हुए देख कर बोला

"अकेले अकेले ही लड्डू खा तारे हमरा के ना देबे"

सुगना अबोध थी उसे लड्डू का रहस्य पता न था उसने लड्डू का बचा हुआ छोटा टुकड़ा सोनू को दे दिया जब तक सरयू सिंह सोनू को रोक पाते सोनू की जीभ उस लड्डू के स्वाद को महसूस कर रही थी लड्डू में मिली हुई दवाई का स्वाद सोनू को रास ना आया उसने कहा

"लड्डू तनी तीत लगाता"

सरयू सिंह ने बात बदल दी

"हां ई लड्डू तनी पुरान हो गईल बा"

इन्हीं बातों के दौरान सुगना ने अपनी आंखों से बहता हुआ वीर्य अपने पेटीकोट में पोछ लिया था।

कजरी सुगना के ब्लाउज पर पड़ी सलवटे देख रही थी परंतु वह कुछ बोल पाने की स्थिति में न थी उसे यह कतई उम्मीद न थी कि सरयू सिंह इतनी जल्दी और इस तरह से सोनू की उपस्थिति में सुगना के साथ छेडख़ानी कर लेंगे।

सोनू अपने जहन में अपनी दीदी सुगना का खुशहाल चेहरा और उसकी सहेली लाली की सुनहरी यादें लेकर अपने घर लौट गया।

इधर सरयू सिंह ने सुगना के जीवन में खुशियां भर दी थी। वह कभी कभी उसके गर्भाशय में अपना वीर्य भरते, कभी अपनी वीर्य रूपी मलाई से उसकी मालिश। सुगना को सरयू सिंह का हर रूप पसंद आता वह सिर्फ और सिर्फ चुदने का आनंद लेती। बुर के अंदर लंड का फूलना पिचकना उसे अद्भुत सुख देता था इसलिए वह सरयू सिंह को अपने अंदर स्खलित होने पर अब टोकती न थी। उसने अब सब कुछ नियति के भरोसे छोड़ दिया था। और नियत उसे अभी और सुख देने पर उतारू थी। उसका गर्भाधान अब प्राथमिकता न रही थी। सरयू सिह जब जब वह अपनी बहू की बुर में अपना वीर्य भरते उसकी काट वह लड्डू के रूप में सुगना को खिला देते।

सुगना को उस लड्डू का रहस्य अभी पता न था परंतु वह अपने गर्भ में गिरे हुए वीर्य को भूलकर संभोग सुख का आनंद ले रही थी। जब जब सरयू सिंह सुगना की बुर में अपना वीर्य भरते तब तब सुगना अपने बाबुजी को घूरकर देखती और उसे लड्डू मिलता। वह इस राज को जानना चाहती थी परंतु सरयू सिंह वह बात छुपा ले जाते।

सुगना ने अब अपनी जांघें अपने बाबूजी के लिए पूरी तरह फैला दी थी यह उसकी सास कजरी की भी इच्छा थी और उसकी मां पदमा की भी। सुगना मन ही मन गर्भवती नहीं होना चाहती थी परंतु वह यह बात बार-बार सरयू सिंह से नहीं कहना चाहती थी। सरयू सिंह जब जब उसकी बुर में अपना वीर्य भरते वह एक तरफ थोड़ी दुखी होती परंतु मां बनने की खुशी सोचकर वह प्रसन्न भी होती। बुर में वीर्य भरे जाने के पश्चात उसे लड्डू खाने को मिलता उसके लिए यह एक अतिरिक्त खुशी थी।

अगले दस बारह दिन में कजरी ने सुगना और सरयू सिंह को संभोग करने के खूब अवसर दिए। सुगना की घनघोर चुदाई भी हुई इसके वावजूद सुगना का महीना आ गया।

सुगना बेहद खुश थी परंतु अपनी सास कजरी के सामने दुखी होने का नाटक कर रही थी।

सुगना का महीना आने के पश्चात सरयू सिह बेहद प्रसन्न थे। यह खुशी उनके अंतर्मन में थी परंतु जब जब वह कजरी के पास जाते वह अपनी खुशी पर काबू रखने का प्रयास करते ।

इन दस बारह दिनों में कजरी और सरयू सिंह के बीच संभोग ना हो पाया था परंतु अब सुगना का महीना आने के बाद सरयू सिंह कजरी के साथ रात बिताना चाहते थे।

सुगना समझदार थी उसे सरयू सिंह और कजरी के बीच की नजदीकियां बखूबी पता थी वह जानती थी की अब चुदने की बारी उसकी सास कजरी की थी। वैसे भी सरयू सिंह इन दिनों बेहद उत्तेजित रहा करते थे और हो भी क्यों ना अपनी बहू की कोमल बुर को चोद चोद कर उनका लंड मदहोश हो गया था। उसे एक पल के लिए भी चैन ना आता जब जब सुगना लहराती हुई दिखाई पड़ती तब तब वह लंड अपना सर उठाता। सुगना इन दिनों कजरी के कोठरी में उसकी चारपाई पर ही सो रही थी।

शाम के वक्त सुगना और कजरी आगन में नहीं मिल रही थी तभी सुगना ने कहा

"मां, हम अपना कोठरी में में सुतब"

"ई काहें?"

"राउर कुवर जी आजो मत धर लेस" सुगना ने मुस्कुराते हुए कहा सुगना की बात सुनकर कजरी भी हंस पड़ी और बोली..

"हम बता देब परेशान मत हो"

" ए सुगना, एक बात पूछी?"

" का बात?"

" कुंवर जी भीतरीये गिरावत रहन नू"

"का गिरावत रहन?" सुगना ने अनजान बनते हुए कहा

"अरे आपन मलाई"

"मां साफ-साफ बोल ना का पूछा तारे"

कजरी ने अपनी जाँघे फैला दी और अपनी बुर की तरफ इशारा करते हुए बोली

"तोरा में मलाई भरले रहन की ना?"

"हा भरत रहन पर कभी कभी हमारा देह पर भी गिरावत रहन"

कजरी का चेहरा लाल हो रहा था जिसमें वासना का पुट ज्यादा था और क्रोध का कम उसने कहा

"उ तोरा देह पर ना गिरावत होइहें चूचीं पर गिरावत होइहें"

सुगना ने अपने मन की खुशी को दबाते हुए कहा

" ए मा तोहरा कैसे मालूम"

कजरी निरुत्तर हो गई उसकी चोरी उसकी बहू ने पकड़ ली थी। कजरी झेंप गयी उसने स्थिति को संभालते हुए कहा

"अरे सब मर्द लोग के दु ही चीज पसंद ह" उसने अपनी निगाहों से सुगना की चूची और बुर की तरफ इशारा कर दिया।

सुगना भी आज कजरी को छेड़ने का मन बना चुकी थी उसने कहा

"मां बाबूजी ता कई साल पहले ही चल गई रहन रउआ कैसे मालूम था मर्द लोग के लीला"

कजरी ने उसकी बात का कोई उत्तर न दिया बल्कि अपनी निगाहें गेहूं की थाली में गड़ा ली ।

सुगना ने अपनी मर्यादा को ध्यान में रखते हुए बात को वहीं पर समाप्त कर दिया परंतु जाते जाते वह मुस्कुराते हुए बोली

"आज हम अपना कोठरी में सूतब अपना कुँवर जी से बच के रहिह"

