Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 13 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

जब तक इस कहानी का अपडेट आता है...

एक सफ़ेदपोश की.... मौत

कहानी पढ़िए....

अपडेट आज शाम तक....
 
लाली को प्रसन्न देखकर सोनू की बांछें खिल उठीं। वह फटाफट अपनी फटफटिया से नीचे उतरा और मन में उमंगे लिए लाली के घर की तरफ तेज कदमों से चल पड़ा उसके मन में सिर्फ और सिर्फ एक ही ख्याल आ रहा था कि हे भगवान राजेश जीजू घर पर ना हो.

नियति मुस्कुरा रही थी जिस व्यक्ति ने लाली और सोनू को करीब लाने में सबसे अहम भूमिका अदा की थी सोनू अपनी अज्ञानता वश उसकी उपस्थिति को अवांछित मान रहा था.

परंतु मन का चाहा कहां होता है। फटफटिया की आवाज राजेश ने भी सुनी थी और लाली का संबोधन भी वह भी हॉल में आ चुका था जैसे ही सोनू लाली के करीब आया राजेश ने कहा

"अरे वाह साले साहब आज तो फटफटिया में….. कहां लॉटरी लग गई?"

सोनू केअरमानों पर घड़ों पानी फिर गया.

"नहीं. जीजाजी , यह मेरे दोस्त की है कुछ काम से शहर आया था सोचा आप लोगों से मिलता चलूं"

"सच बताना मुझसे या अपनी लाली दीदी से?"

सोनू पूरी तरह झेंप गया परंतु लाली ने बात संभाली

"आपका क्या है आप तो दिन रात ट्रेन में ही गुजारते हैं मेरा भाई कभी-कभी आकर हम सबको खुश कर देता है"

सोनू मुस्कुराने लगा उसने राजेश के चरण छुए और फिर लाली दीदी के। लाली ने फिर उसे उठाकर अपने गले से लगा लिया यदि राजेश उस हाल में ना होता तो सोनू के हाथ निश्चय ही लाली की पीठ पर अपनी उपस्थिति का एहसास करा रहे होते और इन दोनों के बीच दूरियां कुछ और कम होती लाली के तने हुए स्तन सोनू के सीने से सट कर चिपटे हो चुके होते।

तभी लाली का पुत्र राजू सोनू के पास आ गया। सोनू ने उसे अपनी गोद में उठाया और कुर्ते की जेब से दो लॉलीपॉप निकालकर उसके हाथों में दे दिया। राजू ने सोनू के गालों पर चुंबन दिया। एक पल के लिए सोनू को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे लाली के कोमल होंठ उसके गालों से हट गए। सोनू की स्थिति सावन के अंधे जैसी हो गई थी उसे हर जगह सिर्फ और सिर्फ लाली के खूबसूरत कोमल अंग और दिखाई पड़ रहे थे.

लाली ने फटाफट चाय बनाई और हॉल में बैठकर अपने दोनों मालियों के साथ चाय पीने लगी। सोनू की नजरें झुकी हुई थीं और राजेश अपनी आंखों के सामने नियति द्वारा मिलाए गए तो अद्भुत प्रेमियों को एक साथ देख रहा था। सोनू जैसे बलिष्ठ और मजबूत युवा को लाली जैसी गदराई हुई युवती के साथ देख कर राजेश भाव विभोर हो गया। मन ही मन हुआ उन दोनों को संभोग अवस्था में देखने लगा। लाली ने उसकी मनोदशा पढ़ ली और बेहद प्यार से बोली

"कहां अपनी फटफटिया में खो गए चाय पी लीजिए चाय ठंडी हो जाएगी"

राजेश अपनी ख्यालों से बाहर आया और बोला

"तुम शंकर जी के मंदिर जाने वाली थी ना जाओ आज तो तुम्हारा भाई फटफटिया लेकर आया है उसी के साथ घूम आओ"

"और घर का काम धाम कौन करेगा आपको ड्यूटी भी तो जाना है"

"अरे तुम तैयार होकर जल्दी चली जाओ आज सब्जी मैं बना दूंगा तुम आकर रोटी सेक लेना और बाकी काम बाद में हो जाएगा और फिर फटफटिया रोज रोज थोड़ी ही आएगी"

अभी कुछ देर पहले राजेश की उपस्थिति को देखकर सोनू जितना निराश हुआ था राजेश के प्रस्ताव को सुनकर वह उतना ही प्रसन्न हो गया। उसने राजेश की हां में हां मिलाते हुए कहा

"चलिए दीदी आप को घुमा लाता हूं"

सोनू के साथ फटफटिया पर बैठने की बात सोच कर लाली के चेहरे पर शर्म की लालिमा दौड़ गई वह अपनी भावनाएं छुपाते हुए बोली

"तू मोटरसाइकिल चलाना कब सीख गया मुझे गिरा तो नहीं देगा"

"नहीं दीदी मैं चला लेता हूं"

तभी राजू भी जाने की जिद करने लगा

"नहीं बेटा अभी मम्मी को जाने दो जब मैं फटफटिया लाऊंगा तब उस पर बैठना"

सोनू एक बार फिर राजेश के प्रति कृतज्ञ हो गया वह अपनी किस्मत पर नाज कर रहा था कि आज सब कुछ उसके मनोमुताबिक हो रहा था। उसने अपनी खुशी पर काबू रखते हुए चाय के कब को उठाकर किचन में ले जाते हुए कहा.

"दीदी फटाफट तैयार हो जाइये"..

जितना उत्साह सोनू के मन में था लाली भी उतनी ही खुश थी. वह फटाफट अपने कमरे में जाकर अपना अधोवस्त्र लिया और उसे अपनी नाइटी के अंदर छुपा कर हाथ में पकड़े हुए बाथरूम में प्रवेश कर गयी। उसने अपनी पेंटी और ब्रा को सोनू की कामुक नजरों से बचा लिया था। अजब दुविधा में थी लाली एक तरफ तो वह अपना सर्वस्व निछावर करने को तैयार थी दूसरी तरफ उन अंतर्वस्त्रों को नाइटी के बीच में लपेट कर उन्हें छुपा रही थी.

बाथरूम से पानी गिरने की आवाजें आने लगी सोनू के मन में लाली के नंगे और भरे हुए शरीर के दृश्य घूमने लगे। लाली को नहाते हुए तो वह पहले भी एक बार देख चुका था पर नारी रूप के दिव्य दर्शन उसे नहीं मिल पाए थे। पिछली बार उसे लाली का शरीर उसे साइड से दिखाई दिया था. वह अब लाली को साक्षात नग्न देखना चाहता था वह भी वस्त्र विहीन।

राजेश को भी बाथरूम से आ रही आवाज स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी हाल में शांति की वजह से यह आवाज और भी साफ थी। राजेश ने सोनू से यूं ही बातें शुरू कर दी।

"मुझे भी मोटरसाइकिल चलाना सीखना है"

"हां जीजा जी आप भी खरीद लीजिए मैं आपको सिखा दूंगा"

जीजा साले की बातें चल रही थी. तभी मदमस्त लाली अपने पूर्ण यौवन को नाइटी के आवरण से ढके हुए बाहर आई और लक्स साबुन की खुशबू बिखेरती हुई सोनू से सटते हुए अपने कमरे में चली गई। सोनू भीनी भीनी खुशबू से मस्त हो गया परंतु उसके नथूने उसी मदन रस की सुगंध को खोज रहे थे जो आज से कुछ दिनों पहले सोनू के उंगलियों ने लाली की बुर में प्रवेश कर चुराया था।

कमरे में जाने के बाद लाली तैयार होने लगी तभी उसनें आवाज दी

"ए जी सुनिए"

"क्या हुआ? आता हूं" राजेश उठकर कमरे के अंदर जाने लगा

दरवाजा सटाने के बाद राजेश ने पूछा

"क्या हुआ?"

"बताइए ना कौन सी साड़ी पहनु"

"अरे साड़ी मत पहनो पहली बार फटफटिया में बैठोगी कहीं साड़ी फस फसागई तो लेने के देने पड़ जाएंगे"

"तो फिर क्या पहनूं?" लाली चिंता में पड़ गई

"अरे तुम्हारे पास एक सलवार कमीज भी थी ना जो तुम कभी-कभी पहनती थी"

"नहीं नहीं मैं वह नहीं पहनूंगी अब वह थोड़ा छोटी भी होती है और पूरे बदन पर कस जाती है"

राजेश के मन मे लाली का कसा हुआ शरीर घूम गया।

"अरे तुम भी तो दुबली हो गई हो एक बार पहन के तो देखो" राजेश की तारीफ ने लाली में उत्साह भर दिया।

लाली ने अलमारी से मैरून कलर की कुर्ती और चूड़ीदार पैजामा निकाला और पहनने लगी। राजेश का लंड खड़ा हो चुका था। अपनी बीवी को उस खूबसूरत वस्त्र में देख वह मदहोश हो रहा था। इसके पहले की लाली कुछ सोच पाती राजेश पीछे से आया और उसकी दोनों भरी-भरी चुचियों अपनी हथेलियों से दबाने लगा। उसका लण्ड लाली के भरे हुए नितंबों पर सट रहा था लाली ने शर्माते हुए कहा..

"यह तो पूरे बदन से चिपक सा गया है देखिए ना चुचियां कितनी निकल कर बाहर आ गई हैं।"

अपने निप्पलों को दबाते हुए उसने फिर कहा

"और यह दोनों मुए... लग रहा है कुर्ती फाड़ कर बाहर आ जाएंगे."

राजेश ने लाली की मदद की और कुर्ती को थोड़ा सामने खींचकर उसके निप्पलों को छुपा दिया परंतु लाली की भरी भरी चुचियों को छुपा पाना असंभव था। और राजेश तो वैसे भी उन्हें छुपाना नहीं चाहता था। चाहती तो लाली भी यही थी पर स्त्रीसुलभ लज्जा उसमे अभी भी कायम थी।

कुर्ती लाली के शरीर से उसी तरह चिपक गई थी जैसे चांदी का अर्क मिठाई को ढक लेता है परंतु मिठाई का आकार छुपाने में नाकाम रहता है। लाली का सपाट पेट उसकी चुचियों और जांघों के बीच बेहद आकर्षक लग रहा था । कुर्ती लाली के भरे भरे नितंबों को बड़ी मुश्किल से ढक पा रही थी लाली अपने हाथों को पीछे करती और उसे खींचकर नीचे करने का प्रयास करती परंतु उसे ज्यादा सफलता नहीं मिलती।

लाली उदास हो गई उसने सलवार कुर्ती पहनने का विचार त्याग दिया और बोली मैं साड़ी ही पहन लेती हूं यह कुर्ती वास्तव में छोटी है

इससे पहले की लाली का विचार परिवर्तित होता राजेश ने सोनू को बुलाया…

"तुम ही समझाओ अपनी दीदी को साड़ी पहनकर फटफटिया में कैसे बैठेंगी?"

सोनू कमरे में आया और अपनी लाली दीदी का यह रूप देख कर दंग रह गया. लाली को उसने पिछले कई वर्षों में कभी सलवार कुर्ती में नहीं देखा था।

वह लाली की तुलना अपनी कॉलेज की लड़कियों से करने लगा। राजेश ने सोनू की मनोदशा पढ़ ली उसने एक बार फिर कहा

"देखो ठीक तो लग रहा है पर ये परेशान है"

"सच में दीदी, जीजा जी ठीक कह रहे आप बेहद सुंदर लग रही हैं"

"चल झूठे तू भी इनका साथ दे रहा है" लाली ने शर्माते हुए कहा

"नहीं दीदी सच में"

राजेश ने इस बातचीत को विराम देते हुए कहा

"अब तुम लोग जाओ और जल्दी वापस आना मुझे ड्यूटी भी जाना है।"

लाली ने अपने बाल संवारे और झीना सा जार्जेट का दुपट्टा अपने कंधे पर डाला और अपने भरे भरे नितंब हिलाते हुए दरवाजे से बाहर निकल आयी और आस पड़ोस की महिलाओं से नजर बचाती हुयी खूबसूरत लाली अपने युवा सोनू के साथ मजबूत मोटरसाइकिल पर बैठकर शंकर जी के दर्शन के लिए निकल पड़ी।

मोटरसाइकिल के स्टार्ट होने के पश्चात राजेश ने सोनू से कहा

"अपनी दीदी को मंदिर के बाहर भी घुमा देना पिछली बार वह सिर्फ गर्भ ग्रह के दर्शन ही कर पाई थी।"

सोनू उस समय तो पूरे उन्माद में था उसने राजेश की बात सुनी तो जरूर पर समझ नहीं पाया

"हां जीजाजी, पूरा घुमा दूंगा कहकर उसने बात बंद की और मोटरसाइकिल आगे बढ़ा दी"

नियति भी पेड़ की डाली से उड़ते हुए मोटरसाइकिल का पीछा करने लगी आस्था और वासना दोनों अपनी अपनी जगह सर उठा रहे थे ……

उधर साधुओं की टोली और डुगडुगी वाला सुगना के मायके पहुंच चुके थे। बच्चों की टोली उनके पीछे पीछे चल रही थी डुगडुगी की आवाज सुनकर जाने बच्चों के पैरों में पंख लग जाते थे। सब अपने घर से वैसे ही निकलते जैसे स्कूल की घंटी के बाद बच्चे भागते हैं।

कुछ ही देर में गांव की गलियां के दोनों तरफ बच्चों और घूंघट ली हुई महिलाएं दिखाई पड़ने लगती। साधु लोग उस महोत्सव के प्रचार प्रसार से संबंधित पोस्टर घरों पर चिपकाते और सभी को हाथ जोड़कर उस उत्सव में शामिल होने का आमंत्रण देते।

सोनी और मोनी पोस्टर में दिख रहे मेले के दृश्यों को टकटकी लगाकर देख रही थी। वो लकड़ी के बड़े बड़े झूले जिसमें कुल 4 खटोले बांधे हुए थे। उसमें बैठे युवक और युवती को देखकर सोनी के मन में प्रेम की हिलोरे उठने लगीं। अभी उनकी जांघों के बीच की कली पूरी तरह खिली भी नहीं थी परंतु पुरुष के समीप आने पर उतपन्न होने वाली संवेदनाएं उनके दिलो-दिमाग पर छा चुकी थीं। स्त्री और पुरुष का भेद और जांघों के बीच का आकर्षण वह भली-भांति समझने लगी थी।

"क्या देख रही है खटोले में…..साथ बैठने वाला ?"

मोनी ने सोनी के पेट पर चोटी काटते हुए बोला..

अपनी चोरी पकडे जाने पर सोनी शर्मा गई और उसने मोनी से कहा

"तेरा मन नहीं करता क्या?"

"जब भगवान ने मुंह दिया है तो खाना भी देगा मैं भगवान से मांगूंगी की तेरी जांघों के बीच की आग जल्दी बुझे"

मोनी की बात सुनकर सोनी ने उसे दौड़ा लिया और दोनों भागती भागती अपनी मां पदमा के पास आ गयीं जहां पदमा की सहेली पुलिया बनारस महोत्सव के बारे में ही बातें कर रहीं थी।

जाने इसस महोत्सव में क्या बात थी कि गांव के अधिकतर लोग वहां जाने की बातें कर रहे थे कोई 2 दिनों के लिए तो कोई 4 दिनों के लिए पर मन में ललक सभी के थी।

उधर लाली सोनू की मोटरसाइकिल पर दोनों पैर एक तरफ करके बैठी सोनू जैसे अकुशल चालक के लिए यह एक और कठिनाई थी जैसे ही वह लाली की रेलवे कॉलोनी से बाहर आया उसने मोटरसाइकिल रोकी और लाली से कहा

"दीदी आप दोनों पैर फैला कर बैठ जाइये गाड़ी का बैलेंस सही रहेगा?"

राजदूत मोटरसाइकिल कुछ ज्यादा ही ऊँची थी। लाली उस पर बैठने का प्रयास करने लगी परंतु ऊंचाई की वजह से वह अपना पैर दूसरी तरफ नहीं ले जा रही एक तो उसकी चूड़ीदार एक तो पहले से तंग थी दूसरी तरफ पैर को ऊंचा उठाना एक नई मुसीबत आ गई थी।

सोनू के साहस देने पर लाली में अपना पैर थोड़ा और ऊंचा किया और उसका पैर सीट के दूसरी तरफ आ तो गया परंतु "चर्र" एक अवांछित ध्वनि लाली के कानों तक पहुंची। मोटरसाइकिल पर सफलतापूर्वक बैठ जाने की खुशी में लाली उस ध्वनि को नजर अंदाज कर गई परंतु जैसे ही उसके नितंबों ने सीट को छुआ लाली घबरा गई। सीट की ठंडक उसकी बुर के होठों पर महसूस हुई।

लाली को अब जाकर समझ आ चुका था उसकी सलवार का जोड़ पैर के ज्यादा फैलाए जाने की वजह से टूट गया था। और उसकी सलवार थोड़ा फट गई थी सुबह जल्दी बाजी में उसने अपनी ब्रा तो पहन ली थी पर पेंटी पहनना जरूरी नहीं समझा था। घर में वैसे भी उसे पेंटी पहनने की आदत कम ही थी।

लाली के बैठ जाने के पश्चात गाड़ी का बैलेंस बिल्कुल सही हो गया था सोनू की मोटरसाइकिल तेजी से बनारस की सड़कों को रौंदकर हुए शंकर मंदिर की तरफ बढ़ रही थी। लाली अपनी सलवार फटे होने के विचारों से अभी भी मुक्त नहीं हो पा रही थी बनारस की सर्द हवाएं जब उसके बालों को उड़ाने लगी तब उसने अपनी बुर पर से ध्यान हटाकर बालों पर लगाया और उसे व्यवस्थित करने लगी। तथा पीछे से चीखते हुए बोली

"सोनू धीरे चला"

"दीदी बहुत मजा आ रहा है चलाने दो ना"

आनंद तो लाली को भी उतना ही आ रहा था उसने जो सपने अपनी किशोरावस्था में देखे थे वह आज पहली बार पूरे हो रहे थे।

सोनू अपनी रफ्तार में यह भूल बैठा की रोड पर स्पीड ब्रेकर भी होते हैं अपनी लाली दीदी को पीछे बैठा कर वह स्वयं को राजेश खन्ना समझ रहा था स्पीड ब्रेकर ने लाली को उछाल कर उसकी पीठ पर लगभग गिरा दिया।

लाली की बड़ी-बड़ी चूचियां उसकी पीठ पर चपटी हो गई। लाली के इस तरह उछलने से सोनू की मोटरसाइकिल लगभग अनियंत्रित सी हो गई यह तो शंकर जी की लाली पर कृपा थी कि वह दोनों गिरे नहीं और सोनू ने अपनी मोटरसाइकिल सकुशल रोक ली।

लाली ने सोनू को डांटते हुए कहा

"मैं कहती थी ना की धीरे चला…."

अपनी प्रेमिका से डांट खाकर सोनू को अच्छा तो नहीं लगा परंतु सोनू ने अपना चेहरा पीछे घूम आया और लाली को प्यार भरी निगाहों से देखते हुए बोला

"ठीक है बाबा अब धीरे चलाऊगा"

लाली को भी अपनी गलती का एहसास हो चला था शायद उसने कुछ ज्यादा ही देश में वह बात कह दी थी सोनू के मासूम चेहरे और कोमल गाल को अपने बेहद समीप देखकर लाली का प्यार जागृत हो उठा उसने उसके गालों पर चूमते हुए कहा

"कोई बात नहीं सोनू बाबू अब धीरे चलना"

मोटरसाइकिल ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली..