सुगना ने कजरी के मन की बात कह दी कजरी की अंतरात्मा खुश हो गई उसकी जांघों के बीच एक चिलकन सी हुई और कजरी की बुर मुस्कुरा उठी आज कई दिनों बाद सरयू सिंह का साथ उसे मिलने वाला था।

सरयू सिंह आगन में बैठकर खाना खा रहे थे कजरी के मन में आज हलचल थी। सुगना बार-बार कजरी की तरफ देख रही थी उसे पता था आज उसकी सास कजरी जरूर चुदेगी।

खाना खाने के बाद सुगना अपने कमरे में चली गई और कजरी ने अपनी बुर को धो पोछ कर तैयार कर लिया और अपनी चारपाई पर लेट कर सरयू सिंह का इंतजार करने लगी।

आगन में शांति होते ही सरयू सिंह ने अपनी लंगोट उतार ली अचानक उनका ध्यान स्टील के उस छोटे से डिब्बे पर गया जिसमें उन्होंने अपनी प्यारी बहू सुगना के लिए लड्डू बना रखे थे। आज इन लड्डुओं कि उन्हें कोई आवश्यकता न थी। कजरी की नसबंदी पहले ही हो चुकी थी।

सरयू सिंह आकर कजरी की बगल में लेट गए और उसकी चुचियों पर हाथ रख उसे सहलाने लगे कजरी ने कहा

"रउवा अपन बहू सुगना में भुला गईल बानी। हमार याद एको दिन ना आइल हा"

सरयू सिंह ने कजरी की बड़ी-बड़ी चुचियों को जोर से मसल दिया और बोले

"अरे सुगना त अभी लइका बिया। तू ही तो कह ले रहलू कि पूरा मेहनत कर ली ओकरा गोदी में लाइका खातिर"

" एहि से दोनों बेरा (टाइम) मालपुआ खात रहनी हां"

सरयू सिंह मुस्कुरा रहे थे। सुगना के मालपुआ को याद करके वो उत्तेजित हो रहे थे उनका लंड उनकी भाभी कजरी की गांड से छू रहा था जिसे वह पूरी तरह अंदर उतार देना चाहते थे परंतु कजरी ने उस लंड को अपनी गांड में लेने से मना कर दिया था इतने दिनों के साथ के बावजूद वह उस सुख का आनंद न ले पाए थे।

कजरी अब पलट कर पीठ के बल आ चुकी थी सरयू एक हाथ से उसकी चूची मिस रहे थे तथा अपने चेहरे को दूसरी चूची पर रगड़ रहे थे कजरी ने कहा

"राउर सारा मेहनत बेकार चल गईल.."

"मेहनत बेकार नईखे गइल देखेलू सुगना आजकल कितना खुश रहेंले"

"अब रउआ पुआ चूसब त खुश ना रही"

सुगना झरोखे पर खड़ी सरयू सिंह और अपनी सास कजरी की बातें सुन रही थी वह सतर्क हो गई थी उसे यह विश्वास ही नहीं हो रहा था की उसके बाबूजी और सास उसके ही बारे में ऐसी बातें कर रहे थे वह अपना कान लगाकर उनकी बातें सुनने का प्रयास करने लगी।

"ले आवा आज तोहरो चूस दी"

सरयू सिंह ने कजरी की साड़ी को ऊपर खींचना शुरू कर दिया उसकी मखमली और गदराई जांघें नग्न होने लगी। उधर सरयू सिंह उसकी साड़ी को उठा रहे थे और इधर कजरी अपनी चुचियों को ब्लाउज से आजाद कर रही थी।

सरयू सिंह अपना चेहरा कजरी की जांघों के बीच ले जाने लगे तभी कजरी ने रोक लिया और कहा

" रहे दी अभी ई सुख सुगना के ही दी साच में ओकर पुआ फूल जइसन कोमल बा"

"ओह त हु हूँ ओकर पुआ देखले बाड़ू"

"ओकरा खिड़किया से सब दिखाई देला"

"इकरा मतलब वह दिन तू सब देखले रहलु"

कजरी ने कोई जवाब न दिया अपितु सरयू सिंह को अपने ऊपर खींच लिया सरयू सिंह कजरी का इशारा पाते ही उसकी जांघों के बीच आ गए और उनका लंड अपनी सर्वकालिक ओखली में प्रवेश कर गया। सरयू सिंह की रफ्तार और उन्माद बिल्कुल नया था ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह कजरी की बुर को पूरे उन्माद से चोद कर कजरी को प्रसन्न करना चाहते हों और उसे अपनी सुकुमार बहू को चोदने का अवसर देने के लिए उसे धन्यवाद देना चाहते हों। इस नए उन्माद को कजरी ने पहचान लिया और मुस्कुराते हुए बोली

"सुगना बहू रउआ में फुर्ती भर देले बिया"

सरयू सिंह ने कजरी की चुचियों को मसल दिया और उसकी प्यासी बुर में झड़ने लगे कजरी भी अपनी जाँघे फैला कर अपने कुँवर जी की वीर्य वर्षा का आंनद लेने लगी। उसकी बुर भी अपना पानी छोड़ रही थी। आज के इस उत्तेजक प्यार में निश्चय ही सुगना का योगदान था कजरी और शरीर सिंह दोनों ही उसके बारे में सोच रहे थे।

उधर सुगना अपने बाबू जी और अपनी सास की बातें सुन चुकी थी। उसकी रजस्वला बुर भी पनिया गई थी परंतु सुगना उसे और छेड़ना नहीं चाहती थी।

अब तीनों ही एक दूसरे का राज जानते थे।

अपनी सांसे सामान्य होने के बाद कजरी में पूछा

"सुगना के कोनो बीमारी नइखे नु अतना मेहनत पर पर त ओकरा गाभिन हो जाये के चाहीं"

सरयू सिंह ने अपनी खुशी छुपाते हुए कहा " ना अइसन लागत त नइखे, जाए द एक महीना और देख ल"

सरयू सिंह ने अगले महीने भी सुगना की चुदाई का मार्ग प्रशस्त कर लिया था।

शेष अगले भाग में।
 
धन्यवाद, आपका स्वागत है।
 
अगले कुछ दिनों में सुगना और सरयू सिंह की बीच अंतरंगता और बढ़ती गई. कजरी ने कुंवर जी और सुगना को खुली छूट दे रखी थी। सरयू सिंह और सुगना अब दिन में भी एकाकार हो जाते। इधर कजरी रसोई में खाना पकाती उधर दोनों प्रेमी युगल अपनी रास लीला रचाते। सुगना के अस्त-व्यस्त कपड़े और बिखरे हुए बाल देख कजरी सारा माजरा समझ जाती और मुस्कुराते हुए सुगना से पूछती

"भीतरी गिरावले हां की फिर चुचिये पर"

सुगना शर्मा जाति परंतु वह इशारों ही इशारों में कजरी को उत्तर दे जाती। एक बार कजरी के प्रश्न पूछने पर सुगना उत्तर न दे पायी उसके मुंह में लड्डू भरा हुआ था उसने अपनी साड़ी घुटनों तक उठा दी जांघों से बहता हुआ वीर्य घुटनों तक आ चुका था।

कजरी सारा माजरा समझ गई और मुस्कुराने लगी और बोली...