बाली की बुर को अब भी मोटरसाइकिल की सीट का एहसास हो रहा था। अपने हाथों से सलवार के कपड़े को घसीट कर वह अपनी बुर के ऊपर ला रही थी परंतु कुछ ही दूर चलने के पश्चात कपड़ा वापस अपनी जगह पर आ जा रहा था और सीट उसकी बुर को फिर चुमने लगती थी।

लाली ने अपना ध्यान शंकर मंदिर की तरफ लगाया और इस विषम परिस्थिति को भूलने का प्रयास करने लगी। कुछ ही देर में सोनू की मोटरसाइकिल शंकर मंदिर के बाहर खड़ी थी। मोटरसाइकिल से उतरते वक्त एक बार फिर चर्र की आवाज हुई हालांकि यह आवाज पिछली बार की तुलना में कम थी परंतु इसने सलवार के जोड़ को थोड़ा और फैला दिया। लाली ने अपनी कुर्ती को व्यवस्थित किया और दोनों भाई बहन मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगे लाली आगे आगे और पीछे पीछे। रेलिंग लगे होने की वजह से एक समय पर एक आदमी ही चल सकता था। सोनू जानबूझकर पीछे हट गया और लाली ने पहली सीढ़ी चढ़ी लाली आगे-आगे चढ़ती गई और सोनू उसके पीछे पीछे। सोनू ने जानबूझकर लाली और अपने बीच तीन चार सीढ़ियों का फासला बना लिया था।

सोनू तो दूसरे ही नशे में था अपने आगे सीढ़ी चढ़ती हुई लाली के नितंबों को देखकर उसका ध्यान आस्था से हटकर वासना पर केंद्रित हो गया था लाली के बड़े-बड़े भरे हुए नितम्ब सोनू की निगाहों के सामने थिरक रहे थे लाली की मोटी और गदराई हुई जाँघों ने नितंबों को सहारा दिया हुआ था …

"लाली ने पीछे मुड़कर कहा साथ साथ चल ना पीछे क्यों चल रहा है"

लाली ने खुद को सोनू की निगाहों से देख लिया था उसे एहसास हो गया था कि सोनू उसके नितंबों की चाल को देख रहा है..

"हां दीदी" सोनू थोड़ा झेंप गया परंतु उसने उनके बीच का फासला तेजी से कम किया और दोनों अपनी अपनी मनोकामनाएं लिए शंकर मंदिर मैं प्रवेश कर चुके थे।

शंकर भगवान की पूजा अर्चना करने के पश्चात दोनों भाई बहन ने अपनी अपनी मनोकामना उसे भगवान को अवगत कराया लाली की मनोकामना में सोनू से मिलन दूसरे स्थान पर था परंतु सोनू के मन में सिर्फ और सिर्फ इस समय एक ही मनोकामना थी और वह थी लाली दीदी के साक्षात दर्शन और उनसे मिलन।

मंदिर से बाहर आने के पश्चात रेलिंग का सहारा लेकर सोनू और लाली खड़े हो गए तथा मंदिर के पीछे पर ही नदी का खूबसूरत दृश्य देखने लगे लाली ने अपने हाथ में लिए सिंदूर से सोनू के माथे पर तिलक लगाया और प्रसाद खिलाया।

यह मंदिर चोल वंश के राजाओं ने बनाया था जिसमें अंदर कर ग्रह में शंकर भगवान की मूर्ति थी परंतु बाहर में विभिन्न कलाकृतियां बनाई गई थी उनमें से कुछ कलाकृतियां काम कला को प्रदर्शित करती हुई भी थी।

इन कलाकृतियों में खजुराहो जैसे आसन तो नहीं दिखाए गए थे परंतु फिर भी उसका कुछ अंश अवश्य मौजूद था मंदिर के बाहरी भाग को पर्यटन के हिसाब से भी सजाया गया था जिनमें आस्था न थी वो लोग भी इस मंदिर के बाहरी भाग में लगी हुई मूर्तियों को देखने आया करते थे और कुछ ठरकी किस्म के व्यक्ति कलाकृतियों में छुपी हुई कामवासना को देखकर अपनी उत्तेजना भी जागृत किया करते थे।

लाली को इस बात की जानकारी न थी परंतु सोनू तो अब बनारस का जानकार हो गया था हॉस्टल के लड़कों ने उसका सामान्य ज्ञान बढ़ा दिया था लाली दीदी के साथ शंकर मंदिर जाने की बात सुनकर उसके लण्ड ने तुरंत सहमति दे दी थी।

सोनू को राजेश की बात याद आई जो उन्होंने घर से निकलते वक्त कही थी कि अपनी दीदी को मंदिर का बाहरी भाग भी दिखा देना। क्या जीजाजी चाहते थे कि मैं दीदी को इन कामकला की मूर्तियों को दिखाऊं..क्या उन्हें इस मंदिर की इन कलाकृतियों की जानकारी थी?

"कहां खो गया सोनू" लाली ने आवाज लगाई

"कुछ नहीं दीदी चलिए आपको मंदिर का बाहरी भाग दिखाता हूं"

मंदिर के पीछे एक काम पिपासु युवक और युवती की तस्वीर थी परंतु उसमें कोई नग्नता न थी कुछ लोग उन्हें किसी अनजान भगवान की मूर्ति मानते थे परंतु जानकार उसकी हकीकत जानते थे।

सोनू के मन में शरारत सूझी उसने जमीन पर अपने दोनों घुटने टिकाए और सर को सजदे की तरह जमीन से छुआ दिया कुछ सेकंड उसी अवस्था में रहकर वह उठ खड़ा हुआ।

लाली ने पूछा

"यह कौन से भगवान है"

" पहले प्रणाम कर लीजिये फिर बताता हूं"

लाली में देर ना की और सोनू ने जिस तरह प्रणाम किया था उसी तरह प्रणाम करने लगी। लाली की कुर्ती जो नितंबों को ढकी हुई थी वह हवा के झोंके से उड़ गई और लाली की फटी हुई सलवार के बीच से उसकी सुंदर और कसी हुई बुर सोनू की निगाहों के ठीक सामने आ गई जो लाली के ठीक पीछे खड़ा उसके नितंबों की खूबसूरती निहार रहा था। सोनू ने तो सिर्फ उसके नितंबों को जी भर कर देखने की कल्पना की थी परंतु उसकी जांघों के बीच छुपा हुआ अनमोल खजाना सोनू की निगाहों के सामने आ गया था। फटी हुई सलवार ने अपना कमाल दिखा दिया था ।

उधर लाली को अब जाकर एहसास हुआ कि वह लगभग डॉगी स्टाइल में आ चुकी थी। बाहर बहती हवा ने जब उसके बुर के होठों को छुआ तब जाकर लाली को एहसास हुआ कि उसकी सलवार फटी हुई है वह तुरंत ही झट से उठ कर खड़ी हो गई और पीछे मुड़कर देखा सोनू की निगाहें उसके नितंबों के साथ-साथ ऊपर उठ रही थी।

लाली शर्म से पानी पानी हो गई उसे पता चल चुका था की सोनू ने उसकी नंगी बुर के दर्शन कर लिए थे…

शेष अगले भाग में
 
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं और कहानी को पसंद करने के लिए धन्यवाद ।

अपडेट शुक्रवार शाम तक आ जाएगा।
 
कहानी से जुड़ने के लिए धन्यवाद। जुड़े रहिये लाली और सोनू का मिलन तो तय है....
 
उधर लाली को महसूस हुआ कि वह लगभग डॉगी स्टाइल में आ चुकी थी। बाहर बहती हवा ने जब उसके बुर के होठों को छुआ तब जाकर लाली को एहसास हुआ कि उसकी सलवार फटी हुई है वह तुरंत ही झट से उठ कर खड़ी हो गई और पीछे मुड़कर देखा सोनू की निगाहें उसके नितंबों के साथ-साथ ऊपर उठ रही थी।

लाली शर्म से पानी पानी हो गई उसे पता चल चुका था की सोनू ने उसकी नंगी बुर के दर्शन कर लिए थे…

अब आगे…

यह एक संयोग ही था कि उस दिन ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी। लाली जान चुकी थी कि सोनू की निगाहें उसके खजाने का अवलोकन कर चुकी है। लाली मंदिर के पार्श्व भाग में लगे अलग-अलग कलाकृतियों को देखने लगी। कभी वह अपनी सुंदर काया की उन कलाकृतियों से तुलना करती और मन ही मन खुश हो जाती। लाली को उस रात की बात याद आ रही जब वह राजेश की बाहों में नग्न लेटी हुई थी और वह उसकी चूचियां सहलाते हुए उसे चोदने के लिए तैयार कर रहा था

राजेश में उससे कहा..

"लाली मजा आ जाएगा जब तुम्हारी चूचियां मेरे मुंह में होंगे और सोनू का सर तुम्हारी जाँघों के बीच"

"छी, कितनी गंदी बात करते हैं आप, अपने भाई से अपनी वो चुसवाना अच्छा अच्छा लगेगा क्या"

"चुसवाने की बात तो मेरी जान तुमने ही कहीं"

"तो क्या सोनू मेरी जांघों के बीच सर लाकर सजदा करेगा?"

लाली की बातों से राजेश के लंड का तनाव बढ़ता चला जा रहा था।

"सच लाली मजा आ जाएगा जब…" राजेश अपनी बात पूरी नहीं कर पाया पर उसने लाली की चुचियाँ जोर से दबा दी लाली सिहर उठी और बोली…

"क्या जब?" लाली ने उत्सुकता से पूछा

"यही कि उत्तर भारत पर मैं राज करूं और दक्षिण भारत पर तुम्हारा प्यारा सोनू"

लाली राजेश की बात समझ तो गई थी परंतु वह राजेश को खुलकर बोलने के लिए उकसा रही थी..

"आप और आपके सपने ऐसी गंदी बातें कैसे सोच लेते हैं आप"

"मैंने अपने से थोड़े ही सोचा यह तो प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है अपनी प्रेमिका को जी भर कर सुख देना. मेरे पास तो एक ही मुंह है और तुम्हारे पास चूमने लायक कितनी सारी जगह है?"

लाली राजेश की हाजिर जवाबी से प्रभावित हो गई थी उसने कहा तो आपको यह ज्ञान किसी महात्मा ने दिया है

"नहीं मैंने शंकर मंदिर के पीछे लगी एक प्राचीन मूर्ति में देखा था जिसमें एक नायिका को दो पुरुष मिलकर प्रसन्न कर रहे थे"

"सच में आपका दिमाग खाली जांघों के बीच ही घूमता रहता है मंदिर में भला ऐसी मूर्ति कहां मिलेगी"

राजेश ने लाली को अपनी बाहों में भर लिया और चुमते हुए बोला…

"मैं सच बोल रहा हूं"

"मैं नहीं मानती"

"और अगर यदि यह सच हुआ तो?"

"तो क्या आप जीते मैं हारी"

"फिर मुझे क्या मिलेगा?"

"जो आप चाहेंगे"

"बस उस मूर्ति की नायिका तुम बनोगी और सेवक मैं और….. "

राजेश के वाक्य पूरा करने से पहले लाली ने उसके होंठों को अपने होंठों के बीच भर लिया और स्वयं ही राजेश के लण्ड को पकड़ कर अपनी बुर में घुसेड लिया…

राजेश की उपस्थिति में सोनू से संभोग करने की बात सोच कर ही वक्त उत्तेजना से प्रोत हो गई थी….

"दीदी आगे चलिए और भी तरह-तरह की कलाकृतियां हैं"

सोनू की आवाज लाली अपनी मीठी यादों से बाहर परंतु उन यादों ने उसकी बुर् के होठों की चमक बढ़ा दी थी। अंदरूनी गहराइयों से उत्सर्जित मदन रस बुर के होठों पर आ चुका था।

सोनू को अभी भी तृप्ति का एहसास नहीं हुआ था लाली की बुर देखने कि उसके मन में एक बार फिर इच्छा जागृत हुयी।

सोनू ने आगे बढ़ते हुए एक बार फिर दंड प्रणाम किया और लाली अपनी टाइमिंग सेट करते हुए एक बार फिर डॉगी स्टाइल में आ चुकी थी। इस बार नियति को लाली की कुर्ती को हवा से उड़ाने की कोई आवश्यकता नहीं थी लाली ने स्वयं ही अपनी कुर्ती खींच ली थी लाली के बुर् के चमकते हुए होंठ सोनू को उन्हें चुमने का खुला निमंत्रण दे रहे थे।। आह….. कितने सुंदर थे प्यारे होंठ थे। सोनू के मुंह में पानी आ रहा था उसकी जीभ में मरोड़ पैदा हो रही थी वह तुरंत ही झुक कर उन चमकती बूंदों को आत्मसात कर लेना चाहता था।

लाली इस बार कुछ ज्यादा देर तक नतमस्तक रही और अपने भाई सोनू के अरमान कुछ हद तक पूरे करती रही और कुछ के पूरे होने की कामना करती रही।

उठने के पश्चात लाली की निगाहें अभी भी उस कलाकृति को ढूंढ रही थी जिसके बारे में राजेश ने अंतरंग पलों में लाली से बताया था।

सोनु लाली की धीमी चाल से अधीर हो रहा था। उसे तो पता ही नहीं था की लाली दीदी क्या खोज रही हैं। लाली हर मूर्ति का बारीकी से निरीक्षण करती और अंततः लाली ने वह मूर्ति खोजली जिसका राजेश ने जिक्र किया था।

लाली के चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई। मूर्ति पर जाकर उसकी आंखें ठहर गई उसमें एक युवती के साथ दो पुरुषों को संभोग स्थिति में दिखाया गया था यद्यपि उनके लण्ड और बुर को कलाकृति से हटा दिया गया था परंतु फिर भी वह मूर्ति चीख चीख कर अपनी दास्तान कह रही थी।

लाली अपने ख्वाबों में स्वयं को उस नायिका की तरह देखने लगी उसकी जांघों के बीच छुपी बुर कांप उठी।

लाली राजेश से अपनी शर्त हार कर भी जीत हुई अपनी उत्तेजना को चरम पर महसूस कर लाली का रोम-रोम संभोग के लिए तैयार हो चला था यदि सोनू संभोग के लिए तैयार होता तू लाली की जाँघे निश्चित ही फैल जाती। लाली उस अद्भुत संभोग करने के लिए मन ही मन खुद को तैयार करने लगी।

उधर सोनू की कामवासना चरम पर पहुंच रही थी मंदिर जैसी पवित्र जगह से जल्दी से निकल जाना चाहता था उसने लाली से कहां दीदी अब चला जाए देर हो रही है दर्शन भी हो गए..

"हां हां चल भगवान करे तेरी सभी मनोकामनाएं पूरी हो आज तूने अच्छा कार्य किया है…."

"फिर मेरा इनाम"

"चल रास्ते में देती हूं…"

इधर सोनू लाली दीदी के साथ रंगरेलियां मना रहा था उधर हॉस्टल में विकास सोनू का इंतजार कर रहा था सोनू और विकास का दोस्त गोलू विकास की बेचैनी देखते हुए बोला

" क्यों परेशान हैं?"

"वह सोनू बहन चोद राजदूत लेकर गया है अब तक नहीं लौटा

"कहां गया है कुछ बताया था?"

"पता नहीं यार मैं उस समय सोने जा रहा था बोला था जल्दी आ जाऊंगा"

"वह पक्का अपनी लाली दीदी के पास गया होगा. साली गच्च माल है। सोनू की बहन नहीं होती तो साली को पटक पटक के चोदता।"

"माल सुनकर विकास के लंड में ही हरकत हुई उसने उत्सुकता से पूछा सच में चोदने लायक है क्या?"

" बेहतरीन माल है एक बार सोनू के साथ जाकर देख आ मिजाज खुश हो जाएगा तेरा और तुझे और तेरे मुन्ने का। फिर हाथों को मेहनत कम करना पड़ेगा और दिमाग को ज्यादा"

" और हां सोनू से अनजान बनकर पूछना उसे यह नहीं लगना चाहिए कि लाली के बारे में मैंने तुझे बताया है"

अभी विकास और गोलू बातें ही कर रहे थे तभी उनका एक और दोस्त अपने माता पिता की कार से उतरकर हॉस्टल में प्रवेश किया उसने विकास को देखते ही बोला…

" तेरी राजदूत कहां है"

" सुबह-सुबह सोनू ले गया है हम लोग उसी की बातें कर रहे थे"

"तब साला पक्का वही था। साले ने तो बनारस में माल पटा ली है आज सुबह-सुबह ही अपनी माल को लेकर शहर के बाहर जा रहा था मैंने आवाज दी पर साला रुका नहीं। तूने अपनी मोटरसाइकिल उसे क्यों दे दी ? उसे तो अभी ठीक से चलाना भी नहीं आता"

उस दोस्त ने अपनी सारी जलन विकास से साझा कर दी।

भोलू ने कहा "अबे उसकी कोई सेटिंग हो ही नहीं सकती इतना शर्मीला है साला"

"नहीं भाई सच कह रहा हूं। एकदम माल थी पर उसकी उम्र कुछ ज्यादा लग रही थी अपने कालेज की तो नहीं थी।"

भोलू ने एक बार सोचा कि शायद सोनू की लाली दीदी ही पीछे बैठकर कहीं जा रही हो परंतु उस लड़के ने बताया कि लड़की सलवार सूट पहने हुए थे और तो और वह राजदूत पर दोनों पैर दोनों तरफ करके बैठी थी यह बात भोलू के अनुसार लाली दीदी नहीं कर सकती थी भोलू ने उन्हें जब भी देखा था साड़ी पहने हुए ही देखा था। खैर बात आयी गई हो गयी परंतु विकास बेसब्री से सोनू का इंतजार कर रहा था। भोलू द्वारा लाली की गदराई जवानी के विवरण ने सोनू के दोस्तों में भी हलचल मचा दी थी।

उधर मंदिर से सोनू अपनी फटफटिया में लाली को बैठा कर वापस चल पड़ा। लाली की बुर एक बार फिर राजदूत की सीट से सटने लगी। परंतु लाली ने अपनी सलवार को बीच में लाने का प्रयास न किया। सीट की गर्मी उसे पसंद आ रही थी। बाहर खिली हुई धूप मौसम को खुशनुमा बनाए हुई थी। लाली इस बार जानबूझकर सोनू से सट कर बैठी थी और उसकी चूचियां सोनू की पीठ से सटी हुई थीं। पीठ पर मिल रहे चुचियों के स्पर्श और अपनी दीदी की पनियायी बुर की कल्पना ने उसके लण्ड को पूरी तरह खड़ा कर दिया था..

कुछ ही देर में सोनू ने लाली से पूछा

"दीदी मेरा इनाम कहां है"

"वह तो तूने मंदिर के पीछे ही ले लिया था"

सोनू सतर्क हो गया और अनजान बनते हुए पूछा

"मंदिर के पीछे?

"ज्यादा बन मत"

"तूने अपने पसंदीदा चीज के दर्शन तो कर ही लिए"

सोनू को सारी बात समझ आ चुकी थी फिर भी उसने उसे छुपाते हुए कहा

"मैंने तो कुछ भी नहीं देखा हां वह मूर्तियां बहुत अच्छी थीं"

लाली ने अपने हाथ बढ़ाएं और सोनू के तने हुए लण्ड को पकड़ लिया अच्छा तो यह महाराज उन मूर्तियों की सलामी दे रहे हैं।

सोनू निरुत्तर था उस ने मुस्कुराते हुए कहा लाली दीदी आप सच में बहुत सुंदर हो...

"मैं या मेरी वो"

"दोनों दीदी"

"पहले तो तूने कभी इतनी तारीफ न की"

"पहले उसके दर्शन भी तो नहीं हुए थे.."