"अब लगाता तोहार पेट फूल जायी। अपना मन भर सुख ले ल"

बेचारी कजरी को क्या पता था जब तक सुगना लड्डू खाती रहती उसका गर्भवती होना असंभव था.

सुगना मुस्कुरा रही और सरयू सिंह द्वारा दिया हुआ लड्डू खा रही थी। कजरी ससुर बहू के इस प्रेम से अभिभूत थी परंतु लड्डू का राज उसे भी समझ ना आ रहा था।

इधर जैसे-जैसे सुगना अपनी अदाओं से सरयू सिंह को रिझा रही थी उधर सरयू सिंह भी उत्तेजना को नए मुकाम पर ले जा रहे थे। वह शहर जाकर वह सुगना के लिए तरह-तरह की डिजाइनर पेंटी और ब्रा ले आए साथ ही साथ कुछ मैक्सी भी खरीद लाये।

सुगना उनके ख्वाबों की शहजादी वह उसे परियों की तरह सजाना चाहते थे और जी भरकर उसे चोदना चाहते थे। कभी-कभी वह घंटों सुगना के साथ नग्न होकर कोठरी में बंद रहते और कजरी को मजबूरन आवाज देकर उन दोनों को अलग करना पड़ता.

सुगना मैक्सी में अपनी आकर्षक काया लिए हुए लहराती हुई इधर-उधर घूमती और सरयू सिंह मौका देख कर उसे अपनी गोद में बैठा लेते। जब-जब सुगना का चुदने का मन होता वह अपनी पैंटी न पहनती और अपने बाबू जी की गोद में बैठते ही वह जादुई लंड सुगना की पनियायी बुर में प्रवेश कर जाता। उनकी गोद मे उछल कूद करने के बाद सुगना को लड्डू मिलता और वह अपनी जांघों पर बहता हुआ वीर्य लेकर खुशी खुशी वापस कजरी के पास चली जाती.

नया महीना आ चुका था सुगना का भी और अंग्रेजी कैलेंडर का भी। कैलेंडर के नए पृष्ठ पर समुद्र की खूबसूरत फ़ोटो थी जिसे सुगना मंत्रमुग्ध होकर देखती रह गयी। सुगना के चेहरे पर खुशी आ गई।

वह एकटक उस फ़ोटो को देखे जा रही थी तभी सरयू सिह कोठरी में आ गए। सरयू सिंह ने सुगना को गोद में उठा लिया और उसके गालों को चूमते हुए बोले।

" का देख तारू?"

"कतना सुंदर बा ई जगह हमनी के कभी देखे के ना मिली."

सुगना ने अनजाने में ही बाहर घूमने की इच्छा जाहिर कर दी। कई वर्षों बाद उसके मन में यह इच्छा जागी थी। सरयू सिंह को अपनी प्रेमिका की यह इच्छा हनीमून जैसी प्रतीत हुई। सरयू सिंह ने हिम्मत जुटाई और सुगना को किसी समुद्र तट पर ले जाने की सोचा परंतु यह इतना आसान न था वह किस मुंह से सुगना को हनीमून पर ले जाते।

जहां चाह वहां राह। सरयू सिंह ने अपनी व्यूह रचना की और रात को अपनी बाहों में सुगना को लेकर उसे यह खुशखबरी दी। सुगना की प्रसन्नता की सीमा न रही। उसने सरयू सिंह को चूम लिया और एक नई उत्तेजना के साथ उनके ऊपर आ गई सच कहते हैं जब प्रसन्नता मन पर हावी हो तो चुदने चुदाने का आनंद और भी बढ़ जाता है।

सुगना ने इसकी जानकारी कजरी को दी। कजरी भी बेहद प्रसन्न हुई अभी तक सरयू सिंह अपने मन में सिर्फ सुगना का ख्याल लिए हुए हनीमून की तैयारी कर रहे थे उधर कजरी ने भी साथ चलने की इच्छा जाहर की उस बात से उनकी कल्पना में व्यवधान आया और उनके चेहरे पर थोड़ी उदासी आ गई।

नियति मुस्कुरा रही थी। जिस कजरी ने सरयू सिंह को पिछले 10 - 15 सालों से हर सुख दिया था वह उस सुख और उसका साथ भूल कर उसकी बहू सुगना के साथ रंगरलिया मना रहे थे। उन्होंने कजरी को भी साथ ले चलने की स्वीकृति दे दी। खैर कजरी की उपस्थिति से ज्यादा फर्क नहीं पड़ना था। सुगना और सरयू सिंह का मिलन तब तक निर्बाध रूप से होता रहता जब तक कि सुगना गर्भवती ना हो जाती यह बात कजरी भी जानती थी और चाहती भी।

सरयू सिंह ने अपनी जमा पूंजी इकट्ठा की और अपनी जिंदगी के सारे अरमान पूरे करने अपनी भौजी कजरी और बहू सुगना को लेकर उड़ीसा के समुद्रतट पुरी जाने की तैयारी करने लगे।

उन्होंने यह बात अपने दोस्त हरिया से कहां

"ढेर दिन हो गोहिल सोचा तानी कजरी के तीरथ (तीर्थ) करा ले आई फेर बुढ़ापा में जाने कब मौका मिली की ना मिली"

सरयू सिंह ने अपने हनीमून को कजरी के सहारे एक नया मोड़ दे दिया था वह गांव में प्रतिष्ठित तो थे ही और अपनी भौजी को तीर्थ पर ले जाने की बात से गांव में उनका सम्मान और बढ़ गया था।

हरिया भी सरयू सिंह से बेहद प्रभावित हो गया उसने पूछा

"और सुगना बेटी ?."

"अकेले उ कहां रही उ भी संग ही जायी।"

हरिया बात समझ चुका था उसने सरयू सिंह के घर की देखरेख करने का जिम्मा उठा लिया। यह पहला अवसर था जब वह अपनी भौजी को लेकर किसी दूसरे शहर में जा रहे थे और आने वाले कई दिन सिर्फ और सिर्फ पर्यटन और सुगना के साथ हनीमून का आनंद लेना चाहते थे।

कजरी भौजी की खुली सहमति और सुगना की इच्छा दोनों ही सुगना से संभोग करने के लिए उन्हें प्रेरित करती उन्होंने मन ही मन कई सारी कल्पनाएं की थी जिन्हें वह साकार करना चाहते थे। अपनी सुगना और ध्यान में रखते हुए उन्होंने स्लीपर क्लास के तीन टिकट कटा लिए और अपनी बहु सुगना और भौजी कजरी को लेकर तीर्थ यात्रा पर निकलने की तैयारी करने लगे।

सुगना को गर्भधारण से बचाने के लिए अब तक वह जिस लड्डू का प्रयोग करते आ रहे थे उसे आगे प्रयोग करना कठिन होता इस बात का अंदाजा उन्हें था। उन्होंने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जाकर गर्भनिरोध के अन्य उपायों की जानकारी ली। दूसरा उपाय एक इंजेक्शन था जिससे अनचाहे गर्भ को अगले 2 वर्ष तक रोका जा सकता था सरयू सिंह अपनी वासना के अधीन थे उन्होंने मन ही मन सुगना को वह इंजेक्शन दिलाने की सोची .

परंतु जब जब वह उसके मासूम चेहरे को देखते और उसकी मां बनने की चाह के बारे में सोचते वह अपने फैसले में पाप का अंश महसूस करते। उनकी दुविधा बढ़ रही थी और पुरी जाने के दिन नजदीक आ रहे थे इसी दौरान सुगना के हाँथ में लोहे की एक पुरानी कील चुभ गई। उन दिनों टिटनेस इंजेक्शन का बहुत प्रचलन था।

सरयू सिंह सुगना को लेकर प्राथमिक सामुदायिक केंद्र पहुंच गए। एक पल के लिए सरयू सिंह की वासना फिर हावी हो गई और सुगना को उन्होंने 2 इंजेक्शन लगवा दिए। कम्पाउंडर राजवीर उनका राजदार बन गया उसने सुगना को 2 इंजेक्शन लगाए। पहला टिटनेस का और दूसरा आने वाले 2 वर्ष तक उसकी खुशियों का।

सुगना को एक इंजेक्शन के बारे में तो पता था परंतु दूसरे इंजेक्शन से वह पूरी तरह अनजान थी उसमें अपने बाबू जी पर पूरा विश्वास किया था परंतु सरयू सिंह ने अपनी बहू से छल किया था।

इंजेक्शन सुगना के शरीर में प्रवेश कर चुका था अब उसका कोई काट ना था अगले 2 वर्ष तक सुगना को सिर्फ और सिर्फ चुदना था और प्रकृति द्वारा प्रदत गदराई हुई जवानी का भरपूर आनंद लेना था। सरयू सिंह का वीर्य उसकी बुर के लिए किसी काम का ना रह गया था उससे सिर्फ और सिर्फ सुगना की चूचियों की मालिश हो सकती थी।

कुछ ही दिनों बाद सरयू सिंह अपनी बहू सुगना और भौजी कजरी को लेकर ट्रेन में सवार हो चुके थे सबके मन में अपने अपने अरमान थे कजरी को इस बात का इल्म न था की सरयू सिंह इस अवसर को हनीमून के रूप में देख रहे हैं परंतु कजरी खुद मन ही मन यह सोच रही थी कि क्या वह तीनों लोग एक ही कमरे में रहेंगे? यदि ऐसा हुआ तो क्या उसके कुंवर जी बिना संभोग किए रह पाएंगे?

सरयू सिंह जब जब अपनी पुरी यात्रा को याद करते थे उनका ल** तनाव में आ जाता था और जब तक कि उसे सुगना कि बुर् का कोमल स्पर्श ना मिलता वह शांत ना होता.


(आइए कहानी को वर्तमान में ले आते हैं)

हॉस्पिटल के बिस्तर पर लेटे हुए सरयू सिंह अपनी सुनहरी यादों से वापस आ गए थे उनका लंड सुगना के साथ बिताए गए कामुक पलों को याद कर खड़ा हो गया था जिसे वह अपने हाथों से शांत करने का प्रयास कर रहे थे। जितना ही वह उसे शांत करते वह उद्दंड बालक की तरह उतना ही उत्तेजित होता। वह धोती से बाहर आ चुका था कजरी पड़ी बेंच पर सोने का प्रयास कर रही थी। सरयू सिंह के बिस्तर पर हो रही हलचल को देखकर व उनके पास आ गई और बोली

"नींद नईखे आवत का ?"

सरयू सिंह ने अपने लंड को धोती के अंदर ढका पर उसके आकार को कजरी से न छुपा पाए। कजरी ने उसका तनाव देख लिया और बोला

"अब ई महाराज काहै खड़ा बाड़े? रउआ ई कुल मत सोचल करिन।"

सरयू सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा

"आज हमरा दीपावली वाला दिन याद आवत रहल हा।"

कजरी मुस्कुराने लगी उसे भी दीपावली की वह रात कभी न भूलती थी। उसने सरयू सिंह के लंड को अपने हाथों में ले लिया और बोली

"अब तू शांत हो जा. सुगना के लाइका दे देला अब ओकरा के तंग मत कर"

सरयू सिंह ने कहा " अब सुगना के मन ना करेला का"

कजरी ने कहा

"ना आइसन बात नइखे। लेकिन राउर दाग से चिंतित रहेले। ओकरा लागेला कि जब जब रउआ संगे सुते ले राउर दाग और बढ़ जाला"

सरयू सिंह को भी यह प्रतीत होता था कि नीचे इस दाग में कोई न कोई रहस्य अवश्य है परंतु वह इसका स्पस्ट उत्तर नही जानते थे।

कजरी उनके लंड को हाथों से सहला रही थी। उनकी प्यारी बहू सुगना अपनी सहेली लाली के घर जा चुकी थी। तभी कमरे का दरवाजा खुला और एक खूबसूरत नर्स कमरे में प्रवेश की। उस नर्स की उम्र सुगना जैसी ही थी और प्रकृति ने उसकी चुचियों, जांघों और नितंबों को भी वैसी ही खूबसूरती प्रदान की थी जैसी उनकी बहू सुगना को। सरयू सिंह के मन में वासना जाग उठी उन्हें पता था वह नर्स के साथ कुछ भी कर पाना असंभव था पर मन का क्या वह तो निराला था सरयू सिंह धोती से अपने तने हुए लंड को छुपा रहे थे।

अचानक उन्हें नर्स के हाथ में इंजेक्शन दिखाई पड़ा सरयू सिंह के होश फाख्ता हो गए। सारी उत्तेजना ढीली पड़ती गई। परंतु उनका लंड अभी भी इस अनजानी और खूबसूरत बुर की कल्पना में डूबा हुआ था। वह अपना सर झुकाने को तैयार न था।

नर्स ने कहा

"पीछे पलट जाइए कमर में इंजेक्शन देना है"

सरयू सिंह के करीब खड़ी कजरी ने उनकी धोती सरकाई और नर्स ने अपने कोमल हाथों से उनके नितंबों को थोड़ा रगड़ा और अगले ही पल इंजेक्शन घुसा दिया। सरयू सिंह दर्द से कराह उठे ज्यों ज्यों इंजेक्शन में भरी दवा अंदर जा रही थी एक तेज दर्द की लहर सरयू सिंह को महसूस हो रही थी अब उनका लंड भी अपना गुरुर भूलकर धीरे-धीरे शिथिल हो रहा था।

नर्स के जाने के पश्चात सरयू सिंह इस दर्द से निजात पाने की कोशिश कर रहे थे कजरी उनके नितंबों को से लाई जा रही थी उनका लंड अब उम्मीद खो चुका था और सिकुड़ कर छुप गया था।

कजरी ने उस लंड को वापस छूने की कोशिश की पर सरयू सिंह ने रोक लिया और बोला

"जायेद अब रहे द"

सरयू सिंह की उत्तेजना शांत हो चुकी थी और वह सोने का प्रयास करने लगे।

उधर हरिया सुगना और सूरज को लेकर लाली के घर आ गया। लाली सुगना को देखकर खुश हो गई उसने अपने पिता और सहेली का खूब स्वागत किया सरयू सिंह की स्थिति जानकर वह थोड़ा दुखी हुई पर उसे इस बात का संतोष था कि अब वह पूरी तरह होश में थे।

राजेश के घर में दो कमरे थे दोनों ही कमरे पर्याप्त बड़े थे वैसे भी रेलवे के घरों में जगह की कमी नहीं होती है राजेश और लाली ने दो चौकियों को जोड़कर एक बड़ा सा बिस्तर बना लिया था जिस पर राजेश और लाली तथा उनके दोनों बच्चे राजू और रीना सोया करते थे।