"और उस दिन नहाते समय दरवाजे पर खड़ा क्या कर रहा था…?"

सोनु एक बार फिर निरुत्तर था। लाली की हथेलियां उसके लण्ड पर आगे पीछे हो रही थीं। उसका सुपाड़ा फुल कर लाल हो गया कपड़ों के ऊपर से सहलाए जाने की वजह से सोनू थोड़ा असहज हो रहा था परंतु वह इस सुख से वंचित नहीं होना चाहता था। दर्द और सुख की अनुभूति के बीच एक अद्भुत तालमेल हो चुका था. लाली कोई ऐसा बिल्कुल आभास नहीं था कि कपड़े के ऊपर से लण्ड को मसलने से सोनुको दिक्कत हो सकती थी।

अचानक वही स्पीड ब्रेकर एक बार फिर आ गया जिस पर पिछली बार एक्सीडेंट होते-होते बचा था अपनी उत्तेजित अवस्था के बावजूद सोनू सतर्क था। परंतु लाली अब भी बेपरवाह थी। अचानक आई इस उछाल से सोनू का लण्ड लाली के हाथ से छूट गया सोनू ने चैन की सांस ली और लाली अपने आपको व्यवस्थित करने लगी। राजदूत की सीट लाली के प्रेम रस से भीग चुकी थी। जितने वीर्य का उत्सर्जन सोनू अंडकोष कर रहे थे उसकी आधी मात्रा तो निश्चय ही लाली की बुर भी उड़ेल रही थी।

खुद को सीट पर व्यवस्थित करते समय लाली ने अपनी कमर हिलाई और उसकी बुर राजदूत की सीट पर रगड़ उठी। एक सुखद एहसास के साथ लाली को सफर काटने का उपाय मिल गया। उधर सोनू ने अपने पजामे का नाड़ा ढीला किया और लण्ड को पजामे से बाहर कर दिया और उसे अपने कुर्ते का आवरण दे दिया।

अपनी बुर की चाल को नियंत्रित करने के पश्चात लाली को एक बार फिर सोनू के मजबूत पर मुलायम लण्ड की याद आई और उसने अपने हाथ सामने की तरफ बढ़ा दिए। सोनू को लाली की कोमल हथेलियों का स्पर्श प्राप्त हो चुका था। उसके लण्ड ने तीन चार झटके लिए और अपनी परिपक्व महबूबा के हाथों में खेलने लगा।

सोनू के कोमल लण्ड को अपने हाथों में लेकर लाली मचल उठी उसके कुशल हाथ तरह तरह से उस लण्ड से खेलने लगे। जब तक शहर की भीड़भाड़ शुरू होती सोनू के लण्ड ने जवाब दे दिया। वीर्य की धार फूट पड़ी और लाली के हाथ श्वेत धवल गाढ़े वीर्य से सन गए परंतु राजदूत की सीट लाली का स्खलन न करा पायी।

लाली ने सोनू को अपने बाएं हाथ से पकड़ लिया और दाहिने हाथ को अपनी जांघों के बीच लाकर बुर को छूने लगी परंतु वह चाह कर भी स्खलित न हो पाई लाली की तड़प बढ़ चुकी थी।

उन्होंने मिठाई की दुकान पर मोटरसाइकिल रोक दी बच्चों के लिए मिठाई और आइसक्रीम लेकर लाली और सोनू रेलवे कॉलोनी की तरफ बढ़ चले। लाली अब अपने दोनों पैर एक तरफ करके मोटरसाइकिल पर बैठी हुई थी रेलवे कॉलोनी पहुंचते-पहुंचते सड़क पर भीड़ भाड़ बढ़ चुकी थी अचानक साइकिल वाले के सामने आ जाने से सोनू की मोटरसाइकिल का बैलेंस गड़बड़ा गया और सोनू की ड्राइविंग स्किल की पोल एक झटके में ही खुल गई लाली सड़क पर गिर चुकी थी उसकी कमर में चोट लगी थी सोनू की मदद से वह बड़ी मुश्किल से उठ पाई। भगवान का लाख-लाख शुक्र था की मोटरसाइकिल को कोई चोट नहीं लगी की वरना विकास उसका जीना हराम कर देता।

लाली ने कहा सोनू घर पास में ही है तुम चलो मैं पैदल आती हूं। सोनू को लाली की यह बात तीर की तरह चुभ गई उसने अपनी नाराजगी को छुपाते हुए कहा

दीदी उस साइकिल वाले की गलती थी वरना हम लोग नहीं गिरते आप विश्वास रखिए

लाली एक बार फिर मोटरसाइकिल पर बैठ चुकी थी सोनू पूरी सावधानी से लाली को लेकर घर पहुंच गया राजेश अपना टिफिन लेकर बेसब्री से लाली और सोनू का इंतजार कर रहा था। समय कम होने की वजह से वह लाली से ज्यादा बात नहीं कर पाया और निकलते हुए बोला रात तक आता हूं।

लाली ने अपने कमर के दर्द को अपने सीने में दफन करते हुए राजेश से कहा…

आप जीत गए…

राजेश ने मुस्कुराते हुए कहा अपनी तैयारी शुरू कीजिए

लाली मुस्कुरा उठी। लाली का पुत्र सोनू मिठाई और आइसक्रीम के पैकेट देख खुश हो गया था। खुश तो लाली भी बहुत थी परंतु कमर में लगी चोट ने उस खुशी में विघ्न डाल दिया था नियति एक बार फिर मुस्कुरा रही थी। लाली के दर्द में ख़ुशी छुपी हुई थी शायद यह बात लाली नहीं समझ पा रही थी।

उधर सलेमपुर में सरयू सिंह का जन्मदिन करीब आ चुका था। सरयू सिंह बाजार में अपने जन्मदिन के उत्सव की तैयारी कर रहे थे। उन्हें सर्वाधिक इंतजार सुगना द्वारा दिए जाने वाले गिफ्ट का था। सुगना की गुदांज गांड को भेदने की उनकी सर्वकालिक इच्छा कल पूरी होने वाली थी वह सुगना को हर हाल में खुश रखना चाहते थे परंतु उनकी इस इच्छा मैं विरोधाभास था। उन्हें लगता था जैसे इस अप्राकृतिक मैथुन से निश्चय ही सुगना को कष्ट होगा। परंतु उनके विरोधाभास पर विजय उनके लण्ड की ही हुई जो पिछले तीन-चार महीनों सुगना की कोमल बुर् का स्वाद नहीं चख पाया था।

सरयू सिंह ने सुगना के लिए कई सारे कपड़े खरीदे और कजरी के लिए सुंदर साड़ियां। वह कजरी को कभी नहीं भूलते थे। सुगना के लिए लड्डू खरीदते समय उन्हें अपने पुराने दिनों की याद आने लगी जब वह लड्डू में गर्भ निरोधक दवाई मिलाकर अपनी प्यारी सुगना को दो-तीन वर्षों तक बिना गर्भवती किए हुए लगातार चोदते रहे थे हालाकी अब वह उस आत्मग्लानि से निकल चुके थे। सुगना भी यह बात जान चुकी थी और सरयू सिंह की शुक्रगुजार थी जिन्होंने उसे को जवानी का भरपूर सुख दिया था और नियति द्वारा रचे गए संभोग सुख का आनंद भी।

सूरज ढलते ढलते सरयू सिंह गांव वापस आ चुके थे सुगना हाथ में बाल्टी लिए उनका इंतजार कर रही थी उसकी सहेली बछिया जो अब गाय बन चुकी थी। इस मामले में वह सुगना से आगे निकल चुकी थी उसने एक बछड़े और दो बछिया को जन्म दिया था।

कभी-कभी सुगना के मन में दूसरे बच्चे की चाह जन्म लेती। सरयू सिंह से संभोग न कर पाने के कारण सुगना अपने मन की इस इच्छा को दबा ले जाती। हालांकि उसके बाबूजी उसकी कामेच्छा को काफी हद तक पूरा कर देते थे परंतु लण्ड से चुदने का सुख निश्चय ही अलग होता है वह मुखमैथुन और उंगलियों के कमाल से बिल्कुल अलग होता है। सुगना के मन में सरयू सिंह के मजबूत लण्ड की अंदरूनी मालिश की तड़प बढ़ती जा रही थी।

सरयू सिंह को देखकर सुगना चहकने लगी उसने फटाफट सरयू सिंह के कंधे में टंगे झोले को लिया और उसे झट से आंगन में रख आई। बाल्टी में रखी हुई पानी से उसने शरीर सिंह के हाथ और पैर धोए और बोली

"चली दूध दूह दीं आज देर हो गईल बा"

"सुगना के चेहरे पर खुशी और उसकी धधकती जवानी देख कर शरीर सिंह का रोम-रोम खुश हो जाता. उन्होंने सुगना को अपनी तरफ खींचा और उसकी बड़ी बड़ी चूचीयां सरयू सिंह के पुस्ट सीने से सटकर सपाट हो गयीं। उसके भरे भरे नितंब सरयू सिंह की मजबूत और बड़ी-बड़ी हथेलियों में आ चुके थे। सरयू सिंह थोड़ा झुक कर अपने खुर्रदुरे गाल सुगना के कोमल गालों से रगड़ रहे थे। सुगना ने मचलते हुए कहा पहले गाय के दूध दुह लीं। सरयू सिंह ने सुगना को छोड़ दिया और बाल्टी लेकर सुगना की सहेली गाय का दूध दुहने लगे।

सुगना ने कजरी की जगह ले ली थी वह अपनी सहेली के पुट्ठों पर हाथ फेरने लगी और सरयू सिंह गाय की चुचियों से दूध दुहने लगे….

सुगना को अचानक लाली की याद आई एक पल के लिए उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह लाली के नितंब सहला रही थी और कोई उसकी चुचियों से दूध निकाल रहा था। सुगना के दिमाग में राजेश की तस्वीर भी घूम रही थी को हमेशा उसके समीप आने को लालायित रहता था। उसकी सहेली गाय का दूसरा बच्चा भी दूसरे सांड से हुआ था। सुगना के मन मे अपने दूसरे सांड की तस्वीरें घूमने लगीं...