यह बिस्तर राजू और रीना की बाल सुलभ क्रीडा ओं का मैदान भी था और बच्चों के सो जाने के पश्चात वह काम क्रीड़ा के लिए भी प्रयोग में आता था।

दूसरे कमरे में उन्होंने बैठका बना रखा था जिसमें एक पतली चौकी पड़ी हुई थी जो किसी आगंतुक के सोने के काम आती घर में एक रसोई और एक गुसलखाना भी था।

लाली और सुगना रसोई खाना बना रहे थे और हरिया अपने नाती और नातिन के साथ खेल रहा था। सुगना का पुत्र सूरज एक किनारे आराम से सो रहा था। राजू और रीमा कभी उसकी पीठ पर चढ़ते कभी उसके मूंछ के बाल खींचते हरिया उनकी बाल सुलभ लीलाओं से प्रसन्न होकर ऊपर वाले को धन्यवाद दे रहा था जिसने उसकी लाली को ऐसे सुंदर और प्यारी औलाद दे दी थी। वह राजेश का भी शुक्रगुजार था जिसने लाली को हर सुख दिया था।

राजेश को आज घर नहीं आना था वह आज ही ट्रेन लेकर लखनऊ गया हुआ था। हरिया रात में खाना खाने के पश्चात बैठका में लगे हुए चौकी पर सो गया सुगना और लाली दोनों अंदर के कमरे में आ गई बच्चों को सुलाने के बाद बिस्तर पर लेटे लेटे वह दोनों बातें करने लगी।

सुगना उठकर बाथरूम की तरफ गई तभी लाली को राजेश की बातें याद आने लगी आज राजेश के ख्वाबों की मलिका उसके घर में थी घर में ही क्या उसके अपने बिस्तर पर थी काश राजेश यहां होता और अपनी सुगना को अपने बिस्तर पर देखकर उसकी कल्पनाएं आसमान छूने लगती। सुगना स्वयं लाली के बिस्तर पर आकर उत्तेजित महसूस कर रहे थे उसे पता था इस बिस्तर पर उसकी सहेली लाली जाने कितनी बार चुदी होगी।

सुगना के आने के बाद लाली ने कहा

"तोर जीजा जी आज घर में रहिते तो खुश हो जइते"

" ई काहें"

"उनके से पूछ लीह"

"खिसिया मत" ( नाराज मत हो)

लाली खुश थी उसने सुगना को राजेश की कल्पनाओं के बारे में खुलकर बता दिया जितना वह राजेश की कामुक कल्पनाओं के बारे में सुगना को बताती सुगना के कान और चौड़े हो जाते तथा बुर सावधान हो जाती.

सुगना और लाली दोनों अच्छी सहेलियां थी लाली के मुंह से ऐसी कामुक बातें सुनकर सुगना की बुर पनिया चुकी थी लाली भी उत्तेजित थी। दोनों सहेलियां अपने अपने मन में कई तरह के ख्याल लेकर सो गयीं।

अगली सुबह हरिया और सुगना वापस हॉस्पिटल चले गए। लाली और सुगना ने मिलकर कजरी और सरयू सिंह के लिए खाना बना लिया था। हॉस्पिटल पहुंचने पर सुगना को देख सरयू सिंह प्रसन्न हो गए एक ही रात में सुगना से हुई दूरी ने उन्हें कर भावुक कर दिया था वह सुगना के लिए दिन पर दिन अधीर होते जा रहे थे।

दोपहर में राजेश लखनऊ से वापस आ गया लाली ने उसे सरयू सिंह और सुगना के आने की सूचना दी राजेश एक तरफ तो सरयू सिंह के लिए थोड़ा सा दुखी हुआ पर सुगना के आगमन के बारे में सुनकर उसका दिल बल्लियों उछलने लगा उसके ख्वाबों की मलिका आज उसके इतने करीब है इस एहसास ने उसके दिल और दिमाग को अंदर तक गुदगुदा दिया वह लाली को दिखाकर बिस्तर के उस भाग को चूमने लगा जहां सुगना सोई हुई थी लाली हंस रही थी।

उसने कहा..

चली हॉस्पिटल चल के सब केहू से मिली आईल जाओ

राजेश प्रसन्न हो गया और कुछ देर बाद लाली और अपने दोनों छोटे बच्चों को लेकर हॉस्पिटल जाने के लिए रिक्शे में बैठ गया…

शेष अगले भाग में
 
आप जैसे कुछ चुनिंदा लोग ही बचे है इस कहानी के पाठको में।

पाठको के साथ साथ मेरा भी उत्साह कम हुआ है।

अपडेट वीकेंड पर आएगा कुछ नया करने का प्रयास है।
 
रिक्शे में बैठा राजेश सुगना के बारे में सोचने लगा। सुगना जैसी खूबसूरत और जवान युवती के साथ भगवान ने ऐसी नाइंसाफी क्यों की थी? उसका पति हर 6 महीने में गांव आता था। उस बेचारी को पति का सुख उन 3 -4 दिनों के लिए ही मिलता था. बाकी समय उसकी गदराई और मदमस्त जवानी का कोई पूछनहार न था.



राजेश इस बात को लेकर सुगना से बेहद हमदर्दी रखता था। सुगना भी राजेश के करीब आ रही थी यह बात राजेश ने महसूस की थी। जब भी वह अपनी ससुराल जाता सुगना राजेश के लिए तरह-तरह की खानपान की सामग्री बनाती. राजेश उसकी ढेर सारी तारीफ करता और जीजा साली एक दूसरे के प्रति प्रेम का इजहार अपनी आंखों ही आंखों में कर लेते। राजेश उसके लिए उपहार भी ले जाने लगा था जिसे सुगना सहर्ष स्वीकार कर लेती।

इस बार की होली ने राजेश और लाली के बीच सुगना को लेकर आम सहमति बना दी। लाली को अब सुगना और राजेश के बीच पनप रहे कामुक संबंधों से परहेज न रहा। यही हाल राजेश का था वह लाली में सुगना के भाई सोनू के प्रति कामवासना भड़का रहा था।

दरअसल राजेश एक खुले विचार का आदमी था उसके जीवन में कामुकता और सेक्स का विशेष स्थान था। उसे पता था लाली और उसके बीच जो संबंध है उसकी डोर मजबूत थी थोड़ा बहुत व्यभिचार से यदि आनंद बढ़ता था तो उसे इसमे कोई आपत्ति न थी। अब तो लाली भी उसकी इच्छा में शामिल हो गई थी और नियति ने उनकी इच्छा पूर्ति के लिए सुगना और सोनू को उनसे मिला दिया था।

रिक्शा हॉस्पिटल के सामने पहुंच चुका था। राजेश ने राजू को गोद में लिया और लाली ने रीमा को। दोनों पति पत्नी हॉस्पिटल की सीढ़ियां चढ़ते हुए सरयू सिंह के कमरे में आ गए। सरयू सिंह बिस्तर पर पड़े हुए कमरे में घुस रहे अपने प्रतिद्वंदी को देख रहे थे। राजेश ने उन्हें नमस्कार किया और उनका हालचाल लिया। राजेश की निगाहें कुछ देर तो सरयू सिंह के ऊपर रही पर शीघ्र ही अपने लक्ष्य पर पहुंच गयीं।

सुगना के मासूम चेहरे पर प्यार बरसाने के बाद उसकी निगाहों में कामुकता जाग उठी। राजेश की निगाहें सुगना की चूचियों और कटीली कमर पर पड़ीं। कमर के उस गोरे हिस्से जो ब्लाउज और कमर पर साड़ी के घेरे के बीच दिखाई पड़ रहा था उसके बीच सुगना की सुंदर नाभि सुगना के छुपे खजाने का स्पष्ट संकेत दे रही थी। राजेश ने सुगना की नाभि को देख कर मन ही मन सुगना की कसी हुयी बुर की कल्पना कर ली।

सुगना ने राजेश की निगाहों को अपने शरीर पर महसूस कर लिया था। वह गठरी की भांति सिमट रही थी। उसने लाली की गोद से रीमा को ले लिया और लाली को अपने बगल में बैठा लिया। वह राजेश की कामुक निगाहों को अपने बाबू जी के सामने सहने की स्थिति में नहीं थी।

राजेश ने नर्स से उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी इकट्ठा की। वहां उपस्थित सारे लोगों में राजेश सबसे पढ़ा लिखा और प्रतिष्ठित व्यक्ति था। सरयू सिंह भी अपनी युवावस्था में इसी प्रकार अपनी काबिलियत के बल पर कई लड़कियों और युवतियों को प्रभावित करते थे। आज राजेश उनके सामने ही उनकी सुगना को उनसे दूर करने जा रहा था। सरयू सिंह की सोच ना चाहते हुए भी राजेश को प्रतिद्वंदी की निगाह से देख रही थी। इसके उलट राजेश उन्हें और अपने ससुर हरिया को एक ही निगाह से देखता था। सुगना उसकी साली थी और जिस अवस्था से गुजर रही थी उसने राजेश के मन में सुगना के प्रति स्वाभाविक कामवासना को जन्म दिया था। राजेश को तो यह इल्म भी न था की हॉस्पिटल के बेड पर पड़ा हुआ यह अधेड़ अपनी बहू सुगना से ऐसे संबंध बनाए हुए था।

अचानक हरिया ने कहा

"भैया आज हम गांव चल जा तानी खेत में खाद डाले के बा. कल फिर आईब"

हरिया यह जान चुका था कि राजेश आज घर पर ही रहेगा और घर की हालत ऐसी न थी जहां अधिक मेहमान एक साथ रह सकते थे उसने गांव जाना ही बेहतर समझा।

कुछ देर और बातें करने के पश्चात हरिया गांव के लिए निकल गया.

शाम हो रही थी। लाली की बेटी रीमा रो रही थी। सरयू सिंह ने राजेश से कहा..

"बेटा अब आप लोग भी जाके आराम करो बच्चा सब भी परेशान हो रहे हैं" सरयू सिंह राजेश से हिंदी में बात करने का प्रयास कर रहे थे। राजेश ने लाली की तरफ देखा और उसकी इच्छा जाननी चाही। आंखों ही आंखों में लाली की सहमति प्राप्त कर उसने कहा..

" ठीक है । अब हम लोग जा रहे है। काल फिर आएंगे"

सरयू सिंह खुश हो गए। उन्हें जाने क्यों यह उम्मीद हो गई थी कि आज सुगना राजेश के घर नहीं जाएगी। आखिर अब वहां जाने का कोई औचित्य भी न था। आज लाली का पति घर आ चुका था।

राजेश उठ कर खड़ा हो गया। लाली ने सुगना से कहा

"सुगना चला ना ता अंधेरा हो जाई"

कजरी भी यही चाहती थी कि सुगना लाली के साथ चली जाए ताकि उसके बेटे सूरज को कोई दिक्कत ना हो।

लाली ने कजरी के मुंह की बात छीन ली थी। कजरी में उसका साथ देते हुए कहा

"अरे सुगना.. सूरज बाबू के भूख लागल होइ घर जाकर कुछ खिया पिया दीह"

सूरज का नाम सुनकर सरयू सिंह शांत हो गए। एक बार फिर उनकी प्यारी सुगना उनकी आंखों के सामने उनसे दूर अपने प्रेमी राजेश के साथ जा रही थी। उनके दिल का दर्द एक बार फिर बढ़ रहा था। नियति उनके साथ यह खेल क्यों खेल रही थी वह स्वयं ना समझ पा रहे थे।

कजरी उनके मन की व्यथा जान रही थी। जब से उनके जीवन में सुगना आई थी तब से शायद ही कोई दिन ऐसा था जिस दिन उनके लंड ने वीर्य प्रवाह ना किया हो। सरयू सिंह दिन में कभी एक बार तो कभी दो बार सुगना या कजरी को जमकर चोदते तथा अपनी कामवासना को शांत करते। उनमें यह आग पिछले दो-तीन वर्षों में और भी बढ़ गई थी। निश्चय ही इसकी जिम्मेदार सुगना की मदमस्त जवानी और उनकी पुरी यात्रा थी जिसमें सरयू सिंह ने कजरी और सुगना के साथ कामकला के विविध रंग देखे थे।

सरयू सिंह अपना सोया हुआ लंड लेकर बिस्तर पर पड़े हुए थे। जब तक सुगना यहां थी वह चहक रहे थे। वह मन ही मन हॉस्पिटल के इस बिस्तर पर भी सुगना को चोदना चाहते थे। उसके जाते ही उनका चेहरा उदास हो गया कजरी ने कहा..

"अपना सुगना बाबू के याद कर तानी हां?"

कजरी ने सरयू सिंह की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. सरयू सिंह मुस्कुराने लगे वह आज कुछ तरोताजा महसूस कर रहे थे. कजरी ने फिर कहा

"अब ई कुल चोदा चोदी छोड़ दीं। हर चीज के ए गो उमर होला। सुगना त अभी जवान बिया हमनी के उम्र गइल अब ई कुल ठीक नइखे।"

( हर चीज की एक उम्र होती है सुगना तो अभी जवान है पर हम लोग अब बूढ़े हो चले हैं)

सरयू सिंह कजरी की बातें सुन तो रहे थे पर उनका लंड इस बात को सिरे से नकार रहा था। शिलाजीत का असर अभी भी उस पर था। सुगना के साथ चोदा चोदी की बातें सुनकर वह हरकत में आ गया और धोती में एक नाग की भांति अपना सर उठाने लगा। कजरी ने हॉस्पिटल के कमरे का दरवाजा बंद किया और सरयू सिंह के लंड को सहलाने लगी। उसे पता था सरयू सिंह को सबसे ज्यादा आनंद स्खलित होने में ही मिलेगा। शायद वह सुगना की कमी को कुछ हद पूरा कर पाएगी और अपने कुँवर जी के चेहरे पर वापस ताजगी ला पाएगी।

कजरी सरयू सिंह के लंड को हाथों में लेकर सहलाने लगी वह अब अपनी बुर को सन्यास दिला चुकी थी परंतु आवश्यकता पड़ने पर अपने हाथों के कमाल से शरीर सिंह को खुश कर देती। आज भी उसने सरयू सिंह के लंड को सहलाना शुरु कर दिया था।