"कहां भुलाइल बाडू"

"काल राउर जन्मदिन ह नु" सुगना ने सरयू सिह को खुश कर दिया।

सरयू सिह उठकर खड़े हुए और अपनी आंखों में उम्मीद लिए सुगना से बोले

"तैयारी बा नु"

"का तैयारी करें के बा?"

उसने अनजान बनते हुए कहा...

सरयू सिंह ने सुगना के नितंबों पर हाथ फेरा और मुस्कुराते हुए बोले

"आपन वादा याद बा नु?"

"याद बा…."

सुगना ने सरयू सिंह जी के हाथ से बाल्टी ली और आंगन में भाग गई कल की बातें सोच कर उसकी जांघों के बीच बुर सतर्क हो गई थी पर उसकी छोटी सी गांड सहम गई थी….

शेष अगले भाग में
 
सरयू सिह पूरी तरह दोहरा वार करने को तैयार हैं। 4 महीने तड़पने के बाद उनका इंतजार और सुगना की चिपकी हुयी दरार ......अब फैलने को तैयार और दाग का रहस्य बाहर आने को तैयार.....

जुड़े रहें
 
धन्यवाद।। सुगना तैयार है सरयू सिंह भी तैयार हैं

बस अपडेट ही तैयार नहीं है...
 
लाली और सुगना आह तनी धीरे से .....की मुख्य नायिका है अब तक ....आपकी इच्छा का मान रखा जाएगा....
 
हॉस्टल के बिस्तर पर लेटा हुआ सोनू आज के सुखद और दुखद पलों को याद कर रहा था। विकास ने आज उसके साथ जो बर्ताव किया था उसकी उम्मीद उसे न थी।



माना कि उसकी हैसियत मोटरसाइकिल खरीदने की न थी। पर सोनू काबिलियत में विकास से बेहतर था। विकास तो अपने माता पिता की दौलत की वजह से अय्याशी की जिंदगी व्यतीत करता था। परंतु सोनू अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझते हुए कम खर्च में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था।

लाली दीदी के घर पहुंच कर उसने अपनी घड़ी पर निगाह डाली 11:00 बज चुके थे निश्चय ही देर हो गई थी। राजेश के जाने के पश्चात लाली धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए अपने घर की तरफ बढ़ने लगी कमर में आई चोट अपना प्रभाव दिखा रही थी लाली के कदम गर्भवती महिला की तरह धीरे धीरे पड़ रहे थे। एक पल के लिए सोनू को बेहद अफसोस हुआ। उसने लाली दीदी को अनजाने में ही कष्ट तो दे ही दिया था।

सोनू ने लाली के हाँथ पकड़ लिए और सहारा देते हुए घर के अंदर ले आया लाली के कोमल हाथों का स्पर्श पाकर सोनू खुश हो गया परंतु लाली के चेहरे पर तनाव था। शायद दर्द कुछ ज्यादा था।

इस स्थिति में लाली को छोड़कर जाना उचित न था परंतु विकास की मोटरसाइकिल वापस करना भी उतना ही जरूरी था।

सोनू ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए लाली से कहा

"दीदी मुझे मोटरसाइकिल वापस करने जाना पड़ेगा।"

लाली ने अपने दर्द को छुपाते हुए कहा

"सोनू बाबु कुछ खाना खा ले तब जाना"

" नहीं दीदी मैं हॉस्टल में खा लूंगा. मुझे पहले ही बहुत देर हो चुकी है"

"सोनू, ऐसे खाली पेट कैसे जाएगा? मुझे अच्छा नहीं लगेगा"

"नहीं दीदी मुझे जाना होगा"

लाली ने कोई और रास्ता ना देख कर फटाफट बाजार से खरीदी हुई मिठाई सोनू के मुंह में जबरदस्ती डाल दी और पास बड़ी बोतल उठाकर उसके हाथों में पकड़ा दी "सोनू बाबू थोड़ा पानी तो पी ले" लाली बड़ी बहन की भूमिका बखूबी निभा रही थी।

सोनू फटाफट मिठाई खाते हुए पानी पीने लगा. तभी लाली ने पीछे मुड़कर अपनी चुचियों के बीच फंसे 100 -100 के दो नोट निकाले( जिसे सोनू ने निकालते हुए देख लिया) और सोनू को देते हुए बोली..

"यह अपने पास रख ले खर्च में काम आएंगे"

"नहीं दीदी इसकी कोई जरूरत नहीं है"

" मैंने कहा ना रख ले"

सोनू को निश्चय ही पैसों की जरूरत थी। अभी राजदूत में तेल फुल करवाना था। उसने लाली के सामने ही उन रुपयों को लिया और चूम लिया।

लाली को एक पल के लिए लगा जैसे सोनू ने उसके उभरे हुए उरोजों को ही चूम लिया. लाली अपना दर्द भूल कर एक बार फिर शर्म से लाल हो गई। उसने अपनी निगाहें झुका ली और सोनू ने अपने कदम दरवाजे से बाहर की तरफ बढ़ा दिए। जब लाली ने अपनी नजरें उठाई वह अपने मासूम और अद्भुत प्रेमी को राजदूत की तरफ बढ़ते हुए देख रही थी।

लाली को भी आज सुख और दुख की अनुभूति एक साथ ही मिली थी। नियति सामने मुंडेर पर बैठे मुस्कुरा रही थी। लाली का यह दर्द शीघ्र ही सुख में बदलने वाला था।

सोनू राजदूत लेकर फटाफट पेट्रोल पंप पर पहुंचा और पेट्रोल फुल करवाया इसके बावजूद उसके पास ₹50 शेष रह गए जो उसके कुछ दिनों के खर्चे के लिए पर्याप्त थे। उसने लाली दीदी को मन ही मन धन्यवाद दिया और उनके स्वस्थ होने की कामना की और मोटरसाइकिल को तेजी से चलाते हुए हॉस्टल की तरफ बढ़ चला।

हॉस्टल की लॉबी में पहुंचते ही उसकी मुलाकात विकास और भोलू से हो गई

"अबे साले तू तो 9:00 बजे तक आने वाला था? टाइम देख कितना बज रहा है"

सोनू ने अपनी घड़ी देखी और मैं दिमाग मैं उचित उत्तर की तलाश में लग गया

"पहले बता कहां गया था?"

विकास के प्रश्न लगातार आ रहे थे अंततः सोनू ने संजीदगी से कहा

"कुछ नहीं यार ऐसे ही अपने रिश्तेदार के यहां गया था" सोनू का उत्तर सुनकर भोलू ने अपनी नजरें झुका ली और मन ही मन मुस्कुराने लगा।

"सच-सच बता किस रिश्तेदार के यहां गया था?"

"अरे मेरी एक बहन यहां रहती हैं उनके पास ही गया"

"अच्छा बेटा तो ये बता मोटरसाइकिल पर लाल सूट में कौन लड़की बैठी थी?"

सोनू पूरी तरह आश्चर्यचकित हो गया उसे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था अब झूठ बोलना संभव नहीं था। उसने विकास और भोलू को सारी बातें साफ-साफ बता दी सिर्फ उस बात को छोड़ कर जिसके बारे में उसके दोस्त सुनना चाहते थे।

विकास ने चुटकी लेते हुए कहा

"यार जिसने तुझे और उस लड़की मेरा मतलब तेरी लाली दीदी को देखा था वह कह रहा था कि भगवान ने उसे बड़ी खूबसूरती से बनाया है तू सच में तो उसे बहन तो नहीं मानता?"

"अरे बहन है तो बहन ही मानूँगा ना। "

"तो ठीक है बेटा आज से मुझे अपना जीजा मान ले।. इतनी गच्च माल को मैं तो नहीं छोडूंगा पक्का उसे पटाउंगा और …...।"

"ठीक है यदि तू उसे पटा कर सका तो मुझे तुझे जीजा बनाने में कोई दिक्कत नहीं।"

लाली को ध्यान में रखते हुए सोनू ने यह बात कह तो दी परंतु नियति ने सोनू की यह बात सुन ली. विकास सोनू का जीजा…... नियति मुस्कुरा रही थी…

बनारस महोत्सव करीब आ रहा था. दो अनजान जोड़े मिलन के लिए तैयार हो रहे थे। सोनू की बहन सोनी अपनी जांघों के बीच उग रहे बालों से परेशान हो रही थी उसकी खूबसूरत बुर को चूमने और चोदने वाला उसके भाई सोनू से बहस लड़ा रहा था।

सोनू ने उस समय तो बात खत्म कर दी थी परंतु अब हॉस्टल के बिस्तर पर लेटे हुए हुए उसी बात को मन ही मन सोच रहा था। विकास ने कैसे उससे लाली दीदी के बारे में वैसी बात कह दी थी। कितना दुष्ट है साला वो। उसके मन में तरह-तरह के गलत ख्याल आ रहे थे वह विकास से अपनी दोस्ती तोड़ने के बारे में भी सोच रहा था। तभी विकास और भोलू कमरे में आ गए सोनू को उदास देखकर वह दोनों बोले...

"यार तू गुमसुम यहां बैठा है"

"हां मन नहीं लग रहा था" सोनू ने बेरुखी से जवाब दिया

"क्यों क्या बात है?"

"कुछ नहीं, मुझे बात नहीं करनी है तुम लोग जाओ"

विकास सोनू के मन की बात जानता था उसने विकास का हाथ पकड़कर उठाते हुए कहा ...