उधर राजेश अपनी पत्नी और अपनी प्यारी साली को लेकर हॉस्पिटल के नीचे आ चुका था उसने लाली और सुगना को एक रिक्शे में बैठाया तथा दूसरे रिक्शा अपने पुत्र राजू को लेकर घर की तरफ निकल पड़ा लाली और सुनना का रिक्शा आगे आगे चल रहा था और राजेश का उनके पीछे।

राजेश को आज ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी बहुप्रतीक्षित प्रेमिका उसके घर आई हुई थी। राजेश ने घर पहुंचने के ठीक पहले रिक्शा रोक दिया और आइसक्रीम तथा मोतीचूर के लड्डू खरीद लिए। उसने शायद लाली से कभी सुन रखा था कि सुगना को मोतीचूर के लड्डू बेहद पसंद थे।

सुगना और लाली ने घर पहुंचते ही बच्चों के खान-पान का प्रबंध किया बच्चे अस्पताल के वातावरण में कुछ देर में ही तंग हो गए थे। बच्चों का खाना पीना समाप्त होते हैं वह कमरे में लगे बड़े बिस्तर पर खेलने लगे। राजेश के दोनों बच्चे उससे बेहद प्यार करते थे और उसके पीठ पर चढ़कर खेल रहे राजेश भी उनका साथ पाकर आनंदित था ।

उसने सुगना के पुत्र सूरज को अपनी गोद में लेने की चेष्टा की। सूरज राजेश के पास नहीं जाना चाहता था पर उसके हाथ में एक नया और अनजान खिलौना देखकर उसे लेने के लिए राजेश की तरफ हाथ बढ़ाया इसी समय राजेश ने अपने दोनों हाथ बढ़ा दिए और सूरज उसकी गोद में आ गया पर सूरज के हस्तांतरण के समय राजेश की हथेलियों ने सुगना के वक्ष स्थल पर तने हुए सांची के स्तूपों को छू लिया यह घटना अकस्मात हुई थी पर उसकी सिहरन जीजा और साली दोनों में हुई थी। एक पल के लिए राजेश का लंड हरकत में आ गया था। सभी चूचियां उतनी ही कोमल होती है परंतु पराई और अपरिचित चूँची की बात ही अलग थी। सुगना भी अपनी जाँघों के बीच में अनजाना करेंट महसूस कर रही थी। उसने अपनी आंखें झुका ली और कमरे से बाहर आ गई।

कुछ देर खेलने के बाद लाली के दोनों बच्चे राजू और रीमा निद्रा देवी के आगोश में चले गए। सुगना का पुत्र सूरज बिना सुगना की चुचियों का रसपान किये नहीं सोता था। वह अभी भी जाग रहा था और राजेश के साथ खेल रहा था।

सुगना जब भी कमरे की तरफ देखती उसे यह देखकर बेहद हर्ष होता की राजेश सूरज को कितना प्यार करता है जिस तरह बछड़े को प्यार करने से मां स्वतः ही करीब आ जाती है वही हाल सुगना का राजेश उसे पसंद आने लगा था।

लाली ने कहा "जा सूरज के सुता दा उ भी थक गईल होइ"

सुगना कमरे में आ गई और राजेश से बोली

"लाइए मुझे दे दीजिए आपको बहुत तंग किया होगा"

सुगना आवश्यकता पड़ने पर हिंदी बोल लेती थी वह अपनी मां और फौजी पिता के साथ जब कई वर्षों तक बाहर रही थी उस दौरान उसने यह गुण सीख रखा था परंतु यह हिंदी भाषा वह सोच समझकर बोलती थी स्वाभाविक रूप से वह अपनी मूल भाषा में ही बात करती थी।

एक बार फिर सूरज का हस्तांतरण हुआ पर राजेश के हाथों को सुगना का उभरी हुयी चूँचियों का स्पर्श प्राप्त ना हो सका।

राजेश ने कहा बहुत "प्यारा बच्चा है बिल्कुल आप पर गया है"

इतना कहकर राजेश ने सूरज के गाल पर चुंबन ले लिया सूरज का गाल और सुगना के गाल में ज्यादा दूरी न थी एक पल के लिए सुगना को लगा जैसे सूरज के बाद उसकी ही बारी है तभी लाली कमरे में आ गयी।

सुगना सूरज को लेकर कमरे से बाहर जाने लगी तभी लाली ने उसे रोक लिया और बोली

"एहीजे बैठ के दूध पिया ल"

सुगना राजेश के सामने अपनी चूचियां खोलकर सूरज को दूध पिलाने में शर्मा रही थी उसकी दुविधा देखकर राजेश ने कहा

" आप आराम से बैठ जाइए मैं बाहर घूम कर आता हूं"

लाली ने अधिकार पूर्वक कहा

" अरे आप बैठिए सुगना दूसरी तरफ मुंह करके पिला लेगी।"

सुगना बिस्तर पर बैठ गई और सूरज को दूध पिलाने लगी। राजेश दीवाल पर टेक लगा कर बैठा हुआ था। सुगना ने अपने आंचल से अपनी चुचियाँ ढक लीं और सूरज को दूध पिलाने लगी। सुगना की पीठ राजेश की तरफ थी।

लाली ने राजेश को छेड़ा..

"लीजिए अब तो आपकी साली घर आ गई कीजिए उसका स्वागत जैसे हमसे बात करते थे"

राजेश शर्म से पानी पानी हो गया लाली इस तरह की बात बोल जाएगी उसने कभी न सोचा था। वह निरुत्तर हो गया। उधर सुगना अपना सर नीचे किये मुस्कुरा रही थी। पिछली रात लाली ने राजेश द्वारा उसे लेकर की जाने वाली बातों का एहसास करा दिया था। इतना तो सुगना को भी पता था कि पति-पत्नी के बीच में ढेर सारी ऐसी बातें होती हैं जिनका हकीकत से कोई लेना देना नहीं होता। खुद सरयू सिंह उसके साथ ऐसी ऐसी कल्पनाएं किया करते थे जो संभव न था पर उसका आनंद सरयू सिंह भी लेते थे और सुगना भी।

राजेश उसके प्रति आकर्षित था पर लाली जितना बोलती थी उतना सोचना तो आसान था पर करना कठिन। सुगना की जांघों के बीच तनाव बढ़ रहा था उसकी कोमल बुर सचेत हो गई थी।

राजेश ने बात बदलते हुए कहा

"आप के आदेश पर आपकी सहेली के लिए आइसक्रीम ले आया हूं"

" और वह मोतीचूर का लड्डू क्या अकेले में खिलाएगा"

लाली फिर हंस पड़ी थी वह राजेश पर प्रहार किए जा रही थी और सुगना सर नीचे किए हुए मुस्कुरा रही थी।

राजेश भी

हाजिर जवाब था उसने कहा

"अरे आप मौका दीजिएगा तब ना लड्डू खिलाएंगे"

लाली ने झूठ मुठ का गुस्सा दिखाते हुए बोला

"ठीक है हम जा रहे हैं खाना निकालने तब तक अपनी साली को लड्डू खिला लीजिए"

वह उठकर जाने लगी। सुगना ने लाली का हाथ पकड़ लिया और बोला

"हम तोरा रहते लड्डू खा लेब हमरा लड्डू खाए में कौन लाज लागल बा"

सुगना की बात सुनकर राजेश को बल मिला वह बोला "मेरी साली साहिबा ज्यादा समझदार है"

तीनों हंसने लगे थे अब तक सूरज सो चुका था। सुगना ने उसे सुलाने के लिए अनजाने में ही राजेश की तरफ मुड़ गई उसे अपनी चूचियां ढकने का ख्याल न रहा और सूरज को बिस्तर पर सुलाते समय उसने अपनी कोमल नंगी चूचि और खुले हुए निपल्ल का दर्शन राजेश को करा दिया। लाली ने राजेश की निगाहों को सुगना की चुचियों पर निशाना साधते देख लिया और सुगना से हंसते हुए बोली..

"ए सुगना एक आदमी और पियासल बा, कुछ दूध बाचल बा का?"

राजेश की चोरी पकड़ी गई थी सुगना ने राजेश की निगाहों को अपनी चुचियों पर महसूस कर लिया और तुरंत ही अपनी चूचियां ढक लीं.

उसने कुछ कहा नहीं और मुस्कुराते हुए बोली

"ते पागल हो गईल बाड़े चल खाना निकल जाऊ"

उसी समय एक व्यक्ति द्वारा दरवाजा खटखटाने का का एहसास हुआ। राजेश ने उठकर दरवाजा खोला उस व्यक्ति ने कहा

"स्टेशन मास्टर साहब ने आपको बुलाया है"

"ठीक है मैं आता हूं" राजेश ने कहा।

राजेश कपड़े पहन कर बाहर जाने के लिए तैयार होने लगा। लाली थोड़ा दुखी हो गई पर राजेश ने कहा

"अरे तुम खाना निकालो मैं थोड़ी देर में आ जाऊंगा" लाली थोड़े गुस्से में थी।

राजेश के जाने के पश्चात सुगना ने लाली का गुस्सा शांत किया और वह दोनों सहेलियां आपस में हंस-हंसकर बातें करने लगी। लाली ने सुगना से कहा...

"चल तब तक हमनी के कपड़ा बदल लीहल जाउ"

आज ही राजेश ने लखनऊ से आते समय लाली के लिए एक सुंदर नाइट गाउन लाया था। यह नाइट गाउन फ्रंट ओपन टाइप का था जिसे कमर में बने कपड़े के बेल्ट द्वारा बांधा जा सकता था उसका कपड़ा बेहद मुलायम और कोमल था सुगना उसे अपने हाथों में लेकर छू रही थी। उसने इतना अच्छा और कोमल नाइट गाउन पहले कभी नहीं देखा था।

लाली ने कहा

"ए सुगना आज तू ई हे पहिंन ला"

" हट पागल, जीजा जी तोहरा खातिर ले आईल बाड़े."

"पर तोरा के पहिंनले देखे लीहें तो और मस्त हो जइहें. हमार कसम पहिंन ले"

लाली की जिद के आगे सुगना की एक न चली और उसने वह नाइट गाउन पहनने के लिए अपनी रजामंदी दे दी। अचानक सुगना को याद आया उसने पेंटी नहीं पहनी थी साड़ी और पेटीकोट पहनने के बाद उसकी कोई विशेष आवश्यकता वह महसूस नहीं करती थी। आज दिन भर तो वह बिना ब्रा के रही थी दरअसल दूध भरे होने के कारण सुगना की चूचियां ज्यादा बड़ी थी।

आज सुबह नहाने के पश्चात सुगना ने लाली की साड़ी और पेटीकोट तो पहन लिया था परंतु उसकी ब्रा सुगना को फिट नहीं आ रही थी बड़ी मुश्किल से एक पुरानी ब्लाउज सुगना की चूँचियों को ढक पाने में कामयाब हुई थी। इस कसी हुई ब्लाउज की वजह से सुगना की चूचियां और तन गई थी तथा निप्पल अपनी उपस्थिति साफ साफ दिखा रहे थे जिसे सुगना अपने आंचल से ढक कर उसे छुपाने का प्रयास कर रही थी।

सुगना ने लाली से कहा

"गाउन पेटीकोट के ऊपर से पहनब हमरा भीरी नीचे के कपड़ा नईखे"

लाली सुगना की दुविधा समझ गई और अपनी अलमारी खोलकर एक सुंदर सी लाल रंग की पेंटी निकाली। सुगना के नितंब लाली के नितंबों से थोड़ा ही बड़े थे परंतु पेंटी लचीले कपड़े से बनी हुई थी थोड़ा प्रयास करने पर सुगना ने उसे पहन लिया सुगना की गोरी जांघो पर लाली की निगाहें टिक गई वो बेहद खूबसूरत थीं और केले के तने की भांति चमक रही थीं। सुगना का सिर्फ रंग ही गोरा न था उसकी त्वचा में एक अलग किस्म की चमक थी।

लाली ने कहा..

"तोर जाँघ कतना चमकत बा का लगावे ले"

सुगना मुस्कुरा रही थी उसने कोई उत्तर न दिया वह अपने गनितंबों को उस लाल पेंटी में व्यवस्थित कर रही थी।

कुछ देर में उसने लाली की साड़ी और पेटीकोट को उतार दिया तथा उस सुंदर नाइट का उनको अपने शरीर पर धारण कर लिया। सुगना की खूबसूरती देखते ही बन रही थी वह खूबसूरत तो थी ही और इस खूबसूरत निवास में एक परी की बात दिखाई पड़ रही थी। सुगना ने लाली से अपनी सुबह खोली गई ब्रा लाने को कहा।

"एक बार ऐसे ही अपना जीजा जी के दिखा दे उनकर जीवन तर जायी।"



इतने में ही दरवाजे पर एक बार फिर खटखट की आवाज हुयी। राजेश वापस आ चुका था लाली झट से भाग कर गई और सुगना की ब्रा ले आई सुगना ने आनन-फानन में ही वह ब्रा पहनी उसकी सांसे तेज चल रही थी। जब तक सुगना ब्रा के हुक फसाती लाली दरवाजे की कुंडी खोल चुकी थी। राजेश अंदर आ चुका था और सुगना कमरे से निकलकर हॉल में आ रही थी। राजेश ने सुगना को देखा... उसकी सांसे रुक गई….
 
मुझे इस बात की खुशी है किआप सुगना और सरयू सिंह से जुड़ाव महसुस करने लगे है शायद इसीलिए आप सुगना और राजेश के बीच पनप रहा रिश्ता पसंद नही आ रहा है।

आपने छाया के बारे में भी शायद ऐसी ही प्रतिक्रिया दी थी।

क्या करू मित्र जिस तरह पुरुष थोड़ा बहुत व्यभिचार करते हैं उसी प्रकार महिलाओं को भी थोड़ा फ्रीडम देना आवश्यक है। अन्यथा कथानक का निर्माण करने के लिए पात्र कम पड़ जाएंगे...

जुड़े रहिए और आनंद लेते रहे धन्यवाद
 
मेरी लिखी हुई कहानी में आपकी आधी इच्छा तो अवश्य पूरी होगी पर इसे पूरी तरह पालन करवाना कठिन होगा।

फिर भी यदि आप जैसे और पाठकों की प्रतिक्रियाएं यदि इसी दिशा में रहेंगी तो मुझे लिखे हुए अंशों में तब्दीली करना होगा।

जुड़े रहे और सुझाव देते रहे
 
थैंक्स। शीघ ही एक त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा।
 
फिर लाली और सोनू का क्या होगा। कहानी के किरदार और परिस्थितियों उलझी हुई इस उलझन का आनंद लें।
 
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