"अरे भाई माफ कर दे उस समय मैं कुछ ज्यादा ही बोल गया, तेरी लाली दीदी मेरी भी लाली दीदी है मेरी बात को गलत मत लेना"

विकास के मनाने पर सोनू का गुस्सा काफूर हो गया।

उघर लाली का दर्द बढ़ गया था उसने पड़ोसियों की मदद से दर्द निवारक दवा मंगवा ली थी और चोट लगी जगह पर मलने के लिए एक क्रीम भी. उसने दवा तो खा ली पर अपने हाथों से अपनी ही कमर के ऊपर क्रीम लगाना इतना आसान न था। वह राजेश को बेसब्री से याद कर रही थी कि काश वह रात में आ जाता। परंतु रेलवे की टीटी की नौकरी का कोई ठिकाना न था। राजेश रात को नही लौटा और लाली राजेश को याद करती रही। उसके मन में सोनू के प्रति कोई गुस्सा न था सोनू उसे पहले भी प्यारा था और अब भी.

उधर अगली सुबह सरयू सिंह सुबह-सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर दालान में पहुंचे। आज उनके चेहरे पर खुशी स्पष्ट देखी जा सकती थी। आगन से सुनना गिलास में चाय लिए हुए हाजिर हो गई उसने सरयू सिंह के चरण छुए और बेहद आत्मीयता से बोली

"बाबूजी आज राउर जन्मदिन ह"

सरयू सिंह ने सुगना द्वारा लाई गई चाय एक तरफ रख दी और उसे अपनी गोद में खींच लिया। अपनी दाहिनी जांघ पर बैठाते हुए वह सुगना के कोमल गालों को चुमें जा रहे थे और सुगना उनकी बाहों में पिघलती जा रही थी।

सुगना ने भी उन्हें चूमते हुए कहा

"बाबूजी पहले चाय पी ली ई कुल काम दोपहर में"

सुगना ने कजरी को सब कुछ साफ-साफ बता दिया था. आज सरयू सिंह के जन्मदिन के विशेष उपहार के रूप में कजरी ने भी सुगना को चुदने की इजाजत दे दी थी थी.

सरयू सिंह बेहद प्रसन्न थे। उन्होंने पिछले तीन-चार महीनों से सुगना से संभोग का इंतजार किया था तो तीन चार घंटे और भी कर सकते थे। उन्होंने सुगना की बात मान ली और वह अपनी नजरों से सुगना के खूबसूरत जिस्म का और होठों से चाय का आनंद लेने लगे।

सुगना अपने बाबूजी की कामुक निगाहों को अपनी चूचियां और जांघों के बीच टहलते हुए देखकर रोमांचित हो रही थी और होठों पर मुस्कान लिए उनकी चाय खत्म होने का इंतजार कर रही थी.

कजरी ने अपने कुँवर जी के जन्मदिन के विशेष अवसर पर तरह-तरह के पकवान बनाए और सरयू सिंह का पसंदीदा मालपुआ भी बनाया। परंतु सरयू सिंह को जिस मालपुए की तलाश थी उसके सामने यह सारे पकवान फीके थे। सुगना का मालपुआ रस से सराबोर अपने बाबूजी के होठों और मजबूत लण्ड का इंतजार कर रहा था।

समय काटने के लिए सरयू सिंह ने अपनी कोठरी की साफ सफाई शुरू कर दी। इसी कोठरी में आज वह अपनी प्यारी बहू सुगना को जम कर चोदना चाहते थे। उनका लण्ड भी नए छेद के लिए तड़प रहा था। कितनी कसी हुई होगी सुगना की कोमल गांड उसकी कल्पना मात्र से ही उनका लण्ड में तनाव आ रहा था। वह बार-बार उसे समझाते परंतु वह मानने को तैयार ना था। इंतजार धीरे धीरे बेसब्री में बदल रहा था। काश सरयू सिंह के पास दिव्य शक्ति होती तो वह समय को मुट्ठी में सिकोड़ कर समय को पीछे खींच लेते लेते।

साफ सफाई के दौरान सरयू सिंह को शिलाजीत रसायन की 2 गोलियां मिल गयीं। सरयू सिंह की आंखों में चमक आ गई। गोलियों के प्रभाव और दुष्प्रभाव से वह बखूबी परिचित थे उनके मन में कामेच्छा और डॉक्टर के निर्देश दोनों के बीच द्वंद्व शुरू हो गया। उस गोली को वह खाएं या ना खाएं इसी उहापोह में कुछ पल बीत गए। विजय लंड की ही हुई।

शरीर का सारा रक्त लण्ड में भर चुका था और दिमाग के सोचने की शक्ति स्वाभाविक रूप से कम हो गई थी। सरयू सिंह ने एक गोली घटक ली। और दूसरी गोली अपने बैग में रख लीजिए वह हमेशा अपने साथ रखते थे। सुगना के दोनों अद्भुत छेदों का आनंद लेने के लिए सरयू सिंह ने डॉक्टर के सुझाव को दरकिनार कर दिया था।

अंदर सुगना नहा धोकर तैयार हो रही थी। आज उसे दीपावली के दिन की याद आ रही थी जब मन में कई उमंगे और अनजाने डर को लिए हुए वह अपने जीवन का पहला संभोग सुख लेने जा रही थी। आज उसके मन में बार-बार उसकी छोटी सी गांड का ख्याल आ रहा था जिसे आज एक नया अनुभव लेना था। परंतु उसके डर पर उसकी बुर की उत्तेजना हावी थी वह अपने बाबूजी सरयू सिंह से बेतहाशा चुदना चाहती थी उसकी तड़प भी अब चरम पर पहुंच चुकी थी।

कजरी भी पूरी तरह मन बना चुकी थी। उसने भगवान से प्रार्थना की कि उसके कुंवरजी सरयू सिंह का स्वास्थ्य कायम रहे। सुगना को मुखमैथुन पर विशेष जोर देकर और सरयू सिंह से कम से कम मेहनत कराने की बात समझा कर वह अपनी बहू को लेकर उनकी कोठरी में आ गई। सुगना ने अपने हाथ में पूजा की थाली ली हुई थी और कजरी ने अपनी थाली पर पकवान रखे हुए थे।

दोनों ने उनके जन्मदिन के अवसर पर औपचारिकताएं पूरी कीं। कजरी ने सरयू सिंह को आरती दिखायी और माथे पर तिलक लगाया। सरयू सिंह के मन में एक बार यह ख्याल आया जैसे वह जंग पर जाने वाले वीर सिपाही हों। अपनी कोमलांगी बहु सुगना के कोमल छेद के भेदन के लिए इतनी तैयारी…. सरयू सिंह मुस्कुरा रहे थे।

उनकी निगाहें सुगना की ब्लाउज से झांकती हुई चुचियों पर गड़ी हुई थी। सुगना ने अपने हाथों से उन्हें मालपुआ खिलाया और उन्होंने उसकी उंगलियों को अपने होठों से पकड़ लिया। कजरी अपनी बहू और कुँवरजी की अठखेलियां देख रही थी और शीघ्र ही वहां से हटने की सोच रही थी तभी गांव का चौकीदार भागता हुआ आया….

सरयू भैया सरयू भैया चलये मनोरमा मैडम ने आपको तुरंत बुलाया है।

सरयू सिंह भौचक रह गए

"अचानक कैसे आ गई मनोरमा मैडम?"

उन्हीं से पूछ लीजिएगा? कुछ जरूरी काम होगा तभी ढेर सारे पटवारी भी उनके साथ हैं"

"जा बोल दे मेरी तबीयत खराब है मैं नहीं आ सकता" सरयू सिंह किसी भी हाल में सुगना का साथ नहीं छोड़ना चाह रहे थे…

सुगना और कजरी मुस्कुरा रही थीं। सुगना के मन में एक अनजाना डर समा गया एक पल के लिए उसे लगा जैसे नियति ने आज भी उसके काम सुख पर ग्रहण लगा दिया था परंतु उसके बाबूजी अभी मोर्चा लिए हुए थे।

चौकीदार ने कहा

"छुट्टी तो नहीं लिया है ना आपने, चुपचाप जाकर मिल लीजिए बाकी आप जानते हैं मैडम कैसी हैं"

सरयू सिंह के दिमाग में मनोरमा का चेहरा घूम गया। वो बेहद कड़क एसडीएम थीं। जितनी कड़क उतनी ही सुंदर । 5 फुट 6 इंच की ऊंचाई भरा पूरा शरीर और सुंदर मुखड़ा तथा वह सरयू सिंह से बेहद तमीज से पेश आती थी।

सरयू सिंह इस बात को बखूबी मानते थे कोई भी सुंदर और युवा औरत उनकी कद काठी देखकर उन पर आसक्त तो हो सकती थी पर उनसे क्रोधित होना शायद सुंदर नारियों के के वश में न था।

इसके बावजूद ओहदे की अपनी चमक होती है। सरयू सिंह के मन में उसका खौफ हमेशा रहता था किसी महिला से डांट खाना उन्हें कतई गवारा ना था।

चौकीदार से हो रही इतनी देर की बहस में ही सरयू सिंह की उत्तेजना पर ग्रहण लग चुका था उन्होंने मनोरमा से मिलना ही उचित समझा और अपनी सजी-धजी प्रियतमा सुगना को देखते हुए बोले

"सुगना बेटा थोड़ा इंतजार करो मैं आता हूं"

चौकीदार ससुर और बहू के बीच में यह संबोधन देखकर वह सरयू सिंह से प्रभावित हो गया।

उधर प्राइमरी स्कूल पर खड़ी एसडीएम मनोरमा परेशान थी उसने प्राइमरी स्कूल के टॉयलेट का प्रयोग करने की सोची पिछले दो-तीन घंटों से लगातार दौरा करते हुए उसे जोर की पेशाब लग चुकी थी परंतु स्कूल का टॉयलेट देखकर वह नाराज हो गई। तुरंत इतनी जल्दी इसकी सफाई हो पाना भी असंभव था।

स्कूल के प्रिंसिपल ने हाथ जोड़कर कहा

मैडम जी सरयू सिंह जी का घर बगल में ही है आप वहीं चली जाए। मनोरमा के दिमाग में सरयू सिंह का मर्दाना और बलिष्ठ शरीर घूम गया। उनके पहनावे और चेहरे की चमक को देखकर मनोरमा जानती थी कि वह एक संभ्रांत पुरुष है। वह तैयार हो गई सरयू सिंह अपने दरवाजे से कुछ ही दूर आए होंगे तभी मनोरमा अपने काफिले के साथ ठीक उनके सामने आ गई।

सरयू सिंह ने दोनों हाथ जोड़कर मनोरमा का अभिवादन किया और मनोरमा ने भी अपने चेहरे पर मुस्कान ला कर उनका अभिवादन स्वीकार किया।

साथ चल रहे पुलिस वाले ने सरयू सिंह के कान में सारी बात बता दी और सरयू सिंह उल्टे पैर वापस अपने घर की तरफ आने लगे। उनके चेहरे पर मुस्कान थी मनोरमा मैडम ने उनके घर आकर निश्चय ही उन्हें इज्जत बख्शी थी। रास्ते में चलते हुए मनोरमा ने कहा..

आप भी बनारस चलने की तैयारी कर लीजिए दो-तीन दिनों का काम है बनारस महोत्सव की तैयारी करनी है

सरयू सिंह आज किसी भी हाल में सुगना को छोड़ने के मूड में नहीं थे मुंह में हिम्मत जुटा कर कहा

"मैडम मैं परसों आता हूं मेरे परिवार वाले भी उस महोत्सव में जाना चाहते हैं"

"फिर तो बहुत अच्छी बात है आप मेरे साथ चलिए और वहां महोत्सव की तैयारियां कराइये मैं परसों अपनी गाड़ी भेज कर इन्हें बुलवा लूंगी।"

मनोरमा ने शरीर सिंह के घर में जाकर उनका बाथरूम प्रयोग किया। सुगना और कजरी ने मनोरमा का दिल खोलकर स्वागत किया सुगना की खूबसूरती और कजरी की आवभगत देखकर मनोरमा बेहद प्रसन्न हुई। सुगना की खूबसूरत और कुंदन जैसी काया देखकर मनोरमा उससे बेहद प्रभावित हो गई गांव की आभाव भरी जिंदगी में भी सुगना ने इतनी खूबसूरती कैसे कायम रखी थी यह मनोरमा के लिए आश्चर्य का विषय था । वह उससे ढेर सारी बातें करने लगी सुगना ने कुछ ही पलों में अपना प्रभाव मनोरमा पर छोड़ दिया था।

उधर सरयू सिंह पर शिलाजीत रसायन का असर था जब जब वह सुगना को देखते उनका लण्ड उछल कर खड़ा हो जाता परंतु आज उन्हें सुगना से दूर करने के लिए नियति ने मनोरमा को भेज दिया था।

ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे नियति बनारस महोत्सव को रास रंग का उत्सव बनाने की तैयारी में थी। कजरी ने सरयू सिंह के कपड़े तैयार किये और कुछ ही देर में सरयू सिंह मनोरमा के पीछे पीछे जीप की तरफ चल पड़े। सुगना अपनी जांघों के बीच अपनी उत्तेजना को दम तोड़ते हुए महसूस कर रही थी।

सुगना और कजरी को एक ही बात की खुशी थी कि बनारस महोत्सव जाने का प्रोग्राम पक्का हो गया था वह भी एसडीएम द्वारा भेजी जा रही गाड़ी से। यह निश्चय ही सम्मान का विषय था। मनोरमा के आगमन से सुगना और कजरी दोनों की प्रतिष्ठा और बढ़ गई थी।

सुगना ने अपनी बुर को दो-चार दिन और इंतजार करने के लिए समझा लिया।

परंतु बनारस में सोनू के दिमाग में बार-बार लाली का चेहरा आ रहा था उस को लगी चोट सोनू को परेशान कर रही थी। लाली दीदी कैसी होंगी? क्या आज ठीक से चल पा रही होंगी ? यह सब बातें सोच कर उसका मन नहीं लग रहा था अंततः वह हॉस्टल से बाहर आया और लाली के घर की तरफ चल पड़ा.

लाली का पुत्र राजू स्कूल गया हुआ था और लाली बिस्तर पर पड़ी टीवी देख रही थी उसने दरवाजा जानबूझकर बंद नहीं किया का बार-बार चलने में उसे थोड़ा कष्ट हो रहा था। राजेश दोपहर के बाद आने वाला था इसीलिए उसने दरवाजा खुला छोड़ दिया था।

लाली के दरवाजे पर पहुंचकर सोनू ने दरवाजा खटखटाया। अंदर से लाली ने आवाज दी

"आ जाइए दरवाजा खुला है"

सोनू थोड़ा आशंकित हो गया। क्या लाली की सच में तबीयत ज्यादा खराब है? लाली हाल में नहीं थी वह अंदर कमरे में आ गया। लाली पेट के बल लेटी हुई थी। उसने आगंतुक को देखे बिना ही कहा थोड़ा आयोडेक्स लगा दीजिए। इतना कहते हुए उसने अपनी ब्लाउज और पेटीकोट के बीच नंगी पीठ को खोल दिया।

सोनू लाली की नंगी पीठ को अपनी आंखों के सामने देखकर मंत्रमुग्ध हो गया उसमें कोई आवाज न कि और पास पड़े आयोडेक्स को उंगलियों में लेकर लाली दीदी की पीठ को छू लिया। सोनू की उंगलियों के स्पर्श को लाली तुरंत पहचान गई और अपनी गर्दन घुमाते हुए बोली

"अरे सोनू बाबू…. मैं समझी कि वो आए हैं"

"कोई बात नहीं दीदी दवा ही तो लगानी है मैं लगा देता हूँ"

लाली ने अपनी शर्म को छुपाते हुए कहा

"छोड़ दे ना वह आएंगे तो लगा देंगे तेरे हाथ गंदे हो जाएंगे"

"अब तो हो गए दीदी" सोनू ने अपनी दोनों उंगलियां (जिस पर आयोडेक्स लिपटा हुआ था) लाली को दिखा दीं।

लाली मुस्कुराने लगी और वापस अपना चेहरा तकिये में छुपा लिया। सोनू की उंगलियां लाली की पीठ के निचले हिस्से पर दर्द के केंद्र की तलाश में घूमने लगीं। लाली दाएं बाएं ऊपर नीचे शब्द बोल कर सोनू की उंगलियों को निर्देशित करती रही और अंततः सोनू ने वह केंद्र ढूंढ लिया जहां लाली को चोट लगी थी।

सपाट और चिकनी कमर जहां दोनों नितंबों में परिवर्तित हो रही थी वही दर्द का केंद्र बिंदु था। लाली का पेटीकोट सोनू की उंगलियों को उस बिंदु तक पहुंचने पर रोक रहा था। सोनू अपनी उंगलियों में तनाव देकर उस जगह तक पहुंच तो जाता पर जैसे ही वह अपनी उंगलियों का तनाव ढीला करता पेटीकोट की रस्सी उसे बाहर की तरफ धकेल देती।

शायद पेटिकोट की रस्सी लक्ष्मण रेखा का काम कर रही थी। तकिए में मुह छुपाई हुई लाली नसोनू की स्थिति बखूबी समझ रही थी। यही वह बिंदु था जिसके आगे सोनू के सपने थे। लाली मुस्कुराती रही परंतु उसके सीने की धड़कन तेज हो गई थी उसके हाथ नीचे की तरफ बढ़ते गए। पेटीकोट की रस्सी लाली के हाथों में आ चुकी थी।

उत्तेजना और मर्यादा में एक बार फिर उत्तेजना की ही जीत हुई और पेटीकोट की रस्सी ने अपना कसाव त्याग दिया। सोनू की उंगलियां एक बार फिर उस बिंदु पर मसाज करने पहुंची। पेटिकोट की रस्सी अपना प्रतिरोध खो चुकी थी सोनू की उंगलियां जितना पीछे जाती वह सरक पर और दूर हो जाती। लाली के दोनों नितम्ब सोनू को आकर्षित करने लगे थे। एकदम बेदाग और बेहद मुलायम। यदि नितंबों पर एक निप्पल लगा होता तो सोनू जैसे युवा के लिए चुचियों और नितंबों में कोई फर्क ना होता। सोनू ने न अपना दूसरा हाथ भी लाली की सेवा में लगा दिया।

लाली को दर्द से थोड़ा निजात मिलते ही उसका ध्यान सोनू की हरकतों की तरफ चला गया। सोनू लाली के नितंबों से खेलने लगा। पेटिकोट ने नितंबों का साथ छोड़ दिया था और उसकी जांघों के ऊपर था। सोनू बीच-बीच में दर्द को के केंद्र को सहला था और अपने इस अद्भुत मसाज की अहमियत को बनाए रखा था।

परंतु उसका ज्यादा समय लाली के नितंबों को सहलाने में बीत रहा था। सोनू के मन में शरारत सूझी और उसने लाली के दोनों नितंबों को अलग कर दिया लाली की बेहद सुंदर गांड और बुर का निचला हिस्सा सोनू को दिखायी पड़ गया। बुर पर मदन रस चमक रहा था।

लाली की का गांड पूरी तरह सिकुड़ी हुई थी। नितंबों पर आए तनाव को देखकर उन्होंने यह महसूस कर लिया। लाली ने जानबूझकर अपनी गांड छुपाई हुई थी। सोनू ने नितंबों को सहलाना जारी रखा। उसे पता था लाली ज्यादा देर तक उसे सिकोड़ नहीं पाएगी।अंततः हुआ भी वही, लाली सामान्य होती गई परंतु उसकी बुर पर आया मदन रस धीरे धीरे लार का रूप लेकर चादर पर छूने लगा।

सोनू वह खूबसूरत दृश्य मंत्रमुग्ध होकर देख रहा था। गांव की बछिया और गायों की सेवा करते करते बुर से बहने वाली लार का मतलब उसे पता था…..

शेष अगले भाग में।

 
धन्यवाद..... अब मिलन बनारस महोत्सव में होगा।
 
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